सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर लेखनी- मार्च/ अप्रैल 2012
“दर्द में से फूटता है हँसी का निर्झर
अनुभूति जन्म लेती है चोट के अंतर में
रात काली न हो तो व्यर्थ है- तारों का सौंदर्य।“
-विष्णु प्रभाकर
(अंक 61/62- वर्ष 6)
~ हास्य-व्यंग्य विशेषांक~
इस अंक में-
कविता धरोहरः सूर्यकांत त्रिपाठी ' निराला'। गीत और गजलः श्यामल सुमन, रंजन विशदा ।माह की कवियत्रीः सरस्वती माथुर । कविता आज और अभीः रचना शर्मा, मीठेश निर्मोही, शैल अग्रवाल, सुशील कुमार, अमरेन्द्र शर्मा । माह विशेषः काका हाथरसी, रश्मी तरीका, शैल अग्रवाल, अशोक चक्रधर। बाल कविताःरामेश्वर कम्बोज हिमांशु।
मंथनः शैल अग्रवाल। कथाः विजय सत्पत्ति। चिंतनः अविनाश वाचस्पति। सरोकारः मनोहरश्याम जोशी। रपटः शैल अग्रवाल। परिदृश्यः प्रियंका गुप्ता। आँखोंदेखीः प्रभुदयाल श्रीवास्तव। चलते-चलतेः आलोक पुराणिक। आकलनः कृष्ण कुमार अग्रवाल। कहानी विशेषः इस्मत चुगताई। लघुकथाः विष्णु प्रभाकर। कहानी समकालीनः देवी नागरानी। धारावाहिकः दयानंद पाण्डेय। संस्मरणः सुमीता केशवा। नारी दिवस विशेषः रश्मि तरीका। चौपालः वेदप्रताप वैदिक। चांद परियाँ और तितलीः अकबर और बीरबल ।
और
माह की साहित्यिक खबरों से भरपूर विविधा व भारत में जनवरी माह की चित्रमय स्मृतियों के साथ वीथिका
एक अद्भुत संयोग ही है कि इसबार रामनवमी और पहली अप्रैल यानी कि मूर्ख दिवस एक ही दिन पड़े और श्री उलूकाय नमः से सजे मूर्खाधिवेशन के आमंत्रण पत्र के साथ-साथ दूसरा आमंत्रण पत्र मर्यादा पुरुषोत्तम और हम सबके आदर्श श्री राम की गरिमामय और सौम्य छवि लिए था। 'एकतरफ ठुमुक चलत रामचन्द्र...' तो दूसरी तरफ ' जय बोलो बेइमान की'। पर जीवन ऐसा नहीं। यहां तो बुद्धिमान मूर्ख से नहीं मिलेगा और धनवान निर्धन से या पहलवान निर्बल से। पर क्या जीवन सदैव विरोधाभास को समेटे ही नहीं, क्या विरोधी तत्वों में एक चुम्बकीय आकर्षण नहीं। जीवन से बड़ा विरोधाभास और क्या होगा! बीस वर्ष पहले भी तो कुछ ऐसा ही हुआ था जब इसी पहली अप्रैल को मिनटों में बाबूजी 'थे ' हो गए थे और मैंने ही नहीं कइयों ने वाकई में एकबार तो यह अवश्य ही सोचा होगा कि कहीं यह खबर एक फूहड़ मज़ाक मात्र तो नहीं। उसदिन से आजतक इस पहली अप्रैल से ही तो जूझ रही हूँ, खुरंटों को उचेड़कर हंसने की कोशिश में। पर ...रिश्ता मन का दर्द से ऐसे / आँखों का आँसू से जैसे/ पोंछो तो भूलो तो./ छलक ही आती है/ बूंद फिर फिरके ।
कहां भटक गई मित्रों , आज तो हमने कसम खाई है कि हंसेगें और सिर्फ हंसेगें, उस सर्कस के जोकर की तरह जो बारबार मार खाकर भी हंसता है। दूसरों को हंसाता है।
...दो नकारात्मक उर्जा भी यदि सही कोण पर मिलें तो विद्युत उत्पन्न करने की क्षमता रखती हैं, जैसे कीचड़ में से कमल उग आए और करुणतम् परिस्थितियों में से गहनतम् हास उत्पन्न हो...ज्यों अमावस की रात में झिलमिल तारे।...
कामना है कि बारबार ये दिन ऐसे ही साथ साथ आएँ, ताकि हम बुद्धि और धर्म की, छूत-अछूत की, ऊँच-नीच की अलग करती भावनाएँ और सामाजिक व मानसिक ग्रन्थियों और दिवीलिएपन से बचे रह पाएँ या जाने –अजाने बचने की कोशिश करते रहें...समाज के हर तबके से मिले मिलाएँ, वैमनस्य और अहम् को भूलकर सबके हो पाएँ। चूहे पर सवार गणेश और उलूक पर सवार लक्ष्मी... यही अर्थ और संदेश तो देते हैं हमें।
हंसना-हसाना, दूसरों पर ही नहीं खुद पर भी हंस पाना न सिर्फ शूरवीर और सहज व्यक्तिओं के लिए संभव है, यह एक उच्चकोटि की कला भी है। आश्चर्य नहीं कि एकबार पुनः हास्य-व्यंग्य को अप्रैल के अंक में समेटने की लेखनी ने कोशिश की है। मन करे तो मार्च 2009 का अंक भी अवश्य देखें।
रामनवमी और उलूक दिवस की, इस अद्भुत संयोग की एकबार फिर से बधाई और शुभकामना!!
दिवसावसान का समय मेघमय आसमान से उतर रही है वह सांध्य सुंदरी परी सी- धीरे धीरे धीरे। तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास मधुर मधुर हैं दोनों उसके अधर- किंतु जरा गंभीर-नहीं है उनमें हास विलास। हँसता है तो केवल तारा एक गुंथा हुआ उन घुँघराले काले बालों से, हृदयराज्य की रानी का वह करता है अभिषेक। अलसता की सी लता किंतु कोमलता की वह कली सखी नीरवता के कंधे पर डाले बाँह, छाँह सी अंबर-पथ से चली। नहीं बजती उसके हाथों में कोई वीणा नहीं होता कोई राग अनुराग आलाप नूपुरों में भी रुनझुन रुनझुन नहीं सिर्फ एक अव्यक्त शब्द सा 'चुप, चुप, चुप' है गूँज रहा सब कहीं- व्योम मंडल में- जगती तल में- सोती शांत सरोवर पर उस अमल कमलिनी दल में सौंदर्य गर्विता सरिता के अतिविस्तृत वक्षस्थल में धीर वीर गंभीर शिखर पर हिमगिरि अटल अचल में उत्ताल तरंगाघात प्रलय घन गर्जन जलधि प्रबल में क्षिति में जल में नभ में अनिल अनल में सिर्फ एक अव्यक्त शब्द सा 'चुप, चुप, चुप' है गूँज रहा सब कहीं- और क्या है? कुछ नहीं। मदिरा की वह नदी बहाती आती
थके हुए जीवों को वह सस्नेह प्याला एक पिलाती सुलाती उन्हें अंक पर अपने दिखलाती फिर विस्मृति के वह अगणित मीठे सपने अर्धरात्रि की निश्चलता में हो जाती जब लीन कवि का बढ़ जाता अनुराग विरहाकुल कमनीय कंठ से आप निकल पड़ता तब एक विहाग।
कुकुरमुत्ता
आया मौसम खिला फ़ारस का गुलाब, बाग पर उसका जमा था रोबोदाब वहीं गंदे पर उगा देता हुआ बुत्ता उठाकर सर शिखर से अकडकर बोला कुकुरमुत्ता अबे, सुन बे गुलाब भूल मत जो पाई खुशबू, रंगोआब, खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट, डाल पर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट; बहुतों को तूने बनाया है गुलाम, माली कर रक्खा, खिलाया जाडा घाम;
हाथ जिसके तू लगा, पैर सर पर रखकर वह पीछे को भगा, जानिब औरत के लडाई छोडकर, टट्टू जैसे तबेले को तोडकर। शाहों, राजों, अमीरों का रहा प्यारा, इसलिए साधारणों से रहा न्यारा, वरना क्या हस्ती है तेरी, पोच तू; काँटों से भरा है, यह सोच तू; लाली जो अभी चटकी सूखकर कभी काँटा हुई होती, घडों पडता रहा पानी, तू हरामी खानदानी। चाहिये तूझको सदा मेहरुन्निसा जो निकले इत्रोरुह ऐसी दिसा बहाकर ले चले लोगों को, नहीं कोई किनारा, जहाँ अपना नही कोई सहारा, ख्वाब मे डूबा चमकता हो सितारा, पेट मे डंड पेलते चूहे, जबाँ पर लफ़्ज प्यारा।
देख मुझको मै बढा, डेढ बालिश्त और उँचे पर चढा, और अपने से उगा मै, नही दाना पर चुगा मै, कलम मेरा नही लगता, मेरा जीवन आप जगता, तू है नकली, मै हूँ मौलिक, तू है बकरा, मै हूँ कौलिक, तू रंगा, और मै धुला, पानी मैं तू बुलबुला, तूने दुनिया को बिगाडा, मैने गिरते से उभाडा, तूने जनखा बनाया, रोटियाँ छीनी, मैने उनको एक की दो तीन दी।
चीन मे मेरी नकल छाता बना, छत्र भारत का वहाँ कैसा तना; हर जगह तू देख ले, आज का यह रूप पैराशूट ले। विष्णु का मै ही सुदर्शन चक्र हूँ, काम दुनिया मे पडा ज्यों, वक्र हूँ, उलट दे, मै ही जसोदा की मथानी, और भी लम्बी कहानी, सामने ला कर मुझे बैंडा,देख कैंडा, तीर से खींचा धनुष मै राम का, काम का पडा कंधे पर हूँ हल बलराम का; सुबह का सूरज हूँ मै ही, चाँद मै ही शाम का;
नही मेरे हाड, काँटे, काठ या नही मेरा बदन आठोगाँठ का। रस ही रस मेरा रहा, इस सफ़ेदी को जहन्नुम रो गया। दुनिया मे सभी ने मुझ से रस चुराया, रस मे मै डुबा उतराया। मुझी मे गोते लगाये आदिकवि ने, व्यास ने, मुझी से पोथे निकाले भास-कालिदास ने देखते रह गये मेरे किनारे पर खडे हाफ़िज़ और टैगोर जैसे विश्ववेत्ता जो बडे। कही का रोडा, कही का लिया पत्थर टी.एस.ईलियट ने जैसे दे मारा, पढने वालो ने जिगर पर हाथ रखकर कहा कैसा लिख दिया संसार सारा, देखने के लिये आँखे दबाकर जैसे संध्या को किसी ने देखा तारा, जैसे प्रोग्रेसीव का लेखनी लेते नही रोका रुकता जोश का पारा यहीं से यह सब हुआ जैसे अम्मा से बुआ ।
यहाँ से वहाँ तक फैली धरती पर अनगिनत संख्या में लगे हैं वृक्ष पर कोई घना छायादार नहीं।
कुछ की ऊँचाई तो आश्रितों से भी कम। कुछ इतने ऊँचे कि आश्रयदाता हो ही नहीं सकते।
शायद, वातावरण में फैली विसंगतियों ने मनुष्यों के साथ छीन लिए हैं वृक्षों के भी संस्कार।
अनिवार्यता
यूँ ही हारते रहे यदि हम-तुम बार-बार तो समाज पीछे छूट जाएगा जिसके लिए आवश्यक हैं तुम भी और मैं भी
क्योंकि तुम सत्य हो और मैं ईमान।
-रचना शर्मा
दंगाः दो स्थितियाँ
(1)
शब्द चिड़ियों से तितलियाँ बन गए थे खतरनाक मौसम की खिड़कियों से झांकते हुए।
(2)
सीढ़ियाँ उतर आई थी अजान कीर्तन चौराहे-चौराहे पसर गया था।
-मीठेश निर्मोही
दोस्तः दो शब्द चित्र
(1)
दिखते साथ धरती आकाश से मिलते नहीं…
(2)
मूक थे तट बीच बहती रही नदी भी मौन …
-शैल अग्रवाल
तंत्र का जन
मरना होगा रोज - रोज जनतंत्र में तंत्र का जन बन कर जन का तंत्र के बन जाने तक |
शहर में चांदनी
भागो कि सब भाग रहे हैं शहर में कंकड़ीले जंगलों में मुंह छिपाने के लिए
चाँद ईद का हो या पूर्णिमा का टी.वी. में निकलता है अब रात मगर क्या हुआ
मेरी परछाई के साथ चांदनी चली आई कमरे में शौम्य, शीतल, उजास से भरी हुई
लगा मेरा कमरा एक तराजू है और मै तौल रहा हूँ चांदनी को एक पलड़े में रख कर कभी खुद से कभी अपने तम से
लगा रहा हूँ हिसाब कितना लुट चुका हूँ शहर में !
-सुशील कुमार
(1)
खूंखार इरादों सपाट चेहरों और प्रतिक्रियाओं के ठंढेपन में कविता उसके बिस्तर पर तवायफ होती जिसे रौंदता हुआ - कई रंगों की होली खेलता अदृश्य केसरिया तिलक लगाये शमशेर , अझेय , नागार्जुन , केदार पर समरस भाव से शातब्दी वर्ष में कविता लिखता हुआ वह हिंदी प्रदेश में महाकवि की दौड़ में शामिल होने के लिए साध रखा था कुछ युवा कवि को और पुरस्कारों के लिए अपनी कुंठाओं का झोला फैलाये घूम रहा था ।
.(2)
मेरे मीर मेरे ग़ालिब मेरे कालिदास मेरे मुक्तिबोध ----- अच्छा है कि तुम नहीं हो कविता की हत्या होते समय में और तुम्हारी कविता भी अरक्षित होती जा रही है जिसे बचाना जरूरी है बहुत ।
आज भी कुछ खास नहीं था रोज की तरह था दिन दुपहर में ख़ामोशी थी हवा में खुश्की पतों पर धूप बिखरी थी एक हवाई जहाज़ अभी अभी ऊपर से निकला और बादलों में गुम हो गया एक गिलहरी उसकी आवाज़ से रुकी इधर देखा- उधर देखा फिर डरी सी कोटर में जा छिपी शाम भी आज बारिश में भीगने के बाद नम थी मेरे आसपास हवाएं अकेली थी मैं कहाँ थी अकेली मेरे पास तो वक्त था खिले फूल सा जो धीरे धीरे मुरझा रहा था दूर कहीं कोई गा रहा था एक दिन वो आएगा जब परिंदा घरोंदा छोड़ कर उड़ जायेगा सच ह़ी तो है वक्त भी तो एक परिन्दा है हम देखते रह जायेंगे वो उड़ जायेगा !
आखिरी बार !
आखिरकार डरी हुई नवजात चिड़िया की तरह होंठ हिलाते हुए दादी ने अपनी झुरी भरी हथेलियाँ हवा में फैला दी थी पर कोंन देखता? अखबारों में उलझे चाय की चुस्कियां लेते इधर उधर समूह में बतियाते शादी में आये लोग गपशप में व्यस्त थे बाहर हलवाई से बड़े काका बहस कर रहे थे और काकी मेहँदी का कटोरा थामे पूँछ कटी छिपकली सी खिसक गयी थी भाई- भाभी, नन्द- देवर और हुल्लड़ मचाते युवा, बच्चे बेमतलब यहाँ से वहाँ व्यस्त दिखने की कोशिश में भाग रहे थे ताई अब भी नायन काकी से अपने गुजरे ज़माने का इतिहास दोहरा रही थी माँ समर्थन में सिर हिलाती उबटन घोलती धीरे धीरे गणेशजी के गीत गा रही थी बाहर ढोलक की थाप पर मोहल्ले की लड़कियों की बन्नी-बन्ना गाती मिली जुली आवाजे घर में हवा की परियों के साथ लहरा रहीं थी उधर पिता ताऊ जी के साथ बैंक जाने को तैयार थे सुबह धीरे धीरे सरक रही थी कोने में बैठी बन्नी उठी और दादी की झुरियों भरी हथालियों को थाम बोली "अम्मा कुछ चाहिए" धुंधली आँखों से पोती को टटोलती दादी ने रुंधे गले से कहा "गुसलखाने ले चल बिट्टो बस आखिरी बार "!
अपने भीतर
आज फिर मैं दाखिल हुई अपने अंदर टटोलती रही अपनी रूह देखा एक आइना है वहाँ जो मेरा अक्स दिखा रहा था मैं सचमुच अपने आपसे मिलना चाहती थी रूह के प्रवेश पर " स्वागत" लिखा था मेरे पास प्रश्नों के रंग बिरंगे परींदे थे जिनके साथ मैं भी अपने ह़ी भीतर उड़ रही थी मुझे लगा यह उड़ान काफी थी रूह कितनी भी छोटी हो उसकी खिड़की से देखा जा सकता है एक नया आसमान मैंने खोल दी मन की खिड़की और जिंदगी के मोहपाश का द्वार खोल अपने आप से मिलकर बाहर निकल आई!
काका’ वेटिंग रूम में फँसे देहरादून । नींद न आई रात भर, मच्छर चूसें खून ॥ मच्छर चूसें खून, देह घायल कर डाली । हमें उड़ा ले ज़ाने की योजना बना ली ॥
किंतु बच गए कैसे, यह बतलाएँ तुमको । नीचे खटमल जी ने पकड़ रखा था हमको ॥ हुई विकट रस्साकशी, थके नहीं रणधीर । ऊपर मच्छर खींचते नीचे खटमल वीर ॥
नीचे खटमल वीर, जान संकट में आई । घिघियाए हम- “जै जै जै हनुमान गुसाईं ॥ पंजाबी सरदार एक बोला चिल्लाके – | त्व्हाणूँ पजन करना होवे तो करो बाहर जाके ॥
-काका हाथरसी
जब किसी दिन काम वाली न आये ..........
आँखें नींद से भरी हों और अंगडाई अभी ले भी न पाए पति और बच्चो के नाश्ते के बारे अभी सोच भी न पाए एक संदेशा चौंका जाए ,नींद आँखों से ऐसे भगा जाए
जब किसी दिन काम वाली न आये......
मूवी ,शौप्पिंग और मस्ती के अरमान सारे पानी में बह जाए पति के साथ लौंग ड्राइव जाने के सपने अधूरे ही रह जाए केंडल लाइट डिनर से मैन्यु घूम कर दाल चावल पर आ जाए
जब किसी दिन काम वाली न आये........
पूरे महीने की भड़ास पति को हेल्प न करने में निकल जाए बच्चो पर गुस्सा उनकी बिखरी किताबें , जूते देख उतर जाए काम देख देख कुछ समझ न आये ,हालत खराब होती जाए
जब किसी दिन काम वाली न आये .......
रोमांस की ऐसी तैसी कर पति को केवल ब्रेड,बट्टर खिलाये बच्चो को भी दुलार कर ,मुनहार कर मैग्गी खाने को मनाये जींस टॉप से औकात नाइटी पर एप्रन बाँधने पर आ जाए
जब किसी दिन काम वाली न आये .......
उस इंसान की खैर नहीं जो बाहर दरवाज़े पर बैल कर जाए फ़ोन उठाया भी तोह वक़्त बस बाई को कोसने में निकल जाए हमसे ज्यादा कौन है दुखी इस दुनिया में यह सब को जतलाये
जब किसी दिन काम वाली न आये ........
हस्ती घर की महारानी और राजरानी से नौकरानी पर आ जाए सारी अदाएं बर्तन, सफाई वाली की झाड़ू में सिमट आये वो हर काम के पैसे ले छूटी कर घर बैठी ऐश फरमाए
हम सारे काम करके भी दो शब्द शाबाशी के भी न पाए
जब किसी दिन काम वाली न आये......
थकावट से चूर बदन से हर पल आह सी निकलती जाए खुद से ही लडती खुद से ही जूझती दिल में बाई को कोसती जाए कल लुंगी खबर ,कर दूंगी छूटी ये खुद से वाएदा करती जाए
जब किसी दिन काम वाली न आये ......
कल आ जाए बाई ये सोच कर रात भर प्रार्थना करती जाए सुबह उसके आने पैर गुस्सा भूल उससे खूब खिलाये खूब पिलाए कल तक जो कोसती थी जुबां आज वो मिश्री सी घुल घुल जाए
जब अगले दिन काम वाली आ जाए .......
-रश्मी तरीका
अपच
सुनी तूने क्या एक बात नई प्रार्थना है पर किसी से कहियो नहीं बात नहीं के 47 की गोली है अपने तक ही रखें यह अब अपनी जिम्मेदारी है
सुनते ही आँखें चौड़ गईं,पेट में उमेड़ उठी तुरंत ही फोन घुमाया, दूसरी को बताया दूसरी ने तीसरी और तीसरी ने चौथी को और देखते-देखते हैजा फैल गया,,,
-शैल अग्रवाल
गर तुम...
ताजमहल देखकर पत्नी मन ही मन डोली चहककर पति से यूँ बोली- वारी जाऊँ सुन्दर इमारत पर प्यार की संगमर्मरी इबादत पर कितना प्यार करता था शाहजहाँ मुमताज से...
पत्नी की बात समझ में तो आई, पर पति को पच न पाई तुरंत ही अपना प्यार जताया बाँहों में लेकर समझाया- कौन सी बड़ी बात है यह क्या अनोखा कर गया वह सभी बहुत प्यार करते हैं पत्नी से जैसे जान हम तुमसे, ताजमहल जैसा कुछ जरूर बनवा देंगे पर तुम पहले मर कर तो दिखलाओ।
-शैल अग्रवाल
दरोगा जी समझ नहीं पाए
हाए हाए! दरोगा जी कुछ समझ नहीं पाए!
आश्चर्य में जकड़े गए, जब सिपाही ने उन्हें बताया— रामस्वरूप ने चोरी की फलस्वरूप पकड़े गए।
दरोगा जी बोले— ये क्या रगड़ा है? रामस्वरूप ने चोरी की तो भला बिना बात फलस्वरूप को क्यों पकड़ा है? सिपाही बार-बार दोहराए— रामस्वरूप ने चोरी की फलस्वरूप पकड़े गए। पकड़े गए जी पकड़े गए पकड़े गए जी पकड़े गए!
दरोगा भी लगातार उस पर अकड़े गए।
दृश्य देखकर मैं अचंभित हो गया, लापरवाही के अपराध में भाषा-ज्ञानी सिपाही निलंबित हो गया।
रागरंग की तरह ही, हास-व्यंग्य भी, चाहें न चाहें, देखें या न देखें, कोने-कोने बिखरा पड़ा है जीवन और मानव समाज में कभी गुदगुदाता हंसाता तो कभी दिवास्वप्न देखती आँखों पर पानी के छींटे देता और तब भी न जगें तो भरपूर चांटे की तिलमिलाहट छोड़ता । फिर भी व्यंग्य किसी भी परिस्थिति में मात्र मखौल या छिछोलापन नहीं है, ना ही हूबहू प्रस्तुत करती कैमरे की आंख ही। यह काम तो भांड़ और विदूषक भी भलीभांति कर ही लेते हैं।
जीवन की करुणतम या विषमतम परिश्थियों से उत्पन्न हो और सहित में हो वही व्यंग्य साहित्य की विधा कहलाएगा या सुपाच्य हो पाएगा। सत्य के साथ-साथ शिव और सुन्दर का समागम जरूरी है इसमें। सूक्ष्म और पारदर्शी दृष्टि व सहज, सहृदय जन-हितकारी समझ जरूरी है लेखक के लिए।
लोकोक्तियों और मुहावरों के माध्यम से इस 'व्यंग्य' को समझने की कोशिश करते हैं । लोकोक्तियाँ और मुहावरों का भी तो अपना एक इतिहास ... एक धरोहर है, किसी भी संस्कृति और समाज में। हमारे त्रसित और जर्जर समाज में तो हास्य-व्यंग्य से भरी टिप्पणियां कहीं भी पीछा ही नहीं छोड़तीं, क्योंकि जहाँ मुर्दों तक की जान खतरे में हो, वहां तो जो न पकड़ा जाए वही साधू है और चार अंधों में काने का राज्याभिषेक होगा ही। लोकोत्तियां, मुहावरे और नीतिकथाओं के रूप में हास्य- चित्रण व शब्दांकन, पग-पग और यत्र-तत्र-सर्वत्र दिखता रहता है; चाहे वह बिल्लियों के झगड़े में बन्दर बांट की बातें हों, या फिर लोमड़ी के खट्टे अंगूरों की; चाहे हम 'आधी छोड़ पूरी को धावै, आधी रहै न पूरी पावै,' की क्रिया-प्रक्रिया देख रहे हों, या ' अपना उल्लू सीधा करने के लिए ' ' गधे को बाप बनाने की ' या फिर मात्र ' टेढ़ी उँगली से घी निकालने की ' या 'नाच न आवै आंगन टेढ़ा ' की ही, क्यों नहीं...तुरंत कई चित्र उभर आते हैं, संदर्भ जुड़ जाते हैं और पूरी-की-पूरी ’कलई खुल जाती है’ आँखों के आगे।
' सैंया भए कोतवाल तो हमें डर काहे का ' जैसी हास्यास्पद कुसंगतियां और विसंगतियां तो समाज में सदैव से रही हैं और रहेंगी ही, क्योंकि ' पांचों उंगलियां तो भगवान ने भी बराबर की नहीं बनाई'। जब आज भी जाने कितनों ने ' अँधे के आगे रोकर' अपने 'नैना खोए' हैं तो हम आप भला कैसे अकेले-अकेले भाड़ फोड़ सकते हैं।
विसंगतियों के साथ कैसे भी जीना सीख ही लेता है आदमी और उसका बनाया यह भद्र समाज। आजभी जाने कितने ' धोबी के कुत्ते, घर के न घाट के' बने दरदर भटक रहे हैं और आज भी न जाने कितने गधे इंसान के रूप में आखिरी सांस तक जीवन का बोझ ढोए जा रहे हैं, कोल्हू के बैल से पिस रहे हैं, जब कि उनके बगल में ही कहीं कोयल के अंडों को कौवे सींच रहे हैं तो कहीं पीतल पर सोने के मुलम्मे पर मुलम्मे चढ़ाकर असल रूप में बेचा जा रहा है।...' लाठी वाला' ही तो आज भी ' भैंस हांकता है' और हम सब जो 'आंख के अंधे' हैं ', ' नाम नयनसुख ' पाकर खुश हैं।
कितने भी हम 'गाल बजाएं 'वास्तविकता तो यह है कि ' जाकी न फटे बिबाई, वह क्या जाने पीर पराई' - हास-परिहास, कहीं उपहास न बन जाए और चोट पहुंचाए, यह एक व्यंग्यकार की बड़ी जिम्मेदारी है। ध्यान न दिया जाए तो एक सहज व निश्चल सा मज़ाक को भी आक्रामक या बेहद करुण या कठोर में तब्दील होते हुए देर नहीं लगती ... कभी-न-कभी कुछ पढ़ते-लिखते, आम जिन्दगी से जीते- गुजरते हम सभी ने यह कई बार महसूस भी किया होगा। तभी तो कहा जाता है –शब्द संभाले बोलिए, शब्द तीर संधान। यानी की प्रत्यंचा पर कसे तीर की तरह इनका निशाना अचूक भी है और घातक भी।
व्यक्तिगत चोट और तमाचे की तिलमिलहट कभी नहीं, हास-परिहास। उत्कृष्ठ साहित्य उठाता है, गिराता नहीं।...व्यक्ति को भी नहीं और मन को भी नहीं, चाहे वह हास्य व्यंग्य ही क्यों न हो! माना, सामाजिक और व्यक्तिगत दोनों ही परिस्तिथियों में हास्य की शक्ति को नकारा नहीं जा सकता, परन्तु यह भी एक गंभीर दायित्व है और किसी भी अन्य सशक्त औजार की तरह ही, इसका भी सटीक उपयोग बेबजह और हर समय नहीं किया जा सकता... ना ही बिना सीखे और सोचे-समझे बगैर ही।
गुलाबी, नीला, काला कई-कई रंगों का हास्य आदि काल से ही हमारे बीच रहा है...एक-एक चुटकुले और कहकहे के बीच रचा-गुंथा, बात फिर अब चाहे किसी भी युग, या समय की क्यों न रही हो। एक सेव के स्वाद में भटक कर एडम और ईव का यूं स्वर्ग छोड़ आना, दशरथ की एक भूल का भुगतान पूरे परिवार को वन-वन भटक कर और उनके वंशजों द्वारा आजीवन भरते रह जाना, द्रोपदी की एक ठिठोली पर पूरा महाभारत मच जाना; और ट्विन टावर के उड़ते ही सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था का ताश के पत्ते-सा ढह जाना... सोचो तो हास्यास्पद ही परिणाम तो हैं जीवन के..'.कौमेडी ऑफ एरर ' और हर विकसित-अविकसित मानव सभ्यता का इतिहास भरा पड़ा है इनसे ।
हास्य की जरूरत मानव समाज को सदा रहती है और रहेगी ही; इसीके सहारे तो चोटकर खाकर आदमी हो या समाज फिरसे उठने की शक्ति ढूंढ पाता है। आसपास का, बीच का कूड़ा साफ कर पाने का साहस जुटा पाता है...पीड़ा और अपमान को भूल पुनः संगठित होता है...मुहावरों के शब्दों में कहूं तो पुनः मुंह दिखा पाता है। अतिशयोक्ति नहीं होगी यदि कहा जाए कि समाज में मेहतर, विदूषक और चिकित्सक तीनों भूमिकाएँ निभाता है व्यंग्य। हास्य का उपयोग मानसिक रोगियों के उपचार तक के लिए मध्यकालीन युग से ही किया जाता रहा है। कहते हैं आदमी जब हंसता है तो शरीर का एक-एक स्नायु तनावमुक्त हो जाता है और सारी थकी मांसपेशियां फिरसे आराम की स्थिति में आकर पुनः स्वस्थ व लचीली होने लगती हैं। आधुनिक जीवनशैली में तनाव से मुक्ति की कितनी जरूरत है, यह अब कोई कहने या लिखने की बात नहीं रह गई है । मुश्किल तो बस इतनी-सी है कि अन्य संवेदनाओं की तरह ही हास्य भी एक व्यक्तिगत रुचि और अनुभव ही तो है। किसको किस बात से गुदगुदी होगी, कौन कब गमक उठेगा, यह कारक भी तो इतना ही विस्तृत और भिन्न है जितना कि खुद भिन्न-भिन्न रूप और स्वभाव वाला आदमी, या फिर उसके द्वारा संजोए रीति-रिवाज व मान्यताएं... संस्कृति और प्रचलन...विविध व बहुरूपी समाज ! इसी संदर्भ में याद आ रहा है काका हाथरसी का धमधूसर कव्वाल, जिसे स्टेशन से घर तक ले जाने के लिए तांगे वाले ने दुगने किराए की मांग की थी क्योंकि एक नहीं दो चक्करों में ही वह उसे घर ले जा पाता, या फिर सुरेन्द्र शर्मा का वह बच्चा जो बड़े के इतिहास और भूगोल के भारी-भारी प्रश्नों से तंग आकर, एक दिन उसी का ज्ञान जांचते-जांचते, उससे रामलाल के बारे में पूछ बैठता है। प्रस्तुत है ब्रिटेन के जाने माने कवि पद्मेशगुप्त का एक हंसाता चुटकी लेता दोहाः
'' सीता बोली राम से, अच्छा है यह बनवास कौन भुगतता वहां भला, तीन-तीन थीं सास। ''
या फिर त्रिशूल कार्तिकेय की कविता ' कविता की स्वर्ण जयन्ती ' । जीवन में भी ऐसी स्वर्ण जयन्तियां आपने भी बहुत देखी, सुनी और मनाई होंगी-
'' एक तथाकथित अखिल भारतीय कवि ने अपनी इकलौती कविता काव्य-मंच पर पचासवीं बार सुनायी श्रोताओं ने- तालियों की गड़गड़ाहट के साथ कविता की 'स्वर्ण जयन्ती ' मनाई ''
समाज के हर क्षेत्र में पल-पल ही आदमी एक दूसरे की बखिया उधेड़ने में लगा रहता हैं फिर भावनाओं पर कलम की कैंची चलाने की या व्यंग्य की क्या जरूरत है?...सोचने की बात है। सुलझे व्यंगकार की जिम्मेदारी है कि वह वक्त की नब्ज को पकड़े। नित नए और तेजी से बदलते समाज की विसंगितयों और विद्रूपताओं को न सिर्फ समझे, सलीके से प्रस्तुत करे और समाधान भी इंगित करे। अपनी बहु प्रचलित व प्रशंसित विधा चंपू के लिए हमारे दौर के प्रसिद्ध व्यंगकार और हम सबके प्रिय श्री अशोक चक्रधर जी लिखते हैं-
चंपू होता है, अन्नकूट की तरकारी। गद्य, पद्य, नाटक, नौटंकी, चीजें गड्डमड्ड सारी। यहाँ सभी विधाओं में विधाता अपना मुंह खोलता है।
चंपू में सपने से लेकर किचन के बर्तन तक सब बोलते हैं। और सच बोलते हैं।
सच बोलने वाले के पास एक लम्ब्रेटा स्कूटर होना चाहिए, सच की एक किक मारे और लंबा होले और दूर जाकर गाए - ओले-ओले-ओले।
सफल व्यंगकार समाज की नब्ज पकड़ता और पकड़ाता है। तत्कालीन लहरों के प्रवाह को समझता और अपनाता है और उसमें तैरने की प्रक्रिया में और निखारता है, डूबता नहीं।
अकबर बीरबल के चुटकुले हों या टोडरमल की उक्तियाँ या फिर हमारे प्रिय कवि अशोक चक्रधर जी के चंपू या मि. बीन की बेवकूफी की हद तक अबोध हरकतें, नेताओं के निर्णय और कार्य प्रणालियों से प्रेरित नित-नित नए और दिलचस्प कार्टून- चुटकुले, हास-परिहास और व्यंग्य आज मानव सभ्यता का अभिन्न हिंसा बन चुके हैं और आगे भी रहेंगे । कैसे भी आए हंसी, यदि एक भी उदास को हंसाया जा सके, भूल और कुरूपताओं का..विसंगतियों का अहसास दिलाया जा सके, तो यह एक बड़ी उपलब्धि है।
कुछ दिन पहले तक मेरी हालत बहुत खराब थी . मुझे कहीं से कोई भी अटेंशन नहीं मिल रही थी . हर कोई मुझे बस टेंशन देकर चला जाता था , जैसे मैं रास्ते का भिखारी हूँ और मुझे कोई भी भीख में टेंशन दे देता था. मैं बहुत दुखी था . कोई रास्ता नहीं सुझायी देता था. मुझे कहीं से कोई भी अटेंशन मिलने के असार नज़र नहीं आ रहे थे .मैंने बहुत कोशिश की , इधर से उधर , किसी तरह से मुझे अटेंशन मिले , लेकिन मुझे कोई फायदा नहीं हुआ. उल्टा टेंशन बढ गयी . ऊपर से बीबी –बच्चे और आस पड़ोस के लोग और ताना मारते थे, कि इतनी उम्र हो गयी , मुझे कोई जानता ही नहीं था . रोज अखबार और टीवी ,रेडियो में दूसरों के नाम और उनके किये गए अच्छे –बुरे काम देख-पढ़-सुन कर दिल जल जाता था . मुझे लगने लगा था कि मेरा जन्म बेकार हो गया है .
