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                                               सोच और संस्कारों की सांझी धरोहर
                                                              लेखनी- मार्च 2013


                                                       ~फागुन के रंग ~


                                  " पलट पलट मौसम तके, भौचक निरखे धूप,
                                   रह रहकर चितवे हवा, ये फागुन के रूप।"
                                                             विनोद शुक्ल


                                                        इस अंक मेः   


कविता धरोहरःसूर्यकांत त्रिपाठी निराला । कविता आज और अभीः सत्यनरायण सिंह, शैल अग्रवाल, अनीता रश्मि, विजय सिंह, राजू रंजन प्रसाद, मोतीलाल राउरकेला, महेन्द्र भटनागर, प्रीत अरोड़ा, सत्येन्द्र श्रीवास्तव,  सरस्वती माथुर, रंजन विशदा, , पद्मा मिश्रा। माह विशेषः सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, केदारनाथ अग्रवाल, रचना श्रीवास्तव, नीरजा द्विवेदी, महेशचन्द्र द्विवेदी,  कुसुम सिन्हा, नरेश मेहता, तेजराम शर्मा, शैल अग्रवाल. सोम ठाकुर, चन्द्रकांता, दिनेश शुक्ल, भगवती चरण वर्मा।  माह की कवियत्रीः पुष्पिता अवस्थी । गीत और गजलः निदा फाजली।   चांद परियाँ और तितली में बाल कविताः प्रभुदयाल श्रीवास्तव। रंग रंगोलीः होली संबंधित कविता , गीत, हायकू, दोहे. लेख, व्यंग्य आदि रचनाओं का संग्रह।


शब्द चित्रः शैल अग्रवाल। मंथनः शैल अग्रवाल। ललित निबंधः नर्मदा प्रसाद उपाध्याय। कविता में इन दिनों- ओम निश्चल। कहानी धरोहरः फणीश्वरनाथ रेणु । कहानी समकालीनः अनिता रश्मि । स्मति शेषः हेमंत शर्मा। परिदृश्यः विजेन्द्र शर्मा। समीक्षाः विजेन्द्र शर्मा। आकलनः अर्जुन प्रसाद सिंह, देवी नागरानी। हास्य व्यंग्यः संजीव निगम। गुफ्तगूः हेमंत शर्मा। लहर लहर किनारेः शैल अग्रवाल। परिचर्चाः संगीता श्रीवास्तव, बी.एल. प्रजापति । सरोकारः  सीताराम गुप्ता।  चौपालः शालिनी माथुर। चांद परियाँ और तितली में बाल कहानीः प्रभुदयाल श्रीवास्तव।


माह की साहित्यिक खबरें और गतिविधियाँ लिए विविधा और वीथिका में वेदप्रताप वैदिक-अपनी भाषा से भेद क्यों ?

                                                                      और
माह की साहित्यिक खबरों से भरपूर  रंगारंग विविधा और वीथिका में  कबिरा खड़ा बाजार में वेद प्रताप वैदिक  ।


                   अगले माह के विषय की सूचना और विवरण 'अबाउट अस' पृष्ठ पर है।

                                       परिकल्पना,  संरचना, संपादनः शैल अग्रवाल

                              पत्रिका प्रति माह की पहली तारीख को परिवर्तित की जाती है।

                                             संपर्क सूत्र: editor@lekhni.net; shailagrawal@hotmail.com 

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                                                                                                                                                  अपनी बात

"बहुत दिनों से आँखों में एक सपना पल रहा था कि हम विश्व में फैले भारतीयों का ( भारतीयों का ही क्यों, हर उस इन्सान का जो सुन्दर और कल्याणकारी का हिमायती है) एक ऐसा मंच हो जहाँ से आप सभी (एक सी सोच वालों) तक पहुँचा जा सके, अपनी कही और आपकी सुनी व समझी जा सके--- प्रयास यही रहेगा कि विश्व की हर संस्कृति और साहित्य में जो जानने और समझने लायक जो है और हमारी पहुँच के अन्दर है, आपतक पहुँचे। जो बचाने लायक है, बचाया जा सके। आने वाली पीढ़ियों के मन से भेदभाव दूर करते हुए उन्हें कुछ ऐसा दिया जा सके जो नफरत और कुकर्मों की ढलान पर खड़ी मानवता के लिए ठोकर या फिसलन का नही, सहारे का काम करे और एक दूसरे से जोड़े--- संस्कृति और विचारों की एक ऐसी साँझी धरोहर --- एक ऐसी त्रिवेणी, जिसमें डुबकी मारते ही सारे गिले शिकवे भूलकर  हम एक दूसरे के पास आ सकें—कुछ पल के लिए ही सही सुखद सानिध्य पा सकें। कोई दावा नही कर रही कि पूरी तरह से ऐसा हो ही पाएगा परन्तु एक प्रयास तो है  ही और आप सबका,  अपने मित्रों का सहयोग भी चाहूँगी---इरादे नेक हों और अपनों का साथ हो तो रास्ते भी तो खुद ब खुद निकल ही आते हैं।
कोपल कोपल ही जब नव-जीवन संदेश ले आया है और बसंत ( हर्ष-उल्लास और रंग-रूप) की तैयारी में है तो इससे अच्छा और कौन सा समय हो सकता है लेखनी के इन्द्रजाल पर  आने या  प्रथम प्रयास के लिए----चाहती तो थी कि बसंत पंचमी के दिन माँ सरस्वती के आशीष के साथ पत्रिका इंद्रजाल पर आए, परन्तु  बसन्त पंचमी की कौन कहे अब तो होली  भी आकर चली गई---चलिए, जब जो हो जाए वही शुभ है। एकबार फिर जुड़ने का आग्रह करतेहुए और सहस्त्र शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर नारी के विभिन्न रूपों को उकेरती आपकी अपनी लेखनी--- आशीर्वाद और प्रतिक्रिया का इन्तजार रहेगा ---"


मित्रों, यह थी लेखनी के पहले अंक की 'अपनी बात'। अब जब इस सत्तरह मार्च को लेखनी छह वर्ष पूरे करती सातवें वर्ष में प्रवेश करने वाली है तो जाने क्यों आज भी इसी बात को दोहराने का मन कर रहा है क्योंकि इरादे आज भी वही हैं। उम्मीद है लेखनी के साथ-साथ यह अनुरोध, यह चाह भी अपनी पूरी ईमानदारी के साथ आप तक पहुंचेगी और आपका भरपूर स्नेह और सहयोग इसे मिलता रहेगा। 


नारी दिवस और मातृ दिवस दोनों ही तिथियाँ भी इसी मार्च के महीने में ही आती हैं और नारी के हर रूप , विशेषतः माँ का ध्रुवीय महत्व जीवन में क्या है, कहने की जरूरत नहीं, फिर भी शिलालेख-सी नारी की किस्मत आज भी जस-की-तस ही तो नजर आती है।  किसने लिखी इसकी किस्मत...क्या है इसकी अस्मिता... नारी पर आज भी इतना कुछ कहने को बाकी है कि अगला अप्रैल का पूरा अंक ही इस विषय पर रखने का मन बनाया है। विषय है -नारी अस्मिताः किसके शिलालेख ? इस अंक में तो हम बस रूप रंग और रस की बातें करेंगे। फागुन के रंग बिखेरे और संजोए हैं हमने आपके लिए। बसंत भले ही अभी पूर्णतः मादक और सुरभित न हुआ हो, पर सूखी पातहीन डालें अकुआने लगी हैं,  और जल्दी ही महीनो से सोई पड़ी डैफोडिल्स, क्रोकस और ट्यूलिप की गांठें रंगों का मेला लगा देंगी पातहीन, रंगहीन प्रकृति में।  देख रही हूँ, पीछे खड़े ओक के निवृस्त्र पेड़ पर चिड़िया का ताजा घोसला पताका बना कड़कड़ाती ठंड के बावजूद भी, बदलते मौसम का उद्घोष कर रहा है। सृजन और संरक्षण की इस एक और नई नवेली ऋतु में...बाहर बरफ हो या बासंती बयार, आइये लेखनी के इन पन्नों पर हम आप खेलते हैं फाग। मनाते हैं एकबार फिरसे वही रूप-रंग भरा रागमय महोत्सव...वही रंग और रूप जिसके बिना व्यंजन ही नहीं,  जीवन तक स्वादहीन है...जिसके हम-आप, हमारी संस्कृति और सभ्यता, सभी चिर दीवाने-से दिखते है।


सातवें वर्ष के इस प्रवेशंक में बदलता मौसम, बदलता मन,...चलें क्यों न पन्ने पलटकर देखते हैं क्या-क्या संजोया है नींद से जागती प्रकृति की तरह ही लुभाने और रसाप्लावित करने के लिए  लेखनी ने अपने पृष्ठों पर!


आपकी प्रतिक्रिया, आशीर्वाद  और स्नेह का इंतजार रहेगा।...


                                                                                                                                 -शैल अग्रवाल

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                                                                                                                                               बसंतः दो शब्द चित्र


                                                                                                                                                    - शैल अग्रवाल

                       बसंत

हवाओं का महकता  अहसास जाते शिशिर की तसल्ली है। वह जानता है कुछ चीजें नम अंधेरों से ही उग पाती हैं। सूरज की फैली किरणें और उष्मित धरती  हो या न हो , परन्तु आस भरी जिजीषा बीज रूप से अवश्य अंकुरित होती है।   अंधेरों से भरा दुख भले ही गर्भाशय हो उसका, बीज वह अतल गहराइयों में दबा और टूट पिस कर भी जिन्दा रहता है और रहेगा । पूरी शिद्दत के साथ खिलेगा बसंत में, शर्त बस यही है कि कुरेद-कुरेद कर बांझ न कर डालें ठंडी हवाएँ। इसी रंग रूप की आस और विश्वास के सहारे  ही तो महीनों जूझा और जीता है शिशिर निर्दयी  हवाओं  से।                                        









     अगले वसंत में

पुष्प-गुच्छों का रूप-गंध, शाखों के कोमल झूले, नव विहगों की चहचह , सबको छोड़ अकुलाता दूर जाता वह पात...विछोह उसके बस में नहीं, ना ही कोई वादा । 'ये छोटे-छोटे सुख ही तो चिता हैं जीवन के,'  अलग हो गया वह पल भर में ही सबसे, ' जो नियति है उससे कैसे बचा जा सकता है, भला! '                                अब बेचैनी नहीं एक संतुष्ट मुस्कान थी उसके शिथिल पड़ते होठों पर क्योंकि पता है उसे भी, जैसे कि पता है उस उदास तने को कि इन्ही जड़ो में तो सिमट जाएगी  उसकी मिट्टी  भी एक दिन और  तब फिर से  खिलखिलाएगा वह इन्ही शाखों पर अगले बसंत में...

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                                                                                                                                          कविता धरोहर
                                                                                                                                   सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

रँग गई पग-पग


रँग गई पग-पग धन्य धरा---
हुई जग जगमग मनोहरा ।

वर्ण गन्ध धर मधु मरन्द भर
तरु-उर की अरुणिमा तरुणतर
खुली रूप - कलियों में पर भर
स्तर स्तर सुपरिसरा ।

गूँज उठा पिक-पावन पंचम
खग-कुल-कलरव मृदुल मनोरम
सुख के भय काँपती प्रणय-कलम
वन श्री चारुतरा ।










सखि वसन्त आया


सखि, वसन्त आया ।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।

किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका,
मधुप-वृन्द बन्दी-
पिक-स्वर नभ सरसाया।

लता-मुकुल-हार-गन्ध-भार भर
बही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में वन-
यौवन की माया।

आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे,
केशर के केश कली के छुटे,
स्वर्ण-शस्य-अञ्चल
पृथ्वी का लहराया।












ज़ुही की कली


विजन-वन-वल्लरी पर
सोती थी सुहाग-भरी--स्नेह-स्वप्न-मग्न--
अमल- कोमल -तनु तरुणी--जुही की कली
दृग बन्द किये शिथिल--पत्रांक में
वासन्ती निशा थी
विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़
किसी दूर देश में था पवन
जिसे कहते हैं मलयानिल ।
आयी याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात
आयी याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात
आयी याद कान्ता की कमनीय गात
फिर क्या? पवन
उपवन-सर-सरित गहन -गिरि-कानन
कुञ्ज-लता-पुञ्जों को पार कर
पहुँचा जहाँ उसने की केलि
कली खिली साथ ।
सोती थी
जाने कहो कैसे प्रिय-आगमन वह?
नायक ने चूमे कपोल
डोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल ।
इस पर भी जागी नहीं
चूक-क्षमा माँगी नहीं
निद्रालस बंकिम विशाल नेत्र मूँदे रही--
किंवा मतवाली थी यौवन की मदिरा पिये
कौन कहे?
निर्दय उस नायक ने
निपट निठुराई की
कि झोंकों की झाड़ियों से
सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली
मसल दिये गोरे कपोल गोल
चौंक पड़ी युवती--
चकित चितवन निज चारों ओर फेर
हेर प्यारे को सेज-पास
नम्र मुख हँसी-खिली
खेल रंग प्यारे संग । 

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                                                                                                                                       कविता आज और अभी

  आते ही बसंत कंत,  मन हुआ फागुनी


गात सिहराय गया, शिशिर कंपाय गया।
जाते जाते चला सौंप, ऋतु आज फागुनी।।

मान अंत शिशिर का, उदित बसंत हुआ।
आते ही बसंत कंत, मन हुआ फागुनी।।

जग पहचाना लगे, कोई न बेगाना लगे।
संग ले अनंग जब, बही बयार फागुनी।।

गोरियों के प्रेम पगे, बैन से ही रीझें मीत।
जग है निहाल सत्य, गीत सुन फागुनी।। 

- सत्यनारायण सिंह  











     बसंत


ड्रेनपाइप में                                                                                                                                                                     चिड़िया के घोंसले
और शैनेल की शीशी में
महकती बेला चमेली
चित्रों में ही खिलते हैं 
पलाश और कचनार
यह शहरी बसंत है


यह बेचैनी यह बेबसी
शायद ले जाए कभी
गांव, तुम्हारी  ओर
मिलवा पाऊं अपनों को
किलक-किलक मंडराती
तितलियों के झुंड                                                                                                                                                              सरसों के फूलों के खेत
और फुदकती गौरैया से


क्या आज भी                                                                                                                                                                    दूर तक फैली  है वही गन्ध                                                                                                                                                                          बौराई अमराई की                                                                                                                                                             फूलते हैं अमलताश और कचनार


कोयल की कूक लिए
गुड़ सा मीठा  वह अहसास                                                                                                                                                पीली चटक धूप में अलसाता                                                                                                                                            रोम रोम में रुपता  जाता                                                                                                                                                  जिसे  कभी हम                                                                                                                                                              बसंत कहते थे !


-शैल अग्रवाल











      दूब

     

वह नन्हीं -सी हरियाई दूब 
मुस्कुरा उठी तब            
किरणों ने छुआ उसे जब!
अॅंखुआई हुई दूब को             
शर्म से देख कॉंपता
खिल खिल हॅंसा बरगद विशाल
कहा,
‘वह देख आ रहा है                                            
तेरा काल !!’    

         
अॅंखुआई हुई दूब ने        
चुपके से आकर
कानों के लबों में                                                                                 
कहा घबरा कर    
‘बचा लो मुझे 
इन दरिंदों से.                                           
मैं जीना चाहती हूँ!’


    - अनीता रश्मि














सनन्-सनन् निनाद कर रहा पवन… 


सनन्-सनन् निनाद कर रहा पवन,
अजस्र मर्मरित हुए हैं वन सघन,
न पर्ण सा बना रहे सिहर-सचल, 
ओ मनुज बना रहे सदा सबल |

घनक घनक घनेरते घनेरे घन,
नृत्य कर रहे निरत तड़ित चरण ,
मन रहे न यह कभी तेरा विकल,
ओ मनुज बना रहे सदा सबल |

झरर-झरर वरिष अदिति निगल रहा ,
अमित अनिष्ट अग्नि ज्वाल पल रहा ,
सामने अड़े हुए अडिग अचल ,
ओ मनुज बना रहे सदा सबल |

थरर-थरर है काँपती वसुंधरा ,
तीव्र ज्वार ले उदधि उमड़ पड़ा ,
हो रहे विरोध में ये जग सकल ,
ओ मनुज बना रहे सदा सबल |


    -विजय सिंह ( आस्ट्रेलिया)













 सुबह का सूरज


लाल गुलाबी सूरज
चिपका है जो बादलों से अभी
आग का गोला है
अथवा बिन्दी माथे की
उड़ा दी है जिसे हवा में
शैतानी हरकतों ने
किसी क्रूर पति की
उठेगी अभी मां कोई
सुगाहिन टांक लेगी माथे से
बचाकर दुनिया की तेज नजरें
कि वह लाल बड़ी गेंद है
चपल बालिका की
रूठ गई है जो मनमानी से उसकी
टंग गई है जाकर दूर
छोटे पड़ते हैं जहां
नन्हे कोमल हाथ।

अरे! अब तो निराश हो
लौट चली है बालिका
घर को
भांप उसकी पीड़ा
गतिमान हो लिया है सूरज
बच्ची की तेज थिरकती टांगों से
बिठाकर मेल
सरकती है आकाशीय गेंद
खुश है लड़की
मन ही मन
कि गिरेगी अब सीधे
गोल आंगन में उसके
चूम लेगी जी भर
रख देगी सुरक्षित
टूटी टिन की पेटियों में
हंसती पड़ी है जहां
बचपन की रंगीन गुड़िया
बालों से जिसके
आती है रह-रह
केसर-सी खुशबू।

राजू रंजन प्रसाद













अपने घरों से बाहर


जब खेतों की हरियाली
 सावन को साथ लाने की
 जिद लिए जी रहे हो
 जब उम्मीदों की घास
 बच्चों के खाली हाथों में
 खिलौनों की जगह
 ताकत लिए उग रहे हों
 हम आश्वस्त हैं
 कि दरख्त अभी नहीं सूखेगा ।
 
 साहस और विश्वास के अंतिम छोर तक
 वह मौजूद रहता है सदा हमारे समय में
 घड़ी की सूई बनकर
 हमारी आंखों में
 ज्योति की चमक बनकर
 जो प्रत्येक खौफ के विरुद्ध
 शपथ उठाने का हौसला रखता है
 तब बची रहती है हमारे चूल्हे में आँच ।
 
 बहुत संभव है कि वे बदतर समय में भी
 शब्दों के साथ हों
 और आसमान में टंगी दुनिया
 कल को बदल जाए केचुओं में
 इन सभी स्थितियों को हम
 जितने कम समय में जान लें
 मोहरे बनाने के उनके सारे उपाय
 उनके टेबल पर ही धरे रह जाएंगें ।
 
 मैं तय नहीं कर पा रहा हूँ
 कि मंगल की भाषा
 कैसे पृथ्वी का किरण बनेगी
 और हमारे पुरुषत्व का दंभ
 कैसे व्यवस्ता के खिलाफ
 कुदाल उठा पायेगा ।
 
 हम महज देह नहीं हैं
 ना ही धूलकण
 हमारे हाथों में हैं
 शब्दों की आवाजें
 और सीने में है सूरज
 तब कैसे
 कोई समय बदतर होगा ।


  मोतीलाल राउरकेला












 कचनार


पहली बार
मेरे द्वार
रह-रह
गह-गह
कुछ ऐसा फूला कचनार
गदराई हर डार!

 
इतना लहका
इतना दहका
अन्तर की गहराई तक
पैठ गया कचनार!

 
जामुन रंग नहाया
मेरे गैरिक मन पर छाया
छ्ज्जों और मुँडेरों पर
जम कर बैठ गया कचनार!

 
पहली बार
मेरे द्वार
कुछ ऐसा झूमा कचनार
रोम-रोम से जैसे उमड़ा प्यार!
अनगिन इच्छाओं का संसार!
पहली बार
ऐसा अद्‌भुत उपहार!


-महेंद्र भटनागर














हसीन पल


आज का दिन है कितना सुहाना
धूप खिली है अलसाई – सी
मीठी- मीठी हवा का झोंका
सरसों की खेती हरशाई- सी
मन मयूर – सा नाचे
कोयल – सी बोली बोले
रंग-बिरंगी देख ये दुनिया
चंचल हृदय डोले
मस्ती का ये हसीन आलम
आँखों में सुंदर सपने
कल्पनाएँ साकार हुई
अजनबी बने अपने
काश थम जाए समां यही
तू भी मेरे साथ चल
दिल कहता उड़ जाएं आज
हाथ किसी के न आएं कल



  -प्रीत अरोड़ा














  फागुनी मौसम


फागुनी मनुहार पर
गुन्जन करते भंवरे डोले
फूलों को रिझाते बोले 
जाड़े की केंचुल उतार
करें धरा का रूप श्रृंगार 
नये बौर महकाएं मिलकर 
पाहुन के पैरों में  महावर रच  
प्रीत अंग अंग में भर दें 
नये कांधों पर बसंत को लादें  
अभिसारी गीतों से फागुनी  
मौसम भीना भीना कर दें !

 डॉ सरस्वती माथुर 

















फागुनी भूआ पर...


फागुनी भूआ पर उगा हुआ वह फूल
सरसों के खेतों के पास
एकाकी तन कर खड़ा
पीताम्बरी लताओं से घिरा दबा वह फूल
किसके प्यार की धरोहर यह फूल
क्या नाम विशेष दूँ इसे
जो देरतक हवाओं से जूझता रहा

पर फागुनी स्निग्ध हवा का
एक झोंका आया
स्पर्श कर अपने अंकों में भर लिया उसे
और गुदगुदाने लगा जड़ तक
अब सभी पत्तियां झरने लगीं एक-एक कर
और बिखरने लगी खुशबू
मैंने घास को इस तरह
खिलखिलाते
पहले कभी नहीं देखा है

-सत्येन्द्र श्रीवास्तव
















हँसते फूल और कलियाँ मुस्काती हैं।


देखकर तुमको हँसते फूल और कलियाँ मुस्काती हैं।                                                                                                        लताएँ झूम-झूमकर अभिनन्दन के गीत सुनाती हैं।
तुम्हारा नाम क्या है?

 
तुम्हारा उजला-उजला रूप लगे पूनम की रात कोर्इ।
बसी चंचल चितवन में हो जैसे स्वपिनल सौगात कोर्इ।
चाँद की किरणें भी दो बातें करने को शरमाती है।
तुम्हारा नाम क्या है?

 
तुम्हारी बोली का अभ्यास कुहुक कर करती कोयलिया।
ख़नक का वैभव पाने हेतु छनकती हर दम पायलिया।
विफलता लेकिन अपनी देख तड़पती है, पछताती है।
तुम्हारा नाम क्या है?

 
चाहता है मेरा भी हृदय बनाना तुमको अपना मीत।
निछावर करने को है विकल तुम्हीं पर अपने सारे गीत।
मगर मन से उठ शंकाएँ फिर अपना प्रश्न उठातीं है।
तुम्हारा नाम क्या है

-रंजन विशदा

















        बासंती मन


बासंती मन क्या गाता है?
गंध गंध रस भीनी धरती का अंतर्मन,
मधुपर्क सुवासित झिलमिल जीवन का आँगन,
आँचल भर पुष्पित नेह- हुलास लिए ,
बासंती मन क्या गाता है?
पात पात खिल गए,डालियाँ सजीं द्रुमों पर,
वन,उपवन,मादक रस भींगे कोकिल के स्वर,
राग रंग की सभा सजाये ,
बासंती मन क्या गाता है?
झुमा हरसिंगार चमेली का मन पावन,
सुख़ बरसता ,मदमाता शीतल मलय पवन,
सुधियों का मृदु संसार लिए,
बासंती मन क्या गाता है?
बीते कल की मनुहार लिए,
आगत का स्वागत भार लिए,
गुन गुन करता गीतों में राग विराग लिए,
बासंती मन क्या गाता है?


   -पद्मा मिश्रा

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माह विशेष

BASANT

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                                                                                                                                                                    मंथन


                                                                                                                                                         - शैल अग्रवाल

           फागुन के रंग


कौन रंग फागुन रंगे, रंगता कौन वसंत,
प्रेम रंग फागुन रंगे, प्रीत कुसुंभ वसंत।                                                                            
                  -विनोद शुक्ल 

बसंत जब समस्त वैभव के साथ आँखों के आगे किलकता है तो सम्मोहित हम रूप-रंग और रस में डूब जाते हैं। स्फूर्ति और उर्जा से भर उठते हैं।  एक-एक  याद  कई-कई  खिड़कियाँ  खोलती, सारे  रस,  सारे राग और उन्माद के साथ  मन में रिसती चली  जाती हैं। कहीं पलाश तो कहीं अशोक, कहीं क्रोकस और ट्यूलिप तो कहीं डैफोडिल्स. दुनिया के किसी भी कोने में बैठे हों,  खिड़की के बाहर चाहे बर्फ नजर आती हो या रेगिस्तान का झुलसाता विस्तार, ग्लोबल वार्मिंग हो या डीप फ्रीज,  फागुन  के नाम पर  तो आज भी आँखों के आगे बस एक ही छवि उभरती है, और वह है शीत के प्रहार से उजड़ी  दुनिया में रंगों  के विष्फोट  की। अनूठे सृजन की।  महकते बाग बगीचों की, आम की बौरों पर बैठी कूकती कोयल और रंग-बिरंगी नव प्रष्फुटित कलियों की, व उन पर गुनगुन करते भंवरों की, डाल-डाल पर चहकते पक्षियों और उनके  नन्हे नन्हे फुदकते बच्चों की। हर्ष से दमकते गुलाल लगे युवा कपोलों की। ब्रज की उन्माद भरी रंग और रसिया में डूबी होली की।   पुष्प और इत्रों में नहाए, मन्दिरों मे सजे-धजे राधाकृष्ण की...प्रेमपगे पकवानों और मनोहारी मुस्कन और चितवनों की। इस मौसम के तो ख्याल मात्र से बौराई दिखने लग जाती है अमराइयां और फिर से  सिहराने लग जाती है पुरवाई; वही सोंधी यादों की कोरी और भीनी महक लेकर। पता नहीं रौशनी की चमक बढ़ जाती है या आशावादी मन की, चारो तरफ रूप और रंग का मेला-सा लग जाता है। प्रकृति भी तो रंगों की होली खेलने लग जाती है फागुन के महीने में !

प्रकृति और पुरुष का संबन्ध अनादि काल से रहा है--- चाहे वह प्रभात की पहली किरण हो या सावन की पहली फुहार, अगर धरती जगती-संवरती है तो उसपर रचे-बसे प्राणी भी । मौसम अच्छा हो तो, ' मन-मयूर नाच उठा ' किसने नही कहा और जाना है, और अगर यही मौसम बोझिल और ऊदा-ऊदा हो जाए तो आँखें तक को सावन भादों होने में देर नहीं लगती!

ठंड और अंधेरे से भरे ब्रिटेन ही क्या,  पूरे  विश्व मे ही बसंत का इंतजार रहता है और इसका आगमन, एक त्योहार की तरह मनाया जाता है---रंग-रूप और उल्लास से महकता व गमकता। बच्चे बूढ़े जवान सभी के मन में एक नयी उमंग भर देता है यह मौसम। धरती दुल्हन सी संवर जाती है। सूरज की सुनहरी किरनों में नहाए डैफोडिल्स, क्रोकस, बिजी-लिजी और फ्यूशिया व फौरगेट मी नौट जैसे फूलों से भरी क्यारियां बगीचों को ही नहीं, हर उदास और खिन्न मन तक को लहलहा देती हैं यह ऋतु और तरह तरह के फूलों की खुशबू हवा के हर झोंके के साथ आंखों में ही नहीं, आत्मा तक में पैठ जाती है। ये वो खुशनुमा महीने हैं जब  आदमी ही नहीं, आकाश तक कुछ और ही ज्यादा साफ और नीला दिखता है यहां --- और समन्दर तो उससे भी ज्यादा गहरा नीला----स्पष्ट और पारदर्शीं ----बिल्कुल ही यहां की बिल्हौरी आंखों की तरह।

वसंत ऋतु आशा और उल्लास की ऋतु है। संदेश और सृजन की ऋतु है। वसंत ऋतु वह ऋतु है जब सूक्ष्म-साकार से मिलता है, मात्र मिलता ही नहीं, मिलकर महकने और खिलने लग जाता है...नए-नए रूप लेकर नए जन्म ले लेता है। बहलाने और बहकाने लग जाता है। और हो भी क्यों न, सोई धरती के कानों में जब आतुर आकाश एकबार फिर से अपना वही पुराना प्रणय गीत गुनगुनाता है, तो हरित , अलसाई धरती कैसे न कोपल-कोपल लहलहाए और नीले आसमान की खिलखिलाती धूप और नव विहगों की सारी चहचाहट अंकों में सहेजे-समेटे, शरमाती-लजाती कैसे न कह दे कि कल की पीली पड़ती यह धरती नेहसिक्त होकर एक बार फिरसे  हरिया चुकी  है। कामदेव का पुष्प-बाण तो शिव तक की तपस्या भंग कर देता है।

 माना शिव ने तपस्या भंग होते ही, दंड स्वरूप, तीसरी आंख की क्रोधाग्नि में कामदेव को भस्मीभूत कर डाला था, परन्तु फिर तुरंत ही रति के विलाप से द्रवित हो, अशरीर ही सही, चिरंजीवी होने का आशीर्वाद भी तो दे ही दिया था। उस दिन से आजतक प्रकृति और मानव दोनों के ही कण-कण में बसे उस काम के सूक्ष्म शरीर का ही तो महोत्सव मनाते आ रहे हैं हम बसंत महोत्सव के रूप में...इसमें मनाए जाने वाले त्योहारों के रूप में। क्योंकि यह वसंत ऋतु मदन ऋतु भी तो है और कामदेव के अन्य नामों में एक नाम बसंत और एक नाम मदन भी तो है ।

बसंत पंचमी के आते-आते ही मौसम में एक मादकता सी छा जाती है। बौराए आमों के साथ मानव पशु-पक्षी, पूरी पृथ्वी ही मानो बौरा-सी जाती है। हरियाली धरती पीली सरसों की चूनर ओढ़े नई-नवेली दुल्हन सी खिलने और फलने लगती है और खुले नीले आकाश से झरझर झरती सुहानी गुलाबी धूप मानो पृथ्वी के सारे रंगों को अपनी  सुहानी आभा से कुछ और ही निखार देती है। कुहकती कोयल, दादुर, मोर ...सभी का मन एक नए आल्हाद से झूमने लगता है और हवाओं तक में शुरु हो जाता है एक अनूठा संगीत...एक गुनगुनी छेड़छाड़। फिर तो किसी को याद दिलाने की जरूरत नहीं... पूरी प्रकृति ही शोर मचा देती है, ' जागो! फाग-फगवाड़ा आ गया। मिलन का प्रियतम के साथ छेड़छाड़ का मौसम आ गया। एक दूसरे के रंग में भीगने और भिगोने का मौसम आ गया।' 



वर्ष भर प्रकृति मंच तैयार करती है तब कहीं जाकर वसंत ऋतु अपने इस मोहक और अनूठे अंदाज में आ पाती है। प्रकृति और पुरुष, दोनों ही को पूरी तरह से लुभाती- रिझाती। ठंडी सिहरती हवा और गुलाबी गुनगुनी धूप। खेतों पर दूर तक फैली पीली सरसों की चादर और खिले-अधखिले रंग-बिरंगे फूलों से लंदी फंदी डालियां और.क्यारियां, वह भी साफ-सुथरे, चमकते नीले आकाश के नीचे...पूरी ही पृथ्वी एक आकर्षक तस्बीर सी सज उठती है...कुशल नृत्यांगना सी थिरकती और लरजती।...नाजुक कोपलें मन्द-मन्द हवा पर झूमती, मानो अपने ही रूप-रंग पर शरमा-शरमाकर इतरा रही हों। सिहरती पत्तियां और चटकती कलियां... सुर और लय के साथ ताल में थिरकती। धरती जाने कैसे दिव्य घुँघरू बांध चुकी होती है कि दादुर मोर पपीहे सभी वाहवाह कर उठते हैं। नन्हे नवजात पक्षियों का कलरव, एक नया उत्साह, नया संगीत देता हुआ सुरभित हवाओं में गूंजने लग जाता है। ताजा हवा के ये झोंके जब खुशबूओं के मस्त कलीन पर सवार हो कर बगल से गुजरते हैं तो उदास से उदास मन, पंक्षियों-सा खुले आकाश में विचरने लग जाता है,  लाचार और कमजोर पंख तक अपनी ताकत तौलने लग जाते हैं। शायद इसीलिए तो बसंत ऋतु को ऋतुराज कहा जाता है...सृजन और उल्लास की ऋतु माना जाता है। महकती-लहकती इस ऋतु को प्राचीन काल से ही भारत में एक उत्सव नहीं, महोत्सव की तरह मनाया जाता है। गीत-संगीत और भरपूर राग-रंग के साथ। 


 फाग या मदन महोत्सव की परंपरा भारत में तो प्राचीन काल से चली ही आ रही है, दुनिया के करीब-करीब हर कोने में ऐसे ही समकक्ष परंपरा वाले त्योहारों को अपने-अपने तरीके से मनाने की कई-कई रोचक और भिन्न प्रथाएँ हैं। कहीं टमाटरों से प्रिय को रंगा जाता है, तो कहीं पुष्पों से। कभी लड्डुओं की मार पड़ती है, तो कभी लठ्ठों की। हाँ, राग-रंग के इन त्योहारों में एक सूत्र सब जगह जरूर एक-सा मिलता है...और वह है. प्रियतम का सुखद साथ... उपहार व ठिठोलियों का आपस में आदान-प्रदान।  यूरोप के सेंट वेंलेन्टाइन और वैलेन्टाइन डे से तो अब भारत का बच्चा-बच्चा परिचित हो चुका है और इसकी अच्छी-बुरी तरंगों से और आलोड़ित भी।


विदेशों में जहाँ युगल स्वेच्छा से इस दिन अपने अपने प्यार के समक्ष जीवन भर का साथ निभाने का, शादी करने का प्रस्ताव रखते हैं, ठीक इसरे विपरीत भारत में युगलों के व्यवहार को अभद्र मानते हुए, संदिग्ध निगाहों से परखा जाता है। यदि खबरों की मानें तो,  भारत के कुछ हिस्सों में तो  वैलेंटाइन मनाते युगलों को मारा-पीटा ही नहीं गया, उन्हें सरे आम बेइज्जत करके कहीं-कहीं तो उनकी जबर्दस्ती शादी भी करवा दी गई है। कितना सही या गलत है यह रवैया, उसे मनाने या न मनाने देने का तरीका... इन सब बातों पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।हाँ,  इस तरह की घटनाओं से दो बातें तो स्पष्टतः उभरकर सामने आती हैं ...इन त्योहारों के  प्रति हमारी भावनाओं की कृतिमता और हमारे रूढ़िवादी समाज की असहनशीलता। क्या अपनी बात समझाने का, या विरोध प्रदर्शित करने का कोई और सभ्य तरीका  नहीं रहा हमारे पास, विशेषतः अब जब संचार के इस युग में दूरियां मिटती जा रही हैं और पूर्वी व पाश्चात्य जीवन शैली ही नहीं,  संस्कार, संस्कृति...पहनावा-उढ़ावा, सब गडमड हो चुका हैं ! युवाओं को भी समझना पड़ेगा कि उत्सव का आनंद लेने में बुराई नहीं, परन्तु मर्यादा और शालीनता के दायरे में रहकर ही सह्य हैं परंपरागत भारतीय समाज को ये पश्चिमी तौर-तरीके ।


.कितनी फिसलन है और कितनी काई है, और कितना मात्र परिवर्तनों का भय है, इतना नीर-क्षीर विवेकी तो अभिववकों और समाज सुधारकों को भी होना ही पड़ेगा। फिर आधुनिकता की...भौतिकता की.... आर्थिक प्रगति की इस दौड़ में हमने खुद ही तो घसीटा है युवा पीढ़ी को, उनकी आंखों में तेजी से बदलती इक्कीसवीं सदी का एक नया और आधुनिक सपना देकर। ...बुराई कहाँ है...सोच में, व्यवहार में या  फिर विरोध में? 


चलिए कहाँ भटक गए हम भी। हम तो बात कर रहे थे फाग की। ...फलते-फूलते, महकते  इस मौसम के प्राकृतिक और नैसर्गिक रास-रंग की। विघ्नों और सोच-समझ...समाज, परंपरा और आधुनिकता के आपसी टकराव  की नहीं।
वैसे भी प्रकृति के अनुसार मन और मन-माफिक त्योहार..यही तो जीवटता है, जीवन का रस और रसायन है। मानव स्वभाव और सोच की यही बारीकियां...यही समझ तो उसे अन्य जीवों से प्रथक करती है और नीरस, सपाट जीवन को नए रंग, नए रूप देकर आकर्षित और प्रेरित ही नहीं करती, नव स्फूर्ति भी दे देती हैं ।


बात चाहे होली की हो या बसंत की, हमारी संस्कृति में राग-रंगमय त्योहारों की कमी नहीं; करीब-करीब हर मौसम और हर वर्ण के लिए एक अलग और अनूठा त्योहार  है। यदि व्यंजनों की विविधता को भूल भी जाएं, उनकी बात न भी करें, तो भी हर त्योहार सामाजिक और धार्मिक, दोमुखी चेतना और दोहरा आयाम  लिए हुए है । आज भी पुराने को नए से जोड़ने का अद्भुत प्रयास हैं ये त्योहार और अपना दायित्व बखूबी निभा भी रहे  हैं।  


यह भी एक संयोग  ही था कि बीसियों वर्ष बाद उस दिन रंग भरनी एकादशी के दिन, अनजाने में ही सही, उस रागरंग भरे दृश्य का आनंद लेने, मैं काशी में सही वक्त व सही स्थान पर ही जा रुकी थी।  रंग-बिरंगे गुलाल भरे बादलों  के बीच से उठती, वे ढोल–तांसे की मधुर और जयजयकार के साथ मिलीजुली,  गूंजती हुई आवाजें और साथ में नाचती-झूमती, रुक-रुककर आगे बढ़ती  भक्तों की वह टोली,  पूर्णतः होली का आस्थामय समां था मेरे सामने। यातायात रुक जाए, तो रुके। शहर खड़ा हो जाए, तो खड़ा रहे, अब किसे परवाह! काशी में होली का हुड़दंग पूरे जोश-खरोश के साथ शुरू हो चुका था। कहते हैं शिवरात्रि के दिन शिव पार्वती का विवाह हुआ था और रंग-भरी एकादशी के दिन गौना। आल्हादित भक्तों की मानूँ, तो पार्वती गौना करवाकर, वापस घर लौट रही थीं..अपने शिव के पास...  पूरे एक जन्म और सोलह वर्ष की कठिन तपस्या उपरान्त ...फिर इतना हर्ष ...इतना उन्माद कैसे और क्यों  न छलके !


चांदी के सिंहासन पर सोलह श्रंगार के साथ फूलों से लदी गौरा ईष्ट भोलेनाथ के साथ बेहद फब रही थीं। संतुष्ट लग रही थीं। और वह नाचती, कूदती बेसुध भीड़, उसी आस्था, उसी अटूट प्रेम के पुनर्मिलन का ही तो उत्सव मना रही थी। नाचते- झूमते, आधे-भूखे-नंगों की वह टोली ... वाकई में शिव की बारात और सेना दोनों का ही अहसास दे रही थी। विश्वास नहीं होता आज की व्यस्त जिन्दगी में भी कैसे जुट जाते हैं इतने लोग? ... पर, शिव तो सदा से ही निर्बल और असहायों के ही साथ रहे हैं। सांप तक को गले में लपेटने की क्षमता रखने वाले एक यही तो हैं, जो असहाय और दीन-दुखियों के सहायक हैं, दीनानाथ हैं । बनारस वैसे भी फक्कड़ और भूखे-नंगों का ही शहर है। यहां पर आस्था और उत्तेजना की  भंग की एक चुटकी मात्र, आज भी  भूख और प्यास दोनों को ही भगाने और बेसुध रखने में पूर्णतः समर्थ है।

यातायात  पूरी तरह से रुक चुका था। काफी देर तक ड्राइवर कोशिश में रहा कि अगल-बगल कहीं से भी गाड़ी निकाल ले। अंत में हार कर उसने भी इंजिन बन्द कर दिया था और  भीड़ में जा खड़ा हुआ था।

रूप, श्रंगार , उल्लास, सबकुछ अद्भुत, और अभिभूत करने वाला था। आते-जाते भक्त दणडवत् प्रणाम कर रहे थे तो कई पंक्तिबद्ध हाथ जोड़े विभोर और आत्म-समर्पित थे। दृश्य भव्य और अलौकिक था ...शिवमय था और शिव की काशी सा ही निराला व अनूठा भी था। आज भी यहाँ हर छोटा-बड़ा त्योहार बेहद हर्ष और उल्लास के साथ ही मनाया जाता है। श्रद्धालुओं का उन्माद यहां सदा से ही संक्रामक रहा है और जाने कितने हजारों वर्ष पहले हुई घटना को लेकर उसदिन भी, चारो तरफ से उमड़ ही नहीं, आसपास रिसता-सा चला जा रहा था... बनारस की उन पतली गलियों को भावनाओं की दलदल से पुनः पुनः पाटता-समेटता हुआ। शिव और गौरा का विवाह भी तो इसी माह हुआ था- जिसे आज भी सभी शिव भक्त शिवरात्रि के रूप में मनाते हैं। शिव जो अपने विकारों और अहं को शेर की छाल की तरह बिछाकर समाधिस्थ हो सकते हैं...शिव जो अपने त्रिशूल की तरह ही मनसा, वाचा, कर्मणा जन कल्याण के लिए समर्पित हैं। शिव जिन्होंने रूप और चौंसठ कलाओं के प्रतीक चंद्रमा को अपने मस्तिष्क पर धारण कर रखा है, वह भी ओजस्वनिनी गंगा के शीतल प्रवाह समेत....कहीं कोई विकार या परेशानी नहीं, बस शान्त और निर्मल उजाला ही उजाला...


विदेशी पर्यटक, दुकान खोलते दुकानदार, ग्राहक सब धंसते जा रहे थे और  उस सबके बीच बैठी, मैं इन्तजार कर रही  थी  जलूस के गुजर जाने का, सबकुछ बीत और चुक जाने का, वह भी एक कसैली कसक के साथ। सोचकर हैरान हूँ, कि आखिर ऐसा क्यों...पूर्णतः डूब क्यों नहीं पा रही मैं ?   भीड़भाड़ भरे जुलूस में डूबता-उबरता मन  आस्था और समर्पण के उन पलों में भी इतना निर्लिप्त कैसे रहा?  क्या  वाकई में हमारे अहसास मात्र मस्तिष्क का एक रसायनिक आंदोलन ही हैं या जैसा कि मैं मानती हूँ, उनकी जड़ें अतीत और संस्कारों तक जाती हैं...?

और ज्यादा सोचना-समझना चाहा तो खुद को और भी भ्रमित पाया, कहीं आत्मरक्षण और आत्म संरचना की एक नैसर्गिक क्रिया और प्रतिक्किया ही तो नहीं सारी भावनाएँ ?  फिर क्यों इतनी लड़ाइयां जीती और हारी गई हैं  इसी राग-अनुराग पर...क्यों इतने न्योछावर हुए...आखिर क्यों इतने ग्रन्थ लिखे और पढ़े गए इस छलनामय दुरूह विषय पर। क्या है यह  फागुनी उन्माद या  वासंती बयार , इसकी खुशबू. और क्यों उस बेखुदी से उठते हैं हजारों  उलझे-अटके प्रश्न। सामीप्य का सुख और कामना ही नहीं, क्यों उलझन धोखा और मजबूरियों भी हैं इसमें......क्योंकि चाहें  न चाहें,  हर घटित और फलित की भी तो अपनी-अपनी पूर्व निर्धारित तिथियां और पल होते हैं , जिनपर हजार कोशिशों के बाद भी हमारा कोई वश नहीं और जिन्दगी किसी भी परिस्थिति में हठी मन से हार नहीं मानती।

फिर क्या है यह प्यार, जिसके लिए कभी-कभी एक जन्म भी काफी नहीं पड़ता...कैसे जन्म-जन्मांतर इंतजार कर लेते हैं लोग जैसे कि पार्वती जी ने कभी किया था और फिर अपनी लगन की एकाग्रता से हासिल भी कर लिया था अपना खोया स्वर्ग...सब कुछ वापस।...क्या संभव भी है ऐसा...नटखट मन जबाव देने की बजाय कन्हैयैलाल नंदन की  हाल ही में पढ़ी कविता की पंक्तियां सुनाने लग जाता  है-


“ नदी की कहानी कभी फिर सुनाना
मैं प्यासा हूँ दो घूँट पानी पिलाना
मुझे वो मिलेगा ये मुझको यकी हैं
बहुत जानलेवा है ये दरम्याना
मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था
भंवर देखना कूदना डूब जाना। ”

 पार्वती हो या सीता, राधा हो या मीरा...यहां तक कि अनुसूइया और श्रवण कुमार को ही क्यों न लें, चाहे ध्रुव और प्रहलाद के बारे में ही क्यों न सोचें, हर उद्दाम और अलौकिक लगन, एक धोखे, एक विनाश ...नश्वरता और चाहे-अनचाहे विछोह से गुजरकर ही अमरत्व प्राप्त कर पाती है...धोखा भी ऐसा-वैसा नहीं प्रायः अपनों द्वारा ही दिया हुआ...या फिर अपनी ही जानी-अनजानी गलती से आमंत्रित विनाश। वाकई में बहुत कठिन है ‘ डगर पनघट की’। कभी समाज साथ नहीं देता तो कभी परिस्थितियां, तो कभी ग्रीक ही क्या, हर बड़ी कहानी के नायक की तरह, एक छोटी-सी भूल भी आत्मघातक सिद्ध होती है। नेह जितना प्रगाढ़ होगा...कुशाग्र तीली-सी कसक या पीड़ा भी उतनी ही तीव्र। तो क्या विछोह और धोखा कसौटी है प्यार की...एक अनिवार्यता है इंतिहा चाह की...या मात्र भय है अनागत और अनचाहे का, बिछुड़ने का, जो बेचैन किए रहता है। सही निर्णय में बाधक सिद्ध होता है। सही ही तो है हादसे प्रायः गलती से ही नहीं, साहस की कमी से भी तो होते हैं । वजह जो भी हो, सच तो यह है कि हम इन कहानियों को उनकी विफलता के लिए नहीं, लगन और निष्ठा के लिए , हार न मानने वाली प्रवृत्ति के लिए ही  याद रखते हैं।


लौकिक अलौकिक ये दास्तानें आज भी बहुत कुछ कहना और सिखलाना चाहती हैं, यदि हम सुनना और सीखना चाहें। सती और फिर पार्वती के रूप में वह पुनर्जन्म की कहानी, मन के किसी कोने को बचपन से ही अशांत और उद्वेलित करती आई है। क्या बेटियां वाकई में पराया धन और उधार की धरोहर मात्र हैं , या शादी के बाद वे खुद बदल जाती हैं...मान-अपमान के कांटे कुछ ज्यादा ही चुभने लगते हैं मन में...कुछ भी अनदेखा और माफ करना भूल जाती हैं? पुराने को ढूँढते-ढूँढते नए का अस्तित्व तक तोड़ने-फोड़ने पर आमदा हो जाती हैं... क्या जरूरत थी सती को ज़िद करके मायके जाने की...फिर यूँ पल भर में प्राण तज देने की...क्या वह शिव से ज्यादा प्यार करती थीं या अपनी इच्छाओं से... अपने मान-सम्मान से ?  क्या यह भावनाओं का अनियंत्रित आवेश ही है जो आजीवन भटकाता है, समस्या, हर हार की जड़ बन जाता है ...फिर चाहें वे मनुष्य हों या देवी-देवता...या फिर कुछ और है, जो पूर्व निश्चित और निर्धारित रहता है...बस बुद्धि और बहाने बन जाते हैं वैसे-ही?

