दो अक्तूबर ने देश को दो विभूतियों दीं; दो ऐसी हस्तियाँ जिनका भारत सदा ऋणी रहेगाः एक जो अपने आग्रह और दृढ़ता के लिए विख्यात था तो दूसरा जो अपनी प्रतिबद्धता और विनम्रता के लिए। दोनों ने ही देश को एक अविस्मरणीय और अनुकरणीय नेतृत्व दिया। बापू और शास्त्री दोनों ही भारत के गौरव थे परन्तु अपने स्वभाव और कार्यप्रणाली में बेहद भिन्न । दोनों ही भारत रत्नों की स्मृति को शत् शत् नमन ।
खंड-खंड में भिन्न-भिन्न संस्कृतियाँ, भिन्न-भिन्न भाषाएँ संजोए हिमालय सा अडिग खड़ा भारत, गौरवमय भारत है अपने पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा और बंग परिवेश से सदा के लिए सज्जित और सुशोभित। यदाकदा लड़ाई झगड़े, सांप्रदायिकता की आग, भेदभाव सब कुछ होता रहता है, फिर भी भारत एक है। अपनापन, एक पारिवारिक परिवेश बना रहा है हमेशा। और यही सदियों से इसकी सबसे बड़ी ताकत, सर्वाधिक मनोहारी छवि और संस्कृति है। कई हमले हुए, कई शासक आए, साथ में अपने तौर-तरीके, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति भी लाए परन्तु, गंगा, बृह्मपुत्र , सिंधु और नर्मदा की तरह न सिर्फ इन्होंने इसकी शस्य श्यामला धरती को सींचा, विविधता से इसका रूप और निखरा, धरती और लहलहाई। आज जब विश्व के बड़े बड़े साम्राज्यों का विघटन हो गया है, रूस जैसे सामंती व शक्तिशाली देश तक कई-कई टुकड़ों में बंट चुके हैं, भारत आज भी अपनी अखंडता में अक्षुण्ण है। प्रायः देश दो जातियाँ या एक ही जाति की दो उपजातियों में शान्ति और समझौता नहीं रख पाते। भारत कई-कई धर्म और जातियों को लेकर साथ है, वह भी एक सौहाद्रपूर्ण समन्वय के साथ। कम संतोष और गर्व की बात नहीं यह। अमृता प्रीतम ने कहीं कहा था-
इक दरिया को जो प्यास लगती है वो दूसरे दरिया की होती है मुसाफिरों के मिलने से क्या होता है जब तक दरिया को दरिया न मिले .....
लेखनी के समन्वय अंक को हमने इसी सोच की प्यास से संजोया है उस भाषाई वैविध्य की इंद्रधनुषी छटा को न सिर्फ पन्नों पर समेटने की , बल्कि आप तक पहुँचाने की चाह के साथ। भारत ही नहीं विश्व की विभिन्न भाषाओं के अनुवाद हैं इस अंक में। विश्व की हर भाषा का अपना साहित्य है वहाँ का सुख-दुख स्वाद समेटे हुए। भारत में खुद कई भाषाएँ हैं जिनके अपने अलग-अलग रूपरंग और आंचलिक संवेदनाएं हैं। लेखनी का अक्तूबर अंक सद्भावना अंक है और भाषांतर विशेषांक है।
समन्वय भिन्न भाषा और संस्कृतियों की सोच और अनुभूतियों का... समन्वय का संबंध सिर्फ सद्भाव से नहीं, ना ही जबर्दस्ती के सानिध्य और गडमड से। समन्वय की प्रक्रिया तो दूध में शक्कर के घुलने जैसी है या फिर मिट्टी में बीज के प्रवेश और फूल बनकर खिलने जैसी है। विविध सोच और संस्कृति के बावजूद एहसास और भावनाओं का एक ही धागा तो जुड़ा है मानव की अनुभूतियों और आदान प्रदान में। चमड़ी का रंग कोई भी हो, जुबां की ध्वनियाँ कितनी भी भिन्न हों, हमारे सुख दुख, भूख प्यास...मतलब एक ही रहा हैं। जरूरत बस पास जाने और समझने की है। पास जाने पर अजनबी अजनबी नहीं रह जाता । ये अहसास मात्र जुड़ाव नहीं, एकात्म हैं। ‘स्व’ को मिटाकर , नए ‘हम’ के चोले का सुखमय प्रकरण है। यह बात दूसरी है कि नए या अपरिचित को समझने के लिए धैर्यमय प्रतीक्षा और ललक चाहिए , जिसके लिए वक्त और अभ्यास दोनों से ही गुजरने का वक्त आज हममें से किसी के भी पास नहीं। और यहाँ पर अनुवाद हमारी मदद करता है, कर सकता है। तुरंत की तुरंत हम सैकड़ों भाषाओं की रचनाओं का आनंद ले लेते हैं। जब अनुवाद में नेहभरी दृष्टि भी हो तो परकाय प्रवेश जैसा ही हो जाता है यह और निर्जीव भी मुखरित हो उठता है। हम दूसरों को न सिर्फ अपना-सा देखते हैं, अपितु पाने और समझने भी लगते हैं। विषय गागर में सागर भरने जैसा है फिर भी उम्मीद है कि हमारा यह लघु प्रयास आपको पसंद आएगा।
किसी भी वाद-विवाद और वैमनस्य का अंत संवाद ही तो है और साहित्य आज भी इसमें अहं भूमिका निभा सकता है। पर चाहा भी तो सदा सच नहीं होता वरना यह इतने लड़ाई-झगड़े और मासूमों का खून-खराबा इन सबकी कोई जरूरत न कभी थी, न रहेगी एक सभ्य और सहिष्णु समाज में और ना ही रहनी चाहिए। खैर...।
अक्सर ही सोचती हूँ , हमारी संस्कृति हमारी भाषा जिसने कई विदेशियों को अपना दीवाना बना दिया , हम भारतीय क्यों इसका सही मान व आकलन नहीं कर पाते। दीवाने प्रेमी की तरह हिन्दी को प्यार करने वाले और हिन्दी की तकनीकी और बारीकियों को समझने वाले समर्पित साधक प्रो. स्टुअर्ट मैकरेगर का 19 अगस्त को 83 वर्ष की उम्र में यहाँ ब्रिटेन में देहावसान हो गया। बीस साल के अथक श्रम के बाद विश्व को हिन्दी-अंग्रेजी की औक्सफोर्ड डिक्शनरी देने वाले इस विद्वान का हिन्दी समाज सदैव ही ऋणी रहेगा। औक्सफोर्ड में पढ़ रहे दर्शन शास्त्र के विद्यार्थी का यूँ एक विदेशी भाषा के प्रति समर्पित हो जाना अपने आप में कम रोचक नहीं। फिजी में मिली एक हिन्दी व्याकरण की किताब ने मानो उनकी रुचि की धारा ही बदल दी थी। 1959-60 में आपने भारत आकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में दाखिला लिया और 1968 में ब्रजभाषी रचनाकार इंद्रजीत ओझा (जो कि मशहूर कवि केशवदास के संरक्षक थे ) पर पीच.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की, फिर तो उनका पूरा जीवन ही मानो हिन्दी को समर्पित था।
लेखिका सरोज श्रीवास्तव 90 के दशक में ब्रिटेन आवास के समय हिन्दी अधिकारी होने की वजह से प्रो. मैकरेगर के संपर्क में आईं। इस अंक में आप पढ़ेंगे प्रोफेसर मैकरेग को एक भावभीनी विनम्र श्रद्धांजलि उन्ही की कलम से। अक्तूबर के इस गरिमामय उत्सवों के महीने में जब नारी के नौ शक्तिमय रूपों की पूजा की जाती है, सात जन्मों के साथ और समर्पण का संकल्प दोहराया जाता है, परिचर्चा में एक सवाल उठाया है पद्मा मिश्रा ने- कितने आजाद हैं आज भी नारी के सपने। और यही रहेगा हमारे अगले अंक का विषय ; आधुनिक नारी और समाज ।
इस माह माह के कवि की तरह हम एक ऐसे कवि को लेकर आए हैं जिनकी कविताओं में एक चौंकाने वाला, तत्व रहता है , वे झकझोरती तो हैं, सोचने पर मजबूर भी करती हैं परन्तु प्रकृति जैसे विस्मय के साथ इनका अर्थ पंखुरी-दर-पंखुरी ही आंखें खोल पाती हैं। माह विशेष में शीतल व सौम्य शरद गीत हैं अपनी धवल चांदनी लिए और नमन में हम देश के राष्ट्रपिता गांधी को याद कर रहे हैं। कविताओं में अलैक्जैंदर पुश्किन, पाब्लो नैरूदा विलियम वर्डस्वर्थ , टैगोर और कई अन्य विश्व के महान कवियों की कुछ रचनाओं के अनुवाद हैं, साथ ही भारत की विविध आंचलिक मधुरता लिए हुए विभिन्न भाषाओं की रचनाएँ हैं। गीत और ग़ज़ल शील निगम जी के हैं व कहानियों में हम इसबार आपके लिए भोजपुरी, तामिल, मराठी, व सिंधी कहानी के साथ-साथ चांद परियाँ और तितली में एक चेक लोककथा लेकर आए हैं। इंगलिश सेक्शन में स्वागत कर रहे हैं जानी मानी लेखिका सरोजनी साहू का उनकी उड़िया कहानी के साथ और किड्स कौर्नर में एक अफ्रीकन लोक कथा व बाल गीत है। इसके अलावा भी अन्य सभी नियमित स्तंभ-मिलाजुलाकर हमेशा की तरह तीस से अधिक स्तंभ, यानी कि महीने के हर दिन के लिए एक नया स्तंभ। उम्मीद है कि यह अंक भी आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा। प्रतिक्रिया और सुझावों के इंतजार के साथ, माह के सभी आगामी त्योहारों की अशेष शुभकामनाएँ।
एक बच्चे के चेहरे का रूप धरे कोई ताबूत, एक क़िताब किसी कौवे की आँतों के भीतर लिखी हुई, एक जानवर लस्त-पस्त चलता कोई फूल लिए हुए, एक पत्थर किसी पागल के फेफड़ों के भीतर साँस लेताहुआ. यही है । यही तो है बीसवीं सदी ।
- अदोनिस अँग्रेज़ी से अनुवाद :मनोजपटेल
पूरे तो हों सपने(चाईनीज़)
दक्षिणी पहाड़ियों की तराई में उगाता हूँ सेमिये घास उगी है झमाझम, पर सेमियाँ बहुत कम भोर में जाता हूँ बंजर को आबाद करने चाँदनी रात में भी उठाकर कुदाल तंग रास्ता, पौधे और दूब उत्तुंग ... रात भर ओस से तर मेरे कपड़े परवाह नहीं पूरे तो हों सपने -थाओ छ्येन
इंद्रधनुष ( अंग्रेजी)
जब जब देखूं इन्द्रधनुष नभ
मन झूम झूम जाता है | ऐसा ही था जब बचपन था आज युवा भी वह भाता है |
यह रहेगा ऐसा ही जब अपने को बूढ़ा पाउँगा | या चुपके से एक दिन जब दुनिया से उठ जाऊंगा |
बचपन है जनक जीवन का यह सत्य सामने पाता हूं |
-विलियम वर्ड्सवर्थ अनुवादः रामाश्रय सिंह
गायक (रूसी) येकातिरिना बाकूनिना के लिए
सुनी क्या तुमने जंगल से आती आवाज़ वो प्यारी गीत प्रेम के, गीत रंज के, गाता है वह न्यारे सुबह - सवेरे शान्त पड़े जब खेत और जंगल सारे पड़ी सुनाई आवाज़ दुखभरी कान में हमारे यह आवाज़ कभी सुनी क्या तुमने ?
मिले कभी क्या घुप्प अंधेरे जंगल में तुम उससे गाए सदा जो बड़े रंज से अपने प्रेम के किस्से बहे कभी क्या आँसू तुम्हारे मुस्कान कभी देखी क्या भरी हुई हो जो वियोग में ऎसी दृष्टि लेखी क्या मिले कभी क्या तुम उससे ?
साँस भरी क्या दुख से कभी आँखों की वीरानी देख गीत वो गाए बड़े रंज से दे अपने दुख के संदेश घूम रहा इस किशोर वय में जंगल में प्रेमी उदास बुझी हुई आँखों में उसकी अब ख़त्म हो चुकी आस साँस भरी दुख से क्या कभी तुमने ?
-अलैक्सान्दर पुश्किनमूल रूसी भाषा से अनुवाद : अनिल जनविजय
प्रेमपत्र की विदाई (रूसी)
विदा, प्रिय प्रेमपत्र, विदा, यह उसका आदेश था तुम्हें जला दूँ मैं तुरन्त ही यह उसका संदेश था
कितना मैंने रोका ख़ुद को कितनी देर न चाहा पर उसके अनुरोध ने, कोई शेष न छोड़ी राह हाथों ने मेरे झोंक दिया मेरी ख़ुशी को आग में प्रेमपत्र वह लील लिया सुर्ख़ लपटों के राग ने
अब समय आ गया जलने का, जल प्रेमपत्र जल है समय यह हाथ मलने का, मन है बहुत विकल भूखी ज्वाला जीम रही है तेरे पन्ने एक-एक कर मेरे दिल की घबराहट भी धीरे से रही है बिखर
क्षण भर को बिजली-सी चमकी, उठने लगा धुँआ वह तैर रहा था हवा में, मैं कर रहा था दुआ लिफ़ाफ़े पर मोहर लगी थी तुम्हारी अंगूठी की लाख पिघल रही थी ऐसे मानो हो वह रूठी-सी
फिर ख़त्म हो गया सब कुछ, पन्ने पड़ गए काले बदल गए थे हल्की राख में शब्द प्रेम के मतवाले पीड़ा तीखी उठी हृदय में औ' उदास हो गया मन जीवन भर अब बसा रहेगा मेरे भीतर यह क्षण ।।
-अलैक्सान्दर पुश्किनः मूल रूसी भाषा से अनुवाद : अनिल जनविजय
सबसे उदास कविता (स्पैनिश)
मैं आज सबसे उदास कविता लिख सकता हूँ
लिख सकता हूँ कि रात तारों से जगमग है तारे, नीले-नीले तारे, दूर टिमटिमाते तारे
मैं आज सबसे उदास कविता लिख सकता हूँ लिख सकता हूँ कि प्यार किया था उसे और उसने मुझे
ऐसी ही एक रात थी जब वो थी मेरी बाँहों में चूमा था बारबार इसी अनंत विस्तार के नीचे
प्यार किया था जी भरकर कैसे न करता प्यार उन खामोश सुन्दर आँखों को
मैं आज सबसे उदास कविता लिख सकता हूँ वह मेरे पास नहीं है, खो चुका हूँ मैं उसे
काली यह रात और-और गहराती जा रही है और कविता आत्मा को भिगो रही है ज्यों ओस दूब को
फर्क यह नहीं कि मेरा प्यार रोक न सका उसे फर्क यह है कि रात तारों वाली है और वह साथ नहीं
दूर कोई गाता है और मेरी आत्मा प्यासी है उसके लिए
मानो ले ही आएंगी पास, ये आंखें ढूँढ रही हैं हृदय तरसता है और वह मेरे पास नहीं है
वही रात, वही चांदनी में नहाए पेड़ बस हम ही वो नहीं रहे , जो थे कभी
नहीं चाहता हूँ चाहना उसे, चाहे जितना भी चाहा था कभी पर शब्द हवा पे सवार उसी तक पहुँच जाते हैं बारबार
वो किसी और की है, उतनी ही अंतरंग जितनी थी मेरी, कभी
वह मधुर आवाज, कोमल तन, और बोलती आंखें नहीं मैं अब उसे प्यार नहीं करता, झूठ, करता हूँ
प्यार की उम्र क्यों नन्ही और दुःख का पहाण बड़ा
तारों भरी रात में वह मेरी बाँहों में थी आज वह नहीं, और रूठी आत्मा उदास है
अंतिम दुख है यह पर जो वह देगी मुझे और अंतिम कविता यह, मैं लिखूंगा उसपर।
पाब्लो नेरूदाः अंग्रेजी से अनुवादः शैल अग्रवाल
मैं तुम्हें.. (स्पैनिश)
मैं तुम्हें एक खूबसूरत गुलाब या चमकते हीरे की तरह नहीं, ना ही दहकते फूलों की कतार की तरह, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ जैसे एक रहस्य आत्मा की तड़प से प्यार किया जाता है
मैं तुम्हें प्यार करता हूँ एक टहनी की तरह जो खिलती नहीं पर असंख्य फूलों को छुपाए है यह भी तो प्यार ही है कि एक सुगंध धरती से उठी और मुझमें में आ समाई है
मैं तुम्हें प्यार करता हूँ , बिना जाने कब, कहाँ कैसे सीधे , सरल बिना किसी अहं या ग्रन्थि के मैं तुम्हें प्यार करता हूँ , क्योंकि यही तो हूँ मैं इसलिए जहाँ भी मैं नहीं, अब तुम भी तो नहीं
इतनी पास हो तुम कि सीने पर रखा यह हाथ मेरा नहीं, तुम्हारा है इतनी पास हो तुम कि बन्द पलकें हैं तुम्हारी, जब मैं सो जाता हूँ।
पाब्लो नेरूदाः अंग्रेजी से अनुवादः शैल अग्रवाल
एक जादुई पल (रूसी)
वो जादुई पल आज भी आँखों में तुम मेरे साथ, तुम मेरे सामने... थोड़ा धुंधला और अस्पष्ट पर मेरे लिए तो अति सुन्दर, अति दुर्लभ
इन दूरियों और वर्जनाओं से विनती करता हूँ रहम खाएँ मुझपर युग बीते शीतल मधुर आवाज सुने युग बीते तुम्हें सपने तक में आए युग बीते जब क्रूर वक्त के हाथों छिन गईं तुम मुझसे
तुम जो मेरा एकांत हो, मेरी साधना हो !
धुँधली पड़ती जा रही हैं तुम्हारी आवज की सरगम अलौकिक नाक-नक्श,
सूने उदास, अलस पलों में खोया रहता हूँ मैं काले उमड़ते बादलों में कोई कल्पना नहीं, कोई प्रेरणा नहीं न कोई रोने, मचलने या प्यार करने को न एक बहाना जीने को...
दुख में डूबी पलकें पुनः देख रही हैं उमड़ते बादल अचानक फिर वही जादुई पल मेरे सामने- तुम मेरे साथ... अति सुन्दर, अति दुर्लभ !!
अलेक्सानदर पुश्किनः अंग्रेजी से अनुवादः शैल अग्रवाल
दूर अपने घर जातीं तुम (रूसी)
दूर अपने घर जातीं तुम एक अपरिचित देश जा रही थीं सबसे कठिन असह्य उस पल में मैंने तुम्हारी हथेलियों को अपने आंसुओं से भिगोया था ठंडी सुन्न पड़ती उंगलियों में पकड़े रोकना चाहा था कैसे भी तुम्हें
मेरे दिल ने कहा था- साथ रहेगा अब तो यह दर्द सदा, तुमने अपना मुँह घुमा लिया था हटा लिए थे होठ उस क्रूर चुम्बन से एक स्वप्न जो जगाया था मेरे भीतर निष्काषित कर दिया था सदा के लिए- तुमने कहा था- अगली बार जब हम मिलेंगे घने औलिव की छाँव में, खुली उजास धूप में तब हमारे चुम्बन से यह पीड़ा जा चुकी होगी हमेशा हमेशा के लिए...
वही, नीला और स्वच्छ आकाश है जहाँ घने पेड़ों की छाँव आज भी कलकल बहती नदी पर नृत्य करती है पर खो गया है सब वक्त की अनंत धारा में वह रूप, वह पीड़ा
सिवाय यादों में बसे उस मधुर चुंबन के, इंतजार है आज भी मुझे, वादा था तुम्हारा।
अलेक्सान्दर पुश्किनः अंग्रेजी से अनुवादः शैलअग्रवाल
इन्तज़ार करो मैं लौटूँगा (रूसी)
इन्तज़ार कर, मैं लौटूँगा । इन्तज़ार कर तू मेरा, इंतज़ार कर तू, जब उदास हो हो तेज़ बारिश का फेरा, इंतज़ार कर, जब बर्फ़ गिरे और गर्मी पड़े भारी, जब भूल चुके हों सबको, सब कोई भूल कहानी सारी, इन्तज़ार कर, जब दूर जगह से ख़त भी न आ पाएँ, इन्तज़ार कर, जब सब थक जाएँ और थक कर सो जाएँ ।
इन्तज़ार कर, मैं लौटूँगा और भूल जा उन सबको जो याद करते वह सब-कुछ भूल जाना था जिसको बेटा सोचे, माँ भी सोचे मैं ज़िन्दा नहीं बचा हूँ दोस्त थक जाएँ बाट जोहते सोचें कि मर चुका हूँ जाम पिएँ वो मेरी याद में बैठ अलाव किनारे पर तू इंतज़ार कर मेरा, जानम ! यादों के सहारे
इन्तज़ार कर, मैं लौटूँगा हर मौत को हराकर इन्तज़ार मेरा जो छोड़ चुके हैं उनको सिर हिलाकर समझ नहीं पाएँगे वो कैसे तूने मुझे बचाया इन्तज़ार किया तूने मेरा तो मैं ज़िन्दा रह पाया सिर्फ़ मैं और तू यह जानेंगे, जानम ! मैं कैसे लौट के आया इन्तज़ार किया तूने मेरा, ज़िन्दगी ! सिर्फ़ तूने मुझे बचाया
कंस्तांतिन सीमानफ़ः मूलः रूसी से अनुवाद : अनिल जनविजय
मैं सोना चाहता हूँ(स्पैनिश)
“मैं सोना चाहता हूँ । मैं सो जाना चाहता हूँ ज़रा देर के लिए, पल भर, एक मिनट, शायद एक पूरी शताब्दी... लेकिन लोग यह जान लें कि मैं मरा नहीं हूँ... कि मेरे होठों पर चाँद की अमरता है, कि मैं पछुआ हवाओं का अजीज दोस्त हूँ... ...कि, कि... मैं अपने ही आँसुओं की घनी छाँह हूँ...”
फेदरिको गार्सिया लोर्काः अनुवादः उदयप्रताप
वर्षा गानः अज्ञात
हरे तीर चीरते हैं धरती का सीना और बढ़ते हैं स्याह बादलों की ओर टपकती है जल बूँदें टप टप टप टप बरसती जल धाराएँ करती हैं शोर टपकती हैं कोपलों से बूँदें टप टप टप टप और हरे तीरों का आवेग लेता है वेग पिघलने लगता है गहरा कुहासा बूँदें बनकर टप टप टप टप
अनुवादः किशोर दिवसे
अलाव (अमरीकी)
आओ ,,,सेंक लो अपनी बर्फ हथेलियाँ समय के सर्द चक्रवात से चाँद की रौशनी में मैंने जलाया है अलाव ,उन लकड़ियों के गट्ठर से जो थे किसी जीवित पेड़ का किस्सा और बन सकते थे किसी जहाज का हिस्सा बताइए पत्तियाँ अधिक शावत हैं या लकड़ियों के सीने में चुभोये नश्तर या फिर बढ़ई के हाथ की अंगुलियाँ इन बहुरंगी आग की लपटों से आओ।.. सेंक लो अपनी बर्फ -हथेलियाँ समय के सर्द चक्रवात से . चाँद की मद्धम रौशनी के नीचे दहक रहा है अलाव लकड़ियों से
-विटर बायनरः अनुवादः किशोर दिवसे
अकेली बनिहारिन ( अंग्रेजी )
तकते रहो उस अकेली बनिहारिन को निरंतर काम करती पहाड़ी ललना को फसल काटते वह गुनगुनाती है गीत रुको और सुनो... सुरों के मधुर मीत ............
फसल काटकर बांधती है वह गट्ठर अकेले मधुर गीत गुनगुनाती है वह कितने अकेले ओह! सुनो गूंजते हैं कैसे समूची पहाड़ी में गीत उस प्यारी सुंदर प्यारी ललना के ........................ नहीं गुनगुनाये होंगे अब तक किसी कोयल ने पहाड़ी ललना के गीतों से मधुर "स्वागत गीत" चिलचिलाती रेत के अरब रेगिस्तान में भी छायादार कोनों में सुस्ताते ,काफिलों के लिए .................... वसंत में भी नहीं सुनी थी इतनी मीठी कूक कोयल भी क्यों भूल गई थी इतनी मीठी कूक मौन भंग कर दे जो शांत समंदर का और सफर करते यहूदी नाविकों का .............. कोई बताओ पहाड़ी ललना गाती है कौन सा गीत ! क्या करूणा से शोकाकुल होगा उसका विरही मीत या, यह गीत है बिछुड़े परिजन के प्रेम की जीत या फिर युद्ध के मृतकों का है कोई विलाप गीत अंतर्मन की है पीड़ा-दुःख,दर्द या करूणा अतीत की यादें।फिर भिगो सकती है नयना
कैसा भी हो गीत,पर छिपी है ललना की प्रीत जैसे अमर हो गए सुर ,उनसे सधकर संगीत मैंने देखा है उसे फसल काटते -गाती है वह गीत हाथों में हंसिया-झुके-झुके गुनगुनाती है मन मीत .................. आस के अघाते तक,सुना पहाड़ी बनिहारिन को जैसे ही मैं चढ़ता था ऊंची पहाड़ियों को धडकनें गूंजने लगतीं उन गीतों के सुरों पर अरसा हो गया सुने नहीं,वे मधुर गीत कहीं पर
-विलियम वर्ड्सवर्थः अनुवादः किशोर दिवसे
ज्वार भाटा (अमरीकी)
लहरें उठती हैं और गिरती हैं सांझ के धुंधलके पर लगता है स्याह का कर्फ्यू तब उत्तेजित समंदर की नम भूरी रेत पर फिर से लहरें उठती है और गिरती हैं भागता है पथिक बदहवास शहर की ओर छोड़ जाता है पदचिन्हों के क्षणिक छाप फिर नया पथिक... और नए पद चिन्ह क्योकि लहरें उठती हैं और गिरती हैं
-एच.डबलू लौंगफैलोः अनुवादः किशोर दिवसे
समंदर का साया( अमरीकी)
पर्णांग की पत्तियों सी पारदर्शी स्फटिक से विहंगम में इठलाती लहराती /लता के तने पर बलखाती उड़ रही थी एक प्यारी सी तितली दूर तक पसरे दक्षिणी पोखर की ओर अब नहीं है आकाश में तैरती सी वह तितली जो उडी थी आकाश से उतरी
अपने पंखों का धनुष उठाये,अनदेखी पश्चिम में मछुआरी नौकाओं के दस्ते लंगर डाले हुए अनेक जहाज़ों के बीच पूरब में अकेला सारस स्थिति प्रग्य छिपकर कर रहा है मत्स्य यग्य नहीं है कहीं पर भी सूखी जमीन/पर सूरज की गर्म रौशनी के नीचे हाथ भर के फासले पर है शांति निस्तब्धता ,सहज और अनुपम
-विटर बायनर अनुवादः किशोर दिवसे
एक नदी से (यूक्रेनियन)
नदी-पानी की रेतघड़ी अनन्त की रूपक मैं तुममें प्रवेश करता हूँ अधिक से अधिक भिन्न ताकि मैं एक बादल एक मछली या एक चट्टान हो सकूँ और तुम अपरिवर्तनीय हो एक घड़ी की तरह नापती हुई शरीर के कायाकल्प और आत्मा की विफलताएँ रेशों और प्यार की धीमी सड़न में मिट्टी से उपजा तुम्हारा छात्र होना चाहता हूँ और खोजना स्रोत ओलंपियन हृदय ठण्डा टार्च सरसराते खम्भे तुम मेरी आस्था और निराशा का तलशैल हो ओ नदी मुझे सिखाओ आग्रह और हठ ताकि मैं आखिरी घड़ी में पात्रता रखूँ विशाल डेल्टा की छाया में समाप्त होने की आदि और अन्त के पवित्र त्रिभुज में
-ज्बीग्न्येव हेर्बेतः अनुवाद : रेनाता चेकाल्स्का- अशोक वाजपेयी
भारत - मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाए बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते है इस शब्द के अर्थ खेतों के उन बेटों में है जो आज भी वृक्षों की परछाइओं से वक़्त मापते है उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं और वह भूख लगने पर अपने अंग भी चबा सकते है उनके लिए ज़िन्दगी एक परम्परा है और मौत के अर्थ है मुक्ति जब भी कोई समूचे भारत की राष्ट्रीय एकता' की बात करता है तो मेरा दिल चाहता है - उसकी टोपी हवा में उछाल दूँ उसे बताऊँ के भारत के अर्थ किसी दुष्यंत से सम्बंधित नहीं वरन खेत में दायर है जहाँ अन्न उगता है जहाँ सेंध लगती है
अवतार सिंह संधु ' पाश'
सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना(पंजाबी)
सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती, पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती, गद्दारी, लोभ का मिलना सबसे खतरनाक नहीं होता, सोते हुये से पकडा जाना बुरा तो है, सहमी सी चुप्पी में जकड जाना बुरा तो है, पर सबसे खतरनाक नहीं होता, सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शान्ति से भर जाना, न होना तडप का सब कुछ सहन कर जाना, घर से निकलना काम पर और काम से लौट कर घर आना, सबसे खतरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना । सबसे खतरनाक होती है, कलाई पर चलती घडी, जो वर्षों से स्थिर है। सबसे खतरनाक होती है वो आंखें जो सब कुछ देख कर भी पथराई सी है, वो आंखें जो संसार को प्यार से निहारना भूल गयी है, वो आंखें जो भौतिक संसार के कोहरे के धुंध में खो गयी हो, जो भूल गयी हो दिखने वाली वस्तुओं के सामान्य अर्थ और खो गयी हो व्यर्थ के खेल के वापसी में । सबसे खतरनाक होता है वो चांद, जो प्रत्येक हत्या के बाद उगता है सूने हुए आंगन में, जो चुभता भी नहीं आंखों में, गर्म मिर्च के सामान सबसे खतरनाक होता है वो गीत जो मातमी विलाप के साथ कानों में पडता है, और दुहराता है बुरे आदमी की दस्तक, डरे हुए लोगों के दरवाजे पर ।
अवतार सिंह संधु ' पाश'
वफा (पंजाबी)
बरसों तड़पकर तुम्हारे लिए मैं भूल गया हूं कब से, अपनी आवाज की पहचान भाषा जो मैंने सीखी थी, मनुष्य जैसा लगने के लिए मैं उसके सारे अक्षर जोड़कर भी मुश्किल से तुम्हारा नाम ही बन सका मेरे लिए वर्ण अपनी ध्वनि खो बैठे हैं बहुत देर से मैं अब लिखता नहीं-तुम्हारे धूपिया अंगों की सिर्फ परछाईं पकड़ता हूं।
कभी तुमने देखा है-लकीरों को बगावत करते? कोई भी अक्षर मेरे हाथों से तुम्हारी तस्वीर बन कर ही निकलता है तुम मुझे हासिल हो(लेकिन) कदम भर की दूरी से शायद यह कदम मेरी उम्र से ही नहीं मेरे कई जन्मों से भी बड़ा है यह कदम फैलते हुए लगातार रोक लेगा मेरी पूरी धरती को यह कदम माप लेगा मृत आकाशों को तुम देश में ही रहना मैं कभी लौटूंगा विजेता की तरह तुम्हारे आंगन में इस कदम या मुझे जरूर दोनों में से किसी को कत्ल होना होगा।
अवतार सिंह संधु ' पाश'
एक ख़त (पंजाबी)
मैं – एक आले में पड़ी पुस्तक। शायद संत–वचन हूँ, या भजन–माला हूँ, या काम–सूत्र का एक कांड, या कुछ आसन, और गुप्त रोगों के टोटके पर लगता है मैं इन में से कुछ भी नहीं। (कुछ होती तो ज़रूर कोई पढ़ता) और लगता – कि क्रांतिकारियों की सभा हुई थीं और सभा में जो प्रस्ताव रखा गया मैं उसी की एक प्रतिलिपि हूँ और फिर पुलिस का छापा और जो पास हुआ कभी लागू न हुआ सिर्फ़ कार्रवाई की ख़ातिर संभाल कर रखा गया। और अब सिर्फ़ कुछ चिड़ियाँ आती हैं चोंच में कुछ तिनके लाती हैं और मेरे बदन पर बैठ कर वे दूसरी पीढ़ी की फ़िक्र करती हैं (दूसरी पीढ़ी की फ़िक्र कितनी हसीन फ़िक्र है!) पर किसी भी यत्न के लिए चिड़ियों के पंख होते हैं, पर किसी प्रस्ताव का कोई पंख नहीं होता। (या किसी प्रस्ताव की कोई दूसरी पीढ़ी नहीं होती?)
-अमृता प्रीतम
तू नहीं आया (पंजाबी)
चैत ने करवट ली, रंगों के मेले के लिए फूलों ने रेशम बटोरा – तू नहीं आया
दोपहरें लंबी हो गईं, दाख़ों को लाली छू गई दरांती ने गेहूँ की वालियाँ चूम लीं – तू नहीं आया
बादलों की दुनिया छा गई, धरती ने दोनों हाथ बढ़ा कर आसमान की रहमत पी ली – तू नहीं आया
पेड़ों ने जादू कर दिया, जंगल से आई हवा के होंठों में शहद भर गया – तू नहीं आया
ऋतु ने एक टोना कर दिया, चाँद ने आकर रात के माथे झूमर लटका दिया – तू नहीं आया
आज तारों ने फिर कहा, उम्र के महल में अब भी हुस्न के दिये जल रहे हैं – तू नहीं आया
किरणों का झुरमुट कहता है, रातों की गहरी नींद से रोशनी अब भी जागती है – तू नहीं आया
-अमृता प्रीतम
मेरा पता (पंजाबी)
आज मैंने अपने घर का नंबर मिटाया है और गली के माथे पर लगा गली का नाम हटाया है और हर सड़क की दिशा का नाम पोंछ दिया है पर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना है तो हर देश के, हर शहर की, हर गली का द्वार खटखटाओ यह एक शाप है, एक वर है और जहाँ भी आज़ाद रूह की झलक पड़े – समझना वह मेरा घर है।
-अमृता प्रीतम
बहुरूपिया (मराठी)
सीना चाहिए फटे हुए जीवन को खेतों में फैली हुई अनंत हरी घास की नोंकदार सुइयों से मेरी दुकान है दरजी की। धोना चाहिए सिलवट पड़े फटे वस्त्रों को मिट्टी के ढेर और काटती हवाओं में हँसते हुए पसीने से, पीढ़ियों से मेरा धंधा धोबी का। उधेड़ना चाहिए बचकाने पंडितों का कानूनी कसीदा और चढ़ाना चाहिए न मिटने वाला नया रंग गहरा लाल, जिसमें छिप जाएँ खूनी रक्त के गहरे दाग। मिट्टी के रंगों वाला मैं हूँ रँगरेज। सुलझाना चाहिए क्रांति की कंघी से बीमार जिंदगी के उलझे हुए बाल, और सजाना चाहिए भोली जनता की शर्मीली दुल्हन को, अनागत से गहरे प्रणय के लिए मेरे खून में का पुरोहित हटता नहीं ब्याह रचाने का शौक घटता नहीं।
-वृंदा कलिंदकरः मराठी से अनुवाद दिनकर सोनवलकर
चल अकेला ( बंगाली)
तेरा आवाहन सुन कोई ना आए, तो तू चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला, चल तू अकेला, जब सबके मुँह पे पाश.. ओरे ओरे ओ अभागी ! सबके मुंह पे पाश, हर कोई मुंह मोड़के बैठे, हर कोई डर जाय ! तब भी तू दिल खोलके, अरे! जोश में आकर, मन का गाना, गूंज तू अकेला! जब हर कोई वापस जाय... कानन-कूच की बेला पर सब कोने में छिप जाय...
