एक बार फिर अगस्त का महीना आ गया है और अगस्त का महीना हमेशा ही हमारा ध्यान भारत की तरफ खींचता है। आजादी और उसकी उपलब्धियों का जश्न मनाना चाहता है, साथ ही देश की प्रगति . दशा और दिशा का भी लेखा-जोखा रखना चाहता है। किधर जा रहा है भारत क्या हम खुश हैं इसकी प्रगति व परिस्थियों से? और यदि नहीं तो क्या हो सकता है एक आम भारतीय का योगदान परिस्थितियों और देश को सुधारने में ?
इकबाल ने कभी लिखा था - सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा-और हम राष्ट्रीय पर्व जैसे 26 जनवरी या पंद्रह अगस्त के दिन स्कूल के प्रांगण में लहराते तिरंगे के आगे खड़े, भाव विभोर सुख और गौरव के पंखों पर चढ़े इस गीत को उल्लसित हो-होकर गाया करते थे। परन्तु वे बचपन के दिन थे, जब सावन के अंधे की तरह हरा ही हरा था चारो तरफ। क्या आज हम चाहें भी तो गा सकते हैं उसी तन्मयता और ईमानदारी के साथ इस गीत को ? शायद नहीं, क्योंकि हम बच्चे नहीं रहे, और सिर्फ मान लेने व आंखें बन्द कर लेने से ही हमारा हिन्दोस्तान सारे जहाँ से अच्छा तो नहीं हो जाता !
हाल ही में ङुई उत्तराखंड की आपदा ने पर्यावरण और धर्म के खोखलेपन की तरफ भी हमारा ध्यान खींचा है और कई विचलित करने वाली खबरों ने आधुनिक भारतीय चरित्र पर भी कई-कई प्रश्न चिंह लगा दिए हैं।
सच्चाई तो यह है कि देश आजकल वाकई में आपद्कालीन परिस्थितियों से गुजर रहा है। माना उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा पर हमारा वश नहीं था, परन्तु देश के साधु-सन्त, नेता-अभिनेताओं के कुकर्म...क्या यही वे व्यक्ति नहीं, जिनकी तरफ आम जनता दिशा निर्देश और आदर्शों के लिए देखती है?
एक आपदा से उबरने की कोशिश करते हैं, भूल सुधार हो सकती है का संकल्प लेकर आस की किरण ढूंढ़ते हैं तबतक दूसरा तूफान हिम्मत तोड़ देता है। बलात्कार, भ्रष्टाचार और लालच से जर्जर देश का चरित्र वाकई में मरणासन्न अवस्था में पहुंच गया है-जहाँ के वृद्धों से अमानवीय तरीकों से छुटकारा पाया जाता है, जहाँ गरीबों की कीमत कीड़े-मकोड़ों से ज्यादा नहीं और जहाँ नारी शरीर मात्र एक मांस का लोथड़ा है भूखे दरिंदों के लिए। शिक्षा, स्वास्थ सब व्यापार के धंधे हैं और नैतिकता हर जगह से शून्य है चाहे वह राजनैतिक परिसर हो या धार्मिक। अधिकांशतः जो भी ताकत की कुरसी पर जा बैठा वह माफिया के सरगने जैसे हथकंडे अपनाकर कुरसी की रक्षा करता है, देश भले ही जाए भाड़ में।
क्या हुआ जो स्कूल का मिड डे मील खाकर बच्चे इधर –उधर मररहे हैं, इसी बहाने कई ठेके, कई धन्धे और सरकार का नाम तो हो ही रहा है। विचार भटकने लगते हैं और विश्वास लड़खड़ाने लग जाता है। सोचने की बात है कि क्या हो गया है हमारे इस हरे-भरे, दया और दर्शन में अग्रणी देश को कि खबरें पढ़ते, देखते सिर शर्म से झुक जाता है, क्यों माली ही आज चमन को उजाड़ने पर आमदा हैं? क्यों हर नीति हमारे देश में चुटकी बजाते ही अनीति में पलट जाती है, और हमारे कानों पर जूँ तक नहीं रेंगती?
जिसे मौका मिलता है वही कभी राजनीति तो कभी धर्म की आंच पर स्वार्थ की रोटी सेक और खा रहा है और करोणों भूखे-नंगों की आह उनका हाजमा तक नहीं बिगाड़ पाती? फिल्मों में दिखाई देता 'अमर प्रेम' कैसे आज के ' बद्तमीज इश्क' में बदला-क्या कभी सोचा है हमने-कहाँ गलती हुई, क्यों मुन्नी बदनाम हुई और शीला की जवानी जैसे भड़काऊ गीत ही चारो तरफ गूंजते हैं आज?
न सिर्फ आज हमारी फिल्मों की आर्थिक सफलता का ये एक प्रमुख हिस्सा हैं क्योंकि अर्धनग्न थिरकती लड़कियों पर फिल्माए गए हैं, अपितु गली-बाजार चारो तरफ हमें वैसी ही शारीरिक और वैचारिक नग्नता दिखती है। सभ्य और शिक्षित परिवार की छोटी-छोटी बच्चियाँ पारिवारिक आयोजन और शादी ब्याह में इन उत्तेजक गीतों पर वैसे ही कूल्हे मटकाती नजर आती हैं और सगर्व अभिभावक व परिजन ताली बजाते नजर आते हैं ! क्यों इन अभद्र शब्दों के अर्थ हमें छूते नहीं, और हमारी भारतीय संस्कृति के गौरवमय स्तंभ, शालीनता, परोपकार, बड़ों का आदर सत्कार आदि गुणों पर सीधा प्रहार नहीं कर रहे है?
जब आदमी सिर्फ अपने बारे में ही सोचता है, सामंतशाहियों की तरह से भाई भतीजों के सहारे अपना ही साम्राज्य फैलाने लगता है तो धूर्तता, दुष्कर्म...जायज नाजायाज हर हथकंडे को अपनाता है। यही वजह है कि उद्दंडता और अभद्रता ही संस्कृति और देश के चरित्र का पर्याय है आज। कोई किसी से कुछ नहीं कहता, क्योंकि सभी एक से हैं।
बूढ़े माँबाप को तो संभाल नहीं पा रहे हैं, बोझ हो गए हैं, सनातन उद्दात्त दायित्व- जैसे कि वसुधैव कुटुम्बकम् को कैसे समझ पाएंगे या निर्वहन कर पाएंगे हमारे युवा। यह डौमीनो असर कैसे रोक सकते हैं हम, आज जब स्वार्थ-परता ही हमारे देश का चरित्र बन चुकी है।
बढ़ते यौन अपराध, घूस , चोरी डकैती क्या यही आधुनिकता है, क्या इसी इक्कीसवीं सदी के सपने में जी रहे थे हम ! यह स्वार्थ की ही तो अति है कि हर संभावी परिणाम और आपदा से आंखें मीचे हम शुतुरमुर्ग की तरह सब अनदेखा कर रहे हैं और रेत में सिर छुपाए बैठे हैं। कहीं ईमानदार औफिसर को नौकरी छोड़नी पड़ती है, तो कहीं एक सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता को दुर्घटना ग्रस्त करके मरने से भी बद्तर कर दिया जाता है, क्योंकि उसने जानलेवा धमकियों के बाद भी देश के हित में चुनाव में खड़े होने की हिम्मत की।
मानवता का मजाक बनाती ये खबरें, घटनाएं क्यों हमें द्रवित नहीं कर पातीं, क्यों हमारी चेतना को नहीं ललकारतीं, क्योंकि दोषी हम सभी हैं और अपनी-अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभा नहीं पा रहे हैं। हो सकता है नक्कारखाने में तूती की तरह हमारी आवाज न सुनाई दे परन्तु प्रयास तो जारी रखना ही होगा। अभी हमारी लड़ाई खत्म नहीं हुई ! अब लड़ाई पराधीनता कि नहीं स्वाधीनता के संयम को स्थापित करने की है। आचरण और व्यवहार पर निगाह रखने की है और दूसरों के सुख दुख समझने की है। हराम के अरबों का हाजमा करने वालों को अब लाखों और करोणों का घोटाला बड़ा नहीं लगता उन्हें बताने की जरूरत है कि घोटाला तो घोटाला ही है, चाहे वह एक रुपये का ही क्यों न हो? अगर नेम व शेम पौलिसी से कुछ असर होता है तो बिना भारी कुरसी के पायों से डरे ऐसा होना चाहिए और उन्हें तुरंत ही पद से हटाए जाने की मांग भी। मानवता के नाम पर दानवता के सौदे आखिर कबतक?
उद्धृत करना चाहूंगी कादंबिनी की संपादिका मृणाल पाण्डेय को।
“हमारे विगत में सही वैचारिक फूट जब कभी भी हुई तो उससे अणुबम सरीखी ऊर्जा निकली है, और उस समय उसने देशकाल पात्रता के हिसाब से समय-समय पर हमारे देश में नर्म और गर्म दलों की, वाम और दक्षिण पंथ और मध्यमार्गी दलों की वैचारिकता स्पष्टता बनाई। लेकिन मंथन के बाद सार्थक ऊर्जा के विकिरण की बुनियादी शर्त यह है कि मथानी का आधार किसी एक की निजी सत्ता हवस की आंधी को नहीं, कठोर वैचारिकता की कछुआ पीठ को बनाया गया हो। हवा-हवाई गुब्बारों की फूट से तो गर्म हवा ही निकल सकती है।“
क्या नहीं है सुजलां , सुफलां, शस्य श्यामला हमारी मातृभूमि में !
लेखनी का यह अंक इसी गौरवमय माँ का वन्दन और श्रुतिगान है। कहीं कुछ कर्कष या दुख भरी कर्ण-अप्रिय ध्वनियाँ या शिकायतें सुनाई दे रही हैं तो उन सभी पर ध्यान देना भी हम सभी भारतीयों का धर्म है-क्योंकि हम ही तो हैं भारत... और इसका एक-एक आंसू , एक-एक मुस्कान …सारे सुख दुख हमारे अपने ही तो हैं।...
बुरे का श्राद्ध और अच्छे का पोषण; आज भारत की कोई और इससे अच्छी पूजा व वन्दना हो ही नहीं सकती और अपने छोटे से तरीके से लेखनी का प्रयास जारी रहेगा-
‘‘टूटें न तार कभी जीवन सितार के/ऐसे बजाओ इन्हें प्रतिभा के ताल से
किरणों के कुमकुम से, सेनुर, गुलाल से/लज्जित हो युग का अंधेरा निहार के।”
- केदार नाथ अग्रवाल
भारत की स्वाधीनता की इस छाछठवीं वर्षगांठ और जन्माष्टमी व रक्षाबंधन जैसे माह के आगामी महत्वपूर्ण त्योहारों पर हर भारतवासी, भारतवंशी और भारत बंधुओं को अशेष बंधाइयों के साथ ईश्वर से यही प्रार्थना है कि हम सब चाहे जहाँ कहीं भी हों और जिस भी हालत में हों, खुश रहें और अपनी पूरी योग्यता...पूरी खुशी व पूरी ईमानदारी व समर्पण के साथ, इस कठिन व भ्रमित वक्त में भी भरपूर जीवन जिएँ।
आइये देखते हैं कि क्या-क्या संजोया है हमने अगस्त अंक के इस स्वाधीनता विशेषांक में- अगस्त का महीना सावन का महीना है और सावन यानी धार्मिक, सामाजिक त्योहारों की भरमार, जब भावात्मक रिमझिम से तो मन सरोबार रहता ही है, मिट्टी फिदरत की हो या देश की स्वतः ही हरियाने और लहलहाने लग जाती है। विजय शिंदे के विचार और सरस्वती माथुर और गोवर्धन यादव के आलेख रागरंग और परिदृश्य इसी सावन की हरियाली और उल्लास में शिवमय हैं। सावन के दूसरे बड़े त्योहार राखी पर भी कुछ मनभावन सामग्री है।
चारो तरफ उल्लास के ही रंग भरने का इरादा था हमारा परन्तु बाढ़ यदि दलदल पैदा कर दे, सड़ती लाशों की दुर्गंध फैला दे तो सफाई भी तो नागरिक धर्म है। माह विशेष में इसबार उत्तराखंड में आहत व्यक्ति और परिवारों को...उनकी व्यथा को स्मरण व अपनी जान पर खेल कर दूसरों की जान बचाने वाले देश के बहादुर सपूतों को नमन किया है हमने। साथ में परिचर्चा में वैज्ञानिक तथ्यों के साथ नरेश माटिया जी ने एक जानकारी पूर्ण आलेख दिया हैं कि क्यों और कैसे बचा रह गया केदारनाथ मंदिर और चौपाल में कैलाश भाटिया ने अपने ही अंदाज में राखी का सार्थक व उद्देश्यपूर्ण चित्रण किया है। गीत और गजल में प्रस्तुत हैं देशप्रेम से ओतप्रोत श्यामल सुमन की रचनाएँ और कविता धरोहर मे सुदामा पाणडेय धूमिल अपने ठेस औऱ खरे बनारसी अंदाज में कुछ विचारोत्तेजक काव्य टिप्पणियों के साथ हैं। कहानियों में हम इसबार आपके लिए तीन कहानियाँ लेकर आए हैं, अनीता रश्मि की कहानी ‘ओस की पहली बूंद’ में जहाँ संप्रदायिक दंगों का चित्रण है और इनकी निरर्थकता को दिखाते हुए कहानी एक बहुत ही सकारात्मक बिंदु पर समाप्त होती है , वहीं शैल अग्रवाल की कहानी ‘ चरैवैति‘ एक मां और बेटी की जीवटता की मार्मिक कहानी है, जो हर आपदा से जूझते हुए कभी न हारने का, आगे ही बढ़ते रहने का संदेश देती है। रश्मि बड़थ्वाल की कहानी –बेताल प्रश्नों के बीच लकीर की फकीर न होकर जीवन में नारी हित के मूल्यों को अनदेखा नहीं, अत्याचार के आगे खड़े होने का संदेश देती है। गिरीष पंकज की लघुकथाएं और हरिशंकर परसाई का व्यंग्य अपना अलग ही तेवर लिए हुए हैं और कृतिमता का पर्दाफाश करते हैं । विजय शिंदे का आलेख विचार में कुछ ज्वलंत समस्याएं जैसे पर्यावरण और नैसर्गिक खनिज और संसाधनों का दुरुपयोग आदि को लेकर प्रस्तुत हुआ है । विविध कविताएं, बाल सामग्री और अन्य स्थाई स्तंभ... बहुत कुछ पठनीय और विचारणीय संजोया है हमने इस अंक में आपके लिए। लेखनी के अंग्रेजी हिस्से में भी जन्माष्टमी और भारत के ऊपर रोचक व महत्वपूर्ण जानकारी है देखना न भूलिएगा,
शिवमय सावन तो वैसे भी पूरा माह ही एक उत्सव , एक त्योहार है। हम सभी के जीवन में नमी और हरितिमा बनी रहे, एकबार फिर हर भारतवासी, हर भारतवंशी और हर भारत बंधु को अशेष शुभकामनाएँ व बधाई।
एक आदमी रोटी बेलता है एक आदमी रोटी खाता है एक तीसरा आदमी भी है जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है मैं पूछता हूं-- 'यह तीसरा आदमी कौन है ?' मेरे देश की संसद मौन है।
पटकथा
भूख और भूख की आड़ में चबायी गयी चीजों का अक्स उनके दाँतों पर ढूँढना बेकार है। समाजवाद उनकी जुबान पर अपनी सुरक्षा का एक आधुनिक मुहावरा है। मगर मैं जानता हूँ कि मेरे देश का समाजवाद मालगोदाम में लटकती हुई उन बाल्टियों की तरह है जिस पर ‘आग’ लिखा है और उनमें बालू और पानी भरा है। ... यहाँ जनता एक गाड़ी है एक ही संविधान के नीचे भूख से रिरियाती हुई फैली हथेली का नाम ‘दया’ है और भूख में तनी हुई मुट्ठी का नाम नक्सलबाड़ी है। मुझसे कहा गया कि संसद देश की धड़कन को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है जनता को जनता के विचारों का नैतिक समर्पण है लेकिन क्या यह सच है? या यह सच है कि अपने यहां संसद - तेली की वह घानी है जिसमें आधा तेल है और आधा पानी है और यदि यह सच नहीं है तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है? जिसने सत्य कह दिया है उसका बुरा हाल क्यों है? मैं अक्सर अपने-आपसे सवाल करता हूँ जिसका मेरे पास कोई उत्तर नहीं है और आज तक – नींद और नींद के बीच का जंगल काटते हुये मैंने कई रातें जागकर गुजार दी हैं हफ्ते पर हफ्ते तह किये हैं। ऊब के निर्मम अकेले और बेहद अनमने क्षण जिये हैं। मेरे सामने वही चिरपरिचित अन्धकार है संशय की अनिश्चयग्रस्त ठण्डी मुद्रायें हैं हर तरफ शब्दभेदी सन्नाटा है। दरिद्र की व्यथा की तरह उचाट और कूँथता हुआ। घृणा में डूबा हुआ सारा का सारा देश पहले की तरह आज भी मेरा कारागार है।
शान्ति पाठ
अखबारों की सुर्खियाँ मिटाकर दुनिया के नक्शे पर अन्धकार की एक नयी रेखा खींच रहा हूँ , मैं अपने भविष्य के पठार पर आत्महीनता का दलदल उलीच रहा हूँ। मेरा डर मुझे चर रहा है। मेरा अस्तित्व पड़ोस की नफरत की बगल से उभर रहा है। अपने दिमाग के आत्मघाती एकान्त में खुद को निहत्था साबित करने के लिए मैंने गांधी के तीनों बन्दरों की हत्या की हैं। देश-प्रेम की भट्ठी जलाकर ... मैं अपनी ठण्डी मांसपेशियों को विदेशी मुद्रा में ढाल राह हूँ। फूट पड़ने के पहले, अणुबम के मसौदे को बहसों की प्याली में उबाल रहा हूँ। ज़रायमपेशा औरतों की सावधानी और संकटकालीन क्रूरता मेरी रक्षा कर रही है। गर्भ-गद् गद् औरतों में अजवाइन की सत्त और मिस्सी बाँट रहा हूँ। युवकों को आत्महत्या के लिए रोज़गार दफ्तर भेजकर पंचवर्षीय योजनाओं की सख्त चट्टान को कागज़ से काट रहा हूँ। बूढ़ों को बीते हुए का दर्प और बच्चों को विरोधी चमड़े का मुहावरा सिखा रहा हू। गिद्धों की आँखों के खूनी कोलाहल और ठण्डे लोगों की आत्मीयता से बचकर मैकमोहन रेखा एक मुर्दे की बगल में सो रही है और मैं दुनिया के शान्ति-दूतों और जूतों को परम्परा की पालिश से चमका रहा हूँ। अपनी आँखों में सभ्यता के गर्भाशय की दीवारों का सुरमा लगा रहा हूँ। मैं देख रहा हूँ एशिया में दायें हाथों की मक्कारी ने विस्फोटक सुरंगें बिछा दी हैं। उत्तर-दक्षिण-पूरब-पिश्चम-कोरिया, वियतनाम पाकिस्तान, इसराइल और कई नाम उसके चारों कोनों पर खूनी धब्बे चमक रहे हैं। मगर मैं अपनी भूखी अंतड़ियाँ हवा में फैलाकर पूरी नैतिकता के साथ अपनी सड़े हुए अंगों को सह रहा हूँ। भेड़िये को भाई कह रहा हूँ। कबूतर का पर लगाकर विदेशी युद्धप्रेक्षकों ने आज़ादी की बिगड़ी हुई मशीन को ठीक कर दिया है। वह फिर हवा देने लगी है। न मै कमन्द हूँ न कवच हूँ न छन्द हूँ मैं बीचोबीच से दब गया हूँ। मै चारों तरफ से बन्द हूँ। मैं जानता हूँ कि इससे न तो कुर्सी बन सकती है और न बैसाखी मेरा गुस्सा- जनमत की चढ़ी हुई नदी में एक सड़ा हुआ काठ है। लन्दन और न्यूयार्क के घुण्डीदार तसमों से डमरू की तरह बजता हुआ मेरा चरित्र अंग्रेजी का 8 है।
भारत है वीरों की धरती, अगणित हुए नरेश। मीरा, तुलसी, सूर, कबीरा, योगी और दरवेश। एक हमारी राष्ट्र की भाषा, एक रहेगा देश। कागा! ले जा यह संदेश, घर-घर दे जा यह संदेश।।
सोच की धरती भले अलग हों, राष्ट्र की धारा एक। जैसे गंगा में मिल नदियाँ, हो जातीं हैं नेक। रीति-नीति का भेद मिटाना, नूतन हो परिवेश। कागा! ले जा यह संदेश, घर-घर दे जा यह संदेश।।
शासन का मन्दिर संसद है, क्यों बिल्कुल लाचार। ख़ुद का हित करते, पर दिखते, जनहित को तैयार। रंगे सियारों को पहचाने, बदला जिसने वेष। कागा! ले जा यह संदेश, घर-घर दे जा यह संदेश।।
वीर शहीदों के भारत का, सपना आज उदास। कर्ज चुकाना है धरती का, मिल सब करें प्रयास। घर-घर सुमन खिले खुशियों की, कहना नहीं बिशेष। कागा! ले जा यह संदेश, घर-घर दे जा यह संदेश।।
कैसे बचेगा भारत देश?
है कुदाल सी नीयत प्रायः, बदल रहा परिवेश। कैसे बचेगा भारत देश?
बड़े हुए लिख, पढ़ते, सुनते, यह धरती है पावन। जहां पे कचड़े चुन चुन करके, चलता लाखों जीवन। दिल्ली में नित होली दिवाली, नहीं गाँव का क्लेश। कैसे बचेगा भारत देश?
है रक्षक से डर ऐसा कि, जन जन चौंक रहे हैं। बहस कहाँ संसद में होती, लगता भौंक रहे हैं। लोकतंत्र के इस मंदिर से, यह कैसा सन्देश? कैसे बचेगा भारत देश?
बूढा एक तपस्वी आकर, बहुत दिनों पर बोला। सत्ता-दल संग सभी विपक्षी, का सिंहासन डोला। है गरीब भारत फिर कैसे, पैसा गया विदेश? कैसे बचेगा भारत देश?
सजग सुमन हों अगर चमन के, होगा तभी निदान। भाई भी हो भ्रष्ट अगर तो, क्यों उसका सम्मान? आजादी के नव-विहान का, निकले तभी दिनेश। ऐसे बचेगा भारत देश।।
चेतना
कहीं बस्ती गरीबों की कहीं धनवान बसते हैं सभी मजहब के मिलजुल के यहाँ इन्सान बसते हैं भला नफरत की चिन्गारी कहाँ से आ टपकती है, जहाँ पर राम बसते हैं वहीं रहमान बसते हैं
करे ईमान की बातें बहुत नादान होता है मिले प्रायः उसे आदर बहुत बेईमान होता है यही क्या कम है अचरज कि अभीतक तंत्र जिन्दा है, बुजुर्गों के विचारों का बहुत अपमान होता है
सभी कहते भला जिसको बहुत सहता है बेचारा दया का भाव गर दिल में तो कहलाता है बेचारा है शोहरत आज उसकी जो नियम को तोड़ के चलते, नियम पे चलने वाला क्यों बना रहता है बेचारा
अलग रंगों की ये दुनिया बहुत न्यारी सी लगती है बसी जो आँख में सूरत बहुत प्यारी सी लगती है अलग होते सुमन लेकिन सभी का एक उपवन है, कई मजहब की ये दुनिया अलग क्यारी सी लगती है
उलझन
सभी संतों ने सिखलाया, प्रभु का नाम है जपना सुनहरे कल भी आयेंगे, दिखाते रोज एक सपना वतन आजाद वर्षों से बढ़ी जनता की बदहाली, भले छत हो न हो सर पे, ये सारा देश है अपना
कोई सुनता नहीं मेरी, तो गाकर फिर सुनाऊँ क्या? सभी मदहोश अपने में, तमाशा कर दिखाऊँ क्या? बहुत पहले भगत ने कर दिखाया था जो संसद में, ये सत्ता हो गयी बहरी, धमाका कर दिखाऊँ क्या?
मचलना चाहता है मन, नहीं फिर भी मचल पाता जमाने की है जो हालत, कि मेरा दिल दहल जाता समन्दर डर गया है देखकर आँखों के ये आँसू, कलम की स्याह धारा बनके, शब्दों में बदल जाता
लिखूँ जन-गीत मैं प्रतिदिन, ये साँसें चल रहीं जबतक कठिन संकल्प है देखूँ, निभा पाऊँगा मैं कबतक उपाधि और शोहरत की ललक में फँस गयी कविता, जिया हूँ बेचकर श्रम को, कलम बेची नहीं अबतक
खुशी आते ही बाँहों से, न जाने क्यों छिटक जाती? मिलन की कल्पना भी क्यों, विरह बनकर सिमट जाती? सभी सपने सदा शीशे के जैसे टूट जाते क्यों? अजब है बेल काँटों की सुमन से क्यों लिपट जाती?
दृष्टि
वतन से प्यार मुझको भी वतन के गीत गाता हूँ नये निर्माण की खातिर पसीना भी बहाता हूँ जमीं पर आयी आफत का हवा में उड़ के सर्वेक्षण, मिले भाषण में जब राहत खरी खोटी सुनाता हूँ
तहे दिल से तमन्ना है तिरंगा के तरानों का सभी लोगों को मिल पाते नये अवसर उड़ानों का मगर अफसोस कितने घर में चूल्हे भी नहीं जलते, वतन सबका बराबर है नहीं बस कुछ घरानों का
जहाँ पर देश की बातें सुजन करते हैं वो संसद विरोधों में भी शिष्टाचार की पहचान है संसद कई दशकों के अनुभव से क्या हमने ये नहीं सीखा, अशिष्टों की लड़ाई का, अखाडा बन गया संसद
हमारी भिन्नता में एकता का मूल है भारत समन्दर में पहाड़ों में है बसता गाँव में भारत मगर मशहूर शहरों की खबर मिलती सदा हमको, भला हम कब ये समझेंगे कि बस दिल्ली नहीं भारत
नमन मेरा है वीरों को चमन को भी नमन मेरा सभी प्रहरी जो सीमा पर है उनको भी नमन मेरा नहीं लगते हैं क्यों मेले शहीदों की चिताओं पर, सुमन श्रद्धा के हैं अर्पण उन्हें शत शत नमन मेरा
विविध रंग भरता ये मेरा चमन है. कोई प्यारा नगमा सा मेरा वतन है. न हिन्दू है कोई न कोई मुस्लमान, बस ममता लुटाती मेरी भारती माँ उस माँ की आँखें ज्यों गंगा जामुन हैं, कोई प्यारा नगमा सा मेरा वतन है. ये मंदिर और मस्जिद के झगड़े पुराने, क्यों भूले हम, रिश्तों के दिन वो सुहाने, अब भाई से भाई का छूता मिलन है. कोई प्यारा नगमा सा मेरा वतन है. वो बापू की धरती, वो झांसी की रानी, नहीं भूला जग उन शहीदों की कहानी, जिन कुर्बानियों से हर एक आँख नाम है, कोई प्यारा नगमा सा मेरा वतन है. ये किसकी सदा थी क़ि जागे थे हम भी, ये किसने दुआ की नई रोशनी की, उस माँ के चरणों में मेरा नमन है, कोई प्यारा नगमा सा मेरा वतन है.
-पद्मा मिश्रा
अपनी आजादी के नाम
भूले बिसरे संबंधों के सूनेपन में, नवयुग की किरणों का अद्भुत पैगाम भरें, एक दिन' तो अपनी आजादी के नाम करें. जो धूल भरी आंधियां छ गयी हैं नभ में, खो गया उजाला जिनसे जग के आँगन में , आओ हम नई क्रांति का सूरज एक गढ़ें, जन-मन के अंतर में एक नया प्रकाश भरें, 'एक दिन 'तो अपनी आजादी के नाम करें. जो छोटी छोटी राहों से होकर गुजरे, अब राजमार्ग पर भटक गए मेरे साथी, अपनी माटी की प्यार भरी भाषा भूली, अब सपनो का संसार बुना करते साथी. हम सत्ता क़ि उन अंधी गलियों से चलकर , एक नव प्रभात के नए सूर्य के साथ बढ़ें, 'एक दिन' तो अपनी आजादी के नाम करें. हमने अपनी पहचान नहीं खोई अब तक, अब भी जागे हैं, ऊँचे पर्वत शिखरों पर, बर्फीले झंझावातों के सूनेपन में, हम देश प्रेम के सपने बुनते हैं मन में, जो लुटा गए प्राणों का बलिदानी सावन, उनमर शहीदों क़ि गाथाएं याद करें 'एक दिन तो अपनी आजादी के नाम करें. नन्हीं आखे पूछा करती हैं सवाल, कब तक मिल पायेगा अपना अधिकार हमें? हम नहीं चाहते ऊँचे महलों क़ि दुनियां, अपनी छोटी सी कुटिया ही स्वीकार हमें. हम नव युग क़ि इन भोली आशाओं में, उनके सपनो का एक सुदृढ़ आधार बनें, 'एक दिन 'तो अपनी आजादी के नाम करें?
-पद्मा मिश्रा
दीयाअंतिमआसका ( एकसिपाहीकीशहादतकेअंतिमक्षण )
दीया अंतिम आस का, प्याला अंतिम प्यास का वक्त नहीं अब, हास परिहास उपहास का कदम बढाकर मंजिल छु लुं, हाथ उठाकर आसमाँ पहर अंतिम रात का, इंतज़ार प्रभात का
बस एक बार उठ जाऊं, उठकर संभल जाऊं दोनों हाथ उठाकर, फिर एक बार तिरंगा लहराऊं दुआ अंतिम रब से, कण अंतिम अहसास का कतरा अंतिम लहू का, क्षण अंतिम श्वास का
बस एक बुंद लहू की भरदे मेरी शिराओं मे लहरा दूँ तिरंगा मे इन हवाओं मे फहरा दूँ विजय पताका चारों दिशाओ मे महकती रहे वतन की मिटटी, गुँजती रहे गुँज जीत की सदियों तक इन फिजाओं मे
सपना अंतिम आँखों मे, ज़स्बा अंतिम साँसों मे शब्द अंतिम होठों पर, कर्ज अंतिम रगों पर बुंद आखरी पानी की, इंतज़ार बरसात का पहर अंतिम रात का, इंतज़ार प्रभात का
अँधेरा गहरा, शोर मंद साँसें चंद, होसलां बुलंद, रगों मे तुफ़ान, जस्बों मे उफान आँखों मे ऊँचाई, सपनो मे उड़ान दो कदम पर मंजिल, हर मोड़ पर कातिल दो साँसें उधार दे, कर लु मे सब कुछ हासिल
जस्बा अंतिम सरफरोशी का, लम्हा अंतिम गर्मजोशी का सपना अंतिम आँखों मे, ज़र्रा अंतिम साँसों मे तपिश आखरी अगन की, इंतज़ार बरसात का पहर अंतिम रात का, इंतज़ार प्रभात का
फिर एक बार जनम लेकर इस धरा पर आऊं सरफरोशी मे फिर एक बार फ़ना हो जाऊं गिरने लगूँ तो थाम लेना, टूटने लगूँ तो बांध लेना मिट्टी वतन की भाल पर लगाऊं मे एक बार फिर तिरंगा लहराऊं
दुआ अंतिम रब से, कण अंतिम अहसास का कतरा अंतिम लहू का, क्षण अंतिम श्वास का
-दिनेश गुप्ता
क्याहोगयाज़रादेशकाहालतोदेखो
बहुत हुआ अपना अपना घर बार, माँ का प्यार दुलार क्या हो गया ज़रा देश का हाल तो देखो क्या कर लेगा अकेला अन्ना, कहते थे सियासी गलियारे एक बुढे ने बदल दी युवाओं की चाल तो देखो
होसलों के खजानों को खंगाल कर तो देखो अपनी रगों के लहू को उबाल कर तो देखो झुक जाएगा आसमाँ, कदम चूमेगी मंजिले अपनी आँखों मे सपनो को पाल कर तो देखो
सत्ता के नशे मे चूर कितना इन्सान तो देखो भ्रस्टाचार की अग्नि मे जल रहा अरमान तो देखो इरादों मे होती है जीत, ताकतों मे नहीं बुंद बुंद बढता, होसलों का तूफान तो देखो
सत्तायें पलट सकती है, तस्वीरें बदल सकती है भटके हैं रास्ते मगर, मंजिले फिर भी मिल सकती है ज़रा बदल कर अपनी चाल तो देखो
क्या हो गया ज़रा देश का हाल तो देखो।
-दिनेश गुप्ता
कवि अपना कर्तव्य निभा तू
छा रहे निराशा के बादल, अंधियारा बढ़ रहा प्रतिपल । घुट-घुट कर जी रहा आदमी आदमी नचा रहा आदमी । आशा के कुछ गीत सजा तू, कवि अपना कर्तव्य निभा तू।
मानवता लहू लुहान पड़ी, बुद्धि चेतना से बनी बड़ी । रक्त पिपाशा है पशु समान, हेय मनुज अन्य, निज अभिमान । सुन धरती का यह रोना तू, कवि अपना कर्तव्य निभा तू।
कर्म क्रूर, पाखण्ड, धूर्तता, विध्वंस, वासना, दानवता । लुप्त मानव का जन से प्यार, निज स्वार्थ वश करता संहार । जागरण के अब गीत गा तू, कवि अपना कर्तव्य निभा तू।
भोग में है खॊया इंसान, भूल गया है स्नेह, बलिदान । उन्माद, शोषण, कुमति विचार, बना यही मानव व्यवहार । पथ मानव को उचित बता तू, कवि अपना कर्तव्य निभा तू।
है जेबें भर रहे कुशासक, जनता पिस रही क्यों नाहक । सुविधाओं की खस्ता हालत, पग-पग, पल-पल जीवन आहत। उनींदी आँखे खोल अब तू, कवि अपना कर्तव्य निभा तू ।
अर्थ सभी कृत्यों का तल है, ज्ञान, तेज, तप सब निर्बल है । विस्मित सभ्यता, मौन आघात, कैसे मिटे यह काली रात ? ज्योति पुंज कोई बिखरा तू, कवि अपना कर्तव्य निभा तू ।
वाणी - अमृत, अंतर - विष है, जीवन बना छल साजिश है । धमनी रक्त श्वेत हुआ है, प्रस्तर मानव हृदय हुआ है । प्राणों में नव रुधिर बहा तू, कवि अपना कर्तव्य निभा तू।
-कवि कुलवंत सिंह
मुद्दे
मुद्दों की बात करते-करते वे अक्सर रोने लगते हैं. उनका रोना उस वक्त कुछ ज्यादा बड़ा आकार लेने लगता है जब कटोरी में से दाल खाने के लिए चम्मच भी नहीं हिलाई जाती उनसे, मुद्दों की बात करते-करते कई बार वे हंसने भी लगते हैं क्योंकि उनकी कुर्सी के नीचे काफी हवा भर गयी होती है मुद्दों की बात करते-करते वे काफी थक गए हैं फिलहाल बरसों से लोगों को खिला रहे हैं मुद्दे पिला रहे हैं मुद्दे जबकि आम आदमी उन मुद्दों को खाते-पीते काफी कमजोर और गुस्सैल नजर आने लगा है मुद्दों की बात करते-करते उनकी सारी योजनाएं भी साल-दर-साल असफलताओं की फाईलों पर चढी धूल चाटने लगी हैं जबकि आम आदमी गले में बंधी घंटी को हिलाए जा रहा है मुद्दों की बात-करते उन्हें इस बात की चिंता है कि आने वाले समय में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आम लोगों की भूख को कैसे काबू में रखा जा सकेगा ? मुद्दों की बात करते-करते वे कभी-कभी बडबडाने भी लगते हैं कि उनके निर्यात की योजना आयात की योजना में उलझ गयी है रुपये की तरह हर साल अवमूल्यन की स्थिति में खडी उनकी राजनीति लालची बच्चे की तरह लार टपका रही है आजकल मुद्दे लगातार मंदी के दौर से गुजर रहे हैं ।
-अशोक आंद्रे
जब से मेरे देश में
जब से मेरे देश में स्वराज हो गया, सस्ता हो गया आदमी मंहगा प्याज हो गया, कितनी ईमानदारी से करते है बेईमानी देखो, भ्रष्टाचार में नंबर वन हिन्दुस्तान हो गया, और बारिश से अब डरने लगे है लोग, क्यों की पिछली बरसात में पूरा शहर टाइटेनिक जहाज... हो गया, दुहाई देते है सब इंसानियत की मगर, न जाने कितने बच्चो का कत्ले आम हो गया, सुन कर अब तालियाँ मत बजाओ लोगो, मेरा ये पैगाम भी बदनाम हो गया, मल्टीमिडिया सेट अब बच्चे भी रखते है जेब में, इसीलिए तो मित्रो नेटवर्क जाम हो गया, अब तो स्कूल में होता है बलात्कार, ये कैसी शिक्षा का प्रचार हो गया, कटे हांथो से देश की पकडे हो बागडोर, तभी तो कही संसद भवन कही अक्षरधाम हो गया, हवाओ में भी यारो घुल रहा है अब जहर, फिर भी मेरा भारत महान हो गया.
-राजेन्द्र अवस्थी
व्यथा की आत्मकथा
(एक ढाई वर्ष की बालिका के साथ हुए दुष्कर्म की करुण कथा )
ऐ सजल नयनों बताओ, क्योंकर बिलखती है व्यथा? जब बुझे नयनों ने छेड़ी, यन्त्रणा की दारुण कथा.
सुनने वालों थाम लो दिल, मैं सुनाती उसकी कथा. थर्रायेगा पाषाण भी सुन, एक दानव ने जो किया.
ढाई बरस की बालिका थी, प्यारी सी मुस्कान मुख की. नादान थी वह मासूम थी, थी तोतली ज़ुबान उसकी.
भोली थी न जानती थी, आ गई है विपदा बड़ी. छल,छद्म से अनजान थी, संग परिचित के चल पड़ी.
जानकर आत्मीय उसे वह, खिलखिला कर हंस पड़ी. टौफ़ी पकड़ लीं हाथ में, गलबहियां डाल चुम्मी जड़ी.
हाय रे वह वहशी दरिन्दा उसे ले गया एकान्त में. कुकृत्य कर छोड़ा उसे जब, कैसे बताऊं किस हाल में?
थी रक्त से लथपथ बालिका, आंख भर न जिसने जग देखा. इन्द्रियों से अन्भिग्य तन का, बन चुका था लोथ मांस का.
तड़प-तड़प जब प्राण निकले, अश्रुओं ने लिख दी थी कथा. थे नयन चकित, पथरा चले, अधरों ने पढ़ी थी चिर व्यथा.
उन चकित नयनों से बही जब, तड़प- तड़प कर दारुण व्यथा, काश पढ़ पाता वो कामुक, बिलखती व्यथा की आत्मकथा.
- नीरजा द्विवेदी
नारी की द्रोही नारी है
देखो दहेज की बलिवेदी पर, धू-धू जलती वह नारी है. जो पीड़ित करती वह नारी है, जो पीड़ित होती वह नारी है. जो सास बनी वह नारी है, जो बहू बनी वह नारी है. नारी के हाथों ही देखो, प्राण त्यागती वह नारी है. आज बनी है मां पिशाचिनी, भ्रूणों की हत्यारी नारी है. जो शोषण करती वह नारी है, जो शोषित होती वह नारी है. दुर्दैव! भारतीय समाज में, नारी की द्रोही नारी ही है.
-नीरजा द्विवेदी
एक स्लम की व्यंग्योक्ति
किसी महानगर में प्रवेश करती रेलगाड़ी के डिब्बे से निहारते हुए अथवा उतरते जहाज़ से नीचे झांकते हुए आप ने मुझे देखा होगा भंवें सिकोड़ी होंगी नाक बंद की होगी और पास में बैठी पत्नी या मित्र से सहानुभूति के स्वर में कहा होगा कैसे जीते हैं इस स्लम में लोग? फिर कुछ राजनीतिग्यों, कुछ नौकरशाहों पर अपने मन की भड़ास निकालकर किसी दुःस्वप्न की तरह भूल गये होंगे मुझे और प्रारम्भ कर दी होगी उद्देश्यहीन वार्ता देश की ग़रीबी एवं भ्रष्टाचार पर.
पर क्या कभी आप ने जानने का प्रयत्न किया कि मैं क्या हूं, क्यों हूं और किसके लिये हूं? क्यों बसा हूं मैं नगर के गंदे नाले के किनारे? क्यों प्रत्येक तीन गुणे तीन मीटर के क्षेत्रफल में बना है एक झोपड़ा मुझ पर? सर्कंडों की दीवालों पर रखी है एक तिरपाल, जो बीरबल के चिराग़ की तरह, केवल मानसिक सांत्वना देती है वर्षा, शीत या सांप से सुरक्षा की. क्यों रहते है प्रत्येक नौ वर्गमीटर के झोंपड़े में नौ प्राणी कुत्तों और पिल्लों की तरह, और गाय भैंस भी जिस पानी को सूंघकर नथुने फैलाकर आगे बढ़ जाते हैं ये कपड़े धोते और नहाते हैं उसी में.
मैं जानता हूं कि तुम मुझे महानगर की सुंदरता में बदनुमा दाग़ समझकर स्वर्गलोक के बीच श्मशान मानकर भुला देना चाहते हो और अपने भावलोक से मिटा देना चाहते हो मेरा अस्तित्व. पर चाहे तुम्हारी प्रगति ने या तुम्हारी स्वार्थी संचयी प्रवृत्ति ने छोड़ा है मेरे लिये एक छोटा सा भूखंड, फिर भी मेरे प्रत्येक वर्गमीटर में बसता है एक प्राणी. क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर से ही तुम्हारे सम बना है उसका शरीर. वह शरीर जो बचपन से ही बीनने लगता है गंदे ढेरों में कुछ रद्दी टुकड़े जो नित्य क्रिया हेतु बैठता है सड़क के किनारे जो चलाता है रिक्शा और ढोता है बोझा अथवा तुम्हारे घरों में लगाता है पोंछा. नहीं तो पेट भरने हेतु तरह तरह के नाटक कर मांगता है भीख या स्वयं को बेचता है तुम्हें कुछ टकों के लिये.