हाल ही में एक कवि सम्मेलन में हास्य रस के सुप्रसिद्ध कवि सुरेन्द्रशर्मा की द्वारिकाधीश कविता सुनी। कविता अच्छी थी, गहरी सोच के साथ।   मन में कई सवाल उठे और पल भर को प्रेम में आस्था विचलित भी हुई। फिर तुरंत ही मन ने उत्तर दिया,  प्रेम तो संपूर्ण भक्ति और समर्पण है। विश्वास और आस्था है। यहाँ दूर-पास और हार-जीत ..मैं और तू -सभी भेदभाव मिट जाते हैं.. दुख व पीड़ा तक सुख का पर्याय बन सकती है...फिर संशय कैसा...जो सवाल सुरेन्द्रशर्मा की राधिका रानी ने उठाए थे वह प्रेम दीवानी राधा सोच भी नहीं सकती थी, उन्हें अपने किशन के चरित्र , सिद्धांत व  ध्येय, सभी  पर पूरा भरोसा था इतनी कृष्णमय थी वह कि कृष्ण कभी दूर ही नहीं हुए उनसे।


वास्तव में राह सच की हो या प्रेम की प्रायः दुर्गम और कांटों भरी ही रही है फिर भी इस डर से इस अनादि अनंत बगिया के सौंदर्य में कभी कोई कमी नहीं आई -न तो फूलों के नैसर्गिक रूप और महक में और ना ही भँवरों की गुनगुन में।


अक्सर प्रेम कथाओं में बेवफाई भी खूब दिखाई जाती है पर जिसमें बेवफाई हो वह फिर प्रेम कैसा....?

आज भी प्रेम में एकनिष्ठ समर्पण और त्याग का ध्यान आते ही जिस जुगल किशोर का सर्वोपरि ध्यान आता है वह राधाकृष्ण ही हैं। मात्र इच्छा या कामना नहीं, वह एक दूसरे के प्रति  उनका अदम्य और अपराजेय प्रेम ही तो था, जिसने राधेश्याम को आजतक अलग नहीं होने दिया। मीरा को जहर के प्याले के बाद भी जिन्दा रखा। पर इतना प्यार इतनी आस्था; इतना विश्वास भी तो साधारण जीवन में  संभव नहीं। इतनी सच्चाई और इतना समर्पण भी तो होना चाहिए, साथ-साथ हिम्मत भी। यूँ तो प्रेम की निर्मल धारा युगों से अविरल बह रही है , पर उस निश्छलता में भीग पाना, उस अमृत को आत्मसात कर पाना विरलों को ही आ पाता है। इसी संदर्भ में याद आ रही है फैज साहब की एक मशहूर नज्म, 

वो लोग बोहत खुश किस्मत थे
जो इश्क को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे
हम जीते जी मशरूफ रहे
कुछ इश्क किया, कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
फिर आखिर तंग आकर हमने
दोनों को अधूरा छोड़ दिया।


अधिकांशतः भृतहरि की नायिका जैसा ही तो हाल रहता है , जो यह तक न जान पायी कि जरूरी काम के लिए जाते नायक को किन शब्दों के साथ विदा दे । यदि वह ' जाओ' कहती है तो नायक सोचेगा कि वह उसे प्यार ही नहीं करती, इसीलिए तो झट से जाओ कह दिया। 'मत जाओ' कहने पर भी उसका ही नुकसान होगा और ' थोड़ा और रुककर जाओ' कहने पर काम भी बिगड़ेगा और साथ में जाने की घड़ी भी नहीं टलेगी। अन्त में वह हारकर नायक से ही पूछती है कि अब वही बताए कि ऐसे समय में वह उसे क्या कहकर विदा दे।  

ठहर कर सोचा जाए तो प्रेम के ' पनघट' की 'डगर' वाकई में 'कठिन' है और आज भी झटपट 'गगरी' भर लाने का ना कोई सुगम पथ है और ना ही कोई मूलमंत्र। आज भी प्यार के हर प्रश्न का प्यार ही एक उत्तर है।यही वजह है कि प्रेम-प्यार का प्रसंग चलते ही आँखों में जो छवि सर्वोपरि उभरती है वह आज भी राधाकृष्ण की ही होती है। ऐसा नहीं कि बहुत धार्मिक हूँ, या भारतीय हूँ, इस वजह से ऐसा होता है... या फिर रोमियो जूलियट, हीर-राँझा, शीरी फरहाद और लैला मजनू, आदि  प्रेम कहानियों से परिचित नहीं।

रासरंग और मिलन व विछोह के अनगिनित प्रसंगों के बाद भी जो संयम और ठहराव...काल और स्थान की दूरियों को लांघता अभिन्न और अविच्छेद सामीप्य इस जोड़ी में दिखता है, वह और कहीं है ही नहीं...एक ऐसी अजेय ललकार है इनके प्यार में जो अलग या दूर होने की सोच तक को धिक्कार देती है। शायद इसलिए कि कर्तव्य की मांग पर योगी-सा कृष्ण का राधा से अलग होने का फैसला खुद अपना था...  निर्णय जो अपने लिए नहीं; सार्वजनिक हित में ... जन कल्याण के लिए लिया गया था  ! विश्वास था उन्हें अपने प्रेम पर। समझ थी अपने कर्तव्य की। मीरा सी दीवानगी संभव है और समझ में भी आती है क्योंकि 'गिरधर गोपाल' के लिए उनका प्यार, साकार होकर भी अमूर्त था। भक्त और भगवान का रिश्ता था। परन्तु राधाकृष्ण तो युगल थे..मित्र थे। सदैव साथ-साथ थे। फिर भी समय की; कर्म की पुकार पर हर व्यक्तिगत सुख (बांसुरी और राधा) तकको छोड़ दिया था कृष्ण ने। और राधा भी उनके निर्णय के आड़े नहीं आयीं। युगल का त्याग ही तो है जिसने उनके प्यार को तप की ऊंचाइयों तक पहुँचा दिया। इस निर्वाह के लिए जो अदम्य साहस और संयम चाहिए, वह  आसान नहीं, चाहे हम इन्सानों में ढूँढें या देवी-देवताओं में।पर राधा-कृष्ण का तप हो या मीरा की दीवानगी और हट, दोनों  ही वन्दनीय हैं। विशेषतः तब, जब दोनों ही रिश्ते सांस और शरीर-से हैं... आस्था की उस दीवानगी को छूते हैं जो या तो प्रिय में लीन होकर एकाकर हो जाती है और मिलन या विछोह से ऊपर उठ  जाती है या फिर पत्थर तक को भगवान बना देती है। वैसे भी इस ढाई आखर के शब्द के रहस्यों को समझना या इस चंचल मन को पूरी तरह से बस में कर पाना इतना आसान तो नहीं! इसकी हर बात ही निराली है । इस दरिया की धार तो सदैव ही उलटी बही हैः इसमें तो डूबकर ही उबरा जाता है।



खुसरो दरिया प्रेम का उलटी वाकी धार।
जो उतरा सो डूब गया जो डूबा सो पार।    

और इस उलझन को चतुर राधारानी ने समझा भी था और सुलझाया भी... जो कृष्णमय होकर अपना जीवन जिया उन्होने। यही वजह थी कि उनकी झलक मात्र कृष्ण को हर्षा देती है क्योंकि संसारिक सारी बाधाओं के बावजूद भी कृष्ण की सांस-सांस की जरूरत को समझा उन्होने...उनके मन की हर बात जानी और निबाही। तभी तो बिहारी ने कृष्ण की नहीं, राधा की प्रार्थना की। वे जानते थे , राधा हैं तो कृष्ण हैं। 

" मेरी भवबाधा हरो राधा नागरि सोय। जा तन की झाँई परे स्याम हरित दुति होय "

राधा वास्तव में चतुर थीं क्योंकि वे प्रेम में बाधा नहीं सहायक बनीं। और यही है प्रेम की वास्तविक परिभाषा; जो आज भी किताबों में नहीं, जीवन में ही मिलेगी। कब सोच और शरीर ही नहीं, जीवन तक प्रिय को समर्पित हो जाता है प्रेमी को पता ही नहीं चल पाता और यही 'स्व' का मिटना ही उनके अमर सुख का कारण बनता है। जीवन के कांटों पर फूलों-सा रंग और खुशबू बिखेरता है प्रेम। तभी तो कबीरदास कह गये कि "पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित हुआ न कोय, ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।" यही कबीर एक दूसरे दोहे में लिखते हैं - "प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय। राजा प्रजा जेहि रुचै शीष देय लहि जाय " ऐसे प्रेम को पाने के लिए ' शीष' यानी अहं को, अस्तित्व के अलगाव को त्यागना ही पड़ेगा। और यह कितना कठिन है हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं।

जमला ऐसी प्रीत कर जैसे निसि औ चन्द्। चन्दा बिन निसि फीकरी निसि बिन चन्दो मन्द।।  

और एकबार यदि ऐसा प्रेम मिल भी जाए तो उसे संभालकर रखना भी तो आना ही चाहिए।

" रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए।।" 

कितना भी हम तौलें परखें, यह तो मानना ही पड़ेगा कि ईश्वर की तरह प्रेम आज भी जिन्दा है। शाश्वत है। सार्वभौमिक है। तभी तो हजार उत्तेजक खबरों के धमाकों के बीच बैठे  हम आप आज भी इसकी बातें कर रहे हैं। इसमें रुचि ले रहे हैं। इसके बारे में लिख-पढ़ रहे हैं।

जीत कहूं या विधना से विद्रोह, जो अदम्य और निरंतर है और उसकी रची सृष्टि-सा ही अपराजेय और हठी  भी, वही तो है यह मानव, उसके अपने ही रूप में रचा-बसा। हर युग में नई पीढी इसे अपने एक नये ढंग से महसूस करेगी और पाएगी। वक्त  के साथ प्रेमियों के नए-नए स्वरूप और नए-नए प्रतिमान उभरकर आयेंगे... प्रतिमान जो प्यार और त्याग की उद्दाम ऊंचाइयों को छूते रहे हैं, छूते रहेंगे। क्योंकि प्रेम का वास्ता आज भी मन से ज्यादा, और बुद्धि से कम है। आजभी प्रेम ही इस सृष्टि का आधार है। यह वही खुशबू और रंग है जिसे जीवन की धूप और हवा उड़ाती भी है और बढ़ाती भी है। दुरुह है यह।

 पर बात यदि मात्र संयम और समर्पण की ही होती, तो यंत्रवत् सब सही चलता ही रहता, बिना किसी विद्रोह या संशय के...जैसे कि प्रकृति में चलता रहता है-क्रम से ग्रीष्म, बरखा, शिशिर, और आते जाते बसंत की तरह। पर मानव मन तो अपनी ही राग अलापता है और बसंत पर ही अड़ा रहना चाहता है। मनमाफिक सातवें मौसम की तरह नयी छटा , नई सदाबहार सातवीं ऋतु ही रखना चाहता है बारहों महीने।
पर यह कैसे संभव हो?  हजार आंसू और मुस्कानों में लिपटी , लू की अंधड़ और बरखा की रिमझिम शीतलता एक साथ समेटे जीवन इसकी अनुमति कैसे दे दे। हम इसे धोखा कहें या नियति, अधिकांशतः प्रेम कहानियां ...सफल या असफल, जीवन की तरह ही, निराशा, आंसू और धोखे के तानेबाने पर नहीं, यथार्थ की जरूरतों पर, पल के निर्णय पर स्वतः बुन जाती है। मन का क्या...यह तो सिर्फ वही याद रखता है, जो रखना चाहता है। हाँ इतना अवश्य है कि व्यक्ति और समाज दोनों की ही अपेक्षाओं का पहाण सदा से ही इतना अधिक दुर्गम और अपार है कि कठिनाइयों से जूझते , अपनी अदम्य इच्छा की प्राप्ति के लिए, मानव को निराशा की अंधेरी गर्तों से गुजरना ही पड़ता है...पड़ेगा।  जो इसे जीत ले या नियंत्रित कर ले वही कहानी अमर है, याद रह जाती है। इसीमें इसकी परीक्षा भी है और उपलब्धि भी।  हैरान हूँ, तो उस विधाता पर जिसने इस खेल के कुछ ऐसे नियम बनाए। मन के साथ मस्तिष्क जोड़ा और गुलाबों को कांटों पर उगाया। सिर्फ उगाया ही नहीं, उसकी गंध और रूप को इतना मादक बनाया कि आताजाता हर व्यक्ति कसक महसूस करे.. .दर्द से कटे और आजीवन चिलकता रह जाए।



... पाप पिशाचनी पर मां पार्वती का सिंहासन संजोता मानव मन सतत क्रियाशील है... और यही तो है इसकी सबसे बड़ी उलझन और ताकत दोनों ही। अनगिनित वासंती सवालों और गुत्थियों को समर्पित है मन। मन एक रहस्यमय गुत्थी , पहले तो हृदय बनकर आजीवन सींचता है हमें औरफिर मनमानी करने के बाद, जीवन के अंत का कारण बनता है उससे खुद ही पूर्णतः विमुख या शांत होकर। जिसे जान ही नहीं पाते हम, बस आजीवन जानने की कोशिश में ही लगे रहते हैं वही मन ही तो है हमारा संसार, हर रागरंग और रंजिश की वजह।


बरखा में मल्हार गाता है मन और फागुन में बौराता है। कोई भी मौसम हो, झरझर झरना ही स्वभाव है इसका। हल्के से झोंके से मिट जाता है यह, पर मिट के नष्ट नहीं होता, फिर से उग आता है। नए-नए स्वांग रचाता है। दया, करुणा और परोपकार के हजारों गुणों से पूर्ण होकर भी, पल भर में ध्वस्त कर सकता है यह समस्त बृह्मांड और अगले पल ही खुद भी धाराशायी होने की क्षमता कहूँ या बावरापन भी रखता है। नई उर्जा, नई आणविक शक्ति के नित नए-नए भट्टे बनाते देर नहीं लगती इसे और फिर उन्हींके हाथों विनाश होते देख...घबराया, बेचैन, बचने के रास्ते ढूंढ़ता फिरता है। फिरता ही नहीं, ढूंढ लाने की सामर्थ भी रखता है, ढूँढ लाता है।

आप सोच रहे होंगे कैसी है यह वसंत की प्रस्तावना जिसमें न कोयल की कूक है न बोऱाई आम की अमराई। ध्यान से देखें, तो सब हैं यहीं पर। यह बात दूसरी है कि इसबार हम बात स्पष्टतः कोयल की कूक की नहीं, उस मूक पीर की, उस धोखे की  भी कर रहे हैं, जिसके तहत वह अपने अंडे दूसरों के घोंसलों में रख आती है,,,,रख ही नहीं आती, रखकर खुश भी रहती है।

 शरीरहीन, अदृश्य और भस्म यह राग-रंग वाकई में अमरत्व का वरदान लिए हुए है। यही तो वजह है कि बसंत कभी बस-अंत नहीं, एक नई शुरुआत, नए उल्लास का द्योतक है। हर आलोचना, हर शिकायत, हर भ्रान्ति के बाद भी जीवित ही नहीं प्रतिक्षित और मनभावन है। सुख कहें या सृजनहारा की छलना; सृजन प्रक्रिया के ही दूसरे नाम हैं ये ऋतुए भी। पतझड़ में बहारों के बीज बचाती और छुपाती ही नहीं हैं ये, उन्हें रोपती भी तो हैं। यही तो सृष्टि है, जिजीषा और संजीवनी हैं।


एक बार फिर से वापस आ गया है फाग महोत्सव। लहलहाती गेहूं की पकी बालियां और महकती पकी सरसों , सबकुछ खुशियों के भंडारों में सिमटने को तैयार हैं। एकबार फिर से सुन ली है प्रकृति ने पुरुष की... दिल ने दिल की फरियाद और प्रकृति के साथ-साथ जीव-जन्तु तक, सब नए उल्लास से भरे दिख रहे  हैं। यहाँ इंगलैंड में भले ही  अभी पातहीन वृक्षों पर कोपलें न फूटी हों, परन्तु चिड़ियों ने घोसले बनाने शुरु कर दिए हैं। 


बसंत के आगमन के साथ साथ, जब हर कोपल, हर किसलय, ज़जबातों और यादें की सुरभित मलय लिए इन्द्रधनुषी धनक दे रही है--चारो तरफ सु-मन ही सुमन खिल आए हैं, (क्या कभी यह भी सोचा है आपने कि फूलों का एक पर्यायवाची सुमन (सु-मन) भी क्यों है---शायद इसलिए कि कांटों पर भी मुस्कुराते रहते हैं ये---अपने रूप-रंग और गन्ध से पूरा वातावरण ही सजा संवार देते हैं, बिना जाने या भेद-भाव किए कि राजमहल में खिले हैं या जंगल में --- क्योंकि खुशबू और सौंदर्य दोनों ही नैसर्गिक या स्वभावगत् हैं--- अब ऐसे उदार मानस को हम सु-मन नही तो और क्या कहेंगे !)

तो आइये हम आप भी भरपूर स्वागत करते हैं इस हरियाली---इस उत्साह,इस रंग और रूप के आकर्षक महोत्सव का... नव विहगों की चहचह और नव कलियों पर गुनगुन मंडराते उल्लास का जिसका नाम ही बसंत है... बस-अंत दुख का, उदासी का। अभाव और अत्याचार का... बस-अंत हर तरह की दुख देती काली परछांइयों का ..चाहे प्रकृति हो या फिर उसकी गोदी में रचा-रमा  मानव!... 

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                                                                                                                                                        ललित निबंध
                                                                                                                                              -  नर्मदा प्रसाद उपाध्याय

                                                           रंग के रूपायन

होली केसरिया रंग के निर्झर पुष्प पलाश का जन्मदिन है। कभी इस पलाश के फूल को ब्रज कानन की वीथियों से एक दिन राधा ने बीना और फिर इसके केसरिया रंग से एक साँवरे को नहलाकर सदैव के लिए भारतीय मन में शाश्वत रूप से बसी कविता के द्वार खोल दिए। कान्हा तब से कविता हो गए और राधा की यह ‘धृष्टता’  हमारी सांस्कृतिक परंपरा की अमर धरोहर होली के रूप में प्रतिष्ठित हो गई। यदि राधा यह धृष्टता नहीं करती तो कृष्ण कृष्ण नहीं होते, वे निरे कर्मयोगी बने रह जाते। न राग वसंत होता, न गुलाल और अबीर से घिरते आकाश और न ही मन के क्षितिज से उगते आनंद के सतरंगी इन्द्रधनुष। होली नहीं होती तो निरंजन सूर इतने ज्योतिर्मय कैसे होते ? जिनकी आँखों ने कृष्ण के सबसे आलोकमय रूप को देखा और कहा—

खेलन हरि निकले ब्रज होरी,
कटि कछनी, पीतांबर ओढ़े हाथ लिए भौंरा चक्र डोरी,
मोर मुकुट कुंडल स्रवनन कर बर दसन दमक दामिनि छवि चोरी।


वसंत का यह प्रतिनिधि त्योहार केवल आम्र बौरों की मंजरियों के खिल उठने, रंगों के पूरी मस्ती के साथ बिखरने और निसर्ग की निरावृत शोभा को निहारने मात्र का त्योहार नहीं है, बल्कि यह रेखाओं की उस थिरकन की भी मनोरम अभिव्यक्ति है, जिस थिरकन ने भारतीय चित्रांकन परंपरा की विभिन्न शैलियों में इस मादक त्योहार को उरेडकर सदैव के लिए हमारी संस्कृति के पन्नों में अमर कर दिया।

होली मनाते कान्हा की भावभीनी भंगिमा हमारी चित्रकला की परंपरा में बड़े सलोने रूप में उतरी है तथा वह होली राधा और माधव के उल्लास से भरपूर प्रेम की सहज और सार्थक अभिव्यक्ति के रूप में रंगों और रेखाओं में साकार हुई है। इसी होली को भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मध्यकाल व उत्तर मध्यकाल में फूली और फली चित्र शैलियों में उरेहा गया है। इन सभी चित्र शैलियों में चित्रित होली के लघुचित्र विश्व भर के कला संग्रहालयों तथा व्यक्तिगत संग्रहों में बिखरे हैं। इन चित्रों का समग्रता में वर्णन अत्यंत विस्तीर्ण होगा, इसलिए कुछ विशिष्ट रूपायनों के संबंध में शैलीगत संदर्भ सहित चर्चा की जा रही है।

भारतीय चित्रांकन परंपरा के संदर्भ में यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भारतीय चितेरों ने राग और रागनियों को भी रूप दिए हैं तथा उन्हें रंग और रेखाओं में बांधा है। भारतीय चितेरों ने राग वसंत का चित्रण करते समय होली मनाते राधा-माधव की छवि को ही केन्द्र में रखा है।


वसंत रागिनी के रूपायन पर केन्द्रित अनेकों लघु चित्र राजस्थान तथा पहाड़ की विभिन्न शैलियों में बने। इन चित्रों में वसंत ऋतु का चित्रण है। यह चित्रण जहाँ एक ओर निसर्ग की शोभा को अपनी पूरी मनोरमता के साथ अभिव्यक्त करता है वहीं दूसरी ओर कृष्ण के इस शोभा के बीच गोपियों के साथ मुग्ध होकर नृत्य करने की अनुपम भंगिमा को भी दरशाता है। वसंत रागिनी के चित्रण में वसंत की शोभा के साथ-साथ होली के उल्लास को भी मध्यकालीन चित्रों ने अभिव्यक्ति दी है। वसंत रागिनी के अनेक चित्र मौजूद हैं। इनमें से सर्वाधिक आकर्षक रूपायन कोटा शैली का है। वसंत रागिनी का यह चित्र सन् 1770 में चित्रित किया गया था तथा यह वर्तमान में आर्ट गैलरी ऑफ न्यू साउथ वेल्स, सिडनी में संरक्षित है। इस चित्र की सबसे बड़ी विशेशता यह है कि इसमें नृत्यरत कृष्ण की गतिशीलता, वसंत का उल्लास तथा कृष्ण और गोपियों के वासंती परिधान कलाकार के संवेदनशील मन तथा उसकी कल्पनाशीलता को भलीभांति परिभषित कर देते हैं। रागिनी वसंत के उल्लेखनीय चित्रों में वह चित्र भी शामिल है, जो आमेर कलम का है तथा जिसे सन् 1700 में चित्रित किया गया था। यह राजा संग्राम सिंह के संग्रह में है। इसी तरह का होली खेलते राधा-कृष्ण का वसंत रागिनी का एक सुन्दर रूपायन ‘ प्रीमेन कलेक्शन ‘ , टोरेंटो में मौजूद है। यह चित्र भी काँगड़ा कलम का है, जिसे सन् 1800 में बनवाया गया था। इस चित्र की भी सबसे बड़ी विशेषता राधा, कृष्ण और उनकी गतिशील भंगिमाओं का होना है।दक्षिण भारत में सोलहवीं सदी में राग-माला श्रंखला के जो चित्र उरेहे गए उनमें से अधिकांश अब अप्राप्य हैं, किंतु सन् 1580 से 1590 के बीच वसंत रागिनी का अहमद नगर शैली का एक मोहक रूपांकन राष्ट्रीय संग्राहलय नई दिल्ली में है। इस चित्र की यह विशेषता है कि तत्कालीन उत्तर भारतीय रूपांकनों के लक्षण इस लघुचित्र में दिखाई देते हैं, विशेषकर ओढ़नी प्रायः वैसी ही स्त्री पात्रों को उरेही गई है जैसी ‘लौरचंद्रा‘   के रूपांकनों में उरेही गई है। इस चित्र में नायक-नायिका (राधा-कृष्ण) एक झूले पर बैठे हैं, पीछे प्रफुल्लित आम के वृक्ष हैं। झूले के दाईं ओर शहजादे को अपने हरम में होली खेलते दिखाया गया है। सभी के परिधान अलंकृत हैं। स्त्रियों के वस्त्र झीने और रंगीन हैं। शहजादे स्त्रियों से घिरे खड़े हैं। स्त्रियों के हाथों से में पिचकारियाँ हैं, जिनसे रँग छूट रहा है। चित्र के आगेवाले हिस्से में रंगीन पट्टियां उरेही गई हैं। यह यद्यपि आभिजात्य होली का अंकन है, लेकिन चितेरे ने इसमें अद्भुत आंचलिकता के दर्शन कराए हैं।


दक्किनी कलमों के बाद मुगल कलम में होली के बड़े मनभावन रूपायन हुए। हरम की होली के अलावा तत्कालीन सम्राटों को अपने दरबारियों के साथ भी होली खेलते चित्रित किया गया है। मुगल कलम में बनाए गए होली के रूपायन अपने आप में विशिष्ट हैं तथा मुगलकालीन कलाकारों ने चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान, इस त्योहार के अंकन में अपने आत्मिक उल्लास के रंग उड़ेल दिए हैं। सन 1750 में होली खेलते शहजादे का एक शानदार चित्र विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम लंदन में है। इसमें एक शहजादा अपने हरम में होली के त्योहार को पूरे उल्लास के साथ मनाते हुए चित्रित किया गया है। इस चित्र में विभिन्न प्रकार के रंग, वाद्य यंत्र, अवध की वेशभूषा, वहाँ का नारी सौंदर्य और विशेष रूप से प्रकृति की सुषमा से भरपूर पृष्ठभूमि दर्शनीय है। मुगल कलम के अलावा उससे प्रभावित अन्य प्रादेशिक मुगल कलमों से बड़े सुंदर होली के रूपायन हुए। इसके प्रतिनिधि उदाहरण विशेष रूप से अवध कलम में मौजूद हैं।

होली का यह स्वरूप राजस्थान तथा पहाड़ की शैलियों में परवर्तीकाल में बड़े मनोरम रूप में विकसित हुआ।

राजस्थान की प्राचीन शैलियों में मेवाड़ शैली अप्रतिम है। इस कलम में होली के बड़े लुभावने अंकन हुए। सन् 1660 में वसंत रागिनी को चित्रित करते हुए मेवाड़ी कलम का एक सुन्दर चित्र राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में है । इस चित्र में कृष्ण गोपियों के साथ होली खेल रहे हैं। बाँसुरी बजाते, नृत्य करते कान्हा की सहभागिन दो सखियां हैं, जो वाद्य सँभाले हैं। एक तीसरी सखी पिचकारी से उनपर रंग फेंक रही है। दृश्य में कई पिचकारियाँ दिखाई दे रही हैं। आमने-सामने दो मयूर हैं, जिनके आस-पास अन्य पक्षी विचर रहे हैं। पार्श्व दृश्य गुलाबी है। सभी के परिधान वासंती हैं और मन मानो केसर में  पगे। रूप, रंग, स्वर और सौरभ को इस दृश्य में देखा जा सकता है।

राष्ट्रीय कला संग्रहालय नई दिल्ली में ही राजस्थानी (मेवाड़) कलम का राणा प्रतापसिंह द्वितीय का अपने महल में होली मनाते हुए सन् 1753 का एक चित्रांकन है। यह चित्र दो भागों में है। ऊपरी भाग में लड़ते हाथी तथा दो चीनी चित्र उकेरे गए हैं, जो डच प्रभाव को स्पष्ट करते हैं। महाराणा अपने पुत्र और अन्य सामंतों के साथ होली मना रहे हैं। चित्र के निचले भाग में एक कृतिम युद्ध का दृश्य अंकित है, जिसमें उनके सामंतोंके बीच रंगीन पानी से भरे और सोने व चान्दी के पतरों से मढ़ी बन्दूकें रखी हुई हैं। राजसी होली का यह अकन अद्भुत है।

इस शैली का एक और सुन्दर चित्र उदयपुर संग्रहालय में है, जिसे चित्रकर तारा ने सन् 1854 में बनाया है। इस चित्र में राणा स्वरूपसिंह ( 1842-61 ई.) को होली मनाते दिखाया गया है। इस चित्र में राणा अनेक अश्वों पर सवार दिखाई दे रहे हैं। इन घोड़ों के खुरों के आघात से गुलाल की धूल उड़ रही है। पार्श्व में उदयपुर महल को बड़े सुंदर रूप में दिखाया गया है। इसी संग्रहालय में सत्रहवीं सदी में ‘ गीतगोविन्द‘ के प्रसंग के आधार पर बनाया गया एक मनोहर चित्र है, जिसमें वसंत की सजीव शोभा को रंगों और रेखाओं के माध्यम से अनावृत कर दिया है। एक ही चित्र में कई दृश्य हैं। कहीं राधा और कृषण नृत्यरत हैं, कहीं वे एक-दूसरे की बाँहों में बाँहें डाले हैं, कहीं वे नाचती-गाती डफली बजाती सखियों के बीच हैं। चित्र के दाँये भाग में होली खेलते नर-नारियों को दरशाया गया है।

उदयपुर कलम का एक सुन्दर चित्र जो सन् 1708 से 1710 के बीच में बनाया गया था, वह वर्तमान में नेशनल गैलरी ऑफ विक्टोरिया, मेलबोर्न में है। इस चित्र में महाराजा अमरसिंह को अपने दरबारियों के साथ होली खेलते दरशाया गया है। इस चित्र की अद्भुत विशेषता है इसका आधुनिक संतुलन। प्रकृति की शोभा चारों ओर बिखरी हुई है और बिखरते गुलाल के बीच महाराज अमरसिंह अपने दरबारियों के साथ होली खेल रहे हैं। इस चित्र में वे इस प्रकार चित्रित किए गए हैं कि जैसे वे धरती के ऊपर आकाश में बैठे हों, जबकि वास्तविकता यह है कि वे धरती पर ही बैठे हैं। कतारबद्ध होली खेलते उनके दरबारी ऐसे चित्रित किए गए हैं जैसे उन्होंने एक लंबाकार रूप में खड़े होकर उस सिंहासन को थाम रखा हो, जिस पर उनके महाराजा बैठकर होली खेल रहे हैं। यह अपने प्रकार का विलक्षण चित्र है।

बीकानेर कलम का एक सुंदर चित्र, जो सत्रहवीं सदी का है, वह जे.पी.गोयनका के व्यक्तिगत संग्रह में है। इसमें गोपियों के साथ होली खेलते राधा और कृष्ण विशिष्ट स्वरूप में अंकित किए गए हैं। इसी तरह आमेर कलम का एक राधा कृष्ण की होली का बेहतरीन चित्र राजा संग्रामसिंह के संग्रह में है। यह सत्रहवीं सदी में बनाया गया था। इस चित्र में कृ,ण मोर मुकुट पहने, राजसी परिधानों में एक चौकी पर खड़े हैं। वे अपने एक हाथ में थमी पिचकारी से सामने खड़ी राधा पर रंग बरसा रहे हैं। उन्हें राधा की सखियों ने घेर रखा है। एक सखी एक बड़ी पिचकारी से कान्हा पर केसरिया रंग की बौछार कर रही है। हरे और लाल परिधान में लिपटी राधा अपने कान्हा के सामने खड़ी है।

नाथ द्वारा कलम में राधा कृष्ण की होली के अनेक अंकन मौजूद हैं। इनमें से अधिकांश अंकन विभिन्न व्यक्तिगत् संग्रहों में हैं। यह शैली अपेक्षाकृत अर्वाचीन है, इसलिए इस शैली में बनाए गए अनेक चित्र उपलब्ध होते हैं। एक उत्कृष्ट चित्र, जिसमें राधा और कृष्ण की होली का अँकन है, वह पॉल.एफ. विल्टर संग्रह, न्यूयौर्क में है। यह चित्र सन् 1850 में बनाया गया था। इसमें राधा और कृष्ण को दैवी और मानवीय दोनों ही स्वरूप में दरशाया गया है। अपने परंपरागत वेशभूषा में भगवान कृष्ण राधा से होली खेल रहे हैं। पार्श्व में नाथद्वारा की भव्य अट्टालिकाएँ हैं तथा आकाश में भी देवी-देवता अपने यानों में बैठकर इस होली में सम्मिलित होते दिखाई पड़ रहे हैं।

इंडियन म्यूजियम, कलकत्ता में सन् 1780 में बनाया गया राधा-कृष्ण की होली का एक मनोहारी रूपांकन उपलब्ध है। यह पहाड़ी कलम का है। इसी तरह चंडीगढ़ म्यूजियम में काँगड़ा कलम का अठारहवीं सदी का होली खेलते कृष्ण का एक सुंदर रूपायन मौजूद है।



इस तरह न केवल राजस्थान और पहाड़ की बड़ी-बड़ी रियासतों में बल्कि छोटे-छोटे ठिकानों में भी होली के सुंदर रूपांकन हुए।

होली और राग वसंत के इन रूपायनों के अलावा कहीं-कहीं राग हिंडोला में भी होली के दृश्य भारतीय लघुचित्रों में दिखाई देते हैं।

राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली; भारत कला भवन, बनारस तथा महाराजा छत्रपति शिवाजी संग्रहालय मुंबई (प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम) जैसे विश्वप्रसिद्ध भारतीय संग्रहालयों के अतिरिक्त अनेक व्यक्तिगत संग्रहों तथा भारत की कला वीथियों में होली के मनोहारी रूपांकन मौजूद हैं। विदेशों में विशेषकर इंगलैंड में विक्टोरिया एँड अलबर्ट म्यूजियम, लंदन; ब्रिटिश म्यूजियम, इंडिया ऑफिस कलेक्शन जैसे संग्रहालयें में तथा अनेक व्यक्तिगत संग्रहों में होली के महत्वपूर्ण अंकन मौजूद हैं। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न संग्रहालयों में भी होली के मध्यकालीन लघु चित्र संरक्षित हैं।

ऐसे अनेक चित्रों का उल्लेख किया जा सकता है और ऐसे अनेक चित्र अभी मौजूद हैं, जिनका अध्ययन किया जाना है।


इस अनमोल विरासत का अध्ययन करना और इससे रूबरू होना अपने आप में एक अप्रतिम अनुभूति है। होली का त्योहार बार-बार उस भाव का स्मरण कराता है जिस भाव में डूबकर राधा औपर माधव के अलौकिक प्रेम को अष्टछाप के महान कवि नंददास ने इन शब्दों में बाँध दिया था—

                                                                                      रंग रँगीली राधिका
                                                                                        रंग रँगीली पीय
                                                                                 इहि रंग भीनै नित बसौ
                                                                                        नंददास के हीय। 

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     RANG-RANGOLI

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                                                                                                                                                         कविता में  इन दिनों


                                                                                                                                                             - ओम निश्‍चल

पुष्‍पिता अवस्‍थी हिंदी  की सुपरिचित कवयित्री हैं।  अब तक उनके छह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। शब्‍द बन कर रहती हैं ऋतुऍं, अक्षत, अंतर्ध्‍वनि, हृदय की हथेली, ईश्‍वराशीष एवं ‘शैल प्रतिमाओं से'। जनवरी, 1960 में जन्मी पुष्‍पिता ने अपनी कविता यात्रा वाराणसी से शुरू की थी जिसकी सुगंध अब दिग-दिगंत में व्‍याप्‍त हो चुकी है। वे इन दिनों नीदरलैंड में हैं और लगातार लिख रही हैं। विश्‍व में अनेक देशों का भ्रमण कर चुकी पुष्‍पिता के भीतर एक भारतीय कवयित्री का चित्‍त बसा है। वे विदेश में रहते हुए भी अपनी अंतर्दृष्‍टि से जैसे अपनी कविताओं में प्रकृति और पुरुष के अनिंद्य अभिसार का चित्र उकेरती हैं। उनकी कविताओं का स्‍थायी भाव प्रेम है। ऋतुओं में बसंत और सावन जैसे उनकी प्रिय ऋतुऍं हों। भारत में फरवरी बसंत का मौसम होता है, यानी प्रेम का। पुष्‍पिता ने अपनी कविताओं में प्रेम और रागदग्‍ध बसंत के बहुतेरे चित्र उकेरे हैं। इस स्‍तंभ के अंतर्गत नंद किशोर आचार्य, अरुण कमल, वर्तिका नंदा, भगवत रावत , विनोद कुमार शुक्‍ल , ओम भारती , प्रतापराव कदम, संजय कुंदन और तजिन्‍दर सिंह लूथरा के बाद प्रस्‍तुत है सुपरिचित कवयित्री पुष्‍पिता अवस्‍थी के नए संग्रह 'शैल प्रतिमाओं से' पर डॉ.ओम निश्‍चल का आलेख।


शैल प्रतिमाओं से

पुष्‍पिता अवस्‍थी

अमृत कंसल्‍टैंसी, 

नीदरलैंड

www.amcon.nl                                                                                                                                                               


फूली हुई सरसों का पीताम्‍बरी शगुन


यों तो हर व्‍यक्‍ति के भीतर लगभग समान मानवीय भावनाएं पाई जाती हैं किन्‍तु कवियों का हृदय स्‍वभावत: संवेदनशील होता है। पुष्‍पिता ने 'शब्‍द बन कर रहती हैं ऋतुऍं' शीर्षक संग्रह के साथ हिंदी कविता में प्रवेश किया था तथा उसके बाद आए संग्रह 'अक्षत' से प्रणय और कोमल भावनाओं की कवयित्री के रूप मे अपनी जगह बना ली थी। उसके बाद आए उनके संग्रह 'हृदय की हथेली' में तो जैसे प्रकृति और पुरुष का अद्वितीय संगम देखने को मिलता है। यों तो बीच में 'अंतर्ध्‍वनि' और 'ईश्‍वराशीष' जैसे संग्रह भी आए तथा उन्‍होने अपने को वैश्‍विक चेतना से भी जोड़ने की कोशिश की, अपनी कविता के लोकेल को उन्‍होंने अपनी आत्‍मा के सूक्ष्‍म शरीर से निकाल कर विश्‍व को यथार्थ के धरातल पर समझने का यत्‍न किया किन्‍तु बार बार उनकी चेतना मौसम के स्‍निग्‍ध अहसासों और प्रणय की अनिंद्य अनुभूतियों को बीनने-बटोरने और रचने-सँवारने में लगी रही।



हाल ही अमृत कन्‍सल्‍टैंसी, नीदरलैंड से अंग्रेजी, डच और हिंदी में एक साथ प्रकाशित पुष्‍पिता अवस्‍थी की कविताओं का संग्रह 'शैल प्रतिमाओं से' अपनी भीतरी बुनावट में एक कवयित्री के स्‍नेहिल हृदय की भावानुभूतियों का बयान करता है। इन कविताओं का राग अद्वितीय है। उसकी आंच अपनी आर्दता में भी दग्‍ध करने वाली है। इन कविताओं के जरिए कवयित्री अनुभूतियों के उस टेकआफ यानी उड़ान का आनंद अनुभव करती है जिसमें प्रिय के अधरों से अपनी ही देह का अमृततुल्‍य रसायन तृप्ति के सुख से भर देता है। यह पूरा संग्रह ही जैसे शैल प्रतिमाओं से कवयित्री का रागात्‍मक संवाद हो। वह कहती है:

आस्‍था का अनन्‍य प्रणय

स्‍पर्श करना चाहता है

आत्‍मा का असीम स्‍नेह

आस्‍था की आंखें 

पाषाण में 

बोती हैं ईश्‍वरीय छवि

जैसे देह

बोती है देह में प्रेम। (शैल प्रतिमाओं से)



हिंदी कविता में देह राग को जैसे वर्जित-सा मान लिया गया है। ले देकर इस क्षेत्र में अशोक वाजपेयी ने देह को अपनी कविता के आत्‍मिक उल्‍लास का अनन्‍य माध्‍यम बनाया है। थोड़े दैहिक आभा के चित्र शमशेर में भी मिलते हैं। अज्ञेय में आत्‍मा का तरल प्रकाश दीखता है। केदार नाथ अग्रवाल के दाम्‍पत्‍य प्रेम की कविताओं में देह और आत्‍म का विरल सहकार है। इसलिए उत्‍कट प्रेम की अभिव्‍यंजनाओं में भी यह देखने की चेष्‍टा होती है कि कवि यहॉं देह से कितना ऊपर उठ सका है। क्‍योंकि देह को सामान्‍यत: भोग का माध्‍यम समझा जाता है। जबकि इन कविताओं को पढते हुए लगता है देह यहॉं कोई वर्ज्‍य वस्‍तु नही है बल्‍कि यह प्रेम का गेह है। यहॉं देह का निषेध नही है बल्‍कि देह का गहरा स्‍वीकार है। यहॉं देह के भीतर विदेह का अनुभव है तो स्‍वप्‍न की आंखों में स्‍वप्‍न देखने का विरल भाव भी। स्‍वप्‍न की आंखों में स्‍वप्‍न की पंक्‍तियॉं हैं:

जल की पारदर्शी आंखों में

नदी बनने के स्‍वप्‍न

नदी की तरल आंखों में है

समुद्र बनने के स्‍वप्‍न

समुद्र की तूफानी आंखों में हैं

बादल बनने के स्‍वप्‍न

बादल की घुमड़ती आंखों में हैं

तृषित को तृप्‍त करने के स्‍वप्‍न

मेरी आतुर आंखों में है

तुम्‍हारे लिए स्‍वप्‍न

जैसे पृथ्‍वी की आंखों में है

सुख-स्‍वप्‍न।           (पृष्‍ठ 44)



कहने को स्त्री प्रणय का केंद्रबिन्‍दु है। पर अपने ही सुख से वह सदा वंचित रहती आई है। वह नखशिख वर्णनों में है। प्रेम और श्रृंगार की विवृति में है पर जैसे अपनी ही कस्‍तूरी से अनजान रहती है। पुष्‍पिता ने ऐसी स्‍त्री को हमेशा जागने वाली नदी कहा है। पृथ्‍वी की तरह सहनशीला कहा है। वह पुरुषप्रिया होकर भी जैसे अपने ही स्‍वाद और स्‍पर्श-सुख से वंचित हो। अनाम'वह'के लिए में कवयित्री इस स्‍त्री के बहाने समूची स्‍त्री जाति की पीड़ा को जैसे उपनिबद्ध कर देती है:

वह हमेशा जागती रहती है

नदी की तरह



वह हमेशा खड़ी रहती है

पहाड़ की तरह

वह हमेशा चलती रहती है

हवा की तरह



वह अपने भीतर कभी 

अपनी ऋतुऍं

नहीं देख पाती है

वह अपनी ही नदी में

कभी नही नहा पाती है



वह अपने ही स्‍वाद को

कभी नहीं चख पाती है। (पृष्‍ठ 50)



इस संग्रह पर लिखते हुए मेरा ध्‍यान पुष्‍पिता पर ही कुछ बरसों पहले लिखी गयी इस टीप पर अँटक जाता है। ' कवयित्री की दृष्‍टि में प्रेम की परिभाषा अनूठी है---प्रेम शब्‍दों से परे है/ शब्‍दकोशों से बहिष्‍कृत/ मन के अंत:पुर का पाहुन है वह/ केवल हृदय से---हार्दिकता से काम्‍य। प्रेम तक पहुंच बनाना आसान नहीं है। जाहिर है यह शब्‍दसाध्‍य नही है, अनुभूतिगम्‍य है। शब्‍द से देह जागती होगी, प्रेम नहीं जागता। प्रेम तो अनुभव-किए की चीज है। जे कृष्‍णमूर्ति कहते हैं, प्रेम सिखाया नहीं जाता। पुष्‍पिता कृष्‍णमूर्ति के वैचारिक सान्‍निध्‍य में रही हैं, अनेक कविताऍं उन्‍होंने बनारस में कृष्‍णमूर्ति फाउंडेशन, राजघाट के गंगातट पर अथवा पीपल छाया में बैठ कर ही लिखी हैं। कृष्‍णमूर्ति का जीवन प्रेम का पर्याय है। प्रेम की इसी पवित्र अभिलाषा के साथ ये कविताऍं रची गयी हैं। शब्‍द इस अभिलाषा, अनुभूति के वाहक अवश्‍य हैं, किन्‍तु केवल शब्‍दों के भरोसे, शब्‍दकोशों के भरोसे प्रेम की उस अनुभूति को जिया नही जा सकता, अनुभूति के उस ठौर तक पहुंचा नहीं जा सकता, जहॉं तक ये कविताएं सहज ही खींच ले जाती हैं। इस प्रेम का ठौर कठिनाई से प्राप्‍य है, दुस्‍साध्‍य है इसकी परिक्रमा। पर जिसे यह अनुभूति प्राप्‍त हो, जो शब्‍दों की त्‍वचा की उजास के भीतर उतर गया हो, जिसका ध्‍यान केवल शब्‍दों में ही अँटका

नहीं रह गया हो, उसके लिए तो कुछ भी अलभ्‍य और दुस्‍साध्‍य नहीं है। अनुभूति के इस तल तक आकर नहीं रह गया हो, उसके लिए तो कुछ भी अलभ्‍य और दुस्‍साध्‍य नहीं है। अनुभूति के इस तल तक आकर ही कोई कह सकता है---

तुम्‍हारे साथ प्रणय की परिक्रमा

हाथ थाम ले जाती है मुझे वहां----

जहॉं न पाखी पहुंचते हैं न पंख

न मछली पहुंचती है न जल

न शब्‍द पहुंचते हैं न अर्थ

न शोर पहुंचता है न मौन। (शब्‍द बन कर रहती हैं ऋतुऍं)



मैंने पाया है कि पुष्‍पिता की इन कविताओं में लबालब प्रसन्‍नता भरी है---अंतश्‍चेतना के कोरों को छूती हुई हिय से हिलगी प्रसन्‍नता, हृदय को प्रणय-निनाद से भर देने वाली गहरी अनिंद्य अनुगूँज---जिसका ताप इधर की ब्रांडेड प्रेम कविताओं में कम ही महसूस होता है।अनुभूति की कोमल वीथियों से गुजर कर तथा प्रणय के उत्‍ताप को आत्‍मा की शक्‍ति बना कर रची इस संग्रह की लगभग सभी कविताओं में स्‍त्री की कोमल संवेदना का गहन स्‍पंदन धड़कता है।



प्रेम को शक्‍ति बनाकर जीने और रचने वाली यह कवयित्री जानती है कि उसकी कविताओं में प्रेममयी मानवीय छवियों के बावजूद प्रेम का छंद कहीं ओझल हो रहा है। प्रणय के नाम पर प्रपंच का बोलबाला बढ़ रहा है। एक छली संवेदना से प्रेम की आस्‍थाओं को जिलाने की कोशिश हो रही है। ऐसे में वह सावधान करती है: 'मन-भोजपत्र पर/ प्रणय का प्रपंच नहीं/ प्रेम का सच लिखो/ मन-माटी को / कुम्‍हार की हथेलियों -सा/ रॉंधो गूँथो/ मन में प्रेम की काया गढो/प्रेम की माया नहीं।' वर्जनाओं से घिरे इस संसार में जहॉं प्रेम भी विपणन कला में माहिर लोगों के आखेट का विषय बन गया हो, एक सीधे सच्‍चे प्रणयी मन के लिए प्रेम किसी व्‍यापार की तरह नहीं, एक पवित्र कर्मफल की तरह जीवन में उपलब्‍ध होता है, सांसों के लिए संजीवनी बन कर आता है। दुनिया की ऐसी कितनी स्‍त्रियॉं हैं, जिन्‍हें सच्‍चा प्रेम सुलभ है। प्रेम---साहित्‍य में भले समादृत हो, समाज में वह अभी भी लांपट्य और छिछोरेपन का ही पर्याय समझा जाता है। पर्याप्‍त वयस्‍क और प्रगतिशील हुए समाज की यह दशा है कि प्रेम की राह में धर्म जाति वर्ण की तमाम दीवारें खड़ी हो जाती हैं और सारी की सारी सामाजिक कुटिलता प्रेम को तबाह करने पर तुल जाती है। ऐसी पशु परिस्‍थितियों में भी पुष्‍पिता स्‍त्री के समर्पित पारदर्शी मन को उजागर करती हैं जो उस पीताम्‍बरी शगुन के लिए प्रतिश्रुत दिखती है, जहां वह प्रिय के मन की यमुनोत्री तक पहुंच कर अपनी अक्षय तृष्‍णा की तृप्ति पा सके।


