मानव ने जब पहली बार अपने बारे में सोचा होगा-कहां से आया वह? या किसी असाध्य उलझन में पड़ा होगा, तो उससे बच निकलने की बेचैनी में उसे किसी बेहद सशक्त सहारे की जरूरत महसूस हुई होगी या फिर किसी अपने को जब प्राण विहीन होते देखा होगा- तो निश्चय ही सवाल उठे होंगे –कहां गया यह, अब जाने कैसा होगा, कहीं होगा भी या नहीं ? क्या है इस जीवन की सार्थकता ? आदि आदि..तो इन दुख से उबरने , इन सवालों का जबाव ढूँढने में , उन कल्पना और परिकल्पना से जन्मे मानक, उदाहरण और उपमाओं ने ही उसे सम्भाला भी होगा और सान्वत्ना भी दी होगी जिन्हें आज हम धर्म या धर्म ग्रन्थ भी कहते हैं और मिथक व परीकथाएँ भी। यही बाद में आगे चलकर, कालान्तर के साथ उस समाज विशेष की संस्कृति और परंपराएँ बनीं। धर्म और संस्कार बने, वेद पुराण बने, गीता रामायण और बाइबल कुरान बने। जिनको भी हम समझ न पाए , जिनसे डर लगा-वे भूत प्रेत, दानव और असुर बन गए और आज तक हमारे साथ हैं -कल्पना में भी , समाज में भी।
बात परियों की हो या भगवान की, आपदाओं की या परंपराओं की, लोककथाएं , रीति-रिवाज; सभी को समेटे यह अंक मिथक और परंपराओं पर है। किसी भी संस्कृति के वाहक हैं ये ...ऐतिहासिक निरंतरता देते हैं ये उसे। मिथक और परंपराओं के नाम पर भारत के जनमानस को जिन दो ग्रन्थों ने सर्वाधिक आलोड़ित, प्रभावित और शासित किया है वो हैं रामायाण और महाभारत। दक्षिण में रामेश्वरम से लेकर हिमालय की चोटी केदारनाथ तक हमें यही गाथाएं अंकित मिलती हैं चाहे हम पण्डवों के युग में जन्मे हों या आज की इस इक्कीसवीं सदी में। जितना हम इन ग्रन्थों की भावगूढ़ता , सदर्भ और संदेशों में डूबते हैं, उतने ही नए-नए आयाम अनावृत होते चले जाते हैं । बारबार और जगह-जगह उन्ही कहानियों को सुनते पढ़ते देखते वह थोड़ी बहुत बदलती तो हैं ( जितने मुंह उतनी बातें) पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उस समूह की अंतस्चेतना में गहरे जा बैठती हैं। परिणाम यह होता है कि सच्ची-झूठी इन घटनाओं के चरित्र मिथक बन जाते हैं चाहे राम हों या रावण...द्रौपदी हो अर्जुन या कर्ण और कुन्ती। सूर्य चंद्रमा, पर्वत, समुद्र, अग्नि वायु संपर्क में आने वाली कोई चीज भी तो नहीं रह पाई इनके दायरे से बाहर। और हम अनजाने ही पलपल उन संदर्भों से सहारे, नए-नए अर्थ ढूंढने लग जाते हैं। खुद तो हम ऐसा करते ही हैं आने वाली पीढ़ी भी हमें देखकर, जाने-अनजाने वही करती है और जब बारबार दोहराई जाए तो यही हमारी संस्कृति या परम्परा कहलाती है। इन परम्पराओं को भी अक्सर वक्त की कसौटी कसती है और निरर्थक सड़ी-गली खुद ही झरती और बदलती रहती हैं। जीवन गति है और गति में नए सम्पर्क और बदलाव दोनों ही , संभव ही नहीं, अवश्यंभावी भी हैं। आज भी सार्थकता की सबसे बड़ी कसौटी वक्त ही है।
