द्रुम समीर कंपित थर-थर-थर झरती धाराएँ झर-झर-झर जगती के प्राणों में स्मर शर बेध गए कस के ...
-सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला '
(लेखनी-वर्ष-4-अँक-41)
सावन विशेषांक
माह विशेषः सावन के लोक गीत। हाइकू और क्षणिकाएँ : लालबिहारी लाल , शैल अग्रवाल। माह के कविः जतिन्दर परवाज़ । कविता आज और अभीः श्याम सुन्दर दुबे, केसरीनाथ त्रिपाठी, शंभुनाथ, दामोदर लाल जागिड़, प्राण शर्मा, शील निगम। कविता धरोहरः माखनलाल चतुर्वेदी, सुमित्रानन्दन पंत। शिशुगीतः अज्ञात ।
मंथनः डोमन साहू समीर। परिचर्चाः डॉ. रामचन्द्र रॉय। कहानी समकालीनः रश्मि बड़थ्वाल । कहानी समकालीन शैल अग्रवाल। लघुकथाः आलोक सातपुते । चौपालः सीताराम गुप्ता । हास्य व्यंग्यः शरद जोशी। संस्मरणः शैल अग्रवाल। रागरंगः कादम्बरी मेहरा। परिदृश्यः अजय पाराशार । बाल-कहानीः शैल अग्रवाल । माह की साहित्यिक खबरों और गतिविधियों से भरपूर विविधा।
लहराते कुंतल हों या बरसते नयन, वर्षा ऋतु का संबध सीधा सौंदर्य और श्रंगार से ही रहा है, मानव मन के गूढ़तम रहस्य...सृजन और सिंचन से रहा है। रूप और रंग के इन्द्रधनुष ही नहीं, सूखी तपती धरती पर राहत और जीवन का संदेश लेकर आती हैं ये बौछारें, तभी तो ऋतुओं की रानी कहा जाता है इसे। यह बात दूसरी है कि ' रानी का अन्तर द्रवित दृगों में पानी '। चरक संहिता में भी बसंत के बाद सर्वाधिक हितकारी ऋतु कहा गया है इसे , क्योंकि फल-फूल, धन-धान्य, खेत-खलिहान सभी पर एक समृद्धि...एक बहार ...अनूठी हरियाली जो आ जाती है इस ऋतु में। बात जब सावन की है तो कैसे भूल सकते हैं हम मादक इस ऋतु के पलपल बदलते रंगरूप को...दादुर, मोर, पपीहों को। रोमांच के साथ जोश भी तो आ मिलता है इसकी रिमझिम में और मेघों की ताक धिना-धिन के साथ-साथ आस्था के मंजीरे भी तो बज उठते हैं चारो तरफ।
एक बार फिर वही सावन का महीना आ पहुँचा है, और बाहर बदली भी सावन-सी-ही है।' सी' इसलिए कि यहां इंगलैंड में तो बारहों महीने सावन-भादों ही है। सामने टी.वी. पर कोई किशोरी बेहद नए और मोहक अन्दाज में एक बेहद रसीले बेगम अख्तर के पुराने गीत -बरसन लागीं बुंदिया सावन की, सावन की मनभावन की-को झूम-झूमकर नए और आधुनिक अंदाज में गा रही है। सोचने पर मजबूर हूँ, अंदाज चाहे जो भी हो, गीत तो वही पुराना है और जादू भी वैसा ही। अचानक मन एक नई पुलक से भर उठता है और यादों की बाढ़ आ जाती है। मन एक बार फिर जा रमता है बनारस की गलियों में, बनारस जो आज भी आध्यात्म, आस्था और रीतियों के त्रिशूल पर अटका निराला शहर है। इसकी शिवमय सावन की हरहर गंगे से गूंजती गलियाँ...बेलपत्र और गंगाजल से अभिषिक्त गलियाँ, जो आजभी किसी को मोक्ष दिलाने की पूरी सामर्थ रखती हैं ( विशेषतः काई भरी घाटों की सैकड़ों साल पुरानी सीढ़ियाँ और कीचड़ भरी गलियों के दम पर...अरे, सांड और सन्यासियों को तो भूले ही जा रही थी मैं!) ।
फूलों का सिंगार, झूले, मेंहदी, चूड़ी, बिन्दी, महावर और साथ में कजरी और बिरहे के उल्लासित भीगे-भीगे स्वर... मीठी-मीठी छेड़छाड़...सावन के पहले सोमवार से ही बनारस के जन-जीवन में बढ़ता वह हर्षोल्लास, भीड़-भाड़, आजतक भुलाए नहीं भूलती। माना कि वे सावन की झांकी के नाम पर स्वनियंत्रित मानस-मंदिर की मूर्तियां गरिमा की जगह कौतुक ही अधिक पैदा करती थीं और लाउड-स्पीकर पर बजते , कजरी, बिरहा और देवी-गीतों को अनसुना कर पाना बच्चे-बूढ़े क्या, किसी के लिए भी संभव नहीं (न तब और न शायद आज ही!) पर आसपास के गांवों से आई और उमड़ती भीड़, इस बात की गवाह है कि भगवान के सजे-धजे इस यंत्रीकरण का जनता पूरे साल इन्तजार करती है। शहरों में जीवन भले ही बदल जाए, पर गांवों और छोटे शहरों में जन-मानस आज भी वहीं-का-वहीं खड़ा है...प्रकृति के करीब और जोशीला ! सैकड़ों सालों से चले आ रहे इन त्योहारो को... ऋतुओं के परिवर्तन को आज भी वैसे ही गाजे बाजे से, हर्षोल्लास के साथ मेले के रूप में ही मनाया जाता है।
इस अद्भुत नगरी में यह वह महीना है जब प्रकृति और परमेश्वर एक हो जाते हैं। बाबा विश्वनाथ अपने पूरे श्रृंगार के साथ सड़कों पर घूमते नजर आते हैं और हर मन्दिर, हर गली में एक मेला-सा लग जाता है। नव-विवाहिताओं के सिंदूर और महावर की वह चमक गली-गली और कोने-कोने बिक रहे फूलों से होड़ लेने लग जाती है...हो भी क्यों नहीं, श्रंगार और सावन का चोली-दामन का जो साथ है! सावन है, तो शिव हैं; शिव यानी कि कल्याण ही कल्याण। सावन शिवजी का प्रिय महीना है क्योंकि यह मात्र शिवजी का ही नहीं, पार्वती जी का भी तो महीना है। यही वह महीना है जब शिव पार्वती का विवाह हुआ था। और यही वह महीना है जब परशुराम स्नेह और श्रद्धा की कांवर कांधे पर लटकाकर आराध्य देव का जलाभिषेक करने नंगे पैर ही निकल पड़े थे। सावन के इस महीने में सैकड़ों व्यक्ति इसे वैसे ही कन्धे पर लटकाए आजभी दिख जाएंगे भारत के कोने-कोने में। हर सड़क, हर पगड़ंडी से हर शिवालय तक जाता यह रास्ता आज भी उसी अटूट आस्था के जीत की ही तो कहानी दोहराता है। कांवर आज भी तो भक्ति, श्रद्धा और आस्था की ही प्रतीक है यहाँ पर ।
बचपन से ही जिन रस्मों और यादों में जिया जाए, उनसे निकल पाना प्रायः संभव नहीं, क्योंकि ये स्मृतियां और अनुभव ही तो हैं, जो जीवन में नींव के पत्थर बनते हैं। विचारों और सोच में रंग भरते हैं। ये तीज-त्योहार ही तो हमें हमारे विलक्षण भारतीय संस्कार और तौर-तरीके सिखाते हैं। ठहरे कल की उंगली दौड़ते- भागते आज को थमा, भविष्य से जोड़ने का काम करते हैं यह।
गलियों और सड़कों पर पुराने महोत्सव जैसे रथयात्रा वगैरह की तो धूम रहती ही है अब पर्यटकों के लिए भी (मुख्यतः विदेशी पर्यटकों के लिए) पुणे, खजुराहो और दिल्ली मुम्बई जैसी महानगरियों में भी, संस्कृति और कला की संस्थाओं द्वारा ही नहीं, आध्यात्मिक संस्थाओं द्वारा भी बेहद कलात्मक रूप से गीत-संगीत के साथ वर्षा-मंगल और गीत-संगीत महोत्सव मनाने का प्रचलन देश भर में जोर पकड़ चुका है और दिन-प्रतिदिन भव्यतर आयोजनों का रूप लेता जा रहा है। अबतो यहाँ बरमिंघम में भी जगन्नाथ यात्रा खूब धूमधाम से निकलती है और हरे रामा हरे कृष्णा के श्रद्धालुओं के भजन और फेरी के साथ-साथ चैम्बरलिन स्क्वायर पर स्थानीय कलाकारों द्वारा काव्यपाठ, नृत्य और प्रदर्शनी आदि का भी आयोजन होने लगा है।
कभी, हमारे विधालय में भी सावन, वर्षा-महोत्सव के रूप में बड़े जोर-शोर के साथ एक विशिष्ट अन्दाज में मनाया जाता था। पचास-साठ बालिकाओं के सामूहिक नृत्य के साथ सुबह-सुबह सात बजे ही प्रभात फेरी...फिर शान्ति-निकेतन की ही परम्परा पर विविध और अनोखे सांस्कृतिक कार्यक्रम। नए-पुराने बाउल-गीत, रविन्द्र-संगीत, मनीपुरी नृत्य सभी का समावेश, हर साल ही एक नया समां बांध देता था यह आयोजन। अल्पना और फूलों से गुंथे मंच के साथ-साथ लकड़ी के पीढ़े और स्तंभ...सभी महीनों पहले से ही रंगने-संवारने शुरू हो जाते थे और हर साल ही छोटे-बड़े सभी ये काम विद्यार्थी खुद-ही किया करते थे, वह भी हर साल नए और दुगने उत्साह के साथ। हरेक को बस एक ही फिक्र रहा करती थी कि कुछ और नया व पहले से अच्छा कर पाए वह! फिर एक सावन वह भी आया जो शान्ति-निकेतन में गुजरा और आजतक भुलाए नहीं भूलता। कला और परम्पराओं की मानो बाढ़ आ गई थी चारो तरफ। हर दिन त्योहार... एक नया महोत्सव। घने पेड़ों की शाखों से टपकती बूंदों के नीचे भीगते अक्सर ही लम्बी सैर पर निकल जाया करते थे हम, आसपास बसे सान्थाल-गांवों की तरफ। वहां घरों के दरवाजे पर बंधी बंदनवार, और घंटियां, नित-नई अल्पना, नए-नए बाउल गीत (बंगाल के गांवों में गाए जाने वाले भक्ति रस में डूबे भिक्षु गीत)---और आदिवासियों के हाथों बनाया गया वह बेंत और चमड़े का सामान, बातिक और एम्बौस् टेक्नीक से बहुत ही कलात्मक ढंग से सजा-संवरा। उन पिछड़ी जातियों की लोक परम्परा और अनूठी प्रतिभा को बेहद पास से देखने और जानने का अद्भुत और अभूतपूर्व मौका था वह ! ...
सुर-सावन हो या सुख-सावन, चाहे वतन से दूर यादों की अंजुरी में भीगा, उदा-उदा और नम सावन, कहीं भी रहो आज भी तो रसाप्लावित ही करता है यह।... स्वर छमाछम बरस रहे हैं- ' बरसन लागी बुंदिया सावन की'...बेगम अख्तर नहीं तो दूसरे गाएंगें, गा रहे हैं। वक्त का चक्र कब और किसके लिए रुका है...तो क्या किया जाए ' अबकी बरस सावन में ', न बांटना, साथ-साथ न भीगना क्या संभव भी है? ...शायद नहीं, न आपके लिए और ना ही मेरे लिए।
देखो सावन में हिंडोला झूलैं मन्दिर में गोपाल। राधा जी तहाँ पास बिराजैं ठाड़ी बृज की बाल।।
सोना रूपा बना हिंडोला, पलना लाल निहार। जंगाली रंग, सजा हिंडोला, हरियाली गुलज़ार।।
भीड़ भई है भारी, दौड़े आवैं, नर और नार। सीस महल का अजब हिंडोला, शोभा का नहीं पार ।।
फूल काँच मेहराब जु लागी पत्तन बांधी डार। रसिक किशोरी कहै सब दरसन करते ख़ूब बहार।।
2.
अम्मा मेरे बाबा को भेजो री कि सावन आया, कि सावन आया, कि सावन आया
अरी बेटी तेरा, अरी बेटी तेरा, अरी बेटी तेरा बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री कि सावन आया, कि सावन आया, कि सावन आया
अम्मा मेरे भैया को भेजो री अरी बेटी तेरा, अरी बेटी तेरा, अरी बेटी तेरा बेटी तेरा भैया तो बाला री कि सावन आया, कि सावन आया, कि सावन आया
3.
झूला पड़ा कदम की डारी झूलें कृष्ण मुरारी ना कौन काठ का बना हिंडोला का की लागे डोरी ना चनन काठ का बना हिंडोला रेशम लागे डोरी ना के हो झूले के हो झुलावे के हो देवे तारी ना राधा झूलें कृष्ण झुलावें सखियां देवें तारी ना।
4.
संपवा छोड़ेला संप केंचुली हो रामा गंगा छोड़ेली करार पियावा छोड़ेला घर आपन हो घरे रहु ननदी के भाय
अब की सवनवा तू मत जा बिदेसवा घरे रहु ननदी के भाय।
5.
नन्हीं - नन्हीं बुदियाँ सावन का मेरा बरसना जी।
पहला झूला -झूला मैनें बावुल जी के राज्य में, सारी -सारी रतियां बागों का मेरा झूलना जी।
पहला झूला -झूला मैनें भैया जी के राज्य में, सारी -सारी रतियां सखियों संग मेरा झूलना जी।
एक झूला- झूला मैंने ससुरा जी के राज्य में, सारी -सारी रतियां महलों में मेरा झूलना जी।
एक झूला- झूला मैंने ससिया जी के राज्य में, सारी -सारी रतियां सेजों पर मेरा झूलना जी।
6.
सइयां तोहें नइहर बोलइबे अबकी सावन में अमवा की डारी झुलुवा झुलइबे अब की सावन में झिमिर झिमिर बुनिया पड़े जब तब तोहे कजरी सुनइबे अब की सावन में।
शजर पर एक ही पत्ता बचा है हवा की आँख में चुभने लगा है नदी दम तोड़ बैठी तशनगी से समन्दर बारिशों में भीगता है कभी जुगनू कभी तितली के पीछे मेरा बचपन अभी तक भागता है सभी के ख़ून में ग़ैरत नही पर लहू सब की रगों में दोड़ता है जवानी क्या मेरे बेटे पे आई मेरी आँखों में आँखे डालता है चलो हम भी किनारे बैठ जायें ग़ज़ल ग़ालिब सी दरिया गा रहा है
गुमसम तनहा...
गुमसम तनहा बैठा होगा सिगरट के कश भरता होगा उसने खिड़की खोली होगी और गली में देखा होगा ज़ोर से मेरा दिल धड़का है उस ने मुझ को सोचा होगा सच बतलाना कैसा है वो तुम ने उस को देखा होगा मैं तो हँसना भूल गया हूँ वो भी शायद रोता होगा ठंडी रात में आग जला कर मेरा रास्ता तकता होगा अपने घर की छत पे बेठा शायद तारे गिनता होगा
बारिशों में...
बारिशों में नहाना भूल गए तुम भी क्या वो जमाना भूल गए कम्प्यूटर किताबें याद रहीं तितलियों का ठिकाना भूल गए फल तो आते नहीं थे पेडों पर अब तो पंछी भी आना भूल गए यूँ उसे याद कर के रोते हैं जेसे कोई ख़जाना भूल गए मैं तो बचपन से ही हूँ संजीदा तुम भी अब मुस्कराना भूल गये।
सहमा सहमा....
सहमा सहमा हर इक चेहरा मंजर मंजर ख़ून में तर शहर से जंगल ही अच्छा है चल चिड़िया तू अपने घर तुम तो ख़त में लिख देती हो घर में जी घबराता है तुम क्या जानो क्या होता है हाल हमारा सरहद पर बेमोसम ही छा जाते हैं बादल तेरी यादों के बेमोसम ही हो जाती है बारिश दिल की धरती पर
आ भी जा अब जाने वाले कुछ इन को भी चैन पड़े कब से तेरा रस्ता देखें छत आँगन दीवार-ओ-दर जिस की बातें अम्मा अब्बू अक्सर करते रहते हैं सरहद पार न जाने कैसा वो होगा पुरखों का घर
मुझ को खंजर ...
मुझ को खंजर थमा दिया जाए फिर मिरा इम्तिहाँ लिया जाए ख़त को नज़रों से चूम लूँ पहले फिर हवा में उड़ा दिया जाए तोड़ना हो अगर सितारों को आसमाँ को झुका लिया जाए जिस पे नफरत के फूल उगते हों उस शजर को गिरा दिया जाए एक छप्पर अभी सलामत है बारीशों को बता दिया जाए सोचता हूँ के अब चरागों को कोई सूरज दिखा दिया जाए
घाटियों से घाटियों तक दौड़ता उजला हरापन एक चादर झलमलाती तानती उनई घटाएँ।
पगडंडियों के पांव में जो घाव थे पिछले दिनों एक फाहा रख गया है पोखर उलंगकर पास से अंखुए खोलती-सी आंख फैलता है सुनहरापन खेत, सपने लगे बुनने ठूंठ वीराने लगें खास से !
छूटती-सी बोगदे में- रेलगाड़ी उड़ती हुई बदली हुई लालटेनों को हिलाता पेड़ पोस्टर-सा कि जुगनू दिपदिपाए !
बज रही ओरी छलक कर आंगन समेटे और कब तक खट रही जो जोगिया खपरैल छू रहीं उसको बिजलियां ; पांव अटके गांव-गलियारों में आंख अटकी खिड़कियों पर मेंहदी रचाए अंगुलियां सौंपती हैं हलदिया रंग की कजलियां !
जंगलों में एक सरगम छेड़ती हैं रात-दिन बूंदें संगीत की महफिल हुआ मौसम आर्केस्ट्रा मेघ-मालायें बजायें !
- श्याम सुंदर दुबे
ममता
बादलों की बेटी वर्षा के झूले पर धरती पर आई कच्ची माटी के आँगन में पोर-पोर समाई।
पर बदले रूप में बड़ी ही इठलाई जब पकी ईटों पर आई वही बूँद, बूँद-बूँद छितराई।
ममता भी कभी रूप बदलती है कभी शालीन कभी उन्मुक्त होती है।
उसकी गाथा उसके मिलन पर उसकी अनुभूति होती है।
- केशरी नाथ त्रिपाठी
सावन
सावन लगा हुई हरियाली कू-कू कोयल करती डाली पड़ी फुहार मंद मुस्कानी सब खेतों में भर गया पानी
मुड़ तालाबों की धुन देखो मेंढ़क कहते मेघों बरसो ऐसी घटा अँधेरी छाई मंद-मंद चलती पुरवाई
डाल-डाल पर पड़ गए झूले अब कुम-कुम के मन है फूले सावन मास सुहावन लागे घर से योगिन बाहर भागे
ये सुंदर वर्षा ऋतु आई प्यासी धरती की प्यास बुझाई जंगल में कैसा है शोर मस्त मगन हो नाचे मोर
सब बच्चों के मन को छू लें आओ सखियों झूला झूलें चिड़िया चीं-चीं करती डाली सावन लगा हुई हरियाली।
- शंभुनाथ
मन मरुथल में
मन मरुस्थल में ग़जब सूखा पड़ा हैं। नेह का बादल अजब रुखा खड़ा हैं। कौंध कर अम्बर से बिजली ने निंहारा, कौन सा दरख्खत यहां सबसे बड़ा हैं। गर्म लगती हैं जमाने की हवा भी, हर जगह तहजीब का पहरा कड़ा हैं। वो मसलने के लिऐ उद्यत खड़े थे, शाख से जब टूट कर गुँचा झड़ा हैं। रुक गये थे छांह ठण्डी देख कर जब, तब ये जाना पांव में कांटा गड़ा हैं। इक सचेतक सी सड़क बोली पथिक से, मील का पत्थर अभी आगे गड़ा हैं। चंद खुशियों की सजी महफिल थी लेकिन, मुश्किलों का अलहदा अपना धड़ा हैं। -दामोदर लाल जांगिड
तनहाइयाँ....
