' चांद पर जा अटके बूंद-बूंद ओस-से बहे कदम-कदम फिसले-गिरे नम दूब पे मखमली सुख देते सपने जुगनू से चमकें। ' शैल अग्रवाल
परम्परा से प्रगति तक की दूरी नापते सपने नींद में भी तो नहीं सोते ! अनवरत् प्रेरणा देते यही तो हमारी प्रगति के गर्भकोष हैं। माना सभी अविष्कार जरूरतों से ही जनमते हैं पर इन्ही के सहारे तो फलते-फूलते हैं हम; जड़ों से जुड़कर, कटकर तो कुछ भी संभव ही नहीं।
प्रकृति में भी सदा पुराने से ही नया जनमता है और समाज में भी। सपने भले ही हम चांद के देखें, प्रगति भी वही समाज और स्वभाव में टिक व पच पाती है जो उपयोगी और व्यवहारिक हो, पुराने को नए के साथ जोड़े रखे।
कैसे भी देखें या सोचें, प्रगति और परंपरा दोनों ही समाज के लिए उपयोगी हैं क्योंकि मानव का स्वभाव है परिचित से जुड़े रहकर नए की तलाश करना है । वह स्वभाव से अन्वेषक भी है और पुराने से शीघ्र ही ऊब भी जाता है। पर कुछ ऐसी परंपराएं हैं जिन्हें छोड़ ही नहीं सकता वह, सदा उसके साथ रही हैं और रहेंगी-जैसे दिन में तीन बार खाना, साक्षर होना आदि। परंपराएं जो उसके जीवन की जरूरत हैं, आत्मा और शरीर की भूख हैं; इन्हें भूलकर, तजकर जी ही नहीं सकता वह। हाँ, इंद्रियों के सुख और मन की शांति या आधिपत्य के लिए जिन परंपराओं को अपनाता है वह, उनमें जरूरत, विवेक और इच्छा व उत्तेजना के अनुकूल परिवर्तन होता रहता है, क्योंकि चाहता है वह। आदमी का स्वभाव और रुचि दोनों ही थिर या एकस्थ नहीं। उसके लिए परिवर्तन ही प्रगति है। अब यह प्रगति सार्थक हो तो सोने में सुहागा।
परन्तु नए पुराने का यह सामंजस्य इतना आसान भी नहीं क्योंकि स्वभाव से प्रगति और परंपरा, दो विपरीत भाव और प्रक्रिया हैं, प्रगति जहा आगे बढ़ने वाली है, परंपराएँ अपनी जगह पर थिर रहना पसंद करती हैं, एक रुका हुआ भाव रखती हैं, अक्षुण्ण चिरता में ही गौरव मानती है, प्रगति के लिए आगे बढ़ना और चलते जाना जरूरी है। प्रगति स्वभाव और गुण से गतिशील या चलायमान है और परंपरा ठहरी हुई, कभी-कभी तो अपने ही बिन्दुपर जकड़ी और बंधी भी। फिर समाज और मानव के हित में इन दोनों का सामंजस्य कैसे हो ? वैसे ही शायद, जैसे नदी पर्वत से निकलकर आगे बढ़ती है। उसके सारे तत्व और अंश लेकर, उसीसे सारी शक्ति और गति लेकर, परन्तु आगे का रास्ता जरूरत अनुसार, विवेक अनुसार खुद बनाती है। रास्ते की दुर्गमता और कठिनाइयों को जीतते हुए अपनी राह बनाकर चलने पर ही गन्तव्य तक पहुँच पाती है। प्रगति में अनुभव या इतिहास की समझ का समावेश हो, वर्तमान का आग्रह हो , तभी उसका गन्तव्य सुलभ, सार्थक और सफल हो पाता है। प्रगति हो या परंपरा दोनों में सार्थकता और सुलभता जरूरी है वरना पानी के बुदबुदों की तरह एक ही बदलाव की आंधी में यह अपना अस्तित्व खो बैठेंगी।
प्रगति और परंपरा दोनों के ही अपने-अपवे खेमे हैं। कट्टर समर्थक और विरोधी भी हैं, जिन्हें हम परम्परावादी या और्थोडौक्स और दूसरी तरफ प्रगतिशील या आधुनिक भी कहते हैं। इस बहस में पड़ने के पहले हमें याद रखना होगा कि पुराने के बिना नए की कोई पहचान नहीं, जैसे कि आज के बिना न तो गुजरा कल है और ना ही आनेवाला कल। पाना और खोना ही नियति है हमारी और इसी के बीच दौड़ती जिन्दगी में ही तलाशते हैं हम अपने सारे सुख ... जीवन का सम । आदिकाल से ही जो अच्छा लगा उसे परंपरा के नाम पर सहेज लिया है समाज ने और जो प्राप्त हो गया, उसे प्रगति का नाम दे, मील का पत्थर बना दिया। क्रम चलता रहता है । आज की प्रगति ही तो कल की परंपरा है और कल की परंपरा जब वक्त के साथ चलने में असमर्थ हो जाएगी, पुनः प्रगति का ही सहारा लेगी।
ऐसा नहीं कि सहज ही मिल जाता है सबकुछ। अनेक विमर्श, प्रयोग, शोध व निरंतर खोज के बाद ही हम वास्तविक प्रगति के सोपान पर कदम रख पाते हैं और इर्षा, घमंड व आलस से बचकर ही इस मंजिल का सुख संभव है। बिना सोचे-समझे, दूसरे की नकल , उसके जैसा बनने की चाहत हमें क्षणिक सुख भले ही दे, न तो यह संतुष्ट करेगी और ना ही गंतव्य की ओर गतिशील ही। प्रगति और परंपरा की बहस और टकराव, वाकई में बहुत पुराने है फिर भी सब जानते हुए भी, सभी एक अंधी दौड़ में फंसे हुए हैं। साथ-साथ आज भी कुछ समाज में ऐसे भी मिल जाएंगे, जो इस अंधी दौड़ में शामिल नहीं। दौड़ नहीं रहे। इनकी भी अपनी-अपनी वजह हैं। कुछ तो सम्यक दृष्टि व विवेक की वजह से, पर कई ऐसे भी हैं जिनकी दृष्टि अतीत पर ही अटकी रह गई है। ये सिर्फ पीछे ही देख पाते हैं। नए को समझना और अपनाना इनके बस की बात नहीं। माइक्रोवेव आया तो कड़ा विरोध हुआ, कम्प्यूटर आया तो विरोध हुआ और आज दोनों के ही बिना किसी का भी काम नहीं चल पाता। उदाहरण अनगिनित हैं जहाँ हम पहले तो अविष्कारों या परिवर्तन से डरे फिर वह हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गए। ऐसा ही हुआ है और आगे भी होता ही रहेगा।
परिचित से ही चिपके रहने की आदत की वजह से, खोने के डर से, हर नए को बुरा समझना भी तो ठीक नहीं। समाज में आज भी कई ऐसी परंपराएँ मिल जाएंगी जो प्रगति के पैरों की बेड़ियाँ हैं। जातपात, दहेज प्रथा, नारी और निर्बल का शोषण, फहरिश्त आज भी द्रोपदी का चीर-सी ही तो है, जो जीवन को असह्य और कटु बनाती हैं। साथ में कई ऐसी परंपराएं भी हैं जो आज अपना वर्चस्व खो चुकी हैं और टूटने के कगार पर हैं। को हैबिटेशन और समलैंगिक शादियों के चलते, व मशरूम की तरह उगते वृद्धाश्रमों को देखते हुए हम कह सकते हैं कि संयुक्त परिवार और शादी को भी इन टूटती या बदलती परंपराओं में गिना जा सकता है। यह बात दूसरी है कि यह मानव समाज की नींव परंपराएं हैं और आज भी इनकी जड़ें उतनी जर्जर व पूर्णतः खोखली नहीं हुईं।
वक्त की कसौटी पर खरी उतरती परंपराएं कभी प्रगति में बाधा नहीं बनती, क्योंकि सकारात्मक प्रगति परंपराओं का टिकाऊ व मूलतत्व लेकर ही आगे बढ़ती है, समाज में रचबस पाती है। अवरोधक नहीं , सहायक हैं यह एक दूसरे की। मुश्किल तब आती है जब स्वार्थ और ताकत के लिए परंपराओं को नया-नया रूप दिया जाता है। तोड़ा मरोड़ा जाता है। धर्म( कुधर्म) या काला जादू का चोला पहने, ये समाज में व्याधि-सी फैल जाती हैं। विकार पैदा करती हैं। मूढ़ जनता को डरा-धमका कर वश में करती हैं। अज्ञेय ने कहीं लिखा था-
“ दुख सबको मांजता है और चाहे स्वयं सबको मुक्ति देना वह न जाने, किंतु जिनको मांजता है उन्हें यह सीख देता है कि सबको मुक्त रखें। “
-अज्ञेय
हम कृतिम साधु-संत या महंतों की बात नहीं कर रहे , जो वाकई में बंधु हैं, साधु हैं , दूसरों के दुख से द्रवित हैं, कभी दूसरे को विवश नहीं करेगें, उसकी कमजोरी का फायदा नहीं उठाएगें। ऐसे जाल तो कायर व कपटी ही फैलाते हैं। कहीं प्रसाद के नाम पर नशीली दवाओं का उपयोग और फिर महिलाओं के साथ बलात्कार और व्यभिचार, तो कहीं काले जादू से शत्रु का नाश या फिर तुरंत ही धन प्राप्ति के लालच में तरह-तरह के कुकर्म, पशुओं और मानवों तक की बलि आदि। शत्रु के पुतले बनाकर उनमें पिन लगाना। अहित के लिए गुड़ियों के मुंह पर सिंदूर, राख और काजल मलकर घर के बाहर पेड़ों पर लटका देना आज भी जाने कितने देशों में प्रचलित है और लोगों को भयभीत भी करता है; विशेषतः सरल व नासमझ लोगों को। इनके जंतर-मंतर और यंत्र-तंत्र को आज भी हमने इतनी ताकत दे रखी है कि चाहे जिसे मसल सकते हैं ये, हमेशा के लिए शांत कर देते हैं अपने खिलाफ उठी आवाज को। हाल ही में पुणे के पास सतारा के रहने वाले डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर, जो कि मराठी साहित्य का एक बड़ा नाम थे और महाराष्ट्र में नरबलि, जादू टोना और काले जादू जैसी बुरी प्रथाओं के खिलाफ चलाए जा रहे आंदोलनों के अगुआ माने जाते थे, की हत्या कर दी गयी। ।
डॉ नरेन्द्र दाभोलकर के प्रयासों के चलते जल्द ही महाराष्ट्र सरकार प्रदेश में जादू टोना विधेयक लाने जा रही थी। दाभोलकर पिछले 16 साल से काले जादू के खिलाफ एक कड़े कानून की मांग कर रहे थे।उन के इस प्रयास को कई बार कुछ हिंदू राष्ट्रवादी संगठनो का विरोध भी झेलना पड़ा था। अंधविश्वास के बारे में उन्होने कई किताबे लिखी है।
वे पिछले 18 वर्षों से अंधविश्वास के खिलाफ़ कानून बनाने के लिए लगातार सक्रिय थे, अब सरकार द्वारा कानून बनाया तो दिया गया पर उनकी शहादत के तीन दिन बाद। ऐसे समाज कर्मी की हत्या वाकई में एक बेहद निंदनीय कृत्य है और अंधविश्वासों के ख़िलाफ़ वैज्ञानिक चेतना के बढ़ते क़दमों पर रूढ़िवादी ताक़तों का प्रायोजित प्रहार भी।
कुरीति और अंधविश्वास आज भी हमारे समाज को पूर्णतः क्षयग्रस्त किए हुए है। सबकुछ जानते-समझते भी हम जाने कब इन अंधविश्वास और जर्जर व बाधक परंपराओं के चंगुल से निकल पाएंगे और धूर्त व छद्मियों की दादगिरी को रोक पाएंगे। बढते अपराध और नैतिक क्षरण को देखते हुए जो इसके खिलाफ लड़ रहे हैं उनकी हत्या नहीं, उनका साथ देना आज हमारा नागरिक धर्म होना चाहिए, आखिर इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं हम !
' प्रगति के नाम पर
एक अंधी दौड़ सुख की तलाश में दुख देती परंपराएँ कितना कुछ खोया है हमने पाने की चाह में?
-शैल अग्रवाल
लेखनी का सितंबर अंक प्रगति और परंपरा पर है। कितने यह एक दूसरे के बाधक या पूरक हैं, कैसे इनमें एक सुखद सामंजस्य बिठाया जा सकता है जिससे बच्चे, बूढ़े, सभी खुश रह सकें। उम्मीद है सोद्देश्य यह अंक आपको पसंद आएगा।
कविता धरोहर में इस बार सुमित्रानंदन पंत और गीत व ग़जल में आपके प्रिय साहिर लुधियानवी। भावोद्वेलक कविताओं का खजाना है वर्तमान कवियों की कविता का स्तंभ कविता आज और अभी। माह की कवियत्री सविता भार्गव की कविताएँ ओस की नम बूंदों सी अंतस सींचती हैं। सितंबर का महीना हिन्दी के लिए भी पहचाना जाता है। विचार में हिन्दी के भविष्य पर कुछ ठोस विचार वरिषठ लेखकों के व मंथन में एक प्रवासी का दृष्टिकोण व दर्द हिन्दी को लेकर। माह विशेष में संकलन मां बोली एक से एक मनोहारी नई व पुरानी हिन्दी पर कविताओं को लिए हुए है। साथ में रवीन्द्र अग्निहोत्री, शैलेन्द्र चौहान, ओम निश्चल के विचारोत्तेजक आलेख व संजीव निगम का व्यंग्य लेकर आए हैं हम इसबार आप के लिए। इसके अलावा कमलेश्वर, शैल अग्रवाल, बीनू भटनागर, और पद्मा शर्मा की चार बांधे रखने वाली कहानियाँ हैं। धारावाहिक मिट्टी के चौथे भाग में प्रवासी जीवन कैसे विदेश की मिट्टी में पहचाना ढूँढता है, जड़ें जमाता है -पढ़ पाएंगे आप। अन्य सभी स्थाई स्तंभ-चांद परियाँ और तितली, पर्यटन, विविधा, वीथिका, व साक्षात्कार आदि में भी पठनीय, सूचनात्मक और विचारणीय सामग्री है। अंग्रेजी के हिस्से में भी बहुत कुछ उल्लेखनीय व रोचक है -कहानियाँ कविताएँ, विचार , बच्चों की सामग्री सभीकुछ।
यह तो थी इस अंक की बात, लेखनी का अक्तूबर अंक सद्भावना अंक है और भाषांतर विशेषांक है। अनुवाद कार्य से जुड़े और इसके शौकीन सभी मित्र कवि व लेखकों से अनुरोध है भारत व विश्व की अन्य भाषाओं के सुरुचिपूर्ण और उत्कृष्ट साहित्य से लेखनी के पाठकों का भी परिचय करवाएं और आपकी पसंदीदा रचनाओं का हमें इंतजार रहेगा।
सदियों से इन्सान यह सुनता आया है दुख की धूप के आगे सुख का साया है
हम को इन सस्ती ख़ुशियों का लोभ न दो हम ने सोच समझ कर ग़म अपनाया है
झूठ तो कातिल ठहरा उसका क्या रोना सच ने भी इन्सां का ख़ून बहाया है
पैदाइश के दिन से मौत की ज़द में हैं इस मक़तल में कौन हमें ले आया है
अव्वल-अव्वल जिस दिल ने बरबाद किया आख़िर-आख़िर वो दिल ही काम आया है
उतने दिन अहसान किया दीवानों पर जितने दिन लोगों ने साथ निभाया है
ख़ून अपना हो या...
ख़ून अपना हो या पराया हो नस्ले-आदम का ख़ून है आख़िर जंग मग़रिब में हो कि मशरिक में अमने आलम का ख़ून है आख़िर बम घरों पर गिरें कि सरहद पर ... रूहे-तामीर ज़ख़्म खाती है खेत अपने जलें या औरों के ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है टैंक आगे बढें कि पीछे हटें कोख धरती की बाँझ होती है फ़तह का जश्न हो कि हार का सोग जिंदगी मय्यतों पे रोती है इसलिए ऐ शरीफ इंसानो जंग टलती रहे तो बेहतर है आप और हम सभी के आँगन में शमा जलती रहे तो बेहतर है
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें...
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते वरना ये रात आज के संगीन दौर की डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें
गो हम से भागती रही ये तेज़-गाम उम्र ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र
ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब, होंठों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाब मेराज-ए-फ़न के ख़्वाब, कमाल-ए-सुख़न के ख़्वाब
तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी के, फ़रोग़-ए-वतन के ख़्वाब ज़िन्दाँ के ख़्वाब, कूचा-ए-दार-ओ-रसन के ख़्वाब
ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे ये ख़्वाब ही तो अपने अमल के असास थे ये ख़्वाब मर गये हैं तो बे-रंग है हयात यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-सन्ग है हयात
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते वरना ये रात आज के संगीन दौर की डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें।
मैं आरम्भ और अंत के बीच सुनता हूं जीवन का संवाद जहां मैंने तमाम लापरवाहियों के बाद जाना किसी बात का कोई छोर नहीं जो जहां थाम लें, बस वे उलझे सवाल जो हमनें नहीं किए उन्हें हल करना है किसी तरह यह बात साफ होगी हमनें अपने न होने को पराजित ही दिया आखिरकार
-नीलोत्पल
प्रथाएँ तोड़ आए
छोड़ आए छोड़ आए छाँव के क्षण बहुत पीछे छोड़ आए
बहुत मुश्किल था स्वयं को बाँध पाना मुट्ठियों में रेत का कैसा ठिकाना तोड़ आए, तोड़ आए पाँव से लिपटी प्रथाएँ तोड़ आए
थकन भी क्या कहें जो आँख लगती कहीं कोई रोशनी थी साथ जगती जोड़ आए, जोड़ आए अनकहे कल में कथाएँ जोड़ आए
लोग थे औ' जेब में थे कई चेहरे रास आए नहीं पर सपने सुनहरे मोड़ आए, मोड़ आए हमें मुड़ना था दिशाएँ मोड़ आए
-यश मालवीय
"परम्पराओं ओर आधुनिकता के बीच !"
मैं आज भी निभाती हूँ परम्पराएँ आधुनिकता का जामा ओढ़ कर भूल नहीं पाती हूँ मैं पीढ़ियों के परंपरागत विरासत में मिले संस्कार
याद रहता है मुझे करवा चौथ पर चाँद को अर्क दे व्रत् खोलना भादों की तीज पर निराहार उपवास करना सक्रांत पर बायना निकाल बुजुर्गों का सम्मान करना क्यूंकी वो आज भी मेरे जीवन का हिस्सा है
हवाएँ कितनी ही बदलीं संदर्भ भी ख़्वाब हुए निरंतर बदले पर अच्छा लगता है मुझे आज भी सावन में मेहंदी लगाना तीज चौथ पे शृंगार कर सिंदूर से मांग सजाना नाग पंचमी पर नाग को दूध पिलाना
आज भी शामिल है हर वृहस्पतवार पूजा कर केले की तुलसी पर दिया जलाना दीवाली पर लक्ष्मी मैया को मूंग चावल का भोग लगाना गोवर्धन पूजा पर गाय को गुड खिलाना
हर त्यौहार पर शृंगार कर और पैर छूकर पति के स्नेहिल आशीर्वाद में भीग तृप्त हो जाना साथ साथ अपने वजूद के लिए आज भी नापना होता है मुझे घर आँगन का ऊंचा आकाश
उसी कड़ी में घर गृहस्थी को संभालना कार चला बच्चों की टीचर पैरेंट्स मीटिंग से लेकर हर सामाजिक बंधन की रीति नीति निभा अपनी उपस्तिथि दर्ज कराना बुने हुए रिश्तों के बंधन निभाना आज भी शामिल है
सच जीवन के खोल से लिपटी हैं आज भी मेरे इर्द गिर्द परम्पराएँ और दहलीज़ पार खुले हैं दरवाजे जो आधुनिकता की चुनौतियों के चटक रंगो की सीमा रेखा भी हैं जो जरूरी हैं नए रास्तों के लिए उन्हे भी नापती हूँ
साथ ही परम्पराओं में भी अपने वजूद के सितारे आस्था पिरो टाँकती हूँ क्यूंकी यह परम्पराएँ आधुनिकता के साथ मिलकर आज भी मुझे विश्वास देती हैं भ्रमित नहीं करतीं!
-डॉ सरस्वती माथुर
पहले बहुत पहले
पहले बहुत पहले बहुत पहले से भी बहुत पहले एडम और ईव ने चुराया था एक सेव और सुधरे नहीं हैं हम आजतक।
-शैल अग्रवाल
जग के व्यापार से समभाव हुए हैं
दिन तो दिन रातों के भी अभाव हुए हैं भाव बहुत बेभाव हुए हैं उजियारे कितने अलगाव हुए हैं कितने अँधियारे कष्टों में काटे औरों के किस्से किससे समभाव हुए हैं अपने अपने किस्से हर कोई जीता है वक्त बहुत बीता बेहद ठहराव जिए हैं दूर निकल आए जब तक भ्रम टूटे सुख ने भी कितने घाव दिए हैं नहीं कहूँगा दुख मैं इसको भाव बहुत बेभाव हुए हैं
-शैलेन्द्र चौहान
आदमी
बहुत प्यार है अपनी चुप्पी से इसलिए नहीं कि चुप्पी साध लेना हल हो किसी समस्या का बल्कि इसलिए कि उसे कुछ काम नहीं है न किसी की प्रतीक्षा न किसी के लिए प्रेम न वह कहीं जाना चाहता है घर, न घाट जंगल तो कदापि नहीं न उसके पास बचा ही है कुछ आस कि कहीं बोया जाए यह बीज और रख सके कम से कम अपने भर फसल ।
इसलिए वह चुप है जब कभी वह भूल कर बैठता है और चला जाता है किसी चौराहे पे कुछ नजरें उठ जाती है उसकी ओर कुछ नजरें टटोलती है उसकी चुप्पी कुछ पत्थर आ लगतें हैं चेहरे पर लेकिन उसके चेहरे पर न कोई शिकन झलकता है न कोई झल्लाहट एक मुस्कान भर खेल जाती है उसके मासुम चेहरे पर वही मुस्कान जो खो गयी है आज हर आदमी के चेहरे से ।
-मोतीलाल राउरकेला
नदियाँ
इन सूखी नदियों का क्या करें उम्मीदों से भरी होती है किनारों को कुरेदती हैं अपने तेज इच्छा शक्ति वाले नाखूनों से निकाल लेती हैं अपने हिस्से की नमी
सोखती है दर्द उदासी हताशा हमारी यादों में मुस्कराती है पिछले साल कैसी भरी थी
उमड़ते बादलों में खोजती हैं अपना जीवन बरसेगा तो भर जाउंगी
बंटी हुई भी बांटती हैं अपना अकेलापन किनारों से पिछले साल अपने उपर बंधी पीली चुनरी को याद कर निस्तेज होती भी है कुछ देर को
पूरी रात चाँद इन लकीरों पर संभलता गिरता रहा इनकी दरकती छातियों में भी फूटते हैं वात्सल्य के सोते
नदियां सूखती है तो एक शहर खोने लगता है अपनी संस्कृति नाव तैरना भूल जाती है बच्चों की कश्तियों में नही सवार होते सपने ओ माझी रे .. की पुकार नही पहुचती इस पार से उस पार
-शैलजा सक्सेना
आइना
तिरक गया है यह आइना और बिखर गई हूँ किरच-किरच मैं कभी खुद को संभालती तो कभी अपने परिवेश को वातानुकूलित कार के शीशों के बाहर सड़कों पर सामान बेचते , भीख मांगते हर ट्रैफिक लाइट पर भूख की दुहाई देते रोते रिरियाते चेहरे दिखाई तो देते हैं पर छू नहीं पाते हैं हमें इनकी जरूरतों के लिए जगह नहीं हमारी दौड़ती-भागती जिन्दगी में अखबारों का काम कर देते हैं टी.वी. और कम्प्यूटर
और धूपबत्तियों के लिए शेष नहीं अब भगवान ना ही टिशू पेपर के लिए एक भी आंसू हमारी आंखों में काजल-सा घुल जाता है सब दूसरे का दुख-दर्द चेहरा या मन बिगाड़े बगैर भटक-भटक कर जीने के लिए अभिशप्त हैं ये आवारा बादल-से और हम खुद अपनी ही उगाई मरीचिकाओं में।
- शैल अग्रवाल
हम आदिम "लौह -खण्ड" हैं !!
झोंक दो भट्ठियों में खींचो / तानो पीटो पटको / टेढ़ा होने तक,
हम प्रतिकार नहीं करेंगे ...
हम पददलित होकर भी तुम्ही पर सजेंगे
निश्चित रूप से / नियंता तुम ही होगे
पर अपनी तीक्ष्णता से हम काट देंगे तुम्हे एक रोज़
घिस घिस कर खुद की धार बनाते हुए
हम आदिम "लौह -खण्ड" हैं !!-
-अमित आनंद पाणडेय
वो हाथ बांधे खडे हैं
वो हाथ बांधे खडे हैं सर झुकाए बड़ी भीड़ है चारों तरफ एक पेड़ के ठूंठ के नीचे वो आज सबके सवालों का जबाब देने वाले हैं
पहला सवाल ..नदियाँ अपने सूखने का कारन जानना चाहती है स्कूल के बच्चे अपने मरने का पेड़ अपने भूरे बचे शाखों की हरी पत्तियों का किसान भी उन पेड़ों के बारे में जानना चाहते हैं ... जो गर ना रहे पेड़ तो कहाँ करेंगे हम आत्महत्या एक जगह तो सुरक्षित उन्हें भी दो तिरंगे में लिपटे जवान अपने साथ होने वाले धोखे का पहाड़ नदी झरने खेत खलिहान जिन्दा मुर्दा इंसान सबके हाथ में सवालों की तख्तियां हैं
पर उनके हाथ में सत्ता की बागडोर है उनकी आवाजें बुलंद है जब भीड़ उनके आस पास बढ़ने लगती हैं उनके सर उठ जाते हैं हाथ भी आवाज भी उनके आँखों के इशारे रौद दिए जाते हैं सवाल वो एक मुर्दा देश चलाते हैं हम मोमबत्तियों में अपनी संवेदना जलाते हैं
छत विछत नदियाँ पहाड़ खेत किसान जवान बच्चे
अपने हाथ की तख्तियां झुकाए ये धरती छोड़ कर चले जाते हैं .
-शैलजा सक्सेना
एक टुकड़ा रोटी का .....
क्या तुम बता सकते हो - रोटी कैसे बनतीहै मुझे मालूम है - तुम कहोगे - तवे पर सेंकी जाती है और तंदूर पर तो बढ़िया पकती है ,
लेकिन नहीं -नहीं -नहीं तुम नहीं जानते ,इसका पकना , नेता इसे पकी-पकाई ही खाते हैं और खाकर कभी डकार भी नहीं लेते .
अपने घर कीलुटिया -बिटिया गिरवी रखकर बेंच कर अपने तन की बोटी -बोटी को खाता है ,ये मेहनतकश ..
एक टुकड़ा रोटी का .....-
गोपेश वाजपेयी
कब होगा प्रभात
मानवता का तिलक लगा के छाती पर सूरज खुदवा के चुपके-चुपके उतर रही है साम्प्रदायिक रात हमारे भारत में । कब होगा प्रभात हमारे भारत में ।...
धर्म-कर्म की ओढ़ के चादर, रावण को सीने से लगाकर, ज़ोर-शोर से फैल रही है साम्प्रदायिक आग हमारे भारत में । कब होगा प्रभात हमारे भारत में ।
वोट पे तिरछी नज़र टिका के, झंडे पर श्रीराम लिखा के, ठोक के छाती निकल पड़ी है हिटलर की बारात हमारे भारत में । कब होगा प्रभात हमारे भारत में ।
मन्दिर-मस्जिद तुड़वाती है, भाई-भाई को लड़वाती है, देखो कितनी शातिर हो गई पूँजीपति जमात हमारे भारत में । कब होगा प्रभात हमारे भारत में ।
-बल्ली सिंह चीमा
विकास की थ्योरी
बन्दर से आदमी और आदमी से फिर खूंखार जानवर क्या यही थी तुम्हारी विकास की थ्योरी डार्विन?
-शैल अग्रवाल
सच के साथ
सच, बस सच, पूरे तीखेपन के साथ दांतो के इस वाक्य के आसपास जोर-जोर से चिल्लाते नजर आते हैं आज के खबरिया चैनल लेकिन, ये चैनल धनपशुओं की दुकानें हैं... जिनमें घुन लगी मानसिकता के लोग परोस रहे हैं ऊबाऊ और बासी खबरें नंगे संच के साथ
-महेश चौधरी
कल रात मेरे सपने में
कल रात मेरे सपने में
गांधारी ने इंकार कर दिया आँखों पर पट्टी बाँधने से
एकलव्य ने नहीं काटा अपना अँगूठा द्रोण के लिए
सीता ने इंकार कर दिया... अग्नि-परीक्षा देने से
द्रौपदी ने नहीं लगने दिया खुद को जुए में दाँव पर
पुरु ने नहीं दिया अपना यौवन ययाति को
कल रात इतिहास और "मिथिहास" की कई ग़लतियाँ सुधरीं मेरे सपने में
सुख दुख के झिलमिलाते वलय 'कामना की मारी मैं झील हूँ/तुम शहर भोपाल हो मुझमें प्रतिबिम्बित।'
अचरज है कि प्रेम की एक अलक्षित दुनिया बसाए सविता भार्गव को स्त्री-जीवन दुखों का घर लगता है। तभी तो वह कहती है: 'औरत अंधकार की यातना है/ देह है परछाई हैं / रंगीन तड़प है मछलीघर की।' एक ऐसी ही अभिव्यक्ति 'सजा' में है: 'दिन भर बर्तनों के साथ बज रही हूँ/रात के लिए सज रही हूँ/यही मेरी सजा है।' लेकिन आखिरी बीवी हूँ तुम्हारी को कुछ अलग ढंग से पढ़ा जाना चाहिए। दिन से रात तक परिवार के लिए खटती स्त्री की पीड़ा का यह जैसे इकबालिया बयान और माफीनामा हो। आज के उदार वातावरण में भी स्त्रियॉं जैसे दाम्पत्य के कटघरों में कैद हैं---महज कुछ खुशी के लिए अपने अस्तित्व को भुलाती हुई। यह कविता सपाट लहजे में अपनी पूरी कहानी बयान कर देती है। हालॉंकि कुछ अनुगूँजें भी उनमें सुनी जा सकती हैं समकालीन कवयित्रियों की ।
इस स्तंभ के अंतर्गत नंद किशोर आचार्य, अरुण कमल, वर्तिका नंदा, भगवत रावत, विनोद कुमार शुक्ल, ओम भारती, प्रतापराव कदम, संजय कुंदन, तजिन्दर सिंह लूथरा,पुष्पिता अवस्थी, ज्ञानेन्द्रपति, नरेश सक्सेना, अशोक वाजपेयी, एकांत श्रीवास्तव और सवाईसिंह शेखावत के बाद प्रस्तुत है मध्यप्रदेश की सुपरिचित कवयित्री सविता भार्गव के हाल ही में प्रकाशित पहले कविता संग्रह ' किसका है आसमान' पर डॉ.ओम निश्चल का आलेख।
सुख दुख के झिलमिलाते वलय
किसका है आसमान
कवयित्री: सविता भार्गव
राजकमल प्रकाशन प्रा.लि.