अपनी गंगा में जीती हूँ

तुम्‍हारी यमुना

जैसे---

अपने कृष्‍ण में

तुम मेरी राधा 



तुम्‍हारे शब्‍दों में

छूती हूँ मैं

तुम्‍हारे ग्‍लेशियर खंड

तुम्‍हारी शब्‍द-प्‍यास में

बुझाती हूँ अपनी मन-प्‍यास

और सौंपती हूँ अक्षय तृष्‍णा

तुम्‍हारे शब्‍दों की नाव से

मैं पहुंचती हूँ 

तुम्‍हारे मन की यमुनोत्री तक

सेमल के फूल के रंग में

छिपे होते हैं रेशमी फाहे

और फूली हुई सरसों का

पीताम्‍बरी शगुन

बसंत ऋतु से पहले

बसंत के लिए।            (पीताम्‍बरी शगुन)



यह प्रेम के निर्गुण और सगुण की कवयित्री है। हृदय के आले पर प्रेम का एक अबुझ दीया जलाए हुए वह मन की खँजड़ी पर प्रीति के बोल गुनगुना रही है। इतने बरस हो गए पुष्‍पिता को कविताऍं लिखते हुए---इस बीच देश दुनिया की सैर भी कर ली। पर लगता है, एक बनारस - राजघाट उनके भीतर बसा ही रहता आया है चाहे वे सूरीनाम की धरती पर रही हों या अब नीदरलैंड की प्राकृतिक सुषमा के बीच। उनका भोजपुरी चित्‍त विदेशी पर्यावरण में भी भारतीय ऋतुओं की परिक्रमा कर लेता है। आज तक उनमें जगी प्रेम की लौ मंद नहीं हुई है। बल्‍कि यह बढ़ती उम्र के साथ जैसे प्रगाढ से प्रगाढतर होता जा रहा है। यह तभी संभव होता है जब हम दुनिया की मायावी शक्‍तियों से परे रहते हुए प्रेम की एक अलग जीने-योग्‍य दुनिया अपने भीतर रचते  और बसाते हैं। 



पुष्‍पिता अवस्‍थी की कविता यात्रा स्‍वदेश से प्रवास तक फैली हुई है। इसलिए इन कविताओं में प्रेम की परिधि भी व्‍यापक है। वह सीमातीत है। सीमाऍं प्रेम का कुछ भी बिगाड़ नहीं पातीं। वह कवयित्री के हृदय में अपनी उपस्‍थिति बनाए रखता है। प्रिय सदैव उसकी स्‍मृतियों में निवास करता है। उसके भीतर सेमल की तरह रचता है एक रेशमी कोना, जो उसके मन का एक सुधी पड़ाव बन जाता है:--


तुम्‍हारी सांसों के घर में

घर बनाया है---मेरी सांसों ने

तुम्‍हारे अधर में

धरे हैं---मेरी चाहतों के संकल्‍प

तुम्‍हारे स्‍पर्श में

छूट गयी है---एक खिली हुई ऋतु (ईश्‍वराशीष)



यह वही पुष्‍पिता है जिसका कहना है, अगर सिर्फ प्रेम कहना चाहती तो बहुत कुछ सरल कुछ शब्‍द लिख देती कोरे कागज पर, सूखी रेत पर और रच देती प्रेम का पूरा संसार। किन्‍तु वह जानती है कि यह काम इतना सरल नहीं है। वह लिखती है---कहना मुश्‍किल कि तितली के पंखों के रंगों में कहॉं से आती है/ शहद सी मिठास, वैसे ही ---बिल्‍कुल वैसे ही जानना मुश्‍किल मन की प्रकृति में/ कहां से शामिल होता है प्रेम का सौभाग्‍य सुख।



'शैल प्रतिमाओं से' में उनकी कुछ सुपरिचित कविताऍं भी संग्रहीत हैं। पर यह कुल मिलाकर जैसे एक प्रणयी का एकालाप हो। एक अटूट संवाद। संबोधनो, मुनहारों, तृप्‍तिमय उदगारों और सौंदर्य को उकेरती सराहती अभिव्‍यक्‍तियों से भरी ये कविताएं मनुष्‍य चित्‍त को आत्‍मा की कोमल थपकियों से सहलाती हैं। पृथ्‍वी की क्रूरताओं के विरुद्ध कोमलतम स्‍पर्श का आवाहन करती हैं।  निरंतर मटमैली होती दुनिया को कुछ और सुंदर बनाने की इच्‍छाओं से भरी हैं। पृथ्‍वी की चिंता में वे कहती हैं: पृथ्‍वी अकेली औरत की तरह सह रही है जीने का दुख। वह प्रेम को एक पवित्र कर्मफल मानती है और प्रिय को आत्‍मा का वास्‍तविक सहचर। अपनी चेतना का सजल उर मित्र। आज के इस काषाय होते वातावरण में प्रेम का ऐसा समुज्‍ज्‍वल उल्‍लास यों तो कल्‍पनातीत है क्‍योंकि आज सब कुछ बाज़ार के हवाले है। इसका महज एक दिन मुकर्रर है। पर कवयित्री इस एक दिवसीय उपक्रम के विरुद्ध हर दिन प्रेम का दिन मानती है। वह तो इस बात से मुतमइन है कि मात्र एक स्‍पर्श में ठहर जाता है पूरा जीवन। 



इन कविताओं में पारामारिबो का नदीतट है, सूरीनामी नदी है, जिसे देख मन में बसी भारत की गंगा याद आती है, तो प्रेम का पर्याय बनी हनेका भी। बच्‍चों के लिए फरिश्‍तों जैसी हथेली लिए और दोस्‍तों के लिए सदैव दोस्‍ती का हाथ बढ़ाने वाले डचभाषी कीस मौरिक, अपने कर्तव्‍यपथ पर डटे पीटर ब्रांस तो हैं ही,  सूरीनाम को अपनी कविता से जिलाने वाले कवि श्रीनिवासी, और सूरीनाम की सबानाई माटी से अपनी देह माटी को जोड़े रखने वाले चलते फिरते बाक्‍साइट कवि माइकल स्‍लोरी भी हैं। कवयित्री पूरी कृतज्ञता से इन्‍हें अपनी कविता का सहचर बनाती है। 



पुष्‍पिता ने बनारस से कविता यात्रा शुरु की थी। प्रणय की प्रकृत माधुरी का आस्‍वाद भी यहीं उन्‍होंने चखा था। एक आतुर आकुल और कविता कला के लिए समर्पित मन लिए वे अपनी कल्‍पनाओं में प्रेम का घर बनाती रहीं और प्रेम की राह में रोड़े अटकाने वाली परिस्‍थितियों का सामना भी किया। स्‍त्री जीवन में प्रेम की असंभवता को उन्‍होंने अपने अनुभवों के तईं ही जाना बूझा और स्‍त्री को प्रेम के बदले मिलने वाले संताप, पुरुष वर्चस्‍व के घटाटोप में घुट कर जीने वाली स्‍त्री की वेदना को गहरे तक महसूस किया। एक ठियॉं से दूसरी ठियॉं बदलती और प्रेम में बार बार ठगी जाने वाली स्‍त्री-संवेदना भी उनके यहॉं घनीभूत है। लेकिन विश्‍वबंधुता में पगी पुष्‍पिता की आंखें विदेश में भी स्‍वदेश की यादों में डूबी रहीं। वे सूरीनामी नदी में गंगा की छवि देखती रहीं, प्रवासी बच्‍चों को वात्‍सल्‍य भाव से निरखती रहीं, सूरीनाम के सुनीलाकाश की छवि आंकते हुए सूर्यसूक्‍त लिखती रहीं और अटलांटिक महासागर की तटौना भूमि पर उमड़ घुमड़ करती लहरों में अपनी व्‍यथाओं का सरगम रचाती रहीं। ..........पुष्‍पिता का यह सफर जारी

है। प्रेम के लिए उनके मन का एक कोना आज भी उसी तरह सजल और करुण है। वह आज भी उस विश्‍वास की तलाश में है जिसके लिए उन्‍होंने लिखा था:  ''प्रणय !  तुमसे कुछ नहीं/ सिर्फ अभय की नाव/ दोना भर विश्‍वास/ और महुआ सा प्रेम चाहिए.....महकता और महकाता।'' उनकी कविताएं वासंती हवाओं का मंगलगान करती हैं, हहराते सामुद्रिक शोर का मौन लिखती हैं और चाहती हैं कि एक ऐसी दुनिया अपने प्रिय के लिए बना सकें जिसमें ऑंसू का एक क़तरा भी न हों। पुष्‍पिता के काव्‍य में हर उस स्‍त्री की वेदना धड़कती है जो इस विपुल वसुधा में प्रेम की अपनी मढैया डाले अपनी अकिंचन इच्‍छाओं को मूर्त रूप देने में संलग्न हैं।

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                                                                                                                                                      माह की कवियत्री
                                                                                                                                                         पुष्पिता अवस्थी

तुम्‍हारी सॉंसों के नाम


वे ही हैं
जो जुते हैं जमीन में
मेरी भूख के विरुद्ध



वे ही हैं
जो डटे हैं मिल कारखानों में
मेरी यातना के विरुद्ध



वे ही हैं
जो लगे हैं सड़कों और रेल पटरियों पर
सूर्य-ताप की पगड़ी बॉंधे
हमारी यात्राओं के लिए



वे ही हैं
जो दे रहे हैं अपने हाथ
अपनी नींद
अपने सपने मशीनों में
हमारी हर सुविधा के लिए




वे ही हैं
जो रहते हैं
अपने जीवन का स्‍वर्ण-सिक्‍का लगाए
कि कागजिया नोट के अभाव में
उन्‍हें नहीं मिलती
सॉंस बचाने की तालीम
न सड़क पर रास्‍ता
न गाड़ी में सीट
न घर चलाने को नौकरी
न मरने पर कफन



वे ही हैं
जिन्‍हें मुँह होने पर भी
मुँह खोलने का अधिकार नहीं मिलता




वे ही हैं
जिनके बच्‍चे हमारे बच्‍चे पालते हैं
जिनकी औरतें हमारा घर चलाती हैं
जो हमें जीवन देते हैं
अपने जीवन की तलाश में
जैसे मेघ को चाहिए ज़मीन
जमीन को चाहिए बीज
बीज को चाहिए ऋतु
ऋतु को चाहिए प्रकृति




शब्‍द को चाहिए अर्थ
अर्थ को चाहिए जीवन
जीवन को चाहिए मनुष्‍य
मनुष्‍य को चाहिए सृष्‍टि प्रकृति




वे ही हैं
जो चुप रहते हैं
पर ऑंखों से बोलते हैं
उनके जुड़े हाथों के भीतर
हैं भेदों के सारे रहस्‍य
जिनकी रस्‍सी अगोचर है।








ओठों पर शंख


कागज पर शब्‍द
जैसे
ओठों पर शंख।




मेरा मन
तुम्‍हारी स्‍मृतियों की
जीवंत पुस्‍तक।



ईश्‍वर ने
हम-दोनों में बचाया है प्रेम
और हम-दोनों ने
प्रेम में ईश्‍वर.....।











पीताम्‍बरी शगुन


अपनी गंगा में
जीती हूँ तुम्‍हारी यमुना
जैसे
अपने कृष्‍ण में
तुम मेरी राधा





तुम्‍हारे शब्‍दों में
छूती हूँ मैं
तुम्‍हारे ग्‍लेशियर खंड
तुम्‍हारे शब्‍द-प्‍यास में
बुझाती हूँ अपनी मन-प्‍यास
और सौंपती हूँ अक्षय तृष्‍णा



तुम्‍हारे शब्‍दों की नाव से
मैं पहुँचती हूँ
तुम्‍हारे मन की यमुनोत्री तक
सेमल के फूल के रंग में
छिप होते हैं रेशमी फाहे                                                                                                                                                  और फूली हुई सरसों का
पीताम्‍बरी शगुन
वसंत ऋतु से पहले
वसंत के लिए।












अनमिट परछाईं


सूर्य को 
सौंप देती हूँ तुम्हारा ताप

नदी को
चढ़ा देती हूँ तुम्हारी शीतलता
हवाओं को
सौंप देती हूँ तुम्हारा वसंत
फूलों को
दे आती हूँ तुम्हारा अधर वर्ण
वृक्षों को
तुम्हारे स्पर्श की ऊँचाई
धरती को
तुम्हारा सौंधापन
प्रकृति को
समर्पित कर आती हूँ तुम्हारी साँसों की अनुगूँज

वाटिका में 
लगा आती हूँ तुम्हारे विश्वास का अक्षय वट

तुम्हारी छवि से
लेती हूँ अपने लिए अनमिट परछाईं
जो तुम्हारे प्राण से
मेरे प्राणों में
चुपचाप कहने आती है
तुम्हारी भोली अनजी आकांक्षाएँ
तुम्हारे दिन का एकांत एकालाप
तुम्हारी रातों का एकाकी करुण विलाप
मंदिर की मूर्ति में
दे आती हूँ तुम्हारी आस्था
ईश्वर में
ईश्वरत्व की शक्ति भर पवित्रता

तुमसे मिलने के बाद ।












समर्पण के नाम संबोधन


अपनी फड़फड़ाहट 
सौंप देती है पक्षियों को

अपना ताप 
लौटा देती है सूरज को


अपना आवेग 
दे देती है हवाओं को 

अपनी प्यास 
भेज देती है नदी के ओंठों को 

अपना अकेलापन 
घोल देती है एकांत कोने में 

फिर भी 
हाँ ...फिर भी 
उसके पास 
यह सब बचा रह जाता है 
उसकी पहचान बन कर 

मंदिर में 
ईश्वर को हाजिर मानकर 
वह लौटा देती है 
अपनी आत्मा 
गहरी शांति के लिए 

बहुत 
खामोशी है 
शब्द की तरह 

आँखें 
खुली हैं 
किताब की तरह 

हाथ की ऊँगलियों में 
फँसी है पेंसिल
उतरती है उससे काँपती रेखाएँ 
और सिहरते शब्द 

मन 
अब तक नहीं जान पाया 
कैसे कहे अपनी बात 
कि वह समझी जाये 
जो वह कहना चाहता है 
ईश्वर को ईश्वर 
और 
जरूरत को जरूरत   













मैं जानती हूँ


मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
फूल जानता है गंध
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
पानी जानता है अपना स्वाद
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
धरती जानती है जल पीना
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
फूल जानता है अपना फल, अपना बीज
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे 
हवाएँ पहचानती हैं मानसूनी बादल
बादल जानते हैं धरती की प्यास
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
शब्द जानते हैं अपने अर्थ
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
पृथ्वी जानती है सृष्टि का ऋतुचक्र
ऋतुचक्र जानते हैं अपने फल, फूल, फसल
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
वर्षा पहचानती है अपने कीट-पतंग
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
फुनगी जानती है जड़ों की जरूरत
और जड़ें पहचानती हैं फुनगी की खुराक
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
बीज सूँघते हैं ऋतुओं की गंध
और पृथ्वी जानती है बीज की अकुलाहट
मैं जानती हूँ तुम्हें
जैसे
स्त्री अनुभव करती है
भ्रूण के शिशु होने का स्पंदन
जैसे
आत्मा जानती है देह की जरूरत
देह जानती है आत्मा का सुख ।















देह का निर्गुण और सगुण


देह की देहरी पर
प्रेम 
सुख बनकर आता है 
मन देह की खातिर 
ह्रदय के आले पर 
अबुझ दीया धर जाता है 
देह के 
अंतर्मन की भित्ति पर 
टाँग देता है 
कई स्वप्न कैलेंडर 
कैलेंडर की छाती पर 
होते हैं प्रणय के जीवंत छाया चित्र 
गतिशील चलचित्र 
पग-तल में होता है जिनके 
वर्ष-चक्र तिथियाँ, दिवस, माह 

देह से घिरे, घर-भीतर 
पकती है प्रेम-गंध की रसीली रसोई 
कभी तृषा मिटाने के लिए 
कभी तृषा जगाने के लिए ।

देह-गेह के प्रांगण-बीच 
टँगा है मनोहर पिंजरा 
पला है जिसमें हरियाला तोता 
देह-गीत गाता है जो 
लोकगीतों की तरह 
मनकथा कहता है जो 
किस्सा-गो की तरह 
देह के भीतर 
मन की खँजड़ी पर 
ध्वनित होता है 
देह का निर्गुण और सगुण ।
















चिट्ठी से ...


चिट्ठियाँ
दुःख पूछने आयेंगी
शब्द
आँसू पोंछेंगे
आँखें
प्रेम के बैठने के लिए
शहर में
कोई पार्क ...
कोई रेस्तराँ
कोई प्लेटफॉर्म ...
कोई बेंच ...
कोई धँसा ढाबा ..
कोना-अतरा जैसा
ठियाँ नहीं खोजेंगी
सिर्फ देखेंगी

          कैलेंडर

          तारीखें

और डाक-विभाग की तत्परता
चिट्ठियाँ
समय पार लगाएँगी
जिन के
शब्द कभी ओंठ की तरह

          सिहरेंगे ...काँपेंगे ...सूखेंगे

शब्द कभी आह से थकी-मुँदी

          आँख की तरह चुप मिलेंगे

पढ़कर आँखें जानेंगी
गीला दुःख
कसकता ताप
अकेलेपन का संताप
मौन का संत्रास
जो किसी से कहा नहीं जा सकता
सिवाय
चिट्ठियों के आत्मीय वक्ष के













राग प्रार्थना


प्रेम
घुलता है
घोलता है।




द्रव्य की तरह
पिघलता है।
राग-प्रार्थना में
लिप्त हो जाती है – आत्मा



मुंदी पलकों और मौन अधरों के भीतर है
प्रेम का ईश्वर
जुड़े हुए हाथों के भीतर
हाथ जोड़े है -
प्रेम




प्रेम में
बग़ैर संकेत के
देह से परे हो जाती है – देह
अमूर्त देह में अनुभव होती है -
आत्मा की छुअन
अन्तत:
चेतना से सचेतन-संवाद।













प्रेमधुन


तुम्हारी ध्वनि में
सुनाई देती है
अपनी आत्मा की प्रतिध्वनि।



तुम्हारे शब्दों की बरसात में
भीगती है – आत्मा।



आत्मा जनित
प्रेम में होती है –
प्रेम की पवित्रता
और चिरन्तरता…
…बजती है – प्रेमधुन
रामधुन सरीखी
लीन हो जाने के लिए।

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                                                                                                                                                     गीत और ग़ज़ल
                                                                                                                                                    -निदा फाज़ली

              देखा गया हूँ


देखा गया हूँ मैं कभी सोचा गया हूँ मैं
अपनी नज़र में आप तमाशा रहा हूँ मैं

मुझसे मुझे निकाल के पत्थर बना दिया
जब मैं नहीं रहा हूँ तो पूजा गया हूँ मैं

मैं मौसमों के जाल में जकड़ा हुआ दरख़्त
उगने के साथ-साथ बिखरता रहा हूँ मैं

ऊपर के चेहरे-मोहरे से धोखा न खाइए
मेरी तलाश कीजिए, गुम हो गया हूँ मैं











 

मौत की नहर


प्यार, नफ़रत, दया, वफ़ा एहसान
क़ौम, भाषा, वतन, धरम, ईमान
उम्र गोया...
चट्टान है कोई
जिस पर इन्सान कोहकन की तरह
मौत की नहर....
खोदने के लिए,
सैकड़ों तेशे
आज़माता है
हाथ-पाँव चलाये जाता है 














मन बैरागी


मन बैरागी, तन अनुरागी, कदम-कदम दुशवारी है
जीवन जीना सहल न जानो बहुत बड़ी फनकारी है

औरों जैसे होकर भी हम बा-इज़्ज़त हैं बस्ती में
कुछ लोगों का सीधापन है, कुछ अपनी अय्यारी है

जब-जब मौसम झूमा हम ने कपड़े फाड़े शोर किया
हर मौसम शाइस्ता रहना कोरी दुनियादारी है

ऐब नहीं है उसमें कोई, लाल परी न फूल गली
यह मत पूछो, वह अच्छा है या अच्छी नादारी

जो चेहरा देखा वह तोड़ा, नगर-नगर वीरान किए
पहले औरों से नाखुश थे अब खुद से बेज़ारी है। 

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                                                                                                                                                        कहानी धरोहर


                                                                                                                                                      फणीश्वरनाथ रेणु

                                                              रसप्रिया

धूल में पड़े कीमती पत्थर को देख कर जौहरी की आँखों में एक नई झलक झिलमिला गई - अपरूप-रूप!

चरवाहा मोहना छौंड़ा को देखते ही पँचकौड़ी मिरदंगिया की मुँह से निकल पड़ा - अपरुप-रुप!

...खेतों, मैदानों, बाग-बगीचों और गाय-बैलों के बीच चरवाहा मोहना की सुंदरता!

मिरदंगिया की क्षीण-ज्योति आँखें सजल हो गईं।

मोहना ने मुस्करा कर पूछा, 'तुम्हारी उँगली तो रसपिरिया बजाते टेढ़ी हो गई है, है न?'

'ऐ!' - बूढ़े मिरदंगिया ने चौंकते हुए कहा, 'रसपिरिया? ...हाँ ...नहीं। तुमने कैसे ...तुमने कहाँ सुना बे...?'

'बेटा' कहते-कहते रुक गया। ...परमानपुर में उस बार एक ब्राह्मण के लड़के को उसने प्यार से 'बेटा' कह दिया था। सारे गाँव के लड़कों ने उसे घेर कर मारपीट की तैयारी की थी - 'बहरदार होकर ब्राह्मण के बच्चे को बेटा कहेगा? मारो साले बुड्ढे को घेर कर! ...मृदंग फोड़ दो।'

मिरदंगिया ने हँस कर कहा था, 'अच्छा, इस बार माफ कर दो सरकार! अब से आप लोगों को बाप ही कहूँगा!'

बच्चे खुश हो गये थे। एक दो-ढाई साल के नंगे बालक की ठुड्‌डी पकड़ कर वह बोला था, 'क्यों, ठीक है न बाप जी?'

बच्चे ठठा कर हँस पड़े थे।

लेकिन, इस घटना के बाद फिर कभी उसने किसी बच्चे को बेटा कहने की हिम्मत नहीं की थी। मोहना को देख कर बार-बार बेटा कहने की इच्छा होती है।

'रसपिरिया की बात किसने बताई तुमसे? ...बोलो बेटा!'

दस-बारह साल का मोहना भी जानता है, पँचकौड़ी अधपगला है। ...कौन इससे पार पाए! उसने दूर मैदान में चरते हुए अपने बैलों की ओर देखा।

मिरदंगिया कमलपुर के बाबू लोगों के यहाँ जा रहा था। कमलपुर के नंदूबाबू के घराने में भी मिरदंगिया को चार मीठी बातें सुनने को मिल जाती हैं। एक-दो जून भोजन तो बँधा हुआ ही है, कभी-कभी रसचरचा भी यहीं आ कर सुनता है वह। दो साल के बाद वह इस इलाके में आया है। दुनिया बहुत जल्दी-जल्दी बदल रही है। ...आज सुबह शोभा मिसर के छोटे लड़के ने तो साफ-साफ कह दिया - 'तुम जी रहे हो या थेथरई कर रहे हो मिरदंगिया?'

हाँ, यह जीना भी कोई जीना है! निर्लज्जता है, और थेथरई की भी सीमा होती है। ...पंद्रह साल से वह गले में मृदंग लटका कर गाँव-गाँव घूमता है, भीख माँगता है। ...दाहिने हाथ की टेढ़ी उँगली मृदंग पर बैठती ही नहीं है, मृदंग क्या बजाएगा! अब तो, 'धा तिंग धा तिंग' भी बड़ी मुश्किल से बजाता है। ...अतिरिक्त गाँजा-भाँग सेवन से गले की आवाज विकृत हो गई है। किंतु मृदंग बजाते समय विद्यापति की पदावली गाने की वह चेष्टा अवश्य करेगा। ...फूटी भाथी से जैसी आवाज निकलती है, वैसी ही आवाज-सों-य,सों-य!

पंद्रह-बीस साल पहले तक विद्यापति नाम की थोड़ी पूछ हो जाती थी। शादी-ब्याह, यज्ञ-उपनैन, मुंडन-छेदन आदि शुभ कार्यों में विदपतिया मंडली की बुलाहट होती थी। पँचकौड़ी मिरदंगिया की मंडली ने सहरसा और पूर्णिया जिले में काफी यश कमाया है। पँचकौड़ी मिरदंगिया को कौन नहीं जानता! सभी जानते हैं, वह अधपगला है! ...गाँव के बड़े-बूढ़े कहते हैं - 'अरे, पँचकौड़ी मिरदंगिया का भी एक जमाना था!'

इस जमाने में मोहना-जैसा लड़का भी है - सुंदर, सलोना और सुरीला! ...रसप्रिया गाने का आग्रह करता है, 'एक रसपिरिया गाओ न मिरदंगिया!'

'रसपिरिया सुनोगे? ...अच्छा सुनाऊँगा। पहले बताओ, किसने...'

'हे-ए-ए-हे-ए... मोहना, बैल भागे...!' एक चरवाहा चिल्लाया, 'रे मोहना, पीठ की चमड़ी उधेड़ेगा करमू!'

'अरे बाप!' मोहना भागा।

कल ही करमू ने उसे बुरी तरह पीटा है। दोनों बैलों को हरे-हरे पाट के पौधों की महक खींच ले जाती है बार-बार। ...खटमिट्ठाल पाट!

पँचकौड़ी ने पुकार कर कहा, 'मैं यहीं पेड़ की छाया में बैठता हूँ। तुम बैल हाँक कर लौटो। रसपिरिया नहीं सुनोगे?'

मोहना जा रहा था। उसने उलट कर देखा भी नहीं।

रसप्रिया!

विदापत नाचवाले रसप्रिया गाते थे। सहरसा के जोगेंदर झा ने एक बार विद्यापति के बारह पदों की एक पुस्तिका छपाई थी। मेले में खूब बिक्री हुई थी रसप्रिया पोथी की। विदापत नाचवालों ने गा-गा कर जनप्रिया बना दिया था रसप्रिया को।

खेत के 'आल' पर झरजामुन की छाया में पँचकौड़ी मिरदंगिया बैठा हुआ है, मोहना की राह देख रहा है। ...जेठ की चढ़ती दोपहरी में काम करनेवाले भी अब गीत नहीं गाते हैं। ...कुछ दिनों के बाद कोयल भी कूकना भूल जाएगी क्या? ऐसी दोपहरी में चुपचाप कैसे काम किया जाता है! पाँच साल पहले तक लोगों के दिल में हुलास बाकी था। ...पहली वर्षा में भीगी हुई धरती के हरे-हरे पौधों से एक खास किस्म की गंध निकलती है। तपती दोपहरी में मोम की तरह गल उठती थी - रस की डाली। वे गाने लगते थे बिरहा, चाँचर, लगनी। खेतों में काम करते हुए गानेवाले गीत भी समय-असमय का खयाल करके गाए जाते हैं। रिमझिम वर्षा में बारहमासा, चिलचिलाती धूप में बिरहा, चाँचर और लगनी -

'हाँ... रे, हल जोते हलवाहा भैया रे...'

खुरपी रे चलावे... म-ज-दू-र!

एहि पंथे, धनी मोरा हे रुसलि...।

खेतों में काम करते हलवाहों और मजदूरों से कोई बिरही पूछ रहा है, कातर स्वर में - उसकी रुठी हुई धनी को इस राह से जाते देखा है किसी ने?...

अब तो दोपहरी नीरस कटती है, मानो किसी के पास एक शब्द भी नहीं रह गया है।

आसमान में चक्कर काटते हुए चील ने टिंहकारी भरी - टिं...ई...टिं-हि-क!

मिरदंगिया ने गाली दी - 'शैतान!'

उसको छोड़ कर मोहना दूर भाग गया है। वह आतुर होकर प्रतीक्षा कर रहा है। जी करता है, दौड़ कर उसके पास चला जाए। दूर चरते हुए मवेशियों के झुंडों की ओर बार-बार वह बेकार देखने की चेष्टा करता है। सब धुँधला!

उसने अपनी झोली टटोल कर देखा - आम हैं, मूढ़ी है। ...उसे भूख लगी। मोहन के सूखे मुँह की याद आई और भूख मिट गई।

मोहना-जैसे सुंदर, सुशील लड़कों की खोज में ही उसकी जिंदगी के अधिकांश दिन बीते हैं। ...विदापत नाच में नाचनेवाले 'नटुआ' का अनुसंधान खेल नहीं। ...सवर्णों के घर में नहीं, छोटी जाति के लोगों के यहाँ मोहना-जैसे लड़की-मुँहा लड़के हमेशा पैदा नहीं होते। ये अवतार लेते हैं समय-समय पर जदा जदा हि...

मैथिल ब्राह्मणों, कायस्थों और राजपूतों के यहाँ विदापतवालों की बड़ी इज्जत होती थी। ...अपनी बोली - मिथिलाम - में नटुआ के मुँह से 'जनम अवधि हम रुप निहारल' सुन कर वे निहाल हो जाते थे। इसलिए हर मंडली का 'मूलगैन' नटुआ की खोज में गाँव-गाँव भटकता फिरता था - ऐसा लड़का, जिसे सजा-धजा कर नाच में उतारते ही दर्शकों में एक फुसफुसाहट फैल जाए।

'ठीक ब्राह्मणी की तरह लगता है। है न?'

'मधुकांत ठाकुर की बेटी की तरह...।'

'नः! छोटी चंपा-जैसी सुरत है!'

पँचकौड़ी गुनी आदमी है। दूसरी-दूसरी मंडली में मूलगैन और मिरदंगिया की अपनी-अपनी जगह होती है। पँचकौड़ी मूलगैन भी था और मिरदंगिया भी। गले में मृदंग लटका कर बजाते हुए वह गाता था, नाचता था। एक सप्ताह में ही नया लड़का भाँवरी दे कर परवेश में उतरने योग्य नाच सीख लेता था।

नाच और गाना सिखाने में कभी कठिनाई नहीं हुई, मृदंग के स्पष्ट 'बोल' पर लड़कों के पाँव स्वयं ही थिरकने लगते थे। लड़कों के जिद्दी माँ-बाप से निबटना मुश्किल व्यापार होता था। विशुद्ध मैथिली में और भी शहद लपेट कर वह फुसलाता...

'किसन कन्हैया भी नाचते थे। नाच तो एक गुण है। ...अरे, जाचक कहो या दसदुआरी। चोरी डकैती और आवारागर्दी से अच्छा है। अपना-अपना 'गुन' दिखा कर लोगों को रिझा कर गुजारा करना।'

एक बार उसे लड़के की चोरी भी करनी पड़ी थी। ...बहुत पुरानी बात है। इतनी मार लगी थी कि ...बहुत पुरानी बात है।

पुरानी ही सही, बात तो ठीक है।

'रसपिरिया बजाते समय तुम्हारी उँगली टेढ़ी हुई थी। ठीक है न?'

मोहना न जाने कब लौट आया।

मिरदंगिया के चेहरे पर चमक लौट आई। वह मोहना की ओर एक टकटकी लगा कर देखने लगा ...यह गुणवान मर रहा है। धीरे-धीरे, तिल-तिल कर वह खो रहा है। लाल-लाल होठों पर बीड़ी की कालिख लग गई है। पेट में तिल्ली है जरुर!...

मिरदंगिया वैद्य भी है। एक झुंड बच्चों का बाप धीरे-धीरे एक पारिवारिक डॉक्टर की योग्यता हासिल कर लेता है। ...उत्सवों के बासीटटका भोज्यान्नों की प्रतिक्रिया कभी-कभी बहुत बुरी होती। मिरदंगिया अपने साथ नमक-सुलेमानी, चानमार-पाचन और कुनैन की गोली हमेशा रखता था। ...लड़कों को सदा गरम पानी के साथ हल्दी की बुकनी खिलाता। पीपल, काली मिर्च, अदरक वगैरह को घी में भून कर शहद के साथ सुबह-शाम चटाता। ...गरम पानी!

पोटली से मूढ़ी और आम निकालते हुए मिरदंगिया बोला, 'हाँ, गरम पानी! तेरी तिल्ली बढ़ गई है, गरम पानी पियो।'

'यह तुमने कैसे जान लिया? फारबिसगंज के डागडरबाबू भी कह रहे थे, तिल्ली बढ़ गई है। दवा...।'

आगे कहने की जरूरत नहीं। मिरदंगिया जानता है, मोहना-जैसे लड़कों के पेट की तिल्ली चिता पर ही गलती है! क्या होगा पूछ कर, कि दवा क्यों नहीं करवाते!

'माँ, भी कहती है, हल्दी की बुकनी के साथ रोज गरम पानी। तिल्ली गल जाएगी।'

मिरदंगिया ने मुस्करा कर कहा, 'बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ!'

केले के सूखे पतले पर मूढ़ी और आम रख कर उसने बड़े प्यार से कहा, 'आओ, एक मुट्ठी खा लो।'

'नहीं, मुझे भूख नहीं।'

किंतु मोहना की आँखों से रह-रह कर कोई झाँकता था, मूढ़ी और आम को एक साथ निगल जाना चाहता था। ...भूखा, बीमार, भगवान!

'आओ, खा लो बेटा! ...रसपिरिया नहीं सुनोगे?'

माँ के सिवा, आज तक किसी अन्य व्यक्ति ने मोहना को इस तरह प्यार से कभी परोसे भोजन पर नहीं बुलाया। ...लेकिन, दूसरे चरवाहे देख लें तो माँ से कह देगें। ...भीख का अन्न!

'नहीं, मुझे भूख नहीं।'

मिरदंगिया अप्रतिभ हो जाता है। उसकी आँखें फिर सजल हो जाती हैं। मिरदंगिया ने मोहना - जैसे दर्जनों सुकुमार बालकों की सेवा की है। अपने बच्चों को भी शायद वह इतना प्यार नहीं दे सकता। ...और अपना बच्चा! हूँ! ...अपना-पराया? अब तो सब अपने, सब पराए।...

'मोहना!'

'कोई देख लेगा तो?'

'तो क्या होगा?'

'माँ से कह देगा। तुम भीख माँगते हो न?'

'कौन भीख माँगता है?' मिरदंगिया के आत्म-सम्मान को इस भोले लड़के ने बेवजह ठेस लगा दी। उसके मन की झाँपी में कुडंलीकार सोया हुआ साँप फन फैला कर फुफकार उठा, 'ए-स्साला! मारेंगे वह तमाचा कि...

'ऐ! गाली क्यों देते हो!' मोहना ने डरते-डरते प्रतिवाद किया।

वह उठ खड़ा हुआ, पागलों का क्या विश्वास।

आसमान में उड़ती हुई चील ने फिर टिंहकारी भरी ...टिंही ...ई ...टिं-टिं-ग!

'मोहना!' मिरदंगिया की अवाज गंभीर हो गई।

मोहना जरा दूर जा कर खड़ा हो गया।

'किसने कहा तुमसे कि मैं भीख माँगता हूँ? मिरदंग बजा कर, पदावली गा कर, लोगों को रिझा कर पेट पालता हूँ। ...तुम ठीक कहते हो, भीख का ही अन्न है यह। भीख का ही फल है यह। ...मै नहीं दूँगा। ...तुम बैठो, मैं रसपिरिया सुना दूँ।'

मिरदंगिया का चेहरा धीरे-धीरे विकृत हो रहा है। ...आसमान में उड़नेवाली चील अब पेड़ की डाली पर आ बैठी है। ...टिं-टिं-हिं टिंटिक!

मोहना डर गया। एक डग, दो डग ...दे दौड़। वह भागा।

एक बीघा दूर जा कर उसने चिल्लाकर कहा, 'डायन ने बान मार कर तुम्हारी उँगली टेढ़ी कर दी है। झूठ क्यों कहते हो कि रसपिरिया बजाते समय...'

'ऐं! कौन है यह लड़का? कौन है यह मोहना? ...रमपतिया भी कहती थी, डायन ने बान मार दिया है।'

'मोहना!'

मोहना ने जाते-जाते चिल्ला कर कहा, 'करैला!' अच्छा, तो मोहना यह भी जानता है कि मिरदंगिया 'करैला' कहने से चिढ़ता है! ...कौन है यह मोहना?

मिरदंगिया आतंकित हो गया। उसके मन में एक अज्ञात भय समा गया। वह थर-थर काँपने लगा। उसमें कमलपुर के बाबुओं के यहाँ जाने का उत्साह भी नहीं रहा। ...सुबह शोभा मिसर के लड़के ने ठीक ही कहा था।

उसकी आँखों में आँसू झरने लगे।

जाते-जाते मोहना डंक मार गया। उसके अधिकांश शिष्यों ने ऐसा ही व्यवहार किया है उसके साथ। नाच सीख कर फुर्र से उड़ जाने का बहाना खोजनेवाले एक-एक लड़के की बातें उसे याद हैं।

सोनमा ने तो गाली ही दी थी - 'गुरुगिरी कहता है, चोट्टा!'

रमपतिया आकाश की ओर हाथ उठा कर बोली थी - 'हे दिनकर! साच्छी रहना। मिरदंगिया ने फुसला कर मेरा सर्वनाश किया है। मेरे मन में कभी चोर नहीं था। हे सुरुज भगवान! इस दसदुआरी कुत्ते का अंग-अंग फूट कर...।'

मिरदंगिया ने अपनी टेढ़ी उँगली को हिलाते हुए एक लंबी साँस ली। ...रमपतिया? जोधन गुरुजी की बेटी रमपतिया! जिस दिन वह पहले-पहल जोधन की मंडली में शामिल हुआ था - रमपतिया बारहवें में पाँव रख रही थी। ...बाल-विधवा रमपतिया पदों का अर्थ समझने लगी थी। काम करते-करते वह गुनगुनाती - 'नव अनुरागिनी राधा, किछु नाँहि मानय बाधा।'...मिरदंगिया मूलगैनी सीखने गया था और गुरु जी ने उसे मृदंग थमा दिया था... आठ वर्ष तक तालीम पाने के बाद जब गुरु जी ने स्वजात पँचकौड़ी से रमपतिया के चुमौना की बात चलाई तो मिरदंगिया सभी ताल-मात्रा भूल गया। जोधन गुरु जी से उसने अपनी जात छिपा रखी थी। रमपतिया से उसने झूठा परेम किया था। गुरु जी की मंडली छोड़ कर वह रातों-रात भाग गया। उसने गाँव आ कर अपनी मंडली बनाई, लड़कों को सिखाया-पढ़ाया और कमाने-खाने लगा। ...लेकिन, वह मूलगैन नहीं हो सका कभी। मिरदंगिया ही रहा सब दिन। ...जोधन गुरु जी की मृत्यु के बाद, एक बार गुलाब-बाग मेले में रमपतिया से उसकी भेंट हुई थी। रमपतिया उसी से मिलने आई थी। पँचकौड़ी ने साफ जवाब दे दिया था - 'क्या झूठ-फरेब जोड़ने आई है? कमलपुर के नंदूबाबू के पास क्यों नहीं जाती, मुझे उल्लू बनाने आई है। नंदूबाबू का घोड़ा बारह बजे रात को...।' चीख उठी थी रमपतिया - पाँचू! ...चुप रहो!'

उसी रात रसपिरिया बजाते समय उसकी उँगली टेढ़ी हो गई थी। मृदंग पर जमनिका दे कर वह परबेस का ताल बजाने लगा। नटुआ ने डेढ़ मात्रा बेताल हो कर प्रवेश किया तो उसका माथा ठनका। परबेस के बाद उसने नटुआ को झिड़की दी - 'एस्साला! थप्पड़ों से गाल लाल कर दूँगा।'...और रसपिरिया की पहली कड़ी ही टूट गई। मिरदंगिया ने ताल को सम्हालने की बहुत चेष्टा की। मृदंग की सूखी चमड़ी जी उठी, दाहिने पूरे पर लावा-फरही फूटने लगे और तल कटते-कटते उसकी उँगली टेढ़ी हो गई। झूठी टेढ़ी उँगली! ...हमेशा के लिए पँचकौड़ी की मंडली टूट गई। धीरे-धीरे इलाके से विद्यापति-नाच ही उठ गया। अब तो कोई भी विद्यापति की चर्चा भी नहीं करते हैं। ...धूप-पानी से परे, पँचकौड़ी का शरीर ठंडी महफिलों में ही पनपा था... बेकार जिंदगी में मृदंग ने बड़ा काम दिया। बेकारी का एकमात्र सहारा - मृदंग!

एक युग से वह गले में मृदंग लटका कर भीख माँग रहा है - धा-तिंग, धा-तिंग!

वह एक आम उठा कर चूसने लगा - लेकिन, लेकिन, ...लेकिन ...मोहना को डायन की बात कैसे मालूम हुई?

उँगली टेढ़ी होने की खबर सुन कर रमपतिया दौड़ी आई थी, घंटों उँगली को पकड़ कर रोती रही थी - 'हे दिनकर, किसने इतनी बड़ी दुश्मनी की? उसका बुरा हो। ...मेरी बात लौटा दो भगवान! गुस्से में कही हुई बातें। नहीं, नहीं। पाँचू, मैंने कुछ भी नहीं किया है। जरुर किसी डायन ने बान मार दिया है।'

मिरदंगिया ने आँखें पोंछते हुए सूरज की ओर देखा। ...इस मृदंग को कलेजे से सटा कर रमतपिया ने कितनी रातें काटी हैं! ...मिरदंग को उसने अपने छाती से लगा लिया।

पेड़ की डाली पर बैठी हुई चील ने उड़ते हुए जोड़े से कहा - टिं-टिं-हिंक्‌!

'एस्साला!'उसने चील को गाली दी। तंबाकू चुनिया कर मुँह में डाल ली और मृदंग के पूरे पर उँगलियाँ नचाने लगा - धिरिनागि, धिरिनागि, धिरिनागि-धिनता!

पूरी जमनिका वह नहीं बजा सका। बीच में ही ताल टूट गया।

-अ‌‌‌-कि-हे-ए-ए-हा-आआ-ह-हा!

सामने झरबेरी के जंगल के उस पार किसी ने सुरीली आवाज में, बड़े समारोह के साथ रसप्रिया की पदावली उठाई -

'न-व-वृंदा-वन, न-व-न-व-तरु-ग-न, न-व-नव विकसित फूल...'

मिरदंगिया के सारे शरीर में एक लहर दौड़ गई उसकी उँगलियाँ स्वयं ही मृदंग के पूरे पर थिरकने लगीं। गाय-बैलों के झुंड दोपहर की उतरती छाया में आ कर जमा होने लगे।

खेतों में काम करनेवालों ने कहा, 'पागल है। जहाँ जी चाहा, बैठ कर बजाने लगता है।'

'बहुत दिन के बाद लौटा है।'

'हम तो समझते थे कि कहीं मर-खप गया।'

रसप्रिया की सुरीली रागिनी ताल पर आ कर कट गई। मिरदंगिया का पागलपन अचानक बढ़ गया। वह उठ कर दौड़ा। झरबेरी की झाड़ी के उस पार कौन है? कौन है यह शुद्ध रसप्रिया गानेवाला? इस जमाने में रसप्रिया का रसिक...? झाड़ी में छिप कर मिरदंगिया ने देखा, मोहना तन्मय होकर दूसरे पद की तैयारी कर रहा है। गुनगुनाहट बंद करके उसने गले को साफ किया। मोहना के गले में राधा आ कर बैठ गई है! ...क्या बंदिश है!

'न-वी-वह नयनक नी...र!

आहो...पललि बहए ताहि ती...र!'

मोहना बेसुध होकर गा रहा था। मृदंग के बोल पर वह झूम-झूम कर गा रहा था। मिरदंगिया की आँखें उसे एकटक निहार रही थीं और उसकी उँगलियाँ फिरकी की तरह नाचने को व्याकुल हो रही थीं। ...चालीस वर्ष का अधपागल युगों के बाद भावावेश में नाचने लगा। ...रह-रह कर वह अपनी विकृत आवाज में पदों की कड़ी धड़ता - फोंय-फोंय, सोंय-सोंय!

धिरिनागि-धिनता!

'दुहु रस...म...य तनु-गुने नहीं ओर।

लागल दुहुक न भाँगय जो-र।'

मोहना के आधे काले और आधे लाल होंठों पर नई मुस्कराहट दौड़ गई। पद समाप्त। करते हुए वह बोला, 'इस्स! टेढ़ी उँगली पर भी इतनी तेजी?'

मोहना हाँफने लगा। उसकी छाती की हड्डियाँ!

...उफ! मिरदंगिया धम्म से जमीन पर बैठ गया - 'कमाल! कमाल!...किससे सीखे? कहाँ सीखी तुमने पदावली? कौन है तुम्हारा गुरु?'

मोहना ने हँस कर जवाब दिया, 'सीखूँगा कहाँ? माँ तो रोज गाती है। ...प्रातकी मुझे बहुत याद है, लेकिन अभी तो उसका समय नहीं।'

'हाँ बेटा! बेताले के साथ कभी मत गाना-बजाना। जो कुछ भी है, सब चला जाएगा। ...समय-कुसमय का भी खयाल रखना। लो,अब आम खालो।'

मोहना बेझिझक आम ले कर चूसने लगा।

'एक और लो।'

मोहना ने तीन आम खाए और मिरदंगिया के विशेष आग्रह पर दो मुट्ठी मूढ़ी भी फाँक गया।

'अच्छा, अब एक बात बताओगे मोहना! तुम्हारे माँ-बाप क्या करते हैं?'

'बाप नहीं है, अकेली माँ है। बाबू लोगों के घर कुटाई-पिसाई करती है।'

'और तुम नौकरी करते हो! किसके यहाँ?'

'कमलपुर के नंदूबाबू के यहाँ।'

'नंदूबाबू के यहाँ?'

मोहना ने बताया उसका घर सहरसा में है। तीसरे साल सारा गाँव कोसी मैया के पेट में चला गया। उसकी माँ उसे ले कर अपने ममहर आई है... कमलपुर।

'कमलपुर में तुम्हारी माँ के मामू रहते हैं?'

मिरदंगिया कुछ देर तक चुपचाप सूर्य की ओर देखता रहा। ...नंदूबाबू - मोहना - मोहना की माँ!

'डायनवाली बात तुम्हारी माँ कह रही थी?'

'हाँ।'

'और एक बार सामदेव झा के यहाँ जनेऊ में तुमने गिरधर-पटटी मडंलीवालों का मिरदंग छीन लिया था। ...बेताला बजा रहा था। ठीक है न?'

मिरदंगिया की खिचड़ी दाढ़ी मानो अचानक सफेद हो गई। उसने अपने को सम्हाल कर पूछा, 'तुम्हारे बाप का नाम क्या है?'

'अजोधादास!'

'अजोधादास?'

बूढ़ा अजोधादास, जिसके मुँह में न बोल, न आँख में लोर। ...मंडली में गठरी ढोता था। बिना पैसा का नौकर बेचारा अजोधादास!

'बड़ी सयानी है तुम्हारी माँ।' एक लंबी साँस ले कर मिरदंगिया ने अपनी झोली से एक छोटा बटुआ निकला। लाल-पीले कपड़ों के टुकड़ों को खोल कर कागज की एक पुड़िया निकाली उसने।

मोहना ने पहचान लिया - 'लोट? क्या है, लोट?'

'हाँ, नोट है।'

'कितने रुपएवाला है? पचटकिया। ऐं... दसटकिया? जरा छूने दोगे? कहाँ से लाए?' मोहना एक ही साँस में सब कुछ पूछ गया, 'सब दसटकिया हैं?'

'हाँ, सब मिला कर चालीस रुपए हैं।' मिरदंगिया ने एक बार इधर-उधर निगाहें दौड़ाई, फिर फुसफुसा कर बोला, 'मोहना बेटा! फारबिसगंज के डागडरबाबू को दे कर बढ़िया दवा लिखा लेना। ...खट्ट-मिट्ठा परहेज करना। ...गरम पानी जरुर पीना।'

'रुपए मुझे क्यों देते हो?'

'जल्दी रख ले, कोई देख लेगा।'

मोहना ने भी एक बार चारों ओर नजर दौड़ाई। उसके होंठों की कालिख और गहरी हो गई।

मिरदंगिया बोला, 'बीड़ी-तंबाकू भी पीते हो? खबरदार!'