थक –हार कर मैंने अपने सबसे अच्छे दोस्त को फोन लगाया और उससे अपना दुखडा रोया . उसने मुझे बहुत समझाने की कोशिश की ,कि अटेंशन पाने के चक्कर में मेरी टेंशन बढ जायेंगी . उसने कहा कि , अटेंशन सिर्फ बुरे कामो में ज्यादा मिलती है , अच्छे कामो में कम मिलती है . अब इतने बरसो से मैं अच्छा बनकर रहा हूँ , लेकिन मुझे तो कोई अटेंशन नहीं मिली , सो सोच लिया कि बुरा बनकर ही अटेंशन लूँगा .उसने बहुत समझाया ;लेकिन मैंने एक न सुनी , मैंने उससे कह दिया कि अगर वो मुझे कोई उपाय न बताये तो वो मेरा दोस्त नहीं .
अब बरसो की दोस्ती दांव पर थी , उसने मुझसे पुछा कि अगर मैं ऑफिस में कोई पैसो की गडबड करूँ तो मेरा नाम पुलिस के पास जायेंगा और इस तरह से मुझे अटेंशन भी मिलेंगी . मैं थोडा सा हिचखिचाया , मैंने कहा यार इतने बरसो में जो नहीं हुआ , वो काम करके , बुढापे में क्यों अपना नाम खराब करू. .फिर उसने कहा कि मैं अपने बॉस को छुरा भोंक दूं , शायद इससे मुझे प्रसद्धि मिल जाए . मुझे उसका ये उपाय पसंद तो बहुत आया , क्योंकि मैं अपने बॉस को सख्त नापसंद करता था. लेकिन छुरा मारने के नाम से दिल धडक गया , क्योंकि आज तक मैंने कोई मार –पीठ नहीं की थी . मैंने उससे कहा कि मैं उसके खाने में जहर मिला देता हूँ ..दोस्त ने पुछा लेकिन इससे तेरी तरफ कोई अटेंशन नहीं आयेंगा . किसी को जब पता ही नहीं चलेंगा कि तुने ये किया है तो तेरी तरफ किसी की अटेंशन नहीं आएँगी . उसकी बात में दम था . फिर उसने कहा कि उसके चेहरे पर स्याही फ़ेंक दे . जब वो किसी मीटिंग में होंगा , तब तुझे अटेंशन मिल जायेंगी . उसका ये आईडिया मुझे अच्छा लगा.
दूसरे दिन , जब ऑफिस की बोर्ड मीटिंग थी , तब मैंने भरी मीटिंग में अपने बॉस पर चिल्लाया और उससे कहा कि उसने मेरी जिंदगी खराब कर दी है , और ये कहकर गुस्से से अपने पेन की स्याही उसके ऊपर फ़ेंक दी . वो सावधान था , वो झुक गया , और मेरी द्वारा फेंकी गयी स्याही हमारे कंपनी के मालिक पर गिरी . मेरे कंपनी के मालिक ने दुनिया देखी थी , उसने मेरा गुस्सा सहन कर लिया और समझदारी से काम लिया , उसने मेरे बॉस की और मेरी तनख्वाह २५% कम कर दिया और कहा कि अगली बार ,इस तरह की घटना होने पर ,हम दोनों को नौकरी से हटा देंगा . इस घटना से मुझे कोई अटेंशन नहीं मिली .लेकिन घर आने पर पत्नी ने मेरी तनख्वाह कम होने वाली बात पर ऐसा रौद्र रूप दिखाया कि मेरे तिरपन कांप गए.
मैंने फिर अपने दोस्त को फोन किया , कहा कि मुझे कोई ज्यादा अटेंशन नहीं मिली है और अब लोग इस घटना को भूल भी चुके है . मैं कुछ धमाकेदार कार्य करना चाहता हूँ . कुछ रास्ता बताये. मेरे दुनियादार दोस्त ने कुछ देर सोचा और कहा कि यार तू मोहल्ले की कोई औरत को छेड दे, पुलिस आकर तुझे ले जायेंगी और तुझे इस दुष्ट काम के लिये हर कोई कोसेंगा और तेरी बड़ी बदनामी होंगी . इस काम से तो तुझे १००% अटेंशन मिल जायेंगी . बात में तो दम था, कॉलेज के जमाने में अक्सर ऐसा करने से मोहल्ले में बाते होती थी ..सो मैं उसकी बात मान गया .
मैं शाम को मोहल्ले के नल पर जाकर पानी भरने के लिये बाल्टी हाथ में ली . मेरी पत्नी ने कहा कि , मेरी तबियत तो ठीक है न ? जिस आदमी ने जिंदगी में काम नहीं किया वो अब पानी भरने जा रहा है . मैं कहा कोई खास नहीं , बस यूँ ही तुम्हारी मदद करना चाह रहा हूँ . मोहल्ले में एक ही नल था और शाम को वहां बड़ी भीड़ रहती थी, बहुत सी औरत जिन्हें मैं भाभी कहता था [ और होली के दिन रंग डाल कर छेड़ता था ] वहां पानी भरने आती थी, वो सब वहां पर थी और मुझे देख कर आश्चर्य से हँसने लगी , सबने पूछा कि , आज होली नहीं है , फिर आज पानी भरने यहाँ कैसे. मैंने मुस्कराकर कहा , मैं तो आज ही होली खेलने के बहाने तुम सबको छेड़ने आया हुआ हूँ, ये कह कर मैं जल्दी से अपने पड़ोस की भाभी पर पानी डाल दिया . उसे बहुत गुस्सा आया , वो कुछ कहने ही वाली थी , कि पड़ोस की दूसरी भाभी ने उसके कान में कुछ कहा , बस फिर क्या था, थोड़ी ही देर में मैं और दूसरी औरते मिलकर नल पर पानी की होली खेलने लगे. मैं बड़ी कोशिश कर रहा था कि मैं औरतो को छेड कर भाग जाऊ. लेकिन ऐसा नहीं हुआ , खूब हो हल्ला होने के बाद , वहाँ की औरतो ने मुझे लाकर मेरी धर्मपत्नी को सौंप दिया और कहा कि मैं वह आकार सारी औरतो को पानी डाल डाल कर छेड रहा था. इतना कहकर वो सब तो चली गयी , लेकिन मेरा क्या हाल हुआ होंगा , उसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकता .. हाय , उस बात की याद आते ही तन – मन कांपने लगता है .
कुछ दिन बाद मैंने फिर अपने दोस्त को फोन किया , उससे कुछ नया रास्ता बताने को कहा, उसने कहा कि सुन तू किसी शराब के दूकान में जाकर हल्ला कर दे. पुलिस आकर तुझे ले जायेगी .आयडिया अच्छा था. फिर उसने कहा कि शराबी के दो ही ठिकाने , एक तो ठेका और दूसरा थाने !! , मैं मान गया , संध्या समय घर से निकल पडा और मोहल्ले के एकमात्र शराब के ठेके पर पहुँच गया . वहां जाकर शराब पी और नशे में मैंने वहां पर मौजूद दूसरे ग्राहकों और शराबियों से लड़ना शुरू किया , ये देखकर ठेके के मालिक ने मुझे झापड मारा और मैं बेहोश हो गया , उसने मुझे घर लाकर छोड़ा और मेरी प्यारी सी धर्मपत्नी को सारी बात सुनाई . कुछ देर बाद मुझे होश आया , देखा तो सामने यमराज मेरी पत्नी के रूप में बैठा था . उसकी बाद की कथा मत पूछिए .
अब मैं बहुत दुखी हो चूका था. कोई भी मुझे किसी भी प्रकार की अटेंशन नहीं दे रहा था . बल्कि जिंदगी में बहुत से टेंशन पैदा होते जा रहे थे. बहुत दुखी होकर मैंने फिर अपने दोस्त को फोन लगाया . उसे कहा कि ये मेरा आखरी फोन है उसे , अगर वो कुछ न कर पाया मेरे लिये तो मैं आत्महत्या कर लूँगा . मेरी ये बात सुनकर दोस्त ने घबरा कर कहा कि , मैं तुझे आखरी रामबाण उपाय बता रहा हूँ , इसकी सफलता की पूरी गारंटी है . उसने फुसफुसाकर मुझे एक घांसू उपाय बताया , उपाय सुनते ही मैं कह उठा “ what an idea sir जी !!!” अब रास्ता साफ़ था , मुझे अटेंशन मिलने ही वाली थी .
दूसरे दिन , शहर में उस राजनीतिक पार्टी की महासभा हुई और एक महान भ्रष्ट नेता भी आया . और एक अच्छा आदमी होने के नाते मुझे भी बुलाया गया . उस नेता का भाषण चल ही रहा था कि , मैं उठकर सामने गया और अपना जूता उसे दे मारा . बस फिर क्या था , हंगामा खड़ा हो गया , पुलिस ने मुझे पकड़ लिया , लेकिन फिर अचानक मेरी देखादेखी करीब ५ बंदे और खड़े हो गए और उन्होंने भी अपने जूते उस नेता की तरफ उछाल दिए .चारों तरफ जोरदार हंगामा शुरू हो गया , पुलिस ने हम सबको थाने लेकर गयी . और हमें हवालात में ठूंस दिया गया . शहर में बहुत धूम हो गयी थी , लोग सडको पर आ गए थे . टीवी , रेडियो और प्रेस में मेरी चर्चा हो रही थी . कुछ समय बाद , हमें एक वार्निग देकर छोड़ दिया गया . लोगो ने हमारी रिहायी पर उत्सव मनाया. मेरे गले में फूलो की माला थी और मुझे गाजे बाजे के साथ घर लाकर छोड़ा गया .
मुझे लगने लगा कि अब मुझे अटेंशन मिल रही है . मुझे मेरी अटेंशन एक पाव-किलो नज़र आ रही थी . घर पर मेरी बीबी ने मुझे मुस्कराकर देखा और कहा , तुम तो बड़े बहादुर निकले जी , और मुझे एक झप्पी दी , मुझे अब अटेंशन आधा किलो लगने लगी . थोड़ी देर बाद बेटे ने आकर पाँव छुए और कहा , Dad, I am proud of you . मुझे अब अटेंशन एक किलो नज़र आने लगी , मुझे बड़ी खुशी हो रही थी . पास पड़ोस के लोग आये और कहने लगे , कि मैं उनके मोहल्ले में हूँ , इस बात पर उन्हें गर्व है . मेरी अटेंशन अब ५ किलो हो गयी थी . शहर के लोग मेरा आदर सत्कार कर रहे थे, हर कोई मुझे अपने सभा और कार्यक्रम का अध्यक्ष बना रहा था . मेरा अटेंशन अब १० किलो हो गया था . हर अखबार , टीवी, रेडियो में मेरे ही चर्चे थे, पान ठेले से लेकर सब्जी मार्केट तक और सिनेमा हाल से लेकर लोकसभा तक , हर जगह बस मैं ही छाया हुआ था , अब मेरा अटेंशन ५० किलो का हो गया था . मैं बड़ा खुश था .
मेरे बॉस ने मुझे तरक्की दे दी थी , मेरे सहकर्मी रोज मुझे अपना डब्बा खिलाने लगे , ऑफिस की कुछ औरते मुझे देखकर मुस्कराने लगी ,यार लोग मेरे साथ अब घूमने आने के लिये तडपते थे. मेरी अटेंशन अब १०० किलो से ज्यादा हो गयी थी , मुझे परम खुशी हो रही थी . चारों तरफ मेरा नाम था , टीवी, रेडियो और अखबार मेरे नाम के बिना सांस नहीं ले पाते थे.
फिर अभी कल की ही बात है , जिस राजनैतिक पार्टी के नेता को मैंने जूता मारा था , उसी पार्टी ने मुझे अब मेरे शहर का उम्मीदवार बनाया है और मुझे चुनाव का टिकिट दिया है . अब मेरे चारों तरफ अटेंशन ही अटेंशन है , कहीं कोई टेंशन नहीं है . बस खुशी ही खुशी है . इतना अटेंशन तो मैंने कभी सोचा भी नहीं था . मैं अब अटेंशन के नीचे दब दब जाता था. मैंने अपने दोस्त को फोन करके कहा , यार तेरी युक्ति तो काम कर गयी , अब चारों तरफ अटेंशन ही अटेंशन है . . वो हँसने लगा .
अब कोई टेंशन नही है . आह जिंदगी कितनी खूबसूरत है ...वाह मज़ा आ गया !!!! हर तरफ सिर्फ मेरे लिये ही अटेंशन है .
अटेंशन जिंदाबाद !!! राजनीति जिंदाबाद !! जनता जिंदाबाद !! अटेंशन जिंदाबाद !!
गरीबी की रेखा, अमीरी की हेमा। अमीरी और अमरीकी दोनों एक जैसे लगते हैं जबकि अमरीका की हालत इन दिनों बहुत बारीक हो चुकी है। इतनी बारीक की देखने पर भर से उनकी अर्थव्यवस्था टूटने सी लगती है। वैसे यह जरूरी नहीं कि जो बारीक हो, वह टूटेगा ही, कई बार बारीक चीजें सबसे मजबूत होती हैं। मजबूत रिश्ते यूं ही पल भर में दरक जाया करते हैं लेकिन बारीक सी दोस्ती जन्म जन्म का साथ बन जाती है। रिश्तेदारी गरीबी हुई और मित्रता अमीरी। अब मित्रता अमरीका से हो तो अमीरी का ही आभास देगी, चाहे सत्यानाश ही कर दे।
गरीबी के करीबी न नेता होते हैं और न अभिनेता। कुछ अभिनेत्रियां होती भी हैं तो अभिनेताओं को गॉड फॉदर बनाकर अमीर हो जाती हैं। वह बात दीगर है कि बाद में हल्ला मचाकर अभिनेता की इज्जत और ख्याति दोनों को लूट लें। अमीर होना हर कोई चाहता है, जरूरी नहीं कि जो गरीब हो वही अमीर होना चाहेगा बल्कि जो अमीर है उसको और अमीर होने की वासना मन में बसी होगी क्योंकि उसे तो अमीरी का चस्का लग चुका है और जिस चीज का चस्का एक बार लग जाए तो छूटता नहीं है, न आसानी से और न मुश्किल से।
वैसे रेखा को गरीब नहीं कहा जा सकता है, अगर रेखा को गरीब कह रहे हैं तो वह कब मानहानि का मुकदमा ठोंक दे, कहा नहीं जा सकता और जो मुकदमा चलाने की हैसियत रखता है, वह गरीब हो सकता है, मुझे इसमें संदेह है। इससे जाहिर है कि गरीबी की न तो रेखा है, न बिंदी है। हां, हिंदी जरूर गरीब है, इनके मध्य में बिंदी होते हुए भी हिंदी की अंग्रेजी और काले अंग्रेजों द्वारा चिंदी चिंदी की जा रही है।
गरीबी की असलियत रेखा नहीं है, उसकी चोटी तो सदा शिखर पर ही रहती है और कभी घटती नहीं है। हां, उसे तार तार किए जाने की जरूरत है क्योंकि उनके खाते में न रोटी है, न कपड़ा है, बिजली और साफ पानी की तो बात करना भी बेमानी है। सिर पर उनके ओपन आसमान है जो सिर्फ तभी ढकता है, जब बारिश के पहले काले बादल आसमान पर घिर आते हैं। वे गरीबी की क्या कहें, अमीरी को भी ढक जाते हैं। वे जब ढकते है तो अमीर ढके जाते हैं। गरीब तो ढकने के बाद भी उघड़े हुए नजर आते हैं। यह उघड़ना, यह उधड़ना – गरीबी के पिचके गाल पर तमाचे का तड़ से पड़ना है। जो उधड़ते उधड़ते भी भरे बचपन और जवानी में अधेड़ बना देता है।
गरीबी हाथी जितनी छोटी भी नहीं है, उसे ढकना हाथी को ढकने से मुश्किल है। हाथी दिखता है, उसे ढकने के सफल उपाय किए जा सकते हैं। गरीबी दिखती नहीं है, उसे यहां से ढको तो वहां से नंगी नजर आती है और वहां से ढको तो यहां से। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि गरीबी वह नंगी है जो क्या तो पहनकर नहाएगी और नहाकर क्या निचोड़ेगी, इस चक्कर में वह खुद ही निचुड़ जाएगी। वैसे भी हाथी के हाथ नहीं, सूंड हुआ करती है और मजबूत चार पैर जो जाहिर करते हैं कि गरीबी महामजबूती से कायम है, इसे हिलाना पॉसीबल नहीं है।
कुछ रुपयों की गिनती करके किसी को गरीब और किसी को अमीर बतलाना, मानसिक दिवालियापन ही कहा जाएगा। अब चाहे वह आयोग बतलाए लेकिन आयोग पहले ही रोग से ग्रस्त है। जिस दिन नैतिकता, स्वस्थ परंपराओं और ईमानदारी के बल पर अमीरी और गरीबी का शक्ति परीक्षण किया जाएगा, उस दिन सचमुच में देश की असली गरीबी और अमीरी का हाल मालूम होगा। असली अमीर और असली गरीब की जानकारी लेना कोई हंसी खेल नहीं है। कोई ऐसा ठठ्ठा नहीं है जो इस ठाठ के पट्ठे के खेल का पर्दाफाश कर सके।
अमीरी के सामने गरीबी को तिगनी का नाच नचाने में आयोग पूरे मनोयोग से सक्रिय है। अमीरी तो वैसे सब अमीरों के देसी और विदेसी बैंक खातों में सदैव खिलखिलाती रहती है। वह नए नए रास्ते ढूंढ कर गरीब को और गरीब करने में सभी आंकड़ों की बाजीगरी के साथ जुटे हैं। इस जुटने को करतब दिखलाना भी कह सकते हैं परंतु आयोग को मदारी कहना उचित नहीं है। अमीर को अमीर दिखलाने की जरूरत ही नहीं है। पैसा पैसे को खींचता है और गरीबी आयोग को, वह गरीब को भी नहीं खींचती है। आयोग जितना गरीब के पास खिंचा चला जाता है, उतना उसकी पोल को खोलता है। उस समय वह बोलना तो सब सच चाहता है लेकिन बोलता सब झूठ है क्योंकि झूठ ठूंठ है। सच सुनने से सब रूठ जाते हैं। झूठ बोलने से कोई ठूंठ नहीं होता। एक अतीव सक्रियता जाग उठती है जिसे जागरूकता भी कहा जा सकता है। जागरूकता में रूकता कुछ नहीं, बस गरीबी के विरुद्ध अपनी चैतन्यता दिखाने को सब जाग जाते हैं और गरीब के भाग सो जाते हैं। आप तो जाग रहे हैं न ?
नेता जी किसी भी दल के नेता नहीं है। नेता-बिरादरी में उठना-बैठना उन्हें पसन्द नहीं है इसलिए दोस्तों ने उन्हें यह नाम दे डाला है। लिबास भी उनका यूथ0-लीडरवाला है-खादी की गंजी (जिसमें नोटों की गड्डी रखने के लिए गहरी जेब हो) खादी का कुर्ता-पैण्ट, जवाहर जाकेट और कोल्हापुरी चप्पल। गाँधी टोपी नहीं पहनते कि ‘ऊ सब ढकोसला अब चलता नहीं। एक तो ढकोसला करो, दूसरे खतरा मोल लो कि कोई भी एइरा-गइरा आ के उछाल दे टोपी ससुरी को।’ नेताजी को नेताओं की कृपा से नौकरियाँ मिलती रहती थीं लेकिन नौकरी उन्हें कभी रास नहीं आयी- ‘कहीं अपने जइसो का रासन-पानी नौकरी ससुरी से चल पाया है आज तक ?’ वह समझते हैं कि महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की सोहबत करते-करते वह स्वयं एक दिन महत्त्वपूर्ण हो जायेंगे- ‘भइया पालिटिक्स में हम जइसे चे गैन दालों ही की दाल गलती हय।’ न भी महत्त्वपूर्ण हुए तो कोई गम नहीं, ‘अरे माल-मत्ता तो बनबे करेगा !’ परसों शाम नेताजी हमारे यहाँ टपक पड़े।
मीटर-डाउन टैक्सी उन्होंने बाहर रोके रखी। हमने इस फिजूलखर्ची पर उन्हें प्रवचन नहीं दिया क्योंकि यह प्रवचन विशेष, नेताजी अनेक बार हमसे सुन चुके हैं। उनका कहना है कि ‘जब आखिर में पेमेण्ट किसी भगत से ही कराना हय तो इस टैक्सी ड्राइवर की गरीबी क्यों न हटवा दें। अउर बार-बार टैक्सी-स्कूटर खोजना ऊ सब हम से होता नहीं।’ नेताजी ने मुँह-हाथ धोया। शरबत पिया।, कुर्ता उतारा। गंजी से झाँकती गाड़ियों को भीतर धकेला और तकिया लेकर खटिया पर पसर गये हमने कहा, ‘‘लगता है आज कोई तगडी मुर्गी फंसी है !’’ नेताजी बोले, ‘‘अजी मुर्गी कहाँ हम-जइसे छुटभइय्यों के भाग में ? गउरइया ससुरी फँस जाये तो गनीमत।’’ फिर एक गहरा निश्वास छोड़कर उन्होंने कहा, ‘‘ब-हूत ‘‘मन्दा चल रहा है धन्धा। सैकड़ों-हजार से किसी का काम चला आज तक ? अचार मिलने वाली बात हुई यह तो, डउल करना हय आहार का !’’
हमने पूछा, ‘‘सैकड़ा हजार अगर अचार है तो आहार भला किसे कहा जाता है।’’ ‘‘कक्का,’’ नेता जी बोले, भला बताओ, वह नेता ही क्या जिसने अपना टार्गेट कम-से-कम एक करोड़ न रखा हो। ज्यादा लालच ठीक नहीं, एक करोड़ रुपय्या हुई जाय बस !’’ ‘‘चाहे कैसे भी ?’’ हमने टोका। ‘‘अब इसी कइसे-एइसे से हमें चिढ़ है कक्का ! अरे पइसा जइसे पइदा किया जाता है वइसे ही किया जायेगा ना, महीनत-मसक्कत से ! घर बइठे तो हमें मिल नहीं जायेगा। दउड़ेंगे। धूपेंगे, सऊदा करवायेंगे लोगन का सऊदा-सुल्फ के लिए चार अपनी गाँठ में भी आयेंगे।’’ ‘‘हेरा-फेरी को मेहनत-मशक्कत कहते हो ?’’ ‘‘फेरी लगाना मेहनत का काम है कक्का, अउर, हेरा-फेरी में तो पसीने छूट जाते हैं कमजोर लोगन के। अच्छी सेहत अउर मोटी चमड़ी, दुई ठो चीज जरूरी हय इस धंधे के लिए।’’ ‘‘लोग क्या कहेंगे ?’’
‘‘कउन लोग ? जो कुछ कहिने की हइसियत रखते हैं, उन्हें उन्हें खुदे इस धन्धे से फुर्सत नहीं ससुर कि किसी से कुछ कहें। अउर जो हैसियत नहीं रखते उनके कहिने से क्या होता है ? हाथी जा रहा है अपनी सान से, भूँकने दो कुत्तों को। जियादा ही भूँके तो डाल दो एक टुकड़ा उन्हें भी।’’ ‘‘हैसियतवाले सब लोग भ्रष्ट है ? कोई अपवाद नहीं ?’’ ‘‘अपवाद कोई होगा तो मारा जायेगा ससुरा। हइसियत छिनने की नउबत आयेगी तो खुद सही लाइन पर लग जाएगा।’’ ‘‘सब लोग घूम लेते हैं ? हर काम घूम से होता है ?’’ हमने पूछा। ‘‘किस्तमवाले लेते हैं, किस्मतवालों का होता है !’’ नेताजी ने कहा और चाँदी की डिबिया में से पान मसाले और तम्बाकू का मिश्रण ग्रहण किया। पीक-भरे मुँह से वह बुदबुदाये, ‘‘जीने के पचासियों तरीके हैं, कोई जीना चाहे तब न ! मिडिल क्लासवाले कलम-घिस्सू किर्रू क्या जानें जिन्दगी किस चीज का नाम हय ? जो लाइन से नहीं लगता कक्का उस ससुरे की जिन्दगी मार तमाम लाइनों में लगे रहने में बीत जाती है। कभी रासन की लाइनों में लगे हैं, कभी दूध की, कभी बस की लाइन में लगे हैं, कभी खइराती दवाखाने की ! ससुर मरते हैं तो घरवालो को लकड़ी के लिए भी लाइन लगानी होती है।’’ ‘‘सब !’’ नेताजी ने पीक थूकी, नौकर को बुलाकर पचास का नोट दिया और अतिरिक्त जलपान की व्यवस्था की। फिर उन्होंने अपने गुरुजी का एक किस्सा सुनाया।
‘‘एक मर्त्तबा,’’ नेता जी ने कहा और थोड़ा चूना जबान पर लगाया, ‘‘गुरुजी ने एक मोटी आसामी का काम हाथ में लिया। कुछ दिन बाद असामी मिला, बोला, चिन्ता में हूँ वह काम होगा कि नहीं ? गुरुजी बोले, आप काहे चिन्ता करते हैं ? अरे आपकी ओर से चिन्ता करने के पइसे हम लिए हैं कि नहीं ? काम आपका सब फिट है। मामला टिचन समझिए। असामी बोला, लेकिन उसमें तो ऊँचे लोग फइसला करने बैठे हैं। गुरुजी खीझे, बोले, बता दिया काम फिट हय, जियादा डीटेल में जाने की जरूरत नहीं। आसामी खुश हुआ। फिर उसने अपने अन्दाजे से एक रकम बतायी कि इतने में ही हो गया होगा काम। गुरुजी भिन्नाये, उन्होंने सुनायी फटकार। कहिन के, आप बिल्कुल आउट आफ डेट हो चले हैं। आपके जमाने में काम सस्ते में होते थे लेकिन होते वही थे जिनके होने की गुंजाइस हो। आज हर तरह काम काराये जा सकते हैं। पइसा, अलबत्ता, पहले से बहुत जियादा लगता हय।’’
‘‘अच्छा यह बताओ, एक ही करोड़ क्यों ?’’ हमने पूछा, ‘‘एक अरब क्यों नहीं ?’’ ‘‘कहा न जियादा लालच ठीक नहीं।’’ नेताजी बोले, ‘‘एक करोड़ हो तो घर में मउज-मस्ती ठीक रहे। जहाँ जाये वहाँ राशन पानी, रिहाइस घोड़ा-गाड़ी सबका इन्तजाम फिट हो। भगत मण्डली हमेसा साथ रहे, भजन-कीर्तन चलता रहे। बस !’’ ‘‘अच्छे काम क्यों न करो, जिससे समाज में नाम हो।’’ हमने शंका की। ‘‘ ‘‘आपकी सुई भी रिकार्ड पर वहीं अटकी हय कक्का।’’ नेताजी बोले, ‘‘किसी का कोई काम करा देना पाप है कि पुन्न ? जो लोग यह पुन्न कमा रहे हैं वे समाज में बदनाम हैं क्या ? हमें ही लो, आपो हमें नेताजी कहते हंय कि नहीं ? यह बदनाम हुआ कि नाम ?’’ ‘‘कोई ऐसा काम करने की इच्छा नहीं होती कि लोग याद करें ?’’ ‘‘लोग भगवान के बाद हमें ही तो याद करते हैं। काम फँसा, याद किया।’’
‘‘वह याद करना अलग है !’’ हमने कहा, ‘‘मरने के बाद भी तुम्हें याद किया जाए कोई ऐसा काम करना चाहिए।’’ ‘‘अब मरने के बाद कउन किसको याद करता है यह किस मरने वाले ने देखा है !’’ नेताजी बोले , ‘‘हिन्दू अपने शास्त्र में मामला जरूर फिट कर गये हैं कि तीन पीढी़ तक तर्पन हो और याद किया जाये। लेकिन रासन-पानी होगा तभी न सराद्ध-तर्पन होगा। तो अक्लमन्दी इसी में है कि आदमी अपने हाथों तीन पीढी़ के रासन-पानी का प्रबन्ध कर जाये। महँगाई के इस जमाने में भी एक करोड़ रुपया तीन पीढी़ के रासन-पानी के लिए काफी है।’’ नेताजी खटिया से उठे, फोन की ओर बढ़े, नम्बर घुमाते उन्होंने मुस्कराकर कहा, ‘‘इसी मारे हमने एक करोड़ का टार्गेट रखा है। देस के उनहत्तर करोड़ लोग ससुर, एक-एक करोड़ का टार्गेट बना लें तो उद्धार न हो जाये। मगर कोई जीना चाहे तब न।’’
हम कहना चाहते थे कि लुटने के लिए इस दरिद्र देश में 69 करोड़ के लिए एक-एक करोड़ रुपया कहाँ। देश में ऐसी समृद्धि कहाँ पैदा होगी कि सबको अच्छा ‘राशन-पानी’ मिल सके ? भौतिकता के पुजारी जब राशन-पानी के अभाव में मरने-मारने पर उतारू हो जाएंगे तब देश का ही नहीं, नेताजी और उनकी बिरादरी का क्या हश्र होगा ? हम कुछ कहें इससे पहले नेताजी को लखनऊ की लाइन मिल गयी, ‘‘मन्त्रीजी आँय ?’’ उन्होंने कहा, ‘‘जरा बात कराइए ! अरे हमारा नाम-वाम न पूछिए। उनसे कहिए आपके सी-इन-सी है दिल्ली से, चमचा-इन-चीफ !