दरियागंज नई दिल्ली
मूल्य 200 रुपये
''मैं एक उज्ज्वल काया अँधेरा मेरी केश राशियों में ठहरा है वही जो तुम्हारे आराम की जगह है।''
पहला संग्रह किसी भी कवि के लिए फूल की तरह होता है। चाहे वह तनिक देर से ही आए। उसमें भी उसे देर से प्राप्त संतान-सुख जैसी सुखद अनुभूति होती है। सविता भार्गव का पहला कविता संग्रह 'किसका है आसमान' भी कुछ देर से आया है लेकिन इसमें पहलौठी संतति जैसा सुख है। स्वभाव से कोमल, स्त्री के मिजाज के अनुरूप सविता भार्गव की कविताओं को देख कर लगता है कि यह कवयित्री जीवन से प्रेम करने वाली कवयित्री है। वह स्त्री विमर्श की राह पर चल निकली उन तमाम कवयित्रियों से अलग है जो शुरु से ही पुरुषों को स्त्रियों का विलोम समझती आई हैं। इसीलिए सविता भार्गव के यहॉं न केवल पौरुष से अभिभूत जीवन के कुछ निजी क्षणों को थाती मान कर सँजोया गया है बल्कि मातृत्व की रूमानियत को भी कुछ उसी तरह सिरजा गया है जैसे अपने संग्रह 'पानी का स्वाद' में नीलेश रघुवंशी ने। इस तरह सविता जीवन और कविता को एक उत्सव की तरह जीने वाली कवयित्री प्रतीत होती हैं।
कविता हमारी चेतना की समुज्ज्वलता का पर्याय है। वह अँखुवाती है तो जैसे भूगर्भ से एक उजास-सी फूटती है। अचरज नहीं कि चेतना के ऐसे ही रौशन क्षणों में कविवर मलय ने कहा होगा: कविता एक उजेरे की नसेनी है। यानी उजाले की सीढ़ी। सविता के काव्य में उजाले की सीढ़ियॉं दीखती हैं, कोमल कल्पनाओं में उद्दीप्त सुख-दुख के वलय झिलमिलाते हैं। नन्हा सुख जैसी कविता लिखते हुए कवयित्री अपने ही बच्चे की उँगलियों, गुदगुदी हथेलियों, दूधियॉं दॉंतों, ऑंखों, हँसी और आवाज़ में विलीन हो जाती है। मातृत्व के इस वैभव को जीते हुए वह कविता को ममता की इबारत में बदल देती है। कदाचित इन्हीं गुणों के कारण केदारनाथ सिंह जैसे कवि को उसकी कविता की ये पंक्तियॉं छूती हैं: 'मेरी हथेलियों में अब भी थरथराता है/उसके गालों का पहला स्पर्श/ मैंने छुआ था जैसे पहली बार/अपने से अलग अपने को।' उन्होंने सविता की कविताओं में स्पर्श का गुण पाया है। चाक्षुष अनुभूति की चर्चा प्राय: होती है, स्पर्श के गुण की नहीं। जबकि स्पर्श गुण कविता को उससे ज्यादा संवेदी और अनुभूति-प्रखर बनाते हैं। हवाओं के पार हिलता है एक नन्हा हाथ विदा के लिए---कहते हुए कवयित्री अपने शिशु से विलग होने के जिस भाव को यहॉं व्यक्त करती है वह लगभग सबके जीवन का एक सहज और अविस्मरणीय अनुभव होता है जिसे देखता हर कोई है, पकड़ पाना ऐसे क्षणों को शब्दों में सबके लिए संभव नहीं होता।
सविता भार्गव की इन कविताओं की एक दूसरी विशेषता है, एक स्त्री की सहज प्रेमानुभूति का बखान। शायद कविता ही वह कोना होता है जहॉं कवि अपने दिल की हर बात खुल कर कहता है। सविता अपनी प्रेमानुभूति को परचम की तरह आकाश में लहराती है। उनके अनुभव के आकाश का अपना चांद है, उसे चाहने और 'मुझे चॉंद चाहिए' कहने का अपना सलीका। पहचानना मुश्किल नहीं कि वे जिस पॉंच अक्षर वाले शख्स से प्रेम करती हैं वह कौन है। वह कहती हैं तुम्हारे नाम की पंचाक्षरी खोल देती है पॉंचों घोड़ों की लगाम। और जब लगाम खुल जाए तो प्रणयी वल्गाओं को कौन थामे! तभी टेसुओं में देह की आग दहकती है और नीले वसन से बादलों के टुकड़े झाँकते हैं। इसी उन्माद के वशीभूत हो कवयित्री कह उठती है: 'प्यार तराशो मुझे/ जैसे कोई हुनरमंद कारीगार तराशता है हीरे को।' उसकी उनींदी ऑंखों में उतरती हुई धूप की तरह प्रिय के पदचाप की आहट सुनाई देती है और होठों से यह धीमी बुदबुदाहट: 'डूब रही है मेरी नींद तुम्हारे भीतर/धीरे से।' 'झील:ग्यारह कविताऍं' तो जैसे कवयित्री के स्त्रीत्व का मानवीकरण हों। एकदम झील-के -से स्वभाव से तुलनीय कवयित्री पानी में कंकड़ फेंकने के कंपन तक को गहरे महसूस करती है, झिलमिल झिलमिल झील-सा ही तो है स्त्री का जीवन। आखिर कह ही उठती है वह: 'कामना की मारी मैं झील हूँ/तुम शहर भोपाल हो मुझमें प्रतिबिम्बित।' पर झील को लेकर होने वाली सियासत उसे दुखी करती है।
अचरज है कि प्रेम की एक अलक्षित दुनिया बसाए सविता भार्गव को स्त्री-जीवन दुखों का घर लगता है। तभी तो वह कहती है: 'औरत अंधकार की यातना है/ देह है परछाई हैं / रंगीन तड़प है मछलीघर की।' एक ऐसी ही अभिव्यक्ति 'सजा' में है: 'दिन भर बर्तनों के साथ बज रही हूँ/रात के लिए सज रही हूँ/यही मेरी सजा है।' लेकिन आखिरी बीवी हूँ तुम्हारी को कुछ अलग ढंग से पढ़ा जाना चाहिए। दिन से रात तक परिवार के लिए खटती स्त्री की पीड़ा का यह जैसे इकबालिया बयान और माफीनामा हो। आज के उदार वातावरण में भी स्त्रियॉं जैसे दाम्पत्य के कटघरों में कैद हैं---महज कुछ खुशी के लिए अपने अस्तित्व को भुलाती हुई। यह कविता सपाट लहजे में अपनी पूरी कहानी बयान कर देती है। हालॉंकि कुछ अनुगूँजें भी उनमें सुनी जा सकती हैं समकालीन कवयित्रियों की । जैसे 'अंधेरा मेरी केश राशियों में ठहरा है/वही जो तुम्हारे आराम की जगह है।' याद करें अनीता वर्मा को जिसने लिखा है: 'अभी मैं प्रेम से भरी हुई हूँ / अंधकार अभी मेरे सिर्फ़ मेरे केशों में है।' एक तरफ तो वह इस बात के लिए मुंतजिर कि 'मैं ऐसे ही देखती रहना चाहती हूँ उस दिशा में / जहॉं से हर पल लगे कि डूबते जा रहे हो तुम मेरे भीतर', दूसरी तरफ सृष्टि के क्रियाकलापों का बोध कराती हुई उसकी कविता सृष्टि जगूड़ी की कविता 'वह शतरूपा' की याद दिला देती है। अनुरागमयी दृष्टि से सींचती हुई स्त्री के भीतर वस्तुत: एक सृष्टि का विस्तार समाहित होता है।
सविता ने यहॉं कुछ चरित्रों को भी रचा है। जैस बगिया वाली चाची, बड़ी बहन, बेगम अख्तर, बड़ी बुआ आदि। इन चरित्रों के भीतर झॉंक कर देखें तो कवयित्री की सूक्ष्म दृष्टि का पता चलता है। यहॉं तक की झील पर कविता लिखते हुए वह अंत में झीलमय ही हो उठती है। झील की झिलमिल में स्त्री का जीवन झिलमिलाता दिखता है। उसे लगता है वह कामना की मारी झील हो उठी है--विस्फारित ऑंखों की तरह। सविता भार्गव की भाषा स्थूलकाय नहीं है। वह संवेदना और अनुभूति के सहकार से जन्मी है। उनका कवित्व केवल कुछ रतिश्लथ बिम्बों वाली(जिनमें चूमने, सहलाने, देह के भीतर उतरने, स्तनों के सॉंवले गुलाब को चूमने और प्यार को हीरे की तरह तराशने इत्यादि के प्रसंग हैं) कविताओं से नहीं ऑंका जा सकता है या इस निर्वचन से भी कि ' न हो यह वासना तो जिन्दगी की माप कैसे हो'(भारती); बल्कि इस प्रतिश्रुति में ही कहीं उसका कवि ठौर पाता है: 'ओ मेरे समय के हाथी जैसे विराट दुखो!/ मैं महावत की तरह सवारी करना चाहती हूँ तुम पर।' कवि का आत्मकथ्य उसकी भूमिका या वक्तव्य नहीं होता। कविता ही उसका आत्मकथ्य है, यही है जो उसके मिजाज की गवाही देती है: 'आज रात बारिश जाग रही है/ चकित है अंधकार/ कि मैं हूँ उसकी सहचरी/ जागती हुई साथ उसके।' भवानी प्रसाद मिश्र ने 'चकित है दुख' लिखा था, यहॉं 'अंधकार चकित है', पर जिस ऊर्जा से कवयित्री अपने पिता की हथेलियों में अपने स्पर्श की छाप टटोलती है, उसी ऊर्जा से वह नन्हे नन्हे सुखों को बीनती बटोरती है और कठिन समय में भी सुख दुख के झिलमिलाते वलय से निराश नहीं होती। अच्छी कविता शायद इसीलिए नाउमीदी के बीच उम्मीद की अलख है।
तुमने छुआ मैं नदी हो बह गई प्यास के पहाड़ों तक चूमा तुमने मुझे मैं तपा आई धूप को कानों में कुछ कहा तुमने हवा बन मैं उड़ा लाई शहद का बादल सहलाई जब तुमने मेरी देह धरती हो अॅंखुआ गई मैं ओर छोर उतरे तुम मुझमें आसमान-सी नीली आभा-सी भर गई मैं चांद मेरी हथेली पर था और तारे मेरी आंखों में मैं बदल गई एक दिन घोंसले में एक दिन नन्हें नन्हें चूजों ने अपने पंख खोले और मैं आसमान हो गई।
औरत
औरत अंधकार की यातना है धीरे-धीरे खोल रही है अपना जूड़ा धीरे धीरे सँवार रही है केश कुछ याद कर रही है धीरे धीरे कुछ भूल रही है धीरे-धीरे
देह है परछाईं है रंगीन तड़प है मछलीघर की।
अचानक
तराशते तराशते एक पत्थर उभर आती है एक सूरत सुधारते सुधारते संवेदनाओं के हिज्जे अचानक कौंध जाती है कोई कविता रंगों से खेलते खेलते बन जाती है रंगों की एक भाषा लड़ते भिड़ते एक दिन समझ में आता है जीवन।
सज़ा
दिन भर बर्तनों के साथ बज रही हूँ रात के लिए सज रही हूँ यही मेरा सज़ा है।
नदियॉं
जाने किसने कहा था नदियां दुखी करती हैं नदियां दुखी करती हैं चली जाती हैं छोड़कर नदियां बदल लेती हैं अपने रास्ते कई बार पर न रह कर भी बनी रहती है उनकी स्मृति जैसे घर से चले जाने के बाद भी बेटी बनी ही रहती है घर के किसी सूने कोने में।
निशान
तुम्हारी छुवन के वो निशान जो धीरे धीरे धुँधले होकर मिट गए पलकें बंद करके अब भी देख सकती हूँ उन्हें कभी कभी लगता है बंद पलकों से निकाल कर सजा लूँ वापस देह पर।
आज जिस नदी में खड़ी होती हूँ
एक नदी में बह गया था बचपन वह नदी बह गई दूसरी नदियों में आज जिस नदी में खड़ी होती हूँ दिखाई पड़ता है उसी में मेरा बचपन।
आतंकी ख़तरा
मैं एक देह हूँ मैं एक देश हूँ
अखबारों में ख़बर है देश भर में आतंकी ख़बर।
आराम की जगह
मैं एक उज्ज्वल काया अंधेरा मेरी केश राशियों में ठहरा है वही जो तुम्हारे आराम की जगह है।
है सींचा सृजन को जिसने, बनी वह पावनी गंगा. अँधेरे रास्तों पर मधुरतम सहगान है हिन्दी. क्यों विकृत हो गयी है आज, माँ के भाल की बिंदी . कहाँ तू खो गयी हिन्दी?-- हिंदी मेरी भाव -भावना की भाषा है ,मेरी पहचान है , मेरी अस्मिता और मेरा सम्मान है ,जिस प्रकार माँ बोलना सिखाती है ,चलना सिखाती है उसी प्रकार मातृभाषा हिंदी ने भी मुझे ,मेरे सृजन का पहला पाठ पढाया , ऊँचे नीचे संघर्ष के रास्तों पर मुझे अध्ययनशील बनाकर चलना सिखाया -आज मै कह सकती हूँ की हिंदी मेरी दूसरी माँ है--कभी कभी मन विचलित जरुर होता है जब भाषा के विवाद को लेकर बड़े बड़े सत्ताधीशों ,बुद्धिजीवियों को बहसें करते देखती हूँ या सुनती हूँ ,जो भाषा हमे प्रबुद्ध बनती है ,समाज में अपनी पहचान हेतु सक्षम बनाती है --वह विवाद का कारण कैसे हो सकती है ? ''माँ 'चाहे जिस भाषा में बोला जाये उसका अर्थ एक ही होता है-कितना अच्छा होता यदि हम अनेक भाषाएँ जानते !-- विश्व के और समीप आपाते ,हमारी हिंदी ने दुनिया के देशों से हमारी दूरी कम की है ,हम कहीं भी जाएँ ,वहां की भाषा न भी जानते हों ,केवल हिंदी भाषा का ज्ञान उनसे संपर्क का माध्यम बन सकता है --क्या यह अपने आप में सुखद आश्चर्य नहीं ? ,संसार का सम्पूर्ण ज्ञान हमारी भाषा में निहित है ,आज तो हिंदी की कूट भाषा के निर्माण ने उसे तकनीकी होने की उपाधि भी दे डाली है,इस समय इस आलेख को कम्प्यूटर पर टाइपकरते हुए भी गौरवान्वित हूँ कि मै हिंदी भाषा में अपनी बात आप तक पहुंचा सकती हूँ ,प्रसिद्द रूसी विद्वान् चेलिशेव ने कहा था ''हिंदी को एक विश्व भाषा बनाने की समस्या तभी हल होगी जब वह अपने देश में उचित स्थान ले पायेगी '' हिंदी भारत की आत्मा है, पूरे भारत को एकता के सूत्रमें बाँधने वाली, हिमालय से लेकर कन्या कुमारीतक हमारी आवाज पहुँचाने वाली समपर्क भाषा हिंदी ही है जैसा की पूर्व राष्ट्रपति वी वी गिरी ने कहा था ''हिंदी के बिना भारत की राष्ट्रीयता की बात करना व्यर्थ है ''इसलिए बंगला भाषी होते हुए भी सुभाष चन्द्र बोस और गुजरती भाषी गाँधी जी ने इसे राष्ट्रभाषा की संज्ञा से अभिहित किया था ,''गाँधी जी हिंदी में लिखना पढना और बात करना अधिक पसंद करते थे ,जब मै बिनोबा जी की पुस्तक पढ़ रही थी तब उनके विचारों सेअत्यंत प्रभावित हुई -- उन्होंने लिखा था ---'' यदि मेने हिंदी का सहारा नही लिया होता तो कश्मीर से कन्या कुमारी तक और आसाम से केरल तक के गाँव गाँव जाकर में भूदान का क्रन्तिकारी सन्देश जनता तक न पहुंचा सकता '' बंगला के लोकप्रिय लेखक बंकिम चन्द्र चात्तोप्ध्याय स्वयम इसे स्वीकारते हुए कहते हैं --''हिंदी भाषा की सहायता से भारत वेर्ष विभिन प्रदेशों के बीच जो लोग एकता स्थापित कर सकेंगे वे हीसच्चे भारत बंधू से अभिहित किये जाने योग्य हे ''--आज भारत में उत्तर -दक्षिण के विवाद में भाषा भी एक मुख्य मुद्दा है परन्तु किसी ने भी जनता के बीच जाकर हिन्द की प्रतिष्ठा और उसके प्रति लोगों के प्यार को पनपते हुएनहीं देखा --बस भड़काऊ भाषण और बयानबाजी से उनके मानस को प्रभावित करने की निरर्थक और दुराग्रह पूर्ण कोशिशें की जाती रही हैं ,लेखक रामचंदर राव कहते हैं -''दक्चिन के प्रान्तों में हिंदी के प्रति आस्था बढती जा रही हे और ये कहना कि वहां की जनता हिंदी के खिलाफ हे , उचित नही हे-'' हिंदी अन्य देशो के साथ भारत के सांस्कृतिक संबंधो की कड़ी के रूप में भी कार्य कर रही है जब तक देश का कामकाज अपनी भाषा में नही चलेगा तब तक हम यह नही कह सकते कि देश में स्वराज्य हे ---हिंदी के पास अपने शब्द कोष और अभिव्यक्ति की ऐसी सामर्थ्य हे जो अंग्रेजी से किसी प्रकार कम नही हे ,पूर्व राष्ट्रपति स्व ज्ञानी जैल सिंह ने अत्यंत आदर व् गर्व के साथ हिंदी को देश की भाषा के पद पर प्रतिष्ठित किया था ---जो देश अपनी माँ और अपनी मातृभाषा का आदर नही कर सकता दुनिया में उसकी कोई इज्जत नही करेगा ''--प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के नाम पर राष्ट्रीय -स्थानीय एवं प्रादेशिक स्तर पर हिंदी के पखवाड़ों की घोषणा करना ,कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति --और राजनेताओं- बुद्धिजीवियों द्वारा खुले मंच से --कुछ वादे दोहराए जाना ही हिंदी के विकास के लिए प्रयाप्त नहीं है ,सच्चे मन से हिंदी की खोई प्रतिष्ठा वापस लानी होगी वह प्रतिष्ठा जो हिंदी ,संस्कृत के विख्यात रूसी विद्वान् फादर कामिल बुल्के को भी गर्व से भर देती है --''संसार की कोई ऐसी भाषा नही हे जो सरलता और अभिव्यक्ति की क्षमता में हिंदी की बराबरी कर सके ''--इस सन्दर्भ में कहीं सुने एक रोचक प्रसंग की भी चर्चा करना चाहूंगी --''छपरा के राजेन्द्र कालेज में प्रो. मुरलीधर श्रीवास्तव जी थे जो हिंदी के प्रबल पक्षधर थे --अंग्रेजी का विरोध और हिंदी का समर्थन करनेवालेकुछ क्रुद्ध छात्रों का दल घूम घूम कर अंग्रेजी में लिखे पोस्टर आदि फाड़ रहा था ,उन्होंने उन्हें बुलाकर कहा ---''तुम्हारे और मेरे विरोध में बस इतना ही अंतर है कि तुम अंग्रेजी हटाना चाहते हो और मै हिंदीकोबढ़ाना चाहता हूँ ताकि अंग्रेजी रहे परन्तु हमारी हिंदी उनसे भी बढ़कर श्रेष्ठ हो --आगे बढे ,हम हिंदी को अपनाएं अंग्रेजी स्वतः दूर हो जाएगी ''--आज हमारी स्थिति भी ऐसी ही है ,हम अंग्रेजी में हिंदी का समर्थन अपरोक्ष में उसके मुकाबले अन्य भाषाको प्रश्रय दे रहे हैं -वस्तुतः हमारा विरोध दूसरी भाषाओँ से नहीं होना चाहिए बल्कि अपनी हिंदी भाषा केअधिकाधिक प्रयोग और लिखने बोलने पढने ,अभिव्यक्ति के सशक्त साधन के रूप में अपनाकर उसे करना चाहिए ताकि सही मायने में वह ''राष्ट्र भाषा ''बन सके , जो गाँधी के सपनो में थी और थी सुभाष की आजादी, अपनी धरती का गौरव है, भारत माँ की यह शहजादी भारत माँ की यह शहजादी . अपने ही घर में उपेक्षा का शिकार न हो,हम इसे हृदय से अपनाएं ,इअसे बोलकर ,लिखकर सृजन के माध्यम से ,इसकी अस्मिता के वाहक बनें --यही मेरी -आपकी --सम्पूर्ण भारत की शुभकामना हो -- आओ कुछ ऐसा कर जाएँ , यह बने पूजिता विश्वमना ... यह श्रेष्ठ बने, विश्वस्त बने, अधिकार भरें इस पर अपना ---पद्मा मिश्रा
सत्ता की भाषाओं से हिंदी का हमेशा ही विरोध रहा । इस भाषा संघर्ष से होते हुए हिंदी निकली है । इस दृष्टि से देखें तो हिंदी का वर्तमान अच्छा ही नहीं, बेहतर है । पर जब बात भविष्य की आती है तो मुझे बहुत ज्यादा आश्वस्ति नहीं होती । कारण यह है कि जो हमारी बिलकुल बच्चों की पीढ़ी है और चाहे वह किसी भी वर्ग की क्यों न हो, अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा-व्यवस्था में डाली जा रही है । भविष्य में जो ये बच्चे पढ़-बढ़ कर निकलेंगे तो क्या भविष्य होगा यह आप सोच सकते हैं । सच पूछो तो आज जो हिंदी क्षेत्र की एकदम नई पीढ़ी है वह आने वाले समय में शुद्ध हिंदी भी नहीं बोल पाएगी । जाहिर है, लेखन और लेखकों के लिए भी संकट है । कन्नड़ के महान लेखक भैरप्पा ने एक व्याख्यान में कहा था, "मुझे दुख है कि मेरे बच्चे मेरी पुस्तकों को अंग्रेजी के माध्यम से पढ़ेंगे क्योंकि उनको मूल कृति की भाषा समझ नहीं आएगी ।" हिंदी का बड़ा लेखक भी भैरप्पा की तरह ही सोच सकता है । अब तो देश की सरकारें ही चाहें तो मातृभाषा को उसका हक दिलवा सकती हैं ।
-डॉ. विश्वनाथ प्रसादतिवारी, उपाध्यक्ष, साहित्य अकादमी
हिंदी भाषा के विकास की गति बेहद उत्साहवर्द्धक है । देश क्या, विदेश क्या, हिंदी क्षेत्र क्या, अहिंदी क्षेत्र क्या हर जगह यह गति पा रही है लेकिन फिर भी यदि हिंदी को उसका हक, उसका सही स्थान आज तक नहीं मिल पाया है तो जाहिर है कि कहीं न कहीं गतिरोध उत्पन्न करने वाले कारक भी बहुतायत में मौजूद हैं और यह हर स्तर पर मौजूद हैं । भाषा के स्तर पर भी और समाज के स्तर पर भी । भाषा के स्तर पर विशुद्धतावादी सोच से ग्रसित व्यक्ति तो समाज के स्तर पर हर चीज में राजनीति करने की मानसिकता से ग्रसित लोग इसे रोकने वाले कार्य कर रहे हैं । लेकिन इतना तय है कि यह भाषा रुकने वाली नहीं है । बाजार यदि अंग्रेजी को बढ़ावा देने का काम करता है तो देश हिंदी के प्रति अपना प्रेम कुछ इस तरह से प्रकट करता है कि बाजार को अपनी दिशा बदलनी पड़ती है। विशुद्धतावादी मानसिकता भाषा में अंग्रेजी या प्रांतीय भाषाओं के शब्दों की घुसपैठ पर त्योरियां चढ़ाती है तो विज्ञापन और उसे सुनने-सराहने वाली जनता उसका स्वागत करती है, उसे अपनी जुबान पर चढ़ाकर लोकशक्ति का परिचय देती है ।
दरअसल, हिंदी हमारी अस्मिता से कुछ इस कदर जुड़ी हुई है कि भले ही इसका भान हम स्वीकार करने से कतराते हों लेकिन अहिंदी भाषी क्षेत्रों और विदेशों में इस विश्वास के कारण हिंदी को सहेजने-संभालने का खूब काम हो रहा है । केरल में हिंदी के उच्चस्तरीय शिक्षण पाठ्यक्रमों में जो हिंदी साहित्य सूचीबद्ध किया जा रहा है वहां गुणवत्ता ही एकमात्र मानक है । जाहिर है, वहां पाठ्यक्रमों में बिलकुल नई पीढ़ी तक के रचनाकारों को स्थान मिल रहा है । वहां के हिंदी साहित्य के पाठक अरुण प्रकाश, संजीव, उदय प्रकाश और उनसे भी बाद की पीढ़ी के युवा रचनाकारों के न सिर्फ नाम बल्कि उनकी रचनाओं से परिचित हैं । यकीन मानिए जापान में टोक्यो यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के अध्यक्ष फूजीयू को आधुनिक पीढ़ी के हिंदी रचनाकारों के नाम यहां के किसी सुशिक्षित व्यक्ति से अधिक पता हैं । इंग्लैंड में शेक्सपीयर के घर में स्थित संग्रहालय में नागरी लिपि में लिखा हुआ है कि "यह शेक्सपीयर का निवासस्थान है" तो आखिर हिंदी विभिन्न दिशाओं में कैसे फल-फूल रही है । निश्चित तौर पर कोई अदृश्य ताकत है और वह निश्चित तौर पर हमारी सांस्कृतिक चेतना की ताकत ही होगी जो ऐसा हो रहा है । विश्व साहित्य सम्मेलनों को भले ही सरकार का अपेक्षित सहयोग न मिल रहा हो लेकिन फिर भी इन प्रयासों ने हिंदी को विश्व फलक पर स्थापित किया है ।
सच पूछें तो हिंदी पर मातमपुर्सी करने वाले वे ही लोग हैं जो किन्हीं कारणों से हिंदी का मातम मनाकर अपनी जेबें भरना चाहते हैं अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं । चाहे वे हिंदी के तथाकथित मठाधीश हों या कि बड़े प्रकाशक या सौ सालों से चली आ रही संस्थाएं । ये साहित्यकारों और पाठकों के बीच खड़े होकर एक-दूसरे का हक मारने की जुगत में ही लगे रहते हैं । इस देश में अंग्रेजी को भी एक मिशन के तहत ही तो बढ़ाया गया । बावजूद आज हिंदी के छह अखबार ऐसे हैं जिनकी पाठक संख्या एक करोड़ से ऊपर है । आज से बीस साल पहले पाठकों की संख्या के आधार पर तय अखबारों की सूची में अंग्रेजी के अखबार होते थे । जाहिर है, भाषा बढ़ रही है । हां, साहित्य का बायकॉट जो मीडिया ने किया हुआ है, यह जरूर चिंताजनक है ।
रवीन्द्र कालिया, वरिष्ठ निर्देशक ज्ञानपीठ
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दो चीजें चिढ़ पैदा करती हैं । एक तो बहुत निराशावादी दृष्टि । दूसरे अपने आप को गाली देना कि हम हिंदी वाले ऐसे हैं, वैसे हैं, गिरे हुए हैं। जैसे हम हिंदी वाले समाज से कटे हुए लोग हों । कोई ऐसे प्राणी हों जिनका इस दुनिया से कुछ लेना-देना ही न हो । भाषा न बिगड़ती है, न सुधरती है । वह सिर्फ बदलती है । जो लोग शुद्धता की दुहाई देकर या किसी भी और वजह से इसमें होने वाले बदलावों का विरोध करते हैं वे दरअसल इसके असली दुश्मन हैं । वे इसे मार देंगे । जिंदगी लगातार विकसित होती चीज है । इसमें नए विचार, नई चीजें, नए उपकरण, नई तकनीक, नए संचार माध्यम जुड़ते रहते हैं । चूंकि यह सभी भाषा से जुड़े हैं तो निश्चित तौर पर भाषा भी इनके साथ बदलेगी । यह बदलाव हमारी, समाज और बाजार सबकी जरूरत है । बाजार भाषा का विस्तार करता है । उसे ज्यादा ग्रहणशील बनाता है । मैं समझता हूं कि किसी भी क्षेत्र में शुद्धतावादी होने से काम नहीं चलता । आप बहुत शुद्धतावादी बनेंगे तो आपका बोरिया-बिस्तरा बांध दिया जाएगा । इसलिए बेहतर है कि व्यवहारवादी रवैया अपनाया जाए ।
हिंदी इस लिहाज से भी मजबूत है और रहेगी कि यह हमेशा से आंदोलनों की भाषा रही है, सामाजिक संवाद की भाषा रही है । पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक इसे पढ़ने-लिखने वाले लोग रहे हैं । इस दिशा में हिंदी सभाओं का भी बेहतरीन योगदान रहा है । राजनीतिक तौर पर भले ही कुछ प्रदेशों में इसका विरोध रहा हो लेकिन वहां भी इसे सीखने वालों लोगों की कमी नहीं रही है । हिंदी फिल्मों और टीवी ने भी हिंदी के विकास में बड़ी भूमिका निभाई है । पाकिस्तान, श्रीलंका से लेकर अमेरिका तक इसके दर्शक बिखरे पड़े हैं । मनोहर श्याम जोशी द्वारा लिखे गए सीरियल "हम लोग", "बुनियाद", "मुंगेरीलाल के हसीन सपने" तो इतने लोकप्रिय हुए कि क्या कहा जाए। "रामायण" और "महाभारत" इतने लोकप्रिय हुए कि लोग दुकान बंद करके भी इन्हें देखते थे । इनके माध्यम से जिस भाषा का विकास हो रहा है वह जाति, संप्रदाय और धर्म के बंधनों को तोड़ती है और सब लोगों से एक जैसा संवाद स्थापित करती है । जहां तक राष्ट्रभाषा समितियों का सवाल है, मैं उनके कामों से जरा भी इत्तफाक नहीं रखता । मेरा तो मानना है कि जो भाषा सत्ता की भाषा बन जाती है उसका खात्मा हो जाता है । इन्हें हिंदी की याद तब आती है जब 14 सितंबर आता है और इस अवसर पर हिंदी पखवाड़ा मना लिया जाता है।
कुछ साहित्यकारों-पत्रकारों को बुलाकर उन्हें संतुष्ट कर दिया जाता है । चोंचलेबाजी में पैसे बर्बाद कर यह अपने काम का इतिश्री समझ लेते हैं । कुछ नए क्षेत्र हैं जो हिंदी के इस्तेमाल में सहज नहीं हो पाए हैं । चूंकि अभी तक हिंदी की कोई तकनीकी शब्दावली विकसित नहीं की गई है इसलिए भी यह दिक्कत आती है । वह अंग्रेजी के शब्दों का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल कर लेते हैं जिससे एक खास तरह का नकलीपन उनमें देखने में आता है । उनको सहज और स्वाभाविक प्रवाह में आने में वक्त लगेगा ।हिंदी की तो एक खासियत है कि यह हमेशा से शुद्धतावाद के खिलाफ रही है । यह हमेशा से ही लचीली रही है । हिंदी की विविधता और भी आंख खोल देने वाली है । यही मिश्रण इसे जीवंत बनाए रखता है और इसकी स्वीकार्यता को बढ़ाता है। इसलिए मेरा मानना है कि हिंदी का भविष्य बेहद उज्ज्वल है क्योंकि यह सत्ता से अधिक लोकसत्ता की भाषा है ।
राजेन्द्र यादव संपादक, हंस
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1958-58 में जब मैं दिल्ली आया था तब यहां की साहित्यिक अड्डेबाजी अपने उत्कर्ष पर थी । विगत कुछ दशकों में हमारा सांस्कृतिक आंदोलन लगातार कुंद हुआ है । आज के साहित्यकार और साहित्यिक गोष्ठियां सत्ता और प्रकाशकों के दबाव से कुछ ज्यादा ही ग्रस्त हो गई हैं । ऐसा क्यों हुआ है जैसे सवालों पर विचार करें तो बात यहीं तक सीमित नहीं रहेगी। यह चर्चा जनलोकपाल से लेकर खेल विधेयक की बीसीसीआई से हार तक खिंचेगी । लोग अपनी आमदनी जरा सा कम करने को तैयार नहीं हैं । मार्क्स का एक कथन है - "द मोर यू हैव द लेस यू आर ।" यानी आपके पास जितनी ज्यादा समृद्धि आती है आपका व्यक्ति उतना छोटा होता जाता है । यही कारण है कि जिनके पास जितना अधिक पैसा है वे उतना अधिक भ्रष्ट हो रहे हैं । निम्न वर्ग के लोग भी भ्रष्ट आचरण करते हैं पर उनका अपराध दूसरी तरह का होता है । सारा दोष पूंजीवाद पर मढ़ने की जल्दीबाजी कोई मूढ़ता नहीं है ।
बाजार के अर्थतंत्र में किसी धीमी चीज और बड़े दायरे के लिए जगह ही कहां है । धीमापन और अवकाश नए बाजार की आंखों की किरकिरी हैं, घाटे का सौदा है । यहां तो सबकुछ जल्दी में और कम से कम स्पेस में होना चाहिए। पर एक बात और है, मुझे लगता है और मैं इस मामले में बेहद आशावादी हूं कि हिंदुस्तान में यह सब बहुत दिनों तक चल नहीं सकता । यह सोचकर आपको आश्चर्य नहीं होता कि हिंदुस्तान में हर जनांदोलन की शुरुआत बुड्ढे करते हैं । ऐसा संसार के किसी कोने में नहीं होता । गांधी, जयप्रकाश, अण्णा का आना बताता है कि यह देश असली मुद्दे को पकड़ लेता है ।
ऐसा क्यों होता है कि इस देश में स्वाधीनता संग्राम से लेकर जन लोकपाल विधेयक के लिए हुए आंदोलन तक की भाषा हिंदी रही । एक मराठी मानुष ने अपनी खास भाषा शैली में स्टेज से लगातार हिंदी में राष्ट्र को संबोधित किया? यह हिंदी की महिमा है । हिंदी हमारी और देश की जरूरत है । जनहित का सारा आंदोलन हिंदी में ही होगा । इस देश में हिंदी अपने बल पर खड़ी है । जिसे जरूरत पड़ेगी वह हिंदी की सेवा में सामने आएगा जो नहीं आएगा वह हाशिए पर फेंक दिया जाएगा । अण्णा को भी पता था कि यदि जनता से बातें करनी हैं हिंदी में ही करनी होंगी । यही कारण है कि जब चुनाव आते हैं तो इस देश के अंग्रेजी पत्रकारों की ताकत हिंदी पत्रकारों के मुकाबले कमतर हो जाती है । तब हिंदी और भारतीय भाषाओं के पत्रकारों की ताकत बढ़ जाती है ।
अरुण जेटली हों कि चिदंबरम क्या वे चुनावी भाषण अंग्रेजी में देने की स्थिति में कभी आ पाएंगे ? सारी लीपापोती के बावजूद एक संस्कृति का तंत्र, अपना इतिहास अपना अतीत पोंछ कर मिटाया नहीं जा सकता ।
विश्वनाथ त्रिपाठी वरिष्ठआलोचक
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हिन्दी का भविष्य : भविष्य की हिन्दी !
यह हिन्दी पट्टी में विमर्श का सबसे पुरातन किन्तु शाश्वत विषय रहा है । इस पर जाने कबसे विमर्श हो रहा है । और निष्कर्ष दिये जा रहे हैं । शायद आज़ादी के प्रथम दशक के बाद से ही । कदाचित् लेखक-बिरादरी और शिक्षक-चिंतक-अनुयायी समाज भी इससे सहमत हों । शायद अधिकांश हिन्दीभक्त भी सहमत हों कि वे उन सारे कारणों के बारे में भी भली-भाँति जानते हैं कि हिन्दी की अवमानना और अवहेलना के मूल में कौन-सी ताक़तें क्रियाशील हैं ? इसमें भी शक़ की गुंज़ायश नहीं हो सकती कि ऐसे सारे लोग उनके निदानात्मक उपायों से भी वाकिफ़ है । किन्तु सबसे बड़ी विडम्बना तो यही है कि ऐसे सारे लोगों में हिन्दी भाषा, शिक्षा, संस्कृति और संस्कार के प्रति तेज़ी से उदासीनता बढ़ती चली जा रही है। परिवर्तनशीलता की अकाट सत्यता के वाबजूद समूची हिन्दी-संस्कृति की दिशा आज अनजाने दिशा की ओर गतिशील है । यह मात्र हिन्दी का ही नहीं, इस महादेश के जीवन-मूल्यों के प्रति आस्थाओं के भोथरे होते चले जाने का भी संकट है ।
मैं यहाँ यह भी कहना चाहूँगा कि हिन्दी के समक्ष संकट, संकट से उबरने के उपायों और वांछित व्यवहारों का संज्ञान होने के बाद भी हममें से बहुतेरे हिन्दी के अलावा विदेशी-वाणी के शरण को वाज़िब क़रार देने लगे हैं । हो सकता है कि इसके मूल में अर्थशास्त्र या उपयोगितावादी दबाब हों । किन्तु यह हमारी गुलाम मानसिकता से पनपे द्वैध का प्रतिफल भी तो हो सकता है। जिसमें हम सार्वजनिक तौर पर तो भारतेंदु की उक्तियों का शाब्दिक स्मरण करते रहते हैं किन्तु उनके भावार्थों, निहितार्थों को आज भी अपने जीवन-व्यवहार में उतार नहीं सके हैं । यह गुलाम मानसिकता ना भी हो तो हमारी अकादमिक दरिद्रता तो है ही कि हम ज्ञान और विज्ञान के लिए हिन्दी को असमर्थ मानते रहे । परिणाम में आज हमें एक अच्छा तर्क मिल गया है - कि अँगरेज़ी के बिना विकास और प्रौद्योगिकीय उत्थान असंभव है । यदि यह सच भी है तो इसके चलते क्या हमने आज़ादी के बाद से आज तक, अपनी उच्च शिक्षित पीढ़ी को क्रमशः हिन्दी से परे ले जाने का षडयंत्र नहीं किया है ? जबकि इस बीच हम ज्ञान विज्ञान के सारे पाठ्यक्रमों को हिन्दी में रच सकते थे ।
बात सिर्फ़ इतनी ही नहीं है ।
क्या इससे हमारे देश के करोड़ों युवा, उनका घर-परिवार और संसार उस भाषा के परिसर में नहीं धकेल दिये गये जो मूलतः हिन्दी पर राज करनेवालों की भाषा रही है । हिन्दी ही क्यों, वह सारे विश्व में उपनिवेशवाद का विचार देने वाली भाषा भी रही है । वह बाज़ारवाद और पाश्चात्य जीवनशैली को विकसित करने वाली भाषा भी रही है । दरअसल पश्चिम की अँगरेज़ी आदि भाषा में पूर्व संसार की प्रमुख भाषा यथा हिन्दी की तरह मानवीय उदारता, सहिष्णुता और प्राकृतिक आध्यात्मिकता केंद्र में रही ही नहीं । वहाँ प्रजातांत्रिक स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा तो है किन्तु एकांकी विकास की अमानवीय चेष्टा के लिए उकसानेवाली दृष्टि भी बहुतायत है । वहाँ भौतिकता को सर्वोपरि माना गया है और यहाँ अध्यात्म को ।
अँगरेज़ी अहम् की भाषा है । हिन्दी वयम् का संस्कार देनेवाली संस्कृत से दीक्षित भाषा है । यही हिन्दी और पश्चिम की भाषा का बुनियादी फ़र्क है । यह सच है कि औद्योगिक क्रांति और उससे जुड़े विकास में जो अधुनातन ज्ञान और विज्ञान सिरमौर बना वह अँगरेज़ी के मुखारविंद से ही उच्चरित हुआ था । औद्योगिक विकास के माड़ल को स्वीकार करने वाले देशों के समक्ष यह मजबूरी ज़रूर रही कि इसी भाषा से आने वाले विचारों, उपायों, टेक्नीक, निष्कर्षों को अपनाकर अपनी बहुसंख्यक आबादी को रोज़ी-रोटी दी जाये । किन्तु इससे परिणाम के प्रति शायद ऐसे देश जागरूक नहीं थे । और यदि थे तो भी लाचारी इतनी ज्यादा थी कि अँगरेज़ी के रूप में वहाँ एक विदेशी भाषा को गाँव- गली और घर-द्वार तक पहुँचने का रास्ता खुल गया और मातृभाषाओं में विकास की क्षमता न्यून होने का भावबोध पनपने लगा । अपनी पृथक और समृद्ध भाषा होने के बाद भी जिन देशों ने अँगरेज़ी को वरीयता दी उसके पीछे विकास और ज्ञान-विज्ञान का अध्ययन महत्वपूर्ण कारण रहा है । किन्तु वे अपनी मातृभाषा के प्रति उदासीन कहाँ हुए ? उन्होंने अपने राज-काज और काम-काज की भाषा के रूप में परायी भाषा को अंगीकार कदापि नहीं किया । वहाँ आज भी मातृभाषा ही सिरमौर भाषा बनी हुई है ।
यहाँ मैं यह भी कहना प्रांसगिक समझता हूँ कि अँगरेज़ी की निरंतर स्वीकार्यता में आधुनिकता मात्र से सांस्कृतिक-मोक्ष की थोथी तलाश की कामना भी रही है । आज़ादी से पहले से ही भारत के बुर्जुआ और तथाकथित पढ़े लिखे अमीरों ने अँगरेज़ी को सभ्रांत भाषा के रूप में मान्यता प्रदान करना शुरू कर दिया था । उसे सबसे पहले देश में ज़मींदारों, रियासतदारों, मनसबदारों ने गले लगाया । आम किसानों, कारीग़रों, मज़दूरों सहित आम भारतीय जन ने नहीं । यह ऐतिहासिक तथ्य है । शायद इसलिए कि वह शासन-अनुशासन व्यापार-वाणिज्य की भाषा प्रतीत हुई । शायद इसलिए भी कि वे स्वयं को आम भारतीयों के बीच विशिष्ट, सभ्य और आधुनिक दिखाना चाहते थे । यह भी सच है कि सबसे पहले देश के बड़े घरानों के लोग ही अँगरेज़ी शिक्षा के लिए विलायत के दास बने । आम आदमी नहीं । हुआ क्या कि अँगरेज़ी को सभ्यता की भाषा मान ली गई । इससे हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के बौनेपन जैसी कृत्रिम मानसिकता को बल मिला और इससे न केवल भाषाओं का अनहित हुआ बल्कि उन भाषाओं में विन्यस्त सभ्यता की उज्ज्वलता भी प्रभावित होती चली गयी । जो आज भी बदस्तुर जारी है ।
हिन्दी की दयनीयता के लिए अधिकांशतः सरकारी उद्यमिता को कटघरे में खड़े करते हैं। उसके बिगडते स्वास्थ्य के लिए अन्यान्य भाषा को गरियाते हैं । हिन्दी ही नहीं, भाषा मात्र बहते नीर की तरह होती है । जब जल ही नहीं रहेगा तो नदी तो सूख ही जायेगी ना ! जब उसे हर मोड़ पर और अधिक जल मिलेगा नहीं तो वह कब तक बहेगी । दरअसल हमने हिन्दी के साथ ठीक वही बर्ताव किया जैसा हम गंगा के साथ करते रहे । उसे माँ जैसी पवित्र भी मानते रहे और उस पर मलमूत्र और क्षत-विक्षत शव भी प्रवाहित करते रहे । गंगा की सफाई के नाम पर घोषणायें और परियोजनायें तो बनती रहीं किन्तु स्वार्थगत राजनीति और कामचोरी से सब कुछ जस के तस है ।
मैं यहाँ एक हालिया उदाहरण देना चाहूँगा । इसमें भाषायी विकास, भाषायी प्रेम और सरकार के मध्य संबंधों की असलियत का पता भी चलता है -
मैंने राज्य के सभी थानों को लिखा कि यदि कोई फ़रियादी अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी आदि भाषा में एफ़. आई. आर. लिखवाये तो उसे उसी भाषा में लिखा जावे । ना कि उसे हिन्दी में लिखवाने या स्वयं लिखने के लिए बाध्य किया जावे । जानते हैं - चार-छह माह गुज़र चुके हैं । मुझे आज तक कोई सूचना नहीं मिली कि अमूक थाने में किसी ने छत्तीसगढ़ी में अपना बयान नोट कराया। हो सकता है यह वास्तविकता का एक पहलू हो । किन्तु संकेत तो मिलता है कि कभी छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़िया के नारों में बह जाने वाला गाँव-घर का आम आदमी सरकारी कामकाज के अवसरों पर हिन्दी में ही अपनी बात रखना पसंद करता है ।
इस उदाहरण को लेकर मैं यह भी बात करना चाहता हूँ और वह यह, कि आज गाँव-देहात का आदमी भी छत्तीसगढ़ी या अपनी मातृभाषा के बनिस्पत हिन्दी में और वह हिन्दीभाषी है और अँगरेज़ी जानता है तो राजकाज में अँगरेज़ी भाषा में बतियाने में अपनी भलाई देखता है । क्या यह एक तरह की मनोवैज्ञानिक कमज़ोरी भी नहीं है कि हम अपनी भाषा के व्यवहार क्षेत्रों में भी परायी भाषा को सिर्फ़ इसलिए तवज्जो देते हैं कि वहाँ हम पिछड़े ना समझ लिये जायें । दरअसल यह जो मनोवैज्ञानिक दबाब है यह भाषायी दासता का अनुसरण भी है । यह सिर्फ़ छत्तीसगढ़ी में नहीं, अन्य भारतीय बोली-भाषाओं के व्यवहारकर्ताओं का स्थायी भाव है । यह मनुष्य की आत्महीनता या भाषा की आत्महीनता, बेशक इस पर शोध होना चाहिए ।
हिन्दी भाषा में मिलावट को लेकर भी बहुत बहस होती है । हमें यह स्वीकारना चाहिए कि हिन्दी स्वयं में कोई विशुद्ध भाषा नहीं है । जिसे हम खड़ी बोली कहते हैं वह भी नहीं । कोई भी भाषा यदि वह भाषा तो वह बहता नीर भी है ।हिन्दी भी अपनी पूर्वी और पश्चिम हिन्दी के बोलियों और भाषाओं से लेती देती रही है । क्या ब्रज-अवधी—राजस्थानी-बघेली-छत्तीसगढ़ी आदि के बिना हिन्दी समृद्ध हो सकती थी ? जब आप तुलसी को हिन्दी का महाकवि कहते हैं तो आप हिन्दी नहीं दरअसल अवधी को ही स्मरण कर रहे होते हैं । यदि आप मीरा को हिन्दी की कवयित्री मान रहे होते हैं तो भी आप हिन्दी को नहीं राजस्थानी को भी स्वीकार रहे होते हैं । मुझे एक जिज्ञासा यह भी है कि आख़िर जिसे हम विशुद्ध हिन्दी मानते हैं उसमें ऐसा एक भी महाकाव्य क्यों नहीं लिखा जा सका और लिखा भी गया तो जो रामचरित मानस, सुरसागर या बीजक की तरह पूजनीय नहीं बन सका । यदि ऐसा होता तो खड़ी बोली के उद्भव से लेकर आज तक कम से कम एकाध ऐसी किताब तो अवश्य होती जो लोक के जुबां पर होती । हाँ, पढ़े लिखे और विशुद्धतः कहें तो साहित्यिक दुनिया में ऐसी कई किताबों का जिक्र किया जा सकता है । इससे कोई आपत्ति भी नहीं है ।
मैं इस बहाने कहना यही चाहता हूँ कि हमने हिन्दी में लिखा तो ख़ूब । हिन्दी को कई मोड़ दिये । कई नये कोणों से तराशा । शिल्पगत, रूपगत और विचारगत भी । किन्तु विश्व की दूसरी-तीसरी सबसे बड़ी भाषा होने के बाद भी हमारे हिस्से एक भी नोबुल नहीं है । इसका आशय हिन्दी में सर्वश्रेष्ठ लेखन का नितांत अभाव नहीं । और पुरस्कारों से भाषा का मूल्याँकन भी नहीं । मैं ऐसा इसलिए कहना चाहता हूँ कि हम हिन्दी की वैश्विकता का मूल्याँकन करते वक़्त उन सारे आँकड़ों को दोहराते हैं कि कितने देश में कितने लोग हिन्दी बोलते, समझते और लिखते-पढ़ते हैं । हमें यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि इतर भारतीय देशों में हिन्दी सिर्फ़ भारतीयों के मध्य मेलजोल की भाषा है । और यह उस पर निर्भर है कि वह हिन्दी में बतियाये या फिर वहाँ की भाषा में । यहाँ एक बात साफ़ तौर पर मानना चाहिए कि प्रवासी देशों की हिन्दीभाषियों में से अधिकांश अपने आर्थिक और व्यावसायिक हित संवर्धन के लिए प्रवास पर हैं । आशय यही कि ये सारे वे लोग हैं जिनके लिए हिन्दी या अन्य मातृभाषा रोजगारमूलक सिद्ध नहीं हो सकी । पीड़ा भले ही ज़रूर हो मातृभाषा की भूमि से दूर रहने की, किन्तु मातृभाषा की अक्षमता का एक बोध उनके मन में स्थायी रूप से घर किया हुआ है । इसे भी स्वीकारना होगा ।
हम हिन्दी के गुणानुवाद करते समय और एक आँकड़ा रखते हैं – 125 से अधिक विदेशी विश्वविद्यालयों में हिन्दी का अध्ययन-अध्यापन होता है । हम अक्सर यह बताना भूल जाते हैं कि दरअसल इनमें प्रतिवर्ष कितने छात्र-छात्रायें प्रवेश लेते हैं ? और पारंगत होने पर कितने घर-परिवार, कामकाज, राजकाज में हिन्दी ही बोलते हैं ? ज़ाहिर है कि ऐसे छात्रों के लिए हिन्दी शिक्षण का आधार अनुवाद का टूल्स मात्र है । न कि हिन्दी की संस्कृति का विस्तार्य । एक दर्द भरी सच्चाई यही भी कि आज भी हिन्दी संयुंक्त राष्ट्र संघ में अपना स्थान नहीं ले सकी है ।
हिन्दी के बहाने हिन्दी लेखक बिरादरी पर भी चर्चा करने से हमें गुरेज़ नहीं करना चाहिए कि विचारवाद के सम्मोहन से हिन्दी का विकास तो निश्चित रूप से हुआ है। हिन्दी के मनुष्य को भी नई दृष्टि और विचार-शक्ति मिली है । जीवन और जीवन में फैले चीज़ों को नये नज़रिये से देखने का अवसर मिला है । किन्तु हम लेखकों में शिविरबद्धता भी कम नहीं बढ़ी है। कभी-कभी तो बात इतनी बिगड़ जाती रही है कि हिन्दी सेवियों और पाठकों को हिन्दी के उद्धारक हिन्दी के पथभ्रष्टक नज़र आते रहे हैं । जितनी उठापटक हिन्दी में है उतना शायद अन्यान्य भारतीय भाषाओं और विश्वभाषाओं में नहीं । सच्चाई यही है कि हिन्दी और अँगरेज़ी दोनों में प्रवीण और पूर्ण संभावनाशील नया लेखक बहुत सोच विचार कर हिन्दी के बनिस्पत हिन्दी मातृभाषा होने के बावजूद अँगरेज़ी लेखन की ओर मुड़ जाता है । इस सबके बावजूद हमने पिछली शताब्दियों में अभिव्यक्ति के नये औजारों, विधाओं और प्रयोगों से उसे समृद्ध तो किया ही है । यह भी संतोष जनक स्थिति है ।
प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर हिन्दी या मातृभाषा के माध्यम से पाठ-पठन का अर्थ अपनी जड़ों की पहचान भी है । वह केवल अक्षर ज्ञान को सहजता से जानने-पहचानने का माध्यम मात्र नहीं । मातृभाषा के रूप में हिन्दी का अनुराग अपने होने की विशिष्टता के प्रति भी सतर्कता का परिचायक है । यह आज की कथित वैश्विकता के घटाटोप में राष्ट्रीय अस्मिता अर्थात् भारतीयता को बचाने की ज़द्दोज़हद भी है ।
किसी भाषा में उपलब्ध कार्मिक दक्षता और ज्ञानबद्धता से किसी को परहेज़ नहीं हो सकता किन्तु मनुष्य के लिए मात्र कार्मिक विकास ही सबकुछ नहीं । यदि ऐसा होगा तो सांस्कृतिक बहुलता का लोप हो जायेगा। सांस्कृतिक बहुलता के लोप का मतलब किसी भाषा में विन्यस्त अकूत ज्ञान-विचार-दर्शन-मूल्य का भी लोप होगा । इसलिए हिन्दी भाषा के विकास की दिशा में अब तक की सारी नाकामयाबी के बाद किसी रोज़गारमूलक भाषा के रूप में अँगरेज़ी आदि विदेशी भाषा में शिक्षा और ज्ञान को वांछनीय सिद्ध करने का मतलब मातृभाषा या हिन्दी भाषा का परित्याग नहीं ।
यदि हम हिन्दी के स्थान पर अँगरेज़ी या किसी अन्य भाषा को ही मन और मनीषा की भाषा बनाने पर तुले हुए हैं तो हम अपने संपूर्ण अतीत और ऐतिहासिकता को भी नकारने पर भी तुले हुए हैं । अँगरेज़ी या चीनी या कोई भी परायी भाषा में पारंगत होकर हम अपना अर्थशास्त्र तो सुधार सकते हैं किन्तु सिर्फ़ अर्थशास्त्र से संसार नहीं चलता । जहाँ और जिस भी स्तर पर ऐसा हुआ है वहाँ की सामाजिकी और सांस्कृतिकी ध्वस्त हो गई । वैभव के शिखर पर भी छुछापन पसरने लगी । शायद यही वह कारण रहा है – जिसके लिए आज भी बहुत सारे देश परायी भाषा के रूप में अँगरेज़ी शिक्षा और राजकाज में उसके प्रयोग से स्वयं को अलग रखे हुए हैं । इस रूप में भी क्या ऐसे देशों का विकास धीमा है या बाधित है । शायद कदापि नहीं ।
संचार साधनों से अपेक्षा की गई थी कि वे हिन्दी के विस्तार में मशीनी योगदान देगें । रेडियो, रंगमंच, टेलीविज़न, सिनेमा, अखबारों, पत्र-पत्रिकाएँ, इंटरनेट, ब्लॉगस् और वेबसाईट्स ने इसमें अपना ऐतिहासिक योगदान दिया भी है किन्तु आज का निजी इलेक्ट्रानिक मीडिया अँगरेज़ी के बाज़ारवाद से निर्देशित हो रहा है । यह इस महादेश की महाभाषा के साथ ही घालमेल नहीं, दरअसल यह अँगरेज़ी की वर्चस्ववादिता का सुनियोजित प्लान है जिसका एकमात्र उद्देश्य वैश्वग्राम के दर्शन के सहारे सारे देशों की चेतना और सोच को एक शिल्प में तब्दील कर देना है । ताकि सोचने-विचारने की जो मौलिक परंपरा और जीवन-दर्शन है वह अँगरेज़ी सभ्यता के इशारों पर तब्दील हो सके । यह किन्हीं अर्थों में भाषायी उपनिवेशवादी प्रवृत्ति का हिडन तरीका भी है ।
हिन्दी का भविष्य कैसा होगा और भविष्य की हिन्दी कैसी होगी ? शायद मैने जो कुछ अभी कहा है उससे कुछ संकेत आपको मिल सकते हैं । वैसे यह सब हम आप जानते हैं । और हम आप यह भी जानते हैं कि हम पढ़े-लिखे लगो कुछ करें या ना करें, हिन्दी का कुछ नहीं बिगड़ने वाला....