तनहाइयाँ अकेलीं नहीं होतीं, तनहाइयों में भी साथ होतीं हैं कुछ परछाइयाँ...,उन ख्यालों की, जो कभी भूले- भटके से , अँधेरी रातों में, न जाने कहाँ-कहाँ से निकल कर , बस जाते हैं मन के हर कोने में, और फिर छा जाते हैं,काले बादलों से, बरसते हैं खूब नयनों के झरोखों से इन नयनों का बरसना राहत देता है उस चाहत को ,जो पैदा हुई थी कभी.. मन में बसाया था जिसे... दिल के हर कोने में जाग पड़तीं हैं इन तनहाइयों में फिर से उस चाहत की परछाइयाँ भूले-भटके से ये ख्याल,उनींदी सी यह चाहत, बन जाते हैं दो किनारे, इन तनहाइयों के और साथ निभाते हैं हर पल,अंत तक।
-शील निगम
बदलियाँ
आसमां में घुम - घुमा कर आ गयी हैं बदलियाँ जल - तरंगों को बजाती छा गयी हैं बदलियाँ
नाज़ औ अंदाज़ इनके झूमने के क्या कहें कभी इतराई कभी बल खा गयी हैं बदलियाँ
पेड़ों पर पींगे पड़ी हैं प्यार की, मनुहार की हर किशोरी के ह्रदय को भा गयी हैं बदलियाँ
साथ उट्ठी थीं सभी मिलकर हवा के संग - संग राम जाने किस तरह टकरा गयी हैं बदलियाँ
एक नजारा है नदी का जिस तरफ ही देखिये पानियों को इस तरह बरसा गयी हैं बदलियाँ
भीगते हैं बारिशों के पानियों में झूम कर बाल - गोपालों को यूँ हर्षा गयी हैं बदलियाँ
उठ रही है हर तरफ से सौंधी - सौंधी खुशबुएँ बस्तियां , जंगल सभी महका गयी हैं बदलियाँ
याद आएगा बरसना " प्राण " इनका देर तक गीत रिमझिम के रसीले गा गयी हैं बदलियाँ
- प्राण शर्मा
आओ चलो मचाएँ शोर
छपक-छपक के पानी बरसे वन मे नाचे मोर आओ चलो मचाएँ शोर
हर खेतों में हरियाली अब लहर-लहर लहराती है इन बागों की हरी डाल पर कोयल गीत सुनाती है पीले मेंढक तलाबो में टर्र-टर्र तान सुनाते हैं पशु पक्षी आँगन में मेरे ज्ञान की बात बताते हैं हर हर हर हर बहे बयारिया मनवा देती यों झकझोर आओ चलो मचाएँ शोर
नदिया कल-कल बहती रहती यौवन के ख़यालों में नभ से जो अमृत रस गिरता टकराता बड़े पहाडो से भारत देश किसानों का है चहुँ ओर हरियाली हैं हर खेतों में फसल दिखाती उसकी शान निराली हैं सच्चाई से डटे रहेंगे हम जाएँगे अब कहीं न छोड़ आओ चलो मचाएँ शोर....
(रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150 वीं जयन्ती पर लेखनी की भावभीनी पुष्पांजली)
अपनी गीतांजलि (बंगला) की रचनाओं पर साहित्य विषयक विश्विवख्यात नोबेल पुरस्कार (1913 ई.) में प्राप्त करके विश्व कवि के रूप में प्रतिष्ठित होने वाले कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाओं में नैसर्गिक प्रकृति और मानवीय प्रवृत्ति का अदभुत् समन्वय है। प्रकृति के कण-कण में परमसत्ता की अनुभूति भारतीय मनीषा की विशेषता रही है, जिसकी सफल अभिव्यक्ति उनके काव्य में भूरिशः हुई है। सूर्य-सोम, पवन-प्रकाश, वन-पर्वत, जीवन-मरण, शयन-जागरण इत्यादि प्रकृति के प्रत्येक पदार्थ और प्रत्येक घटना में परमात्मा की प्रतीति उनकी रचनाधर्मिता की कालजयी सार्थकता है। ऋतु-वर्णन काव्य-कला का एक प्रमुख विषय रहा है जो केवल अभिधात्मक ही नहीं, उद्बोधात्मक भी हुआ करता है। यों तो वर्ष भर की सभी ऋतुओं के बहुरंगी चित्रण विभिन्न भाषाओँ के काव्य-साहित्य में होते ही रहे हैं, परन्तु शिशिर, वसन्त और पावस को उसमें प्रमुखता प्राप्त रही है। महाकवि रवीन्द्रनथ ठाकुर का काव्य इस दृष्टि से अतीव उत्क्रष्ट रहा है। काव्य कला के समष्टिगत लक्ष्य 'सत्यं शिवं सुन्दरम्' का परिपादन उनकी रचनाओं में सर्वतः ही परिलक्षित है। यहां पावस विषयक उनकी कतिपय रचनाओं का संक्षिप्त विवेचन किया जा रहा है। अपनी एक रचना में वह कहते हैं;
आषाढी संध्या घिर आई, दिन अब बीत गया; लगातार हो रही वृष्टि है, रुक-रुककर देखो। घर के कोने में बैठो एकाकी, क्या-क्या सोच रहा हूं मन में ! सजल वायु क्या जाने, क्या कह जाती, पैठी इस जुही के वन में! लहर उठी है आज हृदय में मेरे, खोज नहीं पाता हूं कूल कहीं; प्राण रुला जाता है सौरभ आके, भीग रहे हैं वन के फूल कहीं। रात अँधेरी, पहर-पहर को भर दूं, किस स्वर से कुछ सोच नहीं पाता; सब कुछ भूले आकुल हूं मैं भूल कौन-सी है? (क्या जानूं मैं!)
पावस का प्रारंभ आषाढ़ मास के प्रथम दिवस से माना जाता है, जिससे उत्प्रेरित होकर संस्कृत के महाकवि कालिदास ने अपनी युगजयी कृति मेघदूतम की रचना की थी। वह आषाढ़ कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाधर्मिता को भी उत्प्रेरित करे, यह स्वाभाविक ही है। तदनुसार वर्षा की झड़ी के साथ ही परमात्मा की उपस्थिति की प्रतीति उनकी एक रचना में इस प्रकार शब्दायित हैः
आज गहन सावन-घन-प्रेरित चरणों से तुम आ धमके हो। नीरव रजनीवत् चुपके-से सब लोगों की दृष्टि बचाए। आज नयन मूंदे प्रभात है, पवन वृथा करता पुकार है, निलज नील आकाश ढंके यह सघन मेघ किसने प्रेरा है? कूजनहीन पड़ा है कानन, द्वार बंद हैं सभी घरों के; पथिक कौन तुम, भला, अकेले पथिक -शून्य पथ पर आ धमके! मेरे सखा, प्राणप्रिय मेरे! द्वार खुला है मेरा, देखो; स्वप्न-सरीखे होकर सम्मुख, मुझे उपेक्षित कर मत जाओ।।
स्पष्ट है कि वर्षा की झड़ी के साथ परमसत्ता की समुपस्थिति और उसमें अपनी संलिप्त की रहस्यात्मकता कविवर की काव्यकला की उत्कृष्टता है। इनकी एक अन्य रचना में कहा गया हैः
आज वारि लो झरता झर-झर भरे हुए मेघों से हैं; फोड़ गगन आकुल जल-धारा थमती नहीं कहीं भी है। शाल विपिन में दल के दल हैं मेघों से लग गई झड़ी; झूम-झूम मैदानों में है इधर-उधऱ वर्षा होती। जटा बिखेरे मेघों की यों कौन आज है नाच रही! अजी, खुला है मन मेरा यह लुटा झड़ी में हो जैसे ! वक्षस्थल-पूरित तरंग है पड़ती पांवों पर किसके? अंतस् में कलरव यह कैसा? खुला द्वार का पट ज्यों; हृदय-बीच जागा पागल-सा मास भाद्रपद में हूं यों! आज रात-भर बाहर ऐसा कौन मत्त हो रहा भला?
असीम परमसत्ता के साथ जीवात्मा का अद्वैत भाव भारतीय आध्यात्मिकता और दार्शनिकता का सार तत्व है। उस परम तत्व को अपने सखा, अपने बंधु के रूप में अभिकल्पित करते हुए कविवर रविन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा हैः
आज झड़ी की रात हुआ आगमन तुम्हारा हैः रोता है आकाश हतास्-सा, नहीं नींद है नयनों में मेरे; द्वार खोलके हे प्रियवर!बार-बार मैं तुम्हे निहार रहा। प्राण-सखा, हे मेरे बन्धु! बाहर कुछ मैं देख न पाता, सोचा करता हूं कि भला, पथ किधर तुम्हारा है! किस सुदूर सरिता के पार, किस दुर्गम जंगल के पास, किस गंभीर तमिसा होकर हो जाते हो पार, भला, तुम? प्राण-सखा हे मेरे बंधु!
सारांशतः पावस वर्णऩ के क्रम में परमात्मा के साथ एकात्मकता की सहज अनुभूति और उसकी सफल अभिव्यक्ति महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाधर्मिता की अभिनंदनीय विशिष्टता है।
हिन्दी और रवीन्द्रनाथ टैगोर (रवीन्द्रनाथ ठाकुर की 150वीं जयंती पर)
हमलोग सभी जानते हैं कि विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मातृभाषा बंगला थी। उनकी अधिकांश रचनाएँ बंग लिपि में ही मिलती है। उनके नाबेल पुरस्कार से विभूषित अंगरेजी काव्य-ग्रंथ गीतांजलि अथवा सांग्स आफ आफरिंग्स, उनके बंगला के गीतांजलि,खेया,नैवेद्य काव्य ग्रंथों से चयनित कवितओं के अंगरेजी अनुवाद हैं। इस पुस्तक की भूमिका डब्लू बी यीट्स ने लिखी थी और इस पुस्तक पर,रवीन्द्रनाथ ठाकुर को सन् 1913 ई. के साहित्य का नाबेल पुरस्कार मिला था। किंतु रवीन्द्रनाथ ठाकुर भारत में सर्वाधिक बोली जानेवाली हिन्दी भाषा एवं इसके साहित्य से भी अवगत थे। इसकी जानकी उन्हें आचार्य क्षितिमोहन सेन, पण्डित हजारी प्रसाद द्विवेदी आदि मनीषियों से प्राप्त होती रहती थी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने आचार्य क्षितिमोहन सेन द्वारा सम्पादित दादु ग्रन्थ की भूमिका में लिखा है- जब मैंने हिन्दी साहित्य के अपरिचित भंडार से काव्य के शुद्ध रूप को ढूँढना आरम्भ किया। वैसे समय में,मुझे एक दिन क्षितिमोहन सेन महाशय के मुँह से बघेलखंढ के कवि ज्ञानदास के कुछ पद सुनने को मिला। मैंने कहा- मिल गया । शुद्ध वस्तु है। बिल्कुल मूल्यवान वस्तु है। इससे बढ़कर कुछ हो ही नहीं सकता है। ज्ञानदास की रचना सुनकर मुझे अनुभव हुआ कि आजकल जिसे आधुनिक कविता कहते हैं! इसका परिचय इनकी कविताओं में मिलता है। ये सभी कविताएँ सर्वदा के लिए आधुनिक हैं।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने क्षितिमोहन सेन के सम्बंध में लिखा है-मैं क्षितिमोहन बाबू की कृपा से हिन्दुस्तान के अन्य दूसरो कवियों की रचनाओं से परिचित हुआ हूँ। इसमे सन्देह नहीं है कि एक समय हिन्दी भाषा में गीत साहित्य का आविर्भाव हुआ है,उसके गले में अमरसभा का वरमाल्य है। आज वह अनादर के कारण बहुत कुछ ढ़का हुआ है। इसका उद्धार करना आवश्यक है और ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे भारतवर्ष के जो लोग हिन्दी नहीं जानते हैं, वे लोग भी भारत के इस चिरंतन साहित्य को अपने उत्तराधिकार के गौरव का भागीदार हो ।
रवीन्द्रनाथ के उक्त कथन से स्पष्ट है कि वे हिन्दी के प्राचीन साहित्य से विशेष प्रभावित थे। इसका प्रमाण आचार्य क्षितिमोहन सेन द्वारा संकलित कबीर वाणी से एक सौ पदों का चयन करके, उन्होंने हण्ड्रेड पोएम्स आफ कबीर शीर्षक कबीर की रचनाओं का अंगरेजी अनुवाद, जिसका प्रकाशन सन् 1917 ई. में न्यू यार्क से मैकमिलन ने किया था। इस पुस्तक की भूमिका अंगरेजी भाषा एवं साहित्य के विद्वान एवेल्वीन अण्डरहिल ने लिखी थी। इस पुस्तक की विशेषता यह है कि रवीन्द्रनाथ ने कबीर के पदों का अंगरेजी अनुवाद करने से पूर्व रोमन लिपि मंे कबीर के पदों की एक पंक्ति शीर्षक में दे दी गई है। तत्पश्चात् उक्त पदों के आधार पर कबीर के पूरे पद का अंगरेजी में पद्यानुवाद है। रवीन्द्रनाथ के इस अनुवाद के सम्बंध आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है- कबीर की सौ कवितओं का जो अंगरेजी अनुवाद रवीन्द्रनाथ ने किया है, इसके माध्यम से उन्होंने हिन्दी साहित्य को नवीन चिन्तन की सामग्री ही नहीं दी, समस्त हिन्दी भाषी जनता को दप्त और तेजस्वी बना दिया है। मिश्रबन्धुओं के हिन्दी नवरत्न के प्रथम संस्करण में कबीर को कोई स्थान नहीं मिला था। रवीन्द्रनाथ ने कबीर का जब आदर किया तो द्वितीय संस्करण में कबीर को भी एक रत्न माना गया। रवीन्द्रनाथ ने हिन्दी के मध्यकालीन कवि कबीर,सूरदास,तुलसीदास आदि पर भी काव्य- रचनाएँ की हैं जो उनके कथा काव्य-ग्रंथ में संकलित हैं।
जिस प्रकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर हिन्दी के मध्यकालीन कवियों की रचनाओं से प्रभावित हुए थे, उसी प्रकार हिन्दी साहित्य के आधुनिक कवि मैथिलीशरण गुप्त,जयशंकर प्रसाद,सूर्यकांत त्रिपाठी निराला,सुमित्रानन्दन पंत,महादेवी वर्मा आदि भी उनकी रचनाओं से प्रभावित रहे हैं। रवीन्द्रनाथ ने बंगला में काव्ये उपेक्षिता शीर्षक से एक निबंध लिखा था। रवीन्द्रनाथ के इस निबंध से मैथिलीशरण गुप्त इतने प्रभावित हुए कि भारतीय साहित्य में उपेक्षित नारियों के आधार पर साकेत,यशोधरा,विष्णुप्रिया आदि जैसे काव्य-ग्रंथों की रचनाएॅ कर डाली । इन काव्य-ग्रंथों में युगों से उपेक्षित चली आ रही नारियों को,उन्होंने महिमा मंडित किया है। छायावादी कवि भी किसी न किसी रूप से रवीन्द्रनाथ से अवश्य ही प्रभावित रहे हैं। महादेवी वर्मा रवीन्द्रनाथ से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने पथ के साथी ग्रंथ में रवीन्द्रनाथ के प्रति हार्दिक उद्गार प्रकट किया है।
साधारणत: लागों की यह अवधारणा है कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर हिन्दी के राष्ट्रभाषा के पक्षधर नहीं थे। लेकिन यह अवधारणा गलत है। रवीन्द्रनाथ हिन्दी का प्रचार-प्रसार चाहते थे पर उनका ढंग अलग था। वे आचार्य क्षितिमोहन सेन की कार्य-पद्धति के पक्षधर थे कि हिन्दी में जो कुछ श्रेष्ठ रचना है, उसे भारत की प्रान्तीय भाषा-भाषियों के सम्मुख रखा जाए। वे हिन्दी के शुभचिन्तक थे। वे सर्वदा पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी को हिन्दी ग्रंथ के प्रणयन के लिए प्रेरित करते रहते थे। रवीन्द्रनाथ की प्रेरणा से ही सन् 1937 ई. में शान्तिनिकेतन में हिन्दीभवन की स्थापना हुई है। वे हिन्दीभवन के माध्यम से हिंदी में ठोस साहित्यिक कार्य होना, देखना चाहते थे। वे हिंदी भली भाँंति पढ़ और समझ लेते थे। किंतु हिंदी बोलने से सदा संकोच करते थे। पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी रवीन्द्रनाथ से अंगरेजी में बातचीत करते थे। उन्होंने चतुर्वेदीजी से कहा था - अंगरेजी में मुझसे क्यों बातचीत करते हो जब मैं हिंदी सीखना चाहूँ तो मुझसे हिंदी में बोला करो।
रवीन्द्रनाथ हिंदी के लेखकों से मिलने के लिए बहुत ही उत्सुक रहते थे। वे प्रेमचंद से मिलने के लिए बहुत उत्सुक थे। किन्तु किसी कारणवश एक दूसरे से मिल न सके। रवीन्द्रनाथ ने माखनलाल चतुर्वेदी एवं जैनेन्द्र से मिलने पर कहा था - मैं हिन्दी भाषी लोगों के निकट सम्पर्क में आने के लिए उत्सुक हूँ। यहाँ हमलोग संस्कृति- प्रचार के लिए जितना भी कुछ कर सकते हैं, कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि हिन्दी भाषी लोग यहाँ आवें,हमारे अनुभव में हिस्सा बटाएँ और अपने अनुभव से हमें लाभान्वित करें ।