असल में नेता जी जबसे कवि बने हैं; समस्या बढ़ती ही जा रही है। अक्सर ही पार्लियामेंट में बजट पेश करते-करते भावविभोर होकर कविता सुनाने लग जाते हैं और कवि सम्मेलनों में बढ़ती मंहगाई और देश के आर्थिक संकट पर भाषण दे आते हैं।
कल की ही बात ले लीजिए, एक अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में प्रसिद्ध हास्य कवि श्रोताओं को गुदगुदाते हुए सुना रहे थे- पत्नी बोली –ए जी, अमेरिका के कवि सम्मेलन से मेरे लिए के लेके लौट्ये? मै बोल्यो- डेढ़ लाख जूते मिले हैं, कहे तो थारे लिए भी ले आऊँ !
अभी वे अपनी हंसिका सुना भी न पाए थे कि आयोजक दौड़े-दौड़े आए और हंसी के फव्वारों बीच धीरे से कान में फुसफुसाए- अब आप किनारे बैठें श्रीमान। नेताजी, खजूरी मल हो चुके हैं विद्यमान। अपनी नवी-नवी पुष्तक ‘रूप के जाल ’ संग, चढावेंगे अब तो वो ही चोखो-चोखो रंग।‘
लार-सी बह आई कविता को रूमाल से पोंछते, चुपचाप कोने में जा बैठे कविवर बेचारे।
श्रोताओं की वाहवाही से गमकता माइक अब था छप्पन भोग का थाल, जिसको आसपास भिनभिनाती मक्खियों की निगाहों से बचाकर, बड़ी सुघड़ता से नेताजी ने लिया था अपने हाथों में बखूबी संभाल।
अब वे थे और था सामने बैठा विशाल जन समुदाय। देख और न कोई उपाय, खरहरा हाथ में लेकर बुदबुदाए कविवर नेताराम ‘कविता सुन्दरी मुझे लुभा रही है। ओजस्वी धारा बही जा रही है। कभी उबारती तो कभी डुबोती, नित नए करतब दिखला रही है।‘
दर्शकों को समझ नहीं आया, नेताजी भाषण दे रहे हैं या कविता पढ़ रहे हैं।...कुछ उचके-बिचके, कुछ ने इधर-उधर ताका-झांका, पर कोई करतब नजर नहीं आया बांका। सच कहें तो क्या कहना चाह रहे हैं यह तक नहीं जान पाए बेचारे। बढ़ती खामोशी और उलझन को भांप, नेताजी काल्पनिक आंसुओं को रूमाल से पोंछ, पुनः मुस्कुराए और हाथ जोड़कर कविता पसंद करने के लिए झटपट एक जोरदार धन्यवाद परोस लाए।...
अब ह़ाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगा। आगे वे क्या बोले, किसी को सुनाई नहीं देता था। सच कहें तो, वैसे भी कोई फरक नहीं था पड़ता था। अधिकांश की समझ को कविता और भाषण का भेद दुरूह था। नेताजी सामने हैं, यही बहुत था। चारो तरफ मदहोशी का आलम था। लच्छेदार शब्दों का जाम लबालब बहे जा रहा था। सेठ-साहूकार, लुच्चे-लफंगे, छोटे-बड़े, विद्वान-मूर्ख, भांति-भांति रूपी कवियों को संग बहाती, न्यूयार्क, पैरिस, लंदन घुमाती काव्य-धारा में एकत्रित हर व्यक्ति हाथ धोने को तैयार था और चुटकुले व फिल्मी गाने याद कर-करके कविता पर हाथ-पे-हाथ अजमाता जा रहा था।
विश्वास था सबको कि आज जो ये छोटे-बड़े नेता मंच से कविता सुनते-सुनाते जा रहे हैं, उसका असली राज अब उनके भी हाथ आ लगा है। यूं तो ये काव्य आयोजन वे भी आराम से कर सकते थे और नेताजी जैसी कविताएँ भी थोक में सुना सकते थे, बस वह दूसरी शर्त ही थी, जो परेशान कर रही थी। वाक् चातुर्य के साथ-साथ चंदा लेने और देने की की सामर्थ और नेतागिरी की चतुराई किस दुकान में मिलती थी-यही एक बात बारबार उनकी कविताई के आड़े आ जाती थी और कवि बनने के बन्द कर देती थी सारे द्वार। वरना, लक्ष्मी की कृपा से तो कल्लू हलवाई भी कुछ रबड़ी, कुछ जलेबी खिलाकर और पांच हजार रुपए का चंदा देकर ही बनजाता है शिरोमणि कविभूषण कल्लू राम। अब इस बात को उलटकर ऐसे भी समझा जा सके है कि आज के जमाने में कविता लिखना-पढ़ना भी नेतागिरी से कम जोखिम भरा काम नहीं। शौक यह राजसी है कोई आम नहीं। हां, हो भी क्यों न, दोनों को ही तो लाइट में रहना होगा, जरा भी बेवक्त की बूंदाबांदी हुई नहीं कि बेजोड़ के तारों से करेंट भी सहना होगा। चारो तरफ रिपोर्टर जासूसों का पहरा है और चतुर्मुखी राज्य करना...चौबीसों घंटे हंसी के गोलगप्पे तो कहीं वाहवाही खाना और परोसते जाना, बड़ों-बड़ों का हाजमा बिगाड़ने के लिए काफी होता है।
पर, हम ज्यादा इस फेर में न पड़कर जो सहज समानताएँ हैं एक नेता-अभिनेता और कवि में उन्ही पर नजर डालते हैं ताकि नेता-अभिनेता और समाजप्रणेता सभी की समझ में बात जरा और अच्छी तरह से आ जाए और कवि-समुदाय के सागर- किनारे बैठकर लहरें गिनना वे भूल जाएँ। अब विदेशों में ही नहीं, भारत के तटों पर भी तो चढ़ते-गिरते शेयर बाजार की तरह सुनामी वक्त-वेवक्त आता-जाता ही रहता है।
हाँ, तो जब-जब ये हाथ उठाकर, मुठ्ठी बांधे जोशीली कविता सुनाते हैं और तदुपरान्त चुपचाप पीछे के दरवाजे से सटक जाते हैं, कभी सड़े टमाटर तो कभी जूतों की माला से डर जाते हैं, तो आम आदमी को तो निश्चय ही कवि में नेता और नेता में कवि या अभिनेता नजर आने लग जाते है। वैसे भी भगवान के सिवा यत्र-तत्र-सर्वत्र प्रकट हो जाना फिर तुरंत ही अंतर्ध्यान भी हो जाना, गुर भी तो बस इन्हें ही आता है। सभी का मंच, माइक और माला का प्यार इतना गहरा है कि जनता जनार्दन के इर्द-गिर्द ही इनकी किस्मत का फेरा है। फिर भीगे जूतों और सड़े टमाटरों के हार से जो डर जाए वह कैसा नेता, कैसा अभिनेता और कवि तो हरगिज ही नहीं होता।...घड़ियाल की चमड़ी और घोड़े का जिगर, ये गुर तो घुट्टी मे ही सीखकर आते हैं ये। इनके लिए जीना-मरना एक वक्त-बेवक्त का गाना है। निरर्थक शब्दों के बुने जाल पर ही तो जीवन ठहरा है। हरेक के मन पर तारीफों का सदा रहता पहरा है। मनाना और मुकरना, वक्त पड़ने पर गधे को बाप बनाना भी तो भलीभांति इन्हें आता है। कोई सुने या न सुने, अपना ही गाना गाना है। शब्दों की ही तो ये खाते हैं। शब्दों को ओढ़ते-बिछाते हैं और थकें तो इन्ही पर सो तक जाते हैं। शब्द ही तो हैं इनके जो आम जनता को डुबाते और बहकाते हैं, दिन-रात सब्ज बाग दिखलाते हैं।
हां, तो कहाँ बहक गए हम आप, बात नेता-अभिनेता या कवि की नहीं, नेता जी की किताब की हो रही थी आज, उसकी मुंह दिखाई की हो रही थी। भूलना ही होगा कि कैसे ये शब्दों को थोक भाव से खरीदते और बिकवाते हैं और फिर कैसे-कैसे उन्हें दुकानों पर सजाते हैं।... खुद लिखते हैं, कुछ दूसरों से लिखवाते हैं। तो जनाब वक्तव्य खतम होते ही नेता जी के पी.ए. ने दुल्हन-सी लाल चुनरी और कई -कई की खरीदी तारीफों के वक्तव्य में लिपटी किताब निकाली और मेज पर मुंह दिखाई के लिए जमा दी। लोगों को पहले से ही खबर लग चुकी थी कि आज आम नहीं, नेताजी की पुष्तक के लोकार्पण की दावत थी। सो कवि सम्मेलन तो आने का मात्र एक बहाना था, कम-से-कम चार मिठाई और चार नमकीन गरमागरम चाय के साथ होंगे, हर व्यक्ति ने जाना-माना था।
चारो तरफ किताब का जोरदार प्रचार था। नेता-अभिनेता, सब्जी वाले, रिक्शेवाले सबके हाथ में एक प्रति किताब की और साथ में खड़े, मुस्कुराते नेता जी की छवि थी। हर अखबार और चौराहे पर, मोटर और बसों के पीछे यह छपी थी। कोने-कोने मुफ्त बांटी जा रही थी। जाहिर है कि कवि सम्मेलन पर भी छायी रही। कितने कविता के लिए, कितने चायपानी को पहुंचे, कहना मुश्किल था, पर वहां पर बड़ी भीड़ थी!
नेताजी ने चारो तरफ संतुष्ट नजर डाली। अब नेताजी के नाम के और कुछ नेताजी के काम के नारे लगा रहे थे। कुछ सिरफिरे तो एक दूसरे को एक-एक नारे के मिलते दाम भी खुश हो-होकर बतलाए जा रहे थे। पर, नेता जी, ठहरे नेताजी, धन्यवाद एक बार और जोर से देकर बात संभाल ली और उछलती पगड़ी ‘ चलता हूं। अभी शहर में किताब के दस बारह और लोकार्पण होने हैं’ कहकर तुरंत ही वापस भीड़ की बागडोर संभाल ली। पास के दरवाजे से बाहर की राह वे लेनेवाले ही थे, कि एक तख्ती पर लिखा नजर आया- ‘ गली-गली में शोर है, नेता हमारा चोर है।‘ नेताजी का माथा ठनका, तुरंत ही सीक्योरिटी को अलर्ट कर डाला- ‘ अब यह आत्मघाती कैसे आ धमका, सी.बी.आई की तो पहुंच नहीं यहां ? क्या पाकिस्तान का इसमें हाथ है, या फिर किसी बड़ी ताकत ने दिया साथ है? ‘
सीक्योरिटी ने तुरंत ड्यूटी कांस्टेबल से कम्प्लेन दर्ज करवाई और जल्द-से-जल्द आपतकालीन एक सुरक्षा मीटिंग बुलवाई।
‘घबराएं नहीं आप ‘- तसल्ली देता वह नेताजी से बोला- ‘ देखिए, अब इससे क्या? कार्यक्रम में बहुत फरक तो नहीं पड़ता। भारत है यह, यहां हर मिनट पर पचासों आदमी हादसे से है मरता। फिर यहां तो बस फोटो पर फोटो हैं और बातों पर बातें हैं। गरम-गरम चुस्कियां और चटखारे लेती चाटें हैं।‘
हर व्यक्ति अब फोटो खिंचवाए जा रहा था, कहकहे और यादों के बीच, परिचित-अपरिचितों को अजीबो-गरीब किस्से पर किस्से सुनाए जा रहा था। कहीं अंग्रेजों के जमाने की बातें थीं तो कहीं इमरजेन्सी की रातें थीं। कहीं ‘हलो माई डियर था ’ तो कहीं ‘ फीयर नौट, एवरी थिंग विल बी क्लीयर ’ था। कविता गवास की बदहजमी से परेशान कवियों के लिए अब वहां चारो तरफ वहां सुख-सरिता थी। कविता...और बस कविता थीं। न कोई बंदिश, न घंटी, और न घड़ी, मजे की बात तो यह कि- एक सुनाओ और सैंकड़ों की फरमाइश थीं।
शेर पर शेर चुटकुले पर चुटकुले बरसाती नदी से बहने लगे और आते-जाते छपाछप हाथ-पैर धोने लगे। देखकर इतना बहका-बहका आलम, एक मौकापरस्त नेता जी ने लपक कर नेताजी का पीछे-से पकड़ लिया दामन ... ‘कहां चल दिए आप श्रीमान, अभी तो किताब को सम्मान भी नहीं दिलवा पाया। आपके उपकार का पाई-पाई कर्ज चुकाऊंगा। कुछ आपको और कुछ खुद को, नित नए सम्मान दिलवाऊंगा।‘
नेताजी सुनते ही दरवाजे से पलट आए और दीवानों की महफिल में किताब की तारीफ में नए-नए कलमे पढ़वाए। उपस्थित जनों ने भी रुंधे गले से खूब सुना और सुनाया-‘ श्रीमान, रिधिमान हैं। अन्नदाता और नेता महान हैं। बरसों-से देश का भार उठाया है, निरक्षर हैं तो क्या, अब जब कलम आपने उठाई है। हमारी किस्मत भी तो संग-संग चमक आई है। देश-विदेश भ्रमण के किस्सों पर लिखी आपकी यह कविता की किताब, निश्चय ही, प्रेरणा ही नहीं हमारे लिए, संजीवनी बूटी और सपनों की एक खान है। थोड़े को ही बहुत समझिएगा, श्रीमान। जान लीजिए आप हमारी इस बात में कितना खम है, किताब की क्या कहें, जब कवर तक में दिखता इतना दम है।‘
कबूतर की तरह छाती फुलाकर नेता जी ने इधर-उधर देखा और गुटरगूं, गुटरगूं वाले भाव-विभोर अन्दाज में तुरंत ही संरक्षण का भरपूर दाना दे डाला।
अब सभी चौबीसों घंटे नेता जी के साथ ही रहते हैं। दिन-रात चुगाली करते हैं और सपनों की चारी खा-खाकर दिनरात ही गुटुरगूं करते हैं। सुबह उठते ही तोते-सा रोज दोहराते हैं... ‘श्रीमानजी आप महान हैं....वगैरह-वगैरह।‘
अब वे कविता की अपच से परेशान हैं। खाना-पीना तो दूर रहा, नेता जी की किताब से कविता सुनकर ही चाय की प्याली तक पी पाते हैं। नए-नए शौक की जो खुमारी है, नेता जी तो दिनरात उसी में डूबे हैं और वे बेचारे बगल में बैठे-बैठे सूखते रहते हैं। मन ही मन उस दिन को रोते हैं, जब मुफ्त के रसगुल्ले और समोसों का ध्यान आया था और अखबार में किताब के लोकार्पण की खबर पढ़कर नेताजी के साथ दोस्ती का पेंग बढ़ाया था।
परेशान हैं बेचारे कल जब एक महीना बीत जाएगा, तब तो होने ही होंगे सारे-के-सारे वारे-न्यारे। आखिरी कविता सुनते ही वह निर्णायक दिन भी आ जाएगा, जो उन्हें आजीवन कारावास की राह दिखलाएगा। वे मंत्री जी का भला कैसे सामना कर पाएंगे... किताब की शान में सच कहें या अपनी जान बचाएँ , निर्णय भला कैसे आखिर ले पाएंगे! पर हो पाए, या न हो पाए, जल्दी ही ढूंढना ही होगा अब तो उन्हें कि कौन सी कविता है किताब में, जो नेताजी को शीघ्र-ही श्रेष्ठ कवियों की कतार में पहुंचाएगी और सम्पूर्ण साहित्य की जान बन जाएगी।
उसदिन से आजतक वे दिनरात नेताजी की किताब के पन्ने पलट रहे हैं और शब्दों के एक बीहड़ जंगल में भटक रहे हैं। मिलजुलकर लगे पड़े हैं बेचारे, शायद कोई हीरा छुपा ही हो कोयले की इस खान में।
जान जो गए हैं बुद्धिमान, नेता जी और कवि, दो मन होकर भी, आज तक एक ही तो हैं जान।...
हमारे एक बुजुर्ग हुआ करते थे। अब नहीं हैं, मर गए हैं...। वे जब ज़िन्दा थे तब लेन-देन का व्यापार करते थे और बहुत अमीर थे। लोग दबी-जली ज़बान से उनकी पीठ पीछे कहा करते थे कि इस मुए लेन-देन के कारण ही वे इत्ते अमीर बने थे। अब यह बात भी लोगों की जली ज़बान से ही सुनी थी कि उनकी अमीरी का मुख्य कारण ‘लेन’ ही था। वैसे शौक उन्हें दोनो का था, पर लेन में कुछ ज़्यादा ही था...और इसमें वे कुछ भी ले लिया करते थे। रुपए, पैसे, भोजन, कपड़ा...यहाँ तक कि सुनसान जगह देख कर भीख लेने में भी संकोच नहीं करते थे। पर देन में वे सिर्फ़ उपदेश देने में विश्वास रखते थे। उनके नाते-रिश्तेदार, पास-पड़ोस के लोग उनकी देनदारी की आदत के चलते ही लेनदारी वाली आदत को भी नज़रअंदाज़ कर देते थे। कारण, उनके पास समय काटने का कोई और साधन भी नहीं होता था।
वे अमीर उपदेशक चूँकि हमारे बुजुर्ग भी थे, इस लिए उनके आदर्शों पर चल कर अमीर बनने के सपने हम भी देखा करते थे। शुरू में वे हमें ‘बच्चा टोली’ कहकर टाल जाया करते थे, पर एक दिन जब मनुआ ने नौटंकी वाले भिखारी का रोल निभा कर पड़ोस के लड़के से उसका कीमती पेन झटक लिया, तब उन्होंने अपनी दी हुई उपाधि हमसे छीन ली...। पर इससे हमारा नुकसान नहीं हुआ, बल्कि फ़ायदा ही हुआ। चूँकि उस घटना-दुर्घटना के बाद से उन्होंने हमें बच्चा समझना छोड़ दिया था, सो बहुत सी बातें वे हमारे सामने भी धड़ल्ले से बोलते थे और इस धड़ल्लेपन से हमने बहुत सी बातें सीख ली...।
अब यह बात सब जानते हैं (स्वीकार भले ही न करें) कि आज की ज़िन्दगी का पहला और आखिरी लक्ष्य अमीर बनना है, चाहे उसके लिए कुछ भी क्यों न करना पड़े। चोरी, डकैती, अपहरण, हत्या से लेकर नेतागिरी तक ही क्यों न हो...। पर इसके साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि इन सब में मेहनत के साथ-साथ जोखिम भी बहुत ज़्यादा है। चोरी-डकैती में पकड़े गए तो हड्डी-पसली सब बराबर कर दी जाएगी...। अब ऐसे में आदमी बिना हड्डी का अमीर बन कर करेगा भी क्या...? सीधा भी तो नहीं खड़ा रह पाएगा, जबकि अमीरी में सीधा खड़ा रहना बहुत ज़रूरी है और काफ़ी शान की बात भी, फिर...? अपहरण के धन्धे में भी कम जोखिम नहीं...। इसमें असफ़ल होने का अन्देशा कुछ ज़्यादा ही बना रहता है। पकड़े या पहचाने जाने पर मान-सम्मान का जो अपहरण होता है, सो तो होता ही है...। अगर उधर से एक धेला नहीं मिला तो अपहरण करके लाए हुए को खिलाने-पिलाने का जो खर्चा होता है, सो अलग...।
वैसे जोखिम तो हर व्यापार में उठाना ही पड़ता है और इस जोखिम को जो उठा लेता है, वही अमीर बन जाता है। बाकी तो ग़रीब बन कर जनम लेते हैं और गरीबिए में मर भी जाते हैं, यह बात भी हमारे वही बुजुर्ग बात-बात में बड़े ठसके से कहा करते थे...।
हमारे बाजूवाले घर में रहने वाला एक लड़का, जो डेढ़ पसली का था और उस पसली पर उस से भी आधी बिना बाँह वाली बनियाइन और उस पसली के नीचे मिलेट्री कलर की दो बित्ते की नेकर (जिसे वह अक्सर पूरी दिलेरी से अपनी कहता पर छोटा भाई उसे छीनते वक़्त उससे भी ज़्यादा दिलेर होकर उसे अपनी कहता) पहने रहता, उनके विचारों का बड़ा घोर समर्थक था और इसी समर्थन के चलते उसने आधी रात के समय हमारे घर से ट्राँजिस्टर चुरा कर चोरी वाला व्यापार शुरू कर अमीर बनने की कोशिश की, पर मँहगाई की तर्ज़ पर अम्मा की मार के चलते उसका यह बिजनेस फ़ेल हो गया। तब से सुना है कि लुक-छिप कर वह भीख वाला व्यापार कर रहा है। उसके बाबू रो-रो कर गरियाते, तो लोग दोष देकर फिर उन्हीं को समझाते, जाने दो बच्चा है...अक़्ल आएगी तो ठीक हो जाएगा, वरना ये सब तो लोग अक़्ल आने के बाद ही करते हैं...शुक्र करो कि वह यह सब पहले ही कर रहा है, बाद में अपने हिसाब से सुधार लेना...वैसे भगवान का अहसान मानो कि वह बिगड़ा नहीं...वगैरह...वगैरह...।
लोगों की यह आम धारणा हमारे इन बुजुर्ग के कारण ही बनी थी। वह हमेशा कहा करते थे कि किसी की ग़ुलामी कर कोई अमीर नहीं बन सकता। इसके लिए वे बड़े-बड़े उदाहरण दिया करते थे...यथा, किसी मज़दूर को कभी अमीर बनते देखा है...? क्लर्क से लेकर अफ़सर तक को अमीरों के आगे जी-हज़ूरी करते क्या नहीं देखा? अरे, आदमी जब भी अमीर बना है अपने बिजनेस के बल पर...समझे...! वे इसे स्पष्ट करने के लिए अक्सर समझ न आने वाले तर्क दिया करते थे। उनके इन तर्कों के चलते ही हम समझ पाए कि हमारा भारत देश आखिर इतना ग़रीब क्यों है...? हमारे यहाँ की स्त्रियाँ इतनी प्रगति के बाद भी इतने पीछे और बीमार क्यों हैं...? हमारे बड़े शहरों में नदी से ज़्यादा नाले क्यों बहते हैं...? और इन सबसे बड़ी बात- साबुत माँस-मज्जा से ज़्यादा डेढ़ पसली वाला आदमी कुकुरमुत्ते की तरह क्यों उगता चला जा रहा है...?
इन सब तर्कों-वितर्कों के बाद जो बात समझ में आती थी वह थी कि यह सब दूसरों की ग़ुलामी करने के कारण ही है। फिर ये सब अपना बिजनेस क्यों नहीं करते? यह तर्क भी फ़ेल हुआ जब बुजुर्ग ने हँस कर कहा,"बच्चा, बिजनेस करना सरल नहीं है...बड़े गुर सीखने पड़ते हैं तब कहीं जाकर कोई अमीर बनता है...।"
उनकी बात सुन कर हमने भी फ़ैसला कर लिया कि अब उनसे अमीर बनने का गुर सीख ही लिया जाए...। अभी हम लोग सोच ही रहे थे कि सुना कि वे मर गए। उनके इस तरह जाने से हम तो ग़रीब ही रह गए, पर उनके आदर्शों और सीख के चलते उनका एक भतीज़ा रातो-रात अमीर बन गया। उनकी दबी-गली लाश देख कर लोगों ने अपने उस अन्दाज़े को पुष्ट किया जो उन बुजुर्ग की शिक्षा की ओर संकेत करता था। अब इत्ती जल्दी किसी को अमीर बनता देख दिल तो सभी का मचल रहा था, पर उसके अन्दर जो जोखिम था, जिसे भतीजे ने उठाया था, उसे हर कोई उठाने का साहस नहीं कर सकता न , सो ज़्यादातर लोग ग़रीब बने आहें ही भरते रह गए और अन्दर-ही-अन्दर सोचते रहे कि कौन सा ऐसा बिजनेस शुरू किया जाए , जिसमें जोखिम भी न हो और एक धेला भी खर्च न हो। उन सब के साथ हम भी काफ़ी परेशान-चिन्तित थे।
वक़्त था कि बड़ी तेज़ी से बीत रहा था कि अचानक हमें रास्ता दिख गया। हुआ यूँ कि एक सुबह हम बड़े दुःखी थे कि अचानक दरवाज़े की कॉलबेल बड़े ज़ोर से चीखी। गुस्से में उठ कर हमने भड़ाक से दरवाज़ा खोला तो यह देख कर और भी गुस्सा आया कि एक जवान हट्टा-कट्टा भिखारी स्टील का बड़ा सा कटोरा लिए भीख माँग रहा है। उस भिखारी का उच्च स्तर देख जले-भुने हमने कहा,"क्यों बे...भीख माँगते शर्म नहीं आती...? और वह भी स्टील का कटोरा लेकर, कॉलबेल बजा कर माँग रहा है...?" हमने सोचा कि हमारा गुस्सा देख कर भिखारी डर कर आगे बढ़ जाएगा और हमारा पैसा बच जाएगा। पर यह क्या? हमारे गुस्से से डरने की बजाय वह भिखारी ही गुस्सा गया। हमें परे करके भड़ाक से पूरा दरवाज़ा खोल कर वह वहीं दरवाज़े पर पालथी मार कर बैठ गया और फिर कटोरे को पटक कर बोला,"काहे भाईऽऽऽ...हमें काहे को शरम आएगी...? शरम क्या हमारी सखी है...? अरे, हत्या, लूट, अपहरण कर के शरम आती है किसी को...? दूसरे की बहू-बेटियों की अस्मत खराब करते हुए शरम आती है किसी को...? अपने ही घर में, अपने ही भाई-भतीजों, बाप की जेब या गला काटते शरम आती है किसी को...? फिर खाली-पीली हमीं को शरम काहे आए...?"
उस भिखारी के तर्क को सुन कर हम तो हक्का-बक्का रह गए। हमें हकबकाया देख कर वह थोड़ा और फैल कर बोला," अब एक बात और सच्ची बोलता हूँ...झूठ हो तो टोकना...। अरे भइया, अगर एक तरह से देखो तो हम लोगों में और चन्दा माँगने वालों में क्या फ़र्क है? जिस को देखो आज वही, कभी किसी संस्था के नाम पर, तो कभी किसी विपदा के नाम पर, तो कभी वोट के नाम पर...बस दरवाज़े पर खड़ा माँग ही तो रहा है...। अब अगर इस पापी पेट के नाम पर हम तुमसे कुछ माँग रहे तो क्या ग़लत कर रहे...?"