भारत में हिन्दी की और न्यूनाधिक दूसरी भारतीय भाषाओं की स्थिति गिरावट के रास्ते पर है। ऐसी आशा थी कि समाज के नायक भारतीय भाषाओं को विकसित करने के लिए स्वतंत्र भारत में क्रान्तिकारी कदम उठाएंगे परंतु जो देखने में आ रहा है वह ठीक इसके विपरीत है। यह षढ़यंत्र है या अनभिज्ञता इसका फ़ैसला समय ही करेगा।
जयप्रकाश मानस, सम्पादक सृजनगाथा.कॉम
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भाषा के सरलीकरण की प्रक्रिया स्वाभाविक है परंतु वह अपनी ही भाषा की सीमा में होनी चाहिए। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आज अंग्रेज़ी और उर्दू के बहुत से शब्द ऐसे हैं जिसके बिना हिन्दी में हमारा काम सहज रूप से नहीं चल सकता। ऐसे शब्दों का हिन्दी में प्रयोग सहज और स्वाभाविक होने की सीमा तक पहच चुका है और ऐसे शब्दों के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए किसी को कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। यह भी ठीक है कि हिन्दी में भी कई बातों को अपेक्षाकृत सरल तरीके से कहा जा सकता है। परंतु यह सब व्यक्तिगत या प्रयोग-शैली का हिस्सा है। विभिन्न शैलियों का समावेश ही भाषा के कलेवर को बढ़ाता है और उसमें सर्जनात्मकता को प्रोत्साहित करता है।
भाषाओं का क्रमशः विकास कैसे होता है और इसके विपरीत भाषाओं का ह्रास कैसे होता है यह अनेकानेक भाषाओं के अध्ययन से हमारे सामने स्पष्ट होकर आया है। भारत में हिन्दी और शायद अन्य भारतीय भाषाओं के साथ जिस प्रकार का व्यवहार होता आ रहा है वह हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं की ह्रास-प्रक्रिया को ही सशक्त करके बड़ी स्पष्टता से हमारे सामने ला रहा है। इस ह्रास-प्रक्रिया के बारे में विस्तार से लिखे जाने की आवश्यकता है।
हम सबको मालूम है कि अंग्रेज़ी का प्रयोग भारत में केवल भाषागत आवश्यकता के लिए ही नहीं होता अपितु समाज में अपने आपको समाज में अपना ऊंचा स्थान स्थापित करने के लिए भी होता है। इसलिेए प्रयोग की खुली छुट्टी मिलने पर अंग्रेज़ी शब्दों का आवश्यकता से अधिक मात्रा में प्रयोग होगा। दुनिया में बहुत सी भाषाएं लुप्त हुई हैं और अब भी हो रही हैं। उनके विश्लेषण से पता लगता है कि उनके कुछ भाषा-प्रयोग-क्षेत्रों (domians) पर कोई दूसरी भाषा आ के स्थानापन्न हो जाती है और फिर अपने शब्दों के स्थान पर दूसरी भाषा के शब्दों का प्रयोग उस भाषा के कलेवर को क्षीण बनाने लगता है। इस प्रकार विभिन्न विषयों में विचारों की अभिव्यक्ति के लिए वह भाषा धीर धीर इतनी कमज़ोर हो जाती है कि वह प्रयोग के लायक नहीं रह जाती या नहीं समझी जाती । क्षीणता के कारण उसके अध्ययन के प्रति उसके अपने ही लोग उसको अनपढ़ों की भाषा के रूप में देखने लगते हैं और उसकी उपेक्ष करने लगते हैं। यह स्थिति न्यूनाधिक मात्रा में भारत में आ चुकी है।
फिर कठिन क्या और सरल क्या इसका फ़ैसला कौन करेगा। हिन्दी के स्थान पर जिन अंग्रेज़ी शब्दों को प्रयोग होगा उसको लिखने वाला शायद समझता होगा परंतु इसकी क्या गारंटी है कि भारत के अधिकांश लोग उस अंग्रेज़ी प्रयोग को समझेंगे। भाषा-विकास की दृष्टि से यह सुझाव बुरा नहीं है कि हिन्दी शब्दों का प्रयोग अधिकाधिक हो और जहां हिन्दी के कम प्रचलित शब्द लाएं वहां ब्रैकट में उसका प्रचलित अंग्रेज़ी पर्याय दे दें। जब हिन्दी का प्रयोग चल पड़े तो धीरे धीर अंग्रेज़ी के पर्याय को बाहर खींच लें।
भाषा के समाज में विकसित करने के लिए भाषा में औपचारिक प्रशिक्षण अनिवार्य है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जो बात हम अपनी भाषा में अलग अलग ढंग से और जिस बारीकी से कह सकते हैं वह अंग्रेज़ी में अधिकांश लोग नहीं कह सकते। इसलिए शिक्षा के माध्यम से अपनी भाषा को विकसित करना समाज में लोगों के व्यक्तित्व को सशक्त करने वाला एक शक्तिशाली कदम है।
भाषा के प्रयोग और विकास के लिए एक कटिबद्धता और एक सुनियोजित दीर्घकालीन योजना की आवश्यकता है परंतु ये दोनों बातें ही आज देखने को नहीं मिलतीं। दूसरी बात - जिस अंग्रेज़ी के बलबूते पर हम नाच रहे हैं उसमें भाषिक प्रवीणता की स्थिति का मूल्यांकन होना चाहिए। अंग्रेज़ी की स्थिति जितनी चमकीली ऊपर से दिखाई देती है वह पूरे भारत के संदर्भ में उतनी आकर्षक नहीं है। लोग जैसे तैसे एक खिचड़ी भाषा से अपना काम चला रहे हैं। हिन्दी की खिचड़ी शैली को एक आधिकारिक मान्यता प्रदान करके हम उसके विकास के लिए नहीं अपितु उसके ह्रास के लिए कदम उठा रहे हैं। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं का विकास तब होगा जब उसके अधिकाधिक शब्द औपचारिक व अनौपचारिक प्रयोग में आएंगे और विभिन्न भाषा-प्रयोग-क्षेत्रों में उसका प्रयोग, मान और वर्चस्व बढ़ेगा।
निज भाषाउन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सबगुन होत प्रवीन। पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहतहीन के हीन।।
उन्नति पूरी है तबहि, जब घरउन्नति होय। निज शरीर उन्नति किये, रहतमूढ़ सब कोय।।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहूँन ह्यौंहिं सोच। लाख उपाय अनेक यों, भले करोकिन कोय।।
इक भाषाइक जीव इक मति, सब घरके लोग। तबै बनत है सबन सों, मिटतमूढ़ता सोग।।
और एक अति लाभ यह, या में प्रगटलखात। निज भाषा में कीजिए, जो विद्याकी बात।।
तेहि सुनि पावैं लाभ सब, बातसुनै जो कोय। यह गुन भाषा और मंह, कबहूनाहीं होय।।
कितनी खरी है उनकी यहबात आज भी!आज भी तो भाषा की यह पीर एकपर्वत-सी हीखड़ी है हमारे सामनेऔर देश की अस्मिताव छवि, दोनों को ही अपंग कर रही है। दुनिया में बोली जानेवाली दूसरी सर्वाधिक भाषा होकर भी विश्व-भाषा मान्यता प्राप्तछहभाषाओं में हिन्दी नहीं है, कहीं न कहीं यहतथ्य हम भारतीयों की कमज़ोरी और आत्म-विश्वास की कमी को दर्शाता है। हमारी आपसी फूट, गुट बाजी और नासमझी का परिणाम है। चीन जैसे देश आज इसलिए इतने आगे बढ़ पाए क्योंकि उन्होंने मातृभाषा के महत्व को समझा। देश की शिक्षा, व्यापार आदि, सभी को अपनी मातृभाषा में ही रखा। संसार ने अपनी जरूरत मुताबिक उनसे समझौता किया, उन्होंने दूसरों की भाषा के साथ नहीं।
दीवानगी जब हद से गुजर जाए तो जुनून बन जाती है और अगर चार दीवाने मिल बैठें तो एक मुहिम एक आन्दोलन भी। समय आ गया है कि यदिलांघ नही सकते तो कम-से-कम इस पर्वत को पिघलाने का तो भरपूर प्रयास हमें करना ही होगा। मातृभाषा हिन्दी के संदर्भ में बारबार याद आ रही है कभी पढ़ीअंग्रेजी की एक कविता, "नौट वेविंग बट ड्राउनिंग"। असहाय हिन्दी डूब रही है, मदद मांग रही है और हम यही समझकर आराम से बैठे हैं कि हिन्दी तो बहुत सशक्त है, इसे कुछ नही हो सकता।हजारों साल से चली आ रही है, आगे भी ऐसे ही चलती रहेगी। परक्या आजभारत के महानगरों में या विदेशों में बसे भारतवंशियों के घरों में...कम-से-कम आपस की पारिवारिकबातचीत तक में, हिन्दीअपना वर्चस्व रख पाईहै!
देश की संस्कृति और संस्कारों से प्यार न हो, तोभाषा से भी प्यार नहीं हो सकता और जब तक अभिव्यक्ति सार्थक व प्रभावशाली न हो, दूसरे भला हमें कैसे समझ पाएँगे...दूसरों की तो छोड़ो क्या हम खुदको समझ सकते हैं ऐसे? ना ही, दूसरों की भाषा कभी हमारी अपनी एक अलग आवाज और पहचान बन सकती है... न संयुक्त राष्ट्र संघ में, औरना ही विश्व के हित में लिए गए किसी अन्य फैसले में।
संस्कृति और संस्कार, -आत्म विश्वास , भाषा और पहचान या अस्मिता, ये चारो ही अविच्छिन्न हैं। गहरे जुड़े हुए हैं औरअलग नही किए जा सकते...क्योंकि ये एक दूसरे के पूरक भी हैं और संवाहक भी। मां के दूध-सी हिन्दी हमारी रग-रग में है इसलिए हमें हिन्दी केप्रति चिन्तित होने की नहीं, बस सजग होने की जरूरत है।विचारने कीजरूरत है कि आजजब करीब 250 लाख भारतीय करीब 110देशों में बिखरे हुए हैं परन्तुक्या वजह है कि विश्व में दूसरे नम्बर पर बोली जाने वाली भाषा (यदि पाकिस्तान आदि अन्य देशों के नागरिकों को भी जोड़ लिया जाए तो शायद यह संख्या पहले नं. पर भी पहुंच सकती है, क्य़ोंकि लीपि भले ही अलग हो, बोलने में तो हिन्दी और उर्दू में कोई फर्क नहीं)अभी भी विश्व-भाषा नहीं बनसकी और आबादी के हिसाब से विश्व में दूसरे नम्बर पर जापहुंचे हम सभी भारतवासी अभी भी अपनी भाषा को उचित सम्मानन तोदे पाए हैं, औरना ही विश्व के आगेदिला ही पाए हैं? आज भी बसहिन्दी-दिवस मनता है... देश- विदेश में वैश्विक स्तर पर हिन्दी सम्मेलन होते हैं और हम फिरसे इन्तजार करते रह जातेहैंअगले वर्ष का...एक और सम्मेलनका ? दुनिया की और किसी भाषा के साथ तो ऐसा नहीं है ...क्यों हमें हिन्दी हमेशा, देश की आजादी के साठ साल बाद भी, मरणासन्नऔर बीमार ही नजर आती है, और यदि अगर वाकई में ऐसा है भी, तो किसने पहुंचाया इसे इस आपदकालीन स्थिति में?
बज़ाय एक-दूसरे का मुंह तकने के, हम सभी को अपने-अपने गिरेबां में झांकना होगा...क्या हम खुद अपने दैनिक जीवन में हिन्दी को यथोचित सम्मान और महत्व दे पाएहैं?जबतक भारत में, या विश्व के कोने-कोने में फैले भारतीय ही हिन्दी को उचित सम्मान न देंगे, अपने ही देश में मजदूर और अनपढ़ों की भाषा समझी जाने वाली हिन्दी- विश्व-सभागार मेंउचित स्थान कैसे ले पाएगी?
जरूरतें, किसी भी भाषा केविस्तार को गति देती हैं। हिन्दी की जरूरत को भी जिन्दा रखने कीजरूरतहै। इसके लिए हमें हिन्दी को अपने देश में, और सारी दुनिया के सामने भी, रोटी-रोजी, व्यापार, उच्च-शिक्षा व तकनीकी आदि से जोड़ना होगा...मीडिया व्यापार और प्रचार से जोड़ना होगा। अपने देश और भाषा में गौरव लेते हुए, विश्वीकरण के इस युग में सिर्फ दुनिया ही नहीं, भारत में भी अंग्रेजी के समकक्ष, हिन्दी के प्रति उदासीन जन-समाज को बताना होगा कि हिन्दी भी उतनी ही सशक्त और सक्षम भाषा है जितनी कि गुलामी के साथ आई और आजतक हिन्दी पर राज करती, उसे मुंह चिढ़ाती अंग्रेजी है। बल्कि हिन्दी तो अपने देश की संजीवनी बूटी है...पूर्वजों की सोच... भारत मां के दूध-सी, भारतीयता के सभी पोषक तत्व...अपना इतिहास... संस्कार और युगों के तप और मनन सभी का सार लिए अमूल्य शब्द गंगा है...गीता, रामायन... वेद, पुरान है।
विदेश की मिट्टी पर जब भी कोई अपना घर बनाता है तो नींव की पहली ईँट जहां सपनों की मिट्टी से रची और महत्वाकांक्षा की आंच में तपी होती है, दूसरी निश्चय ही यादों से बनी होती है। यादों की मिट्टी में रची, यादों की आंच में तपी---और आंसुओं से बुझी व तरी। जमीं पर खड़े घरों को शायद समय और प्रकृति नष्ट भी कर दे परन्तु मन के अन्दर गुनी-चुनी ये इमारतें तो वक्त के साथ-साथ हमारी यादों, तौर-तरीके और संस्कारों का संग्राहलय बनती चली जाती हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी भाषा और संस्कृति को सुरक्षित रखती हैं, ... एक बृहद संदर्भ कोष बनी, विषम या नई परिस्थिति में दुधारू दृष्टिकोण और तुलनात्मक सोच के साथ...परिस्थितियों की बेहतर और स्पष्ट समझ देती जाती हैं। भारत के बाहर बसे या बैठकर लिख रहे लेखकों का यह बारबार भारत या अपने अतीत की तरफ देखना और मुड़ना बस एक भावनात्मक राग या नौस्टैलजिया ही नहीं पनपने की अनिवार्य शर्त है।जड़ों से कटकर ना तो कोई जीव जी सकता है और ना ही संस्कृति!
शक्ति के लिए जुड़ना पड़ता है, और जुड़ने के लिए अपनाना।दुनिया के किसी भी कोने में हों, अधिकांशतःभारत-वंशी आजभी विचारों और संस्कारों से भारत को ही अपनीआत्मा मेंसंजोए हुएहैं। न सिर्फ खाने-पीने और रहन-सहन के अन्दाज से कईयों नेस्वयं को भारतीय रखा है, वरन् भारत के लिए कुछ कर गुजरने की ललक ( भारत के जिस गांव या कस्बे से वे या उनके पूर्वज आए थे, उस ओर) बारबारउन्हें वापसभारत की ओरखींचती है और आज भारत के कोने-कोने में ऐसे गांवों का झुरमुट उठता चला आ रहा है जिनकी काया-कल्प में इन भारतवंशियों का हाथस्पष्टहै। पहले कभी जब जबर्दस्ती बंधुआ मजदूरों की तरह लोगों को विदेश ले जाया जाता था, प्रवासी शब्द त्रासदी रहा होगा, आज तो यह शब्द देश का गौरव है और प्रवास में रहना प्रगतिशीलता की निशानी बनता जा रहा है।
समृद्धि, साहित्य और संस्कृति का यह भारतीय पौधा जो आज प्रवासी विदेशों की मिट्टी में रोप रहे हैं, अगर भारत से इसे सराहना और सद्भावना की धूप मिले, सोच का पानी मिले, तो निश्चय ही न सिर्फ यहएक सुखद अमराई बनकर सभी को छांव देगा अपितु अनगिनतमीठे फल भी।
इसके लिए भारतीयों को भी इन्हें खुले मन से अपनाना होगा।आपसी गुटबाजी और अहम को भूलकर हिन्दी और हिन्दीवासियों को आपस में जोड़ना और उनसे जुड़ना होगा। हिन्दी और हिन्दी-लीपि (लीपि के बिना भाषा अन्ततोगत्वा मिट ही जाती है, इसलिए लीपि पर भी ध्यान देने की बेहद जरूरत है, मात्र रोमन लीपिमेंही हिन्दी लिखपाने वालीप्रवृत्ति को आगे बढ़ने से रोकने की जरूरत है।)के प्रचार प्रसार के साथ-साथ बिना किसी भी भेदभाव के हिन्दी में रचे जा रहे उत्कृष्ट साहित्य को भी जनता के सामने लाना होगा, चाहे वह विश्व के किसी भी कोने में बैठकर क्यों न रचा जा रहा हो,ताकि पाठकों की, आम आदमी की रुचि हिन्दी और हिन्दी साहित्य में बनी रहसके औरविदेश में जन्मा, पला, बढ़ा प्रबुद्धयुवायह कहने पर मजबूर न हो कि पचास प्रतिशत भारतीय फिल्मों की तरह इस साहित्य में भी आधा माल तो कचरा , या निम्न श्रेणी का हीहै।
रचनाकार जो भारत से बाहर बैठकर साहित्य सृजन कर रहे हैंवह भी, भारत में या किसी भी अन्यसाहित्यकार की तरह ही, जीवन जीते विभिन्नमनोभावों और दबावों सेगुजर रहे होते हैं, बस उनका मंथन और दृष्टिकोण दोहरा हो जाता है क्योंकिउनकी रचनाशीलतादो संस्कृतियों से गुजर रही होती है, दो सभ्यताओं के मूल्यों को लेकर चलती है, जो कि अक्सर ही आपस में टकराते हैं, और पात्रों को ही नहीं, स्वयं रचनाकारों को भी, खुद का व परिस्थियों का मनोविश्लेषण करने पर मजबूर करते हैं और भावों का यही संघर्ष, विदेशी अंधड़ पानी के मौसम में स्व-रोपण...अस्मिता और जीवन के स्थाई मूल्यों की तलाश...साथ-साथ जड़ों से जुड़े रहने की ललक, यही दुधारी औरजुझारू सोच ही भारत से बाहर लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य की सबसे बड़ी शक्तिहै, कोई भावात्मक भटकन याकमजोरी नहीं, भारतीयता की यात्रा का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है।हां अगर निष्कर्ष पर पहुंचने का माध्यम ही निष्कर्ष बन जाए तो जरूर एक भटकनही कहलाएगी... अविरल रुदन नहीं चाहिए किसी को, न जीवन में और ना ही साहित्य में।
हमें यह भीनहीं भूलना चाहिए कि अभिव्यक्ति का माध्यम चाहे कुछ भी हो परन्तु दर्द हर मनुष्य का एक ही होता है, जैसे कि तृप्ति के आयाम कई हो सकते हैं, परन्तु भूख एक ही होती है। इन्सान प्रवासी हो सकता है पर साहित्य नहीं, कहीं भी बैठकर किसी भी भाषा में लिखा जाए, साहित्य बस साहित्य होताहै, और जिस भाषा में उसका सृजनहो रहाहै उसी समूह का परिचायक भी। साहित्य और भाषा दोनों का ही संबन्ध संस्कार और परम्पराओं से होता है ...देश परिवार और समाज से होता है... इन्सान या जाति के पूरे इतिहास...हर संघर्ष, हर आकांक्षा, उपलब्धि और निराशा से होता है, उसके आज औरआने वाले हर कल से होता है।औस्ट्रेलिया, न्यूजिलैंड, अमेरिका याकहीं भी अंग्रेजी मेंरचा जा रहा साहित्यअंग्रेजी साहित्य ही है जैसे कि फ्रेंच का भी।कहते हैं सृजनरत इन्सान रचयिता के सर्वाधिक करीब होता है क्योंकि उन पलों में वह स्व से निकलकर समस्त से जुड़ जाता है। अब ऐसे उद्दाम पलों को कैसे हम भौगोलिक सीमाओं में बांध सकते हैं। हां जगहों की अपनी-अपनी भाषा, अपने-अपने अन्दाज और अपनी अभिव्यक्तियां हो सकती हैं जिससे आंचलिकता और विविधता आती है, काल और परिवेष के बिन्दु-विशेष की छवियां उभरती हैं, परन्तु भाव रस और गुण तो वही शाश्वत ही होते हैं। किसने सृजन किया, कहां बैठकर किया, उससे इतना फर्क नहीं पड़ेगा, महिला ने किया, या पुरुष ने किया उससे भी नहीं; , जितना कि क्यों और किन-किन परिस्थितियों को जीते हुए कियागया यह सृजन। दृष्टिकोण का फर्क हो सकता है जैसे गुलाबी चश्मे से देखो तो गुलाबी औरहरे से हराव नीले से नीला पर दृश्य तो अन्ततः वही-का-वही रहता है। गुलाबी चश्मे से दिख रहे पहाड़ को गुलाबी पहाड़ नही कहा जा सकता, वह भी बस पहाड़ ही है, हम सभी यह बातजानते हैं... जो गुलाबी चश्मे से देख रहे हैं वे भी और जो खुली आँखों से,वे भी।
आप प्रवासी लेखक, कवि या साहित्यकार कहिए, सही है पर साहित्य जिसमें मन रमता है...भाव रमते हैं वह कैसे प्रवासी हो सकता है, क्योंकि यह तो स्वभाव से ही काल और जगह की सीमा से परे हैं। शाश्वत या चिर् है। जो सहित की भावना से उत्पन्न हो... जुड़ने की चाह लेकर आगे बढ़े, उसे कैसे हम खेमों में बांट सकते हैं, दराजों में रख सकते हैं।
चिड़िया की बोली को चहकना और सांप की बोली को फुंकारना और शेर की बोली को दहाड़ना व कुत्ते की बोली को भोंकना कहते हैं।आदमी की बोली में ये सब गुण होते हुए भी आदमी, आदमी ही कहलाता है, कुत्ता शेर या सांप नही बन जाता!
बंबइया और कलकतिया हिन्दी की तरह ही ब्रिटिश अमेरिकन या गिरमिटिया और खाड़ी की हिन्दी भी बसहिन्दी ही है ---उसके मानक मुहावरे सब भारतीयों के अपने अनुभव और आम जीवन के संघर्ष... दो सभ्यताओं के टकराव से उपजे हैं। स्थानीय चन्द शब्दों और अभिव्यक्तियों से सजा यह हिन्दी काएक नया और अनूठा कलेवर है जिसे सभीहिन्दी-भाषियों को न समझने में दिक्कत होनी चाहिए औरना हीअपनाने में। अंग्रेजी इसलिए विश्व की संपर्क भाषा बन सकी क्योंकि इसने कभी विदेशी शब्दों से आपत्ति या परहेज नही किया। कबीर ने भी भाषा को बहता जल ही कहा है। और हम सभी जानते हैं प्रवाह को जीवित रखने के लिए समिश्रण कितना जरूरी है। चिन्ता की कोई बात नही जो उपयोगी होगा वही साथ बहेगा और अनचाही कीचड़ व पत्थर स्वयं ही बैठते चले जाएंगे।
हमने बड़े-बड़े विद्वानों को अक्सर कहते सुना है कि मुख्य धारा से जुड़ने के लिए हमें पता होना चाहिए कि क्या-क्या नए प्रयोग हो रहे हैं और कौन-कौन से नए मानक आ रहे हैं साहित्य में।मेरे ख्याल से तो साहित्य की कोई जाति या अनिवार्यता या शर्त नहींहोती, जिससे बंधकर ही रचनाकार को चलना होगा, तभी वह एक विशिष्ट खेमे में बैठने लायक होगा। मौलिक साहित्य किसी खास पद्धति या परम्परा से प्रभावित होकर नहीं रचा जा सकता। यह निर्झरणी तो स्वतः ही फूटती है। मानव और प्रकृति की तरह इसकी नैसर्गिक विविधता ही इसकी सुन्दरता भी है और अनश्वरता भी।सही है अगर रास्तों का पता हो तो यात्रा सुलभ होती है, परन्तु फिर नवीन की खोज और रोमांच भी तो छूटेगा! अनुसरण के सहारे अन्वेषण नहीं हो पाता, इसके लिए तोअनजान छलांगें लेनी ही पड़ती हैं।
जीकर और भोगकर , भले ही कल्पना में ही क्यों न, रचा जाए तो विशिष्ट काल और परिस्थिति को अभिव्यक्त करता साहित्य ही रचा जाएगा और यह साहित्य खुद ही नए मानक और नई अभिव्यक्तियों से लैस भी होगा। उसकी यह विविधता ही उसकी विशिष्टता बनेगी। सृजन में खुद के प्रति और समाज के प्रतिईमानदारी और जिम्मेदारी ही किसी कलाकार की सर्वोपरि रचना-धर्मिता है, बजाय किसी भी तरह की खोज और जुड़ने की चाह के या विस्मित करने के प्रयास के। जानती हूं जीवन में एक लेखक या कवि जितनी उड़ानें लेता है वह सब वास्तव में जीना या भोगना असंभव है परन्तु यहीं आकर तो कला और जीवन अलग हो जाते हैं औरअद्भुत बात यह है किजुड़ते भी हैं...जुड़ते इसलिए कि साहित्य अलग होकर भी जीवन से अलग नहीं किया जा सकता, या जी सकता है...जीवन वृक्ष के सहारे ही तो येसभी ललित लताएं पुष्पित और सुरभित हो पातीहैं
अब सवाल उठता है कि क्यों करता है कोई भी इसान सृजन, या क्या जरूरत है इन नयी-नयी कलाकृतियोंऔर रचनाओं की समाज को? अन्न, जल और हवा, पानी की तरह इसकी भी क्या अवश्यंभावी जरूरत है जीवन को या समाज को ? इसके लिए हमें समझना होगा क्या है जोबाध्य करता हैकलाकार को सृजन के लिए...कुछ बदलने की चाह जैसे कि सामाजिक अन्याय अत्याचार या कुरीतियां...जैसा कि अपने अपने समय में तुलसी और कबीर ने किया, प्रेमचन्द ने किया। कुछ बांटने की चाह... एक दर्द, एक खुशी, एक आश्चर्य, एक जिज्ञासा एक अनुभूति इतनी तीव्र कि दबाए न दबे, इतनी तीव्र कि खुद ही छलक पड़े, सदियों से नवों रसों के साहित्य की अविरल बहती धारा को शायद हमइसी श्रेणी में रखेंगे। या फिरकुछ बिल्कुल ही नया और अनूठा कर गुजरने की ललक... (आर्ट फौर आर्ट सेक) कला के लिए कला---आधुनिक और प्राचीन सभी प्रयोग और शैलियां...सभी ललित कलाकार व कला प्रेमी इससे भलीभांति परिचित हैं क्योंकि मानव स्वभाव से ही चंचल है और सतत् नए की खोज में रत रहता है।
किस उद्देशय से किया जा रहा है सृजन, यह जाननाजरूरी है। उद्देश्य की बात इस लिए जरूरी है क्योंकि लक्षहीन गन्तव्य नहीं पा सकता। माना दृष्टिकोण का फर्क नए रंग, नए आयाम देता है परन्तु हर क्रिया का कोई-न-कोई कारक तो होता हीहै और चेतन अवचेतन उसे नहीं भूला जा सकता। अब आप कहेंगे कि फिर ये रंगीन चश्मे क्यों ... और खास करके तब, जब वही यथार्थ हीचित्रित या वर्णित होना है?