रवीन्द्रनाथ हिन्दी गद्य के लचीलेपन से बहुत ही प्रभावित थे। उन्होंने चोखेर बालि उपन्यास के आँख की किरकिरी शीर्षक से प्रकाशित हिन्दी अनुवाद की भाषा बहुत ही प्रशंसा की थी। वे सहज-सरल एवं सजीव भाषा के पक्षधर थे। उन्हें कृत्रिम अर्थात् अलंकारमयी रचनाएँ पसन्द नहीं थी। उन्होंने बिहारी की रचनाओं के सम्बंध में कहा था- कुछ भी क्यों न हो, बिहारी सतसई जैसे ग्रन्थ मेरे लिए रुचिकर सिद्ध नहीं हुए, विशेषकर किसी-किसी दोहे के चार-चार पाँच-पाँच अर्थों के विषय में वाद-विवाद मुझे कुछ जँचा नहीं।
रवीन्द्रनाथ के नाबेल पुरस्कार मिलने के बाद, उनकी रचनाओं का हिन्दी अनुवाद होना आरम्भ हुआ है। उनकी रचनाओं का सबसे अधिक अनुवाद गीतांजलि एवं कथा-साहित्य का हुआ है एवं अभी भी हो रहा है। रवीन्द्रनाथ की 125वीं वर्षगाँठ के अवसर पर दिल्ली के हिन्द पॉकेट बुक्स एवं सरस्वती विहार ने तेरह खण्डों में रवीन्द्र ग्रंथावली शीर्षक से उनकी रचनाओं का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किया है । किन्तु इन तेरह खण्डों में केवल रवीन्द्रनाथ के कथा साहित्य को ही अधिक लिया गया है। उनके निबन्ध जो आज भी प्रासंगिक हैं,उन पर किसी ने ध्यान नहीं दिया है। यही नहीं कापीराईट की अवधि के समापन के बाद भी रवीन्द्रनाथ की जितनी रचनाओं का हिन्दी अनुवाद भिन्न-भिन्न प्रकाशक,प्रकाशित कर रहे हैं,वे अधिकांशत: उनकी गीतांजलि एवं कथा-साहित्य का ही अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं। इसी प्रकार साहित्य अकादमी ने भी रवीन्द्र संचयन शीर्षक से रवीन्द्र जन्म शती के अवसर पर प्रकाशित,उनकी रचनाओं का पुनर्मुद्रण ही प्रकाशित किया है।
इस प्रकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर हिन्दी साहित्य के रचनाकारों की गतिविधियों से परिचित थे। उन्होंने पण्डित हजारी प्रसाद द्विवेदी को हिन्दी साहित्य के विकास के लिए प्रेरित किया था। शान्तिनिकेतन में हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए हिन्दीभवन की स्थापना की। हिन्दी के लुप्त साहित्य के पुर्नोद्धार के लिए आचार्य क्षितिमोहन सेन को प्रोत्साहित किया।
रॉयल होटल के चौराहे पर टैम्पो की प्रतीक्षा करते हुए भी मस्तिष्क में बिगड़े हुए रिकार्ड की तरह बस इतना ही घूम रहा है...कोई अच्छी सी कहानी दीजिए, कोई अच्छी सी कहानी दीजिए, कोई.....। इसी तरह जब मैं मुंशीपुलिया चौराहे पर खड़ी थी तो मस्तिष्क एक ही रट लगाए था, प्रांशु बिना खाना खाए सो गया, प्रांशु बिना खाना खाए सो गया, प्रांशु....। मैं जिस टैम्पो में बैठी उसमें पहले से ही सात सवारियां बैठी थीं। जिनमें से दो सवारियां तो ऐसी थीं जिन्हें एक-एक गिनना मेरे विचार में अन्याय ही है। हर सवारी का किराया बराबर होता है पर भार नहीं, भार और आकार का सम्बन्ध तो स्पष्ट ही है। बस यूं समझिए मैं मोटा-मोटी के बीच घिसते-पिसते ही मुंशीपुलिया तक बापस पंहुची। घर पहुंच कर मुझे अनुभव हुआ कि तीन घंटे और आठ रूपये खरचा करके जो मैं खरीद कर लायी वह है, कोई अच्छी सी कहानी दीजिए, कोई अच्छी सी कहानी दीजिए, कोई.....यह चकरघिन्नी। कल भी तो मेरी एक कहानी छप कर आयी थी। शाम को तथाकथित मित्रमण्डली उपस्थित। ”बघाई, बधाई, बधाई“। कहानी न छपी जैसे कि हवेली खड़ी कर ली हो मैंने! ”हो जाएं पकौड़े-वकौड़े।“ जवाब में पकौड़े भी हो गये, चाय के साथ चुई भी और वाय भी। बाद में हिसाब लगाया मात्र अड़सठ रूपये खर्च हुए। कहानी को लिखने-भेजने में खर्च आया था नौ रूपये। पांच-छः महीने बाद कहीं पारिश्रमिक मिलेगा डेढ़ सौ रूपये। मित्रमण्डली के हटते ही प्रांशु-प्रत्यूष ने घेर लिया ”मम्मी आपकी कहानी छपी। अपने बच्चों को गिफ्ट तो देंगी न!“ औलादें तो मां के गालों पर एक-एक पप्पी धर कर ही उसे खरीद डालती हैं, पर बेचारी मां क्या करे बच्चों को कैसे समझाए कि पारिश्रमिक तो मिलेगा छः महीने बाद। तैंतालीस रूपये झटक गये बच्चों को खुश करने में। याने कि कल की कहानी ने कल ही एक सौ बीस रूपये हल्के करवा लिए और जब डाकिया उसका पारिश्रमिक मुझे सौंपेगा तो दस रूपये वह हल्के करवा लेगा! बाकी बचेंगे बीस रूपये उससे अगली कहानी लिखने के लिए कागज कलम और डाक टिकट खरीद लूंगी। चलिए फाकामस्ती तो साहित्यकार का मौलिक गुण होता है या कहिए कि जन्मसिद्ध अधिकार, बात समझ की है जैसे भी समझिए। एक प्रतिष्ठित पत्र में डेढ़ दर्जन लेख-कहानियां भेजे थे जिनमें छः रचनाएं छपी हैं बाकी दर्जन भर गायब। कुल मिलाकर निष्कर्ष ‘व्यवस्था ठीक नहीं है’। व्यवस्था कौन और कब सुधारेगा राम जाने। शायद ‘यदा-यदा हि धर्मस्य’ के अन्दाज में कोई अवतार लेगा तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
एक-एक कहानी के लिए आ बैल मुझे मार कहावत को जीना होता है। उन स्थितियों को देखने-समझने, उन अनुभूतियों को अपने में गहराई तक उतार लेने के लिए, जिन पर लिखना है उन पात्रों को अपने में समा लेने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे, क्या-क्या झेलना पड़ेगा यह तो पहले से खुद को भी पता नहीं होता है। एक कहानी पकने तैयार होने में कितना समय लेगी यह भी निश्चित नहीं और आर्थिक दृष्टि से तो हमारा गणित हमेशा ही हासिल पाया शून्य पर अटका रहता है।
जब दैनिक पत्रों ने साथ में पत्रिका भी छापनी आरंभ की थी वे बड़े आशा भरे दिन थे। लगता था अब कम से कम मसिजीवी कहलाने की स्थिति बना ही लूंगी। एक टाइप राइटर खरीदने योग्य पूंजी जुट जाय साथ में एक मेज-कुर्सी बस दिन बहुर जाएंगे। पर रचनाएं घूरे में ....दिन क्या बहुरेंगे! गृहस्थी की बारीक पिसाई जैसा काम जिसका स्पष्ट ब्यौरा नहीं दिया जा सकता, साथ में लेखन और सामाजिक कार्य। कुल मिलाकर जीवन की चादर इस तरह तन गयी है कि लगता है कि किसी भी पल कहीं से भी फटकर चिथड़ा हो जाएगी। कुल परिचय क्षेत्र के एक तिहाई लोग कहते हैं कि मुझे केवल घर देखना चाहिए, दूसरे फालतू कामों में मैं अपना स्वास्थ्य चौपट किए दे रही हूं। दूसरे एक तिहाई कहते हैं कि मुझे केवल लिखना चाहिए जाहिलोंे की तरह निरर्थक कार्य नहीं करने चाहिए। शेष एक तिहाई कहते हैं कि काम तो वही है जो समाज के लिए किया जाय, यूं अपने लिए तो सभी जी लेते हैं। हर मत के कुछ-कुछ लोग ऐसे भी हैं जो शारीरिक दृष्टि से दुपाये और कार्यभार की दृष्टि से तिपाये इस प्राणी को चौपाया घोषित करने की ही फिराक में रहते हैं। छोड़िए यह प्रसंग भी, अभी तो मांग ‘एक अच्छी सी कहानी’ की है। यूं तो इस माह में इस अच्छी सी कहानी के अतिरिक्त चार और जगह से कहानी की मांग हुई है, किंतु मांगने वाली सभी लघु पत्रिकाएं हैं। लघु पत्रिकाएं, जिनकी स्वयं ही स्थिति डायलिसिस पर पड़े रोगी की तरह है वे इस घोर भौतिकवादी युग में भी लेखक को क्या दे सकती हैं सिवाय धन्यवाद पत्र और लेखकीय प्रति के? लेखक को भूख न लगे कम से कम इतना नया आविष्कार तो वैज्ञानिकों को करना ही चाहिए। सरकार ऐसी कोई दवा बनवाकर वितरित क्यों नहीं करवाती कि एक गोली खा लो तो साल भर तक रोटी, सब्जी, दाल, भात कुछ याद ही न आए, मुंह से लम्बी सांस खींचो पेट में हवा भर जाय बस छुट्टी! यह पेट का लाक्षागृह न होता तो जीवन लक्ष्य को ही समर्पित हो सकता था। पर सपने देखकर तो समस्याएं हल नहीं होतीं न!
घड़ी घूर रही है। रात के साढ़े ग्यारह बज गये हैं। फिर रिकार्ड बजते-बजते सुई अटक गयी है कोई अच्छी सी कहानी...कोई अच्छी सी कहानी...कोई....।
बच्चों को हर रात एक नयी कहानी चाहिए...‘कोई अच्छी सी कहानी सुनाओ मम्मी’। दाएं-बाएं सटकर रोज फर्माइश करते हैं वे और कहानी आप ही फूट पड़ती है....एक परी थी ...नन्हीं सी प्यारी सी छोटी सी....। एक चिड़िया थी मीठे-मीठे गीत गाती थी...। एक तितली थी अपने रंगीन पंखों को फहराती हवा में लहराती थी बाग-बाग घूमती थी....। मनुष्य कितना भी बड़ा हो जाय, बूढ़ा हो जाय, उसका बचपन उसके व्यक्तित्व में कुछ न कुछ अंश में विद्यमान रहता ही है। रहना भी चाहिए। परंतु इस समय कहानी की मांग बच्चों की नहीं है। वे तो ढाइ घंटे से सो रहे हैं। यह मांग तो उसी प्रतिष्ठित दैनिक पत्र के साहित्य संपादक की है जहां मेरी दर्जन भर रचनाएं....। ”क्या आपको एक भी नहीं मिली?“ मेरे यह पूछने पर संपादक महोदय दार्शनिक मुद्रा में छत को निहारते रहे थे। शायद इसका यह अर्थ हो कि ऊपर वाले पर भरोसा रखो, या ऐसा कि ऊपर वाला जाने, या कि शायद वे कहना चाहते हों कि सब नश्वर है मिट्टी से मोह मत करो या कि शव्द अनश्वर है निराकार है उसे आकारों में मत बांधो। चूंकि कहानी अंक विशेष के लिए चाहिए थी, अतः मैंने पूछा ”कहानी का फ्रेम या विषय वगैरह कुछ तय है क्या?“ ”नहीं ऐसा कुछ नहीं बस ज्यादा लम्बी न हो।“ फिर मैं दर्जन भर रचनाओं की बात परे धकेल कर ही बाहर निकल आयी थी। साथ में थी यह ‘अच्छी सी कहानी’ ‘अच्छी सी कहानी’ की घुमड़न।
सहसा एक बड़े लेखक का कथन याद आया कि कहानियां लीक से हटकर जीने वालों की होती हैं। सद्गृहस्थ लोगों की कोई कहानी नहीं होती है। पूरे मुहल्ले के लोगों पर दृष्टिपात करती हूं। सबके सब सद्गृहस्थ! अब लीक से हटकर जीने वाले को कहां से ढूंढकर लाऊं? अचानक याद आता है इस संपादक की पहली पत्नी गांव में है। यहां शहर में इसने एक नौकरीपेशा कवयित्री से दूसरी शादी की हुई है। बिना पहली पत्नी को तलाक दिए ही! ...लिख डालूं इस लीक से हटकर जीने वाले संपादक की कहानी? पर जल में रहकर मगर से बैर!!
वैसे तो मानव जीवन के आरम्भ के साथ ही कहानी आरम्भ हो गयी थी और जब तक ‘मनुष्य’ रहेगा कहानी भी रहेगी, विषय सर्वत्र बिखरे हैं, एक-एक मनुष्य के जीवन में लाखों कहानियां हैं, तब भी कभी-कभी जाने कैसा सन्नटा छा जाता है....घेर लेता है अभिव्यक्ति की निरर्थकता का सन्नाटा...! भाई लोग कहते रहते हैं अपने अनुभवों के आधार पर लिखो, भोगा हुआ यथार्थ कब काम आएगा, इससे लिखना कठिन भी न होगा और कहानी पाठक को बिल्कुल अपनी सी ही लगेगी। घड़ी रात के डेढ़ बजा रही है। बिजली का बिल आएगा तो...? तो शायद मेरे लिए एन्जाइना का दर्द भी लेकर आएगा और यहां समस्या है कि ज्यों की त्यों....! कोई अच्छी सी कहानी, कोई अच्छी सी कहानी की आवर्तिता ....! कहानी के कई प्लॉट मस्तिष्क में हैं पर उन्हें अच्छी सी कहानी बना देना मेरे बस की बात नहीं। तब भी चलो कहानी आरंभ करती हूं परियों की नहीं इन्सानों की.... ”एक लड़की थी। उसकी एक अच्छी सी मां थी, एक अच्छे से पिता थे, एक अच्छा सा भाई था। वह लड़की जब छोटी थी तो स्कूल जाती थी, जब बड़ी हुई तो कॉलेज जाने लगी। तब वह और बड़ी हुई तो एक अच्छे से लड़के से उसका विवाह हो गया। फिर उसके दो अच्छे-अच्छे प्यारे-प्यारे बेटे हुए...
मुझे विश्वास है यह कहानी अच्छी बन रही है क्योंकि एक लड़की दो लड़कों को जन्म देती है, एक भी लड़की को नहीं। नारीवादियों को कोई शिकायत का मौका नहीं दे रही है कि कन्या भ्रूण हत्या, कन्यावध, या कन्या को जन्म देकर उसका उपेक्षापूर्ण ढंग से पालन-पोशण जैसा कुछ हुआ...। हां तो वह लड़की...क्षमा करें, वह स्त्री अपने प्यारे-प्यारे बेटों को पालती रहती है, पालती रहती है....किसी को उससे कोई शिकायत नहीं, उसको किसी से कोई शिकायत नहीं....। फिर? ....शिकायत नहीं फिर...? आगे....उसका अपना अस्तित्व? अपनी पहचान?....
लगता है कहानी लम्बी हो रही है। अभी तक सम्पादक जी की एक ही बात मस्तिष्क में थी कि कहानी अच्छी हो, अब दूसरी बात ठकठकाने लगी है.....ज्यादा लम्बी न हो... ज्यादा....। ठीक भी है, कहानी ज्यादा लम्बी होगी तो जाने क्या-क्या उघाड़ती जाय....फिर कहानी अच्छी कहां रह जाएगी? एक औरत जिन्दा जलाई नहीं गयी, उसे औरत होने के लिए दण्डित नहीं किया गया, इससे अच्छी और क्या कहानी हो सकती है? चलिए यहीं समाप्त कर देते हैं एक अच्छी सी, छोटी-सी कहानी को ।
सावन का महीना और विश्वनाथ गली की वह भीड़ भरी उमस--श्रृद्धालु भक्तों के गँगा-नहाए पैरों की कीचड़ में लथपथ, बेहद सनी-पुती और चिपचिप। किसने कहा था निवेदिता से कि यहाँ आए और वह भी किसी और दिन नहीं, सोमवार के दिन। ऐसा वैसा सोमवार भी नहीं, सावन का पहला सोमवार; जब भगवान के साथ-साथ चोर-उच्चकों का भी भोग लगता है यहाँ पर! खुद को ही बारबार कोसती- सम्भालती, गली के एक सिरे से दूसरे तक उमड़ती भीड़ के धक्के खाती, वह आखिर अपनी प्रिय चूड़ियों की दुकान के आगे पहुँच ही गई ---बिना एक कदम चले, बिना किसी प्रयास के । और सबसे विशेष बात तो यह थी कि बिना किसी दुर्घटना के। यह बात नहीं है कि निवि यह सब जानती नहीं थी, समझती नहीं थी। पूरा बचपन गुजारा है उसने इसी शहर में-- आँखें खोली हैं इसी धरती पर। ड्राइवर दुर्गा ने भी तो बहुत समझाने की कोशिश की थी-आज नहीं बिटिया रानी, आज रहने दो। पर निवेदिता के पास समय ही तो नहीं था, एक और कल ही तो नहीं था। कल तो फिर हमेशा की तरह उसे दूर, बहुत दूर ले जाएगा और फिर उसके अपने ये लोग, अपना यह शहर, ये खट्टी-मीठी यादें, सब बस एक धुँधला-सा सपना बनकर ही तो रह जाएँगीं, दूर कहीं अटकी, एक और ऐसी-ही सुबह के इँतजार में। और निवेदिता वहाँ विदेश में बैठी पूरे साल भर तक फिर बस बाट जोहती ही तो रह जाएगी।...