-रवीन्द्र नाथ टैगोर
मैं मरना नहीं चाहता ( बंगाली)
मैं मरना नहीं चाहता इस सुन्दर संसार में मनुष्यों के बीच मैं बचा रहना चाहता हूं जीवंत ह्रदय के बीच यदि जगह पा सकूं तो इन सूर्य-किरणों में, इस पुष्पित कानन में मैं अभी जीना चाहता हूं
पृथ्वी पर यहां प्राणों की तरंगित क्रीडा ... कितने मिलन, कितने विरह कितनी हंसी, कितने आंसू मनुष्य के सुख-दुःख को संगीत में पिरोकर यदि अमर आलय की रचना कर सकूं तो यहां मैं जीना चाहता हूं
यदि यह संभव नहीं तो जब तक रहूं तुम सबों के लिए सुलभ रहूं संगीत के नए नए पुष्प खिलाता रहूं इस आशा के साथ कि तुम उन्हें चुन लोगे देर-सबेर हंसते हुए फूल तुम ले लेना उसके बाद अगर वे फूल मुरझा जाएं तो उन्हें फेंक देना !
-रवीन्द्र नाथ टैगोर
तुम्हारी बातों से (असमिया)
तुम्हारी बातों की सीढी चढ़ते हमको मिला शब्दों का इक गाँव
आसमान की चिड़िया खेत की गाय-बकरी तलब के कछुए और मछली और हमारे घर के पिछवाड़े में लगे पेड़ सबने मानने से इंकार किया था ऋतुओं का शासन
तुम्हारी बातों के नशे में उसको मिला ओस भरा एक चौराहा वीणा के तार की तरह झंकृत हो चुकी थी ग्रीष्म में भी चाँदनी सी शीतल उसकी देह
सूखे पेड़ पर लटक रहा था रसदार फल शायद वही है पेड़ ले कोटर की आत्मा जिसकी खुशबू में टूट गयी थी शीत की नींद तुम्हारी बातों के विराम चिह्न में आया था हेमंत वह भूल गयी थी संकरे रास्ते का अंधकार और दुःख भरी शाम की बातें एक पुराणी ख़ुशबू धोने उस दिन बारिश भी चली आई थी बदल को छोड़ कर
देखो, तुम्हारी बातों की सीढी चढ़ते-चढ़ते किस तरह बन गया शब्दों का एक गाँव।
तुम कभी किसी मोड पर एक नयी गाथा लिखना लिए संदेश प्रेम का सुंदर सी भाषा सीखना लिखना नव अंकुरों का धीरे धीरे कली बनना मंद पवन के झोंकों से पात पात जा कर मिलना तितली भँवरे का आना हौले से छु कर जाना कलियों का फिर शरमाना ओर डाली मे जा छुप जाना
तुम कभी किसी ------
कोयल का मधुर गाना दो पंछी का पास आना प्रकृति करके बहाना अंतस प्रेम का उपजाना थिरक थिरक मयूरा का फैला पंखो को नाचना प्रणय निवेदन कर स्वीकार मोरनी संग साजना
तुम कभी किसी ---------
बूंदों का बरस जाना प्रेमियों का तरस जाना मिल जाये फिर दोनों करके यूं बहाना खुशियों से जीवन का संवर संवर जाना जैसे हो संबंध कहीं सात जनम पुराना
तुम कभी किसी ------
कलियों का फूलों मे नव प्रतिरूप गढ़ना ममता के छांव मे नव जीवन का बढना हिरनी संग भाग रहा प्यारा सा छौना माँ बच्चे संग संसार भी पड़ रहा बौना
जिस्म थक जाये, टूट जाये, बिखर जाये तो क्या ? वक़्त को हारना और आदमी को जीना है | सब शिक़स्तों को, मज़ालिम को है पीना तुझको, तुझको मरना नहीं, जीना है, फ़क़त जीना है |
हार के घूँट कई बार पिये हैं तूने, जब से आया है तू, इस दुनिया में जीने के लिये | क्या तवारीख़, क्या निज़ाम और क्या रस्मों – रिवाज़, सब के हाथों में है इक तेग नुकीली, तेरे सीने के लिये |
जिस्म घायल, हाथ ख़ाली, कोई परवाह न कर, गर्मिये रूह ख़ुद शमशीर में ढल जायेगी, वक़्त, तारीख़ो - निज़ाम, रस्मों – रिवाज़ हारेंगे, ज़ीस्त क्या चीज़ है, तक़दीर बदल जायेगी |
दिल को मत तोड़, थके पाँव अगर उठते नहीं, राह दुश्वार है और तन्हा सफ़र है तेरा | वो बहुत दूर, कहीं पर्वतों से भी ऊपर, एक सपनीला – सुनहरा सा, वो घर है तेरा |
आगे बढ़ना है यूँ, हालात मुत्तासिर न करें, इन अँधेरों को, ज़ख्मे – ठोकरों को पीना है | राह सिमटेगी, मिलेगी तिरी मंज़िल तुझको, मौत को हारना और ज़िंदगी को जीना है | जिस्म थक जाये, टूट जाये, बिखर जाये तो क्या ? वक़्त को हारना और आदमी को जीना है |
-ए.टी.ज़ाकिर (रचनाकाल: ०२-०१-८७)
एक नदीः (पंजाबी)
एक नदी ऋषि के पास आई , ... दिशा माँगने....
उस नदी को ऋषि की प्यास ने पी लिया......
सुरजीत पतारः अनुवादः जगजीत सिद्धू
मुक्ति के लिए (पंजाबी)
इस सदी की मुक्ति के लिए मैं कोई भी झूठ बोल सकता हूँ , कोई भी सच
जैसे ये कि, आदमी के मरने से दर्द कम हो जाता है ... या हँसना, उदास होने का ही एक तरीका है
जैसे ये कि कविता सम्भावना खो बैठी है फिलासफर , राजनीतिक , साइंसदान , काहवा घरो में बैठे , सिर्फ बूढ़े हो रहे हैं शायर , नेता और आन्दोलन गरजते हुए शेरो कि तरह मैदान में उतरते हैं , और बकरी के साथ पानी पी कर , वापिस आ जाते हैं
रब सपने में आया , एक मादा -बिम्ब है , जो साथ सोता है , बिस्तर में , पर साथ जागता नहीं
इस सदी कि मुक्ति के लिए मैं कसम खाता हु रोज ...रब की , रब में यकीन नहीं .....
-सती कुमारः अनुवाद जगजीत सिद्धू
पति के नाम एक संदेश - ऐसा खत में लिखो ! (मराठी)
मै अच्छी हूं , घबराओ नको, ऐसा खत में लिखो। कोणी मेल्याने तुझको लिक्खा , मै निकली रोडां पर अगर तुझ को शक है मुझपर , नहीं निकलूंगी बाहर पानी लेने को जाऊं क्या नको , ऐसा खत में लिखो.
सौ रुपये का हिसाब मांगा , तो मैने क्या घर में उड़ाई लाईट के बीस दी , पानी के तीस दी , पचीस का राशन लायी पचीस दूधवाले को दूं क्या नको , ऐसा खत में लिखो।
बाबा को आया बुखार खांसी, प्रायव्हेट में गयी उसको लेकर सौ रूपया दिया , इंजेक्शन लिया, असर नही हुआ बच्चे पर मै जे.जे. को जाऊं क्या नको, ऐसा खत में लिखो।
आवाजे-निस्वां है महिला मंडल, जाती मै उस मीटिंग को तेरी बहन को शौहर जब पीटता , हम जाती धमकाने को उस की मदद करूं क्या नको , ऐसा खत में लिखो।
बेबी को मैने स्कूल में भेजा , खूब अच्छी पढती है औरतो को भी है लिखना-पढना , आवाजे निस्वां का मत है मै पढने को जाऊं क्या नको, ऐसा खत में लिखो।
जबसे गया तू , बिगडा है माहौल, फसाद का डर है मुझको मजहब के नाम पे कैसे ये झगड़े, अमन से रहना है सब को ये बस्ती में समझाऊं क्या नको, ऐसा खत में लिखो।
महंगाई इतनी , रोजगार भी नहीं , तेरे जैसे जाते दुबई को घर भी कितने टूट जाते देखो , दुख होता मेरे मन को तू भी आता क्या साथ देने को , ऐसा खत में लिखो।
कोणी मेल्याने तुझको लिक्खा, मै ठुमकती रोडां पर मीटिंग में जाती , मोर्चे पर जाती , हाथ में परचम लेकर तू भी आ जा साथ देने को , ऐसा खत में लिखो ।
आवाज़-ए-निस्वां की कार्यकर्ता शहनाज शेख और गीता महाजन द्वारा रचित गीत
डेथ सर्टिफिकेट(गुजराती)
प्रिय बिटिया तुम्हें याद होगा जब तुम छोटी थी, ताश खेलते समय तुम जीतती और मैं हमेशा हार जाता
कई बार जानबूझ कर भी ! जब तुम किसी प्रतियोगिता में जाती अपने तमाम शील्ड्स और सर्टिफिकेट मेरे हाथों में रख देती तब मुझे तुम्हारे पिता होने का गर्व होता मुझे लगता मानों मैं दुनिया का सबसे सुखी पिता हूँ
तुम्हें अगर कोई दु:ख या तकलीफ थी एक पिता होने के नाते ही सही, मुझे कहना तो था यों अचानक अपने पिता को इतनी बुरी तरह से हरा कर भी कोई खेल जीता जाता है कहीं ?
तुम्हारे शील्ड्स और सर्टिफिकेट्स मैने अब तक संभाल कर रखे हैं
अब क्या तुम्हारा “डेथ सर्टिफिकेट” भी मुझे ही संभाल कर रखना होगा ?
-मूल : एषा दादावाला,अनुवाद : सागरचंद नाहर.
पगफेरा (गुजराती)
बिटिया को अग्निदाह दिया, और उससे पहले ईश्वर को, दो हाथ जोड़ कर कहा, सुसराल भेज रहा हौऊं, इस तरह बिटिया को, विदा कर रहा हूँ, ध्यान तो रखोगे ना उसका ? और उसके बाद ही मुझमें, अग्निदाह देने की ताकत जन्मी लगा कि ईश्वर ने भी मुझे अपना समधी बनाना मंजूर कर लिया
और जब अग्निदाह देकर वापस घर आया पत्नी ने आंगन में ही पानी रखा था वहीं नहा कर भूल जाना होगा बिटिया के नाम को
बिना बेटी के घर को दस दिन हुए पत्नी की बार-बार छलकती आँखें बेटी के व्यवस्थित पड़े ड्रेसिंग टेबल और वार्डरोब पर घूमती है मैं भी उन्हें देखता हूँ और एक आह निकल जाती है
ईश्वर ! बेटी सौंपने से पहले मुझे आपसे रिवाजों के बारे में बात कर लेनी चाहिए थी कन्या पक्ष के रिवाजों का मान तो रखना चाहिए आपको दस दिन हो गए....
और हमारे यहाँ पगफेरे का रिवाज है !
मूल गुजराती लेखिका : एषा दादावाला
मूल : एषा दादावाला,अनुवाद : सागरचंद नाहर.
दाम्पत्य ( ओड़िया)
हम दोनों बैठे थे चुपचाप दिन बिता, सांझ हुई सांझ बीती ,रात हुई पंछी लौट चले अपने घोंसोलों में चाँद निकलने वाला था, हमें मालूम न था शुक्लपक्ष था या कृष्णपक्ष था .
हम दोनों बैठे थे चुपचाप चारों तरफ़ सरीसृप ,कीडे मकोडे घेरे हुए थे हमें लता-गुल्मों की तरह उस ओर हमारी नजर न थी अँधेरा गहराता गया और अब एक दुसरे को देखना भी सम्भव न था .
फिर भी दोनों बैठे रहे चुपचाप क्योंकि एक की साँस दुसरे की पहचान थी हम बैठे थे ओस भिगाती गई, कुहासा ढकता गया , पाँवों से हम जमते गए , बर्फ बनने के पहले देखा , किसीने मेरी हथेली पर अपना हाथ रखा .
-डॉ. सरोजनी साहू
हर साल जितने पेड़ कटते हैं , उससे ज्यादा कटती हैं औरतें । (ओड़िया)
वह एक पेड़ थी एक पेड़ को पहचानने के लिए खुद को पेड़ बनना पड़ता है उसकी खरखराहट को छूने के लिए अपनी छाया का सहारा लेना पड़ता है ।
पहली बार जब मैं उससे मिली उसने मुझे कसकर पकड़ा और खूब रोई... उसने मुझे बताया कि उन्होंने उसे जड़ से उखाड़कर अपने आंगन में रोपा ताकि वह छाया और सुरक्षा दे सके
दूसरी बार जब मैं उससे मिली वह मेरे कंधे से लगकर एक बार फिर रोयी वह रोयी , सिसकी और उसने कहा मैंने सब कुछ देने की कोशिश की छाया , सुरक्षा, प्रेम, खुशबू पर उन्हे कुछ और चाहिए था उन्होंने मेरे पत्ते गिने और उन्हें पैसे से तोला फिर और पैसे की मांग की उससे भी ज़्यादा जितने मेरे पास पत्ते थे …।
तीसरी बार जब मैं उससे मिलने गई वह नहीं थी ... वह जा चुकी थी ...... उसे काट डाला गया था और अलाव में जला डाला था जिसमें उन्होंने अपने गीले हाथ सेंके और सुखाए उनके हाथों पर खून का , कत्ल का एक भी निशान नहीं था ...
हर साल जितने पेड़ कटते हैं , उससे ज्यादा कटती हैं औरतें । सभी कटी हुई औरतें अलाव में इस्तेमाल नहीं होती कुछ को बना दिया जाता है बैसाखियां वर्ना यह विकलांग अपंग समाज बिना किसी सहारे के कैसे खड़ा होता !!
सुचेता मिश्र की ओडि़या कविता का अंग्रेजी से भावानुवाद ( ''एक औरत की नोटबुक '' - पृष्ठ 38 से )
निकला रवि तो... (सिंधी)
निकला रवि तो रात का अँधेरा तो गम हुआ कम रौशनी है, ये तो अलग इक सवाल
है आई न मौत वक़्त पे, आई अभी तो क्या पहले मुहाल जीना था, मरना है अब मुहाल
था कौन, आया था वो कहाँ से, गया कहाँ देखा किसे? हयात बनी मुन्तज़र सवाल
किस काम से था जा रहा, चलता गया किधर आया ख़याल किसका? बना श्याम बेखयाल
नारायण श्यामः अनुवाद: देवी नागरानी
खुद शिकार हो गया(सिंधी)
खुद शिकार हो गया इक सुहानी रात को जब तारापति चन्द्रमा अपनी सतह पर नमूदार था और मैं अपनी दोनाली बन्दूक लेकर शिकार के लिए शिकार गाह की तरफ बढ़ा रात के सन्नाटे में जंगल में पेड़-पौधों को चीरता सिन्धु का किनारा पकड़ के चलता रहा, चलता रहा कुछ दूर जाकर अचानक !! सुरीली आवाज़ कानों से टकराई शांत माहौल सुनसान जगह और मधुर आलाप !! अजब लगा और मैं खिंचता चला गया उस अलाप की तरफ. जैसे ही नज़र सामने पड़ी एक हसीं नाज़नीन सफ़ेद मखमल की खुशनुमा साड़ी में लिपटी हुई सिन्धु घाट पर एक संगमर्री शिला पर बैठी अपनी हसीं कोमल लम्बी लम्बी उँगलियों से सितार के तार को छेड़े गा रही थी “श्याम तुझ बिन कैसे गुज़ारे ये बिरह की रात” और मैं उस सुरीली आवाज़ से मुतासिर शांत चित उसे सुनता रहा सुबह की पहली किरण आई नाज़नीन गीत का आखरी पड़ दोहराकर सितार की तारों से अपनी पतली-पतली उँगलियों को ढीला किया एक घायल शिकार की तरह मैंने सर्द आह भरी और मुंह से बे-अख्तियार निकला “वाह” यूं महसूस किया शिकार करने निकला था पर खुद शिकार हो गया !
साभार: अदबी चमन (१९९७)
चोइथराम लालचंदानीः अनुवाद: देवी नागरानी
बिक्री के लिए ( खासी)
बिकाऊ है यह गीली, रमणीय भूमि अपनी समस्त लाभकारी योग्यता के साथ हमारे बेशकीमत खनिज औषधीय वृक्ष दुर्लभ ऑर्किड वृक्ष भूमि और जल सब कुछ और बहुत भी कुछ. बिकाऊ हैं इस धरती की ही तरह सुन्दर, वर्णीय युवतियां मैदानी लोगों को वर बनाना शोभता है हमें वैसे तो समुन्दर पार के पुरुष भी अपनाने में हर्ज नहीं बस थोड़ी योग्यता हो (विवाहित, विधर्मी या विजातीय सब स्वीकार हैं) तोंद जिन्हें हो या हाल फिलहाल निकलने की सम्भावना हो वे ही आवेदन करें. बिकाऊ हैं कंकड़ी जैसे आदिम जनजातीय मूल इन्हीं से प्रगति का रथ आगे बढ़ता है हम तो हम से दूर हुए जाते हैं हम ही हम से लगातार लज्जित हैं. बिकाऊ हैं अभिमान, मूल्य और काम करने की आदत लज्जा बोध और अंतरात्मा संपर्क सूत्र चाहिए? ज़रूरत नहीं हमारे दलाल सर्वत्र विराजमान हैं सड़क पर आप संपर्क कर लें उनसे खुले खजाने.
-पाल लिंगदोहःअनुवाद गोपाल प्रधान
(कवि पाल लिंगदोह का जन्म १९७२ में शिलोंग में हुआ था. उनका एक द्विभाषिक काव्य-संग्रह प्रकाशित है. वे का खुन हाइनीत्रिप नेशनल अवेकनिंग मूवमेंट के संस्थापक अध्यक्ष रहे. यह पार्टी खासी स्टूडेंट्स यूनियन के समर्थन से बनी..)
फफूँद (खासी)
घर के भीतर जहां रहता हूँ बहुत ठंड और अँधेरा है. इतनी ठंड कि कभी पता भी नहीं चलता दिन कितना गरम है, इतना अँधेरा कि कभी पता नहीं चलता बाहर कितना बजा. खिड़की के बाहर आडू के रंग बदले फिर उन्होंने चूनर ओढ़ी सर्दियों के अंतिम संतरे भी धूप में पक चले. पर बाहर की दुनिया पर मेरा वश ही क्या! मन तो सूरज की धूप देखने के लिए सुरंग से रेंग कर बाहर निकला पर फिसल कर फिर नीचे आया बाहर पत्थर पड़ने का डर जो था. इसी वजह से फफूँद की मानिंद ठन्डे और अँधेरे घर में पड़ा रहा जो भी कुछ मैं करता हूँ फफूँद ही दिखाई देता है.
-किनफम सिंग नोंकिनरिहः अनुवाद गोपाल प्रधान )
(कवि किनफम सिंग नोंकिनरिह का जन्म १९६४ में सोहरा में हुआ था. उनके दो काव्य संग्रह अंग्रेज़ी में और तीन खासी में छप चुके हैं. फिलहाल वे नेहू, शिलांग में प्रकाशन विभाग में कार्यरत हैं)
हमेशा नहीं रहते पहाड़ों के छोए पर हमेशा रहेंगे वे दिन जो तुमने और मैंने एक साथ खोए।
दृश्य
एक आदमी अभी मेरा एक शब्द ले कर मुझे टोह गया उसके मुँह में वह शब्द अब भी गरम होगा ऐसा उस समय हुआ जब काँच की किरचवाली दीवार पर एक बिल्ली मुँह में चूहा ले कर जा रही थी झाड़ी में बिल्ली ने चूहे को छोड़ दिया; गरम। कोमल फड़कता हुआ चूहा चला, चलने के बाद दौड़ने लगा दौड़ते ही फिर दबोचा बिल्ली ने पकड़ कर फिर दूसरी झाड़ी में ले गई झाड़ी के ऊपर मँडराती रहीं केंकती हुई चिड़ियाँ चूहे से छूट चुकी थी चूहे भर जमीन बिल्ली के नीचे दबी हुई थी बिल्ली भर जमीन लेकिन उसकी परछाई और बड़ी होकर बाघ की तरह पसरी हुई थी दुबारा वह आदमी मेरी ओर आ रहा है और मुझे दूसरे शब्द की तरह देख रहा है
अंतर्देशीय
इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए न अपने विचार। न अपनी यादें इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए न अपने संबंधों की छाप न दुख, न शिकायतें न अगली मुलाकात का वादा न सक्रांमक बीमारियाँ न पारिवारिक प्रलाप न अपने हस्ताक्षर वरना यह पत्र पकड़ा जा सकता है इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए क्योंकि जिनका 'ठिकाना' नहीं वे असहाय सबसे ज्यादा संदिग्ध हैं बाहर एक ओर किसी पानेवाले का नाम और पता दूसरी ओर किसी भेजनेवाले का हस्ताक्षर जरूर हो समाचार खुद हिफाजत चाहते हैं इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए भेजनेवाला जानता है क्या नहीं लिखा गया क्यों नहीं लिखा गया पढ़नेवाला जानता है कोरा, वह भी बाँच लेगा एक भी आखर जिसके हिस्से आया इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए न कोई विस्फोटक शब्द न बच्चा पैदा होने की खबर न कोई आकस्मिक मृत्यु न बम न कोई वाजिब तर्क न नए साल की बधाई न तलाक का इरादा इस पत्र के भीतर कुछ न रखिए सारा मुद्दा, सारा पत्र पोस्टमैन का रक्तहीन चेहरा है जो रोज गाँजा जा रहा है और जिसे शाम को वह जमा भी नहीं कर सकता।
आते हुए वसंत के लक्षण
रात की आंधी में विश्वनाथ सिनेमा के पास एक पेड गिरा पोस्टर में स्त्री का केवल धड़ बचा था और पुरुष के केवल हाथ
हवा में अब भी तेजी और फडफड़ाहट है खलनायक सिर से लेकर जीन्स तक आधा फट गया है एक आंख एक बांह के बावजूद वह ठूँठ सा लग रहा है
हवा में अजीब सी उत्तेजना है मौसम बदल रहा है ठूँठों के भी ककुए फूट रहे हैं इतनी तेज हवा कि दिल हिल जाऍं मगर कुछ नए शब्द भी शायद खिल जाऍं इस वसंत में।
सर्वतापी
न अध्यादेश/ न उपदेश न पेंसुला/ न राष्ट्र न देश सूर्य जैसा सर्वतापी प्रेम
आग जैसी गहन इच्छा कहीं किसी में किसी के लिए जितनी पराई उतनी अपनी तल्लीनता झकझोर देती है क्यों
रामायण और महाभारत से पहले भी युद्ध था प्रेम व्यक्तिगत सबमें बसा हुआ खून खराबा षडयंत्रों की तरह रचा हुआ चेर्निबल और युकोशिमा के बाद भी इसी धरती पर कई बार फूटेगा प्रेम और सब मारे जाऍंगे
समुद्र-सा अगाध, हिमालय- सा ऊँचा शहर की किसी घनी बस्ती के असुविधाजनक कमरे में एक दिन बाहर आएगा प्रेम और तीनों लोकों तक फैली हवा में फैल जाएगा।
दुविधा में आत्मा
आत्मा ने रोटी खाई तो और भी व्यवस्थित होकर सँवर गई जूते पहने तो और भी निर्भय होकर चलने लगी
पानी पिया तो शरीर में और भी तृप्त लगने लगी आत्मा पेड़ ने जैसे नदी को नदी ने जैसे असंभव को अपने भीतर खींच लिया हो
आत्मनिर्भर, आत्मविभोर आत्मतृप्त क्षणों से गुज़रती आत्मा को कुछ आत्महीनताऍं आत्मनिर्वाण की ओर ले जाने की सोच रही है
जबकि रोटी, कपड़े और जूते ने उसे पानी पीते ही कुछ अधिक मानवीय स्वतंत्रता की ओर ले जाने की सोची है।
हिंदी कविता में लीलाधर जगूड़ी का नाम विश्वविश्रुत है। धूमिल के सान्निध्य में रहे जगूड़ी ने अपनी कविता का गंतव्य पहले ही पहचान लिया था। 'नाटक जारी है'---कविता में एक ऐसा घोषणापत्र था जिससे इस सदी के राजनीतिक उथल पुथल और सांस्कृतिक विचलनों के हालात पढ़े जा सकते थे। उसके बाद जगूड़ी ने अपना मुहावरा विकसित और पल्लवित किया और मैं नहीं जानता कि हिंदी में उनके अलावा ऐसा कोई कवि है जिसका तार्किक कौशल कविता में इतनी गझिन बुनावट के साथ परिलक्षित हुआ है। कविता को महज संवेदना की उपज न मानने वाले लीलाधर जगूड़ी ने कविता की पारंपरिक पारिभाषिकी से बहुधा छेड़छाड़ की है तथा अपनी अलग सरणि बनाई है। प्रतीकों के इस्तेमाल के युग में उन्होंने प्रतीकों की नई निष्पत्तियों उजागर कीं। रूढ़ियों से वे कभी नहीं भागे, उनसे भी उन्होंने सार्थक संरचनाऍं बुनीं। उनकी कविता बिम्बमालाओं की झड़ी लगाती है तो प्रतीतियों की नई आमद भी। वे शब्दों, अर्थों, अभिप्रायों से खेलने वाले कवि हैं तथा हर कविता को अलग तरह से रचने के हामी भी। अपने ही मुहावरे और परिचित व्यंजनाओं में कैद होकर रह जाने वाले कवियों में वे नहीं हैं इसलिए हर बार नया करने की कोशिश में वे वास्तव में कविता का एक नया संसार रचते हैं जो कभी कभी अनभ्यस्त पाठकों के लिए खासा दुरूह भी होता है। पर जगूड़ी ने कविता में कभी अपने को दुहराया नहीं, किसी एक करवट बैठे नहीं, किसी अवसाद, चपलता, बड़बोलेपन का शिकार अपनी कविता को नहीं होने दिया।
इस यात्रा में, घबराये हुए शब्द, भय भी शक्ति देता है, अनुभव के आकाश में चॉंद, ईश्वर की अध्यक्षता में, खबर का मुँह विज्ञापन से ढँका है जैसी अद्भुत कृतियों के रचयिता लीलाधर जगड़ी अपनी परंपरा खुद निर्मित करते हैं।
इस स्तंभ के अंतर्गत नंद किशोर आचार्य, अरुण कमल, वर्तिका नंदा, भगवत रावत, विनोद कुमार शुक्ल, ओम भारती, प्रतापराव कदम, संजय कुंदन, तजिन्दर सिंह लूथरा,पुष्पिता अवस्थी, ज्ञानेन्द्रपति, नरेश सक्सेना, अशोक वाजपेयी, एकांत श्रीवास्तव,सवाईसिंह शेखावत और कवयित्री सविता भार्गव के बाद जाने माने कवि लीलाधर जगूड़ी के हाल ही में प्रकाशित संग्रह '' जितने लोग उतने प्रेम'' पर डॉ.ओम निश्चल का आलेख।
प्रेम के प्रमेय में
ओम निश्चल
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पुस्तक: जितने लोग उतने प्रेम
कवि: लीलाधर जगूड़ी
प्रकाशक:राजकमल प्रकाशन प्रा.लि.
