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                                         सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर
                                                        लेखनी-मई-2010 

  





                                            " 

                                             कटे हुए हर पेड़ से, चीखा एक कबीर


                                            मूरख, कल को आज की, आरी से मत चीर"


                                                                                    -नरेश सांडिल्य


                                                       (प्रकृति और पर्यावरण)


                               


                                                              (लेखनी-वर्ष-4-अँक-39)  


इस अंक में,


गीत और ग़ज़लः  रविकांत पाण्डेय, शशिकांत,  नीलम वर्मा,  विनीता गुप्ता। माह के कविः बुद्धिनाथ मिश्र। कविता धरोहरः जयशंकर प्रसाद । कविता आज और अभीः गगन मीत कौर, शैल अग्रवाल, राजीव सेठ, विंसेंट वान रॉस,  सीताराम गुप्ता,  शशिकांत,  राधेश्याम बन्धु। बाल गीतः निर्मला सिंह।


मंथनः डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव। परिचर्चाः डॉ. विमला उपाध्याय।  कहानी विशेषः महेशचन्द्र द्विवेदी। कहानी समकालीनः शैल अग्रवाल। संस्मरणः दिनेश ध्यानी। लघुकथाः संजय जगनाल। सरोकारः अजय पराशार। परिदृश्यः अजय पराशार। चौपालः श्री महेन्द्र देसाई -गुजराती से अनुवाद व्योम अखिल । बाल कहानीः निर्मला सिंह।  खबरों से भरपूर विविधा। 




                                              संरचना व संपादनः शैल अग्रवाल

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                                                                                                                                                              अपनी बात

प्रकृति रम्य है, सुन्दर है और किसी भी सुन्दरी की तरह इस पर पूर्ण विश्वास करना , इसके भरोसे खुद को छोड़ देना, आपदाओं को आमंत्रण देना है, या फिर आप उन लोगों में से हैं, जिनकी सोच है कि 'यदि पृथ्वी हमें माँ की तरह प्यार देती है तो माँ की तरह ही सजा देने का भी उसे अधिकार है? ' जो भी हो आपकी सोच, लेखनी इस बार आपके लिए कई सवाल लेकर आई है...सवाल जो हमें खुद अपने गिरेबां में झांकने को मजबूर करेंगे।  बात तो करना चाहते थे  फूलों की, तितलियों की, झरनों और बादलों की, परन्तु बात करनी पड़ रही है 'ग्लोबल वार्मिंग' की। सदियों से यही होता  रहा है कि प्रकृति भरपूर नेयमतें देती है और हम बस लेते ही नहीं,  अपने स्वार्थ में अन्धे, लूटते आए हैं;  परिणाम  है कि जलमय धरती ही जल-ती है..! अब हम कैसे रूप रंग और गंध की बातें करें। क्या फरक पड़ता है कि आप प्रकृति को माँ मानते हैं या सहचरी, वैज्ञानिकों की मानें तो वास्तविकता यह है कि हमारी धरती  मौत की कगार पर है।


य़ूँ तो धुरी पर अपनी स्थिति बदलने से हर 100 हजार साल पर एक बड़ा परिवर्तन आता है पृथ्वी के मौसम और संरचना दोनों में ही, परन्तु सन 60 से यह परिवर्तन बहुत तेजी से आया है, धीरे-धीरे नहीं बेहद चौंकाने वाली गति के साथ। कई इसे हमारे दुरुपयोग का नतीजा बताते हैं। .जीवन ही नहीं, सृष्टि की संरचना तक आज एक अविश्वसनीय विरोधाभास में डूब चुकी है-कहीं पे सूखती नदियां तो कहीं डूबते शहर। मौसम के बदलते ये मिजाज... नदियां सूख रही हैं और समुद्र की सतहें बढ़ रही हैं;  सूरज की किरणों से निखरती नहीं, उबलती धरती ! एक अजीब और असह्य स्थिति है यह। शायद वह दिन दूर नहीं जब कलकल बहती ये रम्य नदियां एक सपना हो जाएंगी, संग्रहालय और इतिहास के पन्नों में ही बची रह जाएँगी और  सूखी लकीरों के निशानों को दिखा-दिखाकर कहा जाएगा कि देखो यहाँ पर कभी फलां-फलां नदियाँ बहा करती थी !  

लाखों औरतें जिस गंगा मा की लहरों-से अमर सुहाग की कामना आज गा-गाकर करती हैं, कहा जा रहा है कि शीघ्र ही...अगले पच्चीस-तीस साल में ही ( सन 2035 तक) वह गंगा पूरी तरह से सूख जाएगी; क्योंकि  जिस हिमखंड से उसका उद्गम है वह बहुत तेजी से पिघल रहा है।  अनुमान है कि अगले चन्द दशकों में ही, पृथ्वी के बढ़ते तापमान के प्रभाव स्वरूप भारत  को ही नहीं, पूरे विश्व को ही नई-नई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा और जीवनदायी स्वच्छ जल इनमें से एक प्रमुख मुद्दा होगा।  

कहते हैं, जब जगो तभी सवेरा है और अगर हम अभी नही जगे, तो क्या पूरी मानवता के लिए बस अंधेरा ही अंधेरा नहीं... क्या अपनी पृथ्वी को, इसके पर्यावरण को संभालकर ऱखना, इसकी रक्षा करना, हमारा कर्तव्य, एक जरूरत... सुख-चैन नहीं?  वैज्ञानिक नए गृह और नए नक्षत्रों की तलाश में हैं जहां इस बूढ़ी जर्जर धरती को त्यागकर चैन की बंसी बजा सकें, पर दिल्ली कितनी दूर है, कोई नहीं जानता! हो सकता है मंगल गृह (मार्स) पर धूल हो, हवा हो, पर पृथ्वी पर तो अभी भी बहुत कुछ है, जो स्पृहणीय है, संग्रहणीय और रहस्यमय भी नहीं। जीवन्त व सुखद है!  लूट-खसूट कर क्या दुर्दशा कर डाली है हमने इसकी और कितना प्रदूषित कर दिया है हमने इसे, इस वास्तविकता को अब और नहीं नकारा जा सकता! वक्त आ गया है कि जब बेइन्तिहां मौज-मस्ती और सुख-सुविधाओं से थोड़ा वक्त निकालकर इसे भी दिया जाए और हम अपनी आदतें व दिनचर्या बदलें या उनमें सुधार करें। पहले एक-एक घर में चार-चार कारे सम्पन्नता और शान की निशानी थीं,  आज संपन्न और समर्थ देश भी एकबार फिरसे सार्वजनिक  वाहनों पर जोर दे रहे हैं, काम पर जाते समय आस-पड़ोस के साथ वाहनों की साझेदारी की बातें कर रहे हैं। बिजली के अपव्यय को रोकने की बातें कर रहे हैं। शाकाहारी जीवन शैली अपनाने के लिए कह रहे हैं। इससे प्रदूषण तो रुकेगा ही, खनिज पदार्थों का अपव्यय भी रुकेगा। उर्जा और खनिज दोनों को ही बचाने की बेहद जरूरत है। हर तरह का अपव्यय और अन्धी विलासिता व शान-शौकत रोकने की जरूरत है। आज गरीब दाने-दाने को भटक रहा है, परन्तु हमें सोचना यह है कि आने वाले कल में क्या होगा जब सभी भटकेगें। पैसा तो रह जाएगा पर दाना या पानी नहीं! 

'काश् वक्त होता और हम और हमारे पूर्वज इसकी तरफ कुछ और ध्यान दे पाते।' यही सोच-सोचकर मात्र हाथ ही न मलती रह जाएँ कहीं हमारी आने वाली पीढ़ियां ! पर, दौड़ती भागती इस जिन्दगी में इस पृथ्वी के बारे में भी थमकर सोचने का वक्त क्या निकाल पाएंगे हम कभी ! नास्तिक नहीं हूँ और ना ही निराशावादी पर मानवता के भविष्य ( विशेशतः अपनी इस धरती के भविष्य को लेकर) इस फिसलन और विश्व के लापरवाह रवैये पर दुःख जरूर है।  एक से एक विचलित करने वाले पर्यावरण के तथ्य सामने आ रहे हैं ।  कोई कह रहा है कि पृथ्वी इतनी गरम होती जा रही है कि नौर्थ पोल से भी बड़े बड़े हिमखंड तेजी से हर साल पिघल रहे हैं और समुद्री जल सतह बढ़ती जा रही है। तो कोई कह रहा है कि यदि यह सब ऐसे ही रहा तो जल्दी ही दुनिया का पूरा नक्शा ही बदल जाएगा और एक बड़ा भूखण्ड , कई-कई देश पानी में डूब जायेंगे। हाल ही में आई बंगला देश की बाढ़ और उससे हुए नुकसान की खबरों से तो यही लगता है कि शायद इन बातों में कहीं कुछ सच्चाई है। इंगलैंड और अमेरिका जैसे विकसित देशों के कई-कई भाग अब तो आदी-से होते जा रहे हैं आए दिन की बाढ़ों और मौसम के प्रकोपों से। हाल ही में आइस लैंड में ज्वालामुखी के लगातार फूटने से गैस और धुँओं के बादल जो पैदा हुए थे उन्होंने समस्त हवाई आवागमन को कैसे पूरे एक हफ्ते के लिए बन्द कर दिया था, इसे भला कौन भूल सकता है? चीन और वियतनाम में घटित आपदा और नुकसानों  को कैसे भुलाया जा सकता है? परेशान हैं खगोलशास्त्री अनियंत्रित तूफान और बढते भूकंपों द्वारा हुए नुकसानों से...एक तरफ पिघलते पर्वतों से, तो दूसरी तरफ सहारा रेगिस्तान के बढ़ते विस्तार से...लावा फेंकते हुए क्रुद्ध ज्वालामुखियों से। देखा जाए तो प्रकृति का यह अप्राकृतिक रूप, मौसम और पृथ्वी की रूप-रेखा में आते तेजी से ये बदलाव, आज गरीब अमीर हर देश, पूरे विश्व को ही त्रस्त किए हुए हैं। इन पर कैसे नियंत्रण किया जाए, इस विषय में गोष्ठियाँ तो होती हैं, परन्तु हस्ताक्षर करने को अपनी यांत्रिक और रासायनिक सुख-सुविधाओं को छोड़ने को कोई भी तैयार नहीं, चाहे देश अमीर हो या गरीब ...प्रगतिशील हो या विकसित और वैभव-सम्पन्न। एकतरफ बाढ़ और सूखा से तबाह फसलें आज मनुष्य की जरूरत भर जैसे तैसे पूरी कर पा रही हैं तो दूसरी तरफ अधिकाधिक रसायनों का खेती में प्रयोग फसलों और खाद्य-पदार्थों  को बेहद जहरीला और मानव के लिए बीमारियों का घर बनाता जा रहा है।

हर तरह के लालच और दुरुपयोगों का आज परिणाम यह है कि खाद्य और अन्य इस्तेमाल के पदार्थों में कमी, बढ़ती कीमतें, भुखमरी और त्राहि त्राहि... विश्व की बढ़ती आबादी का पृथ्वी के कुछ ही हिस्सों की तरफ ललचना और आंख बन्द करके लपकना । ...क्या हम वाकई में उस महाप्रलय की तरफ चल पड़े हैं जिसका जिक्र हमारे धर्म-ग्रन्थों में मिलता है और जिसमें जलथल एक हो जाने की बात का उल्लेख है या फिर यह सब भी डरावनी ...उत्तेजक खबरों का एक नया सिलसिला मात्र है! जो भी हो, जब इन्सान एक घर बनाता है तो उसको कितनी लगन से सजाता संवारता है; हर संभव तरीके से हिफाजत करता है , तभी तो उसमें चैन और आराम से रह पाता है, फिर यह पृथ्वी जो हम सबका घर है, इसकी इतनी उपेक्षा और अवहेलना क्यों?              
उजड़ती हुई यह धरती, क्या अब वाकई में इसे बचाया नहीं जा सकता...क्या यह अपने नैसर्गिक अन्त तक जा पहुंची है या कोई और भी जिम्मेदार है इस विध्वंस का?  क्या बस वे आतंकवादी ही हैं, जिनके बमों की दिल दहला देने वाली गूंज आज हमें दुनिया के किसी भी कोने में चैन से नहीं रहने देती या फिर खुद हमारी अपनी अनगिनित इच्छाएँ भी... और-और धन-संचय की बेरहम लिप्सा और अतृप्त होड़, जिसके रहते बड़ी बेरहमी से पृथ्वी के भांति-भांति के नैसर्गिक और.खनिज पदार्थों को दिनरात लूटा जा रहा हैं...उनका अपव्यय हो रहा हैं...ऐसे हम भी किसी आतंकवादी से कम नहीं !

आधुनिक जीवन का यह औध्योगीकरण, जिसका उठता धुँआ आसमान तक में छेद कर आया है...या फिर एकबार फिर उस भगवान को ही दोष दिया जाए, जो अपने इस प्रतिरूप मानव को पृथ्वी पर भेजकर बिल्कुल ही भूल चुका है और यहां आकर रहना तो दूर, कभी हमारी तरफ मुडकर देखना तक याद नहीं उसे ! क्या कभी सोचा है हमने कि जब वह आखिरी पेड़ गिरा दिया जाएगा, आखिरी मछली भून ली जाएगी और आखिरी पानी की बूंद सोख ली जाएगी तब , तब क्या होगा हमारा? क्या वृक्षारोपड़ एक हल हो सकता है हमारी समस्याओं का...क्या पीने के पानी की तबाही को रोकने के लिए जल संचय भी एक हल नहीं हमारे पास ( सुना है भारत में जल संचय पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है और आगामी ओलंपिक खेलों के लिए जल रहित शौचालय पर भी शोध हो रहा है।) मलमूत्र से खाद आदि बनाने का काम और जोरशोर से करने का विचार है भारत सरकार का। गोबर गैस तो भारत में जाने कबसे चल रही है। सौर्य उर्जा का भी पूरा इस्तेमाल करने की जरूरत है। यदि ऐसा सुचारु और स्वस्थ रूप से प्रतिपादित किया जा सका तो भारत विश्व का उर्जा संरक्षण और संचालन में प्रतिनिधित्व कर सकता है ? क्या मिल बांटकर कम से कम अपव्यय के साथ अधिक-से-अधिक की गुजर नहीं की जा सकती? इतना सहिष्णु तो होना ही पड़ेगा हमें। हमारी यह जमीन की बेइन्तिहां भूख और कटते जंगल तो जिम्मेदार हैं ही इन समस्याओं के, हमें अपनी जीवन प्रणाली, आदतें और कुछ बेहद बुनियादी समझौते करने की भी बेहद जरूरत है।


पिछले कुछ दिनों से एक ई.मेल घूम रही थी कि माया सभ्यता में प्राप्त भित्ति अंक-गणना के अनुसार सन 2012 में पृथ्वी का अन्त हो जाएगा...कि माया सभ्यता बहुत विकसित थी और उनकी भविष्यवाणियाँ गलत नहीं होतीं। समझ में नहीं आया यह सनसनीखेज खबर डराने के लिए थी या चेतावनी थी...चेतावनी भी तो किससे और किसलिए...क्या कुछ किया जा सकता है पृथ्वी और हमारे बचाव के लिए ?  और यदि नहीं, तो फिर ऐसी खबरों को यूँ स्पष्टतः दिन तारीख और मिनट के साथ बेमतलब ही फैलाकर लोगों को डराने से क्या फायदा  ?  वैसे भी खुदको अनश्वर समझने वाला मानव समाज क्या कभी डरा है ? 


...हो सकता है हम अपनी बुद्धि के बल पर हर समस्या का कोई हल निकाल ही लें, पर फिर क्या  एक खास चयन प्रकरण नहीं शुरु हो जाएगा और चन्द समर्थों की ही होकर नहीं रह जाएगी यह पृथ्वी?... क्या उस ढलान पर जाने से पहले ही सम्भलना बेहतर नहीं...अपव्यय तो रोकना ही होगा। पेट्रोल के बगैर तो काम चल सकता है, पर पानी के बगैर कैसे काम चलेगा ?संभले नहीं तो शायद सचमें बूंद बूंद को तरस जाएं और अगला विश्व युद्ध पेट्रोल पर नहीं, पानी पर ही हो जाए? ये और कई कई ऐसे जलते सवाल हैं जिन पर आकर बारबार ठहरी है लेखनी। ..समस्याएं जिन्हें मिल बैठकर बांटना चाहा है कइयों ने। हल क्या हैं, और यदि हैं भी तो कितने सार्थक... यह सब तो भविष्य ही बता पाएगा, अभी तो बस इतना ही सुखकर है कि हम  खुदको और अपने आसपास को सुनने व समझने की एक ईमानदार कोशिश तो कर रहे हैं ,  तथ्यों पर थोड़ा ही सही, ध्यान तो देने लगे हैं ।  

                                                                                                                           -  शैल अग्रवाल   

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                                                                                                                                               गीत और ग़ज़ल

धरती अंबर...








धरती अंबर सबकी खातिर ख्वाब सुहाने रखता हूँ
अपने होठों पर हरदम आजाद तराने रखता हूँ

मां का प्यार, पिता की सीखें, भूली-बिसरी कुछ यादें
सोने से पहले इन चीजों को सिरहाने रखता हूँ

दर्द ज़मानेवाले आखिर मेरा क्या कर सकते हैं
अपने दिल में खुशियों के अनमोल खजाने रखता हूँ

फूल खिले हैं, चाँद उगा है, कोयल गाती बागों में
तुझसे मिलने के हरदम तैयार बहाने रखता हूँ

अपने पुरखों की तहजीबें आज तलक भी ना भूला
आंगन में चिड़ियों की खातिर अब भी दाने रखता हूँ

अपने अंदर जब झांका तो ये मुझको मालूम हुआ
इक तहखाने के अंदर कितने तहखाने रखता हूँ

उनको दौलत प्यारी है और मुझको प्यार है इन्सां से
दौलत वाले क्या जानें मैं क्या पैमाने रखता हूँ

घर से कोई भूखा वापस जाए ये मंजूर नहीं
कुटिया है छोटी पर दिल में राजघराने रखता हूँ

                                 -रविकांत पाण्डेय











बेबस किनारे










कब तलक देखोगे तुम यूँ चाँद-तारे
रफ़्ता-रफ़्ता  डूब  जाएंगे  ये  सारे।

 
जूझना होगा हमें मौजों से बढ़कर,
कुछ नहीं कर पाएंगे बेबस किनारे।

 
जीत की ख़ातिर किया क्या कुछ न उसने,
एक हम हैं  जीत  की  बाजी  भी  हारे। 

 
कुछ यहाँ बदला नहीं, सब कुछ वही है,
फिर न क्यूँ दिलकश रहे अब ये नज़ारे।

 आस की वो आखिरी कश्ती भी डूबी,
पार कर खुद दरिया अपने ही सहारे।

                -शशिकांत










ज़लज़ला










बिना किसी तूफ़ान के कब टली कोई बला
हो कहीं तो खलबली, उठे कहीं तो ज़लज़ला

 
अपने ही दायरे में तू कभी उगा, कभी ढला
सुबह कब कहाँ हुई सफ़र में ना पता चला

 
क्या कुछ तलाश कर सका, ना कर सका जो हौंसला
हसरतों को कर बुलन्द  और  मशाल  को  जला

 
ना सोच तेरे साथ क्यों, कोई भी नहीं चला
दूर ही अभी सही,  आ रहा  है  काफ़िला

 
ज़ोर स्याह रात का रौशनी पे कब चला
अपना वजूद ढूँढ़ ले, वक्त है ये  बुलबुला

 
करना अगर है, कर अभी, जो भी है तेरा फ़ैसला
ज़िन्दगी नहीं रुकी,   तू  चला  या  न  चला

            - डॉ. नीलम वर्मा










दर्द का दरख़्त










ये नाम के सूरज हैं चमकना नहीं आता।
बादल बने फिरते हैं बरसना नहीं आता।

वो इसलिए नाराज हमसे रहते हैं हरदम
बातों में उनकी हमको उलझना नहीं आता।



 धूपों में जले आज तक, आगे भी जलेंगे
क्योंकि तुम्हारे साये में, पलना नहीं आता।

 
तूफ़ान बन के आओ, चाहे आँधियाँ बनो
बस्ती है ये ऐसी कि उजड़ना नहीं आता।

 
ऐसा नहीं कि कुछ भी हिलाता नहीं मुझे
हूँ दर्द का दरख़्त,  उखड़ना नहीं आता ।

                  -विनीता गुप्ता

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                                                                                                                                                            माह के कवि
                                                                                                                                                          -बुद्धिनाथ मिश्र


फिर दुपहर लगी अलसाने








फिर दुपहर लगी अलसाने
नीम तले।

 
सिर पर पसरी छाँह
लगी हटने
ताल नदी के होठ
लगे फटने

 
हवा लगी अफवाह उड़ाने
नीम तले।

 
टहनी-टहनी सूख
हुई काँटा
खेतों में फैला फिर
सन्नाटा
अंग-अंग फिर लगे पिराने
नीम तले।

 
चैता आँके रेख
महावर की
खलिहानों को
आँचर लगे नयन उलझाने
नीम तले।









भरी दुपहरी









भरी दुपहरी
मारी-मारी फिरे डाल पर
पतछाँही के लिए गिलहरी
भरी दुपहरी। 

 
उलटी धूपघड़ी की टिड्डी
चाट गई सब हरियल सपने
तलवे जले घाट धोबिन के
भरी सीपियाँ लगीं चमकने


भरी दुपहरी।
सूखे का बेताल नाचता
हुई दिशाएँ अंधी-बहरी।
भरी दुपहरी।

 
रुत के मारे हुए कुओ के
माथे पर मकड़ी के जाले
झूठी-सच्ची आग लगाकर
दुबकी हवा कहीं परनाले

 
भरी दुपहरी
पानी-पानी चिल्लाती है
बेपर्दा हो नदिया गहरी।                                                                                                                                                      भरी दुपहरी। 








चिलचिलाहट धूप की








चिलचिलाहट धूप की
पछवाँ हवा की मार
यह तपन हमने सही सौ बार।

 

सूर्य खुद अन्याय पर
होता उतारू जब
चाँद तक से आग की लपटें
निकल पड़तीं।



चिनगारियों का डर                                                                                                                                                            समूचे गाँव को डँसता
खौलते जल में
बिचारी मछलियाँ मरतीं।



हर तरफ है साँप-बिच्छू के
जहर का ज्वार
यह जलन हमने सही सौ बार।

 

मुँह धरे अंडे खड़ी हैं
चीटियाँ गुमसुम
एक टुकड़ा मेघ का
दिखता किसी कोने।



आज जब से हुई
दुबराई नदी की मौत
क्यों अचानक फूटकर
धरती लगी रोने ?  

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                                                                                                                                                          कविता धरोहर
                                                                                                                                                         जयशंकर प्रसाद


कनक किरन









तुम कनक किरन के अंतराल में
लुक छिप कर चलते हो क्यों ?

नत मस्तक गवर् वहन करते
यौवन के घन रस कन झरते
हे लाज भरे सौंदर्य बता दो
मोन बने रहते हो क्यो?

अधरों के मधुर कगारों में
कल कल ध्वनि की गुंजारों में
मधु सरिता सी यह हंसी तरल
अपनी पीते रहते हो क्यों?

बेला विभ्रम की बीत चली
रजनीगंधा की कली खिली
अब सांध्य मलय आकुलित दुकूल
कलित हो यों छिपते हो क्यों?







 
    झरना





 




मधुर हैं स्रोत मधुर हैं लहरी
न हैं उत्पात, छटा हैं छहरी
मनोहर झरना।

कठिन गिरि कहाँ विदारित करना
बात कुछ छिपी हुई हैं गहरी
मधुर हैं स्रोत मधुर हैं लहरी

कल्पनातीत काल की घटना
हृदय को लगी अचानक रटना
देखकर झरना।

प्रथम वर्षा से इसका भरना
स्मरण हो रहा शैल का कटना
कल्पनातीत काल की घटना

कर गई प्लावित तन मन सारा
एक दिन तब अपांग की धारा
हृदय से झरना-

बह चला, जैसे दृगजल ढरना।
प्रणय वन्या ने किया पसारा
कर गई प्लावित तन मन सारा

प्रेम की पवित्र परछाई में
लालसा हरित विटप झाँई में
बह चला झरना।

तापमय जीवन शीतल करना
सत्य यह तेरी सुघराई में
प्रेम की पवित्र परछाई में॥




 

 

किरन






 




किरण! तुम क्यों बिखरी हो आज,
रँगी हो तुम किसके अनुराग,
स्वर्ण सरजित किंजल्क समान,
उड़ाती हो परमाणु पराग।

धरा पर झुकी प्रार्थना सदृश,
मधुर मुरली-सी फिर भी मौन,
किसी अज्ञात विश्व की विकल-
वेदना-दूती सी तूम कौन?

अरुण शिशु के मुख पर सविलास,
सुनहली लट घुँघराली कान्त,
नाचती हो जैसे तुम कौन?
उषा के चंचल मे अश्रान्त।

भला उस भोले मुख को छोड़,
और चूमोगी किसका भाल,
मनोहर यह कैसा हैं नृत्य,
कौन देता सम पर ताल?

कोकनद मधु धारा-सी तरल,
विश्व में बहती हो किस ओर?
प्रकृति को देती परमानन्द,
उठाकर सुन्दर सरस हिलोर।

स्वर्ग के सूत्र सदृश तुम कौन,
मिलाती हो उससे भूलोक?
जोड़ती हो कैसा सम्बन्ध,
बना दोगी क्या विरज विशोक!

सुदिनमणि-वलय विभूषित उषा-
सुन्दरी के कर का संकेत-
कर रही हो तुम किसको मधुर,
किसे दिखलाती प्रेम-निकेत?

