वर्ष 2011 ने भी 2010 की तरह ही विश्व में बड़ी उथल-पुथल, सड़े-गले को बदलने की भूख देखी, जिसके चलते कई तानाशाहों के तख्ते तो पलटे पर मानवीय सहज संवेदनाओं का विद्रूप और दुखद क्षरण भी दिखा। क्या धर्म और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू नहीं? कहीं समाज को जोड़ने की जगह तोड़ तो नहीं रहा यह जुनून? क्या दुनिया के 80 प्रतिशत् झगड़े-फसाद आज भी मत या आधिपत्य की ही लड़ाई पर ही, नहीं। विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों में मतभेद और मनमुटाव के कारण ही नहीं? फिर क्यों जरूरी है यह धर्म हमारे लिए ? किस सहारे की उम्मीद रखते हैं हम धर्म और इसके ठेकेदारों से? क्या प्रर्थनाएं सुनता भी है कोई, या फिर असहाय और निर्बलों का भगवान तक नहीं?सच्चाई चाहे जो भी हो, हमें अच्छाई में आस्था रखनी पड़ेगी...कुछ और नहीं तो एक आस, एक सांत्वना के लिए ही, अपने और दूसरों के मानसिक स्वास्थ के लिए ही।...
विचारों के प्रभाव को नकार नहीं सकते हम। मानसिक रूप से स्वस्थ समाज के लिए प्रार्थना और प्रयास यही रहना चाहिए कि आने वाले वक्त में भी मनों में ईश्वरीय तत्व सजग और अक्षुण्ण रहें और नया वर्ष 2012 विश्व के हर प्राणी के लिए अधिक आस्थामय , निर्माणकारी और सहज हो। शान्तिपूर्ण व सुखमय हो।
दुनिया के अंधेरे-से-अंधेरे कोने में पैदा हुई नरगिस भी ( तेजी से विश्व की बढ़ती जनसंख्या के बावजूद, और बदलते आर्थिक वातावरण और लुढ़कते शेयर व घटते हुए प्राकृतिक खनिज व खाद्य पदार्थ के बावजूद भी) अपनी बेनूरी पर न रोए और उसके व मानवता के दीदावर सुख-शान्ति के हिमायती हों।
कुछ भी लिखने के पहले स्पष्ट करना चाहती हूँ कि संशय हर चीज को विकार में बदल देता है। विश्वास ही जीवन का स्पंदन है। वैसे भी धर्म शब्द में ही उसकी वास्तविक उपयोगिता, जरूरत व अर्थ-महत्ता छिपी हुई है। संस्कृत के धृ धातु , जिसका अर्थ धारण करना; से व्युत्पत्त इस शब्द के दो अर्थ हो सकते हैं और दोनों ही बहुत सही व ठीक-ठीक व्याख्या देते हैः 1. जो धारण करने लायक यानी कि परिस्थिति और जरूरतों के हिसाब से श्रेष्ठ हो , वैयक्तिक व सामाजिक विकास करे, वही अपनाना। 2. इस संसार को और खुद को धारण यानी कि सहने और रह पाने लायक बनाना, बनाने का सतत् प्रयास करते रहना.. यानी कि दूसरे हमें बर्दाश्त कर पाएं और हम दूसरों को, इस लायक बने रहना, यही किसी धर्म का पहला और अंतिम नियम और जिम्मेदारी है और यह तभी संभव है जब हम दूसरों के हित-अहित के बारे में भी उसी सहृदयता व समझ से सोचें, जैसे कि अपने लिए सोचते और करते हैं। स्वर्ग या नर्क तो अगला सोपान है, पहले तो हमें इसी दुनिया को रहने और सहने लायक बनाना है। साहित्य व समाज एक दूसरे से अलग नहीं। स-हित ही समाज भी है और साहित्य भी।
बदलाव सिर्फ बदलने के नाम पर कोई लक्ष्य नहीं साध पाता। बदलती जरूरतों के अनुसार खुद को ढालना, जिससे बाहरी और आंतरिक दुनिया के तौर-तरीके और नेयमतें सबके लिए ही सुखदायी व उपयोगी हों, क्या ऐसे नियम और शिक्षा का प्रचार ही असली धर्म नहीं? मानवता के हित में नहीं ? सभी धर्म-ग्रन्थों का सार नहीं?
भले ही रास्ते के कांटे-कंकड़ हटाने के लिए सुदर्शन चक्र उठाना पड़े य़ा कृपाण। जीवन यानी कर्म ही तो धर्म है। कृष्ण ने गीता में भी यही कहा है और नानक व मुहम्मद ने गुरुबाणी और कुरान में भी। याद रखने की जरूर है कि लड़ाई, बुराई या विकारों से है, व्यक्ति या जाति विशेश से नहीं । शक्ति व पदवी स्वार्थ-सिद्धि का साधन मात्र नहीं। दूसरों की तकलीफ और दुखों के सहारे झूठे वादे देकर भड़काना और बर्गलाना फिर बंदर-बांट करना शायद सबसे बड़ा अधर्म है जो आज हर तबके हर परिस्थिति , हर स्तर पर हो रहा है। लालच और अनैतिकता के रथ पर सवार स्वार्थी नए-नए मुखौटे लिए घूम रहे हैं। धर्मभीरू बदलें या न बदलें, इन्हें रोकने और इनसे बचने का साहस व धैर्य पैदा करना ही शायद आज के धर्मवीर का सबसे बड़ा ध्येय होना चाहिए। आखिर भगवान भी तो इन्सान का ही रूप लेकर आते हैं हमारे बीच में ही रहते हैं।
दया, क्षमा, सहिष्णुता और त्याग जैसे शाश्वत आधारभूत सत्यों को स्वीकारते हुए बदलते वक्त , जरूरत और साधनों के अनुकूल खुद को ढालते चलना ही धर्म की राह है, न कि स्वर्ग या नरक के लालच और भय में आडंबर युक्त अनुष्ठान और विनाश का संकल्प! धर्मग्रन्थों की जरूरत पढ़ने के लिए नहीं , समझने और जीने के लिए आज अधिक हैं। जीवन ही तो धर्म है। यही वजह है कि लेखनी का नए वर्ष का पहला अंक हमने 'आधुनिकता' या वक्त की बदलती जरुरतों पर, उनके साथ सामंजस्य पर, आधुनिकता की परिभाषा पर रखने का मन बनाया है। विषय पर आपकी संयत और भद्र रचनाएं-कविता, कहानी लेख आदि आमंत्रित हैं।
ईश्वर या दैवीय शक्ति में अपार श्रद्धा होने के बावजूद भी किसी भी धर्म का आडंबर पूर्ण कर्मकाण्ड और दिखावा मन कभी आत्मसात नहीं कर पाया, शायद यही वजह है कि सहज विवेक देते कबीर और रहीम के दोहे आज भी मन के बेहद करीब हैं। पसंद के कुछ कबीर के दोहों को आपके मनन और आनंद के लिए माह विशेष में संजोया है। उम्मीद है लेखनी की अन्य सामग्री के साथ आपको ये भी पसंद आएंगे।
धर्म का मुद्दा लेखनी ने किसी वर्ग या संप्रदाय पर उंगली उठाने या किसी को सही-गलत प्रमाणित करने के लिए नहीं, मात्र चारो तरफ बिखरे विनाश और दुख के बीच राहत खोजने के प्रयास में ही उठाया है क्योंकि धर्म के नाम पर आज भी हम बारबार ही भटक और भटका रहे हैं जबकि बकौल इकबालः 'मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना।'
वक्त की जरूरतों को आवाज देने का एक विनम्र इंगित मात्र है, यह अंक ।
एकबार फिर शान्त और सुलझी मानवता द्वारा सहभोग्या और सदाफूला धरती के लिए अटूट सपने और प्रार्थना के साथ , आगामी क्रिसमस और नवागत् वर्ष 2012 की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ!
तू ईश्वर है या अल्लाह मुझे एक नज़र ही आये फिर मालिक तेरी दुनियाँ में क्यों झगड़ा है इंसानों में हर दिशा दिखे तेरी झलकी , हर साँस गिने तेरी गिनती तेरी ही दी इन साँसों को क्यों छीना है इंसानों ने फिर मालिक तेरी दुनियाँ में क्यों झगड़ा है इंसानों में.....
यह दंगे ख़ून ख़राबा मालिक तेरे नाम पे क्यों हैं मस्जिद मंदिर का झगड़ा मालिक तेरे नाम पे क्यों हैं ये सिसका सहमा आँगन क्यों पाटा है इंसानों ने फिर मालिक तेरी दुनियाँ में क्यों झगड़ा है इंसानों में.....
घर लुटे हुए और जले हुए मालिक तेरे नाम पे क्यों हैं ज़िन्दा कटते मरते इन्साँ मालिक तेरे नाम पे क्यों हैं उजड़ी बेवा के आंचल को क्यों खींचा है इंसानों ने फिर मालिक तेरी दुनियाँ में क्यों झगड़ा है इंसानों में.....
लुटती माँ बहनों की इज़्ज़त मालिक तेरे नाम पे क्यों हैं इक नन्हीं बच्ची के आँसू मालिक तेरे नाम पे क्यों हैं इन बच्चों को बेदर्दी से क्यों गोदा है इंसानों ने फिर मालिक तेरी दुनियाँ में क्यों झगड़ा है इंसानों में.....
धर्मों क़ौमों के ये झगड़े मुझे दूर दूर तक दिखते हैं सिंदूर सुहागन की मांगों से नगर नगर में छुटते हैं बच्चों को इन हथियारों से क्यों लादा है इंसानों ने फिर मालिक तेरी दुनियाँ में क्यों झगड़ा है इंसानों में.....
-अब्बास रजा अलवी
मेरा भगवान !
मेरा भगवान रोज नए नए कपड़े बदलकर मेरे सामने आता है।
हंसता मुस्कुराता सबकुछ सुनता समझता दिव्य आभा छोड़ जाता है।
आज उसने जीसस के तो कल अल्लाह और परसों ईश्वर वाले कपड़े पहने थे।
और भी जाने कितनी पोशाकें हैं उसके पास जिन्हें बदल-बदलकर
नित-नित बहलाता फुसलाता रहता हमें दुख-दर्द बांट जाता है
बाल-हट पर हमारी मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों में बट-बटके बैठता जो
कभी श्रद्धा के फूल कभी दंगे फसाद का भोग कभी चोटें भी खा आता है....
-शैल अग्रवाल
सड़क पर...
सड़क पर तेजी से जाते हुए सवार ने देखा ..... एक वृद्ध व्यक्ति गिर कर , कराह रहा था ,
कराह थी तीव्र पीड़ा की पैरों में चोट लगी थी शायद , उसे देख कर मन भर आया
बहुत दूर ..... किसी गाँव में बैठा हुआ , वृद्ध पिता याद आया ,
लेकिन .... घडी में दस बज रहे थे , उसे ऑफिस समय पर पहुँचना था
वरना देर से पहुँचने पर , आज फिर वेतन कट जायेगा , और पिता की दवाओं का खर्च कहाँ से आयेगा,
एक लम्बी साँस लेकर वह चल पड़ा उस रास्ते पर ... जो उसके ऑफिस की ओर जाता था .....!
- अमित तिवारी
हम सब....
हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर अपने अपने घर पहुँचना चाहते
हम सब ट्रेनें बदलने की झंझटों से बचना चाहते
हम सब चाहते एक चरम यात्रा और एक परम धाम
हम सोच लेते कि यात्राएँ दुखद हैं और घर उनसे मुक्ति
सचाई यूँ भी हो सकती है कि यात्रा एक अवसर हो और घर एक संभावना
ट्रेनें बदलना विचार बदलने की तरह हो और हम सब जब जहाँ जिनके बीच हों वही हो
-कुंवर नरायण
जो भीतर...
जो भीतर धधक रहा बाहर आ जाने दो दबे दर्द को ताण्डवी नृत्य फिर दिखाने दो अभी मत बताओ प्रभु कोई भी सहज राह मानव को अपने तेजाब में नहाने दो
-सतेन्द्र श्रीवास्तव
मन एक टूटा कांच
मन एक टूटा कांच सौ रूप तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े बिखरे वक्त की धूप हवा पानी और और चमकाती संवारती जाती एक-एक रूप तुम्हारा लहूलुहान नफरत भरी इस दुनिया में!
-शैल अग्रवाल
न जाने बचपन किधर गया.....
अभी अभी तो हाथ पकड़कर साथ साथ ही चलता था आगे बढ़ने की चाहों में वो सबको हँसमुख दिखता था जीवन की इन बाधाओं ने कब मुझसे उसको छीन लिया
पीछे मुड़कर कितना ढूंढा न जाने बचपन किधर गया.....
चँदा मामा को छूने की आशाएँ सारी रखता था उड़न खटोले की परवाज़ें सपनों में भी भरता था हर मज़हब उसको प्यारा था बस देश ही उसका न्यारा था
पीछे मुड़कर कितना ढूंढा न जाने बचपन किधर गया.....
खेल खिलौने ईद दीवाली सबमें अपना दिखता था दादी नानी ख़ाला मौसी वो सबको अपना कहता था कब माँ की लोरी छूट गयी कब रिश्तों का पामाल हुआ
पीछे मुड़कर कितना ढूंढा न जाने बचपन किधर गया.....
- अब्बास रज़ा अलवी
यह मंदिर
यह मंदिर उसने तो नहीं बनवाया था हम ने ही तो चारदीवारी खींच उसे सिंहासन पर बिठलाया था
अब यह आलम है कि वह फूल माथे से लगकर चरणों पर चढ़कर भी बस सूखा-ही-सूखा
और वह मंदिर में खड़ा भगवान फिरसे हंसा हमारी अंधी आस्था हठी इस दुराग्रह पर।
-शैल अग्रवाल
पहचानते कहाँ हैं लोग
मस्जिदों-मन्दिरों की दुनिया में मुझको पहचानते कहाँ हैं लोग रोज़ मैं चांद बन के आता हूँ दिन में सूरज सा जगमगाता हूँ
खनखनाता हूँ माँ के गहनों में हँसता रहता हूँ छुप के बहनों में मैं ही मज़दूर के पसीने में मैं ही बरसात के महीने में
मेरी तस्वीर आँख का आँसू मेरी तहरीर जिस्म का जादू मुझको पहचानते कहाँ हैं लोग
माना कि धर्म एक ऐसा तत्व है जो समूची जाति को प्यार, क्षमा और सहनशीलता का ज्ञान देता है लेकिन उसके नाम पर या उसके आधार पर संसार में क्या कुछ नहीं हुआ है या हो रहा है ? बच्चन की काव्य - पंक्ति ` मंदिर - मस्जिद लड़वाते हैं ` इसी सच्चाई को उजागर करती है . सोचा जाए तो अल्लामा इकबाल के इस मिसरे ` मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना ` का भाव बच्चन की पंक्ति के भाव से मेल खाता है . धर्म द्वारा लड़वाने का संकेत उसमें निहित है .
धर्म का सीधा - सादा अर्थ है - कर्तव्य . ऐसा कर्त्तव्य जो अपने लिए , परिवार के लिए , समाज के लिए , राष्ट्र के लिए और सकल विश्व के लिए यानि सकल जाति के लिए कल्याण -कारी हो . लेकिन कल्याण भी किये जाओ और ताड़ना भी किये जाओ , यह कोई धर्म नहीं है। धर्म जान देना सिखाता है, जान लेना नहीं। संसार में कितने प्रतिशत लोग हैं जो दूसरे धर्मों के लिए मर मिटते हैं ? हर एक की अपने धर्म में ही आस्था है। हर एक को अपना धर्म और सम्प्रदाय भाता है । कोई विरला ही धर्म की सार्वभौमिकता को समझता - बूझता है । सच तो यह है कि हमने धर्म को पंथ या सम्प्रदाय के घेरे में बंद करके रख दिया है। हर धर्माचार्य अन्य धर्मानुयायी में यही भावना भरता है -
" अपना कल्याण चाहते हो तो हमारे धर्म की शरण में आओ। हमारा धर्म सर्वश्रेष्ठ है ।"
धर्माचार्यों द्वारा बेचारे लोगों को इस तरह फुसलाना मार्क्सवाद भर्त्सना करता है। इसीलिये मार्क्सवाद ने धर्म को मानव समाज के लिए अफीम बताया है ।
चूँकि धर्म का उपयोग कई अर्थों में होने लगा है और उसमें राजनीति घुस आयी है इसलिए उसका मूल अर्थ ` कर्त्तव्य ` गौण हो गया है। जैन धर्म के आचार्य का कथन है - " धर्म और राजनीति को एक मानने का अर्थ है , यदि धर्म के क्षेत्र में राजनीति का प्रवेश है तो न धर्म का उपयोग रहेगा और न ही राजनीति अपना काम कर पायेगी। इस सन्दर्भ में हमारा दृष्टिकोण यह है कि राजनीति पर धर्म का अंकुश रहे किन्तु धर्म पर राजनीति हावी न हो।" ( धर्मयुग , मई 1996 )
धर्म में राजनीति या राजनीति में धर्म के प्रवेश का इतिहास कोई नया नहीं है, बहुत पुराना है। संसार का इतिहास साक्षी है कि ` धर्म संकट में है ` के आह्वान से ही जनमानस को उकसाया जाता रहा है। सांप्रदायिक दंगों में राम और रहीम दोनों ही खतरे में पड़े हैं। भारत में तो क्या, सारे संसार में ऐसे कई युद्ध हुए जिनका आधार धर्म ही था। संसार में पहले एक ही धर्म था - मानवता का . धीरे - धीरे सम्प्रदाय बने और सम्प्रदायों ने धर्म को अपने नामों से जोड़ दिया। संसार में कई ऐसे महापुरुष पैदा हुए जिन्होंने अपनी - अपनी जाति के मूल धर्म से कट कर पृथक धर्मों की नीवें डालीं और अपनी- अपनी धार्मिक मान्यता का प्रचार - प्रसार किया । धर्म का सम्बन्ध ह्रदय से है लेकिन वह मस्तिष्क की उपज बन कर रह गया। मस्तिष्क की इस उपज के आधार पर कोई प्रोटेस्टेंट है और कोई कैथोलिक है , कोई सुन्नी है और कोई शिया है , कोई बौद्ध है और कोई जैन है , कोई सनातनी है है और कोई आर्यसमाजी है। मनुष्य में अलगाव की प्रवृत्ति शाश्वत है। वह कल भी थी , आज भी है और कल भी रहेगी । अगर यह अलगाव की प्रवृत्ति मनुष्यों में नहीं होती तो समूची मानव जाति का धर्म एक ही होता और धर्म विभिन्न जातियों के बीच विद्वेष का कारण नहीं बनता । चूँकि हर जाति को अपना धर्म प्रिय और दूसरी जाति का धर्म अप्रिय लगता है इसलिए जातियों में सांस्कृतिक और धार्मिक एकता का अभाव सदा ही रहा है । किसी ने सच ही कहा है - " अन्य जाति के किसी व्यक्ति से बैर मोल लेना हो तो उसके धर्म को गाली दे दो।"
संसार के इतिहास में कई ऐसी आक्रामक जातियां नज़र आती हैं जिन्होंने ` बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है ` की उक्ति को चरितार्थ किया है। अपना- अपना धर्म फैलाने के लिए उन्होंने हर तरह का हथकंडा अपनाया। ईसाई मिशनरियों को ही लीजिये. वे संसार के किस कोने में नहीं पहुँचे ? उन्होंने कभी प्यार से और कभी लाठी की मार से लोगों को धर्मान्तरित किया । मुहम्मद गोरी , महमूद गजनवी , बाबर आदि भले ही अलग- अलग देश और जाति के थे लेकिन थे इस्लाम के अनुयायी । उन सबका मक़सद भारत के इस्लामीकरण का रहा । भारत में जन्मे - पले अधिकाँश मुसलमान शासकों और नवाबों ने इस्लाम को फैलाने में नाना प्रकार के अमानवीय तौर- तरीके अपनाए । उनके द्वारा कश्मीर जैसे सुन्दर और रमणीक प्रदेश में धर्म-भीरु ब्राह्मणों का बलपूर्वक धर्मान्तरण ज़ोर- शोर से किया गया । उस जघन्य धर्मान्तरण को रोकने के लिए सिख धर्म के नवम गुरु श्री तेग बहादुर का दिल्ली में शहीद होना उल्लेखनीय है -
तिलक जंजू राखा प्रभु ताका
कीनो बडो कलिहि में साका
( विचित्र नाटक , गुरु गोविन्द सिंह )
जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर जिसने 1556 से लेकर 1605 तक भारत ( इंडियन सब कोंटीनेंट ) में राज्य किया था, एक सहिष्णु बादशाह थे। उन्होंने ` दीन-ए -इलाही धर्म चलाया 1581 में। यह धर्म सब धर्मों के प्रति उदार था लेकिन मौलवियों ने उसे इस्लाम निंदक घोषित कर दिया । हार कर अकबर को उक्त धर्म दफन करना पड़ा ।
धर्म के आधार पर ही पारसी धर्म को ईरान से देश निकाला मिला। धर्म के आधार पर ही अहमदिया मजहब को पकिस्तान में मान्यता प्राप्त नहीं है। धर्म के आधार पर ही सिख अपने को हिन्दुओं से अलग मानते हैं। धर्म के नाम पर ही मध्य युग में शिव और राम भक्तों में पारस्परिक तनाव रहता था। इसलिए तुलसीदास को फटकारना पड़ा -
शिव द्रोही मम भगत कहावा
सो नर मोहिं सपनेहु नहीं पावा
धर्म के नाम पर ही मूर्तिपूजा के विषय को लेकर सनातनधर्मी और आर्यसमाजी के संबंधों में कटुता कभी इतनी ज़्यादा बड़ी थी कि दोनों के बीच लडकी या लड़के का रिश्ता लेना गुनाह समझा जाने लगा था।
हिंदु और मुसलमान कभी एक जाति नहीं रही। दोनों के धर्मों में ज़मीन -आस्मान का अंतर है। यदि वे एक जाति के होते तो राम और रहीम में अंतर नहीं होता । यदि वे एक जाति के होते तो हिंदु जाति मुसलमान जाति को को म्लेच्छ और मुसलमान जाति हिंदु जाति को काफिर कतई नहीं कहती। यदि वे एक जाति के होते तो दोनों जातियों में वैमनस्य की भावना नहीं होती और दोनों के मुहल्ले जुदा- जुदा नहीं होते । यदि वे एक जाति के होते तो मुहम्मद अली जिन्ना को राजगोपाल आचार्य को यह नहीं लिखना पड़ता -" हम गाय का मांस खाने वाले हैं और आप सूअर का मांस खाने वाले . हममें और आपमें एकता कैसी ? "
हिंदु और मुसलमान में वैमनस्य की भावना पहले भी थी और अब भी। दोनों के जुदा मुहल्ले पहले भी थे और अब भी है। इंग्लैण्ड में भी अधिकाँश मुसलामानों के मुहल्ले जुदा हैं। यह सच्चाई है। हिन्दुओं और मुसलामानों के वैमनस्य के सन्दर्भ में मुझको दो घटनाएं याद आती हैं। दोनों घटनाएँ भारत के विभाजन के पहले की हैं और वे वजीराबाद ( अब पाकिस्तान ) में घटी थी। एक घटना मेरे ननिहाल से जुडी है। मेरी नानी उषा काल में उठ कर प्रभु का नाम लेने वाली भद्र महिला थी । एक दिन एक निर्धन मुसलमान का पाँच साल का प्यारा - प्यारा बच्चा भूले - भटके उनके कमरे में जा घुसा । देखते ही देखते ` राम दुहाई ` का शोर मच गया। नानी का कमरा भ्रष्ट हो गया था । नीचे कुएं से बाल्टियों में पानी भर-भर कर लाया गया और कमरे को मल - मल कर धोया गया। दूसरी घटना इस तरह है . एक नौजवान मुसलमान अपने हिंदु दोस्त को भूल से मस्जिद में ले गया । पता लगने पर मस्जिद के आसपास के इलाकों की मुसलमान बिरादरी में ` काफिर , काफिर ` का शोर मच गया .
अधिकाँश लोगों का मत है कि भारत में इस्लाम को आधार बनाकर यदि हिन्दुओं का धर्मान्तरण और उनके मंदिरों का ध्वंस नहीं होता तो हिन्दुओं में मुसलमानों के प्रति वैमनस्य , विद्वेष और कटुता की भावनाएं कभी पैदा नहीं होती। दोनों कौमें भाईयों की तरह प्यार से रहती और देश का विभाजन नहीं होता। सच्चाई यह है कि हिन्दुओं के धर्मान्तरण और मंदिरों के के ध्वंस के पीछे अधिकाँश मुसलमान शासकों की हिंदु धर्म और संस्कृति के प्रति असहिष्णुता की भावना थी । सारे मुग़ल पीरियड में कुछेक ही मुसलमान राजाओं और नवाबों के उदाहरण मिलते हैं जिन्होंने दीवाली या दशहरा जैसे महोत्सवों में भाग लिया था । महान राजा वह होता है जो प्रजा के प्रति उदारवादी होता है, जो प्रजा की भावनाओं का आदर करता है। मुग़ल सम्राट हिंदु और मुसलमान में भावनात्मक एकता पैदा कर भारत के इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जोड़ सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि मुसलमान शासक होने के नाते इस्लाम के प्रचार - प्रसार में ही उनकी मंशा व दिलचस्पी थी । .उस काल में हिंदु धर्म की जितनी उपेक्षा हुई थी उतनी शायद ही किसी काल में हुई थी। उस उपेक्षा से उपजी असंतोष की भावना हिन्दुओं में व्याप्त होनी ही थी। मुसलमान अल्पसंख्यक थे लेकिन उनके अन्नदाता मुसलमान शासक थे । हिन्दुओं को दबाने में महान कवि अमीर खुसरो ने भी अपनी आवाज़ बुलंद की थी। वहीद मिर्ज़ा ने लिखा है - " खुसरो का हिन्दुओं से विशेष प्रेम नहीं था। उसने उनके रीति- रिवाजों का मज़ाक उड़ाया और बादशाह को आगाह किया था कि उनके हाथ में ज़्यादा सत्ता न आने दे।" ( भाषा और समाज , राम विलास शर्मा )
अल्लामा इकबाल महान कवि थे . शुरू - शुरू में वह उदार प्रवृत्ति के थे। सब धर्मों के प्रति सहिष्णु थे । ` सारे जहां से अच्छा हिन्दोसतां हमारा ` तराना उन्होंने रचा। तराने ने धूम मचा दी। जल्द ही उनकी भारत प्रेम की भावना लुप्त हो गयी। इस्लाम उनके दिल- ओ - दिमाग पर हावी गया। वह एक अलग देश की कल्पना करने लगे । वह ` सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा " भूल गये । उस तराने के स्थान पर इस तराने ने जन्म लिया - चीन - ओ - अरब हमारा हिंदोस्तां हमारा मुस्लिम हैं हम , वतन है सारा जहां हमारा तौहीद १ की अमानत सीनों में है हमारे आसां नहीं मिटाना नामोनिशां हमारा दुनिया के बुतकदों में पहला वो घर खुदा का हम उसके पासबां हैं वो पासबां हमारा तेगों के साए में हम पल कर जवां हुए हैं खंजर हलाल का है कौमी निशां हमारा मगरब की वादियों में गूंजी अजां हमारी थमता न था किसी से सैल - ए रवां २ हमारा बातिल ३ से दबने वाले ए आसमां नहीं हम सौ बार कर चुका है तू इम्तहाँ हमारा ए गुलस्तान - ए अन्द्लस ४ के दिन हैं याद तुझको था तेरी डालियों में जब आशियाँ हमारा ए मौज - ए - दजला ५ तू भी पहचानती है हमको अब तक है तेरा दरिया अफ़साना ख्वां हमारा ए अर्ज़ - ए पाक तेरी हुरमत ६ पे कट मरे हमहै खूँ तेरी रगों में अब तक रवां हमारा सालार - ए - कारवां ७ है मेरे- ए - हजाज़ अपना इस नाम से है बाकी आराम - ए - जां हमारा इकबाल का तराना बांग - ए - दरा ८ है गोया होता है ज़्यादा ऐसा फिर कारवां हमारा ।
एक बात यहाँ पर उल्लेखनीय है कि धर्म के आधार पर शायद किसी विरले हिंदु कवि ने मुहम्मद या इस्लाम की प्रशंसा में कवितायें लिखे हों .लेकिन रसखान , रहीम , नजीर अकबराबादी आदि अनेक मुसलमान कवियों ने भगवान् राम , भगवान् कृष्ण व गुरु नानक पर असंख्य पद कहे हैं ।
धर्म के आधार पर न केवल जातियां बनी हैं बल्कि भाषाओं में भेद भी उत्पन्न हुआ है। भाषा विज्ञानियों का मानना है कि भाषा के विकास में धर्म और संस्कृति दोनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। धर्म के आधार पर लेटिन का प्रभाव अंग्रेज़ी पर रहा । हिंदी को ही लीजिये, उसके प्रचार - प्रसार के पीछे भी हिन्दुओं की न केवल सांस्कृतिक बल्कि धार्मिक भावना ने भी काम किया . धर्म के आधार पर ही हिंदी लिपि देवनागरी लिपि कहलाई ।
ब्रज भाषा ,अवधी , हरियाणवी , भोजपुरी , राजस्थानी इत्यादि समृद्धशाली भाषाएँ थी। इन समृद्धशाली भाषाओं के होते हुए मेरठ , आगरा और दिल्ली के आसपास बोली जाने वाली हिंदी की तूती बोलने लगी, क्योंकि लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाएं उससे जुड़ने लगी थी। हिंदी के विकास में आर्य समाज का उल्लेखनीय योगदान कहा जा सकता है । महान कृति ` सत्यार्थ प्रकाश ` स्वामी दयानंद ने हिंदी में ही लिखी थी।. एक बात ध्यान देने योग्य है कि यदि पंजाबी , गुजराती , मराठी , बांग्ला इत्यादि की भाँति ब्रज , अवधी ,हरियाणवी , भोजपुरी ,राजस्थानी इत्यादि भाषाओं की अपनी - अपनी लिपि होती तो हिंदी का विकास हो पाना दुष्कर था । पंजाबी भाषा सिख धर्म से जुडी है। उसकी लिपि गुरुमुखी कहलाती है । गुरुओं ने उसे सींचा। सिख धर्म की अमूल्य कृति ` गुरु ग्रन्थ साहिब ` गुरमुखी लिपि में है।
मजहब से ही जुडी होने के कारण उर्दू का विकास हुआ और वह पकिस्तान की कौमी ज़बान बनी , उस पकिस्तान की जहां भारत के विभाजन के पहले 90 प्रतिशत लोगों की भाषा पंजाबी थी। रामविलास शर्मा का मत है कि उर्दू का कोई आध्यात्मिक संबंध नहीं है। वे अपनी पुस्तक ` भाषा और समाज ` में लिखते हैं - " उर्दू का का कोई आध्यात्मिक सम्बन्ध होता तो वह सबसे पहले इस्लाम की जन्मभूमि अरब में बोली जाती । " लेकिन अधिकाँश लोगों का मत है - " उर्दू का आध्यात्मिक सम्बन्ध सीधे अरब से न रहा हो लेकिन उसकी राज माताओं अरबी और फारसी भाषाओं का आध्यात्मिक सम्बन्ध अरब से तो है ही . कट्टरपंथी औरंगजेब के शासनकाल से ही उर्दू शायरों की ऐसी जमात पैदा हुई जिसने खड़ी बोली को अलग से ऐसा रूप दिया जो फारसीमय था । नासिख ,ग़ालिब आदि शायरों ने भारत की धरती पर फारसी और अरबी की मिली -जुली ज़बान का ऐसा रंग भरा जो पढ़े - लिखे लोगों की भी समझ के परे था .उनके कुछेक शेर अपवाद ही कहे जायेंगे । शायद ऐसे शायरों की मुश्किल ज़बान को पढ़कर कभी मीर तकी मीर ने कहा था- क्या जानू लोग कहते हैं किसको सरूर - ए - कल्ब आया नहीं है लफ्ज़ ये हिंदी जबां के बीच ।
उस समय रची जा रही फारसीमयी उर्दू शायरी के बारे में दाग देहलवी का शेर भी पढ़िए -
उसको कहते हैं ज़बान - ए - उर्दू जिसमें न हो पुट फारसी का ।
उस समय की शायरी में गुल और बुलबुल के तराने गूंजने लगे थे। किसी भी शायर को न तो कोयलों का मधुर गान सुनायी दिया और नं ही मयूरों का मनभावन नर्तन दिखायी दिया । इसीलिये भारतीय त्यौहारों और ऋतुओं के गीत रचने वाले नजीर अकबराबादी की शायरी को उर्दू शायरी में स्थान नहीं मिला। फ़िराक गौरखपूरी के रूबाईयों के संकलन ` रूप ` को उर्दू के शायरों ने इसलिए नकार दिया क्योंकि उसमें संस्कृत के शब्द थे और वह शुद्ध भारतीय विचारधारा से जुड़ी था । उस समय उर्दू का सम्बन्ध फारसी से जोड़ा जाता था।. उसे हिन्दुओं की नहीं बल्कि मुसलामानों की जबान समझा जाता था । यह सब मजहब के तहत हो रहा था । इस धारणा के बारे में उर्दू के ही दो विद्वानों की टिप्पणियाँ उल्लेखनीय हैं - " उर्दू ने फारसी का दूध पीया था .उसके सहारे परवान चढ़ी . रफ्ता - रफ्ता फारसी की जगह उर्दू का चलन हो गया । यह एक कुदरती उसूल था . जिस तरह बाप का जानशीन बेटा होता है , उसी तरह फारसी की भी कायम मुकाम उर्दू हो गयी। " ( मौलाना हक , उर्दू की उत्पत्ति - चन्द्रबली पाण्डेय ) . " दूसरी शर्त यह थी कि डिक्शनरी लिखने वाला ` शरीफ ` मुसलमान हो क्योंकि खुद दिल्ली में भी फसीह उर्दू सिर्फ मुसलामानों की ज़बान समझी जाती है । " ( मौलाना हाली , उर्दू की उत्पत्ति - चन्द्रबली पाण्डेय )
स्वयं चन्द्रबली पाण्डेय ने अपने लेख ` उर्दू की उत्पत्ति ` में उर्दू का सम्बन्ध मजहब से जोड़ते हुए स्पष्ट लिखा है - " यहाँ यह साबित करना है कि दर हकीकत उर्दू राजभाषा ( फारसी )की सगी होने के कारण दरबार में प्रतिष्ठित हुयी , प्रजा की बानी के नाते नहीं ------------ अपना यही कहना है कि उर्दू दर हकीकत फारसी का बिलकुल अक्स है । वह हिंदुस्तान की चीज़ नहीं ,फारस या इस्लाम की बरक़त है । "
भाषाओं पर धर्म या मजहब का प्रभाव कितना ज्यादा होता है इसका एक उदाहरण देकर मैं अपनी बात समाप्त करूँगा । हिंदुस्तान में लिखी जाती पंजाबी और पकिस्तान में लिखी जाती पंजाबी के अलग - अलग मिजाज हैं । दोनो की लिपियाँ भिन्न हैं । हिन्दुस्तान में पंजाबी की लिपि है गुरमुखी और पकिस्तान में पंजाबी की लिपि है शाहमुखी। इसका कारण भी धर्म या मजहब है । ध्यातव्य बात यह है कि भारत की पंजाबी हिंदी प्रधान है और पाकिस्तान की पंजाबी उर्दू प्रधान । भाषा के इतिहास में यह पहला उदाहरण है कि वर्तमान में किसी भाषा की दो लिपियाँ हैं । चूँकि गुरुमुखी लिपि सिख धर्म से सम्बद्ध है इसलिए पाकिस्तान में इसे मान्यता प्राप्त नहीं है । भारत में पंजाबी लिखने वालों का मानना है कि चूँकि पाकिस्तान में मजहब के आधार पर ही उर्दू ज़बान का दबदबा है इसलिए गुरुमुखी लिपि को वहाँ स्वीकार नहीं किया जा रहा है । मजहब से सम्बंधित इस समस्या के बारे में 2003 में कनाडा में द्वितीय विश्व पंजाबी भाषा कोंफ्रेस में डा. करनैल सिंह ने साफ़- साफ़ शब्दों में कहा था - " विचारणीय बात है कि कि जहाँ भारत में पंजाबी भाषा की स्थिति मजबूत है, स्कूल - कोलेजों और युनिवर्सिटियों में पढाई जाती है, वहाँ पकिस्तान में 70 - 75 प्रतिशत से अधिक पंजाबी भाषी होते हुए भी गिनती के ही कोलेजों ( स्कूलों में नहीं ) में पंजाबी ऑप्शन मजबून के तौर पर पढाई जाती है। पंजाब असेम्बली में कोई स्पीकर की आज्ञा के बिना पंजाबी बोली में अपने विचार प्रकट नहीं कर सकता है। मौलवियों और कट्टरपंथियों का नज़रिया है कि पाकिस्तान इस्लाम का किला है .उर्दू मुसलमानों की ज़बान है । जो व्यक्ति पंजाबी या किसी और बोली में बात करता है वो काफिर है।"
काश , हम धर्म या मजहब के मूल अर्थ ` सर्वे भवन्तु सुखिन: ` को समझते !