मूल्य: 295/-
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''मेरी आत्मा लोहार है ज़िन्दगी से रोज लोहा लेती है मेरी आत्मा धोबी है मन का मैल ऑंसुओं से धोती है
मेरी आत्मा कुम्हार है सपनों की मिट्टी से आकार बनाती है मेरी आत्मा बढ़ई है रोज़ कोई न कोई विचार खराद देती है
किसी भी आत्मा की कोई एक जाति नहीं होती यहां किसी भी एकराम से काम नहीं चलने वाला मैं आत्माराम भी हूँ, सिर्फ मोचीराम ही नहीं रोटीराम भी हूँ, सिर्फ रामरोटी ही नहीं।''
ये पदावलियॉं अभी अभी आए लीलाधर जगूड़ी के नए कविता संग्रह '' जितने लोग उतने प्रेम'' से उद्धृत हैं। जिन्हें भाषा की शक्तियों से, शब्दों की निस्सीमता से खेलना आता है, शब्द से अर्थ और अर्थ से अनेक अर्थात् बना लेने की जिनमें क्षमता है जो शब्दों के बीहड़ से अभिप्रायों की नदी बहा सकता है, जो भाषा को हवा की तरह बॉंधे लेने में हुनरमंद है, वह कौन हो सकता है भला ---लीलाधर जगूड़ी के सिवा। कविता के शिल्प में उत्तरोत्तर बदलाव की जिसकी चुनौती धूमिल ने भी स्वीकारी थी, जो 'गरीबी हटाओ' की तर्ज पर भूख को एकदम से खत्म करने की मॉंग के सर्वथा विरुद्ध रहा है और जो यह कहता हो: ''आपदाओं में कुछ अच्छे गुण वाली आपदाऍं भी होती है/ जिन्हें खोना नहीं बल्कि बोना चाहती हूँ सबमें जैसे कि भूख/ भूख मिट जाए भले ही पर मरे न कभी, वरना मेरे तुम्हारे रोमांच मिट जाऍंगे।'' अमिट भूख के रोमांच से कविता के विरल रोमांच तक संतरण करने वाले इस कवि की कल्पनातीत होती पतंग को सहज ही काट पाना मुमकिन नहीं है। लीलाधर जगूड़ी के पिछले संग्रह ''खबर का मुँह विज्ञापन से ढँका है'' पढे हुए कई साल हो गए, पर लगता है उसे पढने का रोमांच अभी ताज़ा है। इस ताज़ा ताज़ा रोमांच को शब्द और शब्दों के रोमांच को अभिप्रायों के रोमांच में बदलने वाले जगूड़ी का यह संग्रह 'जितने लोग उतने प्रेम’ ‘जितनी आत्माऍं उतने ख़तरे’,’ जितने रास्ते उतने कुशल क्षेम’ की अवधारणाओं के साथ सामने आया है।
परिस्थितियों से पारिस्थितिकी तक जगूड़ी के शब्द यात्रा करते हैं और इन्हीं शब्दों, अभिप्रायों में जगूड़ी का कवि विचरता है: 'परिभू स्वयंभू' कवियों की तरह जो मजबूत से मजबूत लोहे जैसे विचार को भी शब्दों के घन से पीट-पीट कर एक लचीली काया में बदल देता है।
प्रेम एक ऐसा विषय है जिस पर जितने मुँह उतनी बातें। प्रेम का अनुभव हर एक का अपना होता है, उसके बखान के तरीके अलग हो सकते हैं। जो अपने अनुभव का बखान नहीं कर सकते वे भी इसके संक्रमण को महसूस करते हैं। जो जीवनानुभव का परिणाम है, लीलाधर जगूड़ी उसे अपने 53 वर्ष के काव्यानुभव का नतीज़ा मानते हैं----जीवनानुभव से काव्यानुभव तक प्रेम के इस संक्रमण, अनुभवन और प्रस्फुटन को उन्होंने एक नई अवधारणा में पिरोया है: 'जितने लोग उतने प्रेम' कह कर।
अपने पसंदीदा कवि को पाठक उसके उत्स से समझना चाहता है। बरसों जगूड़ी के सान्निध्य में रह कर यह जानना मुश्किल नहीं है कि वे कविता में निरंतर रचनात्मक तोड़फोड़ करने वाले कवि रहे हैं। 'नाटक जारी है' से लेकर आगे के सभी संग्रहों में उन्होंने अपने को उत्तरोत्तर बदला है। कहा होगा अज्ञेय ने ---'राही नहीं, राहों के अन्वेषी'। पर जगूड़ी के इन प्रयोगों में भाषा, अनुभव और कथ्य का एक सर्वथा बदला हुआ संसार दीखता है। वे निरंतर ही नहीं, उत्तरोत्तर अपने प्रयोगों में प्रगति की कामना से भरे दिखते हैं कविता लिखते हुए वे वस्तु और रूप की समस्या से भी मुक्त दिखते हैं। फिर जो कवि 'कविता जैसी कविता से बचो'---का हामी हो और जो भाषा को उत्तरोत्तर नए ढंग से बॉंधने के उपक्रम में तल्लीन हो, उसके प्रयोग निस्संदेह भाषा और कथ्य की अजानी-अपहचानी युक्तियों के अनाविष्कृत संसार तक ले जाते हैं। एकरसता और ऊब के निर्माण के विरुद्ध उनकी कविता हर बार अपना चेहरा-मोहरा बदल लेती है जैसे करवटें सुकूनदेह नींद के लिए जरूरी हैं---जगूड़ी की कविता बार-बार उदविग्नता में करवटें बदलती है, जो हर पल कवि की व्यग्रता – नया रचने और रूढ़ियों को तोड़ने की हिकमत का परिचय देती है।
प्रेम जीवन में एक ही बार होता है, ऐसा कहने वाले बहुतेरे होंगे पर जितने लोग उतने किस्म के प्रेम की अद्वितीयता का अपना खास अर्थ है। हर व्यक्ति के भीतर प्रेम, करुणा तथा अन्य मानवीय भावनाओं का उदय और प्रकटन अपनी तरह से होता है---यानी अपनी प्रकृति, अपने व्यवहार, अपनी समाहिति और चेतना में किसी भी दूसरे से भिन्न---इसीलिए जगूड़ी का यह चिंतन प्रेम की एक ही मनोभूमि पर 'जितने लोग उतने प्रेम' की अवधारणा लेकर सामने आता है। कहने के लिए यह ऊपर से प्रेम कविताओं के संग्रह जैसा दिखाई देता है, पर यह प्रचलित अर्थों में प्रेम की रूढ़िबद्ध छवि से बाहर निकलने की कोशिश भी है। इतने चालू, सतही, दैहिक और सांसारिक खानापूर्ति की तरह लिये जाने वाले प्रेम से जगूड़ी पहले ही अपना पल्ला झाड़ते हुए चलते हैं। इसीलिए वे उस रास्ते पर जाने को बरजते हैं जिस रास्ते का निर्माण और खोज पहले ही की जा चुकी है। कविता में, जीवन में, प्रेम में---नई नई सरणियों और प्रमेयों की खोज कवि को काम्य है जिससे कवि के शब्दों में---नई सॉंसों के लिए धड़कते हुए संघर्षरत जीवन की भाषा मिल जाए और आलोचक को नया जन्म मिल सके।
जगूड़ी की कविता यह बताती है कि वे अभिव्यक्ति के लिए किस हद तक जोखिम उठाते हैं। मुक्तिबोध जब यह कहते हैं कि 'अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने ही होंगे/ तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब'---तो केवल स्थूल अर्थों में ही नहीं, आभ्यांतरीकृत चेतना के सभी स्तरों पर वे परिवर्तन और उथल-पुथल की मॉंग कर रहे होते हैं। प्राय: कवियों की यह कामना होती है कि उन्हें व्यापक रूप से समझा और सराहा जाए। वे जन जन तक संप्रेषित हों। किन्तु हिंदी के कुछ कवि ऐसे हैं जो अपनी शर्तों और धुन पर कविता लिखते हैं। विनोद कुमार शुक्ल के बाद जगूड़ी ही ऐसे कवि हैं जो कविता लिखते हुए कविता लिखने जैसे किसी रोमांच के वशीभूत नहीं होते। विनोद कुमार शुक्ल ने 'खिलेगा तो देखेंगे' उपन्यास लिखा था; जगूड़ी की एक कविता का शीर्षक है: 'लिखे में भी न खिले मेरी उदासी तो'। उन्होंने अपनी एक कविता को किसी प्रकार की भावुकता की आबोहवा में नहीं खिलने देकर भाषा के अजाने रहस्यों, अनखिले अर्थों और अभिप्रायों की क्यारियों में खिलने दिया है। परंपरागत अर्थ देने वाले मंतव्य उनके यहॉं लगभग पस्त नज़र आते हैं। कवि के रूप में उन्होंने कभी अच्छी तुकें खोजी हैं तो कभी नए गद्य की गढ़न का सुख भी लिया है, जैसे वे 'कविता जैसी कविता' न लिखे जाने का बीड़ा उठाए हुए हैं, वैसे ही वे अपनी कविता के लिए 'आलोचना जैसी आलोचना' को नाकाफी मानते हैं। वे चाहते हैं, जैसे उनकी कविता शब्दों के अजाने अभिप्रायों में ले जाती है, वैसे ही कुछ जोखिम आलोचना भी उठाए। वे गद्य को लय और श्वासानुक्रम से बॉंधने के प्रयासों के तुलसी के बीजमंत्र ‘भाषानिबद्धमतिमंजुलमात्नोति’ से प्रेरणा लेते दिखते हैं।
जगूड़ी ने भाषा को सदैव कविता में एक आयुध की तरह बरता है। उनके यहां जीवनानुभव भाषा का अनुभव बन कर प्रकट होते हैं। उनकी कविता अपनी पंरपरा खुद निर्मित करती है; वह निरंतर अनुसंधान और अभ्यास का प्रतिफलन भी है। इसीलिए साधारण पाठक के वह ज्यादा काम की नहीं दीखती। जगूड़ी की विचारधारा पर जिन लोगों को संशय हो, उन्हें उनकी ‘मिलाप’ कविता पढनी चाहिए। जिसमें वे कहते हैं, ‘ थोडी सी श्रद्धा।थोड़ी सी मातृभूमि। थोड़ी सी राष्ट्रभक्ति से भरे जो मनुष्य मिलते हैं हमेशा मुझे संशय में डाल देते हैं।‘ वे परिसीमित राष्ट्रीयता के विरोधी हैं। इसलिए उनका कहना एक उदारचरित कवि का कथन है: ‘सीमित नागरिकता के बावजूद मेरे पास असीम राष्ट्र है/ और असीम मातृभूमि/ मुझे आल्प्स से भी उतना ही प्यार है जितना हिमालय से।‘ जगूड़ी की कविताओं में जितनी आधुनिकता दिखती है, परंपराओं से उनका कवित्व उतना ही संवलित भी जान पड़ता है। ‘न ययौ न तस्थौ’ जैसी कविता का जन्म परंपरा की इसी ज़मीन पर हुआ है। संस्कृत काव्य के क्लैसिकीय तत्वों से उनका गहरा परिचय रहा है। तभी तो वे ‘संकट के बादल’ में लिखते हैं: ‘कवियों से मिलना हो/तो पहाड़ झेलते कवि के पते पर रहते हैं/ कालिदास, नागार्जन और बादल।‘ किन्तु हर बार कविता की एक नई प्रजाति को जन्म देने के आकांक्षी जगूड़ी यह कहने से गुरेज़ नहीं करते कि ''विचारों के ओम-तोम और जीनोम से पैदा हुआ/ परंपराओं का आधुनिक संस्करण हूँ मैं।''
कवि का जन्म ही शायद शब्दों, प्रतीकों, अलंकरणों, रसों, भावों, अनुभावों और भाषा के सौंदर्यविधायक तत्वों से खेलने के लिए होता है ताकि सार्थक कुछ का जन्म हो सके। कविता की अदायगी विनोद कुमार शुक्ल के यहॉं भाषा के भीतर से प्रकट होती है—मंद मंद खुलती और उदघाटित होती हुई तो ज्ञानेंद्रपति के यहॉं वह शब्दयुग्मों से खेलती नज़र आती है। जगूड़ी कविता-कला की इंजीनियरिंग के उस्ताद लगते हैं, वे भी कहीं-कहीं 'विस्मित' से 'सस्मित', 'चोचक' से 'रोचक', 'जिया' से 'पिया' और 'चला' से 'खला' की तुक मिलाते दिखते हैं। वे छाते को केवल भीगने से बचाव का उपकरण नहीं मानते बल्कि भाइयों में छाते की तरह अपने बड़े होने और अब व्यक्तिवादी और अकेली हो चली छतरियों से लेकर आसमान को एक उड़े हुए छाते के रूप में देखते हुए धूप में पेड़ जैसे लगते छातों तक की परिकल्पना कर लेते हैं। हमारा अड़ोस- पड़ोस जहॉं एक-दूसरे की पोलीथीन की आवारा थैलियों और टीवी के शोर से तनातनी में रहता हो वहॉं परस्पर सौहार्द के नाम पर कैसे किसी खुरपे से करुणा की पीठ खुजलाई जा सकती है? कवि पूछता है। जगूड़ी का कवि अपनी जिद और धुन में प्रयोगों का हामी बेशक हो, वह जीवन के अंदर और अभावों के नेपथ्य और स्त्री की सुबकियों में किस खूबी से जा घुसता है, ‘दर्द भरे नाले’ कविता इसका परिचायक है। पानी के अभाव को लेकर केदारनाथ सिंह की 'पानी की पार्थना' और 'पानी था मैं' जैसी मार्मिक कविताऍं हम पढ चुके हैं। 'पानी का प्लांट' जगूड़ी की जल-चिंता का एक नया दृष्टिकोण है। 'पानी-पत्ता' में वे पानी के गिरने और पत्ते के गिर कर उड़ने और धूल में लिथड़ने तक से सीख लेने को प्रेरित करते हैं। पर जगूड़ी के इस कविता–कौशल में जब हम उनकी संवेदना की जामा-तलाशी लेते हैं तो बहुत कम कविताएँ हाथ आती हैं। जबकि मंगलेश डबराल जैसे कवियों में संवेदना का रसायन अब भी अक्षुण्ण है। 'नये युग में शत्रु' तक उनकी संवेदना शब्दों की मार्मिकता को सम्हाले रहती है। उनकी एक कविता 'आखिरी मुलाकात' है जिसमें मरणासन्न मॉं को देखने आने वाले बेटे का बयान दर्ज़ है। 'उस कहानी' में अपना गीत और गद्य ओढ़ती-विछाती हुई दादी का चित्रण मिलता है तो 'सुंदर स्त्री के दुख' मध्यवर्गीय स्त्री का एक रोचक वृत्तांत है। कई अन्य स्त्री विषयक कविताओं सहित 'कुछ स्त्रियॉं याद आती हैं' स्त्री की नियति का हालचाल बताने वाली कविता है जिसमें जीवन के खटराग से जूझती हुई स्त्रियों के वृत्तांत हैं। पर इनमें भी वह चुम्बकीय संवेदना नहीं है जो हृदय को बॉंध लेती हो। हॉं, वह कवि के ज्ञान से अभिभूत अवश्य करती है।
'जितने लोग उतने प्रेम' को पढ़ते हुए जगूड़ी के भीतर पैदा होती कविता की यांत्रिकता हमें विस्मित भी करती है तो चकित भी। यों तो 'छब्बीस जनवरी 2009', 'अध:पतन', 'सार्वजनिक औरत', 'गिलहरी और गाय', 'एकोहंबहुस्याम:','जवाबी चेहरा', 'नए जूते', 'एक छिपुर की डायरी', 'प्रेम' व 'नीरस जमाने में सरस कवि' जैसी कविताओं में हम जगूड़ी के कवित्व के आरोह-अवरोह को पूरी यति-गति में अवलोकित कर सकते हैं पर कहीं न कहीं यह प्रश्न अवश्य उठता है कि ये आखिर किस प्रजाति के पाठकों की कविताऍं हैं। जोखिम उठाकर रच रहे लीलाधर जगूड़ी ने बहुतेरी कालजयी कविताऍं लिखी हैं तो अपने लिए दुरूहता की चुनौती-भरी खाइयॉं भी उत्खनित की हैं जिन्हें लॉंघ पाने में आलोचक तक लड़खड़ा पड़ें। यह 'कविता को कविता जैसा न रचने' की उनकी हिकमत का प्रमाण भले हो, रेत से तेल निकाल पाने जैसी मशक्कत भी यहॉं पाठकों को कम नहीं करनी पड़ती । अचरज नहीं, कि प्रायोजित समालोचना के इस दौर में जगूड़ी जैसे ज्ञान-सिद्ध कवि से आलोचक पहले से ही दूर भागते रहे हैं, ऐसे में जिस भोगे-भुगते और अध्ययन-जुगते आलोचक की बात वे अपनी भूमिका में करते हैं, ऐसे समर्पित आलोचक अब इने-गिने ही होंगे। नई कविता रचने की तरह नए आलोचक पैदा करने की जगूड़ी की यह कोशिश बेशक एक सद्प्रयास है किन्तु कविता में नवाचार की यह जुगत उन्हीं के शब्दों में ‘चित्तविहीन आलोचक’ को कहीं और ‘चित’ न कर दे।
‘ जाति न पूछो साधु की’ तरह ही मानवता की भी कोई भाषा नहीं होती , जाति नहीं होती...आपसी प्रेम, सद्भाव और करुणा के अलावा। फिर समाज के ताने-बाने में रचा-बुना मनुष्य और उसका साहित्य अपने को अलग-थलग कैसे रख सकता है। आंद्रे ब्रेंता ने लिखा है कि कोई कलाकृति तभी मूल्यवान होती है, जब भविष्य की आहटें उसमें मौजूद हों और भविष्य को पहचानने के लिए वर्तमान को जानना जरूरी है, अतीत को याद रखना जरूरी है, ताकि हम अपनी ही रौ में न बहते चले जाएं... आसपास से और सहजीवियों से भी जुड़े रहना जरूरी है । भाषा और संवाद का विकास भी शायद इसी जोड़ने और जुड़ने की चाह से ही हुआ था और आज भी हजारों आन्दोलनों और परिवर्तनों के बाद भी, भाषा की मुख्य जरूरत यही है...। एक सोद्देश्य जीवन की तरह ही ,उत्कृष्ट साहित्य में भी दो चेतनाएँ साथ-साथ और समानान्तर चलती हैं –एक निजी, दूसरी समग्र –निजी जो हमारे अपने अनुभव, अपनी जाति तबके की , यानी आंचलिक या मातृ भाषा में अनुभव और संस्मरण सोखती है और दूसरी समग्र- जो विश्व संस्कृति और साहित्य की भाषा को समझने उनके सुख दुखको आत्म सात करने के लिए-नया जानने व सीखने के लिए, पुरवा और पछुआ हवाओं से अपने फेफड़े स्वस्थ रखने के लिए मन और मस्तिष्क की खिड़कियों को सदा खुला रखती हैं। अज्ञेय ने अपने एक आलेख में लिखा था- “ निःसंदेह प्रत्येक जीवित भाषा एक भौगोलिक प्रदेश से भी बँधी हुई होती है, लेकिन जीवित भाषा के स्वास्थ्य और सामर्थ का एक लक्षण यह भी है कि वह अपने को उस भौगोलिक प्रदेश तक सीमित नहीं रखती, न रखना चाहती है। स्वास्थ्य का यह आग्रह नहीं होता कि वह केवल उसी मिट्टी से रस ग्रहण करे। और सांस लेने के लिए जिस हवा की आवश्यकता होती है वहतो न जाने कहाँ-कहाँ से बह कर आती है; जिस वृष्टिसे वह भूमि उर्बरा और रसा होती है वह वृष्टि भी न जाने किन-किन सागरों की देन होती है। गान्धीजी ने यों ही नहीं कहा था कि वह अपने घर की खिड़कियाँ सब ओर खुली रखना चाहेंगे, सभी संस्कृतियों से हवा और रौशनी ग्रहण करना चाहेंगे।
लेकिन यह दोहरा बन्धन एक अत्यंत सूक्ष्म संतुलन की मांग करता है। कोई साहित्य, कोई संस्कृति न तो अपनी जमीन को छोड़कर पनप सकती है और न चारोओर से बह कर आने वाली हवाओं के प्रति अपने को बन्द कर सकती है। अपनी जमीन से संबंधटूटने पर वह परोपजीवी और पर निर्भर हो जाएगी—और हम देखसकते हैं कि आज भारतीय समाज का एक अंग ऐसा भी है जो भारत से कटा हुआ है और परोपजीवी है—जो आज इस पर गर्व भी करता है और नहीं पहचानता कि वास्तव में वह निर्मूल हो चुका है। दूसरी ओर बाहर की ताजी हवा के प्रतिखिड़कियां दृष्टि बन्द कर लेना भी धीरे-धीरे धुट कर मरना है। अपने समाज में और अपने साहित्यों में इस तरह की संकीर्णता के परिणाम भी हम देख सकते हैं। “
इसी संजो और जान लेने की पिपासा से शुरू होती है हमारी जानने-सीखने, पढ़ने-पढ़ाने और साहित्य व अनुवाद-साहित्य आदि की जरूरत व प्रतिक्रियाएँ । ये जरूरतें प्राकृतिक और आम हैं। आदमी को जब लिखना -पढ़ना नहीं आता था, भाषा और लीपियों का कोई नियमित और सुचारू ढांचा नहीं था उसके पास, तब भी उसने आड़ी-तिरझी लकीरों और निश्चित हाव-भावों के साथ अपने को अभिव्यक्त करना शुरू कर दिया था..मस्त पवन के साथ झूमकर वह नाचा था और दारुण दुख में रोया और आक्रोष में चीखा चिल्लाया था, ताकि उसके सहजीवी उसे समझ सकें, उनमें शामिल हो सकें।.. धीरे-धीरे फिर उसने अपने विचारों और अनुभवों की धरोहर भावीपीढ़ी के लिए सहेजना भी शुरू कर दिया था। सोचिए यदि यह जानने-पहचानने और आदान-प्रदान व संवाद का सिलसिला विकसित नहीं हो पाता, जिज्ञासा और जरूरतों के तहत अनुवाद और अनुसरण आदि न होते तो कैसे बिना मिले या देखे दूसरी संस्कृतियों, दूसरे देशों और दूसरों के मन में झांकना संभव था...उन्हें जान और समझ कर निकट पहुंच पाना, अपनी बात कह पाना संभव था ! मानव का यायावरी मन सदैव से ही, खुद को ही नहीं , आसपास, परिचित-अपरिचित सभी को जानने की जिज्ञासा और पिपासा लिए रहता है...उपमा, तुलना और आकर्षण व विघटन....एक जानने और सीखने की प्रक्रिया जीवन में लगातार चलती ही रहती है ...हम सबके ही जीवन में और कला या व्यवहार; खुद हमारेअपने व्यक्तित्व और जीवन तक में अनुवादित और अभिव्यक्त भी होती रहती है...कभी प्रभावशाली और अनुसरणीय प्रसंग बनी तो कभी एक चेतावनी...एक निषेध रेखा बनकर। कला का यह अनुवाद , यह विवेचना जीवन में प्रतिपल हमारे साथ है, चाहे वे एक ललित नृत्यरूप में परिलक्षित हों या एक मनोहारी चित्र या कविता के रूप में । प्यार का एक चुंबन हो या अपमान की एक फटकार---भावों का यह अनुवाद जीवन में निरंतर और सहज रहा है। हाँ, कला उसे सुरुचि से रेखांकित करती है, सहेजती है और स्मरणीय व कालजयी बनाती है।
कला के उद्देश्य के संदर्भ में चर्नीशेव्स्की (१८२७-१८८९) की टिप्पणी कला को इतिहास से अलगाती है। वह कहता है कला का मूल उद्देश्य जीवन में मानव की दिलचस्पी की हर चीज को पुनः मूर्त करना है। बहुधा जीवन का स्पष्टीकरण और उसकी परिणतियों का गुण-दोष विवेचनभी काव्यात्मक कृतियों में प्रमुख स्थान ग्रहण कर लेता है। प्राकृतिक उष्मा हो या भावात्मक आलोड़न साहित्य हमें दैनिकजीवन से ऊपर ले जाता है। आम को अमरकर पाना सिर्फ कलाकार के ही बस की बात है। अपनी परंपरा से आए समान उत्तराधिकार को हम अपनी अमूल्य निधि औरउपलब्धि मानते हैं। उसकी रक्षा और निर्माण हमारा धर्म है। हमारी पूरी आस्था उसपरंपरा में है। परन्तु भाषा के आधार पर विघटन और अलगाव की रणनीति; उसपर आधारित राजनीति, किसी भीदेश या समाज को बेहद विष्फोटक और हानिकारक बिंदु पर लाकर खड़ा कर सकती है। सभ्यताके कई-कई युग पीछे धकेल सकती है। ...किसी भी देश की आजादी और देश की अस्मिताका एक अनिवार्य संबंध होता है और अस्मिता में भावात्मक समन्वय निहित है; क्योंकि अगर देश अपने को एक नहीं मानता तो उस की अस्मिता काकोई सवाल ही नहीं उठता--- हाल ही में मुंबई सदन में हिन्दी और मराठी को लेकर हुए विवाद और देश के कोने-कोने से आंचलिकता के आधार पर भेदभाव और अलगाव की आपत्तिजनकघटनाएँ स्वतंत्र भारत को सोच की एक नई तरह की पराधीन मानसिकता में उलझाती-सी प्रतीत होती हैं। विषय पर हमारे समय के चिंतक नरेन्द्र कोहली जी का कहना है -
“ अंग्रेजी के विरुद्ध हमारा अपना अधिकार मांगना, वस्तुतःहिन्दी के लिए ही नहीं, सारी भारतीय भाषाओं के लिए उन का अधिकार मांगना है। जब तक देश में अंग्रेजी का वर्चस्वरहेगा, तब तक किसी भारतीय भाषा का विकास नहीं हो सकता। कुछ लोगों कीयह मान्यता है कि अंग्रेजी इस देश जीवन में इतनी दूर तक बैठ गई है कि उसकाअस्तित्व अब समाप्त नहीं किया जा सकता। उनकी यह मान्यता भी है कि अंग्रेजी विश्वस्तर पर इतनी शक्तिशाली भाषा है कि यदि उस का अस्तित्व रहेगा तो उसका वर्चस्व भीबना रहेगा। मेरा इन दोनों ही मान्यताओं से न केवल मतभेद है, वरन् पूर्ण विरोध है। किसी समय फारसी भी इस देश के जनजीवन मेंइतनी गहरी पैठ गई थी कि कोई मान नहीं सकता था कि कभी उसका अस्तित्व समाप्त हो सकताहै। अंग्रेजों के समय कौन कल्पना कर सकता था कि यह देश कभी ब्रिटिश साम्राज्य सेमुक्त हो सकेगा, किंतु प्रयत्नपूर्वक उस साम्राज्य सेमुक्ति प्राप्त की गई। ठीक उसी प्रकार राजनीतिक और सास्कृतिक संकल्प क आधार परअंग्रेजी भाषा से भी हम मुक्त हो सकते हैं। रहने को उस का अस्तित्व बना भी रहे तोभारतीय भाषाओं पर उस का वर्चस्व अनिवार्य नहीं है। फ्रांस, जर्मनी, पुर्तगाल, चीन, जापान इत्यादिदेशों में अंग्रेजी का प्रचलन है, किंतु उसकावर्चस्व नहीं है। कल तक रूस में अंग्रेजी की स्थिति अत्यंत नगण्य थी, किंतु राजनीतिक तथा आर्थिक कारणों ने आज उसे वहाँ महत्वपूर्णबना दिया है।“
आज संचार के इस युग में दूरियाँ मिटाना आसान है तो परालंबी भावनाओं से मुक्ति भी बेहद सहज। क्योंकि विकास की, सभ्यता की एक यह भी शर्त है कि हम एक खुले, सहज और पारदर्शी मानव व्यवहार व समाज की तरफ अग्रसर हों। सौहाद्र और समन्वय के साथ हम अपने जीवन और साहित्य दोनों से ही अवांछनीय व कटु को हटाएँ। सर्व भोग्या धरती पर खुल कर जिएँ और दूसरों को जीने दें।
सत्ता मानव जीवन की चेतना को सत्तापेक्षी बनाती है, कला और साहित्य उसके ऐसा करने का विरोध करते हैं। साहित्य अपने मूल उद्देश्य में मानव के जीवन को और अंततः समाजको चेतनशील बनाने का काम करता आया है। कला और साहित्य हमेशा से ही, हर तरह के विरोध के बावजूद भी, समाज और उसकी चेतना को ढालने में सक्षम है, इसका उद्देश्य मात्र मनोरंजन कभी नहीं रहा। इसने न सिर्फ दर्पण की तरह समाज को प्रतिबिंबित किया है, अपितु नदी की तरह नई राहें भी बनाई है, नव-जीवन संचार किया है..चाहे वे मानवता के हितकारी ह्यूगो और चेखव हों या फिर हमारे अपने तुलसी और कबीर।...
अनुवाद को मौलिक सृजन की कोटि में रखा जाए या नहीं, यह बात हमेशा चर्चा का विषय रही है । अनुवादकर्म में रत अध्यवसायी अनुवादकों का मत है कि अनुवाद दूसरे दर्जे का लेखन नहीं, अपितु मूल के बराबर का ही सृजनधर्मी प्रयास है । बच्चन जी के विचार इस संदर्भ में द्रष्टव्य हैं -‘मैं, अनुवाद को, यदि वह मौलिक प्रेरणाओं से एकात्मक होकर किया गया हो, मौलिक सृजन से कम महत्त्व नहीं देता । अनुभवी ही जानते हैं कि अनुवाद मौलिक सृजन से भी अधिक कितना कठिन-साध्य होता है! मूल कृति से रागात्मक सम्बन्ध जितना अधिक होगा, अनुवाद का प्रभाव उतना ही बढ़ जाएगा । वस्तुतः सफल अनुवादक वही है जो अपनी दृष्टि भावों/कथ्य/आशय पर रखे । साहित्यानुवाद में शाब्दिक अनुवाद सुन्दर नहीं होता । एक भाषा का भाव या विचार जब अपने मूल भाषा-माध्यम को छोड़कर दूसरे भाषा-माध्यम से एकात्म होना चाहेगा, तो उसे अपने अनुरूप शब्दराशि संजोने की छूट देनी ही होगी । यहीं पर अनुवादक की प्रतिभा काम करती है और अनुवाद मौलिक सृजन की कोटि में आ जाता है ।‘ (साहित्यानुवाद, संवाद और संवेदना, पृ. 85.) दरअसल,अनुवाद एक श्रमसाध्य और कठिन रचना-प्रक्रिया है । वह मूल रचना का अनुकरण-मात्र नहीं वरन् पुनर्जन्म होता है । वह द्वितीय श्रेणी का लेखन नहीं, मूल के बराबर का ही दमदार प्रयास है । इस दृष्टि से मौलिक सृजन और अनुवाद की रचना-प्रक्रिया प्रायः एकसमान होती है । दोनों के भीतर अनुभूति पक्ष की सघनता रहती है । अनुवादक जब तक कि मूल रचना की अनुभूति, आशय और अभिव्यक्ति के साथ तदाकार नहीं हो जाता तब तक सुन्दर एवं पठनीय अनुवाद की सृष्टि नहीं हो पाती । इसलिए अनुवादक में सृजनशील प्रतिभा का होना अनिवार्य है । मूल रचनाकार की तरह अनुवादक भी कथ्य को आत्मसात् करता है, उसे अपनी चित्तवृत्तियों में उतारकर पुनः सृजित करने का प्रयास करता है तथा अपने अभिव्यक्ति-माध्यम के उत्कृष्ट उपादनों द्वारा उसको एक नया रूप देता है । इस सारी प्रक्रिया में अनुवादक की सृजनप्रतिभा या कारयित्री प्रतिभा मुखर रहती है । अनुवाद में अनुवादक की कारयित्री प्रतिभा के महत्व को सभी अनुवाद-विज्ञानियों ने स्वीकार किया है। इसी कारण अनुवादक को भी एक सर्जक ही माना गया है और उसकी कला को सर्जनात्मक कला। फिज़्ज़ेराल्ड़ द्वारा उमर खैयाम की रुबाइयों के अनुवाद को इस सन्दर्भ में उद्धृत किया जा सकता है। विद्वानों का मानना है कि यह अनुवाद खैयाम की काव्य-प्रतिभा की अपेक्षा फिज़्ज़ेराल्ड़ की निजी प्रतिभा का उत्कृष्ट नमूना है।स्वयं फिज़्ज़ेराल्ड़ ने अपने अनुवाद के बारे में कहा है कि एक मरे हुए पक्षी के स्थान पर दूसरा जीवित पक्षी अधिक अच्छा है(मरे हुए बाज़ की अपेक्षा एक जीवित चिड़िया ज़्यादा अच्छी है)कहना वे यह चाहते हैं कि अगर मैं ने रूबाइयों का शब्दशः/यथावत अनुवाद किया होता तो उसमें जान न होती,वह मरे हुए पक्षी की तरह प्राणहीन अथवा निर्जीव होता। अपनी प्रतिभा उंड़ेलकर फिज़्ज़ेराल्ड ने रूबाइयों के अनुवाद को प्राणमय एवं सजीव बना दिया है।
अनुवाद के अच्छे/बुरे होने के प्रश्न को लेकर कई तरह की भ्रांतियां प्रचलित है।आरोप यह लगाया जाता है कि मूल की तुलना में अनुवाद अपूर्ण रहता है,अनुवाद में मूल के सौन्दर्य की रक्षा नहीं हो पाती, अनुवाद दोयम दर्जे का काम है आदि- आदि।अनुवाद-कर्म पर लगाए जाने वाले उक्त आरोप मुख्यतः अनुवादक की अयोग्यता के कारण हैं।अनुवाद में मूल भाव-सौन्दर्य तथा विचार-सौष्ठव की रक्षा तो हो सकती है, परन्तु भाषा-सौन्दर्य की रक्षा इस लिए नहीं हो पाती क्योंकि भाषाओं में रूपरचना तथा प्रयोग की रूढ़ियों की दृष्टि से भिन्नता होती है.अतः मूल-भाषा जैसी स्वाभाविकता/मधुरता प्रायः अनुवाद में नहीं आ पाती. यह सही है कि मौलिक लेखन के बाद ही अनुवाद होता है,अतः निश्चित रूप से वह क्रम की दृष्टि से दूसरे स्थान पर है। परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि गुणवत्ता की दृष्टि से भी वह दूसरे स्थान पर है। जिस प्रकार मौलिक लेखन बढ़िया भी हो सकता है और घटिया भी,उसी प्रकार अनुवाद भी घटिया/बढ़िया हो सकता है। उक्त आरोपों से अनुवाद-कार्य का महत्व कम नहीं होता।सच पूछा जाय तो अनुवादक का महत्व इस रूप में है कि वह दो भाषाओं को न केवल जोड़ता है अपितु उनमें संजोई ज्ञानराशि को एक-दूसरे के निकट लाता है।अनुवादक अन्य भाषा की ज्ञान-संपदा को लक्ष्य भाषा में अंतरित करने में शास्त्रीय ढंग से कहां तक सफल रहा है,यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि दूसरी भाषा के पाठकों का अनुवाद द्वारा एक नई कृति से परिचित होना है।मूल रचना का स्वल्प परिचय पूर्ण अज्ञान से बेहतर है।गेटे की वे पंक्तियां यहां पर उद्धृत करने योग्य है जिनमें उन्होंने कार्लाइल को लिखा था,‘ अनुवाद की अपूर्णता के बारे में तुम चाहे कुछ भी कहो,परन्तु सच्चाई यह है कि संसार के व्यावहारिक कार्यों के लिए उसका महत्व असाधरण और बहुमूल्य है।’
कुल मिलाकर यह अनुवादक की निजी भाषिक क्षमताओं, लेखन-अनुभव एवं प्रतिभा पर निर्भर करता है कि उसका अनुवाद कितना सटीक, सहज और सुन्दर बन पाया है।मेरा खुद का मानना है कि एक अच्छे अनुवादक के लिए एक अच्छा लेखक होना भी बहुत ज़रूरी है. एक अच्छा लेखक होना उसे एक अच्छा अनुवादक बनाता है.
हिंदी लोगों की मां है। पर भोजपुरी भाषियों की बेटी है - हिंदी। हिंदी की दुर्दशा सर्वविदित है। और जब बेटी बेइज्जत होती है तो मां कितना आहत होती है यह मां ही जानती है। इस लिए हिंदी से कहीं ज़्यादा संकट मे भोजपुरी है। इस लिए भी कि जैसे हिंदी भाषियों में अपनी भाषा के प्रति मान-स्वाभिमान नहीं है और अंगरेजी की चेरी बन कर रह गई। हिंदी सरकार की कृपा से किसी तरह जी खा रही है। वैसे ही भोजपुरी भाषियों में भी अब अपनी भाषा का वह स्वाभिमान वह स्व नहीं रहा जो कभी इतना था कि उस की बेटी हिंदी सर्वमान्य भाषा बन गई। पर अब तो मां बेटी दोनों का स्व आहत है। हां बेटी राजाश्रय पा कर भी दरिद्र बन बैठी है और मां अनाथ, फटेहाल और बेहाल है। हुंह! हिंदी की मां भोजपुरी।
भोजपुरी, जिस को विश्व के 20 करोड़ लोग बोलते हैं। यहीं नहीं दुनिया के पांच प्रभुता संपन्न देश ऐसे हैं जहां भोजपुरी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है।[हालां कि अब इधर अंजोरिया के संपादक डा. ओम प्रकाश सिंह इस पर प्रतिवाद करते हैं और कहते हैं कि भोजपुरी कहीं भी किसी भी देश में राज्य-भाषा का दरजा प्राप्त नहीं है, यह मात्र अफवाह है जो भोजपुरी की दुकान चलाने वाले लोगों ने फैला रखी है। वह तो लगभग चैलेंज देते हुए कहते हैं कि किसी के भी पास डाक्यूमेंट्री प्रूफ़ अगर इस बारे में हो तो दिखाए।] और भारत में राष्ट्रभाषा हिंदी को छोड़ कर अन्य सभी भाषा भाषियों से भोजपुरी भाषियों की संख्या सर्वाधिक है। हिंदी की जितनी उप भाषाएं या बोलियां हैं उन में भी भोजपुरी बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक है। फिर भी इस हिंदी की मां को अपनी ही भूमि पर अपेक्षित सम्मान एवं मान्यता प्राप्त नहीं है। दुनिया के और देशों में भोजपुरी राजभाषा हो तो हो यहाँ तो कुछ भाई लोग फरमान जारी कर बैठते हैं कि भोजपुरी भाषा ही नहीं है।
तर्क क्या है? तर्क है कि भोजपुरी की अपनी कोई लिपि नहीं है। और बिना लिपि के कोई भाषा - भाषा नहीं हो सकती। तो क्या हिंदी भी भाषा नहीं है? उस की भी तो अपनी कोई लिपि नहीं है। देवनागरी लिपि में लिखी जाती है हिंदी। फिर हम कहते ही हैं ब्रज भाषा। तो ब्रज भाषा की क्या लिपि है? और अवधी की भी? यह भी तो आखिर भाषा ही है। अपनी भाषाओं को छोड़िए जिस के हम आज गुलाम बने बैठे हैं उस अगरेजी की भी तो अपनी कोई लिपि नहीं है। अंगरेजी भी तो रोमन लिपि का लेप लगाए है।
भोजपुरी जो अनाम, फटेहाल और बेहाल है तो इस लिए भी कि उस की ज़मीन पूर्वी उत्तर प्रदेश में विकास के पांव बहुत सुस्त हैं। एक तरह से विकास को बनवास ही मिला हुआ है पूर्वी उत्तर प्रदेश में। दरअसल शुरू से ही पूर्वांचल उपेक्षा का शिकार रहा है। इस के अधिकांश ज़िले अभी भी उद्योग शून्य हैं या उद्योग के नाम पर एक या दो छोटे मोटे उद्योग हैं। पिछली सरकारों ने राजनीति के लिए पूर्वांचल का खूब दोहन किया है। परंतु वर्तमान सरकार किसी भी माने में बेहतर नहीं है। यह भी पूर्वांचल से सौतेला सुलूक बदस्तूर जारी रखे है।
सिर्फ भाषण या आश्वासन से तो विकास नहीं होता है न। गत योजनाओं के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के इस एक तिहाई भूभाग और आबादी वाले पुर्वांचल के लिए न्यूनतम धनराशि खर्च की गई है। नए उद्योग कम से कम खोले गए हैं। क्यों कि पूर्वांचल की आवाज़ कमजोर थी। पूर्वांचल का कोई एसा प्रभावशाली नेता नहीं हो पाया जो कि इसकी वकालत करता। हालांकि पूर्वांचल ने उत्तर प्रदेश को पांच मुख्यमंत्री दिए हैं। वीर बहादुर सिंह से कुछ उम्मीदें जरूर थीँ पर समूचे प्रदेश के विकास के चक्कर में उन्होंने भी पूर्वांचल की उपेक्षा ही की। प्रधानमंत्री रहे चन्द्रशेखर भी पूर्वांचल के थे और भोजपुरी भाषी थे। पूर्वांचल के विकास की अकुलाहट भी उनके मन में भरी हुई थी। पर यह अकुलाहट हकीकत में धरती पर उतरी नहीं।
उत्तर प्रदेश देश के सर्वाधिक पिछड़े राज्यों में से एक है और पूर्वी उत्तर प्रदेश का सर्वाधिक पिछड़ा क्षेत्र है। विकास को गति देने के मकसद से उत्तर प्रदेंश ने वर्ष 82-83 में ज़िला योजना का शुभारंभ किया था। इस का एक उद्देश्य क्षत्रीय असंतुलन दूर कर समान विकास की गति प्रदान करना भी था। उसी समय प्रदेश को पूर्वीं, पश्चिमी, मध्य, बुंदेलखंड तथा पर्वतीय क्षेत्रों में विभाजित किया गया था। इस के बावजूद कुछ विशेष क्षेत्रों में पूर्वांचल की जो स्थिति है वह तालिकाएं देखने से स्पष्ट हो जाती है। यद्यपि वर्ष 82-83 से अबतक रुपए का पर्याप्त अवमूल्यन हुआ है और सरकार योजना व्यय में जिस वृद्धि का गर्व से गान करती है वह एकदम थोथा है। परंतु यह संपूर्ण देश एवं प्रदेश का प्रश्न है। यहाँ हम केवल उन आंकड़ों को दे रहे हैं जो यह बताते हैं कि प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में 82-83 से 89-90 तक जिला योजना में कहाँ कितनी वृद्धि की गई है और कितना धन व्यय हुआ तालिका तीन देखें।
आंकड़ों से स्पष्ट है कि पूर्वी क्षेत्र के विकास पर अन्य क्षेत्र के सापेक्ष न्यूनतम धनराशि व्यय की गई है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पूर्वी क्षेत्र में निम्नलिखित 19 जनपद सम्मिलित हैं :- इलाहाबाद, आजमगढ़, बहराइच, बलिया, बस्ती, देवरिया, फैजाबाद, गाजीपुर, गोण्डा, गोरखपुर, जौनपुर, मिर्जापुर. प्रतापगढ़, सुल्तानपुर, वाराणसी, सिद्धार्थ नगर, मऊ, सोनभद्र, महाराजगंज। इस क्षेत्र में कृषि विश्वविद्यालय केवल फैज़ाबाद में है जो कि वास्तव में मध्य क्षेत्र की आवश्यकता पूरी करता है। सरकारी इंजीनियरिंग कालेज मात्र गोरखपुर में है। इलाहाबाद का इंजीनियरिंग कालेज भी मध्य क्षेत्र के लिए अधिक उपयोगी है। दरअसल लोग पूर्वांचल केवल गोरखपुर और वाराणसी मंडल कि ही मानते हैं। यदि सरकार इस क्षेत्र की विस्तृत पहचान स्वीकार करती है तो हमें आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
विधान सभा विधान परिषद या संसद में पूर्वांचल का कोई जनप्रतिनिधि अपनी आवाज़ बुलंद नहीं कर पाता जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक गूंजे. स्व॰ विश्वनाथ सिंह गहमरी ने संसद में पूर्वांचल की गरीबी का चित्रण करके संसद को अपने भाषण से हिला तथा रुला दिया था। पटेल कमीशन बैठा तो उस से बड़ी बड़ी उम्मीदें की गईं परन्तु अंततोगत्वा आयाराम गयाराम ही सामने आया।
तो पूर्वांचल में इस विकास को बध में ही शायद भोजपुरी का बध भी निहित है। कश्मीर जो आज बारूद पर बैठा है तो उस का एक सब से बड़ा कारण यह भी है सरकार ने कश्मीरी बोली भाधा को हाशिए पर रख दिया. उर्दू वहां राजभाषा बना दी गई। कश्मीरी का गला घोंट दिया गया तब जब वहां के मुसलमान भी उर्दू कम कश्मीरी ज़्यादा जानते हैं। कश्मीरी ही उन की मातृभाषा है। अपनी मातृभाषा का बध कश्मीरियों को नहीं सुहाया और वह सरकार के खिलाफ सीना तान बैठे। आज नतीज़ा सामने है।
और कश्मीर ही क्यों पंजाब, बोडो, झारखंड और उत्तरांचल जैसे झगड़ों का सबब ही है क्षेत्रीय असंतुलन, भाषाई उपेक्षा और सांस्कृतिक क्षरण। तो क्या पूर्वी उत्तरप्रदेश की दीवालों पर लिखी क्षेत्रीय असंतुलन और भाषाई उपेक्षा की इबारत तभी मिटेगी जब वह ज्वालामुखी बन फूटने लगेगी?