चपल! ठहरो कुछ लो विश्राम,
चल चुकी हो पथ शून्य अनन्त,
सुमनमन्दिर के खोलो द्वार,
जगे फिर सोया वहाँ वसन्त।

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                                                                                                                                  कविता आज और अभी

        दर्शक










कितना कुछ देखती हैं आँखें
नन्हीं-ऋतु में जामुनी फूल चुनना
गुलाबी ऋतु में सफेद बाल संवारना
बसंत वेला में सूखे पत्तों को सहलाना
पतझड़ में फूलों की आस

 
शोर में मौन को जीना
मौन में शोर से चौंक पड़ना
नौकाओं से बंधी नौका की छटपटाहट
आज़ाद पंछी की उड़ान में छिपी तड़प
कितना कुछ देखती हैं आँखें।

 -गगनमीत कौर 











     ये पेड़







ये पेड़ जड़ से
मटमैली धरती पकड़े
किस मोहपाश में बंधे खड़े
यूँ ही चुपचाप --
गरमी-सरदी और बरसात
नई शाखों, नए पत्तों में सजी
लुभाती-रिझाती इनकी ललक
और बावरी फुनगियों की पुलक
सज-संवर, सिहर-सिहर
छू आती सपनों का आकाश
उमंगों की शाखें फलती-फूलती
आतुर हो-हो बढ़ती जातीं
मदिर-मलय-सा बौराया मन
कर लेता फल-फूलों का श्रृंगार
और फिर तन की हरियाली
कलियों का यौवन
कर देते सब न्योछावर
लुट-लुटकर धरती पर
और झूमते इतराते
ये हंस-हंस
ले अपने हिस्से में बस
कुछ सूखी शाखें --
कुछ चुभते कांटे --


      शैल अग्रवाल










       संवाद










आग बरसाता सूरज
ठूँठ खड़े पेड़
बुलबुल का नगमा, पर गूँज रहा है

 “ सिर फिर गया है इसका “ एक ने कहा,
दूसरा सदा की तरह मुस्कराया  

 “बन्द कर मुस्कराना, इस कुत्ते समय में तू कैसे हरदम
ऐसे कर सकता है। “ –पहला उसे खाने दौड़ा  

 “मुस्कराहट अरदास है नगमे के लिए
जैसे नगमा मुस्कराहट के लिए
ये सहारे हैं एक दूसरे के गाते-मुस्कराते रहने के लिए।“

--दूसरे का वैसे ही मुस्कराते हुए जवाब आया।

               -राजीव सेठ











नन्हा पौधा और मैं










जेठ की भरी दुपहरी
चिलचिलाती धूप
आँगन में एक गमला
गमले में
सेर भर मिट्टी में
लू के थपेड़ों से निढाल
दोहरा हुआ नन्हा कोलियस
मिलते ही
दो अँजुलि पानी
खड़ा हो जाता है
तनकर सीधा
स्वागत में
हिलती हैं
नन्ही नन्ही पत्तियाँ
मृदु मुस्कान बिखेरती सी
बिठा लेती हैं
मुझे अपने पास
जेठ की इस दुपहरी में

      - सीताराम गुप्ता










तो फिर तुम्ही बताओ










उपवन की हरियाली को यदि बाड़ स्वयं ही खा जाएगी
तो फिर तुम्ही बताओ मुझको, ‘नन्ही कलियों का क्या होगा?’

पाने मधु की भेंट सुमन से
भँवरे  दूर-दूर  से  आते।
काँटों का भय त्याग, स्नेह से,
चूम उन्हें निज प्यार जताते।

मधु के बदले उपवन में यदि सुमन हलाहल लगे बाँटने
तो फिर तुम्ही बताओ मुझको-‘ भ्रमरावलियों का क्या होगा? ‘

हार गये तो हारे हो, पर
जीत गये तब भी हारोगे।
अभी समय है सोचो पल भर
हिंसा से तुम क्या पा लोगे ?

मरघट बनते रहे नगर यदि जलती रही घृणा की आँधी
तो फिर तुम्ही बताओ मुझको- ‘आँगन-गलियों का क्या होगा? ‘

जाने कब से खोज रहे तुम
सुख को जग के धन वैभव में
पर शीशलता पायी किसने
इस भीषण जलते रौरव में।

हो न सके यदि शमित तृषा यह और बढ़ गयी प्यास हृदय की
तो फिर तुम्ही बताओ मुझको -‘ इन रंग-रलियों का क्या होगा?‘

              -शशिकांत




 



 
लालच










बड़ी मेहनत से
सींचकर
ताल के पानी से
उठाया था
जड़ों ने
जिस पेड़ को
सूरज की ओर...

झुक गयीं
टहनियाँ
उसी पेड़ की

फिर से
जमीन की ओर...
 पानी के लालच में !

-विंसेंट वान रॉस










खुदगर्जी









अमरबेल से भी
क्या खुदगर्जी का
सबूत माँगना पड़ेगा ?

 
क्या यह काफ़ी नहीं
कि जिस पेड़ पर
उसकी
ज़िन्दगी निर्भर है

वह उसे भी
चूस-चूसकर
जड़ों समेत
सुखा देती है ?


-विंसेंट वान रॉस




 






हरियाली मत हरो






 





हरियाली मत हरो गन्ध की
कविता रुक जाएगी
फूलों के आँचल की ममता
खुशियाँ लुट जाएंगी।
नीम तले की कथा-कहानी
बाबा को कहने दो,
अमराई झूले की कजरी
बहना को गाने दो!

 
फुलबगिया मत हरो प्यार की
नदिया थक जाएगी,
हरियाली मत हरो गन्ध की
कविता रुक जाएगी !

 
भैया से वृक्षों के सपने
किसने छाँट दिये हैं ?
बस्ती में पत्थर के जंगल
किसने उगा दिये हैं ?

 
डाली की बाँहें मत काटो
छाया मिट जाएगी,
हरियाली मत हरो गन्ध की
कविता रुक जाएगी !

 
आँगन के तुलसी-चौरे तक
रेगिस्तान न आए,
भाभी के जूड़े का गजरा
कऊ नहीं मुरझाए !

 
पंचवटी की हँसी न छीनो,
सीता पछताएगी,
हरियाली मत हरो गन्ध की
कविता रुक जाएगी !

   राधेश्याम बन्धु

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                                                                                                                                                                  मंथन


                                                                                                                                                          -वीरेन्द्र यादव

वेदों में वृक्ष संस्कृति ( पर्यावरण) की अवधारणा

भारतीय संस्कृति को अरण्य (वृक्षों) की संस्कृति भी कहा जाता है क्योंकि भारतीय संस्कृति और सभ्यता वनों से ही आरम्भ हुई। भारतीय ऋषि-मुनियों, दार्शनिकों, संतों तथा मनस्वियों ने लोकमंगल के लिए चिंतन-मनन किया। अरण्य (वनों) में ही हमारे विपुल वाङ्मय, वेद-वेदांगों, उपनिषदों आदि की रचना हुई। अरण्य में लिखे जाने के कारण ग्रन्थ विशेष आरण्यक कहलाए। प्रकृति के विविध स्वरूप को समझते हुए वृक्षायुर्वेद की रचना की गई। भारतीय संस्कृति में वृक्षों की जितनी महिमा-गरिमा का उल्लेख किया गया है, सम्भवत: और किसी देश की संस्कृति में देखने को नहीं मिलता है। सदियों से ही ऋषि-मुनियों ने वृक्षों में देवत्व एवं दिव्यत्व का एहसास किया। वृक्षों में विराट विश्व एवं प्रकृति की विराटता का कोमल एहसास है। प्रत्येक पेड़-पौधों वनस्पति व वृक्ष में प्रकृति की एक अनुपम शक्ति और रहस्य छुपा हुआ है। जिसका आख्यान वेदों, उपनिषदों, पुराणों, शास्त्रों, लोक विश्वासों व परम्पराओं में अनेक रूपों में दृष्टिगोचर होता है। इन वृक्षों के शुभ-अशुभ परिणामों को लेकर काफी अध्ययन भी किये गये, कौन से वृक्ष हमारे लिए स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी है ? कौन से वृक्ष केवल सौन्दर्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण है ? कौन से वृक्ष हवन की दृष्टि से पवित्र हैं ? इन सभी सत्यों एवं तथ्यों की जानकारी हमारे वैदिक ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है।

भारतीय संस्कृति में वृक्ष मानव के लिए स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के प्रमुख घटक के रूप में माने जाते हैं। आयुर्वेद में इनकी विशेषता का उल्लेख मिलता है और इन पौधों के गुण-धर्म के आधार पर इनका औषधि रूप में एवं पर्यावरण के लिए उपयोग किया जाता है। वनस्पतियों का यही गुण-धर्म एवं उनका सदुपयोगिता उन्हें देवत्व का स्थान प्रदान करती है। वृक्षों को देवता के समान मानकर उनकी उपासना, अभ्यर्थना की परम्पराएँ हमारी धरोहर रहीं है। वेदों में वृक्षों को पृथ्वी की संतति कहकर इन्हें अत्यधिक महत्व एवं सम्मान प्रदान किया गया है - सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद की एक ऋचा में कहा गया है - भूर्जज्ञ उत्तान पदो .......... (ऋग्वेद् १०/७२/४) अर्थात हमारी पृथ्वी वृक्ष से उत्पन्न हुई है। यह भी माना गया है कि बृह्मा ने जल में बीज बोया और वनस्पति उपजी ये मान्यताएं सृष्टि में वृक्षों के प्रथम आगमन की सूचनाएं ही नहीं देती, बल्कि इन्हें आदिशक्ति से भी जोड़ती हैं। गीता में श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि अहं क्रतुरहं यज्ञ: स्वाधाहमहमौषधम् (९/१६) अर्थात् मैं ही औषधि हूँ तथा वृक्षों में अश्वत्थ (पीपल) हूँ - अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां (१०/२६) वृहदारण्यक उपनिषद (३/९/२८) में वृक्ष का दृष्टांत देकर पुरूष का वर्णन किया गया है क्योंकि पुरूष का स्वरूप वृक्ष के समान है। दोनों में पर्याप्त समानताएं हैं। आयुर्वेदाचार्यों की दृष्टि में देखें तो विश्व में ऐसी कोई वनस्पति नहीं, जो औषधि के गुणों से युक्त न हो। यहाँ पर वृक्षों को देवतुल्य मानकर इन्हें व्यर्थ रूप से काटने पर नैतिक प्रतिबन्ध लगाया गया है। इसलिए श्वेताश्वतरोपनिषद में वृक्षों को साक्षात बृह्म के सदृश्य बताया गया है - वृक्ष इवस्तब्धों दिवि तिष्ठात्येक:। पद्य पुराण में भगवान विष्णु को अश्व रूप, वट को रूद्र रूप और पलाश को ब्रह्म रूप बताया गया है - अश्वत्थ रूपी भगवान विष्णुरेव न संशय:। रूद्ररूपी वटस्तदूत पालाशो ब्रह्मरूप धृक। महाभारत एवं रामायण में वृक्षों के प्रति मनोरम कल्पना की गई है। महाभारत के भीष्म पर्व में वृक्ष को सभी मनोरथों को पूरा करने वाला कहा गया है - सर्वकाम फला: वृक्षा। धार्मिक मान्यता है कि जिस घर में तुलसी की नित्य पूजा होती है, वहाँ पर यमदूत कभी नहीं पधारते हैं - तुलसी यस्य भवनै तत्यहं परिपूज्यते। तद्गृहं नीवर्सन्ति कदाचित यमकिंकरा। वाराह पुराण में उल्लेख किया गया है कि जो पीपल, नीम या बरगद का एक, अनार या नारंगी के दो, आम के पाँच एवं लताओं के दस वृक्ष लगाता है वह कभी भी नारकीय पीड़ा को नहीं भोगता है और न ही नरकऱ्यात्रा करता है।

अश्वत्थमेकं पिचुमन्दमेकं न्यग्रोधमेकं दशपुष्पजाती:।

द्वे द्वे तथा दामिमातुलंगे पंचाम्ररोपी नरकं न याति।

महाभारत में वृक्षों को देवताओं के समान माना गया है और इसका पूजन सामग्री के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। महाभारत के एक पर्व में कहा गया है कि पर्ण और फलों से समन्वित कोई भी सुन्दर वृक्ष इतना सजीव एवं जीवंत हो उठता है कि वह पूजनीय हो जाता है -

एको वृक्षो हि यो ग्रामे भवेत् पर्णफलान्वित:।

                         चैत्यो भवति निर्ज्ञातिरर्चनीय: सुपूजित:।।(आ. १५१/३३) 

समुद्र मंथन से वृक्ष जाति के प्रतिनिधि के रूप में कल्पवृक्ष का उद्भव होना एवं देवताओं द्वारा उसे अपने संरक्षण में लेना वृक्षों की महत्ता को अवगत कराते हैं पृथ्वी सूक्त में लिखा है कि वन तथा वृक्ष वर्षा लाते हैं, मिट्टी को बहाने से बचाते हैं साथ ही बाढ़ तथा सूखे को रोकते हैं तथा दूषित गैसों को स्वयं पी जाते हैं। यही कारण है कि पुरातन काल में वृक्षों का देवता के समान पूजन किया जाता था। हमारे ऋषि-मुनि एवं पुरखे इसलिये कोई भी कार्य करने से पूर्व प्रकृति को पूजना नहीं भूलते थे -

अश्वत्थो वटवृक्ष चन्दन तरुर्मन्दार कल्पौद्रुमौ।

जम्बू-निम्ब-कदम्ब आम्र सरला वृक्षाश्च से क्षीरिण:।।

शास्त्रीय दृष्टि से देखें तो तीर्थ स्थानों में वृक्षों को देवताओं का निवास स्थान माना है। वट, पीपल, आँवला, बेल, कदली, पदम वृक्ष तथा परिजात को देव वृक्ष माना गया है। भारतीय संस्कृति से धार्मिक कृत्यों में वृक्ष पूजा का अत्यधिक महत्व है। पीपल (अश्वत्थ) को शुचिद्रुम, विप्र, यांत्रिक, मंगल्य, सस्थ आदि नामों से जाना जाता है। पीपल को पूज्य मानकर उसे अटल प्रारब्ध जन्य कर्मों से निवृत्ति कारक माना गया है। पीपल को अखण्ड सुहाग से भी सम्बन्धित किया गया है। लोक परम्परा के अनुसार संतान की इच्छुक स्त्रियाँ उसकी पूजा अभ्यर्थना करती हैं। मान्यता है कि पीपल की परिक्रमा करने से जन्म-जन्मांतरों के पाप-ताप मिट जाते हैं। चित्त निर्मल होता है। अश्वत्थ की महिमा वेदों-पुराणों में जगह-जगह देखने को मिलती है। तुलसी को वायु शोधन एवं पवित्रता के लिए हर आँगन में लगाने की प्रथा है क्योंकि तुलसी को सर्वाधिक आक्सीजन प्रदायक पौधा माना जाता है। इसका पर्यावरण से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसके पास हानिकारक जीवाणु-विषाणु या कीड़े-मकोड़े नहीं पनपते। यह घातक कृमि और कीटों को नष्ट करती है। भोजन में तुलसी का भोग पवित्र माना गया है, जो कई रोगों की रामवाण औषधि है। भारतीय संस्कृति में बिल्व वृक्ष को भगवान शंकर से जोड़ा गया है। इसकी पत्तियों को शिवलिंग पर चढ़ाने का विधान है। परन्तु वावन पुराण में बिल्व पत्र को लक्ष्मी से उद्भव मानते हैं। इसमें लक्ष्मी का वास भी माना जाता है। इसे अथर्ववेद में महान 'वै भद्रो बिल्वो महान भद्र उदुम्बर:।` अर्थात् औषधीय गुणों से युक्त होने के कारण इसकी तुलना उपकारी पुरूष से की गई है। वामन पुराण में कदम्ब का जन्म कामदेव के माध्यम से किया गया है। कदम को भगवान विष्णु, लक्ष्मी एवं यशोदा नंदन कृष्ण से भी जोड़ा गया है - ढाक, पलाश, दूर्वा एवं कुश जैसी वनस्पतियों को नवग्रह पूजा आदि धार्मिक कृत्यों में प्रयुक्त किया जाता है। इसके साथ ही अशोक, चम्पा अरिष्ट, पुन्ताग, प्रियंगू, शिरीश, उदूम्बर तथा पारिजात को शुभ माना गया है। इनमें देवताओं का निवास स्थान अथवा देवत्व शक्ति मानी गयी है। इन वृक्षों के सानिध्य से मनुष्य में तेज, ओज तथा वार्यवान होने की सम्भावना सुनिश्चित है। वाराह-मिहिर, कश्यप संहिता तथा विश्वकर्मा-प्रकाश आदि बहुमूल्य ग्रन्थों में लिखा है बाग लगाना हो तो सर्वप्रथम इन प्रमुख वृक्षों को लगाना चाहिए -

अशोक चम्पकारिष्ट पुन्नागाश्च प्रियंगव।

शिरीषो दुम्बरा: श्रेष्ठा: पारिजातक मेव च।।

एवे वृक्षा: शुभा ज्ञेया: प्रथमं तांश्च रोपयेत्।।

इसी तरह से भगवान विष्णु को बाल रूप में वट पत्रशायी कहा गया है। स्त्रियाँ वट सावित्री की पूजा ज्येष्ठ अमावस्या को करती है। वे अपने पति के दीर्घायुष्य एवं मंगल कामना के लिए व्रत रखकर वट वृक्ष की परिक्रमा करती हैं। नीम की पूजा का भी प्रचलन है। नीम के पेड़ का प्रेत बाधा के लिए उपयोग किया जाता है। कुछ आदिवासी एवं अन्य जातियाँ इसमें देवी का वास तथा नाग पूजा के रूप में पूजती हैं।

भारतीय परम्पराओं के अलावा बौद्ध और जैन साहित्य में वनऱ्यात्राओं एवं वृक्ष महोत्सवों का सुन्दर वर्णन मिलता है। बौद्ध एवं जैन परम्पराओं में वृक्षों को सम्मान एवं अदब की दृष्टि से देखा गया है। भगवान बुद्ध को पीपल के नीचे बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। तभी से उसे बोधिवृक्ष कहा जाता है। बोधिवृक्ष की पूजा के दृश्य का बोधगया, साँची, मथुरा, अमरावती आदि स्थानों से प्राप्त शुंगकला में सुन्दर अंकन हुआ है। साँची के तोरण में वृक्षों का अलंकरण अत्यन्त मनोहारी है। इसमें शाल, अशोक, चंपा एवं पलाश वृक्षों का सजीव एवं अनुपम वर्णन मिलता है। वन-उपवन शोभा और समृद्धि के आगम थे। ये वैरागियों के लिये मुक्ति पाने के साधन, वानप्रस्थ जीवन के आधार पर सन्यासी, तपस्वी, योगी और भिक्षुओं के लिए शरण स्थल थे। बोधिचर्यावनार (८/४०-४३) में वनों और वृक्षों के सम्बन्ध में कहा गया है कि वृक्ष सदैव देते रहने की प्रवृत्ति रखते हैं। भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं को गृहों में वास करने की अपेक्षा वृक्षों के नीचे वास करने का आदेश दिया था। प्राचीन काल में वन-उपवन में एकत्र होकर वृक्ष महोत्सव और बसंतोत्सव मनाने की परम्परायें थी। ''ग्रीक परम्परा में एडोडिनाअरिस, ओरिसस, डिमीटर जन्य या वनस्पति के देवता माने गए हैं। डायनिसस मदिरा और अंगूरलता का देवता था। एकेसियन आर्टेमिस देवता का आवास ओक वृक्ष के कोटर में माना जाता था।`` भारत के इन्द्र महोत्सव जो हरियाली एवं धरती के शस्य श्यामला तथा विश्वव्यापी प्रजनन और पृथ्वी की कोख में से पनपने वाली वनस्पतियों की दृष्टि से मनाया जाता है यही इन्द्र महोत्सव की तुलना यूरोप के स्मे-पोल उत्सव से की जाती है जो कनाडा और अमरीका में अत्यन्त लोकप्रिय है। पूर्वी अफ्रीका के बानिका नामक कबीले में पेड़ काटना मातृहंता जैसा जघन्य पाप माना जाता है। वहीं केन्द्रीय आस्ट्रेलिया के डीटी कबीले के लोग पेड़ों को अपने पूर्वजों का रूपान्तरण मानते हैं। फिलीपीन द्वीपवासी भी उन पर अपने पूर्वजों की आत्मा का वास मानते हुए उन्हें पुरोहित की आज्ञा से ही काटते हैं। विश्व के कई देशों में कबीले में रहने वाले लोग फल देने वाले वृक्षों की देखभाल एक परिवार के सदस्य के रूप में करते हैं, यहाँ तक कि उन वृक्षों के आसपास आग जलाना, शोर मचाना वर्जित माना जाता है जिससे कि वे भयभीत न हों।

वास्तविकता यह है कि पेड़-पौधों की पूजा, अर्चना, वंदना एवं प्रार्थना के पीछे कर्मकाण्ड नहीं अपितु इनके पीछे कई मानवोपयोगी वैज्ञानिक तथ्य छिपे हुए हैं। जो किसी न किसी रूप में स्वास्थ्य एवं आयुर्वेद की दृष्टि में उपयोगी तथा पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से धार्मिक आस्था के रूप में योगदान देते हैं। जहाँ पीपल का वृक्ष सर्वाधिक आक्सीजन देता है वहीं आयुर्वेद अर्थात् चिकित्सकीय दृष्टि से इस वृक्ष की छाल से उत्तम टेनिन की प्राप्ति होती है जो जीवाणु रोधक होती है। इसके फल गुणकारी होते हैं, इससे चर्मरोग एवं फेफड़ों के रोग दूर होते हैं। आयुर्वेद के मतानुसार तुलसी, चरपरी, कटु, अग्नि दीपक हृदय के लिए हितकारी, गर्मी दाह तथा पित्त नाशक और कुष्ठ, मूत्रकृच्छ, रक्ताविकार, पसली की पीड़ा कफ तथा वात नाशक है। तुलसी का प्रयोग विभिन्न प्रकार के रोग ज्वर, मन्दाग्नि, उदर शूल, कप-खाँसी आदि को दूर करने में सहायक होती है। वट वृक्ष को हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। जैन तीर्थंकर ऋषभ देव को वट वृक्ष के नीचे केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। अत: जैन धर्म में इसे केवली वृक्ष कहा जाता है। वट वृक्ष भीषण गर्मी में राहत प्रदान करता है तथा इसकी टहनियों के द्वारा पृथ्वी की श्वसन क्रिया उचित ढंग से संचालित होती है। इसकी रस्सी जैसी टहनियाँ चर्मरोग, आँख रोग, मधुमेह के लिये उपयोगी होती हैं। वेदों एवं उपनिषदों में वन से उपवन तक की यात्रा एक अत्यन्त ही रोचक विषय है। जो स्वास्थ्य-सम्बर्द्धन में औषधीय प्रयोग करने की महत्वपूर्ण विधियों के रूप में प्रयोग की जाती है। ''कंदमूल फलों के अलावा औषधि उपयोग में आने वाले गुलाब, मालवी, तुलसी, चमेली, चंपा, जूही, माधवी, बकुल, कदम्ब, केतकी, अशोक, बंधूक, हारसिंगार, कमल, पलाश, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, जटामांसी, नागकेशर, लवंग, प्रियंगु, दाडिम, तिल, गेंदा, इंगदी,, अलसी, करौंदा, कायफल, गुंजा, गधविरोजा, गुड़हल, शालपर्णी, तेमरू, पद्याख, पाषाण भेदी, दाऊहलदी, वट आदि किसी न किसी रूप में दवा के काम आते हैं आयुर्वेद की चिकित्सा इन्हीं पर आधारित है।``

आयुर्वेद की चिकित्सा के साथ-साथ वृक्ष प्रदूषण रोकने में भी सहायक होते हैं। प्रदूषण रोकने के लिए अश्वत्थ (पीपल), नीम, अशोक, तुलसी आदि वृक्षों को लगाया जाता है इसमें धूम, धूल आदि सोखने की असीमित शक्ति होती है। पीपल ४.१५:, अशोक ४.५६:, आम्रलता २.२४:, आम्रवृक्ष ४.०५:, गुल्म (बेर, छोटी इलायची),

१.४४:, इमली २.०८:, कदम्ब ४.५६:, वट ३.५९:, धुआँ तथा धूल सोखने की शक्ति रखते हैं। अभी हुए एक शोध सर्वे अध्ययन के अनुसार ''प्रत्येक दिन वायु में ५.१ टन सल्फर डाई आक्साइड २०६.३ टन हाइड्रो कार्बन, ०.०३ टन नाइट्रोजन तथा १.०७ टन एसिड मिश्रित होता है। वास्तव में देखा जाए तो गैसों को अवशोषित करने के लिए उपर्युक्त पेड़-पौधों का आरोपण करें तो काफी हद तक प्रदूषण की रोकथाम एवं इसको नियंत्रित किया जा सकता है। वेदों में श्रेष्ठ ऋग्वेद् में इस तथ्य को भलीभाँति समझाया गया है। ऋषि प्रदूषण रहित वायु को औषधि के समान दीर्घ जीवनदायक तथा अमृत स्वरूप मानते हैं। तथा उसका अपने सम्बन्धियों के समान उल्लेख भी करते हैं। विष्णु धर्मसूत्र, स्कंद पुराण एवं याज्ञवल्क्य स्मृति में वृक्ष के काटने को अपराध माना गया है और इसके लिए दंड का विधान बनाया गया। इसके पीछे चाहे जो कारण एवं कर्मकाण्ड रहे हों परन्तु इतना तो सुनिश्चित है कि वेदों एवं पुराणों के सृजनकर्ता प्राच्य ऋषि इस तथ्य को बारीकी से समझते थे। अत: उन्होंने मनुष्य की परा प्रकृति एवं अपरा प्रकृति के सूक्ष्म एवं स्थूल सम्बन्धों पर व्यापक चिंतन करके प्रकृति के विकास क्रम को पूर्ण करके इसके स्तरों पर आरोहरण करने का निर्देश दिया है। प्राच्य ऋषियों का उद्देश्य बाह्य प्रकृति से अंत: प्रकृति में प्रवेश कर तथा उसे पार कर आनंद पाना था। इसी वजह से भारतीय अरण्य संस्कृति इतनी समृद्धि और सम्पन्न रही है।

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि वृक्षों को सम्मान एवं पूजन अर्चन तथा वंदन तथा संरक्षण के पीछे पर्यावरण को सुरक्षित रखना था। वर्तमान में प्रकृति और पर्यावरण को बचाने, इसे फिर से संरक्षित, सुरक्षित और समृद्ध करने के लिए हमें इसके प्रति फिर से भावात्मक सम्बन्ध स्थापित करने होंगे। इसके साथ ही भारतीय वैदिक कालीन संस्कृति की प्राचीन मान्यताओं को सामयिक परिप्रेक्ष्य में कसौटी से कसकर फिर से हमें 'माता भूमि: पुत्रो हं पृथिव्या:` का उद्घोष करना होगा। संस्कृति संवेदना से पनपती है और हमारे अंदर वृक्षों के प्रति जब तक गहरी संवेदना संप्रेषित नहीं होती तब तक पर्यावरण का शोषण एवं दोहन होता रहेगा। इसके लिए आवश्यकता है एक सर्वोपरि अखण्डित अनुशासन की। जिस तरह सूर्य, चन्द्रमा, आकाश अपनी-अपनी सीमाओं में आबद्ध होकर नियमबद्ध तरीके से परिचालित हैं। इसी को मूलमंत्र मानकर पर्यावरण के अपार क्षरण को रोका जा सकता है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना का प्रतिपालन करते हुए एवं भारतीय संस्कृति के विराट मूलमंत्र -

सर्वे भवन्ति सुखिन: सर्वे सन्तु निरामय:।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दु:ख भागभवेत्।।


 की आज पर्यावरण संरक्षण में सार्थकता है, जिसकी प्रासंगिकता आज के ग्लोबल वार्मिंग के युग में और महत्वपूर्ण हो गई है।


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                                                                                                                                                              परिचर्चा


                                                                                                                                            - डॉ. विमला उपाध्याय

साहित्य में पर्यावरण की महत्ता

डॉ. बो.ड्रूस ने चेतावनी दी है 1990 से 2020 के बीच हर रोज 50 जीव और पादप प्रजातियां समाप्त हो जाएंगी। अगर वनों के कटान और औध्योगिक गैसों से उत्पन्न तापक्रम वृद्धि पर नियंत्रण न हो पाया तो भयंकर परिणाम होंगे।
चेतावनी जो आज सुनाई पड़ती है वह हमारे ऋषि-मुनियों ने बहुत पहले दी थी। उनकी चिंता निसंदेह दूसरे तरह की थीं। वे पृथ्वी को मां मानते हुए उनकी सुरक्षा, उनको संवारने, वर्षा और वन, जीव-जन्तुओं आदि के प्रति वे सदैव प्रस्तुत थे। इसका कारण था इन सबके प्रति इनका आत्मीय रिश्ता। यह संबन्ध प्राचीन ग्रंथों में मंत्र बनकर संचित है।

वृक्षान् छित्वा पशून हत्वा

         कृत्वा रुधिर-कर्दनम्

 स्वर्ग: चैत गम्यते मर्त्यै:

         नरक केन गम्यते?