कितनी बार सोचा है तुमने तुम्हारी प्रगति ने, तुम्हारी सभ्यता ने कि मेरे इन प्राणियों के शरीरों में भी बसती है एक आत्मा. इन्हें भी शीत, ग्रीष्म व बर्षा सताती है तुम्हारी ही तरह. भूख प्यास की इनकी भी तड़प तुमसे कम नहीं है. इन्हें भी लगती है चोट इनका भी होता है क्लांत शरीर इनका भी दुखता है मन रोग क्लेश और मृत्यु से भयभीत होते हैं ये तुम्हारी ही तरह. और चांद पर उतरने की इनकी भी कामना तुमसे कम नहीं, इन्हें भी भाते हैं सुस्वादु भोजन गद्देदार बिस्तर, टी. वी. और फ़र्नीचर.
इन्हें है भान कि ये तुम्हारी बीस मंज़िली अट्टालिका बनाने में अपना पसीना तो बहा सकते हैं पर उसमें विश्राम नहीं कर सकते हैं. पर यह तो न समझो कि ये निःस्प्रह हैं, निर्लिप्त हैं, मृतप्राय हैं और सुख पाने की इच्छा भी नहीं कर सकते हैं. इन्हें भी सताता है काम, आता है क्रोध लगता है मोह और कामना है मोक्ष की.
यदि यह बात याद रख सको तो जाकर लिख देना विधान भवन की दीवारों पर न्यायालयों की चौखटों पर मंत्रियों के घरों पर अफ़सरों की कालोनियों पर और सेठों की कोठियों पर कि हर महानगर के बाहर एक स्लम है जो मृतकों का श्मशान नहीं है वरन उसी में रहने वाले लोगों ने ही बनायी हैं तुम्हारी कालोनियां कोठियां और महल.
क्या तुम उन्हें एक आउटहाउस भी नहीं दी सकते हो? क्या सचमुच तुम उनका कीड़ों मकड़ों की तरह जीना ही उचित समझते हो? क्या इस कृतघ्नता पर नहीं धिक्कारती है कभी तुम्हारी चेतना तुम्हें? और क्या समाज के आभिजात्य समूह अपने अपने में एक माफ़िया गिरोह हैं जो आते हैं एक दिन हूणों और चंगेज़ों की तरह, लगाते जाते हैं आग मेरे हर झोपड़े में जला देते हैं इन इन्सानों की जीवन भर की कमाई. जो हैं कुछ चीथड़े, टोकरे और दो-चार बर्तन. कुछ इन्सान भी जल-भुन जाते हैं चीखते हैं पुकारते हैं बहरे ईश्वर को अंधे न्याय को और भाग जाते हैं बसाने एक नया स्लम जहां बहता होता है किसी फ़ैक्टरी से निकलता बदबू भरा एक नाला.
और फिर यही इन्सान खड़ी करते हैं इसी स्थान पर ऊंची सी अट्टालिकायें. अपने ही लहू से अपने ही उजाड़े घरों पर. फिर भी नहीं पसीजता है तुम्हारा हृदय तुम्हारी आत्मा; रहते हो तुम इसके एक एयर-कन्डीशंड फ़्लैट में ऊचाई से देखते हो मुझे और बोलते हो पत्नी या मित्र से जाने कैसे ये लोग इस स्लम में जीते हैं? और पुनः प्रारम्भ कर देते हो बढ़ती आबादी, ग़रीबी एवं भ्रष्टाचार पर एक अर्थहीन वार्ता.
- महेश चन्द्र द्विवेदी
असीम आरक्षण
भारत में शासन चाहे किसी दल का हो, आरक्षण का क्षेत्र व सीमा बढ़ाये जाते हैं; श्रेष्टता व परिश्रम हैं यहां टके सेर बिकते, आरक्षित भ्रष्ट-कनिष्ठ ज्येष्ठ बनाये जाते हैं; ऐ चुनाव! कहां तक तेरा गुणगान करुं, देश जाति-धर्म में बांटकर वोट कमाये जाते हैं.
भ्रष्ट नेता और अफ़सर सीना तानकर चलें, सत्यनिष्ठ अफ़सर सब मुंह छिपाये जाते हैं; पेट हैं जिन लोगों के फटने तक भरे हुए, ऐसे अफ़सर ग़रीबों का गेंहूं खाये जाते हैं; ऐ आरक्षण! धन्य है तू और तेरा जातिवाद, घोटालेबाज़ नेता तेरे कारण जिताये जाते हैं।
-महेश चन्द्र द्विवेदी
सीमा
मेरे देश के पहाण और धरती आज जैसे गरीब की लुगाई खंगाल रहे, रौंद रहे आते जाते हक जताते बुरी नजर से देख रहे लोग
और यह सब सहती , आग-पानी के सहारे कोप जताती, अस्तित्व, उर्वरता... अपना हरियाला संतुलन बचाती जैसे-तैसे जिए जा रही है...
-शैल अग्रवाल
तिरंग फहरा लो।
तारा है वो, सितारा है वो झिलमिल आँखों में चंदामामा सा प्यारा है वो जागती आँखों का सपना देश वो हमारा है तस्बीर यह आँखों में सजा लो, तिरंग फहरा लो।
दूर हैं तो क्या मजबूर हैं तो क्या मन में कुछ यादे हैं वादे और इरादे हैं इरादों को आजमा लो, तिरंग फहरा लो।
मिट्टी वह पुरखों के खून सनी मिट्टी वह जिससे यह देह बनी मिट्टी वह अपनी पहचान है मिट्टी वह पूज्यनीय माथे से लगा लो तिरंग फहरा लो।
सूखा कहीं, बाढ कहीं भूखे कई, नंगे कई लालच और गुर्बत के मारे हैं अपने पर सारे हैं अपनों को बचा लो तिरंग फहरा लो।
तन मन धन सब अर्पण यही तो पूर्वजों का तर्पण मां का आवाहन है वादों का जल दो कर्मों की आहुति जीवन एक यज्ञ बना लो तिरंग फहरा लो।
तुम जब हँसती हो तो आ जाती है धूप में अनोखी चमक जल में विरल तरलता हवा में अद्भुत उल्लास गुलाबों में सिहरन पेड़ों में हरा उजास
तुम जब हँसती हो तो बढ़ जाती है नक्षत्रों की कांति नदियों में विपुल जल खबरों में अवकाश बादलों में बारिश घरों में सुख-चैन
तुम जब हँसती हो तो गाती है देह में सर्पिलता लहू में रक्तिम आभा मन में अनन्त इच्छाएँ आत्मा में अमरता अस्थि-मज्जा में जिजीविषा
तुम जब हँसती हो तो भर जाता है स्त्रियों में लबालब प्यार पुरूषों में विनम्र अनुरोध पिता में पुरुषार्थ माँ में मनुहार संतति में परिष्कार
तुम जब हँसती हो तो उठती है मिट्टी से सौंधी गमक बस्तियों से भोज की गंध दिनों में मशक्कत और अट्टहास रातों में स्वप्न और आमंत्रण धमनियों में उद्दाम वेग
तुम जब हँसती हो तो जागती है घोड़ों में हिनहिनाहट दोस्तों में दोस्ती दुश्मनों में दुश्मनी पण्डितों में चतुराई ईश्वर में करूणा
तुम जब हँसती हो तो ढँक जाती है नग्नता आवरण से आवरण निर्वस्त्रता से होठ चुम्बनों से आकाश ग्रह नक्षत्रों से धरती धन-धान्य से
सीढ़ियौं
सीढ़ियाँ नापना चाहती हैं चोटी के रहस्य तहखानों की गहराई वैसे उनका ताल्लुक शिखर से अधिक है रपट कर भी जा सकता है आदमी पाताल में
वे जुड़ी रहना चाहती हैं उस बच्चे से जिसे फिक्र है बढ़ने-बडरने की उनकी स्मृतियों में संचित हैं चढ़ने-उतरने के तमाम नक्शे
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हमेशा लगता है कि हमें कहीं पहुँचना है कैसा लगता है सीढ़ियाँ उतरते हुए झाँक कर देखें गहरी घाटी में
चढ़ने उतरने के सिलसिले के बीच सीढ़ियाँ ठहरी हैं शताब्दियों से उनकी ख्वाहिश है वे उड़ कर चली जाएं सातवें आसमान से परे
गुरुत्वाकर्षण
कुछ लोग नापना चाहते हैं आकाश की अन्तिम ऊँचाई वे छलाँग लगाते हैं ब्रह्माण्ड में और लौट आते हैं धरती पर निरुपाय गुरुत्वाकर्षण का नियम उनके आड़े आता है
कितना उचित है उनका यह सोचना कि आदमी कहाँ पहुँच गया होता यदि नहीं होता गुरुत्व का अवरोध
ऊँचाई हो या नीचाई अस्तित्व का मूलाधार है गुरुत्व ही अनंत ब्रह्माण्ड में हम बिखर जाते छिछड़ों की तरह यदि नहीं होती गुरुत्व की कशिश
हर ऊँचाई के लिए द़न करनी होती है नींव में अपनी सबसे बड़ी ख़्वाहिश वह जो दिख रहा है शिखर लाँघता हुआ कब से द़न था अतल में कौन जानता है
सन्त-जन कहते आये हैं केवल गुरू ही दिलाता है भव सागर से मुक्ति कबीर ने यूं ही नहीं किया गोविन्द से पहले उसका पा-लागन
ब्रह्माण्ड की यात्रा शुरू करने से पहले मैं पूरी करता हूँ अपनी प्रार्थना ...स्वस्ति नो बृहस्पतिर्ददातु!’
जीवन का जादू
साँसो ने जल से जाना जीवन का जादू ‘जायते इति’ ‘लीयते इति’ आती हुई साँस सृष्टि है जाती हुई प्रलय शिव ने पार्वती से कहा तू इनके मध्य ठहर जा अमृत को उपलब्ध हो जाएगी।
घर उजाड़–बियाबान में बनाया मैंने एक माटी का घर घरों से घिरी दुनिया कुछ और भरी–पूरी हुई
अगले दिन मैंने पूछी रहमत चाचा की खैर–कुशल सुदूर पड़ौस तक फैला मेरा घर–द्वार
मैं जब–जब सोचता हूँ तमाम चीज़ों तमाम लोगों के बारे में तो गाँव, जिला, प्रान्त और राष्ट्र की सीमा में ही सिमट कर नहीं रह जाता घर–संसार
मैं रोज प्रार्थना करता हूँ ‘हे पिता विश्व का कल्याण करो सभी को आरोग्य दो! अभय दो! सन्मति दो!’
मेरी दिली ख्वाहिश है कि अगली बार मैं चीखूँ आकाशगंगा के सीमान्त पे ताकि गैलेक्सियों के आर–पार बिखर जाएं घरों की सरहदें
मॉंमेरे लिए माँ को जानना जख्म के बीचों बीच से गुजरना है।
आज ही बड़े तड़के मुझे माँ का खयाल आया चूल्हे की मंद आग पर बटलोही में सीझती माँ हौले-हौले गुनगुना रही थी चपाती के गोल फूले पेट पर चमकता उनका बड़ा काला मस्सा मंद-मंद हँस रहा था ब्यालू करते हुए मैं खुश था माँ का होना ब्यालू का मुकम्मिल होना है
बड़े तड़के ही मैं लौटा था गूगन कहार की गाय को बिवाकर ब्याने के पहले की पीड़ा से छटपटाती हाँफती-काँपती थरथराती रंभाती डकराती वह गाय तड़पती सदी के आखिरी मुहाने पर पहुँच एक सुन्दर सलौने बछड़े में बदल गयी लहू कीच-कादे से सनी एक आत्मीय आग्रही हौंक किलक कर उठी और बाड़े को फाँद मेड़ पर आ गई जहाँ दूब थी हरी-हरी हरी-भरी कल्ले फोड़ती खुश खिली-खिली सी
अभिलाषा
‘जन का, जन के द्वारा, और जन के लिए’ चमकता है संसद की दीवार पे लिखा लिंकन का प्रसिद्ध सूत्रवाक्य गण और तंत्र की गरिमा से दीप्त
मेरी अभिलाषा है इसका मर्म बिंधे मेरे राष्ट्र के प्राणों में गणतंत्र की गुनगुनी धूप में होते हुए होना जड़ें ठीक से बताती हैं होने के बारे में
मूल की महिमा को छिपाये रहते हैं वृक्ष
दिखने से दूर होते हुए होना
स्वाभाविक और जरूरी
कुछ लोग मुझे पसंद करेंगे कुछ नापसंद यह स्वाभाविक है और जरूरी भी दुनिया के सन्तुलन के लिए
लगभग लुच्चापन है यह कोशिश कि सभी मुझे पसंद करें ग़ज़लआग की आँख में पानी की तरह। आँख का नूर निग्हेबानी की तरह। हर हथेली में रस्म जि़न्दा है, दोस्त रिश्तों की रवानी की तरह। रेत में दूब, दूब में दरिया एक मुसलसल–सी कहानी की तरह। धूप धरती की पाँव बच्चे का, सुर्ख़ सूरज पे निशानी की तरह। आँत में रात है ब्यालू का बखत, रोटियाँ रात की रानी की तरह। प्रेम मेंप्रेम करते पुरुष के लहू में चीखते हैं भेड़िये उग आती हैं दाढ़ें पंजे और नाखून प्यार में पुरुष बेतरह गुर्राता है हाँफता है काँपता है और शिथिल हो जाता है
प्रेम करने की कला केवल स्त्री जानती है वह बेसुध भीगती है प्रेम की बारिश में फिर कीलित कर देती है उस क्षण को देखी है कभी ग्लेशियर से फूटती पीन उज्ज्वल जल-धार
एक स्त्री ही गुदवा सकती है अपने वक्षस्थल पर अपने प्रेमी का नाम नीले हरफ़ों में
सवाई सिंह शेखावत राजस्थान के वरिष्ठ कवियों में हैं। अब तक उनके कई कविता संग्रह प्रकाशित हैं, किन्तु 'दीर्घायु हैं मृतक' से उन्होंने हिंदी कविता में एक विशेष पहचान बनाई। उन्होंने अपनी कविता में हवाई किले नहीं बांधे, बल्कि जीवन की सांस चलते रहने के लिए जीवन को अंतरंगता से पढने की कोशिश कविता में की है। ज़रा-सी दूब के लिए चिंतित यह कवि अपनी इसी अकिंचन इच्छा से अपने भीतर के कविता-संस्कारों को एक ज़मीन देता है। जीवन दुखमय है पर ज़रा-सी किलकारियॉं जीवन को खुशी के रंगों से भर भी देती हैं। शेखावत की कविता में दरकती हुई इच्छाओं के मृण्मय आकार हैं तो संगदिल समय के सीने को चीर कर निकलती हरी दूब का सपना भी, जिसे कभी नंद भारद्वाज ने देखा और जो लगभग राजस्थान के हर कवि का सपना है। शेखावत इस सपने को अपनी कविताओं में नया रूप देते हैं। वे पेड़ की नहीं, जड़ों की बात करते हैं और कहते हैं, जड़ें बच जाऍं तो पूरा पेड़ बच जाएगा। हमारे यहॉं प्राय:उस कवि को राष्ट्रकवि मानने का रिवाज़ है जो घोषित तौर पर राष्ट्रभक्ति में कविताऍं लिखे। जबकि देखा जाए तो हर कवि राष्ट्रकवि है, बल्कि राष्ट्रकवि ही नहीं, विश्व कवि है। शेखावत में राष्ट्रभक्ति के बीज भी प्राय: छितरे बिखरे मिलते हैं। एक कविता 'अभिलाषा' में इस कवि का स्वप्न है कि :
‘जन का, जन के द्वारा, और जन के लिए’ चमकता है संसद की दीवार पे लिखा लिंकन का प्रसिद्ध सूत्रवाक्य गण और तंत्र की गरिमा से दीप्त
मेरी अभिलाषा है इसका मर्म बिंधे मेरे राष्ट्र के प्राणों में गणतंत्र की गुनगुनी धूप में।
इस स्तंभ के अंतर्गत नंद किशोर आचार्य, अरुण कमल, वर्तिका नंदा, भगवत रावत , विनोद कुमार शुक्ल, ओम भारती , प्रतापराव कदम, संजय कुंदन, तजिन्दर सिंह लूथरा,पुष्पिता अवस्थी, ज्ञानेन्द्रपति, नरेश सक्सेना, अशोक वाजपेयी और एकांत श्रीवास्तव के बाद प्रस्तुत है राजस्थान के सुपरिचित कवि सवाईसिंह शेखावत के हाल ही में प्रकाशित नए कविता संग्रह ' कितना कम जानते हैं हम ख्यातिहीनता के बारे में' पर डॉ.ओम निश्चल का आलेख।
समकालीनता और शाश्वत जीवन-चिंता किताब:कितना कम जानते हैं हम ख्यातिहीनता के बारे में कवि: सवाई सिंह शेखावत प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, एफ 77, सेक्टर 9, रोड नं.11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईस गोदाम, जयपुर-302006 मूल्य: 70/-
कितना कम जानते हैं हम ख्यातिहीनता के बारे में---सवाई सिंह शेखावत की महत्वपूर्ण काव्यकृति है। लंबे अरसे से कविता में सक्रिय शेखावत ने जीवन की बारीक वास्तविकताओं और मानवीय संवेदना के सघन तंतुओं को अपनी कविता में गहरे अनुस्यूत किया है। उनकी प्रगतिशीलता इस बात का पूरा खयाल रखती है कि कविता विचार बोझिल न बनने पाए। आज के पूंजीवादी समय में जब आम आदमी के जीवन को लेकर लगातार उपेक्षाऍं बरती जा रही हैं, शेखावत अपनी चिंताओं का इज़हार कविता में करना नहीं चूकते। वे कहते हैं: कैसे बचेगा पृथ्वी पर जीवन/ कोई बचा रहा है काबा, कोई काशी/ किसी को नहीं दिखता जिन्दा दरख्त और दूब जरा-सी।
‘कुछ जरूरी चीज़ों के बारे में’ एवं ‘तिरोहित हो जाए दुख दुनिया से’ शीर्षक दो खंडों में विभक्त इस संग्रह के जरिए शेखावत ने यथार्थ की जटिल संवेदना के साथ साथ जीवन के उल्लास और विश्वास की रेखाऍं भी खींची हैं। वे पुराने जूते से प्रेरणा लेकर कविताऍं लिखते हैं तो अपनी पोतियों व पोतों को लेकर भी वे उम्मीद और बचपन के बीच हमें ले जाते हैं। कोई पुरा कथा उन्हें उद्वेलित करती है तो ‘अंतिम अरदास’ में वे एक सच्चे कवि की कौंध को रेखांकित करते हैं जिसके सघन प्रकाश में जीवन का मूल पाठ दोहराया जा सकता है। आज जिस तरह से हमारे जीवन से पुराने मूल्य विदा हो रहे हैं, नई पीढ़ी प्रकृति और पारिस्थितिकी से जिस तरह कटती जा रही है, वे ‘फैसला’ कविता में एक जरूरी संदेश देते हैं: ‘जब समूचे पेड़ पर संकट आया हो/ और तुम्हारे पास विकल्प नहीं बचा हो/ पूरे के पूरे पेड़ को बचाने का/ तब कोशिश करना/ जड़ों को बचाने की/ बचा रहेगा पूरा पेड़ ही।‘
प्रेम कविताऍं बेशक शेखावत ने कम लिखी हैं पर वे स्त्री के गुणसूत्र से वाकिफ हैं जो प्रेम में अपने प्रेमी का नाम अपने वक्षस्थल पर गुदवा सकने का साहस रखती है। वे कहते हैं: ‘प्रेम करने की कला/ केवल स्त्री जानती है/ वह बेसुध भीगती है/ प्रेम की बारिश में।‘ ‘अस्तबल’ कविता स्मृति में खनखनाते अस्तबल के घोडों की टापों की याद दिलाती है। जरा इसे अभी अभी उत्तराखंड की त्रासदी से जोड़ कर देखें तो यह कविता एक नए पाठ का सृजन करती है। ‘जो नही है’ और ‘जो है’ के बीच के सन्नाटे और स्मृति की एक सांकेतिक बुनावट है यह कविता। वे एक कविता में अपनी स्मृति में अँटकी शमशेर की सुपरिचित कविता ‘एक पीली शाम’का जिक्र पूरी आवेगमयता से करते हैं तथा देखते हैं कि जीवन की हलचल जाग रही है, ऋतुचक्र थका नहीं है, नीरस जाड़े के बाद दबे पांव चला आया है रगों में दौड़ता गुनगुना बसंत---रस, गंध और मकरंद बनता हुआ।
ये कविताऍं बताती हैं कि कवि सादगी और सरलता का आकांक्षी है। अकारण नहीं कि वह ‘घर लौटने की तलब’ में यह कहता है: सीधे और सरल शब्द ही / खोलेंगे भीतर का दरवाज़ा’। वह मनुष्य होकर भी अपने मामूलीपन को खोना नही चाहता । अमरता के रास्ते पर चलने से वह बचना चाहता है। वह घुटनों के बल प्रार्थनाओं में झुकने और विराट ईश्वर से केवल मामूलीपन को मांगते हुए वह आदमी में भय और शर्म,घृणा और प्रेम, बेसब्री और इरादे बचाये रखना चाहता है। कभी कवींद्र रवींद्र ने यह कहा था, ‘ईश्वर अब भी बच्चों को धरती पर भेज रहा है। इसका अर्थ है कि वह अभी मानव जाति से निराश नहीं हुआ है।‘ यहां पोतों और पोतियों को लेकर कवि की कविताऍं बताती हैं कि वह बच्चों के कलरव, हास उल्लास धमाचौकड़ी घमासान मान मनुहार ठुमकों के बीच यह कहने से नहीं चूकता कि ‘ अपने पोतों की रगों में धड़कता हूँ मैं/ उनके पोतों का ख्वाब बन कर। ‘ पोतों ही नहीं, पोतियों के बारे में लिखते हुए भी कवि भावुक हो उठता है। उनकी खिलंदड़ी गतिविधियॉं, दादी के बालों में तेल लगाती नरम नरम हथेलियां, मीठी बतकहियॉं, अनिंद्य शरारतें सब कवि के लिए जीवन की गतिविधियॉं हैं। ये पोतियॉं ही हैं जो कवि को बूढ़ा होने से बचाये हुए हैं। पोतों-पोतियों पर रामदरश मिश्र व अशोक वाजपेयी जैसे कवियों ने भी कविताऍं लिखी हैं पर शेखावत की कविताओं में एक खास रंगत है। वे कविताओं में लंगा बंधुओं के गायन की गमक भरते हैं तो मिट्टी की महानता भी उकेरते हैं। वे मिट्टी में घुलते लवण को, लवण में घुली उत्तेजनशीलता को, हड्डियों की दृढ धवलता को, जीवन में अँखुवाते अनिवार्य स्पंदन को कविता की धमनियों में महसूस करते हैं।
शेखावत की यह कृति कविता में भाषा की समकालीनता का भी परिचायक है। राजस्थान के कवियों में नंद चतुर्वेदी, विजेंद्र, नंद किशोर आचार्य, ऋतुराज, नंद भारद्वाज, हेमंत शेष के बाद सवाई सिंह शेखावत की कविता हिंदी कविता की एक अग्रणी आवाज़ है। यह कवि भाषा को लेकर कितना संजीदा है, यह उसकी कविता बताती है। वह शब्दों के अवमूल्यन से चिंतित होता है और इसी आशय की एक कविता में कहता है: ‘शब्दों की दुनिया में/ कल फिर एक हादसा हुआ/ जब टीवी वालों ने एक गुंडे को/ बाहुबली कह कर पुकारा।‘ उसकी कविता के स्थापत्य पर भी गौर करें तो बहुधा एक ऐसी सुचिंत्य कोशिश दिखती है कि कविता शब्दों के सार्थकता और उसकी प्रभावान्विति का पर्याय बन सके। वह ‘जरूरी’ और ‘अतिरिक्त’ पर बेहद गौर करने वाला कवि है। अपनी एक कविता ‘अतिरिक्त नहीं’ में विनोद कुमार शुक्ल ने लिखा था: ‘पेड़ में बहुत सारी पत्तियॉं है/ किन्तु अतिरिक्त एक भी पत्ती नहीं।‘ शेखावत इसे आगे बढाते हुए कहते हैं: ‘सारी की सारी पत्तियॉं जरूरी हैं पेड़ के लिए / पेड़ में एक भी पत्ती अतिरिक्त नहीं है।‘ वे अंत में कहते हैं: ‘हम फर्क करें जरूरी और अतिरिक्त में।‘
वे कविताओं में मकबूल फिदा हुसैन के घोड़ों की बांकी भंगिमा पर मुग्ध दिखते हैं और निहायत वर्तमान में ही मरने और जीने की बात करते हैं। वीरेन डंगवाल की एक कविता भलेपन पर है। इतने भले नहीं बन जाना साथी/ जैसे सर्कस का हाथी। शेखावत ‘भले आदमी का कृष्ण पक्ष’ में इस भलेपन की पूरी संरचना को नए सिरे से देखते हैं और कहते हैं: ‘भला होना यकीनन बड़ी बात है/ लेकिन बेचारा भला आदमी होना/ कोई शुभस्थिति नहीं है/जीवन की करुणा की स्थापना के लिए / उसे काटने से बरजा गया था/ दुनिया की बेहतरी के लिए/ भले आदमी को फुफकारते भी रहना चाहिए।‘ मैं अन्यत्र कहता रहा हूँ कि हर कविता में भीतर एक संदेश होता है। चाहे कविता जितनी निजी और एकांतिक हो। वे अगर अपने को विश्वयारी का पुराना कवि मानते हैं तो इसलिए कि वे प्रेम के बारे में कुछ पुरानी तरह से सोचते हैं। वे कहते हैं, मुझे इसी काया में मोक्ष चाहिए जो संभव थी पुरातन कविता में प्रेम की तरह। जैसा कि कह चुका हूँ शेखावत अपनी कविता के लिए पुराने जूतों के पास भी जाते हैं तथा उन्हें देख कर ही वे विश्वासपूर्वक यह कहते हैं:
एक कवि को पुराने जूतों की तरह
आत्मीय और उदार होना चाहिए
केवल तभी उसकी कविता बचा सकती है
जीवन को कंटीलें धूल-धक्कड़ से
झुलसती धूप से
ठिठुरते शीत से।(पुराने जूते)
जब चौतरफा यश:कामिता का बोलबाला हो, यह कवि ख्यातिहीनता को केंद्र में रखने वाला कवि है। इस वाचाल समय में वह खामोशी को गुनने वाला और अनकहे को सुनने वाला कवि है। वह कितने अनुरोधों, धिक्कारों से भरी इस छोटी सी जिन्दगी में ख्याति के उत्कर्ष और ख्यातिहीनता के मर्म को जानता बूझता है। तभी तो वह कहता है, किसी फूल पर रीझना या कविता लिख देना बेशक आसान है पर कविता में जिन्दगी के जख्मों पर मरहम लगाना बहुत मुश्किल है। ‘कविता की आंख से देखो/ लिखा हुआ पोस्टकार्ड / दुनिया की सबसे खूबसूरत कविता है’ कहने वाले शेखावत का कविता संसार बहुआयामी है। उसने चिट्ठियों के रूपक से कविताऍं रची हैं तो मृतकों की मनोभूमि को भी खंगाला है। दंगो में हमेशा मारे जाते लोगों को हिंदू या मुसलमान की दृष्टि से देखा जाता है, आदमी की नहीं। शेखावत यह दुआ मांगते हैं कि यदि दंगे में मारा जाऊँ तो आदमी की मौत मरूँ। ये कविताऍ समकालीनता की चिंता के साथ साथ एक तरह की शाश्वत जीवन चिंता की कविताऍं भी हैं। यहॉं जीवन बोलता है, उम्मीद बोलती है।
देखते-देखते भारत ने आजादी के छाछठ वर्ष पूरे कर लिए हैं।बहुत कुछ बदला और सुधरा है इस बीच। देश की उपलब्धियाँ गर्वित करती हैं। आज भारतविश्व में अपनी एक उभरते देश की विशेष पहचान बना चुका है और एक ताकत की तरह उभर रहा है। कई कीर्तिमानहासिल किए हैं हमने धरती पर ही नहीं अंतरिक्ष में भी। यहाँ तक कि भगवान तत्व ढूँढने मेंभी हमारे वैज्ञानिकों की अहम् भूमिका रही है। पर धरती पर, हमारे अड़ोस-पड़ोस में, लाखों वैसे ही भूख से बिलखकर मर रहे है। खुद अन्न उगाने वाले किसान परिवारकापेट नभर पाने की वजह से आत्महत्या कर रहे हैं, मजदूर सड़कों और वर्क साइट्स पर दम तोड़ देते हैंऔर हम संज्ञा शून्य हैं उनके संघर्षमयजीवन के प्रति।
वैसे भी क्या बदल पाए हैं हम! सालों पहले विभाजित भारत-पाकिस्तान आज भी लड़े जा रहे हैं।आएदिन का दोषारोपण, गोलाबारी आम बात है । न तो कोई विभाजन रेखा से संतुष्ट हैं और ना ही अपने पडौसी से। कश्मीर अभी तक सुलग रहा है और चीन सामंतशाही रवैये के अन्दर हमारी सीमाओं को निगलता जा रहा है। घरों के अंदर परिवार और रिश्तों की डोर टूटती-सी नजर आती है।यौन अपराध की खबरें और और घिनौनी होतीजा रही हैं,बढ़ रही हैं और आपद्कालीन स्थितियों तक में बुरा हाल है, जैसा कि अभी हमारी सरकारों ने उत्तराखंड की आपदा में सिद्ध कर दिया है-
“वो 'गुजराती' को बचा रहे थे..वो 'बिहारी' बचाते रहे..!/जाने किस ओर से 'हिन्दुस्तानी' बह गया..!” गोपाल राठी।
बात यहीं खतम हो जाती, कैसे भी संभाल ली जाती।निपट लेता हर आसन्न खतरे से एक अरब से ऊपर की जनसंख्या वाला हमारा देश, अगर हमें प्यार होता एक दूसरे से, विश्वास होता एक दूसके पर। समस्या तो यह हैकिकोई भी खुश या सुरक्षित नहीं आज के इस आजाद भारत में। राजा, प्रजा, नायक, अभिभावक, देश काराष्ट्रपति तक नहीं । सभी को संरक्षण और आरक्षण चाहिए। बैसाखी और सीढ़ियां चाहिए। घुन-सा व्याप्त भृष्टाचार चाटे जा रहा हैदेश को भी औरइसकेचरित्र को। हर हाथ में आज पत्थर है और हर जुबान पर एक मुद्दा।चेहरे जाने कैसे-कैसे गुबारों से मटमैले हैं और हम हैं कि आइने ही साफ किए जा रहेहैं।
वजहें कई और कुछ भी हो सकती हैं। स्वतंत्र भारत में पली-बढ़ी जनता हो या नेता, प्रायःजिम्मेदारियोंअब अहसास हीन हैं। क्योंकि न तो कुर्बानियां दी गई हैंऔर ना ही पराधीनता का दुख झेला गया है। सुलभ इस संस्कृति में हर आदमी अपने पद और ओहदेका भरपूर फायदा ले रहा है, लेना चाहता है। वह शायद कोई और वक्त था, जबमूल्य भिन्न थे जीवन के। जब भारतीय चरित्रवान और गरिमामय थे और अपनी साफछवि में गौरव लेते थे। आदर्श और सिद्धान्तों के लिए हर त्याग आसान था उनके लिए। आज तो तिजोरियां भरने और स्वमूर्ति गढ़ने से ही फुरसतनहीं..किसी भी पद पर हों अफसर से लेकर चपरासी तक ...डॉक्टर, नेता, अभियंता, जज, पुलिस सब।हम भूल चुके हैं कि आजादीसिर्फ मनमानी उच्छृंखलता ही नहीं, साथ में जिम्मेदारी और कर्तव्यबोध न हो तो यही आजादीफिसलन बन सकती है , चोट दे जाती है-
' यहवह भारततो नहीं जिसके लिएलाखोंने शीश कटाए,जान गंवाई अपने ही खून काले आचमनचोला लाल रंगाया था यहवह भारततो नहीं जाने कब आएगीअपनी आजादी !'
व्यभिचार और बलात्कार, चोरी-चकारी और राजनीतिक तिकड़मों के चलते हत्याएँ आम खबरें हैं हमारे आजाद देश की। किस दुख और मलाल में उभरी थीं यह पंक्तियाँ कलम से, याद आते ही गर्दन शर्म और दुख से झुक जाती है।
बड़प्पन के गौरव में नहाना अच्छी बात है, पर ताकत के मद में डूबना नहीं।
हम अंतरिक्ष में चाहे जितने रौकेट भेजें; पर क्या देश की बुनियादी जरूरतों को, भूख, आवास और शिक्षा की जरूरतों को पूरा करना जरूरी नहीं? देश के भविष्य का आज भी एक बड़ा हिस्सा जो भूखा-नंगा सड़कों पर भटक रहा है, उसका पेट भरना, तन ढकना जरूरी नहीं ? किसी भी देश का गौरव और प्रगति (और संतोष भी) मुठ्ठी भर लोगों के वैभव से नहीं, आम आदमी की खुशहाली से नापा जाता है। कहीं बढ़ते भ्रष्टाचार और अपराधों में देशवासियों का यहआंख बंद करके अपना ही घड़ा भरने वाला रवैया तो जिम्मेदार नहीं, कबहमारा और हमारी सरकार का ध्यान इन बातों पर जाएगा और बाहर की चमक-दमक को भूल भारतवासी व भारतवंशी देश के उत्थान की दिशा में अग्रसर होंगे!कहते हैं सच्चा प्यार वही होता है जो खामियों के प्रति भी सजग रहे।
नफे-नुकसान की नपी-तुली संस्कृति में जी रहेहैं हम। एक हाथ दो, तो दूसरेसे लो। यही उपकार और परोपकार है। सारा दमखम छवि और तिकड़म का ही तो है। इसीलिए शायद आज भारत की पहचान इसका आध्यात्म और विवेक नहीं, बौलीवुडहै विश्व केआगे।कोई बुराई नहीं इसमें पर एक आत्माविहीन शरीर शिव तत्व को खोकर शव ही तोहै।
जैसा कि हर बदलाव के साथ होता है बहुत कुछ झरा और टूटाहै। विशेषतः हमारी आंतरिक संरचना और जीवन के मूल्य। भारतीय संस्कृति जोजुड़कर चलने, प्रेम और सद्भाव पर आधारित थी। करुणामयी थी , बड़ों का आदर करना, ध्यान रखना जानती थी, आज या तो सेक्स और शराब में डूब चुकी है या फिर सास भी कभी बहू थी जैसे कसैले घरेलू मुद्दों में उलझ कर रह गई है।पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित तेजी से बदल रही है,और जो काम कानहीं उसे बेरहमी से फेंक रही हैं...भाई-बहन, मां-बाप..रिश्ते, सद्भाव सभी को।
निश्चित ही आज का यह भृष्ट भारत हमारे सपनों का भारत नहीं। क्या खो गया है हमारे पास से जिसे ढूँढना ही होगा तकि एक बार फिर हम भारतीय होने में गर्व का अनुभव कर सकें। कभी नारायण दत्त तिवारी तो कभी राखी सावंत ..सस्ता मनोरंजन बहुत हो चुका।क्या हमनेऐसे ही स्वतंत्र भारत का सपना देखा था? यदि नहीं, तो क्या थाहमारासपना औरइन सपनों को पूरा करने के लिए हम क्या कर सकतेहैं? जबाव शायद इन फुंफकारते सवालों के फनों में ही कहीं उलझे-लिपटेहैं । देखना यह है कि हमारे राम और कृष्ण के देश में आज भी कितने साहसीऔर सूझबूझ वाले हैं जो पुनः कालिया मर्दन करसकें!
आज के भारत का असली मुद्दासामाजिक विषमताओं का है...विषमताएं कुछ प्रकृति देय और अधिकांश हमारीअपनी संवेदन-शून्यता की वजह से...अन्याय और कुरीतियों के आगे मूक समर्पण या हमारेस्वभाव की बेबसी की वजह से...या फिर चलने दो जैसे चल रहा है वाली पलायनवादीप्रवृत्ति की वजह से।..ऐठीमालिकाना प्रवृत्ति और रीढ़ की हड्डी हीन जी हजूरीवाले इस मानसिक प्रदूषण की वजह से। जाति वाद और अपना अपना धर्म व सम्प्रदाय के स्थापन केकुकुरमुत्ती भेदभाव की वजह से हम आजतक वैसे ही विपन्न और असमर्थ हैं जैसे किपरतंत्र भारत में थे, जिससे उबरने के लिए कभी हजारों नेजान दी थीं।
मानाहर परिस्थिति बस में नहीं होती, प्रारब्ध का बड़ा हाथ होता है जीवन में और फिर प्रकृतिभी तो बदल रही है , अप्रत्याशित परिवर्तन आसपास का मौसम ही नहीं हमारा जीवन भी दूभर कररहे हैं परन्तु इस कठिन वक्त में सिर्फ मौसम ही नहीं हम भी तो बदल रहे हैं...आत्मसंरक्षण के भय और दबाव तले मानवता खो रहे हैं...स्वार्थी और संवेदना विहीन होते जारहे है।
आज के अमानुष और ताकतवरसमाज के अनगिनित कुरूप और घिनौने कुकर्मों की सड़ांधअब तोकरीब-करीबपूरे हीविश्व को दूषित कर चुकीहै, और हम ही नहीं, आने वाली कई-कईपीढ़ियां हरज़ानाभुगतने को मजबूर हैं।बहुतकुछ बदल रहाहै और तेजी से बदल रहाहै। नजरिया हमारे मूल्य सभीकुछ।आज भौतिकता और ऐश्वर्य की अदम्य लालसा ही जीवन का ध्येय और शर्त बन चुकी नजर आती है औरनैतिकता वमानवीय मूल्य पिछड़ेपन की निशानी। सब चोरी कर रहे हैं और जबतक पकड़े न जाएं कोई भीचोर नहीं।अपने भारत में तोपकड़े जाने पर भी चोर नहीं। सफलताऔर ताकत ही प्रमाणपत्र है उँचे चरित्र के भी और ऊंचे ओहदे के भी।नेता याअभिनेता नहीं, चन्द धनाढ्यों की बात नहीं...कल का आम, लाचार और मजबूर आदमी भी अबत्वरित परिणाम चाहता है...कमा कर बराबरी नहीं कर सकता तो चोरी चकारी, लूटपाट याअपहरण किसी से भी नहीं हिचकिचाएगा वह ...जरूरत पड़े तो इस लालच में हत्या भी कर देगा...जैसा कि पहले थ्रिलर या हौरर मूवीज में होता था, क्योंकि उसने अपने हर आदर्श हर सिद्धांत को टूटते बिखरते देखा है, उनके सूत्रघार और ठेकेदारों तक को फिसलते देखा है।दौड़ में आगे रहने कीप्रवृत्ति नेकिसको धक्का दिया किसके ऊपर पैर रखकर आगे बढ़े; सबभुलवा दिया है।जब आदमी आदमियत के गौरव को ही भूलता जा रहा हैतोजिम्मेदारियों को कैसे याद रख पाएगा। ‘मैं ‘ का आकारइतना बड़ा हो गया है कि ‘हम’ ‘तुम’ सब विलुप्त हो चुके हैं। ध्यान न रखा तो यहहांफता भागता मैं भी थककर संज्ञाहीन होने में अधिक वक्त नहीं लेगा। इसकी बेचैनी औरहवस ही ले डूबेगी इसे।
बात बहुत पुरानी नहीं है, एक बहुत महत्वपूर्ण पद और प्रतिष्ठा केनेता जिनपर देश की बड़ी जिम्मेदारीथी, बातों ही बातों में पूछ बैठे थे -विदेश में बसे आप भारतवंशी क्या सोचते हैंभारत के बारे में ? और तब जबाव जो ध्यान में आया था आजआपके साथ बांटना चाहती हूँ - एक ऐसी इमारत जिसकी नींव खोखली हो चुकी है, और छत जर्जर...देखना यह है किबीचकी दीवारेंकबतक और कैसे संभली रहेंगी, याखड़ा रख पाएंगी इसे!
आप भी शायद जान-बूझकर अनजान बनें, पूछें -यह साहित्यिक भाषा समझ में नहीं आई- तो नींव यानी हमारा वर्किंग क्लास हमारे किसान और मजदूर...जो आज भीहड्डी-तोड़ मेहनत के बाद भी भूखे सोते हैं, बच्चों का, परिवार का पेट न भर पाने की ग्लानि में आए दिन आत्महत्या करने पर मजबूर हैं । और छत यानी हमारे शासक, अनुशासक, अभियंता औरउद्योगपति, जिनके सहारे देश चलता है ...चलना चाहिए ...जो कर्तव्यों को भूलते नजर आ रहे हैं, अपनी ही हवसभरने में लगे रहते हैं। फिर यह बीच की दीवारें , यानी चन्द ईमानदार और सच्चे देश के नागरिक जो जी जान से देश के हित में सब कुछ न्योछावर करने के जजबे पर जीते हैं, देश कीगाड़ी घसीट रहे हैं, कबतक गधों की तरह हर निठल्ले और नाकारों का भार ढोते, आक्रोश के ज्वालामुखी परधधकते हुए भी, शांत और संतुलित रह पाएंगे। छोटी-छोटी सुविधाएं भी नहीं इनके पास, जबकि नेता अभिनेता सब अरबों में खेल रहे हैं। इनके लिए तो कभी पानी गुम तो कभी बिजली गुल। दवा और खाने पीनों की मिलावट से तो आज हर भारतीय संपन्न हो या विपन्न, परेशान ही नहीं डराहुआहै।
खतरा बाहर से तो है ही, हमारे अपने अंदर से उससे ज्यादा है। एक जागरूक और संयत परन्तु दृढ़ हस्तक्षेप जरूरी है...समाज के आम आदमी, उसके रहन सहन, उसकी सोच, उसके साहित्य, उसके मनोरंजन सभी को जिम्मेदार होना पड़ेगा...नफे-नुकसान की बात भूलनी पड़े तो भूलनी होगी। ज़ाहिर है विश्वीकरण के इस युग में जीने के ही नहीं, रुचि और मनोरंजन के साधन भी बदल रहे हैं। स्पर्धा के मकड़ जाल में हरेक को कुछ नया परोसने और ढूंढने की अंधी चाह है।तुरंत की सफलता और लोकप्रियता कीतलाशमें विवेक और जिम्मेदारी दोनों ही बहुत पीछे छूट गएहैं, न सिर्फ लेखकों से, अपितुप्रकाशकऔर प्रस्तुतकर्ताओं से भी...आधुनिक तकनीकियों से सब कुछ तुरंत ही सामने आ जाता है। अच्छा बुरा सब। इन्द्रजाल भी अपवाद नहीं। हाथ पर हाथ धरेहम तमाशबीन बने बैठे हैं और क्रूरता व अश्लीलता के चित्र व विडिओ बाजारोंमें, इन्द्रजाल आदि परघूमते रहते हैं। आसानी से उपलब्ध हैं। जानेकिस आस या उपहास में आए दिन लगातार भेजे और दिखाए जाते हैं...चित्रजिन्हें आम आदमीदेखते ही आंखें बन्द करने पर मजबूर हो जाता है।
सोचने पर मजबूर हूँकि वाकई में कौन इन्हें देखना चाहेगा, औरआखिर क्यों कोई इन्हें दिखानाभी चाहता है ?...किसतरह केप्रभाव औरपरिणामकी अपेक्षा की जाती है इनसे...। क्या मानसिक न्यूनता औररुग्णता का नाम ही आज कला और साहित्य है। माना साहित्य तत्कालीन समाज का दस्तावेजहै पर भविष्य के प्रति इसके दायित्व को भी नहीं भूल सकता...हर यात्रा का पहलाकदम स्वयं से ही शुरु होता है और मंजिल स्वतः मिल जाती है, शर्त सिर्फ यही है कि हम सही दिशा की तरफदेख रहे हों।
शोषण और पोषण की इस संस्कृति में अपने आस-पड़ोस, समाजमें तोकुछ बदल नहीं पाए, विश्व की समस्याओं सेजूझकर क्या हासिल कर पाएँगेहम !
