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                                                                                                                                पर्यटन

                                                                                                                     गोवर्धन यादव

छ्त्तीसगढ का खजुराहो- भोरमदेव                                    

मध्यप्रदेश के उत्तरीय भाग में पन्ना एवं छतरपुर के मध्य स्थित “खजुराहो”, १० वीं एवं ११ वीं शताब्दी में बने हिन्दु मन्दिरों के लिए विश्वविख्यात है. मन्दिरों के दीवालों पर उत्कीर्ण मैथुनरत प्रतिमाएँ हमेशा से उत्सुकता के केन्द्र में रही हैं. इन्हें देखने के लिए लाखों पर्यटक यहाँ पहुँचते हैं.

 ठीक इसी तर्ज पर कवर्धा(छत्तीसगढ) से लगभग १७ कि.मी.पूर्व की ओर मैकल पर्वत श्रृंखला पर स्थित ग्राम छपरी के निकट चौरागाँव नामक गाँव में स्थित है. छत्तीसगढ का खजुराहों कहा जाने वाला “भोरमदेव” मन्दिर, न केवल छत्तीसगढ, अपितु समकालीन अन्य राजवंशॊं की कला-शैली के इतिहास में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है. ११वीं शताब्दी के अंत में( लगभग १०८९ ई.) निर्मित इस मन्दिर मे शैव, वैष्णव एवं जैन प्रतिमाएँ भारतीय संस्कृति एवं कला की उत्कृष्टता की परिचायक है. इन प्रतिमाओं से ऎसा प्रतीत होता है कि धार्मिक व सहिष्णु राजाओं ने सभी धर्मों के मतावलम्बियों को उदार प्रश्रय दिया था.

       किवदन्ती है को गोंड जाति के उपास्य देव भोरमदेव( जो कि महादेव शिव का एक नाम है) के नाम पर निर्मित कराए जाने पर इसका नाम “भोरमदेव” पड गया और आज भी इसी नाम से प्रसिध्द है.

      

मन्दिर की स्थापत्य कला शैली मालवा की परमार शैली की प्रतिछाया है. छत्तीसगढ के पूर्व-मध्यकाल(राजपूत काल) में निर्मित सभी मन्दिरों में “भोरमदेव” सर्वश्रेष्ठ है. निर्माण योजना एवं विषय वस्तु में सूर्य मन्दिर कोणार्क एवं खजुराहो के मन्दिरों के समान होने से इसे छत्तीसगढ का खजुराहो भी कहा जाता है.

       इस मन्दिर का निर्माण, श्री लक्ष्मण देव राय द्वारा कराया गया था. इसकी  जानकारी वर्तमान मण्ढप में रखी हुई एक दाढी-मूंछ वाले योगी की बैठी हुई मूर्ति, जो ०.८९ से.मी. ऊँची एवं ०.६७ से.मी. चौडी है, पर उत्कीर्ण लेख से प्राप्त होती है. इसी प्रतिमा पर उत्कीर्ण दूसरे लेख में, कलचुरिन संवत ८४० तिथि दी हुई है. इससे यह जानकारी प्राप्त होती है कि यह मन्दिर छठे फ़णि नागवंशी शासक श्री गोपालदेव के शासन में निर्मित हुआ था.

       किन्तु मण्डवा महल से प्राप्त शिलालेख में राजा रामचन्द्र द्वारा निर्माण होना बताया गया है. चूंकि यहाँ फ़णिनाग वंश के नागवंशी राजाओं ने लम्बे काल तक राज्य किया, जो कलचुरियों के अधिसत्ता को स्वीकार करते थे. लंबी वंशावली में सर्वप्रथम अहिराज राजा से नागवंश की शुरुआत हुई. शिलालेख से यह स्पष्ट होता है कि अर्तुकन की अनुपम सुंदरी पुत्री मैथिला का एक नागराज से प्रेम हुआ था और इनसे उत्पन्न पुत्र अहिराज से वंश की शुरुआत हुई.

       पूर्वाभिमुखी प्रस्तर निर्मित यह मन्दिर,नागर शैली का सुन्दर उदाहरण है. मन्दिर में तीन प्रवेशद्वार हैं- प्रमुख द्वार पूर्व दिशा की ओर, दूसरे का मुख दक्षिण की ओर और तीसरा, उत्तराभिमुखी है. इसमें तीन अर्ध-मंडप, उससे लगे अंतराल और अंत में गर्भगृह है. अर्धमंडप का द्वार शाखों व लता-बेलों से अलंकृत है. द्वार शाखों पर शैव द्वारपाल, परिचारिक,-परिचारिका प्रदर्शित है. मण्डप के तीन दिशाओं के द्वारों के दोनों ओर पार्श्व में एक-एक स्तंभ है, जिनकी यष्टि अष्ट कोणीय हो गई है. इसकी चौकी उल्ट विकसित कमल के समान है, जिस पर कीचक बने हुए हैं, जो छत का भार थामे हुए हैं. मण्डप में कुल १६ स्तंभ हैं, जो अलंकरणयुक्त हैं. मण्डप की छत का निर्माण प्रस्तरों को जमाकर किया गया है. छत पर शतदल कमल बना हुआ है. मन्दिर १५३ मीटर ऊँचे अधिष्ठान पर निर्मित है. इसकी लम्बाई १८१३ और चौडाई १२२० मीटर है.