"आओ दीदी, क्या बात है अबकी बार बहुत दिनों बाद आईं", देखते ही दुकानदार गद्दी से ही चहक कर बोला-'जा मोहन, दीदी के लिए एक ठंडा तो ले आ।' " नहीं-नहीं रहने दो मैं अभी मिश्राजी के यहाँ से ठँडाई ही पीकर आ रही हूँ। तुम बस जरा अपनी सबसे अच्छी चूड़ियाँ और बिन्दियाँ दिखा दो।" " ला चल, अच्छा जरा वह कलकत्ते वाला नया माल निकाल---दीदी भी क्या कहेंगी-" दुकानदार ने मुँह की पीक को उँगलियों से पोंछते हुए लड़के के सर पर हलकी सी चपत जमा दी, बिल्कुल वैसे ही जैसे सवारी को आता देखकर ताँगे वाला आराम करते घोड़े को हलके से थपथपा देता है। चूड़ियाँ क्या, एक मायाजाल थीं। सुनहरी, रुपहली, चमकती-खनकती। निवी को पहनने से भी ज्यादा इन्हें जमा करने का शौक था। वैसे भी, वहाँ इँगलैंड में कहाँ इतना यह सब मिल पाता है। हमेशा की तरह आज भी यह बनारस से जाते-जाते निवि की आखिरी खरीददारी थी।
इसके पहले यँत्रवत् वह वह सब कर चुकी है जो हर साल ही करती है- घाट पर चुपचाप बैठकर हमेशा की तरह याद करना कि किस-किसको यहाँ पर खोया; नहीं, शायद अकेले छोड़ा ? और फिर अकेले ही चुपचाप मल्लू की नाव में बैठकर घूमना---मझधार में जाकर जलती चिताओं को घँटों घूरना और यूँ ही सोचते रह जाना-- कैसा होगा यह-- कौन होगा---जाने किस-किस से बिछुड़ा होगा-- आदमी, औरत-- बच्चा, बूढ़ा? जाने कितनों को असहाय छोड़ा होगा इसने भी--न जाने कौन-कौन बिलख रहे होंगे इसके लिए भी-- और अन्त में उस हठी सोच का, हमेशा की तरह वहीं, उसी एक बिन्दु पर आकर मचल जाना---बारबार याद दिलाना---देख निवि, तेरे मम्मी-पापा भी यहीं, ऐसे ही धुँए-धुँए तिरोहित हुए होंगे--इसी घाट पर---अपनी निवी को आखिरी बार बस देखने भर के लिए तरसती आँखों से भटकते हुए। ढूँढ निवि, ढूँढ, इस मिट्टी में, इस हवा में और इस गँगा के मटमैले पानी में--शायद अब भी वहाँ कहीं कोई तेरा इँतजार कर रहा हो? मौत में इतनी ताकत नहीं होती जो सबकुछ मिटा दे---कुछ न कुछ तो रह ही जाता है-- आहटों, आवाजों और सपनों में छुपा हुआ। और फिर हमेशा की ही तरह अँत में मल्लू का उतावला होकर पूछना--
" चलें बिटिया सूरज तड़क आया है-?" और निवी का चुपचाप वैसे ही, हाँ, काका- कहकर वापस लौट आना।
दीन दुनिया से बेखबर अपनी ही सोच में डूबी निवि यँत्रवत् चूड़ी के डब्बे पर डब्बे छाँटे और पलटे जा रही थी। बड़ी लगन से एक-एक छाँटकर वह बिन्दियों की तरफ मुड़ी ही थी कि पीछे से बुर्के में से आवाज आई-
" यह लो पैसे और यह सभी पैक करके मुझे दे दो।"
निवी अपने कानों पर विश्वास न कर सकी-- ' कौन है यह ? वह जो घँटे भरसे इस सड़ियल गर्मी में चिपचिप खटी है--सड़े फूलों, कीचड़ और पीक व पसीने की भभक में नहाई है उसका क्या होगा ? '
पलटकर मुड़ी, ' देखूँ तो सही, यह अभद्र देवीजी आखिर हैं कौन ? '
" पर बहनजी यह चूड़ियाँ तो इन्होंने पसँद कर ली हैं। आप दूसरी पसँद कर लीजिए-- एक से अच्छा एक माल है।"
दुकानदार ने उसकी उलझन और परेशानी को अपनी व्यापार-कुशल विनम्रता में लपेटकर बुरकेवाली के आगे पेश कर दिया। वह जानता था कि औरतों में अक्सर-ही ऐसा ही होता है। जो चीज एक को पसँद आती है, दूसरी को भी निश्चय ही, वही पसँद आती है-- चाहे चूड़ियाँ हों या साड़ियाँ। यह तो उसकी रोज की ही समस्या थी। वह जल्दी-जल्दी कागज में चूड़ियों को लपेटकर आँखों के आगे से ओझल करने लगा।
" नहीं मुझे तो यही चाहिएँ।"
बुरके वाली औरत की आवाज में एक हठ, एक आग्रह था। स्तँभित निवि कुछ भी कह पाए इसके पहले ही वह दुराग्रही अपरिचिता खुद ही बोल उठी -
" परेशान क्यों हो रहे हैं आप, इसी के लिए तो खरीद रही हूँ मैं भी यह सब।"
निवेदिता विश्वास न कर सकी--' कौन है यह जो उसपर इस तरह से मेहरबान है, अधिकार जता रही है? माना पूरा बनारस ही अब उसे अपने कुनबे जैसा लगता है, पर यह तो हद ही हुई जा रही है- वह भी बीच बाजार में- यूँ, इस तरह से? '
धड़कते दिल से पीछे मुड़कर एकबार फिर ठीक-से देखा उसने--आवाज कुछ पहचानी हुई सी थी--कौन हो सकती है यह--- कहीं रिज्जू तो नहीं, रिज्जू -यानी कि उसके बचपन की सहेली रिजवाना शेर। उसकी कॉलेज के दिनों की सबसे मस्तमौला, सबसे सीधी, सबसे पगली सहेली। हाँ वही बदामी बड़ी-बड़ी हिरणी सी भोली और कटीली आँखें बार-बार उसके असमँजस पर मुस्कुरा रही थीं। बुरके की काली जाली से झाँक-झाँककर अपनेपन का नटखट इजहार कर रही थीं।
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यूँ तो हरसाल ही बनारस में घूमते-फिरते, सामान खरीदते निवेदिता ने अक्सर सोचा था कि उसकी सब सहेलियाँ आखिर कहाँ गायब हो गईं? कोई दिखती क्यों नहीं ? मिलती क्यों नहीं? पर यूँ चूड़ियाँ खरीदते-खरीदते अचानक ही रिज्जू का इसतरह से मिल जाना-- उसने तो सपने में भी नहीं सोचा था-- दिल बल्लियों उछलने लगा। पुरानी यादें बरसाती बाढ़ सी मन को डुबोने लगीं। दौड़कर सहेलियों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया। शायद दोनों के ही भावावेश में काँपते शरीर को सहारे की बहुत जरूरत थी। " कहाँ थी तू अबतक-- ऐसे गधे के सिर से सींग की तरह कैसे और कहाँ गायब हो गई थी?" दोनों की ही खुशी और जुबाँ एक-सी ही थी। दोनों ने ही हँसते-रोते, आँसू पोंछते एक साथ शिकायत की और फिर दोनों ही जवाव देने की बजाय खिलखिलाकर हँस पड़ीं। दोनों के ही सवाल खुद ही जवाब बनकर उँगली पकड़े-पकड़े उन्हें बीस साल पुरानी यादों की गलियों में ले चले। शब्दों और यादों में होड़ लग गई, देखें अब कौन पहले वहाँ तक पहुँचता है।
" अच्छा तो यह जमाना आ गया है-- खुद बिना बताए चुपचाप शादी कर ली। पराए वतन में जा बसीं और शिकायत कर रही है-- सचसच बता क्या तुझे नहीं लगता कि शिकायत मुझे करनी चाहिए ?"- रिजवाना की आँखों में प्यार भरा उलाहना था। " चल कहीं बैठकर आराम से बातें करते हैं। "
गल-बहियाँ डाले सहेलियाँ चल पड़ीं-- आसपास कहीं बैठने की जगह ढूँढती हुई।
दोनों ही ग्राहकों को यूँ बिना कुछ खरीदे बगैर ही जाते देख दुकानदार घबरा गया, बोला-- " दीदी इन चूड़ियों का क्या करूँ ? " दोनों ही बातों में मगन हो चुकी थीं। की हुई खरीददारी का किसी को भी होश नहीं था अब। " हर पैकेट के दो-दो पैकेट बना दो। जो तुम्हारे पास न हों, उन्हें आधी-आधी कर दो। दुर्गा बस अभी आकर सब ले जाएगा।" उत्साह और प्यार से खनकती आवाज में निवेदिता पलटकर बोली और फिर बिना जबाब का इन्तजार किए, चल भी पड़ी। दुकानदार फिर से एक-एक करके सब बन्द पैकेट खोलने लगा। उचक-उचककर मैचिंग जोड़ियाँ ढूँढने लगा। इसबार उसे यह फालतू की मेहनत कतई नहीं खल रही थी। आखिर निवी जैसे खरीददार रोज-रोज तो नहीं ही आते। " तो यह दुर्गा क्या अभी तक है तुम्हारे यहाँ?" रिज्जू ने आश्चर्य के साथ पूछा। " यह वही दुर्गा है न जो हमेशा तेरे साथ रहता था जीप पर---वही दुर्गा है न, जो घँटों दरगाहों और दरख्तों पर धागे बाँधता, औलाद के लिए दुआएँ माँगता, मारा-मारा फिरा करता था ?" " हाँ-हाँ, वही दुर्गा। तुझे तो अभी भी बहुत कुछ याद है। अब बुढ़ापे में बिचारा कहाँ जाएगा-- पर हाँ इसके यहाँ कभी कोई बच्चा वगैरह नहीं हुआ, पर अभी भी यह बस बच्चों की ही ड्यूटी करता है। उन्ही को अपने बच्चे समझता है। यह भी खुश है और घरवाले भी। इसे बच्चे मिल जाते हैं और घरवालों को एक जाना-पहचाना भरोसे-मँद, जिम्मेदार, समझदार गार्जियन-- ड्राइवर तो कहीं भी कई मिल जाएँगे, पर इसके जैसा अपना समझने वाला नहीं।" " अच्छा मार गोली दुर्गा को। तू सुना तेरे क्या हाल-चाल हैं? कहाँपर तेरी ससुराल है--कितने बाल-गोपाल हैं और हमारे जिज्जू मियाँ कैसे हैं--तेरा कितना ख्याल रखते हैं --हमसे कब मिलवा रही है उन्हें तू ?
उत्साहित निवेदिता सवाल पर सवाल पूछती चली गई बिना रुके और देखे कि रिजवाना का चेहरा बुझ गया था, काली बदलियों से घिर आया था--- " चल, घर नहीं चलेगी तू--अब भी पास ही में, उसी पुराने अब्बू के घर में ही रहती हूँ मैं---सबसे खुद ही मिल लेना। मैं जानती हूँ कि आज भी तू अपने जीजू से मिलकर बहुत खुश होगी क्योंकि तू उन्हें अच्छी तरह से जानती है।" रिजवाना निवि के लिए अनबूझ पहेलियों की गुत्थी बनती जा रही थी। "क्यों नहीं - होना भी चाहिए। आखिर साली हूँ उनकी।" रिजवाना की बुझी आँखों में झाँकते हुए सँभावित तूफान से डरी निवेदिता सहमे गले से बोली। घर ज्यादा दूर नहीं था। वहीं पुलिस थाने के पीछे, चौक के पास ही तो रहती थी रिजवाना। कुछ नहीं बदला था। वही पतली मोड़दार गलियों कि भूल-भुलैया से निकल कर निवी आज बीस साल बाद फिर से उसी आँगन में खड़ी थी और गुजरा कल यादों के पँख लगाकर पक्षी सा सामने उतर आया था। आगे एक साफ-सुथरे पलँग पर मौसीन लेटा हुआ था। हाँ वही मौसीन। उनकी कक्षा का कवि और शायर मौसीन --लड़कियों की साड़ियों पर, पल्लुओं पर हँस-हँसकर शायरी लिखनेवाला, शरारती मौसीन। हर ईद पर डब्बे भर-भरके केवड़े और गुलाबजल की खुशबू में डूबी सेवियाँ बाँटने वाला मौसीन। उसके वे मासूम शेर तो आजतक निवि की तनहाइयाँ गुदगुदा जाते हैं पर आज वह दौड़कर आगे नहीं आया। बस वहीं लेटे-लेटे ही चहका--वही शरारती मीठी-मीठी चुटकियाँ लेते हुए--- " वल्लाह, आज तो हमारी नन्ही किरन पूरा गोल-मटोल आफताब बनकर देहलीज़ लाँघ आयी है।" " देखो मौसीन, इस उमर में तो सुधर जाओ। क्यों अब भी पिटने की ख्वाइश पर ही जिन्दा रहते हो?"
निवि ने भी उसी उत्साह से बिछुड़ी हुई मित्र-मँडली का स्वागत किया। पर लंगड़ी वह खुशी ज्यादा देर तक टिक न सकी, उत्साह की बैसाखियों पर दौड़ न सकी। एक दर्दीला अपाहिज अहसास दोनों बाँहें फैलाए निवि की अगवानी में पूरी हिम्मत के साथ आगे खड़ा था।
" अब देखो ना निवि, तुम्हारी सहेली के प्यार ने कितना निकम्मा कर दिया है मुझे--पलँग से ही नहीं उतरता मैं तो। " बच्चों-सी सहजता से मौसीन ने आसपास घिर आई उदासी को तोड़ना चाहा।
" कब मौसीन---आखिर कैसे ? किसकी नजर लग गई इस खुशमिजाज खूबसूरत जोड़े को?"
प्रश्नों के अजगर निवि के चारो तरफ मुँह बाए खड़े हो गए और सारी पीड़ा को झट बँद पलकों में छुपे आँसू सा समेटकर निवि ने स्वागत में मुस्कुराते हुए मौसीन को गले से लगा लिया।
" तो अब तो शहँशाह ने तलवार की जगह फिर से कलम उठा ली होगी। बस फरमान पर फरमान ही लिखते होंगे-? मजाक किनारे, सच-सच बताओ मौसीन यह सब कब और कैसे? "
निवि और खुशी का मुखौटा पहने नहीं रह सकी।
"या खुदा अभीभी वही उतावलापन। तुम लड़कियों में कभी बुजुर्गियत और ठहराव आता भी है या नहीं। पच्चीस साल में लिखा यह जिन्दगी का रिसाला पाँच मिनट में ही कैसे सुना दूँ मैं अब तुम्हें। बयानगी के लिए हर साल को कम-से-कम पाँच-पाँच मिनट तो दो।"
मौसीन सहज हो कर बोला।
उसके बाद जो कुछ उस भावुक शायर, कर्मवीर की जुबाँ से निकला, गर्म चाय की प्यालियों के साथ भी उसके ज़हन में जमता चला गया। दर्द की उन उघड़ती परतों ने निवि को दुनिया के वे सब घिनौने चेहरे दिखा दिए, जिनकी घृणा और हवस में हर सच्चे और क्रान्तिकारी का, स्वप्न-दृष्टा का, बस वही हाल होता है जो मौसीन का हुआ। पर निवि भी एक-के-बाद-एक, मौसीन का सारा दर्द अपने अन्दर समेटती चली गई। एक अच्छी सहेली की तरह उसे उनकी हर पीड़ा की साझेदारी चाहिए थी।
" याद है निवि, जब हमने मिलकर बहुत सारे कार्ड बनाए थे।"--मौसीन कहे जा रहा था-" मोर्चे पर लड़ रहे जवानों की मदद के लिए। और फिर उन पैसों को जमा करके अपने हाथों से शास्त्रीजी को दिया भी था ?" " हाँ-हाँ।" उन गमकती यादों में डूबी निवी बोली- " और फिर वहीं बस-स्टौप पर तुमने अपनी वह कविता भी तो सुनाई थी मुझे। " निविने याद आजाने के उत्साह में बात बीच में ही काटकर पूरी कविता ही दोहरा दी---
" सुबह के बजे आठ थे, सजे-बजे उनके ठाठ थे
इठलात बलखाती चली जा रही थीं
मैने आहें भी भरीं इशारे भी किए
पर जालिम ने मुड़कर नहीं देखा
क्या रोडवेज की बस थी
नहीं-नहीं कॉलेज गर्ल थी।
निवि की आवाज में आज भी वही पुरानी बच्चों-सी पुलक थी। " सच निवी, इतनी ज्यादा याद हैं तुम्हें, हमारी वे नादानी की दास्तानें। क्या इतना याद करती थीं मुझे ? फिर कभी खत वगैरह क्यों नहीं लिखा? हाँ ! उसी दिन शुरु हुआ था मेरी जिन्दगी में आजतक चल रही इस जिहाद का कभी न खतम होने वाला यह खतरनाक सिलसिला और मेरी जिन्दगी अजीबो-गरीब शर्तों में बाँट दी गई थी। उस दिन बस से उतरते ही, वहीं, अपनी ही गली की मोड़ पर मुझे अगुआ कर लिया गया था, वह भी आँख पर पट्टी बाँधकर। फिर पूरे एक हफ्ते उस बन्द अँधेरे कमरे में मैं सोचता रह गया-- कौन हैं यह लोग और क्या चाहते हैं आखिर मुझसे? मेरा कसूर क्या है आखिर --इनका मकसद क्या है ? मैं तो कोई रईसजादा भी नहीं जो मेरे एवज में इन्हें कोई मोटी रकम ही मिल जाए--फिर मैं यहाँ पर, इसतरह से कैद क्यों ?" " उन अँधेरों में बँद मेरी सोच घुलती रही। आँसू बन-बनकर बहती रही। पर साफ और खुलासा कुछ भी नहीं हुआ। पूरे हफ्ते यूँ ही बन्द रहने के बाद मेरी पेशी हुई। और बिना किसी दलील के मुझे खबरदार करके तुरँत छोड़ भी दिया गया। फिर कोई ऐसी-वैसी हरकत की तो मार दिया जाएगा--नहीं उससे भी बद्तर, लूला-लँगड़ा करके छोड़ दिया जाएगा-- ऐसी जाने कितनी हिदायतों के साथ। देख तो नहीं पाया कि वे लोग कौन थे, पर आवाजें बहुत ही ज्यादा पहचानी हुई थीं। बिल्कुल अपने मौलाना जैसी, कुनबे वालों जैसी। पर, निवि आजतक मैं सोच नहीं पाया कि ऐसी-वैसी से उनका मतलब क्या था? जहाँतक मुझे मालूम है मैने कभी कोई गिरी हरकत नहीं की है। इश्क तक भी तो देखो बस एक अपनी बीबी के साथ ही किया है। तुम्हारी सहेली इसकी गवाह है।"
मौसीन ने उदासी के माहौल पर एक और मजाक का नाकाम मुल्लमा चढ़ाना चाहा।
" पर जाने क्यों निवि, उसके बाद हरपल ही मुझे लगने लगा कि कोई मुझपर निगरानी रख रहा है। पीछा कर रहा है मेरा। और इससे मेरे इरादों में थोड़ी और फौलादी सख्ती आ गई। धधकती वादी सा मेरे अन्दर भी एक नाइँसाफी का ज़ज़बा सुलगने लगा। जीवन के इस धर्मयुद्ध में कौरव-पाँडवों की तरह दोनों तरफ मेरे भी अपने ही खड़े थे और मुझे भी बस सच का ही साथ देना था, क्योंकि चाहे भगवान कहूँ या ईशू, धर्म का साथ न दूँ तो बदनाम तो हरहाल में बस मेरा अपना खुदा ही होगा। और अल्लाह-गवाह है मैने कभी उसे और दीन-ईमान को रुसवा नहीं होने दिया है। षडयँत्र से भरी एक रणभूमि बिछती चली गई मेरे आगे और मैं अर्जुन सा चाहकर भी कभी उबर न सका। भाग न सका। हरबार ही किसी बेबा बहन या लाचार मां के आँसुओं ने मुझे रोक लिया। हर बेबस बीमार अनाथ के हाथ मेरे अपने गिरेबाँ को घेरे हुए थे। क्योंकि अत्याचार करने और सहने वाले, दोनों ही मेरे अपने ही तो थे। मैं जाता तो कहाँ जाता ? किससे भागता, किससे न्याय माँगता ? अफसोस बस यही था कि मेरे पास गाण्डीव या कृष्ण नहीं थे। थी तो बस, तुम्हारी यही मुझ में विश्वास रखने वाली सहेली और मेरी सस्ती-सी यह कलम। दुर्भाग्य तो देखो मेरा --सबका होते हुए भी मुझे किसीने नहीं अपनाया। मैं हिन्दू नहीं था क्योंकि रोज नमाज पढ़ता था और बुजुर्गों ने मुझे मौसीन नाम दिया था। मुसलमान नहीं था, क्योंकि हिन्दू औरतें मुझे राखी बाँधती थीं। भैया कहती थीं। मैं हर अन्याय से लड़ने वाले की खैरियत के लिए बाबा विश्वनाथ से दुआ माँगता भटकता रहा। चमचम का पानी और दरगाह की ताबीज बीमारों में बाँटता रहा। दोनों कौमों की ही आँखों में काफिर और हरामी रहा। आजतक नहीं जान पाया कि आखिर हूँ कौन मैं? इतना जरूर जानता हूँ कि इसी धरती में मेरे अम्मी-अब्बू आज भी सोए हुए हैं और इसकी हिफाजत और अमन ही मेरी जिम्मेदारी है। मेरा फर्ज है। एक टूटे पत्ते-सा आज भी इन गँगा की लहरों पर मैं बह तो रहा हूँ-- पर बिना इसमें भीगे-- सूखा-सूखा ही। कोई शिकायत नहीं कर रहा तुम से, ना ही अपने नसीब को रो रहा हूँ , पर तुम्ही बताओ निवि जिस मिट्टी में पैदा हुआ, पला बढ़ा क्या उसकी पहचान ही मेरी सही पहचान नहीं? माना मेरी माँ को लोग जमीला आपा कहते थे पर मेरी मौसी का नाम शान्ती भी तो है। मैं तो बस नफरत और झूठ को हटाना चाहता हूँ। चाहे वह मुसलमानों के प्रति नफरत और अफवाह फैलाने वाले पोंगा पँडितों ने बिखेरी हो या छम्मन चचा और रसूलमियाँ के मजहबी खतरों ने। अपना-अपना दुख लेकर लोग मेरे पास आने भी लगे थे और मैं सुनने भी लगा था, समझने लगा था उन्हें।
...फिर सुख-दुख, हिन्दु या मुसलमान का घर देखकर तो नहीं आते। जीवन की तरह ये भी तो किसी मजहब की जागीर नहीं ? और अपनी इन नापाक नासमझियों के लिए मुझे दोनों तरफ से ही धमकियाँ मिलने लगीं। गलियों-कूचों में पीटा जाने लगा। पर मैं बदल तो नहीं पाया। रेत में सर छुपाकर अँधा कैसे हो जाता मैं ?