भिखारी की बात में हमको दम लगा । सो लेक्चर झाड़ कर, हमे दम दिखा कर हमसे दस का नोट झटक कर चला गया, पर जाते-जाते हमें बहुत कुछ सिखा गया...।
उसकी उस सीख का ही असर है कि आज हमारा एक अलग बिजनेस है और उस की बदौलत हमें वह सब कुछ मिल गया, जिस के हम सपने देखा करते थे।
आप हमसे पूछेंगे नहीं कि वह कौन सा बिजनेस है...? अरे वही...भीख माँगने का धन्धा...पर ज़रा ऊँचे लेवल का...। बिना स्टील, कसकुट या अलम्यूनियम के कटोरे के ही हमारा यह धन्धा पूरी चाँदी काट रहा है...। थोड़ा दिमाग़ के घोड़े दौड़ाइए...। क्या अब भी नहीं समझे...। अरे भइया...अपने बुजुर्ग की अमीरी के राज़ को जान कर और उस भिखारी रूपी गुरू के प्रताप से हम बहुत बड़े तो अभी नहीं बने...पर छुटभैये नेता जो बन गए हैं...। बड़े मजे में हैं...।
देश में चारों तरफ असंतोष है| देश में है तो प्रदेश कैसे अछूता रह सकता है| जिला ,शहर और गांव सब तरफ असंतोष की आग फैली है|आग शब्द का प्रयोग इसलिये कर रहा हूं क्योंकि इसके प्रयोग से असंतोष की भयानकता का स्पस्ट बोध होता है|असंतोष की दूसरी आगों की तरह सुरा प्रेमियों मॆं भी यह आग राजनैतिक भ्रष्टाचार की तरह फैली है||शासकीय नीतियां सुरा प्रेमियों के विरुद्ध हैं| सरकार ने देश के तमाम मुहकमों को ,उनके नेता मंत्री अफसर और कर्मचारियों को देश एवं स्वयं का विकास करने के लिये भारी भरकम और भीमकाय सब्सीडी देने की प्रथा आरंभ की थी||आम जनता को भी धड़ल्ले से सबसीडी दी जा रही है|सबसीडी को हिंदी में अनुदान कहते हैं देश के सब्सीडी धारकों का तोंद निकल महल निर्माण विकास हुआ|
किंतु हाय बेचारे सुरा प्रेमी......उनकी तर्फ सरकार ने अपनी नज़रें तक इनायत कीं| हिंदुस्तान के किसी सुरा प्रेमी को आज तक सरकार अथवा किसी समाज सेवी संगठन ने सबसीडी नहीं दी|यह भारतीय इतिहास में प्रजातंत्र के नाम पर काला धब्बा है|
बड़े उद्योगों को साठ प्रतिशत तक अनुदान दिया गया है|चालीस जेब से लगाओ और साठ सरकार से मुफ्त में पाओ| पर बेचारे सुरा प्रेमिओं को किसी ने फूटी आंखों से तक नहीं देखा| सरकार ने कभी नहीं कहा की हे सुरा प्रेमी जी यदि आप चालीस रुपये की सुरा अपने पैसे से पियेंगे तो सरकार आपको साठ रुपये अनुदान के रूप पीने के लिये देगी|| कितना घोर अन्याय, जघन्य अपराध है इन सुरा प्रेमियों के साथ| बच्चनजी ने कितने कठोर परिश्रम से मधुशाला लिखी होगी किंतु सरकार उनके इन योग्य पात्रों कैसे नकार रही है यह दुनियां देख रही है|
देश में आर्थिक तंगी है तो इन सुरा श्रेष्ठों को पच्चीस प्रतिशत तक का अनुदान तो मिलना ही चाहिये| उद्योग धँधों में सबसीडी,खाद में सबसीडी,पेट्रोल,गैस गल्ला व्यापार,फिल्म उद्योग,कृषि और महिला विकास जैसे कार्यों मे जी तोड़ बैंक फोड़ सबसीडी किंतु सुरा प्रेमियों को ठैंगा|कितना अनर्थ,सुरा प्रेमियों की आह का कोई डर नहीं ऊपर वाले का कोई भय नहीं |अल्लाहताला सब देख रहा है|उसकी लाठी में आवाज नही होती और वहा मार देता है अनीति करने वालों को|आखिरकार पिटरहा है न देश गरीबी मंहगाई,बेरॊजगारी और भ्रष्टाचार यह सब सुराप्रेमियों की बददुआओं का असर है|सुरा को देसज भाषा में दारू कहते हैं|यह दारू शाश्वत सत्य है, हमारी परंपरा है,संस्कृति है और एतिहासिक धरोहर भी है|पुराणों ऋचाओं वैदिक ग्रंथों एवं प्राचीनतम किताबों में सुरा प्रेमियों की महिमा एवं स्तुति का वर्णन मिलता है|सतयुग से त्रेता से द्वापरऔर्र द्वापर से आज कलयुग तक में सुरा ने अपना विजय अभियान जारी रखा है|मध्यकाल में तो सुरा प्रेमियों का विशेष सम्मान होता था, समाज में इज्ज्त थी और राजा के बिल्कुल बगल में राज्य के सबसे बड़े सुरा प्रेमी का आसन आरक्षित रहता था|वह खुद पीता था और राजा को पिलाता था और राजा को देश दुनियां की चिंता से मुक्त रखता था|राजतंत्र में यही तो मजे थे|न्याय बिल्कुल सही दारू का दारू और पानी का पानी होता था| किंतु हाय रे प्रजातंत्र जिस दारू के ठेकों की कमाई से सरकार कॊ करॊड़ों का फायदा हो उन्हीं दारू भक्तों की यह दुर्दशा| यह तो हम जैसे अंगुलियों पर गिनने लायक लोग ही बचे हैं जिससे देश में दारूखोरों का अस्तित्व कायम है| यदि सरकार ने अब भी आंख न खोली इन सुरा प्रेमियों की नस्ल ऐसे ही समाप्त हो जायेगी जैसे कि डायनासोर की नस्ल समाप्त हो गई हैं|
खान गफ्फार खान हमारे मोहकमे के दारू प्रेमी ड्राइवर थे सुबह से शाम और शाम से सुबह तक राउंड दी क्लाक दारू पीते थे| यदि गालिब आज जिंदा होते तो अवश्य ही दो चार सौ शेर उनके ऊपर लिख डालते| कुछ दिनों पूर्व गफ्फार भाई साठ पार कर गये और सेवा निवृत हो गये| हमने उनका बिदाई सम्मान बड़े धूम धाम से किया|| वे दारू पीकर खटिया पर पड़े थे| हमने उन्हें ससम्मान्न उठाया और माला पहनाक्रर उसी सम्मान से दारू पिलाकर खटिया पर लिटा दिया|हमने दारू के साथ पूरी इंसाफी की| हां तो बात असंतोष की हो रही थीप्रांत के सभी सुरा प्रेमियों ने अपने खिलाफ होते अन्याय के विरोध में एक प्रांतीय अधिवेशन आयोजित कर डाला|प्रांत के धुरंधर एवं प्रसिद्धि को प्राप्त बड़े बड़े दारूखोर एकत्रित हुये| मंच पर दारू श्रेष्ठ, दारू शिरोमणि ,दारू नवाज ,दारू नवीस पियक्कड़ चंद और दारू किंग विराजमान थे| भीड़ तो कम थी किंतु मैदान में तिल रखने को जगह नहीं थी क्योंकि पिय्यकड़ श्रोता बैठने के बजाय जमीन पर ;लोटे पड़े थे| लाउडिस्पीकर में गाना बज रहा था......'हम लाये हैं दूकान से दारू निकाल के,रखना मेरे बच्चो तुम्हीं बोतल सम्हाल के'
आयोजक सभा को संबोधित करने लगा....."प्रदेश के प्यारे प्यारे दारूखोरो, दारू श्रेष्ठो और दारू नवाजो ..सरकार द्वारा हमारे ऊपर किया जाने वाले अत्याचारों के विरोध में यह सम्मेलन आयोजित किया गया है| मंच पर सभी गणमान्य दारूखोर विराजे हैं| आज के सम्मेलन का अध्यक्ष हमने प्रांत के सबसे बड़े शराबी लोटन लाल को चुना है|वे मंच पर ही लोटे पड़े हैं|वह देखिये मंच के बीचों बीच लोटे दिखाई पड़ रहे हैं.......तालियां" और तालियों की आवाज सुनाई पड़ती है|"अब मैं प्रांत के दूसरे बिग गन अर्थात दारूखोरी के रजत पदक विजेता अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त माननीय लुड़कनलालजी ठर्रेवाला से निवेदन करूंगा कि वे माननीय ;ओटनलाल का पुष्पहारों से स्वागत करें|"लुड़कन लालजी मंच पर ही लुड़के पड़े थे|
लोटन लाल को हिलाया डुलाया गया"लोटनभाई उठो तुम्हें माला पहनाई जाना है और लुड़कन दादा आप भी उठिये माला पहनाइये लोटन को" आयोजक ने लुड़कन का सिर पकड़कर हिलाया| लोटन और लुड़कन दोनों ने उठने में असमर्थता व्यक्त कीलुड़कनजी क्रोध में बड़ बड़ाने लगे"अरे इस निकम्मी सरकार ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा,उठने लायक कहां छोड़ा है हमें हिच्च....कलेजा जलाया है अपना...अपने पैसों की दारू पी है, घर फूंक तमाशा देखा है हमने,सरकार ने एक पैसा भी नहीं दिया है हमें दारू पीने को| सबसीडी मिलती तो हम भी खड़े होने लायक रहते|दूसरे लोग सबसीडी के बल पर ही तॊ खड़े हैं,बंगलों में रहते हैं कारों मेंघूमते हैं|" "अच्छा आप माला तो पहना दीजिये... लुड़के लुड़के ही पहना दीजिये" आयोजक बोला| "अच्छा कहां है माला? कहां है लोटन का गला? गला यहीं ले आओ"
"यह है रे लुड़कन मेरा गला,किंतु कटा हुआ है,सरकार ने पहले ही काट लिया है|ये तो मेरे मित्र हैं जो मेरा मकान बेचकर मुझे दारू पिलाकर जिंदा रखे हैं"लोटन ने अपना गला हिलाया|आयोजक की मदद से माला धारण कार्यक्रम सम्पन्न हो गया| इतने में आठ दस बोतलें ट्रे में रखकर एक नौकर मंच पर ले आया|आयोजक लोटन लुड़कन और मंच पर लुड़के सभीदारू खोर बोतलों पर झपट पड़े|फिर गाना बजने लगा...हम लाये हैं दूकान से.............
सम्मेलन अभी जारी है,कब समाप्त होगा नहीं मालूम| हां सरकार सबसीडी दॆ दे तो तुरंत समाप्त हो सकता है|
सिटी बैंक, बैंक ऑफ अमेरिका, स्टेट बैंक वाले जिस तरह से मनुहार करके क्रेडिट कार्ड बेच रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि मिर्जा गालिब वाकई सही समय से पहले आ गए। उन्हें इस समय होना चाहिए था, बहुत मौज में रहते। सुबह से सिटी बैंक वालों का तीसरा फोन है–
देखिए हमारे क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल करेंगे, तो इतना फायदा होगा... पर मैं उधारी का खाने में यकीन नहीं करता, जेब में होंगे, तो ही खर्च करूँगा, मुझे क्रेडिट कार्ड की जरूरत नहीं है। देखिए आपको जरूरत है...
मेरी जरूरत क्या है, मुझे समझ में नहीं आता, सिटी बैंक वाले समझ जाते हैं। इधर मामला बहुत पेचीदा हो गया है। मेरी जरूरत क्या है, मुझे ही पता नहीं होता, क्रेडिट कार्डवालों को पता हो जाता है। मेरे नानाजी अकसर समझाया करते थे–आय से अधिक खर्च करनेवाला तिरस्कार भोगता है। मामला उलटा हो गया है, सिटी बैंक वाला समझ रहा है कि हमारे क्रेडिट कार्ड पर जितनी जल्दी खरीदारी करेंगे, उतने ज्यादा बोनस पाइंट आपको दिए जाएँगे। आय से अधिक खर्च करने वालों को अब क्रेडिट कार्ड वालों की तरफ से बोनस मिलते हैं। एक बैंक वाला आता है, बताता है, हमसे कर्ज लेकर मारुति ले लीजिए, अब तो आपकी जरूरत है। एक आता है कि हमसे कर्ज लेकर मकान बनवा लीजिए, मकान आपकी जरूरत है। एक आता है, हमसे कर्ज लेकर ऑस्ट्रेलिया घूम आइए, ऑस्ट्रेलिया जाना इधर बहुत जरूरी हो गया है। कभी-कभी लगता है कि अपनी जरूरतों के बारे में कितना कम जानता हूँ।
उधारी का मामला इधर रिवर्स गीयर में चल रहा है। पहले उधार लेनेवाला साहूकार के पास जाकर गिड़गिड़ाया करता था कि माई-बाप दे दो, मुझे रकम की जरूरत है। अब साहूकार खुद आकर बताता है कि ले लो, इस काम में आएगा, उस काम में आएगा। सिटी बैंक बालों, बैंक ऑफ अमेरिका वालों, अच्छा है, अभी आए हो, कहीं पहले आ गए होते, तो बहुत उलटा-पुलटा हो गया होता। मदर इंडिया जैसी फिल्म पहले आ गए होते, तो बहुत उलटा-पुलटा हो गया होता। मदर इंडिया जैसी फिल्म न बन पाती। थीम की तुक ही नहीं मिलती। मदर इंडिया में सुक्खी लाला का कैरेस्टर बिलकुल झूठा जान पड़ता। फिल्म में उलटा दिखाना पड़ता, सुक्खी लाला नर्गिस के पास जाकर रो रहे हैं, मुझसे ही लेना कर्ज। उसके पीछे कोई दुक्खी लाला लाइन में है, नहीं, नहीं मुझसे लेना कर्ज, मैं इतना डिस्काउंट दूँगा और साथ में वो वाला फ्री गिफ्त भी।
सत्तर से पहले बनी सारी की सारी फिल्में झूठी पड़ जातीं। साहूकार का कैरेक्टर घृणा का नहीं दया का पात्र बन जाता। पता लगता कि सुक्खी लाला दुखी होकर बन्दूक उठा रहे हैं कि कोई हमसे कर्ज नहीं लेता। गाँववालों देख लूँगा, तुमको। मदर इंडिया में मजबूर होकर डाकू सुनील दत्त नहीं, सुक्खी लाला बनते। मिर्जा गालिब होते, तो परेशान नहीं होते। गालिब ने लिखा है कि बरसात अगर एक घंटे होती है, तो उनका घर कई घंटे तक टपकता है। एच. डी. एफ. सी. वाले गालिब से कहते, चिन्ता की क्या बात, यह लो लोन। बस यह करो कि हवेली के ऊपर बहुत बड़ा-सा साइन बोर्ड टाँग दो स्पान्सर्ड बाई एच. डी. एफ. सी.।
पर एक बात समझ में नहीं आती, जिन्हें जरूरत है, उन्हें सिटी बैंक वाले नहीं देते, जिन्हें जरूरत नहीं है, उन्हें सिटी बैंक वाले फोन कर-करके देते हैं–एक नादान सवाल पूछ रहा है।
कर्ज हैंडपम्प लगाने के लिए नहीं मिलता, कार के लिए मिलता है। कर्ज झोंपड़े के लिए नहीं मिलता, अपार्टमेन्ट के लिए मिलता है। बीमार माँ को देखने के लिए बेगूसराय जाने के पैसे न हों, तो कर्ज नहीं मिलता, कर्ज ऑस्ट्रेलिया के एक्साइटिंग टूर के लिए मिलता है। फसल के लिए बीज खरीदने हों, तो सिटी बैंक से कर्ज नहीं मिलेगा, हाँ, घर सजाने के आइटम खरीदने हों, तो झटके में कर्ज मिल जाएगा। बच्चा बीमार हो, तो कर्ज नहीं मिलेगा, हाँ इक्यावन इंची टी.वी. खरीदने के लिए मिलता है। सिर्फ टी.वी. और कार के कर्ज देखकर सुक्खी लाला याद आते हैं। जैसे भी हों सुक्खी लाला उन्होंने फसल के बीच के लिए भी कर्ज दिया और बीमारी के लिए भी दिया। कार का कर्ज नहीं चुका पाया, इसलिए बैंक के गुंडों ने पीटा और कार छीनी-अखबार में खबर है।
तमाम बैंक वाले कर्ज देने के मामले में भले ही मदर इंडिया हों, पर वसूलने में सुक्खी लाला हैं। सुक्खी लाला का रिकार्ड इस मामले में बहुत साफ है। वह देने के मामले में भी सुक्खी लाला है और लेने के मामले में भी सुक्खी लाला है। सुक्खी लाला ने कभी किसी को फोन करके, उसकी मनुहार करके कर्ज नहीं दिया। जो सब तरफ से सुक्खी लाला लगे, लेने में भी, देने में भी, उससे निपटना आसान है। पर जो देते वक्त मदर इंडिया हो जाए, और लेते वक्त सुक्खी लाला, उससे पार पाना मुश्किल है।
चलूँ, सिटी बैंक से किन्हीं मदर इंडिया का फोन है, समझा रही हैं–इतना उधार तो आपको लेना ही पडेगा, वरना आपकी गुडविल चौपट हो जाएगी...।
अविनाश वाचस्पति अन्नाभाई बेवजगत का सुपरिचित चेहरा है। इंटरनेट पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार तथा समसामयिक तथा सामाजिक मुद्दों पर उनके वैचारिक आंदोलनों को काफी लोकप्रियता मिली है। व्यंग्य लेखन उनका प्रिय शगल है और उनके व्यंग्यों में उनका व्यंग्य विधा के प्रति समर्पण और प्यार झलकता है। अभी-अभी उनका व्यंग्य संग्रह ‘व्यंग्य का शून्यकाल’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है।
हमारे समय और समाज के लगभग सभी मुद्दे उनके व्यंग्यों में प्रस्तुत हुए हैं। इन व्यंग्यों में लेखक एक तरफ जहाँ राजनीतिक विद्रूपताओं पर करारे प्रहार करता है वहीं सामाजिक स्तर पर भी अनेक समस्याओं को ये व्यंग्य उभारते हैं। भ्रष्टाचार तथा मंहगाई उनके प्रिय विषय हैं जो इन व्यंग्यों में निशाने पर हैं। ‘दाल का अरहरापन’, ‘अरे महंगाई रुक’, ‘प्याज-पैट्रोल तकरार’, ‘भ्रष्टाचार के मुंह पर’, ‘भ्रष्टाचार की जय बोल’ आदि व्यंग्य उल्लेखनीय है। ‘ जादू की छड़ी’ शीर्षक व्यंग्य सरकार द्वारा हाल ही में गरीबी की परिभाषा के यथार्थ को सामने लाता है। धार्मिक तथा सांस्कृतिक जगत की विकृतियों पर भी अविनाश की नजर बराबर है। ‘चलो, बाबा बन जाते हैं’ शीर्षक व्यंग्य में वे यह कहने से नहीं चूकते कि ‘बाबा की इतनी संपत्ति देखकर देश के उन भ्रष्ट नेताओं को शर्म आ रही होगी कि वे इतनी संपत्ति नेतागिरी में नहीं जुटा पाए जितनी अकूत संपत्ति बाबा ने बाबा बनकर जुटा ली और उस पर भी तुर्रा ये है कि उन पर न तो किसी किसी अन्ना और रामदेव ने ऊंगली उठाई हो।’ अविनाश जी का प्रहार किसी लाज-लिहाज को ध्यान में नहीं रखता। साधु को स्वादु की संज्ञा देना साहस का काम है। अविनाश अपनी बात को स्पष्ट शैली में कहते हैं। यहां शब्दाडंबर न होकर शब्द-चमत्कार अवश्य है। अत्याधुनिकता तथा तकनीकी-वैज्ञानिक प्रगति के श्वेत-स्याह पहलुओं को भी इन व्यंग्यों में अभिव्यक्त किया गया है।
अविनाश की भाषा का लचीलापन तीखेपन को कम नहीं होने देता अपितु विसंगति पर घुमावदार चोट करता है। उनकी भाषा में जादू है। शब्दों का चयन और उनकी तुकबन्दी से नये अर्थों का सृजन पाठक को बांधता है। लक्षणा और व्यंजना शब्दशक्ति का अद्भुत प्रयोग करते हुए अविनाश नवीन प्रतीकों और बिम्बों को उपयोग में लाते हैं। ये व्यंग्य, व्यंग्य के नये प्रतिमानों का सृजन करते हुए पुराने मानकों को तोड़ते प्रतीत होते हैं। उनकी भाषा का सौंदर्य दृष्टव्य है- ‘भारत की सुरक्षा व्यवस्था कुत्तों के मजबूत कंधों पर टिकी हुई है, जो बाकी बची है वो उसकी पूंछ के समान टेढी है।’ व्यंग्य विधा जिस तटस्थता और निर्भीकता की मांग करती है, वे अविनाश के व्यंग्यों में बखूबी मिलती है। व्यंग्य विधा में बहुधा दोगले तथा दोहरे अर्थ वाले शब्दों का प्रयोग होता रहा है परंतु अविनाश के व्यंग्य कहीं भी साहित्यिक मर्यादाओं का हनन नहीं करते।
संग्रह में संकलित व्यंग्य देश की नामी-गिरामी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। हिन्दी में व्यंग्य विधा के शून्य को भरने का स्तुत्य प्रयत्न ‘व्यंग्य का शून्यकाल’ के रूप में अविनाश वाचस्पति की उपलब्धि कहा जाना चाहिए।
जब मैं जाडों में लिहाफ ओढती हूँ तो पास की दीवार पर उसकी परछाई हाथी की तरह झूमती हुई मालूम होती है। और एकदम से मेरा दिमाग बीती हुई दुनिया के पर्दों में दौड़ने-भागने लगता है। न जाने क्या कुछ याद आने लगता है।
माफ कीजियेगा, मैं आपको खुद अपने लिहाफ क़ा रूमानअंगेज ज़िक़्र बताने नहीं जा रही हूँ, न लिहाफ से किसी किस्म का रूमान जोडा ही जा सकता है। मेरे खयाल में कम्बल कम आरामदेह सही, मगर उसकी परछाई इतनी भयानक नहीं होती जितनी - जब लिहाफ क़ी परछाई दीवार पर डगमगा रही हो। यह जब का जिक्र है, जब मैं छोटी-सी थी और दिन-भर भाइयों और उनके दोस्तों के साथ मार-कुटाई में गुजार दिया करती थी। कभी - कभी मुझे खयाल आता कि मैं कमबख्त इतनी लडाका क्यों थी? उस उम्र में जबकि मेरी और बहनें आशिक जमा कर रही थीं, मैं अपने-पराये हर लडक़े और लडक़ी से जूतम-पैजार में मशगूल थी। यही वजह थी कि अम्माँ जब आगरा जाने लगीं तो हफ्ता-भर के लिए मुझे अपनी एक मुँहबोली बहन के पास छोड ग़यीं। उनके यहाँ, अम्माँ खूब जानती थी कि चूहे का बच्चा भी नहीं और मैं किसी से भी लड-भिड न सकूँगी। सजा तो खूब थी मेरी! हाँ, तो अम्माँ मुझे बेगम जान के पास छोड ग़यीं। वही बेगम जान जिनका लिहाफ अब तक मेरे जहन में गर्म लोहे के दाग की तरह महफूज है। ये वो बेगम जान थीं जिनके गरीब माँ-बाप ने नवाब साहब को इसलिए दामाद बना लिया कि गो वह पकी उम्र के थे मगर निहायत नेक। कभी कोई रण्डी या बाजारी औरत उनके यहाँ नजर न आयी। खुद हाजी थे और बहुतों को हज करा चुके थे।
मगर उन्हें एक निहायत अजीबो-गरीब शौक था। लोगों को कबूतर पालने का जुनून होता है, बटेरें लडाते हैं, मुर्गबाजी क़रते हैं - इस किस्म के वाहियात खेलों से नवाब साहब को नफरत थी। उनके यहाँ तो बस तालिब इल्म रहते थे। नौजवान, गोरे-गोरे, पतली कमरों के लडक़े, जिनका खर्च वे खुद बर्दाश्त करते थे।
मगर बेगम जान से शादी करके तो वे उन्हें कुल साजो-सामान के साथ ही घर में रखकर भूल गये। और वह बेचारी दुबली-पतली नाजुक़-सी बेगम तन्हाई के गम में घुलने लगीं। न जाने उनकी जिन्दगी कहाँ से शुरू होती है? वहाँ से जब वह पैदा होने की गलती कर चुकी थीं, या वहाँ से जब एक नवाब की बेगम बनकर आयीं और छपरखट पर जिन्दगी गुजारने लगीं, या जब से नवाब साहब के यहाँ लडक़ों का जोर बँधा। उनके लिए मुरग्गन हलवे और लजीज़ ख़ाने जाने लगे और बेगम जान दीवानखाने की दरारों में से उनकी लचकती कमरोंवाले लडक़ों की चुस्त पिण्डलियाँ और मोअत्तर बारीक शबनम के कुर्ते देख-देखकर अंगारों पर लोटने लगीं।
या जब से वह मन्नतों-मुरादों से हार गयीं, चिल्ले बँधे और टोटके और रातों की वजीफ़ाख्वानी भी चित हो गयी। कहीं पत्थर में जोंक लगती है! नवाब साहब अपनी जगह से टस-से-मस न हुए। फिर बेगम जान का दिल टूट गया और वह इल्म की तरफ मोतवज्जा हुई। लेकिन यहाँ भी उन्हें कुछ न मिला। इश्किया नावेल और जज्बाती अशआर पढक़र और भी पस्ती छा गयी। रात की नींद भी हाथ से गयी और बेगम जान जी-जान छोडक़र बिल्कुल ही यासो-हसरत की पोट बन गयीं।
चूल्हे में डाला था ऐसा कपडा-लत्ता। कपडा पहना जाता है किसी पर रोब गाँठने के लिए। अब न तो नवाब साहब को फुर्सत कि शबनमी कुर्तों को छोडक़र जरा इधर तवज्जा करें और न वे उन्हें कहीं आने-जाने देते। जब से बेगम जान ब्याहकर आयी थीं, रिश्तेदार आकर महीनों रहते और चले जाते, मगर वह बेचारी कैद की कैद रहतीं।
उन रिश्तेदारों को देखकर और भी उनका खून जलता था कि सबके-सब मजे से माल उडाने, उम्दा घी निगलने, जाडे क़ा साजो-सामान बनवाने आन मरते और वह बावजूद नयी रूई के लिहाफ के, पडी सर्दी में अकडा करतीं। हर करवट पर लिहाफ नयीं-नयीं सूरतें बनाकर दीवार पर साया डालता। मगर कोई भी साया ऐसा न था जो उन्हें जिन्दा रखने लिए काफी हो। मगर क्यों जिये फिर कोई? जिन्दगी! बेगम जान की जिन्दगी जो थी! जीना बदा था नसीबों में, वह फिर जीने लगीं और खूब जीं।
रब्बो ने उन्हें नीचे गिरते-गिरते सँभाल लिया। चटपट देखते-देखते उनका सूखा जिस्म भरना शुरू हुआ। गाल चमक उठे और हुस्न फूट निकला। एक अजीबो-गरीब तेल की मालिश से बेगम जान में जिन्दगी की झलक आयी। माफ क़ीजियेगा, उस तेल का नुस्खा आपको बेहतरीन-से-बेहतरीन रिसाले में भी न मिलेगा।
जब मैंने बेगम जान को देखा तो वह चालीस-बयालीस की होंगी। ओफ्फोह! किस शान से वह मसनद पर नीमदराज थीं और रब्बो उनकी पीठ से लगी बैठी कमर दबा रही थी। एक ऊदे रंग का दुशाला उनके पैरों पर पडा था और वह महारानी की तरह शानदार मालूम हो रही थीं। मुझे उनकी शक्ल बेइन्तहा पसन्द थी। मेरा जी चाहता था, घण्टों बिल्कुल पास से उनकी सूरत देखा करूँ। उनकी रंगत बिल्कुल सफेद थी। नाम को सुर्खी का जिक़्र नहीं। और बाल स्याह और तेल में डूबे रहते थे। मैंने आज तक उनकी माँग ही बिगडी न देखी। क्या मजाल जो एक बाल इधर-उधर हो जाये। उनकी आँखें काली थीं और अबरू पर के जायद बाल अलहदा कर देने से कमानें-सीं खिंची होती थीं। आँखें जरा तनी हुई रहती थीं। भारी-भारी फूले हुए पपोटे, मोटी-मोटी पलकें। सबसे जियाद जो उनके चेहरे पर हैरतअंगेज ज़ाजिबे-नजर चीज थी, वह उनके होंठ थे। अमूमन वह सुर्खी से रंगे रहते थे। ऊपर के होंठ पर हल्की-हल्की मूँछें-सी थीं और कनपटियों पर लम्बे-लम्बे बाल। कभी-कभी उनका चेहरा देखते-देखते अजीब-सा लगने लगता था - कम उम्र लडक़ों जैसा।
उनके जिस्म की जिल्द भी सफेद और चिकनी थी। मालूम होता था किसी ने कसकर टाँके लगा दिये हों। अमूमन वह अपनी पिण्डलियाँ खुजाने के लिए किसोलतीं तो मैं चुपके-चुपके उनकी चमक देखा करती। उनका कद बहुत लम्बा था और फिर गोश्त होने की वजह से वह बहुत ही लम्बी-चौडी मालूम होतीं थीं। लेकिन बहुत मुतनासिब और ढला हुआ जिस्म था। बडे-बडे चिकने और सफेद हाथ और सुडौल कमर ..तो रब्बो उनकी पीठ खुजाया करती थी। यानी घण्टों उनकी पीठ खुजाती - पीठ खुजाना भी जिन्दगी की जरूरियात में से था, बल्कि शायद जरूरियाते-जिन्दगी से भी ज्यादा।
रब्बो को घर का और कोई काम न था। बस वह सारे वक्त उनके छपरखट पर चढी क़भी पैर, कभी सिर और कभी जिस्म के और दूसरे हिस्से को दबाया करती थी। कभी तो मेरा दिल बोल उठता था, जब देखो रब्बो कुछ-न-कुछ दबा रही है या मालिश कर रही है।
कोई दूसरा होता तो न जाने क्या होता? मैं अपना कहती हूँ, कोई इतना करे तो मेरा जिस्म तो सड-ग़ल के खत्म हो जाय। और फिर यह रोज-रोज क़ी मालिश काफी नहीं थीं। जिस रोज बेगम जान नहातीं, या अल्लाह! बस दो घण्टा पहले से तेल और खुशबुदार उबटनों की मालिश शुरू हो जाती। और इतनी होती कि मेरा तो तखय्युल से ही दिल लोट जाता। कमरे के दरवाजे बन्द करके अँगीठियाँ सुलगती और चलता मालिश का दौर। अमूमन सिर्फ रब्बो ही रही। बाकी की नौकरानियाँ बडबडातीं दरवाजे पर से ही, जरूरियात की चीजें देती जातीं।
बात यह थी कि बेगम जान को खुजली का मर्ज था। बिचारी को ऐसी खुजली होती थी कि हजारों तेल और उबटने मले जाते थे, मगर खुजली थी कि कायम। डाक्टर -हकीम कहते, ''कुछ भी नहीं, जिस्म साफ चट पडा है। हाँ, कोई जिल्द के अन्दर बीमारी हो तो खैर।'' नहीं भी, ये डाक्टर तो मुये हैं पागल! कोई आपके दुश्मनों को मर्ज है? अल्लाह रखे, खून में गर्मी है! रब्बो मुस्कराकर कहती, महीन-महीन नजरों से बेगम जान को घूरती! ओह यह रब्बो! जितनी यह बेगम जान गोरी थीं उतनी ही यह काली। जितनी बेगम जान सफेद थीं, उतनी ही यह सुर्ख। बस जैसे तपाया हुआ लोहा। हल्के-हल्के चेचक के दाग। गठा हुआ ठोस जिस्म। फुर्तीले छोटे-छोटे हाथ। कसी हुई छोटी-सी तोंद। बडे-बडे फ़ूले हुए होंठ, जो हमेशा नमी में डूबे रहते और जिस्म में से अजीब घबरानेवाली बू के शरारे निकलते रहते थे। और ये नन्हें-नन्हें फूले हुए हाथ किस कदर फूर्तीले थे! अभी कमर पर, तो वह लीजिए फिसलकर गये कूल्हों पर! वहाँ से रपटे रानों पर और फिर दौडे टखनों की तरफ! मैं तो जब कभी बेगम जान के पास बैठती, यही देखती कि अब उसके हाथ कहाँ हैं और क्या कर रहें हैं?
