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                                                                                                                                             लहर लहर किनारे


                                                                                                                                                   - शैल अग्रवाल

                                                     इस्तेनबुल

अगला दिन एक और नया दिन था और दुनिया का एक और खूबसूरत शहर इस्तेनबुल अपने पूरे सौंदर्य और भव्यता के साथ हमारी आँखों के आगे खड़ा था। चूँ कि यह एक ऐतिहासिक यात्रा थी। हर शहर यूरोपियन सभ्यताओं का लम्बा और विस्तृत इतिहास लिए हुए था। इतिहास के खंडहर और अद्भुत कलाकृतियों को संजोए हुए था। किनारों को छोड़ने और पहुँचने का सुख, एक नशे-सा अलग भी तो है। हर शाम यादों का एलबम सजोती और हर सुबह नए-नए उत्साह से भरी, हमारी जल यात्रा  नित नए और खूबसूरत पड़ाव पार कर रही थी ।

कई बार वैभव और विलासिता के उत्कर्ष पर पहुँचा और कई बार बना बिगड़ा इस्तेनबुल अपनी भौगोलिक स्थिति और सुगमता के कारण यूरोप और एशिया की सभ्यता का एक मनोरम कोलाज है। यूरोप और एशिया को जोड़ता एक बेहद खूबसूरत पुल है इस्तेनबुल। शहर की कई मशहूर ऐतिहासिक इमारतें जैसे ब्लू मौस्क के चारो गुम्बद सूरज की सिंदूरी आभा में नहाए, दूर से ही पर्यटक के मन में एक अमिट छाप छोड़ते हैं। चार साल पहले रूस के सेंट पीटरबरग्स की तरह यहाँ भी पोर्ट पर स्वागत में न सिर्फ बैण्ड-बाजे बज रहे थे अपितु मुस्कान और ठडा पेय व यूडी कोलोन में भीगी तौलिया भी थीं। एक और भव्य स्वागत जो कुछ साल पहले जिमेका में हुआ था अनायास ही याद आ गया जब पोर्ट पर रंगबिरंगी लकड़ी की सुंदर मालाएँ पहनाकर स्थानीय युवतियों ने अपनी पारंपरिक पोशाक में बेहद प्यारी मुस्कान और जिमेकन रम के साथ हमारा स्वागत किया था।

बाहर आते ही खबर मिली कि उस दिन और सिर्फ एक उसी दिन, इतवार और ईद होने की वजह से ग्रैंडबाजार और स्पाइस बाजार दोनों ही बन्द हैं। बन्द हैं.. और वह भी सिर्फ एक उसी दिन के लिए, जिस दिन हम तीन साढ़े तीन हजार मील की जल यात्रा करके वहाँ पहुंचे - धक्का-सा लगा। दोनों इस्तैनबुल में सैलानियों के लिए विशेष आकर्षण थे...ऐसा हमारे साथ ही क्यों, हम तो पहले भी इस्तेनबुल घूम चुके थे परन्तु साथ खड़े बेटे, बहू और पोतों का यह पहला ही अवसर था। बड़े-बड़े वादे किए थे हमने, बहुत कुछ बताया था इन बाजारों के बारे में-यहाँ तक कि यह भी कहा था कि जी भरकर शौपिग करेंगे। खैर...तुरंत ही तटस्थ होते, निराशा को भंवो और होठों से पोंछते बाहर आ गए हम। एकबार फिर स्थानीय तुर्की गाइड, ड्राइवर और वैन हमारा इन्तजार कर रही थी। ड्राइवर और गाइड बेहद विनम्र व मित्रवत् थे। उनकी झुकी आँखें बता रही थीं कि इस्तेनबुल को भलीभांति न दिखा पाने की अपनी मजबूरी पर उन्हें भी हमसे कम अफसोस नहीं था।

तस्कीम चौराहा आज की यात्रा का पहला पड़ाव था। इस चौराहे का तुर्की इतिहास में विशेष महत्व है। मुख्य जन आंदोलन यहीं से शुरु हुए हैं और आज भी जनता की राजनैतिक व वैचारिक आंदोलन और गतिविधियों का यही प्रमुख केन्द्र है । यहाँ से आम जनता को कभी भी संबोधित और एकत्रित किया जा सकता है। इस्तेनबुल शहर दो भागों में विभाजित है पुराना एशिया का हिस्सा और यूरोपियन। तस्कीम स्क्वायर यूरोपियन हिस्से में है। कई खूबसूरत दुकानें, रेस्तोरांत आदि होने के कारण सैलानियों की अच्छी भीड़ थी चारो तरफ।