वह उठ खड़ा हुआ।

मोहना ने रुपए ले लिए।

'अच्छी तरह गाँठ बाँध ले। माँ से कुछ मत कहना।'

'और हाँ, यह भीख का पैसा नहीं। बेटा, यह मेरी कमाई के पैसे हैं। अपनी कमाई के...।'

मिरदंगिया ने जाने के लिए पाँव बढ़ाया।

'मेरी माँ खेत में घास काट रही है। चलो न!' मोहना ने आग्रह किया।

मिरदंगिया रुक गया। कुछ सोच कर बोला, 'नहीं मोहना! तुम्हारे-जैसा गुणवान बेटा पा कर तुम्हारी माँ 'महारानी' हैं, मैं महाभिखारी दसदुआरी हूँ। जाचक, फकीर...! दवा से जो पैसे बचें, उसका दूध पीना।'

मोहना की बड़ी-बड़ी आँखें कमलपुर के नंदूबाबू की आँखों-जैसी हैं...।

'रे-मो-ह-ना-रे-हे! बैल कहाँ हैं रे?'

'तुम्हारी माँ पुकार रही है शायद।'

'हाँ। तुमने कैसे जान लिया?'

'रे-मोहना-रे-हे!'

एक गाय ने सुर-में-सुर मिला कर अपने बछड़े को बुलाया।

गाय-बैलों के घर लौटने का समय हो गया। मोहना जानता है, माँ बैल हाँक कर ला रही होगी। झूठ-मूठ उसे बुला रही है। वह चुप रहा।

'जाओ।' मिरदंगिया ने कहा, 'माँ बुला रही है। जाओ।...अब से मैं पदावली नहीं, रसपिरिया नहीं, निरगुन गाऊँगा। देखो, मेरी उँगली शायद सीधी हो रही है। शुद्ध रसपिरिया कौन गा सकता है आजकल?...

'अरे, चलू मन, चलू मन- ससुरार जइवे हो रामा,

कि आहो रामा,

नैहिरा में अगिया लगायब रे-की...।'

खेतों की पगडंडी, झरबेरी के जंगल के बीच होकर जाती है। निरगुन गाता हुआ मिरदंगिया झरबेरी की झाड़ियों में छिप गया।

'ले। यहाँ अकेला खड़ा होकर क्या करता है?' कौन बजा रहा था मृदंग रे?' घास का बोझा सिर पर ले कर मोहना की माँ खड़ी है।

'पँचकौड़ी मिरदंगिया।'

'ऐं, वह आया है? आया है वह?' उसकी माँ ने बोझ जमीन पर पटकते हुए पूछा।

'मैंने उसके ताल पर रसपिरिया गाया है। कहता था, इतना शुद्ध रसपिरिया कौन गा सकता है आजकल! ...उसकी उँगली अब ठीक हो जाएगी।

माँ ने बीमार मोहना को आह्लाद से अपनी छाती से सटा लिया।

'लेकिन तू तो हमेशा उसकी टोकरी-भर शिकायत करती थी - बेईमान है, गुरु-दरोही है, झूठा है!'

'है तो! वैसे लोगों की संगत ठीक नहीं। खबरदार, जो उसके साथ फिर कभी गया! दसदुआरी जाचकों से हेलमेल करके अपना ही नुकसान होता है। ...चल, उठा बोझ!'

मोहना ने बोझ उठाते समय कहा, 'जो भी हो, गुनी आदमी के साथ रसपिरिया...।'

'चौप! रसपिरिया का नाम मत ले।'

अजीब है माँ! जब गुस्साएगी तो वाघिन की तरह और जब खुश होती है तो गाय की तरह हुँकारती आएगी और छाती से लगा लेगी। तुरत खुश, तुरत नाराज...

दूर से मृदंग की आवाज आई - धा-तिंग, धा-तिंग!

मोहना की माँ खेत की ऊबड़-खाबड़ मेड़ पर चल रही थी। ठोकर खा कर गिरते-गिरते बची। घास का बोझ गिर कर खुल गया। मोहना पीछे-पीछे मुँह लटका कर जा रहा था। बोला, 'क्या हुआ, माँ?'

'कुछ नहीं।'

-धा-तिंग, धा-तिंग!

मोहना की माँ खेत की मेड़ पर बैठ गई। जेठ की शाम से पहले जो पुरवैया चलती है, धीरे-धीरे तेज हो गई ...मिटटी की सुंगध हवा में धीरे-धीरे घुलने लगी।

-धा-तिंग, धा-तिंग!

'मिरदंगिया और कुछ बोलता था, बेटा?' मोहना की माँ आगे कुछ बोल न सकी।

'कहता था, तुम्हारे-जैसा गुणवान बेटा...'

'झूठा, बेईमान!' मोहना की माँ आँसू पोंछ कर बोली, 'ऐसे लोगों की संगत कभी मत करना।'

  मोहना   चुपचाप खड़ा रहा।    

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                                                                                                                                                         कहानी  विशेष


                                                                                                                                                         - अनीता रश्मि

      धरती- अबुआ बिरसा 

     18वीं सदी की एक जादुई रात

चुहचुहाते पसीने के बीच दर्द की उठती लहर. बार-बार ऐंठ जाती करमी की पूरी देह! लुग्गा किधर, खुद किधर, पता ही नहीं चल रहा था. बस, बार-बार दरद-पीडा़ से मुँह सूखकर छुहाड़ा हो जा रहा था. सब कुछ अंधेरे में डूबा हुआ लग रहा था. एकाएक सारा गाँव चमक से भर गया. सब तरफ उजियारा ही उजियारा! करमी की देह में उठती दरद की लहर ठहर गई. उसके घर में एक अलौकिक बालक ने जन्म लिया है, यह बात वह उस समय तो नहीं समझ सकी पर जैसे-जैसे वह बड़ा होने लगा, उसमें एक तेज की झलक मिलती.

  उसे कभी घबराहट होती, कभी गरब करती- उसका छौव्वा आउर छौव्वा लोग से अलग है. उस झोपड़े में वृहस्पतिवार को जन्मने के कारण वह बालक बिरसा नाम से प्रचलित! धीरे- धीरे कोंपल मजबूती धारण कर रहा था. बड़ी-बड़ी बोलती आँखें. साँवला सलोना गात. खुले बदन गाय, बकरी की चरवाही करते हुए घंटों बाँसुरी बजाता. न उसे बाघ से भय लगता, न भालू से. आस- पास ही हिरण, सियार, हुंराड, बनैला सूअर घूमते रहते. बिरसा की बॅंसरी की तान में वे भी मस्त. गाँववाले तो दीवाने थे ही. यह देख-देख करमी और सुगना का हिया जुड़ा जाता.

  जिस धरती में ‘सेन गी सुसुन, काजी गी दुरंग’ अर्थात ‘चलना ही नृत्य, बोलना ही गीत’ था वहाँ का लाल नृत्य- संगीत से अलग कैसे रह सकता था. वह टुइला  एक वाद्य-यंत्र  भी बजाता, फिर वही, जंगल के जानवर-पंछी सब पास डोलने लगते.

   उसका काला उघरा बदन सूरज की जगमग रोषनी में नहाता चमकता रहता. वह काला भुजंग छोकरा. जंगल-जंगल, डगर-डगर फिरते हुए धीरे-धीरे वह बड़ा हो रहा था. कभी-कभार माय करमी उसे पोखर ले जाकर रगड़-रगड़ कर निहलाती और खुद भी निहाती. फिर अपने इष्ट को प्रणाम करती. वह अपलक देखता रहता.

   जंगल में पहरेदार से खड़े बड़े- बड़़े गाछ के कारण अॅंधियारा छाया था पर आउर छौव्वा मन के साथ आठ बरिस का बिरसा बेखौफ होकर जंगल में हेल गया. उसका बाप सुगना ने उसके अंदर से जंगल के भय को एकदमे निकाल दिया था. घर के छप्पर पर खोंसी गई बाँसुरी उठा वह चल दिया जंगल. पेड़ तले बैठ होंठों से बाँसुरी लगा ली. रस की धार बहने लगी. का सुग्गा, का मैना, का बया-गौरैया, क्या हरियल पंछी सभी उड़-उड़ कर इस डाल से उस डाल बैठने लगे. कोई उड़कर नहीं गया. लगा, संगीत की रसधार में वे भी उभ- चुभ कर रहे हैं. उसने अपनी धोती को जांघों के पास से मोड़ कर बाँधते हुए सर उठाकर देखा. आसमान पर कारे बादर छा रहे थे. निर्मल-नीला आकाश पल भर में मलिन. वह घर जाने के लिए उठ खड़ा हुआ. उसने फेंटा में वंशी को बाँधा. और चल दिया मवेशियों को समेटने.

  सुगना को बड़ा शौक कि बेटे को पढ़ा-लिखाकर आदमी जइसन बनाए. ई चरवाही में बिरसा को भी कहाँ मन लगता था. उसे लेकर पैदल ही सुगना चाईबासा पहुँचा. चाईबासा के सलगा नामक सकूल में जब नाम लिखा दिया, तबे उसको चैन पड़ा. पर हुँआ से ही बिरसा का जिनगी में नया मोड़ आएगा, वह बिगड़ जाएगा, यह वह नहीं जान पाया. वहाँ रहते हुए बिरसा जब-तब उ गोरा लोग का ज्यादती की बात सुनता या भेदभाव देखता. उसका खून खौल जाता.

  एक दिन तो विचितर बात हो गई. उस दिन बिरसा कुछ सोचते हुए एक रास्ते पर चला जा रहा था कि पैरों के पास बूटों की चमक दिखलाई पड़ी. उसने नज़र उठाई. वह चैकन्ना होकर देखने लगा. अपलक और बेखौफ!

   ‘‘ ऐई, यह रास्टा किडर को जाटा हाय?’’ एक गोरे ने राह काटकर उससे पूछा.

   बिरसा का तरवा का लहर कपार पर. इन गोरी चमड़ी और नीली आँखोंवाले गोरों से उसे बेतरह चिढ़ हो आई थी.

  ‘‘ ई लोग ही उसके आदिबासी साथियों का मजाक  उड़ाता है. ई लोग ही इतना हड़बोंग मचाता है. हमरे देश में आकर हमीं को सताता है. ’’ वह अक्सर कहता.

  बिरसा पहले से ही खफा था. उसकी बेखौफ आँखें गुस्से से लाल हो उठीं.

  ‘‘ हमसे ई छोटे से रास्ते के बारे में मत पूछो. जब हाम बड़ा होंगे, तुमको तुम्हारा असली रास्ता बता देंगे. सात समुंदर पार जाने का रास्ता!’’

  किशोर बिरसा की अकड़ से भरी बात. अंगे्रज की तिरछी निगाह उस पर गिरी. इसकी आँखों में चिंगारी. उसकी आँखों में भी. चिंगारियों की टकराहट आगे क्या रूप लेगी, उस समय कहना मुश्किल था. फिर दोनों अपनी-अपनी राह लग गए.

  सलगा की धरती पर मिशन स्कूल में पढ़ते हुए उसके अंदर ही अंदर बहुत कुछ सुलगता रहा. बस! वह अपने बड़े होने का इंतजार करने लगा. नित्य अपने पुट्ठे देखता, भीगती मसों को सहलाता. अंदर की धधकती आग से झुलसने लगता उसका तन-मन. संकल्प की तलवार पर धार चढ़ने लगती. उसका चेहरा तमतमा उठता, जब भी वह बग्घी या घोड़े पर सवार चुस्त-चैकस गोरे को देखता. उनके कलफ लगे टंच कपड़ों को वह नफरत से देखता रहता बहुत दूर तक. इस छोटे बालक की नफरत पर निगाह नहीं पड़ती उनकी.

  किशोर बिरसा का पंद्रहवाँ साल! कद-काठी में मजबूत! उसके अंदर धधकती क्र्रांति की ज्वाला! धुंध भी! क्या... कैसे...कब की उहा-पोह! लेकिन ज्यादा देर नहीं रही धुँध. कोहरे की चादर फटते ही उसके सामने सब कुछ एकदम साफ.

  ‘‘हे सिंगबोंगा हम तुमरा कसम खाकर कहते हैं कि जब तक इन अंगरेजों को सात समंदर पार नहीं भेजेंगे, चैन से नहीं बैठेंगे.’’

  उसने मन ही मन ठाना. उसने अपनी जिंदगी का लक्ष्य निर्धारित कर लिया था.

  सहपाठी कहते - ‘‘उसके अंदर एक उजर आतमा है!’’

   सब धर्मों के प्रति आदर! चाईबासा स्कूल छोड़ने के बाद बनगाँव के जमींदार जगमोहन सिंह के मुंशी ने सहारा क्या दिया, मानो एक नई राह खोल दी. रामायण-महाभारत के किस्सों से, तुलसी-चंदन से उसका नाता जुड़ने लगा. हिंदुओं की पूजा-अर्चना में उसका भी मन रमता. सनातन धर्म के प्रति गजब खिंचाव! वह आनंद पांडेय के द्वार पर जा पहुँचा. उस समय सांध्य का झुटपुटा. वे संझा- बाती करके उठ ही रहे थे कि बिरसा के आगमन की सूचना मिली. उन्होंने तुलसी चैरे पर रखे दीए से आरती ली और बाहर चल पड़े. बिरसा की ख्याति फैलने लगी थी. नाम से अनजाने न थे.

   ‘‘सनातन धर्म क्यों ?’’

  उन्होंने घूरकर आदिवासी नवजवान को परखा. उन्हें बिरसा के बात-व्यवहार में कुछ ऐसा अजूबा दिखा, वे तुरंत तैयार हो गए.

   उसकी शिक्षा- दीक्षा शुरु! बिरसा ने जनेउ धारण किया. तुलसी की पूजा भी करने लगा. अपने काले भाल पर जब वह चंदन का टीका लगाता तो पूरा चेहरा दमक उठता. दो सुंदर, बड़ी- बड़ी आँखों के बीच दमदमाता चंदन औरं मन में सनातन धर्म को और जानने की प्रबल इच्छा! वैष्णव पंथ से अप्रतिम लगाव! बढ़ता ही रहा यह जुनून! और इस जुनून ने उसके सोच की धारा बदल दी. उसे अपने समाज की खामियाँ दिखलाई पड़ने लगी. वह उन खामियों को बदलने की फिराक में रहने लगा. स्वाध्याय और मनन-चिंतन बढ़ता गया.

   पठार की धमक

 

    छोटानागपुर के पठार में एक अजीब सी खा़मोशी. बिरसा के कदमों की धमक उसके पहाड़ों, जंगलों, खाईयों के भयावह सन्नाटे को भंग का रही थी. केवल पेट के सफर में लीन मुण्डाओं के अंदर एक आग धधकाने का काम बिरसा ने अपने जिम्मे स्वेच्छा से ले लिया. आदिम जातियों में भी शिक्षा का अलख जगाने की आवष्यक्ता है, पर कैसे? वह एकांत में कुछ सोचने की चाह में एक चट्टान पर जा बैठा. बगल की छोटी-सी चट्टान पर पैर टिका लिए.

   ‘‘क्या किया जाए जो इन लोगों की सोच बदले. ये पढ़ना- लिखना सीखें, बेकार के अंधविष्वास से उनका पीछा छूटे. तनिक आदमी बने सब.’’  

   वह माथे पर हाथ रखे लगातार सोचे जा रहा था. इन्हें जमींदारों के अत्याचार और प्रकोप से भी बचाना है. वह चट्टान पर ही पसर गया. थोड़ी आँख लग गई. शाम का ललहुन सूरज दूर पहाड़ पर छिपने की तैयारी कर रहा था. जंगल में अंधेरा उतर आया था. थेाड़ी- बहुत लालिमा छन-छन कर आ रही थी. उसी समय उनके सामने इंजोर छा गया.

  उसे लगा, वह सिंगबोंगा  सूर्य  का दूत बनकर आया है. सिंगबोगा ने हर वस्तु दी है. वह इतना शक्तिमान हो गया कि सब कुछ ठीक कर सकता है. हर तरह की प्रताड़ना से अपने लोगों को छुटकारा दिला सकता है. उसे बीमार को स्वस्थ करने की ताकत भी सिंगबोंगा ने दे दी है. दिकुओं-जमींदारों, गोरों से लड़ने की ताकत भी. उसने अपने अंदर एक कल्पनातीत परिवर्तन महसूस किया.  उनके मन- तन में उत्साह का ज्वार. उसने काम की शुरुआत करने की ठानी और लगभग दौड़ते हुए जंगल के अंधेरे से बाहर के उजाले की ओर चल पड़ा. बरसात के कारण सब तरफ कीचड़ ही कीचड़! गिरते-संभलते, ढूहों से रपटते हुए जंगल के बाहर आया. उसे इसी तरह राह बनानी है.

   उसने अपने परम मित्र से कहा- ‘‘कुछ लोगों को लेकर एक दल बनाया जाए. उस दल में मेहनत से काम करनेवालों को रखा जाए.’’

  ‘‘ हाँ, यह ठीक रहेगा. ’’

  ‘‘ सबको मिल-जुल कर जमींदारों की ज्यादती से लड़ना सिखाया जाए. फिर ई अंगरेज लोग को भी मार भगाया जाए. ’’ 

  ‘‘ मेहनत काफी करनी पडेग़ी. ’’

  ‘‘ मेहनत से कौन डरता है? ’’

   धीरे-धीरे अन्याय के लिए उठे उनके कदमों को हजारों का साथ मिल गया. दिन-रात सभा- गोष्ठी में ही बीतने लगा. चमचमाते चेहरे की आभा से सभी दंग रह जाते. घुटनों के पास से मोड़कर पहनी गई धोती में सौम्य पर बलि ठ बिरसा. बड़ी-अड़ी आँखें, गठीला बदन, दमकता भाल देखकर ही सब लोग सुध-बुध भूल जाते. बिरसाइतों की संख्या बढ़ने लगी थी.

  ‘‘ का रे बिरसा ऐही दिन ले हमलोग तुमको जनम दिए थे? ’’

  ‘‘ अरे तू ई सभा- जुलूस में लगल रहेगा तो कौन हमारा सहारा बनेगा. ’’  

  माय समझाती, बाप भी. उस पर तो समाज सुधार एवं देशप्रेम का दौरा पड़ा था. कनघ्टियाकर सब सुनता रहता.

  ‘‘ ई छौड़ा हाथ से बेहाथ हो गया करमी. ’’

  ‘‘ हाँ रे! ’’

  सुगना अलग सर धुनता. बिरसा के लंबे बालों में जुएँ न थीं शायद. माय बाबा की बात मान वह केवल अपने काम से काम नहीं रख सका. उसका उद्देश्य बड़ा. वह अपने समाज के प्रत्येक जन में आत्मसम्मान, गौरव, आत्मविश्वास, देशप्रेम भरना चाहता था. 

   ‘‘ आप काहे नहीं समझते हैं, हमरा जन्म खाली कमाने, खाने और मर जाने के लिए नहीं हुआ है. हम जंगल के सारे वाशिंदों की हर तकलीफ में शामिल रहना चाहते हैं. उनकी बीमारी-हारी सबमें स़ाथ. सबका दुख दूर करना ही हमारा धर्म है.’’

  वे दोनों भक्! उसकी ओर ताकने लगे. ऐसा सोचा न था. बेटे के लिए बस एक छोटा-सा सपना ही तो संजोया था.

 ‘‘ कानू तेरा देखभाल करेगा. ’’ उसने अपने भाई की ओर इशारा किया. उसकी बहनें चंपा, कोम्मा और दसकीर भी माय- बाबा को देख लेंगी, उसे विश्वास था.

  वह उठकर किनारे चला गया. पीछे खड़े रह गए माय-बाबा की आँखें लोर से भर गई. वह गिरिजा के बीमार छौव्वा को देखने के लिए आगे बढ़ गया. उसे बहुत-सी निराश आँखों का लोर पोछना था.

  हजारों की भीड़! भीड़ का नेता बिरसा. नंग-धडंग लोग भूखे-प्यासे ही उसकी बात सुनने, बात मानने के लिए जुट आए थे. उसकी धीर-गंभीर आवाज गूँज उठी.

  ‘‘ तुम सब मत घबराना हम हैं. बस हम जैसे बोलते हैं, वैसे अपने रीति -रिवाज, खान-पान, पूजा-पाठ में बदलाव लाओ. हम चाहते हैं, सारा आदिबासी एक हो जाए. जैसे-एक हार में खूब सारा मोती, जैसे एक पलाश का पेड़ में बहुत सारा फूल!  जैसे एक डारी पर ढेर सारा पतय! जैसे एक मुनगा में ढेरों सहजन. का समझे ? ’’

  ‘‘ सब मिल कर अपना कुरीति- अंधविश्वास को दूर करेा. ’’

  ‘‘ अपना देश को आजाद कराने के लिए अपनी जान लगा देा. हर बात में बदलाव लाना जरुरी है. इसके बिना हमें न अपना देश मिलेगा, न अच्छी शिक्षा, न बीमारी से छुट्टी. हमको दिकू-से भी लड़ना है और गोरों से भी. ’’

  बिरसा की आवाज जादू सा कार्य करती.

  ‘‘ आओ आज हम जंगल का कसम खाते हैं कि जब तक हम...’’

  ‘‘ .....धरती आबा...धरती का पिता के जय! भगवान बिरसा के जय.’’

   पूरा वन पंरातर उनके जयजयकार से थर्रा उठता. देखते-देखते वह कब धरती अबुआ बन बैठा, उसे पता ही नहीं चला. लोग भगवान कहते, उसें अच्छा लगता. भगवान बनकर ही वह लोगों को बचा सकता था. तुरही, सिंगा वाद्य-यंत्रों की आवाज के बीच युद्ध के नगाड़े की भी आवष्यकता महसूस होने लगी थी.

   ‘‘ई तो हमारा फर्ज है. हमारे उपर अपनी जमीन का कर्ज है जिसे हमको उतारना है.’’

  चमत्कारों के किस्सों से भर रही थी सबकी झोली! अंग्रेजों के दमन, जमींदारों, इजारदारों बीमारी, अकाल के कोप से कोई बचा सकता है तो वह बिरसा है, ऐसा विश्वास उन बेबसों को हो गया था. उसकी बात मानकर वे अन्य बेांगाओं से भी दूर हट रहे थे. कई-कई बोंगाओं अर्थात वन देवताओं को माननेवालों को वह मात्र एक सिंगबोंगा की आराधना करने के लिए प्रेरित करता.

  ‘‘ सिंगबोंगा पूरी कायनात का संचालक! यह सर्वोत्तम, सर्वशक्तिमान, सृजनकर्ता तथा जड़-चेतन का का पोषक है. इस प्रकाश के देवता के सिवा किसी की पूजा न करें. ’’

. ‘‘ असंख्य बोंगाओं की नहीं, बस एक ईश्वर की पूजा करना उचित है.’’

 ‘‘ भैंस, मुर्गा, बकरा किसी जीव का बलि देना पाप है. सभी जीव को जीने का अधिकार है. जीव-हत्या बंद करो ’’

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  एक बार जंगल से लकड़ी लेकर जैसे ही सोम मुण्डा लौट रहा था , फुफकारता हुआ एक सांप सामने आ गया. एक पल के लिए तो वह डरा. फिर हिम्मत बाँधी. हुस्स! हुस्स!! और गोटे लकड़ी को उस पर पटक दिया. साप हुँए ढेर!

  पर एक दिन बिच्छू से खेलते रहनेवाला सागू उसकी जहर की चपेट में आ ही गया. अपने पूरे हाथ-पैर पर बिच्छुओं को रखे रहता. वे इधर- उधर घूमते हुए उसके शरीर में गुदगुदी भर देते. लेकिन जात तो बिच्छू का. एक साथ पांच-छह बिच्छुओं ने काट लिया. बिख गोटे शरीर में फैल गया. दौडत़े हुए अपने बेटा के आगे आकर गिर गया. आनन-फानन में उसे ओझा से झाड़- फूंक करवाने ले जाया गया. ओझा झाड़-फूंक का लाख उपाय करे, बिख उतरे ही नहीं, चढ़ता ही जाए. अंत में सागू मर गया.

  बिरसा बाहर था. लौटकर आया तो सारी बात मालूम हुई.

    इसी तरह कुछ दिन पहले जड़ी देकर बुखार चढ़ा था गामा को तो वह अॅंट-शँट बकने लगा था.  सबने ‘‘उसको भूत पकड़ लिया ’का.’’ हल्ला मचा दिया.

  उस दिन भी संगठन के काम से बिरसा बाहर था. जब लौटकर आया, ओझा की झाड़ू की मार खा-खाकर गामा दम तोड़ चुका था. बिरसा को अचानक याद आया, ऐसे ही एक गरीब दुखियारिन विधवा को लाठी से पीट-पीट कर मार दिया गया था. और लोग  चिल्ला रहे थे-

‘‘ कुकी डाइन थी. कुकी डाइन खा गई उसको.’’

   उस दिन बिरसा जमकर बरसा.

  ‘‘ ई डायन-बिसाही सब बेकार बात है. भूत-वूत कुछो नय होता है. सबसे पहले सबको ई बात समझना होगा, तभी कुछो अच्छा काम कर सकते हैं. समझा बुड़बक-बकार सब!’’

  ‘‘ ओझा-मताइन पर भरोसा मत करेा.’’ वह कब से यह बात कह रहा है.

 ‘‘ हडि़या दारू मत पियो.’’

  आखिर सागू उसका साथी था. उस दिन से ही वह इन आदिवासियों के अंधविश्वास से लड़ने की सोचने लगा था. सागू मुण्डा का चेहरा रह-रहकर उसके सामने आ जाता. मुण्डारी गीत गाते हुए जब सागू नाचता, बिरसा उसे अपलक देखता रहता. वह समझ गया, उसे बहुत लंबी लड़ाई लड़नी है.

   ‘‘काश ! हम आज गाँव में रहते. जड़ी-बूटी से ही उसको ठीक कर देते.’’

   वह चिंतित हो एक आम के पेड़ के नीचे जा लेटा. कैसे सुधारे, कैसे समझाए ? आम के मंजराने के दिन थे. बगल की एक झुकी डाल पर उसने अपना मुरेठा और तीर-धनु   टाँग दिया था. साथ में संगठन के एक-दो साथी भी थे. कुछ ही देर में उसका ध्यान सामाजिक समस्याओं से हटकर राजनीतिक समस्या की ओर मुड़ गया.

  ‘‘ अपना खूॅंटकुटी अधिकार आदिवासियों को छोड़ना पड़ा. जमींदार, दिकू लोग बेईमानी से सिकरी सोनोंग के द्वारा जंगल-झाड़, परती जमीन, मझियस जमीन छीन लिया. सबको सबक सिखाना होगा. गलत नापी से हम जंगली लोगों का जंगल तक छीन गया. ’’

  ‘‘ हमें अपना हातु बचाना है. कैसे भी.’’

 जब मुण्डा लोग असुर लोगों से अलग होकर यहाॅं आए, झाड़- झंखाड़ों को काटकर समतल जमीन तैयार कर वहाॅं रहने लगे. वही हैे खॅंूटकटी हातु. सबका अपना-अपना हातु .                                      

  उसकी नाक से एक छोटा टिकोरा टकराकर जमीन पर जा गिरा. उसने उसे उठाकर अपने मजबूत दाॅंतो के नीचे कुचला तो एक कसैला स्वाद मॅंुह में भर गया.

  ‘‘यह सब जल्दी कुचल देना होगा. सब तरफ धीरे-धीरे आग सुलग  रही है. बस, हवा देने की जरुरत है.’’

  उसके साथ सबकी नसें फड़फड़ा उठीं. गाछ की डाली पर लटके तीर-धनु  को कंधे पर लटकाकर वह पोखरा की ओर चल पड़ा. उसके पैरों की तेजी से कई पाखी फड़फड़ाकर उड़े. फिर वापस अमलतास, षीषम, कुसुम, सागवान, षाल के गाछों पर जा बैठे. अहरा के किनारे बैठे पोड़की टुकुर-टुकुर ताकने लगे. खेतों में लगी फसलों ने सहमकर हवा की ताल पर झूमना बंद कर दिया. 

अंग्रेजों के दाँत भी खट्टे हो रहे थे. उनका दमन जितना बढ़ता, विरोध के स्वर उतने ही तीखे!

 ‘‘ दिन में ही तरेंगन दिखला देंगे, जल-जंगल, जमीन नहीं देंगे.’’

 पहले विरोध अहिंसात्मक! साथियों की जिद ठुकराकर अहिंसा की छॅाव तले ही पनपता गया था पहले आंदोलन! फिर दिकुओं-अंग्रेजों के विरोध में छिड़ा अहिंसात्मक युद्ध भयंकर होता गया. बाद में अहिंसात्मक भी. उलगुलान...संपूर्ण क्रांति का बिगुल बज चुका था.
    अबुआ राइज एटे जना, दिकू राइज टुंडू तना

 नगाड़ा!...एक बड़ा सा नगाड़ा बज रहा था......ढम!.....ढम!.....ढम! लोग जमा होने लगे। भीड़ बढ़ती गई।

  ‘‘ अबुआ राइज एटे जना, दिकू राइज टुडू तना.....हमरा राज आ रहा है, दिकू राज खत्म होनेवाला है।’’

सबके अंदर एक अजीब तरह की खुशी। बिरसा के हजारों चेलों के अंदर विश्वास की गहरी पर्तें ! जिन साथियों के साथ धूल-धुसरित हो वे पले-बढें, जिनके साथ कई बार साल, सेमल महुआ, पलाश के गंध से सराबोर हुए। जिन कंकरीली-पथरीली रास्तों पर मगन हो खाली पैर दौड़कर जंगली राहों की दूरियाँ नापी थी, आज उन्हीं लोगों के आगे सूरज भगवान की तरह चमक रहा था। सब चेला चपाटी धनुख को उठा जब तीर चलाता, क्या मजाल जो एक भी दुश्मन बचकर निकल जाए।

   एक दिन अपनी तलवार की म्यान पर हाथ रखते हुए गरजा एक अंग्रेज अधिकारी -

  ‘‘ये बिड़सा गॉड कैसे हो गया। वह मैडमैन... उसको सब गॉड बोलटा। उ काला आडमी! उसे पकड़ना मांगटा। नाय टो ई हमारा हानि कर सकटा हाय।’’

 उसके साथियों ने भी बिरसा का यह ताकत और साहस महसूस किया था।  ‘‘इसने सबको टैक्स देने नहीं डिया। ब्रिटेन का शासन मानने से इंकार करटा। सारा आडिवासी उसके टरफ हाय। उ जंगल में आग लगाने का ताकट रखटा हाय। उसको अरेस्ट करने को जरुरट हाय। ’’

   ‘‘आब हमारा हुकूमट उसका अरेस्ट का कब ऑर्डर देगा? डेर करने से उ मैडमैन को पकड़ना कठिन होगा।’’

   दूसरे ने हाँ में हाँ मिलाई। सबकी नजरों में बिरसा चमत्कारी व्यक्ति था। अंग्रेज उसे पागल साबित करने पर तुले थे। अति आधुनिक हथियारों के आगे उलगुलान के वीरों के वे परंपरागत हथियार क्या कहर ढा सकते हैं,  इसका अंदाज अंग्रेजों को करा दिया गया था। डरे हुए आतताईयों ने बिरसा की गिरफ्तारी का फरमान जारी कर दिया। उसको गिरफ्तार करने के लिए फौज की टुकड़ी जंगल-जंगल, गाँव-गाँव मारी-मारी फिरने लगी। कंदराओं की खाक छानी जाने लगी। दमन का चक्का तेज गति पकड़ने लगा। कितने मासूम-निर्दोशों को जिंदगी से हाथ धोना पड़ा। भय की कुहेलिका में डूब गए सब। मन के भीतर भी जंग छिड़ गया।

   बिरसा ने अपनी धोती को सदा की तरह उलटकर घुटने से उपर बाँधी, मस्तक पर चंदन का टीका लगाया. अपने  सफेद मुरेठा  पगड़ी  को कसकर सर के चारों तरफ लपेट उठ खड़ा हुआ. आज लोगों को समझाना जरुरी. अनुयायियों की हिम्मत पस्त हो सकती है. उसके कंधे पर धनु की डोर लटकने लगी और कंधे पर तरकश. कुछ ही देर में वह साथियों को संबोधित कर रहा था-

  ‘‘ भय मत करो. मेरा शासन आरंभ हो गया है. उनकी बंदूकें काठ में बदल जाएँगीं. गोलियाँ पानी के बुलबुले बन जाएँगीं. अंग्रेज मेरे राज को धमकी दे रहे हैं, देने दो. बिना डरे उन्हें सबक सिखाओ.’’

   उसने पहलू बदला. कमर पर हाथ रख कहता गया- ‘‘सभी चीजें आदिवासियों की हैं. लगान क्यों दे हम? कोई लगान नहीं देगा.’’

  कुहू...कुहू... कोयल की कूक! पूरे जंगल में एकदम सन्नाटा छाया था. अनगिनत आदमियों के रहते बस उसकी आवाज गूँज रही थी. चिडि़या, कोयल, गौरैया, सुग्गा की महीन मीठी आवाजें उसका साथ दे रहीं थी. मोर भी गोल-गोल घूमे जा रहे थे. उसके खूबसूरत नृत्य में मानो हामी छुपी थी.  मोरनी अलग मगन!

  ‘‘तुम लोग डटे रहो. इन गेारों से अपना राज छीनने के लिए. अपनी सब कमी से लड़ते रहने के लिए भी.’’

   रात में थक कर बिरसा बहुत दिनों बाद गहरी नींद सोया. कई रातों से उसकी आँखें झपकी तक नहीं थीं. उसे बाघ-भालू से भी लड़ना पड़ रहा था, मसीहदास एवं दाउद नामों से भी. बिरसा के पिता ने इसाई धर्म कबूलकर अपना नाम मसीहदास रख लिया था, बिरसा को भी लड़कपन में ही धर्म परिवर्तन करा दाउद नाम दिया गया था. कई लोग इससे चिढ़े हुए थे. धर्मांतरण के कारण आदिवासियों की नजरों में अलग खटकता रहा था उ और उसका बाप!  सिंगबोंगा की पूजा करते हुए, ईसाइयत से विरत, जनेउ धारी वह वैष्णव लड़का सरना धर्म को अपनाने के चलते ईसाइयों के दिलों का काँटा भी था.

‘‘ ई छौंड़ा भगवान धर्म अपना लिया हय. इसका बात कउन सुनेगा. आउर अइब खुदे भगवान बन गिया हय. ’’

 अंदर ही अंदर गुस्सा सुगबुगा रहा है, यह बात बिरसा समझता है.   

   पर अब उसके सामने एक बड़ा लक्ष्य है. अपने इलाके को फिरंगियों से आजाद कराना ही उसका असली मकसद है. वह क्र्र्रांति की बातों के अलावा और किसी बात पर ज्यादा सोचना नहीं चाहता.

  ‘‘आजादी पाना है. अंगरेजों को मार भगाना है, हमरा पहला उद्देष्य यही है. अब ई जैसे मिले.’’

‘‘ हमको हमारा मकसद में कामयाब करो.’’

 सिंगबोंगा के आगे उसके हाथ खुद-ब-खुद जुड़ गए. आकाश में ललहुन सूरज की चमक से उसकी काली देह जगमगा उठी.   

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   ‘‘अइब कउन है जे हमरा रासता रोकेगा. ई बढ़हर, आम, केरा, सखुआ, सेमल, कुसुम गाछ के एक-एक डारी पर हमरा हक है, हमरा...ई उड़द मों, कुरथी मों, गोंदली मों, धान मों गेहुम मों सब पर बस हमरा अधिकार!’’

भरमी मुण्डा सबसे कहता.

   ‘‘ बिरसा हमरा तकलीफ दूर करने आया. हम मुण्डा को बहुत सता लिया सब. अब कोई नहीं. बिरसा का एक-एक ताली का अरथ गोटे जानवर-पाखी, जंगल का हर जीब समझता है. गाँव का हर आदमी समझता है. ऐही हमरा लोग के लिए सबकुछ कर सकता है.’’

  साँवला भरमी, बिरसा का एक विशेष साथी. संगठन का महत्वपूर्ण सदस्य. खाली बदन, खाली पैर ही मंजिल की ओर पूरे दम-खम से बढ़ते हुए जब शैल रकाब पहॅुंच गया, तब उसका ध्यान उन सब बातों से हटा. साथियों की जिद टाल पाना उसके वश में नहीं रहा. सशस्त्र क्रांति की मांग को अहिंसक बिरसा टाल नहीं पा रहा था. नहीं भूलता भरमी वे दिन.

  मुण्डाओं की विशाल भीड़ में बिरसा ने शैल रकाब डोम्बारी बुरु में सशस्त्र क्रांति का आहवान किया. वे एकदम तैयार. कपिल मुनि की गाय कामधेनु के खुरों से सशस्त्र मुंडाओं का जन्म हुआ था. वीर मुंडा तीर-धनु  के साथ ही पैदा हुए थे. सारे मुंडाओं ने तीर-धनुख हाथ में उठाकर  बिरसा का साथ निभाने का पक्का संकल्प लिया. बिरसा ने सबको बताया-

  ‘‘खूंटी से राँची तक एक साथ चढ़ाई करनी है. सबका तीर पर सान चढ़ा है न?’’

 ‘‘ हाँ! हाँ!! ’’ हजारों आदिवासियों का हथियार कुठार, भाला, पत्थर एवं लाठियाँ भी तीर-धनुख के साथ लहरा उठीं.

  नंगे बदन, सिर पर सफेद पगड़ी और घुटनो तक धोतीवाले तीर-धनुख से सजे वीरों ने लड़ने एवं मरने की ठान ली. अब तक गुप्त बैठकों के जरिए बननेवाले कार्यक्रम खुलेआम सामने आ गए. विरोध का स्वर आक्रमण में बदल गया. और सब जगहों पर एक साथ किए गए आक्रमण ने अंग्रेजों को उस पागल की ताकत का अंदाजा दे दिया. तीरों-कुल्हाडि़यों, फरसा की मदद से जोश परकाष्ठा पर. 24 दिसम्बर 1899 की रात को राँची क्लब में क्रिसमस मनाते अंग्रेजों की बोलती बंद. चर्चों, मिशनरियों, क्लबों पर एक साथ आक्रमण. कितने घरों की होली जला दी वीर मुण्डाओं ने.

  ‘‘ हेन्द्रे रान्ब्रा केचे केचे.’’ .....काले क्रिस्तान को काट फेंको.

  ‘‘ पुंड्री रान्ब्रा केचे केचे. ’’.....सफेद क्रिस्तान को काट फेंको.

हाहाकार! घनघोर हाहाकार!!

  ‘‘ उसकी गिरफटारी अंतिम उपाय हाय. नाय टो ये हमाड़ा डंका बजा डेगा.’’

  ‘‘ उसको अरेस्ट करके खूंटी में खुला अदालत लगाओ. सबके सामने पनिशमेंट दो. तब ई जंगली लोग मानेगा, बिड़सा भगवान नाय, एक साढारन मैन हाय.’’

 अन्य भारतीयों के बीच भी चर्चा आम-

 ‘‘ उसने जल-प्रलय होने की बात की है. वह मुण्डा-राज की घोषणा सरेआम कर रहा है....’’

‘‘ वह एक न्यु रिलीजन ‘बिरसा धर्म’ चला रहा है. लोग खेती का काम छोड़-छोड़कर उसका दर्शन करने जाते हैं.’’

   ‘‘ हाँ! मैंने सुना है कि उसने बिरसा-धर्म के सि़द्धातों का प्रतिपादन भी किया है.’’

       एक दिन डोम्बारी परबत की ओर बढ़ते बिरसा के नंगे पाँव गिरे हुए महुए पर पड़े.

   ‘‘ ऐ तुम मता जाएगा. ई गाछ तरे से जे निकसता हय, मता जाता हय. उधर से नय जा सकता हय?’’

   महुआ बिछती हुई कई औरतों में से एक बोली.

    ‘‘ और तुम सब नहीं मताओगी! ’’

  बिरसा ने मुस्कुराकर जवाब दिया. उसके कठोर चेहरे पर भी कभी-कभी हास्य की लाली दौड़ा करती. विश्वास की भी. फिर एक किनारे रखीं मौनियों में से उसने एक मौनी से भर अॅंजुरी महुआ उठा लिया. सब फिक् से हॅंस दी.

   वह बढ़ता ही रहा. सामने दहकते पलाश के गाछों से पलाश के कई फूल टपके जैसे उसकी आगवानी कर रहे हों. पीछे संगठन के साथियों का हुजूम! लाल-लाल पलाश-फूल की दहक सबकी आँखों से झाँक रही है. कोमल बासंती धूप जितना पलाश को अंगारे का रुप दे रही है, उतना ही उनकी आँखों में संकल्प का अंगार भर रही है. काले चेहरे धूप की दहक से बैंगनी आभा बिखेर रहे हैं. पलाश की टहनियाँ दहकते पलाश-पुष्पों से ढंक गईं हैं, पत्ते तो पहले ही उनके लिए रास्ता बना चुके हैं. एक भी पत्ता नहीं दिखलाई पड़ता, जब अंगारे बने फूल गाछ को घेर लेते हैं. अंगारे बने महाबली के रास्ते से खुद-ब-खुद कायर हटते जा रहे हैं. साथ हैं तो केवल जाँबाज.

  डोम्बारी की पथरीली राह पर चलते हुए एकाएक बिरसा के साथी भरमी ने कान से हाथ लगाकर कुछ सुनने की कोशिश की. नगाड़े की भारी आवाज कान पर पड़ी. वे समझ गए, मंजिल पास है. सभी लोग जमा होकर उनका इंतजार कर रहे हैं. उलगुलान-संपूर्ण क्रांति के साथी बिरसा की प्रतीक्षा कर रहे हैं.

  डोम्बारी बुरु, चलकद, बीरबाँकी, पोड़ाहाट, गोइलकेरा, चकरधरपुर तथा सोनुआ का जंगल-पहाड़ सब में ‘‘जंगल-जमीन हमारा है.’’ की आवाज गूंज रही है. अंग्रेजों के खिलाफ गोलबंद हो चुके हैं सभी.

  

  अंगेरजों के अंदर और भय भरने लगा. उसकी गिरफ्तारी के लिए जगह-जगह छापामारी ! जंगल-पहाड़ रौंदे जाने लगे. बीर-बुरू सब बेहाल. बिरसा के कार्यस्थल चलकद पर भी ब्रिटिश शासन की गाज गिरी.

  ‘‘धरती आबा को हाम जेहल जाने नहीं देंगे. जान दे देंगे पर उनको कुछो नय होने देंगे.’’ 

  सोमा मुण्डा जैसे धार्मिक नेता ने अपने साथियों से कहा. सब राजी ही थे. 

  लेकिन उन भोले-भाले गाँववासियों को पता चलने से पहले ही सोये हुए बिरसा भगवान अंग्रेजों के छल-बल से राजद्रोह के अपराध में गिरफ्तार कर लिए गए. 26 अगस्त 1895 की भयावह रात थी वह.   

  ‘‘ इके तुम नय ले जा सकता है. पहिले हमको जेहल में डालो, तब भगवान को छू सकता है.’’

  साथी दोन्का मुण्डा की गरज से एक पल को ठिठके गोरे पर सब बेकार!

   बनगाँव के जमींदार जगमोहन सिंह और पुलिस की चालाकी रंग लाई. कई सहयोगी भी पकड़ लिये गए.

  ‘‘राते में पकड़ लिया. ’’ ‘‘ कैसे? ’’ ‘‘ कउन ?’’- चर्चा आम.

  ‘‘ सरकार हमको जेल में बंद नहीं रख सकती.’’ कभी कहा था बिरसा ने.

  राँची जेल में घुसते ही जेल की एक दीवार गिर गई. उसके चमत्कार का शोर गहरा उठा. गोटे गाँव-धर, जंगल में खबर आग की तरह फैली. 50 रूपये का जुर्माना या सश्रम कारावास की सजा भी नहीं झुका सकी उस मैडमैन को. हजारीबाग सेंट्ल जेल बिरसा और बिरसाइतों से आबाद हो गया.

  बिरसाइतों ने संगठन और विद्रोह की आग जलाए रखा. प्रशासन बारूद की ढेर पर बैठा था. 1897 में आदिवासियों को प्रसन्न करने का प्लान भी फेल! बारूद फटने को हर पल तैयार!

  धरती आबा उस क्षण को कभी नहीं भूल पाता, जब खूंटी में खुली अदालत में लगाकर उसे सजा देने की बात उठी थी. सब खूंटी की ओर चल पड़े थे. हातुमुंडा, कीलों याने कबीला के प्रमुखों, तथा पड़हा राजा के इशारों पर गाँव के गाँव उमड़ पड़े. गतिऔरा अर्थात युवागृह से भी युवक-युवतियाँ भागे चले आए. कुछ मुण्डारी नृत्य-गीत की तैयारी में व्यस्त थे, वे भी खूँटी में हाजिर!

   ‘‘धरती आबा! भगवान बिरसा !’’ आसमान फट पड़ा था.

  जहाँ, जिधर देखो मूड़ी ही मूड़ी! औरत-मरद, छौव्वा-पुता सब! कैसे लगती अदालत? वह भी खुले में. हिंसक भीड़ कुछ भी कर सकती थी. चीखती- चिल्लाती हिंसक भीड़! आग उगलती निगाहें! आग में घी डालती हथियारों की लपलपाहट! भाले-लाठियाँ! गोरेां का दावा बेकार. खुली अदालत संभव नहीं हो सकी.

 

   धानी मुण्डा बिरसा की सच्ची अनुयायियों साली और परमी की मदद से बिरसा के सिद्धांतों से लोगों को अवगत कराता रहा. उपर से प्रलक्षित शांति! लेकिन अंदर ही अंदर धानी और दोन्का ने मशाल थाम ली थी. बिरसा के प्रारंभिक अहिंसात्मक आंदोलन को कई साथियों की जिद ने पहले ही बदल डाला था. फादर हाफमैन बेहद घबरा उठा. एक रात धानी भी बंदीगृह के हवाले. फूल-फल बेचनेवाली साली पर पुलिसिया निगाहें. एक अंधियारी रात ने अचानक सुना कि धानी चकमा देकर जेल से फरार!

  ‘‘साली! क्या जेल से भागा हुआ धानी मुण्डा तुम्हारे घर में है? पूरे पच्चीस रूपये का इनाम उस पर है. तू उसे पकड़ा दे और इनाम ले ले.’’

  ‘‘हा!....हा!!....हाँ, रात में मेरे घर में ही था वह दरोगा जी. फिर भाग गया बिन बतलाए.’’ हॅंसी साली.    

साली के सर पर बेर से भरी टोकरी थी. गर्भ भार से दुहरी होकर चलती हुई साली को जा घेरा था भरत नामक दारोगा ने. दोनों ओर बड़े-बड़े गाछ, बीच में पतली-सी पगडंडी. उसी पर बढ़ी जा रही थी वह. जंगल की शुरूआत थी. लाल किनारे की इकलौती धोती में लिपटी साली के प्रति    दारोगा ने एक अलग खिंचाव महसूस किया. गठीली और खूबसूरत थी साली. एकाएक उसने अपने पेट को थामा और दर्द से ऐंठकर वहीं बैठ गई. दारोगा को कुछ समझ नहीं आ रहा था. साली दर्द से बेहाल होती रही.

 ‘आह!...उह!....परमी को बुला दो. वही हमरी दरद हर सकती है.’

  जंगल में चमगादड़ उड़ रहे थे. उल्लू रोशनी में अंधे बने बैठे थे. दारोगा को कुछ समझ में नहीं आ रहा था. उसे दया आ गई. वह जल्दी से पगडंडी छोड़कर जंगल के और अंदर हेल गईं. परमी आई तो  जंगल के अंदर साली को बेर खाते देख चैंकी. उस गहरे जंगल में हेलने की जुर्रत अकेला भरत दारोगा कर ही नहीं सकता था. जंगल की भयावहता सुरक्षा कवच था उन सबके लिए. साली मजे से एक पाकड़ गाछ के नीचे बैठकर बेरों को रस ले-लेकर खाए जा रही थी. जंगल में अॅंधेरा उतर आया था. उसके चेहरे पर शैतानी आभा थी. परमी ने इधर-उधर देखा. नवजात का नामोनिशान नहीं.  वह सब समझ गई.