गर्मी-जाडे बेगम जान हैदराबादी जाली कारगे के कुर्ते पहनतीं। गहरे रंग के पाजामे और सफेद झाग-से कुर्ते। और पंखा भी चलता हो, फिर भी वह हल्की दुलाई जरूर जिस्म पर ढके रहती थीं। उन्हें जाडा बहुत पसन्द था। जाडे में मुझे उनके यहाँ अच्छा मालूम होता। वह हिलती-डुलती बहुत कम थीं। कालीन पर लेटी हैं, पीठ खुज रही हैं, खुश्क मेवे चबा रही हैं और बस! रब्बो से दूसरी सारी नौकरियाँ खार खाती थीं। चुडैल बेगम जान के साथ खाती, साथ उठती-बैठती और माशा अल्लाह! साथ ही सोती थी! रब्बो और बेगम जान आम जलसों और मजमूओं की दिलचस्प गुफ्तगू का मौजूँ थीं। जहाँ उन दोनों का जिक़्र आया और कहकहे उठे। लोग न जाने क्या-क्या चुटकुले गरीब पर उडाते, मगर वह दुनिया में किसी से मिलती ही न थी। वहाँ तो बस वह थीं और उनकी खुजली!
मैंने कहा कि उस वक्त मैं काफी छोटी थी और बेगम जान पर फिदा। वह भी मुझे बहुत प्यार करती थीं। इत्तेफाक से अम्माँ आगरे गयीं। उन्हें मालूम था कि अकेले घर में भाइयों से मार-कुटाई होगी, मारी-मारी फिरूँगी, इसलिए वह हफ्ता-भर के लिए बेगम जान के पास छोड ग़यीं। मैं भी खुश और बेगम जान भी खुश। आखिर को अम्माँ की भाभी बनी हुई थीं।
सवाल यह उठा कि मैं सोऊँ कहाँ? कुदरती तौर पर बेगम जान के कमरे में। लिहाजा मेरे लिए भी उनके छपरखट से लगाकर छोटी-सी पलँगडी ड़ाल दी गयी। दस-ग्यारह बजे तक तो बातें करते रहे। मैं और बेगम जान चांस खेलते रहे और फिर मैं सोने के लिए अपने पलंग पर चली गयी। और जब मैं सोयी तो रब्बो वैसी ही बैठी उनकी पीठ खुजा रही थी। भंगन कहीं की! मैंने सोचा। रात को मेरी एकदम से आँख खुली तो मुझे अजीब तरह का डर लगने लगा। कमरे में घुप अँधेरा। और उस अँधेरे में बेगम जान का लिहाफ ऐसे हिल रहा था, जैसे उसमें हाथी बन्द हो! ''बेगम जान!'' मैंने डरी हुई आवाज निकाली। हाथी हिलना बन्द हो गया। लिहाफ नीचे दब गया। ''क्या है? सो जाओ।'' बेगम जान ने कहीं से आवाज दी। ''डर लग रहा है।'' मैंने चूहे की-सी आवाज से कहा। ''सो जाओ। डर की क्या बात है? आयतलकुर्सी पढ लो।'' ''अच्छा।'' मैंने जल्दी-जल्दी आयतलकुर्सी पढी। मगर यालमू मा बीन पर हर दफा आकर अटक गयी। हालाँकि मुझे वक्त पूरी आयत याद है।
''तुम्हारे पास आ जाऊँ बेगम जान?'' ''नहीं बेटी, सो रहो।'' जरा सख्ती से कहा। और फिर दो आदमियों के घुसुर-फुसुर करने की आवाज सुनायी देने लगी। हाय रे! यह दूसरा कौन? मैं और भी डरी। ''बेगम जान, चोर-वोर तो नहीं?'' ''सो जाओ बेटा, कैसा चोर?'' रब्बो की आवाज आयी। मैं जल्दी से लिहाफ में मुँह डालकर सो गयी। सुबह मेरे जहन में रात के खौफनाक नज्ज़ारे का खयाल भी न रहा। मैं हमेशा की वहमी हूँ। रात को डरना, उठ-उठकर भागना और बडबडाना तो बचपन में रोज ही होता था। सब तो कहते थे, मुझ पर भूतों का साया हो गया है। लिहाजा मुझे खयाल भी न रहा। सुबह को लिहाफ बिल्कुल मासूम नजर आ रहा था।
मगर दूसरी रात मेरी आँख खुली तो रब्बो और बेगम जान में कुछ झगडा बडी ख़ामोशी से छपरखट पर ही तय हो रहा था। और मेरी खाक समझ में न आया कि क्या फैसला हुआ? रब्बो हिचकियाँ लेकर रोयी, फिर बिल्ली की तरह सपड-सपड रकाबी चाटने-जैसी आवाजें आने लगीं, ऊँह! मैं तो घबराकर सो गयी।
आज रब्बो अपने बेटे से मिलने गयी हुई थी। वह बडा झगडालू था। बहुत कुछ बेगम जान ने किया - उसे दुकान करायी, गाँव में लगाया, मगर वह किसी तरह मानता ही नहीं था। नवाब साहब के यहाँ कुछ दिन रहा, खूब जोडे-बागे भी बने, पर न जाने क्यों ऐसा भागा कि रब्बो से मिलने भी न आता। लिहाजा रब्बो ही अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ उससे मिलने गयी थीं। बेगम जान न जाने देतीं, मगर रब्बो भी मजबूर हो गयी। सारा दिन बेगम जान परेशान रहीं। उनका जोड-ज़ोड टूटता रहा। किसी का छूना भी उन्हें न भाता था। उन्होंने खाना भी न खाया और सारा दिन उदास पडी रहीं। ''मैं खुजा दूँ बेगम जान?'' मैंने बडे शौक से ताश के पत्ते बाँटते हुए कहा। बेगम जान मुझे गौर से देखने लगीं। ''मैं खुजा दूँ? सच कहती हूँ!'' मैंने ताश रख दिये। मैं थोडी देर तक खुजाती रही और बेगम जान चुपकी लेटी रहीं। दूसरे दिन रब्बो को आना था, मगर वह आज भी गायब थी। बेगम जान का मिजाज चिडचिडा होता गया। चाय पी-पीकर उन्होंने सिर में दर्द कर लिया। मैं फिर खुजाने लगी उनकी पीठ-चिकनी मेज क़ी तख्ती-जैसी पीठ। मैं हौले-हौले खुजाती रही। उनका काम करके कैसी खुशी होती थी! ''जरा जोर से खुजाओ। बन्द खोल दो।'' बेगम जान बोलीं, ''इधर ..ए है, जरा शाने से नीचे ..हाँ ...वाह भइ वाह! हा!हा!'' वह सुरूर में ठण्डी-ठण्डी साँसें लेकर इत्मीनान जाहिर करने लगीं।
''और इधर ...'' हालाँकि बेगम जान का हाथ खूब जा सकता था, मगर वह मुझसे ही खुजवा रही थीं और मुझे उल्टा फख्र हो रहा था। ''यहाँ ..ओई! तुम तो गुदगुदी करती हो ..वाह!'' वह हँसी। मैं बातें भी कर रही थी और खुजा भी रही थी। ''तुम्हें कल बाजार भेजूँगी। क्या लोगी? वही सोती-जागती गुडिया?'' ''नहीं बेगम जान, मैं तो गुडिया नहीं लेती। क्या बच्चा हूँ अब मैं?'' ''बच्चा नहीं तो क्या बूढी हो गयी?'' वह हँसी ''गुडिया नहीं तो बनवा लेना कपडे, पहनना खुद। मैं दूँगी तुम्हें बहुत-से कपडे। सुनां?'' उन्होंने करवट ली। ''अच्छा।'' मैंने जवाब दिया। ''इधर ..'' उन्होंने मेरा हाथ पकडक़र जहाँ खुजली हो रही थी, रख दिया। जहाँ उन्हें खुजली मालूम होती, वहाँ मेरा हाथ रख देतीं। और मैं बेखयाली में, बबुए के ध्यान में डूबी मशीन की तरह खुजाती रही और वह मुतवातिर बातें करती रहीं। ''सुनो तो ...तुम्हारी फ्राकें कम हो गयी हैं। कल दर्जी को दे दूँगी, कि नयी सी लाये। तुम्हारी अम्माँ कपडा दे गयी हैं।'' ''वह लाल कपडे क़ी नहीं बनवाऊँगी। चमारों-जैसा है!'' मैं बकवास कर रही थी और हाथ न जाने कहाँ-से-कहाँ पहुँचा। बातों-बातों में मुझे मालूम भी न हुआ। बेगम जान तो चुप लेटी थीं। ''अरे!'' मैंने जल्दी से हाथ खींच लिया।
''ओई लडक़ी! देखकर नहीं खुजाती! मेरी पसलियाँ नोचे डालती है!'' बेगम जान शरारत से मुस्करायीं और मैं झेंप गयी। ''इधर आकर मेरे पास लेट जा।'' ''उन्होंने मुझे बाजू पर सिर रखकर लिटा लिया। ''अब है, कितनी सूख रही है। पसलियाँ निकल रही हैं।'' उन्होंने मेरी पसलियाँ गिनना शुरू कीं। ''ऊँ!'' मैं भुनभुनायी। ''ओइ! तो क्या मैं खा जाऊँगी? कैसा तंग स्वेटर बना है! गरम बनियान भी नहीं पहना तुमने!'' मैं कुलबुलाने लगी। ''कितनी पसलियाँ होती हैं?'' उन्होंने बात बदली। ''एक तरफ नौ और दूसरी तरफ दस।'' मैंने स्कूल में याद की हुई हाइजिन की मदद ली। वह भी ऊटपटाँग। ''हटाओ तो हाथ ...हाँ, एक ...दो ..तीन ..'' मेरा दिल चाहा किसी तरह भागूँ ...और उन्होंने जोर से भींचा। ''ऊँ!'' मैं मचल गयी। बेगम जान जोर-जोर से हँसने लगीं।
अब भी जब कभी मैं उनका उस वक्त का चेहरा याद करती हूँ तो दिल घबराने लगता है। उनकी आँखों के पपोटे और वजनी हो गये। ऊपर के होंठ पर सियाही घिरी हुई थी। बावजूद सर्दी के, पसीने की नन्हीं-नन्हीं बूँदें होंठों और नाक पर चमक रहीं थीं। उनके हाथ ठण्डे थे, मगर नरम-नरम जैसे उन पर की खाल उतर गयी हो। उन्होंने शाल उतार दी थी और कारगे के महीन कुर्तो में उनका जिस्म आटे की लोई की तरह चमक रहा था। भारी जडाऊ सोने के बटन गरेबान के एक तरफ झूल रहे थे। शाम हो गयी थी और कमरे में अँधेरा घुप हो रहा था। मुझे एक नामालूम डर से दहशत-सी होने लगी। बेगम जान की गहरी-गहरी आँखें!
मैं रोने लगी दिल में। वह मुझे एक मिट्टी के खिलौने की तरह भींच रही थीं। उनके गरम-गरम जिस्म से मेरा दिल बौलाने लगा। मगर उन पर तो जैसे कोई भूतना सवार था और मेरे दिमाग का यह हाल कि न चीखा जाये और न रो सकूँ।
थोडी देर के बाद वह पस्त होकर निढाल लेट गयीं। उनका चेहरा फीका और बदरौनक हो गया और लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगीं। मैं समझी कि अब मरीं यह। और वहाँ से उठकर सरपट भागी बाहर।
शुक्र है कि रब्बो रात को आ गयी और मैं डरी हुई जल्दी से लिहाफ ओढ सो गयी। मगर नींद कहाँ? चुप घण्टों पडी रही।
अम्माँ किसी तरह आ ही नहीं रही थीं। बेगम जान से मुझे ऐसा डर लगता था कि मैं सारा दिन मामाओं के पास बैठी रहती। मगर उनके कमरे में कदम रखते दम निकलता था। और कहती किससे, और कहती ही क्या, कि बेगम जान से डर लगता है? तो यह बेगम जान मेरे ऊपर जान छिडक़ती थीं ...
आज रब्बो में और बेगम जान में फिर अनबन हो गयी। मेरी किस्मत की खराबी कहिए या कुछ और, मुझे उन दोनों की अनबन से डर लगा। क्योंकि फौरन ही बेगम जान को खयाल आया कि मैं बाहर सर्दी में घूम रही हूँ और मरूँगी निमोनिया में! ''लडक़ी क्या मेरी सिर मुँडवायेगी? जो कुछ हो-हवा गया और आफत आयेगी।''
उन्होंने मुझे पास बिठा लिया। वह खुद मुँह-हाथ सिलप्ची में धो रही थीं। चाय तिपाई पर रखी थी।
''चाय तो बनाओ। एक प्याली मुझे भी देना।'' वह तौलिया से मुँह खुश्क करके बोली, ''मैं जरा कपडे बदल लूँ।''
वह कपडे बदलती रहीं और मैं चाय पीती रही। बेगम जान नाइन से पीठ मलवाते वक्त अगर मुझे किसी काम से बुलाती तो मैं गर्दन मोडे-मोडे जाती और वापस भाग आती। अब जो उन्होंने कपडे बदले तो मेरा दिल उलटने लगा। मुँह मोडे मैं चाय पीती रही।
''हाय अम्माँ!'' मेरे दिल ने बेकसी से पुकारा, ''आखिर ऐसा मैं भाइयों से क्या लडती हूँ जो तुम मेरी मुसीबत ..''
अम्माँ को हमेशा से मेरा लडक़ों के साथ खेलना नापसन्द है। कहो भला लडक़े क्या शेर-चीते हैं जो निगल जायेंगे उनकी लाडली को? और लडक़े भी कौन, खुद भाई और दो-चार सडे-सडाये जरा-जरा-से उनके दोस्त! मगर नहीं, वह तो औरत जात को सात तालों में रखने की कायल और यहाँ बेगम जान की वह दहशत, कि दुनिया-भर के गुण्डों से नहीं।
बस चलता तो उस वक्त सड़क़ पर भाग जाती, पर वहाँ न टिकती। मगर लाचार थी। मजबूरन कलेजे पर पत्थर रखे बैठी रही।
कपडे बदल, सोलह सिंगार हुए, और गरम-गरम खुशबुओं के अतर ने और भी उन्हें अंगार बना दिया। और वह चलीं मुझ पर लाड उतारने। ''घर जाऊँगी।'' मैं उनकी हर राय के जवाब में कहा और रोने लगी। ''मेरे पास तो आओ, मैं तुम्हें बाजार ले चलूँगी, सुनो तो।''
मगर मैं खली की तरह फैल गयी। सारे खिलौने, मिठाइयाँ एक तरफ और घर जाने की रट एक तरफ। ''वहाँ भैया मारेंगे चुडैल!'' उन्होंने प्यार से मुझे थप्पड लगाया। ''पडे मार भैया,'' मैंने दिल में सोचा और रूठी, अकडी बैठी रही। ''कच्ची अमियाँ खट्टी होती हैं बेगम जान!'' जली-कटी रब्बों ने राय दी। और फिर उसके बाद बेगम जान को दौरा पड ग़या। सोने का हार, जो वह थोडी देर पहले मुझे पहना रही थीं, टुकडे-टुकडे हो गया। महीन जाली का दुपट्टा तार-तार। और वह माँग, जो मैंने कभी बिगडी न देखी थी, झाड-झंखाड हो गयी। ''ओह! ओह! ओह! ओह!'' वह झटके ले-लेकर चिल्लाने लगीं। मैं रपटी बाहर।
बडे ज़तनों से बेगम जान को होश आया। जब मैं सोने के लिए कमरे में दबे पैर जाकर झाँकी तो रब्बो उनकी कमर से लगी जिस्म दबा रही थी। ''जूती उतार दो।'' उसने उनकी पसलियाँ खुजाते हुए कहा और मैं चुहिया की तरह लिहाफ में दुबक गयी।
सर सर फट खच!
बेगम जान का लिहाफ अँधेरे में फिर हाथी की तरह झूम रहा था। ''अल्लाह! आँ!'' मैंने मरी हुई आवाज निकाली। लिहाफ में हाथी फुदका और बैठ गया। मैं भी चुप हो गयी। हाथी ने फिर लोट मचाई। मेरा रोआँ-रोआँ काँपा। आज मैंने दिल में ठान लिया कि जरूर हिम्मत करके सिरहाने का लगा हुआ बल्ब जला दूँ। हाथी फिर फडफ़डा रहा था और जैसे उकडूँ बैठने की कोशिश कर रहा था। चपड-चपड क़ुछ खाने की आवाजें आ रही थीं - जैसे कोई मजेदार चटनी चख रहा हो। अब मैं समझी! यह बेगम जान ने आज कुछ नहीं खाया।
और रब्बो मुई तो है सदा की चट्टू! जरूर यह तर माल उडा रही है। मैंने नथुने फुलाकर सूँ-सूँ हवा को सूँघा। मगर सिवाय अतर, सन्दल और हिना की गरम-गरम खुशबू के और कुछ न महसूस हुआ।
लिहाफ फ़िर उमँडना शुरू हुआ। मैंने बहुतेरा चाहा कि चुपकी पडी रहूँ, मगर उस लिहाफ ने तो ऐसी अजीब-अजीब शक्लें बनानी शुरू कीं कि मैं लरज गयी। मालूम होता था, गों-गों करके कोई बडा-सा मेंढक फूल रहा है और अब उछलकर मेरे ऊपर आया!
''आ ... न ...अम्माँ!'' मैं हिम्मत करके गुनगुनायी, मगर वहाँ कुछ सुनवाई न हुई और लिहाफ मेरे दिमाग में घुसकर फूलना शुरू हुआ। मैंने डरते-डरते पलंग के दूसरी तरफ पैर उतारे और टटोलकर बिजली का बटन दबाया। हाथी ने लिहाफ के नीचे एक कलाबाजी लगायी और पिचक गया। कलाबाजी लगाने मे लिहाफ का कोना फुट-भर उठा - अल्लाह! मैं गडाप से अपने बिछौने में ! ! !
उस दिन उसके मन में इच्छा हुई कि भारत और पाक के बीच की सीमा-रेखा को देखा जाए जो कभी एक देश था, वह अब दो होकर कैसा लगता है। दो थे तो दोनों एक-दूसरे के प्रति शंकालु थे। दोनों ओर पहरा था। बीच में कुछ भूमि होती है जिस पर किसी का अधिकार नहीं होता। दोनों उस पर खड़े हो सकते हैं। वह वहीं खड़ा था, लेकिन अकेला नहीं था-पत्नी थी और थे अठारह सशस्त्र सैनिक और उनका कमाण्डर भी। दूसरे देश के सैनिकों के सामने वे उसे अकेला कैसे छोड़ सकते थे। इतना ही नहीं, कमाण्डर ने उसके कान में कहा, ‘‘उधर के सैनिक आपको चाय के लिए बुला सकते हैं, जाइएगा नहीं। पता नहीं क्या हो जाए ? आपकी पत्नी साथ में है और फिर कल हमने उनके छः तस्कर माल डाले थे।’’ उसने उत्तर दिया, ‘‘जी नहीं, मैं उधर कैसे जा सकता हूँ ?’’ और मन ही मन कहा, मुझे आप इतना मूर्ख कैसे समझते हैं ? मैं इन्सान हूँ, अपने पराये में भेद करना मैं जानता हूँ। इतना विवेक मुझमें है। वह यह सब सोच ही रहा था कि सचमुच उधर के सैनिक वहाँ आ पहुँचे। रोबीले पठान थे। बड़े तपाक से हाथ मिलाया। उस दिन ईद थी। उसने उन्हें मुबारकबाद कहा। बड़ी गरमजोशी के साथ एक बार फिर हाथ मिलाकर वे बोले, ‘‘इधर तशरीफ लाइए। हम लोगों के साथ एक प्याला चाय पीजिए।’’ इसका उत्तर उसके पास तैयार था। अत्यन्त विनम्रता से मुस्कराकर उसने कहा, ‘‘बहुत-बहुत शुक्रिया। बड़ी खुशी होती आपके साथ बैठकर, लेकिन मुझे आज ही वापिस लौटना है और वक्त बहुत कम है। आज तो माफी चाहता हूँ।’’ इसी प्रकार शिष्टाचार की कुछ और बातें हुई कि पाकिस्तान की ओर से कुलाँचें भरता हुआ बकरियों का एक दल उनके पास से गुजरा और भारत की सीमा में दाखिल हो गया। एक साथ सबने उनकी ओर देखा। एक क्षण बाद उसने पूछा, ‘‘ये आपकी हैं ?’’ उनमें से एक सैनिक ने गहरी मुस्कराहट के साथ उत्तर दिया, ‘‘जी हाँ जनाब, हमारी हैं। जानवर हैं फर्क करना नहीं जानते।’’
चोरी का अर्थ
एक लम्बे रास्ते पर सड़क के किनारे उसकी दुकान थी। राहगीर वहीं दरख्तों के नीचे बैठकर थकान उतारते और उससे कुछ चना-चबेना लेकर भूख मिटाते। दुकानदार उन्हें ठण्डा पानी पिलाता और सुख-दुख का हाल पूछता। इस प्रकार तरोताजा होकर राहगीर अपने रास्ते पर आगे बढ़ जाते। एक दिन एक मुसाफिर ने एक आने का सामान लेकर दुकानदार को एक रुपया दिया। उसने सदा की भाँति अन्दर की अलमारी खोली और रेजगारी देने के लिए अपनी चिर-परिचित पुरानी सन्दूकची उतारी। पर जैसे ही उसने ढक्कन खोला उसका हाथ जहाँ था, वहीं रुक गया। यह देखकर पास बैठे हुए आदमी ने पूछा,‘‘क्यों, क्या बात है ?’’ ‘‘कुछ नहीं,’’ दुकानदार के ढक्कन बन्द करते हुए कहा, ‘‘कोई गरीब आदमी अपनी ईमानदारी मेरे पास गिरवी रखकर पैसे ले गया है।’’
हाँ वो शिला ही थी!! कैसे भूल कर सकती थी मैं पहचानने में उसे, जिसे बरसों देखा, साथ गुजारा, पल पल उसके बारे में सोचा.
शिला थी ही ऐसी, जैसे किसी शिल्पकार की तराशी हुई एक सजीव आत्मा जो तन को ओढकर इस सँसार की सैर को निकली हो. जिस राह से वो गुजरती, गुजरने वाले थम जाते, जैसे जम से जाते थे. उनकी आँखे पत्थरा जाती, जैसे किसी नूर को सामने पाया हो. हाँ वही हूर शिला मेरी प्रिय सहेली आज मेरे सामने से गुजर रही है, खुद से होकर बेखबर.
बारह वर्ष कोई इतना लंबा अरसा तो नहीं होता, जहाँ इन्सान इस कदर बदल जाये, न फ़कत रँग रूप में, पर जिसके पूरे अस्तित्व की काया पलट हो जाए. वो कालेज के जमाने भी खूब हुआ करते थे, जब मैं और शिला साथ साथ रहा करते थे, एक कमरे में, एक ही क्लास में और लगभग पूरा वक्त साथ खाना, साथ पढना, साथ समय बिताना. क्या ओढना, क्या बिछाना ऐसी हर सोच से परे, आजाद पँछियों की तरह चहकते हुए, हर पल का लुत्फ लेते हुए, हर साल कालेज में टाप करते हुए अब हम दोनों फाइनल साल में पहूँचीं. चार साल का अरसा कोई कम तो नहीं होता, किसीको जानने के लिये, पहचानने के लिये.
"अरे शिला!" मैंने उसके करीब जाते ही अपनेपन से उसे पुकारा. अजनबी सी आँखे बिना भाव मेरी ओर उठी, उठकर फिर झुकी और वह कदम आगे बढाकर चल पड़ी, ऐसे जैसे मैं कोई अजनबी थी.
"शिला, मैं सवी, तुम्हारी सहेली. कैसी हो?" जैसे सुना ही न हो, या चाहकर भी सुनना नहीं चाहा, कुछ ऐसा अहसास मन में उठा. ऐसा क्या हो सकता है जो इस बदलाव का कारण बने?
इठलाती, बलखाती, हर कदम पर थिरकती हुई शिला, जैसे किसी शिल्पकार की तराशी कोई छवी, दिन भर गुनगुनाती अपने आस पास एक खुश्बू फैलाती, आज इतनी बेरँग, रूखी बिना अहसास क्यों? मेरी उत्सुकता बढी, मैंने आगे बढ़कर उसके साथ कदम मिलाकर चलते हुए धीरे से फिर उसका हाथ थाम लिया.
" शिला, मैं तो वही सवी, सविता हूँ, पर तुम शिला होकर भी शिला नहीं हो, यह मैं नहीं मानती. कैसा है समीर?"
इस सवाल से उसके चेहरे के रँग में जो बदलाव आया वो देखने जैसा था. चेहरे पर तनाव के बादल गहरे हो गये, आँखों में उदासी के साए ज्यादा घने और तन सिमटकर छुई मुई सा, जैसे वह सिमट कर अपना अस्तित्व छुपा लेना चाहती हो. मैंने उसकी कलाई पकड ली. जब उसने छुडाने की कोशिश की तो ज्यादा पुख्त़गी से पकडी, और हाँ उसने भी फिर छुडाने की कोशिश नहीं की. शायद अपनेपन की गर्मी से पत्थर पिघलने लगा था. उसी प्यार की आँच में पिघलकर ही तो वह समीर के साथ चली गई, दूर बहुत दूर किसी और दुनियाँ में. पीछे छोड़ गई अपनी प्यारी सहेली सविता को, अपने अँतिम वर्ष की पढ़ाई को, अपने आने वाले उज्वल भविष्य को. शायद उस प्यार की पनाह ने उससे वह रौशनी छीन ली थी, जिस कारण उसे सिर्फ समीर, उसकी चित्रकारी, और तूलिका पर निखरे रँग आस पास दिखाई पड़ रहे थे. जाने क्या था वह, कैसे खुमार था, प्यार का जुनून ही रहा होगा, जो उसने अपना भविष्य समीर के नाम लिख दिया. और एक दिन अचानक वह उसके साथ शादी अचानक मेरे सामने आ खडी हुई.
" सवी, मुझे और समीर को शादी की बधाई नहीं दोगी?"
" हाँ हाँ मुबारक हो"..पर अचानक...मेरे शब्द मेरे मुँह में ही रह गए.
" हाँ अचानक ही फैसला करना पड़ा, कल समीर वापस जा रहा है अपने घर शिमला, और में भी उसके साथ जा रही हूँ." कहते हुए शिला मेरे गले लग गई.
"पर दो महीने के बाद फाइनल परीक्षा..." मैं कहना चाह रही थी पर कह ना पाई. शायद शिला जानकर अनजान बन रही थी, या वह अब किसी प्रकार की दख़ल अँदाजी नही चाहती थी, इसीलिये तो शादी का महत्व पूर्ण फैसला अकेले ही ले लिया, किसी की जरूरह ही उसे महसूस नहीं हुई. हाँ एक बात साफ थी, उसके ऊपर उस प्यार का, समीर की कला का जो इँद्रधनुषी खुमार था, उस बहाव में वो बहे जा रही थी. कोई बाँध वहाँ बाँधना बेकार था, यही सोच कर मैं भी अपनी पूरी सोच के साथ अधूरे शब्दों का सहारा लेने लगी.
"सवी, तुम ज्यादा मत सोचो, मैंने सोच समझ कर यह फैसला लिया है क्योंकि मैं समीर के सिवा नहीं रह सकती और न वो मेरे सिवा. अब मैं जीवन के रँगों को ओढ़ना चाहती हूं, उनमें अपनी आशाओं को रँगना चाहती हूँ, इससे ज्यादा कुछ नहीं..हाँ चलो साथ में बेठकर आखिरी बार खाना खाएँ, कल वैसे भी सुबह की गाडी पकडनी है, आओ चलें." कहते हुए उसने मेरी कलाई ठीक उसी तरह पकडी थी, जैसे आज मैंने उसकी पकडी है.
खाना खाते खाते, बातों के दौरान मैं समीर की ओर देखती रही चोरी छुपे, जैसे उसे जानने की, पहचानने की कोशिश करती रही. ऐसा क्या था उसमें जो मेरी प्रिय सहेली की जिँदगी में तूफान बनकर आया और बवँडर की तरह बहा कर ले जा रहा है. दो महीने के लिये जो आर्ट का प्रजेक्ट उसे सौंपा गया था, उसके पूरा होने के पहले ही उसने शिला की जिँदगी पर अपना रँग चढा दिया और अब साथ ले जा रहा था मेरी जान से प्यारी सहेली को, जैसे जबरदस्ती कोई मेरे तन से रूह को जुदा कर रहा था. सोचों के दाइरे से खुद को बाहर निकालते हुए मैंने समीर की ओर रुख किया.
"समीर बुरा न मानना, पर एक बात तो बताओ, क्या दो महीने शिला की खातिर और नहीं रुक सकते ताकि शिला भी अपनी पढाई की जबाबदारी पूरी कर ले. जीवन भर साथ निभाने के लिये जरूरी नहीं है कि हम वक्त के साथ खिलवाड़ करें. पढाई तो रौशनी का एक अँग है, उसे इस तरह अधूरा...."
"सविता जी फैसला शिला का है मेरा नहीं, और उस फैसले से मैं ज्यादा खुश तो नहीं, पर नाराज़ भी नहीं. मेरी प्रेरणा मेरा मीत बनकर मेरे साथ साये की तरह रहे, यह मेरी खुशकिस्मती है."
" पर....." इतना भी न कह पाई और शिला ने आँखों के इशारे से मूक भाषा में मुझे कुछ न कहने के लिये कहकर चुप करा दिया.