ऋषियों की गहन सोच और चिंतन से जन्मे उदारमना भारतीय दर्शन और संस्कारों का तो आज भी पूरा विश्व कायल है। पंजाब सिंधु गुजरात मराठा द्राविण उत्कल बंगा, विंध्य हिमाचल यमुना गंगा... हमारे राष्ट्रगान की बात करें, या आचरण और अनुष्ठानों की, सर्वे भवतु सुखिनः की भावना ही सर्वोपरि रही है। जब भी कोई धार्मिक अनुष्ठान या पारिवारिक रीति-रिवाज किये गए तो उन तक में पढे जाने वाले संस्कृत के श्लोकों में भी गंगा यमुना, सरस्वती, कृष्णा, कावेरी, गोदावरी, तथा सिन्धु आदि सभी नदियों को याद किया गया. उनका आवाहन और उनके प्रति कृतज्ञता जताई गई। जो हमारी सोच और संस्कृति की एकता का ही नहीं, भारत की भौगोलिक विशालता और सोच की परिपक्वता का प्रमाण हैं, सबको साथ लेकर चलने का भाव दर्शाता है।
माना जाता है कि जितने मिथक हैं, सब परिकल्पना पर आधारित हैं। फिर भी यह एक मूल्यी परिकल्पना थी जिसका उद्देश्य सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करना था। प्राचीन मिथकों की खासियत यही थी कि वे मूल्यहीन और आदर्शविहीन नहीं थे। मिथकों का जन्म समाज व्यवस्था को कायम रखने के लिए ही हुआ था। मिथक हमेशा लोक विश्वास से ही जन्मते हैं। पुरातनकाल में स्थापित किये गये धार्मिक मिथकों का मंतव्य स्वर्ग तथा नरक का लोभ, भय दिखाकर लोगों को विसंगतियों से दूर रखना था। मिथक और मिथ्या दोनों ही शब्दों की व्युत्पत्ति में वही ‘मिथ’ है , फिर भी मिथ और मिथक भिन्न है। आश्चर्य नहीं, इस शब्द का प्रयोग अक्सर साहित्य से इतर झूठ या काल्पनिक कथाओं के लिए भी किया जाता रहा है। फिर भी मिथक असत्य नहीं, किसी न किसी सत्य पर आधारित या सत्य की तलाश है या फिर सत्य से सामंजस्य ही हैं। श्राप लगा , सत्यवान मरा फिरभी सावित्री जिन्दा वापस ले आती है पति को। इनमें हमेशा अच्छाई की ही जीत होती है , बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर और अटल हो। इनकी रचना ही समाज कल्याण के लिए हुई है।
कम शब्दों में बात कहने या त्वरित पहचान के लिए परिकल्पनाएँ भी सदियों से गढ़ी गई हैं और प्रतीक भी। कहानी कहना या घटनाओं की स्मृति से पुनरावृत्ति मानव की आदिकाल से ही जरूरत भी रही है और मनोरंजन भी। कला के सभी आकार इसी प्रेरणा और जरूरत से ही जन्मे होंगे। पर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ये प्रतीक और ये मिथक...ये परिकल्पनाएं मानव ने अपने सुभीते और सुव्यवस्था के लिए ही गढ़ीं थीं, आधिपत्य या शासन के लिए नहीं। उसमें सामूहिक चेतना के उत्थान और फायदे की सोच थी, व्यक्तिगत नहीं, चाहे बात धर्म की करें या राजनीति की। हाल ही में धर्म और राजनीति का आम आदमियों की जिन्दगी में , कला और संस्कृति में अवांछनीय अधिकतम हस्तक्षेप, सामूहिक असंतोष और विनाश की वजह बनता दिख रहा है जो कि एक चिंताजनक और फिसलन भरा मोड़ है। हाल ही में भारत में घटी एक घटना पर किसी ने लिखा धा-