अब हम सुल्तान अहमद चौराहे की तरफ चल पड़े। जहाँ ब्लू मौस्क और सोफिया हाडा( जो चर्च से मस्जिद और मस्जिद से बेहद खूबसूरत म्यूजियम में वक्त के साथ तब्दील हुआ) व सुल्तानऔर उनकी मलिकाओं का मुख्य महल कैपीताकी पैलेस है। छुट्टी का दिन होने की वजह से चारो तरफ जन सैलाब था। और चढ़ते दिन के साथ धूप ने भी चटकना शुरु कर दिया था। हर जगह पर्यटकों की लम्बी कतारें और हर पर्यटन स्थल के बाहर खुद ही उग आया मेले-सा बाजार। चारो तरफ रुकने और थकने के कई बहाने थे। फिर भी मन में उत्साह और एक ही दिन की समय सीमा ...छोटे-बड़े हम सभी चलते रहे , इंतजार करते रहे, आनंद लेते रहे।

पैलेस महीन जाली की नक्काशी का अद्भुत नमूना है और अंदर शस्त्र, शाही हीरे जवाहरात और शाही कपड़ों का अद्भुत संग्रह भी।


बाहर निकलते ही इन शाषकों का उद्यान व फव्वारों का शौक खुलकर विहंस रहा था और हमें भी उस भयंकर गर्मी से थोड़ी राहत मिल गई।

मस्जिद में उस आस्था की भीड़ के साथ घूमना अपने आप में एक स्तंभित अनुभव था। याद आ गई वह पहली यात्रा जब जनवरी का महीना था और हड़्डी कंपाती ठंड में बरसात में भीगे हम पांच ( हम दोनों व छोटे बेटे बहू व पोती)अकेले ही थे ब्लू मौस्क के अंदर।         इस्तेनबुल का मौसम अति का मौसम है। गर्मी में खूब गर्मी और ठंड में खूब ठंड। हमने शायद दोनों बार ही थोड़ा गलत वक्त चुन लिया था यहाँ आने के लिए।


अब सोफिया म्यूजियम जाने के लिए किसी में भी उत्साह नहीं दिख रहा था। हमने निश्चय किया कि वैन से ही इस्तेनबुल को ढूँढा जाए। जहाँ मन किया रुक लेंगे , घूम लेंगे। इस्तेनबुल एक बेहद खूबसूरत शहर है । कभी पहाड़ी उंचाइयों से तो कभी समुद्र के किनारे पुल के ऊपर खड़े तो कभी भीड़भाड़ भरे उन बाजारों में जहाँ स्थानीय लोग सामान खरीद रहे थे वक्त कैसे निकल गया, पता ही नहीं चला। खूबसूरत उपहारों से लंदे-फंदे हम एकबार फिर जहाज की ओर वापस मुड़ चुके थे। थकान से आँखें बन्द हो रही थीं। कान में गाइड की आवाज अभी भी गूंज रही थी- एक-एक सुल्तान की कई-कई रानियां होती थीं पर जिसका बेटा सुल्तान बनता था ताकत और महत्व उसी का होता था। युवराज बनने का आकांक्षी अपने आस-पास के अन्य सभी सक्षम और वीर संभावी युवराजों का कत्ल करवा के उन्हे रास्ते से हटा देता था। हरम में सैकड़ों सुन्दर लड़कियां रखी और तैयार की जाती थीं जिनमें जो शहंशाह को खुश कर पाए वही मलिका बन पाती थी या महल तक पहुँचती थी...


एक खूनी दासता भरा, खूबसूरत और चतुर इतिहास; आज इतिहासकारों का शोध विषय, पर्यटकों का मनोरंजन ! कई-कई यादें समेटे इस्तेनबुल...एक तिलिस्मी उपन्यास-सा मन-मष्तिस्क में गुंथ-बुन चुका था।...