 (पेड़ों को काटकर, जीवों को मारकर उनके रक्त को कीचड़ बनाकर ही यदि स्वर्ग जाया जाता हो, तो फिर नरक को जाने का मार्ग कौन सा है !)

वाल्मीकि वनों को पुत्रवत् मानकर उनकी ऱक्षा को सदैव तत्पर रहते हैं और चेतावनी देते हैं कि जो भी मेरे वन के पत्र अंकुर का विनाश और फल-फूल का अभाव करेंगे, वे निश्चित रूप से शाप के भागी होंगे। ऋग्वेद के पृथ्वी सूक्त में है --' माता भूमि पुत्रोsहम पृथ्व्या ' ' भूमि मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूं।'

नदियां हैं माताएं, पर्वत पिता। पर्वत के आश्रय से नदियां निकलती हैं। नदी सदा नीरा है। कामदुधा पिलाती है, पालती है, पोषती है। नदी को मातृत्व यों ही नहीं मिला है, यह गंगा बनकर सगर के साठ हजार पुत्रों को तारती है-

' सगर सुवन सठ सहस

          परस जल मात्र उधारिणी ' 

एक है भौगोलिक गंगा, जो हिमालय से निकलकर अपने आसपास की भूमि व नगरों का सिंचन करती हुई बंगाल की खाड़ी में गिर जाती है। एक है सांस्कृतिक गंगा, मानस गंगा, जो श्री विष्णु के श्री नख से द्रवित होकर ब्रह्मा के कमंडल की शोभा बनती है, देवताओं का सर्वस्व, शिव के सिर माला और भगीरथ राजा के पुण्य का फल है।

श्री हरिपद नख चंद्र-

     कांतमनि द्रवित सुधारस,

ब्रह्म कमंडल मंडन

      भवखंडन सुर सबरस

शिव सिर मालती माल

       भगीरथ नृपति पुण्य फल

               -सत्य हरिश्चन्द्रः गंगा वर्णन 

यह मानवजाति का सांस्कृतिक सिंचन करती हुई शेषशायी विष्णु में समा जाती है। इसलिए गंगा की पवित्रता, मर्यादा की रक्षा के लिए मैथिल कोकिल विध्यापति गंगा में प्रवेश के पूर्व उनसे प्रार्थना करते हैं। 

एक अपराध छमव मोर जानी

       परसल माय पाय तुम पानी।

पर्यावरण कई तत्वों का संधान है। प्रकृति (पहाड़, नदी, वन, सागर, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, आकाश, ग्रह , नक्षत्र)  के साथ है मनुष्य का व्यवहार जगत। कल-कारखाने, उध्योग, प्रतिष्ठान, खनन, कृषि, आवास, नगरीकरण आदि में पर्यावरण की मर्यादा का ध्यान न रखकर मनमानी करना। कल-कारखानों की खतरनाक गैस को हवा में छोड़ना, कूड़ा-कचरा, मलवा बगल में फेंकना या नदी में बहा देना। कुकुरमुत्तों की तरह उगे घरों का बेतरतीब होना। आबादी के रोजगार के लिए वनों की कटाई, मांस भक्षण के लिए जीव-जन्तुओं की हत्या। संचार की जरूरत के मुताविक वाहनों की अधिकता। पेट्रोल, डीजल गैस के कारण वातावरण का दूषित होना। दिल्ली को निकलिए तो आँखें लाल होंगी और जलने लगेंगी, सांस लेने में तकलीफ होगी। इन सबका समाधान है रिट्रीट-प्रकति की ओर लौट चलना। चिड़िया की तरह प्रकृति के साथ तादाम्य , उसके प्रति उत्सुकता, उससे अभिभूत रहना। 

प्रथम रश्मि का आना

               रागिनी कैसे तूने पहचाना।

कहां कहां हे बाल विहगिनी

                पाया तूने यह गाना।।

वृक्ष के पक्षी अचानक कलरव करने लगते हैं। कौन उन्हे बता देता है कि सूर्योदय होने वाला हैः

कूक उठी सहसा तरुवासिनी

                  गा तू स्वागत का गाना,

किसने तुझकोअंतर्यामिनी,

                   बतलाया उसका आना।

           -प्रथम रश्मिः सुमित्रा नन्दन पंत

प्रकृति से हमारा ऐसा रागात्मक संबन्ध होगा, तभी पर्यावरण असंतुलन घटेगा। हमारे आचार्य पंच नदियों में स्नान भले ही न कर पाते हों, पर स्नान के समय पांचों नदियों का श्रद्धास्मरण अवश्य करते रहे हैं।

पर्यावरण शब्द बना है। परि (चारों ओर से, आस-पास, अच्छी या पूरी तरह) आवरण (ढका हुआ अथवा घेरा) सो यह वातावरण के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है यानी हमारी चारों ओर का घेरा, जिससे हम घिरे हुए  हैं। धरती के जिस भाग में हम रहते हैं, उसे जीव मंडल कहते हैं। इस जीव मंडल की माप लगभग स्थिर है। यह क्षेत्र धरती के लगभग 16 किलोमीटर की उंचाई तक फैला हुआ है। संपूर्ण पृथ्वी को घेरने वाले इस आवरण का क्षेत्रफल लगभग 45 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। इस जीव मंडल में धरती, वायु और जल की समृद्ध संपदा है और ये तीनों ही जीवन के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं। इनके बिना कोई जीवधारी जीवित नहीं रह सकता। इसलिए मिट्टी पानी और हवा यही सब रोगों की दवा। इनको अपने अनुकूल बनाना पर्यावरण को अनुकूल बनाना है, जिसका आधार है प्रकृति।

जल है तो जीवन है। जल बरसता है मेघ से। मेघदूतम् (कालीदास) में इसकी संरचना है। धूमज्योतिसलिलमरुता, सन्निपातः क्व मेघः, धूप और जल का संघात है मेघ। कालीदास मेघ को कामनाओं का रूपदाता, प्रकृति पुरुष और निष्पाप कहते हैं।
जानामि त्वां प्रकृति पुरुषं कामरूपं मघोनः।

मेघ के जल के कारण ही प्रकृति नाना रूपों में हमें लुभाती है, रमाती है। जल से उपजता है अन्न, जिसे खाकर बनता है , रक्त, वीर्य, जो अजस्र कामनाएं जगाता है। मेघ कहीं ठहरता नहीं है, जो कुछ जल है बरसाता है। किसी से राग-द्वेष नहीं, परहित कारण शरीर ही धारण करता है। अतः है निष्पाप। महादेवी वर्मा ने अपनी तुलना बदली से की हैः

विस्तृत नभ का कोई कोना,

          मेरा न कभी अपना होना।

परिचय मेरा इतिहास यही,

          उमड़ी कल थी, मिट आज चली

मैं नीर भरी दुःख की बदली।

मेघ समय पर आए, खुलकर बरसे, इसके लिए पेड़-पौधे लगाना, नदी तालाब, सागर एवं अन्य जलाशयों को संरक्षित रखना, पर्वतों को कांटना- छांटना नहीं, यही अनिवार्यता है। इसीलिए साकेत के नवे सर्ग में मैथलीशरण गुप्त मेघगीत गाते हैं और उसकी मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं:

जड़ चेतन में बिजली भर दो

         ओ उद्बोधन बरसो।

चिन्मय बने हमारा मृगमय

         पुलकांकुर  बन बरसो।

मंत्र पढ़ो छींटे जागो

           सोए जीवन बरसो।

घट पूरो त्रिभुवन मानस रस

    कण-कण, क्षण-क्षण बरसो।

आज भीगते ही घर पहुंचे

     जन-जन के जन बरसो।

दरसो परसो घन बरसो।

कवि छतनार बरगद के पेड़ और तुलसी के बिरवे को नई पीढ़ी व चेतना के प्रतीक गुलाब के समकक्ष रखकर नव मूल्यबोध को स्थापित करने की बेचैनी प्रकट करता है।

छोटे से आंगन में, मां ने लगाए हैं,

                 तुलसी के बिरवे दो

पिता ने उगाया है

                बरगद छतनार,

मैं अपना नन्हा गुलाब कहां रोप दूं।

मुठ्ठी में प्रश्न लिए दौड़ रहा हूं

वन-वन, पर्वत-पर्वत

                रेती-रेती बेकार।

 - केदार नाथ सिंहः एक पारिवारिक प्रश्न

प्रकृति के नाना रंगों, रूपों,छवियों और प्रभावों अंतर्यात्रा करने से एक ही सूत्र हाथ लगता है प्रकृति के साथ तादात्म्य। प्रकृति के समान होना, उसी का स्वभाव, त्याग, लोक संग्रह ऱखना।

कितनी कष्ट सहिष्णुता, कितना धैर्य ' खोद खाद धरती सहै, काट कूट बनराय'। इसके लिए चाहिए ऊपर बढ़ना, बढ़ते जाना पर अपनी जड़ को धरती के भीतर जमाए रखना, पांव जमीन पर हों तभी सिर आसमान में रहता है। 

प्रकृति से रागात्मक संबन्ध, उनके संरक्षण हित की प्राणपन से चेष्टा, तभी उसकी शाखा -प्रशाखाएं आकाश को ललकारेंगी। आकाश यहां ग्रह, नक्षत्र, अंतरिक्ष का ध्योतक है, जिसकी छतरी में हम विश्राम करते हैं। यही है पर्यावरण, जिसकी चिंता-महत्ता का बोध हमारे आचार्यों, शास्त्रों और साहित्य में है।

' नवयुग शंख ध्वनि,


हमें जगा रहीतू जाग-जाग मेरे विशाल '

                        - दिनकर

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                                                                                                                                                       कहानी विशेष


                                                                                                                                                 - महेश चंद्र द्विवेदी

                 आपद्कर्म    

यदि आप बिहार की सबसे नटखट एवं चपल नदी कोसी के किनारे के निवासी हैं तो इस दंतकथा से अवश्य परिचित होंगे:
         'हिमालय कीं सबसे सुंदर पुत्री कोसी थी। रानू सरदार नामक राक्षस का उस पर दिल आ गया था और वह रोज़ रोज़ उसके पीछे पड़कर उसे स्वयं से विवाह करने हेतु सताया करता था। अन्य उपाय न देखकर एक दिन कोसी ने उससे विवाह की हामी भर दी, परंतु अपनी एक शर्त रख दी कि विवाहपूर्व एक रात में उसे कोसी पर बांध बनाकर उसे नियंत्रित करना पड़ेगा, और यदि वह इसमें असफल रहता है तो उसे प्राण गंवाने होंगे। प्रसन्नता से उतावला राक्षस रात्रि प्रारम्भ होते ही फावड़ा लेकर बांध बनाने में जुट गया और इतनी शीघ्रता से बांध बनाने लगा कि कोसी के पति हिमालय को आशंका हुई  कि वह राक्षस प्रात: होने से पूर्व बांध पूरा कर लेगा। अत: वह प्रात: होने से पूर्व ही कुक्कुट /मुर्गा/ का रूप धारण कर वहां बांग देने लगे। कुक्कुट की बांग सुनकर रानू समझा कि प्रात: हो रही है और वह अपने प्राण बचाने हेतु उसी समय दूर भाग गया। जब तक उसे कुक्कुट के सत्य का पता चला, वह क्षीणबल हो चुका था, परंतु तब से र्वर्षानुवर्ष वह कोसी को बांधने का प्रयास करता रहा है और कोसी वर्षा ऋतु के आगमन पर उसके प्रयास को विफल करती रही है।`
          'कोसी का प्रतिशोध` नाम से कुख्यात वर्षा ऋतु में आने वाली कोसी नदी की बाढ़ की विभीषिका जग जाहिर है। बाढ़ के दौरान नियंत्रणविहीन होकर मदमाती कोसी  वर्ष १७७० से अभी तक २१ बार अपनी मुख्य धारा को मीलों दूर तक बदल चुकी है और वर्ष २००८ में तो इसने मीलों लम्बे तटबंध को तोड़कर चोट खाई नागिन सम फुंफकारते हुए सहस्रों ग्रामों में तबाही मचाई है।
           मानव मन में प्रेम, सहानुभूति, दृढ़ता, एवं त्याग के साथ-साथ ईर्ष्या, तुच्छता, धृणा, एवं स्वार्थ के भाव अंतर्निहित रहते हैं। काल एवं परिस्थिति के अनुसार कभी स्वार्थ, तो कभी परार्थ के भाव एक दूसरे पर वर्चस्व स्थापति कर लेते हैं। अशिक्षा, अल्पज्ञान, अभाव एवं भविष्य की अनिश्चितता, जो भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक रूप से विद्यमान हैं, उपर्लिखित गुणों/अवगुणों को वहां रहने वाले व्यक्तियों में जल्दी-जल्दी उभारते रहते हैं और उनके आरचण में प्राय: 'क्षणेरुष्टवा-क्षणेतुष्टवा` का भाव परलिक्षित होता रहता है। यह कहानी वर्ष २००८ में कोसी नदी में आई बाढ़ की विभीषिका के दौरान जल्दी-जल्दी बदलती परिस्थितियों में बाढ़पीड़ित ग्रामवासियों की एक ओर सहयोग, सहानुभूति एवं त्यागमय तथा दूसरी ओर क्षुद्र, क्षणिक एवं स्वकेंद्रित प्रतिक्रियाओं पर आधारति है। राष्ट्रीय आपदा के दौरान कतिपय व्यक्तियों एवं संस्थाओ द्वारा कर्तव्यवहन, भ्रष्ट प्रशासकों की करतूतों, एवं नेताओं की राजनैतिक एवं स्वार्थपूर्ण चालबाज़ियों का समावेश प्रसंगवश है।

                                                        ृृृ
          रमेसर यादव ने अपने मकान की छत इसी साल गर्मियों में पक्की कराई थी। रमेसर का गांव मरछेहटा उस स्थान पर बसा हुआ था जहां लगभग सौ  वर्ष पूर्व कोसी की मुख्यधारा बहा करती थी। गरीबी के कारण एवं किसी भी वर्ष कोसी द्वारा अपनी मुख्यधारा परिवर्तित कर देने की आशंका के कारण सभी ग्रामवासियों ने अपने मकान कच्चे ही बनाये थे। बस रमेसर ने पहली बार पार साल गर्मियों मे पक्की ईंट की दीवालों का मकान बनवाया था, परंतु पैसा कम पड़ जाने पर छत को फूस से छा दिया था। गांव वालों का कहना था कि रमेसर पर कोसी मैया मेहरबान हैं जिससे उनकी किरपा से आने वाले जाड़ों में उसकी परवल, लौकी, कोहड़ा और गेंहूं की फसल फिर अच्छी हो गई थी और उसने गर्मियों में छत पर भी लिंटर डलवा दिया था। रमेसर अपने पूरी तरह से पक्के मकान को कुछ प्यार और कुछ गर्व भरी निगाहों से देखा करता था- और क्यों न देखे वह उसे प्यार से क्योंकि वह जानता था कि यह मकान उसे गर्मी में फूस की झिरी से आती धूप, बरसात में फूस से पटकते पानी की टिपटिपाहट, और जाड़ों में बदन को ठंडी दरांती की भांति काटने वाली हवा की सरसराहट से मुक्ति दिलायेगा; और क्यों न गर्व करे वह अपने पक्के मकान पर क्योंकि  पूरे गांव में  केवल उसका मकान ही लाल-लाल ईंटों का पक्का दमकता था?
           मछरेहटा के ग्रामवासियों का जीवन बहुत कुछ कोसी के कोप अथवा कोसी की कृपा पर निर्भर था- कोसी मैया चाहें तो बिना मांगने को मजबूर किये साल भर मजे  में खाने पीने को दे दें और बेटी-बेटा के ब्याह और बरसात में गिरती दीवालों की मरम्मत का खर्चा भी निकाल दें और कोसी मैया निगाह टेढ़ी कर लें तो एक वख्त़ पेट भरने के भी लाले पड़ जायें। ग्राम के प्रत्येक व्यक्ति का जीवन एक दूसरे पर निर्भर था एवं कोसी के ईद गिर्द के दायरे में सीमित था। एक दूसरे पर निर्भरता जहां पारस्परकि सहानुभूति को जन्म देती है, वहीं दिनचर्या का सीमित दायरे में घिरा रहना एवं अभावग्रस्तता ईर्ष्या, अंधविश्वास एवं क्षुद्र मानसिकता की जनक होती है। रमेसर के पक्के घर को देखकर अनेक ग्रामवासियों की छाती पर सांप लोट जाता था- कई लोगों ने गयादीन को यह कहते सुना था,
          ''जब कोसी मैया का रानू राक्षस तक नाहीं बांध पावा रहै, तब ऊ अपनी छाती पर पक्की इंर्ट का भार कहां सहेगी? तू देखल, ऊ जल्दी ही आपन कोप दिखइहैं, जिसके पलेटे में पता नहीं कौन कौन आय जइहैं।``
           और तब घसीटे, इब्राहीम आदि ने पूरी सहमति जताते हुए गयादीन से हां में हां मिलाई थी। गयादीन द्वारा रमेसर के प्रति गांववालों में वितृष्णा पैदा करने के इस प्रयत्न का वैयक्तिक कारण था- दोनों के खेत अगल-बगल थे और गयादीन का आरोप था कि रमेसर हर बार खेत जोतते समय हल का एक कूंड़ उसके खेत में मार देता था और इस प्रकार उसकी दो-चार इंच ज़मीन को अपने खेत में मिला लेता था। इस बात को लेकर दोनों में गाली-गलौज, मार-पीट और पंचायत भी हो चुकी थी, पर रमेसर द्वारा हर साल गयादीन के खेत में एक आध हल चला देना और गयादीन द्वारा गाली गलौज करना दोनों की मानसिक मजबूरी बन चुकी थी। घसीटे का गयादीन की बात में हां में हां मिलाना उसकी आर्थिक मजबूरी थी क्योंकि वह गयादीन के खेत जोतता था। इब्राहीम पहले तो रमेसर की पार्टी में रहता था परंतु जब से उसकी बेटी नूरजहां का आंचल रमेसर के बेटे सुक्खी ने खींच दिया था और उसके पकड़े जाने पर रमेसर ने अपने बेटे को ताड़ना देने के बजाय उसका पक्ष लेते हुए नूरजहां पर ही आरोप मढ़ दिया था, तब से इब्राहीम भी रमेसर से खुन्नस खाये हुए था। कुछ अन्य गांववाले भी रमेसर के पक्के मकान पर तिर्यक टिप्पणियां  किया करते थे। उनमें से अधिकतर के पास रमेसर से मनमुटाव का कोई वैयक्तिक कारण नहीं था, परंतु किसी की तरक्की देखकर जलना और उसकी टांग खींचने का प्रयत्न करना उनकी स्वाभाविक मजबूरी थी।
                                                     ृृृ
                                                    