इंगितमात्र कर देने सेतो हल नहीं निकल आते। जबतक हर आदमी अपने कामोंऔर अभिप्रायोंकीजिम्मेदारी नहीं लेता किसी भी बदलाव की अपेक्षा बेमानी हीहै।न तो कहीं कोई डरा याशर्मिन्दा है, और ना ही किसी की यातना में कोई कमी आ पाई है, यादिला पाया है, तो सिर्फइनकटे सिरों की तस्बीरों और चिनगारी भरी बातों से क्या फायदा ! आज भीतो हम आँखेंबन्द करकेमलाई खा लेते हैं। आज भीतोलाठी वाला ही भैंस हांकता है और आज भी तो शेरकीखाल ओढ़े गीदड़ ही राज करते हैं; क्योंकि आज भी तो अच्छी तरह सेसब कुछजानने, समझनेकेबावजूदभीसमाज के अपराधी और भ्रष्टों काहीहम राजतिलक कर आते हैं; क्योंकि आजभी तोबस बातें ही आसानहैं।
अमीर हों या गरीब, ध्येय प्राप्तिही एकमात्र लक्ष्य और साधन दोनों हैं आज। यही वजह है कि आमरोजमर्रा की खबरे तककिसी भी डरावनी तस्बीर से कम भयावह नहीं। पहले जिन बातों को सुनने मात्र से आदमीलाल हो उठता था आज हम उन्हें अनसुना करना सीख चुके हैं। अभाव और अतृप्ति से हाराइन्सान या तो आक्रोश में हैवान बन जाता है या फिर शुतुर्मुर्ग की तरह रेत में अपनेआँख कान दबा कर असहाय और अनजान। दोनों ही स्थितियाँ हानिकारक हैं। जरूरत आज मानवीय गुणों को बचा कर रखने कीहै। विषम परिस्थितियाँ ही विवेक और धैर्य की कसौटी होती हैं विशेषतः उनके लिए जोप्रबुद्ध हैं, सक्षम हैं, समाज के लिए कुछ कर सकते हैं। धैर्य और संयम नहीं खोनाचाहिए, ना ही भरोसा और आशाही।
धूल झाड़ने और सोचने की जरूरतहै, क्योंकिजबावइसी समाज में हैं और हमारेअपने अन्दर हीहैं। इन्सानियत में विश्वाश पुख्ता रखने के लिएत्याग और सद्भावना की मिसालें आज भी यदा कदा सुनने को मिल ही जाती हैं । भारत एक विशाल और सुन्दर देश है और रहेगा। विविध संस्कृतियों की इन्द्रधुषी छटा से भरपूर यह देश आज भी विविधता में एकता का न सिर्फ संदेश देता है अपितु जीता हैऔर सारी घटनाओं और अफवाहों को भूलकर यूँ ही जीते रहना चाहिए इसे। कई तूफान पार किए हैं हमने, इस आधुनिकता की हवस और उच्छृंखलता से उबरने की शक्ति भी ढूँढ ही लेंगे, क्योंकि बहे जरूर हैं पर डूबे नहीं हैं।जीना अभी भी भूले नहीं हैं , आँसुओंसे भी मोती की चमक ढूँढ लेना आता हैहमें।
हमारी नदियाँ , पर्वत , रीति रिवाज जहां रंगों की अल्पना हैं .तीज-.त्योहार स्पंदन। सावन भादों तो दो ऐसे विशेष महीने हैं जब रिमझिम फुहारें ही नहीं, विभिन्न त्योहारों की बौझारें..गीत-संगीत, अंतस् सींच जाते है। नेह डोर से बांध जाते हैं।
कहते हैं दूरियाँ अहसास की कशिश को तीव्र कर देती है, फिर जननी और जन्मभूमि तो स्वर्ग से भी ज्यादा प्रिय और गरिमामय होती है। उसी स्वर्ग या सोने की चिड़िया को बाहरवाले ललचाई आँखों से देखें या क्षत्-विक्षत करने की कोशिश करें, तो भारतप्रेमियों का आहत होना स्वाभाविक ही है, चाहे वे भारतवासी हों या दूर जा बसे भारतवंशी। डरता है मन कि कहीं फिरसे कोई गलती न हो जाए। लदे पेड़ पर फल देखकर हर हाथ में पत्थर होते हैं। फिर ज्यादा फरक भी तो नहीं, पहले भी तो सोने की चिड़िया को ऐसे ही जाल में फंसाकर पिंजरे में बन्द कर लिया गया था, अब लोग फिर व्यापार करना चाहते हैं। सतर्क होना स्वाभाविक है। क्योंकि चाहे माली बेचे या खुद जाल में फंसे, भुगतना तो चिड़िया कोही है। आध्यात्म, स्वाभिमान औरसहिष्णुता...जीव मात्र के प्रति सद्भाव और करुणा ही शायद हमारी संस्कृति के मूलमंत्र रहे हैं। इन्ही के सहारे हमने दूसरों को जाना और अपनाया है और इन्हीने दूसरों की आँखों में भारत को अपनी विशिष्ट 'भारतीय' पहचानदी है...पहचान जिसका प्रतिनिधित्व राम और कृष्णही नहीं, गौतम व गांधी ने भी किया ...पहचान जिसका चेहरा आज विश्वीकरण की आँधी मेंकुछ-कुछ मटमैला-सादिख रहाहै।शायदप्रेमचन्दके शब्दों में बातकुछ और स्पष्टहो पाए;
‘जब तक साहित्य का काम केवल मनबहलाव का सामान जुटाना, केवल लोरियां गा-गाकर सुलाना; केवल आंसू बहाकर जी हल्का करना था, तब तक उसके लिएकाम की आवश्यकता न थी। वह दीवाना था जिसका गम दूसरे खाते थे। मगर हम साहित्य कोकेवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खराउतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन कीआत्मा हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो---जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदाकरे, सुलाए नहीं क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षणहै।‘
पर क्या हम जगने को तैयार हैं, जगनाचाहते हैं ? बात हताशा या निराशा की नहीं, जीवन की है। अपनों की है।मौत के बाद कोई वजह नहीं रहती, परन्तु जीने कीसौ वजहेंहैं।
लोकमान्य तिलक ने कहीं कहा था कि स्वाधीनता हर मानव का जन्मसिद्ध अधिकार है और गांधी जी ने कहा था कि स्वाधीनता सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। अधिकार और निर्वाह दोनों की ही समझ और सूझबूझ होनी चाहिए । अधिकार की बात तो याद रह जाती है पर जिम्मेदारी और कर्तव्य को सब भूल जाते हैं। भारतवासियों के साथ तो लगता है बहुत तेजी से यह हो रहा है। गरीब किसान आत्महत्या कर रहे हैं, हजारों भूखे मर रहे हैं और अनाज सड़ रहा है, क्योंकि उसे रखना या तो आता नहीं, या फुरसत नहीं। नन्हे बच्चे बूंद-बूंद को तरसते रहें पर अब भारत में भी कीमत सुनिश्चित रखने के लिए लाखों टन दूध सड़कों पर बहा दिया जाता है। स्कूल, अस्पताल, सरकार, गद्दी सब एक धंधा है और करोड़ों इधर-उधर करने का जरिया। भ्रष्टाचार जडें खोखली कर चुका है, तो लालच शील और सदाचार के छप्पर को भारतवासियों के सिर पर से ले उड़ा है। और सबकी आँखें बन्द हैं। बिल्ली जो मलाई खा रही है उसकी भी और चूहे जिन्हें वह दबोचे हुए है, उनकी भी। भष्टाचार समाज के तानेबाने में दीमक की तरह लग चुका है और हम सब कुछ सामान्य मानकर लापरवाह हैं। बोट-बैंक समझी जाने वाली जनता सिर्फ बोट-बैंक ही है, जिसका ध्यान नेताओं को बस चुनाव के समय ही आता है। जहाँ जननायक स्वार्थी हों और रक्षक, शिक्षक सभी बिके हुए, उस देश की आंधियों और अवसरवादियों से कौन रक्षा कर पाएगा? बारबार हम क्यों उपहासात्मक परिस्थितियों में ही पहुँच जाते हैं. चाहे कौमन वेल्थ गेम की बात हो या फिर ठेके पर चल रहे अन्य सरकारी कामों की जैसे कि मिड डे मील या आपद काल में राहत का काम, देश की भ्रष्ट कीचड़ और फिसलन की खबरें तुरंत ही चारो तरफ गूंजने लग जाती हैं। क्षुब्ध करती हैं।
शिवमंगल सिंह सुमन जी की कविता की ये पंक्तियाँ बारबार याद आती हैं,
प्रकृति के महत्त्वपूर्ण अंगों में बादल, पर्वत, नदी, जमीन, मिट्टी, पहाड़, पौधें, फूल, फल, अग्नि, सूर्य, चंद्र... आदि का समावेश होता है। हमारे आस-पास जो भी होता है वह प्रकृति की देन है। मनुष्य हमेशा प्रकृति की गोद में अपने आपको सुरक्षित मानता है और उसी के बलबूते पर अपना विकास करता है। विज्ञान के लिए भी मूलाधार प्रकृति ही है पर आज इंसान ने हर जगह पर प्रकृति में हस्तक्षेप किया है तो परिणाम तो भूगतने ही पडेंगे। भारत में भी और विश्व स्तर भी आबादी इतनी बढ़ रही है कि इंसान घास-फूस हो गया है और कीडे-मकौडे की मौत मारा जा रहा है। प्राकृतिक मौत स्वीकार्य है पर दुर्घटनाओं एवं आपदाओं में आई मौत हमेशा पीडा देती है और उसे स्वीकारना भी मुश्किल होता है। केदारनाथ के बहाने हो या अन्य किसी बहाने, जो आपदाएं आती है उससे मनुष्य अंदर बाहर हील जाता है, पीडित होता है, दुःखी होता है। ऐसी घटनाओं को ध्यान में रखकर उचित कदम उठाने की जरूरत है। भारत जैसे भरपूर और अमर्याद आबादी वाले देश में तो इसकी पहल होना बहुत जरूरी है। अमरिका जैसे विकसित राष्ट्र की कम आबादी और उचित इंतजामों के चलते बडे शहरों के भयानक हादसों में भी मानवीय हानि कम होती है। जापान और अन्य सावध देशों में भी यहीं स्थिति है। सोचना पडेगा वे देश करते हैं तो हम क्यों नहीं? उनसे हमें कुछ सीख प्राप्त हो सकती है तो थोडा प्रयास कर देखे। प्रबल इच्छाशक्ति, उचित पहल, राजनीतिक मनोकामना, सरकारी ईमानदारी और इंसान की सोच में परिवर्तन हो तो मुमकिन है। सामान्य तौर पर सोचे तो भारत में तीर्थस्थलों की शांति नष्ट हो चुकी है, चाहे किसी भी जाति-धर्म के हो, उसका कारण एक ही है ऐसे स्थलों में मानव का अवांछित हस्तक्षेप। इंसान जिन स्थलों को पवित्र और पाक मानता है वहीं जाकर सबसे ज्यादा गंदगी फैलाता है। जहां इंसान पहुंचा वहां प्रकृति की शांति और पवित्रता नष्ट हुई तथा कुछ न कुछ अघटित के संकेत मिलेंगे ही।
देश बढ़ रहा है और दुनिया भी बढ़ रही है। इस होड़ में सबसे ज्यादा हमले प्रकृति पर ही किए जा रहे हैं। विविध मंचों, पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्य में इस पर बार-बार चिंता जताई गई है। प्रकृति के भीतर हरियाली हमारी संवेदनाओं को जैसे जगाती है वैसे ही जैसे इंसान की नजर ऊपर उठती है तो बादलों के विविध रूप हमें आकर्षित करते हैं। हिंदी साहित्य और कविता के क्षेत्र में बादल पर केंद्रित कई कविताएं लिखी पर यहां मेरा उद्देश्य उसके माध्यम से मानवीयता, इंसानीयत, आपत्ति व्यवस्थापन, जाति-धर्म, सूखा, एकता, राष्ट्रप्रेम, समता, सर्वधर्म समभाव, प्रकृति की लूट, सभ्यता और संकृति का तहस-नहस होना आदि पर प्रकाश डालना है। उत्तराखंड़ के पर्वतीय इलाके में बादलों का फटना और उससे केदारनाथ के आस-पास के इलाके में जान-माल का हजारों-करोडों में नुकसान होना मनुष्य के सामने एक बादल कई सवाल खडे कर देता है।
1. बारिश
बादल पहले भी थे, अब भी है और भविष्य में भी रहेंगे, बारिश का भी वैसे ही है। बादल का फटना भी जारी रहेगा, बारिश का कहर और पर्वत का गिरना भी जारी रहेगा। पर बादल और बारिश हमें पूछ रहे हैं कि ‘भीड़ बनाकर बेपरवाह रहने की इजाजत तो हमने नहीं दी थी।’ भारत की करोड़ो की रिकार्डतोड़ आबादी और हुजूम-भीड़ बनाने का तरिका गैरमतलब है। शिर्डी, पंढ़रपुर, त्र्यंबकेश्वर, अमरनाथ, केदारनाथ, हृषिकेश, वाराणसी, जगन्नाथपुरी, बालाजी... जैसे तीर्थस्थलों में रोज-रोज भक्तों की भीड़ इकठ्ठा होती है, बिना किसी आवश्यक इंतजाम के, भगवान भरौसे। बिना किसी मतलब के। कबीर सोलहवीं शति में कहकर गए ‘मोके कहां ढूंढ़े बंदे’ मैं तो तुम्हारे अंदर हूं पर हम अपने अंतर में झांके तो भारतीय कैसे कहे जाएंगे? केदारनाथ में बरसी बारिश और बहे पत्थर, पहाड़। प्रश्न उठता है यह बादल आए कहां से।
"कहां से आए बादल काले?
कजरारे मत वाले!
शूल भरा जग, धूल भरा नभ,
झुलसी देख दिशाएं निष्प्रभ
सागर में क्या सो न सकें यह
करुणा के रख वाले?"
(कविता – ‘कहां से आए बादल काले’ – महादेवी वर्मा)
हालांकि आखों के आंसू और बादलों के पानी का नजदीकी संबंध है। विविध भाव-भावनाओं को लेकर आता है दूसरों के दिलों में संवेदनाएं जागृत करने वाला भाव ‘करुणा’ भी बादलों से संबंध स्थापित करता है। प्राकृतिक और शास्त्रीय आधार पर बादल कैसे भी किसी भी रूप में निर्माण हो परंतु जैसे खुशी को लेकर आता है वैसे दुःख और पीडा को भी। जरूरी है भविष्य में सावधानी बरते।
2. सूखा
सूखे का कारण भी बादल ही और उसका न बरसना। बादल इंसान तो नहीं कि कहे तो बरसे और कहे तो रूके। प्रकृति के अनुकूल परिवेश और उसका समतोल उसको नियंत्रित करता है या बनाए रखता है। अगर इंसान होने के नाते हम अनियंत्रित हुए तो बादलों से कौनसे मुंह हम नियंत्रण की अपेक्षा कर रहे हैं। महाराष्ट्र ने पिछले दो साल से जो भोगा है; विशेष रूप से मराठवाड़े ने, वह दयनीय और दर्दनाक है। सूखे की मार इतनी जबरदस्त पड़ी कि सारी बनी-बनाई खेती और फलों के बगीचे नष्ट हो गए अब इसे दुबारा निर्माण करना हो तो सालों लगेंगे। अनाज वाली फसलें इस साल नहीं तो अगले साल उग सकती है पर फलों के बगीचे वाले पेड़ तो संभव नहीं। इससे किसानों की कमर टूट गई है। पिछले दस सालों में कई भारतीय किसानों ने कर्ज तले आत्महत्याएं की। जिस देश को कृषि प्रधान देश कहने में हम थकते नहीं, वहां एक किसान का मरना और आत्महत्या करना भी अपने घर की गमी जैसा है पर हमारी सारी संवेदनाएं पत्थर हो चुकी है। पास-पड़ौस की घटनाएं हमें अपनी लगती नहीं और उस पर हम सोचना भी नहीं चाहते। एक जगह पर सूखा, दूसरी जगह पर अनावश्यक बारिश क्या सूचित करता है। प्राकृतिक विविधता है तो इंसान अपना दिमाग वहां पर लगाएं। नदी जोड़ प्रकल्प कहां गायब हो गए; क्यों रूके। भारत राज्यों में बंटा देश और उन राज्यों में अलग-अलग पक्ष-पार्टी की सरकारें बिना माने संपूर्ण देश क्यों नहीं माना जाता। एक व्यापक और केंद्रीय योजना क्यों नहीं बनती। कोई योजना बनने से पहले हजारों दलाल उसे लूटने के लिए तैयार होते हैं। रेल, रास्ते, बिजली, पानी... जैसी मूल बातों को राष्ट्रीय स्तर पर ईमानदारी से विकसित करें तो भारत का कोई सानी नहीं। फिर बादलों को कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी -
"बरस जा रे, बरस जा ओ दुनिया के
सुख संबल।
पड़े हैं छाती चीर कर
नाले-नदी सूने।"
(कविता – ‘उठे बादल, झूके बादल’ – हरिनारायण व्यास)
प्रकृति में अपने-आप बैलंस होगा। विकास हो पर प्रकृति को पूछकर, उसकी इजाजत लेकर, उसके नफे-नुकसान को ध्यान में रखकर। ध्यान रहे इस दुनिया में अपना कुछ है नहीं, जो है वह सारा का सारा प्रकृति का है।
3. धर्म-जाति और द्वेष
प्राकृतिक विविधता जैसे, वैसे ही धर्म और जातिगत विविधता, गर्व करने लायक। पर फिलहाल यह भी हमारे देश की एकता पर प्रश्न चिह्न निर्माण करती है। लगता है धर्म-जाति का द्वेष देश की एकता पर काले बादल मंड़रा रहा है। धर्म-जाति के अनावश्यक प्रेम में आदमी अंधा होता है और सारी इंसानीयत तार-तार कर देता है। जो बात तीर्थ स्थलों के अनावश्यक भीड़ की वैसे ही धर्म-जाति के तहत अनावश्यक भीड़ की, अंधेपन की। आजादी के पहले भी और बाद में भी ऐसी स्थितियां कई बार निर्माण हो गई जिसमें मानवीयता को कटघरे में खड़ा किया गया।
"काले बादल जाति द्वेष के,
काले बादल विश्व क्लेष के,
काले बादल उठते पथ पर
नव स्वतंत्रता के प्रवेश के!
X X X
देश जातियों का कब होगा,
नव मानवता में रे एका,
काले बादल में कल की,
सोने की रेखा!"
(कविता – ‘काले बादल’ – सुमित्रानंदन पंत)
ठीक है भूतकाल में जो भी हुआ वह घट चुका है, बदला तो जाएगा नहीं पर घटनाओं का पूनर्मूल्यांकन कर भविष्य में वह पूनरावृत्त न हो इसका ध्यान रखा जाना चाहिए। देश में कई जातियां और धर्म है उसे माने, पर चिपककर रहना गैरजरूरी है। जरूरत है जाति-धर्म विहिन व्यवहार की। प्राचीन परंपराएं और संस्कृतियां मिट रही है; अतः दहलिज को पार करते ही अपने निजी अस्तित्व का चोला उतार कर आए और सामाजिक जिम्मेदार व्यक्ति बने। हमारी एक कृति कितनों का लाभ करा रही है सोचे, नहीं सोचे कोई फर्क नहीं पड़ेगा पर कम से कम इतना तो सोचा जा सकता है कि हमारी एक कृति से किसी का नुकसान न हो।
4. परिवर्तन
प्रगति का स्थायी तत्व है परिवर्तन। रोज नई सोच, नया विचार, नई कृति। अच्छे में सबसे अच्छा, विकास में सबसे अधिक विकास, मानवीयता में अधिक मानवीयता, प्रेम में सबसे अधिक प्रेम हो। इंसानीयत, मानवीयता, एकता, राष्ट्रप्रेम, समता, सर्वधर्म समभाव... सबसे अच्छा हो। इंसान दर इंसान बदला जा सकता है। देश दुनिया के बारे में टिप्पणी करना सहज होता है कारण उसमें हम अपने आपको मानते नहीं? अर्थात् परिवर्तन और अच्छे की जरूरत भी महसूसते नहीं। अतः देश दुनिया का सोचने से पहले व्यक्ति अपने भीतर परिवर्तन कर ऐसे हादसें न हो और इन जगहों से दूर रहे के लिए ‘मैं’ क्या कर सकता हूं सोचे। मानसून के उतरने से और बादलों के बरसने से सारी प्रकृति में परिवर्तन होता है तो घटनाओं के गुजरने से इंसान में परिवर्तन अपेक्षित है।
"जहरी खाल पर
उतरा है मानसून
भिगो गया है
रातों रात सबको
इनको
उनको
हमको
आपको
मौसम का पहला वरदान
पहुंचा है सभी तक...।"
(कविता – ‘मानसून उतरा है’ – नागार्जुन)
बस जरूरी है प्रकृति से पाए प्रत्येक वरदान को अपने हाथों में बड़े प्यार से संभाले। बुद्धि, भाषा, वाणी, विज्ञान... हजारों वरदान हैं, उन्हें अंजुलियों में संभालकर भविष्य का सोचे तो परिवर्तन जरूर होगा। समय-समय पर जो गलतियां हो गई उन पर शंकाएं उपस्थित कर, विवाद कर इंसान को जागृत होना पड़ेगा।
"समय की शंकाओं पर विवाद करो
समाधान सोचकर अलख जगाओ।
स्व उत्थान से ही नवयुग आता है
औ’ कल्पित स्वर्ग सच हो जाता है
निद्रा है टूटेगी, तीव्र घात करो
कोमल अंगों पर वज्रपात करो।"
(कविता – ‘निद्रा है टूटेगी’ – अमरिता तन्मय)
निष्कर्ष
हमारा देश जिसे सोने की चिडिया कहा गया, वैसे ‘सोने को बहुतों ने लूटा है’ पर जो भी बचा है उसको ध्यान में रखते हुए विकास को बनाए रखना भी जरूरी है। सबसे पहली जरूरत है बढ़ती आबादी और भीड़ को काबू में करने की, समय रहते सजग होने की और बुनियादी निर्णय लेने की। धर्म, जाति, राजनीति से ऊपर उठ देश को केंद्र में रखकर पहल करने की आवश्यकता है। जब समय हाथ से निकल जाएगा तो पछताने से कोई लाभ नहीं। बादल के माध्यम से देश, दुनिया, मानवीयता, इंसान, प्रकृति, सभ्यता, संस्कृति... के बारे में व्यापक चिंतन और चर्चा हो और इंसान सही रास्ते पर चले यहीं अपेक्षा।
प्रकृति सबसे ताकतवर है महाकाल रूप में। ईश्वर हो न हो पर प्रकृति जरूरी है। इंसान की सुन्न आंखें उसका रौद्र रूप केवल देख सकती है। जरूरत है मिन्नतों की अपेक्षा, ईश्वर भरौसे बिना रहे आंखें खोल अपनी सुरक्षा के बारे में सोचने की। केदारनाथ जैसी सारी घटनाएं-विपदाएं आह्वान है और बिना सुरक्षा के इंतजाम किए भगवान भरौसे वहां या वैसी जगहों पर जाना खतरों से भरा है। हमारी सुरक्षा का ठेका ईश्वर या प्रकृति ने थोडे ही लिया है। हमारे देश में फैशन बन चुका है कि सबकुछ हम करते हैं और उंगली उठाते है ईश्वर पर। बेचारा मूर्ति से बाहर आकर जवाब नहीं दे सकता ना। अगर मूर्ति से बाहर आ जाता तो थप्पडों और घुसों से हमें लाल-पीला करने में कोई कसर नहीं छोडता। सरकार को दोष देना, ईश्वर को दोष देना बडा आसान बन गया है। बेवजह की भीड, तीर्थ यात्राएं, मंदिरों के आसपास होम हवन से बचे सामान का कचरा और गंदगी फेंकना, प्रकृति पर आक्रमण करना कोई इंसान से सीखे। खुद हजारों अपराध कर भगवान और प्रकृति को कटघरे में खडा करना अन्यायकारक है। रक्षा का आह्वान किया जा सकता है पर वह ईश्वर को नहीं तो भीतरी सजगता वाले शिव को।
खाने की टेबल पर खाना लग रहा था। बेटी बगल के कमरे में बैठी पढ़ कम, टेलीविजन ज्यादा देख रही थी और वह धुले कपड़ों को तह कर-करके अलमारी में रख रही थी कि अचानक ही माली दौड़ता आया और आने वाले प्रकृति के कोप से सचेत रहने की चेतावनी देने लगा। भय और बदहवासी में साफ-साफ कुछ बता भी तो नहीं पा रहा था वह, सिवाय उसी एक बेसुरी रट के, ‘ प्रलय होगा मेमसाब आज! ..प्रलय। चारो तरफ बस यही शोर है । पूरे पंजिम में यही शोर है। ‘
अल्वा की नजर खुद-ब-खुद खिड़की के बाहर चली गई। आकाश पर चीलों मंडरा रही थीं और इक्के दुक्के कुत्तों के रोने की आवाज भी आ रही थी... वहीं पास से ही, कहीं।
’चुप कर।’ कहकर लौटा तो दिया, पर माली की आँखों में फैले भय ने बाध्य कर दिया था अल्वा को कि वह भी अब बचाव के लिए कुछ करे। इन अपशगुनों पर ध्यान दे। अब तो टेलिविजन पर भी खराब मौसम और तूफान की ही चेतावनी थी। जरूरत से ज्यादा ऊंची लहरों का अंदेशा था ... शायद सुनामी भी।
जैसे तैसे कुछ जरूरी चीजों को समेट, तुरंत ही छत पर जा पहुंची तब अल्वा।
...एक रात की ही तो बात थी। लहरें उछाल भले ही मार लें, समुद्र कभी मर्यादा नहीं तोड़ता, जानती थी अल्वा। पूर्वा के साथ एक आरामदेह बिस्तर लगा कर सोने की अच्छी तैयारी कर ली थी उसने। पसंदीदा संगीत, मैगजीन सबकुछ था उसके पास, फिर भी एक अनचीन्हा भय मन को कुतरे जा रहा था और आगत् विप्लव के पदचाप मानो रह-रहकर चौकस करने लगे थे उसे।
’जो होगा, देखा जाएगा। फिर ईशू तो है न सुरक्षा के लिए।’ बारबार यही कहकर मन-ही-मन समझा ले रही थी वह खुद को भी और भयभीत पूर्वा को भी।
खाने के बाद शांति से शाम की फिल्म देखना चाहती थी अल्वा, इसलिए जल्दी-जल्दी सब काम निपटा लिए थे, अच्छा ही हुआ जो रोटियां भी सेक ली थीं उसने, क्योंकि अब घर में चारोतरफ घुप्प अंधेरा था। बिजली जा चुकी थी और भयभीत आंखों से नींद कोसों दूर जा छिटकी थी । जैसे-जैसे भय को दूर धकेलती वह, वैसे-वैसे हाथ-पैर और-और शिथिल होते जाते।
क्रोधित लहरों की फुंकार जल्दी ही बहुत पास से सुनाई देने लगी और तब घबराहट में जाने कहां खो गई थी घर की हर चीज; जितना हो पाया, जो ले पाई, वही बहुत था अब तो परेशान और डरी अल्वा के लिए।
अभी, कुछ घंटे पहले ही तो दूरदर्शन पर संभावित तूफान की खबर आई थी ...और इतनी जल्दी सबकुछ बदल भी गया! अल्वा तेजी से बदलते मौसम से जितना ही सुरक्षित होने की कोशिश करती, शंका के बादल उतने ही गहराते जाते।
अब बाहर की दुनिया से पूरी तरह से कट चुकी थीं, दोनों मां-बेटी। कोई इन्टरनेट या मोबाईल काम नहीं कर रहा था, जिसके सहारे वे वापस जुड़ सकतीं। ...फोन, टेलीविजन, रेडिओ, मोबाइल कुछ नहीं थे अब उनके पास दुर्भाग्य की यह कहानी कहने या मदद मांगने को । न कोई खबर मिल सकती थी और ना ही वो ही कोई सूचना दे सकतीं थीं। अब ये आधुनिक तत्कालीन सुविधाएँ एक असाध्य सपना थीं उनके लिए। सहायता मांगना तो दूर जो उनके साथ घट रहा था, उसे एक-दूसरे के साथ तक तो बांट नहीं पा रही थीं वे ।
भय ने टेंटुए भींच दिए थे दोनों के। यूँ कहा जाए तो ज्यादा सही होगा कि सुरक्षा के चन्द आम जरूरी कवचों के नाम पर विध्वंस के उस क्रुद्ध पल में अब कोई सुरक्षा-कवच या सुरक्षित स्थान नहीं था उनके पास, न तो घर में ही और ना ही मन में..। लकवा मारी सी अपंग मूक दृष्टा थीं अल्वा और पूर्वा। थोड़ी राहत अल्वा को बस एक इसी बात की थी कि दिनभर की थकी पूर्वा को गोदी में सिर रखते ही, सान्त्वना और थपकी देते ही नींद आ गई थी ।
शाम से ही लगातार समुद्री चिड़ियों का हृदय विदारक चीत्कार और जानवरों का दारुण रुदन साफ-साफ दिखाई और सुनाई दे रहा था अल्वा को। न देखना चाहे तो भी, न सुनना चाहे तो भी। मानो मौत के इस काले साये को आदमियों से पहले ही पहचान लिया था इन्होंने।
अल्वा की पथराई आंखें अब प्रहरी-सी सचेत थीं। जब हाथ को हाथ तक न सूझे वह देख पा रही थी कि अंधेरे को चीरती लहरें घर में दरवाजा तोड़कर घुस आई थीं और क्रुद्ध फुंकार के साथ जल्दी-जल्दी सब कुछ समेट रहीं थीं। बर्तन-भांडे, कुर्सी, सोफा, सभी कुछ तो समाता जा रहा था उनकी हाहाकारी झोली में। विनाश का ऐसा ताण्डव, वह भी घर के मजबूत आबनूसी दरवाजों को तोड़कर, 100 गज दूर बहते शान्त-गम्भीर समुद्र द्वारा, अल्वा वाकई में बहुत भयभीत थी अब।
देखते-देखते फटी आँखों के आगे ही, क्रोधित लहरों ने अब तो सीढ़ियाँ तक चढ़ना शुरू कर दिया था; मानो भयभीत अल्वा और पूर्वा को ढ़ूँढ़ कर ही दम लेंगी; अल्वा जानती थी कि अगर विप्लव का यही तांडव रहा तो कुछ ही घंटों में यह छत भी सुरक्षित स्थान नहीं उनके लिए। घर के आगे पीछे का रास्ता तो पहले ही डूब चुका था। पानी की गहराई कितनी है नहीं जानती थी अल्वा, पर यदि लहरों ने सीढ़ी चढ़ना शुरू कर दिया है तो कम-से-कम दस पंद्रह फीट तो अवश्य है ही। तैरना संभव है अगर हिम्मत और ताकत साथ दें तो। पूर्वा भी तैरना जानती है, पर कबतक और कितनी दूर तक, यह नहीं जानती थी अल्वा और क्या वह दोनों यूँ लगातार इस वेग के साथ या खिलाफ तैर भी पाएंगी ?
हर आपद कर्म के लिए शरीर और मन को तैयार कर रही थी अल्वा, एक दृढ़ और जुझारु संकल्प के साथ। चोर नजरों से अपनी और पूर्वा के हाथ पैरों की ताकत और मन की शक्ति को समझती और बारबार तौलती, प्रार्थना पर प्रार्थना किए जा रही थी भगवान से कि 14 वर्ष की उम्र तो बहुत ही कम होती है,...कम-से-कम पूर्वा को तो बख्श ही दें वह इन नागिन-सी फुंकारती लहरों से।
घर के बाहर मजबूती के साथ लाइन में खड़े ताड़ के पेड़, जमीन में गहरे धंसे बिजली के खंबे, सभी को तो ढूँढ-ढूँढकर उखाड़ रही थीं वे लहरें, बहाए ले जा रही थीं सब कुछ अपने साथ। फिर छत के एक कोने में धंस कर बैठी अल्वा और पूर्वा की क्या औकात थी। अगल-बगल कोई घर नहीं था सिवाय उस पुरानी पुर्तगाली रोमन कैथोलिक चर्च के। कितना गर्व था एकान्त प्रिय अल्वा को अपने घर की इस चित्र-सी मोहक प्राकृतिक संरचना पर। पर आज कितना पछता रही थी वह यूँ समुद्र के इतने पास घर चुनने के लिए।
शुरु से ही भला लगता था उसे शयनकक्ष की खिड़की से समुद्र की लहरों को अठखेलियां करते देखना, पर आज वही लहरें कितनी विद्रूप थीं, मानो मौत खुद लहरों का रूप लेकर दर-दर घूम रही थी, हर जीवित प्राणी को निगलने और मिटाने के लिए। सही कह रहा था माली, शायद यही प्रलय है। सृष्टि का अंत है। ढोर, जानवर, पक्षी सब इनकी चपेट में... अब नहीं बचेगा कोई। पूर्वा को लेकर सुरक्षित स्थान की तलाश में रात से ही छत पर वह सिकुड़ी-सिमटी बैठी है, बेटी को कसकर सीने से लगाए और एक छोटी –सी गठरी में चन्द रोटियाँ और जितने आसानी से हाथ में आ सके...वे चन्द पैसे-सिक्के लेकर। अल्वा नहीं जानती कि सामने फुंकारती मौत अब इन्हें इस्तेमाल करने का मौका देगी भी या नहीं, पर इन्तजाम तो करने ही पड़ते है! उसका और बेटी का जीवन अब वाकई ईशू के ही हाथों में ही था। किससे सहारा ले...किस तक मदद की गुहार लगाए नहीं जानती थी वह। कोई सहारा नहीं था वहाँ पर, न घर का और ना ही गृह-स्वामी का। वह तो अच्छा ही था कि रौबर्ट रोहन को स्कूल छोड़ने मुंबई जा चुके थे और ईशू की दया से सुरक्षित थे बाप-बेटे, इस घर, इस शहर, इस समुद्र के किनारे से दूर। वरना दो और अपनों की सुरक्षा को लेकर असहाय और बेचैन अल्वा और क्या कुछ कर लेती, सिवाय बैठकर ऐसे ही डरने और घुटने के... मौत से जिन्दगी की भीख मांगने के। काश् पूर्वा की छुटटियाँ भी चार दिन पहले ही खतम हो गई होतीं, तो कम-से-कम आँखों के दोनों तारों में से एक के टूटने या डूबने का भय तो न सालता रहता उसे!
सुबह तक तो जरूर ही सब शान्त हो जाएगा यही सोचकर छत पर आई थी अल्वा बेटी को सीने से लगाए। वैसे भी घर ऊँचाई पर था और अंग्रेजों के जमाने की बनी एक मजबूत और सशक्त इमारत थी।..उसकी समझ में इस तरह के खतरों को सहने की ताकत थी इसमें। वह कब जानती थी कि घर जो आजतक उसका एक सुरक्षित किला था, अचानक ही, मौत की एक डरावनी सुरंग बन जाएगा और इसमें से केवल अब ये बेहद खौफनाक और असह्य लहरें ही अन्दर-बाहर आने-जाने का अधिकार रख पाएंगीं, या समर्थ थीं।
बर्तन भांडों के साथ मेज कुर्सी ही नहीं, खिड़की, दरवाजे सभी बहे चले जा रहे थे। भय-विस्मित, निष्पलक आँखों से अल्वा देख रही थीं कि कैसे उन चन्द लहरों ने पूरा-का-पूरा घर ही बहा-बहाकर ओझल कर देने की ठान ली थी।
“पूर्वा बेटा, इस खिड़की को कस कर पकड़े रहो, चाहे कुछ भी हो जाए, इसे छोड़ना नहीं ।“ डबडबाई आँखों से बेटी को निष्पलक देखती आधी-घबराई, आधी रोई-सी बोली थी तब, अल्वा।
छत तक पानी बढ़ता देखकर अर्धविक्षिप्त-सी अल्वा बेटी को संयत करने का जितना ही प्रयास करतीं, पूर्वा की आंखों में उतना ही भय गहराता जान पड़ता और नतीजा यह हुआ कि इस विषय पर एक गहरी चुप्पी साध ली माँ-बेटी ने। रात तो कैसे भी अनर्गल कहानी किस्से और चुटकुलों में और अंत में भजन व प्रार्थना में निकल गई, परन्तु सुबह बेटी से दूर जाने से चन्द पल पहले ही, बेहद थर्राती आवाज में यही आखिरी चेतावनी दे पाई थीं अल्वा पूर्वा को, “ याद रहे कुछ भी हो...(कुछ भी का मतलब, कुछ भी) ये खिड़की की सलाखें मत छोड़ना। मेरी बहादुर बेटी हो ना, तुम!”