“ प्रतीकों के मोह पाश से बाहर निकलिए । प्रतीक सत्य नहीं होते. वो तो गढ़े जाते हैं. आज अगर किसी और का शासन होता तो देश के प्रतीक कुछ दुसरे होते. आज अगर राज तंत्र होता तो प्रतीक राजा का चित्र या कोई निशानी होता. प्रतीक तो बनाये जाते रहे हैं कभी किसी चीज के लिए तो कभी किसी चीज के लिए. अपने अपने स्वार्थो की पूर्ती के लिए. कभी धर्म ने बनाये तो राज सत्ता ने. सोचिये अगर प्रतीक अशोक का चिन्ह न होकर कुछ दूसरा होता तो क्या आपके देश प्रेम के भाव पर इसका कोई असर पड़ता ? नहीं पड़ता. सच्चे अर्थो में प्रतीक प्रतिनिधितत्व ही नहीं करते. केवल भाव सच्चे होने चाहिए. लेकिन शासन आपको कभी नहीं सिखाता की भाव कैसे होने चाहिए ? देश प्रेम सच्चे अर्थो में क्या हैं ? वह तो आपको उलझाए रखना चाहता हैं. ताकि आप प्रतीकों के नाम पर लड़ें और वो राज़ करे । प्रतीक तो जड़ - पूजा को बढ़ावा देने और भरमाने के लिए होते हैं. जैसे ईश्वर का प्रतीक गढ़ लिया गया. और आज जब जानकारी हुई तो मालूम चला की मूर्ती पूजा का इतिहास बहुत नवीन हैं. तो क्या ईश्वर भी उतना ही नया हैं.” स्वप्निल कुमार
दूसरी तरफ हमारे अग्रज रामविलास शर्मा जी लिखते हैं-
”प्राचीन पुराकथाओं का तत्त्व जो नवीन स्थितियों में नये अर्थ का वहन करे मिथक कहलाता है। मिथकों का जन्म ही इसलिए हुआ था कि वे प्रागैतिहासिक मनुष्य के उस आघात और आतंक को कम कर सकें, जो उसे प्रकृति से सहसा अलग होने पर महसूस हुआ था-और मिथक यह काम केवल एक तरह से ही कर सकते थे-स्वयं प्रकृति और देवताओं का मानवीकरण करके। इस अर्थ में मिथक एक ही समय में मनुष्य के अलगाव को प्रतिबिम्बित करते हैं, और उस अलगाव से जो पीड़ा उत्पन्न होती है, उससे मुक्ति भी दिलाते हैं। प्रकृति से अभिन्न होने का नॉस्टाल्जिया, प्राथमिक स्मृति की कौंध, शाश्वत और चिरन्तन से पुनः जुड़ने का स्वप्न ये भावनाएँ मिथक को सम्भव बनाने में सबसे सशक्त भूमिका अदा करती हैं। सच पूछें, तो मिथक और कुछ नहीं प्रागैतिहासिक मनुष्य का एक सामूहिक स्वप्न है जो व्यक्ति के स्वप्न की तरह काफी अस्पष्ट, संगतिहीन और संश्लिष्ट भी है।”
बहस लम्बी और रोचक तथ्यों से भरपूर है और किसी भी सिक्के की तरह से इसके भी दोनों पहलू हैं।जब हम भाव और श्रद्धा के साथ कोई प्रतीक बनाते हैं तो वह उस व्यक्ति या वस्तु का पर्याय बन जाता है फिर उसके प्रति वही श्रद्धा और स्नेह की अपेक्षा भी अवांछनीय नहीं...पर अंतिम निर्णय हमेशा पीछे छुपे इरादों को समझकर ही लेना चाहिए। कभी-कभी अति असहनीय स्थिति में भी व्यक्ति चीत्कार और विलाप कर उठता है यह उसके कष्ट की वजह से है-अपराध या उदंडता नहीं।
खैर छोड़ते हैं इस बहस को...खयाल अपना-अपना, पसंद अपनी-अपनी। फिलहाल तो आप अंक में संकलित रचनाओं का आनंद लें, जिन्हे हमने बड़े मनोयोग से संजोया है।
नवरात्रि और अक्तूबर मास के सभी त्योहारों की हार्दिक बधाई के साथ साथ अपनी ही एक कविता से इस अंक की बात को समेटती हूँ-
हर कीमती चीज को संभालने और सहेजने की जरूरत होती है चाहे वे परंपराएँ और संस्कार हों या रिश्ते नाते, विशेषतः अध़ड़ पानी के तूफानी या बदलते मौसम में। युग प्रवर्तक मानवीय चेतना में जितने संशय रहे हैं उतने ही समाधान... जितने संकट उतना ही साहस,
फिर भी....