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१ - यकीन कि खुदा है २- मौज ३ - झूठा ४ - स्पेन का इलाका ५ - अरब में एक दरिया का नाम ६ - इज़्ज़त ७- पथ प्रदर्शक ८ - ऊंची और लम्बी पुकार ।
जब कभी मै अकेले होता हूं तो सच है, मैं अपने करीब होता हूं सांसो की तरह, इस अकेलेपन में पिता की याद उभर आती है जैसे मैं किसी झरने के पास आ गया जलते निदाध में ।
मुझे क्यों लगने लगता है कि मुझे घेर लिया हैं किसी ने अपनी मजबूत बाहों में जैसे हवा में लोका दे रहा हो कोई|
मुझे कोई हिम्मत दे रहा है वक्त से लडने की, ताकि मैं दो-दो हाथ कर सकूं हालात से जैसे अक्सर पिता लडते से नजर आते थे।
मेरे खून में साधना है पिता के संस्कारों की, आग है मूल्यों की भावना है संवेदना है।
पिता मेरी साधना है इस कडवे दौर में।
अपाहिज सूरज की बैसाखियां
अपाहिज सूरज की बैसाखियां, टूटकर जर्जर हो जाती है। तब काली रश्मियां, मणीबंध होकर नाचने लगती है, चांद की रहनुमाई , भटकती चांदनी की लहर पर सवार हो जाती है।
तब, कहीं चिल्लाता है सूरज, घटाओं में खोई, बैसाखियों की बिसात पर, तभी सहसा, अभिमन्यु की तरह लडता है, घनघोर घटाओं की अक्षोहिणी से, सूरज के हृदय में उभरने लगता है--- महाभारत ॥
दर्द
वो दर्द—वो घाव, भले ही सीमित रहें हों, समय के व्यूह चक्र में, उनके दाग़ नहीं मिटा करते।
हम तुम ऐसे ही बने रहें तो जल्द ही जान जाओगे भीतर पलते हुए प्रतीक्षारत दर्द के घाव दर्पण सम्मुख खडे चेहरे पर जिन्हे पढने में देर न लगेगी बदलते दौर में घावों को विषाक्त कर, नासूर बना देता है--- एक दिन ।
जीवन की ठहरी वादियां तुम्हे रोक रोक कर पूछेंगी प्रेम की परिभाषा ।
तब, तब देखना तुम्हारी मूक भाषा डूबती उतरती यादों की खाइयां समा जायेगी, जहां मिलन पलों का उत्सव देख वियोगी घडियों की सूइयां ठहर जायेंगी, वहीं दर्द--- वहीं घाव बनकर ॥
जिंदगी
चौराहे पर जिंदगी हो तो , कई चेहरे भी अपने से हो जाते है। उस एक चेहरे की नमी, रोज ओस बन कर, मेरी ऑंखों में उतर जाती है ।
आंख जब प्रेरणा देने लगती है तो, सावन की बदली की मानिंद, उतर आती है दिल के आकाश में । मेरी आंखो की कालिमा में हर रोज डूब जाती है, वे तमाम आंखे जिनके स्वप्नों ने आत्महत्याएं कर ली हैं |
नर और नारी के बीच, मरती जिंदगी कभी भी रिश्तों के आधार नहीं मानती मरते हुए लोग, सूखती आखों के बीच जिंदगी की पहचान उभरती है॥
अफ़सोस नहीं इसका हमको, जीवन में हम कुछ कर न सके, झोलियाँ किसी की भर न सके, संताप किसी का हर न सके, अपने प्रति सच्चा रहने का, जीवन भर हमने काम किया, देखा-देखी हम जी न सके, देखा-देखी हम मर न सके ।
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक
तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ तू चलती है पन्ने-पन्ने, मैं लोचन-लोचन बढ़ता हूँ
मै खुली क़लम का जादूगर, तू बंद क़िताब कहानी की मैं हँसी-ख़ुशी का सौदागर, तू रात हसीन जवानी की तू श्याम नयन से देखे तो, मैं नील गगन में उड़ता हूँ तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
तू मन के भाव मिलाती है, मेरी कविता के भावों से मैं अपने भाव मिलाता हूँ, तेरी पलकों की छाँवों से तू मेरी बात पकड़ती है, मैं तेरा मौन पकड़ता हूँ तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
तू पृष्ठ-पृष्ठ से खेल रही, मैं पृष्ठों से आगे-आगे तू व्यर्थ अर्थ में उलझ रही, मेरी चुप्पी उत्तर माँगे तू ढाल बनाती पुस्तक को, मैं अपने मन से लड़ता हूँ तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
तू छंदों के द्वारा जाने, मेरी उमंग के रंग-ढंग मैं तेरी आँखों से देखूँ, अपने भविष्य का रूप-रंग तू मन-मन मुझे बुलाती है, मैं नयना-नयना मुड़ता हूँ तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
मेरी कविता के दर्पण में, जो कुछ है तेरी परछाईं कोने में मेरा नाम छपा, तू सारी पुस्तक में छाई देवता समझती तू मुझको, मैं तेरे पैयां पड़ता हूँ तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
तेरी बातों की रिमझिम से, कानों में मिसरी घुलती है मेरी तो पुस्तक बंद हुई, अब तेरी पुस्तक खुलती है तू मेरे जीवन में आई, मैं जग से आज बिछड़ता हूँ तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
मेरे जीवन में फूल-फूल, तेरे मन में कलियाँ-कलियाँ रेशमी शरम में सिमट चलीं, रंगीन रात की रंगरलियाँ चंदा डूबे, सूरज डूबे, प्राणों से प्यार जकड़ता हूँ तू पढ़ती है मेरी पुस्तक, मैं तेरा मुखड़ा पढ़ता हूँ ।
घर तो रखवालों ने लूटा
बदनाम रहे बटमार मगर, घर तो रखवालों ने लूटा मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा
दो दिन के रैन बसेरे की, हर चीज़ चुराई जाती है दीपक तो अपना जलता है, पर रात पराई होती है गलियों से नैन चुरा लाए, तस्वीर किसी के मुखड़े की रह गए खुले भर रात नयन, दिल तो दिलदारों ने लूटा
शबनम-सा बचपन उतरा था, तारों की गुमसुम गलियों में थी प्रीति-रीति की समझ नहीं, तो प्यार मिला था छलियों से बचपन का संग जब छूटा तो, नयनों से मिले सजल नैना नादान नए दो नयनों को, नित नए बज़ारों ने लूटा
हर शाम गगन में चिपका दी, तारों के अक्षर की पाती किसने लिक्खी, किसको लिक्खी, देखी तो पढ़ी नहीं जाती कहते हैं यह तो क़िस्मत है, धरती के रहने वालों की पर मेरी क़िस्मत को तो इन, ठंडे अंगारों ने लूटा
अब जाना कितना अंतर है, नज़रों के झुकने-झुकने में हो जाती है कितनी दूरी, थोड़ा-सा रुकने-रुकने में मुझ पर जग की जो नज़र झुकी, वह ढाल बनी मेरे आगे मैंने जब नज़र झुकाई तो, फिर मुझे हज़ारों ने लूटा।
रोटियाँ गरीब की
दिन गए बरस गए, यातना गई नहीं, रोटियॉं गरीब की प्रार्थना बनी रहीं।
विश्व के अधिक दुखी हो रहे अधिक सुखी जो रहे अधिक सुखी, हो रहे अधिक दुखी कागजों में रह गईं,क्रांतियॉं चतुर्मुखी
राज भी बदल गया, यातना गयी नहीं रोटियॉं गरीब की प्रार्थना बनी रहीं।
एक ही तो प्रश्न है रोटियों की पीर का पर उसे भी आसरा ऑंसुओं के नीर का राज है गरीब का, ताज दानवीर का
तख्त भी पलट गया कामना गयी नहीं रोटियॉं गरीब की प्रार्थना बनी रहीं।
कल्पना पवित्र थी, चॉंदनी बने अमाहर दरिद्र उठ गया, स्वप्न में रमा-रमा पर उदित हुआ नहीं रोटियों का चंद्रमा
स्वप्न टूटते रहे, कल्पना मरी नहीं रोटियॉं गरीब की प्रार्थना बनी रहीं।
चूम कर जिन्हें सदा क्रांतियॉं गुजर गयीं गोद में लिये जिन्हें ऑंधियॉं बिखर गयीं पूछता गरीब वे रोटियॉं किधर गयीं
देश भी तो बँट गया वेदना बँटी नहीं रोटियाँ ग़रीब की प्रार्थना बनी रही
दीपक जलता रहा रात भर
तन का दिया प्राण की बाती दीपक जलता रहा रात भर
दुख की घनी बनी अंधियारी सुख के टिमटिम दूर सितारे उठती रही पीर की बदली मन के पंछी उड़-उड़ हारे बची रही प्रिय की आँखों से मेरी कुटिया एक किनारे मिलता रहा स्नेह रस थोड़ा दीपक जलता रहा रात भर
दुनिया देखी भी अनदेखी नगर न जाना, डगर न जानी रंग न देखा, रूप न देखा केवल बोली ही पहचानी कोई भी तो साथ नहीं था साथी था आँखों का पानी सूनी डगर, सितारे टिम-टिम पंथी चलता रहा रात भर
अगणित तारों के प्रकाश में मैं अपने पथ पर चलता था मैंने देखा; गगन-गली में चांद सितारों को छलता था आंधी में, तूफानों में भी प्राणदीप मेरा जलता था कोई छली खेल में मेरी दिशा बदलता रहा रात भर
मेरे प्राण मिलन के भूखे ये आँखें दर्शन की प्यासी चलती रहीं घटाएँ काली अम्बर में प्रिय की छाया-सी श्याम गगन से नयन जुदाए जगा रहा अंतर का वासी काले मेघों के टुकड़ों से चांद निकलता रहा रात भर
छिपने नहीं दिया फूलों को फूलों के उड़ते सुवास ने रहने नहीं दिया अनजाना शशि को शशि के मंद ह्रास ने भरमाया जीवन को दर-दर जीवन की ही मधुर आस ने मुझको मेरी आँखों का ही सपना छलता रहा रात भर
होती रही रात भर चुप के आँख-मिचौली शशि-बादल में लुकते-छिपते रहे सितारे अम्बर के उड़ते आँचल में बनती-मिटती रहीं लहरियाँ जीवन की यमुना के जल में मेरे मधुर-मिलन का क्षण भी पल-पल टलता रहा रात भर
सूरज को प्राची में उठ कर पश्चिम ओर चला जाना है रजनी को हर रोज़ रात भर तारक दीप जला जाना है फूलों को धूलों में मिल कर जग का दिल बहला जाना है एक फूँक के लिए प्राण का दीप मचलता रहा रात भर
बाबुल तुम बगिया के तरुवर
बाबुल तुम बगिया के तरुवर, हम तरुवर की चिड़ियाँ रे दाना चुगते उड़ जाएँ हम, पिया मिलन की घड़ियाँ रे उड़ जाएँ तो लौट न आयें, ज्यों मोती की लडियां रे बाबुल तुम बगिया के तरुवर …….
आँखों से आँसू निकले तो पीछे तके नहीं मुड़के घर की कन्या बन का पंछी, फिरें न डाली से उड़के बाजी हारी हुई त्रिया की जनम -जनम सौगात पिया की बाबुल तुम गूंगे नैना, हम आँसू की फुलझड़ियाँ रे उड़ जाएँ तो लौट न आएँ ज्यों मोती की लडियाँ रे
हमको सुध न जनम के पहले , अपनी कहाँ अटारी थी आँख खुली तो नभ के नीचे , हम थे गोद तुम्हारी थी ऐसा था वह रैन -बसेरा जहाँ सांझ भी लगे सवेरा बाबुल तुम गिरिराज हिमालय , हम झरनों की कड़ियाँ रे उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे
छितराए नौ लाख सितारे , तेरी नभ की छाया में मंदिर -मूरत , तीरथ देखे , हमने तेरी काया में दुःख में भी हमने सुख देखा तुमने बस कन्या मुख देखा बाबुल तुम कुलवंश कमल हो , हम कोमल पंखुड़ियां रे उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे
बचपन के भोलेपन पर जब , छिटके रंग जवानी के प्यास प्रीति की जागी तो हम , मीन बने बिन पानी के जनम -जनम के प्यासे नैना चाहे नहीं कुंवारे रहना बाबुल ढूंढ फिरो तुम हमको , हम ढूंढें बावरिया रे उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे
चढ़ती उमर बढ़ी तो कुल -मर्यादा से जा टकराई पगड़ी गिरने के दर से , दुनिया जा डोली ले आई मन रोया , गूंजी शहनाई नयन बहे , चुनरी पहनाई पहनाई चुनरी सुहाग की , या डाली हथकड़ियां रे उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे
मंत्र पढ़े सौ सदी पुराने , रीत निभाई प्रीत नहीं तन का सौदा कर के भी तो , पाया मन का मीत नहीं गात फूल सा , कांटे पग में जग के लिए जिए हम जग में बाबुल तुम पगड़ी समाज के , हम पथ की कंकरियां रे उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे
मांग रची आंसू के ऊपर , घूंघट गीली आँखों पर ब्याह नाम से यह लीला ज़ाहिर करवाई लाखों पर
नेह लगा तो नैहर छूता , पिया मिले बिछुड़ी सखियाँ प्यार बताकर पीर मिली तो नीर बनीं फूटी अंखियाँ हुई चलाकर चाल पुरानी नयी जवानी पानी पानी चली मनाने चिर वसंत में , ज्यों सावन की झाड़ियाँ रे उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे
देखा जो ससुराल पहुंचकर , तो दुनिया ही न्यारी थी फूलों सा था देश हरा , पर कांटो की फुलवारी थी कहने को सारे अपने थे पर दिन दुपहर के सपने थे मिली नाम पर कोमलता के , केवल नरम कांकरिया रे उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे
वेद-शास्त्र थे लिखे पुरुष के , मुश्किल था बचकर जाना हारा दांव बचा लेने को , पति को परमेश्वर जाना दुल्हन बनकर दिया जलाया दासी बन घर बार चलाया माँ बनकर ममता बांटी तो , महल बनी झोंपड़िया रे उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे
मन की सेज सुला प्रियतम को , दीप नयन का मंद किया छुड़ा जगत से अपने को , सिंदूर बिंदु में बंद किया जंजीरों में बाँधा तन को त्याग -राग से साधा मन को पंछी के उड़ जाने पर ही , खोली नयन किवाड़ियाँ रे उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे
जनम लिया तो जले पिता -माँ , यौवन खिला ननद -भाभी ब्याह रचा तो जला मोहल्ला , पुत्र हुआ तो बंध्या भी जले ह्रदय के अन्दर नारी उस पर बाहर दुनिया सारी मर जाने पर भी मरघट में , जल - जल उठी लकड़ियाँ रे उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे
जनम -जनम जग के नखरे पर , सज -धजकर जाएँ वारी फिर भी समझे गए रात -दिन हम ताड़न के अधिकारी पहले गए पिया जो हमसे अधम बने हम यहाँ अधम से पहले ही हम चल बसें , तो फिर जग बाटें रेवड़ियां रे उड़ जाएँ तो लौट न आयें , ज्यों मोती की लडियां रे
कुछ देर यहाँ
कुछ देर यहाँ जी लगता है कुछ देर तबियत जमती है आँखों का पानी गरम समझ यह दुनिया आँसू कहती है
उस पार कहीं
उस पार कहीं बिजली चमकी होगी जो झलक उठा है मेरा भी आँगन ।
उन मेघों में जीवन उमड़ा होगा उन झोंकों में यौवन घुमड़ा होगा उन बूँदों में तूफ़ान उठा होगा कुछ बनने का सामान जुटा होगा उस पार कहीं बिजली चमकी होगी जो झलक उठा है मेरा भी आँगन ।
तप रही धरा यह प्यासी भी होगी फिर चारों ओर उदासी भी होगी प्यासे जग ने माँगा होगा पानी करता होगा सावन आनाकानी उस ओर कहीं छाए होंगे बादल जो भर-भर आए मेरे भी लोचन ।
मैं नई-नई कलियों में खिलता हूँ सिरहन बनकर पत्तों में हिलता हूँ परिमल बनकर झोंकों में मिलता हूँ झोंका बनकर झोंकों में मिलता हूँ उस झुरमुट में बोली होगी कोयल जो झूम उठा है मेरा भी मधुबन ।
मैं उठी लहर की भरी जवानी हूँ मैं मिट जाने की नई कहानी हूँ मेरा स्वर गूँजा है तूफ़ानों में मेरा जीवन आज़ाद तरानों में ऊँचे स्वर में गरजा होगा सागर खुल गए भँवर में लहरों के बंधन ।
मैं गाता हूँ जीवन की सुंदरता यौवन का यश भी मैं गाया करता मधु बरसाती मेरी वाणी-वीणा बाँटा करती समता-ममता-करुणा पर आज कहीं कोई रोया होगा जो करती वीणा क्रंदन ही क्रंदन ।
मेरा धन है स्वाधीन कलम विस्मृति के धुँधलके में नेपाली
केवल 52 वर्षों की अल्पायु पाने वाले नेपाली हिंदी के उन गिने चुने कवियों में हैं जिनका जनता से गहरा सरोकार रहा। 11 अगस्त, 1911 को बिहार में नेपाल की सीमा पर बसे शहर बेतिया के कालीबाग दरबार के नेपाली महल में जन्मे शायद इसीलिए गोपाल बहादुर सिंह ने कविताऍ लिखनी शुरु कीं तो नेपाली संज्ञा को अपने नाम के साथ जोड़ा। मैट्रिक तक की तालीम भी हासिल न कर पाने वाले नेपाली ने बेतिया राज के समृद्ध पुस्तकालय में बैठकर ही यदा कदा साहित्य का अध्ययन-अवगाहन किया। क्योंकि अपने सैनिक पिता के साथ विभिन्न जगहों--यहॉं तक कि छावनियों तक में रहने के कारण उनका जीवन प्राय: बिखरा हुआ ही रहा। शमशेर जिसे टूटी हुई बिखरी हुई की संज्ञा देते हैं वह दरअसल नेपाली के जीवन से ज्यादा जुड़ती है। पर हॉं इस बिखराव के बीच जीवन और संसार को नए ढंग से देखने-परखने का अवसर उन्हें अवश्य मिला। वे इतने होनहार थे कि उनकी रचनाऍं तब की श्रेष्ठ पत्रिकाओं, युवक, विशाल भारत, हंस, सरस्वती , कर्मवीर, और प्रताप में प्रकाशित होती थीं। रामवृक्ष बेनीपुरी जी ने उनकी पहली कविता अपनी पत्रिका बालक में छापी थी। अपने समय के बड़े लेखकों से उनकी मैत्री रही। बेतिया उन दिनों साहित्य के साथ साथ संगीत का भी केंद्र हुआ करता था। ध्रुपद के बोलों से कदाचित उन्होंने अपनी कविता को छंदों मे ढालने की प्रेरणा ली होगी।
बेतिया के साहित्यिक माहौल की ही यह असर है कि मात्र 22 साल की उम्र मे उनका पहला कविता संग्रह उमंग छपा, दो साल बाद दूसरा संग्रह पंछी आया, फिर रागिनी, नीलिमा, पंचमी और नवीन शीर्षक संग्रह आए। हिमालय ने पुकारा उनके राष्ट्रीय गीतों का संग्रह है।उनके कविता संग्रहों की भूमिकाऍं उस दौर के दिग्गज कवियों ने लिखीं। पंछी की भूमिका निराला ने लिखी। उमंग की भूमिका पंत ने, नीलिमा की भूमिका योगी के संपादक व्रजशंकर वर्मा ने तो हिमालय ने पुकारा की भूमिका रामधारी सिंह दिनकर ने। चीनी आक्रमण के दौर में उनकी अनेक कविताऍं तत्कालीन लोकप्रिय व्यावसायिक पत्रिका धर्मयुग में प्रकाशित हुईं। नेपाली ने पत्रकारिता में भी जोर आजमाइश की । शुरुआती दौर में प्रभात और दि मुरली पत्रिकाऍं निकालीं तो आगे चल कर निराला जी के साथ सुधा पत्रिका से भी जुड़े। रतलाम टाइम्स, पुण्यभूमि और योगी पत्रिकाओं से भी उनका जुड़ाव रहा । अपने लेखकीय गुणों के कारण वे कुछ दिनों बेतिया राज के प्रेस प्रबंधक भी रहे। लोग कहते हैं, उनके गीतों की पदावली जितनी मधुर होती थी, उनका कंठ उससे भी मधुर और ओजस्विता का पर्याय था।
विस्मृति का धुँधलका और नेपाली
बचपन में पाठ्यचर्या के दौरान पढ़े हुए जिन कुछ गीतों का याद आज भी ताजा है उनमें यह लघु सरिता का बहता जल कितना शीतल कितना निर्मल और तन का दिया प्राण की बाती दीपक जलता रहा रात भर जैसे गीत हैं। बड़े होने पर पता चला, इस गीत के रचयिता वही हैं जिन्होंने मेरा धन है स्वाधीन कलम लिखा है। आज का युग ऐसा है कि बड़े से बड़ा कवि भी विस्मृति के धुँधलके में ओझल हो सकता है। नेपाली जी के साथ भी ऐसा ही हुआ। वे जब तक जीवित थे, यानी 1963 तक--- तब तक उनके नाम और गीतों की धूम थी। वे मंच लूट लेने वाले कवियों में थे। पर पार्थिव सत्ता के ओझल होते ही याददाश्त से गुम-से होते गए। वे विस्मृति के इसी धुँधलके में रहे आए होते यदि शताब्दी वर्ष में उन्हें याद न किया जाता। यहॉं तक कि उनकी रचनाऍं भी अभी तक लगभग अनुपलब्ध ही थीं। उनके रहते भी किसी बड़े प्रकाशक के यहॉं से उनकी कृति न छप सकी। कदाचित ऐसा होता तो उनकी कीर्ति की पताका फहराने वाली कृतियॉं हमारे बीच उपलब्ध रहतीं। शायद प्रकाशकों द्वारा उस दौर के साहित्यिक प्रतिमानों की कसौटी पर नेपाली जी कमतर ठहरते रहे हों,प्रकाशकीय उदासीनता की एक वजह यह भी हो सकती है। यही नहीं गोपाल सिंह नेपाली का नाम न केवल हिंदी की जगत से, बल्कि बालीवुड की दुनिया से भी गहरे से जुड़ा है। उनके सैकड़ों गीत जो फिल्मों के लिए लिखे और गाए गए, आज न केवल अनुपलब्ध हैं, बल्कि उनकी मुकम्मल सूची तक हमारे पास नहीं है। जबकि नेपाली ने अपने गीतों को उस सिनेमाई आभा में नहीं रचा, जिस पर केवल फिल्मी होने का ठप्पा लगा कर उसे नजरंदाज किया जा सके। बल्कि फिल्मों के माध्यम से उन्होंने जाना कि लोकप्रियता हासिल करनी है तो जनता की भाषा समझनी होगी और उसी तेवर में लिखना भी होगा। यह अचरज नहीं कि नेपाली के जेहन में रामधारी सिंह दिनकर की ‘समर शेष है’ कविता की ये पंक्तियॉं रही हों कि : ‘समर शेष है, नही पाप का भागी केवध ब्याध/ जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध।‘ 'हिमालय ने पुकारा' के साथ उनकी कविता में एक खास तरह की नैतिक आक्रामकता आई। एक और वजह यह भी हो सकती है कि दिनकर के दुर्ग में बिना ओज और वीर रस को हथियार बनाये लोकप्रियता की पायदान पर पहुँचना असंभव है। लिहाजा नेपाली की कविता में 'हिमालय ने पुकारा' एक बड़े मोड़ का परिचायक बनी। चीन के आक्रमण ने उन्हें वह भावभूमि दे दी जिस पर खड़े होकर वे जनता की आकांक्षाओं को मूर्त रूप दे सकते थे।
अलग राह : अलग छटा
कहना न होगा कि जिस दौर की साहित्यिक अंतर्धारा में प्रसाद, निराला, महादेवी और पंत का वर्चस्व रहा हो, छायावादोत्तर दौर के कवियों में बच्चन और दिनकर लोकप्रियता के शिखर पर रहे हों, उनके बीच जनसमूह की कसौटी पर लोकप्रिय कवि बनना आसान न था। किन्तु नेपाली सच्चे अर्थों में जनता के कवि थे। उन्होंने लोकमानस में उतरने के लिए अपनी राह अलग तैयार की। न तो उन्होंने छायावादी भाव-भूमि को अपनी रचनाओं में प्रश्रय दिया, न ही वे रहस्यवादी कल्पनाओं का संजाल में घिरे, बल्कि निराला से संपर्क के कारण उनके गीतों के रचाव में कहीं न कहीं एक खास तरह की निराली छटा देखने को अवश्य मिलती है। गीतों में उनकी शख्सियत खुल कर बोलती थी। पर जैसा कह आया हूँ, अपनी रचनाओं में वे सर्वथा अलग दिखते हैं तो अलग दिखते ही नहीं, अपने समवर्ती और अनुवर्ती कवियों-गीतकारों पर अपनी अलग छाप भी छोड़ते हैं। वे फिल्मी दुनिया से भी जुड़े तो अपनी शर्तों पर। उनके अनेक साहित्यिक गीत फिल्मों में ज्यों के त्यों लिए गए। थोड़ी सी अवधि में उन्होंने लगभग 300 गीत फिल्मों के लिए लिखे और ऐसी अपार लोकप्रियता हासिल की जो विरल लेखकों को मिलती है। फिल्मों में लिखे उनके गीतों में कुछ गीतों के बोल हैं-- ओ दुपट्टा रंग दे मेरा रंगरेज, कहॉं तेरी मंजिल कहॉं है ठिकाना, किसी से मेरी प्रीत लगी अब क्या करूँ, दूर पपीहा बोला रात आधी रह गयी, न जाने कैसी बुरी घड़ी दुल्हन बनी एक अभागन, बहारें आऍंगी होठों पे फूल खिलेंगे, मेरी चुनरी उड़ाए लियो जाए, यहॉं रात किसी की रोते कटे या चैन से सोते सोते कटे और शमा से कोई कह दे। यहॉं भी देखें तो गीत भले ही फिल्मों के लिए हों, उसमें भी उनका अपना एजेंडा बोलता था। धार्मिक गीत लिखने में उनका कोई सानी न था। 'दर्शन दो घनश्याम नाथ मोरी अँखियॉं प्यासी रे' जैसा भक्तिपूर्ण गीत लिखने वाले नेपाली के गीतों की अपनी प्रवाहमयता है। गीत का मुखड़ा जेहन में आते ही भाषा और भाव जैसे उनकी कल्पना का स्वत: ही अनुसरण करते हैं। बालीवुड जाकर उन्होंने अपनी फिल्म निर्माण कंपनियों हिमालय फिल्म्स और नेपाली पिक्चर्स की स्थापना भी की तथा तीन फिल्में—नज़राना, सनसनी और खुशबू भी खुद बनायीं जिनमें उस दौर के जाने माने अभिनेताओं ने अभिनय किया। पर बाक्स आफिस पर इन फिल्मों के न चलने के कारण आर्थिक घाटा उठाना पड़ा। फलत:, बालीवुड की दुनिया उन्हें बॉंध कर न रख सकी, वे एक कवि के रूप में अपनी जवाबदेही से विमुख न रह सके और आखिर में जनता-जनार्दन और राष्ट्र के स्वाभिमान को जगाने के लिए काव्य मंचों को समर्पित हो गए।
नेपाली के गीतों का अपना जादू रहा है। वे पाठ और पाठ्यबल दोनों के धनी थे। उनकी इन्हीं विशेषताओं को लक्षित करते हुए निराला ने उनके काव्य में शक्ति, प्रवाह, सौंदर्यबोध और चारुता की सराहना की तो सुमित्रानंदन पंत को उनकी कविता के भावों में कल्पना की आकाशव्यापी उड़ान दीख पड़ती थी। वीरेन्द्र मिश्र को उनकी स्वर लहरी में नदी का सा प्रवाह दीखता था। नरेन्द्र शर्मा को उनकी व्यंजना भाती थी तो नेपाली के निधन पर बच्चन का कहना था कि नेपाली के न रहने से मॉं भारती की वीणा का एक तार टूट गया है। दिनकर ने नेपाली को रससिद्ध कवि और जनता का हृदयहार माना था। दिनकर से उन्होंने कहा था, ‘आई एम वन मैन आर्मी आफ इंडिया।‘ और यह भी कि ‘मैं जानता हूँ कि मुझको कोई पद्मश्री या पद्मभूषण की उपाधि नहीं प्रदान करेगा, किन्तु जब पीकिंग रेडियो मेरा नाम लेकर मुझे गालियॉं देता है तो मुझको लगता है कि शायद मुझको उन उपाधियों से कहीं ज्यादा मिल रहा है।‘ कहने को दिनकर अपने समय के सर्वाधिक ओजस्वी कवि थे। उनकी हुंकार ने देश के स्वाभिमान को ललकारा था। पर वे सत्ता के नजदीक रहे। पंडित नेहरू के प्रिय थे। शुद्ध कविता की खोज से लेकर संस्कृति के चार अध्याय तक उनकी अप्रतिहत बौद्धिक तेजस्विता के आगे नेपाली को कौन पूछता । किन्तु नेपाली सत्ता के मुखापेक्षी नही रहे। कविता में अपना नायकत्व उन्होंने स्वयं प्रतिष्ठित किया। यद्यपि कवि सम्मेलनी और फिल्मी का ठप्पा लगाकर साहित्य में उनके लिए बैरियर खड़े किये गए जैसा आज भी सार्वजनिक जीवन के कवियों के साथ होता है, किन्तु नेपाली को अपने कृतित्व पर भरोसा था और जनता के मध्य अपनी भूमिका का अहसास। खेतों की हरी भरी चादर और गंगा किनारे उनकी तबीयत लगती थी। उनकी ऑंखों की करुणा में गंगा-जमुना का वास था।