बारबार आँसू भीगे बालों को चेहरे से पीछे हटाते हुए इतनी ही तो तसल्ली दे पाई थी मां उसे और आंसुओं से रुंधे गले से निकली वह फसफसी आवाज बहुत ही धीमी और कराहती-सी जान पडी थी तब पूर्वा को । शायद कभी भूल भी न पाए वह माँ की उस आखिरी उदास आवाज को। खिड़की के बीचोबीच बिठाकर कंधे पर लिपटे शौल से बाँध दिया था फिर अल्वा ने उसेः अपनी समझ से एक अतिरिक्त सुरक्षा के लिए। मानो वह चौदह की नहीं चार साल की बच्ची हो उनकी। पूर्वा ने भी यंत्रवत् ही सही, करने दिया था मां को सबकुछ जो भी वह करना चाहती थीं। पूरा विश्वास जो था उसे अपनी मां पर । ...माँ ने भी कब रोहन और उसकी सुरक्षा और सुविधा के अलावा कुछ और सोचा या चाहा था- भलीभांति जानती थी पूर्वा।
आंसू भीगे होठों से बेटी के पूरे चेहरे पर कई प्यार भरे चुम्बन देकर उसे कसकर अपनी बाजुओं में जकड़कर आगत् का इन्तजार करती फटी आंखों से अपने भयावह भविष्य को टोह रही थी अब अल्वा।
खिड़की तक पानी अभी पहुंच नहीं पाया था। पर अल्वा जानती थी कि अगले पल ही, कभी भी पानी खिड़की तक पहुंच सकता है। एकमात्र यह खिड़की ही तो सहारा रह गई थी मां-बेटी की...खिड़की जिसके बाहर से भी, राहत के नाम पर बस, दहाड़ मारते समुद्र का डरावना विस्तार ही दिखाई दे रहा था। तब खिड़की दोनों हाथों से कसकर उसे पकड़ाकर, वह खुद भी तो उसके पीछे खड़ी हो गई थीं, उसे कसकर पकड़े हुए..एक दुशाले-सी ही खुदको भी उसपर लिपटाती-लिभड़ाती-सी।
पूर्वा को पूरी तरह से अपने में समेटकर उसके चारो तरफ एक अतिरिक्त सुरक्षा-कवच बना लिया था अब अल्वा ने।
और तब तुरंत ही उनकी सहमी आंखों के आगे ही घर की छत का वह कोना, आधे वरांडे का छोटा सा उठा हुआ वह टुकड़ा भी अचानक चरमरा कर टूटा और अन्य चीजों की तरह ही पानी में बहने लगा। अंत इतना नजदीक है कब सोचा था अल्वा और पूर्वा ने।
शाम से ही आपद अनहोनी के आभास से अल्वा का मन बेचैन था। जानवरों की तरह जलजले को सूंघती, एक सुरक्षित कोने में पहुंचने को बेचैन थीं दोनों मां बेटी, पर वह प्रलयंकारी पल इतना निठुर था कि इसकी भी इजाजत नहीं दे रहा था उन्हें । एक और तेज लहर का झोंका आया और खिड़की के आगे वाले हिस्से के साथ-साथ ही मां को को भी पूर्वा की पकड़ से छीनकर बहा ले चला इस बार। शायद मां-बेटी दोनों को ही एक हलकी-सी झपकी आ गई थी विनाश के उस अनहोने पल में। फिर तो बस एक भयावह चीत्कार और उसके बाद सब शान्त था वहाँ।
फटी-फटी आंखों से पूर्वा देख रही थी एकाध बार मां का ऊपर उठता हाथ जरूर दिखा था उसे – फिर मां कहीं नहीं थीं। बस जल ही जल का डरावना और अनन्त विस्तार था, आगे और पीछे... दोनों ओर क्या चारो तरफ । पूर्वा ने भी खिड़की सहित ही, कूदना चाहा था मां की सहायता के लिए...मां को ढूँढने के लिए, पर मां शायद जानती थीं कि यही होगा, तभी तो माँ की लगाई उस कसी गांठ ने खुद मां बनकर पूरी तरह से रोक लिया उसे। छटपटाती ही रह गई भयभीत पूर्वा।
देखते-देखते जल और घर की वह निर्णायक रेखा भी मिट गई और घर का दरवाजा तक पूरी की पूरी चौखट के साथ बह-बहकर जाने कहां-का-कहां जा पहुंचा ..अदृश्य .मां की तरह ही। किसी का कोई पता नहीं था। भय का दैत्य सब कुछ निगल चुका था।
अब पूर्वा की मां कहीं नहीं थीं और घर और समुद्र के बीच कहीं कोई सीमा रेखा नहीं बची थी। आंसू डूबी आँखों के आगे, कहां तक घर था और कहां से वह पानी का समुन्दर शुरु होता था, जानने या समझने का कोई ज़रिया नहीं था। मां-घर, अब सब उसी विशाल समन्दर के अदृश्य हिस्सा थे... ...समन्दर भय का...समन्दर यादों का...समन्दर एक अनिश्चित और अकेले आनेवाले कल का।
भीगती कांपती पूर्वा मानो खुद भी तो उसी पानी में जा समाई थी। भय के मारे पूर्वा की सोचने और समझने की शक्ति तक क्षीण पड़ती जा रही थी। दम-घोटू भय ने टेंटुए दबोच रखे थे और गले से चीख क्या, एक छोटी-सी घिघ्घी तक नहीं निकल पा रही थी। अगले पल ही एक अनियंत्रित हिचकी के साथ बेचैनी और मितली सभी को अन्दर ही अन्दर पी गई पूर्वा। पेट में उफनता कई गैलन पानी उसे परेशान कर रहा था या भय और सदमा नहीं जानती थी चौदह वर्षीय पूर्वा।
‘ जाने क्या-क्या और देखना बाकी है अभी तो। होने दो जो होना है।‘
इससे ज्यादा और क्या सोच भी सकती थी वह। पूर्वा पूरी तरह से डूब चुकी थी घटनाओं के अनियंत्रित इस भंवर में ।
‘क्या कर सकती है अब वह? अब तो मां भी नहीं हैं उसे बचाने के लिए, हौसला बढ़ाने के लिए! पर मां कहां और कैसी है? ’
डर ने उसके हाथ पैरों को मानो उसके शरीर से अलग कर दिया था, महसूस ही नहीं हो रहे थे वे उसे। पूरी-की-पूरी पूर्वा मानो भयभीत दो आँखों में बदल गई थी, जो चुपचाप सब देखने और समझने की कोशिश कर रही थीं। सुरक्षा का रास्ता ढूँढे जा रही थी। हालांकि जानती थी पूर्वा, उसके साथ भी, किसी भी पल वही होने वाला है, जो अभी-अभी मां के साथ हुआ था ।
’ ईश्वर, मेरी मां को सुरक्षित रखना। उनकी गलतियों को माफ करना । उन्हें अपनी दया का पात्र बनाए रखना। ’
धर्मभीरू पूर्वा ने मानो भय से आंखें बन्द कर ली थीं, परन्तु अंदर की आँखों से वह सब कुछ साफ-साफ देख पा रही थी...कि कैसे जीसस की सक्षम बाहों ने उसकी मां को उठाकर किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया है। कैसे मां पापा और रोहन ने उसे वापस ढूँढ लिया है और हंसी-खुशी वे तीनों अपने एक नए, ज्यादा सुरक्षित घर में पुनः रहने जा रहे हैं। सुन्न पड़ती, उसी टूटी खिड़की को कसकर पकड़े-पकड़े उसी पर औंधी लेटी-लेटी पूर्वा मुसीबत के इस भयावह पल में भी अपने परिवार के लिए... विशेषकर अपनी माँ के लिए ही सोच पा रही थी। नोहा और उसकी सुरक्षा नाव की कहानी उसने भी पढ़ी थी। मां द्वारा सौंपी यह खिड़की ही उसकी नाव थी,..बस यही जानती थी अब तो, वह।
सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए मां ने फ्रॉक को भी तो घेरे से चीरकर गांठ बांध दी थी उसी खिड़की के सहारे...और ऊपर से अपना शौल भी लपेट कर बांध दिया था ठंड से बचाने के लिए, जो भीग-भीग कर भारी होने के बावजूद भी एक सुरक्षा-सी दे रहा था पूर्वा को, माँ की उपस्थिति और अहसास बना लगातार उसके साथ था।
कहां, और कैसे जाना है..उसकी समझ और बस में अब कुछ नहीं था। नियति जहाँ ले जाए, वही उसका मुकाम था अब, यदि कोई मुकाम हो भी तो ! कुछ पल पहले ही, मां को इसी पानी में अकेले बहते और विलुप्त होते देख चुकी थी वह और इस आपद कालीन स्थिति में कुछ भी हो सकता था, इतनी समझ थी उसमें भी। डूबकर ही नहीं, थकान और भय से भी मर सकती थी वह तो।
अब हिम्मत या समझ, कुछ भी नहीं बची थी कि बचने के उपाय तक सोच पाए, सोचना तो दूर...पिछले कई घंटों से चल रहे लहरों के इस ताणडव को और आगे देख या सह पाए-इतनी भी हिम्मत नहीं थी उसके पास। चाबुक सी प्रचंड लहरों और अंधेरे भय की ठंडी तलवारों के लगातार प्रहार से आहत, भूखी-प्यासी पूर्वा आखिर कब तक लड़ पाती।
एक विरोधाभास बन चुका था गोवा के सुरक्षाधिकारी रौबर्ट दिक्रूजा की बेटी पूर्वा का जीवन इस वक्त। पानी चारो तरफ था फिर भी बेहद प्यासी थी पूर्वा। पूरी गोवा की सुरक्षा का भार उसके पापा के कंधों पर था और अपने परिवार की परिस्थितियों से पूर्णतः शायद अनजान ही थे वह अभी भी। पता हो भी तो कोई सुरक्षा तो नहीं ही दे पा रहे थे वह उन्हें।
लहरों पर दूर बही जा रही थी पूर्वा। अपने घर से दूर, परिवार से दूर, जानी पहचानी हर चीज से दूर। कोई पेड़, कोई वनस्पति, कोई जमीन, कहीं कुछ नहीं दिख रहा था उसे। चारो तरफ बस असीम जल-ही-जल का विस्तार। हां, भयभीत पूर्वा के भय को दुगना करते हुए दो हरे रंग के लहराते सांप भी उसी तरफ बढ़ते आते जरूर दिखे उसी पल।
परन्तु अब हताश् उन आँखों में मूर्छित होने के पहले दुख नहीं था, अपितु थी वह छवियाँ, जो उन दिनों की थीं जो हाल ही में उसने अपने मम्मी पापा के साथ बिताए थे- पिछली छुट्टियाँ, जो तीन हफ्ते पहले ही यहीं पूरे परिवार के साथ इसी समन्दर के किनारे हंसते-खेलते बेहद उत्साह के साथ निकली थीं। रोहन भी था साथ में। छोटे भाई रोहन के साथ की गई छोटी-छोटी बातें और खिलखिलाती हँसी ही उसके सुन्न होते कान सुन पा रहे थे, और थी कभी प्यार से मुस्कुराती तो कभी बेहद उदास मां की छवि... बेटी के लिए कुछ न कर पाने की असमर्थता के दर्द से विकृत दूर जाती माँ का चेहरा और गोदी में छुपाने को फैली, डरी , बेचैन दूर जाती बाँहें । चलचित्र सा सबकुछ साफ साफ देख पा रही थीं पूर्वा की थकान और भय से मुंदती आँखें। तेज लहरों पर डूबती उबराती पूर्वा इन्ही के सहारे, इन्ही की आस में ही तो बहती चली जा रही थी अपनी उस अनंत यात्रा पर।
कुछ ही घंटों में सुन्न पड़ी और मूर्छित पूर्वा को कुछ पता नहीं था कि उसे कितनी खरोंचें, कितनी चोटें लग चुकी थीं...कितने नील पड़ चुके थे उसके सुकुमार शरीर पर और वे उद्दंड और उपद्रवी लहरें कहां से कहां बहाए ले जा रही थीं उसे उसी टूटे खिड़की के फ्रेम में ही लपेटे-समेटे..कि वह कभी वापस अपने घर परिवार के किसी सदस्य से मिल भी पाएगी या नहीं?
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कितने घंटे, कितने दिन, कितने हफ्तों के बाद जगी वह, यह तो ठीक-ठीक नहीं मालूम उसे... हाँ, पर जगने पर पूर्वा ने खुद को किसी अस्पताल के बिस्तर पर पाया...मतलब लहरों के क्रोध से मां का आशीर्वाद ज्यादा सशक्त था-जान चुकी थी वह। पता नहीं, उसकी नींद कितनी लम्बी थी , कितने दिन , घंटे, पल बीच में गुजरे और माँ का क्या हुआ, क्या पापा को मिल पाईं वह , कुछ नहीं जानती थी पूर्वा। किस शहर में थी -यह तक नहीं जानती थी, वह तो। गोवा में तो नहीं ही थी वह..क्योंकि आसपास बोली जानेवाली बातों को जब उसने सुनने-व समझने की कोशिश की, तो आधी ही बातें समझ में आ पाईं, जो कि बीचबीच में अंग्रेजी में हो रही थीं। एक बात साफ थी कि समुद्र किनारे एक पेड़ की शाख में अटकी, उसी लकड़ी के जंगले पर बंधी मिली थी वह उन्हें। यह भी ईशू का एक चमत्कार ही तो था कि बच गई वह- वे आपस में बातें कर रही थीं। बहुत कम ही उबर पाते हैं ऐसी आपदा से। उन्हें कैसे बताती पूर्वा कि वह खिड़की नहीं, मां ही थीं जिसने उसे बचाया है। मां का मन सब जानता है।
पूर्वा ने इधर-उधर सिर घुमाकर पहचानने , सुनने-समझने की कोशिश की, परन्तु हिन्दी और कोकणी का एक शब्द भी कोई नहीं बोल रहा था वहाँ पर । क्या पता कोई दूसरा ही देश हो यह? स्थानीय भाषा कौन-सी थी जिससे कि भौगोलिक स्थिति की जानकारी हो सके , चाहते हुए भी यह गुत्थी सुलझाने की सामर्थ नहीं थी पूर्वा के जर्जर शरीर और सुन्न पड़ते मस्तिष्क में।
प्रेस रिपोर्टरों ने चारो तरफ से घेर रखा था उसे। वे सब उसके होश में आने का बेसब्री से इन्तजार कर रहे थे और शब्दों के उस जंगल में फड़फड़ाते परिंदों की एक भी गुटरगूँ समझ में नहीं आ पा रही थी । अचानक सामने टी.वी. पर खबरें आने लगीं। गोवा के इक्के दुक्के वे गांव जो पूरी तरह से खतम हो चुके हैं वहाँ से किसी के बचने की खबर नहीं है। समुद्र की हाहाकारी लहरें सब लील चुकी हैं।
पूर्वा का मन किया कि उठे और रिपोर्टर के हाथ से माइक ले ले , बताए कि आगत् को कोई नहीं जान पाया, वे भी नहीं। वह बची है उन्ही हाहाकारी लहरों से। और क्या वे उसे उसके बाप, भाई से मिलवा पाएँगे...उसकी माँ को ढूँढ पाएंगे...पर पूर्वा के गले से एक आवाज न निकली। उठना चाहा तो पैर बेहद हल्के और सुन्न महसूस हुए, मानो थे ही नहीं, हाथों को आपस में एक दूसरे से जोड़कर महसूस करना चाहा तो वह तक नहीं कर पाई पूर्वा। लगा, शरीर का हिस्सा-हिस्सा उससे बगावत कर चुका था , उसके नियंत्रण में नहीं था। बगल में खड़ी नर्स को जरूर वह अभी भी सुन पा रही थी, जो दूसरी को बता रही थी – ‘ लगता है फिर से कोमा में चली गई ! ...कितनी सुन्दर है और कितनी छोटी, पर कितनी अभागी। इतनी छोटी-सी उम्र में ही क्या-क्या नहीं सहना पड़ रहा इसे। किस्मत में जाने क्या-क्या लिखा कर लाई है यह...पता नहीं इसका अता-पता- परिवार वाला कोई मिल भी पाएगा या नहीं ?’
पूर्वा ने कसकर आँखें वापस बन्द कर लीं। आगे कुछ सुनने की फिलहाल न तो हिम्मत ही बची थी और ना ही इच्छा!...बस स्कूल में सुना वह वेदगान ही मंत्र-सा कानों में गूंज रहा था ...चरैवेति चरैवेति। चलना ही जीवन है। पीछे जो छूटा सो छूटा...बढ़े चलो, चलते चलो। यही जीवन है। चलते चलो, चलते चलो । सामने पहाड़ हो या दुख का पठार हो। बढ़े चलो, चलो चलो- पूर्वा ने इस शोर से बचने के लिए कान बन्द करने चाहे तो दर्द की चिलक पूरे बदन को आरी-सी काट गई। चलती ही तो रही है वह, बिना थके, बिना रुके पिछले पूरे हफ्ते...होश और बेहोशी दोनों ही हाल में।
बिस्तर से उठने की, हाथ पैर हिलाने की पुनः कोशिश की उसने पर कुछ न कर पाई पूर्वा।
‘ यह भी होगा। अवश्य होगा- तुम हिम्मत मत हारना।‘
मां की आवाज लगातार ढाढस दिए जा रही थी उसे। कोई और हो न हो, पूर्वा जानती थी माँ अभी भी उसके पास थीं और लगातार व भरसक उसकी सुरक्षा कर रही थीं। भावनाओं और घटनाओं से अभिभूत पूर्वा की बंद आँखों से दो ठंडी बूंदें ढुलकीं और अंतस् तक को भिगो गईं।
और तब अचानक सबकुछ पहली बार साफ साफ दिखाई दिया पूर्वा को। बिस्तर पर उसका ठंडा शरीर पड़ा हुआ था, और नर्सों और डॉक्टरों में भगदड़-सी मची हुई थी। सब बेहद घबराए हुए थे। पूर्वा ने देखा सामने रौशनी की एक लकीर के दूसरी तरफ माँ खड़ी थी । चेहरे पर वही प्यार भरी मुस्कुराहट लिए, वही आंचल के साथ-साथ कमर तक लहराते बाल, इसी एक पल को तो तरस रही थी वह। अब एक पल भी और नहीं बरबाद होने देगी, लपककर सुरंग को लांघती पूर्वा मां के गले जा लगी थी।
पल भर को तो मां ने ढेरों प्यार किया था उसे, पर अगले पल ही वापस, अपने से दूर धकेल दिया –
‘ नहीं तू अभी यहाँ नहीं आ सकती, वर्जित है अभी यह पथ तेरे लिए। वापस लौट जा पूर्वा, अभी बहुत से काम करने हैं तुझे। रोहन और पापा को इन्तजार है तेरा। वे लौटेंगे और तुझसे जरूर ही मिलेंगे। तू ही वापस ढूँढेगी उन्हें। ‘
अगले पल ही पूर्वा सुरंग के उस पार धम्म से बिस्तर पर वापस आ गिरी थी। पोर-पोर दुख रहा था उसका और हर चोट की पीड़ा बुरी तरह से परेशान कर रही थी।
अधखुली आँखों से ही पुनः पूर्वा ने देखना चाहा - नर्स और डाक्टर आपस में एक दूसरे को बधाई दे रहे थे। - र्मौत के मुँह से ही नहीं, कोमा से भी सुरक्षित बाहर जो थी उनकी मरीज।...
आठ मार्च निकट आ रहा है, महिला दिवस! तीन सौ पैंसठ में से एक, इकलौता अपना दिन। और मेधा है कि जैसे कोई जगह ढूंढ रही हो छिपने के लिए! चार दिन पहले फोन पर कहा था रोहिणी जी ने ”तुम्हें बोलना है, मेधा! हर बार की तरह इस बार भी बहुत से लोग केवल तुम्हें ही सुनने आएंगे।“
पर मेधा को यह बोलना कभी एकालाप लगने लगता है और कभी प्रलाप। नहीं बोलेगी वह। बिल्कुल नहीं बोलेगी। हर बार वही जख्मों-नासूरों की नुमाइश, घावों-छालों का प्रदर्शन। वही प्रश्न वही आंसू । बार- बार दोहराई गई अकथ कथाएं। मां की कोख मे मारी जाती बेटियां... उपेक्षापूर्ण परवरिश... शिक्षा और विकास के अवसरों से वंचित... दहेज की बलिवेदी पर.... परित्यक्ता, विधवा, तलाकशुदा,.... छेड़छाड़... शारीरिक- मानसिक हिंसा की शिकार... आर्थिक शोषण और विविध षड़यंत्रो से त्रस्त... ”नहीं बोलूंगी इस बार। कुछ भी नहीं बोलूंगी।“
धुंधला सा उजाला फैल रहा है और बासंती गंध नासिका से प्राणों में उतर रही है। सरसों की क्यारी में झूमता बसंत पूछता है ”क्यों देवी! तुम्हारी बंदूक में गोलियां बाकी नहीं रहीं क्या?“
”कब तक दोहराऊं?“ मेधा पता नहीं, हथियार डालती है, खुद को समझाती है या बसंत से पूछती है!
उजाला निखरने लगा है और मेधा बसंत की सुरभित सुरमई आंखो से बच रही है। मजबूर है वह। सामने सारा का सार दृश्य जगत् एक विराट पर्दा बनता जा रहा है, जिसमें उभरने लगे हैं चेहरे........ वन में प्रसव पीड़ा से छटपटाती सीता........... राजसभा में केश खींच कर लाई जा रही द्रौपदी......... श्रापग्रस्त छली गई शिला बनी अहल्या......
”छोड़ो पौराणिक किस्से कहानियां....... पता नहीं, कुछ सच है भी या नहीं“, मेधा अपने आप को बहलाने- भुलाने का प्रयास करती है। सायास पोंछ देती है वे दृश्य... और उसकी उंगलिया कांपती हैं।
”पौराणिक नहीं, ऐतिहासिक भी नहीं, तुम वर्तमान पर ही आओ“, दर्द से कठोर बन गया स्वर भीतर से उठता है........ सामने दृश्य पटल पर उभर रहे हैं नए चेहरे .... माया त्यागी, ऊषा धीमान, मथुरा, रूपकुंवर, भंवरी, नयना साहनी.......पंखे से गुच्छा बनकर झूलती चार- चार सगी बहनें, रेल की पटरी पर कट कर मर गई सहेलियां, कम दहेज लाने की सजा पाई विकृत भयावह चेहरे वाली जली- अधजली और जलकर मर चुकी औरतें..........
मेधा उन सारे दृश्यों से भागना चाहती है और वे सारे दृश्य मेधा के साथ भागते हैं।
विकल- विह्वल हो गई है मेधा।
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ममा के कमरे में कई लोग हैं आवाजों से लगता है। मेधा उनमें शामिल नहीं होती, पर उनसे खारिज भी नहीं रहती। कान उधर ही चहलकदमी कर रहे हैं।
....हम विकासशील देश के नागरिक हैं......विकसित देश हमारे आदर्श हैं, उनकी संस्कृति हमारे लिए अनुकरणीय है........ हम सभ्य संभ्रांत लोग......! हम चमकीले लोग ...हम धरती से ऊपर उठ चुके लोग! ......हम उधर क्यों देखें जहां जहालत भरी है.....गरीबी, गंदगी, मूर्खता के ढेर..... सारे ही गांव, सभी गरीब बस्तियां, झुग्गी- झोपड़ियां..... हमें इनसे क्या लेना देना ? .... कहां पहुंच गये हैं हम......! बंगलोर में सबसे सुन्दर स्त्री भी हमने चुनी है और उसने हमें करबद्ध नमन भी किया......! हमारी सुष्मिता........, हमारी ऐश्वर्या......... हम मुट्ठी भर उजले लोग!
वहां, ममा के कमरे में, भूतपूर्व विश्व सुन्दरी और ब्रहमाण्ड सुन्दरी का तेज फैला हुआ है। कैसी लगती होंगी वे सब उस रोशनी में....? वे, ममा की सहेलियां..... खा-खाकर थुलथुलाई औरतें, रंग और खुशबू से दूर-पास वालों के आंख-नाक फोड़ती औरतें........! बटुए के बल पर सातवें आसमान चढ़ी हुई औरतें। बटुए में भी दूसरे की कमाई!
मेधा खारिज कर लेती है खुद को उस महफिल से।
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सुबह- सुबह आधे सूजे चेहरे के साथ महरी मेधा के पास आकर बैठ गई ”क्या हुआ ?“ मेधा चौंकती है और महरी जैसे फट पड़ती है ”अब तो तुम कुछ करो जिज्जी! कर डालो लिखा-पढ़ी, पुलिस- रपट कुछ भी करो!’ वह अपने हाथ-पैर-पीठ खोल-खोलकर चोटाए अंग दिखाती है।
”ससुरा कमाएगा एक धेला नहीं, और धौंस मन भर की।“ वह बर्तन घिसती रोती जा रही है। मेधा उसे देख रही है, उसका बड़बड़ाना-रोना सब सुन रही है।
”फिर पीकर आया था क्या कल रात?“ अपना प्रश्न खुद ही बिलकुल व्यर्थ लगता है मेधा को।
”कब नहीं पीकर आया?“ महरी सूजी हुई आंखे तरेरती है और मेधा सहम जाती है। जानती है कि उसे मेरी झूठी सहानुभूति नहीं, सच्चा सहयोग चाहिए।
”ये कागज पढ़कर सुनाओ जरा जीजी“दूध-वाली टाइप किया हुआ एक फुल स्केप पेपर मेधा को पकड़ाती है। गोल- गोल भाषा में लिखे उस कागज के निचले भाग पर दो अपठनीय हस्ताक्षर हैं। किसी काल्पनिक कार्यालय के वास्तविक अधिकारी ने दूध वाली को ग्रामीण महिला संगठन बनाने का अधिकार दिया था- मात्र ढाई सौ रूपये शुल्क लेकर!
”जीजी! अब हमारा खाता खुलवा दो बैंक में। खाता होगा, तभी लून मिलेगा न!“
मेधा खीज कर कहती है, ”तुम पढ़ी-लिखी क्यों नहीं ?“
”पढ़ने खातिर अम्मा बाबू जी राजी ही नहीं रहे!“
दूधवाली को मेधा का प्रश्न असमय गाया गया राग सा लगता है। दुपहरी में भैंस दुहने जैसा!
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जमादारिन झाडू एक तरफ रखकर आंगन में बैठी धार-धार रो रही है।
”क्या हुआ?“ उसे झकझोरती है मेधा। हिचकियों के बीच कण्ठ में कैद है उसकी आवाज ”बि...टि...या!“
”क्या हुआ बिटिया को?“ व्यग्र होकर पूछती है मेधा।
”नुक्कड़ वाली बड़ी कोठी का हरामी.......।“ उसके भीतर का सारा रक्त भी आंसू बनता जा रहा है क्या!
ग्यारह साल की लंगड़ी बिटिया जमादारिन की और नुक्कड वाली कोठी का भीमकाय मालिक! ...राक्षस!!
कुछ नहीं सुन सकती, कुछ नहीं सोच सकती मेधा.....। अवसन्न बैठी है वह... ।
वे सब चली गई हैं अपने-अपने आंसुओ मे डूबी हुई। और मेधा जैसे शशोपंज मे कैद होकर रह गई है!
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ममा हांफती-झपटती सी मेधा के कमरे में आती हैं ”मेधा यू शुड नॉट लूज दिस चान्स।“
”कैसा चान्स ?“ सपाट प्रश्न है मेधा का।
”अभी-अभी एक्स एम.एल.ए. नारंग जी का फोन आया था। उनके यहां पार्टी है। पापा के कई फ्रैन्ड्स भी होंगे वहां। तुम जल्दी से तैयार होकर चली जाओ।“
”पर ममा यह क्या तरीका है बुलाने का? अभी फोन किया कि अभी-अभी चली आओ! और हम भागी चली जायें ऐसे निमंत्रण पर?“
”तुम्हें तो बीमारी है बहस करने की। चुपचाप यह कपड़े पहनो और जाओ। जल्दी करो! हरी अप।“
मेधा सोचती है, गनीमत है, ममा को दो-चार और भाषाएं नहीं आतीं। वरना उतनी भाषाओं में, उतनी बार, जल्दी तैयार होने को कहतीं।
बिल्कुल बेमन से पार्टी में जाना? क्या वाहियात बात है! पर ममा मानेंगी नहीं, इसलिए जाएगी मेधा।
नारंग जी की पार्टी में मेधा को अपनी रूचि के अनुरूप न कोई मिलना था, न मिला। पर लोग हैं तो बातें भी होंगी ही।
”मेधा कहीं पार्टी-वार्टी में दिखाई नहीं देतीं तुम!“ पापा के एक मित्र पूछते हैं।
”ये तो नारीवादी झण्डे गाड़ती हैं । पार्टी-वार्टी में क्या करेंगी जाकर ?“ एक सज्जन लपककर बीच में टपकते हैं।
”तुम्हें तो हमने गोद में खिलाया है मेधा! इधर जब से ट्रांसपोर्ट बिजनेस शुरू किया, लोगों से मिलना-विलना काफी कम हो गया। वैसे तुम्हें ये पुरूष विरोध के दौरे कबसे पड़ने लगे ?“
ठहाकों के बीच सिमट सिकुड़ कर झुंझला उठती है मेधा।
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नींद नहीं आती है मेधा को। सिर भारी रहता है।
”तुम क्यों सबकी बलाएं अपने सिर पर लिया करती हो?“ बुआ कहती हैं। ममा उनसे सहमत होती हैं ”हां, दूसरों को देखो। वैसे ही जीना सीखो!“
सहानुभूति और चिढ़ का दोहरा स्वाद लेती है मेधा!
”किटी में चली जाओ आज! मैं नहीं जा पाऊंगी। तुम्हारा सर भी हल्का हो जाएगा!“ ममा का आदेश है, फिर मेधा भी तो चाहती है कि सर हलका हो। तैयार होकर ‘क‘ के पास जाती है । वे रिमोट कन्ट्रोल गोद में रखे, पलंग में धंसी दूरदर्शन का स्वाभिमान देख रही हैं।
”बैठो मेधा ! मुझे ‘स्वाभिमान’ बहुत अच्छा लगता है, मैं इसे छोड़ नहीं सकती। जब से यह सीरियल आने लगा है फिल्में देखना बहुत कम हो गया है। महीने में तीन-चार बस। अरे हां, तुमने ‘बैडिट क्वीन’ के बाद कोई फिल्म नहीं देखी ? उफ् कमाल है चार साल में एक फिल्म देखी वह भी बैडिट क्वीन!“
मेधा उठ खड़ी होती है। ‘ख‘ के पास जाती है। वे फेरी वाले से उलझ रही हैं ”नहीं, मैं इस साड़ी के तुम्हें चार सौ ही दूंगी।... कैसे नहीं पड़ता है ? पड़ता है, ये पकड़ो रूपये। लो न, धरो, ठीक हैं। बिल्कुल ठीक हैं!“
मेधा थोड़ी देर खड़ी रहती है फिर ऊबकर आगे बढ़ जाती है। ‘ग’के घर किटी पार्टी है । चार-चार, पांच-पांच औरतों के झुण्ड बंटे हैं वह हर झुण्ड के पास जाती है। लिपस्टिक..... नेल पॅालिश...... रूज...... मस्कारा....!
बहाने बना-बना कर, और अंत में जैसे जान बचाकर भाग आती है मेधा!
‘घ’नहीं थी उस महफिल में। उसके घर पहुंचते ही मेधा को कुछ आपत्तिजनक दिखता है। वह अचकचा कर लौटने लगती है कि ‘घ’सहज मुद्रा में खिड़की से पुकारती हैं ”आइए न!“
मैंने कुछ नहीं देखा-समझा यह सिद्ध करने के लिए मेधा उनके ड्राइंगरूम की शोभा बन जाती है।
”सहाय साहब टूर पर गये हैं। मेरे कजिन आये हैं। अकेले बहुत बोर होते हैं...। .... और क्या चल रहा है? रोहिणी जी कैसी हैं ? ..... और तो खैर सब ठीक है, पर वे तो खाली हाथ घूमा करती हैं बहुत बुरा लगता है। भई, सुहागन औरत की कलाई में दर्जन भर चूड़ियां तो होनी ही चाहिए।“
मेधा टिक नहीं पाती । ”रोहिणी जी को चूड़ियां पहनाने जाना है“ यह कहकर खिसक लेती है।
किसी से नहीं कहती मेधा कि सिर हल्का करने, हल्के सरवालियों के बीच प्रशिक्षण लेने गई वह, और बुरी तरह असफल होकर लौटी है।
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मेधा मानो उलझा हुआ ऊन का गुच्छा बन गई। अंधेरे में हजारों आखें घूरती रहीं रात भर। शिकायत भरी आखें । अपने-परायों की आखें......! ऐसे कैसे चल पायेगा ? क्या करूं ?
”इधर चली आओ“ अमूर्त बसंत शरारत करता है। मेधा कुछ गुनगुनाना चाहती है, तभी फोन घनघनाता है। ‘महिला मुक्ति मोर्चा’ की अध्यक्ष रोहिणी हैं ”तुरन्त चली आओ, जैसी भी हो। निशा को अस्पताल पहुंचाना है।“
निशा! निशा!! क्या हो गया निशा को? स्कूटर उड़ाती मेधा को अपनी छात्रा रह चुकी उस मासूम सी लड़की की हजार सपनों भरी आंखें याद आ रही हैं। बस छः माह पहले ही तो ससुराल के लिए विदा हुई थी वह!
निशा ने सल्फास खा लिया। वह जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही थी। मेधा के ‘क्यों’का कोई ठोस उत्तर नहीं मिलता। निशा की सास का रवैय्या तो बिल्कुल ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’वाला है। पता नहीं, क्या होगा! सारा दिन अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ते-उतरते, डरते और डरी हुई प्रार्थना करते गुजर गया।
आधी रात को फोन आया, ‘निशा नहीं रही‘। मेधा को शून्य ने घेर लिया कि किसी तरह भी कोई सोच या भावुकता उस पर हमला न कर सके, परन्तु दिन फिर थाना, पुलिस, आंसू और आक्रोश के बीच डूब गया।
निशा पहले मेधा के पड़ोस में रहती थी, इस नाते पड़ोसियों को भी सूचित करना था। क के घर की देहरी पर पैर रखते ही बुद्धू बक्से की श्रीदेवी मुस्करायी- ‘लक्स और क्या!’
क की आधी आंख मेधा के चेहरे पर और डेढ़ आंख श्रीदेवी के चेहरे पर थी। इसी तरह मेघा की पूरी बात सुनी गयी। ख को खबर देकर मेधा ने कहा ”कल हम निशा की हत्या के विरोध में महिलाओं को एकत्र कर थाने पर धरना देंगे। निशा की ससुराल वालों को भी घेरेंगे, आप भी चलें।“
”अरे नहीं, नहीं मेधा! कल नहीं, फिर कभी सही। असल में कल ऐश्वर्या राय की पहली फिल्म टीवी पर दिखायी जा रही है।“
ग के घर की महफिल में किसी अनुपस्थित पड़ोसिन को कहकहों में ढाला जा रहा था। ‘निशा नहीं रही’सुन कर सन्नाटा छा गया, मेधा के मन का गुबार कम हुआ, ... ”आप सब भी चलें...“ याचना उतर आई शब्दों में।
”हमारे यहां तो कल मेहमान आने वाले हैं।“
”हमारी तो निशा के मां-बाप से कभी भी पटरी नहीं बैठी।“
”हमारी कौन-सी बेटियां हैं, जो दूसरों की बेटी के बखेडे में पडे़ं।“
”तबियत ठीक रही, तो मै चलूंगी।“
”कान्ता भाभी आएंगी, तो मैं भी आ जाऊंगी।“
इन पांच उत्तरों को साथ लेकर मेधा घ के घर गयी। देर तक घंटी बजाई और फाटक पर ही खड़ी रही। घ देर से बाहर निकली और जल्दी से अन्दर चली गयी, यह कहकर कि कल तो कजिन के साथ कहीं जाना है।
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निशा की ससुराल और थाने के सामने चीख और आंसुओं से भरे-भीगे नारे लगे, थाने के भीतर किसी कलम की नींद टूटी। कुछ पन्ने पलटे और जैसे कुछ हुआ ही नहीं; कुर्सियां यूं कुनमुना कर सो गयीं। हतभागिनी निशा के चचिया ससुर पुलिस अधीक्षक हैं। उस अकेले आदमी ने परदे के पीछे बैठ कर बाहर चिल्लाती उन सात सौ औरतों को भयाक्रांत करने के लिये क्या कुछ नहीं किया, पर जिन दिलों ने बेटी खोई थी, जिनकी छातियां ऐंठ रही थीं, वे चिल्लाती रहीं न्याय के लिये। उन सात सौ औरतों के सीने की आग क्या एक घर और एक थाना फूंक देने के लिये कम होती, पर उन्हें याद है कि वे औरते हैं।
मेधा दर्द, आक्रोश और पसीने से लथपथ है। जिन्होंने कोई कानून नहीं तोड़ा, न्याय के साथ कोई खिलवाड़ नहीं किया, कोई गलत मांग नहीं कर रहीं थीं जो, उन औरतों की हड्डियां तोड़ी जा रही हैं।
थाने के भीतर कलम के साथ वर्दी बलात्कार कर रही है, कागज गंदले हो रहे हैं। उधर निशा की ससुराल में राहत की लम्बी सांसे ली जाने लगी हैं और इधर मेधा कराहों का विष पीकर शंकर बनने का प्रयास करती हुई बेहोश हो गयी है।
मेधा का यात्रा-मार्ग बदल गया है। घर से अस्पताल, अस्पताल से घर। बहुत लोग हाल पूछने आए, बहुत-सी महिलाएं जिनमें क,ख,ग,घ भी थीं, मेधा की मूर्खता पर तरस खा, दया दिखा कर लौट गयीं वे।
”तुम्हारे करने से क्या होगा?“ ”क्यों चीखती हो सड़कों पर?“ ”क्या कमी है घर में?“ ”तुम चैन से क्यों नहीं जीती हो?“ घर के लोग कह रहे हैं।
”उतरा नारीवाद का नशा?“ मित्र आकर कहते हैं, ”हमें बहुत बुरा लगता है, जब तुम्हारा नाम उन लड़ाकू औरतों से जोड़ा जाता है।“
”इसमें बुरा लगने जैसा क्या है? औरतों से ही तो जुड़ता है न! वह भी लड़ाकू नहीं, जुझारू औरतों से।“
मेधा की मुस्कान मित्रों को अच्छी नहीं लगती।
”सुधर जाओ अभी भी“ कहकर चल देते हैं।
”पागलों के सींग थोड़े ही होते हैं!“ बड़बड़ाती बुआ नैनों से आग्नेयास्त्र छोड़ती है मेधा पर।
मेधा सेंक के लिए गरम पानी मांगना चाहती है, पर चुप रह जाती है। दर्द निवारक गोली निगल कर सोने का विफल प्रयास करती है।
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अंधेरे में कुछ रंग, कुछ बिंदु , कुछ रेखाएं , कुछ धब्बे उभरते हैं। अंधेरा पहले कैनवस बनता है और फिर चलचित्र का पर्दा.....। उस पर उभर आता है निशा का वीभत्स रूप, फटी आंखे पूरे का पूरा ब्रहाण्ड निगल जाएंगी अभी। कैसे मान ले मेधा कि वह निशा थी। लंबी-लंबी लहराती चोटियों वाली, मेधा मैम की लाड़ली ‘दूध की कटोरी’ निशा......! वह चटर-पटर, चटर-पटर बतियाने वाली, हर पल दूसरों का ध्यान रखने वाली, हंसती-मुस्कराती, चुस्त-चंचल लड़की...!
नहीं-नहीं उस काली-कुरूप कुंदे सी निष्प्राण काया को निशा कैसे मान ले मेधा.....! कैसे मान ले कि वह निशा ही थी!
मेधा का मातृत्व छटपटाने लगता है।
करवट बदलती है, तो महरी की नीलों भरी पीठ उभर आती है दीवार पर ...और फिर जमादारिन का क्रंदन।
करवट बदली तो फिर उगने लगते हैं मैली कुचैली धोती-साड़ियों के झुण्ड के झुण्ड। अंधेरों में अनाम-अरूप धोतियां-साड़ियां, घूंघटों वाली। रक्ताल्पता, कुपोषण, रोग-बीमारियों की मूर्त स्वरूप.......!
सन्नाटे की चीखें पागल बना देंगी मेधा को ........ कोई कुछ बोलता क्यों नहीं ......?
मेधा खुद कुछ बोल कर क्यों नहीं तोड़ देती सन्नाटा। क्या चुक गये सारे शब्द ...... सारे नारे ? खोखले आश्वासन ... नेताओें की तरह ....। झूठ ही झूठ था क्या सब?
नहीं-नहीं.... उसके हाथ कानों की तरफ उठते हैं और देह में उठते दर्द की तीखी लहरें मन को आराम देने लगती हैं।
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”अब एक तिहाई आरक्षण के लिए उतर जाओ न सड़कों पर। रहा-बचा स्वाभिमान भी न रहे औरतों का।“ ममा की उजली ठसक का क्लोज अप उभर आता है... पर ये पिचके पेट वाली लाखों औरतें? करूण विवशता घेर लेती है मेधा को .... भरे पेट वालों के पैमाने से इन्हें कैसे नापा जा सकता है!
हजारों-हजार घूंघट गीले हैं। आंसुओें से, रक्त से, स्वेद से और स्तनों टपकते दूध से .....। और उन मौन घूंघटों के भीतर कहीं कैद हो गई है मेधा ....! आंखें फाड़े देख रही है वह निविड़ अंधकार में...।
फिर दम घुटने लगा है।
खिड़की से पुरवा के झोंके पर सवार होकर आया बसंत गुदगुदाना चाहता है मेधा को । मेधा ठस्स .... जैसे काठ हो गई काठ को कोई क्या गुदगुदाएगा? बसंत उदास है... वह नहीं हारा, कभी नहीं , युगों-युगों से वह सर्वदा विजयी रहा है....। उससे सभी हारे हैं, योगी-वियोगी तक। तो मेधा क्या प्रकृति से ऊपर है? .... एक कसक विद्युत गति से समूचा चीर देती है मेधा को।
रो पड़ी है मेधा। ”बसंत! रोको अपने मदिर गीत, समेट लो सुगंध की हाट... मत बढ़ाओ मेरी ओर मृदुल पग .... मेरे भीतर का पावक प्रवाह जला देगा इन्हें..!“
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अंधेरे में कई कोलाज ठिठके पड़े हैं। मेधा आंसू भरी आंखो से उन्हें निहारती है। ”असमय बूढ़ी हो गई झुर्रीदार रूखी त्वचा और छाती से भाग कर पेट पर लटके स्तनों वाली इन औरतों पर भी कभी तुम्हारी कृपा-दृष्टि हुई ही होगी। देखो, इनके भोंथरे हाथों की भाग्यरेखाओं में मैल और कालिख के सिवा और क्या है? बताओ कुछ बचा है क्या उन हथेलियों में?“
”कितना कुछ कहा-लिखा-पढ़ा गया है इन सवालों पर, लेकिन कुछ भी कहा-लिखा-पढ़ा नहीं जा सका! वरना क्यों घिरी होती मैं इन बेताल प्रश्नों के बीच?’’
मेधा चुप होना चाहती है , पर मस्तिष्क की शिराओं में प्रश्न बज रहे हैं। क्या करे मेधा!
हजार-हजार परिचित -अपरिचित चेहरों के भीतर का हाहाकार मेधा के भीतर धंसता जा रहा है।
”रेत कितनी भी स्वर्णिम क्यों न हो, उसे आंखों में नहीं बसाया जा सकता बसंत! कम से कम आज के दिन तो तुम भी मुझे ऐसे ही लग रहे हो......। घड़ी देखो, आठ मार्च आ गया है। तीन सौ पैंसठ में से एक खास दिन क्यों ? क्यों नहीं सब तीन सौ पैंसठ दिन हमारे हो जाते ? एक ही दिन का हिसाब क्यों ?“ मौन हो गई मेधा।
”बाकी बचे तीन सौ चौसठ में से एक सौ बयासी, एक सौ बयासी बांट लें, तो ?“ बसंत सेतु बनाने का बचकाना प्रयास करना है मेधा के चेहरे पर बरबस मुस्कान खिल आई है।
”जिस दिन ऐसा हो जाएगा, बाकी उम्र तुम्हारे नाम कर दूंगी।“
अंधेरे के झीने हो चुके पर्दे पर दूधवाली का चेहरा उभर आता है, उलटी किताब पकडे़ वह जोर-जोर से अ-आ पढ़ने का प्रयास कर रही है। ‘बुद्धू’ मेधा उसकी किताब सीधी करती है और उसकी इस जरा सी बेखयाली मे नींद उसे दबोच लेती है।
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हॉंल खचाखच भरा है। नारी दिवस की चकाचौंध है। मंच पर एक राजनेत्री, एक बड़े व्यवसायी की पत्नी, दो प्रशासनिक अधिकारियों की पत्नियां बैठी हैं। रोहिणी जी भी हैं। मेधा के बोलने की बारी है। स्वर-यंत्र के सामने उसके जाते ही हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से भर जाता है और मेधा बिना किसी संबोधन के प्रश्न करती है, ”यह भव्य स्वागत किसका हो रहा है? किसकी राजसी आवभगत हो रही है यह? अभी तो हमें नारी दिवस का इतिहास पढ़ना है, यानी शोक प्रस्तावों का सिलसिला आरंभ होने जा रहा है। क्या उन शोक प्रस्तावों का हम तालियों से स्वागत करें।
हॉल में सुई-पटक सन्नाटा हो गया है। मेधा नवीन ऊर्जा से भरती जा रही है। और दसों दिशाओें को गुंजा रहा है उसका ओजस्वी स्वर।
रेखा अपने कमरे से बाहर आई और धड़ाधड़ सीढि़याँ चढ़ने लगी. सीढि़याँ जितनी तेजी से चढ़ी गईं, उतनी ही तेजी से उतरी भी गईं। सर्दियों की छोटी शाम मुँह बाए खड़ी थी। लगभग धुंधली होती शाम। लगभग रात का भ्रम पैदा करती शाम. जाड़े की कोमल-मीठी धूप कब की ढल चुकी थी। छज्जे के पास की अपराजिता-बेल खूबसूरत फूलों से लदी थी। यह बेल खंभे के सहारे उपर तक आ गई थी। अभी वह भी डूबते सूर्य के लाल प्रकाश से नहाने के बाद काली रात का इंतजार कर रही थी।
‘‘ भाभी, ये क्या हल्ला हो रहा है? ’’- रेखा बेटे को कमरे में ही छोड़ आई थी। उसकी चीखें आसमान छू रहीं थीं। उसकी आँखों में थोड़ी नासमझी झाँकी। वह जान ही नहीं पाई, अचानक यहाँ की हवा में क्यों जहरीली गंध घुलने लगी। वह देख रही थी, अचानक सब बेहद व्यस्त हो चले। भैया का फोन आते ही घर के दरवाजे- खिड़कियाँ फटाफट बंद। उसका बुखार में तपता बच्चा बार- बार रो उठता, पहले वह ज्यादा ध्यान नहीं दे पाई थी। वैसे उसने भाभी से पूछा था-
‘‘ क्या बात है ? दरवाजा- खिड़की क्यो बंद कर दी आपने? ’’
फिर उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना गुसलखाने में जाकर उसका टटी से भरा पैंट धोने लगी। बच्चे के टावेल से उसके पैर पोछ उसने हगीज बाँधते हुए फिर प्रश्न दुहराया-‘‘ दरवाजा-खिड़की क्यों बंद कर दी आपने भाभी? ’’
‘‘ कुछ नहीं. आप मत घबराइए. कोई बात होगी तो हमलोग संभाल लेंगे। ’’
भाभी ने उसके बेटे गौरव को पुचकारने में अपनी घबराहट छिपानी चाही। आकाश में उमड़ते-घुमड़ते भागते चले जानेवाले घने बादलों की तरह विभिन्न भावों की आवाजाही से चेहरा झॅंवला गया था। रेखा भी बेटे के पीछे व्यस्त हो चली.. घबरा कौन रहा है, वह या भाभी? वह समझ नहीं पाई। भाभी ने ऐसा क्यों कहा?