साथ-साथी, रिश्ते नाते पावन था जो धूप-सा आज शब्द मात्र
सहूलियत के सिराहने तहाए हुए वक्त बदला, परम्पराएं बदलीं हम बदले
(परंपराएं तो फिर बनती ही हैं टूटने को)
फिर भी... टीसता रहता है मन के अंदर कुछ
जैसे गुफाओं में शिलाओं पर टपकती बूंदें
रिस-रिसकर निशान छोड़ें बदल दें रूप-रेखा को छोड़ जाएँ दलदली कीचड़
जय हो जग में जले जहाँ भी, नमन पुनीत अनल को, जिस नर में भी बसे, हमारा नमन तेज को, बल को। किसी वृन्त पर खिले विपिन में, पर, नमस्य है फूल, सुधी खोजते नहीं, गुणों का आदि, शक्ति का मूल।
ऊँच नीच का भेद ना माने, वही श्रेष्ठ ज्ञानी है, दया-धर्म जिसमें हो सबसे वही पूज्य प्राणी है। क्षत्रिय वही, भरी हो जिसमें निर्भयता की आग, सबसे श्रेष्ठ वही ब्राह्मण है, हो जिसमें तप त्याग।
तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतला के, पाते हैं जग से प्रशस्ति अपना करतब दिखला के। हीन मूल की ओर देख जग गलत कहे या ठीक, वीर खींच कर ही रहते हैं इतिहासों में लीक।
जिसके पिता सूर्य थे, माता कुन्ती सती कुमारी, उसकी पलना हुई धार पर बहती हुई पिटारी। सूत वंश में पला, चखा भी नहीं जननि का क्षीर, निकला कर्ण सभी युवकों में तब भी अद्भुत वीर।
तन से समरशूर, मन से भावुक, स्वभाव से दानी, जाति गोत्र का नहीं, शील का, पौरुष का अभिमानी। ज्ञान-ध्यान, शस्त्रास्त्र, शास्त्र का कर सम्यक अभ्यास, अपने गुण का किया कर्ण नें आप स्वयं सुविकास।
अलग नगर के कोलाहल से अलग पुरी-पुरजन से, कठिन साधना में उद्योगी लगा हुआ तन-मन से। निज समाधि में निरत, सदा निज कर्मठता में चूर, वन्य कुसुम-सा खिला कर्ण जग की आँखों से दूर।
नहीं फूलते कुसुम मात्र राजाओं के उपवन में, अमित बार खिलते वे पुर से दूर कुन्ज कानन में। समझे कौन रहस्य? प्रकृति का बड़ा अनोखा हाल, गुदड़ी में रखती चुन-चुन कर बड़े कीमती लाल।
2.
ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो , किसने कहा, युद्ध की वेला चली गयी, शांति से बोलो? किसने कहा, और मत वेधो ह्रदय वह्रि के शर से, भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?
कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊँ किसको कोमल गान? तड़प रहा आँखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान ।
फूलों के रंगीन लहर पर ओ उतरनेवाले ! ओ रेशमी नगर के वासी! ओ छवि के मतवाले! सकल देश में हालाहल है, दिल्ली में हाला है, दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है ।
मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार, ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट-सा संसार ।
वह संसार जहाँ तक पहुँची अब तक नहीं किरण है जहाँ क्षितिज है शून्य, अभी तक अंबर तिमिर वरण है देख जहाँ का दृश्य आज भी अन्त:स्थल हिलता है माँ को लज्ज वसन और शिशु को न क्षीर मिलता है
पूज रहा है जहाँ चकित होजन-जन देख अकाज सात(साठ) वर्ष हो गयेराह में, अटका कहाँ स्वराज? अटका कहाँ स्वराज? बोलदिल्ली! तू क्या कहती है? तू रानी बन गयी वेदनाजनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैंकिसने अपने कर में? उतरी थी जो विभा, हुईबंदिनी बता किस घर में
समर शेष है, यह प्रकाशबंदीगृह से छूटेगा और नहीं तो तुझ परपापिनी! महावज्र टूटेगा
समर शेष है, उस स्वराजको सत्य बनाना होगा जिसका है ये न्यास उसेसत्वर पहुँचाना होगा धारा के मग में अनेक जोपर्वत खडे हुए हैं गंगा का पथ रोक इन्द्रके गज जो अडे हुए हैं
कह दो उनसे झुके अगर तोजग मे यश पाएंगे अड़े रहे अगर तो ऐरावतपत्तों से बह जाऐंगे
समर शेष है, जनगंगा कोखुल कर लहराने दो शिखरों को डूबने औरमुकुटों को बह जाने दो पथरीली ऊँची जमीन है? तोउसको तोडेंगे समतल पीटे बिना समर किभूमि नहीं छोड़ेंगे
समर शेष है, चलोज्योतियों के बरसाते तीर खण्ड-खण्ड हो गिरेविषमता की काली जंजीर
समर शेष है, अभी मनुज भक्षी हुंकार रहे हैं गांधी का पी रुधिर जवाहर पर फुंकार रहे हैं समर शेष है, अहंकार इनका हरना बाकी है वृक को दंतहीन, अहि को निर्विष करना बाकी है
समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल विचरें अभय देश में गाँधी और जवाहर लाल
तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना सावधान हो खडी देश भर में गाँधी की सेना बलि देकर भी बलि! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे मंदिर औ' मस्जिद दोनों पर एक तार बाँधो रे
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध
सोच रहे हैं प्रजापति कैसे समय कटे ! नया नहीं अब दुनिया में कुछ बाकी करने को नींदों को सपने दे डाले मरने-डरने को ऐसी ही मनहूस घड़ी में नारद बोल पड़े महामहिम बतलाएँ कैसे दो में चार घटे ?
सोच रहे हैं प्रजापति कैसे समय कटे ! आसमान में पंछी, बादल चंदा और सितारे धरती, जंगल, बाढ़े, नदियाँ भीगे हुए किनारे ऐसे ही उलझे–से क्षण में नारद बोल पड़े महामहिम बतलाएँ कैसे घर की नार पटे?
सोच रहे हैं प्रजापति कैसे समय कटे ! मर्द बनाए , औरत दे दी औरत को ही दुनिया दे दी राजकुँवर को राजकुमारी औ होरी को धनिया दे दी ऐसे ही नाजुक-से पल में नारद बोल पड़े महामहिम बतलाएँ कैसे दिल का दर्द घटे ?
सोच रहे हैं प्रजापति कैसे समय कटे ! पढने को दे दिया किताबें फूल बनाकर गंध डाल दी धूप बनाई, छाँव बनाई आँखों में सौगंध डाल दी ऐसे ही चिंता के बीच नारद बोल पड़े महामहिम बतलाएँ कैसे यह सौगंध हटे ?