यह व्यक्तिगत पसंद और खुशी का सवाल है, लेखक या रचनाकार की अपनी संवेदनशीलता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का सवाल है...आसपास जो घट रहा है , कितना उसे विचलित या असंतुष्ट कर रहा है, इस तरह के कई पहलू जुड़ जाते हैं कलाकार की सृजन धर्मिता से और एक प्रवासी को तो यह सब अनुभूतियां और भी तीव्रता से महसूसस होती हैं क्योंकि उसनए माहौल में सबकुछ नया है और उस नए से सामंजस्य की लड़ाई आम लड़ाई नहीं, उसके मूल्यों की लड़ाई है, उसके अपने अस्तित्व की लड़ाई है। ऐसी परिस्थिति में उसका अति भावुक होना और अतीत की तरफ बारबार देखना दोनों ही स्वाभाविक हैं, क्योंकि वहीं से तो वह अपनी उर्जा ले रहा है...इस अपरिचित समाज से लड़ने की सारी विधाएँ और परिचित अस्श्र-शस्त्रों का वही तो एकमात्र भंडार है उसके पास। माना नई प्रेरणाओं के अधीन नए आकर्षण और नए प्रयोग होंगे... परन्तु विश्वसनीयता परख और प्रमाण मांगती है। हरेक के जीवनमें यह अदृश्य गर्भनाल अजस्र जीवन स्रोत्र बनकर हमेशा ही साथ रहती है। जिसदिन यह सूखती है, इसपर से विश्वास उटता है, आदमी नितान्त अकेला हो जाता है और विषमता से तो जूझा जा सकता है, एकाकीपन से नही...अक्सर अंतस का यही एकाकीपन ही तो प्रेरित करता है कल्पना लोक के सृजन के लिए।
क्या हैप्रवासियोंकीयह जीवटता जो मरुमें भी शीतल जल-लहरी सी सींचती है ---प्रष्फुटित और पल्लवितहोती है...कहां से आती है यह अथक जूझने की शक्ति...? उनकी रचना व जीवन के इस विलक्षण गुण को देशवासी न सिर्फधैर्यऔर सहानुभूति सेसमझ सकते हैं वरन् इससे लाभान्वित भी हो सकते हैं।नए वातावरण में पनपते प्रवासी लेखक अपने जीवन की तरह ही न सिर्फ अनुकूल जमीन तलाश और पा रहे हैं वरन फलफूल भी रहे हैं। ना सिर्फ अपने अपनाए देश को मातृ-भूमि के करीब ला रहे हैं अपितु दोनों ही किनारों पर खड़ी उनकी सोच, पुल सी संस्कृतियों को जोड़ रही है। और इस पछुआ हवा की गंध में मिश्रित उनके श्रम-बिन्दु, देश के भी किसी काम आ सकें, किसी तपिश या तिरकती धरती को सींच पाएं , छोटे से छोटा भी योगदान दे पाएं तो यह आनन्द दोहरा हो जाएगा। आज भारतीयों की विद्वता, समझ और सुरुचि को विश्व सराह और संजोरहा है, भारत खुद अपने इन दूर बैठे भारतवंशियों को खुदसे जोड़कर आगे बढ़ सकता है और भारतवंशी भी भारत से जुड़कर गौरान्वित और सार्थक महसूस कर पाएंगे। दूरी का दर्द कुछ कम महसूस करेंगे। विकसित देशों में ऊंचे-ऊंचे पद सम्भाले भारतवासी साहित्य के साथ-साथ अपने देश को तकनीकी, चिकित्सा और वैज्ञानिक-शिक्षा आदिमें भीभरपूर मदद दे सकते हैं...देश को अपनाए गए विकसित देशों की आधुनिकतम तकनीकियों से अवगत करा सकते हैं।
प्रवासियोंऔरहिन्दी भाषा केसंदर्भ मेंचन्दप्रस्ताव हैं, जिनपर हमें मिलजुलकर ध्यान देना चाहिएः
1.हिन्दी वर्ण माला और अभ्यास पुष्तिकाओं की विदेशों में सुलभ उपलब्धि या फिर विदेशी भारतीय परिवारों में स्वैच्छिक वितरण।
2. बहुत छोटी उम्र से ही हिन्दी सीखने के लिए प्रोत्साहन प्रोग्राम और देश में अंग्रेजी से टक्कर लेते, हिन्दी के अंतर्राष्ट्रीय स्तर के उच्च कोटि की पाठशालाओं की अवधारणा व स्थापना।
3. सभी आई. ए. ए एस और डां. इन्जीनियरिंग, वैज्ञानिक व कम्प्यूटर आदि की शिक्षा और इम्तहानों में हिन्दी का पूरा और सार्थक विकल्प। यदि ऐसाहुआ तो हिन्दी खुद ही स्वयं को स्थापित कर लेगी।। त्रिभाषषीय फार्मूला बचपन से ही।
4. दोनों देशों की लोककथाओं और धार्मिक पौराणिक कहानियां व आधुनिक कहानियों का दोनों देशों के बच्चों के साथ मिला जुला मंचन। इन्हें भारत से जुड़े विशेष दिन जैसे पन्द्रह अगस्त, होली, दिवाली, क्रिसमस और ईस्टर आदि से जोड़ा जा सकता है।
5. संस्कृति और शिक्षा के आदान प्रदान के लिए संस्थाएं और परिवार, देश विदेश में आपस में जुड़ें। विद्वान और कलाकार व साहित्यकारों में आपसी संपर्क-सूत्र हों।लगातार कुछ ऐसा होता रहे कि नई पीढ़ी की भारत में रुचि कायम रह सके और वे गौरव महसूस करें अपने देश पर। खुदको उसका हिस्सा मानें।
6. भारत और विदेशोंसे हर साल कम-से-कम छह चयनित किताबों का देश-विदेश की लाइब्रेरियों और पुष्तकालयों में वितरण और सुलभ उपलब्धि कराई जाए।
7. हर देश में हिन्दी की स्तरीय लाइब्रेरी खुलें। सरकार सहयोग दे।
8.प्रवासी रचनाओं के प्रकाशन व पुष्तकों के वितरण की एक सुचारु व व्यवहारिक व्यवस्था कराई जाए। जिससे कि किताबें बस धूलखाने के लिए न लिखी जाएँ।
9. रचना चयन व प्रकाशन में प्रवासी के नाम पर या अन्य किसी वजह से कोई छूट न दी जाए। कोशिश यह रहे कि उत्कृष्ट साहित्य ही जनता को पढ़ने को मिले चाहे रचनाकार वासी हों या प्रवासी। जिससे कि जनता की रुचि और विश्वास दोनों ही साहित्य में बने रह पाएँ। किसी तरह की दलबाजी या अन्य किसी तरह के दबाव के अंतर्गत ये निर्णय जहां तक संभव हो न लिए जाएँ। प्रवासी रचनाकारों की उत्कृष्ट कृतियां भी पाठ्यक्रम में ली जाएं।
10 . सरकार की तरफ से प्रकाषक या वितरकों को इसके लिए प्रोत्साहन व आर्थिक सहयोगमिले ताकि वह अधिक रुचि ले पाएं।
सूखी रेत सा जो हम सभी की आंखों के आगे टूट-टूटकरबिखर रहा है...उसे बचाने (संरक्षण और संचय) की चाह, जो बहुमूल्य है और बन्द मुठ्ठी में टिकाकर नहीं रखा जा सकता उसका अनश्वर संचय... रचना की शायद यहीसबसे बड़ी अनिवार्यता है और धर्मिता भी ---इसी के अधीन तो प्रकृति और पुरुष दोनों ही सतत रचनाशील रहे हैं... गुफा में रहने वालों से लेकर आज के बृहमांड में बिचरते वैज्ञानिक सभी। यह.भाषा, संस्कृति...मानवता के सूक्ष्म चक्षाणु , इन्हें तो बचाना ही है, हर पीढ़ी को धाती की तरह अगली पीढ़ीतक पहुंचाना ही है, क्योंकि इनमें ही तो नश्वर मानव के अमरत्व का सार है और किसी भी साहित्य की शायद यहीसबसे बड़ी चुनौतीभी रहीहै। संक्षेप में कहूं, तोवही साहित्य, साहित्य (स-हित)है, जो काल की कसौटी पर खरा उतरे, जिसमें सत्यं शिवं और सुन्दरम् तीनों का ही संतुलित समावेश हो; और ऐसे साहित्य का संरक्षण व प्रचार और प्रोत्साहनहर समाज हरमानव का, चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में हो, मानवता केपारस्परिक उत्थान और सद्भावना के हित मेंसर्वोपरि कर्तव्य है!
प्रेमचंद ने सन 1936 में अपने लेख ’महाजनी सभ्यता’ में लिखा है कि ’मनुष्य समाज दो भागों में बँट गया है । बड़ा हिस्सा तो मरने और खपने वालों का है, और बहुत ही छोटा हिस्सा उन लोगों का था जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को बस में किए हुए हैं ।इन्हें इस बड़े भाग के साथ किसी तरह की हमदर्दी नहीं, जरा भी रू -रियायत नहीं । उसकाअस्तित्व केवल इसलिए है कि अपने मालिकों के लिए पसीना बहाए, खून गिराए और चुपचाप इस दुनिया से विदा हो जाए ।’ इस उद्धरण से यह स्पष्ट है कि प्रेमचंद की मूल सामाजिक चिंताएँ क्या थीं ।
वह भली भाँति समझ गये थे कि एक बड़े वर्ग यानि बहुजन समाज की बदहाली के जिम्मेदार, उनपर शासन करने वाले, उनका शोषण करने वाले, कुछ थोड़े से पूंजीपति,जमींदार,व्यवसायी ही नहीं थे बल्कि अंग्रेजी हुकूमत में शामिल (सेवक / नौकर) उच्चवर्णीय निम्न-मध्यवर्ग / मध्यवर्ग भी उतना ही दोषी था। किसान, मजदूर, दलित वर्ग न केवल शोषित और ख़स्ताहाल था बल्कि नितांत असहाय और नियति का दास बना हुआ जी रहा था। दोनों वर्गों की इतनी साफ-साफ पहचान प्रेमचंद से पहले हिन्दी साहित्य में किसी ने भी नहीं की थी। एक ओर साम्राज्यवादी अंग्रेजी शिकंजा था तो दूसरी ओर सामंतवादी शोषण की पराकाष्ठा थी । एक तरफ अंग्रेजों के आधिपत्य से देश को मुक्त कराने के लिए आंदोलन था, दूसरी ओर जमींदारों और पूंजीपतियों के विरोध में कोई विरोध मुखर रूप नहीं ले पा रहा था। अधिकांश मध्यवर्ग अंग्रेजी शासन का समर्थक था क्योंकि उसे वहाँ सुख सुविधाएँ, कुछ अधिकार और मिथ्या अहंकार प्रदर्शन से आत्म गौरव का अनुभव होता था।
प्रेमचंद ने अपने एक लेख में (असहयोग आंदोलन और गाँधीजी के प्रभाव में) सन 1921 में’स्वराज की पोषक और विरोधी व्यवस्थाओं’ के तहत लिखा था कि ’शिक्षित समुदाय सदैव शासन का आश्रित रहता है । उसी के हाथों शासन कार्य का संपादन होता है अतएव उसका स्वार्थ इसी में है कि शासन सुदृढ़ रहे और वह स्वयं शासन के स्वेच्छाचार (दमन, निरंकुशता और अराजकता) में भाग लेता रहे । इतिहास में ऐसी घटनाओं की भी कमी नहीं है जब शिक्षित वर्ग ने राष्ट्र और देश को अपने स्वार्थ पर बलिदान दे दिया है । यह समुदाय विभीषणों और भगवान दासों से भरा हुआ है। प्रत्येक जाति का उद्धार सदैव कृषक या श्रमजीवियों द्वारा हुआ है।’ यह निष्कर्ष आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है प्रेमचन्द ने । उन्होंने'ज़माना' में 1919 ई. में एक लेख लिखा था जिसमें कहा था कि इस देश में 90 प्रतिशत किसान हैं, और किसान सभा नहीं है। 1925 ई. मे किसान सभा बनी।सामान्यत: यह माना जाता है कि मध्य वर्ग की किसी भी आंदोलन, क्रांति और विद्रोह में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है ।
मध्यवर्ग का एक हिस्सा शासन का पैरोकार और दूसरा हिस्सा आंदोलनों की आवश्यकता का हिमायती होता है। यह दूसरा हिस्सा वैचारिक परिस्थितियों का निर्माण करने में तो अपनी भूमिका का निर्वाह करता है पर आंदोलन की शुरूआत की जिम्मेदारी से वह सदैव बचता रहता है। वह आंदोलन के उग्र और सर्वव्यापी होने पर ही उसमें सक्रिय हिस्सेदारी करता है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस वर्ग की उदासीनता से तो प्रेमचंद क्षुब्ध थे ही, साथ ही समाज में व्याप्त अंधविश्वास, प्रपंच, सामंती शोषण, वर्ग और वर्ण भेद के वीभत्स और कुत्सित रूप के प्रति भी इस वर्ग की उदासीनता एवं तटस्थता से भी वह नाखुश थे । प्रेमचंद का जन्म पराधीन भारत की पृष्ठभूमि में हुआ था जहाँ स्वयं उनको तथा उनके परिवार को अर्थाभाव की विकट स्थितियों से गुजरने के लिए विवश होना पड़ा था । वहीं धार्मिक और सामाजिक रूढ़िग्रस्तता ने जनमानस को विचारशून्य बना रखा था (यहाँ विचारशून्यता से तात्पर्य शोषण और असमानता की परिस्थियों के प्रति विरोध न करने से है)। इसी असहायता, यथास्थिति और असमानता की जनव्याप्ति की प्रतिक्रिया स्वरूप प्रेमचंद की विचारशील प्रकृति को इस व्यवस्था के विरोध की प्रेरणा प्राप्त हुई ।
]भारतीय परिवेश में उस समय पाखण्ड, आडम्बर, ढोंग, अंधविश्वास, दहेज, स्त्री उत्पीड़न, सूदखोरी,महाजनी, बेगार,छुआछूत, धार्मिक प्रपंच, सामंती उत्पीड़न और पूँजी के प्रभाव विस्तार के विषम रोग बुरी तरह समाज में व्याप्त थे । ये रोग मनुष्य के मनुष्यत्व को खाए जा रहे थे । प्रेमचंद ने इस अभिशप्त समाज और आदमी की अंतर्वेदना को बहुत सहृदयता और संवेदनशीलता के साथ देखा-सुना और परखा था जिसके कारण उनके लेखन में वर्गीय समाज का स्पष्ट चित्र उभर कर आया । वह गरीबों, दलितों और शोषितों के पक्षधर लेखक बने । लेखन के बारे में उनका सोचना था कि ’साहित्य में राजनीति के आगे मशाल दिखाने वाली सच्चाई की शक्ति होती है ।’ प्रेमचंद का पूरा जीवन इसी संघर्ष में बीता, जिसमें वे लेखन को प्राथमिक और अपने आप में पूरा काम का दर्जा दिलाने की लड़ाई लड़ते रहे । लिखना एक समाजोपयोगी उत्पादक क्रिया है, यह समझ अभी भी हमारे भीतर नहीं । लिखने के पहले एक पूरी तैयारी की दरकार होती है ।
‘किसानों की बदहाल जिंदगी में बदलाव से ही मुल्क की सूरत बदलेगी. उनका आकलन है कि अंगरेजी राज्य में गरीबों, मजदूरों और किसानों की दशा जितनी खराब है और होती जा रही है,उतना समाज के किसी अंग की नहीं. राष्ट्रीयता या स्वराज्य उनके लिए विशाल किसान जागरण का स्वप्न है, जिसके जरिये भेदभाव और शोषण से मुक्त समाज बनेगा.’ उन्हीं केशब्दों में- हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं, उसमें तो वर्णों की गंध तक नहीं होगी. वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा. प्रेमचंद ने अच्छी तरह समझ लिया था भारत में सबसे खराब हालत कृषकों और श्रमिकों की ही है । एक ओर ज़मींदारी शोषण है तो दूसरी ओर पूँजीपति, उद्योगपति हैं, बीच में सूदख़ोर महाजन हैं।
लेकिन यदि यहीं तक उन्होंने अपनी समझदारी का विकास किया होता तो शायद उनकी समझ और दृष्टि भारतीय समाज के चितेरे के रूप में अधूरी ही रहती । उन्होंने भारतीय जन-जीवन में सदियों से व्याप्त अमानवीय जाति प्रथा की ओर भी पूरा ध्यान दिया। इसलिए उनकी अनेक कहानियाँ वर्णव्यवस्था के अमानुषिक कार्यव्यापार का बड़ी स्पष्टता से खुलासा करती हैं। ठाकुर का कुआँ, सद्गति, सवा सेर गेहूँ, गुल्ली डन्डा, कफन उनकी ऐसी प्रतिनिधि कहानियाँ हैं इस सामाजिक विसंगति को पूरी ईमानदारी से उजागर करती हैं । ’ठाकुर का कुआँ’ में जोखू चमार को ज्वर का ताप अवश कर देता है ।
वहीं चमार टोले में जो कुआँ है उसमें कोई जानवर गिर कर मर गया है । उस कुएँ का पानी पीना किसी तरह निरापद नहीं है अत: पीने के लिए स्वच्छ पानी की आवश्यकता है । अब साफ पानी सिर्फ ठाकुर के कुएँ से ही मिल सकता है, लेकिन चमार वहाँ नहीं जा सकते। वर्णधर्म के अनुसार वे अश्पृश्य तो थे ही उनकी छाया तक अपवित्र मानी जाती थी । अत: जोखू की पत्नी को रात के अंधेरे में चुपके से पानी ले आने का दुस्साहस सँजोना पड़ता है । पर ठाकुर की आवाज मात्र से ही वह भयभीत हो जाती है और अपना बरतन कुएँ में ही छोड़ कर भाग खड़ी होती है। घर लौटकर देखती है कि जोखू वही गंदा पानी पी रहा है। एक तरफ घोर अमानुषिकता है तो दूसरी तरफ त्रासद निस्सहायता है। ऐसा जोखू के निर्धन होने के कारण नहीं वरना अछूत होने के कारण है क्योंकि एक निर्धन सवर्ण को उस ठाकुर के कुएँ से पानी भरने से वंचित तो नहीं ही किया जा सकता था और चाहे जितना अत्याचार या शोषण उसका किया जाता रहा हो ।
’सद्गति’ कहानी में दुखी यों तो चमार जाति का है पर अपनी बेटी के ब्याह का शुभ मुहूर्त वह पंडित से निकलवाने पहुँच जाता है। बावजूद भूखे पेट होने के वह पंडित के आदेशानुसार श्रम करता है और अंतत: लकड़ी चीरता हुआ मर जाता है। उसकी लाश के साथ पंडित परिवार का व्यवहार क्रूरता की चरम स्थिति वाला होता है। वह उसे घिसटवा कर फिंकवा देता है। ’सवा सेर गेहूँ’ में पंडित सूदखोर है। शंकर आजन्म उस पंडित का सूद नहीं चुका पाता।’कफन’के घीसू और माधव भी दलित हैं और व्यवस्था के दुचक्र ने उन्हें जिस मोड़ पर पहुँचा दिया है वह भी अमानवीय ही है। ’गुल्ली डन्डा’ का गया भी अपनी स्थिति से बाहर निकल पाने में असमर्थ होता है।
’गोदान’ का होरी, महतो है और राय साहब, पंडित दातादीन और महाजन के शोषण का शिकार होता है। होरी के मर जाने पर गोदान के बहाने पंडित दातादीन होरी की पत्नी धनिया की जमा पूँजी ’सवा रुपये’ भी हड़प लेता है। यहाँ हम स्पष्ट रूप से देखते हैं कि एक ओर प्रेमचंद की कहानियों में अद्वितीय ’पूस की रात’, ’पंच परमेश्वर’, ’बड़े भाई साहब’, ’नमक का दरोगा’ जैसी कहानियाँ हैं एवं ’निर्मला’, प्रेमाश्रम’, ’कायाकल्प’ और ’गबन’ जैसे सामाजिक कुरीतियों और नारीशोषण पर आधारित उपन्यास हैं वहीं गोदान में उनकी वर्णचेतना, वर्गचेतना तक विस्तृत होती है। गबन उपन्यास के अविस्मरणीय चरित्र देवीदीन खटीक, जिसके दो बेटे स्वाधीनता आंदोलन में शहीद हुए थे, को आनेवाले राज्य के शासक वर्ग और उसकेहाकिम-हुक्कामों के बारे में तगड़ा संशय है- ‘अरे, तुम क्या देश का उद्धार करोगे ।
पहले अपना उद्धार कर लो, गरीबों को लूट कर विलायत का घर भरना तुम्हारा काम है... सच बताओ, तब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौन-सा रूप तुम्हारी आंखों के सामने आता है ? तुम भी बड़ी-बड़ी तलब लोगे, तुम भी अंगरेजों की तरह बंगलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंगरेजी ठाठ बनाये घूमोगे । इस सुराज से देश का क्या कल्याण होगा ? तुम्हारी और तुम्हारे भाई-बंदों की जिंदगी भले आराम और ठाठ से गुजरे, पर देश का तो कोई भला न होगा... तुम दिन में पांच बेर खाना चाहते हो और वह भी बढ़िया माल । गरीब किसान को एक जून सूखा चबेना भी नहीं मिलता । उसी का रक्त चूस कर तो सरकार तुम्हें हुद्दे देती है. तुम्हारा ध्यान कभी उनकी ओर जाता है ? अभी तुम्हारा राज नहीं है, तब तो तुम भोग-विलास पर इतना मरते हो, जब तुम्हारा राज हो जायेगा, तब तो गरीबों को पीस कर पी जाओगे ।‘
प्रेमचन्द ने 19वीं सदी के अन्तिम दशक से लेकर 20वीं सदी के लगभग तीसरे दशक तक,भारत में फैली हुई तमाम सामाजिक समस्याओं पर लेखनी चलायी। चाहे वह किसानों-मजदूरों एवं जमींदारों की समस्या हो, चाहे छुआछूत अथवा नारी-मुक्ति का सवाल हो, चाहे नमक का दरोगा के माध्यम से समाज में फैले इंस्पेक्टर-राज का जिक्र हो, कोई भी अध्याय उनकी निगाहों से बच नहीं सका। प्रेमचन्द ने हिन्दी कथा साहित्य को एक नया मोड़ दिया, जहाँ पहले साहित्य मायावी भूल-भुलैयों में पड़ा स्वप्नलोक और विलासिता की सैर कर रहा था, ऐसे में प्रेमचन्द ने कथा साहित्य में जनमानस की पीड़ा को उभारा। निश्चय ही यह कहा जा सकता है कि प्रेमचंद भले ही दलित वर्ण में पैदा न हुए हों पर इतना तो तय है कि वह दलितों के प्रति पूरी ईमानदारी, सहानुभूति और सम्मान के साथ, उनके साथ होने वाले अन्यायों के विरोधी और उनके मानवीय सामाजिक-आर्थिक अधिकारों के समर्थक थे ।
प्रसिध्द इतिहासकार प्रो. विपिन चन्द्र ने एक बार टिप्पणी की थी-''यदि कभी बीसवीं शताब्दी में आज़ादी के पूर्व किसानों की हालत के बारे में इतिहास लिखा जाएगा तो इतिहासकार का प्राथमिक स्त्रोत होगा प्रेमचंद का 'गोदान',क्योंकि इतिहास कभी भी अपने समय के साहित्य को ओझल नहीं करता।'' गोदान मात्र किसान की संघर्ष गाथा नहीं है वरन् इसमें स्त्री की बहुरूपात्मक स्थिति को दर्शाते हुए उसकी संघर्ष गाथा को भी चित्रित किया गया है। गोदान में अभिव्यक्त गोबर व झुनिया के बीच अवैध प्रेम और विवाह, सिलिया चमाइन और मातादीन पण्डित का प्रेम-प्रसंग जहाँ परम्परा में सेंध लगाते हैं और स्त्री को मुक्त करते हैं वहीं मेहता से प्रेम करते वाली मालती मलिन बस्तियों में मुफ्त दवा बाँट कर सामाजिक कार्यकत्री के रूप में नज़र आती है तो क्लब - संस्कृति के बहाने वह जीवन का द्वैत भी जीती है।
प्रेमचन्द ने जिस दौर में सक्रिय रूप से लिखना शुरू किया, वह छायावाद का दौर था। निराला,पंत, प्रसाद और महादेवी जैसे रचनाकार उस समय चरम पर थे पर प्रेमचन्द ने अपने को तत्कालीन समाज में व्याप्त छुआछूत,साम्प्रदायिकता, हिन्दू- मुस्लिम एकता, दलितों के प्रति सामाजिक समरसता जैसे ज्वलंत मुद्दों से जोड़ा। एक लेखक से परे भी उनकी चिन्तायें थींऔर उनकी रचनाओं में इसकी मुखर अभिव्यक्ति हुई है। उनकी कहानियों और उपन्यासों के पात्र सामाजिक व्यवस्थाओं से जूझते हैं और अपनी नियति के साथ-साथ भविष्य की इबारत भी गढ़ते हैं। नियति में उन्हें यातना, दरिद्रता व नाउम्मीदी भले ही मिलती हो पर अंतत: वे हार नहीं मानते हैं और संघर्षों की जिजीवषा के बीच भविष्य की नींव रखते हैं।
अपने वैयक्तिक जीवन के संघर्षों से प्रेमचन्द ने जाना था कि संघर्ष का रास्ता बेहद पथरीला है और मात्र संवेदनाओं व हृदय परिवर्तन से इसे नहीं पार किया जा सकता। यही कारण था किप्रेमचन्द ऊपर से जितने उद्विग्न थे, अन्दर से उतने ही विचलित। वस्तुत: प्रेमचन्द एक ऐसे राष्ट्र-राज्य की कल्पना करते थे जिसमें किसी भी तरह का भेदभाव न हो- न वर्ण का, न जाति का, न रंग का और न धर्म का। प्रेमचन्द का सपना हर तरह की विषमता, सामाजिक कुरीतियों और साम्प्रदायिक-वैमनस्य से परे एक ऐसे राष्ट् का निर्माण था जिसमें समता सर्वोपरि हो।
प्रेमचन्द इस तथ्य को भली-भाँति जानते थे कि भारतीय समाज में विद्यमान पृथकता ही उपनिवेशवाद की जड़ रहा है। अँगरेज़ों ने इस पृथकता व विषमता की खाई को और भी गहरा करने का प्रयास किया और भारत को सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक व सांस्कृतिक सभी मोर्चों पर क्षति पहुँचायी। यही कारण है कि सन् 1933 में जब संयुक्त प्रान्त के गर्वनर मालकम हेली ने कहा कि- '' जहाँ तक भारत की मनोवृत्ति का हमें परिचय है, यह कहना युक्तिसंगत है कि वह आज से 50 वर्ष बाद भी अपने लिये कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बना पाएगा, जो स्पष्ट रूप से बहुमत के लिये जवाबदेह हो।'' प्रेमचन्द ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया और लिखा कि- ''जिनका सारा जीवन ही भारत की राष्ट्रीय आकांक्षाओं का दमन करते गुज़रा है, उनका यह कथन उचित नहीं प्रतीत होता।'' प्रेमचंद के बाद जिन लोगों ने साहित्य को सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील मूल्यों के साथ आगे बढ़ाने का काम किया, उनके साथ प्रेमचंद की दी हुई विरासत और परंपरा ही काम कर रही थी। बाद की तमाम पीढ़ियों, जिसमें यशपाल से लेकर मुक्तिबोध तक शामिल हैं, को प्रेमचंद के रचना-कर्म ने दिशा प्रदान की।
मैं चुपचाप खडा सब देख रहा हूँ और अब न जाने क्यों मुझे मन में लग रहा है कि दीवानचंद की शवयात्रा में कम से कम मुझे तो शामिल हो ही जाना चाहिए था। उनके लडके से मेरी खासी जान-पहचान है और ऐसे मौके पर तो दुश्मन का साथ भी दिया जाता है। सर्दी की वजह से मेरी हिम्मत छूट रही है... पर मन में कहीं शवयात्रा में शामिल होने की बात भीतर ही भीतर कोंच रही है।
चारों तरफ कुहरा छाया हुआ है। सुबह के नौ बजे हैं, लेकिन पूरी दिल्ली धुँध में लिपटी हुई है। सडकें नम हैं। पेड भीगे हुए हैं। कुछ भी साफ दिखाई नहीं देता। जिंदगी की हलचल का पता आवाजों से लग रहा है। ये आवाजें कानों में बस गई हैं। घर के हर हिस्से से आवाजें आ रही हैं। वासवानी के नौकर ने रोज की तरह स्टोव जला दिया है, उसकी सनसनाहट दीवार के पार से आ रही है। बगल वाले कमरे में अतुल मवानी जूते पर पालिश कर रहा है... ऊपर सरदारजी मूँछों पर फिक्सो लगा रहे हैं... उनकी खिडकी के परदे के पार जलता हुआ बल्ब बडे मोती की तरह चमक रहा है। सब दरवाजे बंद हैं, सब खिडकियों पर परदे हैं, लेकिन हर हिस्से में जिंदगी की खनक है। तिमंजिले पर वासवानी ने बाथरूम का दरवाजा बंद किया है और पाइप खोल दिया है...
कुहरे में बसें दौड रही हैं। जूँ-जूँ करते भारी टायरों की आवाजें दूर से नजदीक आती हैं और फिर दूर होती जाती हैं। मोटर-रिक्शे बेतहाशा भागे चले जा रहे हैं। टैक्सी का मीटर अभी किसी ने डाउन किया है। पडोस के डॉक्टर के यहाँ फोन की घंटी बज रही है। और पिछवाडे गली से गुजरती हुई कुछ लडकियाँ सुबह की शिफ्ट पर जा रही हैं।
सख्त सर्दी है। सडकें ठिठुरी हुई हैं और कोहरे के बादलों को चीरती हुई कारें और बसें हॉर्न बजाती हुई भाग रही हैं। सडकों और पटरियों पर भीड है, पर कुहरे में लिपटा हुआ हर आदमी भटकती हुई रूह की तरह लग रहा है।
वे रूहें चुपचाप धुँध के समुद्र में बढती जा रही हैं... बसों में भीड है। लोग ठंडी सीटों पर सिकुडे हुए बैठे हैं और कुछ लोग बीच में ही ईसा की तरह सलीब पर लटके हुए हैं बाँहें पसारे, उनकी हथेलियों में कीलें नहीं, बस की बर्फीली, चमकदार छडें हैं।
और ऐसे में दूर से एक अर्थी सडक पर चली आ रही है।
इस अर्थी की खबर अखबार में है। मैंने अभी-अभी पढी है। इसी मौत की खबर होगी। अखबार में छपा है आज रात करोलबाग के मशहूर और लोकप्रिय बिजनेस मैगनेट सेठ दीवानचंद की मौत इरविन अस्पताल में हो गई। उनका शव कोठी पर ले आया गया है। कल सुबह नौ बजे उनकी अर्थी आर्य समाज रोड से होती हुई पंचकुइयाँ श्मशान-भूमि में दाह-संस्कार के लिए जाएगी।
और इस वक्त सडक पर आती हुई यह अर्थी उन्हीं की होगी। कुछ लोग टोपियाँ लगाए और मफलर बाँधे हुए खामोशी से पीछे-पीछे आ रहे हैं। उनकी चाल बहुत धीमी है। कुछ दिखाई पड रहा है, कुछ नहीं दिखाई पड रहा है, पर मुझे ऐसा लगता है अर्थी के पीछे कुछ आदमी हैं।
मेरे दरवाजे पर दस्तक होती है। मैं अखबार एक तरफ रखकर दरवाजा खोलता हूँ। अतुल मवानी सामने खडा है।
'यार, क्या मुसीबत है, आज कोई आयरन करने वाला भी नहीं आया, जरा अपना आयरन देना। अतुल कहता है तो मुझे तसल्ली होती है। नहीं तो उसका चेहरा देखते ही मुझे खटका हुआ था कि कहीं शवयात्रा में जाने का बवाल न खडा कर दे। मैं उसे फौरन आयरन दे देता हूँ और निश्चिंत हो जाता हूँ कि अतुल अब अपनी पेंट पर लोहा करेगा और दूतावासों के चक्कर काटने के लिए निकल जाएगा।
जब से मैंने अखबार में सेठ दीवानचंद की मौत की खबर पढी थी, मुझे हर क्षण यही खटका लगा था कि कहीं कोई आकर इस सर्दी में शव के साथ जाने की बात न कह दे। बिल्डिंग के सभी लोग उनसे परिचित थे और सभी शरीफ, दुनियादार आदमी थे।
तभी सरदारजी का नौकर जीने से भडभडाता हुआ आया और दरवाजा खोलकर बाहर जाने लगा। अपने मन को और सहारा देने के लिए मैंने उसे पुकारा, 'धर्मा! कहाँ जा रहा है?
'सरदारजी के लिए मक्खन लेने, उसने वहीं से जवाब दिया तो लगे हाथों लपककर मैंने भी अपनी सिगरेट मँगवाने के लिए उसे पैसे थमा दिए।
सरदारजी नाश्ते के लिए मक्खन मँगवा रहे हैं, इसका मतलब है वे भी शवयात्रा में शामिल नहीं हो रहे हैं। मुझे कुछ और राहत मिली। जब अतुल मवानी और सरदारजी का इरादा शवयात्रा में जाने का नहीं है तो मेरा कोई सवाल ही नहीं उठता। इन दोनों का या वासवानी परिवार का ही सेठ दीवानचंद के यहाँ ज्यादा आना-जाना था। मेरी तो चार-पाँच बार की मुलाकात भर थी। अगर ये लोग ही शामिल नहीं हो रहे हैं तो मेरा सवाल ही नहीं उठता।
सामने बारजे पर मुझे मिसेस वासवानी दिखाई पडती हैं। उनके खूबसूरत चेहरे पर अजीब-सी सफेदी और होंठों पर पिछली शाम की लिपस्टिक की हल्की लाली अभी भी मौजूद थी। गाउन पहने हुए ही वे निकली हैं और अपना जूडा बाँध रही हैं। उनकी आवाज सुनाई पडती है, 'डाश्ललग, जरा मुझे पेस्ट देना, प्लीज...
मुझे और राहत मिलती है। इसका मतलब है कि मिस्टर वासवानी भी मैयत में शामिल नहीं हो रहे हैं।
दूर आर्य समाज रोड पर वह अर्थी बहुत आहिस्ता-आहिस्ता बढती आ रही है...
अतुल मवानी मुझे आयरन लौटाने आता है। मैं आयरन लेकर दरवाजा बंद कर लेना चाहता हूँ, पर वह भीतर आकर खडा हो जाता है और कहता है, 'तुमने सुना, दीवानचंदजी की कल मौत हो गई है।
'मैंने अभी अखबार में पढा है, मैं सीधा-सा जवाब देता हूँ, ताकि मौत की बात आगे न बढे। अतुल मवानी के चेहरे पर सफेदी झलक रही है, वह शेव कर चुका है। वह आगे कहता है, 'बडे भले आदमी थे दीवानचंद।
यह सुनकर मुझे लगता है कि अगर बात आगे बढ गई तो अभी शवयात्रा में शामिल होने की नैतिक जिम्मेदारी हो जाएगी, इसलिए मैं कहता हूँ, 'तुम्हारे उस काम का क्या हुआ?
'बस, मशीन आने भर की देर है। आते ही अपना कमीशन तो खडा हो जाएगा। यह कमीशन का काम भी बडा बेहूदा है। पर किया क्या जाए? आठ-दस मशीनें मेरे थ्रू निकल गईं तो अपना बिजनेस शुरू कर दूँगा। अतुल मवानी कह रहा है, 'भई, शुरू-शुरू में जब मैं यहाँ आया था तो दीवानचंदजी ने बडी मदद की थी मेरी। उन्हीं की वजह से कुछ काम-धाम मिल गया था। लोग बहुत मानते थे उन्हें।
फिर दीवानचंद का नाम सुनते ही मेरे कान खडे हो जाते हैं। तभी खिडकी से सरदारजी सिर निकालकर पूछने लगते हैं, 'मिस्टर मवानी! कितने बजे चलना है?
'वक्त तो नौ बजे का था, शायद सर्दी और कुहरे की वजह से कुछ देर हो जाए। वह कह रहा है और मुझे लगता है कि यह बात शवयात्रा के बारे में ही है।
सरदारजी का नौकर धर्मा मुझे सिगरेट देकर जा चुका है और ऊपर मेज पर चाय लगा रहा है। तभी मिसेज वासवानी की आवाज सुनाई पडती है, 'मेरे खयाल से प्रमिला वहाँ जरूर पहुँचेगी, क्यों डाश्ललग?
'पहुँचना तो चाहिए। ...तुम जरा जल्दी तैयार हो जाओ। कहते हुए मिस्टर वासवानी बारजे से गुजर गए हैं।
अतुल मुझसे पूछ रहा है, 'शाम को कॉफी-हाउस की तरफ आना होगा?
'शायद चला आऊँ, कहते हुए मैं कम्बल लपेट लेता हूँ और वह वापस अपने कमरे में चला जाता है। आधे मिनट बाद ही उसकी आवाज फिर आती है, 'भई, बिजली आ रही है?
मैं जवाब दे देता हूँ, 'हाँ, आ रही है। मैं जानता हूँ कि वह इलेक्ट्रिक रॉड से पानी गर्म कर रहा है, इसीलिए उसने यह पूछा है।
'पॉलिश! बूट पॉलिश वाला लडका हर रोज की तरह अदब से आवाज लगाता है और सरदारजी उसे ऊपर पुकार लेते हैं। लडका बाहर बैठकर पॉलिश करने लगता है और वह अपने नौकर को हिदायतें दे रहे हैं, 'खाना ठीक एक बजे लेकर आना।... पापड भूनकर लाना और सलाद भी बना लेना...।
मैं जानता हूँ सरदारजी का नौकर कभी वक्त से खाना नहीं पहुँचाता और न उनके मन की चीजें ही पकाता है।
बाहर सडक पर कुहरा अभी भी घना है। सूरज की किरणों का पता नहीं है। कुलचे-छोलेवाले वैष्णव ने अपनी रेढी लाकर खडी कर ली है। रोज की तरह वह प्लेटें सजा रहा है, उनकी खनखनाहट की आवाज आ रही है। सात नंबर की बस छूट रही है। सूलियों पर लटके ईसा उसमें चले जा रहे हैं और क्यू में खडे और लोगों को कंडक्टर पेशगी टिकट बाँट रहा है। हर बार जब भी वह पैसे वापस करता है तो रेजगारी की खनक यहाँ तक आती है। धँध में लिपटी रूहों के बीच काली वर्दी वाला कंडक्टर शैतान की तरह लग रहा है।
और अर्थी अब कुछ और पास आ गई है।
'नीली साडी पहन लूँ? मिसेज वासवानी पूछ रही हैं।
वासवानी के जवाब देने की घुटी-घुटी आवाज से लग रहा है कि वह टाई की नॉट ठीक कर रहा है।
सरदारजी के नौकर ने उनका सूट ब्रुश से साफ करके हैंगर पर लटका दिया है। और सरदारजी शीशे के सामने खडे पगडी बाँध रहे हैं।
अतुल मवानी फिर मेरे सामने से निकला है। पोर्टफोलियो उसके हाथ में है। पिछले महीने बनवाया हुआ सूट उसने पहन रखा है। उसके चेहरे पर ताजगी है और जूतों पर चमक। आते ही वह मुझे पूछता है, 'तुम नहीं चल रहे हो? और मैं जब तक पूछूँ कि कहाँ चलने को वह पूछ रहा है, वह सरदारजी को आवाज लगाता है, 'आइए, सरदारजी! अब देर हो रही है। दस बज चुका है।
दो मिनट बाद ही सरदारजी तैयार होकर नीचे आते हैं कि वासवानी ऊपर से ही मवानी का सूट देखकर पूछता है, 'ये सूट किधर सिलवाया?
'उधर खान मार्केट में।
'बहुत अच्छा सिला है। टेलर का पता हमें भी देना। फिर वह अपनी मिसेज को पुकारता है, 'अब आ जाओ, डियर!... अच्छा मैं नीचे खडा हूँ तुम आओ। कहता हुआ वह भी मवानी और सरदारजी के पास आ जाता है और सूट को हाथ लगाते हुए पूछता है, 'लाइनिंग इंडियन है।
'इंग्लिश!