एक समय लखनऊ से छपने और गाजीपुर से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका भोजपुरी लो्क और उ॰प्र॰हिंदी संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में कबीर जयंती के मौके पर एक दो दिवसीय भोजपुरी अधिवेशन हुआ। यह 1989-1990 की बात है। इस अधिवेशन में भोजपुरी की उपेक्षा पर सुलग रहे लोगों की मन की आग सरकार ने भी महसूस की। तत्कालीन खाद्य और रसद मंत्री दिवाकर विक्रम सिंह अधिवेशन में मौजूद थे। अधिवेशन के प्रस्ताव में जब भोजपुरी अकादमी की स्थापना की माँग की गई और बाद में लगभग सभी वक्ताओं ने भोजपुरी अकादमी की माग दुहराई तो मंत्री जी लाचार हो गए. दिवाकर विक्रम सिंह खाद्य मंत्री थे। भाषा उन के अधिकार क्षेत्र की बात तकनीकी रूप से नहीं थी। पर दिवाकर विक्रम सिंह अधिवेशन में पूरे समय रहे और वह भोजपुरी में ही बोले। और बोले कि भोजपुरी अकादमी की बात तो मैं स्पष्ट रूप से अभी नहीं कहूंगा लेकिन उ॰प्र॰हिंदी संस्थान के ही अधीन भोजपुरी विभाग का एक प्रकोष्ठ खुलवाने की बात ज़रूर मुख्यमंत्री जी से करूंगा। लगता है दिवाकर विक्रम सिंह मुख्यमंत्री से इस मामले पर कुछ बात कर नहीं सके। क्यों कि आज तक तो ऐसा कुछ हुआ ही नहीं। हो सकता है ब्यूरोक्रेसी भी इस में कहीं आड़े आ गई हो।
जैसे खाद्य मंत्री दिवाकर विक्रम सिंह ने कहा कि वह हिंदी संस्थान में भोजपुरी प्रकोष्ठ खुलवाने की बात मुख्यमंत्री से करेंगे। वैसे ही पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने एक बार भोजपुरी लोक पत्रिका का विमोचन करते हुए कहा था कि भोजपुरी ही नहीं प्रदेश की सभी क्षेत्रीय भाषाओं को वह बढ़ावा देना चाहते हैं, निखारना चाहते हैं। उन के लिए निदेशालय बनाएंगे। इस के लिए पंडित अमृतलाल नागर जो उस समारोह की अध्यक्षता कर रहे थे को उन्हों ने अध्यक्ष भी मनोनीत कर दिया। और कहा कि नागर जी एक कमेटी बना कर तय कर दें कि हमें क्या करना है, हम उसे स्वीकार कर लेंगे। अब तो नागर जी नहीं रहे और न ही नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री हैं सो वह योजना भी कहां बिला गई कोई नहीं जानता।
बिहार में बरसों पहले भोजपुरी अकादमी गठित हो गई. लखनऊ विश्वविद्यालय में अवधी का एक प्रश्नपत्र हिंदी में पहले से निर्धारित है। पर पूर्वांचल के किसी भी विश्वविद्यालय में भोजपुरी पर प्रश्नपत्र तो दूर वहाँ इस की चर्चा तक नही होती। दुनिया में 20 करोड़ और भारत में 15 करोड़ लोग भोजपुरी बोलते हैं पर वह भारतीय संविधान की आठवीं सूची से नदारद हैं। जब कि 2 करोड़, 3 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाएं वहाँ दर्ज हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन के प्रसारणों में बाकी क्षेत्रीय भाषाएं तो गूंजती हैं पर भोजपुरी नदारद रहती है तो क्या सिर्फ इस लिये कि भोजपुरी भाषी भकुआए हुए हैं और इसी लिए भोजपुरी भी भकुआई है। सच कहूं तो मां बेटी दोनों ही भकुआई हुई हैं. फर्क यही है कि मां बुढ़ा गई है और बिटिया अभी जवान है। पर स्थिति दोनों की वही स्थिति है कि, "दुनिया गइल चनरमा पर तें अबहिन भकुअइलै बाड़े।"
नगवा घाट पर बैठे सुक्खू ने स्वच्छ जल से धोकर सिल पर लोढ़ा खड़ा कर दिया और उस पर नारियल की खोपड़ी से दूधिया भांग गिराता हुआ वह चिल्लाया---"लेना हो बाबा भोलानाथ!" पानी में छटक पड़ी साबुन की बट्टी खोजने के लिए उसके साथी झींगुर ने उस समय गोता लगा रखा था। वह भी पानी के भीतर से विजयामंत्र पढ़ता हुआ बाहर निकला और मंत्र के शेष भाग की पूर्ति करता हुआ-सा चिल्लाया-
" जो विजया की निन्दा करे उसे खाय कालिका माई ! " और फिर सुक्खू की ओर घूमकर उसने पूछा, " का भाई सुक्खू माल तैयार हो गयल?"
" मसाला त कब्बै से तैयार हौ। देखीं, तोहैं साफा पानी से कब छुट्टी मिलला?"
"हम्में त तनिक देर लगी भाई ! "
" अच्छा, त तोहार हिस्सा रखके हम आपन पी जात हई ।"
झींगुर ने सर हिलाकर स्वीकृति दी और सुक्खू ने नारियल में भांग भरकर पीने की तैयारी की। वह नारियल में मुंह लगाने ही जा रहा था कि पीछे से आवाज आयी,
" क्या बच्चा, अकेले-ही-अकेले? "
सुक्खू ने घूमकर देखा कि एक बाबाजी की भव्य मूर्ति पीछे खड़ी बत्तीसी चमकाते हुए उसकी ओर याचना की मुद्रा से देख रही थी। बाबाजी के शरीर पर चौंगानुमा अलफी झूल रही थी। उनके एक हाथ में कमंडल और दूसरे में सिंदूर-चर्चित लोहे का त्रिशूल था। सिर पर लम्बे मटीले केश और नाभि तक झूलती दाढ़ी थी। उनकी इस अद्भुत मूर्ति का प्रभाव सुक्खू पर पड़ा और उसने कहा, " सबै आपै लोगन क त माया हौ गुरुजी। आपक अस्थान कहाँ हौ महाराज?"
" साधू तो रमते राम हैं, बेटा! उनका बँध के स्थान कहाँ! बाबा कबीरदास ने कहा है---
" साधू बहता नीर भल,
जे नहिं सिन्धु समाय।
अचल होय पाथर बने
या गड़ही ह्वै जाय।"
साधू का कथन अभी समाप्त नहीं हो पाया था कि झींगुर ने पत्थर पर धोती पछारते हुए कहा," का भाई, ई काबुली कौआ कहाँ से आयल? "
साधु ने ' काटखाऊँ ' मुद्रा से झींगुर की ओर देखा, पर चुप रहा। उत्तर दिया सुक्खू ने--- " तू कइसन बतियावत हो भाई झींगुर। महात्मा हौवन देखलन् चल अइलन।"
साधु ने भी झींगुर की पूरी उपेक्षा कर सुक्खू से कहा," बच्चा ! देरी क्यों करता है ? दे न ! "
" ल बाबाजी। कमणडल में लेब का।"
" हाँ, हाँ, दे-दे इसी में।"
बाबाजी ने कमण्डल आगे बढ़ाया। सुक्खू ने थोड़ी-सी भांग उसमें डाल दी। बाबाजी ने एक सांस में उसे सोखकर अलफी की जेब से पीतल मढ़ी लम्बी-सी एक चिलम और गाजे की पोटली निकाली और उसमें से थोड़ा सा गांजा निकाल हथेली पर मलने लगे। उधर झींगुर धोती सुखाने के लिए फैलाकर वहाँ आया। उसने देखा भांग बहुत थोड़ी बची है। उसने क्रोध से मुंह विकृत करते हुए कहा, " का सुक्खू, तोहऊँ मायाजाल में फँस गइल।"
सुक्खू ने उत्तर दिया," अरे भाई, साधुन महातमन के देके तबै परसाद लेबै के चाही। "
" अच्छा ढेर ग्यान जिन छांट। अइसन तोता-रटन्त साधु हम बहुत देखले हई। साधु क सकल अइसन हो ला? "
बाबाजी गांजा मलकर सुलफ़ा सुलगा चुके थे। जल्दी-जल्दी दो चार दम लगाकर उन्होंने लाल-लाल आँखों से झींगुर को घूरा। झींगुर ने उनकी आँखों में आँखें मिलाते हुए कहा, " बनर-घुड़की जिन देखाब बाबाजी, नाहीं त अच्छा न होई।"
"तेरा नास हो जाएगा," बाबाजी शाप देने की मुद्रा में गुर्राए।
" जबान सँभाल के बोल," झींगुर ने गरम होकर कहा।
" साधू का अपमान करता है? तेरा ना-ना-ना- ना-नास हो जायगा, " बाबाजी ने हकलाते हुए कहा।
" फिर अपने बुँक ले जाल ! बडका बाबा कनके आल हौ। जानत नहीं कि ' काशी के कंकर' सिबसंकर समान हैं। अइसे सराप से हम नाहीं डेराइत।"
" तू क्या चीज है बे छोकड़े ! सराप से तो बड़े-बड़े काँप जाते हैं। सुना नहीं कि गीताजी में क्या लिखा है
'भृषा न होई देव रिसि बानी '। "
" बहुत देखले हई, हो। "
" कुछ नहीं देखा है। देखना है तो सामने रामनगर की ओर देख, कैसा होता है साधू का सराप !"
साधू की अँगुली के साथ ही झींगुर की दृष्टि गंगा-पार सामने की ओर घूम गयी। समूचा किला दीपावली मनाता हुआ आलोक-स्नान कर रहा था। कार्तिक कृष्ण अष्टमी की संध्या थी। पश्चिम में अग्निगोल तिरोहित हो चुका था, परन्तु पूर्व में अभी स्वर्णगोलक की रेखा भी प्रकट न हो पायी थी। गोधूलि समाप्त होते-होते अन्धकार छा गया। उस काली पृष्ठभूमि में प्रकाशोज्ज्वल किला उस चित्र के समान दिखाई पड़ रहा था जिसमें कृष्ण केशों की व्यापक सघनता में चित्रकार ने किसी सुन्दरी के चन्द्रमुख का आलेखन किया हो। झींगुर की बहस की प्रवृत्ति शांत हो चुकी थी। वह मंत्रमुग्ध किले की ओर देखता रहा। बाबाजी के होठों पर भी मुस्कान की क्षीण रेखा खिंच गयी जिससे उनका रूप कुछ और अदर्शनीय हो उठा।
परन्तु बाबाजी की इस मुस्कान पर सुक्खू की श्रद्धा और भी बढ़ गयी। उसने परम विनीत स्वर से पूछा, " साधू के सराप और किला से का मतलब महाराज? "
" मतलब बहुत है बच्चा! तेरे में सरधा है, मैं तुझे सारा मतलब बताए देता हूं। राजा चेतसिंह का नाम सुना है बच्चा?"
" हाँ बाबाजी, महाराज बरबण्डसिंह क लड़िका न? खूब जानीला, ई का अगवे ओनकर किला हौ।"
" तू तो बहुत ज्ञानी हो बेटा! हां, तो चेतसिंह की बात है। वह जब काशी-नरेश रहे तो काशी में उस बखत एक बहुत बड़े सिद्ध का निवास रहा बेटा ! "
" के गुरूजी ! " सुक्खू ने हाथ जोड़कर पूछा।
"बाबा कीनाराम "
" बाबा कीनाराम? " सुक्खू ने विस्मय-मिश्रित हर्ष से कहा, " बाबा कीनाराम के हम खूब जानीला गुरुजी ! ओनकर बनावल भजन हमार भाई आज तक गावला। हाँ त महाराज का भवल ? "
" तो बेटा, उसी किले के नीचे राजा चेतसिंह एक दिन टहल रहे थे। उधर से रमते जोगी बाबा कीनाराम आ निकले। राजा ने उनको देख तेरे इसी साथी की तरह अभिमान में भरकर उन्हें नमस्कार तक न किया। बाबाजी भी रुक गए। संतों को अभिमान कहां बेटा! जैसे मैने अपने से आकर तुझसे याचना की वैसे ही उन्होंने राजा से कहा,'राजा! भूख लगी है।' राजा ने घृणा भरी मुस्कान से उनकी ओर देखा और कहा, ' ठहरो, खाना मंगाता हूं।' राजा ने अपने एक कर्मचारी की ओर इशारा किया। वह कर्मचारी था कायस्थ बहुत चतुर। समझा न बेटा?"
बेटा सुक्खू बाबा की बात बड़े भक्तिभाव से सुन रहा था। उसने मूल मूल समझा था। शास्त्र की उलझन उसकी समझ में न आयी थी। पर उसने सिर झुकाकर कहा," हाँ महाराज, समुझ गइली।"
" कुछ नहीं समझा बेटा, समझने की बात तो अब आयगी, समझ। कर्मचारी ने हाथ जोड़कर राजा से कहा, ' सरकार, बाबा से बैर न करो। ' पर सरकार ने उसकी बात नहीं मानी। कहा, ' हम भी छत्री, बाबा भी छत्री। लेकिन हम राजा, वह भिखारी। उसने हमें सलाम क्यों नहीं किया?"
" राम राम, राजा क ई बुद्धि ! " सुक्खू ने विनीत निवेदन किया।
" हाँ बेटा! यही बात है। सूरदास ने भी कहा है--- 'समय चूकि पुनि का पछिताने।' सो कर्मचारी ने फिर कहा, ' अच्छा, तो फिर हमें बाबाजी के लिए भोजन लाने का हुक्म हो।' राजा ने कहा--- ' हाँ जाओ ले आओ। देखो, किले के उधर दोपहर कहीं से एक लाश आकर किनारे लग गयी है। बहुत दुर्गन्ध है उसमें। उसे डोमड़ों से उठवा मँगाओ। ' "
"अरे !" विस्मय से सुक्खू का मुँह खुल गया और मिनट भर खुला ही रहा।
बाबाजी पूर्ववत् मुस्कुराए और कहने लगे, " तो उस कर्मचारी ने कहा, ' सरकार सूली दे दें, पर ऐसा काम मुझसे न होगा।' बाबा कीनाराम खड़े सब सुन रहे थे। उन्होंने कहा, ' सदानन्द, यह जैसा कहता है, करो। अपने वंश में सदा आनंद नाम रखना, आनंद रहेगा।' सदानंद ने भी वह मुरदा उठवा मंगाया। राजा ने बाबाजी से कहा,' भोग लगाइए।' सारे पार्षद और कर्मचारी मुँह फेरकर खड़े हो गए। राजा ने डाँटा। तब सब सामने देखने लगे। बाबा ने अपना दुपट्टा उतारकर मुरदे पर डाल दिया। पाँच मिनट बाद सदानन्द से कहा, ' दुपट्टा उठाओ।' सदानंद काँपते पैरों से आगे बढ़े। उन्होंने काँपते हाथों से आँख मूँदकर कपड़ा उठा लिया। जयकारा सुनकर जब उन्होंने आँखें खोलीं तो क्या देखा, बोल !" बाबाजी ने डपटकर सुक्खू से पूछा।
सुक्खू सकपका गया। उसने सोचा कि क्या कहें। फिर खयाल आया कि राजा की करनी पर बाबा को क्रोध आया ही होगा। तो उसने धीरे से कहा," मुरदवा अजगर बन गइल होई!"
" थोड़ा-सा चूक गया, बेटा ! " बाबाजी ने स्नेहसिक्त अट्टाहास करते हुए कहा, " अजगर नहीं बना, बेटा! पकवान लड्डू, पेड़ा, बरफी, जलेबी, इमरती, मोहनभोग। " कहते-कहते बाबाजी हाँफ गए। परन्तु बात जारी रखी। उन्होंने कहा, " बाबा का चमत्कार देख राजा की आँखें खुल गयीं। वह घबराकर पैरों पर गिर पड़ा। " परन्तु बाबा ने कहा, ' नहीं, अब तुम राजा नहीं रह सकते। और जानते हो, तुम्हें गद्दी से कौन उतारेगा? यही सदानन्द। ' राजा थरथरा गया, बेटा! बड़ी विनती की। तब बाबा पसीज गए। उन्होंने कहा, ' तुम्हें तो गद्दी से उतरना ही पड़ेगा। हां, तेरी विनती पर मैं प्रसन्न होकर कहता हूं कि तेरे बाद तेरा यह राज खण्डित रूप में तेरे प्रतापी पिता के वंशधरों को मिलेगा। छः पीढ़ी तक राज्य करने के बाद तेरे राज्य का विलय होगा। '
श्रद्धा विभोर सुक्खू अभी विलय का अर्थ भी नहीं समझ पाया था और न ही पूछ पाया था कि इससे किले की सजावट का क्या संबंध, कि झींगुर ने हंसकर कहा," नशा जोर कइले हो का बाबाजी?" और बाबाजी ने उसकी ओर फिर घूरकर देखा। झींगुर हंसता ही रहा।
जिस समय बाबाजी ने झींगुर का ध्यान किले की सजावट की ओर आकृष्ट किया तो कुछ देर तक झींगुर किले की ओर देखता और विचार करता रहा कि आज किले में यह सजावट कैसी है। बाबाजी के अट्टाहास से उसका ध्यान भंग हुआ और उसके बाद उसने बाबाजी के मुंह से जो कुछ सुना वह उसके मन में जमा नहीं। उसने कौतुक अनुभव किया और हंसने लगा।
" लेकिन महाराज," सुक्खू ने पूछा " विलय माने का ? "
इतने में कहीं से सीटी की ध्वनि आयी। बाबाजी चौंक गये। उन्होंने उठते-उठते कहा , " इसका माने यही कि आज चेतसिंह का राज्य समाप्त हो रहा है। दिल्ली की सरकार यह राज्य लखनऊ की सरकार को दे रही है। समझा बेटा ? " और बाबाजी कदम बढ़ाकर चले। मोड़ घूमते ही उन्हें पुलिस के कुछ कर्मचारी और एक बड़े अफसर दिखाई पड़े। बाबाजी ने इधर-उधर देखकर फौजी ढंग से अफसर को सलाम किया। अफसर ने कहा, " कहो बाबाजी, तुम अपनी ड्यूटी तो बड़ी चौकसी से बजाते हो?"
" वह तो मैने कह ही दिया है हुजूर ! मृषा न होई देव रिषि बानी। हुजूर से क्या छिपा है ? " बाबाजी ने कहा।
" इसीलिए तो कहता हूं, " अपसर ने कहा, " मुझसे सचमुच कुछ नहीं छिपा है। तो वहां गाँजा-भाँग पीकर जो कुछ बक रहे थे वह सरासर बेहुदी बात थी। कायदे के खिलाफ काम की सजा जानते हो?"
" जब कहते हैं तो ठीक ही होगा। मृषा न होई देव रिषि बानी, सीताराम, सीताराम, " बाबाजी ने जोर से कहा और उसी समय दो-तीन आदमी मोड़ घूमकर आते दिखाई पड़े। अफ़सर भी घुर्राट जमादार की चतुराई पर मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ गया।
उधर झींगुर ने बाबा की बात सुनते ही सुक्खू से सहसा पूछा " का हो, आज 15 तारीख त नाहीं न हौ? "
" का जानी भाई ! पनरह तारीख के का हौ ? "
" तू सुक्खू नाही बुद्धू हौआ, " झींगुर ने मुस्कराकर कहा। सुक्खू भी बिना कुछ समझे ही हंसने लगा।
किले की ओर बड़ी ही तीव्र उल्लास-ध्वनि हुई। झींगुर भी उस ओर ताकने लगा। वह एक कमरे की ओर, जिसे महाराज के कमरे के नाम से जानता था, एकटक निहारता खड़ा रहा। सहसा उसने देखा कि कमरे की खिड़की में कोई आकर खड़ा हो गया है। झींगुर ने निगाह जमाकर देखा और तब अपने साथी से बोला--
" अरे, सामने महाराज हौअन, हरहर महादेव कहे के चाही।" लेकिन झींगुर ने कुछ सोचकर कहा, " जब राजै नहीं रह गयल तब...?"
" तब तोहार कपार!" झींगुर ने सुक्खू से कहा, " राज नहीं रह गयल तब ऊ राजौ नाहीं रह गइलन का ? मन्दिर टूट गयल त का भजवानौ गायब हो गइलन? तू चुप रह " और स्वयं वह खिड़की की ओर मुंह उठाकर जोर से चिल्लाया--- " हर-हर महादेव ! "
कुशल! कुशलता जानने की इच्छा है। कालेज की हमारी पढ़ाई को समाप्त हुए करीब एक साल गुजर गया। प्रण कर लिया था कि एक अच्छी नौकरी ढूँढ लूं, तभी दोस्तों और सखियों से लिखा-पढ़ी करूं। इसी कालावधि के बीच कभी कहीं हमारे पुराने दोस्तों से आपकी मुलाकात हुई कि नहीं?
आपकी खैर-खबर जानना चाहता हूं। कैसे समय कटता है? मां-बाप किस हाल में हैं? प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा में हूँ। सस्नेह, अरविंदन्
भुवना इस विचार से हर्षित हुई कि एक साल बीत चुकने पर भी उन्होंने मुझे याद किया है और खत लिखने का कष्ट उठाया है।
उसकी मुद्रा-भावना पढ़कर पिताजी ने सवाल किया, “ ओ बिटिया! किसकी चिट्ठी है? “
“अरविंदन् नाम के एक सखा की... ! “
“ कौन है यह अरविंदन्? “ यह सवाल करते हुए पिताजी के चेहरे पर शंकित रेखाएं खिंच गईं।
“मेरे कालेज के एक सहपाठी थे।“
“अच्छा, अब वह क्यों खत लिखने लगा? हाय रे भगवान! कैसा अनर्थ हो रहा है! ऐसी आशंका से ही मैंने एक बार तुम्हारी मां से कहा था कि तुम्हारी पढ़ाई रोक दूं। उसने मेरी सुनी! अब तो कोई न कोई नौजवान चिट्ठी लिखने का दुस्साहस कर रहा है! “
“बेकार यों गुस्सा करने की क्या जरूरत है पिताजी? वह तो एक भले मानस हैं। कितनी सद्भावना से उन्होंने मुझे याद किया है। लीजिए यह खत; आप स्वयं पढ़ कर देख लीजिए।“
भुवना को अपने पिता की आशंका और गुस्सा निरर्थक लगा।
“ तो तुम चाहती हो कि मैं भी उस चिट्ठी की बेतुकी बातें पढ़ूं। हां, जब तक मैं तुम्हारे हाथ पीले न कर दूं तब तक मेरी बेचैनी बनी रहेगी। और एक बात। इस बीच तुम कहीं उसको अपने साथ लेकर गुमराह न हो जाना; मैं तुमसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं।“
पिताजी ने सचमुच हाथ जोड़कर प्रणाम किया। उनकी इस क्रिया से भुवना लज्जावश संकुचित हो गई। फिर पल-भर के लिए भी वह वहां खड़ी न रह सकीँ, कमरे में घुसकर लेट गई।
भुवना की आंखों से आंसू की धार उमड़ पड़ी, वह चिंतित हुई कि पिताजी कैसे विचित्र ठहरे! बीस साल की पहचान के बावजूद वह अपनी पुत्री को समझ न सके !
वाह! अरविंदन् कितने बड़े जेंटिलमेन हैं। उनके उत्तम विचार तथा नेकी को मैं किस तरह समझाऊं पिताजी को? उन्होंने मेरे आकर्षक पहनावे की एक बार भी प्रशंसा नहीं की थी। कभी अधूरे नाम से मुझे संबोधित नहीं किया, न कभी मेरे रूप-लावण्य के बारे में कोई शब्द मुंह से निकाला। सच्ची दोस्ती की सीमा क्या है, वह इसकी खूब जानकारी रखते हैं।
हाय! गरीब घराने के युवक जो ठहरे। इस दुखी अवस्था में उनकी एक अच्छी नौकरी लग गई तो उनके मां-बाप ने कितनी प्रसन्नता का अनुभव किया होगा! लेकिन...लेकिन पिताजी की कटु बातों ने सारी खुशी पर पानी फेर दिया।
***
वह चिट्ठी खोलकर पढ़ने लगी-
तिरुच्ची 5.2.1990
श्रीमती भुवना जी,
कुशल! कुशलता जानने की इच्छा है। प्रशिक्षण प्राप्त करने के उद्देश्य से मैं दो साल के लिए अमेरिका चला गया था। पिछले सप्ताह ही लौटा हूं। आपने जो निमंत्रण पत्र भेजा था, वह मेरे हाथ लग गया। लेकिन आपके विवाह के दो वर्ष पश्चात मैं अपनी ओर से आशीष भेज रहा हूं। इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं। आपके स्वच्छ मन के अनुरूप निश्चय ही आपको एक योग्य वर पति स्वरूप प्राप्त हो गए होंगे। वह...श्री आनंद आप पर प्यार व स्नेह बरसाते होंगे। अपने आदरणीय जीवन साथी को आप मेरी शुभकामनाएं पहुंचा दें। यह दाम्पत्य जीवन आप दोनों के लिए सदा सुखी व सानंद सिद्ध हो, यह मेरी हार्दिक अभिलाषा है।
अभिवादन के साथ,
अरविंदन्
अरविंदन की ऐसी शुभकामनाएं चिट्ठी में पढ़कर भुवना बहुत आनंदित हुई। उसके विवाह के शुभ दिन यद्यपि बहुत सारे जन उपस्थित हुए थे, फिर भी अरविंदन की अनुपस्थिति निराशाजनक व दुखदायी लगी थी।
खैर अपनी शादी होने या न होने की बात का जिक्र उन्होंने नहीं किया। क्योंकि अभी तो वह विदेश से वापस आए हैं। जल्दी ही उनकी शादी तय हो जाएगी, तब वह मुझे निमंत्रण भेजेंगे ही। पति महोदय के संग जाकर उनके विवाहोत्सव में अवश्य हाजिरी दूंगी।
“ भुवना ! पिताजी की चिट्ठी पढ़ रही हो क्या? तुम्हारे चेहरे पर भला इतनी खुशी! “पति बोला।
“ पिताजी की चिट्ठी प्राप्ति मात्र से ही प्रसन्नता होती है क्या ? एक दोस्त की चिट्ठी है यह। “
“ कौन है यह दोस्त? कला ने लिखा है या प्रिया ने ? “
“यह लीजिए चिट्ठी, अरविंदन् ने भेजी है।“
चिट्ठी लेकर पढ़ते-पढ़ते वह मुंह बनाने लगा।
“ऐसा व्यवहार मुझे बिल्कुल नापसंद है।“ उसने चिट्ठी को तह करके उसकी ओर बढ़ाया।
पति के शब्द, उच्चारण तथा ध्वनि ने समझा दिया कि वह गुस्से में है। भुवना के लिए यह अप्रत्याशित बात थी।
“जी, ऐसी बातें आपके मुंह से!“
“देखो भुवना! कोई अजनबी तुम्हें चिट्ठी लिखे, मेरे लिए असह्य है। उसके साथ हमारा क्या रिश्ता है? “
पति के शब्द भुवना के दिल में घाव कर गए। अभी पहली बार उसके हृदय में जलन का अनुभव हुआ। अपने मानस में उसने पति के प्रति जो ऊंचा किला बना रखा था वह टूट-फूटकर गिरने लगा।
छिः! आखिर यह भी एक सामान्य पुरुष सिद्ध हुए। सी.ए. की सनद पाकर इन्होंने सिर्फ हिसाब-किताब संभालना सीखा है।
“आप मुझपर विश्वास नहीं करते! एक पवित्र मैत्री को समझने में असमर्थ रह गए ! पूरे इन दो वर्षों में आपने मुझे एक संकुचित दायरे तक ही सीमित समझ रखा है। “
“ऐसी बेकार बातों से तुम मुझे बेवकूफ बनाना चाहती हो क्या? एक अपरिचित युवक ने तुम्हें खत लिखा है, यह बेचैन करने वाली गंभीर समस्या है। इस कारण, संभव है, हममें मनमुटाव पैदा हो जाए। अब इतना भर कह देना काफी समझता हूं। “
***
उसने बेमन से चिट्ठी खोली-
तिरुच्ची, 5.6.1998
श्रीमती भुवना जी,
अखबार में यह समाचार पढ़कर अपनी आंखों पर विश्वास न कर सका कि आपके जीवन-साथी विपद् ग्रस्त होकर चल बसे। इस खबर से मेरे दिल पर मानो बिजली टूट पड़ी है। जबकि मैं स्वयं अपने दिल को सांत्वना न दे सका, तब आपको किन शब्दों के प्रयोग से तसल्ली दे सकूंगा।
बस, धीरज रखिए, क्योंकि नौ साल का आपका जो लाडला है, उसको एक भला मनुष्य बनाने का भार आपके कंधों पर है। लक्ष्य प्राप्ति पर अटल रहिए। आपको मेरी ओर से कोई सहायता आवश्यक लगे, तो लिखिएगा।
खैर, आप तो कोई खत ही नहीं लिखतीं !
आत्मग्लानि के साथ,
अरविंदन्
भुवना की आंखें गीली हो गईं।
“मां! आप आंसू क्यों बहा रही हैं? किसकी चिट्ठी है? “ पुत्र ने पूछा।
“अरविंदन् नाम से एक सखा ने लिखी है।“
अचानक उसने अपने गले से हाथ हटा लिए। बेचैन होकर बोला-
“अरविंदन? कौन हैं वह अंकिल? मैंने तो उनका नाम तक नहीं सुना। वह हमारे क्या होते हैं जो इस तरह आपको चिट्ठी लिखने लगे ? “
औरंगाबाद से सुदाम का तार पहुंचा वैसे ही एकाएक मेरा दिल धडकने गया। थरथराते हाथों से तार के कागज को खोला। उसमें लिखा था –
‘‘आक्का की तबीयत और बिगड़ गई है, जल्दी आ जाओ।’’
ऑफिस से घर आया और पत्नी को हकीकत बताई। इस खबर के लिए पहले से तैयार पत्नी ने जितना जल्दी हो सके उतने जल्दी घर के काम निपटाए। भागते-दौड़ते दोनों भी बस स्टाप तक पहुंचे। औरंगाबाद की ओर जाने के लिए तैयार बस पकडी।
बस चल पडी और दौड़ने लगी, उसकी गति के साथ मेरे विचार भी दौड़ने लगे...। वैसे मेरी बहन आक्का दुर्भाग्यशाली! क्रूर नियति के हाथों का खिलौना। शादी क्या हुई उसके जीवन में पीडा और दुःख का अंधेरा गहराने लगा। साल, दो साल, ...पांच साल हुए। लेकिन उसके चेहरे पर खुशी देखी नहीं गई। जीवन में आनंद की फुआरे नहीं आई...। तन-मन से हार चुकी आक्का के जीवन में बच्चे का सुख शायद नहीं लिखा था और दिनों-दिन उसकी संभावनाएं भी धुंधली होती जा रही थी। खूब कोशिश की। दवा-दारू की। जिसने जो बताया वह किया और हर जगह पर दिखाया। झांड़-फूंक किया। मंदिरों में जाकर भगवान के सामने कई बार मिन्नतें भी की... उसकी सीढियों पर माथा टेका। बड़े-बड़े अस्पतालों में विद्वान डॉक्टरों को दिखाया। एक्सरें निकाले। दो बार क्युरेंटिंग किया परंतु कोई लाभ नहीं। उसके ससुराल वाले तो बेसब्री से बच्चे का इंतजार कर रहे थे। बच्चे की कमी के कारण आक्का को हमेशा अपमान, टिका-टिप्पणियां और पीडाएं सहनी पड़ रही थी। उसका पति दूसरी शादी का कब का मन बना चुका था। उनको समझा-बुझाकर आज तक जबरदस्ती रोके रखा था।
■■
...कुछ दिन पहले की बात है, ...एक दिन आक्का रोते-बिलखते घर आई! पेट के दर्द से पीडित और असहनीय वेदनाओं से कराहती हुई। बिस्तर पर पड़े-पड़े पेट को दोनों हाथों से पकड़कर तड़प रही थी। सबकुछ मुश्किल और असहनीय था उसके लिए। भीतरी नारी वेदना। किसी को बता नहीं सकते कि क्या हुआ है। उसको समझा-बुझाने के सिवाय हमारे हाथों में कुछ भी नहीं था। परंतु दर्द बढ़ते ही जा रहा था। जब उसके लिए असहनीय हुआ तो तत्काल वैजापुर के एक गायनोकॉलॉजिस्ट को दिखाया। उन्होंने भीतर-बाहर से चेकअप किया और औरंगाबाद के सरकारी अस्पताल ‘घाटी’ में लेकर जाने की सलाह दी। हम बिना समय गवाएं घाटी में आए। मेरा छोटा भाई सुदाम भी इसी शहर में था। वह भी आ गया। उसकी वजह से कई मुश्किलें आसान हो गई। दो दिनों में सारे टेस्ट करवाए गए। गर्भाशय की बायोप्सी भी की। बायोप्सी का रिपोर्ट जब तक आए तब तक आक्का को घाटी में ही रखा जाना था।
बायोप्सी की रिपोर्ट आई और हम सब पर मानो पहाड़ टूट पडा। ...कँसर! और वह भी अपनी चरम को छू चुका था, नियंत्रण के बाहर। सुनते ही दिल बैठ गया। लगने लगा कि क्रूर काल ने मेरी बहन के साथ गंदा मजाक किया है और विषैले नाखुनों से दिल पर हजारों खरौंचें उठाकर लहुलूहान किया है। हारे हुए मन के साथ साहस जुटाया और डॉक्टर को पूछा –
‘‘...डॉक्टरसाहब अगर गर्भाशय को निकाला जाए तो?’’
‘‘...........’’