         ''हमका लागल कि गयादिनवा सही ही कहत रहै कि कोसी मैया की छाती पर मूंग दलिहौ, तौ देवी आपन परकोप जरूर दिखहियें। खबर मिली है कि नेपाल मा कुसहा के पास कोसी के किनारे पर बना बांध टूट गइल है ओर कुसहा, स्रीपरु, रहीपरु, लौकाही आदि कई गांव पानी में पूरे के पूरे बहि गे हैं। बांध केर कटान बढ़ रहिल है, और लोगबाग कहत हैं कि हमरे गांव मा पानी आवै मा अधिक दिन नाहीं लगिहैं।``
          वह भादों मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी का दिन था और आकाश में दिन भर घटाटोप बादल छाये रहे थे। सांझ का धुंधलका होने लगा था जब त्रिपुरारी पंडित सुपौल से लौटे थे और गांव वालों को तटबंध टूटने के विषय में बता रहे थे। आपदा की आशंका से भयभीत गांव वाले मूक होकर पंडित जी की बात सुन रहे थे। बस उनके नेत्रों में परलिक्षित भय उनके हृदय का रहस्य खोल रहा था। उनमें से कई कोसी की बाढ़ की भयावहता अपने जीवन में देख चुके थे और अन्य उसके विषय में बड़े-बूढ़ों के मुख से सुन चुके थे। कोसी की बाढ़ की यह आपदा भूतकाल में उनका धन, जीवन, ज़मीन और फ़सल सब नष्ट-भ्रष्ट करती रही है और आजतक उस पर कोई नियंत्रण नहीं लगा पाया है। अत: गांववालों द्वारा इसे रमेसर की कोसी की छाती पर पक्का मकान बनाने की धृष्टता के कारण कोसी मैया का प्रतिशोध मान लेना स्वाभाविक ही था। सभी मन ही मन रमेसर को कोस रहे थे।
                किसी रतह राम राम कहते कहते गांव वालों की वह रात कटी। अगले दिन पता चला कि बांध मीलों की लम्बाई में कटता चला जा रहा है और बाढ़ ने नेपाल से आगे भारत में तबाही मचाना प्रारम्भ कर दिया है। अररिया, पूर्निया, मधेपुरा, खगरिया और सुपौल जनपदों में गांव के गांव खाली कराये जा रहे हैं। यह सुनकर त्रिपुरारी पंडित एवं अन्य हिंदुओं ने कोसी मैया को शांत करने के लिये पूजा एवं मंत्र-जाप प्रारम्भ कर दिया। इब्राहीम और अन्य मुसलमान पांचों  वक्त नमाज़ अता कर अल्लाह से रहम की दुआ करने लगे। यद्यपि घर खाली करने की आवश्यकता पड़ने की आशंका सभी के मन में व्याप्त कर गई थी, परंतु चूंकि अपना घर सुरक्षा एवं अपनत्व का एक अद्वितीय अहसास देता है, अत: कोई व्यक्ति घर खाली नहीं करना चाहता था और सभी आशा कर रहे थे कि इतनी दूर से उनके यहां पानी आयेगा भी तो इतना ही कि एक दो दिन पानी के बीच रहने का कष्ट सहकर काम चल जायेगा। पर वे यह नहीं जानते थे कि ऐसा तो बाढ़ में होता है- और यह बाढ़ नहीं साक्षात प्रलय थी।
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                 उस दिन सायंकाल होते-होते आकाश में सन्नाटा छा गया था और फिर बहुत तेज़ वर्षा प्रारम्भ हो गई थी। रात्रि गहराने के साथ गांववालों के दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं थीं। पुरुष जल्दी ही अपने अपने घरों में आ गये थे। यपद्यि पुरुषों ने घर छोड़कर अन्यत्र चलने की कोई बात नहीं कही थी, तथापि स्त्रियां रात्रि में जल्दी ही चौका-बर्तन समाप्त कर गहने, रूपये एवं ज़रूरी सामान सम्हालकर बांधने में लग गईं थीं। गाय-भैंस और कुत्ते-बिल्ली सब सहमे हुए से चुप थे। उनकी छठी इंद्री उन्हें आने वाली आपदा का संकेत दे रही थी। फिर दिन भर के तनाव व थकान के कारण गांववाले उंनीदे हो गये थे। रात्रि का तीसरा पहर प्रारम्भ हुए दो घड़ी ही बीती होगी कि तीन दिशाओं से हरहर-हरहर की आवाज़ आनी प्रारम्भ हो गई थी। उस समय भी मूसलाधार वर्षा हो रही थी और चारों ओर धने अंधेरे का साम्राज्य था। गांववाले जब तक ताण्डव करते शिव के गर्जन सम घ्वनि का अर्थ समझ पाते, तूफ़ानी लहरों पर उछलता हुआ पानी गांव में भरने लगा था। यह जानकर लोगबाग अपना अपना आवश्यक सामान लेकर भागने हेतु घर से बारह निकले तो, परंतु बारह आकर चकराकर रह गये। पानी इतना अधिक था एवं इतनी तेज़ी से गांव को हर दिशा से घेर रहा था कि कोई यह समझ नहीं पा रहा था कि किस दिशा में भागकर प्राणरक्षा की जा सकती है। आसन्न परिस्थिति की भयावहता से अनभिज्ञ बच्चे बड़ों को देखकर घबराकर उनके आश्रय में छिप रहे थे, तैरकर पानी के पार बाहर निकलने का प्रयत्न करते कुत्ते भय से कूं-कूं कर रहे थे, इब्राहीम एवं अन्य मुसलमानों की मुर्गियां कुक-कुक करती बही जा रहीं थीं और खूंटे से बंधे गाय, भैंस अपना पगहा तुड़ाने के प्रयत्न में रम्भा रहे थे। जैसे जैसे पानी घरों में ऊपर चढ़ने लगा और प्रलय की विभीषिका का भान लोगों को होने लगा, वैसे वैसे चीख-पुकार एवं अफ़रा-तफ़री का माहौल बढ़ने लगा- कोई अपने बच्चे को पुकार रहा था, कोई बूढ़ी मां के पानी में गिर जाने पर विलाप कर रहा था, कोई पानी में बह जाने वाले अपने रुपये के पीछे भाग रहा था, कोई रम्भाते जानवरों के पगहे खोल रहा था और कोई प्रकाश हेतु माचिस ढूंढ रहा था। फिर शीघ्र ही सबकी समझ में यह आ गया कि पानी की मात्रा एवं उसका प्रवाह इतना अधिक है कि बाहर निकल पाना असम्भव है और मकान में नीचे के तल पर रहकर डूबने से बचा नहीं जा सकता है। अत: वे सब जिनके घर पर छत बनी थी, जितना सम्भव हो सका उतना माल-असबाब लेकर अपने परिवार सहित घर की छतों पर चढ़ गये। परंतु मरछेहटा में अधिकतर घरों की छतें फूस की बनी थीं, अत: उनमें रहने वाले लोग पड़ोसियों की छतों पर आने लगे। रमेसर की छत सबसे बड़ी, ऊँची व पक्की थी, अत: उसमें उसके आस-पड़ोस के फूस की छत के मकान वाले तमाम लोग आने लगे- जिनमें सबसे पहले आने वालों में गयादीन का सात सदस्यों का परिवार तथा सबसे बाद में आने वालों में इब्राहीम का ग्यारह सदस्यों का परिवार था। प्रारम्भ में रमेसर पानी में फंसे हुए सब लोगों को बुला बुला कर उन्हें छत पर आने में सहायता करता रहा था- यहां तक कि गयादीन के परिवार का भी उसने निष्कपट हृदय से स्वागत किया था। इससे उसे परमार्थ में काम आने का पुण्य प्राप्त होने की तुष्टि के साथ अपने मकान के पक्के होने के आत्माभिमान की भावनात्मक तुष्टि भी प्राप्त हो रही थी। परंतु इब्राहीम के परिवार के उसकी सीढ़ियों पर आने तक छत पर कोई जगह खाली नहीं बची थी और वह अधिक भार से छत के गिरने के खतरे से चिंतित भी होने लगा था। इब्राहीम को ऊपर आने से रोकने और कहीं और जगह ढूंढने को कहने की बात वह सोच ही रहा था कि इब्राहीम की छोटी लड़की जमीला का हाथ उसके हाथ से छूट गया था और वह पानी में बहने लगी थी। इब्राहीम, उसकी पत्नी, और नूरजहां अन्य बच्चों व सामान से इतने लदे फंदे थे कि उन्हें छोड़कर जमीला को बचाने की गुंजाइश ही नहीं थी। हताशा में वे रोने चिल्लाने लगे थे। उस अंधकार में बच्ची को बचाने हेतु पानी में कूदने का कोई साहस नहीं जुटा पा रहा था। इसी बीच सुक्खी की निगाह नरूजहां के मुख पर पड़ी थी और उसने पता नहीं उसमें क्या देखा था कि उसने आव देखा न ताव और पानी में कूद पड़ा था। जमीला पानी में नीचे जा रही थी और उसे पकड़ने हेतु डुबकी लगाने के पश्चात जब देर तक सुक्खी बाहर नहीं निकला, तो सबको चिंता हो गई थी और उसकी मॉ फफक कर रो पड़ी थी। पर तभी एक हाथ में जमीला को पकड़े हुए सुक्खी बारह आ गया था। दुख एवं क्षोभ की दशा में रमेसर अभी तक चुप था, परंतु सुक्खी को ऊपर आते देखते ही गरियाने लगा था,
            ''सरऊ, आपन जान देय बदे कूद गये रहौ?``
            सुक्खी चुपचाप इब्राहीम एवं उसके परिवार के सदस्यों में एक एक को लेकर छत पर उनके लिये जगह बनाने लगा था। नूरजहां सबसे बाद में सुक्खी के साथ छत पर आई और किसी तरह निकली बित्ता भर जगह में वह और सुक्खी सटकर बैठ गये थे। अब तक पानी छत के तीन फीट नीचे तक आ चुका था और कहीं छत पर न आ जाये, इस आशंका से सबकी जान सूख रही थी।
             इब्राहीम के परिवार के आने के बाद भी कुछ लोगों ने पानी में तैरकर आते हुए रमेसर की छत पर आने का प्रयत्न  किया, परंतु वहां जगह न होने के कारण और अपनी जान का जोखिम होने के कारण किसी ने उन्हें ऊपर नहीं चढ़ाया। वे लौट गये परंतु कहां गये, यह कोई न जान सका। वैसे गांव के कितने आदमी और जानवर पानी में बह गये हैं ओर कितने बचे हैं, यह न तो कोई जानता था और न जानने की जिज्ञासा प्रदर्शित कर रहा था। सबको अपनी जान बचाने की चिंता इतनी अधिक थी और अंत में अपने बच पाने की आशा इतनी कम थी कि किसी को किसी अन्य के विषय में जानने का ध्यान कम ही आ रहा था। इसके अतिरिक्त आज लोगों का ध्यान अन्य कुछ ऐसी बातों पर भी नहीं जा रहा था जिन बातों पर सामान्यत: वे मरने मारने पर उतारू हो जाते थे; जैसे, आज सुक्खी और नूरजहां इतनी कम जगह मे सटे बैठे थे कि न चाहते हुए भी उनके अंग-प्रत्यंग एक दूसरे का स्पर्श कर रहे थे और सुक्खी ने नूरजहां को वर्षा से भीगने से बचाने के लिये अपनी मोमिया उसकी पीठ पर भी डाल रखी थी एवं इब्राहीम किसी प्रकार की उरजत करने के बजाय सुक्खी को दुआयें दे रहा था, घरुहू चमार और पंडित देवतादीन के परिवार भी बाद में आने के कारण एक ही जगह पर सटे हुए बराबरी के स्तर पर बैठे हुए थे और पैरों के थक जाने पर हिलाने डुलाने पर घुरहू के परिवार के सदस्यों के पैर पंडित जी के लग जाते थे, लखन पासी की गर्भवती बहू को जोर से लधुशंका लगने पर वह सबके सामने छत की मुंडेर पर निबट ली थी, रामबिलास ठाकुर की पत्नी को नींद का झोंका आने पर उसने छुनई दुसाध की पीठ का सहारा ले लिया था और उसे कांपते हुए देखकर छुनई ने उसे बारशि से बचाने के लिये उसके सिर पर अपने साथ लाया बोरा डाल दिया था। एक ऐसे समाज, जो अनेक अडिग स्तरों में विभाजित था एवं जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसकी जाति, लिंग, आयु एवं धन के अनुसार कठोरता से निर्धारति थी, के समस्त नियम अकस्मात ध्वस्त हो गये थे और कुछ घंटों के अंतराल में ही प्रेमपूर्ण साम्यवाद स्थापति हो गया था।

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           शनै: शनै: वर्षा बंद हो गई और बाढ़ के पानी का और ऊपर चढ़ना भी रुक गया था, जिससे सभी लोगों की जान में जान आई और उन्हें भविष्य की चिंता सताने लगी थी। अधिकतर लोग रुकरुक कर आकाश की ओर हाथ जोड़कर 'हे राम! रक्षा कर` अथवा हाथ फैलाकर 'अल्लाह! रहम कर` बोलने लगे थे। कोई कोई स्त्री अपने कीमती कपड़े या गहने घर में ही छूट जाने का रोना भी रोने लगी थी। गांव के अन्य घरों की छतों का दृश्य स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था, पर उन पर भी बातचीत बढ़ रही थी। रमेसर ने पड़ोस की एक छत की ओर मुंह करके पुकारा,
             ''घसीटे काका, सब ठीक है?``
             घसीटे ने रुंआसे स्वर में उत्तर दिया,
             ''घर के और सब लोग तो छत पर हवैं, पर बडक़ा बेटा, जो खेत पर गवा रहल, घर नाहीं लौटा है। ईसरै मालिक है।``
             ऐसी प्रलय में बड़े बेटे के साथ क्या होने की सम्भावना अधिक है, यह अनुमान लगाना कठिन नहीं था, परंतु फिर भी रमेसर ने अपने शब्दों से यथासम्भव ढाढ़स बंधाने का प्रयत्न किया। तभी पूरब दिशा से 'बचाव, बचाव` की कुछ घ्वनियां सुनाई दीं और फिर सब शांत। छुनई दुसाध ने आवाज़ पहिचान कर कहा,
           ''हमका इनमें से एक तौ रामबिलास केर आवाज लागल। लागत है  बिचरऊ बहि गइले।``
           यह  सुनकर सबके हृदय द्रवित हो गये- विशेषकर इसलिये कि अन्य के अतिरिक्त रामबिलास भी सपरिवार रमेसर के यहां शरण की आशा में आया था, पंरतु जगह की अनपुलब्धता के कारण और भार से छत ढह जाने के भय के कारण किसी ने उसे ऊपर नहीं लिया था। वह लौटकर एक झोपड़ी की फूस की छत पर सपरिवार चढ़ गया था और उस झोपड़ी को ही डूबते को तिनके का सहारा मान बैठा था। पर तिनका तिनका ही होता है और उसका सहारा तिनका मात्र ही होता है- झोपड़ी बहुत देर तक पानी का बहाव नहीं झेल सकी थी और उसने स्वयं के साथ रामबिलास को भी सपरिवार जलसमाधि दे दी थी। नूरजहां अपनी हिचकियां न रोक सकी क्योंकि रामबिलास की लड़की उसकी सहेली थी। उसकी हिचकियां सुनकर अनेक अन्य स्त्रियां व बच्चे भी रो उठे थे। मृत्यु के आसन्न होने की आशंका तो सभी के मन में व्याप्त थी, परंतु बाढ़ में मृत्यु द्वारा किसी को कालकवलित कर लेने की यह पहली त्रासदी उनकी जानकारी में आई थी, अत: अधिक हृदयविदारक थी। अनेक पुरुष भी अपने आंसुओं को बाहर आने से न रोक सके थे।
                                                    
              आकाश में बादल छंटने लगे थे और सुबह का भुकभुका होने लगा था। प्रकाश-किरणों के आगमन के साथ सभी के मन में आशा की किरणें भी जगमगाने लगीं थीं। प्रकाश का यह सर्वकालिक, सर्वव्यापक गुण है कि यह हमारे मन मे उत्पन्न होने वाले ऋणात्मक भावों, भयों, एवं आशंकाओं को कम करता है। इधर उधर देखने पर अनेक छतों पर स्त्रियां, पुरुष एवं बच्चे शरण लिये हुए दिखाई दिये। निकट की छत वालों में आपस में रामजुहार भी हुई। दूसरों की दशा को देखकर रमेसर की छत पर शरण लिये हुए लोगों ने अपने भाग्य को मन ही मन सराहा एवं ईश्व की कृपा हेतु उसे धन्यवाद दिया। यह छत अन्य छतों की अपेक्षा अधिक ऊँची और पक्की होने के कारण अधिक सुरक्षित, साफ़ एवं सुविधाजनक थी।  कुछ कुछ दूरी पर स्थित उन मकानों, जो फूस से छाये हुए थे, की दीवालें पूर्णत: पानी में डूब गईं थीं- बस उनके ऊपर के छप्पर पूर्णत: अथवा अंशत: दिखाई पड़ रहे थे। रामबिलास के मकान का छप्पर दिखाई नहीं दे रहा था और रमेसर बड़े भरे मन से बोला,
            ''लागत है कि रामबिलास और ऊ  के बचवा सच्ची मां बहि गइले।``
            यपद्यि राममबिलास के मकान का अस्तित्व न पाकर अन्यों को भी इस तथ्य का विश्वास हो चुका था, परंतु अभी तक कोई अशुभ बात को कहने का साहस नहीं कर रहा था। सबके मन में एक प्रकार का अपराध-बोध व्याप्त था। रमेसर द्वारा बात छेड़ देने पर सियाराम ने सबकी बचत में कहा,
            ''ई परलय मां भगवानै काहू का बचाइ सकत है।``
            फिर कुछ देर तक रामबिलास एवं उसके परिवार के लोगों के विषय में चर्चा छिड़ी रही। उसके पश्चात सभी को नित्यक्रिया से निबटने की चिंता सताने लगी।  लज्जापूर्ण मानसिकता के कारण इसमें स्त्रियों को विशेष कठिनाई अनुभव हो रही थी। पर यह बात सभी समझ रहे थे कि छत पर चढ़ने की सीढ़ियों की दो पैकरियां जो पानी में डूबने से बच गईं थीं, उनमें से एक पर बैठकर बहते पानी में निवृत होने के अतिरिक्ति अन्य कोई विकल्प उपलब्ध नहीं था। यपद्यि इतने लोगों की उपस्थिति में यह कोई कम लज्जास्पद स्थिति नहीं थी, तथापि मजबूरन पहले लड़कों ने अपने को वहीं निवृत करना प्रारम्भ कर दिया। फिर पुरुषों ने और उनके पश्चात स्त्रियों ने मुंह धोती में छिपाकर वही किया। कोसी के प्रकोप ने मनुष्यों द्वारा सदियों से अपनाये गये लज्जा के नियम एक रात्रि में ध्वस्त कर दिये थे।
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           पीने के लिये बहता हुआ पानी तो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था, परंतु खाने का सामान सब लोग पर्याप्त मात्रा में नहीं ला पाये थे। यपद्यि रमेसर ने कुछ सत्तू, और चावल छत पर चढ़ा लिये थे, परंतु इतने लोगों के लिये वे सर्वथा अपर्याप्त थे- और फिर कौन कह सकता था कि कब तक बाढ़ का प्रकोप रहेगा। फिर भी जिनके पास सामग्री थी, उनमें से कई ने उदार हृदय से बच्चों, गर्भवती महिलाओं और थोड़ा-बहुत पुरुषों को खाने को दिया। भरपेट खा पाने की तो किसी को आशा ही नहीं थी, अत: अधिकतर उतने से ही संतुष्ट हो गये। रात्रि में ठीक से सो न पाने के कारण अधिकतर लोग अलसाकर इधर उधर लुढ़क गये। आकाश में बादल अब भी थे परंतु हल्के थे और कुछ पल के लिये सूर्य के दर्शन भी हो गये थे, अत: सब लोग पानी कम होने के प्रति आशावान होने लगे थे और बीच बीच में सामान्य बातचीत का सिलसिला भी प्रारम्भ हो गया था। परंतु दोपहर बाद फिर पूरब दिशा से कालिमा बिखेरती हुई घनघोर वर्षा आ गई और फिर ऐसी निराशाजनक मुर्दनी छा गई थी कि जैसे सबको सांप सूंघ गया हो। छत पर कभी किसी बच्चे के रोने अथवा किसी के दीर्घ उच्छवास की ध्वनि के अतिरिक्त बस तेज़ बहती हवा, बरसते पानी और कोसी की उच्छृंखल लहरों की आवाज़ सुनाई देती थी।
                देर रात हो गई, परंतु पानी निर्बाध बरसता रहा था। फिर अकस्मात दक्षिण दिशा से अम्मा, बापू, हमका बचाव, बचाव,........... हाय हम बहे जाइल........कोई बचाव......... की हृदयविदारक पुकारें आने लगीं। सन्न होकर सब लोग वे पुकारें ऐसे सुनते रहे जैसे वे प्रेतलोक से आ रहीं हों, जिन पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने पर प्रेतों द्वारा प्राण ले लिये जाने का भय हो। फिर जब कुछ कुछ घड़ियों के अंरताल पर वे आवाज़ें दूसरी और तीसरी बार आईं, तब वे अपनी भयावहता सहित  सबके मन में ऐसी बस गईं जैसे वे उनकी रात्रिचर्या का अंग हों और सब लोग एक तरह से उनकी प्रतीक्षा सी करने लगे। सब लोग ऐसे मंत्रबिद्ध हो गये थे कि किसी को पता नहीं चला कि रात्रि में कब वे आवाजें आना बंद हुईं और किस समय पानी बरसना बंद हुआ।
               दूसरी प्रात: बड़ी हृदयविदारक थी। अन्यों के अतिरिक्त रमेसर के चाचा का घर भी ढह गया था और उस पर शरण लिये हुए सभी लोग बह गये थे। एक व्यक्ति लगभग एक फ़र्लांग बहकर एक वृक्ष की डाली से अटक कर बच गया था और रुकरुककर वहां अपना हाथ हिला हिलाकर सहायता की याचना कर रहा था परंतु जब सभी आरत थे तो रक्षक कौन बनता? यपद्यि इस समय पानी बरसना रुक गया था और अब कोसी के पानी का स्तर भी नहीं बढ़ रहा था, परंतु आज सभी का विश्वास हिल चुका था। मानसिक और शारीरकि दोनों रूपों से सब पस्त हो चुके थे- कई ज्वरग्रस्त हो गये थे और इब्राहीम की छोटी बेटी जमीला, जिसे सुक्खी ने अपनी जान पर खेलकर बचाया था, आज तीव्र ज्वर से मरणासन्न थी। सुक्खी कभी उसका हाथ सहलाता था, तो कभी नूरजहां का रुंआसा चेहरा देखकर उसे ढाढ़स बंधाता था। इब्राहीम की पत्नी बदहवास सी 'या खु़दा, रहमकर` कहती हुई बार बार आकाश को निहारती थी, परंतु उसके और ऊपर वाले के बीच घने बादलों का ऐसा परदा तना हुआ था जो छंटने का नाम ही नहीं लेता था। आज जिसके पास जो कुछ खाने को था, समाप्त हो रहा था। बच्चों और बूढ़ों को भूख से तड़पता देखकर रमेसर ने मुटठ़ी मुटठ़ी भर आटा और चावल उन्हें बांट दिये थे और उन लोगों ने उन्हें कच्चा ही चबा लिया था। उसने पूरा प्रयत्न किया था कि किसी को इस बात की भनक न लगे कि उसके पास सत्तू भी हैं, पर बुभुक्षु मनुष्य से भोजन छिपाना उतना ही मुश्किल होता है जितना शेर से मांस छिपाना। रमेसर के परिवार के बगल में बैठी सकुंतला काकी को सत्तू की महक मिल गई थी और उनके पेट में चूहे बहुत जोर से कूदने लगे थे। सायंकाल होते होते इब्राहीम की छोटी बेटी जमीला की हालत बहुत खराब हो गई थी और उसने अपनी मॉ की तरफ़ एकटक देखते हुए 'अम्मी` कहा और दम तोड़ दी थी। छत पर रोना-पीटना प्रारम्भ हो गया था। मॉ, पति, भाई, बहिन दहाड़ मार कर रो रहे थे, अन्य औरतें कमोबेश उसी प्रकार उनका साथ दे रहीं थीं और दूसरे कुछ लोग हुसक-हुसक कर रो रहे थे अथवा चुपचाप अपने अश्रु पोंछ रहे थे। सुक्खी को जितना दुख जमीला के लिये था, उतना ही नूरजहां के आंसू देखकर हो रहा था। सभी व्यक्तियों का अंतरतम दुखी था। बच्ची के प्रति प्रेम के अतिरिक्त इसका एक और प्रमुख कारण था- वह यह कि सभी की आशंका दृढ़तर हो रही थी कि बहुत सम्भव है कि उनका भी ऐसा ही हश्र हो। दूसरों की आपदा हमें कदाचित उतना नहीं झकझोरती है जितना स्वयं पर आसन्न विपत्ति की आशंका।

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          रात्रि के आगमन के साथ पुन: वर्षा प्रारम्भ हो गई थी। आज छोटे बच्चों को छोड़कर किसी ने कुछ नहीं खाया था और सब दो चार घूंट अतिरिक्त पानी पीकर अपना पेट पकड़े सोने का प्रयत्न करने लगे थे। वास्तविकता यह थी कि अब अधिकरत लोग भूख से बेहाल होने लगे थे और चुराई-छिपाई हुई थोड़ी बहुत खाद्य सामग्री छोड़कर किसी के पास खाने हेतु सामग्री नहीं बची थी। ऐसी परिस्थिति में यदि किसी के पास कुछ था भी, तो वह उसे यथासम्भव बचाकर रखना चाहता था। रमेसर की पत्नी के पास केवल सत्तू बचे थे। जब रमेसर का परिवार गहरी नींद में सो गया था तो सकुंतला काकी ने सत्तू की पोटली में सेंधमारी करके अपने व अपने पति के लिये सत्तू निकाल लिये थे और पानी के एक एक धूंट के साथ खा लिये थे। यद्यपि अपने शरणदाता के सत्तू चुराते हुए उन्हें आत्मग्लानि का आभास हुआ था, परंतु खाने से पेट में हुई तृप्ति से उन्हें कई गुना अधिक आत्मिक सुख की प्राप्ति हुई थी।
            उस रात्रि भी तीसरे पहर एक बार 'बचाव, बचाव` की ध्वनि निर्मम नि:स्पृह अंधकार में गूंजी थी, पर छत पर उपस्थित लोग थकान, भूख और पानी में भीगने से ऐसे बेहाल हो रहे थे कि किसी में उस ओर ध्यान देने की भी पर्याप्त दम नहीं थी। दूसरे दिन जगह हो जाने के पश्चात रमेसर की पत्नी को अपने सत्तू के झोले का आकार कम होने का भान हो गया था और वह बिना कुछ पूछताछ किये सकुंतला काकी पर बिफर पड़ी थी,
            'काकी, तुम तौ बड़ी बेसरम और कमीनी निकलीं। हम तुमका सरन दिहा और तुम हमरे बच्चों के वास्ते बचाये सत्तू ही चुरा लिहे।`
            काकी सदैव से वाचाल एवं तेज़मिजाज रहीं थीं, अत: वह कहां चुप बैठने वालीं थीं। सत्तू से प्राप्त उर्जा के फलस्वरूप काकी में पर्याप्त दम भी आ चुका था। अत: उन्होंने पहले तो चोरी करने के आरोप को झूठा बताया था और रमेसर की पत्नी के लगातार प्रतिवाद करते रहने पर वह उस पर झपट पड़ीं थीं। दोनों में गुत्थमगुत्था और झोंटा-खिंचव्वल भीषण रूप से हो गई थी। दोनों छत के किनारे ऐसी जगह पर थीं कि यदि रमेसर आदि दो तीन पुरुषों ने मिलकर उन्हें न पकड़ा होता, तो दोनों ही मुंडेर पार पानी में गिर जातीं।
            नित्यक्रिया से निबटकर किसी-किसी ने बची खुची सामग्री से नाश्ता किया परंतु उसके पश्चात रमेसर के सत्तू छोड़कर सबके पास कच्चा-पक्का समस्त भोजन समाप्त हो गया था और सब लोग भूख से व्याकुल हो रहे थे। रमेसर की पत्नी द्वारा सकुंतला से झगड़ने का एक दुष्परिणाम यह हुआ था कि छत पर सबको पता चल गया था कि रमेसर अपने पास थोड़ा सा सत्तू छिपाये हुए था।
                                                     
            फिर दस बजे दिन से ही पानी का बरसना प्रारम्भ हो गया था। सब के मन में जीवित बचने की आशा क्षीण हो रही थी और हताशा स्थायी हो चली थी। यदा कदा लोग कहने भी लगे थे कि लगता है कोसी मैया प्राण लेकर ही छोड़ेंगी। सुक्खी जो कल तक सबको - और विशेषकर इब्राहीम के परिवार को- ढाढ़स बंधाता रहा था, आज चुप हो गया था। उसके नेत्र स्पष्ट बताने लगे थे कि उसकी भी बच निकलने की आशा क्षीण हो चुकी है। भूख तो सब लोगों को तड़पा ही रही थी, दो बच्चों और तीन स्त्रियों को कै और दस्त भी प्रारम्भ हो गये थे जिनमें इब्राहीम की एक बेटी भी थी। तभी दोपहर में एक सरकारी नाव उनकी ओर आती हुई दिखाई दी जो सबको साक्षात दैवीकृपा लगी। नाव में मल्लाह के अतिरिक्त दो सिपाही थे, जो खाने की कुछ सामग्री भी लाये थे। नाव के छत के किनारे लग जाने पर सिपाहियों में से एक ने कहा,
         