‘‘देखिए न भाभी, इसकी देह गर्म हो गई है। यह सुस्त भी लग रहा है न?’’
‘‘ देखें। हाँ, यह तो सच में बहुत सुस्त लग रहा है।’’ भाभी का रक्त प्रवाह तेज। हाँ, संयत नजर आने की कोशिश में जुटीं थीं।
ट्र्र्रिंग...ट्रिंग..- फोन की घंटी घनघना उठी तो भाभी ने लपक कर रिसीवर उठा लिया और हाँ- हूँ करती रही। उनके चेहरे के रंग में तेजी से बदलाव आ गया। अस्तलगामी सूर्य की रंगीन रष्मियों का वहाँ नामोनिषां न था। हमेशा की गुलाबी आभा गुम गई। अचानक. क्षितिज पर काले बादल छा गए।
बाबूजी वहीं फायर प्लेस के पास बैठे हुए थे। दोनों हाथ सेंकते हुए उन्होंने गौरव की ओर नजर डाली। वे देख न पाए निशा का चेहरा आशंका एवं व्यथा से काला पड़ गया है। उन्हें एहसास तक नहीं, शहर की हवा इतनी जहरीली हो चुकी है। पहले थोड़े आशंकित वे थे।
‘‘ क्या बात है ? किसका फोन था?’’
‘‘ बाबूजी,, इनका था। ये कह रहे थे कि....कि हालत बद से बदतर होती जा रही है। हमें सावधान रहना होगा। ’’ -उसकी आवाज पता नहीं क्यों लरज रही थी। बाबूजी अंगीठी के पास से उठ आए। सर्द मौसम में हाथों को गर्म करने के कई उपाय!
‘‘ शायद कफ्र्यू लगे।’’
‘‘ अरे! बात इतनी बिगड़ गई?’’ रिश्तों की गर्मी एकदम चुक गई है। कम से कम उन्हें तो ऐसा ही लगा..
‘‘बात बड़ी नहीं थी, छोटी- सी थी। यह छोटी बात भी हवा को दहला गई ?’’ वे स्वतः बोल उठे।
कुछ देर उलझे रहे. उन्होंने कभी नहीं सोचा था-‘‘ किसकी गलती.....?’’ ‘‘किसका दो....? ’’ ’‘ बदमाश कहीं के.’’ वाक्यों से सजा वाक्ययुद्ध शहर को इस तरह एक बार फिर जहरीला कर डालेगा। अक्सर बादलों की काली परछाईं से घिर उठते शहर को फिर से नजर लग जाएगी।
‘‘ अरे! यहाँ आसानी से बात इतनी बिगड़ जाती है निशा? छोटी- सी बात का इतना बड़ा अफसाना? मैदान में ओसवाली घास पर मैंने चलना शुरू ही किया था कि.....दोनों के परिवारवाले वहीं तो झगड़ चुके थे..... फिर? ’’
उस फिर का जवाब कहाँ था निशा के पास। पिछले आठ साल के विवाहित जीवन में उसने कई बार शहर की हवा को दुर्गंधित होते देखा था। विभाजन के समय तो उसका जन्म भी नहीं हुआ था लेकिन इंदिरा गाँधी की हत्या, बाबरी मस्जिद के पास जानेवाले कारसेवकों की हत्या, बाबरी विध्वंस के बाद के दंगों की वह गवाह रही है। कई्र-कई कांटेदार रातें उसके ज़ेहन में उभर आईं। उसकी प्रार्थनाओं में शामिल रातें भी। कैसे हॅंसते-खेलते लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं, यह देख वह हमेषा दहल जाती रही है। उसे लोगों में पशु नजर आने लगते हैं। आबाद इलाका जंगल में तब्दील हो जाता है।
‘‘ जानती है निशा, एक दाढ़ीवाला नवजवान था, एक माथे पर तिलकवाला। इसी से बात का रूख दूसरी ओर मुड़ गया। ’’
बाबूजी मॉर्निंग वॉक के लिए निकले थे। मैदान में सदा की तरह भीड़. बच्चे साइकिल चला रहे थे। कुछ लोग ड्राइविंग सीख रहे थे। कुछ जॉगिंग, तो कुछ लोग तेज-तेज कदमों से धरती नापने में व्यस्त। अभी उन्होंने भर आँख किसी को देखा भी न था। दो साइकिल सवार आपस में टकरा गए। खूब लातम-जुतम और बहसा-बहसी से वातावरण का तापमान एकदम गर्म। उन्हें भी बीच-बचाव करना पड़ा। किसी तरह खून-खराबा रोका गया। और अब? थोड़े-थोड़े छिलाए हुए घुटने-कुहनी ने शहर को पूरा ही छील डाला।
निशा का वश चलता, वह समय की सुई उल्टा घुमाकर सब कुछ ठीक कर देती। कभी कर पाई थी ? पर एक अनजानी चाहत! सुई को उल्टा घुमाने की. चाहत पालने में क्या जाता है।
‘‘ बाबूजी, 1947- 48 में भी ऐसे ही दंगे होते थे? ’’
‘‘ इससे भी ज्यादा भयंकर। उस समय भी एक-दूसरे के खून के प्यासे हो उठते थे लोग। ’’
‘‘ बाबूजी, हम ग्लोबलाइजेशन की बात करते हैं। हमारे देश से वसुधैव कुटुम्बकम की लहर उठती रही है। फिर हम अपने देश में ही एक-दूसरे के साथ क्यों नहीं निभा पाते?.....क्यों नहीं घुल पाते दूध में शक्कर के जैसे? हम इन स्थितियेां के साथ वसुधैव कुटुम्बकम की बात कर सकते हैं? ’’
निशा को सच में आश्चर्य हो रहा था। वह लगातार हाथ मले जा रही थी। सामने के आदमकद आइने में वह एक डरे-सहमे प्रश्न के रूप में उपस्थित थी। भीगी हुई दूब की नमी उसकी आँखों में थी। इसी तरह के एक दंगे में उसने अपनी अंतरंग सखी हमेशा के लिए खो दी थी। दंगे की भंवर उसमें कल्पनातीत डर की लहर पैदा करती है। वैसे निशा अपने डर और कमजोरी को कभी किसी के सामने नहीं लाती।
‘‘ नहीं बेटा! पहले हमें घरवालों के साथ प्रेम से जीने का पाठ पढ़ना चाहिए, तब बाहरवालों के साथ दोस्ती की बात करनी चाहिए। मात्र बड़ी-बड़ी बातों से कुछ नहीं होनेवाला.....’’
उनके सामने एक अॅंधेरी लकीर खिंच गई। वे गाँव में भी हर दिन सवेरे-सवेरे खेतों में घूमा करते थे। उनकी दोनों आँखें ओस पी-पीकर अभी भी जवाँ थीं। उनकी आँखों में अब भी वही चमक, वही सामर्थ्य। रिटारमेंट के बाद भी उनकी दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं। उन्होंने ऐसी खुशनुमा सुबह में कभी हवा को दुर्गंधित होते नहीं देखा था वहाँ। यहाँ की हालत उनके आगे व्यथा का कुहरा फैला रही थी।
‘‘ डर का कद विकास के साथ बढ़ता रहा है। कम होना चाहिए था।’’
‘‘ यही मैं कहती हॅू, पहले हम देशवासी तो एक हो लें। फिर बड़ी- बड़ी बातें करें। ’’ निषा से रहा नहीं जा रहा था।
बाबूजी से बातकर कुछ हल्का भी महसूस करने लगी। वह मन के सारे गुब्बार निकाल देना चाहती थी। बाबूजी को चुप रहने का मन हो रहा है, यह समझते ही वह वहाँ से उठ आई। उसकी आँखों में प्रतीक्षा की बेचैनी झाँकने लगी । अभी तक दोनों भाईयों ने दुकान बंद नहीं की है शायद। बाबूजी भी बेहद बचैन! कब आएँगे दोनों?
देर हो रही थी और आशंकित निशा की चिंता यह कि जल्द से जल्द समीर-मिहिर घर वापस आ जाएँ। फिर यह कि कैसे वह पहली बार अपने भैया के पास आई ओस की पहली बूँद सरीखी नाजुक रेखा को इन परिस्थ्तियों से अलग रखे। उसकी सेवा भी करे। छः महीने के बीमार बच्चे के साथ रेखा की देखभाल ही पूरा समर्पण मांगता है, ऊपर से यह हवा। वह वहाँ से उठकर रेखा के बेडरुम में आ गई। रेखा बच्चे में मगन, उसे राहत महसूस हुई। चलो रेखा को पता नहीं है। देह की नस- नाडि़याँ थोड़ी ढीली पड़ीं।
‘‘ गौरव सो गया क्या? ’’ गौरव के सिरहाने बैठ उसके तलवों को हौले से सहलाते हुए पूछा उसने।
‘‘ कहाँ भाभी, यह तो बुखार के कारण सुस्त ......’’
रेखा उसे थपकियाँ देती रही। नई-नई बनी माँ की तरह ही वह केवल बेटे में व्यस्त लगी। उसकी पतली उॅंगलियों को चूमना.....लाल-लाल तलवों को सहलाना ....छोटी-छोटी मुसकुराहटों पर फिदा होना.... नींद में ईश्वर से बातें कर मधुर स्मित बिखरनेवाले नन्हें गौरव केा भरपूर निहारते हुए, उसके पैर-हाथ फेंकने पर चीखते हुए निहाल हो जाना....बस्स! एक अनिर्वचनीय सुख उसकी आँखों को उनींदा रखता। मातृत्व सुख के ठण्ढक भरे एहसास से परे वह कुछ सोच नहीं पाती. अभी उसके मुग्ध चितवन में चिंता की मक्खी गिर पड़ी थी। रेखा कामदार लाल चूडि़यों को कुहनी के थोड़ा नीचे तक चढ़ाए, लाल पाड़ की हरी तांत साड़ी में अस्त-व्यस्त होते हुए भी गजब ढा रही थी। अभी निशा का ध्यान उसके गजब ढाने पर नहीं था। ‘‘ उसे दवा दे दी ? ’’
‘‘ हाँ! होमियोपैथिक दवा है, थोड़ा समय लगेगा। ’’
निशा उसे बातों में उलझाए रख रही थी। बाबूजी के अनुसार एलोपैथ आज की पूरी जीवन शैली को प्रभावित कर रही है। उसके साइड इफेक्ट से बचना मुश्किल है। होमियोपैथिक या आयुर्वेद हमें नेचुरल ढंग से जीना सिखलाता है। रेखा को भी आयुर्वेद पर सर्वाधिक भरोसा है। तब होमियेापैथ पर। रामदेव जी तो आज योग सिखा रहे हैं, बाबूजी चालीस साल पहले से ही योग-ध्यान करते रहे हैं। गाँव में अकेले होमियोपैथ श्रीधर चच्चा या राजनाथ आयुर्वेदाचार्य मोर्चा संभालते है। नासमझ-अनपढ़ों के मोर्चो के लिए ओझा-गुनी तैनात है।
‘‘ सुना था, बाबूजी उनके पास जाने से सबको रोकते है्ं।’’
‘‘ ठीक सुना आपने। इस मामले में बाबूजी की कोई सुने, ना सुने, उनकी कोशिशें अभी भी जारी हैं। ’’
रेखा अपने इंजीनियर साहब को बारंबार यह बताकर खुश हो चुकी है। बाबूजी और उनकी आस्थाओं, उपदेशों पर बहुत गर्व है रेखा को। बाबूजी ही उसके आदर्श थे। हैं भी । उनकी हर बात पर अमल कर वह खुश होती रहती है।
गाँव की सोंधी मिट्टी में पली-बढ़ी रेखा उस सोंधी मिट्टी की तरह ही सहज-सरल। दो भाईयों के बाद की सबसे छोटी रेखा.सबसे कोमल। तन से भी, मन से भी। कमलिनी की नाजुक नाल को मात देती काया। खरगोश के कोमल फाहे सा दिल, रेशमी बात-व्यवहार, सबसे उदार!
रेखा गौरव को थपकियाॅं देने लगी. निषा उसे बतकही में फॅंसाए रखने की कोषिष में प्राणपण से जुड़ी थी कि बाबूजी की आवाज-
‘‘ बह! बहू!!, बाहर समीर आवाज दे रहा है. ग्रिल की चाभी कहाँ रखी है? ’’
हड़बड़ी में उसे ग्रिल की चाभी नहीं मिली.. वह कभी दराज देखती, कभी टेबल, कभी रसोई का प्लेटफॉर्म. बाहर के हल्ले की आवाज अंदर भी आ रही थी।
‘‘ क्या बात है समीर, कैसी स्थिति है ? ’’
स्मीर से पूछते हुए बाबूजी उतावलेपन में अंदर आ पहुँचे। ‘‘ बहू, जल्दी चाभी लाओ न! ’’
उसने फिर कमरे में प्रवेष किया. पलंग पर ही चाभी पड़ी थी. उठाने में चाभी तीन बार गिरी। दो बार गिरते-गिरते बची। वह उसे लेकर उलटे पैरों न लौट सकी।
समीर और मिहिर साथ ही अंदर घुस आए. समीर ने उसके हाथ से चाभी लेकर जल्दी ग्रिल को ताला मारा और सबको हिदायत देता हुआ हॉल में आ गया. समीर की साँसें धड़धड़ाती रेल। चेहरा सिकुड़कर छुहारा! होठों पर पप़िड़याँ ! मिहिर की हालत भी कमोबेष यही। वे बेहाल लग रहे थे। एक के शर्ट की बाँह एक ओर झुक गई थी। दूसरे के शर्ट का तिहाई हिस्सा पैंट के बाहर लटक रहा था। समीर ने पैंट की जेब में हाथ डाला। उसके हाथ में अचानक एक पिस्तौल आ गई। मिहिर ने अपने बुस्र्ट के अंदर दायाँ हाथ डाल कर उसने बाएँ हाथ से बटन खेाल डाला। दाहिने में एक चाकू की चमचमाहट। सब चैंक उठे। चेहरा पूर्ववत भोला और निष्पाप था। ऐसे में उनके व्यक्तित्व के साथ ये हथियार मेल नहीं खा रहे थे।‘‘ य.....ये क्या? समीर, मिहिर ये कहाँ से उठा लाए ? ’’
‘‘ बाबूजी, यह बचाव के लिए है। ’’
बाबूजी की आवाज की थरथराहट से कमरा काँप उठा-‘‘ अब तुम सब भी हथियार उठाकर बचाव करोगे? ’’
‘‘ जब बीस आदमी घर घेर लेंगे, तब इसकी अहमियत .....’’ समीर की बात पूरी न हो सकी थी। सामने रेखा आ खड़ी हुई थी।
निशा जल्दी से आगे बढ़ी -‘‘ रेखा, गौरव सो गया? ’’
‘‘ हाँ।’’ उसे भी कुछ बू लगी- ‘‘ भैया ये सब....? ’’
वे इत्मीनान से बैठते हुए बोले ‘‘....कुछ नहीं। यों ही...’’ फिर बाबूजी की ओर मुखातिब हुए.
‘‘ लगता है, आज रात तक शायद कफर्यू.....’’
‘‘ कफ्र्यू?.. ये नौबत..? ’’ -बाबूजी अचंभित हो उठे।
‘‘ कफ्र्यू? हाँ, तब बात संभल जाएगी। ’’ -निशा को थोड़ा इत्मीनान हुआ।
‘‘ कफ्र्यू? भैया, हम आज तक कफर्यू नहीं देखें हैं। इस बार देख.....’’ -रेखा का चेहरा उत्सुकता से भर गया।
तीनों ने एक ही साथ तीन प्रतिक्रियाएँ दी। बाबूजी का गुस्सा सातवें आसमान पर। सातवाँ आसमान है गर कहीं, तो।
‘‘ कफ्र्यू देखने की चीज है रेखा? ’’
रेखा का बच्चा रोया और वह फिर अंदर चली गई। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। बचपन से लेकर यौवन तक का समय उस छोटे से गाँव में बिता था जहाँ बाबूजी एवं माँ रहते थे। एक-दो बार भैया की नौकरी के बाद वह भी शहर में उनके साथ रही थी, गाँव में रहने पर दंगा-कफ्र्यू आदि की बातें भी सुनी थी, कभी उस परिस्थति से सामना नहीं हुआ था। उसकी उत्सुकता चरम पर जा पहुँची ।
उसके ब्याह केा मात्र आठ महीने बीते थे और एक अविकसित सतमासे मासूम की सुगबुगाहट ने सबको सावधान कर दिया था। बहुत सेवा-टहल से बच्चे को बचा पाई। तब साँसों को तसल्ली मिली। छः महीने के पुत्र के साथ वह स्वास्थ्य लाभ करने यहाँ आई थी। समय की कमी के कारण इंजीनियर साहब अपनी धर्मपत्नी को यहाँ छोड़ वापस जा चुके थे। अभी उसे आए हुए चार दिन हुए थे कि सब कुछ उल्टा- पुल्टा। निशा उसे इन सब बातों से बचाना चाह रही थी। कितनी देर उसको बहला सकती थी, यह सोचनीय बात थी। रेखा कोई बच्ची तो थी नहीं . हाँ, उसने बच्चों जैसा जरुर कहा था,
‘‘ भैया! कफ्र्यू हम आज तक नहीं देखे हैं. इस बार देख.....’’
उसका भोला उत्साह उस ठंढ में फैन के नीचे सुस्ताता हुआ शांत पड़ा था। अब कमरे का चक्कर लगाने लगा....एक....दो....तीन....चार....दस....
‘‘ निशा, छत के उपर जो काँच के टुकड़े, खपड़े रखे हैं, वे वहीं है न? ’’ समीर पूछता हुआ सीढि़यों की ओर लपका. पीछे-पीछे हाथ में पिस्तौल थामे हुए मिहिर भी दो-दो सीढि़या फर्लांगने लगा। दूर कहीं ‘‘ अल्लाह हो अकबर. ’’ नारे की गूँज थी।
जवाब में ‘‘ जय बजरंग बलि...हर- हर महादेव! ’’ की भी।
निशा का मन काँप उठा। फिर वही सब। बीच मंझधार में डोलती नाव की तरह सब कुछ। पिछली बार की त्रासदी याद आ गई।
निशा ने कनखियों से बाबूजी की ओर देखा. वे उपर जाते दोंनो बेटों को देख रहे थे. आँखों में आशंका की वर्तिका हिलती हुई दिख रही थी। एकदम स्पष्ट !
थोड़ी देर खामोशी छाई रही। उदास निशा अपनी उदासी छिपाने के भरसक प्रयास में जुटी थी।
‘‘ तुम्हारी माँ.? ’’
‘‘....सो रही है।’’
दवा खाने के बाद माँ को दो घंटे तक खूब गहरी नींद आती है। उसे गंधाती हवा से बचाने के लिए दवा की एक डोज दे दी गई थी। हाई ब्लड प्रेशर की मरीज थी वह। दवा का असर कम होते ही जागेगी। घर सर पर उठा लेगी। घबराहट में पता नहीं कितना ब्लड प्रेषर बढ़ा लेगी। अब दोनों बेटे आ गए हैं। अब जगे तो हर्ज नहीं। कमजोरों, बीमारों से भी कितना डरते हैं लोग। प्रकृति ने दिया सबको खूब धूप, हवा, पानी, सौंदर्य. बराबर-बराबर! लेकिन लोगों ने अपने डर की वजहें खुद तलाश कर लीं। पूरे शहर में भय की अबूझी लहरें उठ रहीं थीं। लील रहीं थीं सबके विष्वासों को।
‘‘ हटा दो इस चाकू को. मुझे दहशत हो रही है। ’’ बाबूजी स्वयं ही उसे उठाने लगे। तब तक उपर से मिहिर उतरता दिखा।
‘‘ आप सब कमरे में जाइए।’’ वह किचन के पास जाकर कुछ ढूंढ़ने लगा। ‘‘ क्या चाहिए मिहिर जी? ’’
‘‘ आप कमरे में जाइए भाभी। ’’ -उसने कुछ कठोरता के साथ कहा।
‘‘ लगता है, इस बार सब अपना खुन्नस निकाल कर ही दम लेंगे। प्रशासन को समय रहते कफ्र्यू लगा देना चाहिए। कुछ तो कंट्रोल....’’-वह अपनेआप बड़बड़ाता रहा।
थेाड़ी देर में किचन से कुछ चाकू, फोर्क लेकर छत पर चला गया। एक किनारे खड़े होकर देखते बाबूजी को समझते देर न लगी।
‘‘ कई दंगों ने लोगों को सावधान रहना अच्छी तरह से सिखा दिया है। है न बहू? ’’
वे कमरे में आ तो गए पर इधर-उधर चक्कर काटते रहे. लाउॅडस्पीकर की आवाज से चैंककर फिर कमरे से हॉल में लौट आए। तब तक निशा हॉल में आकर प्रादेशिक समाचार के लिए रिमोट से खेल रही थी। वह भी कान लगा कर सुनने लगी। उन्होंने थोड़ा सा दरवाजा खोला। उनके कान खड़े थे। समीर की आवाज आई-
‘‘ बाबूजी, बाबूजी, अब चिंता की बात नहीं, कफ्र्यू का एनाउंसमेंट हो गया है। ’’
कमरे में बच्चे को लोरी सुनाती हुई रेखा ने भी सुना और वह बाहर निकल आई. परदे के एक सिरे के पास खड़े-खड़े ही उसने सहज उत्सुकता के साथ पूछा-‘‘ क्या कफ्र्यू लग.....? ’’ उसकी आँखों में उत्सुकताजन्य अकुलाहट थी।
दस मिनट बाद मिहिर भी आ पहुँचा. निश्चिंतता की लकीरें उसके चेहरे पर. उसके काले पड़ गए चेहरे पर कुछ रंग लौटने लगे। वह इत्मीनान की साँस लेता सोफे पर पसर गया।
बाबूजी से बहसा-बहसी, सलाह-मशवरा के बाद दोनों भाईयों ने यहीं दुकान खोल ली थी। शहर में रहने का लोभ दबाए नहीं दबा था। कई धनखेत बिक गए लेकिन दुकान चल निकली। थोड़ा निश्चिंत होते ही अभी उसी दुकान की चिंता सताने लगी- ठीक से ताला बंद है?....शटर तो नहीं तोड़ पाएँगे?....मेन रोड के बीचोंबीच दुकान होना भी.......
2
एक बार बाबूजी गोवा घूमने गए थे. वे सदा से यायावरी के शौकीन रहे थे छोटे-बड़े किसी परिचित को उठाया और चल पड़े कहीं भी। वहाँ के सागर-तटों, मंदिरों में घूमते हुए उन्होंने कार के स्थानीय ड्राइवर से कई जानकारियाँ ली थीं। वह बड़े उत्साह से सब बताए जा रहा था. पुर्तगालियों की बातें! सागर में कूदकर जान देनेवाले प्रेमियों की बातें! म्ंदिरों की बातें...स्वर कोकिला लता मंगेशकर की बातें! काजू की पैदाईश.....फेनी , कार्निवल की बातें! गोवा के अनगिन प्रसिद्ध तटों की बातें! कार चलती रही, वे घूमते रहे, वह बताता रहा। अचानक वाशिंदों की बात निकली। उसने बताया कि वहाँ चार ही घर अल्पसंख्यकों के हैं। सहज उत्सुकता से बाबूजी के साथी यायावर ने पूछ डाला था-
‘‘ यहाँ दंगा.....? ’’ उसने कई दंगों की विभीषिका की चोट सही थी।
‘‘....दंगा कैसे होगा सर, यहाँ चार ही घर तो उनका है. ’’
आज से तीस- बत्तीस साल पहले की बात थी। वे इस पर गहराई से सोचने लगे थे। कमसिन उम्र की नासमझी थी उनके साथी पर हावी। उसने फिर प्रश्न दागा था- ‘‘ क्यों होते हैं दूसरी जगहों पर इतने दंगे? ’’
उसके बाद तो वह साथी खुल गया था, ‘‘ ये साले आबादी बढा़कर अपना पावर बढा़ने में लगे हुए रहते है. मैन पावर के साथ वोट पावर। और इधर के लोग हिंदू-मुसलमान का विवाद पैदा करने में। दोनों की अपनी-अपनी रोटियाँ हैं। सेंके जा रहे हैं। ’’
‘‘ आम आदमी कभी भी झगड़ा नहीं चाहता। उसके लिए पेट का सवाल सबसे बड़ा है। ’’ बाबूजी कहते थे।
‘‘ नहीं सर! ये साले अपने बच्चों को मार कर आने की सीख देते हैं। हमलोग की तरह सह जाने की नहीं । खुद मेरे साथी साजिद ने अपने बेटे को सिखाया था कि अकिल बेटे, मार कर आना, मार खा कर नहीं। वही अकिल बेटा धुरंधर निकल गया। ’’
‘‘ आप तो हर बाल की खाल निकाल डालते हो भई। जरा सार्थक सोचा करो। ’’
बाबूजी से रहा नहीं गया था। युवा यायावर साथी गर्म बहते खून से बेहाल। उनसे ही उलझ पड़ा।
‘‘ छोड़िए साहेब, हम क्यों झगड़ रहे हैं ? ’’ बाबूजी को बात खत्म करना ही श्रेयस्कर लगा।
फिर गोवा के कई चट्टानी किनारों के साथ चाँदी सी चमकती बालुका राशिवाले तट ने उनका ध्यान बॅंटा दिया।
उन्हें गुजरात का दंगा याद आया। कई लोग लगातार यही कहा करते-
‘‘ गुजरात का दंगा दबी चिंगारी का प्रतिफल है।? सालों से धीमी-धीमी सुलगती चिंगारी ! ’’
‘‘ भय बिन प्रीत नहीं होती। अब देखो, कैसे शांत हो रहा है सब। ’’
‘‘ गुजरात मॉडल स्टेट बन गया है। ’’
‘‘ हमारे शहर में कहा जाने लगा था- ज्यादा बवाल करोगे तो यहाँ भी गुजरात बना देंगे।’’
‘‘ यह गुजराती दंगा निर्णायक हो शायद। शायद अब एक भी दंगा न हो। कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी तो पड़ता है। ’’ जितने मुँह, उतनी बातें।
‘‘ यह कैसा खोना-पाना है। आजादी के इतने बरसों बाद भी हम भाई-भाई की तरह न हो सके, दुष्मन ही रहे। पूरी जि़ंदगी हिसाब-किताब में बिता देंगे? ’’
गाँव भी करवटें लेते हुए कराहने लगा था। उबलने भी।
चौपाल में दो झुंडों में लोग बैठने लगे थे। एक ग्रुप के हटने के बाद ही दूसरा जमे। साझा संस्कृति के हाथों से बागडोर धीरे-धीरे छूटती जा रही थी। बहुत बारीकी से देखने पर नई पीढ़ी का यह परिवर्तन परिलक्षित होता था। बाबूजी ने कभी इस पर ध्यान देने की कोशिश नहीं की थी। माँ ने भी। वे दुआ-सलाम की औपचारिकता से ही खुश थे। भरमाए हुए भी। नीम-पीपल की छाँव अलग होने लगी थी।
चैपालों पर बातों की दिशाएँ भी अलग थीं।
मसलन-
‘‘ कब तक सेवईंयों से बहलोगे ओर बहलाओगे ? ’’
‘‘ गाय काटकर खिला दो बुतपरस्तों को अबकी ईद में....’’
फिर समवेत जहरीली हॅंसी के गिद्धों की उड़ान बेल गाछ के नीचे जमे चौपाल की जड़ों को हिला डालता।
‘‘ मंदिर के बाहर कुँजड़ा का बेटवा का कर रहा था? ’’
‘‘ मोदिया साला ठीके किया. बड़ा मन बढ़ गया है इनका। बन जाए पूरा भारत गुजरात। तबे आराम होगा। ’’
‘‘ हमारे भाग्य विधाता लोगों ने काहे नय उसी दम सबको लाहौर पेठा दिया था। अभी सब तरफ सांति ही सांति होती। एतना जगह छेक कर रखा है सब म्लेच्छ लोग। ’’
एक बार दबी जुबान से झड़प की सीमा तक बात जा पहुँची थी। ‘‘ जियादा मत फुरफुराओ. गाँव को सच में गुजरात बना देंगे। ’’
‘‘ गुजरात न हो गया, जैसे कोय नायाब संसकिरिति हो गई।’’
‘‘ हमारे हाथ भी चूडि़येां से नहीं सजे हैं।’’
रहमान और मास्टरजी की झलक ने नए खून के उबाल पर पानी डाल दिया था। भंवर में डूबती नाव किनारे जा लगी, या किनारे लग जाने का भ्रम पैदा हो गया। बाबूजी के सामने सबकी बोलती बंद। उन्होंने पूरा किस्सा सुना था और एक आपातकालीन बैठकी बुला ली थी।
बाबूजी आरंभ से केवल कथनी में नहीं, करनी से भी वास्तव में धर्म निरपेक्ष रहे थे। उनका इतिहास उठाकर देख ले कोई. उन्होंने विभाजन के दर्द के बीच वहशी हो उठे हिंदुओं से मुसलमानों के कई बच्चे, कई घर बचाए थे, कई्र स्त्रियों की इज्जत बचाई थी। कई दरिंदों के आगे सीना तानकर खड़े हो गए थे- ‘‘ पहले मेरी लाश....’’
उनके गाँव में बुजुर्ग लोग अब भी वैसे ही होली में एक साथ फाग-कजरी गाते हैं, धुरखेर धूल से खेल खेलते हैं। माँओं को कुछ नहीं मिलता तत्काल तो पुए के लोर, सब्जी के रस से ही होली खेल डालती हैं, भले रशीदा आ जाए या सकीला। दोस्तों को देखते ही मर्द भी धुले मीट के लाल पानी से ही सबके मुँह रंग डालते हैं। गोबर घोलकर सबको लोटनी लोटवाते हैं। कोई तनातनी नहीं।
ईद में सेवई खाने घर-घर बाबूजी भी जाते हैं. बाबूजी की यादों में वे पल सदा महकते रहते हैं।
ईद की गोल-गोल, गुँथीं सेंवईयाँ जब गरम दूध में तैरती हुईं मछलियों की तरह दूध के कटोरे में उतरती हैं, मुँह में पानी भर आता है अब भी। . अभी भी।
‘‘ ह्रिदुओं के लिए अलग से झटका-खस्सी कटता है। ’’ बाबूजी जब आते, इस बात का राग जरूर अलापते - ‘‘ वे लोग झटका खस्सी नहीं खाते। वे जि़बह किया खस्सी खाते हैं। पर झटकेवाला एक बकरा जरुर बनवाते। हिंदुओं की कम भीड़ लगती थी ईद-बकरीद पर।’’
‘‘ ऐसा नहीं कि छुआछूत मिट गया हैं। अब भी वहाँ कुछ हिंदुओं के घरों में गिलास-बर्तन अलग रखा जाता हैं। बाहर ही बिठाया जाता है। कोई अंदर आ गया तो अलग पीढ़ी दे दी जाएगी। कुछ हिंदु कभी भी उनके घर में कुछ नहीं खाते, चाय तक नहीं। औरतों को ज्यादा नेम-धर्म निभाना आता है। ’’
‘‘ बूढ़ी औरतें हाथ का छुआ पानी तक नहीं पीतीं। ‘ मलेच्छ ! मलेच्छ!!’ कहकर खूब बिदकतीं बुढि़याँ ....‘.गाय माता को खाता है सब हॅुह!..... छीह !....छीह!!’ कहते नहीं थकतीं. पर.........’’
‘‘ बीफ को टोकरियों में छिपाकर एक बूढ़ी औरत नसीबन आती थी। खूब छिप-छिपाकर बीफ घर-घर जाकर बाँट- बेच आती। उसके बारे में तो उन महिलाओं को पता तक नहीं। नहीं तो न जाने क्या हो जाता। कुछेक घरों के दिल जु़दा थे। अधिकांश घर -दिल एक ही थे......हैं। ’’
बाबूजी भरम की गाँठ को कसकर बाँधे बैठे हैं। खोलते हुए डरते हैं संभवतः. बस किस्सों से दिल बहलाव करते रहते। सच की कुहेलिका में घुसने से घबराते हैं। नए बच्चों-किशोरों की सोच पर उनका वश न था। बच्चे पंडी जी तथा मौलवी के गुपचुप इशारों पर नाचने के लिए उद्यत हो रहे थे आजकल।
‘‘ बाबूजी, आपको नहीं पता, वहाँ भी.....’’
फिर समीर उनके विश्वास के रंगीले परों को काटने से हिचक जाता। उससे आगे बोला नहीं जाता। विश्वास की पुख्ता जमीन और दीवार का ही तो आसरा है बाबूजी को। रहने दिया जाए भ्रम। वह अंदर की जुबान पर सात ताले जड़ देता। आस्था- विश्वास के भ्रम के टूटने पर बाबूजी जी पाएँगे? जिस बिरवे को उन्होंने अपनी अस्थि- मज्जा देकर सींचा था, उसका ढहना सह पाएँगे? सबको सब पता था। सब ढहते हुए को बचाने की कोशिश में जुटे थे। ‘‘.... अब थोड़ा बदलाव सबमें आने लगा है। ’’
बाबूजी कभी-कभार एक पाँव आगे बढ़ाते। फिर मुहाने से ही वापस। आवाज में वह दम नहीं नजर आता, जो उनकी खासियत थी। कुछ कसका हुआ.....कुछ दरका हुआ. अपनी आवाज का खोखलापन उन्हें भी महसूस होता। कभी लगता, वे जाग रहे हैं। कभी लगता, वे सो रहे हैं।
बाबूजी याने मास्स साहब पहले अपने छोटे से खेत में गेहूं, धान, आलू, तिल उपजाने में ही व्यस्त रहते थे, बाद में खेती में मन नहीं रमा। वह ऐसा समय था, जब हर पढ़ा-लिखा किसान खेती छोड़ने की सोच रहा था। शिक्षा हर किसान को खेती के कार्य में हीनता का अनुभव करा रही थी। पढ़ाई करते ही अपने दादा के दबाव में वे खेतों में उतर तो गए थे पर मन उनका मास्टरी की ओर भागता रहा। उनका सपना शुरू से शिक्षक बनने का रहा था। उन्होंने ट्यूशन करके अपनी पढ़ाई पूरी की थी। उस समय बी. एड. करना आवश्यक नहीं था।
गाँव में स्कूल खुलते ही उन्होंने वहाँ अपनी सेवाएँ देनी शुरू कर दीं। कुछ दिन जस-तस खेती भी साथ-साथ चलती रही। बेमन से कितना आलू, प्याज, गेंहू उपजाते? दो साल लगते न लगते चमरौंधा जूतों से खेतों की धूल झाड़ी और पिल पड़े अपने सपनों को पूरा करने में। सपने बसंत में फूले पीले सरसों की तरह क्यारियों में उगे थे। एक-एक कर उन्हें काटते गए। सबसे पहले अपनी देख-रेख में स्कूल का काया-कल्प किया। स्कूल, जो गाँव के मत्थे पर मढ़ा गया था चाँद की तरह। पर था एक कलंक की तरह। एक भी बच्चा दर्शन तक न दे।
हेडमास्टरी की कमान संभालते हुए घर- घर जाकर बच्चों को जुटाया। अपने घर और वेतन से बच्चों को किताबें, पेंसिल, खल्ली -स्लेट दिया. यहाँ तक कि उन्हें ललचाए रखने के लिए लेमनचूस-नानखटाई, बिस्कुट तक खरीद दिया करते। उस समय स्कूलों में नाश्ता, खाना कहाँ दिया जाता था। उन्होंने फिर उन मास्टरों की नकेल कसी, जो दस-पंद्रह दिन या पूरे महीने विद्यालय से गर्मी के मेघ बन गायब रहते। एक तारीख को भदोइया बेंग बन उछलते रहते. टर्र!...टर्र!!...टर्र!!! वे पूरा वेतन उठाते। बाबूजी ने उन सबको छट्ठी का दूध याद दिला दिया। बाद में सब समय से स्कूल ही नहीं आते, अपना काम भी बखूबी करते।
कितने खेतों पर ट्रैक्टर चले, कितनें खेतों को उन्नत किस्म के बीज मिले। कितने चापानल, कितनी नहरें, कितने झगड़ों का निपटारा! सबसे अहम काम हुआ, उन्होंने बी. एड. कर लिया। उन्हें बी. एड. करने के लिए गाँव से बाहर शहर भेजा गया था। सरकारी खर्च पर ।
रिटायर होने तक वह विद्यालय उनके सपनों का विद्यालय बन चुका था। कितने होनहार के चिकने पातों को पहचान उन्होंने फर्श से अर्श तक उठा दिया। कितने मकई के कोमल रेशमी धागों को मजबूती दी। कितनों को इंसानियत का पाठ रटा दिया। कितनों को एक अद्भुत राह दिखाई, उन्हें स्वयं नहीं याद! उनके स्कूल में कभी भेदभाव नहीं किया गया। अपने घर में उन्होंने कभी अलग ग्लास नहीं रखा। अलग पीढ़ी नहीं सजाई। खुजली मिटाने को कई बार तत्पर हो गए रशीद-मोहना, याकूब-सोहना, आबिद-अमित को हमेशा रोका। सबसे उन्होंने नमस्ते, प्रणाम, दुआ-सलाम, आदाब का रिश्ता बराबर रखा। रिश्तों के इंद्रधनुष में सारे रंग पिरोए.....बैगनी., आरेंज. पीला, नीला...... किसी से कभी परहेज नहीं किया। अब ऐसे में मास्टर जी का दुखी होना स्वाभाविक था।
रेखा वहीं बाबूजी के बगल में कुर्सी पर बैठ गई। उनके हाथों की झुर्रियों पर उसने हाथ रख दिया। झुर्रियों को सहलाने लगी। हौले-हौले। पंद्रह मिनट ही बीते होंगे कि तेज चीखें हवा को धारदार हथियार की तरह चीरती आ पहुँची.. हल्ला-हंगामा बढ़ रहा था। दोंनो भाई लपकते हुए उपर जा पहुँचे।
‘‘ ऐई! हॉल्ट!...हॉल्ट!’’ की आवाज गूँजी और एक खामोशी पसर गई। रेखा को कुछ भी समझ में नहीं आया। वह दौड़कर सीढि़यों की ओर लपकी। वहाँ पहुँचते ही देखा, दोंनो भाई सर झुकाए छत से बाहर झाँक रहे हैं चुपके- चुपके। वह जैसे ही आगे बढ़ी, वे चिल्लाए एक साथ
‘‘ रे ...रेखा.. रेखा....’’