जीवन-संघर्ष
नेपाली ने थोड़ी ही वय में जीवन के विराट सत्य का साक्षात्कार किया था। फिल्मों में घाटा उठाने के बाद वे अपने शुद्ध कवि-जीवन में लौट आए थे। जिस तरह लोग जीवन के लिए नाना किस्म के समझौते करते हैं और सतही उद्देश्यों के लिए मनुष्यता के पतन की निम्नतर पायदान पर आ पहुँचते हैं, नेपाली ने ऐसा कुछ नही किया। वे तो कहते थे—‘तुझ-सा लहरों में बह लेता/ तो मैं भी सत्ता गह लेता/ईमान बेचता चलता तो/ मैं भी महलों में रह लेता/ हर दिल पर झुकती चली मगर, ऑंसू वाली नमकीन कलम/ मेरा धन है स्वाधीन कलम।‘–--यह वही कविता है जिसे नेपाली जी जब मंचों पर सुनाते थे तो फिर उनके बाद किसी और कवि का मंच पर टिकना असंभव-सा हो जाता था। नेपाली ने छंदों के जादू को पहचान लिया था। इस कविता में गोपाल सिंह नेपाली का अपना मिजाज बोलता है। एक लेखक कवि की स्वाधीन सत्ता और निजता क्या होती है, इसे नेपाली ने पहचाना और अपने जीवन में उतारा था। इसी स्वत्व और स्वाभिमान के वशीभूत होकर उन्होंने लिखा था—‘लिखता हूँ अपनी मर्जी से/ बचता हूँ कैंची दर्जी से/ आदत न रही कुछ लिखने की/ निंदा-वंदन खुदगर्जी से/ कोई छेड़े तो तन जाती , बन जाती है संगीन कलम/ मेरा धन है स्वाधीन कलम।‘ पर इस स्वाधीन कलमकार की विडंबना देखिए। ऊपर से लगता है फिल्मों का इतना बड़ा गीतकार, जनता का पसंदीदा कवि जहॉं थोड़ी शोहरत मिलते ही मामूली से मामूली कवि भी अपने को ‘गीतों का राजकुमार’ कहलाना पसंद करते हों, नेपाली के जीवन के जद्दोजेहद को बयान करता नेपाली पिक्चर्स के पैड पर 7 फरवरी, 1956 को विमल राजस्थानी के नाम लिखा उनका एक पत्र इंटरनेट पर मौजूद है। विमल ने शायद अपने पत्र में कुछ चुटकी ली होगी। पत्रोत्तर के अंश देखिए—
“मूर्ख कहीं के। यहॉं सुरा – सुंदरी का फेर कहॉं है। जीवन यापन की कठोरता को
रंगरेलियॉं नहीं कहना चाहिए। हॉं, कभी कभी टीस उठती है कि मैं तुम्हारे लिए
कुछ कर नही सका। सोचता हूँ शायद आगे कुछ कर सकें। अभी तो मैं ही भँवर
में पड़ा हूँ। बेतिया के अपने घर वाले चैन से बैठने नही देते। बाप को रूपया
भेजो, भाई को रूपया भेजो, अपना और परिवार की लन्तरानी अलग है। इन्हीं
झंझटों में गीत भी लिखता हूँ, कविताऍं भी झाड़ देता हूँ। आमदनी मरीज के
बुखार की तरह होती है। कभी कम कभी ज्यादा। अब बेतिया से खबर आई है
कि एक जो टूटा-फूटा घर था, वह भी नीलाम हो रहा है या हो चुका है। भाई
मुझे 15-20 दिन का समय चाहिए था अधिक से अधिक या तुम शिव बरन राय
जो ग्रेन मर्चेंट है, छोटा रमना या बनारस बाबू से जरा इतनी बिनती नहीं कर
दोगे। मै यथाशक्ति जल्द यानी इसी मास में बेतिया आ रहा हूँ। तब तक मेरा
इंतजार करें। मैं आकर पैसे चुका दूँगा। यहॉ सांप्रदायिक बलवा के कारण पैसा
थोड़ा रूका हुआ है। नही तो मैं इसी समय चल पड़ता। क्या दुनिया है? जिसने
अपने गीतों और कविताओं से बेतिया और चंपारन के नाम की दुंदुभि सारे
हिंदुस्तान में मचा दी, उसी महाकवि की झोपड़ी बेतिया वाले ही नीलाम कर
रहे हैं। जय हो पैसा भगवान की।“
नेपाली ने इस संघर्ष की छाया अपनी रचनाओं पर नही पड़ने दी। वे उसी उमंग और उल्लास से गाते रहे : मैं सरिता के कल कल –स्वर में अपना ही गायन सुनता हूँ। या उड़ उड़ कर गा रहे विहग जो /वह मेरा ही अमर गान है।
फिल्म जगत और नेपाली
गोपाल सिंह नेपाली का कवि-कद बेशक बड़ा न हो पर उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि कवि सम्मेलनों में 'वन्स मोर वन्स मोर' का शोर तब तक नहीं थमता था, जब तक नेपाली पुन: जनता के सम्मुख आ न खड़े होते। मुम्बई में कवि सम्मेलनों में उन्हें सुनकर ही फिल्मिस्तान स्टुडियो ने उनसे फिल्मों में गीत लिखने का अनुबंध किया था। उन दिनों नेपाली के हालात भी कुछ ऐसे थे कि जीवन यापन के लिए एक नियमित आमदनी जरूरी थी। लिहाजा साहित्यिक गीत लिखने वाले इस कवि को फिल्मी दुनिया की व्यावसायिकताओं से समझौता करना पड़ा। किन्तु नेपाली यहॉं भी सफल रहे। यदि हम फिल्मी दुनिया में हाथ आजमाने गए कवियों पर निगाह डालें तो आजादी के पहले कभी भवानीप्रसाद मिश्र ने भी किसी फिल्म निर्माता को अपने कुछ गीत दिए थे, किन्तु कुछ अखबारों में प्रतिकूल टिप्पणियों के चलते भवानी भाई ने फिल्मों से तोबा कर लिया और यह मशहूर गीत लिखा, 'जी हॉं हुजूर मैं गीत बेचता हूँ', जो बाद में उनकी कुछ बेहतरीन कविताओं में मानी गयी। उसके बाद इस दुनिया में प्रदीप आए। देशभक्ति गीत लिखने में प्रदीप जी अपनी मिसाल खुद थे। सन बयालिस में उनके लिखे गीत 'आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है/दूर हटो-दूर हटो-ऐ दुनिया वालों, हिन्दुस्तान हमारा है' ने यह हालात पैदा कर दिए कि अंग्रेजों ने उन्हें गिरफतार करने की ठान ली। प्रदीप ने ही यह गीत भी लिखा था 'जरा ऑंख में भर लो पानी', जिसे सुनने के बाद नेहरू की ऑंखों में ऑंसू भर आए थे। उन्होंने पूछा था, इस गीत के रचयिता कौन है, मैं उनसे मिलना चाहता हूँ। उसके बाद नरेन्द्र शर्मा आए वे भी साहित्य की मुख्य धारा के कवि थे। फिल्मों में उनके सैकड़ों गीत हिट हुए। साहित्यिक स्पर्श के गीत लिखने में भरत व्यास और शैलेन्द्र भी अग्रणी रहे, यद्यपि वे कवि न थे। गोपाल सिंह नेपाली भी जिस वक्त फिल्मों में गीत लिखने गए, कवि सम्मेलनों में उनकी तूती बोलती थी। चार पॉंच संग्रह उनके आ चुके थे। यद्यपि देशभक्ति और क्रांतिकारी गीतों का नेपाली का दौर फिल्मों से वापसी के बाद शुरू होता है पर फिल्मों में उनके लिखे गीतों ने जनमानस में एक गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने सफर, शिकार, बेगम, लीला, गजरे, शिवभक्त, तुलसीदास, शिवरात्र, जयश्री, राजकन्या, सती मदालता, गौरीपूजा, नागपंचमी, नागकन्या, माया बाजार, नरसी भगत, नई रोशनी, मजदूर, जय भवानी, आदि पचास से अधिक फिल्मों मे तीन सौ से ज्यादा गीत लिखे किन्तु फिल्म जगत से कोई समझौता नहीं किया। फिल्मों में गीत लिखते हुए भी उनके आर्थिक हालात कोई बहुत अच्छे न थे, विमल राजस्थानी के नाम लिखे पत्र से यह बात जाहिर भी होती है। आज इतनी तकनीकी तरक्की के बावजूद हमारे पास नेपाली के लिखे और उस समय के महत्वपूर्ण गायकों द्वारा गाए ज्यादातर गीतों के रिकार्ड उपलबध नहीं हैं ।
कविता: एक मिशन
नेपाली का कवि उमंग, पंछी और रागिनी में रोमानी कल्पनाओं से गुजरता हुआ, नीलिमा और पंचमी में प्रकृति के तत्वों से जीवन जीने की सरस प्रेरणा लेता है। बाद के एक दशक का दौर ऐसा भी है जहॉं नेपाली बम्बई के फिल्मी जगत से जुड़ कर अपने गीतों को जन-जन की कसौटी पर आजमाते हैं। परन्तु उन्होंने बालीवुड से जुड़ कर भी अपने गीतों का कद छोटा नहीं होने दिया, उसे अपनी साहित्यिक रचनाधर्मिता से सींचने का काम करते रहे। चित्रपट की मायानगरी में रह कर जहॉं अपने गीतों से उन्होंने खासा धनोपार्जन भी किया, अपनी फिल्में बनाने की धुन में गाढ़े की पूँजी गँवा बैठे। पर उनकी बौद्धिक पूँजी बदस्तूर उनके पास थी। यही वजह है कि जब वे फिल्मी दुनिया से लौट कर अपने घर यानी आम जनता के पास आए तो वे एक दूसरे ही नेपाली थे। यही वही दौर था जब आजादी के बाद का परिदृश्य हमें लगातार सावधान करता था। गिरिजा कुमार माथुर ने लिखा ही था, 'आज जीत की रात पहरुवे सावधान रहना।' लिहाजा चीन के आक्रमण ने उनके कवि को जैसे एक मिशन दे दिया। ऐसे समय जब राष्ट्रकवि दिनकर की ओजस्वी वाणी क्षितिज में हुंकार कर रही थी, क्षितिज के एक ओर से दूसरे दिनकर यानी नेपाली जी का उदय हुआ। हिमालय ने पुकारा के अपने गीतों से बिना किसी राष्ट्रकवि का क्षत्र मुकुट धारण किए नेपाली ने चीन को बुरी तरह ललकारा और चालीस करोड़ देशवासियों को उठ खड़े होने का आह्वान किया। उनकी रचना 'चलो भाई बोम डिला' सुनाते ही हजारों लोग एक साथ ताल देने लगते थे। वे मानते थे कि कवि कोई छोटा मोटा प्राणी नही है, वह चाहे तो इतिहास बदल सकता है। उनका विश्वास था:
हर क्रांति कलम से शुरू हुई सम्पूर्ण हुई
चट्टान जुल्म की,कलम चली तो चूर्ण हुई
हम कलम चला कर त्रास बदलने वाले हैं
हम तो कवि हैं इतिहास बदलने वाले हैं
इस मामले में वे अपने को वन मैन आर्मी कहा करते थे। वे राष्ट्रकवि के आसन पर भले न विराजमान रहे हों, लोगों के दिलों के सिंहासन पर आरूढ़ हो चुके थे। यही वह समय है जब वे चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा, इन चीनी लुटेरों को हिमालय से निकालो, यह मेरा हिंदुस्तान है, तुम कल्पना करो, नवीन कल्पना करो, शासन चलता तलवार से, इतिहास बदलनेवाले हैं, मुस्कान पुरानी कहॉं गई तथा मेरा धन है स्वाधीन कलम जैसी ओजस्वी रचनाऍं मंचों पर सुना रहे थे। 'चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा' रचना कोई मामूली नही है। यह जागरण और आह्वान का गीत है। प्रयाण गीत है। कबीर कहा करते थे, दुखिया दास कबीर है जागै अरु रोवै। कुछ कुछ ऐसी पीर इस गीत में है कि सुनते ही धमनियों में लहू की गति तेज हो उठती थी: कुछ पदावलियॉं देखें---
भूला है पड़ोसी तो उसे प्यार से कह दो
लम्पट है लुटेरा है तो ललकार के कह दो
जो मुँह से कहा है वही तलवार से कह दो
आए न कोई लूटने भारत को दुबारा।
चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।
जागो कि बचाना है तुम्हें मानसरोवर
रख ले न कोई छीन के कैलाश मनोहर
ले ले न हमारी यह अमरनाथ धरोहर
उजड़े न हिमालय तो अचल भाग्य तुम्हारा
चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।
कहते हैं इस गीत को सुनकर राष्ट्रपति जाकिर हुसैन ने कवि को बधाई दी थी और कहा था कि इस कविता को हिंदी और उर्दू में छाप कर सारे भारत में बँटवा देना चाहिए। ऐसी ही एक उबलता हुआ गीत है, इन चीनी लुटेरों को हिमालय से निकालो। सीमा समस्या पर इससे अच्छा गीत शायद ही कोई हो। आजादी तो हमने अहिंसा के बलबूते ली थी पर कहीं इसे हमारी कमजोरी न मान लिया जाए, नेपाली इस बात से वाकिफ थे। इसीलिए वे इस मामले में थोड़े हार्डलाइनर थे। शीश झुकाना और फरियाद करना उन्हें गवारा न था। है ताज हिमालय के सिर पर---गीत में वे लिखते हैं---
अब दिल्ली वह दरबार नहीं, यह परवानों की महफिल है
है नई शमा उम्मीदों की, आजाद एशिया का दिल है
इस दिल की धड़कन में धड़के, लाखों अरमान करोड़ों के
राजा हो एक, प्रजा लाखों, अब ऐसा यहॉं रिवाज नहीं
है ताज हिमालय के सिर पर, अब और किसी का ताज नहीं।
इन पंक्तियों से हमें नेपाली की वैचारिक बुनावट का अहसास होता है। वे नवीन कल्पना करने के लिए कहते हैं तो किसी निजी चित्तवृत्ति के मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि निज राष्ट्र के शरीर के सिंगार के लिए। कवि देश के लिए पहले सोचता था। निज गौरव नहीं, बल्कि देश-गौरव से ओतप्रोत नेपाली ने ऐसा बहुत कुछ लिखा है--जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है और हर समय ऐसे मूल्यों, उद्बोधनों की प्रासंगिकता बनी रहेगी---
हम थे अभी अभी गुलाम, यह न भूलना
करना पड़ा हमें सलाम, यह न भूलना
रोते फिर उमर तमाम, यह न भूलना
था फूट का मिला इनाम, यह न भूलना
बीती गुलामियॉं न लौट आऍं फिर कभी
तुम कल्पना करो नवीन कल्पना करो।
नेपाली जी ने दिल्ली सरकार को संबोधित एक रचना लिखी थी, ‘शासन चलता तलवार से।‘ शायद वे सरकार से तमाम मामलों में सख्त रुख की अपेक्षा रखते थे। याद हो तो दिनकर ने भी ऐसी एक रचना दिल्ली को संबोधित करके लिखी है: ‘भारत का यह रेशमी नगर’ शीर्षक से। कहना न होगा कि जीवन की अर्धशती आते आते नेपाली के भीतर का क्रांतिकारी कवि जाग उठा था । वह जानता था कि दिनकर की धरती को एक और नेपाली की प्रतीक्षा है। एक और कवि धरती को चाहिए जो राष्ट्र के बारे में, राष्ट्रभाषा के बारे में, राष्ट्रीय एकता के बारे में और स्वाधीन कलम के बारे में खुल कर बोले। मानव की समता के बारे में बोले, देश को, समाज को जगाए। वे स्वराज ही नहीं, सुराज चाहते थे। एक गीत में उन्होंने लिखा है--
स्वतंत्रता मिली हमें कि देश में ‘सुराज’ हो
मनुष्य एक आज हो कि वर्ग एक आज हो
समाज के लिए समाज का अखंड राज हो
मनुष्य मॉंगता यही, यही मनुष्य मानता
कि हो समाज राज में मनुष्य की समानता।
इस तरह एक कवि का कर्तव्य निबाहने में नेपाली सदैव अग्रणी रहे।
वे समता और समानता के कायल थे। उन्हें इस बात का रंज था कि हमारा घर तो घर के रखवालों ने लूटा है। इस भावना को उन्होंने नौ लाख सितारों ने लूटा में पिरोया है। उन्होंने इस विडंबना की ओर याद दिलाया कि जो जेल से लौट आए वे इनाम के हकदार बने, जो जेल न जा सके वे मात खा गए और जिनकी इहलीला जेल में ही समाप्त हो गयी, उन्हें सब भुला बैठे। उनका कहना था: ‘स्वप्न टूटते रहे, कल्पना मरी नहीं/ रोटियॉं गरीब की प्रार्थना बनी रहीं।‘ कभी कभी उनके भीतर का क्षुब्ध मन दुखी भी होता था। उन्होंने पंचमी के गीत—‘जग से हमसे दो दिन न बनी ‘ में लिखा है—
अफसोस नही इसका हमको, जीवन में हम कुछ कर न सके
झोलियॉं किसी की भर न सके, संताप किसी का हर न सके
अपने प्रति सच्चा रहने का, जीवन भर हमने यत्न किया
देखा- देखी हम जी न सके, देखा- देखी हम मर न सके।
गीति काव्य: लिरिक की साधना
जिन अर्थों में गीत को लिरिक कह कर पुकारा जाता है, वह पश्चिम की देन है। हमारा प्राचीन काव्य छांदिक संरचना का महान उदाहरण है। जिस तरह ग्रीक लिरिककारों ने कविता में गीतितत्वों का विधान किया-- चासर से लेकर शेक्सपियर तक के सानेट उससे प्रभावित हुए, जर्मन कवि गेटे में जिस गीतितत्व की सघनता देखने को मिलती है, जिसका कीर्तिमान आगे चल कर वर्ड्सवर्थ, शैली और कीट्स और ब्राउनिंग आदि के कृतित्व में मिलता है, जिससे प्रेरणा लेकर हिंदी में छायावादी काव्यधारा दशकों तक प्रवहमान रही, जिसका रम्य रूप संस्कृत में कालिदास के नाटकों में गुँथा हुआ है, शाकुंतल के पन्ने जिस तरह के लिरिकल आवेग में फड़फड़ाते हैं, जिस लिरिक की संवेदना का वहन जयदेव और मैथिल कवि विद्यापति करते हैं बल्कि जयदेव की अभिनवता और लिरिक का आश्रय ग्रहण कर ही वे आगे चल कर अभिनव जयदेव कहलाए, उस लिरिक में नवता का आह्वान विद्यापति ने तेरहवी सदी में किया---नव वृन्दावन, नव-नव तरु-गन/ नव-नव विकसित फूल/ नवल बसन्त नवल मलयानिल/मातल नव अलिकूल। ध्यान रहे कि बीसवीं सदी के महान हिंदी कवि निराला ने भी अपनी सरस्वती वंदना में नव का अनकेश: प्रयोग किया है। नव गति, नव लय, ताल-छंद नव/नवल कंठ, नव जलद-मन्द्ररव;/नव नभ के नव विहग-वृंद को/नव पर, नव स्वर दे !
हिंदी में लिरिक के यशस्वी कवियों में निराला, पंत, महादेवी और प्रसाद हैं। निराला की गीतिका और अनामिका की रचनाएं, प्रसाद के ऑंसू, पन्त के पल्लव और गुंजन, महादेवी की नीरजा में गीति की --लिरिक की संवेदना सघन है। हिंदी की गीति-चेतना को रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भी काफी प्रभावित किया है। कुल मिलाकर यह जो लिरिक की धारा है वह हिंदी के आधुनिक बड़े कवियों से होती हुई दिनकर, माखनलाल चतुर्वेदी, बच्चन, नरेन्द्र शर्मा और तदुपरांत केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, गोपाल सिंह नेपाली, शिवमंगल सिंह सुमन और गिरिजाकुमार माथुर तक प्रवहमान दिखती है।
युगीन प्रासंगिकता और नेपाली
सवाल यह है कि गोपाल सिंह नेपाली जिस गीत या गीति धारा का संवर्धन करते हैं, उसकी युगीन प्रासंगिकता क्या है। नेपाली ने अपने संग्रहों में अपनी कविताओं के बारे में बहुधा लिखा है। उससे यह पता चलता है कि बचपन में वे ब्रजभाषा की कोमलकांत पदावली से अभिभूत हुए तो उमर खय्याम की रुबाइयों से भी। उन्होंने अपने से सवाल किया था कि उसके गीतों में विचार हों, चिंताऍं हों या रोजमर्रा के खर्च की चीजों की फेहरिश्त हो। राग हो या रोटी। वे लिखते हैं: ‘ आधुनिक हिंदी काव्य वीणा में जो मेरा स्वर बज रहा है वह पता नहीं, आपके लिए रोमांच है, सिहरन है गुदगुदी है या शब्दों की दुलत्ती। हॉं , मैं एक कल्पना मजे में कर सकता हूँ और वह यह कि जाड़े की काली सनी डरावनी रात है। चारो ओर बर्फ पड़ रही है और उस अँधेरे में मेरा क्षीण स्वर जाड़े से ठिठुर कर आपके कानों के दरवाजें पर सर मार रहा है और आप है कि गरम गरम रजाई की तहों के भीतर नींद के मजे ले रहे हैं। जैसे ऊपर से तेल छिड़क कर दियासलाई लगा देने भर की देर हो।‘ इसका अर्थ यह है कि वे अपनी कविताओं को अपनी कसौटी पर कसते रहते थे। उसकी प्रभाववत्ता और सार्थकता का आकलन करते रहते थे। और इसके लिए वे प्रकृति के पास जाते थे, उससे प्रेरणाऍं लेते थे। उनके यहॉं भोर, प्रभात, संध्या, तारों, मेघ, लहर, पंछी, वसंत, वन , पतझड़, प्राची, मेघ, सावन, नन्ही बूँदें, दोपहरी, अम्बर के चित्र हैं तो प्रिय-आगम और जीवन के राग को सींचने वाली काव्यात्मक जिजीविषा भी। कहना न होगा कि कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर पर लिखी रचना में उनके जिस विशेषत्व का अनुगायन नेपाली ने किया है, उन विशेषताओं और काव्यगुणों के प्रति कहीं न कहीं एक ललक नेपाली जी के कवि-मन में भी रही है।
कालिदास तुम, तुम कबीर थे
तुम तुलसी गंभीर धीर थे
तुम गायक कविश्रेष्ठ सूर थे
नयनों के दो बूँद नीर थे।
यह समूची कविता इस बात का उदाहरण है कि यह कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के जीवन और कृतित्व से कितना ओतप्रोत रहा है। वे कविता को बोलचाल की लय से जोड़ने वाले कवि थे। तुम्हारी इतनी सच्ची बात,उड़ा दी हँसकर मैंने आज—कितनी सहजता है उनकी इस पंक्ति में। जैसे यह पारस्परिक संवाद हो।
नेपाली को याद करते हुए जिन कुछ कविताओं को रेखांकित करना जरूरी है, उनमें 'बाबुल तुम बगिया के तरुवर' जैसी कविता भी है। एक सधे हुए रूपक से अपनी बात उठाते हुए वे स्त्री की नियति का लेखा जोखा रखते हैं। पंक्तियॉं ऐसी कि उनमें धँसें तो ऑंसू आ जाऍं। सोचिये ऐसी ही पीड़ा से गुजरते हुए निराला ने कभी 'सरोज स्मृति' जैसी मार्मिक रचना लिखी होगी। बेटियां पराया धन कही जाती हैं। उन्हें पाल पोस कर योग्य वर-घर के सुपुर्द करना होता है। बेटियों के लिए आज के एक शायर ने लिखा है---घर में रहके भी गैरों की तरह होती हैं/ बेटियॉं धान के पौधों की तरह होती हैं----'बाबुल तुम बगिया के तरुवर' कविता में बेटी पिता को संबोधित करती है। सदैव बेटी का हित चाहने वाले पिता को क्या मालूम कि सुहाग की पहनी हुई चुनरी उसकी हथकड़ी बनने वाली है, जिस ससुराल वह जा रही है वह कॉंटों की फुलवारी बन जाएगी। बेटी कहती है, पैदा होने पर मॉं पिता का हृदय जल उठता है, यौवन खिला तो ननद भाभियॉं जल उठती हैं, इस तरह नारी हृदय के अंदर ही अंदर सुलगती रहती है। कवि ने इस कविता में जैसे परकायाप्रवेश कर नारी के अंतर्मन की थाह ली है। लोकभाषा की सी आभा में रची यह कविता सुन कर आंखें बरस पड़ती हैं। इसी तरह 'दूर जाकर न कोई बिसारा करे' और 'दिल चुराकर न हमको भुलाया करो' जैसी मार्मिक और भावसंकुल रचनाऍं है जिन्हें कवि ने हृदय के गीले कोरों से रचा है।
नेपाली के जीवन की अर्धशती संघर्षों में ही बीती। अल्प शिक्षा, परिवार के आर्थिक संकट, फिल्मों में घाटा, घर की नीलामी, यशस्वी कवि होकर भी फाकेमस्ती और दूर तक कहीं न बुझने वाली प्यास ---ने नेपाली के कवि-मन को व्यथित ही नहीं किया, भलीभॉंति मथा भी था। पर उन्होंने निज के संकटों का रोना अपनी कविताओं में नहीं रोया। समाज और देश की व्यथा-कथा लिखने में ही उनका जीवन बीत गया। वे होते तो उनकी आगामी रचनाओं में कविता की, देश की, समाज की और भी बॉंकी छवि हमें देखने को मिलती। इसमें कोई संदेह नहीं कि नेपाली का रचना-संसार सदैव स्मृति में धारण करने योग्य है और रहेगा।
मातृ-प्रेम, तुझे धन्य है ! संसार में और जो कुछ है, मिथ्या है, निस्सार है। मातृ-प्रेम ही सत्य है, अक्षय है, अनश्वर है। तीन दिन से सुखिया के मुँह में न अन्न का एक दाना गया था, न पानी की एक बूँद। सामने पुआल पर माता का नन्हा-सा लाल पड़ा कराह रहा था। आज तीन दिन से उसने आँखें न खोली थीं। कभी उसे गोद में उठा लेती, कभी पुआल पर सुला देती। हँसते-खेलते बालक को अचानक क्या हो गया, यह कोई नहीं बताता। ऐसी दशा में माता को भूख और प्यास कहाँ ? एक बार पानी का एक घूँट मुँह में लिया था, पर कंठ के नीचे न ले जा सकी। इस दुखिया की विपत्ति का वारपार न था।
साल भर के भीतर दो बालक गंगा जी की गोद में सौंप चुकी थी। पतिदेव पहिले ही सिधार चुके थे। अब उस अभागिनी के जीवन का आधार, अवलम्ब, जो कुछ था, यही बालक था। हाय ! क्या ईश्वर इसे भी उसकी गोद से छीन लेना चाहते हैं ?- यह कल्पना करते ही माता की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगते थे। इस बालक को वह क्षण भर के लिए भी अकेला न छोड़ती थी। उसे साथ लेकर घास छीलने जाती। घास बेचने बाजार जाती तो बालक गोद में होता।
उसके लिए उसने नन्हीं-सी खुरपी और नन्हीं-सी खाँची बनवा दी थी। जियावन माता के साथ घास छीलता और गर्व से कहता-अम्माँ, हमें भी बड़ी-सी खुरपी बनवा दो, हम बहुत-सी घास छीलेंगे, तुम द्वारे माची पर बैठी रहना, अम्माँ; मैं घास बेंच लाऊँगा। माँ पूछती-हमारे लिए क्या-क्या लाओगे, बेटा ? जियावन लाल-लाल साड़ियों का वादा करता। अपने लिए बहुत-सा गुड़ लाना चाहता था। वे ही भोली-भाली बातें इस समय याद आ-आकर माता के हृदय को शूल के समान बेध रही थीं। जो बालक को देखता, यही कहता कि किसी की डीठ है; इस विधवा का भी संसार में कोई बैरी है ? अगर उसका नाम मालूम हो जाता, तो सुखिया जाकर उसके चरणों पर गिर पड़ती और बालक को उसकी गोद में रख देती। क्या उसका हृदय दया से न पिघल जाता ? पर नाम कोई नहीं बताता। हाय ! किससे पूछे, क्या करें ?