'बहुत अच्छा फिटिंग है! कहते हुए वह टेलर का पता डायरी में नोट करता है। मिसेज वासवानी बारजे पर दिखाई पडती हैं।
अर्थी अब सडक पर ठीक मेरे कमरे के नीचे है। उसके साथ कुछेक आदमी हैं, एक-दो कारें भी हैं, जो धीरे-धीरे रेंग रही हैं। लोग बातों में मशगूल हैं।
मिसेज वासवानी जूडे में फूल लगाते हुए नीचे उतरती हैं तो सरदारजी अपनी जेब का रुमाल ठीक करने लगते हैं। और इससे पहले कि वे लोग बाहर जाएँ वासवानी मुझसे पूछता है, 'आप नहीं चल रहे?
'आप चलिए मैं आ रहा हूँ। मैं कहता हूँ, पर दूसरे ही क्षण मुझे लगता है कि उसने मुझसे कहाँ चलने को कहा है? मैं अभी खडा सोच ही रहा रहा हूँ कि वे चारों घर के बाहर हो जाते हैं।
अर्थी कुछ और आगे निकल गई है। एक कार पीछे से आती है और अर्थी के पास धीमी होती है। चलाने वाले साहब शवयात्रा में पैदल चलने वाले एक आदमी से कुछ बात करते हैं और कार सर्र से आगे बढ जाती है। अर्थी के साथ पीछे जाने वाली दोनों कारें भी उसी कार के पीछे सरसराती हुई चली जाती हैं।
मिसेज वासवानी और वे तीनों लोग टैक्सी स्टैंड की ओर जा रहे हैं। मैं उन्हें देखता रहता हूँ। मिसेज वासवानी ने फर-कालर डाल रखा है। और शायद सरदारजी अपने चमडे के दास्ताने पहने हैं और वे चारों टैक्सी में बैठ जाते हैं। अब टैक्सी इधर ही आ रही है और उसमें से खिलखिलाने की आवाज मुझे सुनाई पड रही है। वासवानी आगे सडक पर जाती अर्थी की ओर इशारा करते हुए ड्राइवर को कुछ बता रहा है।...
मैं चुपचाप खडा सब देख रहा हूँ और अब न जाने क्यों मुझे मन में लग रहा है कि दीवानचंद की शवयात्रा में कम से कम मुझे तो शामिल हो ही जाना चाहिए था। उनके लडके से मेरी खासी जान-पहचान है और ऐसे मौके पर तो दुश्मन का साथ भी दिया जाता है। सर्दी की वजह से मेरी हिम्मत छूट रही है... पर मन में कहीं शवयात्रा में शामिल होने की बात भीतर ही भीतर कोंच रही है।
उन चारों की टैक्सी अर्थी के पास धीमी होती है। मवानी गर्दन निकालकर कुछ कहता है और दाहिने से रास्ता काटते हुए टैक्सी आगे बढ जाती है।
मुझे धक्का-सा लगता है और मैं ओवरकोट पहनकर, चप्पलें डालकर नीचे उतर आता हूँ। मुझे मेरे कदम अपने आप अर्थी के पास पहुँचा देते हैं, और मैं चुपचाप उसके पीछे-पीछे चलने लगता हूँ। चार आदमी कंधा दिए हुए हैं और सात आदमी साथ चल रहे हैं सातवाँ मैं ही हूँ।और मैं सोच रहा हूँ कि आदमी के मरते ही कितना फर्क पड जाता है। पिछले साल ही दीवानचंद ने अपनी लडकी की शादी की थी तो हजारों की भीड थी। कोठी के बाहर कारों की लाइन लगी हुई थी...
मैं अर्थी के साथ-साथ लिंक रोड पर पहुँच चुका हूँ। अगले मोड पर ही पंचकुइयाँ श्मशान भूमि है।
और जैसे ही अर्थी मोड पर घूमती है, लोगों की भीड और कारों की कतार मुझे दिखाई देने लगती है। कुछ स्कूटर भी खडे हैं। औरतों की भीड एक तरफ खडी है। उनकी बातों की ऊँची ध्वनियाँ सुनाई पड रही हैं। उनके खडे होने में वही लचक है जो कनॉट प्लेस में दिखाई पडती है। सभी के जूडों के स्टाइल अलग-अलग हैं। मर्दों की भीड से सिगरेट का धुआँ उठ-उठकर कुहरे में घुला जा रहा है और बात करती हुई औरतों के लाल-लाल होंठ और सफेद दाँत चमक रहे हैं और उनकी आँखों में एक गरूर है...
अर्थी को बाहर बने चबूतरे पर रख दिया गया है। अब खामोशी छा गई है। इधर-उधर बिखरी हुई भीड शव के इर्द-गिर्द जमा हो गई है और कारों के शोफर हाथों में फूलों के गुलदस्ते और मालाएँ लिए अपनी मालकिनों की नजरों का इंतजार कर रहे हैं।
मेरी नजर वासवानी पर पडती है। वह अपनी मिसेज को आँख के इशारे से शव के पास जाने को कह रहा है और वह है कि एक औरत के साथ खडी बात कर रही है। सरदारजी और अतुल मवानी भी वहीं खडे हुए हैं।
शव का मुँह खोल दिया गया है और अब औरतें फूल और मालाएँ उसके इर्द-गिर्द रखती जा रही हैं। शोफर खाली होकर अब कारों के पास खडे सिगरेट पी रहे हैं।
एक महिला माला रखकर कोट की जेब से रुमाल निकालती है और आँखों पर रखकर नाक सुरसुराने लगती है और पीछे हट जाती है।
और अब सभी औरतों ने रुमाल निकाल लिए हैं और उनकी नाकों से आवाजें आ रही हैं।
कुछ आदमियों ने अगरबत्तियाँ जलाकर शव के सिरहाने रख दी हैं। वे निश्चल खडे हैं।
आवाजों से लग रहा है औरतों के दिल को ज्यादा सदमा पहुँचा है।
अतुल मवानी अपने पोर्टफोलियो से कोई कागज निकालकर वासवानी को दिखा रहा है। मेरे खयाल से वह पासपोर्ट का फॉर्म है।
अब शव को भीतर श्मशान भूमि में ले जाया जा रहा है। भीड फाटक के बाहर खडी देख रही है। शोफरों ने सिगरेटें या तो पी ली हैं या बुझा दी हैं और वे अपनी-अपनी कारों के पास तैनात हैं।
शव अब भीतर पहुँच चुका है।
मातमपुरसी के लिए आए हुए आदमी और औरतें अब बाहर की तरफ लौट रहे हैं। कारों के दरवाजे खुलने और बंद होने की आवाजें आ रही हैं। स्कूटर स्टार्ट हो रहे हैं। और कुछ लोग रीडिंग रोड, बस-स्टॉप की ओर बढ रहे हैं।
कुहरा अभी भी घना है। सडक से बसें गुजर रही हैं और मिसेज वासवानी कह रही हैं, 'प्रमिला ने शाम को बुलाया है, चलोगे न डियर? कार आ जाएगी। ठीक है न?
वासवानी स्वीकृति में सिर हिला रहा है।
कारों में जाती हुई औरतें मुस्कराते हुए एक-दूसरे से बिदा ले रही हैं और बाय-बाय की कुछेक आवाजें आ रही हैं। कारें स्टार्ट होकर जा रही हैं।
अतुल मवानी और सरदारजी भी रीडिंग रोड, बस स्टॉप की ओर बढ गए हैं और मैं खडा सोच रहा हूँ कि अगर मैं भी तैयार होकर आया होता तो यहीं से सीधा काम पर निकल जाता। लेकिन अब तो साढे ग्यारह बज चुके हैं।
चिता में आग लगा दी गई है और चार-पाँच आदमी पेड के नीचे पडी बैंच पर बैठे हुए हैं। मेरी तरह वे भी यूँ ही चले आए हैं। उन्होंने जरूर छुट्टी ले रखी होगी, नहीं तो वे भी तैयार होकर आते।
मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि घर जाकर तैयार होकर दफ्तर जाऊँ या अब एक मौत का बहाना बनाकर आज की छुट्टी ले लूँ आखिर मौत तो हुई ही है और मैं शवयात्रा में शामिल भी हुआ हूँ।
परछांइयाँ जो युग-युगान्तर के बाद भी एक-दूसरे को ढूंढ ही लेती हैं, पल पल छोड़ते और तजते रहते हैं हम इन्हें। और वक्त लागातार समेटता व सहेजता रहता है इन्हे, नए रूप और नए आकार देने के लिए, नए खेल रचाने को बनाता और बिगाड़ता रहता है इन्हे। इस तरह से विधना का यह खेल, जिसे हम दुनिया कहते हैं चलती रहती है और साथ-साथ वक्त के परदे पर...हमारी सोती जगती आंखों के आगे लगातार ये परछाँइयाँ भी तो हंसती रोती व मिलती-बिछड़ती रहती हैं, पर मानें या न मानें, एक बात तो साफ है कि धागे वह हमेशा अपने ही हाथों में रखता है।
हाल ही में कुछ ऐसा ही पढ़ा था औक्सफोर्ड में इंडियोलौजी की पढ़ाई करते क्रिस ने। पर तब उसे क्या पता था कि वाकई में क्या अर्थ है इस वाक्य का और जीवन और दर्शन ...दर्शन और जीवन, एक डोर के ही दो छोर हैं, कभी सुलझे तो कभी बेहद उलझे हुए !
शुक्रवार को कौलेज से लौटते ही, क्रिस ने फैसला कर लिया था कि वह वीकएन्ड पौप के साथ ही बिताएगा। न जाने किन धागों से लिपटा, वह शनैः शनैः उन्ही की तरफ ही तो खिंचता जा रहा था।
शनिवार की सुबह-सुबह ही वह पहुँच भी गया था डैड के घर पर।
अर्जुन सिंह की खुशी भी तो मानो सातवें आसमान को छू रही थी। बेटे को यूँ सहजता से गले लगाने में, उसका स्वागत करने में, पूरा दिन कभी बातों में तो कभी मूवी देखने में, कैसे निकल गया पता ही नहीं चला दोनों को। कहते हैं बेटे के पैर जूते में आने लगें तो वह दोस्त बन जाता है, फिर क्रिस का तो पैर ही नहीं कद भी बाप जितना हो चुका था।
सुबह बेटे को सोता देखकर मात्र बाल और माथा सहलाकर बगीचे में आ गए थे अर्जुन सिंह । सोने दो....जाने कबका थका है ...आज अपने घर, अपने कमरे की नींद पूरे तेइस साल बाद नसीब हुई है इसे। बेटो को पाकर अर्जुन सिंह का पूरा अस्तित्व ही मानो ऊदा-ऊदा हो चला था। बारबार मल्हार जैसा कुछ गाने को मन कर रहा था ...गिद्धा पाते बचपन के यार-दोस्त और पीछे छूटे घर-दालान और नेह के पल घूम रहे थे आंखों के आगे। बगल में रखे रेडियो पर भी तो किशोरकुमार गा रहे थे –आ लेकर चलूँ तुझे एक ऐसे गगन के तले, जहाँ गम न हो, आंसू न हों बस प्यार ही प्यार पले।
तब मनःस्थिति से लड़ने के बजाय उन्होंने भी जोर-जोर से गाना शुरु कर दिया।...
एक बेहद मीठी धुन पर गूंजती और उतनी ही सोजभरी आवाज को सुनकर ही क्रिस की आँखें खुली थीं। क्रिस यानी क्रिशिव आनंद रत्नम। बाप का यही नाम बताया था मां ने उसे और पुष्ट करने को जन्म प्रमाण पत्र पर भी यही लिखाया गया था । साथ में यह भी कि एक दुर्घटना में उसके जन्म लेने से पहले ही गुजर गए थे उसके पिता, इसलिए 'स्वर्गीय' इंजिनीयर आनंदरत्नम।
आज जब समझ में आया है कि कितना बड़ा झूठ किस सहजता से बोल गई थी मां, तो बहुत देर हो चुकी है उसके लिए। पूरा बचपन गंवा चुका है वह । होते हुए भी, बिना पिता के जिन्दगी के 23 बसंत पार कर लिए हैं क्रिशिव ने। वह तो भला हो मि.पौल बकल का ...जिन्होंने सच-सच बता दिया सब कुछ उसे।
...गुजरनी तो रात सैकड़ों उलझनों में चाहिए थी, परन्तु बहुत चैन सो सोया था क्रिस आज महीनों बाद, इस नए घर में। मानो यह उसका अपना ही घर, अपना ही कमरा हो। एक अपनापन, अधिकार सा महसूस हो रहा था घर पर। कमरे की हर चीज़ पर।
खुशनुमा सुबह थी वह। परदा खोलते ही धूप ने पुरजोर स्वागत किया उसका। कमरा उजाले से भर गया। अधखुली आंखों से उसने देखा, पौप, बाहर क्यारियों को तन्मयता से उकेरते नरगिस और अन्य वासंती फूलों की गांठें गाड़ रहे थे, वह भी एक कलाकार-की-सी कुशलता और एकाग्रता से।
...तो इन्हे भी उसकी ही तरह बागवानी का शौक है? नहीं गलत कह गया वह, उसने ही अपने पौप से यह शौक विरासत में लिया है, जैसे कि मम से कुकरी का। मन-ही-मन आज उसने जी भरकर अर्जुन सिंह को कई बार पौप्स कहकर पुकारा। अन्य भारतीय सहपाठियों के मुंह से सुना यह ‘पौप्स‘ शब्द आज दुनिया का सबसे मधुर और आत्मीय शब्द लग रहा था उसे-‘मम‘ से भी ज्यादा। पर जितनी सहजता से मन में गूंज रहा था, जितना आत्म-सुख दे रहा था, उतनी सहजता से उसके गले से बाहर नहीं ही निकला वह इच्छित संबोधन। पिछले सात आठ साल से पौप्स को ढूँढते नील के अंतस् की गहराइयों में गूंजता रहा, बस्स।...
आखिर पहचान ही कितनी है ! चन्द महीने पहले ही तो मिले हैं वे ! अविश्वास में बारबार गर्दन झटककर जाने क्या-क्या समझना , नकारना और स्वीकारना चाह रहा था क्रिस आज। फिर अगर वह न ढूँढता तो इतने पास रहकर भी मिल ही न पाते शायद वे कभी ! न क्रिकेट खेला, न कहानी सुनी, ना ही रूठा मचला गोदी में चढ़कर कभी, बचपन का एक पल भी तो साझा नहीं किया है इनके साथ। गोपी सही ही तो कह रही थी- दुनिया में आने की खुशी तो दूर, पता तक नहीं चला होगा इन्हें उसके आने का। ..दिन-तारीख क्या यह भी पता नहीं था इन्हें तो कि उस स्पर्म ने लड़का बनकर जन्म लिया या फिर लड़की ! इन्तजार नहीं था इन्हे उसका ! प्यार से उगाया फूल नहीं...एक परित्यक्त, बेचा हुआ स्पर्म है बस ! उसका इन्तजार नहीं था इन्हें कभी!
होकर भी बेटा कहाँ हूँ मैं इनका! जैसे सूर्य वीर्यदान करके कर्ण को भूल गए थे। बेटा नहीं, एक परित्यक्त अंश मात्र है वह, बस। फिर पिता-पुत्र के संबंध की अपेक्षा क्यों, भावनाओं का यह उमड़ता आवेग क्यों? डाली से टूटे फूल कितना ही पेड़ पर दावा करें वापस तो नहीं ही जोड़े जा सकते ! पर, ना तो यह एक जड़ ठूँठ है और ना ही वह एक पेड़ । पांच फीट 11 इंच का क्रिशिव है वह, इनका बेटा ।‘
क्रिस ने अपनी हठी सोच को एक ओर छिड़क दिया , पर सोच थी कि उसे छेड़े ही जा रही थी।
जाने किन परिस्थियों में कैसे संरचना हुई थी उसकी। किसे जरूरत थी उसकी, जानना चाहता था ठीक-ठीक से ,परन्तु जान नहीं पाया कभी। बस इतना ही पता चल पाया था कि मि. पौल बकल उसकी मां के दूसरे पति हैं और गोपी उन दोनों की बेटी। वह नहीं। फिर मां ने उसको अपने पहले पति आनंद रत्नम् का नाम क्यों दिया... ? सच तो यह है कि उसे दुनिया में ही लाने की क्या जरूरत थी? क्या जरूरत थी उसके अस्तित्व की जिसे कई झूठ का सहारा लेकर गढ़ा गया, जिया गया? पर अब और यह आनंदरत्नम नहीं। आनंदरत्नम का तो मां की भावनात्मक जरूरतों के अलावा और कोई संबंध ही नहीं उसके साथ।
और तब अपने ही आक्रोश और प्यार के भंवर में हिलोरें लेता क्रिस एकबार फिर पौप्स कहकर आवाज नहीं दे पाया उन्हें। संकोच की जाने कैसी दीवार खड़ी थी दोनों के बीच। कोई कुछ भी कहे, सोचे-समझे, विरासत का हक मांगने नहीं आया था क्रिशिव आनंदरत्नम वहाँ पर, बस जबसे पता चला है कि अर्जुन सिंह कटियार का बेटा है वह क्रिशिव सिंह कटियार कहने को, लिखने को बारबार मचल उठता है बावरा मन। किसी को दुख देने का, आहत करने की चाह नहीं, बस इस प्यार और दुविधा की बाढ़ को बांधना चाहता है वह...एकबार तैरना या डूबना, अपनी, इस रिश्ते की ताकत को जानना चाहता है वह।
कांपते हाथों से आँसू पोंछते, परदा पूरा खोल दिय़ा उसने। कोई आवाज नहीं दी, पौप्स कहकर नहीं पुकारा था उन्हें, पर जाने कैसे आवाज सुन ली थी उन्होंने। सही ही तो है, कहते हैं- प्यार की तो पीठ तक पर आंखें जड़ी होती हैं। स्नेह भरी आँखों से पलटकर उन्होंने क्रिस की तरफ देखा और बड़े जोश के साथ गुड मौर्निंग कहकर वेव किया ...वेव क्या मानो कभी न छोड़ने के लिए बेटे को बांहों में भर लेना चाहते थे अर्जुन सिंह ।
‘ उठ गए तुम। सुनो गरम-गरम आलू के पराठे और दही, अचार वगैरह सब डाइनिंग टेबल पर रखे हैं। मैंने खुद बनाए हैं तुम्हारे लिए। परकुलेटर में कौफी भी तैयार है। दो औरेंज जूस फ्रीज से निकाल कर गिलास में डालो। मैं बस हाथ का काम निपटाकर पांच मिनट में आता हूँ। साथ ही नाश्ता करेंगे हम, आज।‘
‘ एक अचरच का बंडल ही हैं यह पौप भी, खाना भी बना लेते हैं ...पराठे, वह भी इतनी जल्दी...इन्हें किसने बताया कि उसे आलू के पराठे बहुत पसंद हैं! ‘ क्रिस झटपट तैयार होकर नीचे आ गया और उसने वैसा ही किया जैसा कि उन्होंने कहा था। दो गिलास जूस बेसिल की दो दो पत्तियों से सजे अब बाप बेटे का इंतजार कर रहे थे। अगले पल ही खुशी से दमकते वह भी आ गए और कुरसी पर बैठते ही उन्होने खुद अपने हाथों से न सिर्फ उसकी प्लेट लगाई अपितु जिद कर-करके खिलाने लगे उसे, साथ में कभी कुछ तो कभी कुछ बतलाते भी जा रहे थे उसे।
अगले पल जब वह रोल बनाकर पराठा और चम्मच से दही खाने ही वाला था, तभी उठकर रोक दिया अर्जुन सिंह ने, बताते हुए कि कैसे असली स्वाद के लिए पराठे के एक-एक निवाले को कभी दही तो कभी अचार से छुआ-छुआकर खाया जाता है, यूँ अलग पराठे का रोल और चम्मच से दही अलग नहीं खाया जाता।
क्रिस अवर्चनीय सुख में डूबा चुपचाप खा रहा था और ध्यान से उनकी एकएक बात सुन रहा था- ‘ अच्छा तो पौप्स कैसा है भारत, कैसा है आपका पंजाब? सरसों का खेत, गन्ने का रस...यूँ तो मैंने कई-कई बातें किताबों में पढ़ी हैं, फिल्में देखी हैं और अपने गुरु व माँ से भी बहुत कुछ सुना व जाना है भारत के बारे में, पर आज सब आपकी आँखों और मन से जानना चाहूंगा। दिखाएंगे न...बताएंगे न ? ‘ बच्चों की सी सहजता और अबोधता से निष्पलक उनकी तरफ देखता, बीच-बीच में मंत्रमुग्ध क्रिस एकाध ऐसे सवाल भी पूछ ही ले रहा था उनसे।
और तब अर्जुन सिंह को वह बेहद अपना, बेहद प्यारा लगा। कैसे इतने दूर रह पाए वह, आश्चर्य था खुद पर ही उन्हे। बिन-ब्याहे, बिन पत्नी के अर्जुन सिंह का इतना खूबसूरत, इतना समझदार बेटा ! उनकी आंखों से स्नेह उमड़ा पड़ रहा था। पूरे बाप बने दिख रहे थे वह...दिख क्या, बन ही चुके थे। क्रिस की एक खोज, एक लगन ने उनके जीवन को अपिरमित खुशियों से भर दिया था। बेटे की पीठ थपथपाते बोले. ‘चलेंगे, जरूर चलेंगे। साथ –साथ घूमेंगे, सबसे मिलेंगे। और तुम्हें मैं वह सब दिखाऊंगा। सब बताऊंगा...दिल्ली का लाल किला, अमृतसर का स्वर्ण मंदिर और भी बहुत कुछ ...तुम्हारा अपना घर, मोहल्ला, अपने लोग...जरूर मिलवाऊंगा, जरूर बताऊंगा। तुम्हारा हक है जानने का।‘
‘और हाँ, अगली बार मैं तुम्हें मक्के की रोटी और सरसों का साग मठ्ठे के पेय के साथ परोसूंगा। अक्सर सुबह के नाश्ते में मैं यही खाया करता था दिल्ली में। आए दिन जिद करके बनवाता था। मुझे मालूम है तुम्हें भी बहुत अच्छा लगेगा...और हाँ गरम-गरम दूध जलेबी भी। ‘
वह अब अपने और क्रिस के बचपन को पूरा-का-पूरा हर खट्टी-मीठी याद के साथ दोबारा जीना चाहते थे। वाकई में बालक क्रिशिव की उंगली पकड़े अपने गांव में ही तो पहुंच गए थे, हुलस-हुलसकर खेत खलिहान, बाग बगीचे सब दिखलाते, सबसे मिलवाते...गुरुद्वारे , मंदिर हर देवी-देवता के आगे मत्था टेकते, अर्जुन सिंह।
चन्द मुलाकातों में ही कितना सहज हो गया है उनका रिश्ता। पॉल के साथ तो बीसियों साल में भी ऐसा नहीं हो पाया था कभी। उचित-अनुचित और यह वह के दायरे में ही गुत्थंगुत्थ रह गया वह सदा । तुलना नहीं करना चाहता था, फिर भी बहुत कुछ मथ रहा था क्रिस के मन और मस्तिष्क को। बेचैन मन कभी उड़कर उनके सीने से जा लगता तो कभी रूठकर कोप भवन में जा बैठता- ‘जब साथ नहीं रख सकते थे तो क्या अधिकार था, मुझे यह बिना बाप के नेह का...अनाथ जीवन देने का !’
एकबार, बस एकबार उनकी गोदी में सिर रखकर लेटना चाहता था क्रिस, बच्चों की तरह उनकी गोदी में बैठना चाहता था, क्रिस। परन्तु आमने सामने हाथ भरकी दूरी पर बैठकर भी, अभी भी बहुत दूरियां थीं उनके बीच...
‘अच्छा तो चलूँ, मां इंतजार कर रही होगी।‘ सारे भावनात्मक तूफान से उद्वेलित, बेचैन वह उठ खड़ा हुआ। पैर कांप रहे थे उसके। सहारा चाहिए था उसे। आंख, कान सब लाल हो चुके थे और पसीने की धार माथे से लेकर कनपटी तक बह रही थी।
बेटे का पसीने से लथपथ चेहरा देखते ही, दौड़ते-से अर्जुन सिंह उठे और बाँहों में भरकर तुरंत ही सहारा बनकर जा खड़े हुए बगल में। माना दे कर भूल गए थे, पर है तो उनका अपना ही बेटा, अब अनदेखा करना संभव नहीं था उनके लिए। अभी तक जो पिता-पुत्र का स्नेह एक एहसास मात्र था, गले लगाते ही मूर्त रूप ले चुका था। जाने कितनी देर सीने से लगाए खड़े रहे अर्जुन सिंह। क्रिशिव भी अब उनके सीने में सिर छुपाए, एक अबोध शिशु सा सुबक रहा था और अर्जुन सिंह की उँगलिय़ां कभी उसके बाल तो कभी पीठ सहला-सहलाकर सांत्वना दे रही थीं उसे। फिर अचानक मानो सोते से जग गए बाप-बेटे और तुरंत ही तटस्थ भी हो गए दोनों। और तब एकबार फिर भीगी पलकों को पोंछते हुए अर्जुन सिंह ने ही पहल की -चलो क्रिस, तुम्हें अपनी लाइब्रेरी दिखाता हूँ आज। वहाँ अपने बचपन की कुछ तस्बीरें भी हैं मेरे पास। अमृतसर, तुम्हारी अपनी दादी सबसे मिलवाउंगा मैं तुम्हे आज।
‘सौरी, आज नहीं। मुझे जाना होगा अब। स्क्वाश खेलने जाना है अभी।‘
संबोधन घोट गया क्रिस इसबार। उसे जैनी की चेतावनी याद आ गई थी।
‘ एक रात सोना है, तो सो लो। कुछ समय बिताना है तो बिता लो। रोकूंगी नहीं मैं तुम्हे। पर ध्यान रखो, उनकी जिन्दगी में तुम्हारी कोई जगह नहीं। माना कि एक अच्छे और शरीफ इन्सान जान पड़ते हैं अर्जुन सिंह फिर भी उनके लिए तुम्हारे अस्तित्व का कोई महत्व नहीं। आड़े वक्त में चन्द पाउन्ड की जरूरत का साधन मात्र थे तुम। जान लिया, ठीक है। परन्तु दूसरों की जिन्दगी में यूँ अनचाहा अतिक्रमण न तो ठीक और ना ही वांछनीय।‘
शब्द नहीं, मानो एक बेसुरे रिकौर्ड की क्रिच-क्रिच करती आवाजें थीं कानों में जिन्हें चाहकर भी वह भूल ही नहीं पा रहा था। अनचाहा अतिक्रमण...क्रिस का मन किया फूटफूटकर रोए । शायद ही कोई बाप-बेटे इतने एक से लगते हों। विडंबना थी यह भी प्रकृति की...दूर से ही देखकर कोई भी कह सकता था कि वे बाप-बेटे ही हैं।
‘सुनो मैं भी तुम्हारे साथ स्क्वाश खेलूँगा। खेलने दोगे न?’ अर्जुन सिंह खुद अब क्रिस के आगे बच्चों से मचल रहे थे, अपनी उम्र, अपने ओहदे...सारी औपचारिकता को भूलकर। ‘और हाँ, तुम चाहो तो मुझे डैड कह सकते हो। अगर तुम्हें पौप्स अच्छा लगता है तो यही कहो। इसमें भी कम प्यार नहीं। और हाँ हफ्ते में नहीं , तो कम-से-कम महीने में तो यहाँ आकर रहना ही है। यह कमरा अब तुम्हारा ही है। जैसे चाहो रखो, रहो, तुम्हारी अपनी मर्जी है। बस भूलना नहीं कि इसे और मुझे सदा इंतजार रहेगा तुम्हारा। ‘ दरवाजे से बाहर जाते-जाते क्रिस को रुधे गले से अर्जुन सिंह ने रोककर कहा था यह सब। और फिर –‘यह तुम्हारे लिए है। हाल ही में खरीदी थी।’-कहते सुएड की मंहगी अरमानी की अपनी जैकेट उसके हाथों पर रख दी थी।
‘लाया तो अपने लिए था पर अब चाहता हूँ कि तुम ही इसे पहनो। तुम पर खूब फबेगी भी। देखो, ना नहीं करना। यह पौप्स का आशीर्वाद है तुम्हारे लिए।‘
ना नहीं की थी क्रिस ने। बस, सबकुछ वहीं छोड़ता, पीछे मुड़े बिना, बिना उन्हे देखे, जबाव दिये बगैर ही, तेजी से बाहर निकल आया था। पास के ही पार्क में एक बेंच पर जा बैठा था। कितनी देर तक बैठा रहा एकांत में, याद नहीं, परन्तु उठा तो डूबता लाल सूरज रोती आंखों में जलते अंगार-सा चुभ रहा था। घर पहुँचा तो बेहद उद्वेलित, प्रतीक्षा करती माँ ने ही दरवाजा खोला।
फिर तो सवालों की बौझार थी।
‘कहाँ थे तुम अब तक? मोबाइल क्यों स्विच औफ कर रखा था ? बताओ, कैसे कौन्टैक्ट करती मैं तुमसे ! और यह क्या शक्ल बना रखी है ? ‘ मां की आंखें थीं। कुछ नहीं छुपा पाया क्रिस उनसे।
क्रिस मां को तसल्ली देता, करीब-करीब गोदी में उठाता-सा घर के अंदर ले आया।
क्रिस ने देखा कदकाठी में छोटी-सी, सुकुमार उसकी माँ गुस्से और भय से पत्ते-सी थरथर कांप रही थी और सामने दीवार पर दोनों की आपस में मिली गुंथी परछांई भी। यह कैसे भंवर में फंस गया है वह और उसकी माँ...अबतक आने वाले तूफान का पूरा एहसास हो चला था उसे।
‘तुम अब वहाँ नहीं जाओगे।‘ जैनी के स्वर में ऐसी दृढ़ता उसने पहले कभी नहीं देखी थी।
मां के स्वर की सख्ती क्रिस को आहत कर रही थी। बिना जबाब दिए वह भी खिन्नमन ऊपर अपने कमरे में चला गया और दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया उसने । जब भी आहत होता है, या खुदको सुलझाना होता है, ऐसे ही करता है क्रिस, जैनी जानती थी, इसलिए उसने भी नहीं रोका उसे।
निढाल जैनी खुद भी तो कमरा बन्द करके बिस्तर पर जा पड़ी थी। उसका भी तो मन नहीं कर रहा था किसी से मिलने या बात करने का। बन्द पलकों के नीचे आंसुओं की नमी थी। एक साधारण खुशहाल जिन्दगी की चाह में जिन्दगी दूर और दूर फिसलती ही चली गई थी और अब एकबार फिर सारे सिरे गडमड थे। फिर भी एक मोर्चे पर डटे सिपाही की तरह हिम्मत नहीं हारेगी जैनी। हाँ, अब इस उम्र में जाकर जिन्दगी यूँ उलझ जाएगी, कब सोचा था उसने। फिर, अपने को , अपनी सोच को संभाला जा सकता है, दूसरों की को तो नहीं। कैसे दूर रखे खुद को , बेटे क्रिस को, इस मि. अर्जुन ...’व्हाट एवर हिज नेम इज ‘ से। माना कि सज्जन लगता है...पर तूफान को आमंत्रण दोगे तो नाव तो डूबेगी ही। फिर उसकी तो पतवार तक टूट-टूट कर जुड़ी हुई है, सैकड़ों तूफान पार कर चुकी है। जिन्दगी आसान नहीं रही कभी जैनी के लिए, पर अतीत का यह प्रेत इतना परेशान करेगा- अनहोनी की कल्पना तक नहीं थी उसने। स्पर्म को कोख में प्रतिष्ठित करवाते समय कोई चेहरा कोई अस्तित्व नहीं था इस व्यक्ति का। कुछ नहीं था उसकी आंखों के आगे, सिवाय आनंद को जिन्दा और अपने पास रखने के। एक भारतीय बेटा चाहती थी जेनी और उसे ही अपनी कोख में पाल रही थी, बस्स यही एक उसका ध्येय भी था और लक्ष्य भी। उसके लिए तो न होते हुए भी, वह अपने दिवंगत पति आनंद का ही बेटा था। जैसे कभी हिन्दू पौराणिक कथाओं में पार्वती ने अपने सुख, अपनी रक्षा के लिए गणपति को गढ़ा था वैसे ही रचा था उसने भी क्रिस को बिना पति या सहवास के। क्रिस हुआ तो खुश थी वह । शकल-सूरत में काफी कुछ आनंद की तरह ही तो था क्रिस। वही घुँघराले बाल, वही मन बेंधती आखें और वही मोहक मुस्कुराहट ! वह तो कभी कुछ बताती ही नहीं उसे। जरूरत भी नहीं थी इसकी। पर, जैनी के रोकने पर भी पौल ने यह सब क्रिस के लिए जानना जरूरी समझा था- भविष्य में ग्रन्थियाँ और तनाव नहीं चाहतीं तुम, तो सच का सामना करने दो इसे। रोकने पर यही कहा था उससे। पर जैनी आगत के भय से कांप उठी थी-यह कैसे संभव है कि नींव का पत्थर खींचा जाए और इमारत न हिले, फिर यह नींव तो खुद एक भावात्मक जरूरत, झूठ पर टिकी थी।
समझदार होते हुए भी पॉल न सहेज पाया था इस रहस्य को। सब बता दिया था क्रिस को। कैसे और क्यों वह इस दुनिया में आया, क्यों वह उसे पौप्स नहीं कह सकता, क्यों वह देखने में , कद-काठी में परिवार से भिन्न है। यहां तक कि जिसका नाम अपने नाम के साथ जोड़कर घूमता है वह, वह तो उसका बाप ही नहीं, यह भी। एक हाइब्रिड, जोड़ा-घटाया बेटा है वह इस परिवार का।
‘ पर जैनी तो मेरी मां है...यह तो सत्य है न...या फिर इसमें भी कोई शक है? ’ नफरत और हिराकत की लपटों से धधक उठा था क्रिस । पैर पटक कर आग्नेय निगाहों से सबको देखता, ताश के पत्तों सा ढह गया था उस दिन चौदह वर्षीय किशोर । खुद को संभालने में , खड़ा करने में हफ्तों लगे थे उसे। तब क्रिस के मन में यह तूफान ...यह अपने बायलौजिकल पिता को ढूँढने की बेचैनी एक ज़िद बन गई ।
जैनी समझ सकती थी बेटे का दर्द, परन्तु अब तो सिर्फ एक खोज नहीं, वह देख रही थी, भावात्मक रूप से भी जुड़ा जा रहा था क्रिस अर्जुन सिंह से। और यह जुड़ाव शीत और उष्मा का जुडाव था। टूटे पत्ते शाख से वापस नहीं जोड़े जा सकते, उम्र भर का अनुभव था जैनी का यह। वक्त और समाज की बड़ी खाई थी दोनों के बीच। दोनों परिवारों को ले डूबेगा यह तूफान। इसे रोकना ही होगा। जैनी कृत संकल्प थी। अपने लिए नहीं तो क्रिस के लिए तो अवश्य ही कुछ करना होगा। बहुत प्यार करती थी वह अपने बेटे से।
उधर क्रिस शावर लेकर कपड़े बदल चुका था । आत्मा में जब बेचैनी हो तो भूख प्यास किसे लगती है? बिना कुछ खाए पिए सोने की तैयारी में बिस्तर पर लेटा तो टेलिवजन पर चल रही एक खबर ने चौंका दिया उसे। पूरी तरह से जगा दिया। जापान में साढ़े छह मीटर बर्फ गिरी थी , पूरा खड़ा आदमी डूब जाए इतनी। जिसमें कई जानें भी गईं और अजूबे भी हुए। खबर चल रही थी- बर्फ में फंसी एक कार में दम्पत्ति की तो चलते इंजन से पैदा कार्बन मौनोऔक्साइड से मौत हो गई पर मां की कोख में पलता बच्चा जिन्दा है, डॉक्टरों ने उसे बचा लिया है। ‘-क्या जिन्दगी होगी उस बच्चे की भी?’ क्रिस एक बार फिर बेहद बेचैन था अपने लिए नहीं, उस बच्चे के लिए। ‘ मिलना तो दूर, वह तो कभी अपने मां-बाप को ढूँढ तक नहीं पाएगा ! शायद धिक्कारे भी विधाता को कि क्या जरूरत थी उसे पैदा ही करने की , बचाने की ! खुशकिस्मत है वह कि दूर भले ही सही, उसके मां बाप दोनों जिन्दा हैं। वह उन्हें देख सकता है, उनसे मिल सकता है, सुख-दुख बांट सकता है। अपनी अपनी मजबूरियों के बाद भी दोनों उसे बेहद प्यार करते हैं, यह भी जानता था वह। फिर दुख किस बात का, यह उदासी क्यों? ‘
‘...खुश ही रहना होगा उसे और मां बाप को भी खुश ही रखना होगा ! '
क्रिस वाकई में अंतस् के कोर तक भारतीय महसूस कर रहा था, अब खुद को। योग्य पुत्र राम की तरह होते हैं जो मां-बाप के वचन और इच्छाओं का पूरा ध्यान रखें जानता था वह परन्तु योग्य पुत्र श्रवण कुमार की तरह भी होते हैं जो मां-बाप के हर दुख हर कठिनाइयों को अपने कांधे पर ले ले और उन्हें हर सुख दे, यह भी जानता था वह। जान गया था वह अपनी पहचान को, अपनी परंपरा को अपनी जड़ों को। जान गया था वह कि क्यों सैकड़ों विषयों में से इंडियोलौजी को ही पढ़ने के लिए चुना था उसने। यूरोप की इस मैं सभ्यता में पल बढ़कर भी जान गया था वह कि उसके अंदर के राम और श्रवण को अब और सुप्त अवस्था में नहीं रखा जा सकता था। वे उसके बगल में खड़े, एक अबूझ और अद्भुत आत्मबल व संतोष दे रहे थे उसे।
क्रिस नाइट कटियार वाकई में अंतस् के कोर-कोर तक भारतीय था..एक बेहतरीन इंसान था...मन से भी और संस्कारों से भी। उसने खुद को संभाल ही लिया।
बाथरूम से आंसू भरा चेहरा धोकर वापस ही लौटा था कि दरवाजे पर खटखट हुई। जैनी और साथ में गोपी और पॉल सभी उसके लिए ऊपर ही खाना लेकर आ गए थे। मिलबैठकर सबने खाना खाया और एक गेम स्क्रैबल का भी खेला। रात के एक बजे तक हंसी ठहाकों की महफिल चलती रही। उदासी कहां गुम हो गई पता ही नहीं चला। अगली सुबह तक वह एक निश्चय कर चुका था और शाम कौलेज से लौटते ही बरबस उसके पैर 5, औक्सफर्ड ड्राइव, अर्जुन सिंह के घर की तरफ स्वतः मुड़ गए।
क्रिस ने देखा गुजरे इतवार की तरह ही, उस दिन भी अर्जुन सिंह बाहर बगीचे में अपनी बागवानी में ही मस्त थे । पलभर को तो क्रिस उमड़ते स्नेह के साथ अपलक खड़ा उन्हें देखता रहा। फिर चहककर उनके कहते ही- ‘आओ बेटे, आओ। व्हाट ए प्लेजेन्ट सरप्राइज ’ आंसू पोंछ, कैसे भी लड़खड़ाते कदमों से उनके पास पहुंच भी गया, पर जिस मन्सूबे से आया था, बहुत मुश्किल से ही बता पाया। खुद अपनी ही रुंधे गले में डूबी वह आवाज बेहद बेगानी लग रही थी क्रिस को।
- ‘ सौरी, पौप्स, मैं अब आपसे मिलने नहीं आ पाऊंगा। ‘
जाने कितनी हिम्मत जुटाकर क्रिस ने यह बात कही थी खुशी से दमकते अर्जुन सिंह से। पर तभी क्रिस को पूरी तरह से चौंकाते और दहलाते, अर्जुन सिंह अचानक भरभराकर गिरते से पास पड़ी बेंच का सहारा लेते, जैसे तैसे संभले। गिरने से ठहर पाए। क्रिस भी चुपचाप उनकी बगल में जा बैठा। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अब उसे और क्या करना या कहना चाहिए। पौप को ऐसे छोड़कर भी तो नहीं जाया जा सकता! बेसब्री से उसका इंतजार करते पौप से यह कहकर उसने सही किया या गलत, नहीं जानता था वह। आसान तो नहीं था उसके लिए भी यह कह पाना, इतना कठोर निर्णय लेना , निर्णय पर टिक पाना! पर यह सुख-दुख भी तो एक संक्रामक बीमारी ही हैं और उसके अंदर भी तो बहुत कुछ टूट और रिस रहा था।
सूनी सूनी निराश आंखों से उसकी तरफ देखते हुए, अर्जुन सिंह ने झुककर धरती से मुठ्ठी भर धूल उठाई तो सूखी गिरी बूढ़ी टहनियों के साथ कुछ बीज भी आ गए थे उनकी खुली हथेली पर। सिर उठाकर देखा तो सूखी वाइचिलिया और मेपल की शाखें अकुआने लगी थीं । जाड़े भर निस्तेज खड़े हायसिन्थ ने भी लहलहाना शुरु कर दिया था। नीचे कुछ कोपलें भी उग आई थीं। और पातहीन शाखों की ऊंची टहनियों पर नजर आ रहे थे कुछ हाल ही में बने चिड़िया के घोंसले। बसंत पंचमी के आते आते हवाओं में फागुनी सरसराहट शुरु हो जाती है। मौसम का मिजाज गुलाबी हो उठता है, बसंत के मादक पदचापों की आहट साफ सुनाई पड़ने लग जाती है और धरती की कुलबुलाती कोख से उगने लगते हैं तरह तरह के बेल बूटे।
एक क्षीण मुस्कान तैर गई पपड़ियाए होठों पर..’.हम चाहें न चाहें..प्रकृति का क्रम कौन रोक पाया है, कब रुकता है। हर ऋतु का अपना एक जादू है, एक परिवर्तन है ,जो अवश्यंभावी भी है और सही भी है, जीवन की तरह ही।... हम भी तो यूँ ही उगते-मिटते फिर उगते रहते हैं। प्रकृति का यह नियम नहीं बदलता,न बदलेगा। हमारा मिलना, तुम्हारा जन्म सब उसी के अधीन था। हमारा इस मौसम में यूँ मिलना भी क्या एक संकेत नहीं है क्रिस? सुनो। ध्यान से देखो। मैं जाता हुआ शिशिर, बहार, यानी कि तुम्हे बीज रूप में अपने अस्तित्व में छुपाए हुए हूँ। जाऊंगा कहाँ-मैं तो जिऊंगा, हंसूगा तुममें ही क्रिस, जैसे कि तुम जिओगे हंसोगे मेरी छांव में... मुझमें। यह क्रम तो सदा ही चलता रहेगा। इसे न तुम बदल सकते हो और न मैं।‘
क्रिस ने देखा अब उनकी आवाज बहुत शान्त हो चुकी थी। तटस्थ हो चुकी थी, मानो दूर कहीं गहरे कुँए से आ रही हो-‘ तुम भी समझोगे, महसूस करोगे इस बात को एकदिन, आज नहीं तो कल, जब मैं तुम्हारा बेटा या पोता बनकर खेलूंगा तुम्हारी गोद में। हम तुम यूँ ही उलका पात से टकराते रहेंगे, गुजरते रहेंगे एक दूसरे के पथ से। तुम न चाहो, तुम्हारी मां जैनी न चाहे, पर कोई नहीं रोक सकता इसे। विछोह के साथ-साथ सृजन की..मिलन की ऋतु भी तो यहीं है क्रिस। और मैं इंतजार करूंगा उस ऋतु का, तुम्हारे लौटने का।...