- सुधांशु उपाध्याय
एक बुरूंश कहीं खिलता है
खून को अपना रंग दिया है बुरूंश ने बुरूंश ने सिखाया है फेफड़ों में भरपूर हवा भर कर कैसे हंसा जाता है कैसे लड़ा जाता हैं ऊँचाई की हदों पर ठंडे मौसम के विरुद्ध एक बुरूंश कहीं खिलता है खबर पूरे जंगल में आग की तरह फैल जाती है आ गया है बुरूंश पेड़ो में अलख जगा रहा है उजास और पराक्रम के बीज बो रहा है कोटरों में बुरुंश आ गया है जंगल के भीतर एक नया मौसम आ रहा हैं
- हरीश चन्द्र पाण्डे
यह कर्ण और कविता का जन्म है
अचानक-एक कागज आगे सरकता है उसके कांपते हुए हाथो को देखता है एक अंग जलता है ,एक अंग पिघलता है उसे एक अजनबी गंध आती है और उसका हाथ बदन में उतर आई लकीरों को छूता है .. हाथ रुकता है बदन सिसकता है एक लम्बी लकीर टूटती सी लगती है फ़िर जन्म और मौत की दोहरी सी गंध में वह भीग जाती है सब काली और पतली लकीरें - एक लम्बी चीख के कुछ टुकडे दिखते हैं खामोश और हैरान वह निचुड़ी सी खड़ी देखती सोचती - शायद एक क्वारीं का गर्भपात इसी तरह होता है ... यह कर्ण और कविता का जन्म है ..
- अमृता प्रीतम
सूर्य की पेशी का गीत
आँखों में रंगीन नजारे सपने बड़े बड़े। भरी धार लगता है जैसे बालू बीच खड़े।
बहके हुए समन्दर मन के ज्वार निकाल रहे। दरकी हुई शिराओं में खारापन डाल रहे मूल्य पड़े हैं बिखरे जैसे शीशे के टुकड़े।
नजरों के ओछेपन जब इतिहास रचाते हैं पिटे हुए मोहरे पन्ना पन्ना भर जाते हैं। बैठाए जाते हैं सच्चों पर पहरे तगड़े।
अंधकार की पंचायत में सूरज की पेशी किरणें ऐसे करें गवाही जैसे परदेशी! सरेआम नीलाम रोशनी ऊंचे भाव चढ़े।
भरी धार लगता है जैसे बालू बीच खड़े !
-कन्हैया लाल नन्दन
जोधपुर डायरी
पत्थर तराशे ही जा रहे सदियों से सदियों से घर-बार बनाए ही जा रहे सदियों से उजड़ कर बसते ही रहे कई घर छेनी की चमक ही बतला रही कितने पत्थरों को ढाला उसने घर की चौखटों,खिडकियों और रौशनदानों में आटे सी महीन धूल इस छैनी के इर्द-गिर्द गिरती रहती है जोधपुर में जीवंत है रंगीन पहाड़ियां कारीगर पत्थरों में जान फूंक रहे पत्थर घरों में जान फूंक रहे घर आदमी में जान फूंक रहे एक साझी विरासत यहाँ पत्थरों से ज्यादा मजबूत ठहरी यहाँ नत्थू खां नीबू के रंग जैसी पगड़ी बाँधते हैं और झुक कर करते हैं जुहार “पधारो म्हारा देस “
-नरेन्द्र जैन
इतिहास एक पक्ष है
कहते हैं कि इतिहास साक्षी है किंतु यह सिर्फ कहने की बात है, शब्दों का प्रपंच है; सच तो यह है कि इतिहास एक पक्ष है,
चुने हुए तथ्यों का वातानुकूलित कक्ष है; तर्क और शैली का वाणी का विलास है; अधूरे सपनों का रिसती हुई कुंठा का, अतीत या अनागत सुनिश्चय का, एक उच्छवास है!
इतिहास एक दृष्टि है; व्याख्या है, समय की समय पर टिप्पणी, जो घटित हुआ उसकी घुटन नहीं उबटन है।
समय की लीला में पुनरावृत्ति की अगणित वर्तालुकार कणियाँ हैं, इतिहास उन कणियों की- पिरोयी हुई माला है;
किंतु ये कणियां घटनाओं की कब्र की तरह हैं घटनाओं की लाश वहां दफन है, कब्र जो मौत का सबूत है, और इतिहास अपनी पसंद का एक एपिटाफ !