       गर्भगृह का मुँह पूर्व की ओर है तथा धरातल १.५० मीटर गहरा है. इसके ठीक बीच में शिवलिंग प्रतिष्ठित है. छत के ऊपर शतदल कमल बना हुआ है. गर्भगृह में पंचमुखी नाग प्रतिमा, नृत्य गणपति की अष्ट भुजी प्रतिमा, ध्यानमग्न राजपुरुष की पद्मासन में बैठी हुई प्रतिमा, उपासक दंपत्ति प्रतिमा विद्धमान है.

       मंदिर के कटिभाग की बाह्य भित्तियाँ अलंकरण युक्त हैं. कटिभाग में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं उत्कीर्ण है,जिसमे विष्णु, शिव, चामुण्डा, गणेश आदि की सुन्दर प्रतिमाएं उल्लेखनीय है. मन्दिर के जंघा पर कोणार्क के सूर्य मन्दिर एवं खजुराहों के मंदिरों की भांति सामाजिक एवं गृहस्थ जीवन से संबंधित अनेक मिथुन दृष्य तीन पंक्तियों में कलात्मक अभिप्रायों समेत उकेरे गए हैं, जिसके माध्यम से समाज के गृहस्थ जीवन को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया गया है. मिथुन मुर्तियों का यहाँ बाहुल्य है. इन प्रतिमाओं में नायक-नायिकाओं, अप्सराओं की प्रतिमाएं अलंकरण के रुप में निर्मित की गई हैं. प्रदर्शित मिथुन मुर्तियों में कुछ सहज मैथुन विधियों का चित्रण तो हुआ है, कुछ काल्पनिक विधियों को भी दिखाने का प्रयास किया गया है. पुरुष नर्तक-नारी नर्तकियों से यह आभास होता है कि दसवीं-ग्यारवीं  शताब्दी मे इस क्षेत्र के स्त्री-पुरुष नृत्यकला में रुचि रखते थे. मंजीरा, मृदंग, ढोल, शहनाई, बांसुरी एवं वीणा आदि वाद्ध-उपकरण मूर्तियों के द्वारा बजाए जाते हुए प्रदर्शित हुए हैं.मंदिर के परिसर में संग्रहित प्रतिमाओं में विभिन्न योद्धाओं एवं सती स्तंभ प्रमुख हैं.

      

भोरमदेव मन्दिर के उत्तर की ओर शिवमन्दिर, दक्षिण में एक शिवमन्दिर जिसे मण्डवा महल के नाम से जाना जाता है,स्थित है. पश्चिम की ओर छेरकी नामक शिवमन्दिर है.

       सन २००२ में मुझे प्रमोशन मिला था और मैं कवर्धा प्रमुख डाकघर में, बतौर पोस्टमास्टर(H.S.G.I) के पद पर पदस्थ हुआ. छत्तीसगढ का “खजुराहॊ” कहे जाने वाले “भोरमदेव” के बारे में काफ़ी पहले से सुन रखा था. अपनी ज्वाईनिंग देने के पश्चात मुझे इन्तजार था उस इतवार का, जिस दिन डाकघर बंद रहता है, अपनी मित्र मण्डली के साथ वहाँ जा पहुँचा और इस अद्भुत मन्दिर के दर्शन-लाभ ले पाया.

        अगले इतवार को मैंने कवर्धा के वर्तमान विधायक श्री जोगेश्वरराजसिंह से भेंट की,जो भूतपूर्व कवर्धा रियासत के राजा के बेटॆ हैं. यहाँ जाने से पूर्व मैंने अपना परिचय देते हुए उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की थी. उनकी स्वीकृति मिलने के बाद मै उस भव्य राजप्रसाद के परिसर में जा पहुँचा,जहाँ उन्होंने आगे बढकर मेरा स्वागत किया. महल के भीतरी भागों में घुमाया और साथ बैठकर नाश्ता और चाय का भी आनन्द उठाया. मुलाकात के दौरान उन्होंने कहा था-“ यह पहला मौका है जब कवर्धा के पोस्टमास्टर मुझसे मिलने आए हैं”

       जब-जब भी कवर्धा की बात होती है, तो मुझे वहाँ बिताए गए प्रत्येक क्षण की मधुर याद ताजा हो उठती है.