और फिर एकदिन वह खूँखार और शर्मनाक दिन भी आया जब तँग आकर मेरे अपने कुनबेवालों ने ही मुझे अगुआ कर लिया। अधमरा करके अँधेरे कोनों में फेंक दिया ताकि मैं किसी से न मिल सकूँ, कहीं आ-जा न सकूँ। फिर से उन्हें अपने मौला और मौलवियों के आगे शर्मिंदा न कर सकूँ। क्योंकि न तो उनके कहे मुताबिक मैं इन काफिरों की सँगत छोड़ रहा था और ना ही अपने इँकलाबी तौर-तरीके।
उनके मजहबी वतन जाने की दावत भी तो कबूल नहीं की मैने। मेरी हरकतों से सब खतरे में पड़ गए थे। पूरा ढाँचा ही टूट रहा था। वे करते भी तो क्या करते ? और तब मुझे पहली बार पता चला था कि कुछ भी नहीं हूँ मैं। मैं किसी का बेटा नहीं-- किसी का भाई नहीं। बस एक काजल की कटोरी हूँ। जो भी मेरे पास आता है बस काला होकर ही जाता है। पर करूँ भी तो क्या करूँ---जिन्दगी भर ही तो जला हूँ मैं-- पराई आग में तपना अब तो आदत हो गई है यह मेरी -मजबूरी है मेरी। " " आँखों में बसालो तो रूप भी तो सँवारते हो तुम ही। माथे पर टोना बने उनकी रक्षा भी तो करते हो तुम ही।" निवि ने हँसकर कहा-- " पर कुछ भी तो नहीं बदल पाया मैं--- हाँ, तुम्हारी साहसी सहेली ने आगे बढ़कर मेरा दामन जरूर थाम लिया। मुझसे निकाह करके-- मुझ बिखरते को सहारा देकर, सबको सन्न कर दिया था इसने। आज इसने न सिर्फ मुझे जिन्दा रखा है बल्कि मेरे सभी हौसले भी बुलन्द किए हैं। मुझे बारबार याद दिलाया है कि मैं भी उसी शहर का रहने वाला हूँ जहाँ की गँगा पापियों के पाप और गन्दगी को अपने में समेटकर भी बस गँगाजल ही देती है। मैं आज यहीं घर में बैठा गरीब बच्चों को पढ़ाता हूँ। अपने रिसालों और नज्मों के जरिए अपनी बात लोगों तक पहुँचाता हूँ -इस उम्मीद से कि शायद बदली में घिरी यह रौशनी थोड़ा-बहुत उजाला दे ही पाए। आज इस इक्कीसवीं सदी में अगर दो-चार को भी इन मजहबी दायरों से निकाल पाऊँ, इन्सानियत की रौशनी में ला सकूँ तो अपने को सुफल मानूँगा। सच्चा मुसलमान मानूँगा। यह बात दूसरी है कि मेरी बात सुनने वाले ज्यादातर मेरी तरह ही गरीब और लाचार लोग होते हैं जिनके पास खोने और अपना कहने को कुछ भी नहीं होता। उनके तो राम और रहीम दोनों ही बस अन्न के चन्द दाने हैं। तुम ही बताओ निवि, कब और कैसे मैं काफिर हो गया? यह तो बुत-परस्ती नहीं ? अपने पड़ौसी को खुद सा प्यार करो, यही बात तो हर मजहबी किताब सिखलाती है हमें। फिर मैने कहाँ और कैसे गलत पढ़ और सीख लिया ? बचपन से ही वालिद और कुरान-शरीफ से भी तो बस यही सीखा था मैने। अगर हर मजहब की जुबाँ एक है-- हर इँसान की शकल खुदा ने अपनी शकल में बनाई है, तो तुम ही कहो इसमें मेरा कुसूर कहाँ पर है ? क्यों मैं दूसरों की शर्तों पर जीऊँ ? पता नहीं एक सीधा-सच्चा इँसान बनने के लिए मुझे अभी और न जाने किन-किन इम्तहाँ से गुजरना होगा ? बाँसुरी के छेदों सी सातसुरों से छिदी-भिंदी यह जिन्दगी हमें पीड़ा जरूर देती है पर है तो आजभी बहुत ही सुरीली और रसमय। बस हमें बजाना और सुनना आना चाहिए। जाने कब इन रीते छेदों को अपनी साँस दे पाऊँ ? ना जाने कब इस दुनिया के ठेकेदारों का दामन इतना बड़ा हो पाए कि दीन दुखियों को पनाह दे सके, आँसू पोंछ सकें ? नहीं कहता कि मैं भी कुछ ज्यादा कर पाया हूँ-- हाँ इनके दर्द में बस रोया जरूर हूँ। सिर्फ निजी लालच को ही शह नहीं दी मैने। बेपाक धमकियों से डरा नहीं हूँ मैं। झूठ के आगे घुटने नहीं टेके हैं मैने--हाँ, तुड़वा जरूर लिए हैं। तुम चाहो तो इसे मेरा कुसूर कह सकती हो--क्योंकि जो खुद अपाहिज हो गया, अपनी हिफाजत नहीं कर सका, वह दूसरों की हिफाजत कैसे कर पाएगा?" " ना मौसिन, इतना दर्द और बोझ अपने दिल पर मत लो। इतना निकम्मा न समझो खुद को। हम सभी को तुम्हारी--तुम जैसे लोगों की बहुत जरूरत है। अक्सर ही लोग जो चाहते हैं बस कह नहीं पाते। फिर गुस्सा भी तो प्यार का ही दूसरा पहलू है। अपनेपन का यह भी तो एक प्रतीक है। यह सभी थके-हारे और कमजोर लोग हैं। थकी माँ भी जब किसी और से कुछ नहीं कह पाती, तो गोद के बच्चे को ही पीट डालती है। यह बात दूसरी है कि फिर उसके रोने पर खुद भी फूट-फूटकर रोने लग जाती है। अक्सर ही यह कमजोर शब्द भावनाओं का बोझ नहीं उठा पाते और अर्थ का अनर्थ हो जाता है। तुम तो कवि और शायर हो खुद ही सब जानते और समझते हो। अर्थ-अनर्थ पर फिर याद आ रही है तुम्हारी ही एक हल्की-फुल्की-सी कविता जो तुमने बजरे में गँगा की लहरों पर घूमते हुए हमें सुनाई थी।" मँत्र-मुग्ध सा मौसीन सब सुन रहा था, देख रहा था। अपने अतीत को, उस प्यार-दुलार की मीठी फुहार को--पुलका जानेवाले उस ठँडी हवा के झोंके को। मौसीन आँखों के जरिए सारा सुख मन के खजाने में बन्द कर लेना चाहता था। शरारती निवि उसे छेड़े जा रही थी --" मौसीन वही पति के चोट खाकर बेहोश हो जानेपर बड़ी बी की फरियाद वाली तुम्हारी कविता --हाँ वही, जिसे सुनकर आज भी हम सबके पेट में हँसते-हँसते दर्द हो जाता है। " "डाक्टर,डाक्टर जल्दी आओ, मेरे घर में एक एक्सीडेंट हो गया
पति मेरा जो अभी तक पूरे सेंस में था, गिरते ही नानसेंस हो गया।"
निवि अपनी रौ में बोले जा रही थी -"जानते हो मौसीन भावों के अतिरेक में अक्सर ही लोग ऐसी-ही उलटी-सीधी जुबाँ बोलते हैं। कभी लब्ज़ साथ नहीं देते तो कभी कहने की क्षमता ही नहीं होती। वो सब जिन्होंने तुम्हें उलटा-सीधा कहा है, मन ही मन तुम्हारी बहुत इज्जत करते हैं। पर डरते भी हैं कि कहीं तुम उन्हें छोड़कर दूसरे खेमे में न चले जाओ। इसीलिए उलटे-सीधे नामों से बुलाते हैं--डराते धमकाते हैं। तुमसे हरदम जुड़े जो रहना चाहते हैं। तुम्हें खुदसे बाँधकर रखना चाहते हैं। शब्दों पर मत जाओ, उनकी जरूरतों को, इरादों को, कमजोरियों को समझने की कोशिश करो। जानते हो मौसीन कमजोरों के सरपर सच्चे-झूठे, पचास तरह के हौवे होते हैं--हजारों मजबूर शर्तें होती हैं।" " जानता हूँ निवि अच्छी तरह से जानता हूँ--मैने भी पापीसे नहीं बस पापसे ही घृणा करने की कोशिश की है। यही करता आया हूँ बचपन से ही मैं भी। पर जानती हो निवि, गाँधीजी भी कहते थे कि अहिंसा का पाठ शेर ही पढ़ा सकता है एक चूहा नहीं। "
" मैं चाहती हूँ मौसीन कि तुम्हारी यह कहानी अब बस बनारस की गलियों में ही नहीं, यहाँ के हिन्दू-मुसलमानों की जुबाँ पर ही नहीं--- देश-विदोशों के हर कोने में गूँजे। हर कान से टकराए। क्योंकि सूफी-सँतों का कोई देश नहीं होता। मजहब नहीं होता। आकाश-सा उन्हें भी बाँटा नहीं जा सकता। वे तो हवा, पानी और रौशनी की तरह हरेक के लिए होते हैं। हर देश के हर प्राणी के होते हैं। अगले वर्ष विश्व-शान्ती सम्मेलन है--हिस्सा लेने आओ। बोलो, आओगे ना मौसीन-- आना जरूर--- आमलोगों की जुबाँ ही आम लोगों की समझ में आती है। तुम्हारे आने से अपने शहर की---इस देशकी--इस मानव समाज की, इन्सानियतकी, खुद शान्ती और मित्रता जैसे शब्दों की गरिमा में चार चाँद लग जाँएँगे। वैसे भी तो तुम्हें आनेवाली पीढ़ियों को अभी बहुत कुछ देना है, सिखाना है।"
" क्यों जर्रे को आसमान पर बिठा रही हो निवि, अगर मेरे भोले-बाबा ने चाहा, तो हम सब की यह इच्छा भी ज़रूर ही पूरी होगी।" मौसीन ने अपनेपन से छलकती आँखों को पोंछते हुए एक तपस्वी, एक सूफी जैसी दृढ़ता और लगन से यह चुनौती भी स्वीकार कर ही ली।...
एक जीर्ण-शीर्ण मंदिर से चोरी हुई प्रतिमा संयोगवश पुलिस ने बरामद कर ली। थाने में प्रतिमा लोगों के दर्शनार्थ रख दी गईं। खूब रुपये-पैसे का चढ़ावा चढ़ने लगा। थानेदार समेत सारा स्टाफ भक्तिभाव से पूर्ण हो गया। थानेदार ने देखा कि इस चढ़ावे में तो ऊपर के किसी भी अधिकारी को कुछ देना नहीं पड़ता है। वह रोज उस प्रतिमा से प्रार्थना करता कि प्रभु आप स्थाई तौर पर यहीं थाने में विराजमान हो जाइये। उधर प्रतिमा ने भी सोचा कि वहाँ जीर्ण-शीर्ण मंदिर में तो कोई पूछ-परख नहीं थी। यहाँ तो भक्तों की भरमार है, सो एक दिन थानेदार के प्रार्थना करने पर प्रतिमा ने ‘तथास्तु’ कहकर एक फूल उसके हाथ में दे दिया। कुछ दिनों बाद वहाँ थानेदार भगवान का मन्दिर बन गया। अब दोनों खुश हैं।
फ्यूजन
कई हजार वर्ष पहले भारतीय वनों में सभी बंदर मिल-जुलकर रहते थे। उनमें कोई छोटा या बड़ा नहीं था, सब बराबर थे। अपराधी प्रवृत्ति के बंदरों को तड़ीपार कर दिया जाता था। तड़ीपार किये गये बंदर, दूर एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में शरण पा जाते थे।
एक बार तड़ीपार किये गये बंदरों का एक झुंड वापस आया, सभी ने टोपी लगा रखी थी। वे बड़े ही आकर्षक लग रहे थे। उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था का ऐसा चित्र खींचा कि भारतीय बनों के बंदरों ने वर्तमान व्यवस्था को नकार कर लोकतांत्रिक व्यवस्था की माँग की, इस बीच अचानक डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत आ गया। बंदर आदमी के रूप में आ गये। टोपीधारी बंदर टोपीधारी आदमी बन गये जो आज तक लोकतंत्र के ठेकेदार बने बैठे हैं।
मुग़लकालीन दिल्ली का प्रसिद्ध बाज़ार चाँदनी चौक, चाँदनी चौक में एक मोहल्ला बल्लीमारान और इसी बल्लीमारान में एक गली है गली कासिम जान जहाँ नुक्कड़ की एक हवेली में रहते थे मिर्ज़ा ग़ालिब। आज उस हवेली को उनकी यादगार के रूप में संरक्षित किया जा चुका है। कौन थे ये मिर्ज़ा ग़ालिब जिनकी हवेली को संरक्षित कर स्मारक का रूप दिया गया है? स्वयं मिर्ज़ा ग़ालिब के शब्दों में ही देखिए उनके परिचय का अनूठा अंदाज़ः पूछते हैं वो कि ‘ग़ालिब’ कौन है, कोई बतलाए कि हम बतलाएँ क्या?
अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र के समकालीन मिर्ज़ा ग़ालिब उर्दू के मशहूर शायर हुए हैं। मशहूर इतने कि उर्दू शायरी का पर्याय हैं ‘ग़ालिब’।‘ग़ालिब’ उनका नाम नहीं बल्कि तख़ल्लुस या उपनाम था। पूरा नाम था मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ ‘ग़ालिब’। पहले ‘असद’ तख़ल्लुस से शायरी करते थे बाद में ‘ग़ालिब’ तख़ल्लुस अपना लिया।
‘ग़ालिब’ का जन्म 27 दिसंबर सन् 1797 ई0 में अकबराबाद अर्थात् आगरा में हुआ था लेकिन बचपन में ही आगरा से दिल्ली आ गए थे और यहीं के होकर रह गए। इसीलिए अहले-उर्दू उन्हें ‘ग़ालिब’ देहलवी कहकर ही पुकारते हैं। ‘ग़ालिब’ को बचपन से ही शेरो-शायरी का शौक़ था और दिल्ली में उन दिनों शेरो-शायरी का बड़ा चर्चा था जिससे ‘ग़ालिब’ की शायरी दिन-ब-दिन चमकती चली गई। ‘ग़ालिब’ फ़ारसी और उर्दू दोनों ज़बानों में शेर कहते थे लेकिन उनकी लोकप्रियता का कारण उनकी उर्दू शायरी ही है। दीवान-ए-ग़ालिब में उनकी सारी उर्दू ग़ज़लें संकलित हैं। वस्तुतः किसी शायर की ग़ज़लों के संकलन या संग्रह को ही ‘दीवान’ कहा जाता है और जिस शायर की ग़ज़लों का दीवान छप चुका हो उर्दू अदब में उसे साहिबे-दीवान शायर कहा जाता है।
‘ग़ालिब’ की लोकप्रियता उनके साहिबे-दीवान शायर होने में नहीं बल्कि उनकी एक-एक ग़ज़ल और एक-एक शेर की विशेषता के कारण है। उन्होंने शायरी में आम रास्ते से हटकर अपनी एक अलग राह बनाई। शुरू में ‘ग़ालिब’ की शायरी की ज़बान बड़ी कठिन थी लेकिन बाद में दोस्तों के कहने पर उन्होंने आसान ज़बान में शायरी करना शुरू कर दिया। ‘ग़ालिब’ की ज़बान चाहे कितनी ही कठिन क्यों न रही हो या आसान लेकिन उनका शायरी में विचारों की ताज़गी, विषयों की विविधता, सोच की ऊँचाई तथा शब्दों की अर्थवत्ता के कारण उनकी एक विशिष्ट और अलग पहचान बनी रही जो आज भी कम नहीं हुई है। ‘ग़ालिब’ ने अपने एक शेर में अपने बारे में जो फरमाया है वह शत-प्रतिशत सही हैः
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़े-बयाँ और।
‘ग़ालिब’ का इंतकाल बहत्तर साल की उम्र में 15 फरवरी सन् 1869 ई0 में दिल्ली में हुआ। ‘ग़ालिब’ को हज़रत निज़ामुद्दीन क्षेत्र में पवित्र दरगाह से थोड़ा पहले दफ्नाया गया था। आप हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की पवित्र दरगाह जाते वक्त दरगाह के रास्ते में स्थित उनका मज़ार देख सकते हैं। मज़ार के पास ही ग़ालिब अकेडमी की इमारत बनाई गई है। ग़ालिब अकेडमी की इमारत में एक संग्रहालय भी बना है जिसमें ‘ग़ालिब’ के जीवन और उनके साहित्य से संबंधित सामग्री प्रदर्शित है।
बेशक़ ‘ग़ालिब’ की शायरी को समझना आसान नहीं फिर भी ग़ालिब’ ख़ास आदमी की ही नहीं आम आदमी की पसंद भी हैं और इसका कारण है ‘ग़ालिब’ की मृत्यु के एक सौ चालीस साल बाद भी उनकी शायरी आज की शायरी लगती है। यही ‘ग़ालिब’ की प्रासंगिकता का सबसे बड़ा कारण है। ‘ग़ालिब’ न केवल एक अच्छे शायर और बेहद ख़ुद्दार इंसान थे अपितु एक बेहद नेक इंसान भी थे और अपने दोस्तों और मिलने वालों का बड़ा लिहाज करते थे। उनके जीवन की चंद घटनाएँ देखिएः
दोस्ती और ख़ुद्दारी
मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ ‘ग़ालिब’ न केवल उर्दू के महान शायर थे अपितु वे अरबी और फारसी भाषाओं के बहुत बड़े विद्वान भी थे। उन दिनों दिल्ली कॉलेज, जो कश्मीरी गेट स्थित दारा शिकोह पुस्तकालय में चलता था, के प्रिंसिपल मि. टेलर थे जो ‘ग़ालिब’ के दोस्त भी थे। कॉलेज में अरबी पढ़ाने के लिए एक योग्य व्यक्ति की तलाश थी। कॉलेज के अधिकारियों ने इस नौकरी के लिए ‘ग़ालिब’ को बुलाया। ‘ग़ालिब’ पालकी में बैठकर कॉलेज पहुँचे और अपने आने की ख़बर अंदर भिजवाई। जब काफी देर तक प्रिंसिपल उन्हें लिवाने के लिए बाहर नहीं आए तो ‘ग़ालिब’ वापस घर के लिए रवाना हो गए।
जब बाद में उनसे पूछा गया कि वे कॉलेज से वापस क्यों आ गए तो उन्होंने जवाब दिया, ‘‘भई नौकरी का मक़सद है कि रुतबे में थोड़ा-बहुत इज़ाफ़ा हो पर यहाँ तो दोस्ती ही दाँव पर लगी जाती थी। क्या फ़ायदा ऐसी नौकरी का जो दोस्ती से भी हाथ धो बैठें?’’ ‘ग़ालिब’ दोस्तों और मिलने वालों का बड़ा लिहाज करते थे लेकिन दोस्तपरस्त होने के साथ-साथ इस बात का भी उन्हें बहुत ध्यान रहता था कि कहीं दोस्ती या रिश्ते में कोई ख़राबी न आ जाए। ‘ग़ालिब’ अत्यंत विनम्र थे और ये उनका अहंकार नहीं उनकी ख़ुद्दारी ही थी जो दोस्ती की क़ीमत पर नौकरी करने को तैयार नहीं हुए। अंदाज़े-दोस्तपरस्ती
मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ अपने उन दोस्तों के साथ जो गर्दिशे-रोज़गार (काल-चक्र) से बिगड़ गए थे निहायत शरीफ़ाना तौर से सलूक करते थे। दिल्ली के अमाइद (प्रतिष्ठित लोगों) में से एक साहब जो ‘ग़ालिब’ के दिली दोस्त थे और ग़दर (1857 की क्रांति) के बाद उनकी हालत सक़ीम (दुर्दशाग्रस्त) हो गई थी एक रोज़ घटिया-सी छींट का फ़र्ग़ल (रूईदार चोग़ानुमा परिधान) पहने हुए ग़ालिब से मिलने आए। ग़ालिब ने कभी उनको मालीदे अथवा जामावार वग़ैरा के चोग़ों के सिवाय ऐसा हक़ीर कपड़ा पहने नहीं देखा था। उनके बदन पर छींट का फ़र्ग़ल देखकर ‘ग़ालिब’ का दिल भर आया। उनसे पूछा कि आपने ये छींट कहाँ से ली? मुझे इसकी वज़ा (डिज़ायन) बहुत पसंद आई। आप मुझे भी फ़र्ग़ल के लिए ये छींट मँगवा दें।
दोस्त ने कहा कि ये फ़र्ग़ल आज ही बनकर आया है और मैंने इसी वक्त इसको पहना है। अगर आपको पसंद है तो यही हाजि़र है। ‘ग़ालिब’ ने कहा कि जी तो यही चाहता है कि इसी वक्त आपसे छीनकर पहन लूँ मगर जाड़ा शिद्दत से पड़ रहा है। आप यहाँ से मकान तक क्या पहन कर जाएँगे? फिर ‘ग़ालिब’ ने इधर-उधर देखकर बड़ी ख़ूबसूरती से खूँटी पर टँगा अपना मालीदे का नया चोग़ा उतारकर फ़र्ग़ल के बदले उन्हें पहना दिया। दोस्त इंकार करते भी तो कैसे? न तो उनके स्वाभिमान को ठेस पहुँची और दोस्त की मदद भी हो गई। न था ‘ग़ालिब’ का अंदाज़े - बयाँ ही और, था बहुत ख़ूब अंदाज़े-दोस्तपरस्ती भी उनका।
आम बहुत मगरूब (रुचिकर) थे ‘ग़ालिब’ को
आमों का ज़िक्र हो और ‘ग़ालिब’ का ज़िक्र न हो ये हो ही नहीं सकता। अल्ताफ़ हुसैन ‘हाली’ अपनी किताब ‘‘यादगारे-ग़ालिब’’ में ‘ग़ालिब’ के आमों के शौक़ से मुताल्लिक़ ये वाक़िआत दर्ज करते हैं-