2
तीन पहर रात बीत चुकी थी। सुखिया का चिंता-व्यथिक चंचल मन कोठे-कोठे दौड़ रहा था। किस देवी की शरण जाय, किस देवता की मनौती करे, इस सोच में पड़े-पड़े उसे एक झपकी आ गयी। क्या देखती है कि उसका स्वामी आकर बालक के सिरहाने खड़ा हो जाता है और बालक के सिर पर हाथ फेरकर कहता है-रो मत, सुखिया ! तेरा बालक अच्छा हो जायेगा। कल ठाकुर जी की पूजा कर दे, वही तेरे सहायक होंगे। यह कहकर वह चला गया। सुखिया की आँख खुल गयी अवश्य ही उसके पतिदेव आये थे। इसमें सुखिया को जरा भी संदेह न हुआ। उन्हें अब भी मेरी सुधि है, यह सोच कर उसका हृदय आशा से परिप्लावित हो उठा। पति के प्रति श्रद्धा और प्रेम से उसकी आँखें सजल हो गयीं। उसने बालक को गोद में उठा लिया और आकाश की ओर ताकती हुई बोली-भगवान् ! मेरा बालक अच्छा हो जाए तो मैं तुम्हारी पूजा करूँगी। अनाथ विधवा पर दया करो।
उसी समय जियावन की आँखे खुल गयीं। उसने पानी माँगा। माता ने दौड़ कर कटोरे में पानी लिया और बच्चे को पिला दिया। जियावन ने पानी पीकर कहा-अम्मा रात है कि दिन ? सुखिया-अभी तो रात है बेटा, तुम्हारा जी कैसा है ? जियावन-अच्छा है अम्माँ ! अब मैं अच्छा हो गया। सुखिया-तुम्हारे मुँह में घी-शक्कर, बेटा, भगवान् करे तुम जल्द अच्छे हो जाओ। कुछ खाने को जी चाहता है ? जियावन-हाँ अम्माँ थोड़ा-सा गुड़ दे दो।
सुखिया-गुड़ मत खाओ भैया, अवगुन करेगा। कहो तो खिचड़ी बना दूँ। जियावन-नहीं मेरी अम्माँ, जरा सा गुड़ दे दो, तेरे पैरों पड़ूँ।
माता इस आग्रह को न टाल सकी। उसने थोड़ा-सा गुड़ निकाल कर जियावन के हाथ में रख दिया और हाँड़ी का ढक्कन लगाने जा रही थी कि किसी ने बाहर से आवाज दी। हाँड़ी वहीं छोड़ कर वह किवाड़ खोलने चली गयी। जियावन ने गुड़ की दो पिंडियाँ निकाल लीं और जल्दी-जल्दी चट कर गया।
3
दिन भर जियावन की तबीयत अच्छी रही। उसने थोड़ी सी खिचड़ी खायी, दो-एक बार धीरे-धीरे द्वार पर भी आया और हमजोलियों के साथ खेल न सकने पर भी उन्हें खेलते देखकर उसका जी बहल गया। सुखिया ने समझा, बच्चा अच्छा हो गया। दो-एक दिन में जब पैसे हाथ में आ जायेंगे, तो वह एक दिन ठाकुर जी की पूजा करने चली जाएगी। जाड़े के दिन झाड़ू-बहारू, नहाने-धोने और खाने-पीने में कट गये; मगर जब संध्या के समय फिर जियावन का जी भारी हो गया, तब सुखिया घबरा उठी। परंतु मन में शंका उत्पन्न हुई कि पूजा में विलम्ब करने से ही बालक फिर मुरझा गया है। अभी थोड़ा-सा दिन बाकी था। बच्चे को लेटा कर वह पूजा का सामान तैयार करने लगी। फूल तो जमींदार के बगीचे में मिल गये। तुलसीदल द्वार पर था, पर ठाकुर जी के भोग के लिए कुछ मिष्ठान तो चाहिए। सारा गाँव छान आई कहीं पैसे उधार न मिले। अब वह हतास हो गयी। हाय रे अदिन ! कोई चार आने पैसे भी नहीं देता। आखिर उसने अपने हाथों के चाँदी के कड़े उतारे और दौड़ी हुई बनिये कि दुकान पर गयी, कड़े गिरों रखे, बतासे लिए और दौड़ी हुई घर आयी। पूजा का सामान तैयार हो गया, तो उसने बालक को गोद में उठाया और दूसरे हाथ में पूजा की थाली लिये मंदिर की ओर चली। मन्दिर में आरती का घंटा बज रहा था। दस-पाँच भक्तजन खड़े स्तुति कर रहे थे। इतने में सुखिया जाकर मन्दिर के सामने खड़ी हो गयी। पुजारी ने पूछा क्या है रे ? क्या करने आयी है ? सुखिया चबूतरे पर आकर बोली-ठाकुर जी की मनौती की थी महाराज पूजा करने आयी हूँ। पुजारी जी दिन भर जमींदार के असामियों की पूजा किया करते थे और शाम –सबेरे ठाकुर जी की। रात को मन्दिर ही में सोते थे, मन्दिर ही में आपका भोजन भी बनता था, जिससे ठाकुरद्वारे की सारी अस्तरकारी काली पड़ गयी थी। स्वभाव के बड़े दयालु थे, निष्ठावान इतने थे कि चाहे कितनी ही ठंड पड़े कितनी ही ठंडी हवा चले, बिना स्नान किये मुँह में पानी तक न डालते थे। अगर इस पर भी उनके हाथों और पैरों में मैल की मोटी तह जमी हुई थी, तो इसमें उनका कोई दोष न था ! बोले-तो क्या भीतर चली आयेगी। हो तो चुकी पूजा। यहा आकर भरभ्रष्ट करेगी। एक भक्तजन ने कहा-ठाकुर जी को पवित्र करने आयी है ?
सुखिया ने बड़ी दीनता से कहा-ठाकुर जी के चरन छूने आयी हूँ सरकार ! पूजा की सब सामग्री लाई हूँ। पुजारी-कैसी बेसमझी की बात करती है रे, कुछ पगली तो नहीं हो गयी है। भला तू ठाकुर जी को कैसे छुएगी ? सुखिया को अब तक कभी ठाकुरद्वारे में आने का मौका न मिला था। आश्चर्य से बोली-सरकार वह तो संसार के मालिक हैं। उनके दरसन से तो पापी भी तर जाता है, मेरे छूने से उन्हें कैसे छूत लग जायेगी ? पुजारी- अरे तू चमारिन है कि नहीं रे ? सुखिया-तो क्या भगवान ने चमारों को नहीं सिरजा है ? चमारों का भगवान और कोई है ? इस बच्चे की मनौती है सरकार ! इस पर वही भक्त महोदय, जो अब स्तुति समाप्त कर चुके थे, डपटकर बोले-मार के भगा दो चुड़ैल को। भरभ्रष्ट करने आयी है, फेंक दो थाली-वाली। संसार में तो आप ही आग लगी हुई है, चमार भी ठाकुर जी की पूजा करने लगेंगे, तो पिरथी रहेगी कि रसातल को चली जाएगी। दूसरे भक्त महाशय बोले-अब बेचारे ठाकुर जी को चमारों के हाथ का भोजन करना पड़ेगा। अब परलय होने में कुछ कसर नहीं है। ठंड पड़ रही थी, सुखिया खडीं काँप रही थी और यहाँ धर्म के ठेकेदार लोग समय की गति पर आलोचनाएँ कर रहे थे। बच्चा मारे ठंड के उसकी छाती में घुसा जाता था, किन्तु सुखिया वहाँ से हटने का नाम न लेती थी। ऐसा मालूम होता था कि उसके दोनों पाँव भूमि में गड़े हैं। रह-रहकर उसके हृदय में ऐसा उदगार उठता था कि जाकर ठाकुर जी के चरणों पर गिर पड़े। ठाकुर जी क्या इन्हीं के हैं, हम गरीबों का उनसे कोई नाता नहीं है, ये लोग होते है कौन रोकने वाले पर यह भय होता था कि इन लोगों ने कहीं सचमुच थाली-वाली फेंक दी तो क्या करूँगी ? दिल में ऐंठ कर जाती थी। सहसा उसे एक बात सूझी वह वहाँ से कुछ दूर जाकर एक वृक्ष के नीचे अँधेरे में छिप कर इन भक्तजनों के जाने की राह देखने लगी।
4
आरती की स्तुति के पश्चात भक्त जन बड़ी देर तक श्रीमद्भागवत का पाठ करते रहे। उधर पुजारी जी ने चूल्हा जलाया और खाना पकाने लगे। चूल्हे के सामने बैठे हुए ‘हूँ-हूँ’ करते जाते थे और बीच-बीच में टिप्पणियाँ भी करते जाते थे। दस बजे रात तक कथा वार्ता होती रही और सुखिया वृक्ष के नीचे ध्यानावस्था में खड़ी रही। सारे भक्त लोगों ने एक-एक करके घर की राह ली। पुजारी जी अकेले रह गये। अब सुखिया आकर मन्दिर के बरामदे के सामने खड़ी हो गयी, जहाँ पुजारी जी आसन जमाये बटलोई का क्षुधावर्द्घव मधुर संगीत सुनने में मग्न थे। पुजारी जी ने आहट पाकर गरदन उठायी तो सुखिया को खड़ी देखकर बोले क्यों रे, तू अभी तक खड़ी है ! सुखिया ने थाली जमीन पर रख दी और एक हाथ फैलाकर भिक्षा प्रार्थना करती हुई बोली महाराज जी, मैं अभागिनी हूँ। यही बालक मेरे जीवन का अलम है, मुझ पर दया करो। तीन दिन से इसने सिर नहीं उठाया। तुम्हें बड़ा जस होगा, महाराज जी ! यह कहते-कहते सुखिया रोने लगी। पुजारी जी दयालु तो थे, पर चमारिन को ठाकुर जी के समीप जाने देने का अश्रुतपूर्व घोर पातक वह कैसे कर सकते थे ? न जाने ठाकुर जी इसका क्या दंड दें । आखिर उनके भी बाल-बच्चे थे। कहीं ठाकुर जी कुपित होकर गाँव का सर्वनाश कर दें तो ? बोले-घर जाकर भगवान् का नाम ले, तो बालक अच्छा हो जाएगा। मैं यह तुलसी दल देता हूँ, बच्चे को खिला दे, चरणामृत उसकी आँखों में लगा दे। भगवान् चाहेंगे तो सब अच्छा ही होगा।
सुखिया-ठाकुर जी के चरणों पर गिरने न दोगे महाराज जी ? बड़ी दुखिया हूँ, उधार काढ़कर पूजा की सामग्री जुटायी है। मैंने कल सपना देखा था, महाराज जी कि ठाकुर जी की पूजा कर, तेरा बालक अच्छा हो जायेगा। तभी आई हूँ। मेरे पास एक रुपया है। वह मुझसे ले लो पर मुझे एक छन भर ठाकुर जी के चरनों पर गिर लेने दो।
इस प्रलोभन से पंडित जी को एक क्षण के लिए विचलित कर दिया किंतु मूर्खता के कारण ईश्वर का भय उनके मन में कुछ-कुछ बाकी था। सँभाल कर बोले-अरी पगली, ठाकुर जी भक्तों के मन का भाव देखते हैं कि चरण पर गिरना देखते है। सुना नहीं है- ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’ मन में भक्ति न हो, तो लाख कोई भगवान् के चरणों पर गिरे, कुछ न होगा। मेरे पास एक जंतर है। दाम तो उसका बहुत है पर तुझे एक ही रुपये में दे दूँगा। उसे बच्चे के गले में बाँध देना, बस, कल बच्चा खेलने लगेगा। सुखिया-ठाकुर जी की पूजा न करने दोगे ? पुजारी-तेरे लिए इतनी ही पूजा बहुत है। जो बात कभी नहीं हुई, वह आज मैं कर दूँ और गाँव पर कोई आफत-विपत आ पड़े तो क्या हो, इसे भी तो सोचो ! तू यह जंतर ले जा, भगवान् चाहेंगे तो रात ही भर में बच्चे का क्लेश कट जायेगा। किसी की दीठ पड़ गयी है। है भी तो चोंचाल। मालूम होता है, छत्तरी बंस है। सुखिया-जब से इसे ज्वर है मेरे प्राण नहों में समाये हुए हैं। पुजारी-बड़ा होनहार बालक है। भगवान् जिला दें तो तेरे सारे संकट हर लेगा। हाँ तो बहुत खेलने आया करता था। इधर दो-तीन दिन से नहीं देखा था। सुखिया-तो जंतर को कैसे बाँधूँगी महाराज ? पुजारी-मैं कपड़े में बाँधकर देता हूँ। बस, गले में पहना देना अब तू इस बेला नवीन बस्तर कहाँ खोजने जायेगी। सुखिया ने दो रुपये पर कड़े गिरो रखे थे। एक पहले ही भँजा चुकी थी। दूसरा पुजारी जी को भेंट किया और जंतर लेकर मन को समझाती हुई घर लौट आयी।
5
सुखिया ने घर पहुँचकर बालक को जंतर बाँध दिया ज्यों-ज्यों रात गुजरती थी उसका ज्वर भी बढ़ता जाता था, यहाँ तक कि तीन बजते–बजते उसके हाथ पाँव शीतल होने लगे। तब वह घबड़ा उठी और सोचने लगी-हाय। अगर मैं अन्दर चली जाती और भगवान् के चरणों में गिर पड़ती तो कोई मेरा क्या कर लेता ? यही न होता कि लोग मुझे धक्के देकर निकाल देते, शायद मारते भी, पर मेरा मनोरथ तो पूरा हो जाता यदि मैं ठाकुर जी के चरणों को अपने आँसुओं से भिगो देती और
बच्चे को उनके चरणों में सुला देती तो क्या उन्हें दया न आती ? वह तो दयामय भगवान हैं, दीनों की रक्षा करते हैं, क्या मुझ पर दया न करते ? यह सोचकर सुखिया का मन अधीर हो उठा। नहीं, अब विलम्ब करने का समय न था। वह अवश्य जायेगी और ठाकुर जी के चरणों पर गिर कर रोएगी। उस अबला के आशंकित हृदय को अब उसके सिवा और कोई अवलम्ब, कोई आसरा न था। मंदिर के द्वार बंद होंगे, तो वह ताले तोड़ डालेगी। ठाकुर जी क्या किसी के हाथों बिक गये हैं कि उन्हें बंद कर रखे। रात के तीन बज गये थे। सुखिया ने बालक को कम्बल से ढाँक कर गोद में उठाया, एक हाथ में थाली उठायी और मंदिर की ओर चली। घर से बाहर निकलते ही शीतल वायु के झोंकों से उसका कलेजा काँपने लगा। शीत से पाँव शिथिल हुए जाते थे। उस पर चारों ओर अंधकार छाया हुआ था। रास्ता दो फर्लांग से कम न था। पगडंडी वृक्षों के नीचे-नीचे गयी थी। कुछ दूर दाहिनी ओर एक पोखरा था, कुछ दूर बाँस की कोठियाँ में चुडैलों का अड्डा था। बायीं ओर हरे-भरे खेत थे। चारों ओर सन-सन हो रहा था, अंधकार साँय-साँय कर रहा था। सहसा गीदड़ों के कर्कश स्वर से हुआँ-हुआँ करना शुरू किया। हाय ! अगर कोई उसे एक लाख रुपया देता तो भी इस समय यहाँ न आती; पर बालक की ममता सारी शंकाओं को दबाये हुए थी। ‘हे भगवान् अब तुम्हारा ही आसरा है !’ यह जपती वह मंदिर की ओर चली जा रही थी। मंदिर के द्वार पर पहुँचकर सुखिया ने जंजीर टटोल कर देखी। ताला पड़ा हुआ था। पुजारी जी बरामदे से मिली कोठरी में किवाड़ बन्द किये सो रहे थे। चारों ओर अँधेरा छाया हुआ था। सुखिया चबूतरे के नीचे से एक ईंट उठा लाई और जोर-जोर से ताले के ऊपर पटकने लगी। उसके हाथों में न जाने इतनी शक्ति कहाँ से आ गयी थी।
दो ही तीन चोटों में ताला और ईंट दोनों टूटकर चौखट पर गिर पड़े। सुखिया ने द्वार खोल अन्दर जाना ही चाहती थी कि पुजारी किवाड़ खोलकर हड़बड़ाये हुए बाहर निकल आये और ‘चोर, चोर !’ का गुल मचाते हुए गाँव की ओर दौड़े। जाड़ों में प्रायः पहर रात रहे ही लोगों की नींद खुल जाती है। यह शोर सुनते ही कई आदमी इधर-उधर से लालटेनें लिए हुए निकल पड़े और पूछने लगे-कहाँ है ? किधर गया ? पुजारी-मंदिर का द्वार खुला पड़ा है। मैंने खट-खट की आवाज सुनी। सहसा सुखिया बरामदे से निकल कर चबूतरे पर आयी और बोली-चोर नहीं है मैं हूँ; ठाकुर जी की पूजा करने आयी थी। अभी तो अंदर गयी भी नहीं। मार हल्ला मचा दिया। पुजारी ने कहा-अब अनर्थ हो गया ! सुखिया मंदिर में जाकर ठाकुर जी को भ्रष्ट कर आयी !
फिर क्या था, कई आदमी झल्लाये हुए लपके और सुखिया पर लातों और घूसों की मार पड़ने लगी। सुखिया एक हाथ में बच्चे को पक़ड़े हुए थी और दूसरे हाथ से उसकी रक्षा कर रही थी। एकाएक बलिष्ट ठाकुर ने उसे इतनी जोर से धक्का दिया कि बालक उसके हाथों से छूट कर जमीन पर गिर पड़ा, मगर वह न रोया न बोला, न साँस ली, सुखिया भी गिर पड़ी थी। सँभल कर बच्चे को उठाने लगी, तो उसके मुँख पर नजर पड़ी। ऐसा जान पड़ा मानों पानी में परछाई हो। उसके मुँह से एक चीख निकल पड़ी। बच्चे का माथा छूकर देखा। सारी देह ठंडी हो गयी थी।
एक लम्बी साँस खींचकर वह उठ खड़ी हुई। उसकी आँखों में आँसू न आये। उसका मुँख क्रोध की ज्वाला में तमतमा उठा, आँखों के अंगारे बरसने लगे। दोनों मुट्ठियाँ बँध गयी। दाँत पीसकर बोली-पापियों, मेरे बच्चे के प्राण लेकर क्यों दूर खडे़ हो ? मुझे भी क्यों नहीं उसी के साथ मार डालते ? मेरे छू लेने से ठाकुर जी को छूत लग गयी ? पारस को छूकर लोहा सोना हो जाता है, पारस लोहा नहीं हो सकता। मेरे छूने से ठाकुर जी अपवित्र हो जाएँगे।
मुझे बनाया, तो छूत नहीं लगी ? लो अब कभी ठाकुर जी को छूने नहीं आऊँगी। ताले में बन्द रखो पहरे बैठा दो। हाय, तुम्हें दया छू भी नहीं गयी। तुम इतने कठोर हो ! बाल–बच्चे वाले होकर भी तुम्हें एक अभागिन माता पर दया न आयी ! तिस पर धरम के ठेकेदार बनते हो ! तुम सब के सब हत्यारे हो। डरो मत मैं थाना-पुलिस नहीं जाऊँगी। मेरा न्याय भगवान् करेंगे, अब उन्हीं के दरबार में फरियाद करूँगी। किसी ने चू न की, कोई मिनमिनाया तक नहीं। पाषाण मूर्तियों की भाँति सब सिर झुकाए खड़े रहे। इतनी देर में सारा गाँव जमा हो गया था। सुखिया ने एक बार फिर बालक के मुँह की ओर देखा। मुँह से निकला-हाय मेरे लाल ! फिर वह मूर्क्षित होकर गिर पड़ी। प्राण निकल गये। बच्चे को प्राण दे दिये। माता, तू धन्य है। तुझ-जैसी श्रद्धा, तुझ जैसा विश्वास देवताओं को भी दुर्लभ है !
इस समय भी उसे अपना नाम याद नहीं आ रहा था। उसकी आँखों में आँसू आ गए थे, लाल आँसू! वह कभी उस दूर तक फैले मलबे को देख रहा था, तो कभी सामने बने कच्चे-पक्के मन्दिर को। उस टूटे हुए मलबे में से रह-रहकर अज़ान की आवाज़ें निकलकर जैसे हवा में लहरा रही थीं। पूरे वातावरण का तनाव रह-रहकर उसकी नसों-नाड़ियों में घुसा जा रहा था। मन्दिर में से आ रही आरती की आवाज़ भी उसके तनाव को ढीला नहीं कर पा रही थी। आस-पास के लोगों के चेहरों पर अविश्वास और असुरक्षा की भावना जैसे गर्म लोहे से अंकित कर दी गई थी।
आज से लगभग तीस वर्ष पहले भी ऐसे ही बदहवास चेहरे उसने देखे थे। पल भर में घर के करीबी मित्र बेगाने हो गए थे। तब वह स्कूल में पढ़ता था। उस समय उसका एक नाम भी था - इन्द्रमोहन। स्कूल के लिए इन्द्रमोहन तिवारी। अपने नाम से उस बेहद लगाव था। अंग्रेज़ी में अपना नाम बहुत मज़े से बताता था- "आय. एम. तिवारी"-यानि कि मैं तिवारी हूँ और खिलखिलाकर हँस पड़ता था।
उस शाम भी वह खिलखिलाकर हँस रहा था कि उसके पिता ने घायल अवस्था में घर में प्रवेश किया था। उसकी माँ तो पागलों की तरह छातियाँ पीटने लगी थी। बड़े भैया ने तो लाठी उठा ली थी, "आज दो-चार को तो ढेर कर ही दूँगा।''
पिता के शरीर के घाव, भाई का जुनून, सोडा वाटर की बोतलें, अल्लाह-हो-अकबर, सड़क पर बिखरा काँच, हर-हर महादेव, छुरेबाज़ी से घायल लोग, पुलिस की वर्दी, पुलिस का डंडा, पानी के फव्वारे, पुलिस की गोलियाँ, सायरन, बूटों की ठक-ठक, कर्फ़्यू सब याद है उसे ! स्कूल का बन्द होना, सब्ज़ी का गा़यब हो जाना, चेहरों पर चिपका हुआ डर, दिमाग़ों में भरी दहशत, अपनों का बेगा़नापन, बेगा़नों का अपनापन, कुछ भी नहीं भूला है उसे। फिर उसका नाम!
उसे उस छोटी उम्र में ही उन नामों से नफ़रत हो गई थी जो नाम धर्म से संचालित होते हों। क्यों यह नाम, जातों और धर्मों का सिलसिला ख़त्म होने में नहीं आता? किसी भी बच्चे के बस में नहीं कि वह अपना नाम स्वयं रख सके। तो क्यों उसे इस दुनिया में लानेवाले कोई भी नाम दे देते हैं जो कि उमर भर के लिए उसकी पहचान बन जाता है। क्यों नहीं उस बच्चे को छोड़ देते तब तक, जब तक बड़ा होकर वह स्वयं अपने लिए इक नाम की तलाश न कर ले। उसी दिन उसने अपने पिता को कहा था, "बाबू जी, मेरा नाम बदल दीजिए!"
बाबू जी की डांट-फटकार ने उसके फ़ैसले को और भी मज़बूत बना दिया था। बड़ा होते ही, उसने अपना नाम बदलने का जो प्रण लिया था उसे पूरा करने का समय आ गया था। उसे लगा था कि नाम उसका अपना है, वह जब चाहे, जैसे चाहे अपना नाम बदल लेगा। नाम बदलना ऐसा कौन-सा मुश्किल काम है।
नाम बदलना नाम कमाने से कम मुश्किल काम नहीं है। कचहरी के चक्कर, गज़ट में नाम निकलवाना और समाचार पत्र में इश्तहार देना-यह सब करना पड़ा तब कहीं जाकर वह आई.एम.तिवारी से आई.एम.हिन्दुस्तानी बन पाया। हाँ, यही उसका नया नाम था। अब वह किसी को अपने नाम आई.एम.का अर्थ नहीं बताता था। वह चाहता था कि सब लोग उसे केवल हिन्दुस्तानी कहकर पुकारें। हिन्दुस्तानी या फिर मिस्टर हिन्दुस्तानी। उसने प्रण कर लिया था कि किसी को भी अपना धर्म नहीं बताएगा।
पहली ही टक्कर में उसके प्रण के टुकड़ों का मलबा बिखरकर रह गया था। नौकरी के लिए फ़ार्म भरते समय उसे एक कॉलम भरना था - धर्म! उसने धर्म के सामने लिख दिया था-'नास्तिक'! बहुत बार सोचा करता था कि हमारे तो अधिकतर लेखक वामपंथी हैं तो इन लोगों ने नौकरियाँ पाने के लिए धर्म के कॉलम में क्या लिखा होगा। क्या इनका वामपंथ धर्म लिखने की अनुमति देता है? या फिर यह सब ढकोसलावादी वामपंथी हैं? सबने मकान ख़रीद रखे हैं। वामपंथ तो सम्पत्ति अर्जित करने के ख़िलाफ़ है। फिर यह सब क्या गोलमाल है?
नास्तिक होने का दंड उसे भुगतना पड़ा। साक्षात्कार में उससे एक भी सवाल उसकी पढ़ाई या काबलियत के बारे में नहीं पूछा गया। पैनल के हर सदस्य को केवल एक बात में रुचि थी कि वह नास्तिक क्यों है। और क्या नास्तिक-वाद भी कोई धर्म हो सकता है?
अपने मन में घुमड़ती हुई उत्तेजना को उसने जुबान दे ही दी, "सर, धर्म हमें हज़ारों साल पीछे ले जाता है। जब हम कोई कैमरा, फ्रिज़ या कार ख़रीदते हैं तो हमारी कोशिश यही रहती है कि नए से नया मॉडल ख़रीदें। किन्तु जहाँ कहीं भी धर्म की बात आती है, तो हर धर्मवाले अपने पुरातन से पुरातन ग्रंथ की डींग हाँकने लगते हैं। आदिम लोगों द्वारा लिखी गई पिछड़ी हुई बातों के लिए हम लोग कट मरते हैं। क्या यह सही है? क्या नास्तिक होना इस स्थिति से कहीं अधिक बेहतर नहीं है? और फिर एक धर्मनिरपेक्ष देश में ऐसे सवाल का क्या औचित्य है?"
पैनल के सदस्य उसकी बातें सुनते रहे और अन्तत: वह नौकरी उसे नहीं मिली। उसे समझ आ गया कि धर्म की बाँह थामे बिना उसकी नैया पार नहीं लगनेवाली! किन्तु उसे तो किसी भी धर्म में विश्वास नहीं। तो किस धर्म की बाँह थामे? जब सभी धर्मोंवाले अपने-अपने धर्म को श्रेष्ठ और दूसरे धर्मों को नीचा बताने में लगे हों तो वह किस ओर देखे?
नौकरी पाने के लिए उसने अपने जन्म-धर्म का ही हाथ थामा। अपने पासपोर्ट में भी वह हिन्दू हो गया। वह केवल हिन्दुस्तानी बना रहना चाहता था, किन्तु नौकरी ने उसे हिन्दू बनाकर ही दम लिया।
नौकरी मिली भी तो जेद्दाह में। वहाँ तो धर्म का दूसरा ही रूप था। औरतों पर पाबंदियाँ। उनके चेहरे बुर्के ओर नकाबों में ढके नज़र आते। गै़र-मुस्लिम औरतों को भी आबाया पहनना पड़ता था। दिन में पाँच बार नमाज़ के समय पूरा शहर जैसे जड़ हो जाता था। नमाज़ के दौरान सभी दुकानें बन्द।
वहाँ उसने विभिन्न स्तरों पर भेदभाव देखा। पहला फ़र्क तो मुस्लिम और गै़र-मुस्लिमों में था। मुस्लिमों में सऊदी और गै़र-सऊदी का फ़र्क था। अरबी और गै़र-अरबी मुसलमानों में अन्तर था। अमीर और गऱीब देशों के मुसलमानों में अन्तर था। फिर गै़र-मुस्लिमों में चमड़ी का अन्तर था-यानि गोरा और काला।
जीवन में पहली बार जेद्दाह से ताएफ़ जाते हुए उसने मुसलमानों के लिए आरक्षित सड़क देखी थी। मण्डल के कमण्डल का एक और रूप! वहाँ की धार्मिक पुलिस आपका इकामा चेक करेगी। इकामा-यानि कि 'वर्क परमिट'। यदि आपका इकामा हरे रंग का है तो आप मुस्लिम हैं और उस आरक्षित सड़क पर जा सकते हैं। अन्यथा आपको एक लम्बा-सा चक्कर लगाकर अनारक्षित सड़क से ताएफ़ पहुँचना होता था। उसी सड़क पर रास्ते में उसने बिल्डिंगों का एक समूह देखा था। उसे डिपोर्टी कैम्प कहते थे। यानि के वे लोग जिन्हें सऊदी अरब से निष्कासित किया गया हो पहले उन्हें उस कैम्प में रखा जाता था। अन्तत: एक उड़ान पर चढ़ा दिया जाता था जो उन विदेशियों को उनके देश की धरती पर पहुँचा देती थी। उस कैम्प में आप तभी दाखिल हो सकते हैं यदि आप स्वयं निष्कासित या तड़ीपार हैं या फिर आप पुलिसवाले हैं।
डिपोर्टी कैम़्प के बारे में सोचकर ही हिन्दुस्तानी को झुरझुरी-सी आ गई। कैसा व्यवहार होता होगा वहाँ के निवासियों के साथ? हिन्दुस्तानी को जेद्दाह में सदा दहशत का माहौल ही दिखाई देता था। बिना किसी युद्ध-स्थिति के भी वहाँ डर का वातावरण बना रहता था। पुलिस में भी मुतव्वा यानि के 'धार्मिक पुलिस' का आतंक सर्वोपरि था। मुतव्वा से तो सऊदी नागरिक भी डरते हैं। अप्रवासी तो उन्हें देखकर घबरा ही जाते हैं।
ईराक-कुवैत लड़ाई के दिनों में तो यह डर का वातावरण और गहरा गया था। यदि उसे इतनी अच्छी पगार न मिल रही होती तो हिन्दुस्तानी कब का वापस अपने मुल्क आ गया होता। पैसा तो किसी को भी कहीं भी रोक लेता है। पैसे का चमत्कार तो हिन्दुस्तानी जेद्दाह और ताएफ़ में देख चुका था। रेत में पेड़ खड़े कर दिए गए थे।
इराक के साथ युद्ध के समय सी.एन.एन. का अतिक्रमण सऊदी पर भी हुआ। सी.एन.एन. के कार्यक्रमों का खुलापन वहाँ के कठमुल्लाओं को सहन नहीं हुआ। कुछ समय बाद स्टार टी.वी. के डिश एँटेना पर राजघराने की बिजली गिरी। डिश एँटेना को शैतान की कटोरी कहा गया और 'एड्स' की कुंजी। कठमुल्लाओं ने ऐलान कर दिया कि डिश एँटेना लगाने से एड्स हो जाएगी। हिन्दुस्तानी अपने एक मित्र के यहाँ जाकर केबल टी.वी. देख लेता था।
हिन्दुस्तानी उस समय भी धर्म की जटिलताओं को समझ नहीं पा रहा था। एक ही धर्म के दो देश आपस में लड़ते हैं। दूसरे धर्म के कई देश मिलकर एक देश को ध्वस्त करने में जुट जाते हैं। यानि कि धर्म एकता की गारंटी नहीं है! पुत्र द्वारा पिता की हत्या को धर्म नहीं रोक सकता। तो फिर धर्म के नाम पर हत्याएँ क्यों? क्या यह सब केवल आडम्बर है?