''हमारे पास खाने का कुछ सामान है, जो बच्चों, बीमारों तथा कमज़ोर स्त्रियों के लिये है। अत: ये लोग आगे नाव के पास आ जायें।``
          परंतु छत के ठसाठस भरे होने के कारण बच्चों और कमज़ोर स्त्रियों के आगे आने के प्रयत्न करने के पहले ही बलिष्ठ लोग आगे आ जमे थे। फिर दोनों सिपाहियों के लाख समझाने और धमकाने के बावजूद भोजन के अधिकतर पैकेट्स उन्हीं बलिष्ठों ने गपक लिये थे और जिसको जो मिला खा गया था। सिपाहियों के देखते देखते अनेक अपात्र भोजन को लूट ले गये और पात्र भूख से तड़पते रहे। फिर दोनों सिपाही नाव पर छत के निकट खड़े होकर बोले,
         ''इस नाव में सिर्फ  बीस लोंगो को ले जाने की जगह है और हम लोग सिर्फ बच्चों, बूढ़ों और बीमारों को ले जायेंगे। जगह होने पर बीमारों के साथ एक तीमारदार और बच्चों के साथ उनकी मांयें भी जा सकतीं हैं।``
          प्रारम्भ में तो सिपाही कड़ा रुख दिखाकर अपना आदेश पालन करा सके और केवल पात्र व्यक्ति ही नाव पर आ पाये, परंतु जहां मांओं और तीमारदारों के नाव पर आने की बात कही गई, वहीं छत पर हंगामा मच गया। प्रत्येक व्यक्ति नाव पर कूदने को झपट पड़ा और सिपाहियों द्वारा निर्धारति व्यवस्था पूर्णत: भंग हो गई। सुक्खी नाव में बिना नीचे देखे ऐसे कूद पड़ा कि इब्राहीम की मझली बेटी पर ही आकर गिरा और उस बिचारी की टांग टूट गई। इब्राहीम की पत्नी चिल्लाई,
           ''हाय! हमार बिटिया का टांग तोड़ दिहौ।``
           परंतु उस समय सुक्खी के मुख पर पश्चात्ताप का भाव आने के बजाय वह चिल्लाकर बोला,
           ''तौ ऊ का सम्हार के काहे नाहीं बैठी रहौ?``
           एक सिपाही ने क्रोध में आकर सुक्खी को गरियाते हुए उसको एक बेत मार दिया। सुक्खी ने चारों ओर से भर्त्स्रना भरी निगाहों को अपनी ओर उठते हुए भी देखा परंतु वह चुप रहा- वास्तविकता यह थी कि अपने प्राण बचा लेने की सम्भावना से वह इतना आनंदित था कि सिपाही की गाली व मार तथा अन्यों की भर्त्सना ने उसे लेशमात्र भी विचलित नहीं किया था। तभी नाव भार से डूबने को आ गई, तो सिपाहियों ने नाव में कूदने का प्रयत्न करने वालों पर लाठी बरसाना प्रारम्भ कर दिया और नाव में पहले से आ गये लोगों ने उनका साथ देते हुए उन्हें छत पर वापस ढकेलना प्रारम्भ कर दिया। यहां तक कि रमेसर जिसने सबको शरण दी थी और अपने घर का भोजन भी कराया था, उसे भी वापस ढकेल दिया गया। नाव वाले ने जल्दी से नाव छत से दूर हटा ली और वापस चलता बना।
             नाव के वापस चल देने पर छत पर बचे शेष व्यक्तियों को सांप सूंध गया- छत पर फिर मुर्दनी छा गई। नाव में अनेक अपात्रों के चले जाने एवं स्वयं के न जा पाने से ऐसे अनेक व्यक्ति, जिन्होंने शालीनतावश बलात आगे बढ़कर नाव में कूदने का प्रयास नहीं किया था, अपने को मन ही मन कोसने लगे और फिर अपने को पूर्णत: निरुपाय पाकर यह सोचकर मन को समझाने लगे 'अब पछताये का होत है, जब चिड़ियां चुग गईं खेत।`
                                                    ृृृ


नाव के आने और कुछ लोगों को ले जाने से बचे हुए लोगों के लिये एक अच्छी बात यह हुई कि छत पर इतनी जगह हो गई कि वे पैर फैला सकें और चल-फिर सकें। परंतु बुरी बात यह हुई कि उनकी मनुष्यता एवं परार्थ पर से आस्था समाप्तप्राय हो गई- उन्हें लगने लगा कि अपने प्राण बचाने के बजाय दूसरे के प्राणों की चिंता करना मूर्खता है। उस रात्रि में वर्षा नहीं हुई, परंतु भयावह आंधी आई। अर्धरात्रि के पश्चात घने अंधकार एवं आंधी के चीत्कार में दो युवकों ने सत्तू का झोला रमेसर की पत्नी के सिर के नीचे से चुपचाप खींचने का प्रयत्न किया, परंतु वह जाग गई और चिल्लाने का प्रयत्न करने लगी। उसकी आवाज़ उसके गले में ही घुटकर रह गई क्योंकि उन व्यक्तियों ने पहले तो उसका मुंह भींच दिया और चुप न रहने पर उसका गला घोंट दिया। शरीर शांत हो जाने पर उसे मिड़गारी के पार पानी में ढकेल दिया। रमेसर को उस रात देर से नींद आई थी क्योंकि वह सोचता रहा था कि यदि उसने इतने लोगों को अपने यहां शरण न दी होती, तो उसे अपने परिवार सहित नाव पर जगह मिल जाती और आज रात्रि वे कहीं सुरक्षित स्थान पर होते। अत: वह जब सोया तो गहरी नींद में सो गया था। इस कारण उसे पत्नी के साथ घटित घटना का आभास ही नहीं हुआ था। सबेरे उसके बेटे ने उसे जगाकर बताया कि मॉ कहीं दिखाई नहीं दे रहीं है, तब उसके होश उड़ गये। उसने छत के नीचे पानी में हर तरफ़ पत्नी को देखा, पर उसका कोई चिन्ह दिखाई न पड़ा। वह और उसका परिवार विलाप करने लगा। दो लोगों को छोड़कर कोई समझ नहीं पा रहा था कि क्या हुआ, परंतु अधिकतर अपना अनुमान बता रहे थे कि लगता है कि अंधेरे में लघुशंका को उठने पर पैर फिसल गया होगा और पानी में बह गईं होंगी। उन हत्यारों में से एक ने हां में हां मिलाते हुए जोड़ा,
             '' रात भर अस तूफान चलल रहा कि कोऊ काकी केर पुकार लौ नाहीं सुन सका।``
              रमेसर का ध्यान गया कि सत्तू का झोला भी गायब है और वह उस विषय को उठाने वाला ही था कि एक बड़ी सी नाव आती हुई दिखाई दी और सब आशान्वित होकर उसी की बात करने लगे। नाव रमेसर की छत से ही आकर रुकी और सब लोग बिना समय गंवाये उस पर सवार हो गये। कुछ अन्य नावें भी आईं और अन्य मकानों की छतों से लोगों को ले जाने लगीं। उस समय यह चिंता कि कितने के बेटे-बेटियां, भाई-बहिन, मॉ-बाप अथवा संगी-साथी कोसी मैया के प्रकोप से ग्रसित होकर उनके उरद में समा गये हैं सबने सुरक्षित स्थान पर पहुंचने के उपरांत दुख मनाने हेतु मस्तिष्क के किसी अंधेरे कोने में छिपा दी थी। वर्तमान में सबके मन में एक प्रकार की कृतज्ञता का भाव ही था कि वे बच गये हैं।
              नाव के चल देने पर रमेसर ने अवश्य अपनी छत को इस आशा से भरी निगाहों से देखा था कि उसकी पत्नी वहीं कहीं छिपी बैठी होगी और उसे देखकर पुकारने लगेगी,
              ''अरे रुकौ। हमका तौ नाव पै लै लेउ।``

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              मरछेहटा से लाये गये सभी लोगों को जिस रिलीफ़ कैम्प /सहायता केंद्र/ में रखा गया था, वह प्राथमिक पाठशाला का एक पुराना परंतु पक्का भवन था। इसमें कक्षा १ से कक्षा ५ तक के लिये पांच कमरे तथा अध्यापकों के लिये एक कमरा था, परंतु कक्षा ५ के कमरे की छत टूटी होने के कारण अधिकतर शरणार्थी ४ कमरों में थे। कैम्प का प्रबंध देखने वाले सरकारी कर्मचारी अध्यापकों वाले कमरे में रुके थे। केवल बाद में आने वाले कुछ लोग टूटे कमरे में रुके थे। इनमें रमेसर और उसके साथ आये व्यक्ति भी थे, परंतु सुक्खी जो पहले ही आ चुका था बगल के पक्के कमरे में रुका था, जिसमें नूरजहां भी अपने परिवार सहित रुकी थी। उन दोनों में नाव पर ही नेत्रों-नेत्रों में मन के भावों का आदान प्रदान हो चुका था और सुक्खी समझ गया था कि छोटी बहिन पर कूद जाने को नूरजहां ने दुर्घटना मानकर उसे क्षमा कर दिया था। यहां पहुंचकर सुक्खी ने ही उसकी टूटी टांग पर पट्टी बंधवाने का प्रबंध किया था। अपना परिवार आने के पश्चात भी सुक्खी ने अपना कमरा बदला नहीं था- उस कमरे की छत के टूटे होने का बहाना तो उपलब्ध ही था। इब्राहीम ने यहां आकर सुक्खी और नूरजहां की निगाहों पर निगरानी रखनी प्रारम्भ कर दी थी एवं नूरजहां को अपने बगल में सुलाने लगा था जिससे सुक्खी की निगाह सोते जागते-नरूजहां पर न पड़ सके।
              यपद्यि रमेसर वाले टूटे हुए कमरे में बरसते पानी से और धूप से पूर्णत: बचत नहीं थी, तथापि प्रथम दृष्टि में वह कमरा सबको साक्षात स्वर्ग समान लगा था। जब वह कमरा भी ठसाठस भर गया था, तब और आने वाले लोगों को  बारह नीम के वृक्ष के नीचे रोका जा रहा था। इन लोगों को खाने को थोड़ा-बहुत चना-चबेना दिया जा रहा था और रोगियों को दवाइयां दी जा रहीं थीं, परंतु इतने लोगों के लिये व्यवस्था सर्वथा अपर्याप्त थी, और वितरकों को अनुशासन बनाये रखने में बड़ी कठिनाई होती थी।
             सुक्खी वाले कमरे में एक युवक के पास ट्रांज़िस्रटर रेडियो था और उस पर बाढ़ के विषय में खबरें आ रहीं थीं:
              'कोसी नदी पर बंधा टूटने से बिहार में आई प्रलयंकारी बाढ़ अभी भी थमने का नाम नहीं ले रही है और उसकी चपेट में नये नये गांव आ रहे हैं। अनेक ग्राम बाढ़ में घिरे हैं और उनसे किसी प्रकार का सम्पर्क नहीं हो पा रहा है। यह अनुमान से परे है कि कितने घर ढह गये हैं, कितने मनुष्य और मवेशी बह गये हैं और कितनी फ़सल जलमग्न हो गई है, परंतु बाढ़ से प्रभावित लोगों की संख्या दसियों लाख में है। बाढ़ में घिरे लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने एवं भोजन-पानी उपलब्ध कराने हेतु पुलिस, प्रशासन, एवं केंद्रीय बल लगे हुए हैं, परंतु जलमग्न क्षेत्र इतना विस्तृत है कि कई ग्रामो में हफ्ता बीत जाने पर भी राहत नहीं पहुंच पाई है। शासन ने राष्ट्रीय एवं अंरर्ताष्ट्रीय संस्थाओं तथा नारगरिकों से सहायता हेतु अपील की है।`
              सब लोग दत्तचित्त होकर समाचार सुन रहे थे। फिर एक कामर्शियल ब्रेक के पश्चात पुन: समाचार  आना प्रारम्भ हुआ:
              'राहत सामग्री की कमी से बाढ़ में फंसे हुए लोगों एवं रिलीफ़ कैम्पों में रखे गये लोगों में त्राहि त्राहि मची हुई है। सामग्री की कमी तो है ही, परंतु उसके सुपात्रों के पास न पहुंच पाने के अन्य कारण भी हैं। कई स्थानों पर  राहत सामग्री के वितरण में भ्रष्टाचार एवं पक्षपात के आरोप लगाये गये हैं। दूसरी ओर राहत सामग्री का वितरण करने वालों का कहना है कि कई कैम्पों पर बलिष्ठ शरणार्थियों द्वारा राहत सामग्री लूट ली जा रही है, जिससे सुपात्र तक नहीं पहुंच पा रही है। आज केंन्द्र के अधिकारियों ने मुख्यमंत्री के साथ हेलीकौप्टर से बाढ़ का जायज़ा लिया है और केंद्रीय राहत राशि बढ़वाने का आश्वासन दिया है।`
              समाचारवादन के पश्चात समाचारवादक ने चुटकी लेते हुए अपनी टिप्पणी जोड़ी थी,
              'गऱीबों के मसीहा बनने वाले नेतागण में से कोई बाढ़ पीड़ितों को देखने और उन्हें सहायता पहुंचाने अभी तक इस क्षेत्र में नहीं आया है।`
               यह सुनते ही इब्राहीम के मुंह से एक गंदी सी गाली नेताओं के लिये निकली थी और अन्य लोग हंसने लगे थे।
                                                    ृृृ

               आधा पेट रहने से कैम्प के अधिकरत लोग व्याकुल हो रहे थे- भूख का गुण होता है कि कुछ भी खाने को न मिलने पर आदमी प्रारम्भ में तो व्याकुल होता है, परंतु फिर शिथिल होने लगता है और निढाल होने पर उसकी व्याकुलता कम हो जाती है, परंतु आधा पेट खाने से उसमें शिथिलता नहीं आ पाती है और भरपेट खाने की इच्छा तीव्ररत हो जाती है। अत: दूसरे दिन जब एक ट्क में भोजन सामग्री आई, तो कम लोग ही अपना धीरज रख सके और दौड़ लिये। उसे बांटने का प्रबंध करने वालों ने हर तरह का प्रयत्न किया कि पहले बच्चों, रोगियों और महिलाओं को बांटने के पश्चात ही अन्यों को सामग्री दी जाये, परंतु जब इस बात का आभास सबको हो गया कि सामग्री अपर्याप्त है और पुरुषों का नम्बर आने तक शायद ही कुछ बचे, तब पुलिस द्वारा बलप्रयोग के बावजूद सारी व्यवस्था ध्वस्त हो गई और सबसे अधिक सामग्री हट्टे कट्टे पुरुषों ने ही लूट ली। सुक्खी भी उनमें से एक था। उसने उसमें से काफ़ी भाग लाकर नूरजहां को दे दिया- इब्राहीम यह देख रहा था और इसमें छिपे उद्देश्य को भी समझ रहा था, परंतु कुछ बोला नहीं, वरन् नूरजहां द्वारा परिवार में सबको देने पर कुछ बिस्कुट उसने स्वयं भी खाये।
              शनै: शनै: राहत सामग्री की आवक बढ़ने लगी और एक सप्ताह बीतते-बीतते पर्याप्त हो गयी। फिर बाढ़ का पानी कम होने के समाचार भी आने लगे। जीवित बच जाने की आश्वस्ति हो जाने पर सब लोग अपने खोये हुए घरवालों और रिश्ते-नातेदारों का पता लगाने, मृतकों का शोक मनाने,  अपनी खेती में हुई हानि का अनुमान लगाने एवं भविष्य में रोटी रोज़ी की चिंता करने में जुट गये। अपनी जड़ से कटे हुए सभी लोग उससे जुड़ने हेतु अपने गांव शीघ्र वापस जाने की अभिलाषा करने लगे। जिन लोगों के मकान ढह गये थे अथवा जो गांव में वापस जाकर रोटी तक का प्रबंध कर पाने में मजबरू हो गये थे, उनको राहत के रूप में धनराशि बांटे जाने की खबर मिलते ही कैम्प में रहने वाले कुछ नेता-टाइप व्यक्तियों ने प्रशासनिक अधिकारियों और राहत प्राप्त करने वालों के बीच दलाल की भूमिका स्वयं ओढ़ ली। इनका काम अपात्र को पात्र साबित कर उसे देय से कम धनराशि दिलाकर पूरे की रसीद पर हस्ताक्षर करा लेना एवं अंतर की धनराशि में प्रशासनिक कर्मचारियों के साथ स्वयं हिस्सा-बांट करना हो गया। जब तक इन लोगों के स्वयं के प्राण के लाले पड़े थे तब ये किसी प्रकार प्राण बचा देने हेतु ईश्वर से रात-दिन बिनती करते रहते थे, परंतु अब उन्होंने निर्धन एवं निरुपाय लोगों के धन में हिस्सा-बांट करने का यह काम ऐसी कुशलता एवं निर्ममता से प्रारम्भ कर दिया था जैसे मछली जल में पहुंचते ही तैरने लगती है और छोटे कीड़ों को खाना प्रारम्भ कर देती है। सुक्खी ने भी इसमें बढ़चढ़कर भाग लिया और अच्छा-खा़सा धन कमा लिया। फिर एक दिन नूरजहां के शौच हेतु खेत में जाने पर उसे कुछ देर के लिये एकांत में पा लिया। अब तक दोनों का प्रेम ऊँची ऊँची पींगें मारने लगा था और सुक्खी आश्वस्त हो गया था कि नूरजहां उसका साथ पाने के लिये कुछ भी करने को तैयार हो जायेगी। समय की अल्प उपलब्धता के कारण उसने नूरजहां से सीधा प्रस्ताव रखा,
             ''नूरजहां! अब तौ जल्दी ही सब लोग गांव वापस पहुंच जहिहैं और तुम जानत हौ कि गांव मां कोऊ हम दोनन केर प्यार बरदाश्त नाहीं करिहै और हमका बिछुड़ै का मजबरू कर देहै। इसलिये हम सोचा है कि आज रात सबके सो जावै पर हम दूनौं भाग चलैं। सहर जाइके कहीं कुछ काम कर लेबै और सादी करके साथ साथ रहिबै।``
              नूरजहां स्वयं सुक्खी का साथ शीघ्र प्राप्त करने को बेताब हो रही थी और गांव में वापस जाने पर अपने सम्भावित भविष्य को समझती थी। वह होठों में मुस्कराते हुए 'हां` कहकर आगे बढ़ गई थी। रात के तीन बजे, जब सब लोग बेखबर सो रहे थे, सुक्खी हलके से खांसा था और नरूजहां उठकर चुपचाप सुक्खी के साथ पाठशाला भवन के बाहर आ गई थी। सुक्खी ने रेलवे स्टेशन जाने का मार्ग पहले से ज्ञात कर रखा था। उजाला होने से पहले ही वे स्टेशन पहुंच गये थे और ट्रेन से पटना आ गये थे।
              सबेरे नूरजहां और सुक्खी के न मिलने पर इब्राहीम और उसके घर वालों ने बड़ा हंगामा मचाया और रमेसर के घरवालों से उसकी बड़ी गालीगलौज हुई। बात आगे बढ़ सकती थी परंतु बड़े बूढ़ों ने  बीच में  पड़कर किसी तरह मामला शांत किया और दोनों परिवारों को एक दूसरे से अलग रहने की हिदायत की। रिलीफ़ कैम्प के कुछ अन्य मुसलिमों ने यह खबर राजनैतिक नेताओं तक पहुंचा दी और दोपहर बाद कुछ तथाकथित 'सेकुरल` नेतागण अपनी पार्टी की ओर से राहत सामग्री बांटने के बहाने आ गये। इब्राहीम ने रोते हुए उनसे सुक्खी द्वारा अपनी बेटी को बहला फुसलाकर भगा ले जाने की शिकायत की और बेटी को वापस दिलाने की मांग की। अन्य मुस्लिमों ने भी उसकी हां में हां मिलाई और जोड़ा कि सुक्खी एक छटा बदमाश है और पहले भी गांव में नूरजहां के साथ छेड़खानी कर चुका है। कहावत है कि 'अंधे को क्या चाहिये- दो आंखें`। 'सेकरुलज्म़ि` के छद्म पर राजनीति करने वाले नेताओं, जिनके कुशासन के कारण उन्हें अल्पसंख्यक सहित समस्त जनता ने चुनाव में नकार दिया था, को अपने को अल्पसंख्यकों का हमदर्द साबित करने का इससे बढ़िया अवसर और कहां मिल सकता था? यहां बिना बुलाये ही भीड़ उपलब्ध थी और बाढ़ क्षेत्र की हर खब़र मीडिया चौबीसों घंटे प्रसारति करता था। अत: नेता जी वहीं खड़े होकर भाषण देने लगे,
              ''भाइयो और बहनों,
                       हम आवा तौ रहन तोहार हाल चाल जाने का और ई परलय मा तोहार मदद करै का, मुला हियां आइके पता चला कि इन आफत के दिनौं मां हमरे मुसलमान भाइअन की जिनगानी सरुक्षित नाहीं है। उनकी बहू, बिटिया का भगावा जाय रहा है। हम आपन जीते जी अल्पसंख्यकन पर बहुसंख्यक केर ई अत्याचार ना होय देब। हम सब अल्पसंख्यकन कौ बिस्वास दिलावा चाहित है कि नूरजहां बिटिया का बचावै के बाटे हम आपन जान कै बाजी लगाइ देब। हमार पूरी पार्टी ई लड़ाई मा तुमरे साथ है।.....................................``
               नेता जी अपना भाषण समाप्त कर दूसरे रिलीफ़ कैम्प के लिये रवाना हो गये, परंतु यहां इब्राहीम और दूसरे मुसलमानों का खू़न खौलने लगा था। इब्राहीम ने पहले रमेसर को गरियाना प्रारम्भ किया और उसके द्वारा चुपी साधे रहने पर उस पर स्वयं सुक्खी से मिलकर नूरजहां को भगवाने का आरोप लगाने लगा। रमेसर के प्रतिवाद करने पर और जवाबी गालियां देने पर दूसरे मुसलमान इब्राहीम के पक्ष में खड़े हो गये। यह स्थिति देखकर वहां उपस्थित हिंदू रमेसर का पक्ष लेने लगे। किसी मुस्लिम लड़के ने आवेश में आकर रमेसर की लड़की की साड़ी खींच ली। फिर क्या था- समस्त हिंदू और मुसलमानों में खुलकर मारपीट प्रारम्भ हो गई। इब्राहीम के सिर पर किसी ने ईंट से वार कर दिया और उसकी तत्क्षण मृत्यु हो गई। कैम्प पर पुलिस के दो सिपाही थे, जिन्होने दंगा रोकने का प्रयत्न किया, परंतु जब भीड़ उन्हीं पर टूट पड़ी और एक सिपाही का हाथ टूट गया तो वे अलग हो गये। एक दर्जन हिंदुओं और दस मुसलमानों को गम्भीर चोंटें आईं। काफ़ी देर बाद कस्बे से अतिरिक्त पुलिस के आने पर मारपीट रुकी। पुलिस ने दोनों पक्षों के सरगनाओं को पकड़कर उनका चालान कर दिया।
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अब मरछेहटा ग्राम में हिंदू मुस्लिम न तो एक साथ काम करते हैं और न साथ साथ उठते बैठते हैं। दोनों के बीच दुतरफ़ा मुकदमा चल रहा है। रमेसर और इब्राहीम के परिवारों के बीच तो जानी दुश्मनी है, परंतु सुक्खी और नूरजहां पटना में प्रेमपूर्वक विवाहित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उनके एक प्यारा सा बच्चा भी है। वे आज तक मरछेहटा जाने का साहस नहीं जुटा पाये हैं- हां, उन्हें एक क्षीण आशा अवश्य है कि उनके ग्राम के हिंदू और मुसलमान एक दिन स्वार्थी नेताओं  उन्मादी मौलवियों और पोंगा-पंडितो के चंगुल से बारह आकर अपने मस्तिष्क से सोचना प्रारम्भ कर देंगे, और तब वे अपने गांव जाकर अपने बच्चे को मामा-दादा का दुलार दिला सकेंगे। 

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                                                                                                                                                कहानी समकालीन


                                                                                                                                              -शैल अग्रवाल

                  कनुप्रिया

कनुप्रिया लड़की नहीं, एक पहाड़ी नदी थी। जब अपनी रौ में बहती तो सबको साथ बहा ले जाती। सबकुछ अपने में समेटे हुए फिर भी सबसे दूर। एक ऐसा पुराना बरगद का पेड़, जो जितना बाहर दिखता, उससे कहीं ज्यादा जमीन के भीतर था। जिसकी छाँव में थके लोग सहारा ले सकते थे और भूले भटके शान्ति और ठहराव। उसकी नित उठती शाखें पूरे तारे भरे आसमान को अपनी बाँहों में भरने की सामर्थ रखतीं। कनुप्रिया नाम कब और कैसे पड़ा याद नहीं, पर जब भी बच्चे उसे चिढ़ाते, कि उसका नाम " कन्नू-प्रिया " इसलिए है क्योंकि उसकी दोनों कँचे जैसी आँखें खेलते समय हरे, पीले, भूरे अलग-अलग रँगों में चमकती हैं, तो दादी अपना डँडा लेकर उस बानर सेना के पीछे पड़ जातीं। और फिर रोती हुई कनु को चुप कराते हुए कहतीं, जब मेरी लाडो को बँसीवाला खुद ब्याहने आएगा तो तू ही बता वह बस प्रिया कैसे हो सकती है --वह तो कनुप्रिया ही होगी न---अपने कान्हा की प्यारी।

                उम्र के बीस बसन्त निकाल दिए कनु ने इस बँसीवाले के इन्तजार में और फिर एक दिन अचानक ही उसकी शादी तय हो गई सुबोध से। सुबोध जो शादी करके तुरन्त ही इँगलैंड भी चले गये, बिना कनु को बताए ही, कि शादी क्यों की -  इँगलेंड जाना था इसलिए, या फिर उनका और कनु का जन्मों का नाता था, इसलिए?

                कनु अकेले में चुपचाप कभी कान्हा की तस्वीर के कानों पर स्टैथस्कोप सजा देती तो कभी सुबोध के होठों पर बाँसुरी। पर दोनों ही अटपटे से लगते और कनु के प्रश्न उत्तरों के बिना बिन ब्याहे ही रह जाते। 

वैसे भी कनु को प्रश्न पूछने की, चीजों को समझने की, कोई और न बताए तो रात दिन सोचने की, जब तक उत्तर खुद चलकर उसके पास न आ जाएँ, एक मजबूर सी आदत थी... बचपन से ही।

लोग मरते हैं तो कहाँ जाते हैं... फिर लौटकर क्यों नहीं आते...क्या कोई उन्हें पकड़कर कहीं बन्द कर देता है- वगैरह-वगैरह...?