फ़वाकेह (फलों) में आम उन्हें बहुत मगरूब था-आमों की फ़स्ल में उनके दोस्त दूर-दूर से उनके लिए उम्दा-उम्दा आम भेजते थे और वो ख़ुद अपने बाज़े दोस्तों से तक़ाज़ा करके आम मंगवाते थे। एक रोज़ मरहूम बहादुरशाह ‘ज़फ़र’ आमों के मौसम में चंद मुसाहिबों के साथ जिनमें मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ भी थे बागे-हयातबख़्श या महताब बाग में टहल रहे थे। आम के पेड़ रंग-ब-रंग के आमों से लदे थे। यहाँ का आम बादशाह या सलातीन या बेगमात के सिवा किसी को मयस्सर नहीं आ सकता था। मिर्ज़ा बार-बार आमों की तरफ़ ग़ौर से देखते थे। बादशाह ने पूछा, ‘‘ मिर्ज़ा इस क़दर ग़ौर से क्या देखते हो?’’ मिर्ज़ा ने हाथ बाँध कर अर्ज़ किया,‘‘ पीर-ओ-मुर्शिद ये जो किसी बुज़ुर्ग ने कहा हैः बरसरे हर दाना बनिविश्ते अयाँ, कि ईं फ़लाँ इब्ने फ़लाँ इब्ने फ़लाँ। अर्थात् हर एक दाने पर लिखा होता है कि ये उसका है जो उसका बेटा है और वो उसका बेटा है। इसको देखता हूँ कि किसी दाने पर मेरा और मेरे बाप दादा का नाम भी लिखा है या नहीं।’’ बादशाह मुस्कराए और उसी रोज़ एक बहँगी उम्दा-उम्दा आमों की मिर्ज़ा को भिजवाई।
मिर्ज़ा (‘ग़ालिब’) की नीयत आमों से किसी तरह सेर न होती थीं। अहले-शहर तोहफ़ा भेजते थे। ख़ुद बाज़ार से मँगवाते थे। बाहर से दूर-दूर का आम बतौर सौग़ात के आता था मगर हज़रत का जी नहीं भरता था। नवाब मुस्तफ़ा ख़ाँ मरहूम नाक़िल थे कि एक सोहबत में मौलाना फ़ज़्ले हक़ और मिर्ज़ा और दीगर अहबाब जमा थे और आम की निस्बत हर शख़्स अपनी-अपनी राए बयान कर रहा था कि उनमें क्या-क्या ख़ूबियाँ होनी चाहिएँ। जब सब लोग अपनी-अपनी कह चुके तो मौलाना फ़ज़्ले हक़ ने मिर्ज़ा से कहा कि तुम भी अपनी राय बयान करो। मिर्ज़ा साहिब ने कहा, ‘‘भई मेरे नज़दीक तो आम में सिर्फ़ दो बातें होना चाहिएँ मीठा हो और बहुत हो।’’ सब हाज़िरीन हँस पड़े।
आमों से संबंधित एक क़िस्सा और
हकीम रज़ीउद्दीन ख़ाँ जो मिर्ज़ा (‘ग़ालिब’) के निहायत दोस्त थे उनको आम नहीं भाते थे। एक दिन वो मिर्ज़ा के मकान पर बरामदे में बैठे थे और मिर्ज़ा भी वहीं मौजूद थे। एक गधे वाला अपने गधे लिए हुए गली से गुज़रा। आम के छिलके पड़े थे। गधे ने सूँघकर छोड़ दिया। हकीम साहब ने कहा, ‘‘देखिए आम ऐसी चीज़ है जिसे गधा भी नहीं खाता।’’ मिर्ज़ा (‘ग़ालिब’) ने कहा, ‘‘बेशक गधा नहीं खाता।’’
मिर्ज़ा ‘ग़ालिब’ की शायरी से कुछ चुनिंदा अश्आर व एक ग़ज़ल:
इन आबलों से पाँव के घबरा गया था में, जी ख़ुश हुआ है राह को पुरख़ार देखकर।
ये बाइसे-नौमीदी-ए-अरबाबे-हवस है, ‘गालिब’ को बुरा कहते हो अच्छा नहीं करते।
मेहरबानीहा-ए-दुश्मन की शिकायत कीजिए, या बयाँ कीजे सिपासे-लज़्ज़ते-आज़ारे-दोस्त।
ये मसाइले-तसव्वुफ़ ये तेरा बयान ‘गालिब’, तुझे हम वली समझते जो न बादाख़्वार होता।
बेख़ुदी बेसबब नहीं ‘ग़ालिब’, कुछ तो है जिसकी परदादारी है।
मौत का एक दिन मुआयन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती।
की मिरे क़त्ल के बाद उसने जफा से तौबा, हाय उस ज़ादूपशेमाँ का पशेमाँ होना।
नादाँ हो जो कहते हो कि क्यों जीते हो ‘ग़ालिब’, क़िस्मत में है मरने की तमन्ना कोई दिन और।
फिर बेख़ुदी में भूल गया राहे-कू-ए-यार, जाता वगरना एक दिन अपनी ख़बर को मैं।
मुझ तक कब उनकी बज़्म में आता था दौरे-जाम, साक़ी ने कुछ मिला न दिया हो शराब में।
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़े-बयाँ और।
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद, जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।
ताब लाए ही बनेगी ‘ग़ालिब’, वाक़िआ सख़्त है ओर जाँ अज़ीज़।
दाग़े-दिल गर नज़र नहीं आता, बू भी ऐ चारागर नहीं आती?
यादे-माज़ी अज़ाब है यारब! छीन ले मुझसे हाफ़िज़ा मेरा।
ज़िंदगी यूँ भी गुज़र ही जाती, क्यों तिरा राहगुज़र याद आया।
ग़ज़ल
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन, बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का, उसी को देखकर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले।
ख़ुदा के वास्ते पर्दा न काबे का उठा ज़ालिम, कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफ़िर सनम निकले।
कहाँ मयख़ाने का दरवाज़ा और कहाँ वाइज़, पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले।
मुझे उइके जी का यह इरादा पसन्द नहीं है कि वे आमों का निर्यात करना चाहते हैं। उस दिन आमों की प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए उन्होंने बड़े ज़ोर-शोर से यह बात कही कि आमों के निर्यात को बढ़ाया जाए और करोड़ों की विदेशी मुद्रा कमाई जाए। सुनकर मेरा मूड दिनभर खराब रहा। बार-बार सवाल उठता था : क्या यह शासन इस देश को रहने के काबिल नहीं रखना चाहता ? क्या पहला मौका लगते ही मुझे विदेश जाकर बस जाना चाहिए?
बरसों का अनुभव यही कहता है कि मन्त्रियों के भाषण गम्भीरतापूर्वक नहीं लिये जाने चाहिए। ये गंगा जाने पर गंगादासी और जमुना जाने पर जमुनादासी भाषण देते हैं। यदि इन्हें शाम के चार बजे होमियोपैथी के सम्मेलन में भाषण देने को कहा जाए तो होमियोपैथी के इलाज को श्रेष्ठ बताएँगे और उसी शाम छः बजे यदि इन्हें आयुर्वेदिक सम्मेलन में बोलने के लिए कहा जाए तो ये आयुर्वेद को संसार की सर्वश्रेष्ठ इलाज प्रणाली निरूपित करेंगे। मन्त्री पीठ ठोकनेवाली मशीन के रूप में सक्रिय रहता है। सबसे कहता है कि तुम ठीक कर रहे हो, और काम बढ़ाओ। यद्यपि मैं उइके जी को इस कोटि का मन्त्री नहीं मानता। वे जो चाहते हैं, वही कहते हैं और वही करने का प्रयत्न भी करते हैं। कर न सकें, यह दूसरी बात है, क्योंकि जैसी परिस्थितियाँ हैं अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। फोड़ने से चने को लाभ भी क्या होगा?
चूँकि मैं उइके जी को बात को गम्भीरतापूर्वक ले रहा हूँ, अतः आमों के आसपास के सभी प्रेमियों से अपील करूँगा कि हम काले झण्डे लेकर क्यों नहीं मन्त्री महोदय के बंगले पर प्रदऱ्शन करें और आमों का निर्यात होने से रोकें। मैं कहता हूँ इस देश में सिवाय आमों के रह क्या गया है? गेहूँ मँहगा, घी मँहगा, शकर अनुपस्थित और इनसे सहानुभूति प्रदर्शित करती हुई सब्जियाँ मँहगी। विदेशी फ़िल्मों के आयात पर बन्दिश, देशी फिल्मों के मधुर दृश्यों से सेंसर की दुश्मनी। सिर्फ़ आम हैं, जो बाजार में उपलब्ध है और मीठा और रसीला है। ग़रीब चूसकर ग़म ग़लत कर सकता है। कभी लंगड़ा, कभी दशहरी, कभी हापुस और कभी दब्यड़ जैसा स्थानीय भोपाली मधुर आम चूस वर्ष के दो माह बीत जाते हैं अर्थात् वर्ष का छठा भाग अर्थात् पूरी जिन्दगी का छठा भाग। उसके बाद सिर्फ़ शेष भाग के समय को सार्थक बनाने की समस्या रह जाती है, जिसमें शासन असफल है। आम चूसते समय एक बादशाही अनुभूति मन में बनी रहती है, लगता है एक क्षण को ग़रीबी हट गयी है। उइके जी भी इसे चूसते समय पेण्डिंग फ़ाइलों की समस्या से कुछ समय के लिए मुक्त हो जाते होंगे। मेरे ख़्याल से वे उन नकचढ़ों में से नहीं हैं जिन्हें आम नुकसान करते हैं।
वे आमों का निर्यात कर बदले में विदेशी मुद्रा लाना चाहते हैं। मैं कहता हूँ हमें आप देशी मुद्रा ही दिलवा दीजिए ताकि हम तबीयत से आम खरीद सकें। ऐसी विदेशी मुद्रा को क्या शहद लगाकर चाटें जिसे ले बाज़ार जाएँ तो वहाँ मीठा आम न हो, क्योंकि निर्यात हो चुका। लानत है। उइके जी गुठलियाँ निर्यात करने की कोई योजना क्यों नहीं खड़ी करते? व्यर्थ फेंकी जाती हैं। और यदि वे विदेशियों को आम खिला पैसा कमाना ही चाहते हैं तो बेहतर हो आम के मौसम में हमारा पर्यटन विभाग विदेशों में प्रचार करे कि—भाइयों, भारत में आम पक गया है, चूसने चलो। असली प्रेमी आ जाएँगे और यहाँ तबीयत से आम चूसते खजुराहो देखेंगे। मुद्रा भी मिलेगी, अन्तर्राष्ट्रीय भाईचारा भी बढ़ेगा। साथ आम चूसने से बढ़ता है। जब से ‘ अलफोन्सो‘ का निर्यात बढ़ गया है, बम्बई वाले तरस गये और सरकार को गालियाँ देते हैं। क्या मध्यप्रदेश की जनता भी गालियाँ देगी सरकार को इसी तरह ?
मैं चुसी हुई गुठलियाँ क्रोध में फेंकता, ऐसे इरादों के प्रति घोर विरोध प्रकट करता, राज्य के समस्त आम-प्रेमियों से ( अर्थात सारी जनता से) अपील करता हूँ कि सावधान रहें और मंत्रियों की ऐसी कोशिशों को सफल न होने दें। अजी, निर्यात ही करना है तो कुछ नेताओं को निर्यात कर विदेशी मुद्रा क्यों न कमाई जाए? आम कदापि नहीं।
जुलाई यानी की सावन का महीना और यदि सावन के महीने में हम बरखा की बात न करें तो मौसम के साथ भी तो बेईमानी ही होगी। वैसे तो इंगलैंड में बारहो महीने बस रिमझिम ही रिमझिम है पर जब बरखा की बूंदों के साथ हवा में तैरते सुर मिल जाएं, चिड़ियों के कलरव के साथ काव्यपाठ सुनाई दे तो पुलकित मन की थिरकन का अन्दाज आप खुद ही लगा सकते हैं और उसपर से सैर सपाटा यानी कि पिक-निक। बात कर रही हूँ जुलाई 2004 की एक पिकनिक की, जो हमने मिलजुलकर यहाँ इंगलैंड में शेक्सपियर की जन्मस्थली यानी स्टैटफर्ड अपौन एवन शहर में मनाई थी।
जी हां, कुछ कहीं से पिक किया यानी कि बिना पूछे उठा लिया और कुछ निक किया यानी की छीन लिया ----अंग्रेजी इस पिकनिक शब्द की अनूठी यह परिभाषा दी संस्कार भारती के नरेश भारती जी ने और फिर तुरंत ही गम्भीर होते हुए कहा कि यह तो हमारी संस्कृति ही नहीं क्या हम कोई और दूसरा हिन्दी का शब्द इसके विकल्प में नहीं ढूंढ सकते। विश्वास मानिए वहां सुन्दर कविताओं, मधुर गीतों और स्वादिष्ट व्यंजनों के अलावा कुछ भी और पिक या निक नहीं हो रहा था। गवाही देने के लिए कई प्रतिभाएं चांद सूरज सी चमक रही थीं। नेहरू सेन्टर से सपत्नी आए श्री पवन वर्मा जी। अमेरिका से श्री राहुल वर्मा और सुषम बेदी जी। लंदन से अनिल शर्मा और सरोज जी, पद्मेश गुप्त, नरेश भारतीय, वीरेन्द्र संधु, सुदर्शन भाटिया, दिव्या माथुर, अमृता तोषी, दिवाकर शुक्ल और कई नए तरोताजा फूल से खिलते, मदद करते युवा व बच्चे। कवेन्ट्री से प्राण शर्मा और वूवरहैम्पटन से सत्यव्रत शर्मा और महेन्द्र सोलंकी जी, बरमिंघम का करीब करीब पूरा कृति परिवार ----पूरा पूरा इसलिए कि पारिवारिक व्यस्तता की वजह से न आ पार्इं अनुराधा जी की कमी सबको अखर रही थी।
कड़कती तेज धूप में जैसे ही हमारी अपनी अख्तर बाजी ( अख्तर गोल्ड) ने 'मुझसे पहले सी मुहब्बत मेरे मेहबूब न मान '-गाना शुरु किया तो बादल तक हमारे पास आकर झूमने लगे और रंग में भंग होते देख, सुषम वेदी जी ने बहुत ही सुरीली और सधी आवाज में हाव भाव के साथ 'जारे बदरा बैरी जा ' गाना शुरु कर दिया, हम सबने भी भरपूर साथ दिया पर बादलों ने एक न सुनी और बूंदों की रिमझिम लड़ी लगा दी। फिर तो 'गरजत बरसत सावन आयो री लायो न संग में बिछुड़े बलम को ' एक के बाद एक सुरीले गीतों की झड़ी लग गई और सभी उपस्थित साजन सजनी सुर बरखा में भरपूर भीग गए। पिकनिक अब बरखा महोत्सव में बदल चुकी थी । सामने एवन नदी में तैरते हंसों के जोड़े पानी में अटखेलियां कर रहे थे और गोल गोल भंवर बनाती बतखें झुंड बना कुशल बैलेरिना सी बारबार आंखों के आगे से तैर जा रही थीं। किनारे पर झुकी हरी नाजुक विलो की डालियां सुर के हर नाजुक मोड़ पर पुलक पुलक दाद दे रही थी। प्रकृति ने एकत्रित प्रतिभाओं के लिए एक सुन्दर रंगमंच तैयार कर दिया था। इन्हें एकत्रित करने का और इस सुन्दर संयोजन का पूरा श्रेय जाता है कृति यू. के. की महासचिव तितिक्षा शाह को जिन्होंने वातायन की दिव्या माथुर के साथ मिलकर इस सुरीली-रसीली पिकनिक का आयोजन किया था । साथ व सहायता के लिए हर काव्य रसिक जुड़ गया था। सरोज भाभी (सरोज शर्मा) ने तो अकेले ही सबके लिए ढेरों पूरियां बनाने का महारथी काम कर डाला था।
वहां जितने कवि थे उतने ही सुरीले सुर भी। कोई किशोर की याद दिला रहा था तो कोई मुकेश की , कहीं नूरजहां और शमशाद बेगम थीं तो कहीं सुरैया । कहीं निदा फाजली का गीत था तो कहीं राजस्थान का लोकगीत। रागरंग और शोर-शराबे की इस महफिल में जब कविताओं का दौर शुरु हुआ तो मानो आयोजन का रंग ही बदल गया। कोई कविता आंखों में अपना अस्तित्व ढूंढरही थी तो कोई गिर-गिरकर संभल रही थी। कोई उर्दू का शायर था तो कोई हिन्दी का विद्वान। वातायन की परंपरा को कायम रखते हुए पद्मेश जी ने उसी पल जन्मी अपनी नवीनतम कविता का ही पाठ किया।
जहां ' किस किस के झूठे अधर किसकिस से सच अब क्या बोलेंगे-'-सुदर्शन भाटिया की हलकी फुलकी और चटपटी 'किस ' शब्द पर खेलती कविता बरखा के छींटों सी यहां की संस्कृति पर छींटा-कसी कर रही थी और खुद ब खुद विध्यार्थी दिनों की यादों में ले जा रही थी जब मनचले सहपाठी किसमिस (किस-मिस) और टुगैदर ( टु-गेट-हर) जैसे शब्दों को नई-नई और चुलबुली व्याख्या दे देते थे, तितिक्षा शाह की कविता युवा भविष्य की संस्कृति और समझ को लेकर चिंतित थी जिन्हें मा के हाथ की खीर की जगह स्ट्राबेरी कस्टर्ड ज्यादा पसन्द आता है और जिन्हें हमारा प्यार और धरोहर आउटडेटेड ही लगती है।
कोमल प्रेम गीतों की कवियत्री अमृता तोषी जी एक लम्बी और त्रासद बीमारी के बाद साहस की सरहदें पार कर फिरसे कलम उठा चुकी हैं और उन्होंने अपनी नाजुक प्रेम की कविता से मौसम को कुछ और ही भावमय कर डाला। दिव्या जी की कद लम्बा करती नटखट नासमझ और महत्वाकांक्षी मेहराब से लटकी बूंदें गिरकर नष्ट हो जाने के बाद भी मन की गोदी में ही बैठीं रहीं। पर मन की गहराई में उतरीं अमेरिका से आई और उस गोष्ठी की मुख्य कवि सुषम वेदी की कविताएँ। तुम यहां होकर भी नहीं हो और नहीं होकर भी हो--एक मुग्धा नायिका जो अपने भावों की तीव्रता और गहराई से सभी को मुग्ध किए जा रही थी। इसके पहले दिन ही हम बरमिंघम बासी एक शाम सुषम बेदी के साथ बिता चुके थे। सुषम बेदी एक कवियत्री, सुषम बेदी एक साहित्यकारा और सुषम बेदी एक कलाकार से रूबरू हो चुके थे। उनकी यादों की उंगली पकड़े उनके साथ जलंधर, लखनऊ और दिल्ली की गलियों से निकलते अमेरिका तक जा पहुंचे थे। वहां की 'सड़क की लय ' सुन चुके थे। जान चुके थे कि कैसे मा उनकी रचनाओं में अक्सर आती जाती रहती है और कैसे आज भी वह हर बेटी की तरह मां की सुगंध में रची बसी हैं। कितने साहस और ईमानदारी के साथ उन्होंने अपने लेखन में प्रवासी मन के भय और उद्वेलन को समेटा है। विचार सजग और कर्मठ लेखिका सुषम बेदी से रूबरू कराया था हमें हिस्ट्री टॉकिंग. कॉम के रचयिता श्री विजय राणा ने अपने उसी सहज और रोचक अंदाज में। डायरी के पन्नों की तरह अपने बचपन के पन्ने पलटते हुए उन्होंने हमें बताया था कि कैसे उनका बचपन में सोलह साल की उम्र में लिखा पहला उपन्यास किसी बाल सहेली के पास ही रह गया और सन 78 से उन्होंने एकबार फिर से लिखना शुरु किया। अपने साहित्य के बारे में बताते हुए उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने अपने उपन्यास लौटना में यह बताने की कोशिश की है कि जीवन में कभी लौटना संभव ही नहीं हो पाता क्योंकि जो छूटा वह अपने मौलिक रूप में न कभी लौट पाता है और ना ही वापस ही मिल पाता है। और यदि हम लौट भी आएं तो नतीजा कभी अच्छा नहीं होता। पांडव लौटे तो महाभारत हुआ, राम लौटे तो सीता को बनवास मिला। कृष्ण कभी नहीं लौटे इसीलिए बहुत कुछ कर पाए। जहां रहो उसी को अपनाओ और यहां मैं उनसे पूर्णत: सहमत हूं । आगे की ओर देखो यद यही कर्मवीर योगे·ार कृष्ण ने गीता में भी तो कहा है। जब पुराना हटता है तभी तो कुछ और नया पनप पाता है । प्रकृति का भी तो यही नियम है। भले ही यह छूटने और टूटने की प्रक्रिया कितनी ही तकलीफ देह क्यों न हो पर कभी न कभी तो अलग होना ही पड़ता है। जीवन का भी यही नियम है। मजबूर हूं सोचने को क्या यदि गांधीजी न लौटते तो क्या हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के रूप में भारत दो टुकड़े होने से बच जाता… गान्धीजी ने तो इस विभाजन को रोकने के प्रयास में अपनी जान तक गंवा दी थी !