हिन्दुस्तानी का दिमाग बेलगाम घोड़े की तरह भागता जा रहा था। तर्क, वितर्क, कुतर्क सब उसके दिमाग में ज्वार-भाटा खड़ा किए जा रहे थे। "एक समय ऐसा भी तो होगा जब मनुष्य को मालूम ही नहीं होगा कि भगवान भी किसी चीज़ का नाम है। यानि कि इंसान ने भगवान का आविष्कार नहीं किया होगा। फिर किसी ने पहली बार भगवान के होने का अहसास किया होगा। उसने पहले धर्म का ऐलान किया होगा। फिर किसी दूसरे ने किसी और भगवान के होने का एहसास किया होगा। तो दूसरा धर्म उत्पन्न हो गया होगा। इसी तरह फिर तीसरा, चौथा और पाँचवा धर्म बने होंगे।" इस सबका निष्कर्ष हिन्दुस्तानी ने यही निकाला, "जब-जब कोई भी व्यक्ति भगवान को देखता है या उससे तारतम्य बना लेता है तो सभ्यता और बँट जाती है।"
प्रकृति ने तो सभी इंसानों के जन्म और मरण का तरीका एक ही रखा है। इंसान ही क्यों उस बच्चेके पालन-पोषण से लेकर क्रियाकर्म तक भिन्न-भिन्न तरीके अपनाता है। आज जिस देश में हिन्दुस्तानी रह रहा था, वहाँ तो किसी दूसरे धर्म के लोगों को अपने इष्ट देवों की मूर्तियाँ रखने या पूजा करने का अधिकार तक नहीं दिया गया था। फिर भी लोग छुप-छुपकर पूजा करते हैं। क्या धर्म के साथ जुड़ाव इतना बल देता है कि इंसान सरकारी आदेश के विरूद्ध भी काम करने से नहीं डरता।
नास्तिक होने के चक्कर में हिन्दुस्तानी विवाह भी नहीं कर पा रहा था। अब तो लगभग पैंतीस-छत्तीस का हो गया है। पर उसे किसी धार्मिक विधि से विवाह नहीं करना। माँ-बाप को कोर्ट की शादी स्वीकार नहीं। और फिर कोर्ट-कचहरी भी तो धर्म पूछती हैं! साले कोर्ट-कचहरी भी धार्मिक हो गए हैं।
इसीलिए जेद्दाह में अकेला रहता था हिन्दुस्तानी। उसके साथियों ने उसे डरा दिया था, "बनेमलिक इलाके में कभी मत जाना। उस इलाके में सभी दो नम्बर के काम होते हैं। नकली पासपोर्ट, नकली वीज़ा, यहाँ तक कि नकली इकामा (यानि कि `वर्क परमिट') भी। हिन्दुस्तानी हैरान! इतनी सारी पुलिस, असली पुलिस! इतनी दहशत, फिर भी इतने सारे नकली काम! हिम्मतवाले लोगों की कमी तो किसी भी देश में नहीं होती है।
इन्ही दिनों हिन्दुस्तानी का एक नया दोस्त बना था। संजय - एक कम्पनी में मैनेजर था, 'अल-हमरा' इलाके में ही रहता था। उसकी पत्नी अपर्णा और बेटी चयनिका। तीनों बिना किसी द्वन्द्व के जेद्दाह में जी रहे थे। अपर्णा से अक्सर उसकी बहस हो जाया करती थी, 'मैं कहता हूँ जो मुस्लिम नहीं है वह बुर्का या आबाया क्यों पहने?" अपर्णा हँसते हुए सहज तरीके से हिन्दुस्तानी को समझाती रहती थी, "देखो भैया, हम आबाया नहीं पहनेंगे तो हमें लगता है सड़क पर सब हमें ही घूर रहे हैं। हम सड़क पर अलग ही दिखाई देते हैं। जब सभी औरतें बुर्का पहने होती हैं तो हम भी अपनेआपको आबाया में ढका हुआ महसूस करते हैं। नहीं तो लगता है पूरे कपड़े पहने बिना ही घर से निकल आए।"
हिन्दुस्तानी फिर हैरान! हिन्दुस्तानी नारी में कितनी सहनशक्ति है। फिर यहाँ तो अमरीकन और अंग्रेज़ औरतें भी आबाया पहनती हैं। क्या अमरीका और इंग्लैंड में भी यह नारियाँ बुर्का पहन लेतीं? अगर वहाँ की सरकारें भी आदेश लागू कर दें कि स्त्रियों को बुर्का पहनना ज़रूरी है, तो क्या यही स्त्रियाँ विद्रोह नहीं कर बैठेंगी? तो क्या इन्हें भी पैसे का ही लालच है? हिन्दुस्तानी तो अपने देश में भी सिगरेट या शराब नहीं पीता था। इसलिए जेद्दाह में भी उसे कोई विशेष कठिनाई नहीं होती थी। पूजा वह घर पर भी नहीं करता था। इसकी कमी महसूस करने का तो अर्थ ही नहीं था। अब उसने कार भी ख़रीद ली थी। इसलिए उसे आने-जाने में भी दिक्कत नहीं होती थी। पेट्रोल तो लगभग मुफ़्त ही था। दस-बारह रियाल में तो टैंक पूरा भरवा लो। एक रात हिन्दुस्तानी संजय के घर ही खाना खा रहा था। रात को खाना खा चुकने के बाद संजय बोला, "चलो हुक्का पीने चलते हैं।" "यह हुक्का पीने चलते हैं का क्या मतलब भाई? अगर हुक्का पीना ही है तो भरो हुक्का और पी डालो।" "नहीं मेरे गोबर गणेश, आज तुम्हें दिखाते हैं कि रात को बारह बजे भी जेद्दाह में आदमी-औरतें इकट्ठे बैठकर हुक्के का मज़ा कैसे लेते हैं।"
हिन्दुस्तानी हैरान! उसके देश में कभी हुक्के की कद्र रही होगी जब राज-रजवाड़े हुआ करते थे। आज तो हुक्का पिछड़ेपन का प्रतीक बनकर रह गया है। चल पड़ा हिन्दुस्तानी। जीवन में पहली बार सार्वजनिक 'हुक्का पान स्थान' देखने के लिए। खुली छत के नीचे, ढेरों पौधों के बीच, मुगल़ाई शानो-शौकत के हुक्के। किसी में कलकत्ते का तम्बाकू था तो किसी में बहरीन का। कोई पाकिस्तान से ताल्लुक रखता है तो कोई चीन से। जीवन में पहली बार शीशे का बना हुक्का देखा। सारा माहौल देखकर लग रहा था जैसे हुक्का उत्सव चल रहा हो। धीमी-धीमी आँच में हुक्के का तम्बाकू सुलग रहा था।
कुछ यों ही सुलग रहा था सवाल उसके अपने देश में। एक धर्म उसे अल्लाह का घर कह रहा था तो दूसरा उसे भगवान का जन्मस्थान। हिन्दुस्तानी को ये समझ नहीं आ रहा था कि इसमें दिक्कत कहाँ है। अगर भगवान वहाँ जन्मे हैं तो वह भगवान का घर ही तो होगा। दोनों धर्म के लोग उसे भगवान का घर मानकर भी लड़ते जा रहे हैं। क्या ऐसा कोई तरीका नहीं हो सकता की दोनों धर्मों के लोग एक ही स्थान पर आराधना कर लें। इसमें इतनी उत्तेजित होने जैसी स्थिति क्यों है? क़ुछ कुरुक्षेत्र जैसी स्थिति बनती जा रही थी। कोई किसी के लिए एक इंच ज़मीन भी छोड़ने को भी तैयार नहीं। इतनी दूर हिन्दुस्तान में सुलग रहे सवाल की गरमी जेद्दाह जैसे दूर-दराज शहर में भी महसूस की जा सकती थी।
और फिर उसी गर्मी का एक तेज़ भभका दिसम्बर की एक सर्द शाम में उसने महसूस किया। लगभग चार सौ साल पुराना एक ढाँचा चरमराकर मलबेका ढेर बन गया था। हिन्दुस्तानी पहली बार डर गया। उसे लगा जैसे जेद्दाह में हर मुस्लिम की आँखें उसे ही घूर रही हैं। उसे ही उस ढाँचे के गिरनेका गुनहगार ठहराया जा रहा है। परेशान तो संजय भी था। उसका डिश एँटेना तो दुबई, इंगलैंड, पाकिस्तान, बांगलादेश और भारत में जलते हुए मन्दिर भी दिखा रहा था। जेद्दाह में रह रहे हिन्दुओं में एक विचित्र-सी दहशत घर करती जा रही थी। संजय के पिता बँटवारे के भुक्तभोगी थे। उसे अपने पिता की कही हुई एक-एक बात याद आ रही थी।
अफ़वाहों का बाज़ार गर्म था। आज हिन्दुस्तानी को भी डिश एँटेना शैतान का अवतार लग रहा था। क्योंकि वो बिना रुके अयोध्या के समाचार दिए जा रहा था। कई हिन्दुओं के इकामा रद्द कर दिए गए थे। उनके पासपोर्ट पर लाल रंग की 'एग्ज़िट वीज़ा' की मोहर लगाकर उन्हें वापस भेजा जाने लगा। संजय ने हिन्दुस्तानी को आदेश दे दिया, "तुम अकेले घर से बाहर कभी नहीं जाओगे। कुछ दिनों के लिए हमारे घर रह जाओ। घर से दफ़्तर मैं तुम्हें स्वयं छोड़कर आऊँगा। बनेमलिक के इलाके में भूलकर भी मत जाना।"
औरतों के माथों से बिन्दियाँ गायब होने लगीं। बिन्दी ही तो उन्हें अन्य औरतों से अलग कर देती थी। और इसी तरह उनकी बेइज्ज़ती का कारण भी बन जाती थी।
एक शाम तो हिन्दुस्तानी का यह पक्का विश्वास हो गया कि अयोध्या के हादसे का उत्तरदायी वह स्वयं है, संजय है, अपर्णा है और उनकी पाँच वर्ष की बेटी चयनिका है। चयनिका के स्कूल में उसका बायकॉट कर दिया गया। उसे बताया गया कि अयोध्या की मस्जिद उसने तोड़ी है, इसलिए क्लास के और बच्चे उससे बात नहीं करेंगे। रोती हुई सूजी आँखें लेकर शाम को चयनिका ने संजय से पूछ ही तो लिया, "पापा, आपने मस्जिद क्यों तोड़ी? क्लास में मेरे से कोई बात भी नहीं करता।" हिन्दुस्तानी को लगा जैसे उसके शरीर का एक-एक हिस्सा चरमराकर मलबे का ढेर बनता जा रहा है।
गर्मी अभी भी बरकरार थी। पर माहौल में थोड़ा-सा ठहराव आने लगा था। हिन्दुस्तानी का भी दम घुटने लगा था। उसे भी ताज़ी हवा की आवश्यकता थी। एक दिन शाम को दफ़्तर से निकलकर सीधा कॉरबिश की ओर निकल गया। पार्किंग लॉट में गाड़ी खड़ी की। उसने अभी थोड़ी ख़रीददारी ही की थी कि मगरिब की आज़ान हो गई। हिन्दुस्तानी ने सोचा, चलो यह सामान जाकर गाड़ी में रख लेता हूँ, बाकी ख़रीददारी नमाज़ के बाद कर लूँगा। उसने सामान जाकर गाड़ी की डिकी में रख दिया। वापस वह सूख़ की ओर चला दिया। लाऊडस्पीकर पर अरबी में कुरान शरीफ़ की आयतें सुनाई दे रही थीं।
हिन्दुस्तानी अभी कुछ कदम ही चला था कि धार्मिक पुलिस का एक ठुल्ला उसके पास आया और कड़ककर उसका इकामा माँगा। हिन्दुस्तानी बुरी तरह से घबरा गया। उसने जेब से इकामा निकाला और मुत्तव्वे के हवाले कर दिया। इकामा का रंग देखते ही मुत्तव्वे के चेहरे का रंग बदला और साथ ही साथ हिन्दुस्तानी का चेहरा सफ़ेद हो गया। मुत्तव्वे ने उसे पुलिस की गाड़ी में बैठने को कहा। हिन्दुस्तानी उसे समझाता रहा कि उसकी कार पार्किंग लॉट में खड़ी है और उसमें उसका सामान रखा है। अपना ड्राइविंग लाइसेंस और कार की चाबी दिखा-दिखाकर समझा रहा था कि उसे कार तक जाने दिया जाए। किन्तु उसके इकामा का रंग हरा नहीं था। या फिर सारा जेद्दाह ही बने मलिक बन गया था। किसी को कहीं से भी धार्मिक पुलिस गिरफ़्तार कर सकती थी।
हिन्दुस्तानी की कार 'पार्किंग लॉट' में खड़ी रही। सामान उसकी कार में पड़ा था। सामन उसके घर में भी पड़ा था-सामान, जो उसने पैसे जोड-जोड़ कर ख़रीदा था। आज वह उसी 'डिपोर्टी कैम्प' में खड़ा था, जिसे बाहर से देखकर उसके शरीर में झुरझुरी आ गई थी। संजय और अपर्णा परेशान थे। वे दोनों हिन्दुस्तानी को खोज रहे थे। आखिर कहाँ गया? हिन्दुस्तानी के दफ़्तर फ़ोन किया गया, सभी दोस्तों से पूछा गया, हस्पतालों से पूछताछ की गई। उत्तर में केवल एक दीवार ही दिखाई दे रही थी।
तीन-चार दिन के बाद हिन्दुस्तानी को एक फ़्लाइट में बैठा दिया गया। उसके पासपोर्ट पर 'एग्ज़िट' की लाल मोहर लगा दी गई यानि कि अब वह कभी भी जेद्दाह वापस नहीं आ सकता था। विमान में और भी बहुत से लोग थे जिन्हें उसी की तरह 'एग्ज़िट' कर दिया गया था। सबके चहेरों पर एक-से ही भाव थे।
अपने देश वापस पहुँच कर हिन्दुस्तानी के मन में एक इच्छा जागी। "चलो वो जगह देखकर तो आए जिसने उसके जीवन को चौपट कर दिया!" पिता के चेहरे पर जो भाव थे उनमें वह साफ पढ़ रहा था, "मैं ना कहता था, तुम्हारे तरीक़े ग़लत हैं। तुम कभी सफल नहीं हो पाओगे।"
हिन्दुस्तानी अयोध्या की ओर चल दिया। गाड़ी में ही उसे कुछ एक राजनीतिक कार्यकर्ता मिल गए। किसी ने उसका नाम पूछा। उसने अपने पुराने अन्दाज़ में जवाब दिया, "आय.एम.हिन्दुस्तानी।" कार्यकर्ता की बाँछें खिल गईं। "साहिब हम यही तो कहते हैं। हम पहले हिन्दू हैं - हिन्दुस्तानी, बाद में कुछ और। भारतीय तो हमें कई मिले पर हिन्दुस्तानी आप पहले मिले हैं। हमारी सभ्यता, हमारा कल्चर, हमारा इतिहास..." हिन्दुस्तानी का सिर चकराने लगा। आज एक बार फिर उसे अपने नाम से साम्प्रदायिकता की बू आने लगी थी।
अयोध्या के मलबे के सामने खड़ा था हिन्दुस्तानी। उसकी नौकरी की नींव इस पुरानी बिल्डिंग से कहीं अधिक कमज़ोर थी। एक ही झटके में उसकी नौकरी हवा में उड़ गई थी। सारे माहौल को देखकर हिन्दुस्तानी को महसूस हुआ कि केवल एक ढाँचा नहीं चरमाराया, बल्कि उसके साथ बहुत कुछ चरमरा गया है, लोगों का विश्वास, प्यार, भाईचारा, समाज की नींव, सब चरमरा गया है।
हिन्दुस्तानी आँखों में सारी चरमराहट भरे वापस चल पड़ा। एकाएक शोर मच गया-"बम्बई में बम्ब फटे हैं, सैंकड़ों मारे गए।" हिन्दुस्तानी ने आकाश की ओर देखा और उसके मुँह से निकला, "यह क्या हो रहा है भगवान?" उसके शरीर ने झुरझुरी ली। यह उसके मुँह से क्या निकल गया?
रोज-रोज की चिकचिक और बीबी के उलाहनों से शिवचरन का दिमाग खराब था। पत्नी की बात सुनें या माँ की? ... किसे मनाएं, किसे रूठा रहने दें, चिड़चिड़ाहट बढ़ती जा रही थी। सतत् प्रयासों के बावजूद भी, न तो माँ की ममता ही छूट रही थी अपने घर-परिवार से और ना ही बीबी की गृहस्वामिनी बनने उद्दंड वह ख्वाइश ही कम कर पा रहे थे वह। चमत्कारों में विश्वास नहीं था फिर भी अक्सर ही सोचते रह जाते कि काश् ऐसा भी हो एकदिन जब वे सोकर उठें और माँ व पत्नी, आपस में हंस-हंसकर बात करती दिखलाई दें उन्हें। आम लोगों-सा उनका भी घर-परिवार हो।
घर परिवार तो दूर, एक-एक वस्तु से माँ पलभर को भी अपना ध्यान नहीं हटा पाती थीं और कमरे से लेकर जेवर, चौका; हर चीज से मां को बेदखल करके अपना हक़ जमाने का पत्नी का दुराग्रह दिन-पर-दिन और-और बेध़ड़क और बेशर्म होता चला जा रहा था।
‘ भाग्यशाली हैं जिन्हें भगवान जल्दी बुला लेता है। इन्हें देखो, दिन-पर-दिन और भी मलंग ही होती जा रही हैं, महारानी । जाने कबतक छाती पर बैठकर मूंग दलेगी। ऐसे तो अभी बीसियों साल बैठी रहेगी, यह बुढ़िया।‘
'छोड़ो।' ' जाने दो।' ' होगा। तुम्हें क्या फर्क पड़ता है। ' -जैसे उनके मान-मनौव्वल भरे शब्द दोनों के कानों पर जूँ भर न रेंगते। त्रिशंकु-से माँ और पत्नी के बीच लटके शिवचरन कभी माँ की तरफ से सोचना शुरु करते तो कभी पत्नी की बातें गुस्सा और झल्लाहट...एक बेचैन छटपटाहट भर देतीं मन में।
जले-कटे उलाहने आम हो चले थे उनके घर में । एक कौर तक बिना आंसुओं के न निगल पातीं राजरानी। ' क्या आदमी इसी लिए बड़ा करता है...पालता-पोसता है औलादों को! ' गुस्से में बहते आंसुओं को पोंछती और सब अनदेखा , अनसुना करती, शिवधाम ( कमरा जिसकी हर दीवार को शिव-परिवार की तस्बीरों से सजा रखा था उन्होंने) में घंटों जा छुपतीं । पूजा-पाठ के बहाने किताबों को घूरती चुपचाप बैठी रह जातीं उस बन्द कमरे में। पति के जाने के बाद बस यही एक दिनचर्या रह गई थी उनकी। कोई कर्तव्य, कोई जिम्मेदारी...कोई बन्दिश नहीं, बस सांसों की धौंकनी ही जिन्दगी का अहसास थी । फिर भी जीने का मोह नहीं छूटा था और ना ही बहू-बेटा किसी पर बोझ ही थीं वह अभीतक। सारा काम कर ले जाएं, इतनी सामर्थ थी बूढ़े हाथ पैरों मे अभी। सच कहें तो बड़ा बनना, अपना काम करवाना आता ही नहीं था उन्हें, उलटे उनका ही एकाध काम कर देतीं, चलती-घिसटती राजरानी। वक्त-बेवक्त बेटे-बहू को कहीं जाना होता तो उनके सहारे बच्चों को छोड़कर बेफिक्र चले जाते। आराम से रख लेती वह। फिर भी एक छत के नीचे बुढ़िया की उपस्थिति बहू को खलती रहती। सामना होते ही परछाई तक से बचकर निकलती वह। बालों में कनस्तर भर तेल चुपड़कर बुढ़िया जब नहाने जाती तो गुसलखाने को साफ करते-करते न सिर्फ बहू परेशान हो जाती, बच्चों तक के नाक भौं सिकुड़ जाते।
फिर आया वह मनहूस दिन जब साबुन की टिक्की पर फिसल कर कूल्हे की हड्डी तोड़ ली और हाथ-पैरों तक से लाचार हो गई राजरानी।
अब बात खाने-पीने की ही नहीं, हर बात पर आ अटकी थी। बुढ़िया टट्टी-पेशाब तक के लिए दूसरों पर लाचार थी। बहू ने अल्टीमेटम दे दिया । मुझसे नहीं होगा यह सब। वृद्धाश्रम में छोड़कर आओ, नहीं तो मैं घर छोड़ती हूँ।
उसने काशी के विधवा आश्रमों के बारे में सुन रखा था जहाँ ऐसी परित्यक्त वृद्धाओं को लोग थोड़ी-सी राशि दान करके छोड़ आते हैं। गरीब-लाचारों को तो बिना दान-राशि के भी रख लिया जाता है वहाँ पर।
' अमर होकर तो कोई नहीं आया इस दुनिया में। जाना तो सबको ही है। क्या एकदिन आगे और क्या एकदिन पीछे। काशी इसलिए कह रही हूं कि तुम्हारा मन उचटे तो जाकर मिल सकते हो अपनी मां से।'
तर्क-कुतर्कों से पति की मति पूरी तरह से फेर दी पत्नी ने।
तीरथ के बहाने मां को ले जाना अच्छा तो नहीं लगा था शिवचरन को, पर घर की शांति के लिए मजबूरन करना ही पड़ा यह भी।
‘अस्पताल है।’ –कहकर छोड़ा था मां को और दो दिन बाद फिर आएँगे –कहकर ऐसा पलटे कि पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत तक नहीं हुई कायर मन में । मानो मां, मां नहीं भूत-चुड़ैल हो, मुड़कर देखते ही चढ़ बैठेगी उन पर।
आते ही शिवचरन की बीबी ने सबसे पहले शिवधाम को बच्चों के पढ़ने के कमरे में तब्दील किया। रहना तो खुद ही चाहती थी, पर कमरे के कोने-कोने से सास की आंखें पीछा करती-सी महसूस होने लगी थीं उसे। जिन जरी और रेशम के भारी साड़ी-दुशालों पर सालों आंखें गड़ी रहती थीं , अब वे सांप-बिच्छू-से भयभीत कर रहे थे।
गठ्ठर बांधकर नौकरों को पकड़ा दिया सब। सास के प्रति नफरत भय में तब्दील होकर खाज –खुजली बनी पूरे बदन से फूट पड़ी । दमा ने पकड़ा सो अलग। फिर भी कुटिल बुद्धि के रहते बदनामी न होने दी। उलटे समझ मुताबिक औनी-पौनी सहानुभूति ही समेट लाई वह। पूरे गांव में रो-रोकर खबर फैला दी कि- ‘ तीरथ कराने ले गए थे, पर गंगा में डुबकी लगाते वक्त पैर ऐसा फिसला कि मुंह तक वापस देखने को नहीं मिला। भटकते ही रह गए हम। पता नहीं गंगा मां खुद आकर अपनी गोद में ले गईं या मगरमच्छों ने निगल लिया। ऐसे अभागे हैं हम तो कि कुछ भी पता नहीं चल पाया। बस, पैसा-पानी की तरह बहाकर लौट आए। रो-पीटकर ही सब्र करना पड़ा।‘
किसी ने विश्वास किया, किसी ने नहीं भी। हर मन में ही हजारों सवाल उफनते रहे, पर शिवचरन उदासी का मुखौटा ओढे चुप रहे। किसीकी किसी भी बात का कोई जबाव नहीं दिया उन्होंने। पत्नी शादी-व्याह वाले उत्साह से भी ज्यादा आगे बढ़-बढ़कर हर काम में हाथ बंटाती रही पति का और वह भी यंत्रवत् पत्नी के कहे मुताबिक सबकुछ करते चले गए। तेरहवें दिन पूरे गांव को न्योता देकर वह जल्दी ही इस अध्याय को बन्द करना चाहते थे, हमेशा के लिए।
मूसलाधार बारिश में ढोल-ताशे के साथ जिन्दा मां का क्रियाकर्म करने गंगाजी गए तो अनजाने अशुभ की आशंका से मन कांप रहा था। मंत्राचार के साथ सिंदूर से पुती उस फूस की बनी गुड़िया को जल समाधि देकर खड़े भी न हो पाए थे कि वह अनहोनी हुई जिसकी उन्होंने क्या, पूरे गांव तक ने कल्पना नहीं की थी। बाढ़ के पानी संग बहकर आती माँ की असली लाश ने बेटे को ढूंढ ही निकाला था और उनसे टकराकर ही दम लिया - मानो कह रही हो-'ना-ना ऐसा अधर्म मत कर बेटा।'
अब फूस की गुड़िया लाल गोटे लगे किमखाब में बाइज्जत दबी-ढकी और मां घुटनों तक उघड़े पेटीकोट और बटन टूटे ब्लाउज में उपेक्षित और अधनंगी साथ-साथ तैर रही थीं। एकबार फिर पत्नी ने ही पण्डित को दान देने के लिए लाई, सफेद मलमल की कोरी धोती पूजा की थाली से लाश को उढ़ाकर परिवार की इज्जत ढकी और झटपट भय व विस्मय से खुली हर आंख के आगे सच्चाई पर परदा डाल दिया।
अगले पल ही उसके बचाओ-बचाओ के शोर को सुनकर कैसे भी सबने आनन-फानन आंसुओ की झड़ी के पीछे जा छुपे बेटे और गठ्ठर बनी मां की विद्रूप लाश को किनारे तक खींचकर गंगा से बाहर निकाल दिया।
‘ वह तो मां को आश्रम में छोड़कर आए थे फिर यहां पर इस तरह से, कैसे ? ' शिवचरन सन्न थे। ' तो क्या हफ्ते भर भी न चल पाई माँ वहां पर? पता नहीं आश्रम वाले ध्यान भी रखते थे या नहीं या यूँ ही घिसटता-भटकता मरने को छोड़ देते हैं अबला-अनाथों को ? ’
सैकड़ों गली-गली भीख मांगती, सिर पर उस्तरा फिरी और सफेद धोती में लिपटी उदास, कृशकाय बुढ़िया अब एकसाथ एक डरावने सपने-सी बारबार उनकी भयभीत आँख के आगे आ और जा रही थीं। मां के भी तो सारे बाल नदारत थे। मां का सिर भी तो उस्तरा फिरा ही था। एक आध खरोंचों की आड़ी-तिरछी लकीरों को भूल जाए तो चिकना-सपाट ही था। हफ्ते दो हफ्ते के ही अन्दर ही शरीर का सारा गोश्त घुल गया था। चमड़ी हड्डियों पर चिपकी मात्र सी महसूसस हो रही थी। पता नहीं कुछ खाने-पीने को मिला भी था या नहीं, या यूँ ही भूखी प्यासी रात-बिरात लुढ़क गई ?’
कलेजा मुँह को आ रहा था और अंतर्आत्मा तक धिक्कार रही थी उन्हें।
ग्लानि से दबे फूट-फूटकर रो रहे थे अब वह और गाँव वाले आपस में मां-बेटे के प्यार की दुहाई दे रहे थे।
' देखो ममता भी कैसी चीज होती है, मरी हुई ने भी आखिर ढूंढ ही लिया बेटे को। मीलों बहती-तैरती मुखाग्नि उससे ही दिलवाने यहाँ तक आ पहुँची।'
बेटे ने भी विधिवत् मां का दाहसंस्कार किया और जजमानों को भरपेट खिला-पिला व दान-दक्षिणा देकर अपने अपराध बोध से मुक्ति पाने की भरपूर कोशिश की। फिर भी बेचैनी कम न हुई तो स्थानीय अस्पताल में मां की स्मृति में एक कमरा भी बनवा दिया। पूरे गांव में आदर्श बेटे के उस भव्य धार्मिक अनुष्ठान की चर्चा थी । माँ-बेटे के अगाढ़ स्नेह की चर्चा थी, वरना लाश कैसे उन तक ही पहुंचती, वह भी तेरह दिन पहले डूबी हुई... बिना जरा भी सड़े-गले। मानो कोई दैवीय शक्ति का हाथ हो इस सबके पीछे।
' दैवीय शक्ति ही तो थी। वह तो अच्छा है कि लाशें बोल नहीं पातीं।' अब तो उन्हें भी मइया के प्रताप का अहसास होने लगा था। अक्सर चलते-फिरते मां दिखलाई दे जातीं। झाड़-फूंक सब करवाया पत्नी ने और उन्होंने खुद जाकर भी मां के नाम की विंद्यवासिनी पर चूनर और नारियल-बताशा सब चढ़ाए , दीप जलाया, तब जाकर मन को थोड़ा-बहुत चैन मिला।
चार-पांच साल पुरानी हो चली थी बात । शिवचरन एकबार फिर अपनी घर गृहस्थी और व्य़ापार में रम चुके थे। काम-काज अच्छा चल रहा था। फैल-फूल रहा था। व्यस्तता में माँ और उनसे जुड़े प्रसंग को करीब करीब भूल चुके थे सेठ शिवचरन। काम दिनदूना रात चौगुना बढ़ता जा रहा था। गांव वालों का कहना था-मां का पूरा आशीष जो है उनके परिवार पर।
अक्सर काम के चक्कर में इलाहाबाद और बनारस भी जाना पड़ता था। पिछले तीन चार बार से इलाहाबाद के पास हंडिया नामके गांव में जब भी वह अपनी पसंदीदा पान की दुकान पर पान खाने और चाय पीने के लिए गाड़ी रोकते, तो सामने के घर से शिब्बो-शिब्बो की पुकार सुनाई पड़ने लग जाती। शिवचरन बेचैन हो उठते। आँख उठाकर देखते, तो सामने तीन-चार साल की बच्ची हाथ-पैर जंगले की जाली से बाहर निकाले बैठी दिखती । हाथ के इशारों से उन्हें अपनी तरफ बुलाती।
भ्रम होगा – सोचकर वह गाड़ी में वापस जा बैठते पर पूरे रास्ते मन कचोटता रहता। कौन है यह लड़की...कैसे उनका नाम जानती है, वह भी बचपन का नाम..?
छह-सात महीने इसी उहापोह में निकल गए । न पान खाना बन्द हुआ और ना ही बच्ची का उन्हें पुकारना।
पर, उस दिन गाड़ी के रुकते ही वह आदमी हाथ जोड़े इन्तजार करता मिला शिवचरन को।
‘बाबूजी आपको मेरे साथ, ज़रा घर तक चलना होगा, अभी। बस पांच मिनट की ही बात है। बच्ची की जिद है। पता नहीं क्या माया है, मेरी चार साल की बेटी आपसे मिलने की जिद पकड़े बैठी है। तेज बुखार के सन्निपात में भी बारबार आपको ही बुलाए जा रही है। आपकी गाड़ी के इन्तजार में बरांडे में बैठी-बैठी ही दिन-रात गुजारती है। चलें बाबूजी। आपसे बिनती है। मेरी बेटी की जान खतरे में है। ‘
उस अजनबी ने उनके पैर पकड़ लिए थे।
अब शिवचरन के पास टालने का कोई बहाना नहीं था। वैसे भी अगर एक बच्ची को उनसे मिलकर राहत मिल जाती है तो इसमें उनका क्या बिगड़ता है। चुपचाप चल दिए उस अजनबी के साथ।
देखते ही बच्ची दौड़ी और उनसे लिपट गई।
‘-शिब्बो मुझे अपने घर ले चल। मुझे एकबार जाना है अपने घर। ‘
‘अपना घर ..कौनसा घर...किस घर की बात कर रही हो तुम?’