  फटाफट दोनों ने उसके पेट पर बॅंधे तीरों को अलग किया. गर्भभार से छुटकारा मिला उसे. उल्लू की आँखें बंद ही रहीं. दारोगा कहीं पीछे छूटा रह गया. सारे तीर पलभर में टोकरी के अंदर और बेर उपर.हमेशा की तरह. अॅंधेरा घिर गया था. खुशी-खुशी गर्भभार से मुक्त  साली तथा परमी जंगल के अॅधेरे में खो गई.

  धानी देखते ही चैंक उठा.

    ‘‘ कइसे आई रे? ई तीरों का फल तू ही ला सकती है. हम तो सोचे थे कि ई बेर तू नहीं ला सकेगी. ’’

    ‘‘ फिन आएँगे कल यही फल लेकर. कल फिन पेट पर....’’ उसने पूरे विश्वास के साथ कहा. चेहरे की शैतानी आभा हॅंसी में बदल गई... खिल....खिल....खिल....पूरा जंगल हॅंस पड़ा. खिल....खिल.... अॅंधेरे जंगल में चंपा के फूल खिले. जुगनू चमके. देर तक वन के अंदर बने झोपड़े में उन तीनों की हॅंसी तीरों पर धार चढ़ाती रही.   ‘‘ सार दरोगा. ’’

  परमी और साली ने बखूबी उलगुलान का साथ दिया था. गया मुण्डा की पत्नी मकी, बेटियों तथा पतोहुओं का दिल भी जीत चुका था बिरसा. उसके जेहल जाने से सब दुखी थीं. संकल्प से भरी हुई भी.

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  जेहल में विचारमग्न बिरसा! ‘हमको जियादा दिन तक बाँधकर ई गोरा लोग नहीं रख पाएगा.’

   अपने घुटने पर रखे हाथों को उठाकर भगवान बड़े विश्वास के साथ बड़बड़ाते. सश्रम कारावास की सजा बिरसा के लिए भारी न थी. कठिन श्रम तो जीवन का हिस्सा. डहर-डहर, जंगल-जंगल घूम कर जीविका चलानेवाले आदिवासियों के लिए फूलों के बिछौने में ही काँटों सी चुभन. उलगुलान की मशाल ने तिल-तिल जलना सिखाया था. पत्थर तोड़ना या सब्जी उपजाना क्या भारी पड़ता. उसकी चिंता तो यह थी कि उलगुलान की मशाल की लौ ठंढी न पड़ जाए.

  पहली बार वह दो साल तक जेहल में बंद रहा. महारानी विक्टोरिया ने लंदन में 1897 में हीरक जयंती मनाई. सभी बंदियों के साथ बिरसा को भी रिहा किया गया. बिरसा जेल से निकलते ही सीधे अपने अकालग्रस्त गाँव पहुँचा. उसके साथियों ने उलगुलान की आँच बुझने नहीं दी थी. धरती आबा इससे बहुत खुश. उसने खुश होकर जेल से निकलते ही ऐलान किया-

   ‘‘ सोमा मुण्डा सामाजिक का्रंति का प्रमुख और दोन्का मुण्डा, तुम राजनीतिक क्रांति का मुखिया रहेगा. ’’

1898 के अकालग्रस्त चलकद में चेचक-हैजा की महामारी में बिरसा का अद्भुत रूप. लोग दंग. सबके बीच काम, सबकी सेवा.

  ‘‘ हमरा भगबान हमरे साथ हमेशा रहेगा. हारी-बीमारी, सुखाड़ सब में उ हमके नहीं छोड़ेगा कभी. ’’

 

   ‘‘ हम बार- बार यही कहते हैं कि हडि़या दारु मत पियो. उ हमर जी और देही दोनों को बिगाड़ता है. मति, ओझा पर विश्वास मत करो जो एक- दूसरे को लड़ाता है. चोरी मत करो. झूठ मत बोलो. मांस- मछली पर रोक लगाओ. उसे मत खाओ. ई हमको हिंसक बनाता है.’’

   बिरसा की आवाज फिर जंगल, पहाड़ सब में गूँज रही है. सभी ध्यानमग्न होकर सुन ही नहीं रहे है, उस पर अमल करने की कसम भी उठा रहे हैं.

 ‘‘ हम अपने जमीन पर इन फिरंगियों का दमन चलने नहीं देंगे. वे हमको जेल में डाले या गुफा में बंदकर पत्थर से ढंक दे, हम इसको भगाकर ही दम लेंगे. ’’

  ‘‘हिंया सिरफ अपन जन के राज चलेगा. अपन राज में कोई बड़का-छोटका नहीं होगा ,बस! अब सब अपना तीर धनुख को सजा लो. और तेज हमला होगा. ’’

   जनवरी 1900 में तपे हुए कुंदन में और चमक! गुप्त रुप से सारी तैयारी की गई. फिर हमला पर हमला! जगह-जगह सरकारी चीजों, दफ्तरों पर आक्रमण से अंगे्रजों के छक्के छूटे. साम-दाम-दंड-भेद बेकार! 7 जनवरी को खूँटी पर हुए आक्रमण से ब्रिटिश राज आतंकित. अगले दिन ही राँची के उपायुक्त , एच0 सी0 स्ट्रीटफिल्ड, आयुत फारबिस सेना की दो बड़ी टुकडि़यों के साथ खूँटी आ धमके. युद्ध स्तर पर की गई तैयारी से उलगुलान को दबाने की कोशिश जारी. खाने-पीने का सामान लेकर बिरसा तथा उनके साथी डोम्बारी बुरू और शैल रकाब जा पहुँचे. पर....

   ‘‘ अंग्रेजी सेना के सामने हमारा संगठन बहुत छोटा है. अभी लड़ना बेवकूफी होगी. इधर का सारा रास्ता बंद कर दिया गया है. हम चारों ओर से घिर गए हैं.’’

   ‘‘ उनके पास बहुत आधुनिक हथियार भी है. हम एकदम घिर गए हैं. अनेक मुण्डाओं के मरने के बाद भी कुछ हासिल होना कठिन है.

 पहाड़ी पर बैठे बिरसा की आवाज गॅूंज रही थी. लोग समझ नहीं पाए, वह यह सब कह क्यों रहा है.

   ‘‘ मेरा समर्पण ही बर्बादी से बचने का एकमात्र रास्ता है. ’’

   ‘‘ हमसे कोय गलती? हम मरने के वासते तइयार हैं. ’’

   ‘‘ मरना समाधान नहीं है. मजबूत बने रहना जरूरी है. हम केवल तीर-तलवार, कुठार, ढेलबांस आदि से उनका सामना नहीं कर सकते. ’’

 ‘‘ हम केवल अॅंधेरे में तीर नहीं चला सकते. तुम सब समझने की कोशिश करो. अभी मेरा आत्म-समर्पण ही औरों को बचा सकता है.’’

    उसने पक्का इरादा कर लिया था. पहाड़ की तरह अटल उसके इरादे कों पलट पाना संभव नहीं था. लेकिन तब तक... तड़!...तड!!....तड़!!! धाँय...!धाँय!!...धाँय!!!

   समर्पण के ऐलान से पहले ही फायरिंग का आदेश! औरतों-मर्दों, बच्चों की लाशों से कराह उठा पहाड़. वीरों ने मोर्चा संभाल लिया....सर पर बॅंघे कफन को और कसकर लपेट लिया. पीठ पर बेंतरा में आपन छौव्वामन को थामे हुए मुण्डानियों ने भी तीरों को घनुख पर सजा लिया.

   फूलों की तरह वतन पर शहीद होते रहे आदिवासी देषभत्  ! गोलियों की तड़तड़ाहट.... लाशों के ढेर.... चीख-पुकार से दहल उठी छोटानागपुर की मासूम धरती. पूरा पठारी इलाका काँप उठा. वीर गिरते रहे कटे पेड़ों के तरह.

   बेंतरा में बॅंधे बच्चों को माँएँ छाती से लगा भी नहीं सकीं. वे पीठ पर ही होते रहे ढेर . सारी धरती लालम-लाल. काले-काले पत्थर तक लाल! संगीनवाले बंदूकों का सामना झाड़-झंखाड़ के पीछे से तीरों से किया जा रहा था.

    पीठ पर अधमरा बच्चा टाँगे हुए एक मुण्डानी भी गोलियों की जद में आ गई. बेंतरा में बंधे बच्चे के साथ ही फारबिस के सामने लुढ़कते हुए आ गिरी. अधमरा बच्चा उसकी ओर टुकुर-टुकुर ताके जा रहा था. उसकी आँखों की ताब....उफ! पहली बार उसके दिल में कुछ चुभा....

  फारबीस ने घबराकर आँखों पर हाथ रख लिया. वह बच्चे की ओर देख नहीं पा रहा था. कहीं उसके अंदर भी कुछ कुलबुल- कुलबुल करने लगा. शायद मानवता सुगबुगाई.

  ‘स्टॉप!....स्टॉप!....स्टॉप फायरिंग!!’

 पर उसकी उजली कमीज, शानदार वर्दी पर लाल-लाल धब्बे पड़ चुके थे. वर्दी के कोने पर उस अबोध की दो अधखुलीं आँखें जा चिपकीं थीं.

 सारा शैल रकाब और डोम्बारी बुरू रात तक सन्नाटे के आगोश में ! उल्लू भी बोलने से हिचक रहे थे. विलाप भी थम गया था. आहें-चीत्कारें सब सहमी हुईं.

       पठार का  जंगली फूल

   चंद अनुयायियों के साथ बिरसा को चाईबासा के बीहड़ जंगलों में शरण लेनी पड़ी. साथ में परमी और साली भी. उसकी साँसों में बहुत दिनों तक बेकसूरों के शवों की गंध भरी रही. वनों-कछारों पर साथियों की बिखरी पड़ी लाशों को उसने सियार-भेडि़या को खाते देखा था. श्रृगालों को लाशों को खींचकर नदी की ओर ले जाते हुए देखा था. ठिठककर रोकने की कोशिश भी की थी. वे विलाप? व आहें? वे चीत्कार क्या कभी कोई भूल सकता है? बिरसा भी नहीं भूल पा रहा था.

    उस जीत ने अंग्रेजों का मनोबल बढ़ा दिया था. उनकी प्रताड़ना बढ़ रही थी. अंतत दोन्का मुंडा और मंरण्या मुंडा ने 32 विद्रोहियों के साथ आत्म समर्पण कर दिया.

 इस भगवान के भी कई विरोधी तो थे ही. अंग्रेजों के द्वारा दिया गया पाँच सौ का लालच भी कम न था. कईयों का ईमान डोल गया. और एक रात फिर.....

सेंतरा के पश्चिमी जंगल में आग का धुंआँ उठता नजर आया.

‘‘ उ देखों. हुँआ...’’ 

   बिरसा के पीछे लगातार लगे रहनेवाले लालच में से एक ने कहा ‘‘ चलें?’’

  ‘‘ हाँ! चलो.’’

 दबे पाँव वहाँ पहुँचे सब. अपने एक बाजू पर सर रखकर बिरसा सोया था. चारों ओर अॅंधेरा घना. उसकी दोनों तलवारें उसके बाजू में सुस्ता रहीं थीं. गाछों के पीछे से झाँकते लालाच को पहले तो हिम्मत ही नहीं पड़ी. फिर घात लगाकर उन्होंने उसे जकड़ लिया. 500 रुपये का कद काफी उॅंचा हो गया.

  ‘‘ बिरसा भगबान को फिन सिपाही पकइड़ लिया. सिपाही उके हथकड़ी से बाँध कर ले गया.’’

  ‘‘ नय....नय हम देखे, उसको डोरा से बाँधा था. ’’

  जितने मॅुह, उतनी बातें! 

  ‘‘ उसका कई संगी-साथी भी पकड़ा गया. अइब का होगा? ’’

  राँची का सेंट्रल जेल नंग-धड़ंग आजादी के परवानों से भर गया. जेलर तक बिरसा को देखने को उत्सुक.  

  ‘‘ ई जाहिल-जपाट कहाँ से नेता बनकर पैदा हो गया? क्या संगठन क्षमता है. बाप रे! मान गए. वनों में भी ऐसी दीवानगी....’’

  ‘‘ ऐसी एकता! ये झाड़- झंखाड़वाले कहाँ से इतना ग्यानी- ध्यानी हो गए. ’’

  वह हमेशा किसी न किसी से इसकी चर्चा करता. जेल के मोटे- मोटे सींखचों के पीछे बैठा बिरसा अक्सर बाहर निकलने के बाद गोरों से निपटने के प्लान में उलझा रहता. उससे लोगों को कम ही मिलने दिया जाता.

  ‘‘ वह भूखा शेर अब बेबस है, रणनीति का चतुर सेनानी अब कुछ नहीं कर पाएगा.’’

 ऐसा कहकर कभी-कभी किसी से मिलने दिया जाता. वे फुसफुसाते तो जेलर के कान खड़े हो जाते.

   ‘कइसन हय? जेहल में भगवान बिरसा कइसे रहते है? जरुर कोई लीला दिखाने गए हॅंय. उसको पकड़ना आसान बाइत है का!’

   उस दिन जेल में बिरसा से मिलकर भरमी लौटा. उसके कानों में गूँज रही आवाज,

    ‘देख भरमी, अइब हामर जिनगी कर कोनो ठिकाना नहीं है. तुम हार मत मानना. तुम लोग चिंता मत करना. हमने तुमको हथियार दे दिया. अब उससे लड़ना. हम तुममें आतमविश्वास भर दिया. खुद अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए सिखा दिया, अब तुम मत हारना.

  ‘‘ हम  फिर आएँगे. हर लड़ाई में हम साथ हैं.’’

  ‘‘ टाइम खतम, चलो वापस.’’

   एक कड़क स्वर गूँजा. एक वर्दीधारी के हाथ का तेल पिया डंडा चमका. भरमी भरे मन से वापस हो लिया. उलट-उलटकर अपने धरती अबुआ को देखता जाता. धरती के पिता के चेहरे से अब भी तेज टपकता हुआ नजर आया. वह धीरे से जेहल के बाहर आ गया. जेल के परकोटे पर एक गिद्ध बैठा दिखाई दिया. पता नहीं क्यों, उसे बहुत डर लगा. 

    ‘अइब इके नही भेंटाएँगे मिलेंगे का?’ जेल की दीवारें उसे सब ओर से दबोचती हुईं लगीं. वह बड़े फाटक से बाहर आकर सामने के तालाब के किनारे पैर लटकाकर बैठ गया. कैसे गाँव-घर जाके सबसे मिले, कैसे बताएँ कि आब बिरसा.....

 

 दिनोंदिन उसकी घबराहट बढ़ रही थी. वह किसी से बताने से डर रहा था. कोई बिरसाईत या कोई आदिवासी इस अभाव को झेल नहीं पाएगा, उसे एहसास था.

उस दिन पाकड़ पेड़ के फुनगी पर कौआ उचर रहा था- काँव... काँव... काँव!  भरमी ने अपने झोपड़े के कोने में बैठे-बैठे सुना. वह धोती से मुँह पोंछते हुए बाहर आया.

 वह सबको मना करता रहा है.

  ‘‘ मइत उड़ाया कर. इकर आबाज बताता है कि कोई पाहुन आएगा.’’ अभी भी उसे लगा कोई पाहुन आएगा और कहेगा-

 ‘‘ बिरसा भगबान आ रहा है. पापी सब का बंधन काट कर आ रहा है. ’’

  कौवे ने फिर काँव-काँव की. वह हड़बडा़कर अपने झोपड़े से बाहर आया. पर वहाँ कोई नहीं था. आजकल अक्सर उसको ई भरम हो जाता है. कुछ दिनों बाद ही जंगल में आग की तरह फैली खबर-

 ‘‘ धरती आबा नहीं रहा.’’

 ‘‘ कइसे मरा? ’’

 ‘‘ नय पता...पर उ मरा कहाँ, उ तो छपित हो गया. ’’

 ‘‘ ई भुईंया भूमि पर हेतना इतना पाप हय, उ इसी से छपित -गायब- हो गया. ’’ जेतना मुँह, उतना बात!  कोई कहे-

 ‘‘ उके जहर देके अंगरेज मोरा दिया. ’’

 कोई कहे-‘‘ उसको पेट झरी हो गया था. जेहल में कोय धियान नय देता था. गू-मूत में पड़ल रहता था. कहता है, हैजा से मरा. ’’

  ‘‘ उकर साथी बताया कि गू- मूत में लिथड़कर सड़ा दिया उसे. उ गोरन मन के देही में कीड़ा पड़े. हामर धरती आबा को हेतना दरद- पीरा दिया. हामर आबा पर इतना जुलुम, ई आगी मूता उ मन....सिेगबोंगा सबको जराए देगा. ’’

 मुण्डाओं का मसीहा 9 जून 1900 को काँटों से बिंधकर धरती माँ की गोद में जा गिरा. मातृभूमि ने बढ़कर उसे गले लगा लिया. सब फूट- फूटकर रोए. सुदूर जंगल से सियारों-हुराड़ों के रोने की आवाज आ रही थी. पाकड़, बेर, इमली, नीम या पीपर गाछ के नीचे खड़े लोग पहाड़ के बीच बनी उस पगडंडी को देखने लगे, जिधर से धरती आबा अक्सर आता था. अब कौन उनको रास्ता दिखाएगा, यही नहीं समझ पा रह थे वे. रात की काली अंधियारी चादर जैसे उन पर डाल दी गई थी.

 धरती को बचाने के लिए सुरुज की एक किरण बिरसा ने दिखलाई थी, अब उन्हें उसी में राह नजर आ रही थी.

  डलगुलान की लौ जलाए रखने की बहुत कोशिश की वीरों ने. पर नहीं चल पाया ज्यादा दिन तक उलगुलान! अनुयायियों की कोशिश पर दमनकारियों का पलड़ा भारी था. ब्रितानी शोषण के आगे हार माननी पड़ी. नेतृत्व का अभाव भी कारण रहा.

        मजारों के मेले

    कई-कई साल बाद! ... बिरसा घी,, बिरसा किराना दुकान. बिरसा फलाना, बिरसा ढेकाना, बिरसा बाटा, बिरसा जूता का बिगुल बजने-सजने लगा. जेल के भंगियों द्वारा जिस जगह पर लावारिश के जैसा शव को ठिकाने लगाया गया था, उस जगह पर पर गूह-मूत त्याग की बेमिसाल खुली व्यवस्था सालों तक रही.

 एक बिरसा जयंती पर बिरसा की यादों ने नवजात राज्य को इतना सताया, इतना सताया कि आनन-फानन में वहाँ पर भव्य समाधि बनाई गई. अब वहाँ पूरे शान से सब्जी बाजार, मछली बाजार, मीट दुकानों के लिए गाडि़याँ पार्क की जाने लगीं. हर पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी और पंद्रह नवंबर को समाज अब भी उगलने से नहीं चूकता-

शहीदों के मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले.

  वतन पर मरनेवालों का बाकी यही निशां होगा

  महात्मा गाँधी, भगत सिंह, चंद्रषेखर आजाद की तरह भगवान बिरसा की भी आत्मा देखती-सुनती है, सब समझती है और चुपचाप चल देती है किसी नए प्रतिष्ठान के साईनबोर्ड पर चिपकने या चैक-चैराहों पर मूर्ति बन जाने के लिए.                      

  इस बात से कोफ्त-सी होती है सौ साल के बिरसाइत रांगो मुण्डा को. वह जब कभी घर-गाँव से बाहर खूँटी शहर की तरफ आता है. लेकिन राँची आने का उसका कभी. सौभाग्य नहीं हुआ. उसकी बड़ी इच्छा है राँची शहर देखने की. राँची से भी जियादा बिरसा की समाधि देखने की. वह अपनी काँपती उॅंगलियों से काँची नदी की रेत पर न जाने क्या-क्या लिखता रहता है....अस्फुट अक्षर! पर बिरसा के चंद उपदेश पढे़ जा सकते हैं. हॅंडि़या दारू मत पियो....मति ओझा पर विश्वास मत करो...हम आएँगे....हम आएँगे.

   आजकल उसे लगता है, अब वह नहीं बचेगा. अब तो समाधि देख ले. बाबा- भैया मुन्नू-छुन्नू कहकर वह कई लोगों को साथ चलने के लिए मनाता है. वह बिरसा की समाधि देखने की ख्वाहिश को एकदम नहीं रोक पा रहा है.  मरने से पहले एक बेर...बस! एक बेर.....एक सुबह अपनी लाठी थामकर चल देता है राँची के लिए गाड़ी पकड़ने. सामने बस के दरवाजे के पास खड़ा एक युवक जल्दी से उसके पास आ जाता है.

    ‘‘ का बाइत हेकई ? केने चलबईं ? ’’   

  आखिर वह युवक उसे लेकर राँची के लिए खुलनेवाली सुबह की गाड़ी पकड़ लेता है. तजना नदी, तजना पुल, हटिया, बिरसा चैक होते हुए गाड़ी उसे ओवरब्रिज ले आती है फिर बस स्टैंड! उसे कोकर के डिस्टिलरी पुल के पास पहॅुंचाकर वह युवक हाई कोर्ट की ओर हड़बड़ाते हुए निकल जाता है.

  ‘‘ देख, उ सामने है समाधि. थोड़ी देर बैठना चाहता है, बैठ ले. फिर बस स्टैंड दिखलाए थे न ? वहाँ आ जाना. कुछ खा-पी लेना हम वहीं आ जाएँगे. ’’

   वह इधर-उधर देखता है. चारों ओर सन्नाटा और अॅंधेरा उतरा हुआ है. बादल- पानी के कारण. आकाश से बूँदें टपकने लगीं हैं .साइत थोड़ी देर में झड़ी लग जाए. वह वहीं मीट दुकान की शेड के नीचे रूक जाता है. आधे घंटे बाद पानी थोड़ा थमता है तो कीचड़ में ही पाँव जाते हुए पैर आगे बढ़ाता है.

   धीरे- धीरे उजाला क्षितिज से धरती की ओर बढ़ रहा है. उसकी लाठी काँप रही है. वह चलना नहीं छोड़ता. सामने डिस्टिलरी तालाब पर बना हुआ पुल दिखाई पड़ रहा है. बस थोड़ी - हिम्मत और!. वह और पास आ गया है. सामने ही समाधि का बांउंड्री-वॉल! उसके पैरों में गजब की ताकत आ जाती है. पर उसके पाँव धोती में फॅंस रहे हैं.

   ठक! ठक!! ठक!!! नहीं होती. लाठी की आवाज बारिश ने खा ली. उसने समाधि के पास लाइन से बैठे हुए लोगों को देख लिया है. अभ्यस्त लोग बूँदों के बड़े होते जाने से भी नहीं घबराते. वहीं जमे हैं. बॅंूदें अपना धर्म निबाह रहीं हैं.

‘‘ ‘आपन षहीद का भी हम आदर नय कर....’’ 

  वह फुसफुसाता है. उसे जोर से गुस्सा आता है. वह चिल्लाना चाहता है. चीख-चीखकर आकाष-धरती को सर पर उठा लेना चाहता है.

  ‘ ....अरे पगलों! किसकी समाधि पर  धार गिरा रहे हो , समझते हो. झाड़ा फिरने को आउर कोय जगह नय मिला.’

  वह जोर से चिल्ला पड़ता है. वे सब एकबारगी चैंककर उसकी  ओर देखने लगते हैं. फिर समवेत स्वर में उसकी लाचारगी पर हॅंसते हैं और पूर्ववत.....उनकी नजरों में तिरस्कार है, बुढ़ापे के लिए भी, समाधि के लिए भी. वे बस कौतुक और तमाषे की लालसा संजोनेवाले बच्चे हैं. वह उनकी आगत जवानी को कोसने लगता है.

 वह उन्हें खदेड़ने के लिए लाठी उठा लेता है. खुद लड़खड़ा जाता है. अब गिरा कि तब. उसे अपनी और अपनी लाठी कीे बेचारगी पर रोने की इच्छा होती है. वह चिल्ला-चिल्लाकर रोना चाहता है. लाठी से मार-मार कर उन्हें भगा देना चाहता है. लाठी का वह दम कहाँ गया?. इसी लाठी की मार से बाघ, सियार-हुँराड़ तक का भूइत भागता था. वह हिसाब लगाता है, बिरसा को गुजरे हुए लगभग एक सौ साल से जियादा हो गिया. भरल जवानी में बिरसा शहीद हो गया.

   उसके पैर नहीं बढ़ते. हाम कब तक केवल दुकान - मकान में बिरसा भगबान को सजाते रहेंगे?

  तभी वह देखता है- एक छोटा सा बच्चा बाउॅंड्रीवॉल के अंदर जा रहा है. बच्चा कीचड़- पानी से लथपथ है. वह अंदर जाकर समाधि को छूकर प्रणाम कर रहा है. वह वहीं रूककर उसे देखने लगता है. बच्चे की आँखें देर तक बंद रहती है. उसके हाथ देर तक जुड़े रहते हैं.  बच्चे के अंदर पूरी निष्ठा, पूरी भक्ति है......कोई दिखावा नहीं......कोई   राजनीति नय....हड़बड़ी भी नहीं. बच्चा सर उठाकर एक बार उसकी ओर देखता है. साश्चर्य. किसी तरह का लालच नजर नहीं आता उसकी आँखों में.

  अब वह बच्चा एक हाथ में झाड़ू, एक हाथ से अपनी पैंट थामे समाधि के नीचे झाड़ू लगा रहा है. वह धीरे -धीरे शांत होने लगता है. बीच-बीच में बच्चा फैले-बिखरे गीले पत्तों को भी समेट कर एक छोटी-सी टोकरी में रखता है. उसके हाथ और भी गंदे हो चुके हैं. वह अपने काम में मशगूल है. उसे एहसास हो रहा है, बच्चे का काम स्वतः स्फूर्त है. या फिर उसको यह काम दिया गया है. 

जो भी हो...हय तो कुछो बात...कुछो दम....कुछो उम्मीद....कुछो असरा!  उसकी काँपती लाठी में मजबूती आने लगती है. गौर करता है, उसकी टाँगें नहीं काँप रहीं हैं, उसकी धोती नहीं फॅंस रही है अब.

  वह सीधा होकर बाउॅंड्री- वॉल के अंदर चला जाता है.  

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                                                                                                                                                                  स्मृति शेष


                                                                                                                                                                 -हेमंत शर्मा


चाची सप्ताहांत में घर आती थीं। चाचा चाची तीज-त्यौहार और छुट्टियों में ही मिलते थे। क्योंकि चाची शहर से बाहर अध्यापन करती थीं। डेढ बरस पहले चाची जब रिटायर हुईं तो कहा तीस साल बाद आज़ादी मिली। अब बचा जीवन काशी में काटना है, आनंद के साथ। पर गए हफ़्ते चाची दुनिया छोड़ गईं। दिल ने साथ नहीं दिया। लेकिन उन्हें मौत का इंतज़ार नहीं करना पड़ा। आधे घंटे में झटपट चली गईं। हां, जाने के लिए उन्होंने वही दिन चुना जिस रोज़ 20 साल पहले माता गईं थीं। 

 
चाची से अपना खास लगाव था। उन्हें कंधा देने बनारस भी गया। चाचा की शादी के लिए मैं उन्हें देखने काशी विश्वनाथ मंदिर भी गया था। तब अपने समाज में ‘रिंग सेरेमनी’ होटलों में नहीं बल्कि मंदिरों में हुआ करती थी। जीवन, सुख, दुख और संताप पर चाची की दृष्टि साफ थी। वजह उनका मायका ‘मणिकर्णिका घाट’ के पास ही था। वही मणिकर्णिका जहां मोक्ष की कामना में और परलोक सुधारने के लिए लोग अन्तिम समय में आते हैं। इसलिए जीवन से जगत का रिश्ता वे बेहतर समझती थीं। उन्हीं घाट की सीढ़ियों पर उनका बचपन बीता था। जहां उनका दाह संस्कार हुआ। इसे ही समय का चक्र कहते हैं। मणिकर्णिका की जिस गली में कभी चाचा की बारात गई थी। उसी रास्ते शवयात्रा जा रही थी। अजीब स्थिती है जब से सूर्य उत्तरायण हुआ है। हर रोज़ किसी आत्मीय के जाने की ख़बर आती है। शायद अब हम उम्र के इस मोड़ पर हैं जहां से लोग बिछड़ना शुरू हो जाते हैं। 

 

"क्षेत्रे भोजन मठे निद्रा। बाक़ी दुनिया ठेंगे पर।" अन्न क्षेत्र बनारस में धर्म के प्रचार के लिए धन्ना सेठों द्वारा चलाए जाने वाले लंगर को कहते हैं। ये आम बनारसी का जीवन सूत्र है। पर अगर आप एक दिन मणिकर्णिका घाट पर बिता लें तो आप बाक़ी जीवन का सार भी जान सकते हैं। श्मशान वैराग्य से मुक्त हो सकते हैं। मणिकर्णिका यानी महाश्मशान। जहां कभी शिव के साथ जाते हुए सती के कान की मणि गिरी थी। उसी वजह से नाम पडा मणिकर्णिका। इस घाट की दिनचर्या से ही बनारस और बनारसियों का चरित्र समझा जा सकता है। शायद जिसे देख केदारनाथ सिंह ने लिखा है- अद्भुत है इसकी बनावट/ ये शहर आधा जल में है/ आधा मंत्र में/ आधा फूल में है/ आधा शव में/ आधा नींद में है/ आधा शंख में/ अगर ध्यान से देखो तो आधा है/ आधा नहीं है। 

 

इसी होने ना होने के बीच मैं चाची की देह के साथ मणिकर्णिका घाट पर था। गंगा के किनारे चिता पर चाची की देह और अस्त होते सूर्य का रंग एक था। इस माहौल को जाने बिना जीवन के ज्ञान-विज्ञान को नहीं जाना जा सकता। ऐसा लगता है कि वसंत यहां स्थित मंदिरों के शिखर, डोम राजा की धूनी, पत्थर की सीढ़ियों के साथ ही जलती चिताओं पर उतरा है। इन्ही सीढ़ियों पर गुलाव और गेंदे के फूल बिखरे पड़े हैं। गंगा से इस घाट का ‘लैंडस्कैप’ पियाव नदी के किनारे बसे वेनिस से भी सुंदर दिखता है। हर समाज अपने आनंद के कुछ ज़रिए बनाता है। मणिकर्णिका का समाज मुर्दा फूंककर आनंद लेता है। शिव काशी के अधिपति देवता हैं। वो महाश्मशान में रहते हैं। यहीं खेलते हैं, यहीं रमते हैं। तभी तो वसंत में पंडित छन्नूलाल मिश्र यहां गाते हैं- “खेलें मसाने में होरी दिगम्बर, खेलें मसाने में होरी। भूत पिशाच बटोरी दिगम्बर, खेलें मसाने में होरी।” 

 

धूप, अगरबत्ती, गांजे और ठहरे पानी की गंध के साथ चिताओं से उठती चिरांध से युक्त यहां की हवा ही काशी की प्राणवायु है। इस हवा और पानी का अपना समाजवाद है। पंडे, पुरोहित, नाई, डोम, मेहत्तर, साधु, भिखारी चिताओं से सोना-चांदी बीनते मल्लाह (गंगापुत्र) एक साथ बैठते हैं। खाते-पीते हैं। गप्प करते हैं। अड़ी लगाते हैं। इस समाज में सब बराबर है। यहां के राजा हैं डोम राज। उनकी हैसियत इतनी बड़ी है कि उन्होंने राजा हरिश्चंद्र को खरीदकर अपने यहां नौकर रखा था। मुक्ति की इस धुरी पर चौबीस घंटे जलती लाशों के बीच उनकी धूनी है। धूनी देख लगता है कि समय ठहर गया है। घड़ी रुक गई है। इसी धर्मध्वजा के नीचे मदिरा से आकंठमग्न डोमराज मुर्दों को फूंकने के लिए आग देते हैं। दुनिया के साथ उनका परिवार भी बढ़ा है। अब डोमराज के 16 परिवार हो गए हैं जिनकी पारी बारी-बारी से आती है। 

 

मणिकर्णिका का सच वहां गए बिना नहीं समझ सकते। पिण्ड और ब्रह्माण्ड को एक समझने वाली दृष्टि ही इस सच को पहचान सकती है क्योंकि मृत्यु यहां जीवन की लीला है। अंत नहीं है। मृत्यु यहां मंगल है। चिता-भस्म आभूषण है और गंगाजल औषधि। दुनिया ना माने पर ये शहर तो ऐसे ही चल रहा है। शायद इसीलिए मणिकर्णिका की गलियों में शवयात्रा और बारात में कोई खास अंतर नहीं रहता। श्रीकांत वर्मा ने लिखा था- “तुमने देखी है काशी/ जहां जिस रास्ते जाता है शव/ उसी रास्ते आता है शव।” मणिकर्णिका से कुछ दूर आगे ही पंचगंगा घाट पर चादर बुनते थे कबीर। वही चादर- जिसे उन्होंने ज्यों की त्यों धर दी थी। उससे थोड़ा आगे जूता गांठते थे रैदास। और घाट-घाट जाते तो कोई दो किलोमीटर पहले अस्सी घाट पर रामकथा लिख रहे थे तुलसी। तुलसी ने भी इस शहर के जीवन-दर्शन पर अपनी टिप्पणी की थी- “मांग के खइबो, मसीद में सोइबो/ लेवे के एक, न देवे के दोऊ।" इन सबका जीवन से सामना इन्हीं घाटों की सीढ़ियों पर हुआ था। सीढ़ियां इस शहर की पहचान हैं। एक लोकोक्ति है- “रांड, सांड, सीढ़ी, संन्यासी, इनसे बचे सो सेवै काशी”। इन सीढ़ियों पर सांड इतनी तादाद में मिलते हैं कि भ्रम होता है, शायद धर्म इन्हीं के सहारे टिका है। दरअसल काशी में पुरखों की याद में सांडों को दागकर छोड़ने का चलन है। गोवंश की बढ़ोतरी के लिए। 

 
कहना ठीक नहीं है कि काशी मरने की नगरी है। दरअसल, ये जीने की कला भी बताती है। क्योंकि ये शहर आधा शव में है। आधा फूल में। काशी महाश्मशान भी है। आनंद वन भी। भक्ति, श्रद्धा, त्याग और बेपरवाही का ऐसा संगम अनूठा है। मणिकर्णिका से लौटते वक़्त यही अहसास चाची की मृत्यु के शोक को कम कर रहा था। चाची से अपना बेहद लगाव था।  

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                                                                                                                                                            हास्य व्यंग्य


                                                                                                                                                        -संजीव निगम 

कूल-कूल बेबी के डैमफूल अंकल 

 उस दिन जब मैं उनके घर पहुंचा तब वे अपने ड्राइंग रूम में बैठे अपने एल्सेशियन से अंग्रेजी में बात कर रहे थे," 'सिट, सिट, गुड बॉय .".मुझे देखते ही वे हिंदी में आ गए. वे मुझसे  बोले , " अरे आओ , आओ ....". पर विलायती कुत्ते को एक देसी नस्ल वाले का यूँ अचानक आ जाना अच्छा नहीं लगा. वह अपनी भाषा में मुझे डांटता  हुआ मेरी तरफ ऐसे लपका जैसे अमरीका  पाकिस्तान पर लपकता है. मेरे होश उड़ गए. मुझे लगा कि ये विलायती जीव अपने पंजे और नाखूनों से नोच नोच  कर मेरा हाल ईराक या अफगानिस्तान जैसा बना कर ही छोड़ेगा. मेरे मुंह  से थूक  के गुब्बारे उड़ने लगे और बेसाख्ता निकला ," बचाओ, बचाओ." मेरी इस पुकार पर वे जोर से हंस पड़े और उन्होंने मेरी पैंट के पायंचे तक आ चुके उस भयानक प्राणी की ज़ंजीर थाम ली. वे मुझसे बोले , " डरो  नहीं , डरो नहीं, ये काटेगा नहीं." मैंने डरते डरते जवाब दिया , " ये आपको तो पता है , पर इस कुत्ते को पता है या नहीं." मेरी इस बात से उनके चेहरे पर नाराजगी छा गयी. उन्हें अपने कुत्ते को कुत्ता कहा जाना अच्छा नहीं लगा. अपने कुत्ते की समझ को साबित करने के लिए उन्होंने उसे अंग्रेजी में प्यार से निर्देश दिया ," बेबी, ही  इस फ्रेंड,फ्रेंड."  कुत्ता  गुस्से से भरा हुआ मेरी पैंट में नाक गडाए  खड़ा रहा . उन्होंने फिर कहा ," लीव हिम बेबी, कम, कम." .  पर कुत्ते ने किसी अड़ियल आतंकवादी की  तरह से उनकी सरकारी धमकी को नज़रंदाज़ कर दिया. अब वे मुझसे मुखातिब हुए. बोले," आप क्या खड़े खड़े लक्ष्मण झूले की तरह से झूल रहे हैं, साइड से निकल आइये, मैंने कहा न, ये काटेगा नहीं.......ही इस ऐ गुड बॉय." कुत्ता अब भौंक नहीं रहा था, बस जीभ निकाले , गुस्से से हांफता  हुआ मुझे घूर रहा था.मैंने इंच इंच करके कुत्ते के आगे से हटने की कोशिश की . पर वह भी दिशानिर्देशक यानी कम्पास की सुई की तरह से मेरे साथ मुढ़ रहा था. किसी तरह से उसके मेरे बीच में फासला कुछ ज्यादा हुआ तो मैं तेज़ी से लपका और कुछ दूर पड़े सोफे पर बैठने ही जा रहा था कि  कुत्ता फिर इतनी भयानक तरीके  से भौंका कि मैं घबरा कर महंगाई की तरह से ऊपर उछल गया. उन्होंने कुत्ते की ज़ंजीर कस  कर थाम न रखी  होती तो शायद मैं गरीब की कमाई की तरह से उसी समय खर्च हो जाता. इस बार वे मुझ पर कुछ ज्यादा ही नाराज़ हो गए. बोले," आपको ये सोफा ही मिला था  बैठने के लिए?" मैं चक्कर खा गया, सोफे पर नहीं बैठूं तो कहाँ बैठूं? वे बोले ," इस सोफे पर बेबी बैठता है.इसे सोफे पर बैठना बहुत पसंद है.ऐ सी के सामने है न इसलिए . आप वहां उस कुर्सी पर बैठ जाइए. "
मेरे कुर्सी पर बैठने के बाद वह खतनाक प्राणी भी कुछ शांत हुआ. शायद उसे समझ आ गया था कि मेरे जैसा मिडल क्लास आदमी उसका या उसके मालिक का कुछ नहीं बिगाड़ सकता है. वह ठीक मेरे सामने मेरी तरफ निगाह रखते हुए आराम से बैठ गया. इसी के साथ पिछले दस मिनट से चल रहे कुत्तामय वातावरण में कुछ शान्ति छायी. वे बोले ," और सुनाओ,कैसे आना हुआ?"  मैंने कहा," जी, इधर से गुज़र रहा था, अचानक ख्याल आया कि  आपका घर रास्ते में है तो आपसे भी मिलता चलूँ." वे कुछ प्रसन्न हो गए, बोले ," अच्छा किया, इसी बहाने बेबी से भी मिलना हो गया. इसे अपने घर पर मेहमानों का आना बड़ा अच्छा लगता है. क्यों बेबी है न?' कुत्ता बिना कोई जवाब दिए मुझे ऐसे ही घूर रहा था जैसे अपने खाने के लिए किसी हड्डी को घूर रहा हो. उसकी श्वान मुद्रा में मुझे किसी प्रकार की आत्मीयता के दर्शन नहीं हुए.उस कुत्ते की घूरती निगाहें देख देख कर मैं असहज हुए जा रहा था पर वे थे कि  मुझे छोड़ कर अपने कुत्ते को ही सहज करने में लगे हुए थे. "बेचारा बेबी , आपकी वजह से अपने ही घर में ज़ंजीर से बंध गया है. जाओ बेबी अंकल से हेल्लो करो, शेक हैण्ड करो." ये कहते हुए उन्होंने कुत्ते की ज़ंजीर खोलने के लिए हाथ बढाया.अपने इस नए नए भतीजे की आगे की कार्यवाही सोच कर मेरा कलेजा मुंह को आ गया.मैंने घबरा कर कहा," नहीं नहीं कुत्ते को बंधा ही रहने दीजिये." इस बार उनका चेहरा गुस्से से तिलमिला गया, उन्हें लगा कि  कितना जाहिल आदमी है, 'फिर कुत्ता कहा, कमबख्त रिश्तों का भी लिहाज़ नहीं करता है.' उन्होंने अपने बेबी को उठा कर गोद में बिठा लिया. अपने पैत्रिक अधिकार को पाते ही कुत्ते ने लाड में भर कर उनके मुंह पर जीभ ऐसे ही फिराई जैसे  कोई दुकानदार क्रेडिट कार्ड की मशीन पर क्रेडिट कार्ड फिराता है. वे पिता तुल्य आनंद  से भर गए. अपने बेबी के रोयेंदार शरीर पर हाथ फिरा  फिरा कर मानो वे मेरी तरफ से अपने कुत्ते से माफ़ी मांग रहे थे. मैं अब  किसी टीवी शो में मौजूद दर्शक की तरह यूँ ही खामख्वाह सा बैठा हुआ था. उन्हें अपनी मौजूदगी का एहसास कराने के लिए मैंने कहा," कहिये आजकल क्या चल रहा है." वे बोले ," बस एक अच्छे साथी की तलाश जारी है." मैं  चौंक गया ," हैं तो क्या आप दूसरी शादी......." वे झल्ला गए ," तुम भी यार परले दर्जे के गधे हो. अरे अपने लिए नहीं, अपने बेबी के लिए,देखते नहीं बच्चा  जवान हो रहा है, इसके लिए भी तो सोचना है, तुम्हारी नज़र में कोई अच्छी खानदानी बच्ची  हो तो बताओ ," " बच्ची या कुतिया...' मेरे मुंह से निकलने ही वाला था कि मैं रुक गया पर चेहरे पर हलकी सी हँसी आ गयी. मैंने कहा ,:" जी ऐसे तो शायद मिलना मुश्किल होगा. आप शादी वाले किसी डोट कोम में विज्ञापन क्यों नहीं दे देते हैं. काम जल्दी बन जाएगा.." मेरे मज़ाक का कुत्तापन उन्हें अखर गया, इशारों में किये गए मज़ाक का इशारे में ही जवाब देने के लिए उन्होंने कुत्ते को गोद से नीचे उतारा और उसकी चेन ज़रा ढीली कर दी. कुत्ते  ने  फ़ौरन   ब्लैक कैट कमांडो की तरह दो पैरों पर खड़े होकर  मेरी तरफ भयानक जबानी गोला बारी की. मैं घबरा कर अपनी औकात में आ गया. मेरी हालत देख कर उनकी डॉग इगो कुछ शांत हुई, जिसका मानसिक असर उनके मुंहबोले बेटे पर भी पड़ा और वह अपना भयानक मुंह ज़मीन पर रख कर पसर गया.

मुझे लगा कि यहाँ से निकल लेने का यही स्वर्णिम अवसर है.. मैंने बोर्डर पर खड़े सैनिक की तरह से कुत्ते पर सतर्क निगाह रखते हुए , उठने का उपक्रम किया. पर  कुत्ते ने भी न्यूटन के सिद्धांत की तरह से फ़ौरन मेरे एक्शन का रीएक्शन दिया ,मैं धप से वापस बैठ गया. वे बोले ," क्या जाना चाहते हो, तो बोलो ना, अपने आप जाना चाहोगे तो बेबी जाने नहीं देगा." मैंने कहा," ये हर मेहमान को इतना अपना समझता है." वे बोले ,' नहीं चोर समझता है. जिस पर जितना शक होता है उस पर उतना ही गुर्राता है.....अब देखिये ना आप भर भी कितना गुर्रा रहा है." मैंने कहा," इसमें इसकी कोई गलती नहीं है, महीने के आखिरी सप्ताह में हर नौकरी पेशा आदमी इतना लुटा पिटा नज़र आत़ा है कि कोई भी उसे चोर समझने की भूल कर सकता है. खैर अब मैं जाना चाहता हूँ, आप मेहरबानी करके अपने बेबी की चेन कस कर पकड़ लें. "  बेबी कहे जाने से शायद उन्हें मुझ पर दया आ गयी और उन्होंने वाकई कुत्ते की चेन कस कर पकड़ ली. मैंने मौका ताड़ते ही उनके घर से बाहर की तरफ छलांग लगा दी . उनके बेबी के ज़ोर ज़ोर से भौंकने की आवाज़ मुझे ओलम्पिक्स खेलों में खिलाड़ियों का हौसला बढाते दर्शकों के शोर की तरह से   ताबड़तोड़ भागने की प्रेरणा दे रही थी. पीछे से फिर उनके अंगेरजी स्वर  मेरे कानों को सुनाई दे रहे थे, " कूल  बेबी कूल.अंकल हेस गोन,अंकल विल नॉट कम.".

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                                                                                                                                                               समीक्षा


                                                                                                                                                       -विजेन्द्र शर्मा

                              शहद सा अहसास है .... शहदाबा

हिन्दुस्तान में ऐसे करोड़ों लोग है जिन्हें उर्दू रस्मुल ख़त तो नहीं आता मगर वे उर्दू ज़ुबान से मुहब्बत करते है ! शाइरी और उर्दू के ऐसे ही शैदाइयों  के लिए वाणी प्रकाशन , दिल्ली समय – समय पर नायाब तोहफ़े लेकर आता है !

हाल ही में वाणी प्रकाशन ने हरदिल अज़ीज़ शाइर मुनव्वर राना का नया मज्मूआ ए क़लाम “शहदाबा” प्रकाशित किया है ! अदब की दुनिया में दखल रखने वाले मुनव्वर राना को उनकी बेहतरीन शाइरी और शानदार नस्र निगारी (गद्य ) के लिए जानते है मगर वे नज़्में भी उसी मेयार की लिखते है इस बात का इल्म “शहदाबा” को पढ़कर हो जाता है !




मेरी हथेलियों में उस दिन नसीब वाली लक़ीर कुछ ज़ियादा ही इतरा रही थी जिस दिन ये ख़ूबसूरत किताब मेरे हाथ में आयी ! किताब का नाम, “शहदाबा” मुझे  बड़ा अजीब लगा मैंने फ़ौरन बाबा( मुनव्वर साहब )को फोन लगाया और पूछा कि बाबा इस लफ्ज़ के मआनी क्या हैं ? उन्होंने अपनी खनकती हुई बुलंद आवाज़ में कहा कि जिस तरह दो दरियाओं के बीच के इलाके को दोआबा कहा जाता है उसी तरह शहद के छत्ते जहां होते है वहाँ हम किसी को अगर मिलने का वक़्त देते है तो कहते है कि शहदाबे  पे आ जाना ...बस उनका इतना कहना था कि किताब का पूरा सार मेरे सामने खुल गया !

“शहदाबा” में तक़रीबन तीस गज़लें ,चालीस नज़्में ,एक गीत और कुछ

ऐसी कतरनें भी है जो लिबास का हिस्सा नहीं बन सकीं ऐसा मुनव्वर साहब कहते हैं !