सुरों और भावों की रिमझिम में हम सब इतना भीगे कि अंत में बस सब पानी-पानी ही था... बाहर-अंदर, आसपास, आंखों में, होठों पर, बालों पर, और-तो और, पैरों के नीचे भी।...
(यूं तो भारत के हर प्रान्त में ही वर्षा का स्वागत जोश से होता है परन्तु उत्तर प्रदेश और राजस्थान में वर्षा की छटा निराली है। स्वागत की कई-कई रसीली और गीत-संगीतमय परंपराएँ हैं। स्मृति कोष से यादों के उन्ही चन्द छींटें को लेकर आ पहुंची हैं कादम्बरी मेहरा।)
बरखा ऋतु और तीज-त्योहार
आई सावन की बहार, पड़े बूंदन फुहार
देखो भींजत अंगनवां , अरे संवरिया।। देखो...
गोरिया के माथे सोहे लाली रे टिकुरिया।
सिर पे धानी रे चुनरिया, अरे संवरिया।।
भारत का श्रावण मास ! श्रावण नक्षत्र से श्रावण यानी सावन। 'मासे मासोत्तमे श्रावणमासे।'
बैसाख, जेठ व आसाढ़ की तपिश के बाद घने काले मेघों का मास जिनकी उदारता मौसम को ठंडा बना देती है। मौसम की यह जीवन-दायिनी शीतलता, कौन इससे वंचित रहना चाहेगा। अंग्रेजों ने भी इसके अभ्यागत असर को अनुभव किया । मौसम से ही शब्द ढाला मौनसून। यूं तो आसाढ़ से ही मेघ आकाश पर छा जाते हैं परन्तु सावन आते-आते सारी सृष्टि अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित हो जाती है। मैं ठहरी रंग रसिया। सघन भूरे संवलाए आकाश के नीचे हरियाली के सारे स्वर ! सावन मास न केवल रंगों का वरन् स्वरों का भी मास है। एक ओर घन-गर्जन व जल-नर्तन, दूसरि ओर पशु-पंछियों का कलरव और इम सबसे सर्वोपरि किशोरियों के स्वर,
आयो सावन अधिक सुहावन
वन मां बोलन लागे मोर।
दामिनी दमकें मेघा गरजें
रिमझिम मेंह मचावें शोऱ।।
कदाचित निरंतर श्रवण के लिए इस ऋतु का नाम श्रावण रखा गया होगा।
भारत के सभी कवियों ने श्रावण मास की सुन्दरता व उसके प्रभाव को व्यक्त किया है। रामायण में श्री राम सिया को ढूंढते समय कहते हैं,
घन घमंड नभ गर्जत घोरा। पिया बिनु डरपत मन मोरा।
दामिनी दमक रही घन माहीं। खल की प्रीत जथा चिर नाहीं।।
साधु सन्तों के लिए यह प्रवचन का समय है,
पावस आइल देखि कै कोइल साधै मौन।
दादुर जब वक्ता भये पूछत हमको कौन।।
या फिर
बढ़त बढ़त संपत्ति सलिल, मन सरोज बढ़ि जाय।
घटत घटत फिर ना घटै, बरु समूल कुम्हलाय।।
सावन ऋतु में भरे जलाशयों में कमल के विकास को देखकर कवि ने लालच का वर्णन किया है ।
किसान के भाग्य खुल जाते हैं। नम धरती। बोआई का समय। पशु के भाग्य खुल जाते हैं। नम घास। चराई का समय। स्त्रियों के भाग्य खुल जाते हैं। भरे जलाशय। पानी भरने की छुट्टी। मेले झूलों के लिए समय मिल जाता है।
श्रावण मास। धरती की अंगड़ाई के साथ ही युवा जगत भी अंगड़ाई लेता है। रोमांस का समय। किसी का मिलन । किसी की जुदाई। मौसम की ठंडक का फायदा उठाकर कमाई करने शहर हाट चले जाते हैं। विशेषकर कला-जीवी। गर्मियों में छप्पर के नीचे बैठकर जो हाथ की कुशलता से सामान तैयार किया था वही मेलों में बिकेगा। कुछ बेचेंगे, कुछ खरीदेंगे,
रानीः -राजा लश्कर जइयो जी तो लइयो मोरी धानी चुनरी।
राजाः -रानी मैं क्या जानूं जी कि कैसी तोरी धानी चुनरी ।।
रानीः -ऊदा ऊदा दढिया होय किनारों चहुंओर जड़ी।
राजाः -रानी अबकी जइहों जी शहर से लइहों धानी चुनरी।
रानीः - राजा इहां कैसे ओढ़ेंगे नजरिया लागे धानी चुनरी।।
राजाः - रानी पीहर जइहो जी , उहां पै ओढ़ौ धानी चुनरी।
राजाः -रानी हम कैसे देखेंगे कि कैसी लागे धानी चुनरी।
रानीः - ओ राजा तीज पै अइहो जी तो तब देखो धानी चुनरी।।
सावन में मायके जायेगी। क्योंकि सावन भाई बापू की खैर मनाने का मास है। घर में दूध-दही, फल, अनाज की बहुतायत होती है। बेटी का मरद परदेस चला गया तो बेटी को मायके बुला लिया जाता है। कवि शैलेन्द्र ने ऐसी ही एक किशोरी की हृदय विदारक अरज एक गीत में उतारी है,
अबके बरस भेज भइया को बाबुल
सावन मां लीजो बुलाय रे।
अंबुआ तले जब झूले पड़ेंगे
ठंडी पड़ेंगी फुहारें
लौटेंगी जब तेरे आंगन में बाबुल
सावन की ठंडी बहारें
पूछेंगी जब मेरे बचपन की सखियां
दीजो संदेशा भिजाय रे।
आज भी जब बेटी बेटे ब्याह गये, माता पिता स्वर्ग सिधार गये, यह गीत आंसुओं से रुला जाता है। झूले को देखकर किसे मायके की याद नहीं आती ?
मैने देखा पूरे भारत में जितना झूले का चाव है अन्य किसी सभ्यता में नहीं। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व के भारत पर दृष्टि डालें तो बगीचे रखना रईसों का शौक था, खासकर गंगा और जमुना किनारे वाले शहरों में। यह बगीचे वनस्पति संग्रह के लिए कम और ऐशो-आराम संग्रह के लिए अधिक होते थे। इनमें बाकायदा आरामगृह, वीथियां झरोखे, गोल गुम्बददार जालियां (गजीबो), शिकारगाह, अमराइयां, संगीतकारों के रहने के इंतजाम आदि होते थे। श्रावण मास में झूले डलवाये जाते थे और मित्रों का जमघट लगता था। बनारस ऐसे बगीचों के लिए प्रसिद्ध है। अपने बचपन की यादों में ऐसे बगीचों में की गई पिकनिक की याद है। पिताजी के ननिहाल में ऐसा ही एक बगीचा था। अब वहां पिताजी की नानी, नारायणी देवी के नाम पर नारायण नगर बस गया है। ननिहाल वाले मकान में एक ओर घर-वालियां रहती थीं और दूसरी ओर दीवानखाना था जिसमें शाम को संगीत की महफिलें सजती थीं। उस समय की मशहूर गायिका थीं स्वर्गीया श्रीमती जद्दन बाई, जो श्रीमती नरगिस दत्त की मां थीं।
तब ना टी.वी. था, ना रेडियो। संगीतकार इन्ही महफिलों के दम पर अमर संगीत रच पाये। रेडियो का युग आया तो श्रीमती जद्दनबाई स-दल-बल मुंबई पधार गयीं। संगीत का स्वर्ण-युग यों ढल गया। हमारे भाग्य में रह गया सेकेंड हैंड संगीत-श्रवण, यानि असली गायन के सी.डी, टेप आदि।
फिर भी जब शुभा गुर्टू की स्वर-लहरी गूंजती है,
झूला, धीरे से झुलाओ बनवारी रे
सांवरिया बनवारी रे
झूला झुलत मोरा जिया डरत है
याद आते हैं मौलश्री के फूल, तुलसी के नन्हे नन्हे गाछ, मेले से लाई पैसे पैसे की गागर, सुराही और धानी, गुलाबी रंगों की पुड़िया। जाने कितनी छोटी छोटी लकीरें रंगके हम सजाते थे अपनी कपड़े की गुड़ियाँ। कुर्सी के डंडे में उनके लिए झूला बांधा जाता था। खाटों के पीछे उनकी ससुराल और बरांडे के दूसरी ओर मायका। क्या वह कल्पना का अछूता स्वर्ग कभी साकार हो पाया किसी अल्हड़ बाला के यथार्थ में ? संदेह है,
बैरन जवानी ने झूले सजायेऔर मेरी गुड़िया चुराई
बाबुल रे मै तेरे नाजों की पाली
काहे को हो गई पराई...
थोड़े हाथ-पांव लम्बे हुए तो कुछ लच्छन सीखो की गुहार पड़ने लगी। जन्माष्टमी के ड्रामे। माखनचेर लीला !
बरांडे में एक ओर चादरों में नाडा डालकर पर्दा बनाया जाता था, उसके पीछे तखत बिछाकर स्टेज। स्टेज से सटा कोठरी का दरवाजा-यानि हमारा नेपथ्य ! पांवों से भारी सेर सेर भर के घुंघरू बांधकर नाच ! तबले से अधिक तखत की पट पट ताल !
अरे नागनिया बन के डस गई मोहन
तेरी बांसुरिया।
रिमझिम रिमझिम मेंहा बरसे
चमके बिजुरिया।
अरे मै कैसे आऊँ मोहन मेरी
भीगे चुनरिया। अरे नागनिया...
कारे कारे बदरा गरजें
डरपत रे जियरा
अरे मैं कैसे आऊँ मोहन
नाहीं सूझे डगरिया।
तब क्या अभिसारिका नायिका का अर्थ पता था ? क्या हमारी मां दादी को भी पता था ?
झूले पर पेंग चढाते । धक्का देती कहारिन गंगाजली ! समवेत स्वर गूंजता,
उड़ि जाओ रे सुगनवा गंगा पार
खबर लाओ साजन का।
जिया सावन में लरजे हमार
बताय जाओ साजन का।
सोने की थाली में जेवना परोसा
उड़ि जाओ से सुगनवा गंगा पार
खिलाय आओ साजन का।
रूपे की गागर गंगाजल पानी
उड़ि जाओ से सुगनवा गंगा पार
पिलाय आओ साजन का।
मोगरा के फूलन बिछौना लगाया
उड़ि जाओ से सुगनवा गंगा पार
बुलाय लाओ साजन का।
कोई नवोढ़ा परदेस गये पिया को याद कर रही है सावन में। तोते को दूत बना रही है संदेश भिजवाने के लिए। तोते से याद आयी---कच्चे अमरूदों की ललक ! काले नमक की चोरी। तोते के झूठे ज्यादा मीठे होते हैं ! तोते का काटा खाओगी, जुबान पैनी हो जायेगी। संस्कृत के रूप अच्छी तरह रट पायेंगे। और वह कच्चे करौंदे, कंटीली झाड़ियों में घुस-घुसकर झोली भरते थे उनसे। यहां उसे क्रेनबरी कहते हैं। आयुर्वेद ने उसे सौ गुणों से युक्त माना है। उन्ही से सीखकर इस देश में क्रेनबरी हर चीज में परोसी जा रही है जबकि भारत में इसकी उपज और प्रयोग नगण्य है।
सावन की बात चली तो गीता दत्त की याद आई। कितना सटीक वर्णन,
हौले हौले हवाएं डोलें, कलियों के घूंघट खोले
आना मेरे मन के राजा पिहू पिहू पपीहा बोले।।
कारे कारे बदरा छाये और संदेशा लाये
सावन सुहावन आया, पिया मोरे तुम ना आये।।
बिरही गगन रोये, मेरे दो नयन रोये
पिया तुम पास नहीं कहां किस देस खोये।
घन घन बदरा गाजे घन घन पायल बाजे
छाई छाई हाय बहार, तुम बिन जिया ना लागे।।
विरहा बात चली तो मीराबाई की सानी कहां ?