‘ऐसा भौंचक्का-सा क्या देख रहा है, मुझे? अपने उसी मिर्जापुर वाले घर में। पीतल बाजार वाले घर में, चल।‘
अब सकपकाने की शिवचरन की बारी थी। आंख के इशारे से ड्राइवर को गाड़ी का दरवाजा खोलने को कहा और बच्ची तुरंत ही मां-बाप के संग कार की पिछली सीट पर जा बैठी।
कौतुकवश ही सही, अब वह बात की तह में जाना चाहते थे।
इसके पहले कि वह खुद ड्राइवर से कुछ कह पाएँ –बच्ची रामदीन ड्राइवर से हालचाल पूछ रही थी। माना 15 साल से उसी घर में नौकरी करता था वह, पर यह अजनबी लड़की बाबूजी तो बाबूजी उसका भी नाम जानती थी? जरूर इसी पान की दुकान पर किसी को लेते-कहते सुन लिया होगा। अब ड़्राइवर के असमंजस का भी आरपार नहीं था।
पलपल बढ़ते आश्चर्य का और भी छोर नहीं रहा, जब गली में घुसते ही, ठीक अपने घर के दरवाजे पर ही उसने गाड़ी रोकने को कहा और दौड़कर इस अधिकार से घर में घुसी, मानो उसका अपना ही घर हो, कोने-कोने से परिचित हो वह। यही नहीं आंगन में पड़ी उसी चौकी पर बिल्कुल वैसे ही जा बैठी जैसे कि मां दिन भर चौकी पर बैठी पंखा झलती रहती थीं।
‘ तो, दरवाजे का रंग पीले से हरा कर लिया है तुमने। ’-बच्ची के इस वाक्य ने तो शिवचरन को इतना चौंका दिया कि वे लड़खड़ा ही गए और चौखट पर ठोकर लगते-लगते बची। संभलते-संभलते भी सिर दरवाजे से टकरा ही गया।
‘ संभलकर बेटा, संभलकर।‘ बच्ची की आवाज में माँ की ही गूँज थी।
‘कब, तू अपनी यह लापरवाही और उतावलापन छोड़ेगा शिब्बू !’ कहती वह नन्ही बच्ची पंजों के बल खड़ी अब छह फीट के शिवचरन का माथा सहला रही थी।
इसके पहले कि शिवचरन का आश्चर्य में खुला मुँह बन्द हो, मां के ही अन्दाज में डांटना भी शुरु कर दिया उसने –‘ अब ऐसे ही मुंह बाए मुझे देखता रहेगा या छम्मन हलवाई के यहां से कुछ नाश्ता वगैरह भी मंगवाएगा...कचौड़ी, जलेबी और लस्सी। ‘
‘ हां, मां।‘
मुंह से निकला तो खुद ही बेखुदी में की गई इस हरकत पर दांतों तले उंगली चली गई उनकी । 'तो छम्मन हलवाई तक की याद है इसे।' वह तो वह, पत्नी तक का मुंह सफेद पड़ता जा रहा था। बिल्कुल सास के अंदाज में ही एक-एक बच्चे को नाम लेकर बुला रही थी वह अनजान और छोटी-सी बच्ची।
नाश्ता आते ही उसने बच्चों को ही नहीं , शिवचरन को भी गोदी में बिठाकर ही जलेबी खिलाई। अपराध बोध के अंदर दबे शिवचरन बाबू की आंखों से अब लगातार आंसू बह रहे थे। तब सबको वहीं छोड़, शिवचरन को कलाई से पकड़कर घसीटती-सी बच्ची दालान के अंदर ले गई।
फिर बच्ची ने मां की ही भारी और अधिकार भरी आवाज में फावड़ा लाने को कहा और बीच की पटिया पर खड़ी होकर उसे खोदने के लिए कहने लगी। मंत्रमुग्ध शिवचरन के एक ही वार पर पटिया खुल गई। अंदर लाल कंद की एक पोटरी में मां की छन, पायल, कंगन, हसली झुमके सब जस-के-तस रखे थे। बेटे के हाथ सौंपते हुए बोली- ‘ तीनों बच्चों की शादी में बराबर-बराबर बांट देना। पर ध्यान रहे, इस डायन की छाया तक न पड़े इन पर। इसके और तेरे अपराधों को भूली नहीं हूँ, मैं।‘
बहू को सामने देखते ही बच्ची के मुंह से मारे गुस्से के झाग निकलने लगे। जैसे-तैसे पत्नी को कमरे से बाहर कर वह मां के पैरों पर माफी मांगने के लिए गिर पड़े। पर बच्ची का शरीर तो बुरी तरह से ऐंठ रहा था और आंख की पुतलियां अनियंत्रित तेजी से इधर-उधर घूम रही थीं। उसे जबरदस्त दौरा पड़ा था।
तुरंत ही डॉक्टर को बुलाया गया। दवा, इंजेक्शन, सारा खर्च शिवचरन ने ही उठाया।
मां की विरासत, वह गठरी अभी तक सीने से चिपकी थी, पर मां जा चुकी थीं। तीन चार घंटे बाद सोकर उठी उस बच्ची ने शिवचरन की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखा। अब वह उन्हें और उस घर को पूरी तरह से भूल चुकी थी। नए चोले में बसने के लिए उसकी आत्मा के लिए बेहद जरूरी था, यह। मां-बाप से चिपकी वह बच्ची, उनकी शक्ल तक देखकर रो रही थी अब तो , मानो उसका, इनसे , इस घर-परिवार से कोई नाता ही नहीं था कभी।
परिचित-अपरिचित-से उस परिवार को भरे मन से विदा दी उन्होंने और उनके वहाँ से जाते ही, एकबार फिर विधिवत् सारे कर्मकाण्ड और जात-बिरादरी का खाना-पीना किया। हैसियत और श्रद्धा से बढ़कर बाजे-गाजे के साथ मां का श्राद्ध किया । पांच तोले सोना व ग्यारह तोले चांदी का मां के नाम पर दान किया।
मंदिर तक न जाने वाले शिवचरन अब रोज सुबह उठकर पूजा-ध्यान सब करते हैं, फिर भी ‘ इसके और तेरे अपराधों को भूली नहीं हूँ, मैं।‘ वाक्य भुलाए नहीं भूलता।
पूरे ही गांव में आज भी मां बेटे के अलौकिक प्यार के चर्चे हैं। गीत और बिदेसिया बन चुके हैं। हर एक शिवचरन जैसा लायक और मां को प्यार करने वाला, धर्मभीरू बेटा चाहता है पर शिवचरन अक्सर ही रात-बिरात अपने ही घर के दालान में घंटों उकड़ूँ बैठे, फूट-फूटकर रोते दिखते हैं ।
कायर तो कायर। धर्म-भीरू हो जाना अपराध से मुक्ति की गारंटी तो नहीं। मन की अदालत के ये मुकदमे तो जन्म-जन्मांतर चलते हैं, जान चुके थे वह। स्वर्ग-नरक की कल्पना भले ही मरने के बाद की की हो इन्सान ने , पर भुगतना तो यहीं पड़ता है। घर में अखंड पाठ और देवी का रतजगा चलता रहता और वे बेचैन छत पर टहलते रह जाते।
रोज गंगा में तड़के ही नहाते और चार भिखारियों को खाना खिलाते शिवचरन। शायद मुक्ति मिल ही जाए पर छूटा तीर और छूटा वक्त कब वापस आ पाया है? जितना उबरने की कोशिश करते, उतना ही डूबते चले जा रहे थे शिवचरन। मां से बिछुड़ने का दुख है, जो चैन नहीं लेने देता या फिर खुद उनका अपना ही दबा-ढका वह असह्य अपराध-बोध, जो अब आत्मा तक को कचोटने लगा है, कौन जाने !...
अपने जन्म के तीन दिन बाद भी मैं अपने चारों ओर नए संसार को हैरत और घबराहट से देख रहा था। मेरी माँ ने नर्स से पूछा,‘‘ठीक तो है न मेरा बच्चा?’’
नर्स ने कहा,‘‘मैडम, बच्चा बिल्कुल ठीक है, मैंने इसे तीन बार दूध पिलाया है। मैंने आज तक ऐसा बच्चा नहीं देखा जो पैदा होते ही इतना हँसमुख हो।’’
सुनकर मुझे गुस्सा आया, मैं चिल्ला पड़ा, ‘‘माँ, यह सच नहीं है। मेरा बिस्तर सख्त है, दूध का स्वाद बहुत कड़वा था,धाय की छातियों की दुर्गन्ध मेरे लिए असह्य है। मैं बहुत दयनीय हालत में हूँ।’’
लेकिन मेरी बात माँ और नर्स दोनों ही नहीं समझ सकीं ;क्योंकि मैं उसी दुनिया की भाषा में बात कर रहा था, जहाँ से मैं आया था।
मेरे जीवन के इक्कीसवें दिन पुजारी जी आए और मुझपर पवित्र जल छिड़कते हुए माँ से बोले, ‘‘आपको खुश होना चाहिए कि आपका बच्चा जन्मजात पंडित मालूम होता है।’’
मुझे ताज्जुब हुआ, मैंने पुजारी से कहा, ‘‘तब तो तुम्हारी स्वर्गवासी माँ को दुखी होना चाहिए, क्योंकि तुम तो जन्मजात पुजारी नहीं थे।’’
पुजारी भी मेरी भाषा नहीं समझ सका।
सात महीने बाद एक भविष्यवक्ता ने मुझे देखकर माँ से कहा,‘‘तुम्हारा बेटा बहुत बड़ा राजनीतिज्ञ बनेगा, उसमें महान नेता के सभी गुण हैं।’’
मैं मारे गुस्से के चीख पड़ा, ‘‘गलत...मुझे संगीतज्ञ बनना है, संगीतज्ञ के अतिरिक्त मैं और कुछ नहीं बनूँगा।’’
पर आश्चर्य....उस उम्र में भी मेरी भाषा किसी के पल्ले नहीं पड़ी।
आज मैं तैंतीस वर्ष का हो गया हूँ। इन वषोंर् में मेरी माँ, नर्स और पुजारी सब मर चुके हैं पर वह भविष्यवक्ता अभी जीवित है। कल ही मेरी मुलाकात उससे मंदिर के प्रवेशद्वार पर हुई थी। बातों ही बातों में उसने कहा था,‘‘मुझे शुरू से ही पता था कि तुम संगीतज्ञ बनोगे, इस बारे में मैंने तुम्हारे बचपन में ही भविष्यवाणी कर दी थी।’’
मैंने उसकी बात पर आसानी से विश्वास कर लिया ‘ क्योंकि अब मैं स्वयं नन्हें बच्चों की भाषा नहीं समझ पाता हूँ।
- खलिल जिब्रानः अनुवादः सुकेश साहनी
ईश्वर का चेहरा
प्रभा जानती है कि धरती पर उसकी छुट्टी समाप्त हो गयी है। उसे दुख नहीं है। वह तो चाहती है कि जल्दी से जल्दी अपने असली घर जाए। उसी के वार्ड में एक मुस्लिम खातून भी उसी रोग से पीड़ित है। न जाने क्यों वह अक्सर प्रभा के पास आ बैठती है। सुख-दुख की बातें करती है। नयी-नयी पौष्टिक दवाइयाँ, फल तथा अण्डे आदि खाने की सलाह देती है। प्रभा सुनती है, मुस्करा देती है। सबीना बार-बार जोर देकर कहती है, ‘‘ना बहन ! मैंने सुना है यह दवा खाने से बहुत फायदा होता है और अमुक चीज खाने से तो तुम्हारे से खराब हालत वाले मरीज भी खुदा के घर से लौट आए हैं।’’ ‘‘सच ?’’ ‘‘हाँ बहन, आजमायी हुई चीजें हैं।’’ ‘‘तुमने खुद आजमाकर देखी है ?’’ एकाएक सकपका गयी सबीना। चेहरा मुरझा गया। एक क्षण देखती रही शून्य में। फिर बोली, ‘‘बहन ! हम उन चीजों का इस्तेमाल कैसे कर सकेंगे। बहुत महँगी हैं और हम ठहरे झोंपड़-पट्टी के रहने वाले। तुम्हें कितने लोग घेरे रहते हैं। तुम्हारे उनको तो मैंने कई बार रोते देखा है। तुम ये महँगी चीजें खरीद सकती हो। शायद तुम्हारे बच्चो के भाग से अल्ला-ताला तुम पर करम फरमा दें।’’ प्रभा सुनती रही, एकटक सबीना के चेहरे पर दृष्टि गड़ाये रही। उसे बराबर लगता रहा कि ईश्वर का अगर कोई चेहरा होगा तो सबीना के जैसा ही होगा।
गत 26 नवंबर,2011 को हिंदी के जाने माने आलोचक डॉ.कुमार विमल के निधन से सौंदर्यशास्त्र के एक विश्वसनीय अध्येता से हम सब वंचित हो गए हैं। लोहिया नगर का उनका आवास जिसमें वे लगभग एक पुस्तकालय-सा बनाकर रहते थे, उनके न रहने पर सूना-सा हो गया है। तमाम साहित्यिक परियोजनाओं पर काम करने का उनका संकल्प अधूरा छूट गया है। उनके पुस्तकालय में रखी पुस्तकों, जर्नलों, संदर्भग्रंथों को देखते हुए शब्द की सत्ता के प्रति उनकी भक्ति का अहसास होता था। वे सच्चे अर्थों में एक उदारमना लेखक, कवि, आलोचक और साहित्य रसिक थे। उनका न होना एक ऐसे सत्साहित्यिक का अवसान है जिसमें कूट-कूट कर अतिथि वत्सलता, रसग्राहिता और साहित्य, समाज, संस्कृति, कला और राजनीतिक फलक पर अद्यतन गतिविधियों को जानने-अवगाहन करने की सतत जिज्ञासा भरी थी। पटना-प्रवास के दौरान जिस एक बड़ी शख्सियत से मुलाकात के बाद लेखकों के बारे में अपनी आम धारणा बदलनी पड़ी, वे प्रो.कुमार विमल थे। सौंदर्यशास्त्र के अध्येता के रूप में उनकी देशव्यापी ख्याति से अवगत तो था किन्तु वे इतने सहृदय, इतने स्वागतोत्सुक और निर्मल चित्त के व्यक्ति भी होंगे, यह अनुमान न था। यह अवसर मिला, पटना दूरदर्शन के लिए उनसे दो खंडों में विस्तृत बातचीत के दौरान। दो-एक वर्षों से वे शारीरिक रूप से कुछ अशक्त से हो गए थे और उपचार पर आश्रित थे। लिहाजा एकाधिक अपवाद को छोड़ कर कहीं आ-जा नहीं पाते थे। इसीलिए दूरदर्शन की टीम ने उनके घर पर ही इंटरव्यू की व्यवस्था कर दी। उनके विपुल साहित्यानुशीलन और स्मृतिधायी प्रज्ञा को देख मन प्रसन्न हो गया। पटना दूरदर्शन के तत्कालीन निदेशक और कथाकार शशांक ने कहा था, ‘ओम जी, आपको इस शताब्दी के एक ऐसे लेखक से मिलवाने वाला हूँ, जो अपने आप में साहित्य साधना की एक मिसाल हैं।‘ इंटरव्यू के दौरान प्रश्नों और प्रतिप्रश्नों के उत्तर वे जिस संजीदगी और त्वरा से दे रहे थे, उससे बातचीत को विराम देने का मन ही न होता था। काव्यशास्त्र की कसौटियों, साहित्यकारों के संस्मरणों, सौंदर्यशास्त्र के नए मानकों पर होती हुई बातचीत जब टेप खत्म होते होते समापन के छोर तक पहुँची और उन्हें इसके लिए आभार व्यक्त करने का अवसर आया तो उन्होंने ससंकोच कहा, ‘ओम जी, मैं सहसा सभी से घुल-मिल नहीं पाता, पर आज औचक पहली बार, वह भी इतने बहसतलब प्रश्नों के साथ आपसे बातचीत करते हुए मन में यह संशय जगा कि मेरे उत्तर प्रश्नों की उदात्तता और प्रतिप्रश्नों की प्रत्युत्पन्नमति के अनुरूप हैं या नहीं?’ मैंने आश्वस्त किया कि यह बातचीत सर्वथा अनूठी है और आपने धीर मति और प्रज्ञा के साथ प्रश्नों के उत्तर दिए हैं। इस बातचीत के बहाने उनसे कायम यह संबंध निरंतर प्रगाढ़ होता गया। वे मेरे अत्यंत शुभचिंतक हो गए थे। अक्सर वे कहते, ‘ओम जी आज आपका शाम का क्या कार्यक्रम है ?’ मैं समझ जाता, यह बुलाने का इशारा है। हम उनके पास पहुँचते तो वे आतिथ्य की समर्पित भाव-भंगिमा के साथ प्रतीक्षा करते मिलते। उनके सेवक हमें उनके अध्ययन कक्ष में ले जाते। सामने मेज पर, अल्मारियों में किताबें ही किताबें। मैं नहीं जानता कि उनके यहॉं विभिन्न अनुशासनों की जितनी पुस्तकें होंगी, विषयवार सज्जित, उतनी किताबें और किसी हिंदी लेखक के पास होंगी। उनके 10-12 कमरों में लगभग 1 लाख पुस्तकें होंगी। पुस्तक-प्रेम का उनका आलम यह था कि ऐसा कोई महीना न होता जब उनके यहॉं कुछ नयी पुस्तकों की आमद न होती। गए साल जब पटना में कंकड़बाग़ इलाके में पानी भर गया तो उनके मकान के निचले तल पर रखी हजारों पुस्तकों नष्टप्राय हो उठी थीं, जिसकी वेदना उन्हें अंत तक सालती रही।
उनके आतिथ्य की मिसाल यह थी कि यदि आप उनके घर आमंत्रित हैं तो उनके सेवकों द्वारा नाश्ते-पानी की एक से एक लजीज़ डिश आपके सामने प्रस्तुत की जाती रहेगी। कभी कभी ऐसी डिश भी परोसी जाती जिसकी विशिष्टता के बारे में वे बड़े विस्तार से बताते। बीच बीच में वे सेवकों को हिदायत देते और साथ ही खाने पीने का इसरार भी दोहराते रहते। एक बार साहित्य अकादेमी के उप सचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी मेरे साथ उनसे मिलने गए और न न करते हुए लगभग हम लोग जलपान की सात-आठ डिशें उदरस्थ कर चुके थे। इस दौरान वे आपसे कभी अज्ञेय, कभी महादेवी, कभी पंत, कभी दिनकर तथा अनेक ऐसे साहित्यकारों के संग-साथ की बातें करते। अज्ञेय के बारे में बताते कि वे जब भी पटना आते, उनके आवास पर मिलने आते, कोई न कोई पठनीय पुस्तक देख कर उठा लेते । किन्तु पढ़ लेने के बाद वे उसे रजिस्टर्ड डाक से वापस भेजना न भूलते थे। अज्ञेय द्वारा स्थापित वत्सल निधि द्वारा आयोजित हीरानंद शास्त्री स्मारक व्याख्यान माला में पहला व्याख्यान प्रो.कुमार विमल ने दिया था। सौंदर्यशास्त्र पर अपने अधिकार के कारण और खास कर छायावादी कविता के सौंदर्यशास्त्र पर लिखने के कारण वे महादेवी और पंत के बड़े निकट रहे। पंत जी की सुकुमारता का बखान करते हुए वे भावुक हो जाते थे। उनके कालाकांकर में रहने के दौरान के अनेक छोटे बड़े प्रसंग मैंने उनके मुँह से सुने हैं। एक भेंट में उन्होंने अपनी सद्य:प्रकाशित पुस्तक ‘आलोचना और अनुशीलन’ और ‘चिंतन, मनन और विवेचन’ पढ़ने को दी तो मैंने कहा कि यदि आपको आपकी किसी एक पुस्तक से जानना हो तो कोई क्या पढ़े। उन्होंने कहा था, मैं बुद्ध की तरह ‘त्रिपिटक’ तो नहीं लिख सका, किन्तु ‘त्रिपुटक’ तो लिख ही सकता हूँ। लिहाजा वे तीन खंडों में अपने ही लेखन का सार-संग्रह तैयार करने में लगे थे। वे ‘सौंदर्यशास्त्र का गतिविज्ञान’ जैसी पुस्तक लिखने की तैयारी में थे जिसमें वे अश्वेत सौंदर्यशास्त्र, प्रवासी भारतीय साहित्य, स्त्रीवादी और दलित सौंदर्यशास्त्र जैसे विश्व वैचारिकी को आंदोलित करने वाले नए मुद्दे शामिल होते। उन्हें साहित्य का विश्वकोश माना जाता था। इतने संदर्भ और इतनी स्मृतियों वाले व्यक्ति का आज के दौर में होना मुश्किल है। शुरुआत तो उन्होंने एक सुकुमार कवि के रूप में की थी किन्तु उनके भीतर का उमड़ता वैचारिक उद्वेग उन्हें आलोचना की कठिन डगर की ओर खींच ले गया और धीरे-धीरे वे आलोचक बनते गए। सौंदर्यशास्त्र पर उनका काम न केवल विरल कोटि का है बल्कि प्रो.सुरेन्द्र बारलिंगे और हिंदी में रमेशकुंतल मेघ के अलावा इस क्षेत्र में उनका कोई हमकदम नहीं है। उनकी ख्याति इस क्षेत्र में इतनी जानी पहचानी है कि जब सौंदर्यशास्त्र के पारखी नित्यानंद कानूनगो बिहार के राज्यपाल बन कर आए तो वे नियमित तौर पर कुमार विमल का सान्निध्य पाने और उनसे सहचिंतन के लिए गाड़ी भेज कर उन्हें मनुहारपूर्वक बुलवाते थे। छायावादी काव्य के प्रति उनके विशद अनुशीलन को देखते हुए ही पंत जी ने अपनी काव्यकृति ‘गंधवीथी’ की भूमिका उनसे लिखवाई। महादेवी वर्मा भी चाहती थीं कि उनकी कृति ‘पारमिता’ की विस्तृत भूमिका विमल जी ही लिखें पर लोकसेवा आयोग की व्यस्तताओं के चलते ऐसा न हो सका।
भागलपुर के कालूचक में 12 अक्तूबर, 1931 को जन्मे डॉ. विमल ने पटना विश्वविद्यालय से सौंदर्यशास्त्र पर डी.लिट् की उपाधि पाई थी। कुछ वर्षों अध्यापन के बाद वे प्रशासनिक दायत्वों से जुड़े तो अंत तक ऐसी ही जिम्मेदारियों से मुक्त न हुए। इस बीच वे राष्ट्रभाषा परिषद के निदेशक, बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य एवं अध्यक्ष, नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति, व बिहार राज्य बालश्रमिक आयोग के अध्यक्ष आदि पदों पर रहे। इसके अलावा भारतीय ज्ञानपीठ व साहित्य अकादेमी समेत अनेक अकादमियों/समितियों के सदस्य के रूप में सम्बद्ध रहे, पर इसके बावजूद उनके लेखन में कोई गत्यवरोध नही आया। उन्होंने चालीस से अधिक पुस्तकें लिखीं हैं तथा दिनकर और पंत रचना संचयन सहित अनेक कृतियों का संपादन किया है। दो खंडों में ‘सौंदर्यशास्त्र के तत्व’ व ‘छायावाद का सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन’ के अलावा ‘मूल्य और मीमांसा’’,कला विवेचन’ ‘आलोचना और अनुशीलन’,’चिंतन मनन और विवेचन’,’महादेवी का काव्य सौष्ठव’, तथा ‘अंगार’ व ‘सागरमाथा’ कविता संग्रह उनकी यादगार कृतियों में शुमार हैं। हाल ही में उनकी दो नई पुस्तकें छप कर आई थीं, जिन्हें उन्होंने लोकार्पण के लिए अस्पताल जाने के दो दिन पहले प्रकाशक से मंगवाया था: ‘साहित्येतर’ और ‘स्त्री विमर्श-कामाध्यात्म और साहित्य’। अपने साहित्यिक अवदान के लिए उन्हें बिहार के डॉ.राजेन्द्रप्रसाद शिखर सम्मान एवं भारत सरकार के सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया । काव्यालोचन और सौंदर्यशास्त्र के विभिन्न पहलुओं के प्रति उनकी सघन दिलचस्पी जीवनपर्यंत बनी रही। हाल ही में उन्होंने जन्मशताब्दी के अवसर पर पत्र-पत्रिकाओं के लिए अज्ञेय, नागार्जुन और आरसीप्रसाद सिंह आदि कवियों पर मूल्यवान लेख लिखे तथा आखिर तक सक्रिय बने रहे।
कुमार विमल जी अपने इर्द गिर्द की दुनिया को हमेशा ‘कलामय’ बनाए रखते थे। अपने बौद्धिक प्रभामंडल के निर्माण के प्रति भी वे सचेत दिखते थे। राजनीतिज्ञों से उनका नियमित संवाद था। इसका लाभ भी उन्हें मिला। पिछड़े वर्ग के मध्य बौद्धिकता और अकादेमिक उपलब्धियों के वे समुज्ज्वल प्रतीक थे। किन्तु उनकी प्रखर मेधा के बावजूद स्थानीय साहित्यकारों की आवाजाही और बैठकी उनके यहॉं कम होती थी। अपनी उपस्थिति के दौरान कभी भी मैंने शहर के किसी भी साहित्यकार को उनके पास बैठे-बतियाते नहीं पाया। इसकी एक वजह यह भी थी कि जिन दिनों वे बिहार लोक सेवा आयोग के सदस्य व अध्यक्ष थे, लोगों से यों भी दूरी बनाये रखने की विवशता थी कि कहीं सिफारिशी लोगों का तॉंता न लग जाए और बाद में उनकी एकांतिक अध्यवसायी छवि के चलते लोग स्वयं भी संकोच बरतते। दूसरे, अपना ही सतत लेखन-अध्ययन उन्हें समय न देता था । इधर कुछ सालों से वे पुस्तकों से ही संवाद करने के अभ्यस्त हो चले थे। उनसे मिलने जाने पर वे सदैव पुस्तकों के मध्य अपनी कुर्सी पर विराजमान मिलते थे। वे इन्टेलेक्चुअल तो थे ही, इन्टेलेक्चुअल दिखने का प्रभामंडल भी बनाए रखते थे। लिहाजा, मेज पर, सोफे पर, तिपाई पर जगह जगह ऐसी दुर्लभ पुस्तकें रखी होती थीं जिनकी पुस्त पर छपे नामों को देख उनकी शख्सियत एवं उनके विपुल अध्ययन-अवगाहन का एक स्वाभाविक-सा आतंक या दबाव मुलाकातियों पर होता था। सुदर्शन और गोरे-चिट्टे तो वे थे ही। मिलने पर अज्ञेय, पंत, महादेवी, नागार्जुन, रेणु, नेपाली,आरसीप्रसाद सिंह, नामवर सिंह, शिवप्रसाद सिंह, रमेशकुंतल मेघ, प्रभाकर श्रोत्रिय, अशोक वाजपेयी आदि की सरस चर्चा करते। ऐसी ही चर्चा के दौरान उन्होंने बताया था कि जिन दिनों नेपाली के काव्यपाठ की धूम थी, लोग दिनकर तक की उपेक्षा करते थे। उनके लिए ‘वन्स मोर’ ‘वन्स मोर’ की फरमाइशें सुनकर दिनकर इस कदर ईर्ष्यादग्ध हो उठे कि उन्होंने नेपाली को लक्ष्य कर ‘भोटिया गधा’ शीर्षक से एक कविता ही लिख दी। एक बार वे बताने लगे कि चेकोस्लोवाकिया की राजधानी प्राग का नाम प्रयाग से ही प्रेरित होकर रखा गया है। उनकी बतकहियों से लगता कि वे साहित्य की समकालीन छोटी से छोटी गतिविधियों और तात्कालिक प्रवादों तक से बखूबी परिचित हैं। बाहर के साहित्यकारों के लिए वे लगभग एक तीर्थतुल्य आकर्षण बन चुके थे। कोई भी लेखक शहर में आता तो उनसे मिलते ही उनका मुरीद हो उठता।
उनके अनुरोध पर एकाधिक बार फ्रेजर रोड स्थित डाक बंग्ला चौराहे के पास दक्षिण भारतीय व्यंजनों के एक प्रसिद्ध रेस्तरॉं में जाना हुआ। वे बताते, यही वह रेस्तरॉं हैं जहॉं नितीश जी आते हैं। राजनीतिज्ञों से भी उनके संबंध प्रगाढ़ रहे। लालू यादव और नितीश कुमार समेत बिहार के राजनीतिज्ञ उनकी साहित्यिक प्रतिभा की कद्र करते थे। वे जिस सभा में हों, उसकी शोभा बढ़ जाती थी। एक बार उनके जन्मदिन पर उनके घर पहुँचने पर पाया कि साहित्य सम्मेलन के तमाम पदाधिकारीगण एवं साहित्यकार वहॉं जमा हैं। बड़े ही अनौपचारिक माहौल में वे अपना जन्मदिन मना रहे हैं।
कुछ ही माह पहले मेरे पटना से वाराणसी स्थानांतरित होने की अचानक खबर से वे भावुक हो उठे थे। फोन पर उन्होंने इतना ही कहा, ‘ओम जी, क्या कल आप आधे घंटे के लिए हमारे यहॉं आ सकते हैं?’ मैंने कहा, ‘अवश्य’। दूसरे दिन लोहिया नगर स्थित उनके आवास पहुँचने पर पाया कि जैसे वे इस शहर से ‘शुभ विदा’ कहने के लिए सजल ऑंखें लिए प्रस्तुत हों। छक कर जलपान व भोजन कराने के बाद उन्होंने कविताऍं लिखने की एक मांगलिक दैनंदिनी भेंट की,एक सूट का कपड़ा उपहार में दिया और कहा,’ओम जी ! विदा होने वाले मेहमान को दरअसल यहॉं तीन चीजें भेंट करने की परंपरा है: सहकार कुंज, आम्रपल्लव और आम्रफल।‘ उन्होंने अपने पेड़ से ताज़ा तुड़वाए लगभग दो किलो आम भेंट किए और कहा कि ओम जी इन्हें अपने सामान के साथ जरूर ले जाइयेगा। आपके शुभप्रस्थान के लिए ये मेरे आशीर्वाद स्वरूप हैं।‘ विदा होते वक्त उनसे यह वादा था कि किसी इतवार को पटना आकर एक लंबी गप्प हम उनके साथ लगाऍंगे—उनकी स्मृतियों के खजाने का सम्यक् दोहन करेंगे, पर यह संभव न हो सका। अब जब कि वे इहलोक से अपनी यात्रा पूरी कर जा चुके हैं, मेरी स्मृति में पं.नरेन्द्र शर्मा का गीत गूँज रहा है: ‘आज के बिछड़े न जाने कब मिलें'...
एस.डी.एम. ने फिर से सी.ओ. की तरफ़ घूर कर देखा। पर सी.ओ. ने इशारों-इशारों में संकेत दिया कि यहां से निकल लिया जाए। पर एस.डी.एम. बुदबुदाया, ‘तुम सब कायर हो।’ और ख़ुद पूर्व विधायक पर झपट पड़ा। तड़ातड़ तीन चार थप्पड़ जड़े और गरेबान पकड़ कर नीचे ज़मीन पर ढकेल दिया। ज़मीन पर गिरते ही एस.डी.एम. ने तीन चार लात भी रसीद कर दिए। और बोला, ‘बहुत बड़े गुंडे हो, बहुत बड़ी ताक़त समझते हो अपने आप को?’वह बोला, ‘आइंदा से गालियां देने की हिम्मत मत करना और सारे नाजायज़ धंधे बंद कर लो वरना बंद कर दूंगा। और ऐसी-ऐसी धाराएं लगाऊंगा कि हाईकोर्ट से भी जमानत नहीं पाओगे!’
‘तुम्हारी नौकरी खा जाऊंगा!’ बाहुबली पूर्व विधायक ज़मीन पर लेटे-लेटे गुर्राया, ‘तुम को मालूम नहीं है कि तुम ने किस पर हाथ उठाया है।’
‘देखो मैं जिस जगह और जिस झा परिवार से आता हूं। वहां दो ही तरह के लोग पैदा होते हैं। या तो आई.ए.एस. होते हैं या नचनिया। और मैं हूं आई.ए.एस. जो बिगाड़ना हो मेरी बिगाड़ लेना।’ कह कर एस.डी.एम. ने उन को एक और लात रसीद कर दिया। बाहुबली के सारे हथियार बंद साथी और बाज़ार के लोग टुकुर-टुकुर देखते रह गए। और एस.डी.एम. मय फ़ोर्स के वहां से चला गया। भीड़ में गिरधारी राय भी थे। एस.डी.एम. के जाते ही वह मूंछों में मुसकुराए और बड़ी फुर्ती से लेटे पड़े बाहुबली विधायक को जा कर उठाया ज़मीन से और उस की धूल झाड़ते हुए बुदबुदाए, ‘का बाबू साहब किस से उलझ गए आप भी। सब को गिरधारी राय समझ लेते हैं आप भी! हरदम ठकुराई ठोंकने से नुक़सान भी हो जाता है।’
बाहुबली ने अचकचा कर गिरधारी राय को देखा और उन्हें आग्नेय नेत्रों से घूरा। गिरधारी राय फिर बुदबुदाए, ‘रस्सी जल गई, पर ऐंठ नहीं गई।’ कह कर गिरधारी राय सरक गए। बाहुबली भी अपमान से आहत पर अकड़ते हुए लाव-लश्कर समेत चले गए। पहुंचे लखनऊ। मुख्यमंत्री से मिले। और जो कहते हैं, पुक्का फाड़ कर रोना, तो पुक्का फाड़ कर रोए। और फिर लौटे तो एस.डी.एम. को ट्रांसफर करवा कर ही। फिर उस एस.डी.एम. ने जो कहा था कि हमारे परिवार में दो ही लोग होते हैं, एक आई.ए.एस और एक नचनिया। तो उस बाहुबली ने उसे नचा दिया और भरपूर। हर तीन महीने, चार महीने पर उस का ट्रांसफर होता रहा। और दुर्गम से दुर्गम स्थानों पर। उन दिनों उत्तराखंड उत्तर प्रदेश में ही था सो सारा पहाड़ नचवा दिया। गिरधारी से किसी ने इस बात की चर्चा की तो उन्हों ने साफ़ कह दिया कि, ‘अब वह नचनिया बने चाहे पदनिया हमसे क्या?’ वह बोले, ‘हमारा काम तो हो गया न?’