                दादी से पूछो तो बस एक ही जबाब- सब उस नीली छतरी वाले साँवले सलोने की मर्जी है।

कनु का बड़ा मन करता उस मनमौजी भगवान से मिलने को। कैसे वह इतनी अपने मन की कर पाता है? कोई रोकता-टोकता नहीं क्या ? कनु को तो हर समय टोका जाता है- कनु यह मत करो, यहाँ मत जाओ, वहाँ मत बैठो। अच्छे बच्चों को यह नहीं करना चाहिए, वह नहीं करना चाहिए। परेशान कर दिया था कनु को अच्छे बच्चों वाली इन नसीहतों और छोटे-बड़ों के रोज-रोज के खेल ने। आखिर क्यो, कबतक लोग उसे बच्चा ही समझते रहेंगे? बड़ों से तो कोई नहीं कहता कि अच्छे बड़ों को भी हमेशा इतना डाँटते नहीं रहना चाहिए।

                कनु की इस हरदम सोचने और समझने की आदत ने बचपन से ही दादी को, पापा को, सबको बहुत परेशान कर रक्खा था। जब दादी बहुत परेशान हो जातीं तो कनु को पापा के पास भेज देतीं। अब दादी कोई इन्साइक्लोपीडिया तो थीं नहीं। वैसे भी , पाँच साल की कनु के आगे कब की हार मान चुकी थीं, वह।

                "दादी, दादी तुम कितनी बड़ी हो?"

                " पचपन की" दादी ने हँसकर बताया था ।

                "पचपन क्या होता है?"

                "पाँच और पाँच"

                "अच्छा ! तब तो तुम करीब करीब मेरी जितनी ही बड़ी हो-- तभी तो मेरी तुम्हारी इतनी अच्छी दोस्ती है।"

कनु को अब बात कुछ-कुछ समछ में आ रही थी।

                "मा तो हमलोगों से बहुत बड़ी हैं। है ना ? पूरी पच्चीस की! पर, तुम हर समय धूप में मत बैठी रहा करो।"

दादी के सूखती अमियों जैसे झुर्रियों वाले हाथों को सहलाते हुए कनु ने चिन्ता व्यक्त की। अब वह आश्वस्त थी कि अगले पाँच साल में वह भी दादी जितनी बड़ी हो जाएगी और फिर मम्मी-पापा, सब उसकी बातें सुना करेंगे। सुबह ही तो तीस तक की गिनती उसने मास्टरजी को सुनाई थी और उसने खूब अच्छी तरह से उँगलियों पर, कँचों के सँग गिनकर देख लिया है कि पच्चीस से तीस, बस पाँच वर्ष ही बड़ा है।

                अचार के लिए सुखाई अमियों को लेने आई मा ने भी यह सब सुना और रात को खूब हँस-हँसकर पापा को भी बताया। सुनकर तो पापा भी हँसे बिना नहीं रह सके। जोड़ घटाने में बिल्कुल तुम पर गई है तुम्हारी लाडली, मा को छेङते हुए पापा ने तब कहा था।

अगले दिन कनु ने मा को पकड़ लिया ---

                "मा, मा पूरा आसमान बस नीला ही क्यों है ?"

                मा ने जान छुड़ाने के लिए कह दिया क्योंकि भगवान जब आसमान बना रहे थे तो उनके पास बस एक नीला ही रँग था।

अचानक कनु की बहुत सारी समस्याओं का एक साथ ही समाधान हो गया। पानी और यह आसमान, क्यों  दिन में हलका नीला, रात में गहरा नीला --क्यों सबकुछ, चारो तरफ, हरदम बस वही एक रंग, नीला-नीला ही। भगवान ने तो जरूर नीला रँग ही खतम कर दिया होगा, तभी तो घास हरी बनानी पड़ी उन्हें। 


***

उँचे पहाड़, समुन्दर, बादलों पर छलाँग मारता, दौड़ता, कूदता, जहाज बड़ी कनु को उसके बड़े-बड़े प्रश्नों के साथ लेकर, आखिर इँगलैंड पहुँच ही गया। सद्यस्नाता की तरह नहाया धोया देश बड़ा ही मनमोहक लग रहा था। इसके माहौल में भी एक ठँडी सी दूरी, एक ताजगी थी बिल्कुल कनु के अपने स्वभाव की तरह। उसके मन की गरमी भी खुद-बखुद यूँ ही बाहर नहीं आ भभकती थी पर अगर उठ आए तो दरिया बन आसपास की हर चीज को नम करने की सामर्थ रखती थी।

       कनु की उत्सुक आँखें पूरा माहौल पी गर्इं--- सबकुछ कितना नया और अजनबी था--- पैरों की बैसाखी पर चलती वे अक्सर बेचैन होकर दौड़ जातीं लम्बे कौरिडोर के इसपार से उसपार तक, अपने सुबोध को ढूँड़ने के लिए। अचानक दो फैले हाथों ने उसे रोक दिया--

       "क्या मैं आपका सामान देख सकता हूँ?"

       "क्यों नहीं।"

       कनु ने खुद को इस अप्रत्याशित् हमले से बचाते हुए कहा और खुद ही यँत्रवत् वह भारी सूटकेस ऑफिसर के आगे रख दिया। पर उसकी चँचल आँखें उड़ती बयार-सी फिर से आसपास की हर चीज पर डोलने लगीं।

       "इसे खोलिये।"

       आवाज की जँजीरों में जकड़ी कनु पुन: धरातल पर आ गिरी।

इधर उधर ढूँड़ने के बाद आखिर पर्स के एक कोने में उसे चाभी मिल ही गई। कनु ने चाभी ताले में लगाई और घुमाने ही जा रही थी कि एक जाने पहचाने भय ने उसे आ घेरा। बस अभी चौबीस घँटे पहले की ही तो बात है जब पापा ने बारबार कपड़े निकालकर, बारबार तह करके, बारबार गिन-सम्भालकर, फिर भैया को उसपर बिठाकर, बड़ी मुश्किल से यह अटैची बन्द की थी--- वह भी इस हिदायत के साथ कि अब इसे घर जाकर ही खोलना। ऑफिसर की आँखों में देखने के लिए अपनी लम्बी गर्दन बहुत लम्बी खींचकर, एड़ियों पर उचकती, कुछ शरमाती कुछ सकुचाती, छोटी सी कनु ने कहा--

       " मैं इसे खोल तो दूँगी पर वायदा कीजिए आप इसे बन्द कर देंगे क्योंकि असल में न तो मुझे अटैची लगानी आती है और ना ही बन्द करनी। इतनी ज्यादा भरी हुयी तो बिल्कुल ही नहीं। "

       वयस्क कपड़ों में लदी फँदी उस बालिका पर ऑफिसर को तरस आ गया।

       "चलो रहने दो, बस इतना बताओ, इसमें कोई ड्रग वगैरह या कोई और अवैध सामान तो नहीं है।"

       "नहीं।"

       कनु ने बड़ी राहत और इत्मिनान के साथ जबाब दिया।

       " तुम्हारा जहाज कहाँ-कहाँ रुका था?"

       "बस जैनेवा में।"

       बेहद अनमने मन से वह बोली। उसे बाहर जाने की जल्दी थी। सुबोध पता नहीं कितनी देर से उसका इन्तजार कर रहे होंगे। और देर से पहुँचना कनु की आदत नहीं थी। पापा कहते थे कि अगर तुम समय की कद्र करोगे तो समय तुम्हे इज्जत देगा।

       "तुमने वहाँ घड़ी वगैरह नहीं खरीदी?"

       ऑफिसर ने फिर से पूछा। अब कनु को विश्वास हो चला था कि यह ऑफिसर निश्चय ही कुछ खिसका हुआ है।

       "नहीं बाबा, सिर्फ तीन ही पौंड तो हैं मेरे पास। तुम्ही बताओ इनमें कोई घड़ी वगैरह कैसे खरीदी जा सकती है?"

कनु ने प्रश्न पर प्रश्न पूछा?

       "तुम्हारी अपनी घड़ी कहाँ है या घड़ी नहीं लगातीं?"

       कनु का ध्यान अपने हाथ पर गया। घड़ी वाकई वहाँ पर नहीं थी। उसने जरूर उतारकर जेब में रख दी होगी। जेब में हाथ डाला निश्चय ही घड़ी वहाँ नहीं थी। दूसरी जेब में हाथ डाला। घड़ी वहाँ भी नहीं थी। जमीन पर पड़े सैंडविच बौक्स को उठाया। उसमें आधी खाई सैंडविच के साथ नई नवेली दुल्हन के सारे गहने तो पड़े हुए थे पर घड़ी कहीं नहीं थी।

परेशान कनु ऑफिसर से बोली,

       "मेरी कोई भी चीज कभी नहीं खोती। यहीं कहीं होगी, अपने आप मिल जायेगी।"

       ऑफिसर उसकी अबोध लापरवाही से थोड़ा घबरा गया था।

       "क्या यह सब असली हैं?"

       "मैं नकली गहने नहीं पहनती। असल में तो मैं कैसे भी गहने नहीं पहनती।"

       "तुमने क्या यह सब पासपोर्ट पर लिखवाये हैं?"

उसने थोड़ा चिन्तित होकर फिर पूछा?

       "आप ही लिख दीजिए न। पर, प्लीज सम्भालकर। कुछ गिराइयेगा नहीं। सब आपस में बेहद उलझ गये हैं।"

       खुला हुआ डिब्बा उसकी तरफ बढ़ाती, कनु बोली। अब ऑफिसर वाकई में डर गया था।

         "नहीं, नहीं, रहने दो, तुम जा सकती हो।"

       उसने डिब्बा बन्द किया, कनुप्रिया को दिया और उसकी अटैची उठाते हुए उसके साथ बाहर आ पहुँचा।

       "तुम पहली बार अकेली आई हो न।"

       "हाँ।"

       "किससे मिलने आई हो ?"

       "अपने पति से। अब हम यहीं रहेंगे, जबतक वह यहाँ से कोई अच्छी सी डिग्री न ले लें और फिर उसके बाद हम पूरा योरोप, अमेरिका वगैरह सब घूमने जायेंगे।" कनु की आवाज में बच्चों जैसा उत्साह था।

       "अच्छा, अच्छा "

       उसकी स्वप्न-श्रँखला को बीच में ही तोड़ता हुआ ऑफिसर बोला,

       "तुम अपने पति को पहचान तो सकती हो न?"

       कनु की आँखों मे आश्चर्य, अविश्वास और उपहास की ज्वाला एक साथ कौंधी और ऑफिसर डरकर तीन कदम पीछे हट गया।

       "क्यों नहीं।"

       "तुम इससे ज्यादा और कुछ नहीं बोलतीं क्या?"

       दोस्ती का हाथ बढाते हुए उसने कनुप्रिया की तरफ देखा।

       पर कनु की आँखें तो अब बस सुबोध को जल्दी से ढूँढ लेना चाहती थीं।

       ऑफिसर ने अटैची बाहर बरामदे में रखी और जाने के लिए मुड़ गया। वह समझ गया था कि यहाँ दुर्घटना तो हो सकती थी पर कोई गड़बड़ घोटाला नहीं। कनुप्रिया की आँखों में एक क्रान्तिकारी सा, एक योगी सा, एक अबोध शिशु सा, सच्चाई का अथाह सागर जो लहरा रहा था।  कनुप्रिया की आँखों की वह दीवानगी, वह कुछ कर गुजरने की ललक ऑफिसर को अच्छी लगी।

       "बेस्ट ऑफ लक।" वह मुस्कुराकर जाते-जाते, पलटकर बोला।

       अब कनु के आगे एक सीमेंट और कौंक्रीट का घना जँगल था। लोग बेतहाशा इधर से उधर भागे जा रहे थे। हजारों आवाजें चारों तरफ परिन्दों सी उड़ रही थीं। कनु को सबकुछ दिखाई दे रहा था, सुनाई दे रहा था, सिवाय सुबोध के। सुबोध, जिसके लिए कनु, उनकी पत्नी कनु, अकेली यहाँतक आ पहुँची थी, उसी सुबोध का दूर-दूरतक कहीं, कोई पता नहीं था।

कैसे करे, क्या करे, कनु की समझ में कुछ नहीं आ रहा था।

       "कहाँ जाना है बहन?"

       पूछते हुए अचानक किसी ने उसकी पीठ पर हाथ रख दिया।

इस अप्रत्यासित सहानभूति से कनु तृप्त भी हुयी और घबराई भी। कौन सा एहसास ज्यादा मजबूत था कहना मुश्किल है।

       "मैंसफील्ड।"

       "मैं रग्बी जा रहा हूँ। चलो तुम्हें मैंसफील्ड छोड़ दूँगा। ज्यादा दूर नहीं है।"

       "नहीं, नहीं, इसकी जरूरत नहीं। यह आ ही रहे होंगे।"

       कनु की आवाज सहज और मीठी थी। उस अजनबी के अपनेपन ने कनुप्रिया के मन को छू लिया था।

       "तुम फोन क्यों नहीं कर लेतीं कि भाई वहाँ से चला भी है या नहीं।"

       "आप ठीक कहते हो।"

       कनु ने नम्बर जेब से निकाला और उसी के साथ रक्खा वह तीन पौंड में से एक पौंड का सिक्का भी।

       "आप ही इसे तोड़कर चेन्ज दे दीजिए।"

       सह्मदय सरदारजी को उसपर बहुत दया आ रही थी शायद उनकी अपनी बहन इसी उम्र की अबोध और नासमझ थी।

       "अपनी जेब में सम्भालकर रख इसे बहना। पराए मुल्क में अकेली खड़ी है तू।"

       कनुप्रिया की आँखें भर आईं--- पर, उसे किसीका एहसान लेना कभी अच्छा नहीं लगा--विशेशत: स्नेह और सहानुभूति का तो हरगिज ही नहीं। क्योंकि एक यही ऐसा कर्ज था जिसे उतारने में वह स्वयँ को, सदैव ही, असमर्थ और असहाय पाती थी। पर आज उस जन्मों के बिछड़े भाई ने उसे ऋणी कर ही दिया था।

       उस अपरिचित की आवाज में इतना प्यार---इतनी परवाह और इतना आग्रह था कि कनु चाहकर भी मना कर ही न सकी।

       दस पैनी का वह सिक्का कब उसकी हथेली पर आया, कब वह टेलीफोन बूथ की तरफ घूमी, कब उसने नम्बर घुमाया, कनु को कुछ पता  नहीं चला-----दूसरी तरफ से आवाज आरही थी कि डॉ0 सुबोध तो आज छुट्टी पर हैं और अपने किसी व्यक्तिगत काम से लँदन गए हुए हैं। कनु ने आश्वस्त होकर फोन रख दिया। देर-सबेर सही, उसका बँसीवाला उसे लेने आ ही रहा था---     

 

फोन रखते ही उसकी आँखें धन्यवाद देने के लिये उस फरिश्ते भाई को ढूँढने लगीं पर फरिश्ते कब जमीन पर ज्यादा देरतक टिकते हैं ? चेहरों की रेलपेल में वह नव-परिचित चेहरा कबका गुम हो चुका था।

       कनु ने एक लम्बे इन्तजार के लिए पास पड़ी बेन्च पर खुदको व्यवस्थित कर लिया। अभी मुश्किल से दो ही पल बीते होंगे कि सामने से आते हुए, मुस्कुराते नवयुवक ने झुकककर उसे विनम्र नमस्कार किया--

       "आपने मुझे पहचाना ? बताइये तो भला मैं कौन हूँ ?" नवाँगुत नौजवान बारबार पूछे जा रहा था।

       कनु की आश्चर्य-चकित् आँखें इस मिलनसार देश की एक भी बात नहीं समझ पा रही थीं। पहले सह्रदय सरदार जी, अब पहेलियाँ बुझाता यह अपरिचित--- अचानक स्मृति की बिजली कौंधी, धुन्ध के बादल हटे और सुबोध के चचेरे भाइयों के चेहरे एक-के-बाद-एक बरसाती बूँदों से उसकी आँखों के आगे टपकने लगे---

       "ध्रुव भैया" विस्मित कनु ने मुस्कुराते हुए कहा।

       " अरे भाभी, आपने तो मुझे पहले कभी देखा ही नहीं था, फिर कैसे पहचान लिया?" लुका-छिपी के इस खेल में अब कनु को भी आनन्द आ रहा था।

       " मेरे पास एक जादू का चश्मा जो है।"

इसके पहले कि कनु का वाक्य पूरा हो दोनों ही खुलकर हँस पड़े।

       "और, जनाब कहाँ छुपे हुए हैं?" कनु ने इधर-उधर सुबोध को ढूँढते हुए पूछा---

       ध्रुव भैया के कुछ कहने के पहले ही सामने वाली दीवार के पीछे से सुबोध निकल आए फिर तो बस एक, दो, तीन, चार, पाँच क्या पूरे बीस-पच्चीस लोगों का ताँता एक साथ ही लग गया—एक-के-बाद-एक।

       "स्वागतम् भाभी"

       "वैलकम होम कनुप्रिया"

       कनु को समझ में नहीं आ रहा था इस प्यार और स्वागत का, इस अपनेपन का कैसे जबाब दे।

       "धन्यवाद" "धन्यवाद"

       मारे आभार के वह दुहरी हुई जा रही थी।

       अचानक एक सख्त सा चेहरा अपने लम्बे-चौड़े शरीर सहित, ठीक उसके आगे आकर खड़ा हो गया।

       " मैं तुम्हारा जेठ हूँ और यह तुम्हारी जेठानी।"

       "हमारे पैर छुओ।"

       कनु की हँसती तरल आँखों में विद्रोह तैर आया। पहले जेठ वाला प्यार और व्यवहार तो करो फिर यह अधिकार मैं स्वयँ ही दे दूँगी। अभी के लिए बस परिचय की नमस्ते ही काफी है। जुड़े हुए हाथों के सँग दँपति के तरफ देखती विनम्र कनु, कुछ कह नहीं पाई।

सामान कब और किस कार में गया कनु को पता नहीं, हाँ उसने खुद को जरूर एक कार में सुबोध और कथित जेठ-जिठानी के सँग पाया। ध्रुव भैया स्टीयरिंग पर थे जिससे लग रहा था कार उन्ही की थी।

       "तो तुमने साहित्य पढ़ा है?" रोबीली आवाज कनु का इन्टरव्यू ले रही थी।

       "जी, कोशिश की है।"

       "शेक्सपियर के कौन-कौन से नाटक पढ़े हैं?"

       इस शब्द का उच्चारण क्या होगा-- वगैरह-वगैरह जैसे निरर्थक शब्द, इधर से उधर मुड़ती, स्क्रीच करती कार की तरह, हर दिशा से आकर बारबार कनु के कानों से टकरा रहे थे—अनचाही और कर्कश आवाजें कर रहे थे। थकी कनु पर तरस खाकर नींद ने आगे बढ़कर झट से उसे अपने आँचल में छुपा लिया।

       एक भी जबाब न मिलता देखकर आखिर में खिसयाये जेठजी ने अपनी बन्दूक सुबोध पर तान दी--" यह किस बच्ची को उठा लाए हो ?"

अगली सुबह चहल-पहल भरी थी। घर मेहमानों से खचाखच भरा हुआ था, सिवाय उस कमरे के जिसमें कनु सोई थी। उसने तो अभी अपने घर का एक कोना तक ठीक से नहीं देखा था।

       "सोईं आराम से ?" सुबोध ने गुसलखाने से सर निकालकर, अधसोई पत्नी से प्यार से पूछा--

       " नाश्ते में क्या लोगी ?"

       "मैं बनाती हूँ " ज्यादा सो लेने पर कुछ शर्मिन्दगी के साथ कनु बोली।

       "नहीं-नहीं थोड़ा आराम और कर लो, अभी तो सिर्फ साढ़े छह ही बजे हैं। मुझे जरा अस्पताल एक राउन्ड के लिए जाना पड़ेगा। कपड़े सब मैने वाशिंग मशीन में धो दिए हैं। तुम बस सबके लिए थोड़ी खिचड़ी बना लेना। सारा सामान, मसाले वगैरह सब वहीं चौके में ही रक्खे हैं। " 

       कनु बिजली की तरह बिस्तर से निकली और दो ही मिनट में कपड़े बदलकर चौके में थी। वहाँ चाय का दौर चल रहा था। अनगिनित देवर और जेठों में से किसी एक ने खिचड़ी चढ़ा भी दी थी। सबकुछ जल्दी-जल्दी निपट रहा था। शेरवुड फौरेस्ट घूमने जाना था। इतने सारे छड़ों के बीच एक भी देवरानी नहीं थी। हाँ एक जिठानी जरूर थीं और कनु को जिठानियों से बहुत डर लगता था। हिन्दुस्तान में वह कई जिठानियों से मिल जो चुकी थी।

‘ रँग थोड़ा साँवला है। कद थोड़ा लम्बा है। उठने बैठने का कोई शऊर नहीं। अभी बच्ची ही तो है, दब ढककर चार दिन ससुराल में रहेगी तो सब सीख जाएगी--- खुद ही खिल जाएगी-- वगैरह-वगैरह—‘ जैसी टीका-टिप्पड़ियों के बिना खाने की कौन कहे, इनका तो पानी तक नहीं पचता। वैसे भी दूरबीन के नीचे रक्खे कीड़े की तरह औब्जर्वेशन में रहना कनु को कभी अच्छा नहीं लगा, वह चुपचाप अपने कमरे में वापस लौट आई।

धीरे से वाशिंग मशीन खोली कपड़े सुखाने के लिए तो इस विदेश की धरती पर पहली आहुति, उसकी प्रिय छह साढ़े छह गज की काँजीवरम् की साड़ी आधुनिक तकनीकियों से कोप न कर पाने की वजह से मारे शरम के डेढ़ गज की होकर कोने में मुँह छुपाए बैठी थी। कनु की लाख कोशिशों के बावजूद भी साड़ी का सिकुड़ा-सिमटा अस्तित्व अपने पूर्ण निखार पर वापस कभी नहीं आ पाया।

       कनु प्रिया जग गई। ऐसे नहीं चलेगा। चार्ज उसे स्वयँ लेना पड़ेगा। गीले बालों को तौलिये से सुखाकर बाहर आई तो सारी आँखें उसी पर ही थीं। अपने बालों का जादू कनु जानती थी, पर उस स्तँभित मौन से तो वह कुछ ज्यादा ही शरमा गई --विचलित हो उठी। और लड़खड़ाती कनु ने नमस्कार कहकर एक बन्द अलमारी का पट यूँही खोल डाला। अनायास ही कुछ ढूँड़ने लगी। तभी अचानक कथित जेठजी पीछे से आकर कानों में फुसफुसाए--

       " इन बालों को यूँ ही खुला रक्खा करो। कितनी सुन्दर लगती हो ऐसे-- खाम्खाह ही इन्हे जूड़े और चोटी में बाँधे रहती हो।"

       कनु मुड़ी और बिना कुछ बोले, कमर पर मनमानी कर रहे बालों को कसकर जूड़े में बाँध दिया।

अगली सुबह खुशनुमा थी। इँगलैंड का रूप अपने यौवन पर था। चारो तरफ गुलाब की कतारें महक रही थीं। बिजी-लिजी और पुटैनिया से सजी सँवरी, वराँडे में लटकी हैंगिंग बास्केट्स खुद अपने ही फूलों के बोझ से जमीन तक लटकी जा रही थीं और हराभरा लॉन कमरे के कालीन से भी ज्यादा गुदगुदा और खुशनुमा लग रहा था। कनु का मन किया प्याली बाहर ले जाए। ओस से नहाए। हरी-हरी घास पर नँगे पैर दौड़े। लुढ़के, पुड़के और फिर वहीं बादलों को ओढ़कर सो जाए।वैसे भी कनु करे भी तो क्या करे? मेहमान अपने-अपने घर जा चुके थे और सब सामान अपनी-अपनी जगह पर।

       अस्पताल के सिटिंगरूम में अप्रवासी भारतियों का झुँड एशियन प्रोग्राम देखने के लिए आतुर बैठा था। कनु की उत्सुक आँखें भी स्क्रीन पर जा अटकीं। बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था "अपना ही घर समझिए"। कनु के गले में पत्थर अटक गया और आँखें धुँधली हो आईं। यह, और अपना घर ? एक भी तो पहचानी शकल नहीं है यहाँ पर। उदासी के बादलों ने उसे चारो तरफ से आ घेरा। अपने घर में तो मा, दादी, काकी, भैया, पापा सब होते हैं। कैसे मान ले इसे वह अपना घर? इस अकेले घर में तो दूर तक अक्सर कोई आवाज भी नहीं आती। कभी-कभी तो इतना सन्नाटा रहता है कि फोन पर बात करते समय खुद अपनी ही आवाज अनजानी सी लगने लगती है। डबडबाई आँखों को कनु सबकी नजर बचाकर पोंछने लगी पर कनु को क्या पता था कि काफी देर से कोई उसे देख रहा था, पढ़ रहा था---

       "मैं आतिया शरीफ हूँ। मेरे पति इसी अस्पताल में काम करते हैं। मैं आई थी तो मुझे भी तुम्हारी तरह बहुत अकेला-अकेला लगा था। शाम को घर आना। गपशप करेंगे। कुछ अपनी कहेंगे, कुछ तुम्हारी सुनेंगे। तुम चाहो तो मुझे आपा भी कह सकती हो वैसे भी तुम मेरी छोटी बहन आनिया की तरह ही लगती हो, बिना बाजी के बात-बातपर रो पड़ने वाली, आनिया।"

       बाजी की प्यार भरी गुदगुदी से कनु के सारे आँसू खिलखिला पड़े और अगले दिन ही वह दौड़कर उनके यहाँ जा पहुँची।

प्यारी-प्यारी रोटी-दाल की महक ने कनु की रूठी भूख को वापस बुला लिया। आपा ने कनु को जी भरकर प्यार दिया और साथ में दीं जी भरकर हिदायतें। पास के ग्रोसरी वाले का पता और नम्बर। पोटैटो पीलर, श्रेडर, बेलन और न जाने क्या-क्या? कनु को पहली बार लगा कि वह वाकई में वह कनुप्रिया है तभी तो बँसीवाले ने अपने आप ही बहन को भी उसके पास भेज दिया।

       "मैं खुद चलते-फिरते तुम्हारे हाल-चाल लेती रहूँगी। फोन भी करूँगी और ऐसे ही टपक भी पड़ूँगी।"

       "जरूर बाजी।" कनु ने गद्गद् होकर कहा था। और फिर वह सच में टपक ही तो पड़ी थीं, वह भी अगली सुबह ही। कनु सुदामा की तरह बौखला गई थी, कहाँ बिठाए, क्या खिलाए?