पर नहीं। यह भी संभव नहीं था। डॉक्टर ने साफ तरीके से जवाब दे दिया था। कँसर पूरा फैल चुका है और नियंत्रण के बाहर है। गर्भाशय मुख पूरा सड़ चुका था। वाह रे तकदीर! आखिर तक आक्का को बच्चे के सुख से दूर रखा और अब उसे सडाया भी। तकदीर के खेल ने आक्का की सारी जिंदगी तबाह कर दी थी। जलाकर राख कर दी थी। और मेरी छोटी प्यारी बहन जिंदा होकर भी लाश बन चुकी थी।
■■
अचानक बस के ब्रेक लगने से झटका लगा और मेरे विचारों के तार टूट गए। बाहर देखा, बस देवगांव की ओर मुड़कर रूकी थी। आधा सफर तय हुआ था। एकाध घंटे का सफर बाकी था...। पर कोई बस स्टाफ नहीं, गांव से ही दूर बस क्यों रूकी? दुबारा बाहर झांककर देखा। सामने से एक प्रेतयात्रा गुजर रही थी...। सजी हुई अरथी, कंधा देने वाले लोग, रोती-बिलखती महिलाएं, उनके पीछे चुपचाप रेंगता हुआ पुरुषों का हुजूम...। दृश्य देखकर मेरा मन अरथी पर अटक चुका। ऊपर हरीभरी साडी ढकी थी और कंगण सजे थे। तर्क किया कि जिसे लेकर जा रहे हैं वह जरूर सुहागन स्त्री है। प्रेतयात्रा आगे सरकी और बस दुबारा शुरू हुई। खिड़की से झांकते हुए एक संवारी ने इतनी देर से रोके रखी सांस को छोड़ते हुए कहा –
‘‘कुछ भरौसा नही इंसान की जिंदगी का! केवल पानी पर उठा बुलबुला है। कब फुटेगा बताया नहीं जा सकता...। इसीलिए तो संत तुकाराम कह गए कि ’देह नष्ट होने वाली है और एक दिन सबको इस दुनिया को छोड़कर जाना है...।’’
बातचीत का सिलसिला जारी रहा। ईश्वर, नसीब... और अनेक विषयों पर बातें होने लगी। मेरा बन इन बातों से उड़ गया। अरथी और अरथी पर सजी हरी साडी का दृश्य मेरी आंखों के सामने से हटने का नाम नहीं ले रहा था। मन की व्याकुलता बढ़ती गई और वह अंदर ही अंदर आक्रोश करने लगा। आक्का की तबीयत कैसी होगी? क्या होगा? और कौनसी खबर सुननी पडेगी...। आतंक और चिंता बढ़ती जा रही थी।
■■
आक्का मुझसे भी छोटी थी परंतु मेरे लिए उसने बहुत सहा था। मैं उसकी मेहनत और त्याग की वापसी कभी भी नहीं कर सकता हूं। आज मैं जिस मकाम पर हूं वह केवल उसकी बदौलत है। मेरे लिए उसने मजदूरी की, अभाव सहे और पसीना बहाया। ...उससे जुड़ी कई यादें मन की तह से ऊपर उठ रही थी। एक के बाद एक घटनाएं आंखों के सामने से गुजर रही थी।
बहत्तर-चौहत्तर के सूखे की घटनाएं हैं। सूखे की मार से चारों और विरानता फैल चुकी थी। आम आदमी दाने-दाने के लिए मोहताज था। लोगों के मन में भी विरानता, दुःख, पीडा फैल चुकी थी। जिंदा रहने के लिए लोग गांव-गांव और जंगल-जंगल भटक रहे थे। अपना गांव-घर छोड़कर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए इंसान मजबूर था। अपनी भूमि से गहराई तक जुड़ी मन की जड़े उखाड़ते वक्त मन को असंख्य वेदनाएं हो रही थी। ...मेरे पिता जी के ऊपर सात बच्चे और दादी मां का बोझ था। सूखे से आस-पास के इलाखे की सारी खेती-बाडी तबाह हो गई थी, मजदूरी का भी काम नहीं मिल रहा था। सबके खाली पेट। जो था उसे बेच-बाचकर खा चुके थे। अब बेचने के लिए भी कुछ बाकी नहीं था। एक समय जलने वाली चूल्हे की आग भी ठंडी पड़ चुकी थी। गरीबी और सूखे से हाथ बंध चुके थे। क्या करे, क्या नहीं करे समझ में नहीं आ रहा था। पिताजी और हमारा परिवार काल के विक्राल हाथों से चारों ओर से घिर चुका था।
गांव छोड़कर जाए तो यहां बचा-खुचा किसके भरौसे छोडे? अगर गांव छोड़े भी तो यहां दादी के साथ रहेगा कौन और खाए क्या? चिंता सता रही थी। बुरे दिनों में कोई किसी का नहीं होता। घर छोडे तो आंगन भी पराया हो जाता है। मेरे पढ़ाई की चिंता पिता जी को सता रही थी। दादी के पास रहने के लिए पढ़ाई को रोकना उन्हें मंजूर नहीं था। अपनी भूख, पेट, अभाव और चिंताओं से उन्हें मेरी पढ़ाई जरूरी लग रही थी। दिनों-दिन मुश्किलें बढ़ती जा रही थी। घर की बुरी हालत को देखकर मुझसे छोटी आक्का ने कमर कसी और सबकी हिम्मत बांधते पिता जी से कहा –
‘‘...आप्पा अब एक ही रास्ता है। आप सभी जहां काम और रोटी मिले वहां जाए। अण्णा की पढ़ाई को जारी रखे और मैं यहीं रूककर जैसा बने वैसे दादी की देखभाल करूंगी...। आप बेफिक्र होकर जाए।’’
और हुआ भी वैसे ही। मेरी पढ़ाई जारी रही। पिता जी ने जरूरी सामान उठाया। परिवार के साथ दूर कहीं सालदार के नाते मजदूरी के लिए निकल पड़े। मैं बीच-बीच में आक्का और दादी की ओर एकाध बार चक्कर लगा लेता। मेरी पढ़ाई परिवार के भविष्य का आधार थी, अतः मेरे आने-जाने से सूखे की विरानता में उनके चेहरे पर आशा की थोडी-सी हरियाली फैल जाती थी। मैं भी उनके सपनों को जिंदा रखने की भरसक कोशिश कर रहा था।
आज भी मुझे याद है, स्कूल को छुट्टी थी। कोई त्यौहार था और मैंने सोचा चलो एक-दो दिन घर होकर आता हूं। इस बहाने मिलना भी होगा, आक्का और दादी का क्या चल रहा है देखना भी होगा। घर आते-आते अंधेरा घिर चुका था। खाने का समय भी टल चुका था। ...मुझे देखते ही आक्का हैरान हो गई। आज त्यौहार है इसलिए मैं गांव आया हूं, यह आक्का ने पहचान लिया। मैंने कुछ खाया नहीं जानते ही उसने बेचैनी से कहा –
‘‘अण्णा, बाहर कहीं मत जाओ, मैं अभी आयी...।’’ वह जल्दबाजी में बाहर गई। मैं दादी के पास बैठा और वह गांव-घर की हालत, लेन-देन, सुख-दुःख की कहानी बताती रही...। इतने में दरवाजे पर आक्का के कदमों की आहट सुनाई पडी। टिमटिमते दिए के रोशनी में मैंने देखा कि पडोस से बचा-खुचा पल्लू में छिपाकर लाया वह टोकरी में रख रही थी। अपने अभाव, दुःख, दर्द को छिपाते ममता भरे शब्दों में उसने कहा –
‘‘चलो उठो अण्णा। थोडा-सा रूखा-सूखा है खा लो। सुबह से खाली पेट रहे हो। बहुत देर हो गई है, ...चलो खा लो।’’
दिल भर आया था, मन पर पत्थर रखकर आगे सरका। एक-एक कौर मुंह में डाले जा रहा था। थाली में रूखा-सूखा था, किसी के घर का बचा हुआ...। आक्का ने केवल मेरे लिए मांगकर लाया था...। इस हालत, दयनीयता और आक्का के असिम प्रेम में डूबकर निवाला गले से उतर नहीं रहा था पर आक्का-दादी की खुशी के लिए खाए जा रहा था। आंखों से टपकने वाले आंसुओं को अंधेरे में छिपाते हुए निवाले को और नमकीन बनाते हुए नीचे धकेल रहा था। पेट की भूख कम होना दूर रहा पर यह स्थिति दुःख-दाह को और बढा रही थी, मन भीतर से आक्रोश किए जा रहा था...। जैसे-तैसे खाना पूरा किया, उठा और बाहर जाकर अंधेरे में खडे होकर आसुओं को बहने दिया। कहां जाए? क्या करे? ...सीधे घर के छत पर चढा, दीवार से सर टिकाकर भर आए मन को और हल्का किया। आंखों से होकर मन की वेदनाओं को बाहर आने दिया, बहुत देर तक।
आक्का से जुडी ऐसी एक नहीं कई घटनाओं की यादें आज ताजा हो रही थी। मन के बंद कटघरे को तोड़कर बाहर आ रही थी...। कुछ समय और काल के लिए आक्का ने मां होकर मुझे पालापोसा था।
■■
औरंगाबाद के बस स्टाफ पर हम उतरे और सीधे सुदाम के कमरे का रास्ता पकड़ लिया। मैं आगे-आगे भाग रहा था और पत्नी पीछे-पीछे। दोनों के बीच मौन था। भीड़ से रास्ता निकालते हम अपने-आपको धकेले जा रहे थे। हमारे लिए मानो समय ठहर चुका था, भाव-भावनाएं मुक बनी थी...। रास्ते को तय करते वक्त मन में एक भय की छाया मंड़रा रही थी। सुदाम का कमरा जैसे-जैसे नजदीक आ रहा था तब हाथ-पांव आतंक से थरथराने लगे थे। रह-रहकर बुरे खयाल आ रहे थे, बुरे दृश्य आंखों से गुजर रहे थे...। अब आक्का ठीक तो होगी? कैसी हालत होगी? और कोई उल्टी-सीधी खबर तो कानों पर पडेगी नहीं ना? एक नहीं हजारों खयाल।
इसी धुन और विचारों में कब पहुंचा पता ही नहीं चला। पैरों से लिपटे सुदाम के बच्चे की आवाज कानों पर पडी, ‘‘चाचा आए, चाचा आए...।’’ उसे प्यार से पुचकारते हुए हाथ पकड़कर बरामदा पार किया। दरवाजें पर कुछ चप्पलें बिखरी पडी थी...। बढ़ती धड़कनों के साथ अंदर दाखिल हुआ। सबकी नजरे मेरी ओर उठी। आक्का का पति, सास, सुदाम की पत्नी और एक-दो दूसरी महिलाएं वहां बैठी थी...। सबके बीच आक्का के हड्डियों का पिंजर बिस्तर पर पडा था। सारे कमरे पर भयानक छाया मंड़राने का एहसास हो रहा था...।
आक्का की इस दशा को देखकर मेरा मन क्रंदन करने लगा था। बडी मुश्किल से दिल पर पत्थर रख रूदन को रोके रखा था। कारण यहां आक्का की सास के अलावा उमर से मैं ही सबसे बढा था...। सुनी आंखों से बिस्तर पर पडी आक्का पर नजर दौडाते हुए, फर्श का आधार लेकर वहीं बैठ गया। मेरे बैठते ही सुदाम की पत्नी ने आक्का को थोडा हिलाकर जगाया और मेरे आने की सूचना देनी चाही –
‘‘आक्का, आक्का जी... देखो जरा आंखें खोलकर कौन आया है! उठिए! देखिए। अण्णा आए हैं, साथ में आपसे मिलने के लिए भाभी जी आयी है। उठे। थोडी बात कर लिजिए इनके साथ...।’’
आवाज सुनते ही बंद खांचों में आंखें थोडी हिली। जबरदस्ती आंखें खोलकर आक्का ने हम पर नजर दौडाकर पहचानने की कोशिश की। पहचान होने पर कुछ बोलने के लिए उसके सूखे होंठ थरथराने लगे। होंठों को खोलते वक्त भी उसे तकलीफ हो रही थी। लंबी वेदना के साथ उसकी कराह फूटी ...और लगातार सिसकने लगी। मेरे कानों पर उसकी दर्द से भरी सिसकियां पड रही थी लगता था कि कहीं दूर कोई दर्द से, पीडा से कराह रहा हो। सिसकियों से उसका सारा शरीर कांपने लगा। उसकी इस पीडादायी दशा को देखकर मेरे मन को हजारों दरारें पडी और इतनी देर से रोके रखे आंसू अचानक बांध तोड़कर बहने लगे। ...सबकी आंखें भी भर आई। कमरे का सारा माहौल सिसकियों और रूदन से भर गया। बुजुर्ग होने के नाते आक्का की सांस ने सबका साहस बांधा और समझा-बुझाकर चुप करने लगी।
‘‘...बस, बहुत हो गया। उसके लिए बहुत किया है अण्णा आप सबने। उसे ठीक करने के लिए पानी की तरह पैसा बहायाहै, ...वह ठीक हो जाएगी। ऊपर वाले की मर्जी हो तो चार दिनों में चले-फिरने लगेगी...।’’
आक्का की तकलीफ मुझसे देखी नहीं जा रही थी। बहते आसुओं को पोछते-पोछते बाहर आया। जीजा जी से भी उसकी तकलीफ देखी नहीं जा रही थी, वे भी उठकर बाहर आ गए। दोनों भी बरामदे में जाकर बैठे। दोनों ओर बहुत देर तक चुप्पी छाई रही। पर मैं और चुप नहीं बैठ सका। गुस्सा, क्रोध और आक्रोश चुपचाप पीकर मन को समझाना था... कारण नियति ने जो तय किया था उससे कोई भाग नहीं सकता था। हां केवल कुछ दिनों के लिए टाला जा सकता था...। चुप्पी तोड़ने के लिए मैंने कहा –
‘‘आपको कब खबर मिली...?’’
‘‘आज ही...। यह बात भी दो-तीन जनों से होकर हम तक पहुंची थी। पर सच कहूं अब लगता है सुदाम ने बेवजह जल्दबाजी की। हाथों के सारे काम छोड़कर आना पडा। और यहां पर वैसी गंभीर स्थिति है नहीं...।’’
‘‘क्या कह रहे हैं जीजा जी? गंभीर स्थिति नहीं? कैसे कह सकते हैं? अब क्या बचा है उसमें? बोलने की शक्ति नहीं है? वह क्या बोल रही है यह भी समझ में नहीं आता है।’’
‘‘आप जो कह रहे हैं वैसे बिल्कुल नहीं है! अब आपको कैसे बताऊ! हम जब आए थे तब वह अच्छी-खांसी थी। खुद उठकर घंटाभर बैठी थी। बहुत देर तक हमसे बतियाते भी रही। लेकिन एक बात सच है अण्णा, आप कुछ भी कहे, उसके मन में अब भी गृहस्थी की आशा बाकी है! मुझे लगता है उसे ऐसी बीमारी में खाना-पीना चाहिए, आराम करना चाहिए। पर उसकी जान तो घर-गृहस्थी में अटक चुकी है। वहां क्या चल रहा है, गाय को बछडा हुआ या नहीं, क्या हुआ उसे। बछडा अगर बैल हो तो उसको खुब दूध पिलाओ। उसका ध्यान रखो... और बहुत कुछ...।’’
जीजा जी निर्दयता से बोल रहे थे और मैं केवल सुनते हुए विचार करते जा रहा था...। मेरे दिमाग में एक ही बात बार-बार उठ रही थी – आक्का के अधूरे जीवन की। मन के अधूरेपन की। अतृप्त मातृत्व की...। सोच ही रहा था कि सुदाम के बीवी की आवाज कानों पर पडी –
‘‘अब आक्का उठकर थोडी बैठी है। आप उनसे थोडी बात कर लें।’’
अंदर गया तो देखा आक्का दीवार से चिपककर बैठी थी। मनुष्य शरीर के नाते कुछ भी शेष नहीं था। एकाध चित्र जैसे दीवार को चिपाकाया जाता है वैसे वह चिपककर बैठी थी। सुनी आंखें, चेहरे की सारी चमक गायब थी और सूख चुकी, गल चुकी चमडी। लग रहा था मानो उसे हड्डी के साथ चिपकाया हो। उसका चेहरा अंदर से पूरी तरह सूख चुका था और आंखों के नीचे की हड्डियां ऊपर उठ चुकी थी। गली-सूखी उंगलियां सामने रखी मिठाई का छोटा टूकडा उठाकर मुंह में जबरदस्ती ठूंस रही थी...। उसके पास बैठते हुए कंधे पर हाथ रखते प्यार से परंतु कातर स्वर में पूछा –
‘‘क्यों, आक्का अब तुम्हें ठीक लग रहा है ना? कहां-कहां दर्द हो रहा है अब?’’
किसी गहरे-अंधेरे कुएं से जैसी आवाज आती है वैसे कुछ शब्द गुंजते हुए बाहर निकले –
‘‘अब, क्या क्या हो रहा है और कहां-कहां दर्द हो रहा है, कैसे बताऊं तुम्हें... लग रहा है मानो मेरा सबकुछ खत्म हो चुका है...।’’
इतना कहते-कहते उसकी अंदर धंसी हुई आंखों में आंसू भरने लगे। अज्ञात में खोई हुई उसकी आंखें दूर कहीं कुछ ढूंढ़ रही थी। हड्डियों के ढांचे में थोडी जान आ गई और उसका शरीर हिलने लगा। लंबा हाथ थरथराते हुए उठकर पेट की ओर गया। दर्द-पीडा की लकिरें उसके चेहरे पर उठती गई। कराह और असहनीय वेदनाएं चेहरे पर दिखने लगी। पीडा से व्याकुल होकर कराहते-कराहते आक्का बिस्तर पर फैलती गई...।
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काम से बाहर गया सुदाम घर वापस आया था। उससे बातें हो गई। आक्का की बीमारी से उसके लिए भी कई मुश्किलें खडी हो गई थी। उसके शब्दों में शिकायत भरी थी। बात ही करते बैठे थे कि अंदर से उसके पत्नी ने आवाज दी –
‘‘खाना बना लिया है। मेहमानों ने भी खाना नहीं खाया। सब मिलकर थोडा-थोडा खा लें।’’
खाने का मन तो था नहीं पर जीजा जी के साथ बैठ गए। सुदाम को समझाते रहा और जीजा जी से बात करते दो-चार कौर पेट में धकेल दिए।
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यहां आकर बहुत देर हो चुकी थी। चार-साढे चार बज रहे थे। वापस लौटना भी जरूरी था। सुबह निकलते वक्त ऑफिस में केवल एक ही दिन के छुट्टी की अर्जी छोड़ आया था। पत्नी को वापस जाना जरूरी है बता दिया। निकलने की तैयारी शुरू हो गई। निकलने से पहले आक्का से दुबारा बात करने की मंशा से थोडा हिलाकर जगाना चाहा। गर्दन के नीचे थोडा आधार देकर उसे बिठा दिया। मैं भी वहीं बिस्तर पर टिका। रूखे-सूखे, बिखरे बालों पर से हाथ फिराकर डबड़बाई आंखों से देखा और कहा –
‘‘निकल रहा हूं आक्का...।’’
रूमाल मुंह में दबाकर रूदन को रोके रखा। असहनीय हुआ तो उठकर बाहर आया...। दीवार की ओट में हताशा से बैठकर अंदर की आवाजें सुनता रहा। मेरी पत्नी कह रही थी –
‘‘आक्का जी इजाजत दीजिए हमें अभी। ज्यादा कुछ सोचे मत। दवाइयां ठीक समय पर लेते रहें। आप जल्दी ठीक हो जाएंगी...।’’
आक्का ने उत्तर में कुछ कहा नहीं। वह चुप थी। बैठे-बैठे केवल वेदना से कराह रही थी।
निकले से पहले सुदाम की पत्नी पूजा की थाली में कुंकम लेकर आई। मेरी पत्नी और उसने हल्दी-कुंकम एक-दूसरे के माथे पर लगाया। आंसू भरे आंखों से उन दोनों ने आक्का को दुबार आंखें भरकर देखा। उन्होंने मिलकर सुहागन की निशानी के नाते आक्का के माथे पर भी हल्दी-कुंकम लगाया पर कमजोरी के कारण उसकी गर्दन हिलने लगी थी और माथे पर लगाया जा रहा तिलक इधर-उधर फैलते जा रहा था। कुंकम तिलक उसके सुहागन होने की बात को और गहराई से अंकित किए जा रहा था परंतु उसके गाढे रंगो तले उसकी भाग्यरेखा धुंधलाते जा रही थी...। और मैं खुली आंखों से सबकुछ देखने के लिए मजबूर था। मन में उबलता आक्रोश फूटने के लिए उतारू था पर उसे जबरदस्ती रोके रखा था।
...मेरी आंखों के सामने जो खेलते-कुदते धीरे-धीरे बढी हो गई थी, छोटी होकर भी मुश्किल समय में जिसने कभी घर का आधार बनने के लिए कमर कसी थी, उसे आज दयनीय अवस्था में टूटते-बिखरते देख रहा था। बीमारी से गलते भी देख रहा था, उसका छोटा और छोटा होते जाना भी देख रहा था। ‘बच्चे की मां’ होना तो उसके नसीब में नहीं लिखा था लेकिन आज उसका ‘बच्चा’ होना देख रहा था। किसी अपने का, आत्मीय का इस तरह तिल-तिल घटते जाना, मृत्यु के नजदीक पहुंचना मेरे लिए दर्दनाक था...। काल की भयानकता के सामने मैं निहत्था खडा था। हाथ पर हाथ धरे बैठने के सिवा मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा था। नियति की क्रूरता के सामने मैं मजबूर और हताश था...।
दुःख के विशाल और विस्तीर्ण महासागर में मुझे अकेला छोड़ अनंत में विलिन होने की आक्का तैयारी कर रही थी...। लेकिन इस अथाह दुःख को भी एक समाधान की झालर थी कि मेरी आक्का चिरंतन सुहागन के रूप में मृत्यु का वरण करने वाली थी...।
हाथ में थैली उठाकर पत्नी बाहर निकल पडी और मैं भी आक्का को पीछे छोड़ बोझिल कदमों से चल पडा। मेरी आत्मीय प्यारी बहन आक्का पीछे जोर-जोर से मानो आक्रोश कर चिल्ला रही थी, ‘‘...आण्णा, मुझे जीना है, ...अण्णा, मुझे जीना है...!’’
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मूल मराठी लेखक – भीमराव वाघचौरे
प्रसिद्ध मराठी ग्रामीण कथाकर
अनुवादक – डॉ. विजय शिंदे
देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र)
मराठी के प्रसिद्ध ग्रामीण कथाकार के नाते भीमराव वाघचौरे जी ने अपनी पहचान बनाई है। मराठवाडा शिक्षण प्रसारक मंडल के कै. विनायकराव पाटील महाविद्यालय, वैजापुर में सालों अध्यापक के नाते सेवा करने वाले वाघचौरे जी एक अच्छे किसान भी रहे हैं। स्वभाव से निर्मल, सरल, किसानी गंध वाले वाघचौरे जी साहित्य के भीतर भी वहीं शख्सियत रखते हैं। औरंगाबाद जिले के वैजापुर तहसील में गोळेवाडी नामक छोटे गांव में जन्म ले चुके भीमराव वाघचौरे जी ने जो भोगा, पास पडोस में देखा उसे साहित्यिक अभिव्यक्ति का विषय बनाया है। मराठीउपन्यासकार के नाते ‘अंगारकुस’, ‘गराडा’, ‘रानखळगी’, और ’पानघळी’ जैसी कृतियां उनके प्रसिद्धी का आधार है।‘मरनावळ’और ‘मूठमाती’ जैसे दो कहानी संग्रहों में ग्रामजीवन की उपेक्षाओं तथा पीडाओं को उन्होंने व्याख्यायित किया है। सफल और चर्चित कृतियों के निर्माणकर्ता भीमराव वाघचौरे जी भविष्य में और ताकतवर लेखन का दमखम रखते हैं। इनके द्वारा लिखित ‘रा. रं. बोराडे यांचे साहित्य आणि आस्वाद’ समीक्षात्मक ग्रंथ भी मराठी समीक्षाजगत् में मानक रहा है। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद से इनके साहित्य में वर्णित ग्रामजीवन, सूखा, मानवीयता जैसे विविध विषयों को लेकर शोधकार्य संपन्न हो चुका है और नवीन ग्रामीण साहित्य के आयामों को लेकर शोधकार्य भी जारी है।
डॉ. विजय शिंदे
हिंदी और मराठी भाषा के अध्येता के रूप में डॉ. विजय शिंदे ने अपनी पहचान बना दी है। लोकरेवाडी, (तहसील – तासगांव, जिला – सांगली) जैसे छोटे और अहिंदी भाषी प्रदेश में रहकर हिंदी के प्रति विशेष प्रेम और प्रचारक की उनकी भूमिका सराहनीय है। हिंदी तथा मराठी भाषा में सृजनात्मक और समीक्षात्मक लेखन संमातर रूप से जारी है। ‘सवासीन’ इनका पहला मराठी कहानी संग्रह है जिसे महाराष्ट्र राज्य साहित्य और संस्कृति मंडल का अनुदान प्राप्त हो चुका है। उसके बाद ‘ययाति’ हिंदी से मराठी में अनुवादित कहानी संग्रह, ‘एकांत तपस्वी’ हिंदी कहानी संग्रह और ‘इक्कीसवीं सदी में हिंदी साहित्यः स्थिति एवं संभावनाएं’ समीक्षात्मक संपादन ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी पृष्ठभूमि किसान परिवार से हैं, अतः सृजानात्मक और समीक्षात्मक लेखन के ग्रामजीवन, उपेक्षा, पीडा, संघर्ष, वेदना, आत्मचिंतन, बेकारी, शिक्षा क्षेत्र की दयनीयता आदि विषय स्वभावता रुचि के रहे हैं। आकाशवाणी सांगली, कोल्हापुर और औरंगाबाद से मराठी व हिंदी कहानियां, कविताएं और वार्ताओं का प्रसारण हो चुका है। हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध ई-पत्रिकाओं और प्रिंट पत्रिकाओं में समीक्षात्मक, चिंतनात्मक लेखन जारी है तथा समीक्षा क्षेत्र में अपना विशेष पहचान बना चुके हैं
झोंपड़ी के बाहर, खिड़की पर बैठी रेशमा बीड़ी पी रही है । सूर्य की पहली किरण उसके सांवले चहरे को चमका रही है । उसकी आँखें कुछ रोशनी के कारण, कुछ बीड़ी के धुएँ की वजह से लाल हुई हैं । उसकी पेशानी पर सिलवटें ज़ाहिर कर रही हैं कि वह कुछ गहरा सोच रही है । मायूसी उसके चेहरे से नुमायां हो रही है । बीड़ी के आखिरी टुकड़े से, दो तीन फूंक और मारते हुए, बीड़ी फेंकी और वह उठ खड़ी हुई ।
वह खड़ी चारों ओर देख रही थी, बस्ती की और झोपड़ियाँ कुछ नीचे, कुछ थोड़ी दूर, चारों तरफ फैली हुई हैं । आगे शाही रास्ता है जहाँ सुबह की चहल-पहल शुरू हो गई है । पीछे शानदार बंगले हैं जिनमें अभी तक कोई हलचल नहीं है। यह गोपालपुरी है, शहर के सुंदर चेहरे पर बदनाम दाग़ों में से एक बड़ा दाग़ ! यह ‘बदनाम बस्ती’ के नाम से ज़्यादा मशहूर है । बदनाम इसलिये है कि, कहते हैं सभी बुराइयाँ यहाँ जन्म लेती हैं, और बुरे काम इस बस्ती का सरमाया है । गंदगी, कचरे और मैल का घर है यह बस्ती! फैलती बीमारियों की जड़ यह बस्ती ही है । फिर भी इस बस्ती में इन्सान रहते हैं (अगर उन्हें इन्सान कहना वाजिब है तो !) जो कीड़े मकौड़े की मानिंद बढ़ रहे हैं और झोंपड़ियाँ भी मकड़ियों के जाल की तरह फैल रही हैं ।
रेशमा भी इस गंदगी का कीड़ा है । इस बस्ती का एक हिस्सा है, यहीं पर उसका जन्म हुआ और पलकर बड़ी हुई। उसकी माँ के बारे में सभी यहाँ के लोग जानते हैं, उसे देखा है । वह भी इसी बस्ती की रहवासी थी । कालू रेशमा का भाई कहलवाता है । कहते हैं कालू के बाप का एक रात दारू के लिये पैसे न मिलने के कारण रेशमा की माँ के साथ झगड़ा हो गया। दूसरे दिन सुबह से वह ग़ायब रहा, पर किसी ने भी उसे तलाशने की कोशिश नहीं की, क्योंकि यहाँ ऐसा होता रहता है ।
कभी कोई आदमी (पति कहना इतना लाज़मी नहीं है) औरत से झगड़ा करे, कभी नशे में उसे मारकर चला जाए तो, अक्सर दो-तीन दिन के बाद लौट आता है, औरत से माफ़ी माँगता है और अच्छे चाल-चलन की क़सम खाकर ज़मानत देता है । बस समझो कि औरत-मर्द के बीच में कुछ अरसे के लिये सुलह हो गई । किन हालातों में मर्द दो-तीन महीने लापता हो जाता है और फिर अचानक एक दिन लौटकर ज़ाहिर होता है और औरत पर मर्द होने का दावा करता है। लेकिन अपनी जगह पर किसी और मर्द को देखकर कोहराम मचाता है । बस्ती के चार भले-बुरे आदमी इकट्ठे होकर, उसपर लानत उछालते हैं, ‘छी-ऐसा-वैसा ! तुझमें जब औरत को पालने की हिम्मत नहीं है तो फिर तुम्हें मर्द कहलाने का कोई हक़ नहीं ।’ और बेचारा बड़ों की लानत सुनकर, मुँह छिपाता हुआ किसी और बस्ती में जा बसता है । औरत-मर्द के संबंध से पैदा हुआ बालक, उनके बीच की खींचतान से बेख़बर, फुटपाथ पर या बस्ती में पलकर बड़ा होता है । माँ की जानकारी तो उसे अक्सर होती है, पर बाप की नहीं !
कालू का बाप फिर वापस नहीं लौटा । उसकी जगह भरते हुए किसी को नहीं देखा गया । रेशमा की माँ पीछे वाले दो-चार बंगलों में मेहनत-मज़दूरी करके पेट पालती रही । कालू बड़ा हो गया, बस्ती में और लड़कों की तरह भटकता और खाता-पीता था और एक दिन यह ख़बर मिली कि रेशमा की माँ को बेटी पैदा हुई है । कुछ कहा-सुना नहीं हुआ । जिसने बच्चे को देखा, कहा - ‘भई वाह ! इसका रंग नैन-नक़्श तो झोंपड़ी में रहने वालो जैसा नहीं लगता ।’ किसी और ने कहा - ‘लड़की तो नहीं, जैसे कोई सुंदर गुड़िया है ।’ किसी ने जवाब दिया ‘नर्म और मुलायम ऐसी है जैसी रेशम ! यह तो पालनों में पलने के लिये पैदा हुई है ।’
रेशमा पालनों में तो नहीं पली, पर इस बस्ती की सख़्त पथरीली ज़मीन पर लेटी, कभी फुटपाथ की पथरीली चादर पर सोकर बड़ी हुई । माँ के साथ मेहनत और मज़दूरी करके उसका शरीर पुष्ट और हड्डियाँ लोहे की तरह सख़्त हुई हैं । रेशमा आज जवान है, उसके अंग-अंग से अल्हड़ जवानी झांक रही थी, जिसकी संभाल करने के लिये माँ का साथ था, पर पिछले बरस वह भी रेशमा को अकेला छोड़कर परलोक पधार गई । अकेली रेशमा को अपनी जवानी की रक्षा करने के लिये कभी-कभी चंडीमाता का रूप अख़्तियार करना पड़ता था ।
इस बस्ती की कोई मय्यार न थी । जो चीज़ खुले बाज़ार में नहीं मिलती, वह यहाँ मिल जाती । स्त्री की इज़्ज़त और अस्मत भी और चीज़ों की तरह यहाँ बिकती है । यहाँ हर चीज़ का सौदा होता है, दीन और ईमान भी बिकता है ! साँझ होते ही इस बस्ती के रंग-ढंग बदल जाते हैं, इसलिये यह बस्ती बदनाम है ।
रेशमा ने इर्द-गिर्द नज़र दौड़ाई । बस्ती अभी नींद में थी । झोंपड़ियों के बाहर जीवित इन्सान सोये थे, पर वहाँ अभी कोई हलचल नहीं दिखाई पड़ रही थी। नीचे झोंपड़ी के बाजू में स्त्री सूअर लेटी हुई थी, और सात-आठ बच्चे उससे लिपट रहे थे और बारी-बारी दूध पीने की कोशिश कर रहे थे ।
खिड़की से थोड़ा नीचे, रेशमा ने देखा कि उसका भाई कालू टूटी हुई खाट पर लेटा था । एक कुत्ता वहाँ से गुज़रा, खाट के नज़दीक जाकर एक टांग उसने ऊपर की ही थी कि... रेशमा ने उसे दुत्कारा और पास में पड़ा हुआ पत्थर उठाकर फेंका । कुत्ता ‘कीं-कीं’ करता भाग गया ।
‘रेशमा’
और उसने पीछे मुड़कर देखा, वह चम्पा थी, जवान और गठीली, उम्र में उससे कुछ छोटी ।
‘क्यों मुर्दार ! आज सवेरे ही उठकर आ गई हो, रात कोई ग्राहक नहीं मिला क्या?’
‘भाड़ में जाए ग्राहक’, कहते उसने बीड़ी से एक लंबा कश लिया और धुआँ नथुनों से छोड़ते हुए पास में रखे पत्थर पर बैठ गई। रेशमा ने भी उसके साथ-साथ बैठते हुए पूछा - ‘क्यों क्या हुआ है ?’
‘उस दिन वाली वारदात ने तो नींद ही हराम कर दी है रेशमा !’ उसने रेशमा की ओर देखा और आँखे उठाकर एक सरसरी निगाह मुर्दा बस्ती पर डाली । ‘सोचती हूँ, हमें ज़िन्दा रहने का हक़ नहीं है क्या ?’
‘इतनी छोटी और इतना बड़ा क्यों सोचती हो ? देखती नहीं हो, जी रहे हैं ?’
‘मज़ाक में मत उड़ाओ रेशमा !’ चम्पा ने गंभीर आवाज़ में कहा । उसने बुझी हुई बीड़ी का टुकड़ा फेंक दिया ।
‘इतनी ज़िल्लत की ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं, फिर भी मुर्दार सुख से सोने नहीं देते - आख़िर क्यों ?’
‘क्योंकि हम ज़ुल्म सहने के आदी हो गए हैं । हममें ज़ोर और ज़बरदस्ती का मुक़ाबिला करने की हिम्मत नहीं है, हम ईंट का जवाब पत्थर से नहीं दे पाते ।’ ‘सच कह रही हो रेशमा ! उस दिन जो तूने जुर्रत दिखाई, उसने थानेदार और कर्मचारियों के हौसले पस्त कर दिये । तेरी गर्जना और ललकार ने औरों में भी हिम्मत पैदा की और सब निकल बाहर आकर खड़े हुए । नहीं तो आज यहाँ झोपड़ियों के बजाय मैदान दिखाई देता होता ।’
रेशमा की नज़र झोपड़ियों से थिरकती, रास्ते तक पहुँची । यह अहसास कि उनकी ये झुग्गियाँ, पुरानी अटारियाँ, भरभरा कर ज़मीन पर धरी रह जाएँगी । चारों तरफ़ रह जाएँगे सिर्फ़ और सिर्फ़ लकड़ों के, पुट्ठों के, घास के, गूनियों के और मिट्टी के ढेर। औरतें और बच्चे, जवान और बूढ़े, अपने टूटे-फूटे सामान के पास, कड़ी धूप में पड़े दिखाई देंगे । किसी शजर की छाँव में, कुछ गोबर के थेपले सुलगते नज़र आएँगे । आधे नंगे बच्चे इन सब हक़ीक़तों से अनजान, अपने ही फूटे हुए नसीब के ढेरों पर खेलते और दौड़ते रहेंगे, और एक ठंडी आह उसकी सांसो ने बाहर छोड़ी ।
‘एक बात कहूँ चम्पा, दिल में न करना !’