किताब की पहली ग़ज़ल ही मुनव्वर साहब के उस फ़न का दीदार करवाती है जिसे ख़ुदा हर शाइर को अता नहीं करता और वो फ़न है ज़िंदगी के किसी भी पहलू से शे’र निकाल लेना :--

आँखों को इन्तिज़ार की भट्टी पे रख दिया

मैंने दिए को आंधी की मर्ज़ी पे रख दिया

अहबाब का सुलूक भी कितना अजीब था

नहला धुला के मिट्टी को मिट्टी  पे रख दिया

वक्ते जुदाई हर जुदा होने वाला इसके अलावा और क्या  कह सकता है :--

रूख्सत का वक़्त है ,यूँ ही चेहरा खिला रहे

मैं टूट जाउंगा जो ज़रा भी उतर गया

सच बोलने में क्या  नफ़ा –नुक्सान है इस बात को बहुत से शाइरों ने कहा है मगर अंदाज़े मुनव्वर सबसे जुदा है :--

सच बोलने में नशा कई बोतलों का था

बस यह हुआ कि मेरा गला भी उतर गया 

पिछले दिनों कानपुर में कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल साहब के जन्म दिन पे एक कवि-सम्मलेन- मुशायरा था उसमें उन्होंने एक विबादास्पद बयान पुरानी बीवियों को लेकर दे दिया और सियासत ने उस मज़ाक में से भी सियासत निकाल ली ! उस मुशायरे में मुनव्वर साहब भी थे ,काश जायसवाल साहब ने मुनव्वर साहब का ये शे’र पहले पढ़ लिया होता :--

सोना तो यार सोना है चाहे जहां रहे

बीवी है फिर भी बीवी ,पुरानी ही क्यों न हो

जिस शख्स  ने अपनी ज़िंदगी में गम से लेकर मसर्रत तक के तमाम रंग देखें हों  और हर पल को ज़िंदादिली  के साथ जिया हो वही इस तरह की शाइरी कर सकता है जैसी मुनव्वर राना करते हैं :--

ऐसा लगता है कि कर देगा अब आज़ाद मुझे

मेरी मर्ज़ी से उड़ाने लगा है सैयाद मुझे

एक किस्से की तरह वह तो मुझे भूल गया

इक कहानी की तरह वह है याद मुझे

मुनव्वर राना की शाइरी ज़्यादातर आम आदमी के  रोज़-मर्रा के मसाइल ,घर –आँगन , रिश्तों के टूटते –संवरते ताने बाने के इर्द-गिर्द रहती है मगर जब बात रूमान की आती है तो मुनव्वर साहब ने ऐसे –ऐसे शे’र कहे हैं की रूमानियत ख़ुद शर्मिन्दा हो जाती है :--

मेरी हथेली पे होंठों से ऐसी मोहर लगा

कि उम्र भर के लिए मैं भी सुर्ख रू हो जाऊँ

“शहदाबा” हाथ में आते ही ज़हन  पे ऐसा नशा तारी होता है कि फिर आँखें आराम नहीं करना चाहती, दिल करता है कि इसे एक साथ पढ़ डालें और फिर ऐसे शे’र बीच में आ जाते है जिन पर आँखों को बहुत देर ठहरना भी पड़ जाता है ! ऐसी ही एक ग़ज़ल ये है :--

अच्छी से अच्छी आबो हवा के बग़ैर भी

ज़िंदा हैं कितने लोग दवा के बग़ैर भी

साँसों का कारोबार बदन की ज़रूरतें

सब कुछ तो चल रहा है दुआ के बग़ैर भी

बरसों से इस मकान में रहते हैं चंद लोग

इक दूसरे के साथ वफ़ा के बग़ैर भी

हम बेकुसूर लोग भी दिलचस्प लोग हैं

शर्मिन्दा हो रहें हैं ख़ता के बग़ैर भी

ज़ियादातर शाइर अपनी ग़ज़लों में रिवायती से नज़र आने वाले क़ाफ़ियों का इस्तेमाल करते हैं मगर मुनव्वर राना अपनी ग़ज़ल में ऐसे –ऐसे काफ़िये टांकते है कि उसके बाद सिर्फ़ ज़ुबान से  यही निकलता है कि मुनव्वर साहब ऐसे क़ाफ़िये लाते कहाँ से हैं :--

दुनिया सुलूक करती है हलवाई की तरह

तुम भी उतारे जाओगे मलाई की तरह

माँ – बाप मुफ़लिसों की तरह देखते हैं बस

क़द बेटियों के बढ़ते हैं महँगाई की तरह

हमसे हमारी पिछली कहानी न पूछिए

हम खुद उधड़ने लगते हैं तुरपाई की तरह

“शहदाबा” में मुझे वो ग़ज़ल भी नज़र आयी जिसका मतला  दो साल पहले  मुनव्वर साहब से फोन पर सूना था और मैंने बी.एस ऍफ़ और पाकिस्तान रेंजर्स की अमृतसर में हुई शिखर वार्ता की निज़ामत करते हुए शहरे अमृतसर की शान में सुनाया था :--

ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगा

लिबासे ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा

मुनव्वर साहब की शाइरी हो और उसमें ज़िंदगी के फ़लसफ़ों की तस्वीर छुपी रह जाए ऐसा हो ही नहीं  सकता :--

फिर हवा सिर्फ़ चराग़ों का कहा करती है

जब दवा कुछ नहीं करती तो दुआ करती है

कोशिशें करती चली आई है दुनिया लेकिन

उम्र वह पूँजी है जो रोज़ घटा करती है  

शाइरी में आँखों पे बहुत से  शे’र कहे गए है मगर “शहदाबा” की कतरन में से ये  शे’र किसी भी अधूरे मुहब्बत नामे को पूरा कर सकता  हैं और मेरा ये भी  दावा है कि  जिस की भी आँखों की शान में मुनव्वर साहब के ये मिसरे इस्तेमाल हो जायेंगे फिर वो आँखें इज़हारे मुहब्बत अपनी आँखों से ही करेंगी :-उसकी आँखें है सितारों में सितारों जैसी

किसी मंदिर में चराग़ों की कतारों जैसी 

दुनिया के सबसे मुक़द्दस लफ्ज़ “माँ” को ग़ज़ल में लाने का ख़ूबसूरत इल्ज़ाम अगर किसी पे है तो वो है मुनव्वर राना ! “माँ” लफ्ज़ का  शाइरी में इस्तेमाल पहले रिवायत के खिलाफ़ माना जाता था मगर मुनव्वर साहब ने रिवायत से बगावत की , इस लफ्ज़ को महबूब से भी बड़ा दर्जा देकर इतने शे’र कहे कि अदब में कहीं भी माँ का अगर ज़िक्र होता है तो मुनव्वर राना का नाम बड़े एहतराम के साथ लिया जाता है ! “शहदाबा” की गज़लें और नज़्मों में भी मुनव्वर साहेब के मिसरे “माँ” की कदम बोसी करते नज़र आते हैं !

चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है

मैंने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है

“शहदाबा” में मुनव्वर साहब की एक बिल्कुल ताज़ा ग़ज़ल भी है जिसका मतला उन्होंने नई उम्र की ख़ुदमुख्तारियों को मुख़ातिब हो कहा है और उसका एक शे’र फिर से एक ज़िंदगी की हक़ीक़त बयान करता  है !

एक बार फिर से मिट्टी की सूरत करो मुझे

इज़्ज़त के साथ दुनिया से रूख्सत करो मुझे

जन्नत पुकारती है कि मैं हूँ तेरे लिए

दुनिया गले पड़ी है कि जन्नत करो मुझे

अब बात “शहदाबा” की नज़्मों की हो जाए,नज़्म का पैकर ग़ज़ल से बिल्कुल मुख्तलिफ़ है ! “शहदाबा” में पाबन्द और आज़ाद दोनों तरह की नज़्में हैं ! यूँ तो “शहदाबा” की तमाम नज़्में अपने आप में कई सदियाँ समेटे हुए हैं मगर कुछ छोटी – छोटी नज़्में इंसानी फितरत ख़ास तौर पे मरदाना फितरत को सोचने पे मजबूर करती हैं ! एक नज़्म है “गुज़ारिश” जिसकी ये पंक्तियाँ रूह को झिंझोड़ कर रख देती हैं  :---

जिस्म की बोली लगते समय वह ज़्यादातर ख़ामोश रहती है.. ,लेकिन किसी को अपने होंठ चूमने की इजाज़त नहीं देती... जब कोई उसे मजबूर करता है ...तो वह हाथ जोड़ते हुए ..सिर्फ़ इतना कहती है ...कि ..यह होंठ मैं किसी को दान कर चुकी हूँ ...और बड़े लोग दान की हुई चीजें ..कभी नहीं लेते !...

एक नज़्म है एहतिसाबे गुनाह  उसके ये मिसरे देखें ...

एक दिन अचानक उसने पूछा ...तुम्हे गिनती आती है ...मैंने कहाँ हां ..उसने पूछा पहाड़े ..मैंने कहाँ हां ..हां ..

फिर उसने फ़ौरन ही पूछा ..हिसाब भी आता होगा ..

मैंने गुरुर से अपनी डिग्रियों के नाम लिए ..उसने कहा बस! बस !...अब मुझसे किये हुए वादों की गिनती बता दो ...मैं तुम्हे मुआफ़ कर दूंगी !...

ऐसे ही एक नज़्म है ओल्ड गोल्ड ये नज़्म आज के दौर के हर घर की कहानी सिर्फ़ चार मिसरों में बयान करती है :--

लायक़ औलादें ..अपने बुज़ुर्गों को ड्राइंगरूम ..के क़ीमती सामान की तरह ...रखती हैं ...उन्हें पता है कि ..एंटीक

.को छुपा कर नहीं रखा जाता ...उन्हें सजाया जाता है !

“शहदाबा” में मुनव्वर साहब की कुछ पाबन्द नज़्में हैं जिनमें से एक नज़्म तो सोनिया गांधी जी ने अपने घर में फ्रेम करवाकर लगा रखी  है ! इसके एक दो बंद आपको पढवाता हूँ ..

 एक बेनाम सी चाहत के लिए आयी थी

आप लोगों से मुहब्बत के लिए आयी थी

मैं बड़े बूढ़ों की ख़िदमत के लिए आयी थी

कौन कहता है हुकूमत के लिए आयी थी

अब यह तक़दीर तो बदली भी नहीं जा सकती

मैं वह बेवा हूँ जो इटली भी नहीं जा सकती

मैं दुल्हन बन के भी आयी इसी दरवाज़े से

मेरी अर्थी भी उठेगी इसी दरवाज़े से

इशारों –इशारों में मुनव्वर साहब किस तरह सोनिया गांधी के मन की बात को अपनी नज़्म में कह जाते है ;--

आप लोगों का भरोसा है ज़मानत मेरी

धुंधला धुंधला सा वह चेहरा है ज़मानत मेरी

आपके घर की ये चिड़िया है  ज़मानत मेरी

आपके भाई का बेटा है ज़मानत मेरी

है अगर दिल में किसी के कोई शक निकलेगा

जिस्म से खून नहीं सिर्फ़ नमक निकलेगा

“शहदाबा” में मुनव्वर साहब की एक और ख़ूबसूरत नज़्म है जो उन्होंने “सिन्धु दर्शन” महोत्सव के लिए लिक्खी थी ! बात नब्बे के दशक के आख़िरी साल की है जब मुनव्वर साहब को अडवानी जी ने लद्दाख में सिन्धु दर्शन कार्यक्रम का न्योता दिया ! मुनव्वर साहब सिन्धु नदी पर नज़्म लिखने के लिए अपनी फ़िक्र को बार –बार तकलीफ़ दे रहे थे मगर उनकी पसंद का मिसरा ज़हन में नहीं आ रहा था ! अचानक उनकी 5 - 6 बरस की बेटी ने कहा अब्बू क्या कर रहे हो, उन्होंने कहा की बेटे कविता लिख रहा हूँ  ,मुनव्वर साहब ने सिन्धु –दर्शन का निमन्त्रण बच्ची को दिखाया ! बच्ची ने पहाड़ों और नदी की तस्वीर देख कर सवाल पूछा  कि ये नदी कहाँ से कहाँ तक जाती है ? बस मुनव्वर साहब को अपनी नज़्म का मिसरा मिल गया !उन्होंने उस वक़्त बच्ची से कहा कि बेटे ये नदी कहाँ से आती है कहाँ जाती है इसमें हमारा कोई रोल नहीं है ,ये हमारी पैदाईश से पहले की है !मगर बाद में मुनव्वर साहब ने सोचा कि एक बाप , एक दोस्त और एक टीचर की हैसीयत से बच्ची को अब ये समझाना चाहिए कि सिन्धु नदी का हिन्दुस्तान के लिए क्या महत्व् है और फिर वो शानदार नज़्म उन्होंने अपनी बेटी को समर्पित की !उसी ख़ूबसूरत नज़्म के एक –दो बंद :--

सिन्धु सदियों से हमारे देश की पहचान है

यह नदी गुज़रे जहां से समझो हिन्दुस्तान है

चाँद तारे पूछते हैं रात भर बस्ती का हाल

दिन में सूरज ले के आ जाता है इक सोने का थाल

ख़ुद हिमालय कर रहा है इस नदी की देख भाल

अपने हाथों से ओढ़ाया है इसे कुदरत ने शाल

इस नदी को देश की हर इक कहानी याद है

इसको बचपन याद है इसको जवानी याद है

यह कहीं लिखती नहीं है मुंह ज़बानी याद है

ऐ सियासत तेरी हर इक मेहरबानी याद है

अब नदी से कौन बतलाये ये पाकिस्तान है

यह नदी गुज़रे जहां से समझो हिन्दुस्तान है

जब सिन्धु दर्शन महोत्सव में मुनव्वर साहब ने ये नज़्म सुनाई तो तत्कालीन उप प्रधानमंत्री श्री लाल कृष्ण अडवानी ने इन्हें गले लगा लिया !

“शहदाबा” मुनव्वर  साहब की बाकी सब किताबों से अल्हेदा है क्यूंकि हिंदी में उनकी ये पहली किताब है जिसमे उनकी ग़ज़लों के साथ – साथ पाठकों को नज़्मों का भी लुत्फ़ मिलता है !

 “शहदाबा” वाणी प्रकाशन ,दरियागंज ,दिल्ली से डाक द्वारा भी मंगवाई जा सकती है ! “शहदाबा” की ग़ज़लें, “शहदाबा” की नज़्में शाइरी के एक नए चेहरे को हमारे मुख़ातिब खड़ा कर देती हैं ! एक बात और मैं दावे के साथ कहता हूँ कि अगर आप “शहदाबा” पढेंगे तो मुनव्वर साहब को तो अपनी दुआओं में याद करेंगे ही मगर उनके साथ – साथ आप मेरे  हक़ में भी दुआ को हाथ उठाएंगे !

आख़िर में “शहदाबा” की इसी कतरन के साथ आपसे इजाज़त की ईश्वर मुनव्वर साहब की उम्र दराज़ करे और उन्हें कभी ये ना कहना पड़े ... !

हमसे मुहब्बत करने वाले रोते ही रह जायेंगे

हम जो किसी दिन सोये तो फिर सोते ही रह जायेंगे

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                                                                                                                                                            आकलन


कथा रिपोर्ताज : पांव जमीन पर / शैलेन्द्र चौहान, मूल्य - रुपये 80/-
प्रकाशन वर्ष - 2010
प्रकाशन : बोधि प्रकाशन, एफ-77, करतारपुर औद्योगिक क्षेत्र, बाईस गोदाम,
जयपुर - 302006

सम्पर्क- अर्जुन प्रसाद सिंह, जवाहर नवोदय विद्यालय, पाटन, सीकर, राज०
मो. 9413070837हाल ही में आलोचक और कवि शैलेन्द्र चौहान का नया संस्मरणात्मक उपन्यास
उर्फ़  कथा रिपोर्ताज 'पाँव ज़मीन पर'  बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित हुआ
है। लोक जीवन की लय को स्पंदित और अभिव्यक्त करती शैलेन्द्र चौहान की कथा
रिपोर्ताज ‘पांव जमीन पर’ एक महत्वपूर्ण प्रस्तुति है। कवि कथाकार
शैलेन्द्र का लेखन एक सचेत सामाजिक कर्म है। उनका चिन्तन प्रति-बद्धता का
चिन्तन है। वह जन प्रतिबद्ध लेखक हैं।

रिपोर्ताज गद्य-लेखन की एक विधा है। रिपोर्ताज फ्रांसीसी भाषा का शब्द
है। रिपोर्ट किसी घटना के यथातथ्य वर्णन को कहते हैं। रिपोर्ट सामान्य
रूप से समाचारपत्र के लिये लिखी जाती है और उसमें साहित्यिकता नहीं होती
है। रिपोर्ट के कलात्मक तथा साहित्यिक रूप को रिपोर्ताज कहते हैं। वास्तव
में रेखाचित्र की शैली में प्रभावोत्पादक ढंग से लिखे जाने में ही
रिपोर्ताज की सार्थकता है। आँखों देखी और कानों सुनी घटनाओं पर भी
रिपोर्ताज लिखा जा सकता है। कल्पना के आधार पर रिपोर्ताज नहीं लिखा जा
सकता है। घटना प्रधान होने के साथ ही रिपोर्ताज को कथातत्त्व से भी युक्त
होना चाहिये। रिपोर्ताज लेखक को पत्रकार तथा कलाकार दोनों की भूमिका
निभानी पडती है। रिपोर्ताज लेखक के लिये यह भी आवश्यक है कि वह जनसाधारण
के जीवन की सच्ची और सही जानकारी रखे। तभी रिपोर्ताज लेखक प्रभावोत्पादक
ढंग से जनजीवन का इतिहास लिख सकता है।

द्वितीय महायुद्ध में रिपोर्ताज की विधा पाश्चात्य साहित्य में बहुत
लोकप्रिय हुई। विशेषकर रूसी तथा अंग्रेजी साहित्य में इसका प्रचलन रहा।
हिन्दी साहित्य में विदेशी साहित्य के प्रभाव से रिपोर्ताज लिखने की शैली
अधिक परिपक्व नहीं हो पाई है। शनैः-शनैः इस विधा में परिष्कार हो रहा है।
सर्वश्री प्रकाशचन्द्र गुप्त, रांगेय राघव, प्रभाकर माचवे तथा अमृतराय
आदि ने रोचक रिपोर्ताज लिखे हैं। रांगेय राघव ने कहानी के पारंपरिक ढाँचे
में बदलाव लाते हुए नवीन कथा प्रयोगों द्वारा उसे मौलिक कलेवर में
विस्तृत आयाम दिया। रिपोर्ताज लेखन, जीवनचरितात्मक उपन्यास और महायात्रा
गाथा की परंपरा डाली।  हिदी में रिपोर्ताज बहुत कम लिखे गए हैं । रेणु के
रिपोर्ताज इस कमी को पूरा   करते हैं । रेणु ने रिपोर्ताज लिखे और वे
कहानी-संकलनों में संकलित हुए । उनकी 1 94 8 की लिखी 'डायन कोसी' डॉ०
केसरी कुमार द्वारा संपादित 'प्रतिनिधि कहानियाँ में संकलित की गयी एवं
'धर्मयुग' के एक कथा दशक के अंतर्गत  'पुरानी कहानी : नया पाठ'
...रिपोर्ताज लिखा जो 'आदिम रात्रि की महक' संकलन में आया।

शैलेन्द्र चौहान ने इस पुस्तक में भारतीय ग्राम्य जीवन की जो बहुरंगी
तस्वीर उकेरी है
उसमें एक गहरी ईमानदारी है और अनुभूति की आंच पर पकी संवेदनशीलता है।
ग्राम्य जीवन के जीवट, सुख-दु:ख, हास-परिहास, वैमनस्य, खान-पान,
बोली-बानी, रहन-सहन आदि को बहुत जीवंत रूप में प्रस्तुत किया है। यह सब
मिलकर पाठक के समक्ष सजीव चित्र की सृष्टि करते हैं और चाक्षुष आनंद देते
हैं। लोक जीवन का उत्सव इनमें कदम-कदम पर झलकता है। पीपलखेड़ा गाँव के
पोस्टमास्टर ‘बड़े भैया’ हों, कोठीचार के पूरण काका, रघुवंशी जी, तोमर
माट साब हों या क्रूर बजरंग सिंह या गाँव में आया साधु हो – सबका सजीव
चित्रण हुआ है। नदी, झरने, जंगल, तालाब, पहाड़, गाँव के गैल – गलियारे,
पशु-पक्षी, खेत किसान और फसलें हों, मंडी बामोरा का हायर सेकेंडरी स्कूल,
सहपाठी, शिक्षक और वहां का परिवेश हो, विदिशा का बहुविध वर्णन हो
शैलेन्द्र ने पूरी ईमानदारी और इन्वोल्वमेंट के साथ इन्हें सृजा है।
शैलेन्द्र के स्वयं अपने गाँव के लोग, परिजन, सम्बन्धी, मित्र और परिचित,
गढ़े-गढ़ाये चरित्र न होकर जीते-जागते एवं गतिशील चरित्र हैं। ‘पांव जमीन
पर’ जिस अंदाज में लिखी गई रिपोर्ताज कथाएं है वे हिन्दी साहित्य में
विरल हैं, जनोन्मुखी होने के साथ-साथ। प्रेमचंद का ग्रामीण किसान कुलीन जमीदारों के
अन्यायों, सूदखोर व्यापारियों के शोषण, सत्ता के निचले पायदान पर बैठे
कर्मचारियों के दबावों और दमन के बावजूद आत्महत्या नहीं करता था। वह
आखिरी दम तक हिम्मत न हारकर संघर्षपूर्ण स्थितियों कि चुनौती स्वीकारता
था और जब व जैसे हो संभव प्रतिरोध भी करता था फिर उसकी चाहे कितनी बड़ी
कीमत क्यों न चुकानी पड़े। गाँव अब पहले जैसे नहीं रह गए हैं वहां नगरों,
महानगरों जैसा विकास चाहे न पहुंचा हो उनकी वे विसंगतियां जरुर पहुँच गईं
हैं जिन्होंने उनके जीवन को अब उतना सरस, आत्मीय और जिंदादिल नहीं रहने
दिया है जितना पहले वह थे। खुली अर्थ व्यवस्था वाले भूमंडलीकरण ने तो
गांवों के अस्तित्व को ही नकार दिया है, किसानों और खेतिहर मजदूरों को
सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर कर दिया है। विकास के नाम पर जब चाहे
उन्हें उजाड़ा जा सकता है वहां विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाया जा सकता है।
उनके जीवन स्तर को बढ़ाने व सुधारने की बात एक मरीचिका भर बन गई है
गुजिश्ता एक दशक से किसानों में बढती आत्महत्या की प्रवृत्ति ने उन्हें
और गांव को एक बार फिर आर्थिक, सामाजिक समस्या के केंद्र में ला दिया है।
बावजूद इसके वह हमारे साहित्य में मुकम्मल तरीके से प्रतिबिंबित नहीं हुआ
है, बल्कि इधर के कथा साहित्य से गांव धीरे-धीरे कम होता चला गया है।


शैलेन्द्र उन कथाकारों में से हैं जिनके कथा साहित्य में गांव बार-बार
आया है। गरीबों, पिछड़े वर्ग के लोगों, दलितों और छोटे व मझोले किसानों पर
इतना प्रमाणिक वर्णन फिलहाल अन्यत्र नहीं मिलेगा जितना कि यहाँ है।
खेतिहर किसान की समस्यायें और उनके सुख-दु:ख, राग-द्वेष पूरी प्रामाणिकता
के साथ उभर कर सामने आए हैं। दरअसल गांव-किसान से उनके लगाव की अहम् वजह
अपनी मिट्टी से गहरा रिश्ता है जो उन्हें आज भी बांधे रखता है। मैं आज भी
मानता हूँ कि असली भारत गांव में ही है। बावजूद इसके कि आज गांव लगभग
पूरी तरह से टूट चुका है उसका एक बडा हिस्सा महानगरों से जुड गया है। अगर
आजकी कहानी में गांव कम हुआ है तो उसका एक कारण शहरीकरण है। हालांकि
आठवें दशक के पश्चात की कहानी में गांव जरूर था लेकिन उस सीमा तक किसान
वहां नहीं था। आजादी के बाद गांव का बहुत तेजी से विखण्डन हुआ था,
परिणामस्वरूप जिस वर्ग ने गांव से तेजी से पलायन किया उसमें सीमांत किसान
और कृषि आधारित कुटीर उद्योगों से जुडे लोग ज्यादा मात्रा में थे। इसलिए
किसान की अपेक्षा उस वर्ग पर कहानी में ज्यादा फोकस हुआ। दूसरा कारण यह
है कि किसान की समस्यायें स्वयं उसके द्वारा पैदा की हुई समस्यायें नहीं
थीं। वे साहूकार ने पैदा की थीं, राजनीति ने पैदा की थीं या अधिकारी वर्ग
ने पैदा की थीं लिहाजा कहानियां, किसान के नाम से नहीं, बल्कि एक बड़े
कैनवास गांव के आदमी के नाम से लिखी गई। उनका एक कहानी संग्रह नहीं यह
कोई कहानी नहीं सन १९९६ में प्रकाशित हुआ था जिसकी कुछ कहानियां इस
पुस्तक कि पूर्वपीठिका थीं यथा दादी, मोहरे और उसका लौट आना. उस संग्रह
में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों पर एक बेमिशाल कहानी थी 'भूमिका', अब तक
ऐसी कहानी कहीं अन्यत्र नहीं देखने में आई है। शैलेन्द्र ग्राम जीवन के
चितेरे रचनाकार हैं। हिन्दुस्तान की सामासिक संस्कृति की हिमायत, जायज
हकों की लडाई और सकारात्मक जीवन मूल्यों के प्रति निरंतर संघर्ष, उनकी
रचनाओं की विशेषता है। वे प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, अमरकांत,
मार्कण्डेय, शैलेश मटियानी, पुन्नी सिंह, जगदीश चन्द्र की तरह आंचलिक
परिवेश के रचनाकार हैं। अपने कथा साहित्य में स्थानीय बोली के प्रयोग पर
जोर देते हुए वे कहते हैं, यद्यपि ऐसा माना जाता है कि आदमी का शोषण,
उत्पीडन, दारिद्र, अभाव, अशिक्षा, बेरोजगारी इत्यादि सभी जगह पर एक जैसे
हैं, लेकिन मेरा मानना है कि एक जैसे होते हुए भी इनमें बहुत बारीक अंतर
भी है और यदि उस बारीकी को हम सफलतापूर्वक पकडना चाहें तो हमारे पास लोक
बोलियों से शक्तिशाली अन्य कोई औजार नहीं है। मूलधारा से अलग दूरदराज
स्थान पर रहकर जीवन व्यतीत करने वाले आदमी की पीडा को अभिव्यक्त करने
वाले शब्द खडी बोली के पास नहीं हैं और अगर हैं भी तो वे किसी बोली से ही
आए होंगे। जिस परिवेश में आदमी रहता है उसी के अनुरूप आदमी की पीडा को
उसी के शब्दों में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है। जाहिर है ये
रिपोर्ताज न तो कोरे दृश्यचित्रण हैं न मात्र संस्मरण। इनमें भारतीय
ग्राम्य परिवेश, कई-कई आयामों में, ईमानदारी और सजगता से बहुविध सृजित
एवं दृष्टव्य है।

शैलेन्द्र चौहान की ताजा कृति 'पाँव जमीन पर ' को अनेक कोणों से
जाँचा-परखा जा सकता है। यह आत्मकथात्मक संस्मरण है या लोक का चित्रण या
निम्न मध्यमवर्गीय जीवन की संघर्ष-गाथा? वस्तुत: कृति इन तीनों का सुंदर
सम्मिश्रण है। इनके रसायन से जो निर्मित हुआ, उसमें रसानुभूति भी है और
तत्व ज्ञान भी। अलग से वैचारिकता का लबादा न लादे होने पर भी इसमें विचार
समाहित है जो पाठक को सोचने पर विवश करता है। चेतना को झकझोरता है। अतीत
को लौटाया भले ही न जा सके, पर अतीत में लौटा जा सकता है, स्मृति के
माध्यम से। शैलेन्द्र ने यही किया है। अनुभव के बाद 'स्मृति ' लेखक की
महत्वपूर्ण पूँजी है। उससे रचना प्रामाणिक और विश्वसनीय बनती है। जिस
रचनाकार के पास स्मृति का कोश नहीं है, उससे बड़ा दरिद्र शायद और कोई
नहीं।
इन दिनों आत्म-कथाओं और संस्मरणों की बाढ़-सी आई हुई है। इसके अपने खतरे
हैं। इनमें आत्म-श्लाघा जैसी अभद्रता भी हो सकती है और स्वयं को अपने कद
से बड़ा भी बताया जा सकता है। संतोष इस बात का है कि शैलेन्द्र चौहान के
कथ्य में अतिरेक नहीं है। उन्होंने तटस्थ भाव से सच को जस का तस रख दिया
है। शैलन्द्र ने हँसी लिखी है तो मन की उदासी भी नहीं छिपायी है। दरअसल,
पुस्तक बाल्यकाल से युवावस्था तक की यात्रा का सिलसिलेवार बखान है।
उपन्यास-कहानी के परकाया-प्रवेश से भिन्न, स्वकाया-प्रवेश। ग्रामीण भाग
की आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक स्थितियां, संरचना, मानसिक बुनावट, श्रम
और संस्कृति  जिस सहजता से शैलेन्द्र ने उकेरे हैं वह समसामयिक हिंदी
साहित्य में अद्वितीय है।


-अर्जुन प्रसाद सिंह
















अनुभूत मनोदशाओं का एक दस्तावेज़ “पराया देश’

प्राण शर्मा हिंदी के लोकप्रिय कवि और लेखक हैं, गीत एवम ग़ज़ल के जाने माने हस्ताक्षर, ग़ज़ल के शास्र की अनगिनत बारीकियों के माहिर उस्ताद व दक्षता से नए रचनकरों को दिशा दिखाने वाले मार्गदर्शक, अपनी सोच को शब्दों में अभिव्यक्त करते हुए परिपक्वता से भाव मिश्रण की चाशिनी से हमें अपने जिये हुए यथार्थ से परीचित करा कर रहे हैं.... सोच की भट्टी में सौ-सौ बार दहता है तब कहीं जाके कोई इक शेर बनता है रचनात्मकता में ढलने के लिये लेखक को जीवन पथ पर उम्र के मौसमों से गुज़रना होता है और जो अनुभव हासिल होते हैं, उनकी प्राण जी के पास कोई कमी नहीं है. जिंदगी की हर राह पर जो देखा, जाना, पहचाना, महसूस किया, उसे परख कर सरल शब्दों में बुनकर गध्य या पध्य के तानों-बानों में गूँथ लिया... ! इस दिशा में उनका विशिष्ट रचनात्मक हस्तक्षेप हमें उनके पक्ष में सोचने के लिए बाध्य करता है। साहित्य और समाज का आपस में गहरा संबंध है, जिनको एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि साहित्य अपने काल का प्रतिबिंब है, इसीलिए जिस समाज के दाइरे में हम रहते है, उसीका हिस्सा बन जाते हैं. समाज के आसपास की समस्याओं को, विडंबनाओं को कथा या कहानी की विषय वस्तु बनाकर, पात्रों के अनुकूल उनके विचारों को शब्द-शिल्पी की तरह तराश कर मनोभावों को कलात्मक ढंग से हमारे सामने रखते हैं. एक कहानीकार का असली कथ्य उसकी कहानियां ही होती हैं, जो मानवीय संवेदनाओं, जीवन तथा मूल्यों का दर्पण भी होती हैं। कहानी कच्ची मिटटी सी होती है जो किरदारों के माध्यम से अपनी खुशबू मन के आँगन में बिखेरती है. यही महक प्राण शर्मा जी के गध्यात्मक-संग्रह “पराया देश और बड़ी-छोटी कहानियाँ” में पाई जाती है, जिसमें कुल छः कहानियाँ और 46 लघुकथाएँ संग्रहित हैं।

प्राण शर्मा भारत के संस्कारों को अपने सीने में सँजोये, यू. के. में बस गये हैं। भारतीय प्रवासी लेखक और लेखिकाएं दो राष्ट्र के नागरिक बने हैं और उसी बुनियाद पर उनकी रचनाओं में मात्रभूमि से दूर होकर नए परिवेश में रहते हुए तहज़ीब और तमीज़ के नए तजुर्बों से साक्षातकार होता। तहज़ीब और तमीज़ सिर्फ़ शब्द ही नहीं है, वे जीवन जीने के तत्व है जिनके बीज हमारी संस्कृति से, परिवार और परिवेश से मिलते हैं। और यही वजह है कि उनकी कहानियों में मिली-जुली भावनाओं, नई परिस्थितियों से जूझने और सामना करने का विवरण पढ़ने को मिलता है। इस उखड़ने और फिर से बस जाने के कठिन दौर में अपने आप को स्थापित करने की मुठभेड़ में अपने देश की भाषा, साहित्य और संस्कृति को आराध्य स्थान देना एक उपलब्द्धि है, जिसमें भारतीय प्रवासी साहित्यकार पहल करने में पीछे नहीं हटे हैं। इस संग्रह में उनकी पहली कहानी ‘पराया देश’ मर्मस्पर्शी कहानी है, सच जीवन की बुनियाद है जिसपर रिश्तों के निर्माण की नींव रक्खी जाती है. दो देशों की सभ्यता और संस्कारों के द्वंद्व में कल और आज की पीढ़ी की कश्मकश बखूबी दर्शते हुए, प्राण जी ने भारतीयता का पलड़ा ऊपर ही रखा है- उनके भीतर की पीढ़ा इस कहानी में शब्दों में समाधान न पाकर कह उठती है --“हम प्रवास में हज़ारों साल रह लें मगर रंग से भारतीय ही रहेंगे, अंग्रेज़ हम कभी न बन पाएंगे। हम प्रवासी ही कहलाएँगे।“ ऐसी ही प्रसव पीड़ा की गहराई और गीराई उनकी एक रचना में महसूस की जाती है जब देश के बाहर रहने वाले भारतीय सहित्यकार को प्रवासी के नाम से अलंक्रित किया जाता है. इस वेदना को शब्दों का पैरहन पहनाते हुए वे भारत माँ की सन्तान को निम्मलिखित कविता में एक संदेश दे रहे है.... साहित्य के उपासको, सच्चे साधको

मुझको हमेशा कह लो प्रवासी भले ही तुम
कविता को या कथा को प्रवासी नहीं कहो
साहित्य के उपासको, ए सच्चे साधको कविता को या कथा को प्रवासी नहीं कहो!!

इस युग की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि आदमी का नैसर्गिक स्वभाव कहीं गायब हो गया है। बहुआयामी यथार्थ सामने आ रहे हैं जिन को नकारा नहीं जा सकता। इस संकलन की उनकी निम्म: कहानियाँ ख्वाइश, तीन लंगोटिया यार, फिर मिलेंगे, समाज परिवेश, परिवार, के अनेक पक्ष: अमानवीयता, छल-कपट, अकेलापन, स्वार्थ आदि प्रवर्तियों को उजगार करने में सफ़ल हुई हैं। दर्द तो दर्द होता है, पीढ़ा देता है, इसी पीढ़ा वर्णन एक कवि के इस काव्यान्श में पाया जाता है, जिसे शब्दों में महसूस किया जा सकता है ----

खूटियों पर टांग दी हमने तमीज़ें / रक्त में डूबी हुई पहनी कमीज़ें / ज़िंदगी का कथानक हम कह नहीं पाये / वक़्त ने हर बार हस्ताक्षर बदलवाए।

कहानियों में भी ऐसे कई संवाद है जहां पल भर के लिए सोच ठिठककर, रुककर, फिर से पठन का सफ़र ज़ारी रखने की मांग करती है। कहानियों व लघुकहानियों के कुछ ऐसे मिसाल भी हैं --------------नई पीड़ी की न कोई भाषा है न कोई लिबास (पराया देश) भारत में लूट भी ज़ोरों से है और फूट भी, वहाँ आदमी आदमी को लूट रहा है (पति, पत्नि और संतान)भ्रष्टाचार के हमाम में सभी नंगे हैं, बेईमानी का बोलबाला है, चिंतावली बात यह है कि नौजवान भी भ्रष्टाचार की गिरफ़्त में है। (पति, पत्नि और संतान)फूलों की खुशबू इतनी दूर नहीं जाती जितनी दूर धन की ख़ुशबू (ख्वाइश)आंधियों के बहने से क्या पहाड़ भी डोलते हैं? (तीन लंगोटिया यार)तुम दोनों की बातों से रंग-भेद की बू आ रही है (तीन लंगोटिया यार)बाबूजी मुझे मुंबई का जलवायु रास नहीं आया, मैं आपके बिज़नस में आपका हाथ बंटाऊंगा ((फिर मिलेंगे)तान्या के चहरे पर सच का भाव था और हमारे चहरों पर झूठ का(सच झूठ)यहाँ पर हीरोइन को पारदर्शी कपड़े पहनने पड़ते हैं, कभी-कभी तो उसे निर्वस्त्र भी.....! (वक़्त-वक़्त की बात)आप सुरक्षाकर्मी है, आपको सुरक्षा की क्या आवश्यकता है (सुरक्षाकर्मी)

प्राण जी के कथ्य में लोक चेतना और यथार्थानुभाव दमकते दिखाई देते हैं। अभिव्यक्ति में भाषा की सच्चाई और यथार्थ अनुभूति के साथ-साथ अतीत के तीखे गहरे व्यंग भी शामिल रहते हैं...!! कहानियाँ अपने कथ्य और शिल्प के द्वारा, सामाजिक परिस्थितियों से गुज़रते हुए कुछ अनुभवों को एक सूत्र से मानधती हुई मानवता का प्रतीक लगती है। उनकी कहानियों के तत्व जीवंत अनुभव के रूप में, कहीं संवाद के तौर पर हमसे जुड़ते हैं।

वैसे भी मानवीय रिश्तों के राग-अनुराग और विराग को अलग करके नहीं देखा जा सकता, यहाँ तक कि आदमी का स्वतंत्र अस्तित्व भी कुल मिलाकर मानवीय सम्बब्धों का संगठन है। कहीं पैसे कमाने की धुन, कहीं लड़की की पैदाइश पर खुश होने पर, कहीं न कहीं दिल के किसी कोने में बेटे की ललक, वतन लौट जाने की तड़प, संतान की सफ़लता की खुशी, ऐसे अनेक अनकहे, अनछुए पहलुओं को उन्होने ज़बान दी है। उनकी लघुकथाएँ समाज, मानव, और जीवन के पहुलुओं से हमारी बातचीत कराती है। वैसे लघुकथा सिर्फ़ शीर्षक नहीं एक सूत्र भी है 'ब्रह्म’ वाक़्य भी है. श्री जय प्रकाश मानस जी के शब्दों में ‘लघु और कथा एक दूसरे के पूरक है लघुता ही उसकी पूर्णता है, लघुता ही उसकी प्रभुता है. लघुकथा जीवन का साक्षात्कार है’।

इसी संग्रह में श्री रूपचंद चंदेल जी ने प्राण जी की लघुकथाओं के संदर्भ में कहा है --–“प्राण जी ने जीवन के अनछुए और अनुपयोगी समझे जाने वाले विषयों पर उल्लेखनीय लघुकथाएँ लिखी है जो हमारे समय के हस्ताक्षर हैं,” यू॰ के॰ के हमारे पथ-प्रदर्शक स्व॰ श्री महावीर शर्मा जी ने एक खास बात की ओर इशारा करते हुए लिखा था –“प्राण जी की लघुकथाओं में यह विशेषता है कि उनकी लिखी अंतिम पंक्ति मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ जाती है।“ उनकी लिखी हुई लघुकथा सच झूठ आज के व्यावसायिक वर्तन के डंक की लघुकथा है, जहां कोई बेनकाब नहीं। वक़्त-वक़्त की बात में एक माँ अपनी सुंदर बेटी को रोशनी की दुनिया में खुद दाखिल करने ले आती है, सुरक्षाकर्मी में एक करोड़ धन राशि हर साल चंदे में देने वाले महोदय को धमकियों भरे पत्र और फोन आने पर भी, उसे सरकारी सुरक्षा का मिलना नामंज़ूर हुआ, यह कहते हुए कि-- “आप सुरक्षाकर्मी है, आपको सुरक्षा की क्या आवश्यकता है?” ऐसी अनेक कथाएँ है जो देश की , समाज की, आर्थिक, नैतिक, स्थिति को उजगार करती हैं।

दुष्कर्मी , हिपोक्रीट आदि लघुकथाओं में समाज की कुरूपता, और स्वार्थी मनोदिशा को दर्शाती है। दुष्कर्मी में यही आदर्श प्रत्यक्ष हुआ है कि एक पापी दूसरे पापी को पत्थर न मारे। सज़ा के लिये पहला पत्थर वही मारे जिसने कभी पाप न किया हो। समाज में कुकर्म तो सामने आ जाते हैं, पर समाधान के लिए कोई अंकुश नहीं। हिपोक्रसी नंगी होकर भी नंगी नहीं होती!!

कहते हैं जुआ में जो हारा उसका मुंह काला, और जो जीता उसका भी आधा मुंह काला!! वाह री लक्ष्मी में लक्ष्मी के पति सुरेश का भी यही हाल हुआ। पत्नि पति की इस आदत के कारण खीजती है, हमेशा ताने देती, और जुआ को ज़िंदगी का अभिशाप मानती है। उम्मीद से नाउम्मीद न होकर आखिर एक दिन सुरेश जब लाटरी जीत जाता है तो जुआ को अभिशाप समझने वाली पत्नि लक्ष्मी भी उसकी खुशी में शामिल हो जाती है ..वाह रे लक्ष्मी तेरी माया भी अजब है!!! संभवता यही कारण है कि उनकी कथाएँ और लघुकथाएँ संभावनाओं की नयी दिशायें उजगार करती हुई सकारात्मक रूप से पहचानी जाती हैं।

जिस साहित्य में चिंतन हो, सौन्दर्य हो, सृजन की कलात्मक ऊर्जा हो, समाज में होने वाली सच्चाइयों का प्रकाश हो तो वह लिखा हुआ सच खरा लगता है विदेशों में रचा हुआ साहित्य विस्मित करता है, देश से दूर अपने वतन से आती सौंधी महक से अपनी भावनाओं को ओत-पोत करके रचनाकार अपनी सोच सामने रखता है। यह संग्रह पराया देश और छोटी-बड़ी कहानियाँ भी अपने अछूते अहसासों के कारण हिंदी साहित्य की सम्रद्धि करेगा। साहित्य स्रजन की इस संकल्पशील तपस्या को एक यज्ञ मानते हुए मैं यही मंगलकामना करती हूँ कि हर पड़ाव पर प्राण जी अपने अनुभवों की टकसाल से हिन्दी साहित्य को मालामाल करते रहें। शुभकामनाओं के साथ….


समीक्षकः देवी नागरानी, न्यू जर्सी, यू. एस. ए. पुस्तकः पराया देश, लेखक: प्राण शर्मा, पन्ने: 128, मूली: रु. 200, प्रकाशकः मेधा बुक्स , X -11, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032 -

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                                                                                                                                                                 गुफ्तगू


                                                                                                                                                         - हेमंत शर्मा


     दमाद

न जाने क्यों हम अपनी परम्परा और संस्कार भूलते जा रहे हैं। रॉबर्ट वाड्रा ने कुछ सौ करोड़ रुपए क्या कमा लिए। लोगों ने आसमान सिर पर उठा लिया। सब यह भूल गए कि इस देश में दामाद के खातिर कुछ भी कर गुजरने की परम्परा है। दामाद को खुश करने का सिलसिला विवाह के दहेज से शुरु होता है। एक घर का दामाद पूरे गांव का दामाद माना जाता है। उसकी वैसी ही आव-भगत होती है। अब रॉबर्ट वाड्रा की खातिरदारी के लिए भी कांग्रेस सरकार उसी परम्परा का पालन कर रही है। तो इसमें किसी को एतराज क्यों? अगर थोड़े कायदे कानून टूट भी जाएं तो क्या हुआ?

 

इस देश में हर जमाई को ‘जमाई राजा’ कहते हैं। फिर राजा का जमाई। उसके क्या कहने। वह आसमान में सुराख करें तो भी कोई क्या कर लेगा? उसे तो देश का दामाद माना जाएगा। राष्ट्रीय दामाद। झोंपड़ी तक में रहने वाले लल्लू, कल्लू, पनारू अपने दामाद को ‘कुंवर जी’ ही कहते हैं। फिर यह तो असली कुंवर जी है हुड्डा हों या गहलौत वे अगर उन्हें लाखों का माल कौड़ियों में दें, तो यह दामाद जी का हक है।

 

हमारे यहां दामाद सिर्फ आदमी नहीं उत्सव है। परम्परा है। दामाद के आते ही घर में रौनक आती है। जिस गरीब को सिर्फ दाल-रोटी मयस्यर है उसके यहां भी दामाद के आने पर खीर-पूरी बनती है। पकवान बनता है।

 

तभी तो पक्ष हो या विपक्ष दोनों दामाद का ख्याल रखते हैं। जब भाजपा ने रॉबर्ट वाड्रा का मामला उठाया तो दिग्विजय सिंह कहते पाए गए कि हमारे दामाद पर सवाल क्यों उठा रहे हो। क्या कभी हमने आपके दामाद पर सवाल उठाया। बात लाख टके की है। एक दूसरे का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा। हमारे समाज में दामादों को कुछ विशेषाधिकार हैं। फिजूल के नखरे दिखाने का। साली से छेड़छाड़ करने का। बात-बात पर मुंह फुलाने का। उपहार और माल लेने का।

भारतीय राजनीति में ‘दामादवाद’ नई परम्परा है। जिसने भाई-भतीजावाद को किनारे कर दिया है। वैसे तो राजनीति में पहले दामाद फिरोज गांधी थे। पर पॉवर पॉलिटिक्स से उनका कोई लेना देना नहीं था। गांधीवादी सादगी पसंद फिरोज आजीवन भ्रष्टाचार से लड़े। सही मायनों में दामादवाद की शुरुआत चंद्रबाबू नायडू से होती है। वही अब फल-फूल रही है। चन्द्रबाबू तो एक कदम आगे बढ़ गए। उन्होंने ससुर की पार्टी हथिया उन्हें ही किनारे कर दिया। शरद पवार के दामाद सदानन्द सुले भी हमेशा विवादों में रहे। अटल बिहारी वाजपेयी के दत्तक दामाद रंजन भट्टाचार्य पर दबे छुपे आरोप लगते रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ केजरीवाल के घूम रहे आत्मघाती दस्ते ने इस दफा उन पर सीधा हमला बोला। नेहरू-गांधी परिवार के मौजूदा दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर लगे आरोप गम्भीर हैं। सिर्फ पचास लाख चार साल में पांच सौ करोड़ कैसे हो गए?