अचानक अर्जुन सिंह जोर-जोर से हंसने लगे । क्रिस देख रहा था एक और अनहोनी हुई पौप अपने में ही समाधिस्थ-से होते जा रहे थे। होठों पर एक संतोष जनक स्मित थी और आंखों से निर्मल अश्रुधार । तब एक योगी-से ही लग रहे थे पौप उसे।
‘ डैड-डैड, कहीं नहीं गया हूँ मैं। यहीं हूँ। हाँ, डैड यहीं हूँ, आपके पास। हम भला एक दूसरे को छोड़कर कहाँ जा सकते हैं?'
बूढ़े बाप के झुके कंधों को सहारा देता क्रिस उन्हे कमरे के अंदर ले आया।
और तब आराम कुर्सी पर बिठलाकर अर्जुन सिंह को गरम-गरम सूप पिलाते क्रिस ने पहली बार देखा कि एक धागा था नेह का उनके बीच, जिसे कोई नहीं तोड़ सकता। जैनी भी नहीं। हर शक और सुबहे, सच-झूठ की गुंजाइश से परे, शाम के उस गुलाबी धुंधलके में उन दोनों की तो परछाइयां तक एक हो चुकी थी अब। ...
‘’भाभी मैने दाल सब्ज़ी बना दी है, खाना कितनी देर मे खांयेगी आप ?’’ लता ने अनिता से पूछा।
‘’बस, एक घन्टे मे, कुछ ज़रूरी काम निपटा लूँ, तब तक तू पढाई करले।‘’ अनिता ने जवाब दिया ।
‘’अच्छा भाभी जब खांयेगी तभी गरम गरम रोटी सेक दूँगी।‘’ लता बोली।
‘’अभी तू इंगलिश का काम कर ले, कल मै देख लूँगी, मेरी छट्टी है’’ अनिता ने कहा।
‘’ठीक है भाभी’’ कहकर लता पढ़ाई करने बैठ गई।
डा. अनिता और उनकी बेटी पायल ही एक दूसरे की ज़िन्दगी हैं बस, ये दोनो ही इतने बड़े घर मे रहती हैं। डा. अनिता के पति कई वर्ष पहले एक सड़क दुर्घटना मे चल बसे थे। पायल अभी दसवीं कक्षा मे है। डा. अनिता भी बहुत व्यस्त रहती हैं, उन्हे खाना बनाने के लियें एक नौकरानी की ज़रूरत थी। आस पड़ौस के जान पहचान वाले लोगों से उन्होंने कह रक्खा था कि अगर कोई अच्छी खाना बनाने वाली मिल जाये तो वह रखना चाहती हैं। एक दिन लता की माँ अपनी बेटी को लेकर आई और कहने लगी, इसे खाना बनाना आता है जैसा आप कहेंगी वैसा ही बना कर खिलायेगी, आप इसे रख लीजिये। डा. अनिता को लगा कि ये 15-16 साल की लड़की क्या काम कर पायेगी और अभी तो इसकी पढने, स्कूल जाने की उम्र है। लता की मा ने कहा कि वो सब संभाल लेगी, स्कूल भी नहीं छोड़ेगी। डा. अनिता को लगा कि वह काफी ज़रूरतमन्द है अगर उन्होंने काम नहीं दिया तो कहीं और काम करेगी, इसलियें उन्होने लता को रख लिया।
लता की माँ ने बताया कि वह पढने मे बहुत अच्छी है बस इंगलिश मे कमज़ोर है, उसने डा. अनिता से आग्रह किया कि कभी कभी समय निकाल कर उसे इंगलिश पढ़ा दिया करें। अब तय ये हुआ कि लता रात का खाना बनायेगी और अगलें दिन के लंच के लियें सब्जी बनाकर रख देगी, स्कूल से सीधी डा. अनिता के घर आकर रोटी बनाकर खा खिला कर अपने घर जाया करेगी।
सबकी दिनचर्या निर्धारित तरीके से चलती रही। डा.अनिता और पायल के खाने की रुचियाँ लता जल्दी ही समझ गई थी, उनकी पसन्द समझने मे उसे देर नहीं लगी। 15-16 साल की बच्ची रसोई ऐसे संभालती थी जैसे कोई गृहणी 10-15 साल के अनुभव के बाद संभाल पाती है। रसोई का सारा सामान व्यवस्थित रहता और सफ़ाई भी रहती। यह देखकर डा. अनिता बहुत ख़ुश थीं।
जब भी समय मिलता वो उसे इंगलिश पढ़ा देती। पायल उसे इंगलिश बोलने का अभ्यास करवा देती थी। कभी लता की कोई परीक्षा होने वाली होती तो डा़. अनिता कहतीं ‘’तू पढले खाना मै बना लूँगी’’ या कहतीं ‘’चल आज खिचड़ी बनाले’’। कभी परीक्षा के दिनों मे खाना बाहर से मंगवा लेतीं। डा.अनिता पूरा ध्यान रखतीं कि काम की वजह से लता की पढ़ाई मे कोई व्यवधान न पड़े। लता भी समय का पूरा सदुपयोग करती खाना बनाते बनाते भी वो कोई फार्मूला याद करती रहती या कोई परिभाषा दोहराती रहती।
डा. अनिता ने हमेशा इस बात का ध्यान रक्खा कि पायल और लता के बीच कोई तनाव न हो। वो लता का ध्यान रखती थीं इसलियें पायल मे असुरक्षा की भावना आ सकती थी, दूसरी ओर लता के स्वभिमान के आहत होने का डर था। डा.अनिता की दुनियाँ पायल थी उसमे लता के प्रवेश होने से पायल को कोई अंतर नहीं पड़ा पायल के लियें वह नौकरानी ही थी जिससे वह इज़्जत से बात करती थी, हम उम्र होने के साथ दोनों दसवीं मे थी इसलियें पढ़ाई के बारे मे बात कर लेती थीं। पायल लता से हमेशा इंगलिश मे बात करती थी लता को समझने मे कोई दिक़्कत नहीं थी , बोलने मे घबराती थी। धीरे धीरे पायल की कोशिशों से लता इंगलिश बोलना सीख रही थी। पायल उसके उच्चारण दोष ठीक करवा रही थी। गणित मे लता सबको पीछे छोड़ने की क्षमता रखती थी, अगर वह गणित मे कंहीं अटक जाती तो लता से पूछने मे उसे कोई संकोच न होता ।
डा. अनिता पायल का तो ध्यान बहुत रखती हीं थी लता की ज़रूरतों को भी नज़रअंदाज़ नहीं करती थीं। शाम के समय लता से कहती ‘’चल पढ़ाई से थोड़ ब्रेक ले मुझे चाय बनाकर दे, तू पायल को भी दूध दे और ख़ुद भी पीले।‘’ लता कभी कहती ‘’भाभी मै चाय पी लूँगी।‘’- ‘’चाय नहीं मिलेगी दूध पी अभी पढना भी है, और काम भी करना है इसलियें दूध तो तुझे पीना पड़ेगा।‘’ कभी दोनो को फल काट कर उनकी पढ़ाई की मेज़ पर रख देतीं। पायल अपने कमरे मे पढ़ती और लता की पढ़ाई के लियें मेज़ कुर्सी बरामदे मे लगा दी गई थी।
समय बीतते देर नहीं लगती दोनो की दसवीं की परीक्षा का परिणाम आने का दिन भी आगया। लता को 89% अंक मिले और पायल को 91% । लता को गणित मे पूर 100% अंक मिले सब बहुत ख़ुश थे। डा. अनिता ने लता को 1000 रुपये इनाम मे दिये तो कुछ संकोच के साथ उसने ले लिये। डा. अनिता और पायल एक हफ्ते के लिंये छुट्टी मनाने केरला चले गये। डा. अनिता जानती थीं कि पायल भी डाक्टर ही बनना चाहती है इसलियें उन्होने कक्षा 11 मे आते ही उसे मैडिकल की प्रवेश परीक्षा के लियें सबसे अच्छी कोचिंग मे प्रवेश दिला दिया।
डा. अनिता ने लता से भी पूछा कि वो कक्षा 11 मे कौन से विषय लेना चाहती है, आगे क्या बनना चाहती है। लता ने कहा कि वो विज्ञान लेगी और परिस्थितियों ने साथ दिया तो वह इंजीनियर बनना चाहेगी। कोचिंग की फ़ीस देना लता के लियें संभव नहीं था, डा. अनिता से वह यों ही कोई मदद लेगी नहीं, ये वो भी जानती थीं, उसके स्वाभिमान को भी वो आहत नहीं करना चाहतीं थी। अब यह निश्चय किया गया कि गणित तो वह ख़ुद कर लेगी। रसायन विज्ञान और भौतिकी मे डा.अनिता मदद कर दिया करेंगी। कमप्यूटर का प्रयोग करना पायल उसे सिखा देगी। अपनी दूसरी सहेलियों से वो कोचिंग के नोट्स ले लिया करेगी।
दो साल पलक झपकते बीत गये बोर्ड की परीक्षा हो चुकी थीं। अब दाख़िले के लियें कई परीक्षायें दोनों को देनी थीं। पढ़ाई मे इतनी महनत करने के बावजूद लता रसोई का काम लगभग पूरा संभाले हुए थी। केवल बोर्ड की परीक्षा के समय डा. अनिता ने छुट्टी ली थी। उस समय भी जब थोड़ा बहुत समय मिलता तो वो रसोई के काम मे हाथ बटा देती। जब से वो डा. अनिता के घर काम पर लगी थी उसका पूरा दिन उन्हीं के घर पर बीतता,बस रात को सोने अपने घर जाती थी।
पायल को अपने शहर मे दाख़िला नहीं मिला ऐम. बी. बी.ऐस.करने उसे नागपुर जाना पड़ा। सब बहुत ख़ुश थे। डा. अनिता ने सोचा कुछ दिन सूनापन लगेगा फिर आदत पड जायेगी। डा. अनिता पायल को भेजने की तैयारी मे लग गईं उसके लियें नये कपड़े, नया मोबाइल, नया लैपटाप ख़रीद लाईं, पहली बार उसके साथ गईं और नागपुर छोड़ आईं।
अब लता डा. अनिता और भी ध्यान रखने लगी। लता शहर से बाहर नहीं जाना चाहती थी। उसका दाख़िला स्थानीय इंजीनियरिंग कौलिज मे हो गया पर वहाँ फीस बहुत थी। डा.अनिता ने ख़ुद गारंटी लेकर बैंक से शिक्षा के लियें कर्ज़ दिलवाया । पायल के पुराने कपड़े लता ने हमेशा पहने थे, कुछ नये लेकर दे दिये। पायल का मोबाइल और लैपटाप भी उसे मिल गया।अब लता को अपना लक्ष्य सामने दिखने लगा था।
पायल के जाने से घर मे सूनापन आगया था।लता अब रात को भी घर नहीं जाती थी,डा. अनिता ने उसके रहने का प्रबन्ध बरामदे के साथ बने एक छोटे कमरे मे कर दिया था। अब वह सप्ताह मे एक बार ही अपने घर जा पाती थी। अपने बचाये पैसों मे से उसने एक साइकिल ख़रीद ली थी। बहुत समय कौलिज और पढाई मे निकल जाता था फिर भी खाना वह नियत समय पर बना ही देती थी।आते जाते बाज़ार से घर का ज़रूरी सामान भी वही लाने लगी थी। तीव्र बुद्धि तो वह थी ही महनती भी बहुत थी, किस्मत ने उसे डा. अनिता जैसी संरक्षक भी दे दी तो वह अपने लक्ष्य की ओर बिना किसी रुकावट के बढ़ रही थी। कौलिज से आने का कोई निश्चित समय तो था नहीं इसलियें घर की एक चाबी अब लता के पास रहती थी। अपनी सुविधा से जब जो चाहें खाना बनाकर रख देती थी।डा.अनिता जब आतीं तो माइक्रोवेव मे गरम कर लेतीं।
चार साल बीत गये लता के कोलेज मे प्लेसमैंट के लियें कंपनियाँ आने लगीं।लता अब भी शहर के बाहर नहीं जाना चाहती थी, उसे स्थानीय वुमैन्स पौलिटैकनिक मे व्याख्याता की नोकरी मिल गई,तब भी वह उसी तरह डा.अनिता के साथ रहती रही, खाना बनाती रही । जब भी डा. अनिता कहतीं कि अब वो काम छोड़ दे वो किसी और को रख लेंगी तो लता नाराज़ हो जाती, कहती कि वह बस अपना और अपनी भाभी का खाना ही तो बनाती है ये काम तो अपने घर का है। ये तो वो नहीं छोड़ सकती।
लता को जब पहली तनख्वाह मिली तो वह डा.अनिता के लियें एक साड़ी और पायल के लियें कुछ किताबें ले आई। डा. अनिता ने कहा ‘’इतने पैसे ख़र्च करने की क्या ज़रूरत थी, अभी तुझे बैंक का कर्ज़ भी चुकाना है।‘’
‘’अरे, भाभी वह भी चुक जायेगा मेरा ख़र्च ही क्या है।‘’ लता ने कहा।
‘’अच्छा चल ठीक है, ख़ूब कमा ख़ूब ख़र्च कर। ‘’डा. अनिता ने उसके सिर पर हाथ रखकर कहा।
पायल को भी किताबें पसन्द आईं वो कहने लगी ‘’लता तू तो मुझसे बहुत ज़्यादा कमाने लगी है, मुझे तो इंटर्नशिप मे बहुत कम पैसे मिलते हैं और अभी आगे भी पढ़ाई का लम्बा रास्ता बचा है। मै तेरे लियें बहुत ख़ुश हूँ। ये किताबें नागपुर जाते समय ट्रेन मे पढ़ूंगी।‘’ पायल ने कहा।
इस पर डा. अनिता कहने लगीं ‘’तुम दोनो ने अपने लक्ष्य ख़ुद चुने हैं। लता और पायल एक साथ बोल पड़ीं, ‘’ वो तो है। ‘’
कुछ दिन मे छुट्टियाँ समाप्त हो गईं पायल होस्टल चली गई। लता और डा़ अनिता अपने अपने काम मे व्यस्त हो गईं। लता नौकरी करते एक साल हो गया था, पायल की इंटर्नशिप समाप्त होने वाली थी, फिर उसे पी.जी. की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करनी थी।
एक दिन लता अनिता के पास आकर कहने लगी ‘’भाभी आपसे कुछ ज़रूरी काम है।‘’
‘’ बोल न इतना संकोच क्यों कर रही है।‘’ डा.अनिता ने कहा।
‘’भाभी, वो राजेश है मै और वौ....’’ लता ने बताया।
‘’अच्छा तुझे पढ़ाई और काम के बीच डेटिंग की फुर्सत कब मिल गई ?’’
‘’भाभी.’’ लता थोड़ा शरमा गई।
‘’वैसे ये राजेश करते क्या हैं?’’ डा़ अनिता ने पूछताछ की।
‘’भाभी अभी ऐम. टैक किया है। आजकल इंटरव्यू चल रहे हैं।‘’ लता ने बताया।
‘’तूने पसन्द किया है तो अच्छा तो होगा ही। ‘’डा. अनिता ने कहा।
‘’ ऐसा कर उसके माता पिता को और अपनी मा और भाई को रविवार को मेरे घर बुला ले सब तय कर लेगे, मै तेरी मा से पहले ही बात कर लूँगी। ‘’डा. अनिता ने कहा।
रविवार रात के भोजन लिये डा. अनिता ने लड़के वालों को निमंत्रण भेज दिया। राजेश और उसका परिवार सबको अच्छा लगा। राजेश के परिवार से माता पिता ही आये थे बड़ी बहन की शादी एक साल पहले हो चुकी थी। राजेश की पसन्द उन्हे पसन्द आगई। डा. अनिता ने ज्ल्दी ही आर्य समाज मंदिर मे दोनो की शादी करवा दी।
डा. अनिता के घर की एक चाबी अभी भी लता के पास रहती है।. यद्यपि उन्होंने एक लड़की खाना बनाने के लियें रख ली है फिर भी जब भी समय मिलता है लता अपनी भाभी की पसन्द का कुछ बना कर रख जाती है।
दीदी अस्पताल से घर आ गई हैं ...चार कंधों पर सवार ..घर की दहलीज से कमरे तक का सफर भारी हो रहा है ,...कमरे का सन्नाटा अचानक महिलाओं .बच्चों के रुदन से गूंज उठा ,--आज घर की मालकिन .लक्ष्मी --चली गई ..पर अपने पीछे यादों का एक लम्बा काफिला छोड़ कर ...घर -आंगन में बिताये पचास वर्षों का के संग साथ ...गृहस्थी के के सुख दुःख .हर्ष -विषाद के पलों को आत्मसात करती हुई--वृद्धावस्था तक का सफर आज पूरा कर अपने अंतिम यात्रा पर चल पड़ीं ....उनकी शांत मुख मुद्रा मानो कह रही हो --''लो सम्भालो अब अपना घर-बार ..मै तो चली ''..............बिलख रही हैं बेटियां ...रो रही हैं बहुएं ..--''हम तो नहीं थके माँ ..आपकी सेवा करते ..पर आप क्यों चली गईं ?''....कौन सुनता ?...और कौन झिड़कता --''ये बिना मतलब का शोर गुल काहें लगा रखा है रम्भा ?''... अचानक रम्भा सहम कर चुप हो गई -''अभी सब तयारी तो उसे ही करनी है ...पर क्याकरे ..कैसे करे ?..कौन बतायेगा ?..अब तक तो माँ ही सब सम्भालती रहीं ..बताती थीं ..घर खानदान ..के सारे नियम,संस्कार ..पर अब क्या ?...सभी हतप्रभ खड़े हैं ..सभी चाचियाँ ..बुआ जी .बेटियां ...सबकी अपनी अपनी राय ..अपने अनुभव ,. ''अरे रम्भा ..घी लाओ ..और चन्दन भी .लेप करना पड़ेगा '' .रम्भा उठ कर चली ही थी कि , बुआ जी ने टोका--''फूलों व् नई साड़ी के लिए बोल दिया हैं विपिन को ?''रम्भा सिर हिलाती चली गई ... .दीदी वर्षों से बीमार थीं ..जीजा जी के जाने के बाद तो और भी कमजोर हो गई थीं ..किडनी ..हार्ट .लीवर से जुडी कौन सी बीमारी थी जो उन्हें नहीं थी ...पर दिल से अपना हौसला नहीं टूटने दिया था दीदी ने ,..सबको सम्भाला था बेटे ..बहुओं ..घर गृहस्थी --लेंन देन ..संस्कार -परम्पराएँ ..सब ..... किसी पड़ोसिन ने टोका --''इनका सिंगार भी तो करना है ''....छोटी बहु मीनू चौंक उठी -''नहीं नहीं ..माँ तो विधवा थीं ......सिंगार नहीं ''.....हाथों पर चन्दन लपेटती नाउन बोल उठी -''चूड़ियाँ लाओ -कांच वाली ''अबकी रम्भा ने कड़ा प्रतिवाद किया--''नहीं ..वो सब नहीं होगा '' बेटियों का दर्द और पीड़ा कुछ दूसरी ही थी ..माँ के जाने के बाद ..उत्पन्न असुरक्षा का भय उन्हें सता रहा था , --गाहे बगाहे जरूरतपड़ने पर माँ चोरी छुपे उनकी मदद कर देती थी।।पर अब भाभी कितना साथ देंगी ....उनके आंसुओं में शंकाएं भी थी ..और भय भी ...बड़े दामाद जी और बड़ी बेटी संध्यायह अभिव्यक्त करने में कोई कमी नहीं की माँ से उनका लगाव सबसे ज्यादा था ...सबसे ज्यादा सेवा उन्होंने ही की थी .........किसी ने बाल मुंडाए तो कोई बढ़ चढ़ कर सारी व्यवस्था सम्भाल रहा था ...सब दिखावे और प्रदर्शन के लिए अपनी अपनी संवेदनाएं दांव पर लगा रहे थे ...फोटो ग्राफर के आगे .दीदी से सट कर रोआंसीमुद्रा में तस्वीरें खिंचवाने की होड़ सी लग गई थी ...मै आंसुओं में डूबी सोच रही थी कि --''सुना था कि दुःख संक्रामक होता है ...पर क्या दुःख समवेदन विहीन और दिखावा मात्र भी होता है ?..यह आज ही देखा था .मुझेदीदी की बहुत याद आई ...इस पल वो होती तो बिना किसी लाग लपेट के ..न इस पार सोचतीं ..न उस पार .बीच का रास्ता निकाल लेतीं --'' जो है ..वही रहने दो ''..मेरी आँखें भर आई . ओरतों की कीच पिच जारी थी .. तभी विपिन के दोस्तों ने मोर्चा सम्भाल लिया ....माथे पर चन्दन ..अबीर सजा ..फूलों का श्रृंगार कर -साध्वी बनी ..दीदी को ले सभी चले गए --महिलाओं का रुदन शांत हो चुका था ..शेष बची सामग्रियों को हटा दिया गया ..घर धुला ,....अब स्नान की बारी थी ..रम्भा ने बुआ जी से पूछा --' बुआ जी !..आज तो सब साथ ही नहायेंगी न ?'' --''पता नहीं बहुरिया ,...मुझे तो ज्यादा याद नहीं आता ,लेकिन भैया के समय तो ....'' बुआ जी की बात पूरी होने के पहले ही पड़ोस वाली चची जी बोल उठीं --'' हाँ हाँ ..शर्मा जी के समय का तो मुझे भी याद आता है ..सब घर ही जाकर नहाई थीं ''.... रम्भा ने मंझली सास की ओर प्रश्न वाचक निगाहों से देखा ---''मुझे भी याद नहीं आता रे ''..तब छोटी बहु ने ही हल निकाला -''अगर नहाना ही है तो यहाँ भी थोडा सा पानी शरीर पर डाल कर अपने अपने घर जाकर फिर से नहा लेंगे '' --ऐसा ही किया गया क्योंकि बहस करने का कोई फायदा भी नहीं था ....जो दीदी जीवन भर नियमो ..कायदों .परम्पराओं को ढोती रही थीं आज उनके अंतिम कर्म कांड में जैसे तैसे परम्पराएँ निभाई जा रही थीं ,..शाम को फलाहार था सबने अपने अपने हिसाब से किया,परेशानी बच्चों के खाने की थी ..लेकिन दीदी के पड़ोसियों ने अपना अपना धर्म निभाया और ढेर सारा खाना भेज दिया ..,वह रात ..चुपके से उलझनों ..नियमों ..सामाजिक कानूनों में डूबी सी बीत ही गई।।विपिन ने संस्कार के सारे कर्मकांड निबटाये थे ..अतः रम्भा को ही उसके खाने की व्यवस्था संभालनी थी,बाकी सब कुछ ओपचारिक चल ही रहा था ...बड़ा परिवार था ..सबके घर पास पास ही थे अतः बगैर किसी विशेष हंगामे के सारी क्रियाएं पूरी हो रही थीं .पंडित जी ने बताया था कि दस दिनों तक साबुन -तेल ..नहाना ,बाल धोना ,,कपडे धोना वर्जित है --लेकिन स्नान सभी करते थे---------शाम को सभी एकत्र होते गरुड़ पूरण सुनने के लिए --रात का भोजन वहीँ बनता ..पर सभी बहुएं ..चाचियाँ बेटियां एक दूसरे को अविश्वसनीय नजरों से देखते कि कहीं उसने ये नियम तो नहीं तोड़े हैं .. --''आपके कपड़े बड़े साफ लग रहे हैं भाभी ..धोये क्या ?''..बुआ जी आदतवश बोल पड़ीं .. --''कैसे धोयेंगे ?..जब धोना ही नहीं है हं तो बाथरूम में ही छोड़ देते हैं ..बहू साफ करती है ''...भाभी ने मोर्चा संभाला-..पर बुआ जी कहाँ चुप होने वाली थीं ,उनकी बहू वहीँ बच्चे को सुला रही थी ..पूछ ही लिया --''क्यों दिव्या ?'' ....वह सकपका गई --''नहीं तो ?'' सबने राहत की सांस ली पुरे परिवार ने एक तरह से परिस्थितियों के आगे समर्पण कर दिया था .या यों कहें कि एक अघोषित समझौता ही था -जिसे सब निभाए जा रहे थे --दीदी ने कभी जिन्दगी से समझौता नहीं किया था -बस फैसला सुना देती थीं ...सामने वाला कोई भी हो ..वह निडरता से अपनी बात कह डालती थीं ...जब जीजा जी नहीं रहे थे तब भी दुःख व् वेदना से शिथिल होकर भी ...एक भी नियम और परम्परा को लीक से बेलीक नहीं होने दिया था उन्होंने ..और अब तो वर्षों का अन्तराल था और पीढ़ियों का अंतर भी आ गया था .....' शोक संतप्त परिवार के भोजन में अब चटनी ..सलाद ..रायता .पापड़ जैसे चीजें भी शामिल हो गई थीं ..ठीक भी था --डायबिटीज की मरीज मंझली भाभी चावल कैसे खा सकती थीं ?..अतः उनका दूसरा विकल्प ढूंढ़ लेना भी जायज था ..रोटी नहीं बनानी है तो ब्रेड ही खा लेंगे ..तेल -हल्दी का प्रयोग नहीं करना तो रेडीमेड मसालों से काम चल जायेगा ''...मै बस दीदी के परिवार में आ रहे अनोखे बदलाव को देख रही थी -जब तक वे जिन्दा थीं -- थी कि कोई कुछ बोल दे या कर दे पर आज वे नहीं हैं तो सबकी अपनी अपनी राय -मत --फैसले ..समझौतों का शिकार हो नई नईपरम्पराएँ गढ रहे थे बालकोनी में कुर्सी पर बैठी ..चुपचाप रम्भा उदास थी ..मै उसके पास जाकर बैठ गई -सांत्वना भरा हाथ उसके सिर पर फेरा तो उसकी आँखें भर आईं ---''मै कैसे सम्भाल़ूगी सब मौसी जी ?..सब कुछ नया नया अपनी मर्जी से हो रहा है ''.. --'' कुछ भी नया नहीं है रम्भा ...जब नदी की बाढ़ आती है तो अपने साथ कुछ नई मिट्टी लाती है और उपजाऊ मिट्टी को साथ बहा ले जाती है ...ये दुःख भी नदी का बहाव है --कुछ नियम टूटते हैं ,तो कुछ बनते भी हैं --हर आने वाली पीढ़ी कुछ नया जोड़ेगी ..नई परम्पराओं की नींव पड़ेगी ही ..यही तो विकास है ..सोच और पीढ़ियों का बदलाव है --इन्हें तर्क की कसौटी पर मत कसो ....जो हो रहा है -होने दो -दीदी होती तो ऐसा ही करती ''. रम्भा का अशांत मन शांत हो चुका था ..परिवार में परम्पराएँ टूट रही थीं पर कुछ नई और अच्छी सीख भी दे रही थीं --संवेदनाओं के नए प्रतिमान बन रहे थे ..!
मिसेज वालिया कहीं भी जाएं मेकअप करवाने मेरे ही ब्यूटी पार्लर में आती हैं। उस दिन आई थीं। गाड़ी भी अच्छी तरह से पार्क नहीं की उन्होंने और लगभग हांफ सी रही थीं। सफेद साड़ी, सफेद ही चूड़ियां , सफेद ही चप्पल पहनी थी उन्होंने।
’ प्लीज ...प्लीज आज बहुत जल्दी, में हूं। ... जितनी जल्दी हो मुझे तैयार कर दे , मेरी भैन। ... एक जगह जाना है।’
उनकी हड़बड़ाहट अपने चरम पर थी।
’ कहां जाना है दीदी? ’
’अरे क्या बताऊं तुझे! वो मेरी छोटी बहिन है ना ...अरे वही लवली उसका ना ...देवर ना ... उसका देवर एक एक्सीडेट में ....। उसकी डैडबॉडी घर आ गई है। अफसोस करने के लिए जाना है । बहुत हल्का सा आई मीन लाइट, बस लाइट सा कर दे.। अरे जल्दी कर दे ना मेरी मां। लेकिन ध्यान रहे, जल्दी करने में मेकअप खराब नहीं लगना चाहिए। ध्यान रखना मेकअप साड़ी ब्लाउज और चूड़ियों से मैच करे, तू समझ रही है ना।’
मिसेज वालिया की जल्दी को देखते हुए, मैं मेकअप करने में जुट गई थी।
सपना
रामबाबू ऑफिस से यू डी सी रिटायर हुए थे। पत्नी के अलावा दो बेटे और एक बेटी ही थे परिवार में। पेंशन, बीमा और फण्ड से मिली धन राशि से बेटी के हाथ पीले करने के प्श्चात उनके पास जमा पूंजी माईनस जीरो थी। बड़ा बेटा नेतागीरी में रहता था। उखाड़ कुछ पाया नहीं था आज तक और छोटा स्वयं को सलमान खान की औलाद समझता सो रात दिन फिल्मों के बारे में बड़बड़ाता रहता था। मां का आशीर्वाद दोनों को ही प्राप्त था। घर रामबाबू की पेंशन और.......। और क्या रामबाबू ने एक हाउसिंग सोसाइटी में चौकीदार की नौकरी कर ली थी वहॉं से मिली राशि से ही चल रहा था।
जहॉं रामबाबू नौकरी में ईमानदार रहे थे वहीं चौकीदारी में भी कर्तव्यपरायण थे। उस दिन धोखे से चौकीदारी करते समय उनकी आंख लग गई थी उन्होंने एक सपना देख लिया था। बस उसी को अपने परिवार के साथ बांट रहे थे-
आज रात मैंने एक सपना देखा, सुबह की चाय पर बोले थे रामबाबू।
क्या, पत्नी और दोनों बेटे समवेत स्वर में बोले थे।
मुझे भगवान शंकर ने दर्शन दिए। अभी पूरी बात बोल भी नहीं पाए थे कि उनकी धर्मपरायण पत्नी बोली थी, जय भोले। उन्होंने मुझसे कहा, बच्चा मैं तेरी ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता से प्रसन्न हूं। मांग जो मांगना चाहे।। सपना साकार करने लगे थे रामबाबू।
फिर आपने क्या मांगा। तीनों एक साथ बोले थे।
मैंने कहा। हे प्रभु, मुझे मृत्यु प्रदान करो। अपने साथ ले चलो, मैं जीना नहीं चाहता। वे एक एक शब्द होंठ काट-काटकर बोल रहे थे।
औेर ये घर....... ये घर कैसे चलेगा। दोनों बेटों के साथ इसमें पत्नी का स्वर भी समाहित था। आगे का सपना किसी ने नहीं सुना था।
घर के आगे लॉन पर छतरी सा तना , नाजुक सफेद और गुलाबी फूलों के गुच्छों से लदा-फंदा चैरी ब्लाजम का वह पेड़ जब-जब हवा में झूमता, साथ-साथ दिशा भी झूम उठती। हलके से झोंके से ही सैकड़ों पत्तियाँ झर-झर गिरने लग जातीं और आँखों के आगे कालीन-सी बिछ जातीं। तब दिशा उसी कालीन पर टहलने लग जाती, मानो परियों का देश हो वह, मालकिन हो वह इस कायनात की। पल भर में ही सारी थकान जाने कहाँ उड़ जाती तब उसकी।
‘इतना बुरा भी तो नहीं यह देश। माना अकेले हैं, बहुत अकेले हैं अधिकांश लोग यहाँ पर, परन्तु यह अकेलापन, यह जीवन शैली खुद ही तो चुनी है, एक विशिष्ट और एक्सक्लूसिव जिन्दगी के तलाश में। यह वैभव का संचय और अकेलेपन का ठाट-बाट, यही तो उपलब्धि और प्रगति है इन पाश्चात्य विकसित देशों की, इस सदी के सपनों की। सब अपना, बस अपना, बिना किसी के साथ साझे या बांटे। ‘
धार में बहती टूटी टहनी जैसे पेड़ का हिस्सा होकर भी पेड़ का हिस्सा नहीं रह जाती वैसे ही वह भी कहाँ रह गई है अब भारत का हिस्सा; कितनी दूर हो गई है वह देश से, अपनों से, उनकी सोच से। वक्त के प्रवाह ने उसे भी तो दूर अजनबी तटों पर ला पटका है।
कभी कभी अपनी ही सोच से डर जाती थी दिशा और फिर खुद को ही संयत करके आत्मबल तलाशती- पर अगर उसमें अपने अस्तित्व का कोई भी बीज, कोई भी अंश शेष है तो फिरसे फलेंगे फूलेंगे उसके गुण-रूप इसी धरती पर- सोचते-सोचते कभी मुस्कुराती तो कभी उदास हो जाती दिशा।
कल ही उसने सोहो रोड से लौटते समय पास के पार्क में बच्चों को चहकते और क्रिकेट खेलते देखा था। सभी रंग के बच्चे... बेहद खुश बच्चे। उसके बच्चों की तो घर से स्कूल और स्कूल से घर वापस- बस यही दिनचर्या रह गई है। चारो तरफ इतना सन्नाटा रहता है। फोन न बोले तो कोई आवाज ही नहीं आसपास। वैसे तो रास आता है उसे यह सन्नाटा, पर कभी-कभी मन करता है कि भारत की तरह शोर सुनाई दे, बच्चोंकी चिल्लपों कार और हौर्न की आवाजें...सब्जी ठेले वालों की आवाजें। जिनसे कभी वह बेहद खीज जाया करती थी आज मिस कर रही थी उन्हें ही। बारबार ही भारत याद आ रहा था उसे ...अपना शहर अपना मोहल्ला याद आ रहा था। कितना अच्छा लगता था जब कोई भी, कभी भी मिलने आ जाता था। यहाँ की तरह घर के दरवाजे ताले लगाकर नहीं रखे जाते वहाँ पर।
पर यह लोग तो उन हिस्सों को तीसरी और चौथी दुनिया कहते हैं। न तो इन एक्सक्लूसिव मोहल्लों में ही वह खुलापन है , और ना ही यहाँ के बच्चों के बचपन में। स्कूल की फील्ड या फिर मंहगे टैनिस और क्रिकेट के क्लब, वहीं इनकी किलकारियाँ सुनाई देती हैं, वहीं झुंड बनाकर खेल सकते हैं ये। दिशा तोड़ेगी यह चुप्पी...कम-से-कम अपने घर में तो अवश्य ही। उसने पक्का मन बना लिया था।
‘ जब यहीं रहना है तो कुछ वह बदलेगी, इनके रंग में रंगेगी और थोड़ा इन्हें भी तो बदलना ही होगा उसकी खातिर, उस जैसों की खातिर। ‘
और अगले ही दिन उसने अक्षत और रोली के 10-12 मित्रों को एकसाथ ही बुला लिया घर पर।
‘कोई जन्मदिन वगैरह है क्या ? ‘- हर मां स्तंभित थी उसके आमंत्रण पर। पर किसी को ऐतराज नहीं था –कम-से-कम चंद घंटों को आराम से पैर फैलाकर मनचाहा प्रोग्राम देख पाएंगी वे, पति के साथ एकांत में वक्त गुजार पाएंगी इतवार के दिन। जिनसे भी कहा उसने, सभी ने बच्चे भेज दिए। एकाध के तो कजन भी आए साथ में। दो पाली की क्रिकेट टीम बन गई थी तुरंत ही। अच्छा खासा बड़ा लौन था उसका। आराम से क्रिकेट खेल सकते थे बच्चे। दिशा को कोई ऐतराज नहीं था। पर अगले दस पंद्रह मिनट में ही क्रिकेट की पहली कैजुएलिटी था ग्रीन हाउस का कांच का दरवाजा। पहले छक्के का ही वेग न संभाल सका कांच और भयभीत व विस्मित आँखों के आगे ही किरच-किरच गिर पड़ा। उसका होता तो भी ठीक था, सह जाती वह यह नुकसान। पर मुश्किल तो यह थी कि फेंस के बगल में खड़ा वह ग्रीन हाउस पड़ोसी का था, जिसकी तरफ ध्यान ही नहीं गया था। पड़सियों के आगे तुरंत ही जाकर अपराध कबूल किया गया और माफी भी मांगी गयी। खेल तुरंत ही रोक दिया गया। बच्चों के साथ-साथ दिशा को भी अब समझ में आ गया था, क्यों एक्सक्लूसिव घरों में रहने वाले बच्चे खुलकर नहीं खेल सकते, क्यों अंग्रेजी की यह कहावत इतनी मशहूर है कि ‘ व्हेन इन रोम, डू एज़ द रोमन्स डू।‘
बदलने की, व्यवस्थित होने की, सामंजस्य करने की कोशिश वह भी जरूर ही करेगी। रहना है तो इस देश से, इसके माहौल से अभ्यस्त तो होना ही पड़ेगा।
अपनी सोच में उलझी दिशा अभी लंच के बिखरे बर्तनों को अलमारी में रख ही रही थी कि फोन की घंटी बज उठी।
‘ आज शाम को आई. एम. ए. का सालाना जलसा है। मैं साढे छह तक पहुँचूंगा। सात तक वहाँ पहुंचना है। तुम तैयार रहना। और हाँ बेबी सिटर भी अरेंज कर लेना, लौटते-लौटते रात के बारह, साढे बारह बजेंगे।‘
पर इतनी जल्दी सब कुछ कैसे...कुछ कहे, समझे, इसके पहले ही गौरव फोन रख चुके थे। ऐसे ही रहते हैं उनके अधिकांश फरमान या आदेश...अकस्मात और बेहद अर्जेन्सी लिए हुए।
मदद के लिए दिशा ने पड़ोस की बड़ी बहन कुलवंत को ही फोन लगाया और उन्होंने अपनी 23 वर्षीय जस्सी को भेज भी दिया बच्चों की निगरानी के लिए। जस्सी के लिए गेस्ट रूम तैयार करके और बच्चों का, जस्सी का, खाने-पीने का इन्तजाम करके दिशा तैयार थी बाहर जाने को। कांजीवरम की हल्की नीले रंग की साड़ी और गले में दो लड़ी मोतियों की माला, भारतीयता की तराशी मूरत लगी रही थी दिशा।
पर वहाँ हौलीडे इन के हॉल में माहौल पूरी तरह से पाश्चात्य स्भ्यता में डूबा हुआ था।
पहुँचते ही- ‘ जिन, वोड्का या रम, क्या लेंगी आप, वैसे शेरी भी है?’ , उसकी सारी भारतीयता को अनदेखा करते हुए परिचारिका ने पूछा। ‘ औरेंज जूस ठीक है मेरे लिए।‘ बगल में रखे चंद सौफ्ट ड्रिंक की तरफ इशारा करते हुए दिशा ने सिर हिला दिया और ग्लास हाथ में लेकर आगे बढ़ चली।
‘ यह भी कोई पीने की चीज है?’