       "आप चाय पिएँगी या कॉफी? ठँडी या गरम?"

       "अरे बाबा जरा बैठने तो दो।"  बाजी हँसकर बोलीं थीं, "चलो चाय पी लेते हैं।"

कनु के पैरों मे पँख लग गए, दौड़कर कैटल रख आई। उसकी बच्चों जैसी विस्मित आँखों में जोशीला कौतुक था। अपनी बाजी के बारे में वह सबकुछ जान लेना चाहती थी--- अच्छा तो आप लाहौर से हैं। हम अजमेर से। अजमेर और लाहौर की बातें करते-करते कैसे पूरे चार घँटे निकल गए दोनों में से किसीको कुछ पता ही नहीं चला। "अब तो भई, चाय पिला ही दो।" अचानक बाजी बोलीं।

       "अरे राम मेरी कैटल" कनु को मानो करैंट लग गया। वह तीर की तरह किचन में पहुँची। कैतली के नाम पर बस एक प्लास्टिक का हैंडल कनु का बड़ी दयनीयता और बेबसी से इन्तजार कर रहा था। कनु की आँखों में चमक आ गई-- इतना सुन्दर चमचमाता रँग। उसके अँदर का कलाकार सबकुछ भूलकर, पास पड़ी ट्रे और चाकू उठाकर तल्लीन हो गया। पीछे खड़ी बाजी मँत्र-विमुग्ध सी देख रही थीं। एक सधे कलाकार के हाथों सज-सँवरकर ट्रे पर दो सूरजमुखी के फूल बड़ी नजाकत से मुस्कुरा उठे। बाजी ने छोटी बहन को गले लगा लिया। उसका माथा चूमा और कहा-"तुम सच में बहुत अच्छी हो, कनु। बहुत ही प्यारी। चलो मैं अब तुम्हें चाय पिलाती हूँ।"

       "नहीं चाय तो मैं ही बनाउँगी" कनु ने कुछ शरमाते, कुछ झेंपते हुए कहा और दोनों बहनें खिलखिलाकर फिर हँस पड़ीं।


***

       महीने दिनों में बीत रहे थे। गुनगुनी सुबह को कनु चाय के सँग चुस्कियों में पी रही थी।

       "मैं आज की नहीं भविष्य की बात कर रहा हूँ। एम.ए. हो। कोई नौकरी कर सकती हो। तस्वीरें बनाकर बेच सकती हो। सुबोध को थोड़ी आर्थिक मदद मिल जाएगी। तुम्हारे आने से खर्चे बढ़े हैं। कल को घर ग्रहस्थी भी बढ़ेगी। एक तनख्वाह में कैसे गुजर होगी? तुम्हें खुद ही सोचना और समझना चाहिए, यह सब। पढ़ी-लिखी हो। शादी का अर्थ सिर्फ पति के साथ सोना और मस्ती करना ही तो नहीं होता।"

नँगे शब्दों की मार कनु के कान, गाल सब लाल कर गई। समझ नहीं पा रही थी कि वह क्या सुन रही है-- क्यों सुन रही है ? कल ही की सी तो बात है जब अपनी नयी जिन्दगी की शुरुआत करते हुए उसने और सुबोध ने दोस्त बनकर कसमें खायी थीं--- हर समस्या, हर उलझन और परेशानी को मिल-जुलकर समझने, सुलझाने और सहने के वादे किए थे। क्या यही मिलाजुला प्रयास है कि अपने घर का नँगा हालचाल दूसरे आकर सुनाएँ। कनु के प्रयास में तो कभी दूसरों के काम के लिए भी कमी नहीं आई। फिर उसके अपने सुबोध ने कैसे उसे इस लायक भी नहीं समझा। शर्म और ग्लानि से वह जमीन में धँसी जा रही थी बस जमीन ही नहीं फट पा रही थी। विवेक और सँतुलन ढूँड़ती, सामान्य रहने के प्रयास में वह सहज होकर बोली---

       "आप हमारे मेहमान हैं। बैठक और मेहमान घर के दरवाजे आपके लिए सदैव ही खुले रहेंगे पर दया करके, उसके आगे, मेरे शयनकक्ष और स्नान-गृह में झाँकने की कोशिश कभी मत करिएगा। क्योंकि यह न सिर्फ शिष्टाचार के विरुद्ध है वरन् अभद्रता भी है। उन बन्द दरवाजों के पीछे क्या होता है वह हमारा निजी मामला है।"

       इतना दँभ? इतनी दृढ़ता? वह भी एक अबोध सी लगती बालिका में? जेठजी आश्चर्य-चकित थे-- पूरी तरह से बौखला गए थे, वे--

       "बातको ज्यादा गँभीरता से मत लो। मैने तो बस ऐसे ही वार्तालाप को चालू रखने के लिए यह सबकुछ कह दिया था। तुम काम करो या न करो, इससे मुझे कोई फरक नहीं पड़ता--वैसे भी मैं तुमसे ग्यारह-बारह साल तो उम्र में बड़ा हूँ ही। और यह सुबोध वगैरह तो सब मेरे चेले-चपाटे रहे हैं। हमेशा मेरे कहे अनुसार ही चले हैं। ऐसे तो मुझसे आजतक किसी ने भी बात नहीं की।"

स्वस्थापित जेठजी ने इधर-उधर हवा में हाथ फेंकते हुए कहा।

       अचानक कनु सबकुछ जान गई-- समझ गई। सामने बैठे व्यक्ति का हकलाता हलकापन। परिस्थिति की अनर्थ-अर्थहीनता। घटनाओं की मनगढ़ँत उपज और अदृश्य तमाचों की चुनचुनाती तिलमिलाहट। उसके अपने सुबोध तो इस अहँ और नियँत्रण के ताने-बाने में कहीं थे ही नहीं और फिर गैरों से कैसी नाराजगी? क्योंकि नाराज भी तो बस उसी से हुआ जा सकता है जिसके साथ कोई राज हो, जो अपना हो।

       "आप और चाय पिएँगे? लीजिए तबतक यह अखबार पढ़िए।"

       तुरन्त आए अखबार को उन्हें पकङाकर कनु उठ खड़ी हुई। इस एक ही घटना ने उसे हमेशा के लिए वयस्क और जिम्मेदार बना दिया था। गृहिणी के दायित्वों से अवगत् करा दिया था। कौवे, गिद्ध और चूहे किस गृहस्थी में यदा-कदा नहीं घुस जाते? पूरा घर साफ करना होगा। हर जाले को तोड़ना होगा। गन्दी धूल को हटाना होगा और सेंधे भरनी होंगी।

दरवाजे पर दस्तक थी, लगता है कोई आया है। सामने बाजी की नन्ही नताशा सजी-धजी खड़ी थी। हरी फ्रॉक और गहरे काले बालों में हरे रिबन के बीच उसका मुस्कुराता गुलाबी चेहरा बिल्कुल ताजे गुलाब सा खिल रहा था।

       "मौसी-मौसी यह बादल नीला ही क्यों होता है। बताओ न, आप तो आर्टिस्ट हो?"

       लगता है भगवान के पास रँग ही नहीं, मिट्टी भी एक ही तरह की बची थी। या शायद उसे कनु और नताशा जैसे इन्सान बनाना पसन्द हैं। नीला रँग पसँद है। बात रँग की नहीं, रस की ही तो होती है। जो बात गौतम बुद्ध को घर छोड़कर समझ में आई थी, कनु को घर में रहकर समझ में आ गई। नीला कृष्ण-कन्हैया बाँसुरी के सँग और उसके सुबोध स्टैथस्कोप के सँग, दोनों ही अच्छे लगे कनु को आज।

कनु खिलखिलाकर हँस पड़ी---

       "क्योंकि मेरी गुड़िया रानी, भगवान को नीला रँग अच्छा लगता है। आसमान नीला हो या पीला, कोई फरक नहीं पड़ता। बस आदमी को खुश रहना चाहिए।"

"तो मैं अपने आकाश को हरा रँग लूँ ", नन्ही नताशा ने अविश्वाश और बालसुलभ कौतुक से पूछा?

       "क्यों नहीं" कनु ने प्यार से निशू की तरफ देखते हुए उत्तर दिया।

     हरे आकाश की कल्पना मात्र से नन्ही निशू हँस-हँसकर दोहरी हुई जा रही थी और कनु ने आगे बढ़कर उसे गोदी में उठा लिया।

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                                                                                                                                                         दो लघुकथाएँ


                                                                                                                                                   - संजय जगनाल

कहीं खुशी, कहीं गम़!

पार्टी की तरफ से राष्ट्रीय स्तर पर हुए सम्मेलन में जब सब खर्चों को जोड़ा गया तो पता चला कि करीब १५ करोड़ रुपये खर्चा आया है। पार्टी आलाकमान, नेता, समाज सेवक, गरीबों के हितेषी सभी खुश थे कि सम्मेलन शांतिपूर्वक हो गया और पार्टी के प्रचार के साथ-साथ हमारा भी प्रचार हो गया। सभी एक दूसरे को बधाईयां दे रहे थे।
सरकार ने भी सम्मेलन में हुए खर्चों की तरफ ध्यान नहीं दिया क्योंकि मामला पार्टी से जुड़ा था।
छोटे-मोटे नेता भी खुश थे क्योंकि पहली बार उन्हें भी अपनी बात कहने का मौका दिया गया था।
भिखारी भी खुश थे क्योंकि उन्हें भाषण के बाद तरह-तरह के व्यंजन जो परोसे गये थे।
दुखी तो सिर्फ वो लोग थे जिन्हें पता था कि इस खर्चे का भार भी हम पर ही पड़ने वाला है।











***







सूझ-बूझ

मैट्रिक पास टीना इसी बात से चिंतित रहती थी कि पति बेचारे रात-दिन मेहनत करते हैं लेकिन घर की स्थिति में कोई सुधार नहीं हो रहा। आज के समय में मजदूरी करके दो बच्चों का पालन-पोषण और बूढ़े सास-ससुर की जिम्मेदारी निभाना बहुत मुश्किल है।
 अगले दिन टीना ने अपने पति के सामने स्वयं के नौकरी करने की इच्छा रखी। पति ने कहा मुझे कोई एतराज नहीं है लेकिन माता-पिता........? राधा ने हिम्मत करके यहीं बात अपने सास-ससुर के सामने रखी। उसके ससुर ने गुस्से में कहा "हमारी सात पीढ़ियों में आज तक किसी औरत ने नौकरी नहीं की। अब आज हमारी बहु नौकरी करेगी तो समाज में हमारी क्या इज्जत रह जाएगी ?"
 सास भी गुस्से में बोली "तेरी अक्ल ने भांग तो नहीं खाई है ?"
 राधा को एक तरकीब सुझी। उसने चुपके से एक पार्ट-टाइम नौकरी पता कर ली और रोज माँ से मिलने के बहाने नौकरी पर जाने लगी।
 कुछ समय बाद दिनों-दिन घर की हालत और बिगड़ने लगी। पैसे-पैसे के मोहताज हो गये। इस परिस्थिति को देखते हुए राधा ने अपने पास जमा सारी पूंजी अपने ससुर को सौंप दी। ऐसी सूझ-बूझ को देखकर पूरा परिवार स्तब्ध था।

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                                                                                                                                                             संस्मरण


                                                                                                                                                       -दिनेश ध्यानी

    जीवन की सार्थकता

कल सुबह से शुरू हुई बारिश ने पूरी रात रूकने का नाम नही लिया, और अब भी सुबह से रूक-रूक कर बारिश हो रही है। कई साल बाद इस तरह की बारिश देखने को मिली है। सच कहूँ तो जब से रोटी रोजी की खातिर बाहर गया हूँ शायद ही किसी बरसात के सीजन में गांव आना हुआ हो। एक बार जब माता जी की बरसी थी, तब सर्दियों में जनवरी २००५ में गांव आना हुआ था। धुमाकोट से लेकर गांव तक पूरी सड़क बर्फ से ढ़की हुई थी। बच्चों की तो जैसे लॉटरी ही निकल पड़ी। उन्होंने शायद पहली बार इन पहाड़ों में इतनी बर्फ देखी है। संराईखेत में जेसे ही बस रूकी बच्चे नीचे उतर पड़े और बर्फ में खेलने लगे। शायद एक या दो दिन पहले की बर्फ अभी भी नही पिघली थी। उस दिन आसमान साफ था मैंने बच्चों को सामने हिमालय पर्वत की चोटियां दिखायीं तो उनकी बांछें ही खिल गईं।
पहाड़ की जिन्दगी का अपना ही अलग मजा है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि पहाड़ में आदमी कभी भी बोर नही हो सकता है। बर्शते आपको इन पहाड़ों से प्यार हो। जब से होश संभाला अपने घर के सामने सिलडपाख के पहाड़ को रोज देखता लेकिन हर दिन उसमें कुछ नयापन दिखता और उसे और देखने की लालसा ही बनी रहती। गर्मियों के दिनों में रात को जून लगी होती थी। हम अपने घर के आंगन में चारपाई ड़ालकर सोते थे। चांदनी रात में सिलड़पाख की छटो देखने लायक होती थी। आसमान में  चॉंदनी और सामने पहाड़ पर चकोर की टोलियों का मधुर संगीत मन को आड़ोलित कर देता था। नीचे मधुर स्वर में बहती क्यूंपणी रौल का गधेरा मानो स्वर्ग यहीं मेरे घर के आंगन में उतर आ गया हो। कभी कभी रात को बाघ के घूरने की आवाज भी सुनाई देती थी। बहुत ही रमणीक माहौल हुआ करता था तब। पूरे गांव में हर चौक में कोई न कोई बाहर खाट लगाकर सोते थे।
रात से याद आया एक बार जब मैं बारहवीं में पढ़ता था मेरे चचेरे भाई राम प्रसाद ध्यानी गांव में रहते थे उनका घर सब घरों से अलग पहाड़ी पर था। अक्सर मैं उनके साथ रामलीला की रिहरसल के लिए हमारे गांव से मात्र तीन या चार किलोमीटर दूर मुस्याखांद जाता था। रात को  हम अपने गांव से खाना खाकर मुस्याखांद जाते थे। अक्टूबर का समय था खेतों में मुडुवा और झंगोरा की फसल खड़ी थी। इन दिनों रीछ फसल खाने आया करता था इसलिए हम दोनों हाथ में टार्च और ड़ंडा साथ रखते थे। यह हमारा रोज का रास्ता था इसलिए किसी प्रकार की चिन्ता नही थी। लेकिन एक दिन रात में जब हम मुस्याखांद से वापस आ रहे थे यह रात का लगभग ग्यारह साढ़े ग्यारह बजे का समय होगा। तो हमें खेत में कुछ सरसराहट सुनाई दी। हम दोनों आवाज की दिशा ढूढ़ने लगे कि क्या है और कहां है। हम खुशफुसाहट कर ही रहे थे कि हमारे सामने अचानक एक काली छाया खड़ी हो गई। हमें समझते देर नही लगी कि यह रीछ ही होगा। हम जानते थे कि रीछ के लिए नीचे की ओर दौड़ना चाहिए। हमने आव देखा न ताव और दोनों नीचे खेतों में छंलाग लगाते हुए नीचे नदी के किनारे पहुँच गये। इस दौरान चोट लगी या नही कहां क्या हुआ कुछ पता नही हम तो बस दौड़ ही जा रहे थे। उस दिन हमने भागकर अपनी जान बचाई लेकिन उसके बाद हम जब तक रामलीला हुई तब तक रात को वहीं मुस्याखांद में रूकने लगे।
पहाड़ की रामलीलाओं का भी अपना ही मजा है। लोग दिनभर के काम काज से थककर रात होने की प्रतीक्षा करते थे। दूर-दूर से लोग रामलीला सुनने के लिए आते थे। पूरी रातभर रामलीला होती थी और सुबह रामलीला खेलने वाले पात्र रात की खुमारी निकालने के लिए स्टेज में ही लेट जाते थे। मैं राम का पाठ खेल रहा था। बारहवीं की बोर्ड की परीक्षा थी लेकिन पढ़ने की चिन्ता किसे यहां तो बस रामलीला ही सर पर सवार थी। बड़ा मजा आता था रामलीला देखने और खेलने में। अब पहाड़ में वेसी रामलीलायें नही होती हैं। कारण एक तो समाज का ताना-बाना काफी कमजोर पड़ चुका है। शराब पीकर हंगामा करने वालों ने पहाड़ की आबौहवा ही खराब कर दी है।
बात बरसात की कर रहा था और कहां से कहां पहुँच गया। पहले पहाड़ों में बरसात के दिनों में घना कोहरा और रिमझिम बारिश का अपना ही मजा था। जब हम  छोटे थे गांव में अपनी गाय-बच्छियों को जंगल ले जाया करते थे। बरसात के दिनों में जंगल से खुतड़ा और च्यूं लाते थे फिर घर में उसकी सब्जी बनती थी। जानते हो च्यूं भी दो तरह का होता है एक जहरीला और एक बिना जहर का। जहरीला च्यूं खाकर कई लोग मर चुके हैं लेकिन फिर भी लोग च्यूं खाने से बाज नही आते।
आज काफी दिनों बाद गांव में ऐसी बरसात देखी है। सच ऐसा लग रहा है कि वही चालीस साल पुराने घर में हूँ। तब दादी, मां, पिताजी और भाई-बहनों के साथ रहता था। कितनी रौनक थी इसी घर में आज न तो दादी, मां-पिताजी रहे, बहन भाई भी अपनी-अपनी गृहस्थी में मशगूल हैं। गांव यो तो आना जाना कम ही होता है लेकिन जब भी गांव आता हूँ सच में कभी वापस जाने का मन नही करता है। आज दशकों बाद न जाने क्यों अपने इसी पुराने घर के जिंगले से सामने खड़े सिलड़पाख को निहार रहा हूँ लेकिन उसकी रौ, रंगत भी जेसी फीकी पड़ गई है। सामने पहाड़ ऐसा लग रहा है जैसे वो मुझे प्रश्नीली निगाहों से देख रहा है। पूछ रहा है कि आ गया प्रवासी? कहां था इतने दिनो तक? मैंने तुम्हें अपनी हवा, हरियाली और पानी देकर सींचा और तुमने मुझे क्या सिला दिया? ऐसा लग रहा था कि यह घर, यहां की धरती, खेत खलिहान और पौन पंछी सब मुझसे एक ही प्रश्न कर रहे हैं कि तुमने क्या दिया हमारे उपकार के बदले में.....?

कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने अपनी जन्मभूमि का जीते जी उद्धार नही किया, अपनी जननी, जन्मभूमि और अपनों को उपकार के बदले कुछ नही लौटाया उसका जीवन सफल नहीं होता है। और शायद मुझे भी यह धरा और मेरी माटी यही समझा रही है लेकिन मैं स्वार्थी मानव अपने ही स्वार्थ और दो दूनी चार के चक्कर में सबकुछ जान समझकर भी सही मायनों में कुछ नही कर पा रहा हूँ। इन पहाड़ा के लिए और ना ही यहां की धरती के लिए तो क्या मेरा जीवन भी सार्थक नही होगा...? शायद। किसी ने सच ही जीवन की सार्थकता अपना पेट भरने और बाह्य साधनों के संचय में तो कदानि नही है। दूसरों के प्रति उपकार का भाव और दया का भाव होना ही चाहिए। और जिसने जन्म दिया, जिसकी माटी में हम खेल, पले बढ़े उस धरती का भी तो हम पर कुछ कर्ज है उसे लौटाने के लिए अगर हम नहीं सोचेगे तो कौन सोचेगा........?

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                                                                                                                                                              सरोकार


                                                                                                                                                     -अजय पाराशर

महा विनाश की अलामत हैं बढ़ते भूकंप

भुवनेश्वर, कटक तथा अंडमान के द्वीप लैंडफाल में गत रात आए 6.9 तीव्रता वाले भूकंप सहित पिछले कुछ समय से विश्वभर में भूकंपों की संख्या में हो रही वृद्धि को देखते हुए कुछ विचारशील लोग भारतीय शास्त्रों में वर्णित चार युगीय सिद्धान्त को लेकर उद्वेजित हैं, ऐसे में हाल ही में लीसेस्टर विश्वविद्यालय के चार वैज्ञानिकों का धरती पर नया युग आरंभ होने का दावा अत्यंत महत्वपूर्ण है।  इन वैज्ञानिकों के अनुसार हमारी पृथ्वी भौगोलिक समय के नए युग में प्रवेश कर गई है और उन्होंने इस युग का नाम दिया है, एंथ्रोपोसीन।  उनके मुताबिक भले ही पृथ्वी के भविष्य को लेकर चर्चाएं होती रहें परन्तु एंथ्रोपोसीन युग मानव जाति और पृथ्वी, दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगा और नए इतिहास की रचना करेगा। इस युग में प्राकृतिक और मानवीय शक्तियों के मध्य टकराव होगा। नए युग का यह प्रवेश पृथ्वी के इतिहास का सबसे बड़ा विनाश होगा। वैश्विक परिवर्तन के साक्ष्य सामने रखते हुए इन वैज्ञानिकों का यह कहना कि केवल दो शताब्दियों में ही मनुष्य ने धरती के साथ जो अप्रत्याशित व्यवहार किया है, उससे हुए नुकसान के चलते हम नए भौगोलिक युग में प्रवेश कर चुके हैं। जनसंख्या वृद्धि, नगरों का फैलता मायाजाल तथा खनिज तेल के बढ़ते प्रयोग ने पृथ्वी को एंथ्रोपोसीन युग में प्रवेश करा दिया है। पृथ्वी पर बड़े पैमाने पर हो रहे विनाश को देखते हुए अब वैज्ञानिक इस बात पर विचार कर रहे हैं कि क्या एंथ्रोपोसीन युग से जुरासिक, कैम्ब्रियन या इससे ही भौगोलिक समय के पैमाने की किसी मिलती-जुलती इकाई की शुरूआत होगी।  उधर भारतीय शास्त्रों में जिस चार युगीय सिद्धान्त की आज से सैंकड़ों वर्ष पूर्व विस्तृत व्याख्या की गई है, उसके अनुसार वर्तमान में कलयुग का साम्राज्य है। कलयुग के जिन संकेतों या संभावित घटनाओं का शास्त्रों में निरूपण किया गया है, वह अक्षरश: घटित हो रहे हैं। इसके बाद पुन: सतयुग आने का उल्लेख है। शास्त्रों में सतयुग के बाद त्रेता, द्वापर और कलयुग का स्थान है।
 हाल ही में हैती के भूकंप के बाद लगभग हर सप्ताह में विश्व के किसी न किसी स्थान पर होने वाली अधिक तीव्रता वाली भू-गर्भीय गतिविधियां न केवल भू-वैज्ञानिकों बल्कि समाजशास्त्रियों को भी सतत अध्ययन के लिए प्रेरित कर रही हैं। उच्च तीव्रता वाला भूकंप अपने पीछे कई निशान और सवाल छोड़ जाता है। सुनियोजित विकास विनाश रोकने में मददगार है। एक जैसी ही तीव्रता वाला भूकंप अमेरिका या जापान में तो न के बराबर नुकसान करता है पर हिन्दोस्तान जैसे भगवान भरोसे चलने वाले राष्ट्रों में भुज तथा लातूर जैसा विनाश लिख जाता है। भूकंप से होने वाला नुकसान केवल यहीं तक सीमित नहीं रहता, भूकंप के बाद जमीन का कंपन तथा फटना, भूस्खलन तथा हिमस्खलन, आगजनी, मिट्टी का चलना, सुनामी, बाढ़ तथा ज्वार-भाटा भी मानवीय शक्तियों परीक्षा के लिए तैयार रहता है। उन्नत तकनीकी से छोटे से छोटे भूकंप को भी दर्ज किया जा सकता है।  आंकड़ों की बात करें तो 80 के दशक में विश्व में प्रति वर्ष आने वाले भूकंपों का औसत 3,300 और 90 के दशक में 2,300 था। परन्तु रिक्टर स्केल पर छह या इससे अधिक तीव्रता वाले भूकंपों की संख्या में 50 के दशक से बढ़ोतरी जारी है। 1950 के दशक में यह संख्या नौ थी, जो साठ के दशक में 13, 70 के दशक में 51, 80 के दशक में 86 तथा 90 के दशक में 100 तक पहुंच गई। वर्ष 1900 से लेकर 2000 तक रिक्टर स्केल पर सात या इससे अधिक तीव्रता वाले भूकंपों की संख्या औसतन सात प्रतिवर्ष है। यह आंकड़े चौंकाने वाले हैं।  ऐसे में वर्ष 2012 में मैगा भूकंप की भविष्यवाणी पर विचार अनिवार्य हो जाता है। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार पिछले कुछ समय से टैक्टोनिक प्लेट खिसकने से भूकंपों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। धु्रवीय परिवर्तन को दोषी मानने वाले वैज्ञानिक कहते हैं कि यह वर्ष 2012 तक जारी रहेगा।  वर्ष 1931 में विश्व में केवल 350 भूकंपमापी केन्द्र थे, आज यह संख्या हजारों में है। वैज्ञानिक भले ही अपने तर्क प्रस्तुत करते रहें, पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि प्रकृति से हमारी छेड़छाड़ इन तमाम आपदाओं के लिए उत्तरदायी है।
 जनसंख्या वृद्धि, नगरों का फैलाव तथा प्रकृति का अन्यायपूर्ण दोहन मानवीय सभ्यता के पतन के मुख्य कारणों में गिना जाएगा। उदाहरण के लिए भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में मैक्सिको सिटी, टोकियो तथा तेहरान जैसे महानगरों का विकास एक झटके में तीस लाख लोगों को लील सकता है।  भले ही जमीनी टैक्टोनिक प्लेट्स की हलचल को भूकंप का मुख्य कारण माना जाए, पर प्रलोभित मानवीय गतिविधियां भी भूकंप का कारण बनती हैं। बड़े बांधों तथा भवनों का निर्माण, भूमि का  छिद्रण तथा कुओं में द्रव्य स्थापन, कोयला खनन तथा खनिज तेल का दोहन प्रमुख कारण हंै। वर्ष 2008 में चीन के सिकुआन प्रांत में आए भूकंप को इस श्रेणी में रखा जा सकता है, जिसमें करीब 70,000 लोग मारे गये थे।  यहां निर्मित जि़पिंगपु बांध से इस भूकंप की और तीव्रता बढ़ी थी। इसी तरह कोयला खनन गतिविधियों को आस्टे्रलियन शहर न्यू कैसल में आए भूकंप का जनक माना जाता  है। 
 न्यूटन का तीसरा सिद्धान्त भौतिकशास्त्र ही नहीं, जीवन के हर क्षेत्र में खरा उतरता है। जीवनदायिनी प्रकृति का अवैज्ञानिक दोहन अब भारी पडऩे लगा है। विकसित राष्ट्रों ने जहां समय रहते कुछ संभलने तैयारी आरम्भ कर दी है, वहीं विकासशील देशों का संघर्ष अब भी ज़ारी है। उदाहरण के लिए भारत में आजादी के बाद जनसंख्या पर पूरी पाबंदी के साथ सार्वभौमिक शिक्षा तथा गंावों के विकास पर बल दिया जाना चाहिए था। परन्तु हमारे नीति नियन्ताओं ने इन तीनों ही बातों को ताक पर धर कर, तुष्टिकरण की नीति को अपने विकास का मंत्र बनाया और नतीजा हमारे सामने है। ग्लोबल वार्मिंग का असर अब पूरे विश्व पर हो रहा है, वैश्विक गांव की अवधारणा से किसी भी राष्ट्र का बचना संभव नहीं, पर अगर हमने समय रहते दूरदर्शी होकर देश को सर्वोपरि रखा होता तो आज हम विश्व की रहनुमाई कर सकते थे। गांवों की अनदेखी का असर शहरों पर पड़ रहा है, लोग जनसंख्या का दबाव झेल रहे हैं, निरक्षरता, बेरोज़गारी तथा प्रदूषण का आलम है। अगर अब हम चूके तो भूकंपों की मार के साथ जनसंख्या विस्फोट, महानगरीय दबाव, अनियोजित तथा अनियंत्रित विकास, निरक्षरता तथा बेरोजगारी के झटके  इस विभीषिका को और बढ़ाने का ही कार्य करेंगे।