उसकी नजर रेलिंग से बाहर गई। कई फौजी मार्च पास्ट कर रहे थे। संवेदनशील मुहल्ला!! वह जब तक कुछ समझती, हॉल्ट...हॉल्ट की आवाज गूँजी और कई संगीनें उसकी ओर तन गईं। समीर लगभग दौड़ते हुए उस तक आया। उसके खुले मुँह को दबा उसे वहीं नीचे बिठा दिया। दोंनो की साँसें धौंकनी बन गईं।
‘‘ क्या जरुरत थी तुम्हें उपर आने की? ’’
भैया की आवाज की लड़खडा़हट उससे छिपी नहीं रही। झुके-झुके ही समीर उसको थाम पीछे की ओर रेंगने लगा। तब उसने देखा- कई छतों से ऐसे ही आधे झुके, आधे उठे सिर बाहर झाँक रहे हैं। सीढि़यों के पास लाकर समीर भैया ने एक बार चारों ओर देखा, फिर उसे लगभग नीचे ढ़़केल दिया. -‘‘ जाओ नीचे। उपर न आना।’’
वह जैसे ही थोड़ा सा उठी, उसे आकाश का रंग एकदम लाल दिखलाई्र पड़ा। मारे उत्सुकता के उसने चारों ओर देखना चाहा। सब तरफ आग की लाल-पीली लपटें नजर आईं। एक थरथराहट सी उसके टाँगों में हुई और एक नजर फिर से सब पर डाल नीचे भाग आई। नीचे आने के बाद भी काफी देर तक उसके कानों में हॉल्ट!... हॉल्ट! ,चीख- पुकार की आवाज गूँजती रही, आँखों में लाल लपटों की चिंगारी घूमती रही। देर तक काँपती रही कमलिनी काया। खरगोश के रोएँ-सा दिल। अॅंखुआने लगा, कुछ-कुछ समझने का भाव! सत्य से साक्षात्कार का समय शायद आ गया था। बिजली की कौंध ने सब समझा दिया।
‘‘ क्या हुआ?... क्या हुआ? रेखा... रेखा।’’
निशा एवं पिताजी की आवाज वह कहाँ सुन पा रही थी। उनकी बदहवास पर दबी आवाज ने माँ को जगा डाला। वह उठ कर कमरे से जब तक बाहर आई, रेखा संयत होने लगी थी। हर माँ की तरह वह भी बच्चे की किलकारी के साथ किलकारी मारती थी, बच्चे के रूदन के साथ रोती थी। बच्चे की नींद के साथ, सोती, उसके जागरण के साथ जगती थी....हर माँ की तरह वह भी एक माँ थी। लेकिन अभी उसकी चिंताओं में बेटा गौरव नहीं, उसके दोनों भाई थे....हॉल्ट... हॉल्ट की आवाजें.....लपलपाती लपटें थीं....सारा शहर था। उसकी चिंताओं में सारे हिंदू थे। सारे मुसलमान थे।
‘‘ रेखा तुम ज्यादा मत सोचो। जाओ, गौरव को देखो।.सब ठीक....’’ बाबूजी हमेशा कमलिनी को तालाब की गंदगी से बचाकर रखना चाहते।
‘‘....क्या ठीक. बाबूजी आपने देखा नहीं न...’’ बाकी की आवाज उसकी जिद में डूबने लगी. ‘‘....भैया लोग को नीचे बुला लीजिए भाभी।’’
‘‘ हाँ, बुलाती हूँ।’’
‘‘ नहीं ! पहले बुलाइए।’’ वह हिस्टीरिया की मरीज की तरह एक ही रट लगाने लगी।
‘‘ क्या हुआ ? इसे क्या हुआ बहू? ’’
माँ तेजी से आकर उसके सर पर हाथ फेरने लगी। रेखा के ससुराल से आने की खबर से वह भी उत्साहित थी। जब तक रेखा वहाँ रहती, तब तक साथ रहने का मा ने फैसला किया था। वैसे गाँव से ज्यादा दिन दूर रहना उन्हें एकदम नहीं भाता था। गाँव की पगडंडियाँ, भोले झरने, जोड़ा तालाब, ताड़, खजूर के पेड़ से लेकर खेतों कें कीचड़, गोहाल के गोमूत्र-गोबर तक से उन्हें बेहद स्नेह था। खेतों की मेड़ों पर बैठकर वह घंटों आलू कोड़वा सकती थी, रोपा करवा सकती थी, गेंहूँ बुनवा सकती थी, मटर की फलियाँ तुड़वा सकतीं थी। गाय-गोरू की सेवा कर सकती थी, आम-अमड़े के अॅंचार-मुरब्बा में बिजी रह सकती थी। वह भी खुश-संतुष्ट रहते हुए। उसका मन गाँव में ही अटका रहता।
वह कहती है ‘ मूल से ज्यादा सूद प्यारा होता है। ’उसी सूद पर प्यार लुटाने, सेवा करने के लिए वे इस समय यहाँ थीं । रेखा को जबरन उठाकर निशा कमरे में लेती आई। गौरव को उसकी गोद में डाल दिया। और खुद बाहर आ गई। हैवानियत की लपलपाती जीभों के लिए कोई भी रोक बेमानी साबित हो रही थी। बीच-बीच में हल्ले का गुब्बार-सा उठता रहा। वह रात बड़ी दहशत में बीती। हर तरफ नारों का अजीब सा शोर.... डर.... राम रहीम ,अल्लाह, बजरंगबली के नारे एक साथ घृणा में लिपट कर उछल रहे थे। सारे नाम नफरत घटाने में नहीं, बढ़ाने में जुटे थे। सब फरेब! यही तो वजह बन रही अलगाव की।.
‘‘ ईश्वर- अल्लाह तेरो नाम .....सब व्यर्थ..... सबको सन्मति दे भगवान.....’’ बाबूजी की लरजी आवाज। ‘‘ उपरवाले के विभिन्न नामों के बीच कभी इतनी नफरत पनप सकती है, मैं सोच भी नहीं सकता। गुलामी ही अच्छी थी? साथ मिलकर एक मकसद के लिए लड़ते थे। यूँ धर्म के नाम पर एक- दूसरे के खून के प्यासे तो नहीं थे।’’
बाबूजी कह किससे रहे थे? शायद अपने आप से? शायद बहू से? शायद धर्म के नाम पर लड़नेवाले लोगों से? नहीं ...नही! शायद समय से।
माँ भी चुप न रह सकीं। उन्होंने गाँव में रहते हुए विभाजन के समय की भयावहता को देखा था। देखा था-फूट करो और राज करो नीति का परिणाम! आग की जलन! देह में भी, दिलों में भी। फिर सब भूल-भाल कर सबको एकजुट होते भी देखा था।
‘‘ बहू, अभी भी तुमरे चच्चा ससुर मोहर्रम के मौके पर ताजिया लेकर निकलते हैं, वे लोग महावीर जंयती पर महावीरी झंडा लेकर चलते हैं। ’’
‘‘ रहमान को याद करती है, जिसने तुमको भी शरारा और चुन्नी दिया था? विभाजन के समय रहमान को सात छुरा पेटवा में मारा गया था। सातों छुरा पेटवा की अंतड़ी को नहीं छू पाया। पेटवा फट गया था, सारी लदड़ी-पचैनी बाहर। सारा अंतड़ी- पचैनी को हाथ से पेटवा में दबा कर तुम्हारे बाबूजी के पास ही पहुँचा था वह। उस समय सारा देश जल रहा था। हमरा गाँव भी। पर ये उसका इलाज करवाए, घर में छुपा कर भी रखे रहे। वह बलवाईयों से बचने के लिए दस दिन से ज्यादा हमरे घर छिपा रहा था। ’’
माँ की आवाज हिल उठी.- ‘‘ फिर कभी हमरे गाँव को वह दिन नहीं देखना पड़ा। इधर काहे नहीं थमता है जवार ? किसी तरह का बाधा लोगों को हुँआ नहीं डिगा पाता। एक ही बेर में सब लोग बुझ गया कि ई सब सियासी खेल है. यहाँ काहे छोटका बतवा पर भी पगला जाता है लोग! ’’
माँ असमंजस की स्थिति में लगातार बोले जा रही थी। माँ की पुरानी आदत! प्रारंभ में लोग उन्हें मैना कहते नहीं अघाते। चहचहाहट से खुश भी होते। अब तो कभी-कभार चुप रहने की सलाह मिलती है। लेकिन अभी किसी ने नहीं रोका।
‘‘ अरे! जमाल या इमरान जब रामलीला में हनुमान का रोल करते हुए लाल-भभूका बन मंच पर आते, क्या शमां बॅंधता। नकली मूँछ लगाकर रहमान मियाँ के साथ जब हम बाघ बन नाचते थे, क्या मजाल जो कोई पहचान ले- हम हिंदू हैं, मोहमडन नहीं। ’’
बाबूजी का भी पिटारा खुल गया। पर इतना कहते-कहते बुरी तरह हाँफने लगे। यह हंफनी बुढ़ापे से नहीं उपजी थी. बुढापे के कारण उन्हें हाँफते हुए किसी ने कभी नहीं देखा था।
‘‘ तुम सबने देखा है मुझे उस रुप में.....नही ?’’
उनकी यादों से नहीं हटता एक भी विगत पल! रमज़ान के महीने में एक दिन अपने घर में रखे गए रोज़ा अफ़्तार की दावत में दस्तरख़्वान पर बैठे दोस्त-परिचित! लखनवी चिकन का कुर्ता-पाजामा! पठान सूट की बहार! इत्र की ख़ुशबू! उस दिन अपने घर की गहमा-गहमी ! ईदी बाँटना..... कभी भूल सकते हैं?
जब कभी रहमान मियाँ या किसी मुसलमान भाई को जरूरत पड़ती, वे अपनी बैलगाड़ी भिजवा देते। कभी ना-नुकूर नहीं। अपना काम हर्ज हो, तो हो। कई बार रहमान के घर की स्त्रियों के साथ गाँव की अन्य मुस्लिम औरतों को मेले में लाने-लौटाने का जिम्मा उनकी बैलगाड़ी ही उठाती। भले, बैलगाड़ी को दो-दो चक्कर लगाना पड़े। बैलगाड़ी दोनों समुदाय का भरपूर ख़्याल रखती। चारों ओर से रंग-बिरंगे खूबसूरत कपड़ों से ढॅंकी बैलगाड़ी परदानशीनों को बहुत भाती।
‘‘ इस परदे को फाड़कर ही कोई दीदार कर सकेगा....बुरके की ज़रूरत हय? ’’
‘‘ मैं तो बुरका उतार रही हूँ। मेले में पहनॅूंगी अब। ऐ रजि़या, तू भी उतार ना। ’’
काम से लौटकर वे सीधे चाय पीने रहमान के घर दौड़ते। रहमान मियाँ भी खेत-खलिहान, गोहाल से फ़ारिग होकर उनके इंतजार में बैठे मिलते। जब तक दो-दो कप चाय न चढ़ा लें, तब तक चैन था ?....यह तो बहुत बाद की बात है। पहले एक-एक गिलास छाछ या मट्ठा!... बाद के सालों में चाय की जबरदस्त लत और तलब! इस बीच घर-गृहस्थी, दुनिया-जहान, गाँधी-नेहरु, पटेल, गाँव-गिराव, राजनीति-फाजनीति की बातें रंग पकड़तीं। कभी-कभी ठेठ मुसलमान, पाँचों बखत का नमाज नियम से अता करनेवाला हसन रामलीला का मर्यादा पुरूषोत्तम राम बनता। उसके पक्ष में वे सदा खड़े मिलते। एक तो ना-नुकूर होती, नहीं होती भी, तो वे थे ना। वैसे दबी जु़बानें ये कहतीं थीं,
‘‘ रहमान की सिसटरवा टीचर रशीदा आपा अपने से दूध दुहकर रोज हेडमस्टरवा को चाय पिलाती हय. ’’
’’ हेडमस्टरवा उसको सीता का रोल देना चाहता हय. आउर खुदे राम बनेगा.....’’
ही.......ही !....ठी....ठी....!
उन तक भी बात पहुँची थी। वे बहुत ख़फा़ हुए थे। फिर कभी रशीदा आपा का नाम उनके साथ नहीं घसीटा गया।
वर्तमान मे आते ही उन्होंने पुकारा- ‘‘ ऐ समीर! अब आ जाओ नीचे।’’
निशा समझ रही थी, ‘‘ अभी आने लायक स्थिति नहीं है बाबूजी। ’’
‘‘ आजकल रहमान चच्चा कहाँ हैं बाबूजी? ’’ -रेखा ने उनके एकदम करीब आकर पूछा. धीरे से उनके खल्वाट सर पर हाथ रखते हुए। वह धीरे-धीरे उनके सर को सहलाने लगी। बाबूजी को थोड़ा अच्छा लगा।
‘‘ वह अपने बेटे के साथ इसी शहर में इलाज कराने आया हुआ है। उसके बेटे का अपेंडिक्स पक गया है। हम एक-दो दिन में जाकर देखते लेकिन...’’ फिर वे चुप होकर घुटने में सर दे अलाव तापने लगे। आदतन उन्हें यहाँ भी अलाव चाहिए।
सबको झपकी आ गई. किसी ने उस रात कुछ भी नहीं खाया। नींद के कच्चे- पक्के झोंके आते रहे। आशंकित मन कहीं भी बैठा रह गया था... ग्रिल के पास, खिड़की के पास, छत पर ,छत के छज्जे पर, बाहर के बरामदे में कहीं पर।
एकाएक बाहर जोर का शोर उठा- ‘‘ अल्लाह हो अकबर.!’’ ‘‘ नारे तदबीर!’’......‘‘अल्लाह हो अकबर...’’
सब हड़बड़़ा कर उठे. बाहर का शोर अपने घर के बाहर का ही है, समझते देर न लगी। बाहर जोर-जोर से ग्रिल पीटा जा रहा था। तलवार या खंजर की लोहे पर टकराती आवाज भी गूँज रही थी खन ! खनन ! खनन ! खनाक! खनाक!!! पत्थर भी चलने लगे। अंदर सब थर- थर काँपने लगे। रेखा गौरव को गोद में चिपकाकर बैठ गई। उसकी चिंताएँ उलझ-पुलझ जा रहीं थीं। गौरव के कानों पर उसने कंबल को दबा दिया। फिर भी वह बुक्का फाड़ कर रो पड़ा।
‘‘ कहाँ गए फौजी? ... अभी उन्हें नहीं दिख रहा? ’’ बाबूजी दहाडे़ फिर आग को दोनों हाथों से ही उठाने की कोशिश करने लगे- ‘‘ आओ. मैं ही तुम्हारे मुँह झुलसा दूँ शैतानों। ’’
‘‘ बाबूजी, चुप... चुप। सब तरफ से आवाजें आ रही’ हैं....फौजी उधर उलझ गए शायद।’’
बदहवास निशा कभी इधर भागती,कभी उधर। कभी छत की तरफ जाती, कभी माँ के हाथों को पकड़ चुप कराने की कोशिश में लग जाती। उपर दोनों भाईयों के दोनों हाथ चल रहे थे। कभी कोई काँटा फेंकता, कभी काँच के टुकड़े। लहूलुहान होते हुए दंगाई और हिंसक हेाते जा रहे थे। एक पूरे परिवार की बलि के इच्छुक! ग्रिल पर जितनी चोटें पड़तीं, दोनो भाई उतनी ही तेजी से पत्थर, खपड़े, काँच फेंकने लगते। नीचे से भी तलवार, ढेला आदि छत की ओर उछाले जा रहे थे। पर वे सब छत की उँचाई से हार जा रहे थे।
थोड़ी देर में फौजी बूटों की आवाज से पूरा इलाका दहलने लगा। घिरे हुए घर राहत की साँस लेने लगे। खदेड़े जाते लोगों, ‘‘ नारे तदबीर! ’’ ‘‘अल्लाह हो अकबर!’’ ‘‘ जय बजरंगबली!’’ और फौजी बूटो की आवाजें धीरे- धीरे दूर होने लगीं।
माँ के अंदर की आवाज दब नहीं रही थी ‘‘ लाज नहीं आता है सबको। कितना बदल रहा है समाज-देस, एक यही सब नहीं बदल रहा। अब हम तुमलोग को यहाँ एकदमे नहीं रहने देंगे। चलो -चलो गाँव वापस।’’
निशा सबसे यूँ नजरें चुरा रही थी, जैसे अपराधी वह स्वयं हो। जैसे वह शिकार कर रही हो चोरी-चुपके। उसने चुपके से आर्टिफिशियल बेल की ओर ताका जो एक खिड़की पर यत्न से चढ़ाई गई थी। उसी के पीछे से बाहर का जायजा लेने लगी।
‘‘ संबंध भी इतने ही आर्टिफिशियल होते जा रहे हैं। है न निशा? ’’
गाँव यह सब देखकर क्या सोचेगा? पचा पाएगा? बाबूजी अनमने, बेचैन और उदास हो गए। बोलने की इच्छा मर गई। उन्होंने आहिस्ते से ख़ामोशी धारण कर ली। सालों से अपने पर मुग्ध, गर्वित बाबूजी को लगा धक्का गहरा था। मैदान में ही बात उन्होंने खत्म कर दी थी। मॉर्निंग वॉक करने आए सारे लोग तितर-बितर होते हुए उन्हें निहारे जा रहे थे। बात खत्म नहीं हुई थी अब तक. इस बात को वे पचा नहीं पा रहे थे। पचानेवाली बात थी भी नहीं।
वह रात सच में बहुत भारी थी। पूरी रात दहशत एवं डर के साये में. न किसी ने कुछ खाया, न ही आँखों में नींद उतरी। डर के बढ़ते कद के साथ बाबूजी ने सोचा, इतना बड़ा शहर कितना छोटा हो गया है। उस छोटे से गाँव से भी छोटा. उनका मन बहुत देर तक उस सिकुड़ आए शहर के मसले पर सिर धुनता रहा।
दूसरे दिन थोड़ी शांति थी। तीसरा दिन! कफर्यू में ढील दी गई मात्र एक घंटे की। कल तक वारदातों की खबरें आ ही रही थी।
कफ्र्यू की ढील ने लोगों को राहत थमाई। जरूरत की चीजें खरीदने के लिए सभी अपने- अपने घरों से निकल पड़े। मिहिर और समीर भी तैयार थे।
‘‘ एक ही घंटे की छूट मिली है। सामान लाना है?.. जल्दी से उसकी लिस्ट दो।’’
समीर ने फिर रेखा से भी पूछा-‘‘ गौरव को डॉक्टर से दिखाना है? उसको तैयार करो।’’
‘‘ नहीं भैया, अब बुखार नहीं है। तुरंत दिखलाने की जरुरत नहीं है! दवा का फायदा है।’’
‘‘ तब ठीक है, मैं तुरंत आता हूँ। गौरव का बेबी पाउडर का डब्बा भी लेता आउॅंगा। और कुछ...?’’
‘‘ नहीं। ’’
मिहिर भी सब्जी आदि खरीदने निकल पड़ा, बाबूजी की सीख गाँठ बाँधकर ‘‘ पंद्रह मिनट पहले ही आ जाना।’’
बाबूजी आस-पास के इलाके में जायजा लेने निकल कर समय रहते लौट आए। माँ बाहर खड़ी होकर पड़ोसियों से सुख-दुख बाँट आई। बच्चे को सुलाकर रेखा बाहर आई तो देखा, कुछ लोग भर थैला सब्जियाँ ला रहे हैं, कुछ लोग केले के काँधी को कंधे पर लादे आ रहे हैं। कुछ लोग हाथ में आटे का थैला ही उठाए हुए है। कुछ आलू की बोरी रिक्से से उतरवा रहे हैं। हर कोई बेचैन था। फिर से बेसन और चने पर गुजारा न करना पड़े, सब हैरान- परेशान!
‘‘ कितने में एक घैाध खरीदा ? ’’- सुमंत बाबू ने पूछ ही लिया। सलमान रौ में तेज कदमों से कांधी कंधे पर सूअर की तरह लादे हुए आगे बढ़ रहा था।
‘‘ आठ रुपये में खरीदा।’’
‘‘ आठ रूपये में? ’’
‘‘ हाँ! ’’- वह तेजी से बढ़ गया. ‘‘ लूट मच गया जी.....लूट। ’’
सुमंत बाबू गुनगुनाए ‘‘ लूट है भई लूट है, लूट सके तो लूट! ......फिर तो प्राण जाएगा छूट।’’
उन्होंने जानबूझकर ‘‘ राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट! ’’ पर कैंची चला दी थी।
‘‘ ....... प्राण जाएगा छूट! ’’ आधी पंति उन्हें आती न थी। उन्होंने बाकी आधी से ही काम चला लिया। बाथरूम सिंगर सुमंत बाबू की यही खासियत सबको भाती थी। हर विपरीत परिस्थिति में मसखरी। उनका मसखरापन कईयों के जी भी जलाता है, यह कोई सोच नहीं पाता है।
अगल-बगल की कमजोर दीवारों, छतोंवाले लोग पहली या दूसरी मारक रात को ही पक्के मकानों में कूद-कूदकर आ सर छुपा रहे थे। वे भी आज अपने-अपने घरों की हालत देखने गए। फिर लौट आए पक्के मकानों की मजबूत आश्रयस्थली में।
‘‘ दीदी, यहाँ नासिरा बीबी का परिवार रहता था। वे सब कहाँ गए? कब? बाहर से ताला लटक रहा है।’’ रेखा ने बगलगीर से पूछा।
‘‘ तुम नहीं जानती? कफ्र्यू छूटते ही पंछी फरार! गए होगें अपने नाना के घर भाग कर।’’
सीताराम की पत्नी ने अपने छप्पर पर चढ़ी बेल से सीम तोड़ते हुए रेखा को जवाब दिया। घर के बाहर काफी सामान बंधा पड़ा था। एक रिक्षा भी खड़ा था।
‘‘ आप कहीं जा रही हैं, दीदी? ’’ सीम से भरी थैली देखती रेखा ने कुरेदा। ‘‘ ओह! कहीं नहीं. हमरी दीदी का घर मस्जिद के पास है ना.....वहाँ जरा उनलोग का हाल-चाल लेने जाते हैं। एक-दो दिन में आ जाएँगे। बस ! बस ! एक दो दिन में। उसकी तबियत भी तो.....’’
और वे रिक्षे पर बैठ कर चलीं गईं। ऐसी हड़बड़ाहट?
दो-चार परिवार को उसने जाते देखा। दोनों तरफ के लोग घर छोड़कर भाग रहे थे। सब चुपचाप इस इलाके से दूर चले जाना चाहते थे। एक-दूसरे से आँखें चुराते हुए....बहुत दूर! इतनी दूर, इतनी दूर जितना आकाश. चाँद, सितारे। किसी भी विजातीय मानव का चेहरा तक न नज़र आए। इस इलाके को लोग पहले दिन ही छोड़ देते। जरा भी समय मिलता।
‘‘ बस, बीस मिनट रह गया है। ये दोनो कहाँ चले गए हैं? ’’
किसी को जवाब पता न था। कोई भी सही जवाब न दे सका। बाबूजी का प्रश्न यूँ ही लौट आया, अनुत्तरित!
सब्जी बाजार में हरी सब्जियाँ-फल मिट्टी के मोल बिक रहे थे।लोग सब्जी-फल खरीद रहे थे। अपनी- अपनी घडि़यों पऱ उनकी निगाहें थीं। बेचनेवाले भी आनन-फानन में सारा सड़ा-गला माल बेचकर समय रहते अपने-अपने दड़बे में दुबक जाना चाहते थे। चेहरेां पर राहत का हल्का उजास। पर अंदर ही अंदर भय के कीड़े रेंग रहे थे... धीरे- धीरे! आठ आने दर्जन तक केले बिके, दो रूपये किलो तक सेब! मिट्टी के मोल सब्जियाँ ! सड़ी-गली सब्जियों का अंबार मक्खियों को बुला रहा था। सब धड़ाधड़ सामान खरीद थैलों, बोरों में भर रहे थे। जितना, जो मिले स्टोर कर लो। फिर पता नहीं? यह दिलचस्प था कि काम आए, न आए, स्टोर कर लो। पता नहीं कब सब कुछ पहले जैसा होगा? होगा भी या....?
एकाएक भूचाल आ गया। बाजार के एक कोने से लोगों के दौड़ने-चिल्लाने की आवाजें तेज हो गईं। खरीदने-बेचने की आवाजों में भय का कीड़ा तेजी से कुलबुलाया। लोगों के चिल्लाने की आवाज तेज...तेजतर होतीं गईं. भगदड़!
‘‘ भागो...भागो.. हो गया।’’
‘‘ क्या हो गया? ’’
‘‘ भागो भी..’’
‘‘ अरे भईया, क्या हो गया? ’’
‘‘ आखिर हुआ क्या? बोलो भइए। ’’
कुछ लोग ढीठ थे, जमे रहे। देर तक उनकी हॅंसी भागनेवालों का पीछा करती रही। सारे लोग भाग रहे थे। उन्हें भागने की कोई जल्दी नहीं है, ऐसा साफ लग रहा था।
‘‘ भागो, फिर से दंगा हो गया।’’
आनन-फानन में सब सब अपने-अपने दड़बों में सिमटने के लिए दौड़ ही तो पड़े। उन हॅंसनेवाले लोगों के ठहाके चाबुक बन गए। धूप सेंकते, बतकही करते या स्थिति का जायजा लेते लोग भी घरों में दुबकते गए। दरवाजे धड़ाधड़ बंद होते गए। दड़बे भरे-भरे. पतली-पतली गलियाँ तक शोर से खाली। कुछेक ताक-झाँक में बिजी!
निशा अपने ग्रिल को लॉक करने में हिचक रही थी। असमंजस उसकी आँखों को छोटी बना रहा था। -‘अभी तक दोंनो आए नहीं हैं बाबूजी, क्या करें?’
‘‘ ग्रिल लगा दो, उनके आते ही खोल देना। ’’ बाबूजी का असमंजस उनके चेहरे की झुर्रियों में उतर आया। भय भी। निशा भी बड़े अनमने ढंग से ग्रिल में ताला जड़ने लगी। डर ने उसकी साँसों में डेरा डाल लिया था।
‘‘ ऐई निशा! मत बंद करो... मत बंद करो... ऐई निशा, ऐई.....’’ राखी की माँ दौड़ते हुए आ पहुँची। निशा ग्रिल के पास ही थी।
‘‘ अंकित का पापा अभी तक नहीं आया है। किसी को खोजने भेज दो न निशा। ’’
फिर उभरी -‘‘ यहाँ भी कोई नहीं है क्या? हम अभी घर जा रहे हैं। तुमलोग प्लीज छत का दरवाजा खोल कर रखना। हम सब उधर से आ जाएँगे। हमारे घर में रहना एकदम मुश्किल है। ऐसे भी, एक से भले दो। ’’
उसी बदहवासी में वे उल्टे पैरों लौट गईं बार-बार हिदायत देते हुए- ‘‘ जरुर दरवाजा खुला रखना निशा, जरुर. प्लीज!’’
हिरणी की आँखें भी क्या वैसी भयभीत नजर आतीं हैं ? निशा सोचती हुई अंदर आ गई।
पिछली बार भी तो यही हुआ था। आस-पास के लोगों ने उनके घर में ही शरण ली थी। निशा अंदर आ गई, मन बाहर ही अटका रह गया। सभी दोनों भाईयों का इंतजार करने लगे। हर आहट पर वे ग्रिल तक दौड़े जाते। तभी दो बातें एक साथ हुईं. एक- समीर और मिहिर एक ही स्कूटर से घर वापस आ गए, दूसरी- कफ्र्यू का एनाउंसमेंट हो गया। अभी एक घंटा नहीं बीता था। सबकी खिड़कियाँ- दरवाजे पहले ही बंद थे, अब आवाजों को भी काठ मार गया।
बस! कुछ ही देर बाद फिर से ‘‘ हाल्ट!...हॉल्ट!’’ की कर्कश आवाजें थीं।
फिर से सब अपने दड़बों में सिमटे चुपचाप बाहर झाँकने लगे। इस गली में बूटों की आवाज वापस मुड़ गई तो एक फुसफुसाहट बगलवाले घर से उठी-
‘‘ निशा... निशा! ऐई निशा। ’’
दीवारों के पार की महीन आवाज इस घोर नीरवता में सुनाई पड़ते ही निशा छत पर जा पहॅुची। साथ ही उसके घर के दोनों समर्थ युवा भी जा पहुँचे।
राखी के घर की एक दीवार उनके घर की छत से सटी है। राखी का घर पीछे ही तो है। उसके पीछे एक अन्य का। उसके बाजू में एक और खपरैल घर। उस छतवाले घर के चारों ओर कच्चे, छोटे-छोटे छप्परवाले मिट्टी के घरों की लंबी कतार! रास्ते से नहीं दिखते. बगल की छत के पिछवाड़े से किसी तरह चुपके-चुपके पड़ोसन राखी की माँ, उसकी तीनों बहुओं, दो पेातों और बूढ़ी सास को इधर की छत के पिछवाड़े भेज उसके तीनों बेटे घर की रखवाली के लिए वहीं टिके रहे। बहुओं के साथ छोटे- छोटे बक्से भी आए गहनों से भरे हुए। उपर में तहाए कपड़ों से ढॅंके! सब कुछ बहुत चुपचाप से। बूटों एवं तनती बंदूकों से बचते हुए। यूँ भी शाह से ज्यादा तीक्ष्ण चोर की बुद्धि होती है। शाह को भनक भी नहीं लगी।
सब हड़बडा़हट में बाबूजी के पास आ बैठे। सब शांत थे। भीड़ थी पर एक आवाज नहीं। एकदम सन्नाटा। बाबूजी टी. वी. खोल कर बैठ गए थे। तत्काल कहीं से खबर नहीं मिल पा रही थीं। उनकी कोशिशें जारी।
रेखा उब रही है। कफ्र्यू से अब वह उब रही है। चार दिनों के लिए आना हुआ, वह भी नज़रबंद रहते गुजारना। बहुत बोरियत!
शाम में गौरव का बुखार अचानक बढ़ने लगा। चिंता उसके माथे की सलवटों में जा बैठी। रेखा के चेहरे पर फिर से एक सहमी चुप्पी की सशंकित गिलहरी आ बिराजी। वह गौरव को थामे कभी बैठती, कभी उठती, विचित्र बेचैनी से घिरती जा रही थी।
‘‘ कितना अच्छा होता भाभी, हम भैया की बात मान इसे दिखला देते। अब फिर पता नहीं कितने दिन तक कफ्र्यू...? ’’
दोनों भाई फिर से छत पर मोर्चा संभाल चुके थे।
‘‘ हो गया’.....हो गया.....फिर हो गया। ’’ की प्रतिध्वनि में ‘‘ नारे तदबीर... अल्लाह हो अकबर...’’ ‘‘ जय बजरंग बलि, तोड़ दुश्मन की नली....’’ नारों से पटने लगा था शहर पुनः .
कौन दुश्मन?, कैसा दुश्मन? किसका दुश्मन? स्थिर नज़रों से छत की ओर ताकती है रेखा। फिर नज़रें झुका लेती है। एकाएक गौरव जोर से हिचकियाँ लेने लगा। रेखा ने थर्मामीटर लगा कर बुखार नापा। एक सौ तीन....पानी से तर पट्टी लेकर माँ बैठ गई। रेखा का दिल बैठता जा रहा था, कैसे क्या होगा? किंकर्तव्यविमुढ़ रेखा!
‘‘ सतवांसु बच्चा को कब क्या हो जाए, कहना मुष्किल!’’ माँ भी घबराने लगी ।
निशा उपर की ओर दौड़ी ‘‘ मिहिर... समीर! ’’-फटी आवाज! चौंक कर वे दोनों खड़े हो गए। भूल गए, फौजियों की बंदूकें भूखीं हैं.
‘‘ ऐई...बैठो...बैठो..’’ बंदूकें इनकी ओर तन गईं. वे फिर झुक गए। इशारे से पूछा-‘‘ क्या बात है? ’’
वे निशा का इशारा नहीं समझ सके, पर मिहिर नीचे आ गया झुके- झुके ही। जब तक मिहिर, निशा नीचे आए, घबराहट की मारी रेखा बच्चे को लेकर बाहर आ गई थी। बाबूजी रोकने की कोशिश में। माँ भी बाहर। रेखा दायाँ हाथ लगातार हिला रही थी- ‘‘ हेल्प!...हेल्प! ’’
रेखा के बाएँ हाथ में गौेरव की गर्दन गौरैये की गर्दन की नाईं झूल सी गई। बाबूजी हाथ की चाभी को ताले पर घुमा ही रहे थे कि मिहिर आ पहॅुंचा-
‘‘ ये क्या कर रहे हैं बाबूजी? ’’
‘‘ अरे गौरव... .वह.....’’ उनकी आवाज रेखा के चीखने एवं एक फौजी के चिल्लाने में दब गई।
फौजी दबाव में था। वह कटखना हो आया।
‘‘ एई!.....ऐई क्या हो रहा है? अंदर चलिए, अंदर। आपलोग पढ़े- लिखे होकर भी....चलिए अंदर। ’’
‘‘ मेरा बच्चा। बाबूजी, भैया, यह तो...’‘ रेखा फिर हिस्टीरिया की मरीज बन गई। ‘‘ इसे बचा लो भैया। बचा लो। डॉक्टर के पास...’’
उधर फौजी कुछ सुनने को तैयार नहीं था। उसकी खामोश तनी बंदूक कभी भी चीख सकती थी। मिहिर ने रेखा को अंदर खींचना चाहा।
‘‘ रेखा, मैं बात करता हूँ, पहले तुम अंदर आओ।’’
बाबूजी अलग चिल्लाने लगे, ‘‘ आपलोग हमारी सुविधा के लिए हो. न कि...’’
‘‘ एक!... दो...! ती...!!’’
‘‘ चलिए अंदर।’’ निशा बाबूजी को खींचती अंदर आ गई। पीछे- पीछे माँ भी. रेखा की हालत अजीब हो रही थी। बाबूजी को इतना जिद्दी होते उसने कभी नहीं देखा था। मिहिर फिर बाहर निकल आया। इस बार उसके हाथ उसके सर से उपर थे।
‘‘ देखिए, एक बच्चे को मेडिकल ट्रिटमेंट की तुरंत आवष्यकता है। ’’
‘‘ हॉल्ट!...हॉल्ट! जाइए, पहले अंदर. आप सब समझते क्यो नहीं हैं। शहर फिर से जलने लगा है। अफवाह उड़ी थी, उसके कारण शहर फिर से.....’’
वह दौड़ता हुआ दूसरी ओर निकल गया। वहाँ से हल्ले की तेज आवाज उठी थी। गौरव एवं रेखा की हालत किसी से देखी नहीं जा रही। सब बेबस कैदी की तरह फड़फड़ा रहे हैं, बस! मिहिर ने दूसरी दवा ढूँढनी चाही, नहीं मिली। मिल भी जाती, इतना आसान न होता दवा बदलना। सब फिर से घरेलू उपचार में लग गए। राखी का परिवार भी। समीर मोर्चा छोड़ नहीं पा रहे। वे नीचे का हल्ला सुन कर खाली गुस्सा कर रह गए कि कौन इस समय बाहर झाँक रहा है। एकदम अक्ल बेच खाया है।
बाबूजी ने फिर से टी.वी. ऑन कर समझना चाहा। टी. वी. बता रहा था-
‘ हो गया। हो गया। ’ की अफवाह ने फिर से दंगा भड़का दिया है। बात वास्तव में यह थी कि एक साँड़ ने सब्जी मंडी में कुछ लोंगों को दौड़ाया था। उनको दौड़ते देख अन्य अनजान, डरे- सहमे लोग ‘हो गया ..हो गया’ कह भाग खड़े हुए थे. प्रषासन ने लोगों से षांत रहने की अपील की हेै. अफवाहों पर ध्यान न दें....अफवाह फैलाना अपराध है’....आदि....आदि....
कर्फ्यू दो दिनों के लिए और बढ़ाया गया।
सबने चैन की साँस ली। कोई नहीं जान सका, इस अफवाह ने इस बार बाथरूम सिंगर, हॅंसोड़, अपने पर भी हॅंसने की ताकत रखनेवाले सुमंत बाबू की जान ले ली है। अब इसमें उनके ‘‘ राम नाम की लूट है...लूट सके तो लूट ’’ का कितना बड़ा हाथ है, समझ पाना किसी के बस की बात थी भी नहीं। वैसे सलमान ने केले बहुत शौक से खाए। और भुजाली को उन्हीं केलों के छिलकों से पोछा। बड़े इत्मीनान से। बड़े प्रेम से. संबंधों पर बड़ी आसानी से धूल पड़ती जा रही है।
आधे घंटे किसी तरह गुजरे। मिहिर ने थेाड़े स्थिर हो चुके फौजी से बात करने के लिए ग्रिल खोल दोनों हाथ हिलाया. वह पास आ गया.
‘‘ क्या बात है? आप थोड़ी देर वेट नहीं कर सकते. हम उपाय कर रहे हैं. ’’
‘‘ अभी गाड़ी बुलाइए. इस बीमार बच्चे को हाॅस्पिटल लेकर जाने दीजिए.’’ मिहिर का सब्र कोषी के तट की तरह टूट गया.
बात बढ़ता देख बाबूजी ने दोंनो को षांत किया. फिर खुद बात की. कुछ देर बाद ही जिप्सी दरवाजे पर आ लगी. रेखा बच्चे को उठाकर, पिछली सीट पर जाकर बैठ गई. चारों ओर सन्नाटा! आग की लपलपाती जीभें! सड़कों पर खून के धब्बे! बड़े-बड़े धब्बे. जैसे देष के माथे पर ही जा चिपके हों. हवा साॅंय-साॅंय करती हुई. जले घर, दुकानें. फौजी बूटों की धमक! और अपने आलीषान अट्टालिकाओं, माॅल, गाडि़यों के विषाल षो रूम, विभिन्न षैक्षिक केंद्रों, चमचमाती सड़कों, नियौन लाईट से अटे पड़े विकास की हद लांघते षाईन करते षहर की दुर्गंध! रेखा ने नाक पर रूमाल रख लिया. कोई फर्क पड़ता ? पड़ा भी नहीं। दुर्गंध देर तक उसका पीछा करता रहा। विश्व गुरू, ग्रेट इंडिया सड़कों के खून में लिथड़ा था। जाते-जाते आतताइयों द्वारा बोए गए बीज ने काफी दिनों तक असर दिखाया था।
अस्पताल पहुँचते ही वह जल्दी से उतर पड़ी। वहाँ न ज्यादा मरीज, न चहल- पहल! डॉक्टर भी इक्का-दुक्का! रेखा को बड़ा डरावना सा लगा। रास्ते का भयावह सन्नाटा यहाँ नहीं था। यहाँ था, दर्दीले चीखों का डरावना शोर! उसने अचानक रहमान चच्चा को अपने बेटे के बेड के पास खड़े देखा। वह घबरा गई। वे राम चाचा होते, सहारे के अहसास से घिर जाती। दुर्भाग्य से वे रहमान चच्चा निकले। बचपन में उनके कंधों का सहारा मिला था। अभी याद भी करना नहीं चाहती। ग्रिल पर पड़नेवाले खंजर- तलवारों की चोटों की याद ताजा थी।
दूसरी ओर मॅंुह फेर, घबराहट को छिपाती तेज कदमों से आगे बढ़ गई। गौरव की चिंता तो थी ही, अविश्वासी गिद्ध के पैने डैने भी मन-मानस पर फैले थे। सारा अस्पताल परिसर साझा दुख, साझा दर्द, साझा चोट, साझा भय से आक्रांत था।
बाबरी मस्जिद विवाद के समय माँ ने रेडियो में न्यूज सुनकर कहा था,
‘‘ अजोधया जी में एतना लड़ रहा है सब। सरकार हुआँ अस्पताल काहे नहीं बना देती है? सारा झगड़ा-डंडा खतम। हिंदुवन-मुसलमनवन दोनों कराएँ मुफ्त इलाज। किसी के लिए कोय रोक-टोक नहीं। ’’
अनपढ़, धर्मपरायण, धर्मभीरू, राम की परम भक्त माँ की यह सलाह सबको स्तब्ध कर गई थी। ‘‘ नाम दे, राम-रहीम अस्पताल ’’
रेखा कई लागों को एक-दूसरे को पानी पिलाते, हाल-चाल पूछते, सांत्वना देते हुए देख रही थी। पता ही नहीं चल रहा था, कौन हिंदू, कौन मुसलमान, कौन सिक्ख, कौन ईसाई है। सब अकेले थे। सब साथ थे। माँ की बात याद आ गई,
‘‘ राम-रहीम अस्पताल ’’
बच्चा बीमार और रेखा का कोमल हदय! अपने भाईयों से भी ज्यादा.... खरगोश के रोएँ के माफिक! उसे यह सब दृष्य राहत भी पहुँचा रहा था। ओस की बूँद पिघल रही थी। गौरव को छाती से लगा वह धीरे से फुसफुसाई-
‘‘ भाभी, इन घायलों का इलाज नहीं होगा? उनके घरवाले खून के लिए कैसे चिरौरी कर रहे है। इतने बड़े शहर में खून के बिना ही वे मर जाएँगे? ’’
‘‘ अभी कफ्र्यू है न रेखा, इसीलिए। नहीं तो, खून देनेवालों की लाईन लगी रहती। ’’
‘‘ भाभी, कफ्र्यू ऐसा होता है?....दंगा इसे कहते हैं? ’’ - उसने ठहर-ठहरकर कहा। आवाज में तूफान के बाद का ठहराव! वह गौरव की ठंढी पड़ती हथेलियाँ चूम तेजी से रगड़ने लगी। भय की एक ठंढी लहर उसके खून में फिर रेंगने लगी।
तभी एक वृद्धा की आवाज से सारा अस्पताल परिसर काँप उठा,
‘‘ या अल्लाह! रहम कर! ’’
सन जैसे सफेद बालों और झुर्रियों से भरे चेहरेवाली वृद्धा ठीक से खड़ी भी न हो पा रही थी। एकाएक वृद्धा दौड़ती हुई एक कोने से दूसरे कोने में आने-जाने लगी। उसका पूरा शरीर तूफान मेल बन गया। पता नहीं, उन बूढ़ी हड्डियों ने इतनी ताकत कहाँ से बटोर ली?
एक डॉक्टर पास आ गए। वे कहने लगे - ‘‘ आपका बेटा कब से ब्लड लाने गया है, अब तक लौटा नहीं? अब ज्यादा देर नहीं। कहीं से भी खून का इंतज़ाम जल्द होना चाहिए......बी. पॉजिटिव। ’’
उन दोनों ने देखा, वृद्धा हाथ उठाकर दुआ करने लगी.....डॉक्टर से, अल्लाह से।
रेखा से रहा नहीं गया. वह उसके बेड के पास जा पहुँची। वह किशोर ऐंठ रहा था। उसकी लुंगी खून से तर थी। उसकी पतली-पतली, नाज़ुक रोंयेंवाली दाढ़ी में खून चिपका था। उसकी नई-नवेली भूरी मूँछे भी खून का स्वाद चख चुकी थीं। उसकी आँखों में मौत और जिंदगी के बीच का एहसास दम तोड़ रहा था।
वह बहुत मासूम, पवित्र लग रहा था....जैसे चाँद....जैसे सितारे.... जैसे सवेरे का सूरज....जैसे मंदिर...जैसे मस्जिद!....जैसे फ़ज़र की अज़ान....जैसे मग़रिब की अज़ान!....जैसे अल्ल्लाह की इबादत!....जैसे ईश्वर की प्रार्थना!....जैसे सूर्य को अर्ध्य!
जैसे.....जैसे उसका अपना गौरव। गाने की तर्ज पर रेखा ने उसकी मासुमियत को परखा।
वह आगे बढ़ आई। अचानक! गौरव को गोद में थामे हुए ही। गौरव की गर्दन अभी भी लटकी हुई थी।
‘‘ आपको ब्लड चाहिए डॉक्टर? बी. पॉजिटिव? मेरा ग्रुप बी. पॉजिटिव है। आप उस बच्चे की जान बचा दीजिए न. ....प्लीज!’’
अभी हैरान-परेशान लेकिन अपने पर सदा मुग्ध, गर्वित रहनेवाले बाबूजी के द्वारा सींची गई रेखा की ही आवाज थी यह। कोई शक?
गोरख धंधों और लालफीते की ताना शाही दिन-प्रतिदिन और और मजबूत होती नजर आती। आजाद भारत की बहती गंगा में सभी हाथ धोते दिख रहे थे। हर अपराध की जड़ में आर्थिक वजहें, तुरंत अमीर बनने की ख्वाहिश।...