बस वह चली गई, अपनी सुन्हरी दनियां में सुँदर सपनों को लेकर और फिर सब धुँधला धुँधला सा हो गया. दिन बीते, महीने बीते, और साल भी बीतते चले गये..एक नहीं, दो नहीं, पूरे बारह बरस. सोचों का सिलसिला साथ था, पकड़ में उसकी कलाई और हमकदम हमारी चाल. आखिर एक पेड़ के नीचे खींचकर मैंने उसे बिठाया और फिर मैं भी बैठ गई उसके पास सटक कर जैसा हम अक्सर बैठा करते थे.
" अब बता शिला, तू यहाँ इस शहर में शिमला से इतनी दूर? और समीर कहां है, साथ में क्यों नहीं आया?" मैंने अनजाने में कई सवाल एक साथ पूछ लिये और उसका मुँह तकने लगी जवाब के इँतजार में !
जवाब में उसकी म्रगनयनी आँखों से टपके सीप से कुछ मोती, जिन्हें चाहकर भी मैं अपने आँचल में समेट न पाई, ना ही शिला ने जतन किया उस फिसलती हुई धारा को रोकने का. बस कुछ कह न पाई और उठते हुए अपनेपन से कहा " चलो कहीं बैठकर चाय पीते है सवी."
चाय के उस दौर में उसने चाय के साथ न जाने कितने आँसुओं के साग़र पिये, अनबुझी किसी प्यास का होना जाहिर था, पर उस प्यास का रुख एक नया मोड़ ले रहा था. शिला की जुबानी उसकी आसुओं की तरह बिखरी हुई कहानी को समेटते हुए शिला ने कहा " सवी मैं उसके लिये बस तूलिका पर बिखरे हुए रँगों का एक बिँदू थी.."
" थी..." मैंने उलझे हुए होंटों को खोलने की कोशिश की, पर शिला के मन का द्वंद्व शायद अभी बँद न हुआ था.
" हाँ थी. हूँ नहीं सवी " अपनेपन की आँच से थमा हुआ दर्द का दरिया पिघल कर आँखों से बह जाना चाह रहा था और उसी बहाव में बहते हुए शिला कहती गई, " सच मानो सवी जिस तरह उसने तूलिका पर रँग बिखेरकर मेरी तस्वीरों को सजाया, उन्हें सजीव बना दिया अपने हुनर की बारीकियों से, कई खरीदार उन पर फिदा होकर खरीदने लगे. दौलत का नशा दिन से ज्यादा समीर की रातें रँगीन करने लगा.दिन को मैं किसी पत्थर की मूर्ती की तरह उसकी प्रेरणा बनकर घँटों बैठी रहती और वह नपे तुले ढँग से मेरे हर कोण में रँग भरता रहा, बेचता रहा और खनखनाहट में खोता गया, और फिर बहाव इतना तेज़ आया उस बाढ़ में, जो वह मुझे भी बहा ले गया उसकी स्वार्थ की वेदी के उस पार जहाँ मैं तुम्हारी वह सहेली तो नहीं रही जो हर पल को तुम से बाँट लेती थी, पर हां बंटी सी, बिखरी बिखरी सी उस शिला का ज़र्रा ज़र्रा बिखरता गया. हाँ वह शिला जो अपनी आन बान के साथ जिया करती थी...वह..." और शिला फूट फूटकर रोने लगी.
बस अनकहे शब्दों ने हर खालीपन को भर दिया, आँसुओं की जुबाँ सब कह गई. मुझे यूँ लगने लगा कि शिला बिखर कर टूट चुकी है और जहां तक मेरी सोच पहुँच सकती थी, ऐसा आभास हूआ जैसे शिला मुझसे वही पुराना आश्रय माँग रही थी, उसी आँचल की नर्मी ढूँढ रही थी, वह निस्वार्थ स्पर्श माँग रही थी.
मैंने उसे आलिंगन में भरते हुए अपने साथ इस तरह जोड़ लिया जैसे वो कभी मुझ से अलग ही न हुई थी. उसका इस तरह सिमटना, बिखराव का अँत हो गया, सभी बिखरे रँग फिर से सिमट कर उस बेरँग शिला रूपी बिँदू में समाते चले गए, बूँद सागर में समा गई. आकाश के बादल छँट गए, विराटता नजर में भर गई सितारों भरा आसमान साफ दिखई दे रहा था.
कब दुपहर से शाम, शाम से साँझ हुई पता ही नहीं पडा, सफर ज़ारी है, मँजिल क्षितिज के उस पार शायद......!!!
दूर ध्वनी के साथ शब्द भी भीने भीने से मन को भिगोते रहे.
‘ख़ुश रहो।’ कह कर दीपक ने फ़ोन रख दिया। वह रमेश की इस सर्द बातचीत से बहुत उदास हो गया। बाद के दिनों में उस ने धीरज और तरुण से भी यह बातें कीं। इन दोनों की बातचीत में भी वही ठंडापन पा कर दीपक समझ गया कि अब मुनमुन की समस्या का समाधान सचमुच बहुत कठिन है। अब उस ने एक दिन मुनमुन को फ़ोन किया और राहुल का फ़ोन नंबर मांगा।‘क्या इन तीनों भइया से बात हो गई आप की?’
‘हां, हो गई।’ दीपक टालता हुआ बोला।
‘क्या बोले ये लोग?’ मुनमुन उत्सुक हुई।
‘वह बाद में बताएंगे पर पहले तुम राहुल का नंबर दो।’ दीपक खीझ कर बोला।
‘लीजिए लिखिए।’ कह कर उस ने राहुल का नंबर आई.एस.डी. कोड सहित लिखवा दिया। फिर दीपक ने राहुल का फ़ोन मिलाया। राहुल बोला, ‘भइया प्रणाम। अभी गाड़ी ड्राइव कर रहा हूं। थोड़ी देर में मैं ख़ुद आप से बात करता हूं।’ कह कर उस ने फ़ोन काट दिया। दीपक परेशान हो गया। बावजूद इन परेशानियों के वह मुनमुन समस्या का समाधान चाहता था। यह समस्या जैसे उस के दिल पर बोझ बन गई थी। वह जैसे एक घुटन में जी रहा था। उस की आंखों के सामने एक गहरी धुंध थी और इस धुंध में से ही उसे कोई रास्ता ढूंढना था। दिल्ली की व्यर्थ की भागदौड़ भरी ज़िंदगी और इस की आपाधापी से वह इन दिनों यों ही तनाव में रहता था। तिस पर मुनमुन उस के दिलो-दिमाग़ पर सांघातिक तनाव बन कर सवार थी। उसे लगता था जैसे उस के दिमाग़ की नसें फट जाएंगी। जब-तब तिल-तिल कर मरती मुनमुन उस के सामने आ कर खड़ी हो जाती और पूछती, ‘भइया कुछ सोचा आप ने मेरे लिए?’
और वह हर बार निरुत्तर हो जाता।
यह क्या था?
बचपन में मामी के खिलाए पकवानों का कर्ज़ था?
या ननिहाल के नेह और मां के दूध का दर्द था?
कि मुनमुन ही के साथ हुए अन्याय के प्रतिकार का जुनून था?
या यह सब कुछ एक साथ मिश्रित था? जो भी हो उस की जिंदगी गडमड हो गई थी। थोड़ी देर बाद राहुल का फ़ोन आया तो उस ने राहत की सांस ली। राहुल कहने लगा, ‘भइया आप का फ़ोन पा कर मैं तो चकित रह गया। पहली बार यहां आप का फ़ोन आया और माफ़ कीजिए उस वक्त बात नहीं कर पाया।’
‘कोई बात नहीं, कोई बात नहीं।’ दीपक ने कहा।
‘और भइया सब ठीक तो है न!’
‘राहुल अगर सब ठीक होता तो मैं तुम्हें फ़ोन क्यों करता भला?’
‘हां, भइया बताइए क्या हो गया?’
‘मैं पिछले महीने बांसगांव गया था।’
‘अच्छा-अच्छा।’ राहुल ने पूछा, ‘क्या हालचाल है वहां का?’
‘तो तुम को कुछ भी नहीं मालूम?’
‘नहीं इतना तो मालूम है कि बाबू जी मुनमुन को विदा करवा लाए हैं।’
‘बस!’
‘क्या कुछ और गड़बड़ हो गया क्या?’
‘हो तो गया है।’ कह कर दीपक ने वह सारी बातें राहुल से भी कहीं जो रमेश, धीरज और तरुण से कही थीं।
राहुल ने पूरी बात सुनी और परेशान हो गया। बाक़ी तीनों भाइयों की तरह ठंडापन नहीं दिखाया उस ने जब कि आई.एस.डी. काल का ख़र्चा था। फिर भी वह बोला, ‘भइया मामला तो बहुत गंभीर हो गया है। अगर राधेश्याम घर पर आ कर अम्मा और मुनमुन की पिटाई और गाली गलौज कर रहा है तब तो बात और भी गंभीर हो गई है। रही बात अम्मा बाबू जी के वेलफ़ेयर की तो उधर तो मैं जब तब पैसा भेजता ही था। आप जानते ही हैं कि मुनमुन की शादी में सारा ख़र्च लगभग मुझे ही करना पड़ा था तो वह क़र्ज़ा निपटाने में लगा हूं। और मैं सोचता था कि भइया लोग ख़याल रख रहे होंगे।’
‘देखो तुम्हारा पैसा बहुत ख़र्च हो रहा होगा फ़ोन पर।’ राहुल की उत्सुकता देखते हुए दीपक बोला, ‘तुम अपनी आई.डी. बताओ हम लोग मेल के थ्रू बात करते हैं या फिर तुम याहू मैसेंजर पर भी आ सकते हो। तब हम लोग सीधी बातचीत कर सकेंगे।’
‘हां, भइया आप ठीक कह रहे हैं। कह कर उस ने अपनी याहू आई.डी. लिखवा दी और दीपक की भी आई.डी. लिख ली। और कहा कि, ‘हम लोग फिर नेट पर ही बात करते हैं।’
‘हां, क्यों कि बात लंबी है और मामला गंभीर!’
‘ठीक भइया। प्रणाम!’ कह कर उस ने फ़ोन काट दिया।
राहुल की इस बातचीत से दीपक जो गहरे डिप्रेशन में जा रहा था, उबर आया। उस को लगा कि अब कोई रास्ता ज़रूर निकल जाएगा। घुप्प अंधेरे में कोई रोशनी दिखी तो थी। और सचमुच दूसरे दिन राहुल की लंबी मेल दीपक को मिली। राहुल ने विस्तार से सारी बातें रखी थीं घर के प्लस-माइनस बताए थे और माना था कि मुनमुन के साथ पूरे घर ने मिल कर अनजाने में सही अन्याय कर दिया था। जिस में कि सब से ज़्यादा दोषी वह ख़ुद है। कि सिर्फ़ पैसा ख़र्च करना ही अपनी ज़िम्मेदारी समझी। घर बार और वर देखने की भी ज़िम्मेदारी उसे निभानी चाहिए थी जो समय की कमी और बाक़ी घर वालों पर विश्वास के चलते नहीं निभा पाया। फिर उस ने मुनमुन का एक तर्क भी जोड़ा था विवाह पूर्व का कि आदमी एक कपड़ा भी ख़रीदता है तो दस कपड़े देख कर और ठोंक बजा कर फिर हम लोग तो उस का लाइफ़ पार्टनर तय कर रहे थे। और फिर भी नहीं देखा। जब कि मुनमुन लगातार आशंका जता रही थी और सब से चिरौरी कर रही थी कि लड़के को ठीक से देख जांच लिया जाए। पर सब एक दूसरे पर टाल गए। और मान लिया गया कि बाबू जी ने देख लिया है तो सब ठीक ही होगा। शायद अति विश्वास और संयुक्त परिवार में ज़िम्मेदारियों को एक दूसरे पर टालने की त्रासदी है यह। फिर एक लड़के से मुनमुन का बढ़ता मेल जोल एक बड़ा दबाव था जो उस की शादी में जल्दबाज़ी का कारण बना और सब ने एक ड्यूटी की तरह शादी शायद नहीं की, शादी की कार्रवाई की। यह नहीं सोचा किसी ने कि अगर मुनमुन के साथ कुछ अप्रिय होगा, और वह हो भी गया है तो वह इसी परिवार की ज़िम्मेदारी होगी और कि जो एक दाग़ लगेगा वह सभी के दामन पर लगेगा। फिर राहुल ने अपनी चिट्ठी में दीपक से इस बात पर बेहद ख़ुशी और संतोष जताया था कि हमारे परिवार और इस पीढ़ी में आप सब से बड़े हैं और आप इस में जो इस शिद्दत से जुड़ाव महसूस कर रहे हैं तो ज़रूर इस समस्या का कोई सम्मानजनक समाधान भी निकलेगा। फिर उस ने सुझाया था कि उस की राय में मुनमुन की ससुराल में बातचीत कर के उस की सम्मानजनक ढंग से विदाई करवा कर इस समस्या को सुलझाना ठीक रहेगा। मुनमुन वहां जा कर अपने बिगड़ैल पति को सुधार भी सकती है। ऐसा कई बार देखा भी गया है कि पत्नी के प्यार में बहुत सारे बिगड़े लोग सुधर भी गए हैं। बस प्रयास सकारात्मक होना चाहिए।
राहुल की इस साफ़गोई, सुझाव और मेच्योरिटी का दीपक क़ायल हो गया। और रमेश को फ़ोन किया कि, ‘थोड़ा समय निकालो तो बांसगांव चल कर मुनमुन के ससुराल वालों के साथ मिल बैठ कर कोई रास्ता निकाला जाए।’ रमेश सहमत हो गया और बोला, ‘मैं आप को बताता हूं। ख़ुद फ़ोन करूंगा।’
दीपक को लगा कि अब तो बात बन ही जाएगी। कुछ दिन बाद रमेश का फ़ोन आया कि, ‘भइया मैं ने मुनमुन की विदाई का दिन तय कर दिया है। आप भी फला तारीख़ को पहुंचिए विदाई संपन्न करवा दीजिए।’
‘चलो यह बहुत अच्छा काम किया।’ दीपक बोला, ‘पर मेरा पहुंचना कोई ज़रूरी तो है नहीं। और फिर जब विदाई का दिन तय हो गया है तो विदाई हो ही जाएगी। मेरे आने न आने से क्या फ़र्क़ पड़ता है?’
‘फ़र्क़ पड़ जाएगा भइया।’ रमेश बोला, ‘मैं ने मुनमुन की ससुराल वालों को विदाई के लिए राज़ी किया है। अपने घर वालों को नहीं।’
‘तो उन्हें भी राज़ी कर लो।’
‘कैसे राज़ी करूं?’ रमेश चिढ़ कर बोला, ‘मुनमुन किसी सूरत तैयार नहीं है और अम्मा उस को शह दे रही हैं। जबकि बाबू जी हमेशा की तरह तटस्थ हो गए हैं।’
‘तो फिर कैसे होगी विदाई?’ दीपक चिंतित हो कर बोला।
‘कुछ नहीं भइया आप आ जाएंगे तो सब ठीक हो जाएगा।’
‘कैसे भला?’ दीपक ने आश्चर्य से पूछा, ‘मेरे पास कोई जादू की छड़ी है क्या?’
‘हां है न!’
‘क्या बेवक़ूफ़ी की बात करते हो?’
‘अरे भइया आप को नहीं पता पर मैं जानता हूं कि आप की बात न तो मुनमुन टालेगी, न अम्मा, न बाबू जी। आप को शायद पता नहीं कि हमारे घर में जितनी आप की एक्सेप्टेंस है शायद किसी और की नहीं। भगवान झूठ न बोलवाए और माफ़ करे तो मैं कहूंगा कि शायद उतनी भगवान की भी नहीं।’ वह बोला, ‘बस आप उस दिन पहुंच भर जाइए।’
‘भई मुझे तो यह बात नहीं जम रही।’ दीपक बोला, ‘अगर मुनमुन की सहमति नहीं है तो मैं नहीं समझता कि विदाई होनी चाहिए।’
‘फिर?’ रमेश हताश हो कर बोला।
‘फिर क्या?’ दीपक बोला, ‘पहले तो मुनमुन को ही समझाना ज़रूरी है। वह छोटी है और हम लोग बड़े। उस को समझाना, बताना हम लोगों का धर्म है। फिर वह वयस्क है, पढ़ी लिखी है, अपना अच्छा-बुरा समझती है, उस की अपनी जिंदगी और अपना स्वाभिमान है। तुम भी पढ़े लिखे हो। एक ज़िम्मेदार पद पर हो। किसी के साथ इस तरह ज़ोर ज़बरदस्ती! भई मुझे तो नहीं समझ में आती और न ही तुम्हें शोभा देती है।’ वह बोला, ‘फिर यह मसला इतना नाज़ुक है कि इस में बहुत जल्दबाज़ी भी ठीक नहीं लगती मुझे।’
‘कुछ नहीं भैया आप पहुंचिए।’
‘अच्छा चलो मैं पहुंचूं और मुनमुन मामी वग़ैरह मेरी भी बात टाल गईं तो?’
‘तो क्या?’ रमेश बोला, ‘झोंटा पकड़ कर, खींच कर जबरिया घसीट कर विदा कर दूंगा।’
‘फिर तो भई मैं ऐसी विदाई में बिलकुल नहीं आऊंगा।’ दीपक बोला, ‘और तुम्हें भी सलाह दूंगा कि तुम भी हरगिज़ ऐसा मत करो।’
‘फिर क्या करूं?’
‘दोनों पक्षों को आमने-सामने बैठा कर सम्मानजनक हल निकालने की कोशिश करो।’
‘कर चुका हूं यह कोशिश भी पर हल निकलने के बजाय बात और बिगड़ गई।’
‘एक बार फिर कोशिश करो। दो बार, तीन बार, चार बार, हज़ार बार कोशिश करो।’ दीपक बोला, ‘ऐसे हार मान जाने से और इस तरह हड़बड़ाने से तो बात नहीं बनने वाली है।’
‘पर मुनमुन का क्या करूं तब तक?’ रमेश बोला, ‘वह तो पतंग हुई जा रही है। पतंग बन कर परिवार की इज्ज़त पूरे बांसगांव में उड़ा रही है!’
‘मतलब?’
‘मतलब यह भइया!’ रमेश रुआंसा होता हुआ बोला, ‘कहते हुए अच्छा भी नहीं लगता पर कहना भी पड़ रहा है कि मुनमुन चरित्रहीन हो गई है। और क्या कहूं?’
‘ओह!’
‘इसी लिए कह रहा हूं कि येन केन प्रकारेण उसे विदा कर देना ही परिवार के हित में है।’ रमेश बोला, ‘आप को बताऊं भइया कि इसी चक्कर में हड़बड़ा कर ही उस की आनन-फानन शादी भी करनी पड़ी। और शादी में भी उस ने क्या-क्या नाटक नहीं करवाया। वह तो धीरज ने मामला संभाला किसी तरह। और क्या-क्या बताऊं आप को!’
‘चलो थोड़ा धीरज और रखो।’ दीपक बोला, ‘बात बिगड़ी हुई है तो थोड़ा समय लगेगा और समझदारी से काम लेना पड़ेगा।’
‘अब क्या बताऊं?’
‘नहीं सोचो कि अभी जल्दबाज़ी में शादी ग़लत हो गई। और जल्दबाज़ी में कहीं बात कुछ और न बिगड़ जाए। वो कहते हैं न कि पेंच ज़्यादा कसने से पेंच टूट भी जाता है।’
‘हां, यह तो है।’
‘चलो तुम भी कुछ सोचो, मैं भी कुछ सोचता हूं।’
‘ठीक भइया प्रणाम!’ कह कर रमेश ने फ़ोन काट दिया।
दीपक ने रमेश से हुई सारी बात राहुल को लिख भेजी। राहुल बहुत आशान्वित हुआ। उस ने अपनी मेल में लिखा कि, ‘अब आप दोनों भइया इस काम में लग गए हैं तो मुझे पूरी उम्मीद है कि बात बन जाएगी और कोई न कोई सम्मानजनक हल निकल आएगा।’ दीपक ने इस के जवाब में राहुल को लिखा, ‘मामला इतना आसान नहीं है और बहुत जल्दी नतीजे की उम्मीद करना भी बेमानी है।’
फिर दीपक ने धीरज को फ़ोन किया। पर धीरज का फ़ोन नहीं उठा। मुनमुन को मिलाया तो उस का फ़ोन स्विच आफ़ मिला। कुछ दिन बाद रमेश का फ़ोन आया और वह पूछने लगा, ‘भइया क्या सोचा?’
‘सोचना क्या है मैं ने तुम्हें पहले ही बता दिया है कि मुनमुन की इस तरह विदाई के ख़िलाफ हूं मैं। इस में मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता।’ दीपक ने कहा, ‘हां, तुम जब चाहो दोनों पक्षों को आमने सामने बैठ कर बातचीत से पहले कोई हल निकालने की कोशिश की जाए फिर विदाई की बात आए तो मेरे हिसाब से ठीक रहेगा।’
‘भइया मैं आप से फिर कह रहा हूं कि विदाई ही एकमात्र हल है। नहीं मुनमुन कुछ अनर्थ करवा कर ही छोड़ेगी।’
‘तो करो विदाई मैं क्या कर सकता हूं?’
‘आप विदाई के समय आ सकते हैं।’
‘मैं तुम्हें कैसे और कितनी बार बताऊं रमेश कि ऐसे और इस तरह से विदाई से मैं सहमत नहीं और न ही आ सकता हूं।’
‘चलिए भइया मैं फिर फ़ोन करूंगा। आप फिर इस पर सोचिएगा। प्रणाम।’
रमेश के फ़ोन के बाद उस ने मुनमुन का फ़ोन मिलाया। लेकिन उस का फ़ोन पहले ही की तरह स्विच आफ़ मिला। वह जब-जब मिलाता हर बार स्विच आफ़ मिलता। अंततः एक दिन उस ने मुनमुन को एस.एम.एस. किया कि, ‘ज़रूरी बात करनी है और तुम्हारा फ़ोन हरदम स्विच आफ़ मिलता है। मुझे फ़ोन करो।’
दूसरे दिन ही मुनमुन की मिस काल मिली। दीपक ने तुरंत उसे फ़ोन मिलाया। उधर से मुनमुन ने फ़ोन रिसीव भी कर लिया। दीपक ने उस से पूछा, ‘तुम्हारा फ़ोन जब मिलाओ स्विच आफ़ रहता है। आखि़र बात क्या है?’
‘क्या बताएं भइया वह दुष्ट फ़ोन कर-कर के गालियां बकता रहता है। अनाप-शनाप बकता रहता है। इस लिए स्विच-आफ़ रखना पड़ता है।’
‘ऐसे तो सब से कट जाओगी।’ बताओ कोई तुम्हें मेसेज देना चाहे तो कैसे देगा। औरों की छोड़ो मैं ही परेशान हो गया।’
‘तो करूं क्या?’
‘सीधी बात नंबर बदल लो। और परिचितों को जिन को ज़रूरी समझो नंबर बता दो। जिन को न बताना हो मत बताओ।’
‘और यह परिचित ही नया नंबर फिर से उस राक्षस को दे देंगे। भइया कोई फ़ायदा नहीं।’
‘तो यह स्विच आफ़ तो कोई रास्ता नहीं है।’ रमेश बोला, ‘ख़ैर, छोड़ो यह बताओ कि रमेश से तुम्हारी कोई बात हुई है?’
‘हां, हुई तो थी, उधर दो बार।’
‘क्या कह रहा था?’
‘अब क्या बताऊं?’ कह कर मुनमुन रोने लगी। बोली, ‘ज़बरदस्ती मेरी विदाई करना चाहते हैं। मैं ने मना किया तो मुझे रंडी, कुत्ती बनाने लगे। कहने लगे झोंटा खींच कर, घसीट कर घर से बाहर कर दूंगा। कैसे नहीं जाओगी अपनी ससुराल।’
‘अरे?’ दीपक ने हैरत में आते हुए पूछा, ‘फिर?’
‘बताइए बहन से कोई इस तरह भला बात करता है?’ मुनमुन बोली, ‘मैं ने तो फिर भी मना कर दिया और कह दिया कि जो भी करना हो कर लीजिए। चाहिए तो मेरा गला दबा कर यहीं मार डालिए। पर ऐसे तो मैं उस राक्षस के यहां नहीं जाऊंगी। हां, भइया अगर आप की रमेश भइया से फिर कभी बात हो तो उन्हें बता दीजिएगा कि झोंटा पकड़ कर ज़बरदस्ती मेरी विदाई की कोशिश नहीं करें। वह जज हैं घरेलू हिंसा का क़ानून वह जानते ही होंगे। मैं उन पर आज़मा भी सकती हूं यह क़ानून। फिर उन की सारी जजी धरी की धरी रह जाएगी। मैं भी थोड़ा बहुत क़ानून जानती हूं।’
‘ऐसा करने की ज़रूरत नहीं है। तुम भी थोड़ा पेशेंस रखो।’ वह बोला, ‘अच्छा ज़रा मामी से बात करवाओ!’
‘करवाती हूं ज़रा रुकिए!’ कह कर उस ने कहा, ‘अम्मा दीपक भइया का फ़ोन है।’
‘अच्छा-अच्छा!’ कह कर मामी बोलीं, ‘हां, दीपक भइया!’
‘मामी जी प्रणाम।’ दीपक ने पूछा, ‘और क्या हालचाल है?’
‘हालचाल तो भइया तुम को मालूम ही है सब आगे क्या बताऊं? बस बुढ़ापा है।’
‘वो तो है। पर यह बताइए रमेश से बात हुई आप की?’
‘हां, हुई तो है। मुनमुन की विदाई ज़बरदस्ती करने को कह रहा है। भइया उस को समझाओ जज है, जज ही रहे, जानवर न बने।’ वह बोलीं, ‘बताओ वह इतना बौखला गया है कि बहन के घाव पर मरहम लगाने के बजाय गालियां दे रहा है। तमाम ऊल जलूल बक रहा है। उस का घाव और गहरा कर रहा है। यह ठीक नहीं है।’
‘अच्छा मामी प्रणाम!’ कह कर दीपक ने फ़ोन काट दिया। अब वह चिंता में पड़ गया कि क्या करे?
अंततः उस ने सोचा कि अब वह मुनमुन की ससुराल वालों से ख़ुद बात करेगा। इस बारे में दीपक ने पत्नी से भी राय मशविरा किया। पत्नी बोली, ‘यह सब तो ठीक है पर बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बहुत ठीक नहीं है।’
‘मतलब?’
‘मुनमुन के भाई लोग ख़ुद इतने सक्षम हैं और वह लोग कुछ नहीं कर रहे हैं और आप हैं कि अब की जब से बांसगांव से लौटे हैं पगला गए हैं। जब देखो तब मुनमुन-मुनमुन! मुनमुन न हो आप का ओढ़ना बिछौना हो! कहिए तो किसी चैनल वालों से कहूं कि सब एक ख़बर चला दें कि आग लगी है बांसगांव में, फ़ायर ब्रिगेड की गाड़ियां दौड़ रही हैं दिल्ली में।’
‘क्या बेवक़ूफी की बात करती हो वह मेरी भी बहन है।’ दीपक तमतमा गया, ‘मेरी भी ज़िम्मेदारी है।’
पत्नी चुप हो गई। दीपक ने फिर राहुल को एक मेल लिखा। और सारा हाल बताते हुए पूछा कि, ‘क्या मुनमुन की ससुराल से सीधे मेरा बात करना ठीक रहेगा?’
राहुल का जवाब उसी दिन आ गया। उस ने रमेश की गाली गलौज वाली भाषा पर हैरत जताते हुए अफ़सोस किया। और लिखा कि उन को इस तरह मुनमुन से पेश नहीं आना चाहिए। लेकिन अब वह बड़े हैं सो कुछ कहते भी नहीं बनता। अम्मा बाबू जी का हाल सुन कर वह दुखी हुआ। लेकिन मुनमुन का फ़ोन हरदम स्विच आफ़ रहने के कारण वह बांसगांव बात नहीं कर पा रहा। रही बात मुनमुन के ससुराल से बात करने की तो इस से अच्छी बात क्या होगी? उस ने लिखा था कि, आप के पास कोई पूर्वाग्रह नहीं है, कोई गांठ या कोई इगो नहीं है आप के पास। आप बात करिए दोनों पक्ष से। मेरा मतलब है मुनमुन से भी और मुनमुन की ससुराल वालों से भी। क्या पता कोई बात बन जाए, कोई रास्ता निकल जाए। दीपक दो एक दिन तक लगातार राहुल की चिट्ठी पर सोचता रहा। सोचता रहा कि वह करे तो क्या करे? अंततः उस ने मुनमुन की ससुराल फ़ोन किया। मुनमुन के ससुर घनश्याम राय फ़ोन पर मिले। वह बड़े ख़ुश हुए कि, ‘इतने लंबे गैप के बाद कोई तो बातचीत के लिए आगे आया।’ वह बोले, ‘नहीं मैं ही दो बार गया और बेइज़्ज़त हो कर लौट आया।’
‘ऐसा तो नहीं है।’ दीपक बोला, ‘रमेश ने इस बीच आप से विदाई के बाबत बात की है।’
‘हां-हां। फ़ोन आया तो था जज साहब का। लेकिन फिर वह भी भभक कर बुता गए।’
‘मतलब?’
‘मतलब यह कि विदाई हुई नहीं और वह कहते रहे कि यह कर दूंगा, वह कर दूंगा।’
‘देखिए बात अचानक विदाई की करना ठीक भी नहीं है।’ दीपक बोला, ‘पहले जो राह के रोड़े हैं उन्हें साफ़ कर लिया जाए फिर बात आगे बढ़ाई जाए।’
‘समझा नहीं मैं।’ घनश्याम राय थोड़ा बिदक कर बोले।
‘मतलब यह कि जिन कारणों से विदाई रुकी पड़ी है या मुनमुन को आप के यहां से लौटना पड़ा है, पहले उन समस्याओं का वाजिब हल ढूंढ लिया जाए। समाधान हो जाए तो फिर विदाई में कोई समस्या ही नहीं है।’
‘देखिए दीपक जी मेरा मानना है कि विदाई हो जाएगी तो बाक़ी समस्याएं स्वतः हल हो जाएंगी।’
‘नहीं मुझे लगता है पहले कोर इशू जो है, जो रूट काज़ है पहले उसे सुलझाया जाए।’
‘क्या है रूट काज़? क्या है कोर इशू?’ बिदकते हुए घनश्याम राय बोले, ‘आप तो पाकिस्तानी मुशर्रफ की तरह बोल रहे हैं कि जैसे वह आतंकवाद पर ब्रेक लगाने के बजाय कश्मीर-कश्मीर चिल्लाता था और कोर इशू, रूट काज़ कश्मीर बताता था। आप वैसे ही बोल रहे हैं। बताइए आप का कश्मीर, आप का रूट काज़, कोर इशू क्या है?’