‘बोलो, दीदी !’
‘यह जिस्म का सौदा छोड़कर, इज़्ज़त और आबरू की ज़िंदगी गुज़ारने की कोशिश क्यों नहीं करती ?’
चम्पा भड़क उठी !
‘इज़्ज़त , किसकी इज़्ज़त ? कौन-सी इज़्ज़त , कौन-सी आबरू ? यह इज़्ज़त तो उन ऊँची इमारतों में रहने वालों की पूंजी है, हम फुटपाथ पर जन्म लेने वालों और झोपड़ियों में पलने वालों के पास ऐसी अनमोल वस्तु है कहाँ ? हममें इस इज़्ज़त जैसी चीज़ की हिफ़ाज़त करने के लिये ताक़त कहाँ है, हौसला कहाँ है ?’
‘तुम भूल रही हो चम्पा ! हर नारी की शोभा और श्रृंगार उसकी इज़्ज़त और अस्मत है, फिर चाहे वह औरत ग़रीब हो चाहे धनवान ।’
‘ये सब कहने की बाते हैं दीदी ! जैसे आँख खुलती है तो ख़ुद को फुटपाथ पर पाते हैं, फटे-पुराने कपड़ों से नंगे शरीर को ढकते, भूखे पेट के साथ पलकर बड़े होते हैं, अभी जवानी में क़दम रखते ही नहीं है हम, तो कामी कुत्तों और हवस के भूखे दरिंदों की शिकार होती हैं । कहो रेशमा इस पापी पेट के बारे में सोचें या इज़्ज़त की रक्षा करें ?’
‘क्या मैं ये सब नहीं जानती ? नारी बराबर नाज़ुक और अबला है । पर उसमें शेरनी की ताक़त भी छुपी हुई है चम्पा ।’
‘काश सब तुम जैसी शेरनियाँ पैदा हों !’
‘भरोसा रखो, तुम भी वही हो सकती हो, चम्पा !’
‘ये सब फ़िजूल की बातें हैं ।’ और वह उठ खड़ी हुई, बीड़ी सुलगाई, धुआँ हवा में छोड़ते हुए कहा - ‘भला क्या रखा है इस शरीर में । अगर रात को गंदा-मैला होता है तो सुबह उसे साफ़ करेंगे, क्या गुनाह है ? पाप क्या जिस्म को चिपक जाता है ?’ और चम्पा हँसने लगी ।
‘पूरी नारी जाति बदनाम होती है चम्पा !’
‘वैसे तो यह पूरी बस्ती बदनाम है, जो कुछ हम करते हैं वो गुनाह है, पाप है, पर अगर यही काम वह अटारियों वाले करें तो यह उनका मन बहलाव कहलाता है । यह इज़्ज़त और शान उनकी धरोहर है, हमारे वरसे में सिर्फ़ बदनामी हैं ।’
‘तू समझ नहीं पाएगी चम्पा !’
‘और मैं समझना भी नहीं चाहती !’
और वह हँसने लगी थी - थोड़ा दूर जाकर लौट आती है ।
‘एक बात तुमसे कहना भूल गई ।’
‘बोलो, क्या है ?’
‘तुम्हारे पास जो नारी जाति की दौलत है उस पर कितने ही हवसी शिकारियों की नज़र है । तुम्हारी दौलत लूटने के लिये षड़यंत्र रचा जा रहा है और कालू भी उसमें शरीक है, ज़रा सावधान रहना !’
रेशमा की भौहें तन गईं, हाथों की उँगलियाँ खुद-ब-खुद मुट्ठी में बँधती गईं । उस वक़्त कुत्ते की गुर्राहट की ज़ोरदार आवाज़ आई । सामने रास्ते पर से तेज़ रफ़्तार में जाने वाली कार ने कुत्ते को कुचल डाला । उसकी कराहती चीख़ फ़ज़ा में फैलकर जल्द ही सर्द हो गई ।
आज बस्ती में ज़िन्दगी लौट आई है । आज की शाम की रंगीनी कुछ और भी ज़्यादा है । कारण साफ़ है । कालू के तीन साथियों - गंगू, काशीनाथ और अहमद को पुलिस की ज़मानत पर आज़ाद किया गया है । यह जश्न उसी ख़ुशी में है । कुछ दिनों से बस्ती में जो मायूसी और उदासी छाई हुई है वह अचानक ख़ुशी में बदल गई है । कालू और उसके तीनों साथी बस्ती के सिरमौर हैं । इनकी मौजूदगी में किसी ग़ैर को बस्ती में पाँव धरने की हिम्मत नहीं होती । सरकारी दफ़्तर में उनका नाम दर्ज है । जेल भेजे जाने की धमकी उन पर कोई असर नहीं करती । वे उनसे बख़ूबी वाक़िफ़ है ।
उनके लौटने से उनके धंधे में काफ़ी इज़ाफ़ा आ गया है । बस्ती की झोपड़ियों के पीछे अंधेरे में अनेक सरगर्मियाँ जारी हैं । सामने रास्ते पर मोटर और गाड़ियों का रुकना बढ़ गया है । रास्ते की बत्तियों से कुछ दूर वे रुकती हैं । धीमी आवाज़ में कुछ फ़ुसफ़ुसाहट होती है, कुछ लेन-देन होती है और गाड़ी फिर स्टार्ट होकर, रास्ते पर जाती दलदल में ग़ायब हो जाती है ।
धीरे-धीरे रात की शान बढ़ती है । ट्रैफ़िक का ज़ोर कम होता है । महफ़िल का दौर बस्ती की एक तरफ़ पूरे ज़ोर पर है । मन बहलाव के हर रंग से महफ़िल गर्म है । बस्ती के पीछे बंगलों की बत्तियाँ धीरे-धीरे बुझने लगीं । अंधकार गहरा था । महफ़िल के शोर के सिवा बस्तियाँ ख़ामोशी के आलम में थीं ।
रेशमा अपनी झोपड़ी में है, जिसका दरवाज़ा बंद है । अंदर से हल्की रोशनी का प्रकाश झोपड़ी के सुराखों से बाहर झाँक रहा है ।
अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई । रेशमा दरवाज़ा खोलती है, दरवाज़े पर खड़े शख़्स को देखकर वह चीख़ने को थी कि उस शख़्स ने फुर्ती से उसका मुँह हाथ से बंद करते हुए, तेज़ी से दरवाज़ा बंद कर दिया । रेशमा ख़ुद को आज़ाद कराने के लिये छटपटाती है, पर उस पुरुष की मज़बूत गिरफ़्त से ख़ुद को आज़ाद कराने में असफल रही और वह जाल में फँसी मकड़ी की तरह तड़पती रही । पुरुष ने घसीट कर उसे कोने में पड़ी खाट पर डाला । झटके से उसकी चोली फाड़ी, लेकिन दूसरे ही पल उसकी चीख़ हवा में फैलती है । रेश्मा के मुँह पर रखा हाथ हट जाता है और उसमें से खून रेला बनकर बह निकला । दूसरे हाथ से उसने एक ज़ोरदार थप्पड़ रेशमा के चेहरे पर दे मारा जिससे वह पलटी खाकर दूर जा गिरी ।
‘साली हरामज़ादी !! आज तेरा ग़रूर चकनाचूर करके छोडूँगा, देखूँ कौन तुझे बचाता है ?’ और वह जल्दी से उसकी ओर बढ़ा ।
‘ख़बरदार, अगर एक भी क़दम आगे बढ़ाया तो’ - और उसके हाथ में पकड़ा धारदार चाकू हलके प्रकाश में चमक उठा । हवा के झोंके की वजह जलता दीपक बुझ गया, झोपड़ी अंधेरे से नहा उठी, भीतर गालियों की बौछार ज़ारी थी । झटकों की वजह से झोपड़ी हिल रही थी, डर से फड़क रही थी, एक ज़ोरदार भूकंप की तरह धरती काँपने लगी थी । एक तेज़ चीख़ झोपड़ी के झरोखों से निकलकर हवा में गूँजती हुई, महफ़िल की रौनक में समा गई । रंग में भंग पड़ जाते ही भीड़ झोंपड़ी की तरफ़ बढ़ती है।
अचानक ज़ोर से दरवाज़ा खुलता है, एक वर्दी पहना हुआ शख़्स एक गट्ठर की तरह बाहर की ओर लुढ़क आता है और ढलान से नीचे की ओर लुढ़कता जाता है, उसके पीछे उसकी चप्पल उसपर गिरती है । खुले दरवाज़े के पास, रेश्मा एक हाथ में छुरी और दूसरे हाथ में जलती बत्ती पकड़े खड़ी है । खुले हुए बाल, फटे कपड़े, आँखों से आग बरसाती, जैसे साक्षात् काली माता खड़ी हुई हो ।
‘बदमाश, साला हरामख़ोर, सूअर की औलाद ! अगर फिर किसी औरत की तरफ़ आँख उठाकर देखा भी, तो इस बत्ती से मुँह का दूसरा बाजू भी जला दूँगी ।’
लोगों का शोर झोपड़ी की ओर बढ़ता आ रहा है । वह शख़्स तेज़ी से उठता है, जूता सँभालकर उठाता है और कराहता, लंगड़ाता हुआ भाग निकलता है । एक परछाई झोपड़ी के पीछे से निकलकर उसके पीछे ग़ायब हो जाती है ।
‘थू ! कुत्ते की औलाद !!’
और ज़ोर से दरवाज़ा बंद हो जाता है ।
अनुवाद: देवी नागरानी
जन्म: 1941 कराची, सिन्ध (पाकिस्तान), 8 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, एक अंग्रेज़ी, 2 भजन-संग्रह, 2 अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिन्धी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिन्धी में परस्पर अनुवाद। राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय संस्थाओं में सम्मानित , न्यू जर्सी, न्यू यॉर्क, ओस्लो, तमिलनाडू अकादमी व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। महाराष्ट्र साहित्य अकादमी से सम्मानित / राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद से पुरुस्कृत
जैसे टहनियाँ हजारों फूल छुपाए रहती हैं, वैसे ही नए-नए एशियन परिवारों का मोहल्ले में अचानक ही इधर-उधर मिल जाना, एक सुखद अहसास था दिशा के लिए; इस परदेश की मिट्टी में भी चारो तरफ अपनेपन के फूल खिलते दिखने लगे थे उसे।
उस दिन शाम को यूँ ही पास के पार्क में टहलती नीतू मिली, तो तुरंत ही घर आने की जिद करने लगी। और जाने कैसा आग्रह था उस हमउम्र के हठ में कि हफ्ते भर के अंदर ही दिशा उसके घर पहुँच भी गई। वहीं शौपिंग सेन्टर से सटा हुआ ही तो घर था। बातों बातों में पता चला कि नीतू सरावगी के पति दिल्ली से थे और वह खुद पंजाब से। तीन महीने ही हुए थे शादी को और उसे भारत से आए भी कि दुख का पहाड़ टूट पड़ा था उसपर । एक सड़क दुर्घटना में पति बुरी तरह से ज़ख्मी हुए और नौ महीने लगातार बीसियों औपरेशन और मानसिक अवसाद की बीमारियों से जूझने के बाद, अभी साल भर पहले ही पति को खो दिया था नीतू ने। 'अच्छा ही हुआ , वैसे तो। बहुत दुख सहे हम दोनों ने ही। परन्तु भारत लौटने का कोई इरादा नहीं अब मेरा ।' एक बेहद ठंडी सांस ली उसने...दिशा ने उस ठंडी सांस की जलन अपने भी ऊपर महसूस की । 'जी लूँगी यहीं दुखमः सुखम। जब अच्छा नहीं रहा, तो यह भी नहीं रहेगा।'
' जीने नहीं देंगे मुझे परिचित और रिश्तेदार भारत में।' बहुत ही अवसाद भरे स्वर में उसने कहा था।
'पर, अकेले कैसे रह पाओगी, यहाँ ?' पूछने पर एक कटु मुस्कान आ गई थी उसके होठों पर।
' रह लूंगी। यह डॉ. की डिग्री है न मेरे पास। वैसे भी बहुत कठोर और दृढ़ हूँ मैं अन्दर से। मां आईं, सालभर रहीं, और जब समझा बुझा नहीं पाईं, तो हारकर लौट भी गईं। दूसरी शादी के सख्त खिलाफ थीं वह। पर सिर्फ तीन महीने की शादी?'...अभी तो पूरी उम्र पड़ी है मेरे आगे! '
दिशा को नीतू की ख्वाइश ज़ायज ही लगी। शादी करे या न करे यह निजी फैसला है और इसकी ज़रूरत है या नहीं...यह भी। मां का बेटी से जाते-जाते गुस्से में यह कहकर जाना कि, ‘ तो क्या तू दुकान खोलकर बैठ जाएगी ‘- दिशा को भी शायद उतना ही असह्य और कटु लगा था जितना कि नीतू को, पर एक परंपरावादी मां के दुख और क्षोभ को भी समझ सकती थी दिशा...उनके लिए भी तो जवान बेटी का वैधव्य, यह घाव छोटा तो नहीं था और घाव भरने के लिए वक्त मांगते ही हैं।
' मान जाएंगीं मां, जब तुम्हें खुश देखेंगी।'
' हाँ, जानती हूँ।'
अगले पल ही, दुःखद स्मृतियों को तुरंत ही भूल, मुस्कुराती हुई नीतू कुछ अन्य निजी और पारिवारिक फोटोग्राफ के साथ शादी का एलबम भी उठा लाई थी। बड़े चाव से अब वह दिशा को सारी तस्बीरें दिखा रही थी। ‘ देखो दिशा-इस फोटो को देखो, मुझे ईव्स वीकली की तरफ से उस साल की सबसे खूबसूरत दुल्हन का ख़िताब मिला था।‘
दिशा को विश्वास नहीं था। फोटो की मालकिन की तरह ही फोटो में भी कोई ऐसा विशेष आकर्षण या विशिष्टता नहीं लगी उसे, परन्तु सामने बैठी युवती अभी-अभी एक दुःखद हादसे से गुजरी थी और खुश होने के लिए उसे आत्ममुग्धता के भ्रम से गुजरना जरूरी है , जानते-समझते मुस्कुराकर उसका उत्साह वर्धन ही किया दिशा ने।
दिशा की सकारात्मक चुप्पी से अबतक उसके शह को और हवा मिल चुकी थी,
‘ जानती हो कॉलेज में लोग मुझे मीना कुमारी कहते थे। ‘
उसकी अनमयस्क ‘हूाँ‘ ने नीतू का जोश अब थोड़ा ठंडा कर दिया।
अपनी ही सोच में डूब गई थी दिशा –‘ मीनाकुमारी तो नहीं, पर ठीक ठाक ही नाक नक्श पाए हैं नीतू ने और गोरी रंगत भी। साथ में दिवंगत खुद से तेरह साल बड़े पति की अथाह दौलत भी। शादी में ज्यादा दिक्त तो नहीं ही होनी चाहिए इसे। ‘
पर अमीर विधवाओं की भटकन और दुर्भाग्य की कई डरावनी कहानियाँ और खबरें पढ़ रखी थीं दिशा ने और वह नहीं चाहती थी कि सामने बैठी युवती जो अब उसकी सहेली बन चुकी है, किसी तरह की दुखद परिस्थिति में पड़े या मनचलों के हाथों का मज़ाक बने।
‘ जो भी निर्णय लेना सोच-समझकर ठंडे दिमाग और शांत मन से ही लेना और मैं पड़ोस में ही रहती हूँ। जब भी अपना दुःख या एकाकीपन बांटना चाहो, मेरे घर के दरवाजे हमेशा खुले हैं तुम्हारे लिए।‘
गले लगी सहेली से यही कहकर विदा ली थी सहृदय दिशा ने । उसे क्या पता था कि नीतू फोन करेगी तो भूल जाएगी कि चार पांच घंटे फोन पर बात नहीं कर सकती दिशा। इतनी बात करने की आदत नहीं है मितभाषी दिशा को। फिर घर परिवार की, बच्चों की भी जिम्मेदारी भी है उसके ऊपर। फिर भी एक अच्छी सहेली का भरसक फर्ज निभा रही थी वह, फोन को तो घंटों कान से लगाए उसकी एक-एक बात सुनती ही थी, वक्त-बेवक्त जब भी आती नीतू, मुस्कुराकर ही स्वागत करती थी दिशा।
' कैसी-कैसी प्यारी-प्यारी महक आ रही हैं , तुम्हारे चौके से। ' काम से लौटी भूखी नीतू के यह कहते ही वह उसे खाना खिलाकर ही घर वापस भेजती।
तब नीतू ने एक राज बांटा था एक दिन दिशा के साथ- जानती है , जब से मेरे साथ यह हादसा हुआ है मेरा खाना बनाने को मन ही नहीं करता। दावतों और तुम जैसी सहेलियों के यहाँ ही खा लेती हूँ। यहाँ गुरुद्वारे में बहुत अच्छी मक्के के रोटी और सरसों का साग मिलता है। मेरी सर्जरी के बगल में ही है गुरुद्वारा। मेरा तो दोपहर का खाना अक्सर वहीं हो जाता है। तुम भी चलना एक दिन मेरे साथ। टिपिकल पंजाब का स्वाद, घर में तुम वैसा बना ही नहीं सकती।'
' चलूँगी, चलूंगी। जरूर चलूंगी। ' दिशा ने हंसकर सहेली को आश्वस्त कर दिया था।
' हाँ , एक बात और नीतू, दोस्त मानती हो तो सहज रूप से मिलो , रहो। ज्यादा सोचो-समझो नहीं। मित्रता में औपचारिकता नहीं।'
तब पहली बार विदा लेती नीतू के स्पर्श में दिशा को बेहद अपनापन महसूस हुआ था।
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बच्चों का स्कूल, घर और शाम को गौरव के सहकर्मियों के साथ मिलना-जुलना, रेस्तोरैन्त और दावतें, यानी कि बेहद नियमित और व्यस्त दिनचर्या रहती दिन भर और फिर वही रागरंग से भरी शामें देर रात तक...यानी कि जिन्दगी की मोमबत्ती दोनों सिरों से जला बैठा था वक्त उसके लिए, और दिशा भी एक टूटे पत्ते-सी बही जा रही थी । हाँ, उसका यह भ्रम अभी नहीं टूटा था कि प्रवाह कितना भी तेज हो, पतवार तो उसके ही हाथ में है, और रहेगी, जब तक वह चाहे।
रात के बारह बजने वाले थे, पति के साथ एक हंगामे भरी दावत से लौटी थी दिशा। बदन का पोर-पोर दुख रहा था। आंखें बिस्तर तलाश रही थीं। तभी कर्कश फोन की घंटी बज उठी।
जस्सी का फोन था। आवाज बेहद घबराई हुई थी- “ आन्टी, पापा ठीक नहीं हैं। “
दिशा की नींद अब रफूचक्कर थी। जैसे थी वैसे ही वापस चल दी अस्पताल की तरफ। उस रात तो हालत जैसे-तैसे संभल गई, पर बेहद मजबूती-से उम्मीद का दामन पकड़े बैठी कुलवंत, दिशा को अक्सर एक ढहते टीले-सी ही दिखती। वाकई में उसका शेर-सा दहाड़ने वाला और छौने-से मन वाला पति जिन्दा ही कब था- कोरों पर कुछ नम बूंदें यदा-कदा दिख जातीं, जो दुख की परिचायक थीं या नैसर्गिक शारीरिक निष्क्रमण की, कोई नहीं जान पाता? नर्स आती और साफ-सफाई के साथ उन्हें भी यंत्रवत् पोंछ जाती। न कोई उन्हे समझ पाता और ना ही वह अपनी ही कुछ कह पाते। दृष्टि सदा शून्य में रहती, खोए को तलाशती-सी नहीं, बस यूँ ही एक जगह अटकी हुई, भावशून्य। बीच बीच में पलकें छपकतीं या सोते समय बंद होतीं तो सांसों के साथ उठते-गिरते सीने से जीवन का एहसास हो जाता था आसपास के लोगों को। डॉक्टरों का कहना था कभी-कभी सालों बाद भी ऐसे मरीज मूर्छा से बाहर आ जाते हैं। उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।
दिमाग के पिंजरे में बंद एक फड़फड़ाती चिड़िया, जिसके दुख को देखकर घरवाले झटपटाते तो, परन्तु मदद में कुछ न कर पाते । पसंदीदा संगीत, गीता, हनुमान चालीसा आदि के कैसेट, लगातार बजते। जो जो बताता , वही करवाने लग जाती दुख से टूटी कुलविंदर-जादू टोना, धागे वगैरह सब बंधवा लिए पर हालत नहीं सुधरी। वाहे गुरु के निरंतर पाठ के साथ, पंडितों के पूजा पाठ भी चलते रहते, पर किसी का भी असर नहीं दिखता। देखने वालों का तांता जरूर लगा रहता। कुछ तो यह सब सरदार जी के सहृदय और सबकी मदद के लिए सदा तत्पर व्यक्तित्व की कमाई थी, कुछ खाली–बैठे घर में ऊबते लोगों का स्व मनोरंजन का एक उपक्रमण भी। अस्पताल में मजलिस लगी रहती और कुलवंत उन सबसे बेखबर, खुद अपनी भूख-प्यास से बेखबर, बैठी-बैठी पति के हाथ पैर सहलाती रहती, एकटक घूरती, पास ही बैठी रहती, ‘ क्या पता जाने कब होश में आ जाए उसका सरदार और उसे आवाज दे ही बैठे ! तू भी मेरे लिए प्रार्थना कर दिशा। ‘
और तब दिशा धीरे-से बड़ी बहन-सी अपनी बेहद सरल सहेली का हाथ दबाकर भारी मन से चुपचाप घर लौट आती। दिशा गई थी , एक दो बार और अस्पताल पर उसके बस में कुछ नहीं था। किसी के बस में कुछ नहीं था। वह भी उतनी ही असहाय थी जितने कि डॉक्टर और सारे पंडित-ओझा।
पर डूबते इस परिवार का दुःख उससे भी तो बर्दाश्त नहीं हो रहा था। घर-परिवार से दूर बैठी दिशा के लिए कुलवंत परिवार की सदस्य जैसी ही तो हो गई थी, हर आड़े वक्त बगल में उसके बगल में खड़ी।
इतनी जल्दी दुःख का पहाण टूट पड़ेगा सहेली पर और परिवार की रीढ़ तोड़ देगा, इसका आभास नहीं था दिशा को। सहेली की मानें तो मामूली-सा एंजाइना था। कभी-कभी थोड़ी तकलीफ और भारीपन सा महसूस होता तो चूरन की गोली ले लेते सरदार जी। उसीकी ज़िद पर जाँच और एजियोग्राफ वगैरह करवाया था। डॉ. ने कहा था मामूली सा प्लमिंग जौब है। तुम नए आदमी सा महसूस करोगे। खुशी खुशी गए थे अस्पताल , खुद ही कार चलाके, हमेशा की तरह माँ और बीबी-बच्चों के लिए फल काटकर डाइनिंग टेबल पर रखकर, याद से खा लेने की हिदायत देते हुए, हंसते-मुस्कुराते, मां और कुलवंत को समझाते हुए-‘ फिकर काहे की, देखना और भी पठ्ठा होकर ही लौटूंगा मैं हफ्ते भर में।‘
दिशा ने देखा ही नहीं, महसूस भी किया था कि कैसे अभी तक बेहद बहादुरी से मुस्कुराती सहेली की आँखें अब अक्सर गीली ही रहने लगी थीं। ‘ जिस दिल पर इतना नाज था, वही सारी मुसीबत की जड़ बन गया इनके लिए तो... पूरा गांव शेरदिल कहता था और देखो एक छोटा-सा औपरेशन तक न झेल पाए।‘ हंसते-हंसते अब बातबात में रो पड़ती थी कुलवंत और उसके दुख में डूबी दिशा उसे तसल्ली तक न दे पाती। बस हिम्मत रखो, सब ठीक हो जाएगा- यही बुदबुदा कर चुप हो जाती, वह भी इतने धीरे से कि मानो खुद ही उसे अपने आश्वासन पर कोई भरोसा न हो।
फिर चंद दिनों बाद ही वह फोन- सब लुट गया बहन मेरा। सब खतम। आकर देख तो जरा, किस हालत में यहाँ छोड़कर घर लौटूँगी तेरे भाई को !
स्तब्ध दिशा के आनन-फानन पहुँचते ही फफक-फफक कर रो पड़ी थी टूटती-ढहती कुलवंत। दिशा को आशंका तो थी परन्तु अंत इतना करीब था, नहीं जानती थी वह। आगे बढ़कर सहेली को सहारा देती आंसू पोंछती निशब्द खड़ी थी दिशा। चंद मिनटों में कुलवंत ने ही खुद को संयत किया।
“बहुत सारे इंतजाम करने हैं मुझे। यह विदाई भी तो शादी सी ही होती है हमारे यहाँ। पूरा कुनवा, पूरी जमात, सब आएँगे, जीमेंगे । माँ को, बच्चों को भी मुझे ही संभालना है। कैसे कर पाऊंगी, क्या इतनी हिम्मत, इतनी काबलियत है भी मुझमें?”
दिशा हिम्मती सहेली को देखती रही, खुद अपनी हिम्मत टोहती रही। कानों में दादी की आवाज गूंज रही थी, जिसने विपत दी है वही धैर्य और हिम्मत भी देगा। थोड़ी देर में गला खंखार कर बोली-“ चलो मैं भी मदद करती हूँ । आप जो कहोगी , वह काम मैं संभाल लूंगी। कुछ तो सहारा मिलेगा ही।“
कुलवंत ने कुछ नहीं कहा, अपने में ही डूबी रही। उसके टूटे मन के आगे अँधेरा भविष्य था और साथ में था दुख का अजगर और कामों का पहाण।
सब कुछ जैसे वह चाहती थी वैसे ही सिलट गया। पर बिना सरदार जी के अकेले वह अखबार वाली दुकान चलाना अब कुलवंत के बस में नहीं था, खोलते ही फफक-फफक कर रोने बैठ जाती। अंततः बेच दी दुकान उसने। दिशा जानती थी कि सहेली के मन और जीवन में कभी न भरने के लिए एक असह्य गढ्ढा बन चुका था।
कुछ दिन बाद फिर कुलवंत ने ही बात शुरू की थी-पढ़ी लिखी तो बहुत नहीं हूँ मैं, पर खाना बनाना बहुत अच्छी तरह से जानती हूँ। अस्पताल में या घरों में किसी को जरूरत हो तो कर सकती हूँ। चार पैसे आएंगे और मन भी लगा रहेगा। अभी अमनदीप की पढ़ाई पूरी होने में चार पांच साल तो हैं ही। तुम्हारी तो बहुत जान-पहचान है पता करो न। वैसे तो पेंशन से काम चल जाता है पर जबतक दीपू की पढ़ाई न खतम हो, खर्चे तो रहेंगे ही।
दिशा ने व्यथित नजरों से सहेली की तरफ देखा और मदद का वादा करती , मन-ही-मन गुनती-बुनती वापस घर लौट आई। पति से बात करने पर उनका यह कहना कि- ‘ देखता हूँ, क्या मदद कर सकता हूँ , शायद अस्पताल की कैंटीन में ही काम दिलवा सकूँ।‘ दिशा के लिए सांत्वना पूर्ण था। वह जानती थी कि गौरव जिस काम का बीड़ा उठाते हैं, पूरा करके ही दम लेते हैं।
और कुलविंदर को काम मिल भी गया।
अगले हफ्ते से एक रसोइया दो महीने की छुट्टी पर था। अभी काम अस्थायी था , पर सब ठीक रहा तो स्थाई भी हो सकता है। अस्पताल की कैंटीन में हमेशा ही काम बहुत रहता है और कोई-न-कोई छुट्टी पर भी। कुलवंत खुश थी और आभारी भी। दिशा और गौरव, दोनों भरसक उसके मन से अकेलेपन और हीन भावना को हटाने का प्रयास करते पर कुलवंत थी कि खुद में ही डूबती जा रही थी।
‘ चलो अच्छा हुआ जो इन्हें नौकरी मिल गई । अस्पताल में चार लोगों से मिलेंगीं , तो शायद खुद ही इस उदासी के अंधे कुँए से उबर जाएँ।‘
गौरव की यही बातें दिशा को बहुत अच्छी लगती थीं। चुप-चुप सबकी परवाह करना। निस्वार्थ भाव से अपने-पराए, सबकी मदद करते रहना। बहुत गर्व था दिशा को अपने गौरव पर।...
जिन्दगी बहुत सारे सबक देती है। बहुत कुछ से निपटना और सहना सिखा देती हैं। हंसते-हंसते आंख में आंसू आ जाते हैं और भीगी पलकों के नीचे पुतलियाँ अक्सर सपनों की चमक छुपाए मुस्कुरा देती हैं.. बहुत कुछ जाना और समझा है दिशा ने अपने इस कठिन और एकाकी तप में, यह भी एक ऐसा ही कठिन सबक था दिशा के लिए। पर आम भाषा में जिसे जीवन कहते हैं, फूलों की सेज है तो कांटों को भी तो खुद ही बीनना पड़ता है। यदा-कदा भटकती या अलसती दिशा तो नियति कर्म वेदी पर वापस पटक देती, वैसे ही, जैसे कभी-कभी मनपसंद दावत में आनंद लेते-लेते प्याले हाथ से बिखर जाते हैं !
अक्सर ही उसे लगता कि उसका जीवन, उसकी इच्छाएँ मानो उमगते रीते बादलों-सी होती जा रही हैं, कहीं से उठती हैं, और कहीं जाकर बरस जाती हैं। कोई बस या नियंत्रण नहीं उसका जीवन पर, घटनाओं के इस उमड़ते अंधड़ पर और दिशा को यूँ सूखे पत्ते सा भटकना बचपन से ही नापसंद था। पर यह पसंद –नापसंद अपनी कहाँ...यह भी भलीभांति जान ही चुकी थी अब तक शिशु-सी सहज और अबोध दिशा।
ट्रेन तो लेट थी ही, रस्ते की भीड़ भी कम न थी । काफ़ी जद्दो-जहद के बाद सुभाष ढकुरिया पहुंचा । इंटरव्यू की जगह साफ़ पता नहीं थी और वह धैर्य खोता जा रहा था । महानगरों में लोगों की व्यस्तता बिना काम के भी रहती है । किसी से पूछे भी तो कोई सुनकर भी अनसुने की ढोंग रचता और कोई इसकी अंग्रेजी मिश्रित हिंदी को समझ नहीं पाता । मेन रोड की बाँयीं ओर खड़े होकर कभी आती-जाती गाड़ियों को देखता तो कभी लम्बी सांसें छोड़कर किसी रेलिंग के सहारे खड़ा रहता । इसी बीच अपने भारी थैले को कंधे से उतारकर एक चबूतरे पर रख कर बैठने जाता कि उसे थोड़ी ही दूरी पर एक महिला दिखी जो एक छोटी सी कुटिया के बाहर पैंट-कमीजों पर लोहे की स्त्री फेर रही थी । सुभाष की नज़र उस महिला की साड़ी पर पड़ी । उसने साड़ी के पहनावे पर अंदेशा लगाया कि वह महिला उसी के क्षेत्र की होगी । थैले को फिर कंधे पर लादा और कदम बढ़ाया । पास जाकर खड़ा हुआ तो कोई ग्राहक समझकर महिला ने थोड़ी-मोड़ी बांग्ला में कहा -- कि काज आछे बबुआ ? सुभाष उस महिला की बांग्ला से असहजता समझ गया और उसके मुंह से निकल पड़ा -- गोड़ लगs तनी माँ जी ! शूट-बूट वाले किसी युवक से उस विराट नगर में एक स्त्री करने वाली महिला को ये उम्मीद नहीं थी । वह काम छोड़कर सामने आयी और बोली-- जीते रहs बबुआ ! दोनों एक दूसरे के हाथों को पकड़ रखे थे और वह स्पर्श उनके लिए ' प्यासे को पानी' जैसा था । समय कम था । सुभाष ने टूटी-फूटी भोजपुरी में झट से माफोई ऑफिस का पता पूछा । महिला ने जवाब दी-- ऊ पुलवा भिरि बबुआ । नजिके हs । बैठ जा, तनि पानी पी लs । सुभाष तो नौकरी की ता;तलाश में था और उसे जल्दी ऑफिस पहुंचना था पर वह थम गया और जम भी गया । पानी पिया, बातें की । उसे पता चला वह महिला उस कुटिया में अकेले ही वैधव्य-जीवन बीता रही है और गाँव-घर से भी नाता टूट चूका है । सुमधुर कही जानी वाली बांग्ला भी उन्हें थपेड़ लगता है और सुभाष का गोड़ लगना उनकी घर-वापसी जैसी थी। सुभाष इंटरव्यू में अच्छा किया। नौकरी की खबर बाद में मिलती। उसे घर वापस आना था । फिर ट्रेन से सफ़र शुरू। रस्ते भर उस महिला की बोली कानों में गूंजती रही । घर पहुँच कर सुभाष ने अपने पिता से कहा-- पापा, आज मेरी भाषा मेरी शिक्षा से अव्वल निकली और वही मुझे इंटरव्यू दिला पाई वरना मैं सिर्फ अंग्रेजी की दुनिया में गोता लगाता रहता और ऑफिस तक शायद पहुँच ही नहीं पाता । मेरी भाषा की महत्ता मुझे समझ में आई । सुभाष के पिता भी अपनी गलती को मन ही मन भांप कर सहम सा गए और एक लम्बी साँस लेते हुए ' काम ऑन माय सन' न कहकर ' आ जा बबुआ, गले लग जा ' कहते हुए गले मिले । घर के अन्दर से माँ चीखती हुई बोली-- अब समझे जी ? कहते थे न जड़ मत काटिये ! माँ खाने पर बुलाई तो सुभाष ने स्फूर्त जवाब दिया-- आव तनि माँ ।
***
सौ-पचास का कमाल
दो तल्ले घर में रहने के लिए सिर्फ ५ सदस्य ही थे । ललित राय ने ऊपरी तल्ले को भाड़े में देने का मन बनाया । एक परिवार को दिया गया । मालिक और भाड़ेदार में अच्छा संपर्क बन गया । भाड़ेदार की बेटी बड़ी हुई तो शादी भी उसी घर से दी गयी । लड़के की शादी भी हुई । बहु आई । सब कुछ ठीक चल रहा था पर कुछ महीनों में मन-मुटाव की बात सामने आने लगी । एक दिन बहु ने घर पर फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली । ललितजी ने पुलिस केस से तो अपने भाड़ेदार को बचाया पर घर वालों के प्रतिरोध से घर खाली करवाना पड़ा । अब समस्या यह थी कि उस कमरे का क्या किया जाय । सारे लोग डर से दिन के उजाले में भी इधर-उधर प्रेतात्मा का दर्शन करने लगे । सब दीवार से सट कर ही बैठते और दिन-रात घर की बिजली जलती रहती । गलती से अगर कोई चूहे ने कहीं गिलास या कोई वर्तन ही गिरा दिया तो सारे लोग एक साथ विकट शोर मचाते ।
ललितजी ने सोचा कि ऐसे मैं हार्ट-फेल तक की नौबत आ सकती है । इन्होने खुद उस कमरे में सोने की बात सभी से कही । मना करने पर भी वे सोते रहे और उन पर किसी भी प्रेतात्मा का प्रभाव नहीं पड़ रहा था । लोग हैरान थे । घर के सदस्य भी भौचक थे । वे बिल्कुल निडर होकर उस कमरे में रहते थे ।
किसी ने पूछा -- ललित, आप कैसे उस कमरे में अकेले रह लेते हैं ?