और सचमुच उस दिन के बाद उस बाहुबली पूर्व विधायक ने मारे अपमान के बांसगांव की ज़मीन पर फिर पैर नहीं रखा। सो गिरधारी राय बात ही बात में जिस-तिस से शेख़ी बघारते हुए कहते, ‘बड़े-बड़े चंद को चांद बना दिया तो तुम क्या चीज़ हो जी?’ चंद को चांद बनाने के बाद अब वह मुनमुन को भी मून बनाना चाहते थे पर कोई तरकीब निकाले नहीं निकल रही थी। उन को विवेक भी दिख नहीं रहा था। उन्हों ने सोचा कि क्यों न एक बार विवेक सिंह के घर हो कर हालचाल ले लिया जाए। लेकिन फिर उन्हों ने सोचा कि कहीं उन की पोल न खुल जाए और फिर लेने के देने पड़ जाएं। एक तो घर और पट्टीदारी का मामला था दूसरे, मुनमुन के भाई जज और अफ़सर थे ही। सो वह डर गए और मन मसोस कर रह गए। वैसे भी अब वह बूढ़े हो चले थे। पिता का कमाया पैसा समाप्त हो चुका था और बेटे नाकारा हो चले थे। अपनी परेशानियां कुछ कम नहीं थीं उन की पर दूसरों को परेशान करने में उन्हें जो सुख मिलता था उस का भी वह क्या करें?’
विवश थे। अवश थे वह। इस सुख के आगे। मुनमुन को मून बनाने की तड़प में वह एक विज्ञापन का स्लोगन भी गुनगुनाते- ये दिल मांगे मोर! बिलकुल किसी बच्चे की तरह। उधर मुनमुन की, मुनक्का की, मुनमुन की अम्मा की तकलीफें़ बढ़ चली थीं। ख़र्चे बढ़ चले थे। साथ ही बीमारियां भी। ख़ास कर मुनमुन की टी.बी. ने उसे परेशान कर दिया था। अब उस की खांसी में कभी कभार ख़ून भी आने लगा था। हालां कि टी.बी. अब कोई असाध्य बीमारी नहीं रह गई थी। लेकिन इलाज और दवाई जो नियमित होनी चाहिए थी, नहीं हो पा रही थी। डाक्टर कहते कि एक दिन भी अगर दवाई का गैप हो गया तो बेकार। दवाई का पूरा कोर्स बिना किसी गैप के पूरा करना था। पर दवाई में आर्थिक थपेड़ों के चलते, कभी लापरवाही के चलते गैप हो जाती। मामला बिगड़ जाता। बाबू जी समझाते भी कि, ‘सारा कुछ छोड़ कर दवाई लग कर करो।’ फिर पत्नी से भनभनाते भी, ‘मुनमुन की मनमानी बढ़ गई है। उसे रोको। नहीं किसी दिन वह अपनी जान ले लेगी।’
‘मेरी भी वह अब कहां मानती है?’ मुनमुन की अम्मा भी भनभनातीं।
धीरे-धीरे दिन बीते। दिन, ह़ते और महीना, महीनों में बीता। मुनमुन की ससुराल से गौने का दिन आ गया। मुनमुन थोड़ा मुनमुनाई। कि, ‘अभी नहीं। पहले मेरी बीमारी ठीक हो जाए।’ पर मुनक्का नहीं माने। गौने का दिन स्वीकार कर लिया। एक महीने बाद का दिन। बेटों को भी सूचना दे दी। राहुल ने हमेशा की तरह फिर हवाला से बीस हज़ार रुपए भेज दिए और बता दिया कि, ‘मैं नहीं आ सकता।’ तरुण ने कहा, ‘मुश्किल है पर कोशिश करूंगा।’ धीरज ने कुछ स्पष्ट नहीं कहा। पर रमेश ने कहा कि, ‘आऊंगा। पर कुछ घंटे के लिए। सिर्फ़ विदाई के समय।’
सो सारी तैयारी मुनक्का ने अकेले की। ख़रीददारी से ले कर मिठाई-सिठाई तक की। पर पहला काम उन्हों ने यह किया कि राहुल के भेजे पैसों से मुनमुन की टी.बी. की दवा डेढ़ साल के लिए इकट्ठे ख़रीद दी। और उसे हिदायत दे दी कि बिना नागा वह दवा खाए। आधी अधूरी तैयारियों के बीच गौना हुआ। ऐन विदाई के आधा घंटे पहले रमेश बांसगांव सुबह-सुबह पहुंचा। और मुनमुन की विदाई करवा कर अम्मा, बाबू जी को बिलखता छोड़ कर चला गया। अम्मा ने कहा भी कि, ‘बाबू तुम पहले तो इतने निष्ठुर नहीं थे?’ जवाब में वह मौन ही रहा। बाद में चौथ भी ले कर मुनक्का राय अकेले ही गए। लेकिन मुनमुन उन्हें ससुराल में ख़ुश नहीं दिखी। वह चिंतित हुए। भारी मन से बांसगांव लौट आए। गौने के कोई पंद्रह दिन बाद ही मुनमुन का फ़ोन आया कि, ‘बाबू जी, अगर हमें ज़िंदा चाहते हैं तो फ़ौरन आ कर हमें लिवा ले चलिए।’ कह कर उस ने फ़ोन काट दिया।
मुनक्का राय ने किसी से राय मश्विरा भी नहीं किया और सरपट भागे मुनमुन की ससुराल। लौटे तो मुनमुन को ले कर ही। मुनमुन की अम्मा मुनमुन को अचानक देखते ही हतप्रभ रह गईं। बोली, ‘ई क्या हुआ?’ मुनमुन अम्मा से लिपट गई और दहाड़ मार-मार कर रोने लगी। रोते-रोते ही अपने दुख की गाथा बताने लगी। रोना-धोना सुन कर आस-पड़ोस की औरतें भी जुटीं। शाम तक सारे बांसगांव को मुनमुन के ससुराल से बैरंग वापस आ जाने की ख़बर मालूम हो गई। मुनमुन के घर उस रात चूल्हा नहीं जला। मुनक्का राय पर इस बुढ़ौती में जैसे वज्र टूट पड़ा था। जैसे काठ मार गया था उन्हें। रात भर उन्हें नींद भी नहीं आई। सुबह एक पड़ोसन ही चाय नाश्ता ले कर आईं। कुछ शुभचिंतक, हित-चिंतक और मज़ा लेने वाले जन भी आए। किसी से न तो मुनक्का कुछ बोले, न मुनमुन न ही मुनमुन की अम्मा। मुनमुन और मुनमुन की अम्मा हर सवाल पर जवाब में बस रोती ही रहीं। और जब बहुत हो गया तो मुनक्का राय एक शुभचिंतक के बार-बार पूछने पर कि, ‘आखि़र हुआ क्या?’ के जवाब में बस इतना ही बुदबुदाए, ‘अब क्या बताएं कि क्या हो गया?’ और सिर झुका लिया।
कई लोगों ने पीठ पीछे कहा, ‘जो भी हो इतनी जल्दी बेटी को वापस नहीं ले आना चाहिए था मुनक्का राय को।’ किसी ने कहा, ‘किसी से राय मश्विरा भी नहीं किया।’ तो किसी ने अंदाज़ा लगाया, ‘लगता है बेटों को भी अभी नहीं बताया।’ तरह-तरह की बातें, तरह-तरह के लोग। ‘वकील हैं भइया। ख़ुद समझदार हैं। दूसरों को सलाह देते हैं, ख़ुद नहीं लेते।’ एक एक्सपर्ट कमेंट भी आया जो मुनक्का राय के कानों तक भी गया। पलट कर उन्होंने सिर्फ़ घूर कर देखा इस टिप्पणीकार को तो वह धीरे से उठ कर खिसक गया। कि कहीं वकील साहब का सारा गुस्सा उसी पर न बरस जाए! ख़ैर, लोगों का आना जाना कम हुआ। और बात धीरे-धीरे खुली। खुली और खुलती गई। तिल का ताड़ बन कर बांसगांव में गीले उपले के धुएं की तरह सुलगती हुई फैलती गई। बात विवेक तक भी पहुंची। पर वह चाह कर भी नहीं आया। मारे डर के। कि कहीं फिर पिट-पिटा गया तो?
ह़फ्ते भर बाद घनश्याम राय दो लोगों के साथ आए और मुनक्का राय से बोले, ‘वकील साहब उस वक्त आप गुस्से में थे इस लिए आप से तब कुछ नहीं कहा और आप की बेटी को विदा कर दिया। अब गुस्सा शांत कीजिए और निवेदन है कि हमारी बहू को विदा कर दीजिए!’ पर मुनक्का राय शांत रहे। कुछ बोले नहीं। बोलीं मुनमुन की अम्मा और दरवाज़े की आड़ से ख़ूब बोलीं, ‘आप का लड़का जब लुक्कड़ और पियक्कड़ था तो आप क्यों झूठ बोले कि पी.सी.एस. की तैयारी कर रहा है? आप का लड़का जब पगलाया-पगलाया घूमता है यहां-वहां तो आप ने बताया कि इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ता है? और इतने बड़े घर में मेरी बेटी को उपवास कर के रहना पड़ा। आप के घर में भरपेट खाना खाने तक के लिए तरस गई मेरी बेटी। आप का बेटा अभी तक मेरी बेटी का चेहरा तक नहीं देख पाया। यह सब क्या है? आप की पत्नी और बेटी मेरी बेटी को सताती हैं और ताने मारती हैं? नई नवेली बहू से कैसे-कैसे तो काम करवाए आप लोगांे ने? और चाहते हैं कि अपनी बेटी को उस दोज़ख में भेज दूं। मरने के लिए? लांछन और अपमान भुगतने के लिए?’
‘देखिए समधिन जी आप नाहक गुस्सा हो रही हैं। बात इतनी बड़ी नहीं है जितनी आप समझ रही हैं।’
‘मैं सब समझ रही हूं।’ मुनमुन की अम्मा दरवाज़े की आड़ से ही बोलीं, ‘मेरी बेटी ऐसे नहीं जाएगी बस कह दिया।’
‘चलिए जब आप की ऐसी ही राय है समधिन जी तो मैं क्या कर सकता हूं?’ घनश्याम राय ने मुनक्का राय से मुख़ातिब होते हुए कहा, ‘वकील साहब आप ही कुछ विचार कीजिए और समधिन जी को समझाइए।’
पर मुनक्का राय चुप रहे। बोलीं उन की पत्नी ही, ‘समझाइए पहले आप अपने घर में लोगों को और अपने बेटे को पहले सुधारिए। फिर आइए।’
‘हमारे घर में तो वकील साहब औरतें घर आए मर्दों से इस तरह नहीं बोलती हैं।’ घनश्याम राय बोले, ‘क्या आप के घर में औरतें ही बोलती हैं, मर्द नहीं।’
‘ख़ैर, मनाइए कि मर्द अभी हमारे घर के आप की करतूतों को जान नहीं पाए हैं।’ मुनमुन की अम्मा दरवाज़े की ओट से ही बोलीं, ‘जिस दिन हमारे बेटे जान गए आप की करतूतों को तो कच्चा चबा जाएंगे। अभी आप जानते नहीं हैं कि किस परिवार से आप का पाला पड़ा है?’
‘जानते हैं समधिन जी, जानते हैं। आप के घर में सब लाट गवर्नर हैं। इतने बड़े लाट गवर्नर कि एक बहन को संभाल नहीं पाए। कि बहन आवारा हो गई। बूढ़े मां बाप को देख नहीं पाते हैं कि वह मर रहे हैं कि जी रहे हैं।’ घनश्याम राय बोले, ‘हम भी जानते हैं आप के परिवार की लाट गवर्नरी!’
‘अब आप कृपा कर के चलिए और, विदा लीजिए!’ मुनक्का राय बिलकुल शांत स्तर में हाथ जोड़ कर घनश्याम राय से बोले, ‘आप कुछ ज़्यादा ही बोल रहे हैं।’
‘अब आप अपने दरवाज़े पर हमारा अपमान कर रहे हैं वकील साहब!’ घनश्याम राय और भड़के।
‘जी नहीं, मैं पूरे सम्मान सहित आप से विनती कर रहा हूं कि कृपया आप विदा लें और तुरंत प्रस्थान करें।’ मुनक्का राय ने फिर से विनयवत हाथ जोड़े शांत स्वर में घनश्याम राय से कहा।
‘चलिए जा तो रहा हूं पर आप के दरवाज़े का यह अपमान मैं फिर नहीं भूलूंगा।’
‘मत भूलिएगा और फिर मत आइएगा।’ पूरी सख़्ती और पूरी शांति से मुनक्का राय ने कहा।
‘तो यह अंतिम है हमारी ओर से?’ घनश्याम राय तड़के।
‘जी हां, ईश्वर करे यह अंतिम ही हो।’ मुनक्का राय अब अपना धैर्य खो रहे थे।
‘आखि़र परेशानी क्या हो गई वकील साहब?’ घनश्याम राय हथियार डालते हुए बोले, ‘आखि़र हम लड़के वाले हैं!’
‘लड़के वाले हैं तो हमारे सिर पर मूतेंगे?’ मुनक्का राय बोले, ‘हम ने अपनी बेटी की असुविधाओं के बारे में बात की और आप ने हमारी बेटी को आवारा घोषित कर दिया। हमारे रत्न जैसे बेटों पर जिन पर हमें ही नहीं पूरे बांसगांव और पूरे गांव जवार को नाज़ है, उन पर छिछली टिप्पणी कर दी। इस लिए कि आप लड़के वाले हैं और हम लड़की वाले? और पूछ रहे हैं कि परेशानी क्या है? मैं बात टालने के लिए चुप हूं तो आप कह रहे हैं कि मेरे घर में मर्द नहीं बोलते हैं? आप का बेटा पी.सी.एस. क्या बला है की ए.बी.सी.डी. नहीं जानता और आप उसे झूठी पी.सी.एस. की तैयारी का ड्रामा रच कर हमारी फूल सी बेटी का जीवन तहस-नहस कर देते हैं और मर्द बनते हैं? यह कहां की मर्दानगी है?’ मुनक्का राय ने अपनी संजीदगी फिर भी मेनटेन रखी और हाथ जोड़ते हुए फिर से कहा, ‘कृपया प्रस्थान करें।’ उन के इस ‘प्रस्थान’ करें संबोधन में ध्वनि पूरी की पूरी यही थी कि जूता खा लिए और अब जाएं। घनश्याम राय और उन के साथ आए दोनों परिजनों के चेहरे का भाव भी जाते समय ऐसा ही लगा जैसे सैकड़ों जूते खा कर वह जा रहे हों। घनश्याम राय को समधियान में ऐसे स्वागत की उम्मीद नहीं थी। वह हकबक थे।
उन के साथ आए परिजन भी अपने को कोस रहे थे कि वह घनश्याम राय के साथ यहां इस तरह अपमानित होने क्यों आ गए? एक परिजन घनश्याम राय को रास्ते में कोसते हुए कह भी रहा था कि, ‘बांसगांव के लोग वैसे ही दबंग और सरकश होते हैं। तिस पर इस के बेटे जज और अफ़सर। करेला और नीम चढ़ा! किस ने कहा था कि बेटे की शादी बांसगांव में करिए?’ दूसरा परिजन भी पहले के सुर में सुर मिला कर बोला, ‘बांसगांव थाना कचहरी, मार-झगड़ा की जगह है। रिश्तेदारी करने की जगह नहीं है।’
‘अब आप लोग चुप भी रहेंगे? कि ऐसे ही बांसगांव के सांप से डसवाते रहेंगे?’ घनश्याम राय आजिज़ आ कर बोले, ‘वैसे ही दिमाग़ ससुरा बौखलाया हुआ है।’
घनश्याम राय सचमुच होश में नहीं थे। दो दिन बाद उन्हों ने रमेश को फ़ोन किया और रो पड़े, ‘जज साहब हमारी इज़्ज़त संभालिए! हमारी इज़्ज़त अब आप के हाथ है!’
‘अरे हुआ क्या घनश्याम जी? कुछ बताएंगे भी या औरतों की तरह रोते ही रहेंगे?’
‘आप को कुछ पता ही नहीं है?’ घनश्याम राय ने बुझक्कड़ी की।
‘अरे बताएंगे भी या पहेली ही बुझाते रहेंगे?’ रमेश खीझ कर बोला।
‘अरे आप के बाबू जी नाराज हो कर हमारी बहू को पंद्रह दिन बाद ही लिवा ले गए और अब बात करने को भी तैयार नहीं हैं। मैं बांसगांव गया, लड़का वाला हो कर भी। छटाक भर भी हमारी इज़्ज़त नहीं की।’ घड़ियाली आंसू बहाते हुए वह बोले, ‘और बताइए कि आप को कुछ पता ही नहीं है।’
‘पता तो नहीं है पर बाबू जी हमारे इस स्वभाव के हैं नहीं, जैसा कि आप बता रहे हैं।’ रमेश बोला, ‘फिर भी अगर ऐसा कुछ हुआ है तो आप के यहां से ज़रूर कोई भूल-चूक हुई होगी। फिर भी मैं पता करता हूं पहले कि आखि़र बात क्या है? तभी कुछ कह सकूंगा।’
‘हां, जज साहब अब आप ही हमारी आस, हमारे माई-बाप हैं।’
‘ऐसा मत कहिए और धीरज रखिए।’ कह कर रमेश ने फ़ोन काट दिया।
वह चिंतित हो कर थोड़ी देर अवाक बैठा रहा। दुनिया भर के पेंचदार मामले निपटाने और फ़ैसले सुनाने वाला रमेश अपने घर के मामले में घबरा गया। पत्नी को बुला कर बैठाया और घनश्याम राय के फ़ोन वाली बात बताई। रमेश की पत्नी भी चिंतित हुई और बोलीं, ‘पहले बांसगांव फ़ोन कर सारी बात जान लीजिए फिर कुछ कीजिए।’
‘वह तो करूंगा ही पर इस तरह रिश्ते में खटास आने से डर लग रहा है कि कहीं रिश्ता टूट न जाए।’
‘मुनमुन बहिनी शादी के पहले से ही कुछ संदेह में थीं इस रिश्ते को ले कर। पर किसी ने उन की बात को गंभीरता से नहीं लिया। सब मज़ाक में टालते रहे।’
‘तो तुम ने हम को क्यों नहीं बताया तब?’ रमेश ने पूछा।
‘क्या बताती जब सब कुछ तय हो गया था। ऐन तिलक में क्या बताती?’
‘हां, चूक तो हुई।’ रमेश बोला, ‘चलो देखते हैं।’ फिर उस ने बांसगांव फ़ोन मिलाया। फ़ोन पर अम्मा मिलीं। रोने लगीं। बोलीं, ‘अब जब सब कुछ बिगड़ गया तब तुम्हें सुधि आई है?’
‘फिर भी अम्मा हुआ क्या?’
‘सब कुछ क्या फ़ोन पर ही जान लेना चाहते हो?’ अम्मा ने पूछा, ‘क्या मुक़दमों के फ़ैसले फ़ोन पर ही लिखवा देते हो?’
‘नहीं अम्मा फिर भी?’
‘कुछ नहीं बाबू अगर बहन की तनिक भी चिंता है तो दो दिन के लिए आ जाओ। मिल बैठ कर मामला निपटाओ।’
‘ठीक है अम्मा!’ कह कर रमेश ने फ़ोन काट कर धीरज को मिलाया और मामला बताया और कहा कि, ‘अम्मा चाहती हैं कि बासंगांव पहुंच कर मिल बैठ कर मामला निपटाया जाए।’
‘तो भइया मेरे पास तो समय है नहीं। घनश्याम राय आप का पुराना मुवक्किल है। समझा-बुझा कर मामला निपटवा दीजिएगा।’ धीरज बोला, ‘और मुझे लगता है कि मुनमुन की वही नासमझियां होंगी, शादी के पहले वाली। बातचीत कर के ख़त्म करवा दीजिएगा।’
‘चलो देखते हैं।’ कह कर रमेश ने फिर तरुण को फ़ोन मिलाया और सारा मसला बताया। कहा कि, ‘तुम भी साथ रहते तो बातचीत में आसानी रहती। क्यों कि सारी बात मैं ही करूं तो मामले की गंभीरता टूटेगी। तू-तू-मैं-मैं से भी मैं बचना चाहता हूं। धीरज आ नहीं पाएंगे और राहुल इतनी दूर है। किसी और को घर के मामले में डालना ठीक नहीं है।’
‘ठीक है भइया कोई लगातार दो दिन की छुट्टी देख कर दिन तय कर लीजिए। और बता दीजिए, पहुंच जाऊंगा।’
रमेश ने दिन तय कर के तरुण को बता दिया और घनश्याम राय को भी। और साफ़-साफ़ कह दिया कि, ‘बातचीत में आप और आप का बेटा दोनों रहेंगे। तीसरा कोई और नहीं।’
‘तो क्या पंचायत का प्रोग्राम बनाए हैं का जज साहब, कि इजलास लगवाएंगे?’ घनश्याम राय बिदक कर बोले।
‘देखिए घनश्याम जी अगर मामला निपटाना हो तो इस तरह बात मत करिए। मुझे फिर आने में दिक्क़त होगी। बोलिए आऊं कि आना कैंसिल करूं?’
‘अरे नहीं-नहीं जज साहब आप तो ज़रा से मज़ाक पर नाराज़ हो गए!’ घनश्याम राय जी हुज़ूरी पर आ गए।
‘आप जानते हैं कि हमारा आप का मज़ाक का रिश्ता नहीं है।’ रमेश पूरी सख़्ती से बोला, ‘आइंदा इस बात का ख़याल रखिएगा। और हां, अभी बात क्या हुई है मैं बिलकुल नहीं जानता। बासंगांव आ कर ही बात जानूंगा, समझूंगा और फिर कुछ कहूंगा। यह बात एक बार फिर जान लीजिए कि बातचीत में आप और आप का बेटा ही होगा। तीसरा कोई और नहीं। हां, अगर आप चाहें तो राधेश्याम की माता जी को ला सकते हैं। बस। और यह भी बता दूं कि हमारे यहां से भी मेरी बहन, मेरा एक भाई और अम्मा, बाबू जी ही होंगे। कोई और नहीं।’
‘जी जज साहब!’
‘और हां, बातचीत के लिए खुले मन से आइएगा। पेशबंदी वग़ैरह मुझे पसंद नहीं है पारिवारिक मामलों में।’
‘जी, जज साहब!’ कह कर घनश्याम राय घबरा गए। यह सोच कर कि अपने लड़के की नालायक़ी को वह कैसे कवर करेंगे? तिस पर जज साहब ने कह दिया था कोई पेशबंदी नहीं। जज की निगाह है तड़ तो लेगी ही पेशबंदी! फिर भी वह पेशबंदी में लग गए। बिना इस के चारा भी क्या था? पहली पेशबंदी उन्हों ने यह की कि अकेले ही बांसगांव जाने की सोची। और तय किया कि बहुत ज़रूरत हुई तो बेटे से फ़ोन पर बातचीत करवा देंगे। ज़रूरत हुई तो पत्नी से भी फ़ोन पर ही बातचीत करवा देंगे। पर जाएंगे अकेले ही। जो भी इज़्ज़त-बेइज़्ज़त लिखी होगी, अकेले ही झेलेंगे। फ़ोन पर संभावित सवालों के जवाबों को भी पत्नी और बेटे को रट्टा लगवा दिया। और समझा दिया कि विनम्रता पूरी बातचीत में रहनी चाहिए। बस एक बार जज की बहन आ जाए घर में फिर उस की सारी जजी के परखचे उड़ा देंगे। बस एक बार आ जाए।
तय कार्यक्रम के मुताबिक़ रमेश बांसगांव एक दिन पहले ही पहुंच गया। तरुण भी आ गया था सपत्नीक। यह उस ने अच्छा किया था। मुनमुन को समझाने में आसानी रहेगी। ऐसा उस ने सोचा। पर जब मुनमुन की ससुराल और उस के पति की तफ़सील अम्मा ने रोते बिलखते बताई तो उस के पांव के नीचे से ज़मीन खिसक गई। वह हिल सा गया। सोचा कि दुनिया भर को न्याय का पाठ पढ़ाने वाला वह कैसे तो अपनी ही बहन के साथ ही अन्याय कर बैठा। ज़रा सी आलस, ज़रा से अहंकार और ज़रा सी व्यस्तता ने घनश्याम राय के परिवार की थाह नहीं लेने दी। बहन के वर की जांच पड़ताल नहीं करने दी। वृद्ध बाबू जी के भरोसे सब छोड़ दिया। और इस चार सौ बीस घनश्याम राय के झांसे में सब आ गए। सारे भाई सबल हो कर भी कैसे तो अपनी बहन को अबला बना बैठे? सोच कर उस ने अपने को धिक्कारा। पर अब क्या हो सकता था इस पर उस ने सोचना शुरू किया। आख़िर इसी में ही कोई विकल्प तलाशना था। और कोई चारा नहीं था। रात भर वह ठीक से सो नहीं सका। सुबह उठ कर उस ने सोचा कि क्यों न घनश्याम राय को अभी आने के लिए मना कर दे और कह दे कि वर्तमान हालात में बातचीत मुमकिन नहीं। फिर कुछ सोच कर टाल गया। बाबू जी से इस बारे में बात की तो वह बिलख कर रो पड़े। बोले, ‘बेटा हमारी बुद्धि कुछ काम नहीं कर रही। बूढ़ा हो गया हूं। ग़लती हो गई जो मुनमुन को उस नरक में ब्याह दिया। उस वक्त ब्याह तय कर देने के दबाव में आंख पर जल्दी की पट्टी बंध गई थी। कुछ जांच-पड़ताल भी नहीं कर पाया। लड़का इतना नाकारा निकल गया। मैं घनश्याम राय की चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गया। तुम्हीं लोगों से तभी कह दिए होता कि मेरे वश का नहीं है शादी-ब्याह ढूंढना तो शायद यह दिन नहीं देखना पड़ता। मैं भी बेटों के साथ अहंकार की तकरार में ज़िद में आ बैठा। भूल गया कि परिवार में और वह भी बेटों के साथ अहंकार की गठरी बांधने से क्या फ़ायदा? छोटा थोड़े ही हो जाता? पर मति मारी गई थी, आज तो छोटा हो ही गया हूं। फूल सी बेटी की जिंदगी नरक बना कर।’ वह रोते हुए बोले, ‘अरे नरक में भी मुझे जगह नहीं मिलेगी!’
‘ऐसा मत कहिए बाबू जी!’ कह कर रमेश की आंखें भी भींग गईं, ‘हम सभी इस पाप के भागीदार हैं।’ वह बोला, ‘आप अनुभवी हैं कोई रास्ता तो निकालने की सोचिए ही।’
‘मुझे तो कुछ सुझाई नहीं पड़ता। न सोच पा रहा हूं। तुम बड़े बेटे हो, तुम्हीं सोचो।’
‘चलिए घनश्याम राय को आज बुलाया हुआ है। बातचीत करते हैं। शायद कोई रास्ता निकल जाए!’
‘अरे उस नालायक़, चार सौ बीस को बुलाने की क्या ज़रूरत थी?’ मुनक्का राय बोले, ‘उस पापी को तो मैं ने फिर घर आने से ही मना कर दिया था। वह भला क्या आएगा चोर कहीं का!’
‘आएगा, आएगा!’ रमेश बोला, ‘उस ने मुझे फ़ोन किया था और गिड़गिड़ा रहा था। तो मैं ने बातचीत के लिए उसे और राधेश्याम को बुला लिया है। बाप बेटे दोनों को।’
‘चलो अब तुम ने बुला लिया है तो और बात है। नहीं पिछली बार आया था तो मैं ने तो उसे फिर आने के लिए मना कर दिया था।’ रमेश ने फिर अम्मा और मुनमुन को भी समझाया कि, ‘रास्ता तो देखो कोई न कोई निकालना ही पड़ेगा।’ फिर उस ने बताया कि, ‘घनश्याम राय और राधेश्याम राय को बातचीत के लिए बुलाया है। थोड़ी देर में दोनों आते ही होंगे।’
मुनमुन और अम्मा दोनों ही चुप रहीं। कुछ बोलीं नहीं। घनश्याम राय तय समय पर आए और अपनी योजना के मुताबिक़ अकेले ही आए। बेटे को नहीं लाए। रमेश ने पूछा भी कि, ‘राधेश्याम कहां रह गए?’
‘असल में उस की तबीयत ख़राब हो गई है।’ घनश्याम राय ने बहानेबाज़ी की।
‘फिर तो बात नहीं हो पाएगी घनश्याम जी!’ रमेश बोला, ‘मूल समस्या तो राधेश्याम से ही थी, वही नहीं है तो बात क्या होगी?’
‘आप को जो कुछ पूछना हो वह फ़ोन से ही पूछ लीजिएगा उस से।’ घनश्याम राय ने चिरौरी की।
‘फ़ोन से ही जो बात निपटने वाली होती तो मैं बांसगांव क्यों आता?’ रमेश ने तल्ख़ हो कर कहा।
‘अब क्या करें उस की तबीयत ख़राब हो गई अचानक।’ घनश्याम रिरियाये, ‘आप बस बहू को विदा कर दीजिए अब कोई समस्या नहीं आएगी। मैं वचन देता हूं।’
‘आप के वचन की कोई क़ीमत भी है? कोई मतलब भी है?’ रमेश ने पूछा, ‘आप तो बता चुके हैं कि वह पी.सी.एस. की तैयारी कर रहा है? कैसे यक़ीन करें आप के वचन पर?’
‘देखिए जज साहब जो बात बीत गई उस को बार-बार दुहराने से कोई फ़ायदा तो अब है नहीं। आगे की सुधि लीजिए।’ घनश्याम राय ने फिर मनुहार की। बातचीत शुरू हुई। तय हुआ कि घनश्याम राय मुनमुन पर हुई ज़्यादतियों पर सफ़ाई दें और कि मुनमुन से जो भी शिकायत हो वह भी बताएं। घनश्याम राय ने पहले तो कहा कि, ‘इन सब विवादों को सिरे से भूल कर नए सिरे से बात शुरू करें और हमारी बहू को हमारे साथ विदा करें। आगे कोई तकलीफ़ नहीं होगी। न ही कोई शिकायत।’
‘नहीं ऐसा तो नहीं हो सकता घनश्याम जी!’ रमेश ने कहा, ‘आप को बिंदुवार जवाब देना होगा।’
‘देखिए यह कोई अदालत नहीं है जज साहब कि गवाही, जिरह और बहस हो। पारिवारिक मामला है और इसे पारिवारिक ढंग से हल करना चाहिए।’
‘मैं ने कब कहा कि अदालत है?’ रमेश ने कहा, ‘अगर आप का बेटा लुक्कड़ और पियक्कड़ है, आप के घर में हमारी बहन को भरपेट भोजन नहीं मिल सकता, आप की पत्नी और बेटी मेरी बहन से उचित व्यवहार करने के बजाए तंग करेंगी, ताने मारेंगी तो ऐसे में इन समस्याओं का कोई हल निकाले बगै़र आप के साथ हम अपनी बहन को विदा नहीं कर सकते।’
‘देखिए जज साहब आप लोग बार-बार भोजन-भोजन का पहाड़ा पढ़ रहे हैं तो यह बताइए कि अगर सगी पट्टीदारी में आप के यहां गमी हो जाए तो आप के यहां क्या दोनों टाइम भोजन बनेगा? नहीं न?’ घनश्याम राय बोले, ‘तो दुर्भाग्य से उन दिनों गौने के दो दिन बाद ही हमारे चाचा का निधन हो गया। इस लिए यह दिक्क़त आई।’
‘चलिए माना पर फलाहार आदि की व्यवस्था तो होनी चाहिए थी?’