किंतु इतिहास साक्षी नहीं है, न आज का न बीते हुए अतीत का, इतिहास देख नहीं पाता, उसे हम सब अपनी-अपनी नजर से उलट-पलटकर देखते और लिखते हैं;
इतिहास सुन नहीं पाता, उसे सुनाया जाता है; इतिहास स्वयं नहीं बोलता, बोलते हैं केवल इतिहासकार, अपने समय और संदर्भ के नेपथ्य से इतिहास की दुहाई देकर- बोलते हैं उनके पूर्वाग्रह प्रमाण बनकर!
और यह सोचना भी गलत है, कि इतिहास अपने आप को दोहराता है, इतिहास न कृति है न कर्ता है, वह बनाया जाता है पल-पल, और मिटाया जाता है अविरल, जैसे खाली स्लेट पर लिखे हुए प्रथमाक्षर!
-लक्ष्मीमल सिंघवी
मैटरीक
गांव से गांव हम चलते हैं यह रही एक गाय जो रस्सी से पेड़ से बंधी है, यह रही एक औरत जो साड़ी पहने कुएं के पास नहा रही है। खाली खेत इस सर्दियों की सुबह न गेहूँ उगता है, न मक्का, न चावल। यहां एक पीर की कब्र यहां पेड़ एक मंदिर घेरते हैं और यहां एक ही पेड़ खेत की देखभाल करता है उसे क्या क्या दिखाई देता है?
रेलगाड़ी जो तेज गति से आगे ही आगे चलती है। खेत में कौआ किसी की तलाश में है बिना चले, बिना आवाज दिए, शायद बिना सोचे। यहां एक लाल इंट का मकान है, फिर एक दूसरा, फिर तीसरा, फिर एक गांव के ऐसे मकान जहां गलियों में लड़के क्रिकेट खेलते हैं और पटरियों के नजदीक एक औरत शौच कर रही है। पटरियों का जाल बढ़ता है, यह किसी झुमरी तलैया का गांव नहीं, यह वाराणसी है! वाराणसी, कथाओं का, धर्म का, इतिहास का। हम कितनी देर तक रुकेंगे? कौन जानता है? अगर आप उतरें संभव है कि आप कलकत्ता न पहुँचेंगे! लोग निकलते हैं, बोलते हैं, बिना वजह के इधर उधर ताकते हैं। कई लोग यह रास्ता अच्छी तरह जानते हैं; वह जागकर वापस सो जाते हैं, ‘वाराणसी ? अरे, बहुत फासला।
बाकी है! ‘ वाराणसी, संतों का, साधुओं का, सन्यासिओं का... उड़ी हुई आत्माओं का... गाड़ी झटका देती है, फिर हम गंगा के पुल पर चढ़ते हैं, पवित्र गंगा नदी ( ओम गंगे नमः)। अखबार वाला डब्बे में घुस आया है... जंग नहीं छिड़ी है हम चैन की सांस लेकर अपने हाथों को देखते है, पांवो को, जिसकी बदबू मुझे याद दिलाती है कि मैं हकीकत का इंसान हूं खयाल का नहीं।
- मुसाफिर
मुट्ठी भर
बचपन में माँ मुट्ठी भर आटा रोज परात से एक कनस्तर में डालती थी सदाव्रत के लिए
नियम अटल था बस मुट्ठी भर
पर मेरी उंगलियों के बीच से रेत की तरह फिसल रहे हैं मुट्ठी भर सपने मुट्ठी भर हवा मुट्ठी भर आकाश मुट्ठी भर धूप
मुट्ठी भर देश भी
-तेजराम शर्मा
परदेशी
कैसे मान लूँ कि तुम मेरे ही देश के हो तुम तो कभी गन्ने के खेतों के बीच ओस की बूंदों में नहाई पगडंडियों पर चले ही कहां तुम्हारी कोई बूंद पसीने की कभी टपकी ही नहीं प्यासी धरती की नंगी छाती पर