‘देखिए हमारा नहीं आप का ही है कश्मीर, आप का ही है रूट काज़ और कोर इशू।’
‘मतलब?’
‘आप का बेटा राधेश्याम है कश्मीर। राधेश्याम की पियक्कड़ई है रूट काज़ और उस की बदतमीज़ी है कोर इशू। इस को निपटा लीजिए। सारी समस्याओं का समाधान हुआ समझिए!’
‘कोशिश तो हम कर रहे हैं दीपक बाबू।’ घनश्याम राय बोले, ‘पर अकेले हमारे बेटे का ही क़सूर नहीं है।’
‘समझा नहीं।’
‘समझना यह है कि पहले मेरा बेटा पियक्कड़ नहीं था। शादी के बाद बल्कि गौने के बाद जब बहू चली गई तो लोग ताना देने लगे। किसिम-किसिम का ताना। हम से ही लोग कहते हैं कि का घनश्याम बाबू आप की पतोहू भाग गई क्या? तो मैं तो सिर झुका कर सुन लेता हूं। वह नहीं सुन पाता। फ्रस्ट्रेट हो जाता है। फ्रस्ट्रेशन में पीने लगता है। बवाल करने लगता है। घर में भी। बाहर भी। तो इसी लिए बार-बार मैं कहता हूं कि विदाई हो जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा।’
‘चलिए कुछ सोच विचार करता हूं। फिर आप को फ़ोन करता हूं।’
‘ठीक है दीपक बाबू मैं इंतज़ार करता हूं आप के फ़ोन का।’ घनश्याम राय बोले, ‘अरे दीपक बाबू एक बात और कह दूं कि हमारे घर में रहने के लिए मुनमुन को अपनी नौकरी छोड़नी पडे़गी। और इस में कोई तर्क-वितर्क नहीं। कोई इफ़-बट नहीं। क्यों कि मेरा मानना है कि उस की यह शिक्षा मित्र की टुंटपुंजिया नौकरी ही सारी समस्याओं की जड़ है। इसी ने उस का दिमाग़ ख़राब कर रखा है। नहीं हमारे घर रही होती तो अब तक बाल बच्चे हो गए होते। उसी में उलझी रहती। बग़ावत नहीं करती इस तरह। तो कोर इशू यह भी है।’
‘चलिए देखते हैं।’
‘देखते नहीं यह फ़ाइनल है।’
‘बिलकुल।’ कह कर दीपक ने फ़ोन काट दिया। फिर बांसगांव फ़ोन मिलाया। जो हमेशा की तरह स्विच आफ़ मिला। अंततः उस ने एक एस.एम.एस. कर दिया मुनमुन को कि बात करे। दूसरे दिन मुनमुन का मिस काल आया। सुबह-सुबह। दीपक मार्निंग वाक की तैयारी में था तब। लेकिन उस ने मुनमुन का मोबाइल तुरंत मिलाया। यह सोच कर कि फिर जाने कब तक बंद रहे। फिर मुनमुन को घनश्याम से हुई सारी बात बताई और पूछा कि, ‘तुम्हारी क्या राय है? आमने सामने एक बार बात हो जाए?’
‘आप भी भइया क्यों पानी पीट रहे हैं?’ मुनमुन बोली, ‘मुझे नहीं लगता कि वह सुधरेगा और कोई रास्ता निकलेगा।’
‘क्यों? ऐसा क्यों लगता है?’ दीपक ने पूछा।
‘अभी कल ही वह आया था। गाली गलौज कर के दरवाज़ा पीट कर गया है। और आप हैं कि सुधार की उम्मीद कर रहे हैं!’
‘देखो मुनमुन उम्मीद पर दुनिया क़ायम है। तो यहां भी हम नाउम्मीद नहीं हैं।’ दीपक बोला, ‘इतना सब के बावजूद भारत-पाकिस्तान से बात कर सकता है तो हम लोग भी उन लोगों से बात क्यों नहीं कर सकते?’
‘बिलकुल कर सकते हैं आप कह रहे हैं तो।’ मुनमुन बोली, ‘पर भइया यह जान लीजिए कि बातचीत के बाद जो नतीजा पाकिस्तान-भारत को देता है वही नतीजा यहां भी वह सब देंगे।’
‘ठीक है चलो देखते हैं एक बार बात कर के भी।’
‘हां पर यह बातचीत किसी तीसरी जगह रखिएगा। न मेरे घर बांसगांव में न उस के घर।’ मुनमुन बोली, ‘और हां, यह भी कि वह पी कर नहीं आए।’
‘ठीक बात है।’ दीपक बोला, ‘अच्छा एक बात और। वह लोग चाहते हैं कि तुम यह शिक्षा मित्र की नौकरी छोड़ दो।’
‘यह नौकरी तो भइया हरगिज़ नहीं छोडूंगी।’ मुनमुन बोली, ‘यही तो एक आसरा है मेरे पास जीवन जीने का। यही तो एक हथियार है मेरे पास अपनी जंग लड़ने का। और इसी को छोड़ दूं?’
‘तो इस टुंटपुंजिया नौकरी के लिए पति और घर बार छोड़ दोगी?’
‘टुंटपुंजिया ही सही है तो मेरी नौकरी!’ मुनमुन बोली, ‘ऐसे अभागे पति के लिए मैं अपनी यह नौकरी नहीं छोडूंगी। पति छोड़ दूंगी पर नौकरी नहीं। हरगिज़ नहीं।’ मुनमुन पूरी सख़्ती से बोली, ‘आप लोग चाहते हैं कि मैं जियूं और अपने पंख काट लूं। ताकि अपने खाने के लिए उड़ कर दाना भी नहीं ला सकूं। माफ़ कीजिए भइया ऐसा मैं नहीं कर पाऊंगी। जान दे दूंगी पर नौकरी नहीं छोड़ूंगी। यही तो मेरा स्वाभिमान है।’
‘ठीक बात है।’ दीपक बोला, ‘ पर मुनमुन एक बात बताऊं कि थोड़ा झुक जाने में कोई नुक़सान नहीं है।’
‘किस के आगे?’
‘अपने पति और ससुराल के आगे।’
‘आप भी भइया!’
‘देखो मुनमुन जो औरत अपने पति के आगे नहीं झुकती उसे अंततः सारी दुनिया के आगे झुकना पड़ता है। और बार-बार झुकना पड़ता है।’
‘क्या भइया!’ वह बोली, ‘चाहे जो हो मैं नहीं झुकने वाली किसी के भी आगे।’
‘चलो ठीक है पर सोचना ज़रूर मेरी बात पर एक बार।’ कह कर दीपक ने फ़ोन काट दिया। मुनमुन की बात पर चिंता में पड़ गया। यह एक नया बदलाव था। दूसरे दिन धीरज को फ़ोन मिलाया। इत्तफ़ाक़ से धीरज ने फ़ोन उठा लिया। दीपक ने अब तक रमेश, राहुल, मुनमुन, घनश्याम राय से हुई बातचीत के डिटेल्स देते हुए उसे बताया कि, ‘एक फ़ाइनल बातचीत आमने सामने की होनी है। और मैं चाहता हूं कि इस मौक़े पर तुम भी रहो तो अच्छा रहेगा।’
‘ठीक है भइया मैं रह जाऊंगा पर बातचीत का ज़िम्मा आप ही संभालिएगा।’
‘ठीक है। बस तुम आ जाओ।’ कह कर दीपक ने धीरज का फ़ोन काट कर घनश्याम राय का फ़ोन मिलाया। और कहा कि, ‘भई देखिए अगले महीने के सेकेंड संडे को हम लोग बातचीत के लिए मिलेंगे। बातचीत में मुनमुन और उस के अम्मा पिता जी, धीरज और मैं रहूंगा। और आप अपनी तरफ़ से राधेश्याम और उन की मम्मी को ले कर आइएगा। यह बातचीत न आप के यहां होगी न बांसगांव में। बल्कि कौड़ीराम के डाक बंगले में होगी। और हां, राधेश्याम को समझा लीजिएगा कि पी कर नहीं आएंगे।’
‘ठीक है दीपक जी। ऐसा ही होगा। पर अब की बात फ़ाइनल हो जानी चाहिए। और जो कहिए तो एक वकील भी लेते आऊं। फिर जो भी फ़ैसला हो वह स्टैम्प पेपर पर दर्ज कर दिया जाए। ताकि रोज़-रोज़ की चिक-चिक ख़त्म हो जाए।’ घनश्याम राय बोले।
‘यह बताइए पारिवारिक बातचीत में वकील या स्टैम्प पेपर की बात कहां से आ गई भला?’ दीपक बिदक कर बोला।
‘अब बात पारिवारिक कहां रही?’ घनश्याम राय बोले, ‘बात पारिवारिक होती तो अब तक विदाई हो गई होती। पारिवारिक बात होती तो आप को बीच में नहीं आना पड़ता।’
‘घनश्याम जी आप भूल रहे हैं कि मैं परिवार का ही हूं। परिवार से ज़रा भी अलग नहीं हूं। ननिहाल है मेरा। मेरी देह में दूध और ख़ून वहीं का है।’
‘ननिहाल है आप का दीपक बाबू! रिश्तेदारी हुई। घर नहीं। वहां की विरासत आप नहीं मुनक्का राय के लड़के संभालेंगे।’ घनश्याम राय तल्ख़ हो कर बोले, ‘क्या मुनक्का राय के लड़कों ने चूड़ियां पहन रखी हैं जो अब आप को बात करनी पड़ रही है?’
‘घनश्याम जी आप की बात में मामला सुलझाने की नहीं उलझाने की गंध आ रही है। क्षमा करें ऐसे तो मैं बात नहीं कर पाऊंगा। न ही आ पाऊंगा।’
विदेशी धरती पर पहली बार कदम रखना मेरे लिए किसी रोमांच से कम न था। और वह भी सृजन सम्मान एवं वैभव प्रकाशन [छत्तीसगढ़] द्वारा चतुर्थ अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में भाग लेना....कदम जमीं पर नहीं थे मेरे। मैं अपनी प्रिय सखी संतोष श्रीवास्तव और ३५ साहित्यकारों की टोली के साथ १६ दिसंबर को कोलकाता से थाईलैंड के लिए रवाना हो गई।
लगभग ढाई घंटे की यात्रा में खिड़की वाली सीट पर बैठी मैं बादलों, पहाड़ों और विशाल समंदर को नापते हुए प्रकृति की भिन्नता को देखना चाहती थी। बादल पहाड़ व जंगल तो एक से लगे किन्तु नीला हरहराता समंदर अपनी अलग छटा बिखेर रहा था। ऐसा लग रहा था मानो किसी सधे हुए कलाकार ने अपनी जादुई तूलिका से इसमें नीला रंग भर दिया हो। जगह-जगह बादल के सफेद झुंड रुई के फाहों की तरह प्रतीत हो रहे थे। और हम उनके ऊपर उड़ रहे थे। तभी विमान में एनाउंसमेंट हुआ कि थोड़ी ही देर में आप थाईलैंड की धरती में उतरने वाले हैं कृपया अपनी-अपनी सीट बेल्ट बांध लें। मैं उतावली हो खिड़की से नीचे झांकने लगी। अभी दो महीने पहले ही वहां भयंकर बाढ़ आयी थी जिसने थाईलैंड में तबाही मचा दी थी। कई गांव अब भी पानी में डूबे हुए दिखाई दे रहे थे.....खेतों में फसलें पानी में डूबी हुई थीं...अभी तक शहरों से पानी पूरी तरह निकला नहीं था। हमें लगा हम यहां आए ही क्यों.... लेकिन ताज्जुब हुआ यह देखकर कि बैंकाक में पानी का नामोनिशान तक नहीं था। बैंकाक पहुंचते ही हमारा गाइड योगी जो बैंकाक का ही निवासी था लाल झंडा हाथ में नचाते हुए हमें अपने पीछे-पीछे चलने का आदेश देने लगा...हालांकि हम पूरी यात्रा में गाय-बकरी की तरह उसके पीछे-पीछे झुंड बनाकर चलते रहे ताकि कहीं गुम न हो जाएं। नमस्ते,चालो-चालो, जल्दी-जल्दी,काना-काना [खाना-खाना] ये शब्द उसके रटे रटाए तकिया कलाम बन चुके थे, जिन्हें वह अपनी सुविधानुसार प्रयोग करता।बैंकाक से हम पटाया की ओर एक लक्ज़री बस से रवाना हो गए। सभी लोग एक दूसरे का परिचय पाते ही घुल-मिल गए। रास्ते भर कविता,गीत,गज़लों का दौर चलता रहा। पटाया की धरती पर उतरते ही सबसे पहले मैंने धरती को देखा..हमारी धरती की तरह ही...आम अमरुद और केले के पेड़ उन पर लगी पत्तियों में भिन्नता ढूंढने की कोशिश करती रही..कहीं से भी तो भिन्नता नहीं हां यह बात दीगर है कि उनके फलों का आकार ज्यादा बड़ा जरुर था। इतना तो होना ही था । जब एक देश के शहरों में भी भिन्नता देखने को मिलती है फिर यह अलग देश जो ठहरा। पटाया के खूबसूरत होटल 'मंत्रपुरा' रिसार्ट में तीन दिनों के लिए ठहरना निश्चित हुआ। मुझे अब अपने घर की चिन्ता सता रही थी। घरवाले मेरे लिए चिन्तित हो रहे होंगे क्योंकि हम सभी के मोबाइल जो बन्द हो गए थे। बड़ी मुश्किल थी। जिस दुकान में जाओ वे न तो हिन्दी जानते थे और न ही इंग्लिश जानते थे। सिम कार्ड का काम विक्की मल्होत्रा जो टूर आर्गेनाइज़र थे, केवल वे ही कर सकते थे। लेकिन वे व्यस्त थे क्योंकि उन्हें हम सबको अलग-अलग कमरे में ठहराने की व्यवस्था जो करनी थी। मेरी अकुलाहटता को देखते हुए उन्होंने अपना एक नया सिम कार्ड मुझे दे दिया। हम सभी ने फिर उससे अपने-अपने घरों में अपनी-अपनी कुशलक्षेम पहुंचा दी। रूम एलाटमेंट के बाद हम सभी अपने-अपने कमरे में चले गए। जयप्रकाश मानस जी [संपादक-पांडुलिपी] जो हमारे ग्रुप लीडर थे से पहले ही कह दिया कि मुझे और संतोष को साथ ही ठहराएं। मानस जी हम जैसे उद्दंडों को बहुत ही सौम्यता से झेल रहे थे। इतने बड़े ग्रुप को संभालना शायद मानस जी जैसे सहज और सरल व्यक्तित्व वाले ही कर सकते हैं। वैसे भी सभी छ्त्तीसगढ़ियों ने अपने सरल स्वभावानुसार सबका दिल जीत लिया था। सुधीर सक्सेना [संपादक- नई दुनिया] जी हर वक्त ऊ-ला-ला इस अंदाज़ में कहते कि विद्या बालन का सेक्सी डांस याद आ जाता..उसी दौरान 'डर्टी पिक्चर भी रिलीज़ हुई थी और उस वक्त वह गाना अपने चरम पर था। हैदरी जी, सुधीर शर्मा,संदीप तिवारी,अखिलेश ये सभी बेहद हंसमुख बंदे, जो हर वक्त अपनी खट्टी-मिठ्ठी बातों से माहौल को खुशनुमा बनाए रखते। गीताश्री से देर से मेल जोल बड़े लेकिन जब बड़े तो मेलजोल बड़े खास हो गए। दिन भर घूमते और रात में सभी महिलाएं हमारे कमरे में एकत्र हो जातीं। कविता,गीत और डांस का दौर चालू हो जाता। गीताश्री का खूबसूरत डांस देखकर हम सभी दंग रह गए...अलका सैनी जो अब तक चुप्पी साधे थीं....खुलती चली गईं और अचानक उन्होंने रैप डांस कर सबको हैरत में डाल दिया। संतोष ने भी कत्थक के अंदाज़ में सुन्दर डांस किए। १७ दिसंबर की सुबह हमें 'थोरो आइलैंड' जाना था। हमें कहा गया कि चप्पल पहन कर जाना होगा क्योंकि भीग जाने का डर था। समंदर तो हमारे मुम्बई में भी है वहां हम तो ऐसे ही निकल लेते हैं...सोचकर जूते पहन लिए। समंदर के किनारे पहुंचते ही लोगबाग हाफ पैंट, स्लीपर्स और हैट्स में दिखलाई दिए। मैंने भी झट से अपने जूते उतारकर बस में रख दिए और पैदल ही चलने लगी। स्लीपर्स बेचनेवाला स्लीपर्स खरीदने के लिए बाध्य करने लगा । मैं अबतक अपने डालर थाई बाथ में कन्वर्ट नहीं कर सकी थी। जिसके पास थाई बाथ थे वे आपस में भारतीय रुपया देकर अदला-बदली कर रहे थे। सुधीर शर्मा मेरी असमंजसता को भां चुके थे...उन्होंने मुस्कुराते हुए तुरंत अपने पास से १०० बाथ दिये और कहा 'मैडम, ले लीजिए...बाद में दे दीजिएगा'। अब तक तो हम उनसे काफी घुल मिल गए थे,बिना संकोच किए मैंने भी वे रुपए उनसे ले लिए और चप्पल खरीद ली।अब हम कोरल आईलैंड जाने के लिए एक छोटे से जहाज की ओर बढ़े । जहाज पर चढ़ते ही एक फोटोग्राफर ने उसकी तरफ देखते ही बिना हमसे पूछे ही फोटो खींच ली। हमें लगा यूं ही खींची होगी लेकिन वापसी पर उसने एक एक सुन्दर से फ़्रेम जिसमें खूबसूरत अक्षरों में थाईलैंड लिखा था हमारे हाथ में थमा दी और १०० बाथ मांगने लगा। वाह! क्या बात है यह भी एक तरह का १०० पर्सेंट का बिज़नेस है..चाहे कुछ भी हो अपनी फोटो तो लेनी ही थी। हम हमेशा की तरह जगह घेरने के चक्कर में जहाज में सबसे आगे ओपन डेक पर जाकर बैठ गए। धीमी गति से चलते हुए जहाज ने अचानक तेज रफ्तार पकड़ ली.. तेज हवाओं और समुंद्र की उफनती लहरों ने अपना असर दिखाना शुरु कर दिया। हम लोग बुरी तरह से हिचकोले खाते हुए समंदर की उठती लहरों से भीग-भीग जा रहे थे..आगे बैठने पर अफसोस होने लगा....अब तक आगे बैठने की खुशी में हम चिंहुक-चिंहुक कर उटपटांग आवाज़े कर रहे थे...अब चिंहुकने की बारी जहाज के अंदर बैठे लोगों की थी,जिन्हें हमने जबरदस्ती अंदर जाने के लिए बाध्य कर दिया था। समुन्द्र के बीचों बीच खड़े एक दूसरे जहाज में हमें उतरना था,जहां से कोरल आईलैंड के लिए दूसरे जहाज से रास्ता तय करना था। दूसरे जहाज में उतरते ही मालूम हुआ कि कोरल आईलैंड में मौसम खराब होने की वजह से वहां जाने का प्रोग्राम स्थगित कर दिया गया। अब हम साक आईलैंड के लिए रवाना हो गए जो पोला सेलिंग के लिए मशहूर है। यह एक खूबसूरत समुन्द्री तटीय इलाका है,जहां सफेद रेत के बीच घने दरख्तों की ठंडी छांव के तले कई विदेशी जोड़े अर्धनग्न अवस्था में लेटे हुए आराम फरमा रहे थे। कुछ लोग वाटर सर्फ़िंग के लिए वाटर राइड्स करने लगे तो कुछ नीले समंदर के पानी में अठखेलियां करने लगे। मुझे पानी से बहुत डर लगता है सो मैं चुपचाप सीमा जी,डा.सुखदेव और उनकी मिसेज़,लतिका जी, युक्ता जी आदि के साथ समंदर के किनारे बैठ गयी और समुन्दर की जिद्दी लहरों को निहारने लगी जो वाटर स्कूटर को पानी में कई-कई फुट ऊंचे आसमान में उछालने की कोशिश कर रही थीं। सुधीर सक्सेना,सुधीर शर्मा,संदीप तिवारी एवं मानस जी सभी ने वाटर राइडस कर अपनी हसरतें पूरी कर ली थीं। मैं भी किनारे खड़े वाटर स्कूटर पर तस्वीरें खिंचवाने लगी ताकि लौट्कर कह सकें कि हमने भी वाटर राइडिंग की थी क्योंकि बच्चों ने कहा था फलां-फलां जगह जाना, ये करना,वो करना तभी जाओ ममा वरना क्या फायदा। हम तो यहां एक साहित्यिक समारोह में भाग लेने आए थे। लेकिन बिना घूमे फिरे या यहां की जानकारी लिए बिना लौटना निरी बेवकूफी कहलाएगी।सो एक पंथ दो काज हो रहे थे। पूरे रास्ते भर हंसी मजाक का सिलसिला यूं हीं चलता रहा और जरा भी बोरियत महसूस नहीं हुई। सब एक दूसरे की चुटकी लेते रहते। सबसे मजेदार बात तो यह थी कोई बुरा नहीं मानता था। लंच के दौरान विकी ने कहा कि यहां का टिफनी शो बहुत खूबसूरत और मशहूर है उसे जरुर देखें। प्रवेश टिकिट ७०० बाथ हमने योगी को थमा दिया। उसने हम सभी को एक जगह ठीक साढ़े छ: बजे मिलने की हिदायत दी। इसके बाद कोई शापिंग तो कोई टहलने को निकल गया। हम भी थोड़ी देर टहले फिर अपने होटल के कमरे में आ गए। थोड़ा आराम करके संतोष चाय बनाने उठी मैं बिस्तर पर औंधी पड़ी रही। संतोष बोली ' भूख लगी है चल फ्रिज़ के उपर पड़े पैकेट खा लेते हैं।' पिछली शाम को ही सीमा जी ने कहा था कि ' केवल फ्रिज़ के अंदर के सामान का ही चार्ज लगता है। ऊपर का सामान आप खा सकते हो।' इस बात को ध्यान में रखकर ही शायद संतोष का मन मचल पड़ा था, जबकि अब तक हमने कमरे की एक भी चीज़ को हाथ नहीं लगाया था। इस डर से कि कहीं लंबा-चौड़ा बिल न बना दें। चने का पैकेट मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा 'ये ले खा...ऊपर की चीज़ सब खा ही डालते हैं।' कहते हुए उसने दूसरा पैकेट भी खोल दिया और जोर से चिल्ला पड़ी'बाप रे!' मैं घबरा गई 'क्या हुआ?' वह शर्म और संकोच के साथ बोली ' यह तो गलत पैकेट खुल गया यार...इसमें तो कंडोम है।' मैं भी अचकचा कर उठ बैठी ' तूने पढ़ा क्यों नहीं ?' उसके हाथ से पैकेट ले मैं उलटने -पलटने लगी। थाई भाषा में लिखा था,जो पल्ले नहीं पड़ रही थी। बदहवासी में हमने पैकेट को डस्टबिन के भीतर तक डाल दिया ताकि बात यहीं खत्म हो जाय। रात गयी बात गयी ...डस्टबिन के डिब्बे के अंदर हमारी घबराहट भी बंद हो चुकी थी। रात भर हम उस बात को लेकर जुगाली करते रहे..हंसते रहे..नहीं मालूम था कि इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी और अपनी सच्चरित्रता की गवाही यात्रा संस्मरण लिखकर देनी पड़ेगी । शाम के ६ बज चुके थे। हम दोनों तैय्यार होकर योगी द्वारा बतायी हुई जगह पर पहुंच गए। टिफनी शो वाकई थाई कल्चर का खूबसूरत नमूना है। सुन्दर,आकर्षक, पतली देह और कोमलांगी युवतियां अलग-अलग देशों के नृत्य प्रस्तुत कर रही थीं। एक नृत्य खत्म नहीं हुआ कि दूसरा नृत्य हाज़िर...भव्य आधुनिक साज सज्जा से सुस्सजित वह एक रमणीय हाल था। जैसे ही भारतीय नृत्य डोला रे डोला प्रस्तुत किया हम सभी अचंभित रह गए उनकी परफार्मेंस देख कर... माधुरी और एश्वर्या को फेल कर दिया था इन हुस्न की मलिकाओं ने । शो खत्म होने के तुरंत बाद ये सभी खूबसूरत नवयौवनाएं बाहर के गार्डन में लाईन से दर्शकों के साथ फोटो खिंचवा रही थीं। सभी लोग सौ बाथ देकर अपनी-अपनी फोटो उनके साथ खिंचवाने में लगे हुए थे...अखिलेश तो एक लड़की से दोस्ती ही कर बैठा। वह बड़ा खुश हो गया जब कई लड़कियां उसकी ओर आकर्षित होने लगीं...बहुत जल्दी मुंगेरी लाल के सपने टूट गए जब मालूम हुआ ये सभी नवयौवनाएं स्त्री नहीं बल्कि हिजड़े हैं...सभी दंग रह गए इस जानकारी के साथ ही...लोग उन्हें छू-छू कर देखने लगे क्या वाकई ये हिजड़े हैं या युवतियां ? दाद देनी पड़ेगी इस देश की जिसने प्रकृति की मार खाए हुए लोगों को सम्मानजनक जीने का अधिकार दिया है। वे अपनी मेहनत की कमाई खा रहे हैं। कम से कम भीख तो नहीं मांग रहे हैं। रात डिनर के बाद सभी लोगों ने वाकिंग स्ट्रीट जाने का मन बनाया। हमारा भी मन था कि हम उस शहर को देखें जिसके बारे में इतनी कानाफूसी होती है। हम कुछ महिलाएं रात को वाकिंग स्ट्रीट जाने के लिए तैयार थीं। कुछ महिलाएं वहां जाने से डर भी रही थीं। हमने कहा ' डर की क्या बात है आप भला तो जग भला।' हालांकि यहां का सेक्स बाज़ार थाईलैंड सरकार द्वारा बहुत ही सुनियोजित तरीके से चलाया जाता है। पुलिस की कई-कई गाड़ियां इस क्षेत्र की चौकसी के लिए रात-दिन बड़ी ही मुस्तैदी से लगी रहती हैं। कुछ लोगों ने वहां जाने से परहेज किया और कुछ चल दीं हमारे साथ वाकिंग स्ट्रीट की ओर...रात का होना वहां की सुबह का होना माना जाता है....जब एक देश अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की होड़ कर रहा होता है। चूंकि वहां की अर्थ व्यवस्था महिलाओं पर ही निर्भर है। रात हो या दिन, दुकान हो या बाज़ार हर जगह औरतें ही औरतें वह भी खूबसूरत.....हमें भी काफी उत्सुकता थी आखिर है क्या इस बाज़ार में जिसके बारे में चटखारे ले-लेकर बातें हुआ करती हैं। वैसे भी पत्रकारों और लेखकों को वहां जाने से गुरेज नहीं करना चाहिए। आखिर लिखेंगे भी तो क्या ? रोड के दोनों ओर दुकानें सलीके से सजी हुई थीं। हल्की झिलमिल रोशनी की लपलपाहट में सुन्दर युवतियां अर्धनग्न अवस्था में हिलती डुलती नज़र आ रही थीं। दोनोंओर से युवतियों की मदहोश आवाज़ें रोड पर चल रहे ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित कर रही थीं। हर एक टेबल के चारों ओर पुरुष बैठे जाम पी रहे थे और हर टेबल के मध्य में एक राड के सहारे युवतियां उत्तेजक मुद्रा में अंगड़ाईयां लेते हुए डांस कर रही थीं। उनका बेपरवाह हुस्न बेपर्दा होने को लालायित था। आपको आश्चर्य होगा यह जानकर कि उनके हाव-भाव में कहीं भी कामुकता नज़र नहीं आ रही थी...और तो और उनके ग्राहक भी सलीके से बैठे अपनी यौनिक सज्जनता का परिचय दे रहे थे। कहने का तात्पर्य है कि यह एक तरीके से बाज़ार है, जिसे विद्रूपता,बेहयाई और बेशर्मी जैसे नाम देना उचित न होगा। इन युवतियों के प्रति मन सहानुभूति से भर उठा...ये युवतियां केवल गुड़िया बनकर रह गईं हैं जो इस सेक्स बाज़ार को जीवित रखने के लिए जीवित हैं। कहा जाता है युद्ध के दौरान अमेरिका व अन्य देशों के फौजी इस छोटे से द्वीप में विश्राम के लिए ठहरते थे। यहां की भोली-भाली जनता को डरा धमका कर यहां की युवतियों को इन्होंने अपनी हवस का शिकार बनाया। तब से यहां के लोगों ने ठान लिया कि विदेशियों ने हमारी महिलाओं को बर्बाद किया है,हम इन्हें बरबाद कर देंगे। आज यहां कई विदेशी पर्यटक इन खूबसूरत महिलाओं के चक्कर में आते हैं और अपना खूब धन इन पर लुटा कर जाते हैं। दुनिया भर का रुपया यहां जमा हो रहा है...यहां के रहन सहन और भव्यता को देख कर इस बात को माना जा सकता है। थाईलैंड की आर्थिक व्यवस्था जिस्म फरोशी के उपर ही निर्भर है। और इसे यहां पूर्ण रूप से मान्यता प्राप्त है। अभी हम टहल ही रहे थे कि एक सत्रह-अठारह साल का युवक हमारे पास आया और एक लिस्ट थमा दी,जिसमें मालिश से लेकर पालिश तक के रेट्स तय थे। हम भौचक्क रह गए यह जानकर कि यहां केवल पुरुषों के लिए ही नहीं अपितु महिलाओं के लिए भी सेक्स बाज़ार सजे हुए हैं.....अब तक यौन स्वछन्दता और यौन व्यभिचार को लेकर पुरुषों के माथे ही ठीकरे फोड़े जाते रहे हैं....किन्तु यहां १२ से लेकर २५ वर्षीय युवकों द्वारा मालिश से लेकर बिस्तर तक जाने के रेट्स तय थे..गले में लाल स्कार्फ काली पैंट खुला शेव किया हुआ बदन अपनी महिला ग्राहकों को आमंत्रित करने के लिए उद्धत था। रोड पर वे सभी चीजें बिक रही थीं जो शारीरिक प्रक्रिया के लिए उपयोग में लाई जाती हैं। सच पूछो तो यह सब देखकर उस देश और उस देश की भावी पीढ़ी के लिए दया के भाव उभर आए। क्या कभी किसी ने इन युवाओं की भावनाओं को समझने की कोशिश की होगी। इस तरह की जिंदगी जीने को मजबूर ही तो हैं ये भोले भाले लोग....