‘वह तो हुई ही थी।’
‘और राधेश्याम की लुक्कड़ई-पियक्कड़ई?’
‘यह एक ऐब उस में आ गया है। उस को हम सुधार रहे हैं।’ घनश्याम राय बोले, ‘कहीं उस को रोज़ी रोज़गार दिलवा देते आप लोग तो थोड़ी आसानी होती।’
‘और आप के घर में महिलाओं का व्यवहार?’
‘मैं उन को भी समझाऊंगा।’ घनश्याम राय बोले, ‘पर आप भी ज़रा कुछ हमारी बहू को समझा दीजिए।’
‘जैसे?’ रमेश ने पूछा।
‘कि अब वहां से शिक्षा मित्र की नौकरी नहीं चलेगी।’ घनश्याम राय बोले, ‘वह चाहती है कि रोज़ हमारे गांव से आप के गांव पढ़ाने जाए। यानी रोज़ ससुराल से मायके जाए। यह शोभा देगा भला?’
‘और?’
‘हमारे परिवार की महिलाओं को धौंसियाना बंद करे। कि हमारे भैया लोग तो ये, हमारे भैया लोग तो वो। हम यह करवा देंगे, हम वह करवा देंगे।?!’
‘और?’
‘यह भी बता दीजिए कि हमारी बहू को बीमारी क्या है जो संदूक़ भर के दवाई रखती है?’
‘और?’
‘और बस विदा कर दीजिए!’ घनश्याम राय हाथ जोड़ कर बोले, ‘बड़ी बदनामी हो रही है, पट्टीदारी, नातेदारी में। सिर उठा कर चलना मुश्किल हो गया है। जो मन सो कोई सवाल पूछ लेता है बहू के बारे में तो जवाब देते नहीं बनता।’
‘अच्छा, ज़रा राधेश्याम से फ़ोन पर बात करवाइए।’ रमेश ने घनश्याम राय से कहा, ‘और हां, मोबाइल का स्पीकर आन कर लीजिए ताकि बातचीत सभी लोग पूरी तरह सुन सकें।’
‘जी जज साहब!’ घनश्याम राय बोले। हालां कि मोबाइल का स्पीकर आन करने की बात पर वह थोड़ा सकपकाए। पर मोबाइल से राधेश्याम का फ़ोन मिलाया, स्पीकर आन किया। उधर से फ़ोन घनश्याम राय की पत्नी ने उठाया। घनश्याम राय ने कहा कि, ‘राधेश्याम से ज़रा बात कराओ। जज साहब बात करेंगे।’
‘पर उस की तो तबीयत ख़राब है न?’
‘हां, है। पर बात कराओ!’
‘आप तो जानते हैं कि......।’ घनश्याम राय की पत्नी थोड़ा लटपटाईं।
‘मैं कह रहा हूं कि बात कराओ!’ डपटते हुए घनश्याम राय बोले।
‘जी कराती हूं।’ कह कर फ़ोन उन्हों ने राधेश्याम को दे दिया। वह बोला, ‘हलो कौन?’
‘हां, बेटा तुम्हारा बाबू जी बोल रहा हूं लो तुम से जज साहब बात करना चाहते हैं?’ कह कर मोबाइल उन्हों ने जज साहब के हाथ में दे दिया।
‘कौन जज?’ उधर से राधेश्याम पूछ रहा था।
‘अरे भइया राधेश्याम जी मैं बांसगांव से रमेश बोल रहा हूं।’
‘अच्छा-अच्छा मेरा साला जज!’ उधर से बहकी-बहकी आवाज़ में राधेश्याम बोला, ‘आई लव यू जज साहब! आई लव यू!’
आते-आते अमेरिका को अब अक़ल आने लगी है। पहली बार उसने पाकिस्तानी की नब्ज़ पर उंगली धरी है। उसके अन्तरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग को पहली बार पता चला है कि पाकिस्तान की असली बीमारी क्या है। इस अमेरिकी आयोग ने 139 पृष्ठ की अपनी ताजा रपट में कहा है कि पाकिस्तानी स्कूलों की पाठ्य-पुस्तकें उसके बच्चों के दिमागों में ज़हर घोलती हैं। बचपन से ही पाकिस्तानी बच्चों को हिन्दू-घृणा और भारत-भय का पाठ पढ़ाया जाता है। छोटे-छोटे बच्चों को जो किताबें पढ़ाई जाती हैं, उनमें यह तो लिखा ही होता है कि हिन्दू घोर इस्लाम-विरोधी याने काफिर होते हैं और काफिरों की हत्या से सवाब (पुण्य) मिलता है। उन किताबों में बच्चों के दिमाग में यह डर भी बिठा दिया जाता है कि भारत पाकिस्तान को तोड़े बिना चैन से नहीं बैठेगा।
ऐसी किताबें पढ़-पढ़कर ही जब ये बच्चे जनरल जिया या मुशर्रफ या नवाज़ शरीफ या बेनज़ीर बनते हैं तो उन्हें समझ में नहीं आता कि वे भारत के साथ कैसा बर्ताव करें। जुल्फिकार अली भुट्टो तो कह दिया करते थे कि हम भारत से हजार साल तक लड़ेंगे। इसे ही उनके पहले और बाद के नेता ‘‘पाकिस्तान की विचारधारा’’ कहने लगे। जिस देश की विचारधारा या बुनियाद ही इतनी नाकारा हो, वह खुद खुशहाल कैसे रह सकता है? इसी भारत-भय की ग्रंथि के कारण पाकिस्तान के नेताओं ने महान सिंधु-पुत्रों को पहले अमेरिकियों और फिर चीनियों के यहां गिरवी रख दिया। जिन्ना का पाकिस्तान महान राष्ट्र बन सकता था लेकिन वह एक दुमछल्ला बनकर रह गया। वह विश्व-आतंकवाद का गढ़ बन गया है। मियां की जूतियॉं मियां के सिर ही पड़ रही हैं। जिसे ज़िया-उल-हक ‘निजामे-मुस्तफा’ बनाना चाहते थे, वह ‘निजामे-शैतान’ बन गया है। सलमान तासीर जैसे उदार और सज्जन मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया जाता है। इस शैतानी जज़्बे का बीज स्कूली किताबों में ही बोया जाता है।
पाकिस्तान के बच्चों को यह नहीं बताया जाता कि भारत में पाकिस्तान से भी ज्यादा मुसलमान रहते हैं और उनकी हालत उनसे कहीं बेहतर है। विस्फोटों और आपसी झगड़ों में जितने मुसलमान भारत में मारे जाते हैं, उससे कई गुना ज्यादा पाकिस्तान में मारे जाते हैं। अगर भारत मुसलमानों का दुश्मन है तो मुसलमान लोग उसके राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधान न्यायाधीश, सेना-प्रमुख, केबिनेट सचिव, राज्यपाल और मुख्यमंत्री केसे बन जाते हैं? क्या वजह है कि जब कोई पाकिस्तानी पहली बार किसी भारतीय से मिलता है तो वह अचंभे में पड़ जाता है? वह भारतीय उसकी किताब के भारतीय से बिल्कुल भी मेल नहीं खाता। क्या वजह है कि किसी पराए देश में भारतीय और पाकिस्तानी लोग एक-दूसरे के घनिष्ट मित्र बन जाते हैं ? इसीलिए ज्यादा जरूरी है कि भारत और पाकिस्तान के आम लोगों में आपसी संपर्क बढ़े ताकि किताब के सच पर जीवन का सच और कागज के सच पर आंखों का सच भारी पड़ जाए।
सारे भारतवर्ष में 11 नवम्बर को शिक्षा-दिवस मनाया जाता है.शिक्षा-दिवस हम इसलिए मनाते हैं क्योंकि इस दिन हमारे देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद का जन्मदिन होता है.मौलाना आजाद भी जब एक छात्र थे तब उन्होंने खूब मन लगाकर पढ़ाई की.पढ़ने-लिखने में वे ऐसे होनहार थे कि ग्यारह-बारह साल की छोटी-उम्र में वे अपने से दोगुनी उम्र के लोगों के शिक्षक बन गए.वे बाद में पत्रकार बने,फिर देश की आजादी की लड़ाई में महात्मा गाँधी के साथी बने और जब देश आजाद हुआ तो उन्होंने शिक्षा मंत्री के रूप में एक ऐसे भारत का सपना देखा जहाँ हर नागरिक पढ़ा-लिखा हो.शिक्षा एक ऐसा जादू है जिससे हम किसी भी मनचाही वस्तु को प्राप्त कर सकते हैं.शिक्षा का अर्थ है----सीखना.शिक्षा द्वारा मनुष्य में सच बोलना,अंहिसा,चोरी न करना,दूसरों के लिए प्रेम,सहानुभूति,उदारता,विनम्रता व सहनशीलता आदि जैसे गुणों का विकास होता है .शिक्षा मानव जीवन को शांत और सुखी बनाती है .यदि हम बच्चों को शिक्षा नहीं देंगे तो वे अच्छे नागरिक नहीं बनेंगे.
शिक्षा के अभाव में मनुष्य पशु के समान है और उसमें ईर्ष्या ,वैर,कलह आदि के भाव पैदा हो जाते हैं.बच्चों का जीवन कच्चे घड़े के समान होता है.हम उन्हें जैसी शिक्षा और संस्कार देंगे वे वैसे ही बन जाएंगे.इसलिए यदि माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देंगे तो ही वह अच्छे और योग्य नागरिक बनकर देश के विकास में सहायक सिद्ध होंगे.सभी बच्चों को शिक्षित करने के लिए भारत सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान भी चलाया है .ताकि देश का हर बच्चा शिक्षा जैसे मौलिक अधिकार से वंचित न हो.शिक्षा एक ऐसा धन है जिसे कोई चुरा नहीं सकता .शिक्षित व्यक्ति कभी भूखा नहीं मरता.वह कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अपना जीवनयापन कुशलता से कर सकता है.अनपढ़ता किसी भी देश के लिए सबसे बड़ा कंलक और अभिशाप होता है क्योंकि अनपढ़ व्यक्ति का नैतिक ,मानसिक व शैक्षणिक विकास नहीं हो पाता जिसके अभाव में वह अन्धविश्वास और रूढ़िवादिता जैसी कुरीतियों में फसता चला जाता है और लोग उसे मूर्ख समझकर ठगते हैं व उसका शोषण करते हैं.शिक्षा हमारे लिए इसलिए जरूरी है क्योंकि इसके द्वारा मनुष्य में आत्मविश्वास,आगे बढ़ने की उमंग ,कुछ करने का जज्बा और अपनी मंजिल को पाने की इच्छा होती है.
आज हम महात्मा गाँधी ,इन्द्रिरा गाँधी ,जवाहरलाल नहेरू आदि का नाम बहुत आदर -सम्मान से लेते हैं जिन्होंने अपनी शिक्षा द्वारा ही भारत का उचित मार्ग-दर्शन किया है .किसी भी देश की उन्नति और विकास का आधार शिक्षा ही है .यही कारण है कि रूस,अमरीका,जर्मनी जैसे विकसित देश विश्व में प्रथम स्थान पर हैं.शिक्षित व्यक्ति न केवल अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति जागरूक होता है बल्कि वह दूसरों को भी आगे बढ़ने की भी प्रेरणा देता है ,जबकि अनपढ़ व्यक्ति स्वयं तो दुखी होता ही है और वह दूसरों के लिए भी दु:ख और परेशानी का कारण बनता है.शिक्षा के अभाव में मनुष्य अन्धे के समान होता है क्योंकि उसकी आँखों में ज्ञान की ज्योति नहीं होती और ज्ञान के अभाव में वह अपने भविष्य के बारे में कुछ नहीं सोच पाता और जीवन-भर दर-दर की ठोकरे खाता है .
किसी नेता के उबाऊ"" ,दिमाग खाऊ भाषण से भी लंबा एवं आश्वासन के किसी बड़े आंगन से भी चौड़ा हाल, सामने ऊंचे मंच पर महागुरु लंबी दाढ़ीवाले संत भ्रष्टाचारीजी महाराज विराजमान हैं| भ्रष्टाचरण की विद्या ग्रहण करने आये सैकड़ों विद्यार्थी अपने आसनों पर ठीक मंच के सामने अवस्थित हैं| बड़े अनुशासन एवं विपुल शांति से बैठे ये भक्तगण संत भ्रष्टाचारी जी को शीशनत होकर नमन करते हैं| संतजी आशीर्वाद स्वरूप उठे अपने दोनो हाथों से अपने प्रिय शिष्यों का अभिवादन स्वीकार करते हैं| यह हृदय विदारक दृष्य है भ्रष्टाचार की योग पाठशाला का| "मेरे प्यारे देश के भावी भ्रष्टाचारियो ग्लोबलाइस्ड भारतमाता के उपभोक्तावादी,प्रगतिवादी अवसरवादी और तथा कथित समाजवादी संस्कारों में जीने की तीव्र आकांक्षा रखने वाले मेरे प्यारे चमचों सिलवर स्पूनों..आज हम आपको भ्रष्टाचार के शिष्टाचार के प्रथम अध्याय से अवगत करायेंगे" संतजी ने अपने ओंठों पर मधुर मुस्कान लाकर ऐसे मदहोश करने वाले वचन कहे| हां तो भक्तो सर्व प्रथम पदमासन लगाकर बैठ जायें|जो भक्त भ्रष्टासन लगाने में पहले से ही पारंगत हैं वे भ्रष्टासन लगाकर बैठ सकते हैं|किंतु जो भ्रष्टाचार करने में बिल्कुल शून्य हैं वह पदमासन ही लगायें|भ्रष्टाचार के सूत्रों का ग्यान होने पर भ्रष्टासन अपने आप सिद्ध होने लगेगा| मेरे प्रिया शिष्यों अब आप लोग दोनों आंखें बंद कर लें|ध्यान दोनों आंखों के मध्य बिंदु पर रखें|अब कल्पना करें कि आपके चारों ओर भ्रष्टाचार का अथाह सागर लह लहा रहा है|आपके अगल बगल ऊपर नीचे सब तरफ भ्रष्टाचार की लहरें संव्याप्त हैं|उन लहरों पर हरे हरे कड़क कड़क नोट सवार हैं,सौ सौ के नोट दो दो सौ के नोट तीन तीन सौ के नोट चार चार सौ के नोट और पांच पांच सौ के नोट हवा में उड़ रहे हैं|सारा वायुमंडल नोटमय है|आप यह न सोचें कि दो सौ तीन सौ और चार सौ के नोट तो होते ही नहीं है|यदि आपकी संकल्प शक्ति तीव्र होगी,इच्छा शक्ति दृढ़ होगी और नोटों को हज़म करने की शक्ति एवं उदरस्थ करने की क्षमता आपमें होगी तो सरकार को दो सौ तीन सौ और चार सौ के नोट छापने ही पड़ेंगे|सरकार तो क्या सरकार के पिताश्री को भी छापना पड़ेंगे|आखिर भ्रष्टाचारियों की इच्छा पूर्ण करना सरकार का ही तो दायित्व है|बिना भ्रष्टाचारियों की इच्छा पूर्ण किये सरकार कितने दिन कुर्सी पर बनी रह सकती है|हां अब संकल्प शक्ति के साथ श्वांस भीतर भरें|रीढ़ की हड्डी हिंदुस्तानी वोटर की तरह सीधी रखें| अब कल्पना करें की वायुमंडल में तैरते कड़क कड़क नोट भीतर खींची गई श्वांस के साथ नासिका में प्रवेश कर रहे हैं,गले के नीचे उतर कर आपके उदर में समा रहे हैं ऎवं नाभि चक्र पर प्रहार कर रहे हैं| नाभि केंद्र में तेजोमय प्रज्वलित अग्नि की कल्पना करें|दृढ़ इच्छा शक्ति विश्वास और श्रद्धा के आघात एवं हार्दिक कठोरता के प्रहार नाभि चक्र पर करें|अब कल्पना करें कि नाभि चक्र में अवस्थित चिंगारी दावानल बन रही है एवं प्रविष्ठ नोट उसमें जलकर भस्म हो रहे हैंआपकी हाज़मा शक्ति बढ़ रही है |हज़ारों लाखों ही नहीं करोड़ों अरबों रुपये पचा जाने में भी आप सक्षम हो रहे हैं|अब श्वांस रोककर कुंभक करें|कल्पना करें की नाभि चक्र में हज़म किये जमा नोट एक जगह एकत्रित हो रहे हैं|आप अज़गर बनकर उनकी रखवाली कर रहे हैं|अब आप श्वांस को बाहर निकाल दें और कल्पना करें कि श्वांस के साथ आपके शरीर में उपस्थित ईमान, सत्य,प्रेम,करुणा ,दया, मानवता,न्याय,और सिद्धांत इत्यादि सभी दुर्गुण बाहर जा रहे हैं|आपकी आत्मा में किंचित मात्र ईमान बाकी नहीं बचा है|आप केवल बेईमान हैं,भ्रष्टाचारी हैं,पदलोलुप हैं,निष्ठुर हैं,अवसरवादी हैं,स्वार्थी हैं,एवं केवल अपने और अपने लिये जी रहे हैं|सत्य को आपने ऐसे त्याग दिया है जैसे सांप केंचुली को त्याग देता है|आपके बाहुओं में बल आ गया है,आप बाहुबली हो रहे हैं|गहरी सांस लें लंबी सांस छोड़ें और उपरोक्त विचारों को बार बार दुहरायें|एक सप्ताह के अभ्यास से ही आपके रोम कूपों से जय भ्रष्ट जय भ्रष्ट की मधुर ध्वनि गुंजायमान होने लगेगी|आपको अनुभव होने लगेगा की आपका शरीर नोटों के महासागर में तैर रहा है|उन नोटों से आप अपने परिवार की नैया पार लगा रहे हैं|आप नोट खा रहे हैं आप नोट पी रहे हैं|आपकी पत्नी नोटों का मुरब्बा डाल रही है|आपकी प्रेमिकायें नोटों का अचार डाल रहीं हैं|आपके बच्चे नोटोंकी फुटवाल खेल रहे हैं|सारा वातावरण नोटमय है|बैड रूम,ड्राइंग रूम,टायलेट,किचिन,अलमारियां,पोर्च और आंगन नोटों से अटे पड़े हैं|यह प्रणायाम क्रिया जिसे आगे चलकर हम नोटायाम के नाम से जानेंगे आपको दिन में दो बार पांच से दस मिनिट तक करना है|जिन्हें नोट खाने की अत्यंत और गहन लालसा हो,जिन्हें एक दो करोड़ रुपये बहुत कम लगते हों और जो अरबों खरबों डालर खाना चाहते हो वह इस क्रिया को अभ्यास द्वारा दो से तीन घंटे तक कर सकते हैं|किंतु कमजोर प्रकृति वाले और डरपोंक कायर व्यक्ति इसे ज्यादा देर तक न करें क्योंकि उनके पेट फूट जाने का खतरा है,रेड पड़ सकती है,भारतीय खुफिया विभाग एवं सी बी आई वाले पेट में घुसकर नोट ज्ब्त कर सकते हैं|शास्त्रों में लिखा है कि उतना ही खाओ जितना हज़म कर सको,संतोषम् परम् सुखम्|सतत अभ्यास करने से और नियमित नोटायाम करने से हाज़मा शक्ति में वृद्धि होगी,विचार दृढ़ होंगे और संकल्प शक्ति लोहे की तरह ठोस हो जायेगी|धीरज रखें,धीरे धीरे खायें,एक साथ खाना कुशंकाओं को जन्म देता है|लोगों की दृष्टि पड़ती है,पड़ोसी शिकायत करने लगते हैं,उधार मांगने वालों का तांता लग जाता है और मालिकों की भृकुटी टेड़ी होने लगती है|इसीलिये हे शिष्यो मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करना|बस छ्ह माह के अभ्यास से ही आप इतने सक्षम हो जायेंगे कि जितना खाओ खा सकते हैं,पड़ोसी को खा सकते हैं मोहल्ले को खा सकते हैं,संपूर्ण शहर को खा सकते हैं,अपने जिले को खा सकते हैं,प्रदेश को खा सकते हैं,और चाहें तो सारे देश को पचा सकते हैं|बस शर्त यही है की क्रिया क्रमबद्ध हो,शालीनता से हो और नियमित हो|आज जो देश और प्रदेशों में मंत्री बने बैठे हैं वे सभी हमारे शिष्य हैं,इसी पाठशाला से निकले हैं,कठोर साधना की है,सालों नोटायाम का अभ्यास किया है तब कहीं जाकर इस मुकाम पर पहुंचे हैं|उन्होंने धूप में बाल सफेद नहीं किये हैं|मेरी इसी यग्यशाला की भ्रष्टाचार की हंडी में अनवरत मुँह काला किया है इसीलिये अरबों डालर खाने के बाद भी किसी का हाज़मा नहीं बिगड़ा,सब स्वस्थ हैं तंदुरुस्त हैं|पुलिस पास में नहीं फटक सकती और सी बी आई वाले इज्जत से सेल्यूट ठोकते हैं|पुरातन शास्त्रों में,पतंजली योग में आसन एवं प्रणायाम की महिमा का बखान हुआ है और बड़ी प्रशंसा हुई है|नोटायाम प्रणायाम की ही संवर्धित,संशोधित,परिष्क्रित वैश्वीकृत एवं आधुनिक स्वरूप है|जहां प्रणायाम में प्राणों के आने जाने मतलब श्वांसों के आवागमन पर नियंत्रण होता है नोटायाम में नोटों के आने जाने पर नियंत्रण करना करना पड़ता है|प्राचीन काल में प्राणायाम अत्यंत उपयोगी होते थे क्योंकि लोग हवा यानि शुद्ध प्राण वायु खाकर ही आलीशान वैभवपूर्ण जीवन जी लेते थे और भोजन पानी एवं एश- ओ आराम की सामग्री की उन्हें आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी| किंतु इस ग्लोब्लाइस्ड,भौतिकवादी,अर्थवादी और उत्तराधुनिक युग में मात्र हवा खाकर जीवन नहीं जिया जा सकता|पेट भरने के लिये और शरीर की क्षुधा शांत करने के लिये नोट खाना अत्यंत आवश्यकता है|इसलिये आधुनिक ऋषियों ने,सियासत के संतों ने माफिया के महा मुनियों ने और तस्करी के तपस्वियों ने मिलकर अति उच्चतम विधियों द्वारा प्राणायाम को नोटायाम में परिवर्तित कर दिया है|नोटायाम का शाब्दिक अर्थ है नोटों के आने जाने पर संपूर्ण नियंत्रण|आत्मा एवं शरीर का समग्र नियंत्रण जब नोटों के आवागमन पर हो जाता है तो ऐसे महान दिव्य एवं अलौकिक शक्ति प्राप्त साधकों को उल्लू पर सवार पुराने ढर्रे वाली आउट डेटेड लक्ष्मी की कृपा पर निर्भर नहीं रहना पड़ता|लक्ष्मी स्वयं ऐसे साधकों के समक्ष हाथ पसारकर कुछ मिलने की आशा में खड़ी रहती है|ऐसे नर श्रेष्ठ एवं साधक शिरोमणी अरब पति,खरबपति होते हैं|उन्हें लक्ष्मी पति होना आवश्यक नहीं होता|किंतु यह तथ्य ध्यान में रखना पड़ेगा की साधक को सफलता तभी मिलेगी जब उसकी संकल्प शक्ति दृढ़ हो ,ल्क्ष्य प्राप्ति के प्रति संपूर्ण एकाग्रता एवं श्रद्धा हो और समर्पण हो|इच्छा शक्ति,एकाग्रता विश्वास एवं श्रद्धा ही सफलता का सूत्र है|नोटायाम केवल शारीरिक एवं एंद्रिक क्रिया भर नहीं है,इसमें भावों और भावनाओंका संमिश्रण अत्यंत आवश्यक है|नियमित श्वांस उच्छवांस एवं लय बद्ध एवं ताल बद्ध श्वांसोंके आवागमन से नोटायाम अति शीघ्र सिद्ध होता है|नाभि चक्र पर लय बद्ध आरॊह अवरोह क्रम में नोटों के प्रहार से नाभि चक्र आनन फानन जाग्रत हो जाता है|"............मैं देख रहा हूं कुछ शिष्यों को वायुमंडल से अलग अलग वेराइटी के बिखरे नोटों को नासिका द्वारा भीतर खीचने में कष्ट हो रहा है|वे अलग अलग तरह के नोटों को कल्पना में नहीं पकड़ पा रहे हैं|मैं उनसे आग्रह करूंगा कि वे अपनी सुविधा के अनुसार भीतर खींचे गये प्रत्येक श्वांस के साथ एक बोरा नोट पेट के भीतर जाते हुए अनुभव करें|श्वांस रोककर कुंभक करते हुये यह सोचें कि यह बोरे भर नोट पेट में खाली हो रहे हैं|श्वांस बाहर निकालते समय खाली बोरे को नाक के रास्ते बाहर जाता हुआ महसूस करें|एक बार फिर से समझ लें|श्वांस के साथ नोट भीतर खीचने की क्रिया को पूरक कहते हैं|नोट पेट में खाली करने की क्रिया को कुंभक कहते हैं एवं खाली बोरे नाक से बाहर निकालने की क्रिया को रेचक कहते हैं|नोटायाम के आधुनिक मनिषियों द्वारा लिखे गये शास्त्रों के अनुसार संशोधित परिभाषा के अंतर्गत तिजोड़ी एवं स्विस बैंकों में नोटों को भरने की क्रिया को पूरक कहते हैं|तिजोड़ी में नोटों को रोककर रखना आंतरिक कुंभक,तिजोड़ी से नोटों को निकालना रेचक एवं नोटों को अपने हित लाभ के लिये उपयोग में लाना वाह्य कुंभक कहलाता है|नेता एवं मंत्री ब्रांड के के लोग पांच साल तक पूरक एवं आंतरिक कुंभक करते हैं और चुनाव आता है तो वे एक ही बार में रेचक एवं वाह्य कुंभक करके नोटों को वोटों में तब्दील कर लेते हैं|फिर पांच साल तक वोटों की टकसाल में नोट छपते रहते हैं फिर पूरक द्वारा नेताओं की तिजोड़ी में एकत्रित होते रहते हैं| यही विधि का विधान है और यही आधुनिक भारत का संविधान भी है| आज बस इतना ही|"
रितु की मम्मी ने जब हर साल की तरह इसबार भी गैरेज से लाकर अपना क्रिसमस ट्री का डिब्बा खोला तो रितु उसके अन्दर झिलमिल करते सजावट के सामान को देखकर ताली बजा-बजाकर हंसने लगी। वह जानती थी कि उसका क्रिसमस ट्री पूरे मोहल्ले में इसबार भी सबसे सुन्दर होगा । पौला, नताशा, अपनी सभी सहेलियों को बुलाएगी वह , फिर वे इसी ट्री के नीचे बैठकर कल दिन भर खेलेंगी-ऐसा मन भी बना लिया था उसने और कल दिन में आने की तुरंत ही अपने मित्रों को दावत भी दे डाली थी।
मम्मी हंसकर बोलीं, ‘आओ पहले इसे खड़ा करके सजा तो लें फिर ही तो खेल पाओगी तुम इसके नीचे।‘ रितु खुशी खुशी तुरंत ही जा पहुंची मम्मी की मदद के लिए। अभी वह मुश्किल से पहली माला और एक रेनडियर ही लटका पाई थीं कि फोन की घंटी बज उठी। हालांकि धंटी रितु ने सुन ली थी और वह फोन उठाने दौड़ भी चुकी थी ।
' हलो मामा जी. तो आप यह क्रिसमस हमारे साथ बिता रहे हो, अगले इतवार को यहाँ पहुँच जाओगे। जी मम्मी यहीं हैं। अभी देती हूँ।'
बातचीच सुनते ही मम्मी मारे खुशी के ऐसा हड़बड़ाईं और फोन लेने की को ऐसे लपकीं कि रितु की आँखों के आगे ही स्टूल जिसपर वह खड़ी थीं डांवाडोल हुआ और मम्मी गिर पड़ीं। सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि रितु दौड़कर स्टूल को पकड़ तक न सकी। अगले पल वे दर्द से कराह रही थीं। आनन-फानन पापा मम्मी को लेकर अस्पताल गए और एक्सरे के बाद पता चला कि मम्मी की बाँए पैर और हाथ की हड्डियां दो-दो जगह से टूट गई हैं। पूरा दिन उदासी और भागदौड़ में ही बीता। रितु बारबार सोचती- काश् उसने क्रिसमिस ट्री निकालने की मम्मी से जिद न की होती , अभी तो पूरे बीस दिन बाकी थे क्रिसमस में। काश् वह फोन जब मम्मी स्टूल से उतर जातीं तब आता। पर होनी को कौन टाल पाता है। अब नए-नए डेकोरेशन लगाना तो दूर , मम्मी तो अपनी जगह से हिलने लायक भी नहीं रही थी।
अगले दिन जब उसकी सहेलियाँ पौला और नताशा आईं तो सबको ही बहुत दुख हुआ रितु की मम्मी को देखकर। बच्चों के लिए कुछ न कर पाने की उदासी उनके पूरे चेहरे पर फैली हुई थी। तब उन्होंने निश्चय किया कि वे सब मिलजुलकर रितु की मम्मी का सबसे अच्छा क्रिसमस दिन मनवाएंगी। तुरंत ही वे सब मिलजुलकर उस ट्री को ऐसा सुन्दर सजा गईं , जैसा कि वह पहले कभी सजा ही नहीं था , यही नहीं इसबार तो क्रिसमस केक और क्रैकर वगैरह भी रितु ने खुद ही अपनी सहेलियों के साथ मिलकर बनाए। क्रिसमस के दिन जब केक ट्रे में सजाकर रितु मम्मी-पापा और मामा के सामने लाई तो तीनों को ही विश्वास नहीं हुआ कि उनकी नन्ही-सी रितु इतनी बड़ी, इतनी समझदार हो गई है। सबके चेहरे गर्व से दमक रहे थे। और रितु तो खुशियों के सातवें आसमान पर जा बैठी थी। उसका क्रिसमस ट्री सच में इसबार सबसे सुन्दर था और उस की रंगबिरंगी फेयरी-लाइट कमरे में बैठी हर नम आँख के पानी में खुशहाल सपने सी ही झिलमिल कर रही थी। रितु ने मम्मी को केक ही नहीं आज खाना भी तो अपने हाथों से ही खिलाया था।
प्यार कैसे हर मुश्किलों से उबारता है, हिम्मत और समझ देता है नन्ही रितु अपनी पूरी निपुणता और सफलता के साथ इसकी मिसाल बन चुकी थी ।
मम्मी की तो आखें ही नहीं हटती थीं रितु के चेहरे से। रितु वाकई में बहुत प्यारी और बहुत समझदार लग रही थी...क्रिसमस ट्री पर लटकी फेयरी से भी ज्यादा ।
-शैल अग्रवाल
सवाल
प्यारा- प्यारा चन्दा मामा लिये साथ में आता तारे । पंख लगाकर सूरज आता रोज़ सवेरे पास हमारे । तितली को सुन्दर रंगों के ये कपड़े पहनाए किसने ? ठण्डी- ठण्डी हवा चलाई सुन्दर फूल खिलाए किसने ? रामेश्वर कम्बोज ' हिमांशु '