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                                                                                                                                                                परिदृश्य

                                                                                                                                                      -अजय पराशार

बिन पानी सब सून

हिमाचल प्रदेश के शीत जि़लों में गिने जाने वाले किन्नौर में ही जब पारा 32 डिग्री तक पहुंच गया हो, तो ऐसे में राज्य के अन्य जि़लों में दिन पर दिन बढ़ती तपिश का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं। मार्च महीने में ही पारा सामान्य से दस डिग्री से अधिक है। राज्य के कुछ नगरों में तो पारा पड़ोसी राज्यों के मैदानी इलाकों से अधिक दजऱ् किया गया है। प्रदेश में पहले कभी ऐसा नज़ारा देखने को नहीं मिला। बुजुर्गवार घोर कलियुग की दुहाई दे रहे हैं। जून का महीना जब मार्च में गुजर रहा है तो जून में होने वाली विभीषिका का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं। ज़ाहिर है ग्लोबल वार्मिंग ने विश्व के किसी भी कोने को अपने प्रभाव से अछूता नहीं रखा है। सामाजिक चेतना के अभाव में हमारी सोच तथा दिल हिमालयी ग्लेशियरों की तरह सिकुड़ रहे हैं, जिसके फलस्वरूप नदियां नालों में बदल रही हैं, खड्डें सूख रही हैं या रेत-रोड़ों के ढेर में तबदील हो चुकी हैं, पहाड़ छिल रहे हैं तथा पेड़ों की संख्या कम हो रही है।  ऐसे में प्रदेश को हरा-भरा बनाने का राज्य सरकार का संकल्प सामाजिक सहभागिता के बिना साकार होना संभव नहीं है।  अवैध एवं बेतरतीब खनन तथा वृक्षों का कटान बदस्तूर चालू है और लोगों द्वारा अपने पारंपरिक पेयजल स्रोतों की अनदेखी बराबर ज़ारी है।  मनरेगा में स्थानीय निकाय तथा लोग सडक़ों, पक्के रास्तों तथा पुराने पेयजल स्रोतों को पक्का बनाने पर या अन्य सामाजिक परिसंपत्तियां जुटाने पर तो ध्यान दे रहे हैं, पर जल संग्रहण या इससे जुड़ी अन्य तकनीकों पर कतई ध्यान नहीं दे रहे हैं। 

       हमीरपुर जि़ला में पिछले कुछ वर्षों से चलाई जा रहीं जलागम परियोजनाओं के परिणाम अपेक्षा के अनुरूप रहे हैं और यह देश का शायद इकलौता क्षेत्र है, जहां भू-जल स्तर में दो मीटर की वृद्धि दर्ज की गई है। परन्तु यह जि़ला भी अप्रत्याशित गर्मी की मार झेल रहा है और अधिकारियों द्वारा पेयजल स्रोतों के स्तर में 15 प्रतिशत तक गिरावट बताई जा रही है।  आने वाले समय में लोगों को पानी की किल्लत और इसके कारण बिजली की समस्या से दो-चार होना पड़ेगा। खेती पर भी इसका प्रभाव पडऩा स्वाभाविक है।  पर्यावरण विशेषज्ञ जगवीर सिंघा के अनुसार सतलुज में पानी का स्तर सामान्यता से पांच फुट तक गिर गया है और इसे देखने पर ऐसा लगता है मानो सतलुज की आंखों में खड्डे पड़ गए हों और आँसू सूखते जा रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो प्रदेश की नदियां भी निकट भविष्य में सरस्वती नदी की तरह पौराणिक गौरव हासिल कर लेंगी। उदाहरण के लिए नादौन के समीप बहती ब्यास नदी को अब आसानी से पैदल चलकर पार कर सकता है। ऐसे में पानी के लिए तीसरे विश्वयुद्ध की भविष्यवाणी सच होती दीख रही है।

हिमालय के ग्लेशियरों को लेकर हर रोज़ नए दावे तथा अध्ययन सामने आ रहे हैं। अपने नए अध्ययन में इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) पिछले पांच दशकों में ग्लोबल वार्मिंग के कारण हुए जलवायु परिवर्तन के चलते हिमालयी ग्लेशियर में तकरीबन 16 प्रतिशत की कमी आंक रहा है। ऐसे में हिमालय से निकलने वाली नदियों पर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव पडऩा स्वाभाविक है।  परन्तु वास्तव में नदियों में घटते जल स्तर की कहानी शायद इससे भिन्न हो।  नदियों के जल स्तर में आई कमी 16 प्रतिशत से कहीं अधिक है।  घोर आशावादी अभी भी नदियों में आई जल स्तर की गिरावट के लिए कई अन्य कारण गिनाते हैं। पर इतना तय है कि बदलती जलवायु का प्रभाव अब जीवन के हर क्षेत्र में देखा जा सकता है और मौसम चक्र में परिवर्तन जीवन के हर शोबे को मुतासिर कर रहा है।  तापमान बढऩे से चार प्रमुख फसलों गेंहूं, चावल, मक्की और बाजरा के उत्पादन में कमी आई है।  हो सकता है कुछ गर्मियां तो हम ठंडे पेयजल तथा जूस पीकर निकाल लें, पर आने वाला समय लगातार खतरे की घंटियां बजा रहा है। अभी कुछ वक्त मौसम प्रतिकूल रहने के बाद मेहरबानी दिखाकर बारिश या बर्फ दे जाता है और हमारा समय किसी तरह निकल रहा है। हिमालयी ग्लेशियर दुनिया के कई देशों को सिंचित करने के अलावा करोड़ों लोगों की प्यास बुझाते हैं, पर जहां से होकर यह नदियां गुजरती हैं, जब उस राज्य के लोग ही पानी की कमी तथा गर्मी से बेहाल हैं, तो भविष्य अंधकारमय है और हम अगर अभी भी नहीं चेते तो मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा की पुनरावृत्ति को रोकना संभव नहीं होगा।

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                                                                                                                                                                    चौपाल



                                                                                                        (  विलास राव सालुके की कहानी, उन्हीकी जुबानी )

अकाल के काल
एक कथा ऐसी भी...

"एक-दो नहीं, पसीने से लथपथ चालीस हजार लोगों को तपती दुपहरिया और झुलसाती लू को झेलते हुए एक साथ पत्थरों को तोड़ते देख मैं अवाक् रह गया। हरियाली का एक तिनका नहीं। कहीं-कहीं से छोटे बच्चों के बिलखने की आवाज और उन पर खीजतीं, चुप कराती मजदूर माताएं। चालीस हजार छोटी, हथौड़ियों की आवाज-ठक, ठड़ाक, ठक, ठक और पास की पहाड़ियों से वापस लौटती उनकी प्रतिध्वनियां। मेरा मस्तिष्क तो किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया।' 1972 में महाराष्ट्र के पुणे शहर से मात्र 36 किलोमीटर की दूरी पर सासवड़-नेजरी के बीच, मध्याह्न में, उन्हीं सूखे पहाड़ों के बीच खड़े होकर एक पत्रकार को विलासराव सालुंके बीस वर्ष पुरानी वह घटना सुना रहे थे, जिसने उनके एवं कई अन्य लोगों के जीवन की दिशा मोड़ दी थी।

"शहरों में जाकर बसा हर कोई किसी न किसी गांव से आया है। मैं भी मूलत: तो गांव का ही हूं। 1953 में पुणे में विद्युत यांत्रिकी का स्नातक बनते-बनते मैं भी पूरे का पूरा शहरी बन गया था। मैंने "एक्युरेट इंजीनियरिंग कम्पनी' के मालिक के रूप में अपना कारोबार इतना बढ़ाया था कि कारोबार के सिलसिले में एक सप्ताह न्यूयार्क जाता था तो दूसरे सप्ताह टोक्यो। एक सुबह अपने बंगले के हरे-भरे उद्यान में बैठा अखबार पढ़ रहा था। उस समय महाराष्ट्र का अकाल प्रथम पृष्ठ की सुर्खियों में था। मन में विचार आया अकाल कैसा होता है? खुद जाकर देखना चाहिए। बस, अपनी मोटर निकाली और अकाल देखने चल पड़ा। आज से बीस वर्ष पूर्व यहीं आकर रुका था।

एक साथ चालीस हजार लोगों को पत्थर तोड़ते देख गुमसुम हो गया। यह क्या? पुणे से केवल 36 किलोमीटर दूर यह हालत! और अपने धंधे में लीन पुणे में बैठा मैं। मुझे इसका पता ही नहीं कि यहां हजारों आदमी बेवजह पत्थर तोड़ रहे हैं?' उस दिन विलासराव बेचैन रहे। दिमाग में हथौड़ों की आवाज गूंज रही थी। कार से वापस लौट रहे विलासराव वह विलासराव नहीं थे, जिनका पुणे में तीस करोड़ का कारोबार था। अपने बंगले पर जाने के बजाय विलासराव एक प्रतिष्ठित उद्योगपति के नाते सीधे जिलाधिकारी के घर पहुंचे।

"ये हजारों लोग बिना किसी प्रयोजन के पत्थर क्यों तोड़ रहे हैं आपके जिले में?' उन्होंने जिलाधिकारी से पूछा।
"यह तो अर्से से चल रहा है। महाराष्ट्र में जगह-जगह पत्थर तोड़े जा रहे हैं।' उत्तर मिला।
"मगर क्यों'?
"अकाल है, इसलिए।'
"लेकिन पानी की तंगी का पत्थर तोड़ने से क्या सम्बंध?'
"यह तो मैं भी नहीं जानता।' जिलाधिकारी ने कहा, "अकाल की स्थिति में रोजगार देने की वचनबद्धता है, इसलिए रोज के तीन रुपए के हिसाब से पत्थर तुड़वा रहे हैं। आपके पास कोई अन्य विकल्प है?'

विलासराव के पास उस समय इसका विकल्प नहीं था। उद्योगों में आवश्यक सूक्ष्म नाप-जोख के उपकरण तब भारत को आयात करने पड़ते थे। विलासराव ऐसे उपकरण बनाना जानते थे, परन्तु पानी के अभाव में बिलखते लोगों के पास पत्थर तोड़ने के अलावा कुछ और करने का विकल्प नहीं था। वे भारी मन से अपने निवास लौटे। रातभर बेचैन रहे। दूसरे दिन सूर्योदय के पहले वे पत्थर तोड़ने वाले अकाल पीड़ितों के बीच पहुंच गए। उपकरण बनाने वाले अपने लाभदायी कारखाने की तरफ से उनका ध्यान हट गया था। पत्नी कल्पना सालुंके चिन्ता में पड़ गईं।

विलासराव बता रहे थे, "मेरे और जिलाधिकारी के पास यदि विकल्प नहीं, तो संभव है इन अनपढ़ गंवारों के पास होगा। मैं उनके बीच घूम-घूम कर उनसे बतियाने लगा।
गांववालों ने कहा विकल्प क्यों नहीं है? अकाल तो इसी वर्ष पड़ा है आने वाले वर्ष में तो वर्षा होगी। उस समय पानी को व्यर्थ बह जाने के स्थान पर उसे संग्रहीत करें तो...।
' विलासराव के मस्तिष्क में प्रकाश हुआ। अकाल के दिन भी दुबारा आएंगे परन्तु जल का अभाव न रहेगा और इन्हें पत्थर तोड़ने का दुष्कर कार्य नहीं करना पड़ेगा। इतनी सीधी सी बात हम पढ़े-लिखों के बजाय इन ग्रामीणों को पता है। अपने कारखाने को भूल विलासराव अपने वाहन से तुरत-फुरत पुणे लौट कर वहां अपने जैसे अभियन्ताओं से मिले। पूछा,
"बरसात का पानी कैसे रोका जाता है?' उनके जवाब से विलासराव को एक और झटका लगा। अभियन्ता बने इन मित्रों को घर, पुल, रास्ते, नालियां, पानी की टंकी, सिंचाई के लिए बांध इत्यादि बनाने की तो शिक्षा दी जाती है लेकिन वर्षा जल संग्रहण प्रणालियों का प्रशिक्षण उस समय नहीं दिया जाता था। जल संग्रहण एवं सिंचन तो संस्कृति का पर्याय है और विलासराव जान गए कि इससे इन अभियन्ताओं का जरा भी सम्बंध नहीं।

विलासराव अकालग्रस्त क्षेत्र में घूमते-भटकते रहे। गांववालों से पूछ-पूछ कर तालाब बनाने के पूर्व क्या और कैसे निरीक्षण एवं तैयारियां करनी पड़ती हैं, इसका अभ्यास किया। सप्ताह भर में ही उस क्षेत्र में पांच तालाबों को बनाने की योजना जिलाधिकारी को थमा दी गई। पत्थर तोड़ने के स्थान पर तालाबों, छोटे-छोटे चैक-डैम, छोटे प्राकृतिक नालों को छोटे बांधों से मोड़कर तालाबों की तरफ मोड़ने की योजना का पालन शुरू हो गया।

1972 के अकाल के दिन तो बीत गए। गांववाले भूल गए, जिलाधिकारी भी भूल गए, महाराष्ट्र भी भूल गया लेकिन विलासराव नहीं भूले।

बीस वर्ष बाद भी नहीं भूले। अपनी मोटर, बंगला, न्यूयार्क और टोक्यो की यात्राएं और जमे हुए कारोबार को पत्थरों को तोड़ने की ठक-ठक आवाजों को सुनकर विलासराव ने जब छोड़ा तो छोड़ ही दिया। पत्नी और बच्चों को लेकर विलासराव सूखे भट्ठ पहाड़ों में पुरंधर तालुके के बलद गांव से तीस किलोमीटर की दूरी पर नाइगांव आ गए और टेकरी पर स्थित एक मंदिर के नीचे 16 हेक्टेयर ढलवां जमीन किराए पर ली, जिस पर बरसाती सिंचाई से प्रति हेक्टेयर मुश्किल से 50 किलो अन्न उग सकता था। इस शहरी बाबू की बेवकूफी को देखने के लिए गांव वाले उत्सुक थे। लेकिन निर्णय लेने के पूर्व विलासराव ने अभ्यास किया था। उस पर अमल करते हुए ढलान को सीढ़ियों की तरह काटकर छोटे-छोटे समतल क्षेत्र किए। सबसे नीचे मिट्टी का बांध बनाकर एक छोटा सा सरोवर बनवाया। बारिश से उनका छोटा सा सरोवर भर गया और मिट्टी में जल उतर गया तब विलासराव ने सरोवर के नीचे एक कुंआ खोदा और उस पर साढ़े सात अश्व शक्ति की मोटर लगाई। पानी को नीचे से खींच ऊपर टेकरे पर पहुंचा अपने स्तरबद्ध खेतों को सींचा। जब 50 किग्रा. के स्थान पर विलासराव ने प्रति हेक्टेयर 500 किलोग्राम अनाज उगाकर दिखाया और इस जमीन पर 4000 वृक्ष भी लगा दिए, 15 गाएं भी वहां पहुंचा दीं-तब 1976 में तमाशा देखने का विचार रखने वाले ग्रामवासी उनके पास आकर मिन्नतें करने लगे। विलासराव को कमाई की जरूरत नहीं थी, यह तो उनके यज्ञ का अपेक्षित पूर्वानुमान ही था।

"हमारे लिए भी अपने जैसी सिंचाई व्यवस्था करवा दीजिए',
गांववाले बोले, "हमारे बच्चे युवा भिखारियों से भी बदतर हालत में मुम्बई की शैतानी गलियों में मजदूरी करते हैं। गन्ना बेचने के लिए दर-दर भटकते हैं। हमारे गांव हरे-भरे हो जाएं तो हमारे लड़के-लड़कियां हमें छोड़ कर क्यों जाएंगे?'
विलासराव समझ गए कि जिस शांत क्रांति का स्वप्न उन्होंने देखा था उसके यथार्थस्वरूप में आने का समय आ गया है।

गांववालों से उन्होंने कहा, "आपके लिए न सरकार कुछ कर सकती है और न मैं ही कुछ कर सकता हूं। अपनी समस्या और दु:ख का निराकरण आपको स्वयं करना होगा। पराई आस, सदा निराश।' सभी ने एक स्वर में कहा, "कबूल!' इसके बाद कई अनौपचारिक सत्रों-बैठकों में गांववालों से खुलकर बातें करते हुए सबसे सहमति और समर्थन प्राप्त कर विलासराव ने एक स्वप्न साकार कर दिखाया। सबमें सहमति बनी कि अकाल से बचने के लिए भूस्वामित्व पर निर्भर न रहते हुए सभी को आधा एकड़ जमीन सींचने के लिए आवश्यक पानी प्राप्त करने का अधिकार होगा, क्योंकि इतनी जमीन पर स्वयं परिश्रम करके मनुष्य अपनी आवश्यकता का अनाज पा ही सकता है। लेकिन जिनके पास कोई जमीन नहीं, उन्हें भी यह अधिकार होगा, जिसका विनिमय हो सकता है। आधे एकड़ का ही रहेगा। इस जलाधिकार का संरक्षण गांव की पानी पंचायत ही करेगी, जिसका संचालन गांव से बाहर का कोई व्यक्ति नहीं करेगा। जबकि पानी का आवंटन गांव के बाहर का एक वेतनभोगी करेगा। इससे भेदभाव की संभावना घटेगी। जलाधिकार के अंतर्गत प्राप्त जल से कोई गन्ना नहीं उगा सकेगा। कम पानी से उगने वाली बाजारा, ज्वार, मक्के की फसल ही उगाई जाएगी, जिससे पेट की आग बुझेगी। यह भी तय हुआ कि पानी पंचायत की योजना के खर्च का 20 प्रतिशत सभी को अग्रिम देना होगा। शेष विलासराव द्वारा स्थापित "ग्राम गौरव प्रतिष्ठान न्यास' से ऋण में प्राप्त होगा।

इसके बाद नाइगांव में 8, राजूरी में 3, टेकावाड़ी, पिलानवाड़ी, पांडेश्वर, देवगांव, शीदेवाड़ी और धालेवाड़ी को मिलाकर 50 पानी पंचायतें स्थापित हुईं। आधा एकड़ सिंचाई के जलाधिकार पर 20 गांवों की 10,000 आबादी आत्मनिर्भर बनी। 50 योजनाओं पर कुल खर्च दो करोड़ रुपए से भी कम पड़ा। अपने "जड़तंत्र' के सत्ताधीशों को धालेवाड़ी जाकर, प्रजाशक्ति को परखने का अवसर मिल सकता है।



वहां की करा नदी पर एक छोटे बांध की योजना के तहत लोगों को हटा उन्हें अन्यत्र पुनर्वास कराना था। इस पुनर्वास योजना से बेहाल हुए धालेवाड़ी के 67 परिवारों ने अपनी पानी पंचायत बनाई। अब आधे एकड़ के जलाधिकार की व्यवस्था के तहत प्रत्येक व्यक्ति प्रतिवर्ष 10-20 हजार (1992 में) प्याज, ज्वार, गलगोटे उगाकर कमाता है। सरकारी सहायता के बिना 50 हजार से लेकर 1 लाख रुपए तक की लागत से वहां घर बने हैं। हर घर में गाय-भैंस हैं। गांव की ग्रामशाला के 125 युवक पानी पंचायत चलाते हैं और गांव के आग्रह पर पुलिस थाने को विदा कर दिया गया, क्योंकि सारे झगड़े-फसाद समाप्त हो गए। खादी के दो जोड़ी कपड़ों में चलने वाले विलासराव सालुंके गांवों के युवाओं को जलसंग्रह प्रबन्धन सिखा रहे हैं। उनका कहना है, "सरकारी तंत्र को ग्रामोत्थान से कोई लेना-देना नहीं है। गांवों को समझे-पहचाने बगैर वह अपने मस्टर प्लान बनाता रहेगा। यह काम ग्रामीणों को ही करना है।' 1972 के अकाल की दशा पर विलासराव कहते हैं।

हालांकि विलासराव सालुंके अब हमारे बीच नहीं रहे। पर उनका विचार बीज रूप में “पानी पंचायत”, "ग्राम गौरव प्रतिष्ठान न्यास' अभी भी अपनी भूमिका निभा रहे हैं।

विलासराव सालुंके महाराष्ट्र के एक प्रतिष्ठित व्यवसायी थे। वर्षों पूर्व अकालग्रस्त लोगों की पीड़ा देखकर उन्होंने एक संकल्प लिया और उसे पूर्ण भी कर दिया था। यह संकल्प क्या था, इसे पूर्ण कैसे किया गया इस घटना को शब्दों में बांधकर एक लेख के रूप में 1992 में प्रस्तुत किया था श्री महेन्द्र देसाई ने। यह लेख गुजराती पत्रिका "चित्रलेखा' के 25 मई'92 के अंक में प्रकाशित हुआ था। आज जब देश के कुछ राज्य अकाल की विभाषिका से जूझ रहे थे तब यह वास्तविक कथा बहुत प्रासंगिक हो उठी थी। अत: मूल गुजराती लेख का हिन्दी में अनुवाद किया श्री व्योम अखिल ने, जो यहां प्रस्तुत है। यह विवरण साभार  पांचजन्य से लिया गया है। 

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                                                                                                                                           चांद परियाँ और तितली


                                                                                                                                                        -निर्मला सिंह

काश हमारे भी पर होते


काश! हमारे भी पर होते ?
उड़ते फिरते नील गगन में।
जब भी चाहें मस्ताते हम,
दूर दूर महके गुलशन में।


मम्मी, जब भी डाँट लगाती,
फुर्र से उड़ जाते गगन में ।
मम्मी, जब पढ़ने को कहती,
छुपे रहते अपने चमन में।


बातें सुनकर मम्मी बोलीं--
बच्चे, यह हैं पाँखी नभ के,
हम सब हैं धरती के इंसान,
इनकी तरह, नहीं जी सकते,
यही तो है अपनी पहचान।



***





  रंग बिरंगे फूल

अंशुल बचपन से उत्सुक और जिज्ञासु प्रवृत्ति वाला बालक था। हर चीज के लिये अनेकों प्रश्न पूछना उसकी आदत में शामिल था। इधर कुछ दिनों से वह बगीचे में जाकर रंग-बिरंगे फूल तोड़-तोड़ कर फेंकता और बार-बार अपनी मम्मी से डांट खाता। जब कभी भी उसकी मम्मी किसी के घर जाती, वह चुपके से बगीचे में चला जाता और फूलों को नोंचता तोड़ता। एक दिन उसकी मम्मी ने उसे मारा तब वह खूब रोते हुये बोला-


मम्मी आप मारती क्यों हो? मैं तो यह जानना चाहता हूं कि फूलों में रंग क्यों होते हैं? इन्सानों की तरह केवल यह गोरे-काले क्यों नहीं होते?


अंशुल की बात सुनकर मम्मी खूब हंसी, फिर उसे पास बिठाकर समझाने लगी-बेटा इन फूलों में रंग पौधों में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के एन्थोसाईनैन पिगमैंटेसन के द्वारा होता है और यह पिगमैंटेसन हर पौधो में होता है।


थोड़ी देर अंशुल चुप रहा फिर उसने पूछा- मम्मी, यह पिगमैंटेसन क्या होता है?


बेटा यह एक प्रकार का जैविक रसायन है।


मम्मी, प्लीज डांटना मत। मुझे यह भी बताओ यह जैविक रसायन क्या होता है?


बेटा, यह बायो कैमिकल्स होता है और बेटा यह पिगमैन्टेसन पौधों की कोशिकाओं में पाये जाने वाले रंगीन कण हैं, जिनके अंदर रंग भरे होते हैं।

अच्छा मम्मी, अब समझ में आया कि गुलाबी गुलाब के पौधे में सिर्फ गुलाबी गुलाब का ही फूल उगेगा और पीले में पीला फूल--कहकर अंशुल शांत हो गया और उस दिन के बाद से उसने फूलों को नोचना-तोड़ना बंद कर दिया। फिर स्कूल जाकर उसने अपने सभी मित्रों को बताया कि फूल रंग-बिरंगे क्यों होते हैं?