बरसे बदरिया सावन की, सावन की मनभावन की
सावन मे उमग्यो मेरो मनवा भनक सुनी हरि आवन की
उमड़ घुमड़ चहुं दिसि से आयो दामन दमके झर लावन की
नान्ही नान्ही बूंदन मेहा सीतल पवन सोहवन की
मीरा के प्रभु गिरधर नागर आनंद मगन गावन की।
श्रावण नक्षत्र के साथ ही चौमासा शुरु होता है। यानि देवता सो जाते हैं या कहिए छुट्टी पर चले जाते हैं। चौमासा यानि सावन, भादों, क्वार व कार्तिक ! असाढ़ मास की चांदनी एकादशी को देव-शयनी एकादशी भी कहा जाता है। तबसे लेकर कार्तिक मास की देव-उठनी एकादशी तक चौमासा। देव उठनी एकादशी को तुलसी विवाह होता है, फिर सब ठीक। इस काल में हिंदु विवाह आदि नहीं करते थे। कारण था स्वास्थ्य ! बरसात में जलचरों का बाहुल्य, मच्छरों, मक्खियों एवं कुकुरमुत्ते का उद्भभव अनेकों मौसमी संक्रामक रोगों को जन्म देता है। इसी कारण से जैन धर्मावलम्बी मूलक सब्जियां नहीं खाते। दही भी नहीं खाया जाता क्योंकि उसमें बैक्टीरिया होते हैं और बरसाती दही अक्सर बुड़क जाता है। भारत में कढ़ाही में तला भोजन अदिक शुद्ध माना जाता है क्योंकि उसमें संक्रामक रोगाणु नहीं बच सकते। इधर पानी बरसा उधर पकौड़ों की मांग आई। चाय और पकौड़े। तले समोसे, अंदरसे, जलेबियां, पतावड़, पुलबड़ियां आदि बरसातों के प्रिय व्यंजन हैं। सावन मास में धूप न निकलने के कारण संक्रामक रोगों के कीटाणु मर नहीं पाते। कीट-पतंगे जलाशयों में पानी भरने से बहुलता से जन्मते हैं। ताजी तुलसी की पत्ती व अदरक की चाय गुणकारी होती है।
श्रावण मास के प्रमुख त्योहार सोमव्रत एवं मंगलागौरी पूजन है। पूरा महीना शंकर पार्वती को अर्पित है। सावन के सोमवारों को मंदिरों में श्रंगार किया जाता है। अनोखे श्रंगार। बनारस के मारवाड़ी मन्दिर में मक्खन की बट्टियों का श्रंगार देखा। मक्खन को शुद्ध करके उसी के फूल-पत्ती, झूले, मूर्तियां, खंभे, पशु-पक्षी ! पिघलता भी नहीं था। भारत की हस्तकला देखने का सबसे सुन्दर अवसर इसी समय प्राप्त होता है।
श्रावण मास के मंगल किशोरियां पति प्रप्ति के लिए व्रत रखती हैं एवं विवाहिता स्त्रियां पुत्र कामना से गौरी का पूजन करती हैं।
कामिका एकादशी व्रत कृष्णपक्ष की एकादशी को रखा जाता है, जिसके प्रभाव से पाप नाश होते हैं।
सारी दुनिया को अचंभित करने वाला श्रावण मास का अनूठा त्योहार है नाग-पंचमी। पूरे भारत में नागों को बुलाकर दूध पिलाया जाता है। विश्वास है कि ऐसा करने से सांप नहीं काटता। दरअसल वर्षा के आगमन से सांपों के बिलों में पानी भर जाता है और वह बिलबिलाकर बाहर निकल पड़ते हैं। मेढकों का स्वर्णकाल यही होता है और शिकार करने का सांपों के लिए इससे अच्छा समय और क्या होगा।
नागपंचमी की कथा बड़ी मार्मिक है। एक ब्राह्मण के सात पुत्र थे। सावन ऋतु आने पर उनकी स्त्रियां अपने-अपने मायके चली गईं। सातवीं को लिवाने कोई नहीं आया क्योंकि उसके कोई भाई नहीं था। अकेली उदास बैठी वह शेषनाग जी का ध्यान करने लगी। शेषनाग जी दयावश, तुरंत मानव रूप में प्रकट हुए और उसे नागलोक लिवा ले गये। अर्थात धरती के गर्भ में। वहां उन्होंने उसे अपनी बहन बनाया। तभी नागरानी ने असंख्य पुत्रों को जन्म दिया। उसने इस बहन का आगमन अति शुभ माना और उसे पुत्रों का वरदान दिया। साथ ही एक चमत्कारी दीपक प्रदान किया, जिसकी ज्योति सदा जलती रहती थी और वह स्व-प्रकाशित था। गलती से वह दीपक उसके हाथ से छूट गया जिससे पास ही खेलते हुए नागपुत्रों की पूंछ जल गई। क्रुद्ध होकर नागरानी ने बहन को वापस मृत्युलोक में उसकी ससुराल भेज दिया।
अगले बरस इसी दिन की याद में बहन ने सावन की पंचमी वाले दिन दीवाल पर नागों के चित्र उकेरे और अपने भाई-भतीजों को याद करती उनकी पूजा करने बैठी। इधर वह नाग बालक अपनी कटी पूंछ का बदला लेने उसे डसने आए। जब देखा वह तो उन्ही का पूजन कर रही है, उन्हे बहुत अच्छा लगा। नागों को देखकर बहन ने स्वागत में उन्हें दूध पिलाया। तभी से नागों को नागपंचमी के दिन दूध पिलाकर भाई-भतीजों की कुशल मनाई जाती है।
भाइयों की कुशल मनाने का सबसे निराला त्यौहार एकमात्र भारत में मनाया जाता है-रक्षा-बन्धन ! भाई बहन के रिश्ते का पवित्र उत्सव। मैं समझती हूं कि इस त्योहार को हमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित करना चाहिए। यदि भारत में वेलेंटाइन डे मनाने का रिवाज चल पड़ा है तो क्यों नहीं हम प्रवासी जन मिलकर रक्षा-बन्धन का प्रचार करते? प्रेम का पविक्ष स्वरूप अधिक गुणकारी होगा बजाय वेलेंटाइन की हूड़बाई ( अनोखा, अर्थमय शब्द। मेरा मां की भाषा से) के ।
राखी धागों का त्यौहार
बसा हुआ है इस धागे में भाई बहन का प्यार।
या फिर
भइया मेरे राखी के बंधन को निभाना
भइया मेरे छोटी बहन को ना भुलाना।
श्रावण पूर्णिमा सदा-सदा आती रहे और भारतवर्ष---हमारा बिछड़ा भाई हमें सदा-सदा याद रखे।
वर्षा-ऋतु भादों में और भी अधिक गदरा जाती है। भादों की पहली तीज को कजरी तीज कहते हैं, जो रक्षा-बन्धन के तीन दिन बाद आती है। कजरी या कजली शब्द काले रंग का पर्याय है। कदाचित बादलों के घने काले रंग, दिन में भी रात का आभास देने वाली घटाओं से प्रेरित कजली शब्द जुड़ा होगा। परन्तु ऐसा कहा जाता है कि बनारस मिर्जापुर क्षेत्र के आसपास कजली वन था। इसी के नाम पर कजली तीज का नाम पड़ा।
इस दिन झूले डाले जाते हैं। सुहागिनें फूलों का श्रंगार करके कजरी खेलती हैं । कजरी के गीत प्रसिद्ध हैं।
एक किशोरी घर से निकलती है तो उसकी भाभी उसे रोकती है,
भाभीः- तोके गंगा माई कसम जाय न देबै तोके हम , जब तुम जाये लगिहौ छिकबै दुअरिया
बदरिया घिर अइले ननदी।
वर्षा-ऋतु पर भारत की अर्थ-व्यवस्था निर्भर है। क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है। वर्षा ना होने से अन्न की कमी हो जाती है। सभी तीज त्योहार वर्षा के उत्सव हैं। एक समवेत प्रार्थना। हर तरह से देवताओं को प्रसन्न करने का प्रयास। ईश्वर भले ही ना हो कहीं परन्तु वर्षा पर मानवों का या किसी भी अन्य भौतिक शक्ति का जोर नहीं। अंत में प्रार्थना ही मनुष्य का एकमात्र संबल रह जाता है। हमारे शास्त्रों में इंद्रदेव को वर्षा का अधिकारी माना जाता है। अतः उनको प्रसन्न करने के अनेकों मंत्र-तंत्र, योग-विधान हैं। पूरा वृष्टि यज्ञ किया जाता है। सन 76 में इंगलैंड में वर्षा नहीं हुई। जिसके कारण जल का अभाव हो गया। फसलें नष्ट होने लगीं। तब विश्व हिन्दु परिषद व अन्य धार्मिक संस्थाओं ने वृष्टि यज्ञ लंदन में किया। इसमें हजारों परिवारों ने भाग लिया। जिस दिन पूर्ण आहुति हुई उस दिन पानी बरसा और यह विश्व-व्यापी समाचार बन गया। इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए भारत में संगीतज्ञों ने भी अपूर्व साधना की है युगों से। मेघ-मल्हार गाने से वृष्टि होती है। वृंदावनी सारंग और मेघ मल्हार, शुद्ध मल्हार आदि राग सावन की ऋतु में गाए जाते हैं और अनेकों गीत इन रागों में सावन का गुणगान करते हैं।
हिमाचली जंगलों में आजकल जगह-जगह देवदार, चीड़, बान, साल, शीशम, खैर, सैन आदि के सूख चुके वृक्ष या सूखते पेड़ अपनी व्यथा सुनाते देखे जा सकते हैं। इन वृक्षों का कसूर है-इनके द्वारा एक ऐसी बेल को आश्रय देना, जो इनके जीवन रस पर जीती है और इनका जीवन हरने के बाद खुद भी मौत के आगोश में समा जाती है। सिरमौर, सोलन तथा शिमला जि़लों में यह बेल धीरे-धीरे सारे जंगलों को अपनी चपेट में लेती जा रही है। सिरमौर के पांवटा साहिब से सराहां से होते हुए शिमला की ओर बढऩे पर इस नामुराद बेल के चंगुल में फंसे सैंकड़ों पेड़ अपने अस्तित्व की लड़ाई से जूझते नज़र आ जाते हैं। इस बेल से होने वाली हानियों के प्रति उदासीनता बरतने से हम अनजाने में भविष्य में ऐसी समस्याओं से जूझने जा रहे हैं, जिनसे पार पाना आसान नहीं होगा। आने वाले समय में हिमाचल के जंगलों में केवल ठूंठ ही नज़र आएंगे तथा करोड़ों रुपयों की हानि के अतिरिक्त प्राकृतिक सुन्दरता में कमी आएगी, तापमान में वृद्धि होगी और कार्बन न्यूट्रल राज्य का ध्येय केवल सपना बनकर रह जाएगा। आईवी, हाईड्रा हैलिक्स तथा कसकुटा के नाम से जाने जानी वाली यह बेल किसी भी पेड़ की जड़ों के आस-पास उग आती है। केवल दो सालों के भीतर ही उसे अपने शिंकजे में इस तरह कस लेती है कि वृक्ष को अपना अस्तित्व कायम रखना मुश्किल हो जाता है। वृक्षों पर लदी हरे, लाल-पीले पत्तों वाली यह बेल देखने में बड़ी सुन्दर लगती है। आम आदमी को यह अंदाज़ा ही नहीं होता है कि थोड़े समय के बाद यह बेल पेड़ को सुखाने के बाद स्वयं भी सूख जाएगी। यह बेल अपने शिकार वृक्ष से भोजन मिलते ही, होस्टोरिया नामक रस का उत्पादन आरंभ कर उसे अपने शिकार की तंत्र प्रणाली में डाल देती है। ज़मीन में अपनी जड़ें छोडऩे के बाद यह अपने शिकार वृक्ष पर जड़ें जमा लेती है। स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से अपने आपको ढालने वाली यह बेल एक साथ कई वृक्षों को अपने चंगुल में लेने सक्षम होती है। यह परजीवी बेल पेड़ के रस पर जीती है, पर पेड़ सूखने पर इसके अपने जीवन पर भी संकट आंरभ हो जाता है और थोड़े ही समय में यह खुद भी सूख जाती है। अपने मेजबान की क्षमता के आधार पर ही इसकी कठोरता निर्भर करती है। किसी वृक्ष पर हमले के समय यदि उसमें कोई विषाणु मौज़ूद होते हैं, तो यह उन वृक्षों में बीमारी से लडऩे की शक्ति को क्षीण कर देती है। इस आक्रमणकारी एवं विनाशक बेल का साम्राज्य केवल हिमाचल ही नहीं केंद्रीय, उत्तरी तथा पश्चिमी यूरोप, आस्ट्रेलिया एवं संयुक्त राज्य अमेरिका में भी फैला हुआ है। वृक्षों तथा चट्टानों के सहारे इसकी लंबाई 20 से 30 मीटर तक हो सकती है जबकि इससे कम ऊंचाई के पेड़ों पर यह अपने को पूरी तरह फैला देती है। यह परजीवी बेल अपने शिकार के शरीर पर जड़ों के सहारे शिकंजा कसती है। इसकी पत्तियों की लंबाई 50 से 100 सेंटीमीटर होती है। अन्य आक्रमणकारी बेलों, जैसे कुडज़ू की तरह यह पौधा अपने शिकार को समाप्त कर उपजाऊ भूमि को मरू बना देता है। उत्तर-पश्चिमी पैसिफिक तथा दक्षिणी संयुक्त राज्य अमेरिका में इस बेल को प्रांतीय तथा केंद्र प्रायोजित प्रयासों से नष्ट किया जा रहा है। सिरमौर जि़ला में इस बेल को स्थानीय भाषा में दूधिया बेल के नाम से जाना जाता है। पांवटा साहिब तथा अन्य निचले क्षेत्रों में यह बेल 10 से 15 फुट के पेड़ों को ही अपना शिकार बनाती है, जबकि इससे अधिक ऊंचाई के पौधे इसके आगोश से बच जाते हैं। इन क्षेत्रों में यह बेल अपने शिकार पेड़ को पूरी तरह आच्छादित कर लेती है। सरांहा, कुमारहट्टी, बड़ोग, मशोबरा, कोटी तथा अन्य ऊंचाई वाले इलाकों में यह बेल पेड़ों पर पूरी तरह लिपटी नज़र आती है। हिमाचल में इस समस्या से पार पाने के लिए अभी तक पांवटा साहिब की प्रयास पर्यावरण संघर्ष समिति को छोडक़र कोई भी संस्था सामने नहीं आई है। संस्था के अध्यक्ष भजन चौधरी बताते हैं कि उनकी समिति ने इस मुद्दे को वन विभाग के समक्ष रखा है और उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की है। इस बेल के फैलने से पर्यावरण के साथ-साथ जंगलों की सुन्दरता भी नष्ट हो रही है। पर्यटन प्रभावित हो रहा है तथा प्रदेश को माली नुकसान भी झेलना पड़ रहा है। उनके अनुसार इस बेल से हो रहे नुकसान का ईलाज़ संभव है। आज से 15 साल पहले तक वन विभाग द्वारा सभी जंगलों की हज़ामत की जाती थी, जिसे कापस के नाम से जाना जाता था। इससे स्थानीय लोगों को रोज़गार मिलता था। इस अभियान के तहत जंगलों को बीट में बांटकर उगने वाले अनावश्यक तथा परजीवी बेलों, पौधों तथा झाडिय़ों को साफ कर दिया जाता था और उपयोगी वृक्षों को फैलने के लिए उचित वातावरण उपलब्ध करवाया जाता था। रोगग्रस्त छोटे पौधों की इस तरह सफाई की जाती थी कि वह पुन: अंकुरित हो सकें। जंगल की संबन्धित बीट को सुरक्षित रखने के लिए उसे कापस के बाद कुछ वर्षों तक बंद कर दिया जाता था और वनों का स्वाभाविक विकास होता रहता था। परन्तु आजकल यह प्रथा बन्द कर दी गई है, जिससे वनों की सुन्दरता नष्ट हो रही है तथा राज्य को पर्यावरण तथा पर्यटन के अलावा माली नुकसान भी झेलना पड़ रहा है।
नन्हे-नन्हे बादल जब पवन के कन्धों पर बैठकर घूमने निकले तो मारे खुशी के झूम रहे थे। घर के अन्दर बैठे-बैठे उन्हें प्रकृति का ऐसा नज़ारा कभी नहीं देखा था। ज्यादा-से ज्यादा अगर समन्दर ने खिड़की खोल दी तो कुछ रंग-बिरंगी मझलियां जरूर देखने को मिल जाया करती थीं, वरना पानी लाना और मां धरती के नीले-सफेद फेनिल आंचल से खेलना, मात्र बस यही एक मनोरंजन था उनका और समुन्दर की लहरें तो उन्हें इतनी प्रिय थीं कि उनके साथ खेले बगैर तो सो तक नहीं पाते थे वे।
आज पहली बार पवन के कन्धों पर बैठकर उन्हें बाहर की दुनिया की सैर का अवसर मिला था और वे बेहद खुश थे...इतने खुश कि मारे खुशी के आसमान पर जा बैठे थे... दिन के सूरज को ढक लिया था और अब वे रात के चंदा तारे तक जल्दी-जल्दी अपनी झोली में छुपा लेना चाहते थे।
नीचे वाटिका, उपवन, ग्राम, शहर न जाने क्या-क्या दिखाई दे रहे थे उन्हें... ।
पर बादल तो ठहरे बादल, बच्चे जो ठहरे, सरल और नटखट। जरा-सी पवन की आंख झपकी नहीं कि चुपचाप कन्धे से सरके और लगे आगे-आगे दौड़ने। जोश में एक दूसरे का हाथ तक छोड़ दिया उन्होंने और पापा पवन, मां पृथ्वी, यहां तक कि घर, सबसे ही दूर...बहुत दूर निकल गए। भूल गए वे कि रोज़-रोज़ धरती-मां उन्हे क्या सिखलाती थी---अकेले घर से दूर मत जाना, अजनबियों से बातें मत करना, वगैरह...वगैरह।
अब किसी बादल के आगे उंचे-उंचे पर्वत थे तो किसी की आँखों के नीचे गहरा नीला समन्दर। किसी के आगे फैला मरुथल का विस्तार था तो कोई सावन का अन्धा अभी भी हरी-भरी वादियों में ही विचर रहा था।
थोड़ी ही देर में जब पवन को पता चला कि सारे ही बादल पीछे कहीं छूट गए हैं, तो वह बहुत घबराया। लगा पागलों की तरह उन्हें ढूंढने। पास खड़े एक-एक पेड़ से पूछा उसने। नदियों से पूछा, सूरज की किरनों से पूछा ...सबसे पूछा--- तुमने कहीं मेरे बच्चों को तो नहीं देखा। पर सबका एक ही उत्तर था--- अभी-अभी तो यहीं पर खेल रहे थे।
बादलों को ढूंढता, तेजी से दैड़ता परेशान पवन बारबार उन्ही रास्तों पर गोल-गोल चक्कर काटने लगा, पर बादल कहीं नहीं दिखे। नाम ले-लेकर कई-कई आवाजें भी दीं, परन्तु एक भी जबाव नहीं आया। कहीं कोई अता-पता नहीं था बादलों का। खिसिया-खिसियाकर अब वह कभी उन्हें डांटता-फटकाराता तो कभी अपनी ही लापरवाही पर दुखी होता। कहां ढूंढे, किससे पूछे, कुछ समझ में नहीं आ रहा था अब उसके। लोग परेशान थे--यह पवन को क्या हो गया आज, कैसी आंधी-सी उठ खड़ी हुई है चारो तरफ... घबराकर सभी ने अपने-अपने खिड़की, दरवाजे, सब बन्द कर लिए और अपने-अपने घरों के अन्दर जा छुपे।
उधर अकेले-अकेले घूमते बादल जब थक गए और अंधेरा होने लगा, तो उन्हें बेहद डर लगा और भूख भी लग आई। उस दिन तो उनके पास कोई लन्च बौक्स भी नही था, जो रोज़ पानी लाते समय वे अपने साथ ले जाया करते थे। घर की और मां की कसकर याद आने लगी। परन्तु घर वापस जाने का रास्ता तो मालूम ही नहीं था उन्हें। लगे सब घबराकर जोर-जोर से रोने। इतना रोए कि आंसुओं ने टपटप टपटप पूरी पृथ्वी गीली कर डाली। सूखे हुए ताल-तलैया सब भर दिए और बहती नदियों में उफान आ गया। दरअसल रोते-रोते बेहाल हो गए वे। नतीजा यह हुआ कि जिधर देखो, उधर ही बाढ़ आ गई थी। जानते हो बच्चों, यह पृथ्वी पर पहली-पहली ऐसी बारिश थी जो कि आज भी सभी को याद है। इतने आंसू तो किसीने देखे ही नहीं थे कभी।
पर करुणामयी और समझदार पहाणियों से उनका यह दुख देखा न गया और थके हारे बादलों को गोदी में उठाकर उन्होंने खूब उन्हें बहलाया-फुसलाया...चुप कराया। कान्धे से लगा-लगागर थपकी दी और समझाया कि रोने की तो कोई बात ही नहीं, रोने से तो कुछ भी हासिल ही नहीं होता---यही नहीं नीचे बिखरी वादी में बसा घर ही नहीं, उनके घर जाने का रास्ता तक दिखा दिया उन्होंने तो उन्हें । पर तब भी उन बादलों को रोना बन्द नहीं हुआ , क्योंकि रात हो चुकी थी और उन्हें अपने मम्मी-पापा की बहुत ज्यादा याद आ रही थी। तब पर्वतराजा के कहने पर रेशे-रेशे बिखरे और बेहाल रोते बादलों को कुछ समझदार चंदा की किरनों ने गोदी में उठाया, कुछ जो थोड़े बड़े थे उनकी उंगली पकड़ी और सबको बहला-फुसलाकर उनके घर तक छोड़ आईं ।
तो इस तरह से जैसे तैसे वे थके, भूखे-प्यासे बादल वापस अपने घर पहुंच पाए। जानते हो बच्चों, उसके बाद बादल जब भी पवन के साथ घूमने जाते हैं, तो न तो उंगली ही छोड़ते हैं और ना ही अपनी धरती मां को ही आंखों से दूर होने देते हैं। बच्चों अब तुम पूछोगे कि फिर यह बारिश अब भी कैसे और क्यों होती रहती है, तो यह रोने की थोड़े ही, खुशी की बरसात है। गौर से देखेगो तो आज भी आकाश में घूमते ये बादल तुम्हें खेलते और खिल-खिलाकर हंसते और दौड़ते-भागते दिख जाएँगे। पवन के कन्धे पर बैठ कर सैर करती उनकी किलकारियों की आवाज भी साफ-साफ सुनाई देगी तुम्हें। कभी-कभी ज्यादा खुश होने पर भी तो आंसू निकल आते हैं, और यही वह बारिश है जिसका हम सभी को इन्तजार रहता हैं; इस सुख-वर्षा के गिरते ही चारो तरफ तरह-तरह के नए-नए फल-फूल उग आते हैं, फसलें लहलहा जाती हैं और हरियाली-ही-हरियाली छा जाती है। हां--शायद कभी-कभी एकाध भूला-भटका, अकेला दौड़ता बादल आज भी आकाश के किसी काले-अकेले कोने में तुम्हे परेशान और थका दिख ही जाए, पर यह भी अन्य सभी नटखट और शैतान बच्चों की तरह जल्दी-ही समझ जाएगा...अपना सबक सीख लेगा!