ललित जी का जवाब था-- जैसा रहा जाता है । बेकार की बातों पर मैं समय नहीं गंवाता । और ये लोग सब काम छोड़ कर प्रेतात्मा के पीछे लगे हैं । ऐसे में प्रेतात्मा नाम का कुछ होता भी होगा तो वो भी परेशान हो जाये । मेरे पास अगर वो आये तो मैं कहूँगा कि पास आकर टक्कर ले ले और नहीं तो सौ-पचास लेकर दफ़ा हो जाये ।
पूछने वाले ने मन ही मन सोचा -- पुलिस, किरानी या चपरासियों को सौ-पचास देने की बात सुनी थी अब तो लोग प्रेतात्मा को भी दे कर काम निपटाने की सोच रहे हैं ।
दहलीज पर खडी औरत क्या सोचती है ?-नम आँखों से निहारती ,आकाश का कोना -कोना -उड़ने को आकुल ,व्याकुल --पंख तौलती है -तलाशती है राहें --मुक्ति के द्वार की ''---- मुक्ति के द्वार की तलाश आज भी जारी है -वह कभी मुक्त नहीं हो सकी -रुढियों से-,परम्पराओं से ,-सामाजिक विसंगतियों से ,अपनी ही कारा में कैद ,भारत की नारी आज भी अपने जीवन संघर्षों की लड़ाई लड़ रही है --सदियों की गुलामी से उत्पीडित -प्रताड़ित ,रुढियों की श्रृंखलाओं में बंदी -उसकी आँखों ने एक -सपना जरुर देखा था --- जब देश आजाद होगा-अपनी धरती ,अपना आकाश अपने सामाजिक दायरों में वह भी सम्मानित होगी,--उसके भी सपनों ,उम्मीदों को नए पंख मिलेंगे,पर उनका यह सपना कभी साकार नहीं हो पाया,-अपने अधूरे सपनो के सच होने की उम्मीद लिए महिलाएं देश की स्वतंत्रता के संघर्ष में भी भागीदार बन जूझती रहीं-सामाजिक ,राजनीतिक ,चुनौतियों से ,-अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए -बलिवेदी पर चढ़ मृत्यु को भी गले लगाया पर हतभाग्य !--देश को आजादी तो मिली पर ''राजनीतिक आजादी'' ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार भी मिला ,पर अधूरा ,--नियमो -कानूनों,में लिपटा हुआ - -हजारों लाखों सपनो के बीच नारी मुक्ति का सपना भी सच होने की आशा जागी थी ,शांति घोष ,दुर्गा भाभी ,अजीजन बाई ,इंदिरा ,कमला नेहरु ,जैसे अनगिनत नाम जिनमे शामिल थे ---पर नारी मुक्ति के सपने कभी साकार नहीं हो पाए ,-उनकी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया ,वे पहले भी सामाजिक , वर्जनाओं के भंवर में कैद थीं -आज भी हैं ,पहले सती प्रथा के नाम पर पति के साथ जला दिए जाने की क्रूर परंपरा थी , आज भी महिलाएं जलाई जाती हैं -कभी दहेज़ के नाम पर , तो कभी पुरुष प्रधान सामाजिक प्रताड़ना का शिकार होकर,-.बालिका - विवाह की अमानवीय प्रथा में कितनी ही नन्हीं ,मासूम बालिकाएं बलिदान हो जाती थीं --आज भी अबोध ,मासूम ,नाबालिग बच्चियां दुष्कर्म और दुर्व्यवहार का शिकार होती हैं --बेमौत मारी जाती हैं ,भ्रूण हत्याएं भी इसी क्रूर , नृशंस ,गुलाम मानसिकता का सजीव उदाहरण हैं। कभी महिलाओंने सोचा था की जब उन्हें आजादी मिलेगी उनकी भी आवाज सुनी जाएगी ,वे भी विकास की मुख्य धारा में शामिल होकर अपनी मंजिल प्राप्त कर पाएंगीं ,पर आज वे अपने ही देश में सुरक्षित नहीं हैं ,--पहले भी घर व् समाज की चार दीवारों में आकुल -व्याकुल छटपटाती थी ं --और आज भी स्वतंत्रता के 66 वर्षों के बाद भी --वे चार दीवारों में बंदी रहने को विवश हैं क्योंकि बाहर की दुनियां उनके लिए निरापद नहीं है ,--यह कैसी बिडम्बना है !-कैसी स्वतंत्रता है !-जो मिल कर भी कभी फलीभूत नहीं हो सकी ---- जो रही भाल का तिलक उसे , देते फांसी के फंदे क्यों ? जो घर आंगन का मान बनी , उससे नफरत के धंधे क्यों ? फिर क्यों दहेज़ की बेदी पर , बेटियां जलाई जाती है , मुट्ठी भर सिक्कों की खातिर, छत से फिंकवाई जाती हैं ? आज महिलाएं शिक्षित हैं -जागरूक हैं -सपने देखती हैं तो उन्हें सच करना भी जानती हैं लेकिन कुछ मुट्ठी भर रेत से घरौंदे नहीं बनाये जा सकते,---देश की स्वतंत्रता का सूर्य जब प्रज्वलित हुआ --आशा की किरणें महिलाओं के दामन में भी झिलमिलाई थीं परन्तु उसी आंचल को दागदार बनते देर नहीं लगी,-वे अपने ही परिवेश ,समाज ,घर की सीमाओं में शोषित होती चली गईं -यह मानते हुए भी की -वे माँ हैं -बहन हैं -बेटी हैं--कितने रूपों और रिश्तों में जीती हैं वह -त्याग का प्रतिरूप बन कर, पर उन्ही रिश्तों ने उसे कलंकित भी किया --यह हमारे आजाद देश की विकृत मानसिकता का घृणित परिणाम है--दामिनी, गुडिया जैसी मासूमो का बलिदान देश भूला नहीं है -अगर उनके विरोध में कहीं कोई दबी आवाज उभरी भी तो कुछ दिनों तक प्रेस में ,मीडिया और मुट्ठी भर बुद्धिजीवियों के बीच विमर्श का मुद्दा बनी बेटियाँ आंसू बहाने के सिवाय कुछ नहीं कर पातीं. और सरकार कुछ मुआवजा या दोषियों को दो तीन महीनो की सजा दे अपने कर्तव्य से मुक्त हो जाती है. ....और फिर एक नई यातनाकी कहानी का जन्म होता है. आखिर कब तक?..और कितनी बेटियों की बलि चढ़ेगी?क्या हमारा समाज कभी अपनी सोच बदलेगा?..बेटियाँ जो किसी का अभिमान ,किसी के माथे का तिलक बनगौरव व् साहस का नया इतिहास लिख सकती हैं ,उन्हें प्रताड़नाओं के दौर से कब तक गुजरना पडेगा. उन्हें ईमानदारी ,और दृढ़ संकल्पों के साथ शिक्षित और जागरुक बनाने की ठोस कोशिश क्यों नहीं होती?कितने ही बलिदानों ,संघर्षों ,से प्राप्त आजादी को हमने कुछ सत्ता लोलुपों के हाथ का खिलौना बना दिया ,--वे देश के भविष्य से खेलते रहे -संविधानो -कानूनों ,न्याय और प्रगति के नाम पर आधी आबादी के भाग्य का फैसला सुनाते रहे ,परदे के पीछे से घिनौना खेल खेलते रहे ---पूरा देश देखता रह गया --न्याय की लम्बी लड़ाई और दोषियों को सजा दिलाने के लिए सविधान के पृष्ठ खंगाले जातेरहे -- महिलाओं ने खुद को ठगा सा महसूस किया लेकिन उन नर पिशाचों का ह्रदय न पसीजना था न पसीजा,- - क्या हम आदिम युग की और बढ़ रहे हैं ?..आजादी मिले वर्षों बीत गए -समय बदला --युग बदले --कामना तो यही की थी मनुष्यता के पक्षधरों से --उनकी सोच .विवेक ,बुद्धि का विकास होगा --मानवता के नये आयाम स्थापित होंगे ..शिक्षा होगी तो अन्तश्चेतना का भी उत्कर्ष होगा ...पर कितना दुःख होता है ये पंक्तियाँ लिखते हुए की परिवर्तनों के दौर से गुजर कर भी ---शिक्षित होते हुए भी हमने क्रूरता -संवेदना और नृशंसता की सारी वर्जनाएं --सीमाएं तोड़ दी हैं --महिलाओं के साथ पशुओं जैसा आचरण करने वाले जरा अपनी भावी पीढ़ी के विषय में भी सोचें --उनका कल क्या होगा ?...उनकी बहू बेटियां भी यदि इन दुष्कृत्यों का शिकार हुईं तो उनके आंसुओं का वे क्या जवाब देंगे ,,हर महिला माँ है ,बेटी है ,--बस एक बार सोच कर देखें ---हम आवाज उठाते रहे -जुल्म के खिलाफ -नारी अस्मिता के लिए --पर कहाँ खो हो जाती हैं वे आवाजें ?..सत्ता बहरी है या समाज ?कहाँ जाएँ महिलाएं -बेटियां ,!-क्या एक बार फिर विध्वंशकारी क्रांति की प्रतीक्षा है ,,समाज को ...जब सब कुछ नष्ट भ्रष्ट हो केवल मौन ही शेष रह जायेगा !..पहले विदेशियों ,अंग्रेजों से संघर्ष था ,,पर आज अपनों से है,--अपनों से- अपनों का यह युद्ध ज्यादा कठिन है ,शक्ति की नियंता रही है नारी. जावन के संघर्षों में आज भी भारतीय नारी ने हार नहीं मानी है. अपनी प्रगति के रास्ते खुद तलाशे हैं, भारतीय नारी ने सपने भी देखें हैं तो अपने नीद की सुख छाँव में ,अपनों के बीच न की उसे तोड़ कर, विच्छिन्न कर ,वही हमारी संस्कृति की पहचान है. यदि वही पुन्य सलिला नारी हमारे समाज में पद दलित होती है तो यह लज्जाजनक और हमारी संस्कृति का अपमान है. और एक पददलित संस्कृति कभी किसी समाज को विकास का मार्ग नहीं दिखा सकती. हमें अपनी सोच को उदार बनाना होगा.,दहेज़,हत्या, भ्रूण ह्त्या जैसी बुराईयों को जड़ से मिटा कर एक नया आसमान बनाना होगा. जो हमें सुख की छाँह दे सके आज के सामाजिक परिवेश और पुराने ,रुढियों में जकड़े गुलाम मानसिकता वाले चंद मठाधीशों के बीच की सामाजिक स्थिति में कोई विशेष अंतर नहीं है, बस संघर्ष के दायरे बदल गए हैं,अब वह घर आँगन से निकल कर विभिन्न क्षेत्रों, महत्वाकांक्षाओं ,बौद्धिक धरातलों तक फ़ैल गया है, चुनौतियां बड़ी हैं ,पीढ़ियों की सोच को बदलने के लिए बहुत कुछ अभी किया जाना ,लिखा जाना बाकी है, प्रयास करते रहना है क़ि हम उनके साथ न्याय कर सकें,..आजादी के वास्तविक अर्थ को समझने की जरूरत है ,,आजादी सबके हित में हो ,समान ,वर्ग,लिंग,ज़ाति की विभिन्नताओं से परे हो .--लेकिन महिलाओं की आजादी का अर्थ उन्मुक्तता नहीं , बल्कि व्यक्तित्व के विकास के समान अवसर उपलब्ध कराना हो तभी वह अपना आसमान खुद बना पायेगी--हम सभी जानते हैं की जीवन के अरण्य में नारी शीतल सुखद मलय बयार है जो संघर्षों, मुश्किलों ,पीड़ा व् वेदना के अनगिनत थपेड़े सह कर भी जीती है तो परिवार के लिए ,घर आंगन की मंगल कामना में ही जीवन का सार समझती है --वह कभी अलग नहीं होती अपनी पारिवारिक धुरी से ..पर जब चुनौतियां सामने हों तो वह न हारती है न झुकती है ...पर जब टूटी है तो प्रलय ही आई है ,,वह ममता है, मान है ,श्रृंगार है ,प्रेम है, क्या क्या न कहें --बस थोडा सा स्नेह दें और अमृत की मिठास जीवन को सुरभित बना जाएगी ,हम नारी के सम्मान की रक्षा करें तभी हमारी विश्व प्रसिद्द संस्कृति जीवित रह पायेगी. -
मुझे सिगरेट पीने वाली औरतें अच्छी लगती हैं .... लेकिन मेरे मित्रों में ऐसी कोई महिला रचनाकार नहीं है जो मद्यपान करतीं हो । सिर्फ साजदा जैदी सिगरेट पीती हैं लेकिन वा अब बूढ़ी हो चुकी हैं और किसी कदर मजहबी भी। मजहब से मेरी दिलचस्पी कम है लेकिन मजहबी ग्रन्थों का अध्यन मुझे रूचीकर लगता है । इनकी भाषा मुझे मोहित करती है । बाईबिल में हजरत दाउद के गीत पढ़ते हुए मुझ पर नशा छा जाता है । मैं नहीं कह सकता बाईबिल का हिन्दी अनुवाद कैसा है लेकिन उर्दू अनूवाद गजब का है । हजरत दाउद के सांग आफ दी सांग्स का अदभुत अनुवाद पेश किया गया है....ब्लैंक वर्स की बेहतरीन मिसाल । इसे पढ़ते हुए मैं हमेशा रोमांचित हो उठता हुं । गीता के श्लोक भी मुझे रोमांचित करते हैं खासकर वो पंक्तियां जहां कृष्ण कहते हैं कि मैं तेजस्वी का तेज हुं यश्स्वी का यश हुं और वृक्षों में पीपल हुं तो मुझ पर सेहर तारी होता है ।गद्य की ऐसी चासनी और ऐसा बहाव कहीं और देखने को नहीं मिलता । लेकिन ये बात मुझे सिर्फ गीता प्रेस वाले अनुवाद में ही महसूस हुई । मैं ने गीता के और अनुवाद भी पढ़े हैं लेकिन वो इसतरह नहीं बांधते ।मौलाना मौदूदी ने कुरान का जो उर्दू तर्जुमा किया है वो अदभुत हे मेरी मान्यता है कि ऐसे ग्रंथों का अध्ययन रचना्यीलता को नये आयाम प्रदान करता है ।
बात शुरू हुई थी सिगरेट पीने वाली औरतों से..... तो ऐसी औरतों में एक तरह का खुलापन होता है । आप इनसे अपने निजी तजर्बात शेयर कर सकते हैं । किसी रेस्तराँ के अर्ध-अंधेरे कोने में व्हिस्की की चुस्कियाँ लेते हुए इनसे बतियाने का लुत्फ कुछ और ही है । मेरी कहानियों मे अगर नारी मन के सुक्ष्म तरंगों की पकड़ है ता इसकी वजह मेरी इनसे अंतरंग बातचीत है जहां मुझे इनके निजी अनुभवों से आत्मसात हाने का मोका मिलता है । आप इसे आवारगी की संज्ञा दें लेकिन यही आवारगी मेरे लिए सृजन का स्रोत है और इसकी शक्ति भी । और थोड़ी बहुत आवारगी तो रचनाकार में होनी ही चाहिए । आप ड्राईंग रूम में बैठ कर निबन्ध लिख सकते हैं कहानी या उपन्यास नहीं । कहानी लिखने के लिए घर से बाहर जमीन पर चलना पड़ता है । जिस ने सड़कों पर मटरगश्ती नहीं की अपने शहर को हर रंग में नहीं देखा न उसका उजाला न अंधेरा न रात का सन्नाटा न मेले ठेले न गलियां न रैलियां वो कहानी क्या लिखेगा । बहुत सुरक्षित जिंदगी जीने वालो की रचनाशीलता आहिस्ता आहिस्ता मरने लगती है । कहानी लिखने के लिए किताबें से ज्यादा आदमी को पढ़ने की जरूरत है । हर आदमी का चेहरा एक कागज होता है जिस पर उसकी जिंदगी की कहानी लिखी होती हैृ । अदीब अपनी सूक्ष्म नजरों से उसे पढ़ता है और शब्दों के धागे में मोती पिरोता है । किताबों के अध्ययन से बहुत सोच कर लिखी जाने वाली कहानी उदय प्रका्य लिखते हैं । उनकी खूबी है कि इतिहास के गर्भ से कहानी निकालने में कामयाब होते हैं जिसमें अपने समय की सेंन्सिबिलिटी मौजूद होती है । दिल्ली दरबार उनकी बेहतरीन रचना है । अवैध प्रीत की कहानी हमजमीन भी सोच कर लिखी गयी कहानी है । असल में कभी कभी वक्त एक खास किस्म की कहानी की मांग करता है । हमजमीन साम्प्रदायिक सदभावना पर लिखी गयी खूबसूरत कहानी है जिसमें शिल्प की नवीनता है । मैं कहानी सोच कर नहीं लिखता । मुझे कहानी सूझती नहीं है । मुझे कहानी मिल जाती है । कहानी कदम कदम पर बिखरी पड़ी है । बस देखने वाली नजर चाहिए । ‘‘बगूले‘‘ मुझे रांची जाने वाली बस पर मिली । तब मैं विद्यार्थी था और रात वाली बस से रांची जा रहा था। मेरी सीट खिड़की के करीब थी। आगे तीन महिलाएं बैठी आपस में हंसी मजाक कर रही थीं। उन में से ण्क ने मुड़ कर देखा भी । मुझे उसकी नजर साधारण नहीं लगी । बस चली तो कंडक्टर ने बत्ती गुल कर दी । वो महिला मेरी तरफ फिर मुड़ी और पूछा समय कितना हुआ....? समय पूछते हुए मैं ने उसकी आंखों में चमक देखी । बस कुछ दुर चली तो वो फिर मेरी तरफ मुड़ी और पूछा कि हसडिहा कब आएगा ? सवाल बेतुका था लेकिन आंखों की चमक बढ़ गयी थी..और ये बेमायने नहीं थी । ये नजदीक आने का इ्शारा था....और औरतें इसी तरह इशारे करती हैं...मैं ने हाथ आगे बढ़ाया और उसको छूने की कोशिश की । मुझे यकीन था वो बुरा नहीं मानेगी । मैं ने अपनी उंगलियों पर उसकी कमर का स्पर्श बहुत साफ महसुस किया...और उसने झुक कर अपनी सहेली से कुछ कहा और हंसने लगी । सहेली ने मुड़ कर मेरी तरफ देखा और मुस्कराई । उसकी मुस्कराहट अर्थपूर्ण थी । मैं ने हाथ नहीं हटाया । मुझे अपने दिल की धड़कन तेज सी होती महसूस हुई । अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपने पेट पर खींच लिया....मैं सिहर उठा .....मेरी सांस जैसे रुक गई थी।.एक अजनबी औरत का रिस्पांस....ऐेसी सिहरन मैं ने जिन्दगी में पहले महसुस नहीं की थी। बस सड़क पर तेजी से भाग रही थी ।अन्दर सुरमई अन्धेरा था और बाहर हेडलाईट की रौश्नी में सड़क किनारे पेड़ झूम रहे थे । पेत्तों में हवा की सरसराहट दिल की धड़कनों में घुल रही थी ।वो मेरा हाथ सहलाने लगी और मुझे लगा मैं समंदर के किनारे खड़ा हुं और लहरें मेरे पांव भिगो रही हैं... मेरी उंगलियों की पोरों पर च्युंटियां सी रेंगने लगी... मैं होश खोने लगा... अचानक बस रुकी....कोई स्टाप था.. और कन्डक्टर ने रौश्नी की । में ने हाथ खींच लिया । वो हंसी और सहेली से कुछ बोली । मैं चाय पीने नीचे उतरा । चाय पी कर जब मैं वापस आया तो एक सज्जन मेरी जगह बैठ गये थे । उन्हों ने मुझ से कहा कि उनकी तबीयत मितला रही थी इसलिए वो कुछ देर वहां खिड़की के पास बैठना चाहते थे । मैं ने काई आपत्ति नहीं की और उनकी जगह बैठ गया । असल में मैं अभी भी उसी कैफियत में था और और उस एहसास को खोना नहीं चाहता था । बस चली तो फिर अंधेरा हो गया । सीट की पीठ पर सर टेक कर मैं उसी तरंग में डुब गया कि उसने किस तरह मेरा हाथ...? अचानक वो जोर से चिल्लाई.. ‘‘गाड़ी रोको....‘‘ कंडक्टर ने रोश्नी की और बस रुक गयी । वो सज्जन की तरफ मुड़ी और बहुत गुस्से में बाली । ‘‘हरामी...मुझे छूता है....सूअर का जना ....?‘‘ क्हानी यहां थी..उसका रीएक्ट करना....‘‘क्या मैं इतनी बुरी हुं कि हरकोई मुझे हाथ लगा सकता है?‘‘
इस भाव को लेकर मैं ने कहानी ‘‘बगूले‘‘ लिखी । कहानी हिट हुई । इसका बहुत सी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। बगूले में लतिकारानी एक सोलह सतरह साल के युवक को फांसती है और उसे घर बुलाती है और सोचती है कि इस मासूम कली को प्यार करना सिखाएगी । लेकिन युवक खुद पहल करता है और उसको हाथ लगाता है तो वो आगबगूला हो जाती है और युवक को धक्के मार कर निकाल देती है । पटना के एक कथाकार ने कहानी चोरी कर ली । मैं ने प्रेस कान्फ्रेंस की और चोरी की खबर हर जगह छपी । राजेन्द्र यादव ने भी सम्पादकीय मे इसका जिक्र किया । लेकिन अवधेश प्रीत ने चोर का साथ दिया और दैनिक हिन्दुस्तान में टिप्पणी की कि कहानी ऐसी नहीं है कि चोरी हो । असल में जहां गिरोहबन्दी होती है वहां ऐसी सियासत होती रहती है ।
कहानी सिंगारदान मुझे राहत कैम्प मे मिली । भागलपुर दंगे में तवायफों का भी राहत शिविर लगा । वहां एक तवायफ नें मुझे बताया कि दंगाई उसका सिंगारदान लूट कर ले गये । उसने रो रो कर कहा कि वो उसका मुरूसी सिंगारदान था और यही तो एक चीज उसके पास थी ! क्हानी यहीं पर थी...मुरूसी सिंगारदान का लुटना...अपनी धरोहर से बंचित हो जाना....पहले जान-व-माल के लुटने का डर था अब विरासत से महरूम होने का खौफ। मैं ने कहानी शुरु की तो अचेतन में बचपन की एक घटना का दृश्य मेरी रचना प्रक्रिया में घुल गया.... मेरी उम्र सालह सतरह साल थी । मैं अपने भाई से मिलने बेतिया गया था । ठंड का मोसम था। ट्रेन रात तीन बजे पहुंची । उस वक्त घर जाना मुमकिन नहीं था । स्टेशन से बाहर आया तो एक जगह तम्बू गड़ा था मालूम हुआ नौटंकी चल रही है । मैं अंदर बैठ गया । एक बाला नृत्य कर रही थी । उम्र दस-बारह साल हागी । वो लहक लहक कर गा रही थी । उसका जिस्म सांप की तरह बल खा रहा था । उसने बालों में गजरा लपेट रखा था । हाथ मेंहदी से सुर्ख थे और आंखो में काजल की गहरी लकीर कुछ इस तरह खिंची हुई थी कि नयन कटार हो रहे थे । सांप की तरह बल खाता हुआ उस तोबा का जिस्म... घुघंरुओं की रुनझुन... मेंहदी से लहकते हुण् हाथ और तीखी चितवन....रात जैसे ठहर गयी थी और मैं हो्य खौ बैठा था... उसका नृत्य खत्म हुआ तो एक अधेड़ उम्र की औरत स्टेज पर आई और अजीब भद्दे तरीके से नाचने लगी । उसकी आवाज भोंडी थी और नितम्ब भारी थे । उसने भी बालों पर गजरा लपेट रखा था। वो स्टेज पर जोर से पांव पटकती और कुल्हे मटकाती रही । मेरे दिलो दिमाग में विषाद सा फैलने लगा....एक अजीब सा अवसाद...जैसे किसी ने गुलाब की कलियों पर बासी गोश्त का लोथड़ा रख दिया हो....और जब उसने आंचल ढलकाते हुए अपनी भोंडी आवाज में गाना शुरु किया कि ‘‘भरतपुर लुट गयो हाय मेरी अम्मा.....‘‘ तो मैं ने घृणा महसूस की और वहां से उठ गया । घर आया तो मेरी तबीयत मुकददर थी । मैं वर्षों इस अवसाद से मुक्त नहीं हो सका । मैं जब भी उस बाला को याद करना चाहता वो औरत गुलाब की कलियों पर गोश्त का लोथड़ा रख देती । मुझे मुक्ती उस वक्त मिली जब मैं ने कहानी सिंगारदान लिखी । कहानी की संरचना में अचेतन का बहुत हाथ होता है । सिंगारदान लिखते हुए अचानक बासी गोश्त की तीब्र गंध मेरे नथुने में सरसराई....उस औरत के मटकते हुए कुल्हे...और गीत के बोल ‘‘भरतपुर लुट गयो.....‘‘ कहानी में अपने आप ही वो पंक्ति लिखा गयी ‘‘ हाय राजा...लूट लो भरतपुर...‘‘ब्रजमोहन की बीवी का जो चित्रण है वो इसी औरत का अक्स है । सिंगारदान का अनुवाद कई भाषाओं में हुआ है । साहित्य अकाडमी ने इंडियन लिट्रेचर में इसका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया । एश्यिन स्टडीज के ऐनुअल में भी इसका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित हुआ है । जे.एन.यू के देवेन्द्र चौबे ने अपनी किताब ‘‘समकालीन कहानी का समाज शास्त्र‘‘ में एक अघ्याय सिंगारदान पर लिखा है और इसकी भाषा का अद्भुत विश्लेषण किया है । अलीगढ़ दिल्ली और मुम्बई में सिंगारदान का कई बार मंचन भी हुआ है ।
कहानी ‘‘बहराम का घर भी भागलपुर दंगे की कहानी है । हमारे मुहल्ले में एक युवक था असलम । वो दंगे में मारा गया । वो बहराम के घर जाना चाहता था जहां सुरक्षित रहता । लेकिन वहां तक पहुंच नहीं सका । दंगाईयों ने उसे चौक पर ही घेर लिया । कुछ दिनों बाद पता चला कि उसकी लाश कूएं में फेंकी गयी है । कूएं से जब लाश निकाली जा रही थी तो असलम का मां चौक पर चहुंची और बहराम के घर का पता पूछने लगी । वो जानना चाहती थी कि बहराम का घर चौक से कितनी दूर रह गया गया था कि बच्चा वहां पहुंच नहीं सका । उसकी आंखों में हसरत थी...और कहानी यहीं पर थी.! हिंसा से अहिंसा की दूरी क्या है ? इस कहानी का पंजाबी भाषा में भी अनुवाद हुआ । पंजाबी में मेरी दस कहानियों का संग्रह ‘‘मृग्तृष्णा‘‘ के नाम से शीघ्र प्रकाश्य है ।
‘‘मिश्री की डली‘‘ हंस में छपी तो एक जनवादी कथाकार ने इसकी निन्दा की । असल में उन्हें वही कहानी पसंद है जो जनवादी परचम के नीचे खड़ी है । इस तरह का पुर्वाग्रह रचनाशीलता को अवरूद्ध करता है । यही वजह है कि इनके यहां रचनात्मकता नाम को भी नहीं है। इनकी भाषा ठस्स है । ये बहुत सोच कर लिखते हैं और कहानी में समाधान पहले ही ढूंढ लेते हैं। इनकी कहानियां पढ़ते हुए लगता है कि ऐसे कमरे में बन्द हैं जहां बूढ़े चादर ओढ़े मूसलसल खांस रहे हैं । लेकिन एक महिला ने बहुत तारीफ की और पत्र लिखा कि मुझ से मिलना चाहती है । उसने अपना फोन नम्बर भी लिखा था। मैं बहुत खु्श हुआ। मैं ने उसे लवर्ज प्वाईंट पर बुलाया। इस शहर में कोई लवर्ज प्वाइन्ट नहीं है। मैंने ने खोजा है। खोजा क्या इसका अविष्कार किया है। मैं ने उसे फ्रेजर रोड के रीडर्ज कार्नर में बुलाया। उस जगह एक रेस्तरां है जहां अन्धेरे की जन्नत आबाद है। मैं वहां उसके साथ काफी पीते हुए कहानियों पर बात करना चाहता था। लेकिन वो आई तो मुझे काठ मार गया। वो अश्वमुखी थी। उसका चेहरा तिकोना था। जबड़े चौड़े थे और ढलान लिए हुए टुडढी पर त्रिकोण बना रहे थे । उसके बाल रंगे हुए थे और होंट मोटे थे जिस पर लिपिस्टिक की तह भद्यी लग रही थी। मैं किसी को कुरूप नहीं कहता लेकिन मेरे सौन्दर्य बोध को वो गवारा नहीं थी। मैं ने मुख्तसर बात की और घर चला आया। मेरी बीवी ने वो पत्र पढ़ लिया था । उसको फिक्र हुई कि मैं किस से मिलने गया था। मैं ने अगर किसी से मुहब्बत की है तो वो मेरी बीवी है। मैं उसकी आंखों में आंसु नहीं देख सकता। मैं नहीं चाहता उसके दिल में जरा भी शंका पैदा हो। मैं ने उस महिला को घर बुलाया और अपनी बीवी से मिलाया। उसको देख कर मेरी बीवी को इत्मिनान हुआ। वो मेरे सौन्दर्य बोध से वाकिफ है। समझ गयी कि मैं उसके पीछे भागने वाला नहीं हुं।
एक बार मुझे साजदा जैदी को ढाल बनाना पड़ा । उन दिनों उत्तर प्रदेश की एक कवयित्री मेरी कहानियों पर आशिक थी । वो थी भी बहुत खूबसूरत । रोज फोन करती और कहानियों पर बात करती । एक बार फोन मेरी बीवी ने उठाया । पूछा कौन था। में ने बहाना बनाया कि बुढ़िया है स्कूल में पढ़ाती है और कहानियां पढ़ने का शौक है । लेकिन उसको इत्मिनान नहीं हुआ । कहने लगी कि बुढ़िया कैसे है? उसकी अवाज में खनक है । अब मैं क्या कहता ? उसकी अवाज तो वाकई ख्नकदार है। उसी दिन डाक से एक उर्दू पत्रिका मिली जिस में उसकी तस्वीर छपी थी। तस्वीर में वो और भी हसीन लग रही थी। मैं ने जल्दी से पत्रिका छुपाई कि अगर बीवी ने देख लिया तो गजब हो जाएगा। लेकिन खुदा शक्कर खोरे को शक्कर देता है । कुछ दिनों बाद मैं अलीगढ़ गया । बीवी साथ थी। वहां बाजार में साजदा जैदी मिल गयीं । वो बूढ़ी हैं उनके सारे बाल सफेद हो गये है । पांव में भी दर्द रहता है। रंगत सांवली है। वो लाठी टेक कर चल रहीं थीं। मुझे देख कर खु्श हुईे और घर बुलाया । उन से मिल कर हम आगे बढ़े तो बीवी ने पूछा ‘‘कौन थीं?‘‘ मैंने झट से कहा । ‘‘यही न वो शाएरा है जो फोन करती रहती है!‘‘
महिलाओं से दोस्ती का मतलब हमेशा सेक्स नहीं होता है। जो ऐसा समझते हैं वो बीमार लोग हैं। किसी से नई दोस्ती होती है तो मैं हुसैन से फोन पर उसकी बात जरूर कराता हुं। वो पूछता है कौन थी यार तो मैं हंसता हुं। समद तो कहते हैं मुझे भी मिलाओ लेकिन मैं नहीं मिलाता। समद आदमी खूबसूरत हैं। रेखा गुप्ता मेरी बेहतरीन दोस्त है। लेकिन उसकी दिलचस्पी साहित्य से नहीं है। वो ज्यातिष प्रेमी है और मुझसे कुंडली दिखाने मेरे ज्यातिष कार्यालय आई थी। कुंडली के दूसरे भाव में शुक्र केतु के साथ में बैठा था। मैं ने पूछा क्या वो सिगरेट भी पीती है? उसने कहा कि वो शराब भी पीती है । मुझे अच्छा लगा। मुझे एसे लोग पसंद हैं जो अपने गुनाह कबूल करते हे। हम जल्द ही दोस्त बन गये। मैं ने उससे बहुत सी बातें सीखीं। मेरी कहानियों पर उसका बहुत असर है। उसका कहना है कि पत्नी जो हर वक्त घर के कामों में लगी रहती है बहुत जल्द आकर्षण खो देती है। उसको चाहिए कि कभी औरत बन कर भी रहे। कहती है कि बहुत हसीन पत्नी नहीं होती, बहुत हसीन तवाएफ होती है। उसकी नजर में पती पत्नी का रिश्ता मालिक और गुलाम का रिश्ता है जिस में मालिक कोई नहीं हे दोनों ही गुलाम हैं। राजनीतिक गतिविधियों पर भी उसकी नजर गहरी है। बाबरी मस्जिद टूटने का उसे बहुत दुख है। उसका ख्याल है कि खुद अडवानी इस गलती पर पछता रहे हैं। गुजरात में जनसंहार के समय वो वहां थी। वहां का एक एक दृश्य उसे याद है जवाब में मैं ने कलीम आजिज़ का एक शेर सुनाया । खंजर पे कोई दाग न दामन पे कोई छींट तुम कत्ल करो हो के करामात करो हो ।
अफजल गुरु और भगत सिंह को वो एक ही खांचे में रखती है। उसका कहना है कि भगत सिंह अंग्रेजों के लिए आतंकवादी थे। अफजल भी आतंकवादी है । भगत सिंह ने असम्बली पर हमला किया। अफजल ने भी पार्लियामेंट पर हमला किया। भगत सिंह को फांसी की सजा हुई। अफजल को भी फांसी पड़ेगी। हिन्दुस्तान आजाद हुआ तो भगत सिंह हीरो हो गये। काश्मीर आजाद होगा तो अफजल भी हीरो हो जाण्गा। अफजल काश्मीर का भगत सिंह है ।
अंधेरे की जन्नत के एक गोशे में बैठे वोडका की चुस्कियो के साथ उससे बतियाने का लुत्फ कुछ ओर ही है। मैं अपने खास दोस्तो को वहीं बुलाता हुं। लेकिन वो दो पैग से ज्यादा नहीं लेती। मुझे भी दो पेग का मश्वरा देती है। कहती है शराब इंज्वाए करने की चीज है। नशे में बहकना शराब का अपमान है।
फ्रेजर रोड पर रीडर्ज कार्नर के आगे एक रेस्तरां है। अंधेरे की जन्नत वहीं बस्ती है। रेस्तरां की खूबी है यहां का अंधेरा। हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता है । फिर भी समझने में देर नहीं होती है कि किस मेज पर कौन सा चेहरा मौजूद है? चुम्बन की आवाज हमेशा कोनेवाली मेज से आती है जिसमें अक्सर चूड़ियों की खनक भी शामिल होती है । मद्धिम हंसी की आवाज भी दूसरे किनारे से आती है जिसमें मेज के टकराने और गिलास के टूटने की आवाज शामिल होती है। नौजवानो के जोर जोर से बोलने की आवाज हाल के बीचवाले हिस्से से आता है। जाम की के साथ आवाजों का शोर आहिस्ता आहिस्ता बुलन्द होता है जिसमें पाप संगीत का शोर घुला होता है। मैं जब पहलीबार वहां गया तो घबरा गया था। मैं किसी अंधे आदमी की तरह कुर्सियां टटोलता हुआ आगे बढ़ा तो बैरे ने मेरा हाथ थाम लिया था और अकेली कुर्सी वाली खाली मेज तक ले गया था। असल में जो अकेले होते हैं उन्हें इसी तरह की मेज दी जाती है। ऐसी मेजें हाल के एक तरफ कतार में बिछी होती हैं। हाल का दूसरा हिस्सा फैमिली और औरतों के लिए सुरक्षित है। लेकिन असल मेज है कोने वाली जो तंग नहीं है। यहां टांगें मेज से टकराती नहीं हैं। दो आदमियों के बैठने के लिए गददेदार सोफा है। सोफे पर लेट कर भी राहत उठाई जा सकती है। इस मेज की अलग फीस है। यहां बैठने का हिसाब दो सौ रु प्रति घंटा है। मेज के उपर एक लैम्प लटकता है जो हमे्या बुझा रहता है। सिर्फ बिल देते समय मद्धम सी रोश्नी होती है। लैम्प का कोण ऐसा होता है कि रोश्नी चेहरे पर नहीं पड़ती। सिर्फ पैसे गिनते हुए हाथ नजर आते हैं। राहत के तलबगार इसी मेज का रूख करते है। इस शहर में और भी फेमिलि रेस्तरां हें जिसमें छोटे छोटे केबिन बने होते हैं। यहां सिर्फ दो आदमी के बैठने भर जगह होती है। लकड़ी का एक दुबला सा बेंच जिस पर रेक्सिन मंढा होता है और माईका टाप की छोटी सी मेज। जगह इतनी तंग होती है कि बैठने में टांगें मेज की दीवारों से टकराती हैं । कोई गोद में बैठ जाए तो हिलडुल नहीं सकता। इन रेस्तरां में फेमिलि का मतलब बच्चा नहीं है।
अंधेरे की जन्नत में मैं अपने खास दोस्तों को ही बुलाता हुं लेकिन एकबार एक सम्माननीय कथाकार मेरे साथ आए । उस दिन एक जोड़ा सामने की मेज पर बैठा था। लड़की डेनिम की जीन्स और सफेद लैस लगी शर्ट में थी। उसने कूल्हे के निचले हिस्से से जीन्स पहन रखी थी। शर्ट की नेक-लाईन नाभी के पास खत्म होती थी। उसके होंट काले और गाल नीले थे। नाखून पर स्टिकर लगे हुए थे। अलग नाखून पर अलग अलग तरह के स्टिकर । लड़का बार बार लड़की का चुम्बन ले रहा था। ये देख कर मेरे कथाकार मित्र गुस्से से खौल रहे थे। मैं ने उनसे कहा कि जन्नत में गुस्सा हराम है। मेरे कथाकार मित्र मुझसे कुंडली भी दिखाते रहते है।
मैं क्या करुं ? मेरे अंदर दो व्यक्तित्व है । एक ज्योतिष और दूसरा कहानीकार । चाहे छोटे कद का ही सही दोनों में युद्ध चलता रहता है । कभी कहानीकार हावी हो जाता है कभी ज्योतिष। कहानीकार हावी होता है तो कहानियां लिखने की कोशिश करता हुं और ज्योतिष हावी होता है तो कुंडलियां बनाने लगता हुं। मैं जानता हुं दोनों की जंग में मरेगा कोई नहीं। मर रहा हुं मै। दोनों लहुलहान हो कर भी जिन्दा रहेंगे। शायद इसी लिए मैं ने सोचा है कि ज्योतिष पर एक ग्रंथ की रचना करूंगा। मैं ने पराशर मत को समझने का प्रयास किया है । कुछ सूत्र महाभारत में भी ढूंढा है। एक जगह विदुर उवाच में आया है कि ‘‘ आकाश में काले बादल मंडला रहे हैं । यनि रोहिण नक्षत्र का वेद कर रहा है । महायुद्ध को अब टाला नहीं जा सकता । निर्ष्क्य यही निकलता है कि जब जब यानि राहिणी का वेद करेगा भारतीय राजनीति में उथल पुथल होगा । मैं ने इसकी खोज की है । इन्द्रिरा गांधी ने जब इमरजेन्सी लगायी और उसका पतन हुआ तो शनि की यही स्तिथि थी। मैं ने यवनों का मत पढ़ा है और पाश्चात ज्योतिष भी। ज्योतिष के गूढ़तम रहस्य मेरे सीनें में दफन हैं। मैं इन्हें पांच हजार पृष्ठों पर फैलाने का हौसला रखता हुं। महाभारत में कृष्ण ने अर्जुन के लिए सर्वतोभद्र चक्र खींचा था ।
कृष्ण मेरे महबूब हैं । मैं उनपर लम्बी कविता लिखना चाहता हुं .... एक महाकाब्य....! लेकिन ये राधा के स्निग्ध के बिना मुमकिन नहीं है। पहले मुझे राधा को आत्मसात करना होगा । कृष्ण और राधा का प्रेम प्रसंग अध्यात्म की प्रकाष्ठा है । कृष्ण अगर पुरूष हैं तो राधा प्रकिृति और दोनों के संगम से माया की उत्पत्ती होती है। पुराण में कहीं आया है कि राधा को कृष्ण अपने बाम पार्श्व से उत्पन्न करते हैं और रास रचाते हैं और फिर राधा को ,खुद में लीन कर लेते हैं। और मैं ने सलमा को कृष्ण के दाएं पहलू में देखा ! सलमा ईद में सवईयां बनाती है और कृष्ण का इंतजार करती है । सलमा को कृष्ण से शियकायत है कि उठा लयिा तुम ने कनिष्ठा पर नन्दन पर्बत... उठालेते तर्जनी पर मस्जिद की मीनार ! मुझे इसकी चिन्ता नहीं है कि महाकाव्य कब मुकम्मल होगा ? चिन्ता कृष्ण को होनी चाहिए। कविता उनकी है। मैं माध्यम हुं। वो लिखवाएंगे मैं लिखुंगा। वो खुद कहते हैं कि तुम मुझे जिस तरह भजते हां मैं तुम्हे उसी तरह भजता हु। मैं कहना चाहता हुं ‘‘हे कृष्ण! मैं तुझे हजरत दाऊद की गजल की तरह भजता हुं।‘‘
मैं ने अमरेन्द्र कुमार का लेख पढ़ा कि अमृता प्रीतम साहिर लुधियानवी से प्रेम करती थीं और बिना विवाह के इमरोज के साथ रहती थीं। उनके लड़के ने एक बार पूछा कि क्या मैं साहिर लुधियानवी का लड़का हुं ? मेरे साथी मुझे चिढ़ाते हैं कि मेरी शक्ल उनसे मिलती है। अमृता ने जवाब दिया कि अगर तुम साहिर अंकल के लड़के होते तो मैं छुपाती नहीं। बता देती। जब तुम गर्भ में थे तो साहिर का फोटो मेरी मेज पर रहता था। मैं उनसे प्रेम करती थी । शायद इसीलिए उनके चेहरे का अक्स तुम्हारे चेहरे पर आ गया है। प्रभा खेतान भी डाक्टर सर्राफ से प्रेम करती थीं और उनकी रखैल बन कर रहती थीं। प्रभा खेतान ने अपनी आत्मकथा में इसे स्वीकारा है ।
क्या ये औरतें आवारा थीं? आवारगी की उम्र नहीं होती । आदमी उम्र के हर हिस्से में कहीं न कहीं आवारा है । आदमी खत्म हो जाता है आवारगी बची रहती है । उसकी चर्चा चलती रहती है । आवारगी शाश्वत है । देखता हुं कि दोस्तों के बालों में चान्दी के तार मिलने लगे हैं। कुछ एक पर मजहब का रंग भी चढ़ने लगा है। मजहब बुढ़पे का लबास है। क्या मुझे ये लबास ओढ़ लेना चाहिए? मैं कहां जाऊं.? वक्त तेजी से गुजर रहा है। कुछ देर में मंजरनामा बदल जाएगा। मैं अपने आप से पूछता हुं .... और कुछ देर में लुट जाएगा हर बाम पर चांद उस घड़ी ऐ दिल-ए-आवारा कहां जाओगे ? .............................................................