 

ऐसी सांस्कृतिक परम्पराएं देश की सरहद नहीं पहचानती। पाकिस्तान के मौजूदा राष्ट्रपति आसफ अली जरदारी भुट्टो परिवार के दामाद ही तो थे। जब इनकी ख्याति ‘मिस्टर टेन परसेन्ट’ की थी। बेनजीर जब प्रधानमंत्री थी तो कोई काम बिना ‘टेन परसेन्ट’ के नहीं होता था। इसलिए बेनजीर का पहला, दूसरा कार्यकाल भ्रष्टाचार के सवाल पर खासा बदनाम रहा।

 

दुनिया के पहले दामाद शिव ने नाराज होकर अपने ससुर दक्ष प्रजापति का सिर ही उड़ा दिया। रावण भले दुनिया की नजरों में राक्षस हो। पर अपने ससुर मय के मंदसौर में आज भी उसकी पूजा होती है। उसका वहां बड़ा सम्मान है। मुझे भी दामादगिरी का लुत्फ उठाने का बड़ा शौक था। पर शादी के बाद सास-ससुर जल्दी चले गए इसलिए यह सिलसिला चल नहीं पाया। शादी के वक्त मेरी सास ने किनारे ले जाकर मुझे चुपचाप कुछ दिया। वह कीमती घड़ी थी। जिक्र इसलिए कि दामाद को भेंट देने की परम्परा हर तरफ है। कुछ घर जमाई भी होते हैं। हजरते दामाद जहां लेट गए, लेट गए। भगवान विष्णु घर जमाई थे।

हिन्दी में दामाद के लिए ‘जामाता’ और ‘जमाई’ शब्द है। संस्कृत में ‘जामातृ’ का मतलब पुत्री का पति। संस्कृत का ‘जामातृ’ अवेस्ता में ‘जामातर’ हो जाता है। फारसी में ‘दामाद’ होता है। तुर्की में यह ‘दामातर’ के तौर पर मौजूद है। ग्रीक में इसे ‘जामितर’ कहते हैं। मराठी का जमाई हिन्दी की बोलियों में पहुना, मेहमान, कुवंर साहब, ब्याहीजी, यजमान हो जाता। मजा देखिए दामाद रिश्तेदार बनने के बाद ‘पहुना’ ही कहलाता है। बांग्ला संस्कृति में जमाई का बड़ा जलवा है। वहां तो दामाद के लिए बाकायदा एक ‘जमाई षष्ठी पर्व’ है। ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी को पीपल के पेड़ के नीचे जमाई की लम्बी उम्र के लिए प्रार्थना होती है। जमाई राजा को उपहार मिलते हैं। बॉलीवुड भी दामादों पर मेहरबान रहा। दमाद पर दामाद, जमाई राजा, मेरा दामाद जैसी फिल्में बनी। कथाकार मुंशी प्रेमचंद भी इससे अछूते नहीं रहे। उनकी कहानी ही है ‘घर जमाई’।

 

फिर राबर्ट वाड्रा पर इतनी हायतौबा क्यों? भूपेन्द्र सिंह हुड्डा हों या अशोक गहलौत। दामादों को भेंट देना हमारे देश की सामाजिक प्रथा है। उन्हें मिलने वाले लाखों करोड़ों का हिसाब नहीं होना चाहिए। दामाद होते ही इसलिए हैं कि उनकी सेवा की जाए। आखिर दामादवाद ने ही भाई-भतीजावाद को राजनीति से बेदखल किया है। जो काम समाजवादी नहीं कर पाए। लगता है भाई-भतीजावाद का अंत करने के लिए ही दामाद का जन्म हुआ है।

अथ श्री दामाद कथा।    

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                                                                                                                                                            परिदृश्य


                                                                                                                                                 - विजेन्द्र शर्मा

    विवादों की जन्मस्थली ....जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल

पिछले दो-तीन सालों से राजस्थान की राजधानी जयपुर में जनवरी माह में होने वाले जयपुर साहित्य उत्सव ने सुर्ख़ियों में बने रहने के तमाम रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं ! गुलाबी नगरी में होने वाला ये आयोजन पहली बार ज़ियादा सुर्ख़ियों में तब आया जब इसके एक सेशन में अंग्रेजी के कुख्यात लेखक सुहेल सेठ मंच पर ही मदिरा सेवन करते हुए देखे गए ! इस कु-कृत्य का विरोध होना जायज़ था और हुआ भी ,उत्सव में शाम को सजने वाली शराब से सराबोर महफ़िलों ने भी लोगों का ध्यान बड़ा आकर्षित किया ! इस उत्सव के आयोजकों ने जैसे ही इसमें ग्लैमर का तड़का लगाया भीड़ के साथ–साथ प्रायोजक भी कतार में आकर खड़े होने लगे ! मात्र दो–चार लाख के मामूली बजट से शुरू हुए इस मेले का बाज़ार आज करोड़ों तक पहुँच गया !

 साहित्य के नाम पर होने वाले इस उत्सव को विश्व के नक्शे पर  जगह दिलाने के लिए आयोजकों ने बड़ी सोची समझी रणनीति के तहत जानबूझकर गत वर्ष सलमान रुश्दी का नाम उछाला ! ये लोग जानते थे कि प्रशासन रुश्दी को यहाँ आने तो नहीं देगा मगर उसके नाम और अभिवयक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में हम इस “जयपुर लिकर उत्सव “को मक़बूल (प्रसिद्ध ) ज़रूर कर देंगे ! इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि आयोजक अपनी चाल में क़ामयाब हो गए , दो बेशर्म लेखक बड़ी बेहयाई के साथ सलमान रुश्दी की  प्रतिबंधित किताब के अंश पढ़ गए और हमारा लचर निज़ाम लाचार खड़ा रहा ! पूरे उत्सव के दौरान खुलेआम सिगरेट का धुंआ तमाम पाबंदियों के बावजूद भी वातावरण को प्रदूषित करता रहा और बहुत सी फ़िल्मी हस्तियों का साहित्य के प्रति दिखावटी लगाव देखने को मिला ख़ासकर “ बाबू जी ज़रा धीरे चलो “ जैसे आइटम गीत पर थिरकने वाली याना गुप्ता का साहित्य प्रेम !

डिग्गी पैलेस में होने वाले साहित्य के महाकुम्भ जैसे विशेषण से चर्चित कर दिए गए इस आयोजन से साहित्य का कोई भला होगा ऐसी उम्मीद इस साल भी नहीं थी ! जानबूझकर इस बार भी विवादों के शामियाने डिग्गी पैलेस में लगाए गए  ! उन निर्लज्ज लेखकों को पुनः बुलाने की क्या ज़रुरत थी  जिन्होंने पिछले साल रुश्दी की प्रतिबंधित पुस्तक के अंश पढ़े !

 पाक सेना ने हमारे दो जवानो को सरहद पर बर्बरता से शहीद कर देती है और एक जवान का सर तक काट कर वे लोग ले जाते हैं ,पाकिस्तान की हुकूमत इस घिनौने कृत्य पर संवेदना तक प्रकट नहीं करती ,फिर क्या ज़रूरी था कि वहाँ के साहित्यकारों को यहाँ बुलाया जाए !

ये सब भी जानबूझ कर किया गया ताकि आयोजन को सुर्ख़ियों में जगह मिलती रहे ! अगर भारतीय सेना ने पाक सेना के किसी जवान का यूँ  सर काटा  होता और ऐसा कोई आयोजन पाकिस्तान में होता तो मैं दावे के साथ कहता हूँ कि वहाँ से हमारे साहित्यकारों का कार्यक्रम में भाग लेना तो दूर उनका वापिस आना तक मुश्किल हो जाता ! पंच सितारा होटल में बैठकर अभिवयक्ति की स्वतंत्रता की बात करने वाले लेखक आवाम के दर्द को कहाँ समझ सकते हैं !

अंग्रेजी साहित्य को विशेष तरजीह देने वाले इस उत्सव के आयोजकों  ने हिंदी,उर्दू ,और यहाँ की एक-आध ज़ुबान के सेशन रखवा कर थोड़ी मेहरबानी ज़रूर कर दी ! अदब के नाम पर होने वाले इस मनोरंजन उत्सव का जब-जब जिस किसी ने विरोध किया उन्हें आयोजकों ने अगली बार आमंत्रित कर लिया या एक आध सेशन में जगह दे दी ! जो अख़बार इस मेले की कल तक मुखालफ़त कर रहे थे आज वे ही इसके मीडिया पार्टनर बने हुए हैं ! कुछ स्थानीय साहित्यकार और स्वयम्भू साहित्यकार भी पिछले साल खुलेआम इस आयोजन के विरोध में थे मगर इसबार आयोजकों ने बड़ी चतुराई से इन्हें एक –आध सेशन का झुनझुना खेलने के लिए दे दिया और इन अदीबों को ऐसे लग रहा है जैसे इन्हें पदम् विभूषण मिल गया हो !

इस फेस्टिवल का पहला दिन ही एकबार फिर विवादों के साथ शुरू हुआ , आदरणीया महाश्वेता देवी जी ने जमकर नक्सलियों का दर्द लोगों से बांटा ,उन्होंने कहा कि नक्सलियों को सपने देखने का हक़ है काश महाश्वेता देवी जी को नक्सलियों के हाथों शहीद हुए जवानो के सपनों की भी फ़िक्र होती ! क्या ज़रूरत थी साहित्य के नाम पर होने वाले उत्सव में इस तरह की बेहूदा बात करने की !

विज्ञापन जगत से फिल्मों में गीतकार हो गए प्रसून जोशी इस मेले के ब्रांड एम्बेसडरों में से एक हैं ! प्रसून जी ने पता नहीं क्या सोचकर कहा कि भगवान् कृष्ण भी इव टीजर थे ! बड़े अफ़सोस की बात है कि अपने आप को गीतकार कहने वाला कृष्ण के व्यापक दर्शन से ही नावाकिफ़ है समझ में नहीं आता कुछ हटकर बोलने के रौ में ये चमक –धमक वाले लोग इतनी बेतुकी बातें क्यूँ कह जाते हैं ! जावेद अख्तर साहब ने भी कुछ हट कर कहने के चक्कर में यहाँ तक कह दिया कि “एक माँ बच्चे के सबसे क़रीब होती है , वही बच्चे को असली तालीम देती है , एक माँ को धर्म से दूर रहना चाहिए ताकि बच्चे को वो सही शिक्षा  दे सके !””क्या धर्म किसी माँ को अपने बच्चे को सही तालीम देने से रोकता है ? इस बेतुके बयान का कोई सर पाँव नज़र नहीं आता !

 जिस दिन ये मेला शुरू हुआ उस दिन राजस्थान के एक जाने-माने चैनल पर नीचे पट्टी पर ख़बर चल रही थी की प्रसून जोशी जयपुर पहुंचे ..मैरिट होटल में रुकेंगे ....क्या यही मेयार रह गया है ख़बर का ?

लाखों रुपये प्रसून जोशी , जावेद अख्तर , शबाना आज़मी और गुलज़ार साहब  को आयोजकों ने शिरकत करने के दियें होंगे और सुना है कि गुलज़ार तो  इस बार सिर्फ़ श्रोता का किरदार अदा करने आयें हैं ,यक़ीनन गुलज़ार साहब को श्रोता बनने की  भी काफ़ी मोटी रकम मिली होगी !

 एक तरफ़ एक सच्चा क़लमकार पैसों के अभाव में अपनी रचनाओं का अपनी डायरी में ही क़त्ल कर देता है दूसरी तरफ़ साहित्य के नाम पर होने वाले इस आयोजन में करोड़ों रुपये सिर्फ़ कुछ स्वयम्भू अदीबों के ठहरने और इनके आने की फीस में उड़ा दिए जाते है ये दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है !

मुझे तो क्या क़लम से सच्ची मुहब्बत करने वाला हर शख्स जयपुर के इस साहित्य उत्सव को अब यही समझने लगा है :--

जहां अदब के नाम पर , मौज मस्तियाँ जाम !

जयपुर में साहित्य का , कैसा है ये धाम !!

दो साल पहले जयपुर के एक प्रतिष्ठित साहित्यिक प्रकाशक ने दस साहित्यिक किताबों का मूल्य मात्र सौ रुपये रखा , साहित्य के क्षेत्र में ये एक क्रांतिकारी पहल थी , दस लेखकों का क़लाम बहुत से लोगों तक पहुंचा ! अदब की दुनिया में ये क़दम एक साहसिक क़दम था और इसकी पज़ीराई भी बहुत हुई ! उस वक़्त फेसबुक की वाल पर कुछ दोगले किस्म के अपने आप को अदीब कहने वाले लोगों ने बहुत कुछ लिखा ! लेखक के हित का मुद्दा उन्होंने बड़े ज़ोर-शोर से उठाया मगर इस आयोजन के एक सेशन में जगह भर मिल जाने से यही लोग फूले नहीं समा रहें हैं ! जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में लेखनी के साथ होता हुआ भद्दा मज़ाक क्या इन्हें अब नज़र नहीं आता ? क़लम के इन नकली सिपाहियों को ये सब नज़र तो आता है मगर सुर्ख़ियों में बने रहने की चाह ने इन्हें शब्द के साधक से शब्द का सौदागर बना दिया है !

विवाद का कोई भी मौका ये फेस्टिवल अपने हाथ से जाने ही नहीं देता ,मेले के तीसरे दिन साहित्य के मंच पर ज़ात-पात पे उतर आये समाज शास्त्री आशीष नंदी को अचानक क्या हुआ कि उन्होंने यहाँ तक कह डाला की दलित और पिछड़े ज़ियादा भ्रष्टाचारी है ! मीडिया की बदौलत जब ये बात फैली तो दस मिनट के अन्दर – अन्दर नंदी की गन्दी ज़ुबान एक दम पलट गयी वे अपने दिए बयान पर सफाई देने लगे ! क्या पूरे मुल्क ने सुना नहीं वो बयान , पहले कहना फिर मुकर जाना ये सब क्या है  :--

पहले बोले जोश में , गए बाद में नाट !

सरेआम नंदी गए , अपना थूका चाट !!

किसी साहित्यिक मंच पे ऐसी बहस का सबब समझ से परे है या फिर ये है कि लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का सारा ठेका “जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल” के आयोजकों ने ले रखा है !

ऐसे बयान के बाद प्रशासन को चाहिए था की नंदी और आयोजकों को तुरंत गिरफ़्तार करते मगर इनके खिलाफ़ मुकद्दमा भी लोगों के दवाब के बाद दर्ज किया गया !

भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा एक युवा लेखक की कहानी को ये कहकर लौटा दिया गया था की आप के अफ़साने में अश्लीलता बहुत है , साहित्य में ऐसी कहानी का कोई स्थान नहीं हो सकता और इधर जयपुर साहित्य उत्सव के आयोजकों  ने उस अश्लील कथाकार गौरव सोलंकी को बाकायदा आने का न्योता दिया है ! ऐसा लेखक नई नस्ल को क्या सिखाएगा , ज़हनी तौर से बीमार इस तरह के लेखकों का एहतराम करके आयोजक क्या साबित करना चाहते है !

अभी तक हुई इस मेले की  तमाम कारगुजारियों को देखते हुए कहीं से भी नहीं लगता कि इस उत्सव में अदब का भला किसी भी ज़ाविये से हुआ है ! अब  तो ये सवाल उठता है कि इस आयोजन के साथ साहित्य का नाम क्यूँ  चस्पा किया जा रहा है ! भविष्य में अगर ये आयोजन हो तो “ जयपुर साहित्य उत्सव  “ के नाम की जगह इसका नाम “जयपुर मनोरंजन महोत्सव “ कर देना चाहिए !

राजस्थान के साथ –साथ हिन्दोस्तान के तमाम अदीबों से मेरी गुज़ारिश है कि

अदब के नाम पर जयपुर में हर साल होने वाली इस नौटंकी पे लगाम लगनी चाहिए क़लम के सही मायने में पुजारियों को इस आयोजन का बहिष्कार करना चाहिए ! सात से आठ करोड़ के बजट वाले इस आयोजन से आख़िर कुछ विवादों और आयोजकों की जेबों के भराव के अलावा क्या निकल कर आता है !

ऐसे आयोजन से अच्छी तो हमारी ग़रीब साहित्य अकादमियां हैं जो तंग-हालत में भी कम से कम सौ-दो सौ किताबों को छपवाने के लिए लेखकों को आर्थिक सहयोग देती हैं ! हमारी अपनी तहज़ीब को मिटाने पे तुले इस “लिटरेचर उत्सव” में जगह पाकर धन्य हुए हिंदी, उर्दू ,राजस्थानी या अन्य हिन्दुस्तानी ज़ुबान के क़लमकार कभी ये क्यूँ नहीं सोचते कि अना नाम की भी कोई शैय होती है ! जहां इनकी  भाषा के साथ दोयम दर्जे का बर्ताव हो वहाँ बैठकर ये लोग सांस कैसे ले लेते हैं !

इस नौटंकी के प्रायोजकों का जहां तक सवाल है उन्हें भी अपने फैसले पे एकबार फिर से गौर करना चाहिए ! अगर कोई साहित्यिक संस्था इन लोगों के पास थोड़ी इमदाद के लिए जाती है तो इनकी नाक ,भोंहें सिकुड़ने लगती  हैं मगर जयपुर की पवित्र धरा पर होने वाले इस मौज़-मस्ती के मेले के लिए लाखों रुपये देने के लिए इन प्रायोजकों में होड़ लगी रहती है !

साहित्य की आत्मा को चोट पहुंचाने के सिवाय इस उत्सव ने अगर किसी का भला किया है तो वो है जयपुर के होटल व्यवसाय का , बड़े- बड़े कारोबारियों का और आयोजकों का , इश्वर करे जयपुर का नाम विश्व मान-चित्र में छाया रहे ,यहाँ का कारोबार फले-फूले मगर साहित्य के नाम का दुरूपयोग करके नहीं !   

इसी विशवास और उम्मीद के साथ कि आने वाले साल में अगर ये उत्सव हो तो विशुद्ध साहित्य का हो, अगर फिर इसी तरह का मेला लगना है तो इसके आयोजक मुस्तक़बिल में अदब के कांधों पे बन्दूकसाज़ी ना करें !

कविता है  ज़ख़्मी यहाँ ,ग़ज़ल रही है कूक !

कांधे पर साहित्य के , चला  रहे  बन्दूक !

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लहर लहर किनारे

ISTANBUL 

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                                                                                                                                                                    परिचर्चा


या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्दैवै:सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती नि:शेष जाड्यापहा॥

(कुन्द, चन्द्र, तुषार के हार के समान गौरवपूर्ण शुभ्र वस्त्र धारण करने वाली, वीणा के सुन्दर दण्ड से सुशोभित हाथों वाली, श्वेत कमल पर विराजित, ब्रहा, विष्णु महेश आदि सभी देवों के द्वारा सर्वदा स्तुत्य, समस्त अज्ञान और जड़ता की विनाशनी देवी सरस्वती मेरी रक्षा करे।) वसंत ऋतु आते ही प्रकृति का कण-कण खिल उठता है। मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास से भर जाते हैं। हर दिन नयी उमंग से सूर्योदय होता है और नयी चेतना प्रदान कर अगले दिन फिर आने का आश्वासन देकर चला जाता है। यों तो माघ का यह पूरा मास ही उत्साह देने वाला है, पर वसंत पंचमी (माघ शुक्ल 5) का पर्व भारतीय जनजीवन को अनेक तरह से प्रभावित करता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी मां सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है। जो शिक्षाविद भारत और भारतीयता से प्रेम करते हैं, वे इस दिन मां शारदे की पूजा कर उनसे और अधिक ज्ञानवान होने की प्रार्थना करते हैं। कलाकारों का तो कहना ही क्या? जो महत्व सैनिकों के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी का है, जो विद्वानों के लिए अपनी पुस्तकों और व्यास पूर्णिमा का है, जो व्यापारियों के लिए अपने तराजू, बाट, बहीखातों और दीपावली का है, वही महत्व कलाकारों के लिए वसंत पंचमी का है। चाहे वे कवि हों या लेखक, गायक हों या वादक, नाटककार हों या नृत्यकार, सब दिन का प्रारम्भ अपने उपकरणों की पूजा और मां सरस्वती की वंदना से करते हैं।सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों आ॓र मौन छाया रहता है। विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है- प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु। अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हममें जो आचार और मेधा है उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूँ भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है।


                                                                                                              -संगीता श्रीवास्तव











ब्रज में बसंत पंचमी से ही होली का डांडा गढ़ जाने के साथ ही जगह जगह पर होली का उत्सव प्रारंभ हो जाता है और मंदिरों में फागोत्सव के रूप में रंग गुलाल उड़ाने के साथ ढप ढोल नगाड़े मजीरों से धमार राग के स्वर गूंजने लगते हैं। फागुन शुक्ला नवमी को बरसाना की प्रसिद्ध रंगीली व लठामार होली मनाई जाती है। बरसाने की लट्ठमार होली पूरी दुनिया में जानी जाती है। बरसाना की लट्ठमार होली पूरे देश में ही नहीं विदेश में भी प्रसिद्ध है। राधाकृष्ण की लीलाएं इसी गाँव से संबंधित है। बरसाने की लट्ठमार होली फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है।

इस दिन नंद गाँव के ग्वाल बाल होली खेलने के लिए राधा रानी के गाँव बरसाने जाते हैं और विभिन्न मंदिरों में पूजा अर्चना के पश्चात नंदगांव के पुरुष होली खेलने बरसाना गांव में आते हैं और बरसाना गांव के लोग नंदगांव में जाते हैं। इन पुरूषों को होरियारे कहा जाता है। जब नाचते झूमते लोग गांव में पहुंचते हैं तो औरतें हाथ में ली हुई लाठियों से उन्हें पीटना शुरू कर देती हैं और पुरुष खुद को बचाते भागते हैं। लेकिन खास बात यह है कि यह सब मारना पीटना हंसी खुशी के वातावरण में होता है। औरतें अपने गांवों के पुरूषों पर लाठियां नहीं बरसातीं। बाकी आसपास खड़े लोग बीच बीच में रंग बरसाते हुए दिखते हैं।

इस होली को देखने के लिए बड़ी संख्या में देश-विदेश से लोग बरसाना आते हैं। ऐसी मान्यता है कि यह जब श्रीकृष्ण होली के लिए गोपियों को प्रतीक्षा के कराते थे, तब गोपियां उन पर गुस्सा होकर लाठियां बरसाती थी। यह लट्ठमार होली आज भी बरसाना की लड़कियों और नंदगांव के लड़कों के बीच खेली जाती है।Ok`~न्दावन : होली का पर्व नजदीक आते ही प्रकृति भी होलीमय हो जाती हैं| शीतल मलय तन और मन दोनों को ही सराबोर कर देती है| बसंती मौसम में धरा गगन दोनों ही होली की मस्ती में मदमस्त नज़र आते हैं| एक ओर जहाँ कड़ाके की ठण्ड जा रही होती है वहीँ गर्मी का आगाज होने वाला होता है ऐसे में इन दोनों का मिलन काल गुलाबी-गुलाबी होता है और इसी गुलाबी माहोल में जब अबीर, गुलाल और रंग फिजा में उड़ता है तब मौसम अपने आप नशीला हो जाता है| देश के हर एक कोने में होली मनाई जाती है सिर्फ फर्क इतना है की उसके मनाने के पीछे कथाये अलग-अलग हैं| आईये हम आप को बताते हैं कहाँ कैसे मनाई जाती है होली|

धरा पर अलौकिक प्रेम के प्रतीक राधा-कृष्ण की अमर प्रेम कहानी में होली का बड़ा ही अनोखा वर्णन किया गया है। बसंत ऋतु के रसमय मौसम में एक दूसरे पर रंग डालना उनकी लीला का सबसे विशेष अंग बताया गया है। मथुरा और वृन्दावन की होली राधा-कृष्ण के इसी रंग में डूबी हुई होती है।

बरसाने और नंदगाँव की लठमार होली तो प्रसिद्ध है ही देश विदेश में श्रीकृष्ण के अन्य स्थलों पर भी होली की परंपरा है। कहा जाता है कि भक्ति में डूबे भक्तों का रंग बाह्य रंगों से नहीं खेला जाता, रंग खेला जाता है वरन भावना रूपी रंग खेला जाता है सद्भावना बढ़ाने के लिए, रंग होता है प्रेम का, रंग होता है भाव का, भक्ति का, विश्वास का। यही नहीं होली उत्सव पर होली जलाई जाती है अंहकार की, अहम् की, वैर द्वेष की, ईर्ष्या मत्सर की, संशय की और पाया जाता है विशुद्ध प्रेम |


                                                                                                                        - बी.एल प्रजापति

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                                                                                                                                                                   सरोकार


                                                                                                                                                         -सीताराम गुप्ता

होलिका दहन की प्रासंगिकता:

होली ही जलानी है तो नकारात्मक घातक विचारों की होली जलाइये
आज के ग्लोबल वॉर्मिंग के दौर में करोड़ों पेड़ एक ही दिन होलिका की अग्नि में भस्म कर देना क्या उचित है? एक ही दिन में हज़ारों टन ग्रीन हाउस गैसों का ज़हर हमारे पर्यावरण में घुल जाता है। एक ही दिन में इतनी लकड़ी जला दी जाती है जिससे सैकड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्रों का सफाया हो जाता है।



यद्यपि सड़क चौड़ी थी फिर भी जाम जैसी स्थिति बनी हुई थी। थोड़ा आगे जाने पर पता चला कि सड़क के ऊपर ही लकड़ियों का ढेर पड़ा था। लकड़ियों के साथ-साथ दूसरा कूडा़-करकट भी ढेर की शोभा को द्विगुणित कर रहा था। माजरा समझते देर नहीं लगी। होली नज़दीक है और ये सब होलिका दहन की तैयारियों का ही एक हिस्सा है। होली से पहले हर नगर हर कॉलोनी में कमोबेश यही दृष्य नज़र आता है।

     हिंदू पंचांग के अनुसार हम प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होली का त्यौहार मनाते हैं। रंगोत्सव की पूर्व संध्या पर होलिका दहन किया जाता है। वैसे वसंत पंचमी जो माघ मास के शुक्ल पक्ष की पाँचवीं तिथि को पड़ती है से ही होली का प्रारंभ हो जाता है। हर गाँव, हर क़स्बे और हर शहर में एक निश्चित स्थान पर वसंत पंचमी के दिन होली की स्थापना की जाती है और चालीस दिनों तक लोग यहाँ पर लकड़ियाँ डालते रहते हैं। होलिका दहन के दिन उचित  मुहूर्त में उसे अग्नि से प्रज्वलित कर दिया जाता है। शास्त्रों के अनुसार भद्रा नक्षत्र में होलिका दहन पूर्णतः वर्जित है। यही कारण है कि किसी वर्ष तो होलिका दहन सायं सात-आठ बजे ही हो जाता है तो किसी वर्ष प्रातः तीन चार बजे।

     होलिका दहन क्यों किया जाता है इसके पीछे जो पौराणिक कथा प्रचलित है उससे भी आप परिचित हैं। कहा जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्य्ाकशिपु नाम का एक अत्य्ांत बलशाली असुर था। वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जल सकती।

     हिरण्य्ाकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था फिर भी वह जल गई और प्रह्लाद बिना वरदान के भी बच गया। तभी से होली बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है। अच्छाई के सामने बुराई टिक नहीं सकती उसका समाप्त हो जाना निश्चित है पर आज केे माहौल में प्रश्न उठता है कि क्या मात्र लकड़ियों के ढेर में आग लगाने से हम नकारात्मकता से मुक्त हो जाते है? आज जिस रूप में यह त्यौहार मनाया जा रहा है क्या वह प्रासंगिक है?

     ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है। यह भी माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैरभाव, ईर्ष्या और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका तो जल जाती है किंतु प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद अक्षुण्ण रहता है। दहन प्रतीक है विकारों की समाप्ति के उपरांत आनंद के प्रारंभ का अतः मन रूपी भट्टी में नकारात्मक विचार रूपी होलिका को जलाकर समाप्त कर देने में ही इस पर्व की सार्थकता है। बुराई के भी अनेक स्तर और स्वरूप होते हैं। क्या होलिका दहन के साथ हम वर्तमान बुराइयों से मुक्त होने का प्रयास करते हैं? फिर शहरों और क़स्बों में जिस रूप में यह त्यौहार मनाया जाता है क्या वह आज के युग में सही और प्रासंगिक है? परंपरागत रूप में लकड़ियों को जलाना क्या ठीक कहा जा सकता है?

     त्यौहार मनाने के चक्कर में अपने पर्यावरण को नष्ट करके और संसाधनों का दुरुपयोग करके कहीं हम ख़ुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार रहे हैं? त्यौहार के नाम पर देश में एक ही दिन लाखों होलिकाएँ जलाई जाती हैं। एक होली में सैकड़ों किलो लकड़ी जल जाना सामान्य बात है। कस्बों और गाँवों में होली के कई दिन पहले से ही गोबर के पतले-पतले उपले और अंजुलि के आकार की गुलेरियाँ बनाना प्रारम्भ हो जाता है। बनाते समय ही इनके बीच में उंगलि से एक छेद बना दिया जाता है। इनके सूख जाने पर इन्हें रस्सियों में पिरोकर मालाएँ बनाई जाती हैं। होलिका दहन के दिन ये मालाएँ होलिका पर डाल दी जाती हैं।

     कहीं-कहीं अति उत्साही व्यक्ति होलिका दहन के नाम पर टनों लकड़ी एक बार में फूँक डालते हैं। कई स्थानों पर सामूहिक होलिकाओं के साथ-साथ एक परिवार के सभी लोग मिलकर अलग से भी होलिकर दहन करते हैं। करोड़ों पेड़ एक ही दिन होलिका की अग्नि में भस्म कर देना वो भी आज के ग्लोबल वॉर्मिंग के दौर में क्या उचित है? एक ही दिन में पच्चीस हज़ार टन ग्रीन हाउस गैसों का ज़हर हमारे पर्यावरण में घुल जाता है। एक ही दिन में इतनी लकड़ी जला दी जाती है जिससे तीन सौ हेक्टेयर वन क्षेत्र का सफाया हो जाता है।

     पर्यावरण की सेहत के लिए लकड़ियाँ ही नहीं कूड़ा-कचरा और काग़ज़ जलाना भी हानिकारक है। लकड़ी, कूड़ा-कचरा और काग़ज़ जलाने से एक ओर तो वायु में उपस्थित ऑक्सीजन जैसी लाभदायक गैसों की कमी हो जाती है तथा दूसरी ओर घातक ग्रीन हाउस गैसों की वृद्धि। काग़ज़ व अन्य अनेक वस्तुओं को रीसाइकिल करके हम अपनी अमूल्य वन संपदा को बचा कर पर्यावरण को सुधार सकते हैं। हमारा पर्यावरण वैसे ही लगातार बिगड़ता जा रहा है। एक तो आर्थिक विकास के कारण हम अपने पर्यावरण की लगातार उपेक्षा कर इसे प्रदूषित कर ही रहे हैं और ऊपर से कर्मकांडों और पर्वों के माध्यम से स्थिति को और दयनीय बना रहे हैं। बाज़ारवाद स्थिति को और भयावह बना रहा है। आइये होली तथा अन्य पर्वो पर इस परिदृष्य को बदलने की एक कोशिश तो करके देखें।

     एक बार गाँधीजी ने भी होली जलाई थी और वो होली थी विदेशी वस्त्रों की। देश के दस्तकारों और कारीगरों के हाथों से काम छिन रहा था इसलिए गाँधीजी द्वारा विदेशी कपड़े का बहिष्कार कर उसकी होली जलाना उचित ही नहीं अनिवार्य और सार्थक था। यदि होली ही जलानी है तो कोई ऐसी ही होली जलाइये जो हमारे विनाश की बजाय विकास में सहायक हो। कोई ऐसी ही होली जलाइये जिससे हमारा पर्यावरण प्रदूषित होने की बजाय सुधरे। हम साफ-स्वच्छ हवा में साँस ले सकें। जलानी ही है तो ऐसी होली जलाइये जिससे हमारा भौतिक ही नहीं सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश भी कुछ ऐसा हो जाए कि हम निर्द्वंद्व और निर्भय होकर जी सकें। शोषण, उत्पीड़न और बलात्कार से सुरक्षित रह सकें।

     यह तभी संभव है जब हम अपने मन में व्याप्त नकारात्मक भावों की होली जला दें। तटस्थदृष्टा तमाशबीन बनने की बजाय ग़लत का विरोध करने की शक्ति अपने अंदर उत्पन्न करने का प्रयास करें। अज्ञान, अस्मिता-अहंकार, राग-द्वेष, अभिनिवेश, घृणा, वैमनस्य, स्वार्थपरता, परपीड़न आदि सभी घातक मनोभावों की होली जलाएँ। आइये पहले दिन प्रतीकात्मक होलिका की अग्नि में मन में व्याप्त समस्त नकारात्मक भावों का कचरा जला डालें। जिस प्रकार पेड़ अपनी पुरानी पीली पड़ गई पत्तियों को फेंक नई पत्तियाँ धारण कर पुनर्जन्म पाता है हम भी नकारात्मक भावों से मुक्त होकर सकारात्मक भावों का विकास कर नये जीवन में प्रवेश करें। परिवर्तन के अभाव में विकास अथवा पुनर्जन्म संभव नहीं। होलिका दहन तथा अन्य पर्वो के आयोजन के वर्तमान स्वरूप में परिवर्तन भी पुनर्जन्म से कम नहीं होगा।

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                                                                                                                                                      पक्ष-विपक्ष



                                                                                                                                                   शालिनी माथुर


औरत के नज़रिये से
मृतात्माओं का जुलूस

          
 हमारे देश की राजधानी नई दिल्ली में 16 दिसम्बर 2012 को 23 वर्ष की एक युवा स्त्री के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ। यह रेप एक पुरुष द्वारा किया गया केवल वासना मूलक यौन शोषण ही नहीं था, इसमें कई पुरुषों ने मिलकर क्रूरता , बर्बरता, और नृशंसता से पूरे स्त्री शरीर को अपमानित किया और विरूपित करके चलती हुई बस के बाहर फेंक दिया। 29 दिसम्बर को क्रूर हिंसा की शिकार युवती की मृत्यु हो गई। प्रसिद्ध पुस्तक ’सिस्टरहुड इज़ पावरफ़ुल’ की लेखिका और मिज़ मैगज़ीन की सम्पादिका अमरीकी नारीवादी चिन्तक रॉबिन मार्गन का कथन है -“पोर्न इज़ द थियरी एंड रेप इज़ द प्रैक्टिस ।” हम सब इस कृत्य में रॉबिन मार्गन के इस कथन का सत्यापन होते देख सकते हैं।

कथादेश पत्रिका के जून 2012 अंक में औरत के नज़रिए से स्तम्भ में मेरा एक आलेख प्रकाशित हुआ था- व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि। वह आलेख हिन्दी साहित्य में स्त्री शरीर के पोर्नोग्राफ़िक निरूपण के विरुद्ध था। पोर्न साहित्य और पोर्न कला में स्त्री शरीर को बर्बरता पूर्वक विवश, अपमानित, यौनीकृत और विरूपित रूप में निरूपित किया जाता है और रेप में वास्तविक जीवन में वैसा किया जाता है। पोर्न थियरी यानी सिद्धान्त है और रेप प्रैक्टिस यानी क्रियान्वयन। यह दोनों विमानवीकरण की ही प्रक्रियाएं है।

व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि को पाठकों का इतना सुचिन्तित, सुविचारित, प्रतिबद्ध और उत्साह से परिपूर्ण  जन समर्थन मिला क्योंकि यह लेख न्याय के पक्ष में था, सदाशयता पूर्ण था ,और इसमें पाठक अपने विचारों का प्रतिबिम्ब देख सके थे। इतना बड़ा पाठक वर्ग मेरा हमनवा इसीलिए बना क्योंकि  लेख ने उनके ही भावों की तर्जुमानी की थी। इस आलेख को कथादेश से लेकर कम से कम पच्चीस इन्टरनेट पत्रिकाओं ने छापा और लगभग इतनी ही अन्य लघु पत्रिकाओं ने।

पाठकों का आभार व्यक्त करने के लिए शब्द पर्याप्त नहीं है। लेख छपने के बाद तीन जून को मेरे पास पहला प्रशंसात्मक फोन आया और आज आठ  जनवरी 2013 तक कोई भी दिन ऐसा नहीं हुआ जिसमें मुझे कोई नया फोन या एस0 एम0 एस0 न मिला हो। जो फोन नम्बर मैं  बचा सकी उनको एक छोटी डायरी में लिख लिया है। इनकी संख्या 565 है। इंटरनेट पर आई टिप्पणियां जोड़ लें तो पाठकांे की प्रतिक्रियाओं की संख्या हज़ारों में होगी। पाठकांे की  कुल संख्या का तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।

मैं स्वंय को एक सामाजिक कार्यकर्Ÿाा मानती हूँ और विद्यार्थी जीवन से ही समाज से जुड़ कर सामाजिक मुद््दों पर काम करती रही हूं। साहित्य लेखन में मेरा प्रवेश भी मेरे सामाजिक सरोकार का हिस्सा है। मैं हिन्दी भाषी हूँ। आज मुझे अपने हिन्दी भाषी होने पर बहुत गर्व हो रहा है।

ऐसे आलेख वाहवाही बटोरने के लिए नहीं लिखे जाते । पवन करण और अनामिका की उन दो कविताओं को , जिन्हें मैंने पोर्नोग्राफ़ी की शास्त्रीय रचनाएं कहा है , मैंने बड़ी तकलीफ़ के साथ उद्धृत किया था। पाठकों की संवेदनाओं को कष्ट पहुंचाने का मुझे खेद है। आज यह लेख भी उतनी ही तकलीफ के साथ लिख रही हूँ , कि लिखना बहुत जरूरी हो गया है,उन मृतात्माओं के बारे में जिन्होंने एक गम्भीर चर्चा को मखौल में बदलने का प्रयास किया ,एक छद्म विपक्ष खड़ा करके उसे बहस में तब्दील करने का प्रयास किया और अहंकार में चूर हो कर खुद ही बहस समाप्ति की घोषणा भी कर दी। वह आलेख मेरा था ,उस पर चर्चा मैं यूं ही समाप्त नहीं होने दूंगी।

 मैंने स्पष्ट रूप से लिखा था कि ’’यह टिप्पणी केवल दो रचनाओं पर है, कवि तथा कवयित्री के सम्पूर्ण व्यंिक्तत्व या कृतित्व पर नहीं। ’’फिर भी अगस्त के कथादेश में जो लेख छपे उनमें से अर्चना वर्मा का लेख प्रिय शालिनी को सस्नेह और अनामिका का लेख सुश्री शालिनी माथुर को निवेदित था। तब से अब तक मैंने इस विषय पर एक भी शब्द नहीं लिखा, आज भी न लिखती यदि अर्चना वर्मा ने झूठ ,दम्भ ,कुत्सा और दुर्भावना से भरे पूरे ग्यारह पृष्ठ उसी कथादेश के दिसम्बर अंक में न लिखे होते ,जिस कथादेश की वे सम्पादन सहयोगी है।

     जिस आलेख में अर्चना वर्मा का कोई जिक्र न था ,वह बात उनको बहुत नागवार क्यों गुज़री ? वे इतनी व्यथित ,इतनी व्याकुल, इतनी उत्तेजित, इतनी आगबबूला क्यों हैं ? कोई ख़ास बात है क्या? इसका उत्तर इसी आलेख में आगे ढूंढं लेंगे ,पहले उनके झूठ का प्रतिवाद कर दें-

1) अर्चना वर्मा ने लिखा है कि शालिनी ने ’’ आशंका जाहिर की कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उद्धृत कवियों के विरोधियों का कोई कार्टेल इतर कारणों से मुद्दे को ले उड़ा। ’’(अगस्त पृष्ठ8 )यह झूठ है,मैंने ऐसा नहीं कहा । पाठकों का कोई कार्टेल नहीं हो सकता क्योंकि उनका कोई निहित स्वार्थ नहीं होता। मैंने अपने लेख में कवियों के कार्टेल का जिक्र किया था जो खुद ही एक दूसरे को पुरस्कृत किया करते  हैं। इस प्रकरण ने भी यही सिद्ध किया है कि पाठकों द्वारा तिरस्कृत कवि कार्टेल द्वारा पुरस्कृत हैं।

  2)’’ शालिनी कथादेश की आमन्त्रित और एक वर्ष से नियमित स्तम्भ कार है। उनसे मेरा परिचय उनके लेखन के माध्यम से ही है। यह आमन्त्रण अपने आप में उनमें लेखन की तेजस्विता और धार की स्वीकृति है। कथादेश को इस बात का गर्व है कि उसके लिए व्यक्तिगत जान पहचान का नहीं रचना का महत्व है। ’’ (दिसम्बर पृष्ठ 8) अर्चना वर्मा ने यह साबित करने का प्रयास किया हैं मानों मैं उनके आमन्त्रण पर कथादेश में आई हूँ।यह सच नहीं। सच यह है, कि मेरी पहली टिप्पणी ’कहेगी तो बेघर हो कर रहेगी ’ अगस्त 2007 में और मेरा पहला वैचारिक आलेख ’’नारीवादी आन्दोलन पर एक नारीवादी का अन्तर्दर्शन आज से पूरे पांच वर्ष पूर्व ’’ फरवरी 2008 में प्रतिष्ठत नारीवादी रचनाकार सुधा अरोड़ा ने कथादेश केे अपने स्तम्भ औरत की दुनियां में छापा था। उस पर छिड़ी लम्बी बहस में मन्नू भंडारी ,मृृदुला गर्ग , प्रभु जोशी प्रभा खैतान  कात्यायनी और रुनू चक्रवर्ती तथा कुसुम त्रिपाठी ने भाग लिया था। उस समय अर्चना वर्मा हंस में सम्पादन सहयोग कर रही थीं। सितम्बर 2008 में साहित्य के नाम पर पत्रिका हंस में चल रही मठाधीशी और पोर्नोग्राफिक प्रवृŸिा के विरुद्ध कथादेश के औरत की दुनियां में ही मेरा आलेख छपा था ’’ नवरीतिकालीन संपादक और उनके चीयर लीडर्स ।’’, वह लेख भी चर्चित हुआ।

  3)स्तम्भकार होने का उलाहना अर्चना वर्मा मुझे न ही देतीं ंतो बेहतर होता।़ फ़रवरी 2012 में ओथेलो का नारीवादी पाठ पढ़ने के बाद एक वरिष्ठ लेखिका होते हुए स्वयं अर्चना वर्मा ने मुझे फ़ोन ही नहीं किया बल्कि उस लेख की प्रशंसा करते हुए प्रस्ताव रखा कि मैं एक स्तम्भ क्यों न शुरू कर दूं। मार्च 2012 में औरत के नज़रिये से नामक अपने स्तम्भ में मैंने मातृत्व के व्यवसायीकरण पर एक लेख लिखा। मगर अगले ही माह उस स्तम्भ में अर्चना वर्मा ने अपनी एक विस्तृत टिप्पणी के साथ नीहारिका की कहानी छाप दी और उसके कुछ समय बाद उसी स्तम्भ में विभास वर्मा द्वारा किया गया एक अपठनीय अनुवाद। क्या किसी आमन्त्रित स्तम्भकार के स्तम्भ में कोई सहयोगी सम्पादक ऐसी घुसपैठ करता है ? क्या यही उनकी सम्पादकीय नैतिकता है? मुझे स्तम्भकार कहलाने का कोई शौक नहीं है, न ही साहित्यकार कहलाने का । इस प्रकरण को पाठकों के सामने उठाने का मुझे खेद है।

आइए अब अपने लेख के सम्बन्ध में छपे कुछ आलेखों की पाठाधारित चर्चा कर लें।

 दिसम्बर 2012 के कथादेश में छपा अर्चना वर्मा का आलेख ’पढ़न्त की राजनीति ’पूरे ग्यारह पृष्ठों में विस्तीर्ण है। इसकी  पढ़न्त उसकी  पढ़न्त , तेरी पढ़न्त मेरी पढ़न्त,ऐसी पढ़न्त वैसी पढ़न्त,  सŸार से भी अधिक बार पढ़न्त पढ़न्त लिख कर कदाचित् उन्होंने यह कहने का प्रयास किया है कि एक ही रचना को कई तरह से पढ़ा जा सकता है। अनामिका और पवन करण दोनों ही पन्द्रह बीस वर्ष से लिख रहे होंगे। मैंने तो अपना केवल एक ही पाठ उन पाठकों केे आगे प्रस्तुत किया था जिनके शीर्ष पर चढ़ कर वर्षों से ऐसा कविता पाठ चल रहा था। अर्चना वर्मा आखिर कितनी पढ़न्त करेंगी ? क्या मेरे जैसा सामान्य पाठक एक पाठ भी नहीं कर सकता? यह पढ़न्त की कैसी राजनीति है?

अनामिका के लेख के विषय में वे कहती हैं ,’’ पढ़ने वालो ने अनुचित ही इसे शालिनी के जवाब की तरह पढ़ा  और उचित ही असन्तुष्ट हुए कि जवाब नहीं मिला , जवाब दिया ही नहीं गया था। इसी तरह अर्चना वर्मा का आलेख भी पिछले अंक से जारी लेख का पूरक अंश था।’’(दिसम्बर पृृ 8 ) मतलब यह, कि दोनो विदुषियों  ने स्वतन्त्र लेख लिखे हैं,न कि प्रतिवाद ।

 अनामिका ने जो लेख बक़ौल अर्चना वर्मा मेरे लेख के जवाब के रूप में नहीं लिखा था उसकी बानगी देखें -’’ प्रतिवाद- कविता के कंधे -(सुश्री शालिनी माथुर को निवेदित) प्रिय शालिनी जी , प्रेमचन्द के बड़े भाई साहब वाले भाव से आप से दो बातंे कहना चाहूँगी...। हबड़ तबड़ करने वाले हड़बड़िया पाठकों के सामने कविता खुलती नहीं.....। शालिनी बाबू मेैं जिस मिथिला की हूँ वहाँ तो अट्ठाइस तीस की उम्र में ही माताएं सासें ब्लाउज धारना बन्द कर देती हैं ... । लड़कियांे की जीन में वाई फैक्टर नहीं होता न अन्जान सिंह की छवि प्रक्षेपित करने की मजबूरी। स्त्री शरीर कोई पुपुही नहीं होता कि एक ही फंूक में बजने लगेे,उन्नत पहाड़ विशाल भी हों यह जरूरी नहीं। ...नैतिकता का ठेका तो आप खैर लंे ही मत......इस बन्धन की गांठे धीरे धीरे खुलती हैं। यत्न करके देखिये। सस्नेह, अनामिका।’’

अनामिका दर्पवती हैं ,वे ईसा मसीह नहीं हैं , वे क्षमा नहीं करेंगी ,वे पाठ पढ़ाएंगी- ’’ ईसू, यदि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं तो इन्हें जानना चाहिए , हम दिखाएंगे इन्हें आईना कि इन्हें पता तो चले कि ये क्या कर रहे हैं। ’’( पृष्ठ 13) पाठक एक कवयित्री की स्नेह भरी भाषा देखें।

समयांतर के प्रतिष्ठित स्तम्भकार दरबारी लाल कहते हैं कि’’ अनामिका के लेख की विशेषता उनका गुस्सा है। उनके लेख में नोट करने लायक बात यह है कि वे शालिनी को कम से कम दो जगह पुल्लिंग में बदल देती हैं। इस तरह वे ठीक उस पुरुषवादी तौर तरीके का इस्तेमाल करती नज़र आती हैं, जो अपने विरोधी पुरुषों को अपमानित करने के लिए उन्हें स्त्री या स्त्रैण सम्बोधित ही नहीं करते सिद्ध करने की कोशिश भी करते हैं।’’ (समयांतर सितम्बर 2012) मैं इसमें जोड़ना चाहूंगी कि अनामिका के लेख में रौद्र रस ही नहीं अद््भुत रस भी विद्यमान है। पूरा आलेख ही विस्मयपूर्वक लिखा गया है, अनामिका के पद्य में बारह विस्मयादि बोधक चिन्ह थे अनामिका के गद्य में लगभग छप्पन । प्रभु जोशी ने आशंका व्यक्त की है कि,’’अनामिका के पास यदि भाषा का कोई बघनखा होता तो वे शालिनी की आलोचना का पेट फाड़ कर अंतड़ियां बाहर निकाल देतीं।’’ निश्चिन्त रहें, अनामिका  ऐसा कर नहीं सकेंगी। वे बेहद सौभाग्यशाली हैं कि गम्भीर आलोचना की निगाह अब तक उनकी एक ही कविता पर पड़ी है।

अर्चना वर्मा कहती हैं-’’ अनामिका शालिनी के विश्लेषण को जल्दबाज़ पठन्त के रूप में सन्देह का लाभ दे कर कविता की भाषा के कारगर सूत्र देती हैं यह अलग बात है कि वे शालिनी के क्रोध को उबाल देने का काम करते हैं।’’ (दिसम्बर पृष्ठ 9 ) मैंने तो अनामिका के प्रतिवाद पर एक भी शब्द नहीं लिखा , उन को किस सिद्धि की सहायता से इल्हाम हो गया, कि मुझे क्रोध आया या दुलार ? मुझे इन दोनों  करूणामयी स्त्रियों के प्रेम पर पूरा यक़ीन है। वे कहती हैं कि ” भैया और बाबू अपने से छोटे के लिए लाड़ के उभयलिंगी सम्बोधन हैं,“ (दिसम्बर पृ 10 ) तो सच ही होगा। बाबू कह कर मुझे नवजात शिशु मानते हुए अनामिका ने अपने वात्सल्य रस के घड़े मेरे ऊपर ऐसे उलीचे कि उस रस से भीग कर इस शरद ऋतु में मैं थर थर कांप रही हूँ। क्रोध के उबाल का प्रश्न कहाँ ? मेैं तो अर्चना वर्मा के स्नेह से सिक्त हूँ और अनामिका के लाड़ से सराबोर । समझ में नहीं आ रहा महान् विदुषी अर्चना वर्मा की इस बात पर अहो अहो कहूँ या धिक् धिक्। (साभार अर्चना वर्मा )

अनामिका अपनी ओर से इस काव्यशास्त्रीय और स्त्रीवादी चर्चा के बीच एक अति महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती हैं, ” अरे भैया शालिनी, कहाँ पैदा हुए है अभी वे मर्द जो स्त्री की यौनिकता जगा दें? “ मेरे पास इस घटिया प्रश्न का तो उत्तर नहीं मगर एक जिज्ञासा ज़रूर है, ” अनामिका की जिस मिथिला में अट्ठाइस वर्ष की युवा स्त्री ब्लाउज़ पहनना छोड़ चुकी होती है , क्या अनामिका की उसी मिथिला में बच्चों के साथ भी यौनिकता सम्बन्धी चर्चा की जाती है? ऐसी मिथिला कहां है?“दोनों विदुषियों से निवेदन है कि मेहरबानी करके वे अब न तो हमारी अक़्ल का और इम्तहान लें न ही हमारे सब्र का।

अर्चना वर्मा पाठकों की ‘‘सीमित पठन्त क्षमता’ ’’सीमित भाषिक क्षमता’’,’’ सांस्कृतिक पृष्ठ भूमि ’’ और ’’अनिच्छा’’ पर खेद जताते हुए कहती हैं- अनामिका की ’’लिखन्त के तर्क को समझा ही नहीं गया’’।विदुषी लेखिका फ़रमाती हैं, ’’लेकिन अगर किताब के साथ पाठक की खोपड़ी टकराने से खाली घड़ा बजने की आवाज़ आती हो तो क्या गलती सिर्फ किताब की होती है?’’ (दिसम्बर पृ 9 ) पाठक कृपया ध्यान दें ,उक्त वचन एक ऐसी महिला के हैं जिनकी आयु साठ वर्ष से अधिक है, जो तीस वर्ष तक बी0ए0 के विद्यार्थियों को पढ़ाती रही हैं ,जो चालीस पैंतालिस वर्ष से हिन्दी में लेखन कार्य कर रही हैं और जो सम्प्रति कथादेश नामक साहित्यिक पत्रिका की सम्पादन सहयोगी हैं।

यहाँ पर एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न उठ खड़ा होता हैं ,कि पाठकों की खोपड़ी खाली क्यों है? कारण कदाचित् यह है कि जिस समय बुद्धि बंट रही थी उस समय  अनामिका सब के शीर्ष पर विराजमान थीं, इसलिए लगभग सारी बुद्धि उन्हंे ही मिल गई। बची खुची बुद्धि उनकी अभिभाविका अर्चना वर्मा को प्राप्त हुई। इसमें हम पाठकों का कोई दोष नहीं कि जब तक हमारा नम्बर आया तब तक बु़िद्ध बची ही नहीं थी। अर्चना वर्मा तो अपार बुद्धिमती हैं ,जब उन्हें मालूम ही है कि खोपड़ियां खाली हैं, तो वे अपनी किताब से उन पर प्रहार करती ही क्यों हैं? सिर में बुद्धि नहीं तो क्या उसमें दर्द तो हो ही सकता है। पाठकों पर कुछ तो रहम करें।

 मैं लखनऊ शहर की रहने वाली हूँ। अर्चना वर्मा देश की राजधानी दिल्ली में रहती हैं। उनके शहर में पाठकांे के साथ पेश आने की क्या यही तहज़्ाीब है ? 