दिशा अभी पांच कदम भी नहीं चल पाई थी कि सद्य परिचित डॉ. स्वामी ने उसके हाथ से गिलास छीनते हुए कहा- ‘ क्या लाऊँ मैं आपके लिए-ब्लडी मैरी, कौर्क स्क्रू या पीनाकलाडा? या फिर आप भी वही अन्य लेडीज की पसंदीदा ड्रिंक, जिन एंड टॉनिक ही लेती हैं? बताइये, बताइये । शरमाइये नहीं, इस टेम्स की गंगा में नहाकर तो बड़े-बड़े साधु भी अपना चोला बदल लेते हैं!’
दिशा ने पलटकर देखा। पुराने कट की थोड़ी ऊँची सी पैंट शायद गेलिस की वजह से और टार्टन की बो।
‘ अरे वह देखिए, माइ वाइफ फ्रौम बिहार, ज्यादा पढ़ी-लिखा भी नहीं है वह। वह भी पीता है। आजकल सभी पीता है, भारत में भी, फिर यह तो इंगलिश्तान है, यहाँ काहे की हिचक ! ‘
पीले दांत और कान तक खिंची हंसी के साथ इतना कुछ कह डाला था उसने कि उसका दिवालियापन , उसका पिछड़ा और कमजोर परिवेश सबकुछ दिशा की आंखों के आगे कचरे-सा बिखर गया था । फिर भी,
‘ नहीं, नहीं। मेरे लिए यही काफी है। ‘
–कहकर दिशा ने बड़े ही शांत और संयत भाव से स्वामी से गिलास वापस ले लिया और एक शांत-सी जगह ढूँढकर दूर जा बैठी। सामने देखा तो चार पांच औरतें पतला हवायन सिगार पी रही थीं और टेबल पर जिन और टौनिक के ग्लास रखे थे। आंख मिलने पर एक ने वेव भी किया उसे और पूछा, ‘विल यू लाइक टु जौइन अस?’
दिशा के ना करने पर दबी हंसी में डूबी आवाज उसके कान तक पहुंच ही गई- ‘नई चिड़िया लगती है। फिक्र न करो, रंग जाएगी यह भी रंग में। किसी जूनियर डॉ. की वाइफ लगती है –छोटे शहर से।‘ और फिर एक मिली जुली खिलखिलाहट-‘ दीज हौबीज आर वेरी एक्सपेन्सिव बट वेरी एडिक्टिव एनी वे।‘
दिशा को आश्चर्य एक ही बात का था कि वे चारो ही एशियन थीं, भारत या आसपास के ही देशों से।
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गौरव माहौल में पूरी तरह से डूब चुके थे। शोर-शराबा , दावतें...यह हो-हंगामा खूब ही रास आता है उन्हें। बीच-बीच में दिशा से भी आकर पूछ जाते, ‘ सब ठीक तो है न, इनजौयिंग? ’ और वह मुस्कुराकर ‘ हाँ ’ में सिर हिला देती।
अब फ्लोर पर डांस का दौर चल चुका था। बार बार के आग्रह के बाद, गौरव करीब-करीब खींच कर ले ही गए दिशा को फ्लोर पर, जानते जो थे कि दिशा को नाचना कितना पसंद है। पति की बांहों में झूमती दिशा ने आखें बंद कर ली थीं। और्क्रेस्ट्रा पर बजती धुन उसकी प्रिय थी। गाना खतम हुआ तो, ‘ मे आइ हैव द औनर’ कहकर डॉ. स्वामी भी ले गए उसे डान्स फ्लोर पर और सर्कस के जोकर की तरह उझलने लगे। अटपटा तो लग रहा था पर शालीनता और दूरी बनाए रखते हुए दिशा ने उनका भी साथ दिय़ा। फिर थककर अब और नहीं, प्लीज- कहती वापस अपनी टेबल पर जा बैठी।
‘ तुम इतनी बोर कबसे हो गई हो, दिशा ? ‘ लौटते समय पति ने पूछा तो कोई जवाब नहीं दे पाई दिशा। नहीं कह पाई कि उसे यह उनका मित्र डॉ. स्वामी , अच्छा नहीं लगा। नहीं कह पाई कि स्त्रियों के पास एक छठी विशेष ज्ञानेन्दिय होती है, जिसके द्वारा वे आने वाले खतरे को मीलों दूर से ही सूंघ लेती हैं।
अगले दिन शाम को बच्चों के स्कूल में अभिवावक और शिक्षक की कमिटी मीटिंग थी। बच्चों की शिक्षा और भविष्य के निर्णयों में वह भी साझी रह पाए और फन्ड रेजिंग कार्यक्रमों में कुछ मदद कर पाए, यही सोचकर 11 सदस्यों की उस मीटिंग में शामिल हो गई थी दिशा। क्रिस यानी क्रिश्चियाना के अलावा बाकी सभी पुरुष थे कमेटी में। दिशा का तो ध्यान भी नहीं गया था इस तथ्य पर जबतक हेडमास्टर ने स्वागत भाषण में कांटों के बीच शोभित दो गुलाब कहकर संबोधित न किया उन्हें। और तब हंस पड़ी थी भोली-भाली दिशा।
‘-उम्मीद है आप लोग डाली पर उगे कांटों की तरह ही हमारी रखवाली भी करेंगे।‘
पल भर सूंई गिर चुप्पी थी फिर तुरंत ही पूरा कमरा ठहाकों से गूंज पड़ा।
क्रिसमस महीने भर में था, उससे पहले हार्वेस्ट फेस्टिवल । एक कार बूट सेल का कार्यक्रम बना। लोगों ने खुलकर खिलौने, कपड़े और किताबें दान कीं। पौधे भी आए कई। क्रिस और दिशा ने पौधों की टेबल संभाल ली थी। थड़ाथड़ बिक रहे थे सब। मिनटों में मेज खाली हो गई। दिशा के हिसाब से 15 पौंड के पौधे बेचे थे उन्होंने पर वहाँ बस नौ पौंड कुछ पैसे ही थे। करीब-करीब छह पौंड का हिसाब नहीं था। दिशा ने देखा था सबने पैसे दिए थे। टेबल के आस पास या नीचे भी कहीं कुछ नहीं गिरा था। उसने अपने पर्स से कमी पूरी कर दी और चुपचाप घर चली आई। थोड़े दिन उलझन का एक कीड़ा सिर में कुलबुलाता रहा फिर भूल गई दिशा।
हफ्ते-दो हफ्ते बाद एकदिन क्रिस का फोन आया। कल तुम मेरे घर मेरे साथ कौफी पीओगी। सुबह 11 बजे तुम्हारा इंतजार करूंगी मैं।
जाने कैसा स्नेह था आमंत्रण में कि दिशा मना न कर सकी। अगले दिन ठीक समय पर दिशा क्रिस के घर के बाहर थी। बेल करते ही क्रिस ने दरवाजा खोला और बांहों में भरकर उसे अंदर ले गई। दिशा ने देखा बहुत ही सुरुचि से सजा हुआ था क्रिस का घर। पति नेवी में औफिसर थे और पूरी दुनिया से चुनचुनकर लाई गई बेशकीमती चीजों से घर भरा पड़ा था।
‘तुम्हारा घर बहुत ही सुन्दर है ।‘
उसने सामने बैठी क्रिस से कहा तो क्रिस उठकर बगल में आ बैठी और उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बोली, ‘ और तुम्हारा मन। ‘
अचानक उसने अपना पर्स खोला और छह पौंड दिशा के हाथ पर रख दिए। दिशा भौंचक उसे निष्पलक देख रही थी। कुछ पूछे या बोले बगैर। पूछने के पहले ही क्रिस बोली –‘ जानती हो दिशा, उस दिन ये पैसे मैंने ही लिए थे। पर पहली बार ऐसा हुआ कि यूँ पैसे चुराने पर मेरी आत्मा ने मुझे कचोटा। मुझे शौप लिफ्टिंग यानी चोरी की बीमारी है बचपन से ही। कभी भी पैसे की कमी नहीं रही फिर भी बस मजबूरन एक थ्रिल के लिए करती हूँ यह सब। कभी पकड़ी नहीं गई। उस दिन भी ऐसा ही किया था मैंने, पर तुम्हारा व्यवहार देखकर तुम्हारा कद कई गुना बढ़ गया है मेरी आँखों में। ‘
‘ और तुम बेहद बहादुर और बेहद अच्छी।‘ आसान तो नहीं होता अपनी गलती को यूँ कबूलना, दूसरे के सामने उजागर करना। फिर यह भी तो एक तरह की बीमारी ही है। बस कोशिश करो इस आदत से बाहर निकलने की।‘
दिशा की आंखों के आगे हाल ही में पढ़ी वह खबर घूम रही थी जहाँ एक डचेज ने पांच पौण्ड की शौप लिफ्टिंग की थी। उसे भी कुछ ऐसी ही आदत थी। पकड़े जाने पर जज ने उसपर हजार पौण्ड का फाइन किया था। अजीब है यह दुनिया...गरीब देशों में लोग जरूरत के लिए चोरी करते हैं और अमीर देशों में थ्रिल या उत्तेजना के लिए। पाश्चात्य सभ्यता का एक तिलिस्मी संसार खुल रहा था उसकी आँखों के आगे और साथ में एक मजबूत कर्तव्य बोध भी।
–‘ क्या सोच रही हो दिशा ? यही न कि ऐसा क्यों होता है-सच कहूँ तो यह तो मैं भी नहीं जानती।–‘
दिशा ने आगे बढ़कर सहेली को गले लगा लिया।
दोनों ही साफ दिल थीं। दिशा ने पैसे रख लिए और सब कुछ भूल गई। सहेलियों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और अपनी-अपनी कौफी की प्यालियाँ वापस उठा लीं।
दोनों ही जान चुकी थीं कि एक अच्छी दोस्ती की भरपूर संभावना थी उनके बीच ...
प्रेमचंद या मुंशी प्रेमचंद ? 31 जुलाई । महान साहित्यकार एवं उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का जन्मदिवस।
इस अवसर पर अनेक लेखकों ने उन्हें याद किया, उनके साहित्य, उनकी विशेषताओं, उनके योगदान की चर्चा की। किसी ने उन्हें प्रेमचंद लिखा तो किसी ने मुंशी प्रेमचंद। यह तथ्य तो प्रायः सर्वज्ञात है कि जिन्हें हम " प्रेमचंद " के नाम से संबोधित करते हैं, उनका नाम माता - पिता ने " धनपत राय " रखा था, और उनके चाचा उन्हें " नबाव " कहते थे। उन्होंने जब उर्दू में लिखना शुरू किया तो " नबाव राय " नाम से लिखा, पर शीघ्र ही उन्हें यह नाम छोड़ना पड़ा। हुआ यह कि उनकी कहानियों का एक संग्रह " सोज़े वतन " (ज़माना प्रेस , कानपुर से 1909 में ) छपा, जिसमें देशभक्ति की कहानियाँ थीं ; पर सरकार ने इसे राजद्रोही साहित्य मानते हुए इसकी सारी प्रतियाँ ज़ब्त करके जला दीं । धनपतराय ( तब लोग उन्हें इसी नाम से जानते थे ) उस समय सरकार के शिक्षा विभाग में सहायक उप विद्यालय निरीक्षक थे। यह बात तो अब जाहिर हो ही चुकी थी कि धनपतराय ही " नबावराय " हैं । अतः उनके मित्र उर्दू अखबार " ज़माना " के संपादक मुंशी दया नारायण निगम ने सुझाव दिया कि सरकारी कोप से बचने के लिए नबाव राय को " मार दो " अर्थात इस नाम का प्रयोग करना बंद कर दो और नया नाम अपना लो ; उन्होंने ही एक नया नाम सुझाया " प्रेमचंद "। धनपतराय को सुझाव पसंद आया और फिर वे " प्रेमचंद " बन गए ।
पर वे " मुंशी प्रेमचंद " कब बने, यह एक रहस्य लगता है क्योंकि न तो प्रेमचंद द्वारा लिखे किसी पत्र या किसी कृति पर यह नाम मिलता है, और न उनके जीवनकाल में उनके किसी मित्र, प्रशंसक, आलोचक आदि ने उन्हें इस नाम से संबोधित किया। सम्मान के लिए उनके नाम से पहले "श्री", "श्रीयुत", "श्रीमान" आदि का प्रयोग तो मिलता है, पर “ मुंशी “ का नहीं। जैसे, प्रेमचंद की कहानियों के संग्रह मानसरोवर प्रथम भाग पर नाम है 'श्री प्रेमचंद जी ' ; सप्त सरोज पर नाम दिया है ' श्रीयुत प्रेमचंद ' ; निर्मला उपन्यास पर नाम लिखा है ' श्रीमान प्रेमचंद जी ' ; एक दूसरे उपन्यास रंगभूमि पर केवल " प्रेमचंद " लिखा है। प्रेमचंद ने कई पुस्तकों के अनुवाद भी किए। उन पर उनका नाम प्रेमचंद ही दिया है। जैसे नेहरू जी की Letters from a Father to his Daughter का अनुवाद प्रेमचंद जी ने किया था " पिता के पत्र पुत्री के नाम " , उस पर उनका नाम लिखा है " प्रेमचंद बी. ए. " । कहीं भी " मुंशी प्रेमचंद " का प्रयोग नहीं हुआ है। जब प्रेमचंद नबाव राय नाम से लिखते थे, तब भी उन्होंने कभी " मुंशी " शब्द का प्रयोग नहीं किया। उनके उर्दू उपन्यास ' हमखुर्मा व हमसवाब ' ( जो बाद में हिंदी में “ प्रेमा “ नाम से छपा ) पर लेखक का नाम लिखा था " बाबू नबाव राय बनारसी " । प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी ने प्रेमचंद जी पर एक पुस्तक लिखी, “ प्रेमचंद घर में “ ; इस पुस्तक में कहीं भी प्रेमचंद के लिए “ मुंशी “ शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है। यह ध्यान देने योग्य है कि प्रेमचंद जी के अभिन्न मित्र थे मुंशी दयानारायण निगम। उनके लिए अनेक स्थानों पर " मुंशी / मुंशी जी " कहा गया है, पर प्रेमचंद के लिए नहीं।
प्रेमचंद के नाम के साथ " मुंशी " शब्द के प्रयोग के बारे में कुछ लोग प्रायः दो तर्क देते हैं। पहला तो यह कि प्रेमचंद का जन्म कायस्थ परिवार में हुआ था, और कायस्थों के नाम के पहले सम्मान के लिए ' मुंशी ' शब्द लगाने की परम्परा रही है ; और दूसरा यह कि प्रारम्भ में प्रेमचंद अध्यापक रहे और तब अध्यापकों को ‘ मुंशी जी ‘ भी कहने की परम्परा थी। पहली नजर में ये तर्क विश्वसनीय लगते हैं, पर जब हमारा ध्यान इस तथ्य पर जाता है कि ये परम्पराएं तो तब भी थीं जब प्रेमचंद जीवित थे, बल्कि कहना चाहिए कि आज की तुलना में तब ये परम्पराएं अधिक प्रचलित थीं, फिर भी न तो प्रेमचंद ने स्वयं कभी इस शब्द का प्रयोग अपने लिए किया, न किसी और ने उन्हें " मुंशी " कहा, तो इन तर्कों की विश्वसनीयता पर शंका होने लगती है।
ऐसा प्रतीत होता है कि एक भ्रम के कारण प्रेमचंद के नाम के साथ कुछ लोगों ने " मुंशी " शब्द जोड़ लिया है। वह भ्रम उन पत्रिकाओं में निहित है जिनका सम्पादन प्रेमचंद जी ने किया। प्रेमचंद जी ने पहले " हंस " पत्रिका 1930 में शुरू की ; पर वह काफी समय तक घाटे में ही चलती रही। उन दिनों विषय सामग्री की दृष्टि से एक अच्छा साप्ताहिक पत्र " जागरण " नाम से निकलता था, पर यह भी घाटे में चल रहा था। अतः उसके प्रबंधक उसे बंद करने की सोच रहे थे। पत्र की उपयोगिता देखते हुए प्रेमचंद ने उसे खरीद लिया। उनका अनुमान था कि दोनों पत्रिकाएँ मिलकर एक दूसरे का घाटा पूरा कर देंगी। 15 अगस्त 1932 को उन्होंने जैनेन्द्र जी को पत्र में सूचित किया कि जागरण खरीद लिया है। 22 अगस्त 1932 को प्रेमचंद के सम्पादन में जागरण का पहला अंक प्रकाशित हुआ । पर ये पत्रिकाएँ घाटे से नहीं उबर पाई। तब प्रेमचंद जी ने एक और उपाय सोचा। प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (के एम मुंशी) यों तो वकील थे, पर उनकी ख्याति एक साहित्यकार, शिक्षाशास्त्री और समाज सुधारक के रूप में भी खूब हो रही थी। जिस प्रकार प्रेमचंद ने विधवा शिवरानी देवी से विवाह करके समाज को नई दिशा दिखाई, उसी प्रकार श्री मुंशी ने भी बालविधवा " लीलावती " से विवाह करके एक आदर्श उपस्थित किया था। साहित्य में उनकी विशेष रुचि थी। उन्होंने गुजराती, हिंदी, अंग्रेजी में अनेक ग्रंथों की रचना की। उनके उपन्यास " पृथ्वीवल्लभ " पर मणिलाल जोशी के निर्देशन में 1924 में बनी फिल्म बहुत सफल रही थी (बाद में सोहराब मोदी ने भी इस पर फिल्म बनाई) ।
प्रेमचंद ने सोचा कि यदि ऐसा प्रसिद्ध साहित्यकार इन पत्रिकाओं से जुड़ जाए तो इनका प्रसार बढ़ेगा और ये घाटे से भी उबर जाएंगी। उन्होंने श्री मुंशी से इन पत्रिकाओं के सम्पादन से जुड़ने का अनुरोध किया। पत्रिकाएं तो स्तरीय थीं ही, प्रेमचंद जी भी तब तक इतने प्रसिद्ध हो चुके थे कि मुंशी जी को उनके साथ काम करना अच्छा लगा और वे उक्त पत्रिकाओं के सम्पादन के लिए तैयार हो गए। उन्हें विशेष सम्मान देते हुए प्रेमचंद ने सम्पादक के रूप में उनका नाम पहले रखा। हंस के पुराने अंकों पर सम्पादक के रूप में दोनों नाम इस रूप में लिखे मिलते हैं, " मुंशी , प्रेमचंद "।
ऐसा प्रतीत होता है कि जिस खोजार्थी ने हंस के पुराने अंक देखे, उसे पूरी अंतर्कथा की संभवतः जानकारी नहीं होगी। अतः उसने मुंशी और प्रेमचंद के बीच के अल्प विराम को मुद्रण की भूल मान लिया होगा और " मुंशी प्रेमचंद " का जन्म हो गया होगा।
कारण जो भी हो, और " मुंशी प्रेमचंद " चाहे जिसकी भी देन हो , ध्यान देने की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रेमचंद सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में विश्वास रखते थे। इसी कारण वे समाज सुधार की तत्कालीन प्रमुख संस्था आर्य समाज से भी जुड़े और बाद में कांग्रेस से भी जिसने महात्मा गाँधी के नेतृत्व में समाज सुधार को भी स्वतन्त्रता आंदोलन का अनिवार्य अंग बना लिया था। दोनों ही संस्थाएं जातिप्रथा को बुराई मानती थीं, अतः उसे समाप्त करना चाहती थीं। इसी दिशा में एक कदम था अपने नाम के साथ जातिसूचक उपनाम का प्रयोग न करना। प्रेमचंद ने भी इसे अपनाया। उनका जन्म श्रीवास्तव कायस्थ परिवार में हुआ था, पर उन्होंने न इसका प्रयोग किया न कायस्थ जाति के सूचक " मुंशी " का प्रयोग किया। अपने वास्तविक नाम " धनपत राय " के साथ भी उन्होंने श्रीवास्तव या मुंशी नहीं लिखा। उनकी पत्नी शिवरानी देवी, उनके सुपुत्र अमृतराय और श्रीपत राय ने भी इसी परम्परा का पालन किया। जातिप्रथा का विरोध करने के लिए अनेक लोगों ने यह परम्परा अपनाई। पूर्व प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री, उनकी पत्नी ललिता शास्त्री, उनके चारों सुपुत्र (हरिकृष्ण, अनिल, सुनील और अशोक) या प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय ' बच्चन ' और उनके सुपुत्र अमिताभ और अजिताभ के उदाहरण भी हमारे सामने हैं। अतः हमें प्रेमचंद की इस भावना का सम्मान करना चाहिए और उन्हें उसी नाम से संबोधित करना चाहिए जिसका उन्होंने प्रयोग किया अर्थात " प्रेमचन्द " ।
(डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री
सदस्य, हिंदी सलाहकार समिति, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार
पी / 138, एम आई जी, पल्लवपुरम फेज़ - 2, मेरठ 250 110)
डा.विवेक दुबे द्वारा हिन्दी साहित्य जगत में कहानियों, कविताओं और समीक्षाओं से अपनी सशक्त पहचान बनाने वाली डा. दीप्ति गुप्ता का एक रुचिकर साक्षात्कार -
१) आपके लेखन की शुरुआत कब से हुई ? घर में लेखन की पृष्ठभूमि थी या आपका ही रुझान आधार बना ?
मेरा अपना ही रुझान आधार बना ! मेरे लेखन की शुरुआत तब से हुई जब मैं लेखन की अहमियत से अंजान थी ! तब मैं ग्यारह वर्ष की थी ! बगीचे में खिले एक अकेले गुलाब को देखकर न जानेक्यों मेरे बाल मनको लगा कि वह उदास है, खामोश है ! उसके आस पास दूर तक कोई फूल नहीं था ! बस, उसके अकेलेपन से अभिभूत हुई वही उसके पास बैठ कर मैंने अपने जीवन की पहली कविता लिखी ‘ A Lonely Flower’ ! अंग्रेजी में शायद इसलिए लिखी कि हमारी अंग्रेजी की टीचर हम बच्चो को अक्सर छोटी-छोटी कविताएँ, यात्रा वर्णन लिखने के लिए प्रेरित किया करती थी ! सो उनका असर इतना था कि जो भाषा वे पढाती थी, उसी में कविता लिखने का मन हुआ ! उसके बाद बहुत साल तक झिझक के कारण कुछ लिखा ही नहीं ! लेकिन किशोरावस्था में कुछ लिखने के अंदर घुमडता सा रहता था जो कॉलिज पत्रिकाओं तक सीमित रहा ! कहानी और निबंध, कविता लेखन प्रतियोगिताओं में खूब भाग लेना और पुरस्कार मिलने पर, लिखने के लिए और प्रोत्साहित होना....यह सिलसिला चलता रहा ! इसके बाद सत्तर के दशक से धीरे-धीरे मेरी कहानियां पत्र -पत्रिकाओं तक पहुँची !
१) शुरूआती दौर में आपकी रचनाएँ किन पत्र –पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई ?
वामा’ में एक वाकया प्रकाशित हुआ था ! ‘सन्मार्ग’(कलकता)और ‘पंजाब केसरी’ में एक के बाद एक कहानियां, जनसत्ता में भी कहानी व आलेख छपे और छपते रहे ! ये कोई खास उपलब्धि तो नहीं थी पर, इस सिलसिले ने भविष्य के लिए एक आधार दिया ! मेरा लेखन कविता कहानी तक ही सीमित नहीं होता था ! संस्मरण, शब्द-चित्र प्राकृतिक वर्णन, प्रतीकात्मक लेखन , हास्य और व्यंग्य लेखन, मतलब कि जो भी बात, मौसम, शहर, व्यक्ति, प्रभावित कर गया, उस पर कुछ लिखने के लिए कलम उठ जाती थी और कभी कविता, कभी कहानी तो कभी संस्मरण बन कलम से निकलती थी !
२) लेखन से आपका नाता किस तरह का है ? मतलब कि यह आपका शौक है, पैशन है ...या समय का सदुपयोग ?
लेखन से मेरा बड़ा निकट का रिश्ता है - एक आत्मीय नाता है ! जो भी आसपास घटता है, वह दिल पर अक्स छोडता है और मन के तारों को, संवेदनाओ और भावो को स्पंदित करता है ! जब तक उस पर लिख नही लेती बेचैनी सी बनी रहती है ! इसी तरह मन खुश हुआ, आह्लादित हुआ तो कविता उमड़ने लगती है, या आहत हुआ तो फिर से कविता मचलने लगती है ! एक तरह से लेखन को मैं विरेचन भी कहना चाहूगी ! लेकिन कविता या कहानी में रूपांतरित मेरे भाव व विचार मात्र विरेचन ही नहीं होते अपितु वे इस तरह एक सांचे में ढल कर आते हैं कि पाठकों को व समाज को कुछ सकरात्मक दिशा दें ! सकारात्मक सोच दें ! जब किसी चीज़ से इस तरह का नाता बन जाए कि उसके बिना रहा न जाए, वह हर समय हमारे दिलो-दिमाग में चलता रहे तो, वह ‘‘पैशन’’ ही कहलाता है !
३) आपकी कहानियों, कविताओं और आलेखों में नारीवाद के दर्शन कम हुए ! क्या आप नहीं सोचती कि लम्बे समय से इस मुद्दे को ही अनेक लेखिकाओं ने अपने लेखन का विषय बनाया है तो, आप भी इसी विषय को अपनाती ?
मैंने ‘नारीवाद’ को केंद्रित करके कलम नही चलाई ! स्वत: मेरी रचनाओं में जहाँ कहीं सहज ही नारीवाद आ गया , बस उतना ही ! क्योकि अन्य सब लोग इस पर इतना लिख रहे हैं कि मुझे उसे अपनी रचनाओं का मुद्दा बनाने की ज़रूरत नही लगी ! मुझे हमेशा यह महसूस हुआ कि उससे ज्यादा एक अन्य महत्वपूर्ण लेकिन सरासर उपेक्षित मुद्दा है – ‘मानवतावाद’ जो ‘’खोये हुए मूल्यों और संस्कारों’ से गहराई से जुड़ा है! आज के ‘अर्थ आधारित ‘ समाज और ‘उपभोक्ता संस्कृति’ के युग में जो सबसे अधिक उपेक्षित है, जिसका निरंतर क्षरण हो रहा है - वे हैं संस्कार और मूल्य,....मानवतावाद ! इसलिए मैंने ‘मानवतावाद’ को अपने लेखन का विषय बनाया जो किसी भी समाज और उसमें रहने वाले मानव समुदाय के लिए बहुत ज़रूरी है ! स्रष्टि में हर जगह संतुलन अपेक्षित है ! जब-जब संतुलन बिगड़ा, तब-तब विध्वंस हुआ! नकारात्मकता, संस्कारहीनता, मूल्यविहीनता का पलड़ा भारी होने पर समाज उस ओर झुकता-झुकता एक दिन गिर जाएगा ! सो उसका संतुलन डिगे नहीं इस के लिए दूसरे खाली पलड़े में संस्कार और मूल्य रखने ज़रुरी लगे, सो मैंने उन पर ही अपना लेखन केंद्रित किया !
४) एक लेखक के लिए उसकी रचना का प्रकाशन कितना और क्यों ज़रुरी है ? अगर वह आत्मसंतोष के लिए लिखता है तो प्रकाशन उसके लिए कोई अनिवार्य शर्त नहीं !
हमारा लिखा जब तक दूसरों तक न पहुँचे तो, उसकी महता और सार्थकता ही क्या? व्यक्ति द्वारा किए गए किसी भी रचानात्मक कार्य - चाहे वह लेखन हो या कलाकृति या कुछ और - जिस समाज में वह रह रहा हैं, उस समाज के लोगों तक न पहुँचे तो यह उसके लिए दुर्भाग्य की बात होगी ! ‘रचनात्मक’ लेखन तो वैसे भी, एक तरह का वैचारिक और भावनात्मक आदान-प्रदान है जो, समाज और जीवन से जुड़े अनेक मुद्दों से सूत्रबद्ध होता है और उनकी बेहतरी के लिए सोचता है इसलिए उसका दूसरों तक पहुँचना बहुत ज़रूरी है !
दूसरे अपने लेखन को हम तभी निखार सकते हैं, जब वह दूर-दूर तक पाठको के हाथों में जाए ! पाठक हमारे सबसे बड़े और सबसे सच्चे समीक्षक होते हैं ! अगर पाठक लेखक की रचनाओ को पढ़ कर आंदोलित होते है, उससे तादात्मय स्थापित करते हैं, तो समझिए कि हमारी लेखनी में कुछ क्षमता है जो पाठकों को बांधती है ! इतना ही नहीं जब वे रचनाकार की कहानी और कविताएँ पढ़ कर पत्र लिखते हैं या फोन पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं तो, वह रचनाकार के लिए सबसे अधिक सौभाग्य की बात होती है ! पुरस्कार मिलने जैसा लगता है कि लेखक की अभिव्यक्ति लोगों के भावो और विचारों को झकझोर सकी, उन्हें सोचने पर विवश कर सकी ! इसलिए रचना का प्रकाशित होना और पाठकों तक पहुँचना अपने लेखन को परखने के लिए बहुत अधिक ज़रूरी और महत्वपूर्ण है !
५) आपकी रचनाएँ जब पाठकों तक पहुँचती हैं तो कैसा लगता है ?
बहुत सुख और संतोष मिलता है ! पहला सुख और संतोष तो प्रकाशित होने पर मिलता है ! दूसरा, ‘और अधिक’ सुख और संतोष पाठकों की प्रतिक्रियाएं आने पर मिलता है ! जितने अधिक लोग हमारे लिखे को पढ़ने के माध्यम से जुडते हैं, उससे मुझे अपना लेखन उतना ही संपन्न और सम्मानित महसूस होता है ! फिर वह रचना पाठकों की होकर और भी समृद्ध हो जाती है ! न जाने कितनो का वह भावनात्मक और कितनों का मानसिक सहारा बनती है ! किसी को आनंदित करती है तो किसी को राह दिखती है ! ये देखिए कि रचना कितनी बहुआयामी भूमिका निबाहती है ! तो लेखक के लिए यह स्थिति बड़ी आनंददायक होती है ! इस सुख के आगे दुनिया के सारे सुख फीके !
६) आप मानवतावाद पर कुछ प्रकाश डालेगी ?
मानवतावाद यानी नैतिकता और सांस्कृतिक मूल्यों पर केंद्रित दर्शन या दृष्टि ! जो मनुष्यता के प्रतीक ‘उदात्त गुणों’ यानि ‘मूल्यों और संस्कारों ‘की बात करे ! यदि हम अपने प्राचीन ग्रंथों का अनुशीलन करें तो मनुस्मृति, पद्मपुराण, उपजीव्य काव्य रामायण,महाभारत में ‘धारण करने योग्य’ तत्व सत्य, प्रेम, अहिंसा, दया, करुणा, धैर्य, निष्ठा, शांति, आदि उदात्त मूल्यों को मानवता का मूलाधार बताया गया है ! याज्ञवल्क्य ऋषि ने धर्म के नौ लक्षणों के माध्यम से आदर्शों और मूल्यों की ही बात की है ! जीवन के लिए ज़रूरी इन आदर्शों और मूल्यों की बात करने वाला दर्शन ‘मानवतावाद’ मात्र भारत में ही नहीं अपितु विश्व के सभी देशों में जीवन के लिए अपेक्षित माना गया ! जैसे,इतालवी शब्द‘युमनिस्ता’से निकला ‘ह्युमनिस्ट’ शब्द मूल्यों और संस्कारों की ही बात क़रता है ! मध्यकाल में इटली से लेकर पूरे यूरोप में फैले ‘ रिनैंसा’ यानी पुनर्जागरण (सांस्कृतिक आंदोलन) के प्रणेता फ्रांसिस्को पेट्रार्क थे जिन्होंने प्राचीन पंरपराओं की महता को स्वीकारते हुए सांस्कृतिक मूल्यों के निर्माण पर बल दिया ! कहने का तात्पर्य यह है कि मानव मूल्य और संस्कार जीवन के प्राण रूप है, आत्मा है - उनके बिना जीवन की सार्थकता नहीं ! तो आत्माविहीन होकर समाज कैसे स्वस्थ रह सकता है, कैसे जी सकता है ? सो इन मूल्यों और संस्कारों को संजोने की बात प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मेरी हर कहानी का कथ्य और सन्देश होती है ! मेरी कहानियां उस समाज की कहानियाँ है, जो रास्ता भटक गया है, लक्ष्य हीन हुआ चला जा रहा है ! लेकिन उसमें मानवता के प्रति आस्था जगाने वाले ‘प्रकाश-स्तंभ’ सरीखे पात्र हैं जो इंसान के अँधेरे पलों में उसकी रहनुमाई करते हैं ! जिनके हाथों संस्कारों और मूल्यों की पिटारी खुलती जाती है और पाठक को आश्वस्त करती है कि मूल्य मिटे नही, बस कही गुम गए हैं - उनके मिलने की पूरी संभावना है ! जो भी चाहेगा, उन्हें वह खोज ही लेगा और उसे वे मिल जायेगे, जीवन में उतर आयेगे और समाज में फिर से पनप जायेगें !
उदाहरण के लिए - कार्यस्थल की राजनीति, भ्रष्टाचार, आदि समस्याएं ‘कपटी’ में बड़ी शिद्दत से सामने आई हैं ! लेकिन उनके बीच खड़ी नायिका अपने मूल्यों की बलि नहीं चढाती बल्कि दृढता से उन्हें थामे रखती है ! भूमंडलीकरण और औद्योगीकरण तले पिसता मानव, इस सबसे प्रभावित उसका व्यक्तिगत जीवन, उसके रिश्ते, रिश्तों की छीजती गर्माहट...लेकिन इन सबके बावजूद भी मन के आले में बुझते-बुझते दमक उठने वाली ‘भावनात्मक विरासत’ की लौ प्यार, करुणा, अपनेपन को जगाती है, व्यक्ति की ठंडी पड़ी संवेदनाएं और उनमे लिपटा प्रेम, उस लौ की तपिश से बरफ की परतों से बाहर निकल स्पन्दित हो उठता है - ‘अलगाव से लगाव तक’ कुछ इसी तरह की कहानी है !