वापसी पर मन खिन्न था। कहां तो दुनिया की सबसे रंगीन जगह की रंगीनियां देखने गए थे और गमगीन होकर लौट पड़े। १८ दिसंबर की सुबह हमने नोंगा नच बाटेनिकल गार्डन की सैर की। उसके बाद जेम फैक्ट्री में प्रवेश किया, जो दुनिया में हीरे जवाहरात और रत्नों के लिए प्रसिद्ध है। छोटे साइज़ से लेकर बड़े साइज़ तक के रत्नों और हीरों की कटिंग और फिनिशिंग का काम चल रहा था। एक युवक जो हिन्दी भाषा में बात कर रहा था,उसने वहां के समुन्द्र की गहराईयों से निकले किस्म-किस्म के हीरे जवाहरातों की कीमतें बताईं। कुछ लोगों ने राशि के हिसाब से नग खरीदे । हालांकि इन नगों,हीरों की कीमत बहुत ज्यादा लगी सो उन्हें आंखों में भर कर सब खरीद लिया।मुम्बई मैजिक में लंच के लिए हम सब एकत्र हो गए और शाम को यहीं के एक खूबसूरत हाल में सम्मेलन होना था। कार्यक्रम तीन सत्रों में हुआ । पहले सत्र में सम्मान समारोह हुआ और दूसरे सत्र में 'हिन्दी के वैश्विक स्तर पर चर्चा हुई तथा कई पुस्तकों का विमोचन हुआ। तीसरे सत्र में काव्य संध्या का आयोजन हुआ। सभी ने अपनी-अपनी खूबसूरत रचनाएं पेश कीं।इसके बाद चित्रकला प्रदर्शनी हुई जिसमें डा.जे.बी.नायडू की खूबसूरत कलाकृतियों ने सबको आकृष्ट किया। और इस तरह थाईलैंड में एक यादगार शाम सभी के नाम हो गई। डिनर के बाद हम सभी अपने होटल में लौट आए।आज रात पटाया में हमारी अंतिम रात थी। सुबह बैंकाक के लिए रवाना होना था। विक्की ने रात में ही कह दिया कि आप सभी अपने-अपने कमरे में जो मंगाया या यूज़ किया उसका बिल सुबह भर देना। अब मेरी और संतोष की हालत पतली हो गयी। संतोष बोली मैं तो जल्दी उठ जाती हूं ..मैं सबसे पहले जाकर अपना बिल देख लूंगी यदि कंडोम का पैसा भरना भी पड़े तो चुपचाप भर दूंगी किसी को कानों कान खबर भी न होगी। मैं निश्चिंत होकर सो गई। आज १९ दिसंबर की सुबह-सुबह संतोष अपना काम करने गई पर बिल बनाने वाला मौजूद नहीं था सो वापस लौट आई। उसके बाद हम दोनों ने जल्दी-जल्दी अपना सामान समेटा और नीचे काउंटर की ओर चल पड़े। संतोष काउंटर पर जाकर बिल चुका आई। मैंने धीरे से पूछा "क्या हुआ?" वह बोली " कुछ भी तो नहीं उसने उसका बिल नहीं लिया केवल बार के आगे २०० बाथ लिखा था वह चुका आई" मैंने एक लंबी सांस ली। तभी देखा कि डा. सुखदेव साहब काउंटर पर खड़ी लड़की के साथ उलझ रहे थे न तो लड़की की बात उनके पल्ले पड़ रही थी और न ही उनकी बात लड़की समझ रही थी। डा. साहब चिल्लाए जा रहे थे "हद हो गई मैं शराब छूता तक नहीं और तुमने बार का ४०००बाथ कैसे बिल बना दिया?" हम सब भौचक्क हो डा. साहब का मुंह देखने लगे...हुं आज आया ऊंट पहाड़ के नीचे....हमारे साथ अबतक साधु संत के मानिंद चल रहे इस व्यक्ति पर इतना बड़ा आरोप ! कोई मुस्करा रहा था तो कोई उनकी चुटकी लेते हुए पोल खुल जाने की बात करने लगा। "भई जो करना है खुल कर करॊ इस तरह छुपा कर करने से क्या फायदा?" लोग थाई लैंड आते ही इसलिए हैं कि मौज मजा कर सकें....सबकी पोल खुलने वाली है किसने कमरे में क्या-क्या किया....अबतक हम सब की हंसी के साथ अपनी बैलोस हंसी को जोड़े चले जा रहे थे....अचानक हमारे चहरे में हवाइयां उड़ने लगीं । संतोष ने मेरा हाथ दबाते हुए कहा 'हमारा जो चार्ज लगा है वह पानी का है पगली...मैंने बिल देखा है तू घबरा मत'। तब तक विक्की आ गए थे उन्होंने डा. साहब और काउंटर गर्ल की बात को सुलझाते हुए कहा कि ' ४००० बाथ आपको शराब के नहीं लगाए हैं। आपने रात १२ बजे तक अपनी पत्नी के साथ स्वीमिंग पुल के किनारे बैठकर जो कोल्ड ड्रिंक पी थी यह उसका चार्ज है' बेचारे डा. साहब की जान में जान आई। बात आगे न बड़े यह सोच कर डा. साहब ने चुपचाप रूपए चुका दिए। मैंने एक बार भी अपना बिल देखने की कोशिश नहीं की,मैं संतोष की बात पर आश्वस्त थी। अब हम बैंकाक के लिए रवाना हो गए। रास्ते भर लंबी-लंबी उसांसे भरते रहे हम दोनों..चलो जान बची लाखों पाए...। पटाया से बैंकाक का रास्ता काफी लंबा था। टाइम पास करने के वास्ते अंताक्षरी शुरु हो गई। हम सब जोर शोर से गाना गाने लगे। दो ग्रुप बन गए थे। मैं और संतोष कहां हार मानने वाले थे। खासकर गीताश्री का सानिध्य पाकर हमें और भी ताव आने लगा था। हम दोनों शुरु से ही सीधे-साधे साहित्यकारों की मंडली पर प्रेशर बनाए हुए थे या यूं कहिए कि मुम्बई जैसे शहर का प्रभाव हम पर कुछ ज्यादा ही बना हुआ था। एक के बाद एक गाने ऊंची-ऊंची आवाज़ों और तालियों के बीच गाए जाने लगे,हालांकि बस की पिछली सीट में बैठे कुछ लोगों ने आपत्ति भी उठायी पर हम कहां मानने वाले थे। तभी हमारी पिछली सीट से आवाज़ आई ' पटाया के होटल में किसने क्या-क्या किया हमें सब मालूम है। हम तो पत्रकार हैं सबकी खोज खबर रखते हैं।' अब तक हमारे गानों में जो दबंगई थी वह सब काफूर हो चुकी थी। इतनी भी हिम्मत नहीं रह गई थी कि पीछे मुड़कर देख सकें आखिर किसने ये बात कही ,जबकि दबंगई के मामले में हम भी कुछ कम न थे। अब हमारे गाने गले में अटक कर रह गए....मिमियाते-घिसियाते हुए हम अब अंताक्षरी को किसी भी तरह समाप्त कर देना चाहते थे। तभी अचानक बस रुकी। चाय पानी के लिए ड्राइवर ने बस रोक दी थी। सब उतरने लगे..हम भी बनावटी हंसी चेहरे में लादे अपनी जगह पर ही बैठे रहे। अब भूख किसे लगनी थी जो नीचे उतरते। हम दोनों एक दूसरे का चेहरा देखते रहे कोई गुंजाईश ही नहीं थी कि उस वक्त हम उस मामले में बात कर सकें। हम दोनों को रात का इंतज़ार था। बैंकाक पहुंचने तक सारा उत्साह काफूर हो चुका था। बैंकाक में उतरते ही हम एक शानदार होटल में उतरे। कमरे में आते ही मैंने संतोष से कहा 'यार बता ही देते हैं इन लोगों को कि असल में हुआ क्या था.....लोगों को खामख्वाह हमारे बारे में गलतफमियां हो जाएंगी। ' संतोष झिड़की देते हुए बोली 'चुप रह...ऐसी बात किसे कहेंगे?बिल्कुल चुप रह...किसी को कुछ नहीं मालूम।' मैंने प्रश्नात्मक लहजे में पूछा 'तो ये लोग बार-बार एक ही बात क्यॊं दोहरा रहे हैं...होटल काउंटर पर भी बस में भी...''इतने सारे लोग हैं..तू अपने सिर पर ही इल्ज़ाम क्यों ले रही है?' संतोष समझाते देते हुए बोली। मैंने कहा 'यह सही है...लेकिन थाईलैंड जगह ही ऐसी है,जहां लोग मौज मस्ती के लिए ही आते.. . और गलतफमियां कई किस्सों को जन्म दे सकती हैं। यह तो वही बात हो गई न- खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आना।' मेरी इस बात पर संतोष फ़िस्स से हंस दी। काश कि उस वक्त संतोष की बात न मानी होती, सच वहीं कह दिया होता तो सफाई देने के लिए यात्रा वृतांत का सहारा न लेना पड़ता। फिर से संतोष की बात में आकर मैंने स्वयं को दुरुस्त कर लिया। दोपहर को एक भारतीय रेस्तरां में खाना खाया । बहुत दिनों बाद आलू-गोभी और मिक्स दाल का स्वाद चखा। सभी लोग स्वादिष्ट भोजन में टूट पड़े। लंच के बाद बौद्ध मंदिरों के दर्शन किए। वहां के लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। खूबसूरत मंदिर में विशालकाय बौद्ध की प्रतिमा मंदिर की भव्यता का परिचय दे रही थी। मंदिर में शान्ति और अनुशासनप्रियता देखने लायक थी। हनुमान मंदिर,बजरंगबली मंदिर और दुर्गा माता का बड़ा मंदिर था, जहां कतार में लगे युवक और युवतियां माथे पर दुपट्टा ओढ़े लाल रंग का टीका लगाए निकल रहे थे। कितनी आश्चर्य की बात है कि हमारी धार्मिक परंपराओं से मिलती-जुलती इनकी भी परंपराएं हैं। होटल हो या माल हम जहां भी जाते हर जगह वहां के राजा रामा नाईन की तस्वीर लगी हुई है जो वहां ६५ सालों से राजा की गद्दी संभाले हैं। वहा हमें बताया गया कि भूल से भी इनके राजा की बुराई मत करना। ये लोग सीधे सादे जरुर हैं लेकिन अपने राजा की बुराई नहीं सुन सकते,आपसे लड़ पड़ेंगे। कमाल है इस युग में भी राजा के प्रति इतनी घोर इमानदारी वहीं देखने को मिल सकती है। रोड के दोनों ओर मसाज सेंटर में लोग पैरों के मसाज करवा रहे थे। बहुत ही खूबसूरत देश के खूबसूरत और इमानदार लोगॊ की खूब याद आएगी। समय कम होने की वजह से कई लोग बैंकाक के दर्शनीय और एतिहासिक स्थल देखने अपने-अपने हिसाब से चले गए। मैजिक आफ डिनर क्रुज,चायना टाउन,रेन फारेस्ट,फुकेट,क्रेबी,को सेम यू जैसे टूरिस्ट स्थल देखने लायक हैं। दिन भर घूमते फिरते हुए हम लोग शाम को होटल पहुंच गए। सुबह जल्दी उठना था सो गपशप मारते हुए हम दोनों सो गए।२० दिसंबर सुबह-सुबह सफारी वर्ल्ड और मरीन पार्क के लिए रवाना हुए। सफारी वर्ल्ड में जंगली जानवरों को प्रशिक्षित किया हुआ था। वे अपने करतब से पर्यटकों को लुभा रहे थे। शेर, चीता,हाथी विभिन्न प्रकार के प्रक्षियों से पूरा उद्यान भरा हुआ था। मंकी शो, सील शो और डालफिन शो ने तो अभिभूत कर दिया। सीटियों की अवाज़ के साथ ही लाईन से अपनी-अपनी बारी का इंतज़ार करती सील और डाल्फिन ने तो अनुशासनप्रियता की वो मिसाल पेश की कि लोगों ने दांतों तले उंगली दबा लीं। दिवाकर भट्ट जी मुझसे कहने लगे 'आप यह मूवी जरुर कवर कीजिएगा मेरे बेटे को बहुत अच्छा लगेगा' कितना अच्छा लगा यह जान कर कि इंसान कहीं भी हो अपनी जड़ों से जुड़ा ही रहता है। इतनी दूर मस्ती भरे माहौल में हम सभी अपने-अपने परिवार को याद कर रहे थे। हालांकि दिवाकर जी ने वहां से डाल्फिन की सीडी खरीद ली थी। इसके बाद स्टंट शो देखने जाना था मैं और संतोष हमेशा की तरह जगह घेरने और आगे बैठने की फिराक में जल्दी-जल्दी सबसे आगे जाकर बैठ गए। स्टंत शो शुरु हुआ। अभी हम शो देख ही रहे थे कि एकाएक पानी की बौछार से आगे की सीट वाले सभी बुरी तरह भीग गए। अब संतोष और मेरा मुंह देखने लायक था।संतोष बड़बड़ाने लगी 'पहले ही कहा सब के साथ बैठते हैं...सबसे आगे जाकर बैठ गई। देखा भीग गए न..'देर तक उसका बड़बड़ाना खतम नहीं हुआ...मुझे बड़ी कोफ्त होने लगी क्योंकि सभी लोग हमें देख कर ठ्ठाकर हंसने लगे।पूरा मूड खराब हो गया। हम धूप में कपड़े सुखाने खड़े हो गए। उसी उद्यान में लंच भी था हम जैसे तैसे खिसियाते हुए लंच लेने बैठ गए,यह दिखाने की कोशिश करने लगे जैसे कुछ हुआ ही न हो। हालांकि कई लोग हमारी उस हालत पर देर तक हंसते रहे। लंच के बाद हम जू गए। वहां पूरा वन सफेद साइबेरियन फ्लेमिंग पक्षियों से भरा हुआ था। बस में बैठ कर हम पूरा जंगल घूमें। हाथी,भालू,शेर,चीता लगभग सभी जंगली जानवर मनुष्य की अनुशासन शीलता को ठेंगा बताते हुए बिना अनुशासन भंग किए अपने-अपने क्षेत्र में डेरा जमाए बैठे हुए थे। सफारी पार्क के बाद हम शापिंग के लिए इंदिरा मार्केट की ओर रवाना हुए। हम सभी मिलने की एक जगह सुनिश्चित कर अपने हिसाब से मार्केटिंग के लिए चल पड़े। फुटपाथ से होते हुए हम शापिंग माल की ओर बढ़े। यहां भी मुम्बई के फैशन स्ट्रीट और लिंकिंग रोड की तरह मार्केट लग रही थी। लेकिन चीजें महंगी ज्यादा थीं, हां इलेक्ट्रोनिक सामान जरुर सस्ता था। उसके लिए भी आपको असली ब्रांडेड समान की जानकारी होनी चाहिए। कुछ लोगों ने इलेक्ट्रोनिक सामान खरीदा। हमने बच्चों के लिए कुछ कपड़े खरीदे बस। अबतक सभी शापिंग कर वापस लौट चुके थे और थके मांदे होटल की ओर रवाना हो गए।आज वापस भारत लौटने की तैय्यारी थी। एक ओर अपने घर लौटने की खुशी तो दूसरी तरफ नए मित्रों से बिछड़ने का गम....विक्की ने बस में ही सबको अपनी तरफ से हाथी वाला किचेन उपहार में दिया। अब हम विशालकाय स्वर्णभूमि एअरपोर्ट में पहुंच चुके थे। वहां समुन्द्र मंथन के समय देवता और असुरों के बीच छिड़े युद्ध के द्दृश्य वाली शेषनाग वाली कलाकृति ने सबको मोह लिया। ऐसा लगा कहीं न कहीं इस देश के लोग सदियों पहले हमसे बिछड़ गए होंगे या फिर भारत का विस्तार यहां तक रहा हो। जब हमारी संस्कृतियां इतनी मिलती जुलती हैं तो यह अलगाव कब और कैसे हुआ होगा? की बातें आपस में गुत्थम-गुत्था होने लगीं। शायद 'वसुधैव कुटुंबकम' की उक्ति इस बात को चरितार्थ करती हैं। हम सभी ने एअरपोर्ट से ही ड्यूटी फ्री विह्स्की खरीदी और चुपचाप अपने-अपने झोले में डाल दी। अब हवाई जहाज कोलकाता की उड़ान भर चुका था। कोलकाता पहुंचते ही सब एक दूसरे के गले लग-लग कर बिछड़ने का दुख बता रहे थे। और फिर से मिलने की उम्मीद में सबने एक दूसरे से विदाई ली। मुम्बई पहुंच कर मैंने अपना हैंड बैग खोला जिसमें पटाया के होटल वाला बिल मिला,जो संतोष ने विदा लेते वक्त मुझे थमा दिया था। बस की पिछली सीट से उभरती आवाज़े अब भी मेरा पीछा कर रही थीं..मैं उस बिल को सरसरी निगाह डालते हुए चेक करने लगी। बिल के उपर बार के आगे २०० बाथ लिखा था लेकिन बिल के पीछे साथ ही एक छोटा बिल था जिसमें साफ-साफ शब्दों में कंडोम लिखा हुआ था। मेरे पैरों तले जमीन सरक गई...वाकई पीछे बैठे लोगों द्वारा बार-बार चुटकी लेना बेवजह नहीं था...ये तो बेकार की फजीहत हो गई...किस-किस को सफाई देते फिरेंगे..और वो भी थाईलैंड जैसे शहर... जिसका नाम लेने से ही लोग शक की निगाहों से देखने लगते हैं...हालांकि किसी भी बात का स्पष्टीकरण उस बात के सही होने का पैमाना नहीं है..किन्तु मेरा मन हल्का हो चुका है। बेवजह के तनावों से मुक्ति पा चुकी हूं। यह तो अब आप लोगों पर निर्भर करता है आप इस बात की सच्चाई को मानें या न मानें।
ये बात तब एक प्रश्नचिन्ह के साथ सामने आती है जब एक औरत अपने बच्चो को स्कूल से अपनी कार में लाते वक़्त ट्रेफिक सिग्नल के पास आगे पीछे खड़ी गाड़ियो में फंस जाती है और वहाँ से निकलने की कोशिश करती है तभी एक दो और गाड़ियो में सवार सभ्य पुरुष बजाए उस महिला की मदद करने के, आँखे दिखाते अपनी बड़ी गाडी से निकलते हुए बोलते हैं कि ''मैडम जब गाडी चलानी नहीं आती तो चलाते ही क्यों हो? आ जाती हैं न जाने कहाँ कहाँ से ....रास्ता रोक के खड़ी हैं कब से ?हमे पहले ही इतनी देर हो गई है ,ये मैडम हैं कि और देर करवा रही हैं..!इतने में आवाज़ सुनकर महिला ट्रेफिक पुलिस आती है और वहां से भीड़ को हटाने और उन् 'सभ्य 'कहलाने वाले पुरुष को शांति से नियम मानने का आदेश देती हैं और उस कार वाली महिला को अपनी गाडी निकलने का निर्देश देती है लेकिन यह सुनते ही वही व्यक्ति आग बबूला हो जाता है ..बिना जाने समझे की किसकी गाडी आगे है किसकी पीछे या ट्रेफिक महिला पुलिस के निर्देश को माने बिना बोलता जाता है ....वाह भई वाह !अरे मैडम जी ये औरत न तो गाडी चला रही है न हमे आगे जाने दे रही है....और आप हो की उसको ही पहले जाने को बोल रही हो..ऐसा नहीं चलेगा....!हम लेट हो रहे हैं !और व्यर्थ ही गुस्से से उस महिला कार चालक से बदतमीज़ी पर उतर आया ...ओ मैडम !..नहीं आती न तोह न चला ..घर में बैठ ...हट गाडी हटा ...! और उस व्यक्ति ने न तो उस महिला कार चालक का ,न ही ट्रेफिक महिला पुलिस का सिर्फ उनका ''औरत '' होने की वजह से कुछ भी लिहाज़ किया !तो प्रश्न उठता है कि क्या आज भी नारी कितनी भी आगे बढ जाए उसको वही सम्मान मिल पा रहा है ?क्या केवल पुरुष ही सही काम करते हैं?क्या उनको ही सिर्फ गाडी चलानी आती है और उनसे कोई गलती या दुर्घटना नहीं होती ?जहाँ जरा सी भी नारी से चूक हुई नहीं कि पुरुष वर्ग आँखे तरेर कर हाथ घुमा कर औरत को खरी खोटी सुनाने से बाज़ नहीं आता !क्या उस भीड़ में से कोई और पुरुष आगे आकर उस महिला की मदद करने और उस बदतमीज़ पुरुष को चुप करवाने नहीं आ सकता था? नहीं...!क्यों कि सब को ही देर हो रही थी !या फिर वो शायद उस व्यक्ति की अनजाने में ही हाँ में हाँ मिलाने की कवायद में थे ! ऐसा क्यों होता है कि पुरुष वर्ग महिला वर्ग को आगे बढता देख नहीं पाता? महिलाओ को आगे लाने और उनका साथ देने की दलीले खोकली साबित क्यों हो जाती हैं ? देश को आगे बढ़ाने में समाज का योगदान होता है और वही समाज केवल पुरुष प्रधान तो नहीं है ?उस में नारी का भी तो बराबर का योगदान है !फिर हमारा समाज शहरो कस्बो ,जिलो के मिश्रण से बना है पर अफ़सोस कि समाज के इन्ही महत्पूर्ण हिस्सों के लोगो में औरत की स्तिथि आज भी वही है जहाँ छोटी से छोटी बातो के लिए भी औरत को ज़लील करने से पुरुष पीछे नहीं हटता! नारी के अधिकारों की अवहेलना की जाती है ! कुछ भी अच्छा करना हो या नया करना हो तो शुरुआत अपने घर से ही की जाती है ताकि उस शुरुआत से बड़े परिवर्तन को आकार दिया जा सके !फिर अगर अपने घर की नारी हो या दुसरे घर की, नारी का अपमान करके क्या एक अच्छे समाज का निर्माण हो सकता है? नारी का मानसिक शोषण करना छोड़ कर उसके सहयोग से ही उसके अस्तित्व को स्वीकार कर के ही एक स्वस्थ समाज की सरंचना हो सकती है !ऊपर वर्णित घटना मात्र एक छोटा सा उदाहरण है नारी के मानसिक शोषण का !जो नारी एक अच्छी पत्नी,माँ,बहन,के साथ साथ देश की बागडोर सँभालने और चांद की ऊँचाइयों को भी छूने की क्षमता रखती है क्या वो उस पुरुष को मुह तोड़ जवाब नहीं दे सकती थी? दे सकती थी ! पर चुप थी तो अपनी बगल में बैठे बच्चो को देख कर जो उस असभ्य व्यक्ति की आवाज़ सुनकर सहम गए थे और वो औरत अपने बच्चो को प्यार से सहला रही थी या फिर वो खामोश थी तो अपने अन्दर निहित संस्कारो की वजह से क्यों कि वो उस असभ्य पुरुष से दो चार होकर खुद को असभ्य कहलाने से बच कर अपने बच्चो के साथ सुरक्षित अपनी मंजिल की ओर बढना चाहती थी !ये भी तो एक नारी के महान होने का सबूत है जहाँ वो अपने व्यवहार ,अपनी ममता का लोहा मनवाने से पीछे नहीं हटती !
19 मार्च 2011: केंद्र सरकार के मंत्रियों ने इस साल कमाल कर दिया| उन्होंने देश और विदेश का चप्पा-चप्पा छान डाला| राष्ट्र-सेवा के लिए जितनी दौड़-धूप पिछले साल की, उससे दस गुणा ज्यादा इस साल की| जी हां, दस गुणा ज्यादा इसका पता हमें कैसे चला? इसका पता हमें जनता ने नहीं दिया, जिसकी सेवा में उन्होंने दिन-रात कर दिए| इसका पता हमें चला, ताजा बजट की चर्चा के दौरान| सरकारी आंकड़ों का कहना है कि मंत्रियों के यात्रा-खर्च के लिए पिछले साल 47 करोड़ रू. रखे गए थे, लेकिन उन्होंने लगभग 500 करोड़ रू. खर्च कर दिए| दस गुणे से भी ज्यादा पैसों का पता तो लग गया, लेकिन यात्राओं का कुछ पता नहीं| उनका विवरण कहीं नहीं छपा है| ये यात्राएं कहां-कहां हुई और क्यों-क्यों हुई? उनका परिणाम क्या निकला, इसका कोई हिसाब सरकार ने पेश नहीं किया है| यदि कोई सूचना के अधिकार के तहत जानकारी निकलवाना चाहे तो सरकार के पसीने छूट जाएंगे| यात्राओं पर इस दस गुणा खर्च का औचित्य कहीं मोटे तोर पर भी दिखाई नहीं पड़ता| मंत्रियों के यात्र करने से क्या देश के मतदाताओं में कोई विशेष राजनीतिक जागृति फैली? बिल्कुल नहीं| राजनीतिक जागृति तो फैली है, बाबा रामदेव की यात्रओं से और अन्ना हजारे के अनशन से! उन दोनों ने सरकार से एक पैसा भी नहीं लिया| तो मंत्रियों की यात्रा से क्या सरकारी काम-काज में कोई अपूर्व चुस्ती दिखाई पड़ी? क्या सरकार की छवि सुधरी? नहीं, बिल्कुल नहीं| उल्टा ही हुआ| पिछले एक साल में इस सरकार की छवी इतनी गिरी है कि आज तक किसी भी सरकार की नहीं गिरी| मंत्रिगण जहां-जहां यात्राएं करते हैं, वे अपने साथ इस सरकार की बेइज्जती का टोकरा भी अपने सर पर लेकर जाते हैं| मंत्रियों का यात्रा का कोई चमत्कारी प्रभाव किसी निर्माण योजना पर पड़ा हो, ऐसी भी कोई जानकारी सामने नहीं आई| मंतरियों के दौरों के कारण क्या विश्व-ख्याती की कोई चीज देश में बनी? बिल्कुल नहीं| विश्व ख्याती की जो चीज बनी है, वह है दिल्ली की मेट्रो| इस मेट्रो का निर्माण किसी मंत्रि की वजह से नहीं, श्री ईधरण के वजह से हुआ है, जो सच्चे कर्मयोगी हैं| तो फिर मंत्रियों ने यात्राएं, दस गुणी ज्यादा करके देश की कौन सी सेवा की है? मोटे तौर पर देखा जाए तो आम लोगों की खून-पसीने की कमाई के 500 करोड़ रू. पानी में चले गए| जितना समय इन यात्रओं में खर्च हुआ, वह भी सरकार के माथे पर हुआ| एक-एक मंत्री के रख-रखाव पर लाखों रू. रोज खर्च होते हैं| यह रूपए भी इन यात्रओं के कारण बेकार हुआ| इसका अर्थ यह नहीं कि मंत्री लोग हमेशा दिल्ली में ही बैठे रहें| वे अपने कमरों से बाहर ही न निकलें| न देश में कहीं जाए, और न ही विदेश जाएं| जरूर जाएं| हमेशा जाते ही रहें| लेकिन दस गुणा तेजी से क्यों गए और इतने ज्यादा जाकर उन्होंने देश के लिए क्या विशेष उपलब्धि की, यह समझ के परे हैं|
बादशाह अकबर एक दिन बीरबल से मजाक में बोले- ‘ अरे बीरबल, क्या कारण है कि तुम्हारे भगवान जब भी किसी भक्त की जान बचाने के लिए या लाज बचाने के लिए आते हैं तो नंगे पैर बिना किसी सवारी, नौकर-चाकर लिए दौड़ पड़ते हैं। आखिर ये सब किस वक्त काम आते हैं ? ‘
बीरबल मुस्कुरा दिए।
फिर बोले- ‘ उचित अवसर पर उत्तर दूँगा।‘
‘ठीक है, उत्तर देना। ‘
‘ उत्तर दूंगा...वक्त आने दो !’
बीरबल ने उस नौकर से बात की जो राजा के पोते को सम्भालता, दुलारता और खिलाता था।
बीरबल ने एक कलाकार से बादशाह के पोते की शक्ल का बच्चा मोम के मसाले से तैयार करवा लिया था।
बच्चे की देख-रेख करने वाले नौकर को वह मोम का बच्चा देते हुए बीरबल ने कहा- ‘ इसे बादशाह के पोते के कपड़े पहनाकर उधर से ले जाना जिधर तालाब है। कुछ दूरी पर मैं और जहाँपनाह होंगे। बच्चे को गोद में लेकर प्यार करते हुए तुम पैर फिसला कर गिरना और इस तरह गिरना कि बच्चा तालाब के पानी में गिरे और बादशाह देख लें। इस काम के तुम्हें बहुत रुपए इनाम में दूंगा और अगर तुमने मेरे कहने के अनुसार काम न किया तो सजा मिल सकती है। ‘
वह मान गया।
उसने बीरबल का साथ दिया।
योजनानुसार नौकर बादशाह के पोते को तालाब पर ले गया था।
वास्तव में वह मोम का था।
बादशाह और बीरबल दूर थे। बादशाह को यही पता था कि यह उनका अपना पोता है।
बीरबल से बातें करते हुए बादशाह का ध्यान अपने पोते पर था।
अचानक नौकर का पैर फिसल गया।
बादशाह जैसी स्थिति में बैठे थे, बीरबल के साथ वैसे ही उठकर भाग लिए। न उन्होंने जूतियां पहनीं न बीरबल से कुछ कहा।
वह सीधे भागकर वहां पहुंचे जहां पर पानी में बच्चा गिरा था।
परन्तु वह मोम का था। देखकर बादशाह को क्रोध आ गया।
वे नौकर को बुरा-भला कहने और सजा की धमकी देने लगे तो उसने बता दिया कि बीरबल की आज्ञा पर उसने यह नाटक किया है।
बीरबल भी बड़े इत्मीनान से पान खाता हुआ वहां आ गया।
‘ बीरबल यह क्या बदतमीजी थी ? ‘
‘ कुछ भी नहीं। आपने एक दिन कहा था कि भगवान बिना सवारी, बिना नौकर-चाकर क्यों नंगे पांव दौड़ पड़े थे भक्तों की सहायता के लिए। यह मैंने उसी सवाल का जवाब दिया है। आपने भी किसी चीज का इंतजार नहीं किया था, बस दौड़ पड़े थे। ‘
‘ओह-ये बात थी। ‘
‘जी, यह उसी का उत्तर था। ‘
‘ मैं समझ गया हूं, भक्त से भगवान का ऐसा ही प्यार होता है जैसे मनुष्य का संतान से। ‘
बादशाह को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था।
मोटूराम
कभी इधर तो कभी उधर को चलते जाते मोटूराम । मोटर वाला भी चकराया कहाँ जा रहे मोटूराम ।
बीच सड़क में घबरा करके गिरे अचानक मोटूराम । चोट लगी घुटनों पर भारी उठते कैसे मोटूराम -रामेश्वर कम्बोज हिमांशु .