हर नागरिक आजाद भारत में जी रहा था और आजादी के नाम पर उच्छृँखलता उसका जन्मसिद्ध अधिकार।
' अपना अस्पताल क्यों नहीं बना लेते, चरसा काटोगे चरसा। गरीबों के बारे में सोचना ही बेकार है, बीमारी से बचा लोगे तो भूख से मर जाएंगे।' सलाह-मशवरे सुनकर मन विष्तृणा से भर जाता।
अमीर-गरीब सभी को गलत काम करने में कोई हिचक नहीं थी अब। मन की अदालत में जज और जूरी खुद ही बना समाज अपराधों की दलदल में धंसा जा रहा था। आध्यात्म और आदर्श की चादर के नीचे चारो तरफ चोर लुटेरे ही थी और हर कुर्सी को भाई-भतीजेवाद के पावों ने मजबूती से संभाल रखा था।
यह कैसा भारत है? क्या इसीके लिए पूर्वजों ने कुर्बानियां दी थीं? यह उसका भारत नही था ! न तो मन को सुख मिल रहा था और ना ही तन को। जिन सपनों जिन आदर्शों के ताने बाने पर बचपन में अभिवावक और शिक्षकों ने भारत की तस्बीर रची थी, वह सपना तार-तार बिखरा, दम तोड़ रहा था।
कितनी मान-मनौवल के बाद राजी हुए थे गौरव भारत लौटने के लिए--हफ्ते में एक दिन गरीबों का मुफ्त इलाज और जाने क्या-क्या इरादे लेकर लौटे थे वह, अनिभिज्ञ कि इरादों का कोई मूल्य नहीं होता...मानवता की सेवा और देश के हितैषी जैसे बड़े-बड़े दावे करने वाले भी, अधिकांशतः खूनी भेड़िए ही हैं। इनसे जीतना का एक ही तरीका है –खुद बबर शेर बनो। दिशा जान चुकी थी कि मात्र उसकी सोच ही नहीं, भारत में भी बहुत कुछ था जो बदल चुका था, वक्त सबकुछ बदल देता है।
कहीं वह और उसकी सोच ही तो पिछड़ती नहीं जा रही ? कहीं जिन्दगी की दौड़ में हार तो नहीं रही है वह?...क्या हो गया है उसे, यह दौड़...हारजीत...वह भी अपनों के बीच, अपनोंके साथ...क्या-क्या और क्यों सोचे जा रही है वह..गीता में भी तो यही लिखा है मन ही चालक है इन्द्रियों का…यह शरीर तो मात्र एक वाहन ! निरर्थक यह आत्मविश्लेषण रोकना ही होगा उसे। हर बात और निर्णय भी तो अपना वक्त मांगते हैं इसका यह अर्थ तो नहीं कि शंकाओं में घिरकर हार मान ली जाए। लौटना तो कभी सही नहीं महसूस होता और फिर वास्तव में कौन भला लौट पाता है कभी...वक्त कुछ नहीं लौटाता, ना ही खुद ही लौटता है।
लौटने का वह निर्णय गलत था या सही, यह तो वक्त ही बताएगा- पर अभी तो एक अंधड़-से में बही जा रही थी दिशा।
सोच के बहाव में बहते-बहते सुपर मार्केट से सामान उठा-उठाकर पूरी ट्राली भर ली थी दिशा ने। पैसे देकर बाहर निकली तो –‘ नमस्ते जी, नए आए हो क्या, इस मोहल्ले में पहले देखा नहीं आपको?’ कहकर उसके लिए दरवाजा खोल दिया था सामने खड़ी एक अपरिचित महिला ने। उसके हाथ भी नमस्ते में वापस जुड़ गए। गौर से देखा तो महिला एशियन मूल की थी और वेश-भूषा बता रही थी कि पंजाब प्रांत से थी।
‘ हाँ, हफ्ते पहले ही आई हूँ,मैं । ‘
‘ कहाँ भारत या पाकिस्तान से? ‘ अपरिचिता की जिज्ञासा उसके बारे में सबकुछ जान लेना चाहती थी, पर उत्तर सुनते ही आँखों में हर्ष और विषाद का जो एक गुबार दिखा दिशा को उसने विस्थापन की सुनी-पढ़ी वेदना को पुनः जीवित कर दिया था।
‘ भारत से? ‘
उसकी उतावली जिज्ञासा अब शिष्टता का अतिक्रमण कर रही थी।
‘ हाँ।‘
‘ फिर तो ठीक है। कोई भी जरूरत , परेशानी हो तो मैं बगल के ही मोहल्ले में रहती हूँ। मुझे आवाज देने में मत हिचकिचाना।‘
अब उसके चेहरे पर एक संतुष्ट सी मुस्कान थी।
जल्दी से पर्स से टिशू पेपर निकालकर उसीपर आनन-फानन अपना टेलीफोन नंबर लिखकर उसे पकड़ाती हुई वह बेहद सादे लिबास में लिपटी प्रौढ़ा सामान के बोझ से लड़खड़ाती सामने के बस स्टौप की तरफ जाने को लपकी-
‘ चलती हूँ मेरी बस आने वाली ही है।‘
कुछ था उसमें जो छू रहा था मन को, शायद उसका पहनावा, उसकी भाषा, उसका हिन्दुस्तानी होना... दिशा रोक नहीं पाई खुद को, जानते हुए भी कि अपरिचितों से ज्यादा मेल-मिलाप ठीक नहीं, उसने खुद को कहते पाया –‘ आइये मैं आपको आपके घर तक छोड़ देती हूँ। ‘
महिला ने भी कोई आपत्ति या ना नुकुर नहीं की। ‘ ओह दैट इज सो नाइस औफ यू। आज मेरे गोड़े भी बड़े दुख रहे थे ‘, कहती वह अगले पल ही सामान बूट में रखवाकर उसके बगल में आ बैठी। दिशा ने चोर नजरों से देखा कि अब उसकी आंखें खुशी और अपनेपन दोनों से ही लबालब भरी हुई थीं।
सुपर मार्केट से उसके घर का रास्ता दस मिनट से ज्यादा का नहीं था और दिशा के घर से भी।
दरवाजा पगड़ी विहीन सरदार जी ने खोला । दिशा देखती ही रह गई । किसी सरदार को उसने यूँ बिना पगड़ी के पहली बार देखा था। बालों की गांठ सिर के ऊपर जूड़े सी बंधी थी और जबड़ों से लेकर सिर तक कसकर लपेटी गई सफेद पट्टी बता रही थी कि सरदार जी शायद दांत के दर्द से परेशान हैं।
‘ फिटकरी से कुल्ला किया था? कोई चैन नहीं पड़ा जी ?’
आदतन् मजबूर बीबी के सवाल ने सरदार जी को कुछ-कुछ छेंपा दिया था। दर्द को भूल, मुस्कुराकर बोले –
‘ मेरी फिकर छोड़, पहले मेहमान को तो घर के अंदर आने को कह। चाय नाश्ता करवा। ‘
नमस्ते के बाद ‘ नहीं, नहीं। आज नहीं। फिर कभी आऊंगी। ‘ संकोची दिशा बस इतना ही कह पाई। जल्दी ही घर वापस पहुँचना चाहती थी अब वह।
‘ ऐसे कैसे हो सकता है? पांच मिनट को तो अंदर आओ । एक कप चाय पीकर फिर चली जाना। यह गरीब भाई दरवाजे से बहन को यूँ तो नहीं ही लौटने देगा।‘
दिशा अब निरुत्तर थी। और अगले पल ही उनके ड़्राइंगरूम में सोफे पर बैठी हुई थी।
‘ भारत में कहाँ से है बेटी? ‘
दिशा सामने बैठी बुजुर्ग महिला को जबाव दे इसके पहले ही चाय मठरी और सोन पापड़ी लेकर साथिन आ गई और तश्तरी प्यालों को मेजपर सजाते हुए धीरे से फुसफुसाई-
‘ये बीजी-मेरी सास हैं। साथ रहती हैं। बड़ी खराब आदत है इनकी। कोई भी आए इन्हें जरूर आगे-आगे सब कुछ बताए। ऊँचा सुनती हैं। जोर से जबाव देना। सिर में रोज शीशी भर तेल उड़ेल लेंगी। बाथटब इतना चिकना हो जाता है कि साफ करते करते थक जाती हूँ मैं । पर क्या करूं, हाथ-पैर तोड़ लिए, तो भी तो मेरी ही मुसीबत।‘
इस मुल्क में बुजुर्गों की जगह दिशा को समझ में आ रही थी। अधिकांश का बुढ़ापा बुजुर्ग घरों में ही निकलता है, जानती थी वह। इक्की-दुक्की जो परिवार में रह पाती हैं, वह भी व्यस्त जीवन में बोझ ही हैं जिन्हें युवा ढोते हैं। दिशा का मन भर आया। अभी तक सौम्य और शिष्ट लगती महिला की कुछ-कुछ हताश और कुछ-कुछ मखौल उड़ाती-सी आवाज दिशा को अंदर तक उदास कर गई। वह उठी और सामने बैठी बुजुर्गा के बगल में जा बैठी।
‘ नमस्ते बीजी। मैं इलाहाबाद से हूँ।‘
‘ नमस्ते। सत् श्रीकाल। बड़ा सोना शहर है जी। एक वरगे मैं भी कुलवन्दे प्यो संग संगम नहान वास्ते गई थी उत्थे। बरसों पीछे दी गल है। ‘
झुर्रियों भरे चेहरे से स्नेहभरी वे मुस्कुराती आँखें दिशा को बेहद पहचानी सी और अच्छी लग रही थीं। वह उन्हें सुन कम और महसूस ज्यादा कर रही थी।
‘ जी, बीजी। आप भी चाय पीओगी।‘ अपने हाथ का प्याला उनकी तरफ बढ़ाती दिशा बोली।
‘ मन तो नहीं था पर तू कहती है तो पी लेती हूँ। चीनी तो नहीं पड़ी। मैं फीकी ही पीती हूँ। शुगर की बीमारी ने सब खाना-पीना छुड़वा दिया। वरना मेरे वरगे का शौकीन तो पूरे पिंड में कोई और नहीं था। मेरे भल्ले भटूरे तो आज भी सब उंगली चाट के खावें। तू बता कर आइयो। मैं पा रखूँगी।‘
अब वह उसके हाथ सहला रही थीं।
‘ ऐसी भिंडी वरगी नाजुक-नाजुक उंगलियाँ, पतले-पतले कोमल हाथ, एक गांठ नहीं हथेली में। तू मन की बहुत अच्छी है, पर कैसे करती होगी इन हाथों से घर के सारे काम ...ये फूल से हाथ तो राजकुमारियों से हैं। ‘-कहकर बीजी ने उसके हाथ अपने होठों से लगा लिए और अतीत में खो गई दिशा भी- उसकी अपनी मां और दादी भी तो यही कहा करती थीं। आंखें भर आईं। उनके स्नेह के ज्वार में वह भी पूरी तरह से डूब चुकी थीं और वे कब आप से तू पर उतर आई थीं दिशा को भी पता नहीं चल पाया था।
चाय की प्याली मेज पर रखकर उसने परिवार से विदा लेनी चाही।
‘ फिर जरूर आना , बहन।‘
इसबार सरदार जी बोले थे और बलवंत उनके साथ दिशा को दरवाजे तक छोड़ने आई थी। साथ में एक लिफाफे में मठरियाँ थीं।
‘घर की बनी हैं। बच्चों को अच्छी लगेंगी। ‘
मना करना असंभव हो चला था, स्वाभिमानी और संकोची दिशा के लिए भी।
परिवार का अपनापन और कुरकुरी स्वादिष्ट मठरियाँ साथ लेकर ही घर वापस पहुँच पाई थी दिशा उस दिन। मन से पूर्णतः संतुष्ट।
अगले दिन बलवंत टहलते-टहलते आ गई थी । और आते ही बड़ी बहन की तरह बहुत सारे सलाह व मशवरे दे डाले थे, मसलन कौन सी चीज कहाँ से खरीदनी चाहिए वगैरह, वगैरह। फिर तो यह एक आदत-सी बनती जा रही थी। वे प्रायः चाय साथ ही पीतीं। दिशा भी उसका कभी शौपिंग तो कभी वाकिंग में साथ देने लगी थी। किसने कहा भारत पीछे छूट गया-भारत कभी पीछे नहीं छूटेगा, जब तक भारतवासी हैं। कहीं भी रह लो मिट्टी अपनी जात और स्वभाव तो नहीं बदलती।...
पहाडी इलाके में बाढ़ ने तबाही मचा दी। अनेक बह गए, कुछ रास्ते में फंस गये. वे भूखे-प्यासे थे. तभी कुछ लोग खाने के पैकेट और पानी की बोतलें लेकर पहुँचे। लगा, भगवान् भेष बदल कर आये हैं। तभी उनमें से एक व्यक्ति ने कहा, ''एक रोटी के चालीस रुपये और पानी की बोतल के दो सौ लगेंगे''. मरते क्या न करते, सबने पैसे दिये. सामान बेच कर व्यापारी लौट रहे थे। एक बोला, ''आज तो एक ही झटके में हजारों कमा लिए। भोलेबाबा ने छप्पर फाड़ कर दिया है''. उसने इतना कहा ही था कि उसका साथी चीखा, ''अरे बच के। देखो, चट्टान गिर रही है'' सब तेजी से भागे लेकिन सफल नहीं हो पाए और वहीं दब कर मर गए। हाँ, उन के कमाए चमकदार नोट ज़रूर सलामत थे.
जेंटलमेन प्रोमिस
पिछले साल की तरह इस बार भी 'वे' बाढ़ की तबाही का हवाई सर्वे कर रहे थे। लोग बह रहे हैं, मरे पड़े हैं, घर डूब गए है। ऊपर से ऐसे दृश्य निहारो, तो बड़ा रोमांचक होता है. मीडिया के सामने आंसू बहा कर वे घर पहुंचे तो पत्नी बोली, ''आप बड़े वो हैं। इस बार भी अकेले-अकेले उड़ गए''। बच्चे बोले, ''हम भी एन्जॉय करते पॉप''। महोदय ने शरमाते हुए कहा, ''अरे, डोंट बादर, तबाही तो आती रहती है। अगली बार साथ-साथ चलेंगे। इट इज जेंटलमेन प्रोमिस।'' संतुष्ट हो कर पत्नी लेडीज़ क्लब के लिए निकल गयी और बच्चे 'लाँगड्राइव' पर।
आप जीते थे थोड़ी थोड़ी जिन्दगी उन सब में जो आपके द्वार पर खड़े थे अब वे नहीं हैं तो आप भी थोड़े तो कवलित हुए ही होंगे केदारनाथ!
कुछ आशाएं कुछ आस्थाएँ उन्हें यहाँ ले आती थी वे चाहते थे मन्नत करते थे उनका समय बदले अखबार की सुर्खियाँ कहती हैं हमेशा के लिए बदल गए हैं केदारनाथ
हमने चाही हुकूमत हर जगह वहां जहाँ रहते थे केवल पेड़ पौधे पहाड़ तितलियाँ और भगवान हमने रोकी राह हवा की, पानी की, मिट्टी की कभी कभी हम हटाए गए एक अतिक्रामक की तरह तब हमने शिकायत की प्रकृति के तीसरे नेत्र की और जुट गए फिर से नयी हुकूमत खड़ी करने में
उसने आपको गढ़ा खड़ा किया हिमालय के सबसे सुन्दर अरण्य में फिर आपको पूजा यूँ तो आप कभी टस से मस नहीं हुए उसकी गुहार पर और आप जब पसीजे तो बस एक सैलाब आया आप पत्थर ही रहे केदारनाथ
वे ईश्वर थे वे बचे रहे उनके बस में था बचे रह जाना और इसी में उनका ईश्वरत्व था!
-परमेश्वर फुंकवाल
हर परवत नंगा हुआ
हर परबत नंगा हुआ, खींच ली गई खाल देवभूमि श्मशान बनी. अफसर मालामाल गंगा पाइप में बहे, बुझी न फिर भी प्यास जमना जी की लाश पर, दिल्ली करे विकास कोई न बच पाएगा, परलय है विकराल बना हिमाला काल जो, लोभ-लाभ का जाल शिव मंदिर बस बचा रहे, है पूरा टकसाल करे पुजारी प्रार्थना, भरा शवों से थाल मंदिर थर-थर काँपता, शिव प्रतिमा जल माहिं कबिरा कब से कह रहा, पाहन में हरि नाहिं ... गिद्धों को क्या चाहिए, लाशों का अंबार गुजराती कि देहलवी, सभी उड़े केदार दान पात्र भरने गया,डाकू काल के गाल साधू ले भागा मगर, मंदिर का सब माल सैलानी जो फंस गए, उनकी बात हजार जो पहाड़ घुट-घुट जियें, उनका कौन भतार सुख में तीरथ-हज हुआ, जाप, दान, अगियार दुख में सब चु्प साधते, काबा क्या केदार धरती-नदिया बेच दी, बेचा गया पहाड़ कैद रोशनी भी हुई. अब तो खोल किवाड़ |
-आनंद वर्मा
मुक्ति पर्व
कितना भयानक होगा वो मंज़र जो जीवन को बहते फूलों सा बहा ले गया होगा सच छूट गया सब कुछ एक कहानी बन कर शिखर पर चढ़ कर विकराल जल मौत बरसा रहा था चेहरों पर मौत का मातम छा रहा था किसने सोचा था कि यह यात्रा अंतिम तो थी ही पर मुक्ति पर्व भी थी !
-सरस्वती माथुर
कैसे कह दूँ
कैसे कह दूँ तुम थे प्रभु तुम होते तो जटाओं में समा लेते गंगा तुम होते तो गरल कंठ मे उतार लेते, चढावे मे भोले जान तो नही माँगते हो फिर सब जानने वाले औघड़ तुम्हारे सामने इतना विनाश ... नन्हे बच्चे जोर से जयकारा लगाते ऊँ नमः शिवाय खामोश हो गए सदा के लिए क्या गणपति नही नजर आए उनमे तुम्हे . पतियो के शव पर विलाप करती महिलाएं, पार्वती सी छवि वाली सदा सुहागन का आशीष मांगा जिन्होने तुमसे .. ना प्रभु तुम नही थे वहाँ बस लोगो का भरम था टूट गया और सिद्ध हो गया कि शिव नही बस शव है वहाँ...
जब सब बह गया तो केदारनाथ मंदिर कैसे सुरक्षित रहा ?..........एक सवाल
उत्तराखंड में भयानक बारिश और ग्लेशियर टूटने बादल फटने के साथ जब पानी पहाडो से नीचे उतरा तो अपने साथ हजारों टन मलबा नीचे लाया....उसकी चपेट में आकर सभी मकान ढह गए... न धर्मशाला बची, न होटल, न विश्रामगृह, न बैंक, न कुछ और। सब गिर गया, टूट गया, बह गया और जो बचा वो कम से कम 10 फीट मलबे में दब गया, लेकिन एक हजार साल पुराने केदारनाथ मंदिर का बाल भी बांका न हुआ, न उसकी दीवार टूटी न कोई हिस्सा अलग हुआ। केदारनाथ मंदिर को छोड़कर सब कुछ तबाह हो गया। मंदिर के आसपास कुछ नहीं बचा। चट्टानों की बारिश के बीच आखिर कैसे केदारनाथ मंदिर और भीतर का शिवलिंग सुरक्षित रहा?
शिव भक्त इसे भगवान भोलेनाथ का चमत्कार बता रहे हैं, तो विज्ञान के जानकार हजारों साल पुराने इस मंदिर की तकनीक को और मजबूत बनावट को। आखिर इस मंदिर में ऐसी क्या खासियत है, .क्या ये मंदिर भी प्राचीन सभ्यता की उस अकलमंद तकनीक जिसे आज हम दकियानूसी कहते है, की निशानी थी जो उसने कुदरत के किसी भी कहर से बचने के लिए तैयार की थी?
आज हम सब को इसे खुले दिमाग से समझने की जरूरत है।
केदारनाथ धाम एक ऐसे इलाके में है जो कुदरत की उस गोद में है जो रह रह कर हिलोरें ले सकती है। केदारनाथ मंदिर तीन तरफ से ऊंचे पहाड़ों से घिरा है। करीब 22 हजार फीट ऊंचा केदारनाथ, करीब 21,600 हजार फीट ऊंचा खर्चकुंड और 22,700 हजार फीट ऊंचा भरतकुंड। न सिर्फ तीन पहाड़ बल्कि पांच नदियों का संगम भी है यहां मंदाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णद्वरी। वैसे इसमें से कई नदियों को काल्पनिक माना जाता है, लेकिन यहां इस इलाके में मंदाकिनी का राज है।
मंदाकिनी नदी जो पल में बढ़ती है तो पल में सिमट जाती है। यानि सर्दियों में भारी बर्फ और बारिश में जबरदस्त पानी, जिस से उस वक़्त बाढ़ आने का खतरा रहता है। बाढ़ग्रस्त नदी के रास्ते को फ्लड वे (वाहिका) कहते हैं। यदि नदी में सौ साल में एक बार भी बाढ़ आई हो तो उसके उस मार्ग को भी फ्लड वे माना जाता है। इस रास्ते में कभी भी बाढ़ आ सकती है। लेकिन अगर इस छूटी हुई ज़मीन पर निर्माण कर दिया जाए तो ख़तरा हमेशा बना रहता है।
केदारनाथ से निकलने वाली मंदाकिनी नदी के दो फ्लड वे हैं। कई दशकों से मंदाकिनी सिर्फ पूर्वी वाहिका में बह रही थी। लोगों को लगा कि अब मंदाकिनी बस एक धारा में बहती रहेगी। जब मंदाकिनी में बाढ़ आई तो वह अपनी पुराने पथ यानी पश्चिमी वाहिका में भी बढ़ी। जिससे उसके रास्ते में बनाए गए सभी निर्माण बह गए। पर फिर केदारनाथ मंदिर कैसे बच गया ? केदारनाथ मंदिर इस लिए बच गया क्योंकि ये मंदाकिनी की पूर्वी और पश्चिमी पथ के बीच की जगह में बहुत साल पहले ग्लेशियर द्वारा छोड़ी गई एक भारी चट्टान के आगे बना था। कहा जाता है कि ये चट्टान मंदिर की ओर आने वाली हर आफत में मंदिर के कवच का काम करती है। 16 जून को आए सैलाब को भी इस चट्टान ने दो हिस्सों में बांट दिया और मंदिर पर सीधे कोई वार नहीं हो सका। तो उस वक़्त भी इतनी सूझ बूझ का परिचय दिया गया और बिना किसी बाढ़ के कंप्यूटर रिकॉर्ड के ऐसी जगह को चुनना अपने आप में ही एक बहुत बड़ी बात है।
नदी के फ्लड वे के बीच मलबे से बने स्थान को वेदिका या टैरेस कहते हैं। .टैरेस फार्मिंग या सीढ़ीनुमा खेत से सब वाकिफ होंगे, पहाड़ी ढाल से आने वाले नाले मलबा लाते हैं। हजारों साल से ये नाले ऐसा करते रहे हैं.। तो पुराने गाँव पहाड़ी ढालों पर बने होते थे। पहले के किसान वेदिकाओं में घर नहीं बनाते थे। वे इस क्षेत्र पर सिर्फ खेती करते थे। लेकिन अब इस वेदिका क्षेत्र में नगर, गाँव, संस्थान, होटल इत्यादि बना दिए गए हैं, इसलिए यदि आप नदी के स्वाभाविक, प्राकृतिक पथ पर निर्माण करेंगे तो नदी के रास्ते में हुए इस अतिक्रमण को हटाने के बाढ़ अपना काम करेगी ही। यदि हम नदी के फ्लड वे के किनारे सड़कें बनाएँगे तो वे बहेंगे ही।
80 फीट चौड़ा और 187 फीट ऊंचा है मंदिर दक्षिण दिशा की ओर खुलता है जो ज्यादातर मंदिरों से अलग है, ज्यादातर मंदिरों का मुख पूर्व की ओर होता है। ये मंदिर बेहद मजबूत चट्टानों से बनाया गया है। इतना ही नहीं मंदिर के पीछे के हिस्से में एक बड़ी चट्टान नजर आती है, जिसका वर्णन ऊपर भी किया गया है। ये हैरतअंगेज है कि इतने साल पहले इतने भारी पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर, यूं तराश कर कैसे मंदिर की शक्ल दी गई होगी !
कहा जाता है मंदिर छह फुट ऊंचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है और यह चबूतरा शायद जमीन में गहरी पैठी चट्टान का हिस्सा है। इससे मंदिर की ऊँचाई और नींव का एक बैंलेस बना हुआ है। यानि दालान से मंदिर के शिखर तक की जितनी ऊंचाई है उसका एक-चौथाई हिस्सा जमीन के अंदर चट्टान के रूप में है। नींव सीढ़ीनुमा है.। 50-80 किलो से भी ज्यादा भार के पत्थरों से यह मंदिर निर्मित है। ये पत्थर एक-दूसरे से आधुनिक इंजीनियरिंग के डवलिंग मेथड में जुड़े हुए हैं। मतलब पत्थर के बीच के कुछ हिस्से को गोलाकार या आयताकार काटते हुए, एक-दूसरे में फंसा कर उन्हें लॉक करते हुए खड़े करना, जिसे इन्टरलाकिंग विधि कहते है। मतलब इसमें पत्थर को आज की चिनाई की तरह मिट्टी, सीमेंट या किसी चूने से नहीं जोड़ा गया। वैसे अपने प्राचीन स्थापत्य में पत्थरों के ऐसे जोड़ में शीशा याकि लेड भरने की भी परंपरा रही है। पता नहीं केदारनाथ मंदिर में इसे अपनाया गया था या नहीं, पर जो भी भरा गया उसने मंदिर को काफी मजबूती प्रदान की है । मंदिर की दीवार चार-पांच फुट चौड़ी है इससे एक तरफ मंदिर का कुल भार उसे ठोस और जड़ बना देता है तो चबूतरे से मंदिर का आकार कंगूरेदार बनाते हुए यह व्यवस्था की गई कि हवा और पानी का दबाव बने तो वह खुद- ब- खुद कटता जाए। यदि सीधी खड़ी दीवार होती तो एक साथ दबाव में वह अपने आप ढह सकती थी।
केदारनाथ मंदिर की एक और ऐसी हकीकत जिससे कम लोग ही वाकिफ होंगे, वैज्ञानिकों के मुताबिक केदारनाथ मंदिर 400 साल तक बर्फ के नीचे दबा था, लेकिन फिर भी उसे कुछ नहीं हुआ। चार सौ साल तक ग्लेशियर से ढंका था केदारनाथ मंदिर और ग्लेशियर के भयानक बोझ को सह चुका है- ये कहना है देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों का। शायद यही वजह है कि केदारनाथ मंदिर को जल प्रलय के थपेड़ों से कोई नुकसान नहीं हुआ। केदारनाथ मंदिर के पत्थरों पर पीली रेखाएं हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक ये निशान दरअसल ग्लेशियर के रगड़ से बने हैं। ग्लेशियर हर वक्त खिसकते रहते हैं और जब वो खिसकते हैं तो उनके साथ न सिर्फ बर्फ का वजन होता है बल्कि साथ में वो जितनी चीजें लिए चलते हैं वो भी रगड़ खाती हुई चलती हैं। जब करीब 400 साल तक मंदिर ग्लेशियर से दबा रहा होगा तो इस दौरान ग्लेशियर की कितनी रगड़ इन पत्थरों ने झेली होगी। वैज्ञानिकों के मुताबिक मंदिर के अंदर की दीवारों पर भी इसके साफ निशान हैं। बाहर की ओर पत्थरों पर ये रगड़ दिखती है तो अंदर की तरफ पत्थर ज्यादा समतल हैं जैसे उन्हें पॉलिश किया गया हो। दरअसल 1300 से लेकर 1900 ईसवीं के दौर को लिटिल आईस एज यानि छोटा हिमयुग कहा जाता है। इसकी वजह है इस दौरान धरती के एक बड़े हिस्से का एक बार फिर बर्फ से ढंक जाना। माना जाता है कि इसी दौरान केदारनाथ मंदिर और ये पूरा इलाका बर्फ से दब गया और केदारनाथ धाम का ये इलाका भी ग्लेशियर बन गया था।
तो जाहिर है केदारनाथ मंदिर को जिसने बनवाया, जिन कारीगरों-मिस्त्रियों ने इसकी सरंचना सोची उन्होंने नींव के नाते चट्टान और फिर कंगूरे की संरचना तक में यह हिसाब बाकायदा लगाया कि यदि बाढ़ और बर्फानी तूफान आया तो मंदिर कैसे बचेगा? और यह सोचा गया था हजार साल पहले।
लेकिन इसके ठीक विपरित पिछले साठ सालों के अपने सड़क निर्माता, पीड्ब्लुडी इंजीनियर, आर्किटेक्ट, वास्तुकार, योजनाकार ने क्या सोचा?
ताबड़तोड़ देवभूमि को कमाई का जरिया बनाया। ऐसी सड़कें बनाईं जो हर साल टूटती हैं,.क्योकि गलत तरीके इस्तेमाल किये जाते है। जो सस्ते पर बेहद खतरनाक होते हैं। ब्लास्टिंग करके पहाडो में सड़क तो बनाई जाती है, पर इसके साथ ही पहाडो में दरार भी पड़ जाती है । पानी की निकासी का ठीक से प्रबंध किया नहीं जाता, तो बारिश का पानी इन दरारों में घुस कर पहाडो को कमजोर करता रहता है। जिस से पहाड़ छोटे-२ टुकडो में टूटते रहते हैं और भुसंख्लन होता रहता है। जो बाढ़ के समय और खतरनाक रूप ले लेता है। धर्मशाला, होटल, घर बाज़ार इत्यादि गलत जगह पर बनाए जाते है, जैसे ऊपर लिखा गया है । जो इस तरह की प्राकृतिक आपदा के समय हमारी ही आँखों के सामने बह जाते है।
कई यात्रियों के अनुसार 16 जून की शाम को मंदाकिनी में चढ़ते पानी को देख लोग गेस्ट हाऊस, धर्मशाला जैसे ठिकानों को छोड़ मंदिर में आ गए। क्योकि उन्हें अपने हाथों, अपने लिए बनाए गए ठिकानों के बह जाने की आंशका थी। तभी लोगों ने मंदिर में शरण ली। और यात्रियों की आंशका सही भी साबित हुई। धर्मशालाएं, गेस्ट हाऊस बह गए, अगल-बगल बनाए ऊंचे स्थानों को मंदाकिनी ने लील लिया।
लोगों ने सही सोचा कि सीमेंट-क्रंकीट की बनी इमारतें सुरक्षित नहीं हैं। ये भ्रष्ट हैं। ये खोखली हैं। अपने आप लोग मंदिर की तरफ भागे। लोग भगवान के भरोसे मंदिर पहुंच गए। मंदिर का अटल खड़े रहना और बाकी सबका बहना, हमारे बालुई विकास का प्रमाण है.। ये सही है कि हमने विकास किया है. सड़क-पुल बनाए हैं। धर्मशालाएं बनाई हैं। .हेलीकॉप्टर से केदारनाथ पहुंचने लगे हैं। फोन-मोबाइल-नेट सब है, लेकिन इन सब के बावजूद यह गारंटी नहीं है कि.चार धाम यात्रा सुरक्षित रहेगी या नहीं? ये कैसा विकास है जिसमे हम अपना कफ़न खुद ही तैयार कर रहे है? समझने की बात ये है कि हम विकास कर रहे हैं आधुनिक बन रहे है, पुरानी चीजो / संस्कृति को छोड़ आगे बढ़ते जा रहे है, पर क्या हमने सोचा की हमारी आज की बनायी चीज हमारे सामने ही टूट कर बिखर जाती है, बह जाती है, जबकि हजारो साल पुराने निर्माण आज भी कुदरत के प्रकोप के सामने शान से खड़े नज़र आते है ! कहने का मतलब ये है कि कुदरत का प्रकोप तो जो है वो है और वो पिछले हजार वर्षो में इसी जगह पर कई बार हुआ होगा, पर हर बार ऐसा नहीं हुआ होगा जैसा इस बार हुआ! क्योकि इस बार हम सबने अपनी सीमित पर खोखली सोच और उस पर जरूरत से ज्यादा विश्वास के सहारे, इसके साथ कुछ ही समय में बहुत फायदा उठाने की कोशिश के चलते, हजार-बारह सौ साल पुरानी इस देव भूमि और देव मंदिर को अपने कर्मों से भूतहा बना दिया। प्राकृतिक आपदाए तो आती रहेंगी, पर जरूरी हैं प्रकति के हिसाब से निर्माण और हमारी जीवन शैली। जिसमे अब हमे युद्ध स्तर पर बदलाव की जरूरत है। अगर हम सब इस घटना को बिना प्रकृति को दोष दिए सिर्फ एक चेतावनी समझ कर अपने में बदलाव कर पाए तो अच्छा है, अन्यथा तो फिर अन्यथा ही है।...
सावन की मनभावन ऋतू में आकाश बादलों से तीतरपाखी हो उठता है ,यह सावन का ही जादू है कि वीर रस का कवि भी सावन में शृंगार लिखने लगता है। सावन पर स्व.रामधारीसिंह दिनकर की कविता देखें -
जेठ नहीं, यह जलन हृदय की, उठकर ज़रा देख तो ले, जगती में सावन आया है, मायाविनि! सपने धो ले।
आषाढ़ माह खत्म होने के साथ ही सावन का पावन महीना शुरू हो जाता है चारों ओर हरियाली, ठंडी-ठंडी पवन की मदमस्त बयार, बारिश की रिमझिम और सखियों का साथ। फिर कैसे दिल मान सकता है सावन में बिना झूला झूले..., यही तो मौसम है अपनी सखियों के साथ जोर-जोर से सावन के गीत गाकर आम इमली के पेड़ पर डले झूले पर मस्ती करने का। आस्था, अध्यात्म और मौजमस्ती के राज्य राजस्थान में सावन का आलम ही कुछ और होता है । इस जीवंत राज्य में सावन की फुहारें जीवन में नया रंग भर देती हैं।'सात वार, नौ त्यौहार' की कहावत राजस्थान के लिए है लेकिन शायद सावन के महीने में ही इसके विविध रूप और छटाएँ दिखाई पड़ती हैं। सिर्फ मंदिरों में ही नहीं, सावन में घर-घर श्रृंगार-सजावट की परंपरा काशी में अब भी सावन में पूरे शबाब पर होती है। सावन का झूला धार्मिक एकता और महोत्सवों के माध्यम से हर वर्ग-हर जाति और अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के लोगों को भावना के स्तर पर एकाकार कर देता है।आषाढ़ पूर्णिमा से श्रावण पूर्णिमा तक मेले त्योहारों, धार्मिक उत्सवों की धूम के बीच सारा शहर ही मानो हिंडोले झूलता है । हिन्दु संस्कृति में श्रावण मास का विशेष महत्व है। इस मास को सावन माह के नाम से भी जाना जाता है। वर्षा ऋतु होने के कारण इस मास को वर्ष का"रजस्वला काल" भी कहा जाता है। वर्षा के दो-तीन माह तक चलने के कारण इसको वर्ष का "ऋतुकाल "भी कहा जा जाता है। इस माह के दौरान बहुतायत मात्रा में वर्षा होने से धरती माता की उपजाऊ शक्ति में वृद्घि होती है। इससे बीज जल्दी अंकुरित होकर धरती के आंचल को जल्दी हरा भरा कर देते है।सावन को हरा मास भी कहा जाता है। हरा रंग खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। यही खुशहाली मन को हरने वाली होती है और मन में उत्साह व हौसला भरकर जीवन में नवीन चेतना का संचार करती है। हरा का अर्थ है हरने वाला यानि मन को हरने वाला तथा इसे मन के कष्टों व दुःखों को हरने वाला भी कहा जा सकता है। हरा भगवान को भी कहते हैं क्योंकि वह व्यक्ति के सभी कष्टों को हर लेता है और उसे समृद्घशाली बनाता है। इसीलिए भगवान को हरि के नाम से जाना जाता है। अतः इस मास का "हरिमास" भी कहा जाता है। इस संबंध में कवि की दो पंक्तियां सही चरितार्थ होती हैं। " हरा जो हरने को चला, हरे वो मन की पीर। हरि मास में हरने को, हरि आवे हमारे तीर॥"सावन ..नाम सुनते ही रोम रोम गा उठता है, दिल के तार रागिनी छेड़ देते हैं!सावन माह के दौरान बादल उमड़-उमड़ कर चारों ओर बरस जाते हैं। बादलों से घिरा आसमान को देख प्रकृति का कण-कण पुलकित हो उठता है।सावन,उत्सव मेलों की सौग़ात लेकर आता है.तीज, रक्षा बंधन...अनेकोनेक त्यौहार इसी दौरान आते हैं!सावन को याद करते ही मन में फुहार-सी गिरने लगती है। ऐसा होना भी लाजिमी है क्योंकि ज्येष्ठï और आषाढ़ की गर्मी के उपरांत सावन शीतलता प्रदान करता है। सावन में जहां कहीं रिमझिम बारिश की झड़ी लगती है तो कहीं मूसलाधार बारिश बरस कर चहुंओर पानी-पानी कर देती है। सूखी और तपती धरती सावन के महीने में हरियाली की चुनर ओढ़ती-सी प्रतीत होती है। काली-काली घटाएं नीले-नीले अम्बर के एक छोर से दूसरे छोर तक बहती हुई-सी लगती हैं। सावन के महीने में प्रकृति के प्रत्येक जीव में मादकता का संचार होने लगता है।सावन में आसमान से पानी की फुंहार बरसती है। ये फुंहार पृथ्वी माता की तपिश को शांत कर उसकी उपजाऊ शक्ति में वर्धन करती है। आसमान से गिरने वाली इन फुंहारों के माध्यम से पृथ्वी माता पर मधु की वर्षा होती है,जिससे पृथ्वी अमृतरस दायिनी बन जाती है। इसलिए इस त्यौहार को "मधुर्स्वा"के नाम से भी जाना जाता है यानि इसे आसमान से मधु बरसाने वाला त्यौहार भी कहा जाता है। इसी महीने में हरियाली चुनर ओढ़ कर आता है- ‘तीज’ का त्योहार।. सावन में महिलाओं के लिए लहरिया का परिधान बहुत अहम हो जाता है. सावन के महीने में और विशेष रूप से तीज के त्यौंहार के दिन प्रत्येक स्त्री रंग बिरंगी लहरिया की साड़ियां पहने ही सब तरफ दिखाई पड़ती हैं.सावन की फुहारें तीज के उत्सव में दुगना रंग भर देती हैं क्योंकि मरू प्रदेश राजस्थान में बारिश अपने आप में ही किसी उत्सव से कम नहीं होती.सावन का मौसम एक अजीब सी मस्ती और उमंग लेकर आता है। चारों ओर हरियाली की जो चादर सी बिखर जाती है उसे देख सबका मन झूम उठता है।सावन के झूले हर जगह पड़े होते हैं और ठंडी ठंडी फुहारों के बीच महिलाएं ख़ुशी में झूमती नाचती गाती झूला झूलती हैं। सावन में कजरी गाते हुए झूला झूलना उनके उत्साह को दोगुना कर देता है। औरतें रात को इकट्ठा होकर सम्मिलित स्वर में ‘मल्हार’ व सावन के गीत गाती हैं जो बेहद कर्णप्रिय व दिल को छू जाने वाले लगते हैं।बरसात के मौसम में सोलह श्रृगार करे सजी धजी महिलाओं को देखना बहुत ही दिल लुभावना होता है। सावन में चारों तरफ हरीतिमा बिखरने से धरती पर उल्लास का भाव होता है।इस सावन को अपनी मस्ती में सराबोर देखना हो, तो किसी भी गाँव में चले जाएँ, जहां पेड़ों पर झूला डाले किशोरियाँ, नवयुवतियाँ या फिर महिलाएँ अनायास ही दिख जाएँगी. सावन के ये झूले मस्ती और अठखेलियों का प्रतीक होते हैं. यही झूला हम सबको मिला है माँ की बाँहों के झूले के रूप में. कभी पिता, कभी दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, भैया-भाभी या फिर दीदी की बाँहों का झूला. भला कौन भूल पाया है?सावन का मौसम सचमुच सलोना होता है। वैदिक संस्कृति में एक सूर्योदय से एक सूर्यास्त का जो काल है उसे भी सावन कहा गया है। यही वह अल्हड़ सावन है, जिसे भगवान शिव के विशेष मास के रूप में जाना जाता है।सावन में शिवालयों में भीड़ बढ़ जाती है,पौराणिक ग्रंथों में भगवान शंकर को तंत्र का अधिपति भी माना गया है। इसलिए सावन के महीने में मनोकामना की पूर्ति हेतु लोग तंत्र विधान से बम-बम भोले को प्रसन्न करने में भी लग जाते हैं।सावन जहां भक्तों को शिव के नजदीक ले जाता है वहीं साहित्य में यही सावन का बादल बेचारा विरहियों का पोस्टमैन बनकर रह जाता है। चाहे कालिदास का मेघदूत हों जहां बादल कुबेर की अल्कापुरी से निष्कासित कामदग्ध यक्ष का उसकी प्रेमिका तक संदेश पहुंचानेवाला दूत हो या फिर महाभारत का “नलोपाख्यान में जहां यही बादल नल तथा दमयंती दोनों का दूत बनकर अपनी चाकरी निभाता है। तो वही सावन का बादल तीर्थकर पार्श्वनाथ के लिए “पार्श्वाभ्युदय” में और कवि “विक्रम” के “नेमिदूत” में भी दूत ही बनकर प्रकट हुआ है।सावनके अवसर पर झूले डालकर झूलना भी एक अहम रस्म है। सावन के मस्त-मस्त मौसम में जहां नवविवाहिता दुल्हने अपनें मायके चली जाती हों और अपनी सहेलियों के साथ झुंड बनाकर घरों में,बाग़-बग़ीचों में पेड़ों पर झूले डालकर सावन के गीतों और झूले के झोटों की पींग में अपना गम ग़लत कर लें मगर बेचारे पतिदेव क्या करें। सिवाय कांवर लेकर बम-बम भोले कहते हुए तीर्थ पर निकल जाने के। इसी कारण तो शिवभक्त, तीन लोक से न्यारी काशी नगरी प्यारी के शिवभक्त कविवर भारतेंदु ने भी सावन के मर्म को समझकर और बढ़िया ठंडाई पीकर खूब कजरी लिखीं। झमाझम सावन की फुहारों में प्यार का मजा ही अलग है।हरियाणा में सावन का महीना शुरू होते ही नवविवाहिता युवतियों के लिए ‘सिंधारे भेजने’ का कार्यक्रम शुरू होता है तो वहीं बुआ, बहन, बेटियों के लिए कोथली भेजने का भी काम शुरू हो जाता है जो ’तीज के त्योहार पर आकर खत्म होता है।भारतीय परिवारों में, ब्याही बिटिया का घर आना बहुत बड़ी बात मानते हैं और अक्सर बेटियाँ सावन में ही अपने पीहर ज्यादा आती हैं...तीज, रक्षा बंधन...अनेकोनेक त्यौहार इसी दौरान आते हैं...और मायके से ज्यादा मौज और कहीं हो ही नहीं सकती...सुन्दर कपडे पहनना, गहनों में सजना, झूला झूलना, मेहंदी लगाना...पकवान बनाना और खिलाना|तीज के त्योहार के आने तक सामणी फसल की बिजाई हो चुकी होती है और त्योहार मनाने के लिए काफी समय होता है।नयी नवेली दुल्हन ससुराल में बैठी सावन की प्रतीक्षा में पलकें बिछाए हैं !कब सावन आये और कब भाई उसे लिवाने आये बादलों के काले कजरारे टुकड़े आसमान पर तिरते हैं और उसे सौंप देते हैं ढेर सारा उत्साह :"नीले से घुडवन चढ़ मेरे वीरन आहें लिवावे मायके " लोकगीतों के मधुर बोल कानो में रस वर्षा करते हैं तो कहीं दूर गूँज रहे होते हैं ये स्वर -- "अबके बरस भेज भैया को बाबुल सावन में लीजो बुलाय रे लौटेंगीं जब मेरे बचपन की सखियाँ दीजो संदेसा भिजाय रे !" श्रावण सोमवार की एक पौराणिक व्रत कथा के अनुसार जब सनत कुमारों ने भगवान शिव से उन्हें श्रावण महीना प्रिय होने का कारण पूछा, तो भगवान भोलेनाथ ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था।अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया।तब पार्वती ने युवावस्था के सावन महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और उन्हें प्रसन्न कर विवाह किया, जिसके बाद श्रावण के महीने में खास तौर पर कुंआरी लड़कियां अपने सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए श्रावण सोमवार के व्रत रखती हैं। विवाहित महिलाएं श्रावण के सोलह सोमवार करके दीर्घायु सुहागन रहने के लिए सोलह सोमवार करके सत्रहवें सोमवार को उनका उद्यापन करती हैं। हिंदू धर्म इस त्योहार का काफी महत्व होने के कारण सभी शिव भक्त श्रावण माह में खास तौर पर पूजा-अर्चना में लीन रहते हैं। शास्त्रों के मुताबिक सोमवार व्रत में उपवास रखना श्रेष्ठ माना जाता है। व्रत की अवधि सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक है। श्रावण मास में सोमवार व्रत-कथा नियमित रूप से करने पर भगवान शिव तथा मां पार्वती की कृपा बनी रहती है।सावन के महीने में भगवान शंकर की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजन की शुरूआत महादेव के अभिषेक के साथ की जाती है। अभिषेक में महादेव को जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, गन्ना रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, समीपत्र, दूब, कुशा, कमल, नीलकमल, ऑक मदार, जंवाफूल कनेर, राई फूल आदि से शिवजी को प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ की भोग के रूप में धतूरा, भाँग और श्रीफल महादेव को चढ़ाया जाता है।सावन मास में शिव मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है। शिवभक्त अनेक धार्मिक नियमों का पालन करते हैं। साथ ही महादेव को प्रसन्न करने के लिए किसी ने नंगे पाँव चलने की ठानी, तो कोई पूरे सावन भर अपने केश नहीं कटाएगा। वहीं कितनों ने माँस और मदिरा का त्याग कर दिया है।सावन का महीना शिवभक्तों के लिए खास होता है। शिवभक्त काँवरियों में जल लेकर शिवधाम की ओर निकल पड़ते हैं। शिवालयों में जल चढ़ाने के लिए लोग बोल बम के नारे लगाते घरों से निकलते हैं। भक्त भगवा वस्त्र धारण कर शिवालयों की ओर कूच करते हैं।
सावन का इन्द्रधनुषी महिना सभी को उल्लसित कर जाता है ! यह उल्लास एक उत्सव बन जाता है... ग्रीष्म की विदाई और सावन की अगवानी में बरसाती टिपुर टिपुर बूंदों की फुहारें ,आकाश पर घुमड़ते दल के दल बादल देख किसका मन मयूर नर्तन नहीं कर उठता ?तो आइये स्वागत करें सावन का, बहुत से साहित्यकारों ने सावन को अपनी कविताओं में बाँध कर उसके महत्व को दर्शाया है!