७) आज के तकनीकी परिवेश वाले समाज में - संवेदना, भावना और विचारों से जुड़े लेखक की राह कितनी कठिन या सरल है ? इस विषय में आप क्या कहना चाहेगी ?
वैश्वीकरण के इस युग में, संचार तंत्र और विज्ञान के कारण,सब कुछ तंत्र आधारित हो चुका ! संचार माध्यमो से लगता है कि हम सब एक दूसरे के बहुत निकट आ गए है लेकिन वस्तुत स्थिति ये है कि मन से हम एक दूसरे से दूर ही बने हुए हैं ! मन की दूरियों को तकनीकी तार नहीं वरन, भावनात्मक तार तय कर पाते हैं, दिलों को ‘संचार तंत्र’ के तंतु नहीं वरन, ‘संवेदना के तन्तु’ झंकृत करते हैं ! इसके अलावा बाजारवाद के कारण ‘अर्थ’ आधारित समाज में जीवन की हर चीज़ क्रय-विक्रय, व्यवसाय और व्यापार के दायरों में सिमट गई है ! संचार माध्यमों के जाल तले, बाजारवाद, अर्थ आधारित उपभोक्ता संस्कृति से जकड़े, आतंकवाद से घिरे आज के जीवन और समाज में रह कर हमें रचनात्मक लेखन को बनाये रख कर, समाज को अनेक विभीषिकाओं से बचाना है ! दूर जाती मानवता को लौटा कर उसे फिर से मनुष्य में, समाज में स्थापित करना है! राह यद्यपि कठिन है, पर असंभव नहीं ! अत: आज के लेखक आगे बहुत बड़ी चुनौतियाँ हैं ! लेकिन चुनौतियों से डरना कैसा क्योंकि ‘जीवन अपने में ही एक चुनौती’ है ! साहस से डट कर उसका सामना करना है और समाज को रहने की एक बेहतर जगह बना कर उसमे इंसान को ‘इंसान’ के रूप में रूपांतरित होने में सहयोग देना है !
८) ‘देहवादी लेखन’ के बारे में आपका क्या सोचना है? इधर अनेक लेखक़ और विशेष रूप से लेखिकाएं देहवादी लेखन में जुटी हैं !
मैं उस विषय पर लेखन की ज़रूरत नहीं समझती जो पहले से ही समाज में, जीवन में इस छोर से उस छोर तक जंगली बनस्पति की तरह उगा हुआ हो ! ज़रूरत इस बनस्पति पे मूल्य और संस्कारो के फूल उगाने की है जिससे आज सिर्फ देह के स्तर पर जीने वाला आत्माविहीन समाज, फिर से अपनी खोई हुई ताज़गी और सौंदर्य को हासिल कर सके ! इसलिए देहवाद से परे जो है, जो आत्मा से निकलता है और पुन: आत्मा में उतरता है, मैं ऐसे लेखन में रूचि रखती हूँ ! और मात्र रुचि ही नहीं रखती, अपितु वर्त्तमान परिवेश में उसके सृजन को ज़रूरी भी समझती हूँ! आज की कलयुगी लीक से हट कर ‘मेरी इस रूचि’ में, अनेक लोगों को अरुचि हो सकती हैं और असहमति भी लेकिन यह मात्र मेरी पसंद का मुद्दा नही है अपितु समाज के खाली पड़े आत्मिक तल को भरने का मुद्दा अधिक है ! देह का भी ख्याल करना ज़रूरी है , उसकी ज़रुरतो को नज़रअंदाज़ करना सच्चाई से मुँह मोडना होगा किन्तु उसकी भी एक सीमा होती है ! आज देहवादी लेखन की बाढ़ सी आ गई है ! अति सर्वत्र वर्जयेत...वरना ‘अति’ जीवन और समाज के लिए विकट समस्या बन जाती है, रुग्णता लाती है, इसलिए उसके निदान स्वरूप मैं आत्मिक और भाव जगत को स्पंदित करने वाले, प्रेमचन्द, प्रसाद, निराला,महादेवी जैसे उदात्त लेखन को पुन: प्रतिष्ठापित करने में विश्वास रखती हूँ जो आज बहुत पीछे छूट गया है ! उन जैसे रचनाकारों की रचनाओं का मात्र पुनर्पाठ ही होकर नहीं रह जाना चाहिए, अपितु आज के लेखकों की कलम से उनके जैसा कालजयी लेखन भी अपेक्षित है जो हर युग में प्रासंगिक हो !
९) पिछले वर्ष मुझे यह जान कर खुशी हुई कि आपकी दो कहानियों ने क्रमश: २००८ और २००९ में, विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम का हिस्सा होने का सम्मान पाया है ?
जी हाँ, मेरी दो कहानियां पूना विश्वविद्यालय के स्नातक पाठ्यक्रम में क्रमश: तीन- तीन वर्ष के लिए शामिल की गई, सिर्फ अपनी मूल्यपरकता के कारण ! मैं सोचती हूँ कि यह मेरे लिए सबसे स्पृहणीय और सुन्दर पुरस्कार है जो आजीवन अनेक बड़े-बड़े पुरस्कारों से सुसज्जित रचनाकारों को या तो मिल नहीं पाता या फिर बड़ी देर से मिलता है ! जब मुझे इस बात की सूचना मिली तो पहले मैं विश्वास ही नहीं कर पाई, लेकिन जब बाद में ‘वाणी प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित पाठ्य-पुस्तक में, दिग्गज रचनाकारों गुलेरी जी, (उसने कहा था), प्रेमचन्द (घरजमाई), जयशंकर प्रसाद (पुरस्कार), महादेवी (घीसा), मन्नू भंडारी (दो कलाकार) नामवरसिंह (गपशप),धर्मवीर भारती, फणीश्वरनाथ रेणु(ठेस) आदि की कहानियों के बीच अपनी कहानी देखी तो बेहद संकोच से भर गई, क्योंकि ये वे लेखक हैं जिन्हें पहले मैंने विद्यार्थी जीवन में पढ़ा फिर विश्वविद्यालय में छात्रों को पढाया ! संकोचवश खुशी का एहसास काफी समय बाद हुआ ! देखिये, हमारा लेखन दूसरों को कितना भी उत्तम लगे, लेकिन मैं कभी भी अपनी कहानियों को इन स्थापित व शिल्पी लेखकों की कहानियों के बीच सूचीबद्ध हुआ देखने की कल्पना ही नहीं कर सकती !
इसके आलावा ‘अन्तर्यात्रा’ काव्य संग्रह (2005) की ‘निश्छल भाव’ व ‘काला चाँद’ कविताएं दुबई, शारजा, आबूधबी, आदि विभिन्न स्थानों में स्थापित ‘मॉडर्न स्कूल’ की सभी शाखाओँ के पाठ्यक्रम में शामिल है ! यह मुझे नैट पर कविताएं प्रकाशित होने का लाभ मिला ! हुआ कुछ यूँ कि नैट पर तैरती मेरी कविताएँ एक बार इत्तेफाक से माडर्न स्कूल के डायरेक्टर की निगाहों में आ गई! उन्होंने पढ़ी तो बेहद पसंद आई और मुझसे ईमेल द्वारा अनुमति मांगी कि क्या वे मेरी दो कविताओं को अपने स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल कर सकते हैं ? मैंने उनसे पूछा कि उन्होंने मेरी रचननाएँ कहाँ मिली ? तब उन्होंने साहित्यिक साइट्स के नाम बताए और इस तरह मेरी कविताएँ दूर देशों के छात्रों तक पहुँच गई ! इन्हें पाठ्यक्रम में शामिल करने पर मुझे ज़रा भी संकोच नहीं हुआ और बहुत खशी हुई !
१०) आपकी अब तक कितनी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ?
अब तक मेरी आठ किताबे प्रकाशित हो चुकी है तथा दो शीघ्र ही प्रकाशित होने जा रही हैं ! दो कहानी संग्रह, दो काव्य संग्रह, ४ पुस्तके अमृतलालनागर के उपन्यास साहित्य पर शोधार्थियों के लिए ! ‘लेखक के आईने में लेखक’ - यादगार ‘संस्मरणों का संग्रह’ दिल्ली से और विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित मेरे द्वारा लिखित ‘समीक्षाओं का संकलन’ कानपुर से शीघ्र प्रकाश्य है ! हाल ही में जर्मन लेखक C. Schmid की ४० बाल-कथाओं का मैंने हिन्दी में अनुवाद किया है, इन कथाओं कि एक पुस्तक प्रकाशन के लिए जा रही है ! अभी पोलैंड में बसे भारतीय प्रोफैसर ‘डा. सुरेन्द्र भूटानी’ जो एक अच्छे शायर भी हैं, उनकी ५० -५५ नज्मो की मैंने व्याख्या लिखी थी, उन व्याख्याओं की किताब भूटानी जी की नज़्मों के साथ दिल्ली के ‘सभ्य प्रकाशन’ से प्रकाशित होकर आई है ! यह अपने में पहली एक ऐसी किताब है जो नज़्मों की विस्तृत व्याख्या के साथ पाठकों के सामने आई है और वे उसे बड़े चाव से खरीद रहे हैं !
११) मैंने सबसे पहले आपकी कहानी वागर्थ और गगनांचल में व तीन कविताएँ साक्षात्कार व संचेतना में पढ़ी थी ! और हां, Woman’s Era में बहुत ही बढ़िया आलेख पढ़ा था ! क्या आप अंग्रेजी में भी नियमित रूप से लिखती हैं ? प्रिंटेड पत्रिकाओं के आलावा क्या नैट पत्रिकाओं में भी आपकी शिरकत है ?
जी हाँ, दोनों भाषाओँ में लिखती हूं लेकिन ‘हिन्दी’अपनी ज़ुबान में अधिक काम करती हूँ ! गगनांचल, वागर्थ,साक्षात्कार, लमही,संबोधन, उदभावन, , कुतुबनुमा, उदंती,उत्तरा,संचेतना,नई धारा,प्रेरणा, आदि पत्रिकाओं,जनवाणी, , संडेवाणी - मारीश),Indian Express, Maharashtra Herald, Pune Times, Women’s Era, Alive, (Delhi Press)आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं, कहानियों, आलेख एवं समीक्षाओं के प्रकाशनके साथ,नैट की काव्यालय,सृजनगाथा, कथा - व्यथा, अनुभूति-अभिव्यक् त,, हिंदी नेस्ट, अर्गला ,ArticleBase.com, Fanstory.com, Muse.com आदि हिन्दी एवं अंग्रेजी की इ-पत्रिकाओं में विविध रचनाओं का प्रकाशन होता रहता है !
१२) समाज के प्रति लेखक के उत्तरदायित्व के बारे में आपका क्या सोचना है ?
मेरे अनुसार किसी भी व्यक्ति के जीवन का सबसे अहम हिस्सा है - ‘समाज के प्रति उसका दायित्व‘.....और जब वह व्यक्ति एक लेखक भी हो तो यह ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है ! जो समाज हमारी शैशवावस्थ से बड़े होने तक हमें इतना कुछ देता है, तो उसके स्वस्थ विकास, उन्नति,प्रगति के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी बनती है ! समाज के नैतिक मूल्यों की ज़मीन के चिटकने और दरकने पर, टूटने और बिखरने पर, आतंक़ वादी हमलों से ध्वस्त होने पर, दोहरे मानदंडो के बीच बंटने पर, समाज के संवेदनशील लोग सबसे अधिक आहत और असुरक्षित महसूस करते हैं बल्कि वे ही सबसे अधिक शिकार भी बनते हैं ! चतुर-चालाक तो हर स्थिति में खाल बचा कर निकल जाते हैं ! ऐसे में समाज में जो भी अवांछनीय घट रहा है, जो नकारात्मकता बढ़ रही है, कलम की ताकत से उसे रोकने, उसका विरोध करने और ‘सत्य,शिव ‘का आधान करने की भारी जिम्मेदारी लेखक की मानती हूँ मैं ! इसलिए मानो तो बहुत बड़ा दायित्व है कलमकारों का और जो इस बात से बाबस्ता नहीं, उनकी नज़र में ‘दायित्व’ जैसे कोई चीज़ न हो तो कोई आश्चर्य भी नहीं ! यह निर्विवाद सत्य है कि कलम ‘क्रान्ति’ और ‘शांति’ दोनों की वाहक होती है !
डा. विवेक दुबे एसिस्टेंट प्रोफैसर, (हिन्दी विभाग) जामिया मिल्लिया इस्लामिया , नई दिल्ली
जब कृष्ण उद्धव की ज्ञान भरी बासी बातों से ऐसे ही बोर हो गए जैसे कि एम.ए के छात्र अपने गुरुओं के रटे रटाए ज्ञान से होते हैं तो उन्होंने उद्धव से कहा , " हे सरकारी वेतन धारी पंडित, आपने गोपियों की माया मोह से मुझे छुडाने हेतु अपने इस देह रुपी आस्था चॅनल से 2 4 x 7 लगातार अनेक धार्मिक प्रवचनों का प्रसारण किया पर एक छोटी सी बात फिर भी बताना भूल गए । "
जैसे किसी भी साधारण छात्र की सीधी किन्तु मौलिक जिज्ञासा पी.एच.डी , डी लिट् प्रोफ़ेसर को उलझा देती है, वैसा ही उद्धव के साथ हुआ , उन्हें लगा कि सारे वेद पुराण को इम्पोर्टेन्ट क्वेश्चन्स के साथ समझाने के बाद भी कुछ बताने से रह गया , यह तो विश्विद्यालयों के पाठ्यक्रमों की भांति सालों से अपरिवर्तनीय उनके पॉवर पॉइंट आधारित ज्ञान का घोर अपमान है। पर चूँकि उनके मासिक वेतन का चेक कृष्ण के हस्ताक्षर से जारी होता था, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए वे अपने अपमान का घूँट पी गये। उन्होंने कृष्ण से पूछा ," आखिर वह कौन सी बात है जिसे मैं बताना भूल गया। "
कृष्ण ने कहा," क्या आप स्वयं कभी बरसाने गए हैं? ". कृष्ण के मुंह से इस तरह का सामान्य प्रश्न सुन कर उद्धव को घोर आश्चर्य हुआ । कृष्ण के ऊपर कुछ क्रोध भी आया । इतना साधारण प्रश्न ,और इतने महान पंडित से । पर चूँकि बॉस से बहस करके अपना ही एनुअल एप्रेजल खराब होता है, इसलिए उद्धव जी अपने गुस्से को पान की पीक की तरह से पी गए और कार्यालयीन विनम्रता से जवाब दिया, " जी , उस क्षेत्र में अभी तक कभी न सूखा पड़ा, और न बाढ़ आई है, इसलिए वहां का दौरा करने का अवसर अभी नहीं मिला है।"
कृष्ण ने कहा ," तो ठीक है, आप कुछ दिवस के लिए सरकारी दौरे पर बरसाने चले जाइये । "
किसी घिसे हुए सरकारी बाबू की तरह से उद्धव को भी राजधानी का आनंद छोड़ कर बरसाने जैसे पिछड़े इलाके के दौरे का यह प्रस्ताव बड़ा घातक लगा। सबसे बड़ा खटका यह लगा कि ' कहीं पीछे से वहीँ परमानेंट पोस्टिंग न हो जाए। " उन्होंने ' न -नुकुर' करना शुरू किया," प्रभु, बिना किसी कारण सरकारी दौरा किया तो साल के आखिर में ऑडिटर क्वेरी लगा देगा। "
कृष्ण ने कहा '" आप वहाँ के निवासियों के आर्थिक,सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक चिंतन के अध्ययन के बहाने निकल जाइये ।" कृष्ण द्वारा कारण भी दे दिए जाने पर उद्धव और घबरा गए कि कहीं ये ' निकल जाईये' बाद में 'वहीँ रह जाइये' में न बदल जाये।
बचने के लिए उन्होंने बीवी की बीमारी, बच्चों की पढाई वगैरह का हवाला भी दिया पर कृष्ण ने सारे बहानों को खारिज कर दिया। जब बात नौकरी जाने या बरसाने जाने में से एक के चुनने की आ गयी तो उद्धव ने बरसाने जाना ही श्रेष्ठ समझा ।
सरकारी बैलगाड़ी से बरसाने जाते हुए उद्धव ने रास्ते में ही सब सोच लिया कि गाँव की सुन्दर गोपियों और अनपढ़ ग्वालों पर प्रभाव डालने के लिए अपने पद की शान और मस्तिष्क के ज्ञान के अनुरूप क्या क्या कहा जाएगा ।
उद्धव की शहरी छटा धजा को देख कर गाँव के बच्चों ने पहले ही शोर मचा कर मथुरा से मेहमान का शोर मचा दिया। गोप गोपियाँ " कान्हा कान्हा " करते हुए दौड़े चले आये पर वहां आकर उद्धव को देख कर तब वे लोग ऐसे ही निराश हुए जैसे कि आज के समय में लोग " ए" सर्टिफिकेट वाली फिल्मों में हीरोइन को कपडे पहने देख कर होते हैं। गोपियाँ ने तो उन्हें देखते ही ऐसे मुंह बनाया जैसेकि आजकल घर के टीवी पर सास बहु का सीरियल आता देख कर घर के पुरुष मुंह बिचका लेते हैं । सरकारी बाबू की मुफ्त सेवा करने के डर से गोप ग्वाले भी एक एक करके सटकने लगे। पर उद्धव सरकारी प्रशासन के साथ साथ एक एन जी ओ भी चलाते थे। इसलिए उन्हें लोगों को बातों के जाल में फंसाने का व्यावहारिक तजुर्बा था । वे सट से आगे बढ़े और भागते हुए लोगों के सामने खड़े हो गए और बोले,
" हे, बरसाने वासियों मैं कोई वसूली इंस्पेक्टर नहीं हूँ, जिसे देख कर आप भाग रहे हैं . मैं तो आपके प्रिय कृष्ण का परम प्रिय मित्र हूँ । यहाँ पर वे जिस तरह से आप लोगों के साथ टाइम पास किया करते थे, मथुरा में ठीक वैसे ही मेरे साथ टाइम पास करते हैं । इस बराबरी के रिश्ते से आप और मैं भी मित्र हुए। है कि नहीं ? " ये कहते कहते उन्होंने तपाक से अपने पास खड़े एक बुज़ुर्ग गोप से हाथ मिलाया एक सरकारी अधिकारी के इतने प्यार से हाथ मिलाते ही वह गोप उसी क्षण से अपने आप को अति महत्वपूर्ण समझने लगा . उसने अपनी लाठी के बल पर बाकी सभी गोप-गोपियों को वहीँ बैठने के लिए प्रेमपूर्वक समझा दिया । उद्धव को लगा कि अपने रुतबे को जमाने यही माकूल अवसर है। उन्होंने एक पेड़ के नीचे बने चबूतरे को अपने पिछवाड़े से धन्य किया और कहना शुरू किया," देखिये हम हैं प्रकांड प्रतिभा धारक, उच्च प्रशासक , कृष्ण उपदेशक श्री उद्धव यानि कि मथुरा नरेश के सबसे विश्वस्त साथी । श्री कृष्ण ने मुझे एक अत्यंत आवश्यक मिशन पर यहाँ भेजा है. और वह यह है कि आप लोगों के आर्थिक , सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक चिंतन का अध्ययन करना और उसकी रिपोर्ट तैयार करके देश के बुद्धिजीवियों के सामने रखना । वे बुद्धिजीवी उस रिपोर्ट को पढ़ कर उस पर बहस करेंगे फिर उस बहस पर देश के मंत्री बहस करेंगे, उसके बाद देश का दरबार बहस करेगा और तब उसके बाद तय होगा कि आप लोगों के आर्थिक , सामाजिक व राजनैतिक चिंतन का सूचकांक क्या है।" उद्धव की ज्ञान भरी बातों की गर्मी से वातानुकूलित कमरे में बैठे कृष्ण को भी पसीना आ जाता था फिर वे बेचारे गांववाले तो खुले बदन, खुली जगह पर बैठे थे. उनके तो होश उड़ गए । उन्हें समझ ही नहीं आया कि अपनी छोटी-सी बुद्धि से इतनी बड़ी बात का क्या जवाब दें, इसलिए उनमे से कुछ फ़ौरन उद्धव जी के लिए दूध, छाछ , मक्खन लाने के नाम पर निकल लिए। गोपियाँ अभी भी इस आस में खड़ी थीं की शायद उद्धव कृष्ण के बारे में कुछ बात करेंगे पर उद्धव ने पेशेवर विद्वान् की तरह से तुरंत पैड और पेन निकाल अपना राष्ट्रीय महत्व का शोध कार्य शुरू कर दिया। उन्होंने पूछा , " बताइये आप लोगों का आर्थिक , सामाजिक, धार्मिक व् राजनैतिक चिंतन क्या है ?"
जब किसी से इसका जवाब देते न बना तो राधा सामने आयीं और बोलीं ," हमारा आर्थिक चिंतन है कि कृष्ण के लिए दूध, दही, मक्खन बनाना, हमारा सामाजिक चिंतन है कि कृष्ण के साथ रास, होली खेलना, हमारा धार्मिक चिंतन है कृष्ण के नाम की माला जपना और राजनैतिक चिंतन है मथुरा के राजा कृष्ण की याद में रात दिन आंसू बहाना । "
इस उत्तर से उद्धव जी बड़े परेशान हुए उन्होंने बाकी गोप- गोपियों से भी पूछा तो सबने यही उत्तर दोहरा दिया । इससे निराश और क्रोधित उद्धव जी बोले, " आप लोग कृष्ण के अलावा और कुछ नहीं करते ? इस तरह से तो आप हमारे राष्ट्रीय मानव और सामाजिक संसाधनों की बड़ी हानि कर रहे हैं। आप लोगों की वजह से ही देश की जी. डी .पी नीचे चल रही है।" इसी अवसर पर एक भंवरा कहीं से उड़ता हुआ वहां आ गया। राधा जी को लगा कि इस बुद्धिजीवी की बुद्धि ठिकाने लगाने का मौका हाथ आ गया। उन्होंने फ़ौरन अपनी गोपी गायन मंडली को इशारा किया और गाना शुरू कर दिया। उनके गानों में भंवरे के माध्यम से उद्धव को बताया गया कि हमारी ज़मीन बंजर हो रही है, मवेशी चारे के अभाव में सूख रहे हैं, गाँव के छोटे उद्योग धंधे चौपट हो गए हैं, काम की तलाश में युवक शहरों को पलायन कर गए हैं, इसलिए हे सरकारी अधिकारी हमारे पास कृष्ण का नाम रटने के अलावा रास्ता ही क्या है ? अगर तुम्हे हमारी बहुत चिंता है तो हमारे लिए सड़क, पानी और रोज़गार की व्यवस्था करो, और सालों में दर्शन देने की बजाय, साल में एक बार तो दर्शन दिया करो। "
अब उद्धव को समझ आया कि कृष्ण क्यों ब्रज, बरसाने और गोप गोपियों को याद करके आंसू बहाते रहते हैं । मथुरा के राज महल की सुविधाओं के बीच कृष्ण के मन में ब्रज के लोगों के कष्ट भरे जीवन के तीर चुभते रहते हैं। मथुरा के राजपथों पर रथ पर चलते हुए उन्हें ब्रज की टूटी फूटी गलियों पर नंगे पैर चलने वालों की पीड़ा का दंश दुःख देता रहता है। पर आंकड़ों से प्रगति दिखाने वाले उनके अधिकारियों ने जन कल्याण की ज़मीनी योजनाओं को कभी कागज़ की ज़मीन से आगे ही नहीं बढ़ने दिया। बरसाने के लोगों के दुःख के बारे में राधा के व्यंग्य गीतों से विचलित उद्धव से वहां रुकना संभव नहीं हो सका और वे खुद " राधे-राधे" करते हुए मथुरा को वापस चल पड़े ।
डॉ. दाभोलकर उस महान परंपरा के सपूत थे, जिसका सूत्रपात 19वीं सदी में महर्षि दयानंद सरस्वती और राजा राममोहन राय ने किया था। वे 30 साल पहले डॉक्टरी छोड़कर पूरा वक्त समाज सुधार में देने लगे थे। उन्होंने महिलाओं को मंदिर प्रवेश का कानूनी अधिकार दिलवाया। डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर की हत्या पर देश में आक्रोश की जैसी आंधी उठनी चाहिए थी, नहीं उठी। आंधी उठाने में मीडिया की भूमिका सर्वप्रमुख होती है। हमारा मीडिया आजकल कोयला घोटाले की गुमी हुई फाइलों, सरकार और रुपए की गिरती कीमतों, सीमांत पर पाकिस्तान की कारगुजारियों आदि मामलों में उलझा हुआ है। संसद भी इन मामलों को लेकर चल रही है और बार-बार बंद हो रही है। उसे दाभोलकर की हत्या पर प्रतिक्रिया देने की फुर्सत भी नहीं है।
किसी सांसद या नेता के न रहने पर संसद के सत्र को स्थगित कर देना समझ में आता है, लेकिन दाभोलकर जैसे क्रांंतिकारी और प्रामाणिक समाज-सुधारक की जघन्य हत्या के मौके पर हमारी संसद का मौन आखिर किस बात का सूचक है? क्या इसे इस बात का संकेत नहीं समझा जाएगा कि हमारा भारतीय समाज हीरे और कंकड़ में फर्क करना नहीं जानता?
दाभोलकर जैसे लोग भारत में कितने हैं? वे उस महान परंपरा के सपूत थे, जिसका सूत्रपात उन्नीसवीं सदी में महर्षि दयानंद सरस्वती और राजा राममोहन राय जैसे महापुरुषों ने किया था। इस परंपरा को आगे बढ़ानेवालों में डॉ. बाबा साहब आंबेडकर, ज्योतिबा फुले, डॉ. राम मनोहर लोहिया आदि के नाम गिनाए जा सकते हैं। दाभोलकर पेशे से डॉक्टर थे लेकिन उन्होंने लगभग 30 साल पहले अपनी डॉक्टरी छोड़ दी। गृहस्थी का बोझ डॉक्टर पत्नी पर डाल दिया और अपना पूरा समय समाज-सुधार के कामों में देने लगे।
उन्होंने स्त्रियों के मंदिर प्रवेश का आंदोलन चलाया। महाराष्ट्र के विभिन्न शहरों और गांवों से चलकर आई सैकड़ों स्त्रियों ने अहमदनगर के शनि मंदिर के द्वार खुलवाए। बाद में डॉ. दाभोलकर सारे मामले को अदालत में ले गए और उन्होंने स्त्रियों को मंदिर-प्रवेश का कानूनी अधिकार दिलवाया। पहले जिन लोगों ने दाभोलकर का विरोध किया था, उन्हीं संगठनों ने बाद में अपने-अपने क्षेत्र में इसी आंदोलन को चलाया।
जिस कारण डॉ. दाभोलकर की हत्या हुई, वह था, उनका अंध-श्रद्धा-विरोध! उन्होंने अपने संगठन ‘महाराष्ट्र अंध-श्रद्धा उन्मूलन समितिÓ की ओर से देश में चलनेवाले भूत-प्रेतों के टोटके, जादू-टोने, तंत्र-मंत्र, पाखंड, ढोंग, हवाई चमत्कारों आदि का जमकर विरोध किया। वे अपनी पत्रिका ‘साधनाÓ में बड़े-बड़े तथाकथित साधु-संतों, तांत्रिकों-मांत्रिकों, श्यानों-भोपों और जादूगरों की पोल खोलते थे और आम जनता को इन ठगों से सावधान करते रहते थे। वे धर्म या ईश्वर विरोधी नहीं थे लेकिन उनका कहना सिर्फ यह था कि जो भी बात आप मानें, उसके बारे में पहले तर्क करें। यानी वैज्ञानिक मिजाज बनाएं।
यह ठीक है कि मानवीय मामलों में सदा विज्ञान और गणित के अनुसार चलना असंभव होता है। विज्ञान, गणित और तर्क के परे भी एक दुनिया है और उसका दायरा बहुत बड़ा है लेकिन दाभोलकर जैसे लोगों का कहना है कि आप देखते हुए भी मक्खी क्यों निगल रहे हैं? श्रद्धा का अर्थ है सत+धा अर्थात सत्य के द्वारा धारण करना।
लेकिन हमारे दैनंदिन कार्यकलापों और सामाजिक चेतना को धर्म और श्रद्धा के नाम पर इस तरह नियंत्रित कर लिया जाता है कि हमें पता ही नहीं चलता कि हमारी सामान्य बुद्धि को ताक पर रख दिया गया है। क्या यह संभव है कि पत्थर की मूर्तियां दूध पीने लगें? क्या किसी ने देखा है कि कोई बाबा बिना औजार सिर्फ उंगली से शल्य-चिकित्सा कर दे? क्या यह संभव है कि कोई तांत्रिक किसी स्त्री के मुंह में थूक दे और वह पुत्रवती हो जाए? क्या कभी ऐसा हो सकता है कि कोई बाबा की जूठन खा ले तो दूसरे दिन परीक्षा में उसे सबसे ज्यादा अंक मिल जाएं?
लेकिन इस तरह के पाखंड भारत में ही नहीं, दुनिया के सभी देशों में चलते हैं। जिन देशों में साम्यवाद रहा है, उनमें भी मैंने अपनी आंखों से लोगों को अंधविश्वास की नदी में डुबकी लगाते देखा है। आखिर ऐसा होता क्यों है? इसीलिए कि सभी मजहबों में अंधविश्वास को अति महत्वपूर्ण स्थान मिला हुआ है। किन-किन धर्मग्रंथों के नाम गिनाएं, जिनमें ईश्वरीय चमत्कारों का पाखंड नहीं फैलाया गया है। इन धर्मग्रंथों में सर्वथा अवैज्ञानिक और तर्कहीन बातें कही गई हैं। लेकिन उनका विरोध कौन करे? प्रवाह के विरुद्ध कौन तैरे? यूरोप में गैलीलियो जैसे कई वैज्ञानिकों और नीत्शे, इमेनुअल कांट और तॉल्सतॉय जैसे विचारकों को मर्मांतक-प्रताडऩाएं सहनी पड़ी हैं। अपने देश में पाखंड खंडनी पताका गाडऩे के लिए ही महर्षि दयानंद को अपने प्राणों की बलि चढ़ानी पड़ी थी।
दाभोलकर की हत्या कोई मामूली अपराध नहीं है। यह सिर्फ एक-दो सिरफरे लड़कों द्वारा किया गया कुकर्म नहीं है। यह हमारे समाज में छिपी गहरी बीमारी का विस्फोट है। यदि हमारा समाज इस बीमारी से ग्रस्त नहीं होता तो इस हत्याकांड पर पूरा देश भड़क उठता लेकिन उसने इस सारे जघन्य कुकर्म को आसानी से पचा लिया। जरा तुलना करें, रामलीला मैदान और जंतर-मंतर पर हुए नाटकों से, इस घटना की। जरा तुलना करें, उन क्षणिक महानायकों से, इस कर्मवीर दाभोलकर की! पिछले 18 साल से दाभोलकर अंधविश्वास उन्मूलन के लिए कानून बनवाने की कोशिश कर रहे थे।
महाराष्ट्र सरकार की नींद अब खुली। वह अध्यादेश ले आई है लेकिन क्या सिर्फ कानून से अंध-श्रद्धा यानी अंधविश्वास समाप्त किया जा सकेगा? कानून का कुछ न कुछ असर जरूर होगा लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि बाल्यकाल से ही बच्चों को बुद्धिवादिता और तार्किकता के संस्कार दिए जाएं। समाज में ढोंग और पाखंड इसीलिए जिंदा हैं कि लोग अपनी हर समस्या का समाधान अति सस्ता और अति सरल रास्ते से चाहते हैं। हमारे देश में सस्ता और सरल रास्ता बतानेवाले तांत्रिकों-मांत्रिकों की दुकानें चलती ही इसलिए हैं कि लोग ठगे जाने को तैयार बैठे रहते हैं।
दाभोलकर का बलिदान हमारे लोकतंत्र के लिए भी बड़ी चुनौती है। हम यह समझ बैठे हैं कि सिर्फ राजनीति ही देश के उद्धार के लिए काफी है लेकिन हम यह भूल गए कि हमारी राजनीति भी इसलिए भ्रष्ट हो गई है कि हमारा समाज अंधविश्वास का शिकार हो गया है। एक ही नेता, एक ही परिवार, एक ही पार्टी के प्रति लोगों के अंधविश्वास ने हमारी राजनीति को पंगु बना दिया है। उसकी द्वंद्वात्मकता नष्ट कर दी है। राजनीति को बदलने के लिए पहले हमें अपने समाज को बदलना होगा। दाभोलकर ने अपने प्राणों की आहुति चढ़ाकर समाज को बदलने का शंखनाद कर दिया है।
दीपावली का दिन था। चारों तरफ चहल-पहल थी। विभिन्न प्रकार के उपहारों, मिठाइयों और मोमबत्ती-पटाखों की दुकानें सजी थीं। दुकानें और बाज़ार ही नहीं घर और बस्तियाँ सभी रंग-बिरंगी रोशनी में नहाए हुए जगमग-जगमग कर रहे थे। राघव इन सब से तटस्थ चुपचाप अपने घर की छत पर चहलक़दमी कर रहा था। यद्यपि वह पंद्रह-सोलह साल का किशोर था लेकिन त्यौहार के धूम-धड़ाके में उसकी तनिक भी रुचि प्रतीत नहीं हो रही थी। उसे यह बात समझ में नहीं आ रही थी कि लोग महँगे उपहारों, मिठाइयों और शोर-शराबे व प्रदूषण में कैसे ख़ुश हो लेते हैं? जब आदमी ख़ुश होता है तब वह उत्सव मनाता है अथवा उत्सवों के इस प्रकार के आयोजनों से ही उसे ख़ुशी मिलती है इस बात का उत्तर उसे नहीं मिल पा रहा था। इंसान को सच्ची ख़ुशी कैसे मिल सकती है इस बात पर वह जितना सोचता उतना ही उलझता चला जाता।
तभी अचानक पास की दुकानों से एक साथ बहुत से पटाखे छूटने की आवाज़ें सुनाई दीं। राघव ने उस ओर देखा तो पाया कि दुकानों के पास भगदड़ मची हुई थी और चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें आ रही थीं। कई दुकानों के आसपास धुआँ छाया हुआ था। कुछ ही क्षणों के उपरांत धुएँ के बीच से आग भी नज़र आने लगी जो लगातार तेज़ होती जा रही थी। राघव समझ गया कि वहाँ आग लगी है और वो भी पटाखों में विस्फोट के कारण। ‘‘और मज़े लो त्यौहार के! और छुडा़ओ पटाखे!’’ राघव ने मन ही मन कहा। उसे इस बात से थोड़ी संतुष्टि हुई कि पटाखे बनाने, बेचने व छुड़ाने में प्रदूषण फैलाने के लिए जिम्मेदार लोगों को कुछ तो सज़ा मिली। तभी उसने अनुभव किया कि वहाँ से आनेवाली चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें और तेज़ हो गई हैं। राघव से रुका नहीं गया और वह सीधा दुर्घटना स्थल की ओर दौड़ पड़ा।
वहाँ एक महिला पागलों की तरह सिर पटक-पटककर रो रही थी। सामने जलती हुई दुकान में अपनी एक साल की नन्ही बेटी के साथ वह ख़रीददारी कर ही रही थी कि तभी अचानक दुकान में रखे पटाखों में विस्फोट होने लगा और आग लग गई। लोग बाहर भागने लगे। वह महिला भी अपनी बच्ची के साथ बाहर की तरफ भागी लेकिन धक्का-मुक्की में बच्ची का हाथ उसके हाथ से छूट गया और बच्ची वहीं गिर गई। वह बच्ची को उठाने के लिए जैसे ही पीछे मुड़ी चारों ओर धुआँ फैल चुका था और आग भड़क चुकी थी। बच्ची कहीं नहीं दिखलाई पड़ रही थी। वह वहाँ उपस्थित लोगों से अपनी बच्ची को बचाने की गुहार लगा रही थी लेकिन कोई भी उस भयंकर आग में घुसने का साहस नहीं कर पा रहा था।
राघव ने आव देखा न ताव वह फौरन जलती हुई दुकान में घुस गया। जैसे ही वह अंदर घुसा आग की प्रचंड लपटों ने उसे बेहाल कर दिया। उसके कपड़े ही नहीं शरीर भी कई जगह से झुलस गया। उसे लगा कि जैसे वह मौत के मुँह में जा रहा है। वह वापस बाहर आने के बारे में सोच ही रहा था कि एक माँ का विलाप करता चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम गया। राघव अपनी पीड़ा और आग के ख़ौफ को भूलकर एक ही झटके में दोबारा अंदर जा पहुँचा और कुछ ही क्षणों के बाद नन्ही बच्ची को आग की लपटों से बचाता हुआ बाहर निकलता दिखलाई पड़ा। अपनी बच्ची को सही-सलामत देखकर उसकी माँ के चेहरे पर असीम आनंद व प्रसन्नता की लहरें नाचने लगीं। राघव ने इससे पहले कभी किसी के चेहरे पर ऐसी ख़ुशी नहीं देखी थी। माँ ने दौड़कर राघव के हाथों से अपनी बच्ची को ले लिया और उसे गोद में भरकर प्यार करने लगी।
बच्ची एकदम सुरक्षित थी लेकिन राघव के कपड़े झुलस गए थे। कपड़े पसीने और राख व धुएँ की गंदगी से लथपथ हो गए थे। उसके बदन पर भी कई ज़ख़्म हो गए थे जिनमें दर्द हो रहा था लेकिन इस सब के बावजूद राघव का मन अत्यंत प्रसन्न था। उसने एक नन्हे शिशु की जान जो बचाई थी। ‘‘दूसरों की जान बचाने के उपक्रम में इंसान आख़िर अपनी जान की बाज़ी क्यों लगा देता है? इंसान को सच्ची ख़ुशी कैसे मिल सकती है?’’ राघव को इन प्रश्नों का उत्तर मिल चुका था। रंग-बिरंगी रोशनी में नहाए हुए जगमग-जगमग करते आसपास के घर उसे बहुत अच्छे लग रहे थे। उस रात राघव देर तक अपने घर की मुँडेर पर रखे नन्हे-नन्हे दीपकों में तेल डालता रहा।
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मीठा होता खस्ता खाजा मीठा होता हलुआ ताजा मीठे होते गट्टे गोल सबसे मीठे, मीठे बोल मैंने पाले बहुत कबूतर भोले भाले बहुत कबूतर पहने हैं पैंजनी कबूतर - सोहन लाल द्विवेदी