शमोएल अहमद 301 ग्रैंड अपार्टमेंट नई पाटलिपुत्र कालोनी पटना 800013 0612.2261045 09835299303
हम सबके प्रिय 92 वर्षीय गायक मन्ना डे अस्वस्थ हैं। उनके स्वास्थ की कामना के साथ प्रस्तुत है मन्ना डे पर एक रोचक व जानकारी भरा आलेख-
मन्ना डे
वयोवृद्ध एवं सुप्रसिद्ध गायक मन्ना डे के शास्त्रीय संगीत से ओतप्रोत गीतों की मधुरता की आज भी कोई सानी नहीं है। यद्दपि मन्ना ने जिस दौर में गीत गाने प्रारंभ किये उस दौर में हर संगीतकार का कोई न कोई प्रिय गायक था, जो फिल्म के अधिकांश गीत उससे गवाता था। कुछ लोगों को प्रतिभाशाली होने के बावजूद वो मान-सम्मान या श्रेय नहीं मिलता, जिसके कि वे हकदार होते हैं। हिंदी फिल्म संगीत में इस दृष्टि से देखा जाए तो मन्ना डे का नाम सबसे पहले आता है। यूं मन्ना डे की प्रतिभा के सभी कायल थे, लेकिन सहायक हीरो, कॉमेडियन, भिखारी, साधु पर कोई गीत फिल्माना हो तो मन्ना डे को याद किया जाता था। मन्ना डे ठहरे सीधे-सरल आदमी, जो गाना मिलता उसे गा देते। ये उनकी प्रतिभा का कमाल है कि उन गीतों को भी लोकप्रियता मिली।
प्रबोध चन्द्र डे उर्फ मन्ना डे का जन्म एक मई 1920 को कोलकाता में हुआ। मन्ना डे ने अपने बचपन की पढ़ाई एक छोटे से स्कूल 'इंदु बाबुर पाठशाला' से की। 'स्कॉटिश चर्च कॉलिजियेट स्कूल' व 'स्कॉटिश चर्च कॉलेज' से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कोलकाता के 'विद्यासागर कॉलेज' से स्नातक की शिक्षा पूरी की। मन्ना डे के पिता उन्हें वकील बनाना चाहते थे, लेकिन मन्ना डे का रुझान संगीत की ओर था। वह इसी क्षेत्र में अपना कॅरियर बनाना चाहते थे। 'उस्ताद अब्दुल रहमान खान' और 'उस्ताद अमन अली खान' से उन्होंने शास्त्रीय संगीत सीखा। मन्ना डे के बचपन के दिनों का एक दिलचस्प वाकया है। उस्ताद बादल खान और मन्ना डे के चाचा एक बार साथ-साथ रियाज कर रहे थे। तभी बादल खान ने मन्ना डे की आवाज़ सुनी और उनके चाचा से पूछा, यह कौन गा रहा है। जब मन्ना डे को बुलाया गया तो उन्होंने कहा कि बस, ऐसे ही गा लेता हूं। लेकिन बादल खान ने मन्ना डे में छिपी प्रतिभा को पहचान लिया। इसके बाद वह अपने चाचा से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मन्ना डे ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा अपने चाचा 'के सी डे' से हासिल की। अपने स्कॉटिश चर्च कॉलेज के दिनों में उनकी गायकी की प्रतिभा लोगों के सामने आयी। तब वे अपने साथ के विद्यार्थियों को गाकर सुनाया करते थे और उनका मनोरंजन किया करते थे। यही वो समय था जब उन्होंने तीन साल तक लगातार 'अंतर-महाविद्यालय गायन-प्रतियोगिताओं' में प्रथम स्थान पाया।
मन्ना डे को अपने कॅरियर के शुरुआती दौर में अधिक प्रसिद्धी नहीं मिली। इसकी मुख्य वजह यह रही कि उनकी सधी हुई आवाज़ किसी गायक पर फिट नहीं बैठती थी। यही कारण है कि एक जमाने में वह हास्य अभिनेता महमूद और चरित्र अभिनेता प्राण के लिए गीत गाने को मजबूर थे। प्राण के लिए उन्होंने फिल्म 'उपकार' में 'कस्मे वादे प्यार वफा...' और जंजीर में 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी...' जैसे गीत गाए। उसी दौर में उन्होंने फिल्म 'पडो़सन' में हास्य अभिनेता महमूद के लिए एक चतुर नार... गीत गाया तो उन्हें महमूद की आवाज़ समझा जाने लगा। आमतौर पर पहले माना जाता था कि मन्ना डे केवल शास्त्रीय गीत ही गा सकते हैं, लेकिन बाद में उन्होंने 'ऐ मेरे प्यारे वतन'..., 'ओ मेरी जोहरा जबीं'..., 'ये रात भीगी भीगी'..., 'ना तो कारवां की तलाश है'... और 'ए भाई जरा देख के चलो'... जैसे गीत गाकर आलोचकों का मुंह सदा के लिए बंद कर दिया। पहले वे के.सी डे के साथ थे फिर बाद में सचिन देव बर्मन के सहायक बने। बाद में उन्होंने और भी कईं संगीत निर्देशकों के साथ काम किया और फिर अकेले ही संगीत निर्देशन करने लगे। कईं फिल्मों में संगीत निर्देशन का काम अकेले करते हुए भी मन्ना डे ने उस्ताद अमान अली और उस्ताद अब्दुल रहमान खान से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेना जारी रखा। संगीत ने ही मन्ना डे को अपनी जीवनसाथी 'सुलोचना कुमारन' से मिलवाया था। मन्ना डे ने केरल की सुलोचना कुमारन से विवाह किया। इनकी दो बेटियाँ हुईं। सुरोमा का जन्म 19 अक्टूबर 1956 और सुमिता का 20 जून 1958 को हुआ। दोनों बेटियां सुरोमा और सुमिता गायन के क्षेत्र में नहीं आईं। एक बेटी अमरीका में बसी है।
वे 1940 के दशक में अपने चाचा के साथ संगीत के क्षेत्र में अपने सपनों को साकार करने के लिए मुंबई आ गए थे।वर्ष 1943 में फिल्म 'तमन्ना' में बतौर पार्श्व गायक उन्हें सुरैया के साथ गाने का मौका मिला। हालांकि इससे पहले वह फिल्म 'रामराज्य' में कोरस के रूप में गा चुके थे। दिलचस्प बात है कि यही एक एकमात्र फिल्म थी जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था। मन्ना डे की प्रतिभा को पहचानने वालों में संगीतकार शंकर जयकिशन का नाम ख़ास तौर पर उल्लेखनीय है। इस जोडी़ ने मन्ना डे से अलग-अलग शैली में गीत गवाए। उन्होंने मन्ना डे से 'आजा सनम मधुर चांदनी में हम...' जैसे रुमानी गीत और 'केतकी गुलाब जूही...' जैसे शास्त्रीय राग पर आधारित गीत भी गवाए। दिलचस्प बात है कि शुरुआत में मन्ना डे ने यह गीत गाने से मना कर दिया था। मन्ना डे ने 1943 की "तमन्ना" से पार्श्व गायन के क्षेत्र में क़दम रखा। संगीत का निर्देशन किया था कॄष्णचंद्र डे ने और मन्ना के साथ थीं सुरैया। 1950 की "मशाल" में उन्होंने एकल गीत "ऊपर गगन विशाल" गाया जिसको संगीत की मधुर धुनों से सजाया था सचिन देव बर्मन ने। 1952 में मन्ना डे ने बंगाली और मराठी फिल्म में गाना गाया। ये दोनों फिल्म एक ही नाम "अमर भूपाली" और एक ही कहानी पर आधारित थीं। इसके बाद उन्होंने पार्श्वगायन में अपने पैर जमा लिये।
गीतकार प्रेम धवन ने उनके बारे में कहा था कि 'मन्ना डे हर रेंज में गीत गाने में सक्षम है। जब वह ऊंचा सुर लगाते है तो ऐसा लगता है कि सारा आसमान उनके साथ गा रहा है, जब वो नीचा सुर लगाते है तो लगता है उसमें पाताल जितनी गहराई है, और यदि वह मध्यम सुर लगाते है तो लगता है उनके साथ सारी धरती झूम रही है।' मन्ना डे केवल शब्दों को ही नही गाते थे, अपने गायन से वह शब्द के पीछे छिपे भाव को भी खूबसूरती से सामने लाते हैं। अनिल विश्वास ने एक बार कहा था कि 'मन्ना डे हर वह गीत गा सकते हैं जो मोहम्मद रफी, किशोर कुमार या मुकेश ने गाए हों। लेकिन इनमें कोई भी मन्ना डे के हर गीत को नहीं गा सकता।' 1950 से 1970 के दशको में इनकी प्रसिद्धि चरम पर थी। मन्ना डे ने अपने पांच दशक के कॅरियर में लगभग 3500 गीत गाए। भारत सरकार ने मन्ना डे को संगीत के क्षेत्र में बेहतरीन योगदान के लिए पद्म भूषण और पद्मश्री सम्मान से नवाजा। इसके अलावा 1969 में 'मेरे हज़ूर' और1971 में बांग्ला फिल्म 'निशि पद्मा' के लिए 'सर्वश्रेष्ठ गायक' का राष्ट्रीय पुरस्कार भी उन्हें दिया गया।
उन्हें मध्यप्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, उड़ीसा और बांग्लादेश की सरकारों ने भी विभिन्न पुरस्कारों से नवाजा है। मन्ना डे के संगीत के सुरीले सफर में एक नया अध्याय तब जुड़ गया जब फिल्मों में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए उन्हें फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हिंदी के अलावा बांग्ला और मराठी गीत भी गाए हैं। मन्ना ने अंतिम फिल्मी गीत 'प्रहार' फ़िल्म के लिए गाया था। मन्ना दा ने हरिवंश राय बच्चन की 'मधुशाला' को भी अपनी आवाज़ दी है जो काफ़ी लोकप्रिय है। मन्ना डे के जीवन पर आधारित "जिबोनेरे जलासोघोरे" नामक एक अंग्रेज़ी वृत्तचित्र 30 अप्रैल 2008 को नंदन, कोलकत्ता में रिलीज़ हुआ। इसका निर्माण "मन्ना डे संगीत अकादमी द्वारा" किया गया। इसका निर्देशन किया डा. सारूपा सान्याल और विपणन का काम सम्भाला सा रे गा मा (एच.एम.वी) ने। वर्ष 2005 में 'आनंदा प्रकाशन' ने बंगाली उनकी आत्मकथा "जिबोनेर जलासोघोरे" प्रकाशित की। उनकी आत्मकथा को अंग्रेज़ी में पैंगुइन बुक्स ने "Memories Alive" के नाम से छापा तो हिन्दी में इसी प्रकाशन की ओर से "यादें जी उठी" के नाम से प्रकाशित की। मराठी संस्करण "जिबोनेर जलासाघोरे" साहित्य प्रसार केंद्र, पुणे द्वारा प्रकाशित किया गया।
मिस्टर गड़बड़िया हमारे भूतपूर्व पड़ौसी हैं| भूतपूर्व इसलिये कि वे हमेशा मकान बदलते रहते हैं| जिस प्रकार नेताओं को दल बदलने की बीमारी होती है गड़बड़िया को मकान बदलने की बीमारी है| अपने अपने शौक हैं बदलने के,कुछ कार बदलने में अपनी शान समझते हैं कुछ लोग बाईक बदलकर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं| विदेशों में तो साल बदला नहीं कि बीवी बदलने की तलब होने लगती है| ये तो अपना हिंदुस्तान ही है कि लाख अरमान हों कि बीवी बदलें पर कमवक्त समाज के डर के मारे कुछ ऐसा वैसा कर ही नहीं कर पाते|हमारे कई मित्र हैं जो कोसते रहते हैं उन पलों को जब हिंदुस्तान में पैदा हो गये| खैर छोड़ो बेकार बातों में क्या रखा है गड़बड़ियाजी पांच साल में दस मकान बदल चुके हैं| वैसे गिन्नीज़ बुक में नाम लिखाने का उनका हक बनता है परंतु वे कहते हैं कि जब काले धन के मामले में इंडिया एक नंबर हॊने के बाद भी गिन्नीज़ की चिंता नहीं कर रहा तो अपन क्यों करें| कल ही उन्होंने ग्यारहवां मकान बदला है और सुबह से मेरे घर पर आ धमके| अखवार बगल में दबा था और किसी बिन बुलाये मेहमान की तरह प्रकट हो गये| मैंने उनका भये प्रकट कृपाला दीन दयाला कौशल्या हितकारी के तौर पर स्वागत किया| आते ही बोले” क्या हो गया है संसार के लोगों को,यह देखो अब तो मिस मोटी प्रतियोगिता भी आयोजित होने लगी है” यह कहते हुये उन्होंने अखवार मेरे सामने पटक दिया| एक दिन की मुलाकात जो कल शाम कॊ ही हुई थी इतनी बेतकल्लुफ हो जायेगी मैंने सोचा भी न था|अखवार में एक खूब मोटी महिला का फोटो छपा था, नीचे लिखा थामिस मोटी 2013 चुनी गई| उन्हें इनाम के तौर पर दस लाख डालर दिये गये|” हो गया न कल्याण कैसी लीला है ऊपर वाले की यहां दिन भर कलम घिसो अफसर की चार बातें सुनों तब जाकर बीस पच्चीस हज़ार कमा पाते हैं और मोहतरमा खूब मोटीं क्या हो गईं करोड़पति हो गईं| गड़बड़ियाजी बोले जा रहे थे लोगों के पास कोई काम नहीं है जो कि इस प्रकार के बेढब आयोजन करते रह्ते हैं| “गड़बड़िया भाई आगे ऐसा ही होना है, मिस मोटी के बाद मिस सुकट्टी, मिस भुखमरी, मिस लंपट, मिस ठिनगी ऐसी ही प्रतियोगितायें आयोजित होना है,मैंने भविष्यवक्ता की तरह दांव फेका| गड़बड़िया त्रिकाल दर्शी हो गये, कहने लगे एक बात समझ में नहीं आई प्रभुदयाल सरजी ,सारी प्रतियोगितायें मिसों के नाम पर क्यों रजिस्टर्ड हैं, मिस्टरों के नाम क्यों नहीं| मैं समझ गया मिस्टर गडबड़िया अभी अपरिपक्क्व बुद्धि के ही हैं, मैने प्रत्यक्ष तौर पर कहा भाई साहब आप अपने घामड़ दिमाग पर जरा जोर तो डालिये योगाभ्यास कीजिये और प्राणायाम कीजिये| इस सनातन क्रिया से आपकी छठी इंद्रिय जागृत हो जायेगी और आपको ग्यानार्जन होने लगेगा कि आजकल कितनी सारी मिस्टर प्रतियोगितायें आयोजित हॊ रही हैं| मैंने ग्यान गंगा बनकर उपदेशों के गंगाजल से उन्हें सराबोर कर दिया|’ मिस्टर भ्रष्टाचारी,मिस्टर घूसखोर,मिस्टर बेईमान ,मिस्टर घुटाला मिस्टर टालू क्या इतनी सारी मिस्टर प्रतियॊगितायें यहां नहीं चल रहीं हैं? “हाँ सर बात तो सही कह रहे हैं आप” अपनी कम अक्ली पर झेंप मिटाते हुये वे कुछ उत्तॆजित हो गये| फिर चुप हो गये| बात मैंने ही बढ़ाई| “राजधानी से लेकर छोटे छोटे गांव तक में ये प्रतियोगितायें आयोजित हो रही हैं| केंद्रीयकरण से विकेंद्रीकरण की ओर बढ़ते ग्राम संपर्क अभियान के कदम इन प्रतियोगिताओं की शत प्रतिशत सफलताओं में किलोमीटर के पत्थर साबित होंगे| बड़े बड़े दिग्ग्ज भ्रष्टाचारी,घूसखोर अपने अपने स्वागत कंठों में गेंदों और गुलाब के फूलों की मालायें डाले, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा का मुखौटा लगाये प्रतिस्पर्धा में भाग लेने के लिये देश के विकसित मंच पर खड़े हैं|” मिस्टर गड़बड़िया पर हमारी धारावाहिक बातों का गहरा प्रभाव पड़ा|” दयाल भैया आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं,मिस्टर गुंडा, मिस्टर आतंकवादी, मिस्टर धर्म निरपेक्ष, मिस्टर साम्प्रदायिक प्रतियॊगिताएं तो देश के हर प्रांतीय शहरीय और ग्रामीण मंच पर हो ही रहीं हैं| अब तो शक्ति प्रदर्शन भी प्रतियॊगिता का मुद्दा हो गया है| लाख दो लाख की किराये की भीड़ जुटाकर मिस्टर शक्तिमान प्रतियॊगितायें बड़े धुरंधर हर साल छ: महीने में आयोजित कर ही लेते हैं|” मैँने कहा मिस्टर कातिल,मिस्टर बलात्कारी,मिस्टर अपहरण,मिस्टर खाऊ जैसे सफल आयोजनों पर अब सरकार लगता है कि सबसीडी देने का विचार कर रही है| ग्राम प्रमुख एवं सरपंच इनके संचालक बनाये जा रहे हैं| सुना है सांसदों एवं विधायकों के संरक्षण में इन महान ऐतिहासिक उत्सवों को फलीभूत करने के लिये सरकारी अमला जी जान से जुटा है| मिस्टर लफंगा,मिस्टर लतखोर,मिस्टर भगोड़ा जैसी स्वास्थ्य वर्धक एवं सुखदायक योजनायें प्रतिस्पर्धा के लिये प्रस्तावित हैं| राम भली करे | मिस्टर गड़बड़िया प्रसन्न थे|
हम मिस्टर लतखोर बनेंगे,हम सर्वोत्तम चोर बनेंगे मिस मिस्टर के पदक जीतकर चंदा और चकोर बनेगे| गुनगुनाते हुये अपने ग्यारहवें घर की ओर प्रस्थान कर गये|
अंतर्राष्ट्रीय हिंदी जगत के महान विद्वान तथा विश्व प्रख्यात व्यक्तित्व --डॉ आर एस मकग्रेगर --( डॉ रोनाल्ड स्टुअर्ट मकग्रेगर ) का निधन पिछले महीने अपने आवास पर ब्रिटेन में हो गया ।
वे पिछले कई वर्षो से रोग ग्रस्त थे ।
डॉ मकग्रेगर, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय,ब्रिटेन के फैकल्टी ऑफ़ ओरिएण्टल स्टडीज से जुड़े हुए थे।अपने अथक प्रयत्नों एवं अद्भुत मेधा से उन्होंने ,ऑक्सफ़ोर्ड हिंदी इंग्लिश डिक्शनरी की रचना की जिस से उन्हें अभूतपूर्व प्रसिद्धि मिली ।अनेकानेक पुस्तको तथा शोध प्रपत्रों के द्वारा उन्हों ने हिंदी भाषा एवं साहित्य को समृद्ध किया ।
डॉ मकग्रेगर जी के संपर्क में आने का सौभाग्य मुझे वर्ष १९८४ में मिला जब मेरी नियुक्ति लन्दन स्थित भारतीय दूतावास में प्रथम हिंदी व् संस्कृति अधिकारी के रूप में हुई थी । उसी वर्ष १४ सितम्बर को भारतीय दूतावास (हाई कमीशन ) में मनाये गए हिंदी दिवस में डॉ मकग्रेगरजी हमारे मुख्य अतिथि बने तथा उनसे समय -समय परमिलने व् हर कार्यक्रम में उनसे सहयोग पाने का मुझे सौभाग्य मिला । उन के अनिवर्चनीय स्नेह व आशीर्वाद से मुझे अपने कार्यकाल में अनेकानेक प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय विद्वानों से मिलने के भी अवसर प्राप्त हुए ।
( चित्र में प्रोफेसर मैगरेकर के साथ लेखिका)
हिंदी भाषा एवं साहित्य में उनका योगदान सदैव ध्रुव तारे की भांति हमारा सही मार्ग दर्शन करता रहेगा।
उनके प्रति प्रत्येक हिंदी -सेवी का मस्तक विनम्र श्रद्धा से नत है। उनका निधन हिंदी जगत की अपूरणीय क्षति है ।
-सरोज श्रीवास्तव (पूर्व संपादक -राज्यसभा) पूर्व हिंदी एवं संस्कृति अधिकारी (भारत का हाई कमीशन लन्दन)
रोजाना बेतुश्का भेड़ों के झुण्ड को भोजपत्र के वृक्षों की वाटिका के नीचे चराने के लिए ले जाया करती थी.उसकी जेब में हमेशा पटसन के रेशों का गुच्छा रहता था.जिससे वह डोर बनाती फिर भी बेतुश्का को डोर बनाने के बजाये जंगल में घूमना अधिक पसंद था.कभी वह चारागाह में जाकर यह भी देखती की कौन से नए जंगली फूल खिले हैं.अल्हड़पन की मस्ती में बेतुश्का कभी झूमकर नाचती और वृक्षों से लिपटकर गोल-गोल फेरे लगाती.
बसंत ऋतू के एक दिन इसी जगह अचानक बेतुश्का के सामने एक खूबसूरत औरत प्रकट हुई.उसके लम्बे केश थे और उसने सफ़ेद रेशमी अंगरखा पहन रखा था.सर पर रखा फूलों का मुकुट उस पर खूब फब रहा था." मैंने देख लिया है की तुम्हें नाचना पसंद है" सफ़ेद लबादे वाली औरत ने कहा."" हाँ.. सचमुच !."खिलखिलाते हुए बेतुश्का ने कहा ,"मैं सारा दिन नाच सकती हूँ लेकिन मेरी मां ने यह पटसन मुझे बुनने के लिए दिया है.'
"कोई बात नहीं !कल कर लेना चलो आज हम दोनों नाचेंगे" सफ़ेद लबादे वाली औरत ने कहा ," मैं तुम्हें नाच के कुछ नए कदम सिखाऊंगी"
बेतुश्का एक बार फिर उस औरत के साथ नाचने लगी.गीत गाते और खिलखिलाते हुए वे दोनों कभी वृक्षों के नीचे तो कभी मैदान में होते.उन दोनों के क़दमों की ताल इतनी हलकी थी की घास जरा भी मुड़ी-तुड़ी नहीं.शाम का धुंधलका होते ही वह सफ़ेद लबादे वाली औरत उसी तरह आँखों से ओझल हो गयी जितनी अचानक वह प्रकट हुई थी.बेतुश्का भी अपनी भेड़ों का झुण्ड लेकर घर लौट गयी.जब उसकी मां ने पटसन का धागा बुनने के बारे में पूछ ताछ की बेतुश्का ने बहाना बना दिया कि पटसन का गुच्छा उसे मिल नहीं रहा है.उसने सफ़ेद लबादे वाली औरत के बारे में चुप्पी साध रखी थी.
अगले रोज बेतुश्का फिर उसी जगह गयी.आज उसने ठान लिया कि वह पटसन की डोर अवश्य बुनेगी.तभी सफ़ेद लबादे वाली औरत ने प्रकट होकर पूछा," मेरे साथ नाचने चलोगी!? " नहीं मुझे डोर बुननी है.नहीं तो मेरी मां मुझसे नाराज हो जाएगी."बेतुश्का ने कहा.
" अगर तुम मेरे साथ नाचोगी तब मैं बुनने में तुम्हारी मदद करूंगी." औरत ने वायदा किया.
बेतुश्का उस औरत के साथ नाचने लगी.सारा दिन उनहोंने नाचने-गाने में ही बिताया.साँझ ढली तब उस खूबसूरत औरत के होठो पर मुस्कान खिली.उसने जैसे ही अपना दाहिना हाथ हिलाया पलक झपकते ही पटसन का गुच्छा महीन रेशमी धागे के गोले में बदल चुका था.घर लौटकर बेतुश्का ने इसके बारे में मां से कुछ भी नहीं कहा.
तीसरे रोज सफ़ेद लबादे वाली औरत जंगल में बेतुश्का की प्रतीक्षा कर रही थी.आज वे इतना नाचीं जैसा उन्होंने पहले कभी नहीं नचा.चकरघिनी की तरह घूमती,कूदती फांदती ... इठलाती..बलखाती...ठहाके लगाकर मैदान में हवा के झोंकों की तरह ठुमकती और फुदकतीं .दिन ख़त्म होनेपर आज भी सफ़ेद लबादे वाली औरत ने बेतुश्का के लिए रेशमी धागों का गुच्छा बुन दिया था.
" बेतुश्का .. तुम सचमुच बेहद सुंदर नाचती हो.!मुझे अत्यधिक आनंद आया"इतना कहकर सफ़ेद लबादे वाली औरत ने एक ऐसा थैला दिया जिसके बाहरी हिस्से में रहस्यमय कशीदाकारी की गयी थी.
" इसे अच्छी तरह सम्हालकर रखना" उसने कहा. बेतुश्का ने देखा की उसके भीतर भोजपत्र की सूखी हुई पत्तियां थीं. घर पहुंचकर बेतुश्का ने रेशमी धागे का गुच्छा मां को सौंपा.इस बार मां ने उस गुच्छे को बड़े गौर से देखा.
" तुमने इतना सुंदर धागा कहाँ से बुना? बेतुश्का क्या सचमुच यह गुच्छा तुमने ही बुना है?
अब बेतुश्का से रहा न गया.उसने लंबा सफ़ेद लबादा पहने खूबसूरत औरत की पूरी कहानी सुना दी.
"अरे वाह! बेतुश्का...भोजवाटिका की रखवाली करने वाली उस औरत से मिलना किस्मत की बात है. तुम भाग्यवान हो की उससे तुम्हारी मुलाकात हुई."
" मां ! उसने मुझे अनेक करिश्माई नृत्यों के पद-चाप सिखाये हैं?
बेतुश्का चहककर कहने लगी.," और यह देखो मां! उसने मुझे पुराने भोजपत्रों से भरी यह पोटली दी है."
" जब बेतुश्का ने उस पोटली को खाली किया वे पीली पत्तियां ठोस सोने में तब्दील हो चुकी थीं.यह चमत्कार देखकर बेतुश्का का मुह खुला का खुला रह गया .
अनुवादः किशोर दिवसे
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मेरे राजा का राजमहल!
नहीं किसी को पता कहाँ मेरे राजा का राजमहल! अगर जानते लोग, महल यह टिक पाता क्या एक पल ?
इसकी दीवारें चाँदी की, छत सोने की धात की, पैड़ी-पैड़ी सुन्दर सीढ़ी उजले हाथी दाँत की।
इसके सतमहले कोठे पर सूयोरानी का घरबार, सात-सात राजाओं का धन, जिनका रतन जड़ा गलहार।
महल कहाँ मेरे राजा का, तू सुन ले माँ कान में छत के पास जहाँ तुलसी का चौरा बना मकान में!
सात समंदर पार कहाँ पर राजकुमारी सो रही, इसका पता सिवा मेरे पा सकता कोई भी नहीं।
उसके हाथ में कँगने हैं, कानों में कनफूल, लटें पलंग से लटकी लोटें, लिपट रही है धूल।
सोन-छड़ी छूते ही उसकी निंदिया होगी छू मंतर, और हंसी से रतन झरेंगे झर-झर, झर-झर धरती पर।
राजकुमारी कहाँ सो रही, तू सुन ले माँ कान में छत के पास जहाँ तुलसी का चौरा बना मकान में!
बेर नहाने की होने पर तुम सब जातीं घाट पर, तब मैं चुपके-चुपके जाता हूँ उसी छत के ऊपर।
जिस कोने में छाँह पहुँचती, दीवारों को पार कर, बैठा करता वहीं मगन-मन जी भर पाँव पसार कर।
संग सिर्फ मिन्नी बिल्ला होता है छत की छाँव में, पता उसे भी है नाऊ-भैया रहता किस गाँव में