गोपालदास नीरज जी लिखते हैं- "पिया पिया कह मुझको भी पपिहरी बुलाती कोई, मेरे हित भी मृग-नयनी निज सेज सजाती कोई, निरख मुझे भी थिरक उठा करता मन-मोर किसी का, श्याम-संदेशा मुझसे भी राधा मँगवाती कोई, किसी माँग का मोती बनता ढल मेरा भी आँसू, मैं भी बनता दर्द किसी कवि कालिदास के मन का। यदि मैं होता घन सावन का!"
हरिवंश राय बच्चन जी की कविता देखें:
सिंचित-सा कंठ पपीहे का, कोयल की बोली भीगी-सी, रस-डूबा, स्वर में उतराया, यह गीत नया मैंने गाया। अब दिन बदले, घड़ियाँ बदलीं, साजन आए, सावन आया।
बरसते सावन ने मन के आँगन में स्नेहिल अनुभूतियों को तरंगित कर दिया तो कभी रिमझिम झरती मासूम फुहारों ने आत्मा के सुप्त तारों को झनझना दिया
प्रकृति की यह कृपालु दृष्टि हम पर न होती तो आज सावन पर रचित साहित्य का समृद्ध भंडार हमें उपलब्ध न होता।
न जाने कितने संवेदनशील कवियों के गहरे हृदय को इस सावन ने स्पंदित किया हैं।
बहरहाल, सावन का हरियाला मौसम भारत में त्योहारों के आगमन का संकेत होता है। प्यार, रिश्ते, श्रृंगार और खुशियों का यह मौसम प्रकृति के करीब लाता है।
आज राखी है, फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए मेरे पास ऐसी कोई फोटो नहीं है, जिसे आप लाइक या शेयर कर सकें, हाँ, बस एक छोटी सी कहानी है आज धागों के त्यौहार के दिन की, आप सुनेंगे?
प्रातः मन्दिर गया, तो वहां पर मन्दिर की सफाई कर रही ग्रामीण महिला ने मेरी कलाई पर रेशम की डोरी बांध दी, याद आया, अपने जन्म-दिन पर मैंने उसे साड़ी खरीदने हेतु कुछ रूपए दिए थे, उस की इस रिटर्न गिफ्ट से मेरी सूनी कलाई पर पहला स्नेह का धागा बंधा।
घर आया, तो कोरियर वाला, एक लिफाफा दे गया, राखी के साथ एक छोटा सा भाव भरा पत्र
‘‘भैया, मैं अनजान शहर में पति के ऑपरेशन हेतु ट्रेन में यात्रा कर रही थी, हमारी वार्तालाप से तुमने अपना ब्लड डोनेशन कार्ड दे दिया था, अनजान शहर में वह संजीवनी बना, आज मेरी कलाई में सुहाग की चूड़ियां तुम्हारे ही कार्ड के कारण हैं, तुम्हारी कलाई के लिए राखी का धागा भेज रही हूँ, सुजाता बहन।‘‘
भरी आंखों से स्वयं ही दूसरा धागा कलाई पर बांध लिया।
दिन में पुरानी कॉलोनी में हमारे यहां काम करने वाली बाई अचानक आ गई ‘‘सर, हर रविवार को आप मेरे बेटे को गणित व अंग्रेजी पढ़ाया करते थे, इस वर्ष कक्षा 10 की बोर्ड की परीक्षा में स्कूल में प्रथम आया है, मैं गरीब, ट्यूशन फीस आपको क्या देती? मेरा बेटा कुछ लायक बन गया है, आज मैं आप को राखी बांधने आई हूँ।‘‘ भरी आंखों से एक और धागा मेरी कलाई पर सज गया था। सायंकाल समीप के गांव के स्कूल की मेडम का फोन आया, ‘‘सर, आपने नवरात्रि पर हमारे गांव के स्कूल में पोषाहार बनाने वाली दो कामवालियों के साड़ी भेजी थीं, उन्होने आप के लिए राखी भेजी है, आप घर पर हैं, तो मैं उनकी ओर से बांधने आती हूँ, आज स्कूल की छुट्टी है, वरना उनकी इच्छा थी कि आप को हम आज अपने स्कूल में ही बुलाते‘‘ कुछ समय बाद, नाजिमा मेडम घर आकर मेरी कलाई पर दो और धागे बांध गई।
राखी का दिन ऐसा भी होता है, इस समय कलाई भरी हुई है, निर्मल, पवित्र, आत्मीय धागों से एवं आंखें छलक रही हैं, स्नेह, प्यार से। इन रिश्तों को किस श्रेणी में रखूं, सगे, खून के, अपने, पराए, आत्मीय, औपचारिक, स्वार्थी, मतलबी या कुछ और?
मुझे तो कुछ समझ में नही आ रहा है, आप मेरी समस्या का समाधान बतलाऐंगे क्या?
कृति- "मेरी आँखों में मुहब्बत के मंज़र है" विधा- कविता कवि- दिनेश गुप्ता 'दिन' प्रकाशन- डायमंड पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली
नये अर्थों में,पीर पुरानी
नितान्त अकेलेपन में जब संवेदनाओं का ज्वार सीमोल्लंघन कर मस्तिष्क को विषम वेदनाओं में तडपने को बाध्य करने का प्रयत्न करता है,तब उन एकान्त क्षणों के व्यथा.कथा की हृदयाभिव्यक्ति,पन्नों के समतल पर पुनः वीज.वपन के उद्देष्य से संरचनायें गढती हैं और कलमकार कह उठता है.
" शब्द नये चुनकर,गीत वही हर बार लिखूँ मैं कुछ नये अर्थों में,पीर पुरानी हर बार लिखूँ मैं"
" कैसे चन्द लफ्जों में,सारा प्यार लिखूँ मैं ?"
दूसरे सप्तक के प्रथम कवि श्री भवानी प्रसाद मिश्र जी ने नवोदित रचनाकारों को शब्द.जाल में न फँसकर,बिना लाग.लपेट के लिखने की हिदायत दी है.
" जिस तरह हम बोलतें हैं,उस तरह तू लिख। और इसके बाद भी,हमसे बडा तू लिख ।।"
कवि दिनेष गुप्ता 'दिन', जो पेशे से सॉफ्टवेयर अभियंता हैं,सीमित शब्द ज्ञान को सकारात्मक रूप में अंगीकृत् कर जनमानस के सामान्य बोल.चाल की भाषा में सरलता व सहजता से अनन्त प्रेम की बानगी कुछ इस तरह से व्यक्त करते हैं.
" मेरी आँखों में मुहब्बत के जो मंजर हैं तुम्हारी ही चाहतों के समंदर हैं...।"
पृष्ठ-.1
प्रेम में द्वन्द्व भी है,सुलह भी। संकोच भी है,झिझक भी। उलाहना भी है,मिन्नतें भी है। फिर प्रेम की सर्वोपरि उपलब्धि;वियोग की पीडा से कवि भला कब परे है.
"आज में कल में, गुजरनें वाले हर पल में, जब भी तुम याद आती हो, धडकनों से साँसें चुरा जाती हो।"
पृष्ठ.-19 प्रेम खता है। प्रेम सजा है। प्र्रेम सम्पूर्णता भी है,रिक्तता भी है। प्रियतम पर स्वयं को अर्पण करना ही तो प्रेम की पराकाष्ठा है। कवि प्रियतम पर स्वयं को न्यौछावर कर लिखता है.
" सवाल में जवाब में, ख्वाब में खयाल में, गीत में गजल में, राग में संगीत में,
हर घडी,हर पल में हो, मेरे हर लम्हें में,बस तुम ही हो।"
पृष्ठ.30 कवि अपने प्रथम काव्य.संग्रह में ही प्रेम की पीडा,प्रेम की अनुभूति,प्रेम का अवगुण्ठन,प्रेम की विडम्बना,प्रेम की प्रतीक्षा सभी कुछ गीतों के माध्यम से कहने का प्रयत्न करता है। उसे अन्तर का एकाकीपन काव्य.लेखन को प्रेरित करता है। संग्रह के प्रथम खंण्ड में उसके अस्फुट शायरियों का संग्रह है।
' मुहब्बत एक अहसास जो.....’.खंण्ड ने इस शायर के गीतकार बनने तक के सफर पर पैनी निगाह रखी है। मुहब्बत के गीतों का संग्रह यह सर्ग पुनः प्रेम की अतल गहराईयों और अनन्त ऊँचाइयों की कैफियत है।
' बगावत का बिगुल बजाता एक नया हिन्दुस्तान’.सर्ग, साहित्य के त्रिकालदर्शी होनें का प्रमाण देता है। सत्यापित करता है कि साहित्य ही समाज का दर्पण है। कवि देष.समाज में व्याप्त विषमताओं, विपन्नता, निर्धनता, भ्रष्टाचार व मानवीय मूल्यों में दिन-प्रतिदिन होते ह्रास से व्यथित है। वह अपनी व्यथा कुछ यूँ कहता है-
" सत्ता के नषें में चूर कितना इंसान तो देखो, भ्रष्टाचार की अग्नि में जल रहा अरमान तो देखो।"
पृष्ठ-37 गीत फिर एक बार तिरंगा लहराओ। शमा बुझने लगी है परवानों को आना होगा। वीर-रस का रसास्वादन कराती, राष्ट्रीयता की भावना पुष्ट करती है। दीया अंतिम आस का-.गीत के माध्यम से कवि गुमनाम राष्ट्र-नायकों को श्रध्दा-सुमन अर्पित करता है। अपनी भावुकता और संवेदना से यह गीत आँखों को अश्रुपूरित कराता है। कवि स्वयं को एक सिपाही के रूप में व्यक्त कर देश-प्रेम की भावना से ओत-प्रोत हो,मृत्यु के क्षणों की कल्पना कर लिखता है-
" फिर एक बार जनम लेकर,इस धरा पर आऊँ, सरफरोषी में फिर एक बार फना हो जाऊँ, ...................................................................., मिट्टी वतन की भाल पर लगाऊँ, मैं फिर एक बार तिरंगा लहराऊँ........."
;पृष्ठ.45
हकीकत से दूर......सर्ग में कवि स्वयं को ऐसे कल्पनालोक में खो देना चाहता है,जहाँ इन्सानों को मजहब के नाम पर बाँटा न जाये-
" काश कभी वो दिन आये, कुरान मिले गीता में, गीता मिले कुरान में, अल्लाह मिले मंदिर में, मस्जिद में भगवान मिले।"
पृष्ठ.51
कवि अपनो से बिछडनें के दर्द में लिखता हैµ
श्जो दिल में बस जाते है, वो कभी दूर नहीं होते। यादों में भी ना आ पाये, इतने मजबूर नहीं होते।श् पृष्ठ.55
सामाजिक विषमताओं पर जिन्दगी क्या होती है- पुनः सोचने पर विवष करती है। कवि अपनों के दो टुकडे होने से हिमालय पर्वत सा जड और स्तब्ध हो जाता हैँ-
" इन्सान बचे हैं अब तो, इन्सानियत बची कहाँ दिलों में।"
भारत पाक बँटवारा. पृष्ठ.63
आजादी आज भी कितनी अधूरी है-लेख,देष की वास्तविक हालातों से रूबरू कराती है। कवि अपने मुल्क से दूर जाने पर अपनी माटी की खुशबू पाने को कुछ यूँ मचलता है-
" जी चाहता है उडकर लौट आऊँ परिन्दो की तरह"
पृष्ठ-67
वस्तुतः यह पुस्तक, प्रेम-प्रधान काव्य संग्रह है किन्तु सामाजिक कुरीतियों,विषमताओं को यह संकलन विविध भावों से एक साथ समाहित कर लेता है। कवितायें कहीं-कहीं कमजोर व संवेदनहीन भी जान पडती है। समरसता से कहीं-कहीं नीरसता और ऊबाऊपन भी आ जाता है, किन्तु कवि का साहित्येतर कर्मक्षेत्र होने पर भी साहित्यानुराग ऐसे समस्त तर्को का एकमात्र उत्तर बन सकता है।
एक सज्जन छोटे बेटे की शिकायत करते हैं - कहना नहीं मानता और कभी मुँहजोरी भी करता है। और बड़ा लड़का? वह तो बड़ा अच्छा है। पढ़-लिखकर अब कहीं नौकरी करता है। सज्जन के मत में दोनों बेटों में बड़ा फर्क है और यह फर्क कई प्रसंगों में उन्हें दिख जाता है। एक शाम का प्रसंग है। वे नियमित संध्यावंदन करते हैं (यानी शराब पीते हैं), कोई बुरा नहीं करते। बहुत लोग पीते हैं। गंगाजल खुलेआम पीते हैं, शराब छिपकर - गो शराब ज्यादा मजा देती है। आदमी बेमजा खुलकर बात करता है। और बामजा को छिपाकर, यानी सुख शर्म की बात मानी जाती है। लेकिन बात उन सज्जन की उठी थी। उन्हें सोडा की जरूरत पड़ती है। बड़ा लड़का कहते ही फौरन किताब के पन्नों में पेन्सिल रखकर सोडा लेने दौड़ जाता था। लाता छोटा भी है, पर फौरन नहीं उठता। पैराग्रफ पूरा करके उठता है। भारतीय पिता को यह अवज्ञा बरदाश्त नहीं। वह सीमांतों पर संबंध रखता है। या तो बेटे को पीटेगा या उसके हाथ से पिटेगा। बीच की स्थिति उसे पसंद नहीं। छोटा बेटा भी हरकत करता है। पिता जल्दी मचाते हैं, तो कह भी देता है ‘जाता तो हूँ’ ! उसके मन में सवाल और शंका भी उठती है। सोचता है - यह पिता फीस रोकर देता है, कपड़े बनवाना टालता जाता है, फिर यह नहीं सोचता कि इसे पढ़ाई के बीच से नहीं उठना चाहिए।
बड़े लड़के के मन में कभी सवाल और शंका नहीं उठे। वह मेरी ही उम्र का होगा। उसने वही किताब पढ़ी होंगी, जो मैंने पढ़ी थीं। हम सब गलत किताबों की पैदावार हैं। ये सवालों को मारने की किताबें थीं। स्कूल प्रार्थना से शुरू होता था -‘शरण में आए हैं हम तुम्हारी, दया करो हे दयालु भगवन!’ - क्यों शरण में आए हैं, किसके डर से आए हैं - कुछ नहीं मालूम। शरण में आने की ट्रेनिंग अक्षर-ज्ञान से पहले हो जाती थी। हमने गलत किताबें पढ़ीं हैं और आँखों को उनमें जड़ दिया। छोटा लड़का दूसरी किताबें पढ़ता है और आँखें उनमें गड़ाता नहीं है, आसपास भी देख लेता है। वह अपनी आँखों को फूटने से बचाने की कोशिश कर रहा है। इससे सारे पिता-स्वरूप लोग परेशान हैं - भौतिक पिता, गुरु, बड़े-बूढ़े शासक और नेता। हमारी किताबों में पिता-स्वरूप लोग सवाल और शंका से ऊपर होते थे। शिष्य पक्षपाती गुरु को अँगूठा काटकर दे देता था और दोनों ‘धन्य’ कहलाते थे। अब शिष्य उपकुलपति से रिपोर्ट कर देता है कि अमुक अध्यापक शिष्यों के अँगूठे कटवाते हैं। यदि उपकुलपति ध्यान नहीं देते, तो वह विद्यार्थियों का जुलूस लेकर विश्वविद्यालय पर धावा बोल देता है। हमें तो तीसरी कक्षा में ही उस भक्त की कथा पढ़ा दी गई थी, जो अपने पुत्र को आरे से चीरता है। कुछ लोगों के लिए आदमी और कद्दू में कोई फर्क नहीं। दोनों ही चीरे जा सकते हैं। उस भक्त का नाम मोरध्वज था। ऐसी सारी कथाओं का अंत ऐसा होता है जिससे चिरनेवालों को प्रोत्साहन मिले। भगवान प्रकट होते हैं और जिस पार्टी का जो नुकसान हुआ है, पूरा कर देते हैं - मृत को जिला देते हैं, जायदाद चली गई है, तो वापस दिला देते हैं, किसी को मुआवजे के रूप में स्वर्ग भेज देते हैं। कथा के इस अंत ने कितनी पीढ़ियों को आरे से चिरवा दिया होगा।
इस कथा पर न मैंने शंका की थी, न सज्जन के बड़े बेटे ने। मगर छोटा लड़का पूछेगा - पिताजी, चीरने से पहले यह बताइए कि भगवान इससे खुश होते हैं इसका सबूत क्या है? फिर इसकी क्या गारंटी कि वे आ ही जाएँगे? उन्हें हजार काम लगे रहते हैं। फिर इसका क्या भरोसा कि वे कटे को जोड़ देते हैं? अगर यह सब हो भी, तो भी आपके सत्यकल्पित विश्वास आपके अपने हैं। उनके लिए आप अपने को कटवाइए और अपनी हठ निभाइए। पहले जन्मे लोग अपनी सही-गलत मान्यता के लिए पीछे जन्मों को क्यों काटें? एक पीढ़ी के लिए दूसरी पीढ़ी क्यों चीरी जाए?
लड़के मुँहजोरी करने लगे हैं। कंबख्तों की किताबें बदल गई हैं। कोर्स इतनी जल्दी क्यों बदलने लगे हैं? बड़े लड़के से कह दिया था कि अपनी किताबें सँभालकर रखना छोटे के काम आएँगी! पर किताबें बदल गईं। पुरानी किताबें किसी के काम नहीं आ रही हैं। एक ही किताब पीढ़ियों क्यों नहीं चलती? पिताओं को यह चिंता है। बड़ा लड़का फौरन किताब में पेन्सिल रखकर सोडा लेने भाग जाता था। छोटा पैराग्राफ पूरा करके उठता है। भीष्म की कथा भी हमें तभी पढ़ा दी गई थी। हमने भीष्म को ‘धन्य’ कहा था। छोटा लड़का शांतनु को ‘धिक्कार’ कहेगा। ‘धन्य’ और ‘धिक्कार’ की जगहें बदल गई हैं। लोगों को पता नहीं है। छोटा लड़का भीष्म से कहेगा - क्या तुमने भी वही किताबें पढ़ी थीं, जो हमारे बड़े भाई ने? तुम पिता से क्यों नहीं कह सके कि जीवन भर के भोग के बाद भी आप की लिप्सा बनी हुई है, तो मैं क्या करूँ? अपना संयम दे सकता, तो थोड़ा दे देता, जीवन कैसे दे दूँ? राज्य से आप मुझे वंचित कर सकते हैं, पर मनुष्य का स्वाभाविक अधिकार मैं हरगिज नहीं छोड़ूँगा।
छोटा टिप्पणी करेगा - भीष्म ऐसा नहीं कह सके। उन्हें पिता ने आदमी से तीर चलानेवाली मशीन बना दिया। ऑटोमेटिक धनुष ! महाभारत का यह सबसे भला, तेजस्वी, आदरणीय, ज्ञानी व्यक्ति सबसे दयनीय भी है। मगर देख रहा हूँ कि श्रवणकुमार के कंधे दुखने लगे हैं। यह काँवड़ हिलाने लगा है। काँवड़ में अंधे परेशान हैं। विचित्र दृश्य है यह। दो अंधे एक आँख वाले पर लदे हैं और उसे चला रहे हैं। जीवन से कट जाने के कारण एक पीढ़ी दृष्टिहीन हो जाती है, तब वह आगामी पीढ़ी के ऊपर लद जाती है। अंधी होते ही उसे तीर्थ सूझने लगते हैं। वह कहती है - हमें तीर्थ ले चलो। इस क्रियाशील जन्म का भोग हो चुका है। हमें आगामी जन्म के भोग के लिए पुण्य का एडवांस देना है। आँखवाले की जवानी अंधों को ढोने में गुजर जाती है। वह अंधों के बताए रास्ते पर चलता है। उसका निर्णय और निर्वाचन का अधिकार चला जाता है। उसकी आँखें रास्ता नहीं खोजतीं, सिर्फ राह के काँटे बचाने के काम आती हैं।
कितनी काँवड़े हैं - राजनीति में, साहित्य में, कला में, धर्म में, शिक्षा में। अंधे बैठे हैं और आँखवाले उन्हें ढो रहे हैं। अंधे में अजब काँइयाँपन आ जाता है। वह खरे और खोटे सिक्के को पहचान लेता है। पैसे सही गिन लेता है। उसमें टटोलने की क्षमता आ जाती है। वह पद टटोल लेता है, पुरस्कार टटोल लेता है, सम्मान के रास्ते टटोल लेता है। बैंक का चेक टटोल लेता है। आँखवाले जिन्हें नहीं देख पाते, उन्हें वह टटोल लेता है। नए अंधों के तीर्थ भी नए हैं। वे काशी, हरिद्वार, पुरी नहीं जाते। इस काँवड़वाले अंधे से पूछो - कहाँ ले चलें? वह कहेगा - तीर्थ! कौन सा तीर्थ? जवाब देगा केबिनट! मंत्रिमंडल! उस काँवड़वाले से पूछो, तो वह भी तीर्थ जाने को प्रस्तुत है। कौन-सा तीर्थ चलेंगे आप? जवाब मिलेगा अकादमी, विश्वविद्यालय! मगर काँवड़े हिलने लगी हैं। ढोनेवालों के मन में शंका पैदा होने लगी है। वे झटका देते हैं, तो अंधे चिल्लाते हैं - अरे पापी! यह क्या करते हो? क्या हमें गिरा दोगे? और ढोनेवाला कहता है - अपनी शक्ति और जीवन हम अंधों को ढोने में नहीं गुजारेंगे। तुम एक जगह बैठो। माला जपो। आदर लो, रक्षण लो। हमें अपनी इच्छा से चलने दो। अनुभव दे दो, दृष्टि मत दो! वह हम कमा लेंगे।
राजनीति, साहित्य आदि तो बड़े प्रगट क्षेत्र हैं। अप्रगट रूप से भी, विभिन्न क्षेत्रों में श्रवणकुमार काँवड़ उतारने के लिए हिला रहे हैं। वे किन्हीं विश्वासों की आरी से चिरने को तैयार नहीं हैं। मैं कॉफी हाउस के कोने में बैठे उस युवक की बात नहीं कर रहा हूँ, जिसने गुस्से में दाढ़ी बड़ा ली है, जैसे उसकी दाढ़ी एक खास साइज और आकार की होते ही क्रांति हो जाएगी। बढ़ी दाढ़ी, ड्रेन पाइप और ‘सो ह्वाट’ वालों से यह नहीं हो रहा है। चुस्त कपड़े, हेयर स्टाइल और ‘ओ वंडरफुल’ वालियों से भी यह नहीं हो रहा है। ये तो न विश्वास में सच्चे, न शंका में। यह बिना प्रदर्शन और शोर शराबे के घरों और परिवारों में हो रहा है। सुशील, विनम्र और आज्ञाकारी युवक-युवती काँवड़े उतारने लगे हैं किसी के विश्वास के ओर से कटने से इनकार करने लगे हैं। एक परिचित है, जिसका ज्योतिष में विश्वास है। उनकी शिक्षिता जवान लड़की है। जिससे वह शादी करना चाहती थी, उससे ग्रह नहीं मिले। एक-दो और योग्य वरों से मिलान किया पर ग्रह यहाँ भी नहीं मिले। उसके ग्रहों ने किसी नालायक से मिलने के लिए स्थिति सँभाली होगी। लड़की एक दो साल घुटती रही। एक दिन उसने नम्रता से परिवार से कह दिया - ‘आप लोगों का इस ज्योतिष में विश्वास है, पर मेरा नहीं है। जो मेरा विश्वास ही नहीं है, उस पर मेरा बलिदान नहीं होना चाहिए।’ परिवार कुछ देर तो चमत्कृत रहा, फिर उसकी इच्छा से शादी कर दी। देख रहा हूँ कि मोरध्वज का आरा छीनकर फेंका जा रहा है। श्रवणकुमार के कंधे दुखने लगे हैं। वह काँवड़ को उतार कर रखने लगा है। वे सज्जन परेशान हैं। छोटा लड़का पैराग्राफ पूरा करके उठता है। बड़ा तो फौरन पेन्सिल रखकर दौड़ जाता था।
घर के लोग उनको मूडी नानाजी कहते हैं,किंतु अकेले में धीरे-धीरे,कहीं सुन लिया तो फिर समझो कि सुनामी ही आ गई| प्रसन्न हुये तो बंदर बनकर कूदने लगते हैं और गुस्सा हुये तो अल्लाह जाने क्या होगा आगे......"|वैसे तो वह हैं मीरा और मोहन के नानाजी किंतु जब ये दोनों ननिहाल में होते हैं और नानाजी का शब्द बार बार गुंजायमान करते हैं तो मुहल्ले के सब बच्चे उन्हें नानाजी कहने लगते हैं| बच्चे उन्हें बहुत पसंद करते हैं| आखिर वह चीज भी तो ऊंची हैं| सॆना के रिटार्ड कर्नल,छ:फुट ऊंचे,बड़ी बड़ी झब्बेदार मूंछें, रोबीला चेहरा और कहानी सुनाने के विशेषग्य| कहते कि उन्होंने कहानियां सुनाने में डाक्ट्रेट की है| परियों प्रेतों नदी नालों पर्वतों किन्नरों गंधर्वों... ऐसा कौन सा विषय है जिस पर उनका मुंह न चला हो| बस सुनाने का मूड और कोई हाँ में हाँ करने वाला होना चाहिये| अंतरिक्ष की कहानियां तो ऐसे सुनाते हैंजैसे अभी अभी सेटेलाइट से उतरकर अंतरिक्ष घूमकर आये हों| "नानाजी आपकी मूंछें कितनी बडी बड़ी हैं,राजाओं जैसी|"मीरा ने मस्खा मारा| "ए लड़की चापलूसी क्यों कर रही है|' नानाजी गुर्राये| "नानाजी नानाजी आप कितने बोल्ड हैं ,चाचा चौधरी जैसे, छोटा भीम जैसे,बालवीर जैसे,लुट्टापी जैसे..." " ए लड़के एक दूंगा खींचके, अब ज्यादा बोला तो|" नानाजी ने मोहन की बात बीच में ही काट दी |
" ये क्यों नहीं कहता कि कहानी सुनना है एं।" "सो तो है नानाजी, बस हो जाये एकाध, बस मज़ा आ जायेगा|" एक मझे हुये कलाकार की भाँति मीरा और मोहन एक साथ बोल पड़े| "तो सुनों आज तुम लोगों को लम्पू और गुलाबी की कहानी सुनाते हैं|" नानाजी बोले| "यह् क्या बला है नानाजी?" मीरा को शीर्षक कुछ जंचा नहीं| "चुप ,पहले सुनों फिर गुनों फिर पूछो|" नानाजी का मूड सरकने लगा था| "साँरी नानाजी वेरी साँरी" मीरा ने दोनों कान पकड़ लिये| एक गाँव में रहती थी लम्पू | उम्र बारह साल तीन माह सात दिन, उँचाई चार फुट पांच इंच..." "और वज़न ,वज़न कितना था नानाजी?मोहन ने चुटकी ली| " वज़न उसने कभी तुलवाया ही नहीं, गांव में वज़न तौलने की मशीन तो थी ही नही, कैसे तुलवाती बेचारी'" नानाजी ने ठहाका लगाया| "कोई बात नहीं नानाजी,चालीस किलो मान लेते हैं इतना तो होगा ही|"मीरा हँसने लगी| "तुम कहती हो तो मान लेते हैं| हां उसका एक भाई भी था लट्टूसींग|" नानाजी आगे बढ़े| "यह सींग क्या होता है नानाजी? नाम के आगे तो सिंह लगना चाहिये|" मोहन ने प्रश्न किया| " होता तो सिंह ही है ,परंतु यह कहानी गांव की है और गांव वाले तो सींग का उच्चारण करते हैं न| जैसे रामसींग मोहन सींग लालूसींग..." नानाजी ने समाधान किया| "फिर नानाजी आगे क्या हुआ?"मीरा ने पूँछा| "लट्टूसींग बहुत ही प्यारा था| साल भर का रहा होगा गोरा चिट्टा गोल मटोल| साँवली सी लम्पू उसे प्यार करती थी| दिन भर खिलाती। कभी गोदी में लेकर तो कभी झूले में लिटाकर | कभी कभी कंधे पर लाद लेती और बाहर सड़क पर निकल जाती और खूब घुमाती|" कभी अच्छे अच्छे गाने गाती कभी मन ही मन गुनगुनाती| लट्टू बहुत खुश होता,खिलखिलाकर हँस पड़ता| लगता जैसे पुरनमासी का चाँद हँस रहा हो| झूले में लट्टू झूलता तो झूला भी गाना गाता चर्र चर्र चूं चूं चर्र चर्र चूं चूं| लम्पू झूले की नकल करती,कर्र कर्र कूं कूं,कर्र कर्र कूं कूं| उसे बड़ा मजा आता| बच्चे उसे बहुत अच्छे लगते| दोपहर होते होते मुहल्ले के बहुत सारे बच्चे लम्पू के घर आ जाते| लम्पू सबको बड़े प्यार से खिलाती| किसी को गुड्डा देती किसी को गुडिया देती तो किसी को फुग्गे| सब बच्चे मजे सॆ खेलते| बच्चे हँसतॆ तो लट्टू भी हंसता| उसे लगता कि लड़के आसमान से उतरे छोटे छोटे राजकुमार हों और लड़कियां छोटी छोटी सी देवियां हों सुंदर सीं प्यारी सीं |"
"फिर नानाजी ,फिर क्या हुआ?"मोहन ने पूंछा| "लम्पू के पड़ोस में रहती थी गुलाबी,लम्पू की हम उम्र | लम्पू के घर से उसका घर बामुश्किल पाँच सौ फुट दूर था|" नानाजी बड़े अच्छे मूड में कहानी सुना रहे थे| "सिर्फ पांच सौ फुट"अब मीरा को कुछ तो बोलना ही था| "और कितना होगा गांव में तो मकान ऐसे ही होते हैं,गांव भी नज़दीक और दिल भी नज़दीक |कोई शहर थोड़ी है जो जहां घर भी दूर दूर होते हैं और लोग दिलों से भी दूर दूर ही रहते हैं|" नानाजी ने मार्मिक बात कही| "फिर नानाजी? मीरा ने जैसे हूंका दिया| "गुलाबी बच्चों से बिल्कुल भी प्यार नहीं करती थी|अपने छोटे भाई बहिनों से भी वह ठीक से नहीं बोलती थी, लड़ती थी और उन्हें मारती भी थी| उसके खिलोने तो कोई छू भी नहीं सकता था | बड़ों का कहना भी वह नहीं मानती थी और मुहल्ले के बच्चों से तो हर दिन लड़ाई करती रहती थी| किसी के खिलोने छीन लेना किसी के कपड़े फाड़ देना उसका रोज़ का काम था|" " आगे नानाजी" उत्साहित होकर मीरा बोली| "एक दिन गुलाबी अचानक लम्पू के यहां पहुँच गई| लम्पू लट्टूसींग को खिला रही थी| लट्टू हँस रहा था और लम्पू गा रही थी| गुलाबी लम्पू के पास जाकर बैठ गई और उसके गाने सुनने लगी| लम्पू गा रही थी, 'मोरा भईया सोवन लागा रूं रूं रूं,रूं रूं रूं'| गुलाबी ने देखा कि लट्टू जो अभी अभी झूले में हँस रहा था गाना सुनते ही गहरी नींद में सो गया है|
" अरे अरे यह तो सो गया ",आश्चर्य से गुलाबी बोली| "उसे उठाओ मैं उसे खिलाऊंगी|' "ठीक है मैं अभी उठा देती हूं।" लम्पू ने हंसते हुये कहा और वह गाने लगी|
" मेरा भईया खेलन लागा रूं रूं रूं ,रूं रूं रूं|" गुलाबी ने देखा लट्टू झूले में पड़ा पड़ा हाथ पैर हिला रहा है,जोर जोर से हँस रहा है, उछल कूद रहा है| गुलाबी आश्चर्य में पड़ गई| लम्पू क्या जादू जानती है|
"लम्पू और गाओ न कितना अच्छा गाती हो तुम,"गुलाबी ने उसकी ओर निहारते हुये कहा| "मेरा भईया दौड़न लागा रूं रूं रूं रूं रू रूं रूं रूं रूं..."लम्पू उसकी प्रत्येक फरमाईश पूरी कर रही थी| गुलाबी ने देखा गाने की आवाज़ सुनकर लट्टू झूले से उड़कर कमरे में दौड़ लगाने लगा|| "इतना सा लट्टू दौड़ रहा है,अरे अरे यह तो सरे कमरे में फुदक रहा है,क्या कोई चमत्कार हो रहा है " गुलाबी अवाक रह गई| लम्पू ने फिर गाया- मेरा भईया उड़ने लागा रूं रूं रूं रूं रूं..."अब तो लट्टू ऊपर छत में उड़ने लगा। इस कोने से उस कोने,उस कोने इस कोने| गुलाबी ने देखा कि लट्टू के छोटे से सुंदर शरीर मे दोनों तरफ पंख निकल आये हैं,सिर पर मोतियों सॆ जड़ा प्यारा सा मुकुट लगा है,भुजाओं में चाँदी से चमकदार बाजूबंद बंधे हैं| वह छोटी सी पीत वर्ण की धोती पहने कृष्ण कन्हैया लग रहा है| गुलाबी को लगा कि वह बॆहोश होकर गिर जायेगी| वह हांफते हाँफते अपने घर आ गई|
थोड़ी देर में जब वह आश्वस्त हुई तो लम्पू के घर क सारा दृश्य उसके सामने आ गया | लट्टू का ऊपर उड़ना ... दौड़ना ..."जब लम्पू कर सकती है तो मैं क्यों नहीं कर सकती यह सॊचकर उसने झूले में रोते हुये अपने भाई बल्लू को चुप कराने का प्रयास किया| जब वह चुप नहीं हुआ तो वह गाने लगी 'मेरा भईया खेलन लागा रूं रूं रूं रूं रूं....' मगर भईया काहे को चुप हॊने चला उसने गुस्से के मारे बल्लू के गाल में जोरदार तमचा जड़ दिया। "नालायक चुप ही नहीं होता रोये जा रहा है। " वह चिल्लाने लगी|
अब तो बल्लू ने आसमान ही गुँज दिया| गुलाबी की माँ दौड़ी आई|
"क्यों मार रही है उसको "वह गुलाबी पर चिल्लाई| " छोटे भाई को ऐसे मारतॆ हैं क्या?" वह उसको डांटने लगी| गुलाबी रोने लगी "मां यह मेरी बात बिल्कुल नहीं मानता | लम्पू का वह जो लट्टू है न वह तो..."
उसने मां को लट्टू के दौड़ने उडने, हँसने जो भी लम्पू के यहां देखा था,,सभी बातें बताई| माँ आश्चर्य में डूब गई "ऐसे कैसे हो सकता है" " माँ बिलकुल सच कह रही हूं राम कसम|"उसने सच होने का प्रमाण कसम खा कर दिया| "अब कसम काहे के लिये खाती है,सच ही होगा, उससे ही पूँछ के आ ऐसा कैसे होता है|"माँ ने सलाह दी| गुलाबी दौड़ गई लम्पू के घर|
"लम्पू लम्पू बता तेरा भईया तेरे गाने सुनकर तेरा कहना क्यॊं मान जाता है| उड़ने को कहो तो उ.ड़ने लगता है दौड़ने को बोलो तो दौड़ने लगता है...और..." "हसने को कहॊ तो हँसने लगता है रोने को कहो तो रोने ....|" "गुलाबी का प्रश्न पूरा होने के पहले जैसे धरती के नीचे से जबाब आने लगा| "अरे यह तो लट्टू बोल रह है"गुलाबी चौंक गई| " मेरी दीदी बच्चों से बहुत प्यार करती है सच्चा प्यार उन्हें कभी नहीं डांटती, न ही मारती है| उन्हें अपने सब खिलोने खेलने देती है। मन की भोली है मेरी दीदी, देवी का अवतार | भगवान भोले भाले लोगों की सब बातें पसंद करते हैं| चूंकि बच्चे भी भगवान होते हैं, इसलिये सच्चे मन वालों की सभी मान लेते हैं|" लट्टू बोलॆ जा रहा था| " लट्टू भईया मैं भी तो सबसे प्यार...|" "तुम,तुम चुप रहो | सबसे लड़ती हो तुम, झगड़ती हो| न तो बड़ों का कहना मानती हो न ही छोटों सॆ प्यार करती हो| तुम्हारे खिलोने कोई छू भी नहीं सकता, कौन तुम्हारा कहना मानेगा ।" "भईया मुझे माफ कर दो, आगे से किसी से नहीं लड़ूंगी...मुहल्ले के सब बच्चों से प्यार करूंगी।" गुलाबी रोने लगी|
वाह वाह नानाजी क्या कहानी है- फेंटेसी, मज़ा आ गया| मीरा और मोहन ठिल-ठिलाकर हंस रहे थे|
राखी का त्यौहार
राखियों से गुलजार बजार, आ गया राखी का त्यौहार|
मिठाई सजी दुकानों में, शोरगुल गूंजे कानों में, रेशमी धागों की भरमार, राखियों के ढेरों अंबार| कहीं पर बेसन की बरफी, कहीं पर काजू की कतली, कहीं पर रसगुल्लॆ झक झक, कहीं पर लड्डू हुये शुमार| आ गया राखी का त्यौहार|
कमलिया राखी लाई है, थाल में रखी मिठाई है, साथ में कुमकुम नारियल है, खुशी का पावन हर पल है| बहन ने रेशम का धागा, भाई के हाथों में बांधा, भाई की आँखों में श्रद्धा, बहन की आँखों मे है प्यार| आ गया राखी का त्यौहार|
बहन भाई का पावन पर्व, रहा सदियों से इस पर गर्व, जरा सा रेशम का धागा, बनाता फौलादी नाता| बहन की रक्षा करना धर्म, भाइयों ने समझा यह मर्म, बहुत स्नेहिल पावन है, भाई बहनों का यह संसार| आ गया राखी का त्यौहार|