वे पाठकांे से इसलिए नाराज़ है क्यांेकि पाठक न अनामिका का पद्य समझ सके न अनामिका का गद्य। वे कहती हैं ”अनामिका के आलेख की पढ़न्त कविताओं से कहीं ज्यादा दिक़्क़त तलब साबित हुई दीखती है।’’(दिसम्बर पृ10 ) उन को सहसा वाचिक परम्परा याद हो आई जब श्रोता कवयित्रियों के सामने होता था, (जिसका ज़िक्र कात्यायनी ने तुक्कड़ी कवि सम्मेलन में गा गा कर कविता सुनाने वाली किसी कवयित्री के मंच पर और मंच के पीछे व्यवहार के  रूप में किया है)। अर्चना वर्मा कहती है ’’लेखन की सीमा यह है कि वह पाठक की क्षमताओं और सीमाओं से अपरिचित होता है। ’’उन्हें पक्का यकीन है कि अनामिका की क्षमता असीमित है और पाठकों की क्षमता अति सीमित। वे आगे कहती हैं कि अनामिका ने ऐसे पाठक की इच्छा की थी जो उनके ’’लेखन की देह भाषा की हर भंगिमा हर इशारे को समझ लेगा। यह आकांक्षा हताशा के लिए अभिशप्त है। ’’(दिसम्बर पृ 9)

हताश क्यों ? हम सब पाठक महान् विदुषियों को यकीन दिलाना चाहेंगे कि पाठक भी देहभाषा की हर भंगिमा हर इशारे को समझ लेंगे बशर्ते देहभाषा की हर भंगिमा, हर इशारा कविता का हो, न कि कवयित्री का। मंच पर चढ़ कर कवि तथा कवयित्री देहभाषा भंगिमा और इशारों से मंच सिद्ध कर सकते हैं काव्य नहीं। तीन मुहावरे, चार कहावतें, लोकगीतों के पाँच मुखडे़ ,छः परस्पर विरोधाभासी उपमान, आन्तरिक विसंगतियों से भरे सात वाक्यांश और बारह विस्मयादि बोधक चिन्ह कवयित्री को शीर्ष पर बैठा सकते है, कविता को नहीं।

 विदुषी अर्चना वर्मा जिस उŸार आधुनिकतावाद की दुन्दुभी ज़ोर ज़ोर से बजा रही हैं वह एक दर्शन है जिसकी अपनी एक विचार पद्धति है और अपनी निजी शब्दावली। जिस तरह वेदान्त में ब्रह्म और माया महत्वपूर्ण प्रत्यय (कान्सेप्ट) हैं , सांख्य में प्रकृति पुरुष ,न्याय में अणु तथा प्रमा, प्रमेय और प्रमाण ,भर्तृहरि के व्याकरण दर्शन में स्फोट और मार्क्सवाद में बोर्जु़आ और प्रॉलिटेरियट उसी तरह भाषा की निर्मितियों पर विशेष ध्यान देने वाले उŸार आधुनिकता वादी दर्शन में टेक्स्ट ,रीडिंग और कन्स्ट्रक्ट उनके निजी प्रत्यय हैं। इसे रीडर्स रिस्पॉन्स थियरी के अन्तर्गत समझा गया है, यानी एक ही पठन सामग्री को अलग अलग दृष्टियों से पढ़ा जा सकता है आदि।

 संस्कृत भाषा तथा दर्शन शास्त्र की अपनी पृष्ठभूमि के कारण शास्त्रों की मर्यादा ,भाषाओं की गरिमा और अनुवाद के जिस अनुशासन से मेरा परिचय है उसके अनुसार एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि मूल भाषा तथा संस्कृति में उस प्रत्यय की क्या गरिमा , मर्यादा, स्थान और महत्व है। जैसे कूड़े के ढेर पर घूमते जिस पशु को हम सुअर कहते हैं ,सांस्कृतिक धार्मिक संदर्भों के अनुसार अन्यत्र उसे ही वराह कहते हैं। कई बार हम अपनी भाषा का कोई प्रचलित शब्द अपना लेते हैं जैसे अंग्रेजी के रेल को रेलगाड़ी कहना या केवल गाड़ी कह देना जैसे गाड़ी चल पड़ी ,गाड़ी छूट गई आदि।

 टेक्स्ट, रीडिंग और कन्स्ट्रक्ट के महत्वपूर्ण उŸार आधुनिकतावादी प्रत्ययों का अनुवाद लिखन्त ,पढ़न्त और गढ़न्त बेहद कुरुचिपूर्ण और कर्णकटु है। ये शब्द हिन्दी भाषा के पूर्व प्रचलित शब्द भी नहीं हैं। कृत्रिम रूप से गढ़े गए ये शब्द दर्शनशास्त्र के महत्वपूर्ण प्रत्ययों को ट्रिवियलाइज़ करते हुए उन्हें मखौल की भाषा में बदल देते हैं, जैसे तोतारटन्त, मनगढ़न्त आदि। ये न दर्शनशास्त्र की गरिमा के अनुकूल हैं न हिन्दी भाषा की । मैं इन कृत्रिम, कुरुचिपूर्ण और कर्णकटु शब्दों को सिरे से खारिज करती हूं। इन निरर्थक शब्दों को बार बार प्रयोग करके करेंसी में लाने के प्रयास गर्हणीय है।

 एक ही आलेख में सŸार से भी अधिक बार पढ़न्त पढ़न्त लिखने वाली अर्चना वर्मा को उसी आलेख में एकाधिक बार पढ़न्त क्षमता पद़ का प्रयोग करते हुए ज़रा भी संकोच नहीं हुआ। शिक्षा का अधिकार कानून (2009)  बनाने में अमर्त्य सेन और मार्था नुस्बॉम द्वारा प्रतिपादित केपेबिलिटी थियरी का आधार लिया गया है जो यह मान कर चलता है कि क्षमता हर एक के भीतर होती है। अब विद्यार्थियों की क्षमता को भी कम ज्यादा आंकने पर प्रतिबन्ध है और अध्यापकों द्वारा ऐसी भाषा बोला जाना एक दंडनीय अपराध है। उŸार आधुनिकता भी पाठों की विविधता की बात करती है, क्षमता पद इस दर्शन में सर्वथा अस्वीकार्य है। स्पष्ट है कि अर्चना वर्मा केवल विद्वत्ता प्रदर्शन के लिए उŸार आधुनिकता की शब्दावली दोहराती हैं। वे न तो उस दर्शन की भावना समझ सकी हैं, न ही उसे आत्मसात कर सकी हैं।

 जो पाठक अर्चना वर्मा का अगस्त वाला पाठ ठीक से समझ नहीं पाए थे उनकी सुविधा के लिए दयालु लेखिका दिसम्बर वाले पाठ में उन्हें विस्तार से भूतकाल ,वर्तमानकाल और भविष्यकाल समझाने लगीं-’’शल्योपचार अभी हुआ नहीं है ,बल्कि होने वाला है , मौत की चुहिया अभी निकली नहीं है,निकाली जानी है।वह भूतकालिक क्रिया पदों में बावजूद भविष्यार्थे अतीत है।’’(दिसम्बर पृ 15) मेरी जिज्ञासा है कि यह पाणिनि का कौन सा सूत्र है?अनामिका की कविता में स्त्री को खतरनाक व्याधि हो गई है यह सुनकर वह भूतकाल में हंस चुकी हो, व्याधि इतनी फैल चुकी है कि मृत्यु से उसे बचाने के लिए पूरे अंग काट कर निकालने पड़ेंगे यह सुनकर वर्तमान काल में वह हंस रही हो या अंग शरीर से काट कर अलग कर देने के बाद जब सर्जरी की प्लेट  में सजा कर स्त्री के सामने पेश किए जाएंगे तब ’कहो कैसी रही’ कह कर वह भविष्यकाल में हंसेगी ,तीनों ही स्थितियों में कवयित्री द्वारा किया गया वर्णन अमानवीय,क्रूर ,नृशंस, बर्बर और हृदयहीन है। शरीर का विमानवीकरण करते हुए स्त्री स्वयं को पोर्नोग्राफर की नज़र से देख रही  है। काल चाहे भूत हो ,चाहे वर्तमान, चाहे भविष्य उससे अनामिका की कविता की अश्लीलता में कोई फर्क नहीं पड़ता।

वैसे अनामिका द्वारा ग्रेस निकोलस की कविता की नग्नतावादी पंक्तियांे को उद्धृत करने का क्या प्रयोजन रहा होगा? क्या अपनी कविता को उससे कम अश्लील साबित करना? ग्रेस निकोलस की कविता रंगभेद के विरुद्ध लिखी गई विद्रोह की कविता है, उसमें न आत्ममुग्ध नायिका है ,न ही व्याधि का हृदयहीन निरूपण। यह उद्धरण अप्रासंगिक है। व्याधि का रूपक लेकर लिखी गई कविताओं पर हो रही चर्चा के बीच यौनिकता जगाने, पुपुही बजाने, और पहाड़ों की ऊंचाई और विशालता का विवरण देने का प्रयास कवयित्री की मानसिकता प्रदर्शित करता है। पाठकों ने देख ही लिया होगा कि अनामिका का गद्य अनामिका के पद्य से भी ज़्यादा अश्लील है।

   मेरे आलेख को इन्टरनेट पर पहुंचाने का श्रेय आशुतोष कुमार को जाता है। स्त्रीविमर्श ब्लाग की सम्पादिका डा0 कविता वाचक्नवी ने 15 जून 2012 को लिखा ’’आशुतोष कुमार जी द्वारा यह लिखने पर कि ’’ कथादेश के जून अंक में शालिनी माथुर ने ग़ज़ब का लेख लिखा है , कविता की व्याधि पर। निवेदन हैं कि इसे दूसरे दस काम छोड़ कर पढ़ा जाए। पवन करण और अनामिका अपनी स़्त्रीवादी चेतना के लिए चर्चित रहे हेैं लेकिन माथुर तर्क करती हैं कि उनकी कविताएं न सिर्फ स्त्री विरोधी है बल्कि सबसे आपराधिक अर्थों में पोर्नोग्राफिक है। किसी भी रूप में उनकी बहस नैतिकतावादी या अंध-अस्मितावादी नहीं है ,न कविता के प्रति बेवजह कठोर। इस लेख पर चर्चाओं का तूफ़ान उठना चाहिए।’’इस लेख को पढ़ने की उत्कंठा थी।वैचारिक लेखन,स्त्रीविमर्श और कविता तथा आलोचना में रुचि रखने वालों के लिए उक्त आलेख को कल यूनीकोडित किया है।’’( डा0 कविता वाचक्नवी ,लंदन )

 जून 2012 के प्रथम सप्ताह में फेसबुक पर इसे गजब का लेख बताने वाले आशुतोष कुमार ने अगस्त 2012 के प्रथम सप्ताह में कथादेश में अर्चना वर्मा, अनामिका और मदन कश्यप के एक साथ मिलकर आए आक्रमण मंे शामिल होकर एक ऐसा लेख लिखा, जिसमें इस ग़ज़ब के लेख की हर एक निष्पŸिा से असहमति जताई गई थी। ’’(अगस्त पृ 82) बात यहीं तक सीमित नहीं है। तब से लेकर अब तक वे फेसबुक पर मेरे आलेख के विरुद्ध एक लम्बा अभियान चला रहे हैं जिसमें नवम्बर के कथादेश में छपे कात्यायनी के आलेख का विरोध भी शामिल है। (मैं फेसबुक की सदस्य नहीं हूं।)

      व्याधि पर कविता में मैंने कहा था कि मन बुद्धि आत्मा से रहित स्त्री शरीर का विमानवीकृृत निरुपण पोर्नोग्राफी कहलाता है। लेख में मैंने यौनीकृत ,उपभोक्ता वस्तु के रूप में निरूपित,विवश, अपमानित, पुरुष के अधीन, हृदयहीन जैसे अनेक शब्दों का प्रयोग कम से कम एक सौ तीन बार किया था। आशुतोष कुमार ने कथादेश में लिखा है, ’’विवशता के उल्लेख मात्र से कविताएं पोर्नोग्राफिक कैसे हो गईं ? अगर कविता का पाठ इस तरह किया जाएगा तो  ’कस विधि रची नारि जग माहीं ,पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं’ और ’मैं नीर भरी दुख की बदली जैसी पंक्तियां भी पोर्नोग्राफिक कहलाएंगी।’’(अगस्त पृृ 83) क्या कोई भी पाठक इस बात से सहमत हो सकता है?उक्त पंक्तियां लिखने वाला व्यक्ति अध्यापक है। जो अध्यापक उसी बात को एक सौ तीन बार पढ़ने के बाद भी इतना ही समझ सका ,उसकी बुद्धि पर तरस खाने से ज़्यादा तरस उन विद्यार्थियों के भाग्य पर खाया जाना चाहिए जो ऐसे अध्यापक से पढ़ने के लिए अभिशप्त हैं।

     यह एक बेहद घटिया खेल है, आशुतोष कुमार जिसमें शामिल हो कर पवन करण और अनामिका को गोस्वामी तुलसीदास और महादेवी वर्मा, के समकक्ष बता रहे हैं और मदन कश्यप इन्हें पाब्लो नेरुदा, निराला और मुक्तिबोध के समकक्ष । पाठक को कविता समझने में अक्षम साबित करने का प्रयास करते हुए ’कविता समझने की मुश्किल ’ शीर्षक से कथादेश में बहुत प्रतिष्ठा पूर्वक बॉक्स में छापी गई धूर्त टिप्पणी में मदन कश्यप  ने विनम्रता का झूठा प्रदर्शन करते हुए अपनी सहयोगी विदुषियों के समान ही मुझसे व्यक्तिगत निवेदन किया है। मेरा उत्तर है कि पवन करण और अनामिका की आलोच्य रचनाएं यदि छद््म पूर्वक महीयसी महादेवी वर्मा, और महाप्राण निराला के नाम से भी प्रकाशित कर दी जातीं तब भी मैं इन्हें पोर्न ही कहती क्यों कि ये पोर्न ही हैं। मेरी धारणा है कि समीक्षा रचना की होती है ,रचनाकार की नहींे। मुझे बडे़ बडे़ नामों की नेम ड्रापिंग से बिल्कुल डर नहीं लगता। उम्मीद है कि मदन कश्यप  को अपने सवाल का  जवाब मिल गया होगा।

मेरे लेख में जो प्रश्न दो रचनाओं पर थे उन पर विद्वत््चतुष्टय ने दुर्भावना पूर्ण व्यक्तिगत उत्तर लिखे ,यह दुर्भाग्य पूर्ण है।  विचारणीय है कि आशुतोष कुमार के लिए जून में फेसबुक पर जो गजब का लेख अन्ध अस्मितावादी नहीं था, अगस्त में वही लेख अन्ध अस्मितावादी ( कथादेश पृष्ठ 86 ) हो गया? कैसे? कोई ख़ास बात है क्या?

 ख़ास तो दिसम्बर 2012 में कथादेश में छपा मैत्रेयी पुष्पा का पत्र भी है। वे एक वरिष्ठ लेखिका हैं जो हमेशा किसी न किसी कारण से चर्चा में बनी रहती है। उन्होंने स्वयं मुझको तीन बार फोन करके इस आलेख की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम्हारा यह लेख नहीं, शिलालेख है, जिससे उन्होंने बहुत कुछ सीखा । फिर उन्होंने स्वयं अपनी पुस्तक तब्दील निगाहें मेरे पास भेजी, कि मैं उसकी समीक्षा कर दूँ और यदि समीक्षा न भी करूँ तो अपनी राय जरूर बताऊँ क्योंकि वे मेरी स्त्रीवादी दृष्टि की कायल है। दिसम्बर में उन्होंने उसी लेख के विरुद्ध सम्पादक ने नाम पत्र लिखना ज़रूरी समझा जो लेख कल तक शिलालेख था। शिलालेख के ऊपर उत्कीर्ण इबारत इतनी जल्दी मिट गई ? कैसे?

 

अपनी पुस्तक चाक पर सात साल से चल रही चर्चा से तो मैत्रेयी पुष्पा को ऊब नहीं हुई , पर मेरे एक गम्भीर लेख पर हो रही चर्चा से वे सात महीने में ही ऊब गईं,उन्होने लिखा,’’ देखते पढ़ते और समझते महीनों बीत गए - बहरहाल अब इस पोर्नोग्राफी की चर्चा चकल्लस पर विराम लगा देना चाहिए। ( दिसम्बर पृ 5) मैत्रेयी पुष्पा की भेजी हुई पुस्तक मेरे पास है और एस एम एस भी। उनकी तब्दील निगाहें की समीक्षा तो मैंने नहीें लिखी मगर खुद मैत्रेयी पुष्पा की निगाहें क्यों तब्दील हुईं, यह वे ही बेहतर जानती होंगी।

अर्चना वर्मा ने और कुछ ठीक लिखा हो या नहीं यह तो ठीक लिखा है कि ” शालिनी माथुर स्वयं को हिन्दी साहित्य जगत् की अन्तेवासी नहीं मानतीं, और वैचारिक दल बन्दियों , सुविधाजनक गुटबाजियों, व्यक्तिगत ईर्ष्याओं, अवसरवादिताओं की भीतरी राजनीतियों से भी अपरिचित हैं।’’ “(अगस्त पृ 8) ख़ुदा का शुक्र है, मैं हिन्दी के इस अन्तःपुर में नहीं रहती, इसके भीतर बहुत अंधेरा है।

 

विद्वत््त्रयी के आलेखों के पक्ष में  संजीव चन्दन ने अविनाश के ब्लॉग पर लिखा ’’ मुजफ़्फरपुर में साहित्यकारों ने अनामिका और पवन करण की कविताओं पर एक विचार गोष्ठी आयोजित की। इसमें शिरकत के लिए मैंने भी अनामिका और पवन करण की कविता, उसके पाठ तथा स्त्रीवादी आलोचना के सन्दर्भ पर विचार किया। पवन करण की कविता पोर्न तोे कतई नहीं है, इसे बड़ी तफसील से अर्चना वर्मा ने स्पष्ट किया है। .....शालिनी संस्कृत साहित्य की प्रकांड विदुषी बताई जाती हैं। पता नहीं क्यों वे कविताओं को कविता की तरह नहीं पढ़ रही हैं। मुज़फ़्फरपुर में लोग कथादेश के पन्नों की फ़ोटो कॉपी के माध्यम से इन लेखों का प्रसार कर रहे हैं।’’ संजीव चन्दन पाठकों से अपील करते हैं कि,‘‘ शालिनी जी के आलेख को  अकेले न पढ़कर अर्चना वर्मा ,आशुतोष कुमार और अनामिका जी के लेखों के साथ पढ़ा जाए।’’ (मोहल्ला लाइव 24 अगस्त 2012) पाठकों ने देख लिया होगा कि विचार का यह मगध दिल्ली में ही सीमित नहीं है इसकी जड़ें मुजफ्फरपुर तक फैली है। इसने मेरे आलेख को एक नए विचार के रूप में नहीं, मगध पर हुए हमले की तरह देखा और किलेबंदी का प्रयास किया जो सफल न हो सका।

 

अनामिका बड़े गर्व से स्वयं को वाइ फैक्टर से रहित बताती हैं। संजीव चन्दन कहते हैं कि अनामिका की पूरी विचार प्रक्रिया ऐसी स्त्रीवादी विचार प्रक्रिया है जो स्त्री को प्रकृति से ही श्रेष्ठ मानती है। मैं भी एक मां की ही बेटी हूं और एक बेटी की मां भी। एक्स या वाइ क्रोमोज़ोम प्रकृकृति प्रदत्त होते हैं उन पर क्या इतराना ? केवल अपने क्रोमोज़ोम के आधार पर साहित्य में जगह बनाने की कोशिश करने वाली कुछ महिलाओं के कारण स्त्री का दर्जा साहित्य में भी गिरा है और समाज में भी।

 

मैं तो यह बात मान गई कि मैं बाबू अर्थात्् शिशु हूँ ,मेरी जिज्ञासा है कि अनामिका जिन्होंने अर्चना वर्मा के आग्रह की रक्षा करते हुए व्यस्तता के बावजूद लिखना स्वीकार किया ’’ ( दिसम्बर पृ0 8 ) स्वयं पद्मिनी नायिका हैं या वे भी शिशु ही है। कविताएं तो वे केवल वयस्कों के लिए लिखती है ,मगर वयस्क पाठकों के प्रश्नों से कीलित होते ही वे शिशु बन र्गइं ,और अर्चना वर्मा उनकी अभिभाविका बन कर उठ खड़ी हुईं। चाइल्डवुमन पोर्नोग्राफ़र का सब से हसीन ख़्वाब होती है ,जिसका शरीर वयस्क हो और चेहरा शिशुवत््, पलकें झपकाती ,इठलाती ,तुतलाती। स्वयं को वामपंथी कहनेे वालों को पता होना चाहिए कि कम्युनिस्ट रूस ने अपने देश में बार्बी डॉल्स पर इसीलिए प्रतिबन्ध लगा दिया है कि उसका चेहरा शिशु तुल्य है और शरीर वयस्क जिसे बच्चों के दिमाग़ के स्वाभाविक विकास के लिए हानिकारक माना गया।

              

    अर्चना वर्मा अपने आमन्त्रणों ,आग्रहों ,गोवा और कर्नाटक वालों से हुई फोन वार्ताओं और मुजफ़्फ़रपुर में हुई कार्यशाला, वहां  बांटी गई फ़ोटोकॉपियों और जारी की गई अपील के बावजूद पोर्न कविताओं के समर्थन में जितने समर्थक जुटा सकीं उनकी संख्या दस से भी कम है , इनमें इन्टरनेट पर आई टिप्पणियां भी शामिल हैं। मामला कथादेश तक सीमित नहीं , जिसे वे ’’कुल मिला कर तीन बनाम ग्यारह’’(दिसम्बर पृष्ठ 7) बता रही हैं। पोर्न के इस प्रायोजित अनुष्ठान में आमंत्रित सदस्यों के अतिरिक्त कोई भी शरीक नहीं। मामला तीन बनाम ग्यारह नहीं,दस बनाम हज़ारों लाखों है।

 

अर्चना वर्मा केवल उद्भ्रान्त ,उर्मिला जैन ,अनिता गोपेेश ,प्रभु जोशी ,सुनील सिंह ,राहुल ब्रजमोहन ,उदयभानु पांडे, विद्या लाल और कात्यायनी के लेखों और पाठकों के छपे पत्रों से ही क्षुब्ध नहीं है। उनका  कोप इंटरनेट पर हज़ारों की संख्या में आ रही पाठकीय टिप्पणियों को लेकर भी है और उन अनेक आलेखों को लेकर भी जो कथादेश में नहीं छापे जा सके ,मगर जो अन्यत्र प्रतिष्ठा से छपे। उद्भ्रान्त का  15 जून 2012 को लिखा पूरा लेख ’दुनियां इन दिनों’ में  विस्तार से छपा। लेख में भविष्यवाणी की गई थी कि ’’उनका कार्टेल क्या ख़ामोश बैठा रह जाएगा? वह बाँस की खपच्चियों की मदद से उन्हें पुनः त्रिशंकु की तरह ‘शीर्ष’ के स्वर्ग की ओर धकेलने का प्रयास तो अवश्य करेगा। ’’ अर्चना वर्मा ने उद्भ्रान्त पर आ रहे गुस्से को उदयभानु पांडे पर उतारते हुए दिसम्बर में  प्रोफेसर पांडे को ’मानसिक आलस्य’ और ’बौद्धिक जड़ता’ का ताना दे कर डपट दिया।

 

दीप्ति गुप्ता का आलेख भी रचना समय सहित अनेक ब्लॉग्स में छप कर बहुत चर्चित हुआ। उत्तेजना के ज्वार में अर्चना वर्मा ने दीप्ति गुप्ता के नाम से पृष्ठ 13 पर जो आवेशमय टिप्पणी उद्धृत की है वह  दीप्ति गुप्ता ने नहीं लिखी थी। डा0दीप्ति गुप्ता हिन्दी और अंग्रेजी की वरिष्ठ लेखिका हैं और डा0 अर्चना वर्मा की ही तरह विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका भी। अर्चना वर्मा ने अपने क्रोध की गागर मेरे साथ उन पर भी उलीच दी ,’’ये कविताएं दीप्ति गुप्ता और शालिनी जैसों के लिए नहीं है। उनकी सीमाएं समझी जा सकती हैं। ’’ ( दिसम्बर पृष्ठ 12 ) कथादेश की सम्पादन सहयोगी ने यदि जानबूझ कर उनकी टिप्पणी गलत उद्धृत की है तो उन्हें अपनी दुर्भावना पर ग्लानि होनी चाहिए ,यदि भूल वश ऐसा हुआ है तो उन्हें क्षमा मांगनी चाहिए।

 

दिसम्बर में लिखे आलेख में अर्चना वर्मा ने सारे टिप्पणीकारों पत्रलेखकों और पाठकों को नाम ले लेकर कोसा है। कोसने के इस क्रम में उन्होंने मुझ नाचीज़ का नाम चालीस से भी अधिक बार लिया है। वैसे चालीसा के बारे में कहा गया  है कि यदि कोई भक्त इतनी बार प्रेमपूर्वक प्रभु का नाम लेता है तो प्रभु स्वयं धरती पर उतर कर उसके संकट हर लेते हैं।

 

इस पूरे प्रकरण में अर्चना वर्मा की भूमिका क्या है? न चर्चित लेख उनका था न आलोच्य कविताएं उनकी।वे स्पष्ट कहती हैं कि उनकी शालिनी की ’’पढ़न्त से घनघोर असहमति’’ है (पृष्ठ 8 दिसम्बर )। अनामिका और पवन करण के पद्य के पक्ष में उन्होंने छह पृष्ठ लिखे, और अनामिका के गद्य के पक्ष में ग्यारह पृष्ठ। ज़ाहिर है,वे एक पक्षकार हैं। उन्होंने एक गम्भीर चर्चा को छद्म पूर्वक एक घटिया खेल में तब्दील करने का प्रयास किया और स्वयं एक ऐसी रेफरी की भूमिका में आ गईं ,जो सरेआम पक्षपात करते हुए अपनी टीम को पूरे अंक देता है और विपक्षी टीम को केवल फ़ाउल ।

 

अर्चना वर्मा इतनी व्याकुल इतनी उद्वेलित ,इतनी उŸोजित और क्रोधित यूँ ही नहीं है,बात बहुत ख़ास है। वह ख़ास बात यह है कि इन वरिष्ठ विश्वविद्यालयीय विदुषी के पास हिन्दी के समकालीन साहित्य के लिए एक बहुत बड़ी परियोजना थी ,जिसमें कदाचित् मेरे इस छोटे आलेख से बड़ा व्यवधान पड़ गया। अर्चना वर्मा की इस महती परियोजना का प्रस्ताव हम स्पष्ट देख सकते हैं, वे लिखती हैं- ’’ एक समाज का पोर्न किसी दूसरे समाज का रसराज श्रृंगार हो सकता है। ’’ ( कथादेश अगस्त पृ0 8 ) पोर्न को ’’नैतिक सदमा ’’ बताने वाली इस अति बुद्धिमती विदुषी  की इस निष्पŸिा का मैं कड़ा विरोध करती हूँ।

 

विश्व की किसी भी सभ्यता संस्कृति के पूरे इतिहास के किसी भी कालखंड में पोर्न का कोई साहित्यिक मूल्य नहीं रहा। अर्चना वर्मा कहती हैं कि वह एक ही रस है उसे कहीं पोर्न कहते हैं कहीं रसराज श्रृंगार । उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि पोर्न श्रृंगार का विलोम है। ग्रीक साहित्यालोचन में भी दो विपरीत ऊर्जाएं मानी गई है ईरांॅस और थानाटॉस। श्रंृगार की ऊर्जा है ईरॉस पोर्न की ऊर्जा है थानाटॉस -एक प्रेम है दूसरी मृत्यु। पोर्न दरअसल सारे रसों का विपर्यय है।

 

आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व भारत में भरत के नाट्यशास्त्र की रचना हुई थी ,जिसमें आठ रस वर्णित थे। श्लोक स्मृति के आधार पर प्रस्तुत कर रही हूं -

               श्रृंगारहास्यकरूणारौद्रवीरभयानकाः।

               वीभत्साद्भुतौ संज्ञौ चेत् अष्टौनाट्ये रसाः स्मृताः।।

उसके लगभग एक हज़ार वर्ष बाद हमारे आचार्य अभिनवगुप्त ने नाट्यशास्त्र पर टीका लिखी अभिनव भारती ,जिसमें नवां रस शामिल किया गया-शांत रस जिसका स्थाई भाव है शम , अर्थात् आठों रसों की सामरस्य पूर्ण उपस्थिति। आज, ईसा के लगभग दो हजार साल बाद, दिल्ली की विदुषी अर्चना वर्मा दशम् रस पोर्न को प्रतिष्ठित करने का प्रस्ताव लाई हैं । इसका स्थाई भाव क्या होगा, विमानवीकरण, विरूपीकरण, और अगर उर्दू से परहेज़ न हो तो ग़लाज़त?

 

खेल सामने आ चुका हैं मामला दो कविताओं की अस्मिता का नहीं, हिन्दी के समकालीन साहित्य में पोर्न की प्रतिष्ठा का है। प्रस्ताव अर्चना वर्मा का है और समर्थन  वामपंथी आलोचक आशुतोष कुमार का- ’’ शालिनी माथुर के चर्चित आलेख में कहा गया है कि वह नग्नता के खिलाफ़ नहीं है सिर्फ स्त्री शरीर के पोर्नाेग्राफ़िक निरूपण के खिलाफ है , तब भी वह उन तमाम स्त्रियों के खिलाफ़ तो है ही जो अपनी सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए पोर्न कलाकार बनती हेैं।...आखिर पोर्न कलाकार बनने का फैसला स्त्री के लिए अपमान जनक क्यों होना चाहिए।........पोर्नोगा्रफ़ी हर हाल में स्त्री के लिए अपमानजनक ही होती है यह कोई सर्व स्वीकार्य धारणा नहीं है। ’’ ( अगस्त पृ0 85 ) पोर्नस्टार की जीविका के अधिकार का प्रश्न उठाते हुए वामाचार के पक्ष में खड़े आशुतोष कुमार अपने नाम से पूर्व बेहयाई से वामपंथी लिखते हैं, इससे ज्यादा लज्जास्पद बात और क्या हो सकती है ?

 

जिस तरह हम सब को मालूम है,उसी तरह आशुतोष कुमार को ज़रूर मालूम होगा कि पोर्न एक इंडस्ट्री (व्यवसाय) है और पोर्नस्टार उसका प्रोडक्ट (उत्पाद)। पोर्न इंडस्ट्री उत्पाद को अपमानित ,विवश ,विरूपित, यौन उपभोक्ता सामग्री के रूप में पोर्न के उपभोक्ताओं को बेचती है। पोर्न इंडस्ट्री में स्त्री पण्यवस्तु है उसे बेचा खरीदा जाता है। आशुतोष कुमार ने सोच समझ कर ही अर्चना वर्मा की प्रस्तावित पोर्न प्रतिष्ठा का समर्थन किया होगा । यह वामपंथ है ,यह जनवाद और जनसंस्कृति है ,यह प्रगतिशीलता है ,तो अवनति शीलता कैसी होती होगी? यह समय बहुत अंधेरा है।

 

मानिनी विदुषी अर्चना वर्मा ने पवन करण की शहद के छत्तों और दशहरी आमों वाली कविता में संस्कृत के व्याकरण दर्शन के आचार्य भर्त्ृृहरि के शब्दब्रह्म स्फोट का संधान किया है ( अगस्त पृष्ठ 9 ) और अभिमानिनी विदुषी अनामिका ने अपनी उन्नत पहाडों की गहरी गुफाओं वाली कविता को ’’कालिदास की पंक्तियों से अन्तर्पाठीय संवाद करती’’( अगस्त पृष्ठ 14 )  ब्रह्मगांठ बताया है जिसे खोल पाना मेरे जैसे सामान्य पाठक के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।

 

  अर्चना वर्मा ,संजीव चंदन और मदन कश्यप ने कहा है कि मैं कविता समझने योग्य  नहीें और अनामिका मुझसे सस्नेह निवेदन कर चुकी हैं कि,’’नए पाठक को कविता के योग्य बनना पड़ता है!’ ’समझने की योग्यता विकसित करनी पड़ती है! यत्न करके देखिये!’’ ( अगस्त पृष्ठ 14 )

 

योग्यता वाली बात पर बचपन में पढ़ी हुई एक कहानी याद आ गई ,जिसमें सम्राट के कपड़े उसी को दिखाई देते थे जो इस योग्य होता था। नए वर्ष में आइए वह पुरानी कहानी सुनंे।

 

बहुत दिन पहले एक राजा था। उस मूर्ख और घमंडी राजा को कपड़ों के साथ नए नए प्रयोग करने का बहुत शौक था ,और वह हमेशा चापलूसों से घिरा रहता था। एक बार उस दम्भी सम्राट के दरबार में दो धूर्त ठग आए और बोले कि वे उसके लिए एक ऐसे कपड़े की पोशाक तैयार करके देंगे जो उसको दिखाई नहीं देगी जो नादान होगा या जो अपने पद के योग्य नहीं होगा।

 

वे धूर्त ठग हथकरघे पर बिना धागे के ताना बाना बुनने लगे ,वे हवा में सुई में धागा पिरोने का अभिनय करने लगे ,फिर वे ऐसी सुई से उस कपड़े पर बारीक बेलबूटे काढ़ने का अभिनय करने लगे जो बुना ही नहीं गया था। वे सोने चांदी और रेशम के तार मंगवाते और पुरस्कार स्वरूप अपने थैलों में भर लेते। ऐसा बहुत दिनों तक चलता रहा। राजा ने दरबारियों को भेजा। कपड़ा उन्हें दिखाई तो नहीं दिया ,पर स्वयं को योग्य सिद्ध करने के लिए उन्होंने सम्राट से कपड़ों की प्रशंसा की ,उसकी नर्मी ,बुनावट और उस पर कढे़ बारीक बेलबूटों की भी। सम्राट स्वयं जा पहुंचा , कपड़ा उसे भी दिखाई नहीं दिया पर वह नादान नहीं योग्य था।

 

धूर्त ठगों ने हवा में कैंची चलाते हुए कपड़ा काटा और हवा में सुई धागा चला कर पोशाक सीकर सम्राट को पहनाने का अभिनय किया। आत्ममुग्ध सम्राट अदृश्य पोशाक पहनकर चाटुकार दरबारियों के जुलूस का नेतृत्व करता हुआ शहर के बीच चल पड़ा। भीड़ उमड़ पड़ी। भीड़ ने देखा पर चुप रही। इसी बीच भीड़ में खड़ा एक बच्चा ( मिथिला का बाबू) चिल्लाया -’’ राजा ने तो कुछ भी नहीं पहन रखा।’’ ’’नादान बच्चे की आवाज सुनो’’ , एक बुजुर्ग बोला, और फिर यह आवाज फुसफुसाहटों में बदलकर एक कान से दूसरे कान तक होती हुई एक शोर में बदल गई- ’’देखो राजा के तन पर तो वस्त्र ही नहीं।’’

 

हांस क्रिस्चन एंडरसन की यह कहानी भले ही फेयरी टेल के रूप में संकलित हो , यह कहानी बच्चों की नहीं है। दरबार की हिप्पोक्रेसी और बौद्धिकता के झूठे दम्भ के खिलाफ लिखी कहानी यहीं समाप्त नहीें होती। कहानी  आगे चलती हैं- आवाज को सुनकर राजा समझ गया कि सब लोग जान चुके हैं कि वह निर्वस्त्र है, मगर उसने निर्णय किया कि वह उसी प्रकार दरबारियों के जलूस का नेतृत्व करता रहेगा। प्रजा शोर मचाती रही ,दरबारी निर्वस्त्र सम्राट के नेतृत्व में चलते रहे और यह दिखावा  करने के लिए और भी अधिक श्रम करने लगे कि वे एक बेहद शानदार ,बेशकीमती , बेहतरीन पोशाक के दूर तक फैले दामन की झालर को सावधानी से संवार और संभाल कर चल रहे है।

 

निर्वसनों के वसनों की प्रशंसा में अनेक बौद्धिक लेख लिखे जा चुके हैं। प्रगतिशील तथा अवनतिशील कवि तथा विद्वत््जन निर्लज्जता से निर्वसन के नेतृत्व वाले जलूस में चल रहे है। उन सब ने नादान बच्चे की आवाज सुन ली है और उन सब की भी जिन्हें वे आम पाठक और सामान्य पाठक कह कर अपमानित और तिरस्कृत करते रहे हैं। छद्म खुल चुका है, फिर भी मृतात्माओं का जुलूस चल रहा है। ख्ूाबी यह है कि इस जुलूस में इस बार स्त्रियां भी शामिल है।

 

अर्चना वर्मा ने अपनी आठों सिद्धियों के द्वारा प्राप्त अलौकिक ज्ञान के आधार पर मेरे संस्कारों को कोसा है और मेरे जेहादी नारीवादी एक्टिविज़्म को भी। मुझे अपने बहुत पढ़े लिखे सुसंस्कृत माता पिता से मिले संस्कारों पर नाज़ है जिनके कारण मेैं सामाजिक एक्टिविस्ट बनी।

 

ईसा के दो हज़ार बारहवें वर्ष का अंतिम माह इस विडम्बना के लिए याद रखा जाएगा कि जिस समय देश की राजधानी दिल्ली में हजारों आम लोग रेप के विरुद्ध जुलूस में चल रहे थे उसी समय हिन्दी साहित्य की विद्वत्त्रयी दिल्ली में पोर्न के पक्ष में जुलूस निकाल रही थी। यह समय अंधेरा है। मेरा यह प्रतिरोध एक नारीवादी एक्टिविस्ट का पोर्न के विरूद्ध प्रतिरोध है, जो इसी तरह जारी रहेगा क्यों कि मेरा यकीन है कि “पोर्न इज़ द थियरी एंड रेप इज़ द प्रैक्टिस ।” इस अंधेरे समय में मैं अपनी रोशनी के साथ खड़ी हूं, कि अब मैं अकेली नहीं , मेरे साथ हिन्दी का लगभग सारा संसार है।

 

मैं इस तरह से खेल समाप्ति की घोषणा नहीं होनेे दूंगी कि मेरे लिए यह कोई खेल नहीं एक गम्भीर चर्चा है। यह चर्चा अभी समाप्त  नहीं हुई है।

                                                           

शालिनी माथुर,ए 5/6 कारपोरेशन फ़्लैट््स, निराला नगर, लखनऊ फोन 9839014660

 

8 जनवरी 2013

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                                                                                                                                                चांद परियाँ और तितली


                                                                                                                                                    -प्रभुदयाल श्रीवास्तव

    करनी का फल‌

''आज अच्छा मौका है बदला भी ले लूंगा और किसी को शंका भी नहीं होगी|'मॊहन मन ही मन यह‌ सोचकर प्रसन्न हो रहा था|कई दिनों से श्यामू उसे हर बात में नीचा दिखाने का प्रयास कर रहा  था| परंतु वह क्या करे, एक तो शारीरिक रूप से कमजोर और दूसरे आर्थिक दृष्टि से श्यामू से उन्नीस ही बैठता था, इस कारण खुलकर उसका विरोध भी नही कर पाता था|आज ऐसा कुछ करने का प्रोग्राम था कि भैंस  भी मर जाये और लाठी भी न टूटे|श्यामू को पता भी न चलेगा कि बदला ले लिया गया है| गुलाबी हरा और नीला रंग वह बाज़ार से ले आया और चुपके से उसने इतना एसिड उसमें मिला दिया कि सिर पर पड़ते ही फफोले हो जायें|भीड़ में मालूम ही नहीं पड़ेगा कि किसने रंग डाला और वह पकड़ने से साफ बच जायेगा|होली की हुड़दंग चालू हो चुकी थी |छोटे बड़े सभी मैदान में थे| श्यामू भी आ चुका था और रंग खेलने में मस्त हो गया था |मोहन‌ रंग भरी बाल्टी लेकर बाहर जाने ही वाला था कि पिताजी ने आवाज़ दे दी"मॊहन जरा दो मिनिट सुनना बेटा|"ऊंह इनको भी अभी आवाज़ देना थी,वह बाल्टी वहीं पर पटककर‌ पिताजी के पास चल दिया| इतने  में मुहल्ले की महिलाओं की भीड़ हो हल्ला करती हुई उस कमरे में घुस आई और उसकी भाभी को घेर लिया| भाभी ने आव न देखा ताव और पास में रखी वह रंग भरी बाल्टी अपनी सहेलियों पर उड़ेलना चाही|किंतु सहेलियों कि संख्या ज्यादा थी उन्होंने वह बाल्टी छीनकर भाभी के ऊपर ही उड़ेल दी|रंग पड़ते ही भाभी एक दम चीख पड़ी|सब लोग हतप्रभ रह गये|क्या हुआ सब के मुँह से एक साथ निकला| मोहन की भाभी जमीन में लोट गईं और‌चिल्लाने लगीं' बचाओ बचाओ मेरा सिर जल रहा है| 'मोहन और उसके पिताजी भी आ गये |क्या हुआ दोनों चिल्लाये|किंतु मोहन ने जैसे ही रंग वाली बाल्टी खाली देखी वह सारा माजरा समझ गया|"बाबूजी  भाभी के सिर में एसिड गिर गया इन्हें अस्पताल ले चलो ,फौरन ले चलो"वह पागलों सा चीखा| आनन फानन गाड़ी में डालकर वे उन्हें अस्पताल ले गये|"पर तुम्हें कैसे मालूम कि रंग में एसिड है?"बाबूजी  ने रास्ते में आग्नेय प्रश्न मोहन की ओर दागा| मोहन फफक कर रो पड़ा और अपनी करतूत बखान कर  दी| "नालायक यह संस्कार दिये हैं मैंने और तुम्हारी माँ ने"वहा गुस्से के मारे कांपने लगे|भाभी के ऊपर न पड़ता तो श्यामू के ऊपर रंग पड़ता और उसका सिर जल जाता| वह भी तो तुम्हारा दोस्त ही है न|छोटी छोटी बातों को मन में लेकर बैठ जाना और‌ बदला लेना क्या ठीक बात है?बाबूजी का क्रोध शांत ही नहीं हो रहा था|मोहन उनके पैरों पर गिर पड़ा' क्षमा कर दें बाबूजी अब कभी ऐसी गल्ती नहीं होगी|" क्षमा अपनी भाभी से मांगो, श्यामू से मांगो तुमने दूसरे के लिये गड्ढा खोदा उसमें तुम्हारा ही परिवार गिरा, कहा गया है कि जो दूसरों के लिये गड्ढा खॊदता है वह स्वयं ही उसमें गिरता है|"बाबूजी ने समझाइश भरे स्वर में कहा| मोहन ने श्यामू से हाथ जोड़क‌र क्षमा मांगी और आगे से ऐसा न करने की कसम खाई|












        होली आई है


           हंसती गाती धूम मचाती,
           फिर से  होली आई है|
          रंग बिरंगे नाच दिखाती,
          फिर से होली आई है|

         तरह तरह के स्वांग रचे हैं ,
         कोई गधे कोई घोड़े पर|
         एक दूजे पर प्यार लुटाती,
         फिर से होली आई है|

        हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई,
         कैसे रंग उड़ेल रहे,
         आपस में फिर से मिलवाती,
         फिर से होली आई है|


       कहीं चकोली खुरमा गुझिया,
        कहीं पर बेसन के लड्डू,        
        सबका मुँह मीठा करवाती,
        फिर‌ से होली आई है|

         दादा पिचकारी लाये हैं,
          पापा रंग के गुब्बारे,       
         टुल्ली सब पर रंग उड़ाती,         
          फिर से होली आई है|

          बाज़ू वाली आंटी कैसे
          कूद कूद कर नाच रहीं,
           मन मंदिर में अलख जगाती,  
          फिर से होली आई है|


       मक्खन सिंह पहन कर लुंगी,
       कैसे गिद्दा नाच रहे|
         मस्ती में गाती लहराती,
         फिर से होली आई है|

        अमित रुद्र और वंशी गुल्ली,
         पिचकारी में रंग भरे|
         अवनी हँसती मुस्कराती है,
         फिर से होली आई है|

   

         भांग चढ़ाकर बम बम भोले,
          चिल्ला कर सब नाच रहे|
           मस्ती सब पर .चढ़ती जाती,
           फिर से होली आई है|

         झूमझूम कर झूम रही है,
          खेतों में पीली सरसों,
         रंग बासंती ओढ़ ओढ़ कर,
          फिर से होली आई है|