तुमने कभी समन्दर की आंधियों को अपने भीतर महसूस किया ही कहां क्या तुम मुड़िया पहाड़ के बोझ को अपने सिर पर लिए कभी चले हो धूप में कैसे मान लूँ कि तुम मेरे देश के हो कभी तुमने उगाया है गुलमोहर का कोई पौधा ज्वालामुखी की छाती के बीच शामारैल की सतरंगी माटी पर तुमने देखा है कभी प्रचंड तूफान में इंद्रधनुष
क्या सिर्फ इसलिए तुम्हें अपना देशवासी मान लूँ क्योंकि स्कूल के बच्चों के बीच चौरंगा फहरा आए हो तुम बूढ़ी हो गई आजादी के जश्न पर।
-अभिमन्यु अनंत
पिंड दान
क्या तुम्ही हो वहाँ पर सुन सकते हो मुझे स्वीकारते हो अर्पण या फिर यह अन्धी आस्था मेरी बिखर जाएगी यूं ही लहरों सी धुन धुन के सर झाग फेंकती संस्कार और अनुष्ठानों के पथरीले तट।
शैल अग्रवाल
पाप
हमें लगता है मरने के बाद भी पुरखों की आत्माएँ भटकती रहती हैं
विरोध करते रहते हैं वे उनके साथ हुए वर्ताव का गाँव के ओझा को सुनाई दे जाती हैं उनकी आवाजें
उनके अदृश्य हाथ चाहे उठते रहते हों दुआओं में पर ओझा कर देता है हमारे कलुष की पुष्टि
पुरखे बन जाते हैं पाप आत्माएँ पीढ़ियों के बीच रहती है खाली जगह
हमारे समय तक आते जाते फैल जाता है उसमें आकाश जहाँ उठती रहती हैं हमारे ही पापों की अनुगूँजें।
-तेजराम शर्मा
यह पृथ्वी रहेगी
मुझे विश्वास है यह पृथ्वी रहेगी यदि और कहीं नहीं तो मेरी हड्डियों में यह रहेगी जैसे पेड़ के तने में रहते हैं दीमक जैसे दाने में रह लेता है घुन यह रहेगी प्रलय के बाद भी मेरे अंदर यदि और कहीं नहीं तो मेरी जबान और मेरी नश्वरता में यह रहेगी और एक सुबह मैं उठूँगा मैं उठूँगा पृथ्वी –समेत जल और कच्छप –समेत मैं उठूँगा मैं उठूँगा और चल दूंगा उससे मिलने जिससे वादा है कि मिलूँगा |
प्रतापराव कदम हिंदी के सुपरिचित कवियों में हैं। अब तक उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। एक तीली बची रहेगी, कहा उसने और हँसा, बीज की चुप्पी और अब 'उसकी आंखों में कुछ'। 19 सितंबर, 1961 में जन्मे प्रतापराव कदम पेशे से वाणिज्य के अध्येता हैं किन्तु उनके भीतर कविता का अनुनाद गहरे रचा- बसा है। कई पुरस्कार उनके खाते में हैं । खुद वे शमशेर सम्मान के प्रवर्तक और नियामक हैं। हिंदी कविता में प्रगतिशील स्वर के चितेरे प्रतापराव कविता में अभिधा के प्रस्तावक हैं । उनकी कविताओं में यह बात दिखती है। शिल्प और भाषा की कलात्मकता पर भले ही उनके यहॉं कम बल दिखता हो, उनके सरोकार जीवन और संसार से गहरे जुड़े हैं। अन्याय, अंधविश्वास, गतानुगतिकता के वे विरोधी हैं। इस तरह कविता में अब उनका स्वर अचीन्हा और अजाना नही रहा। नंद किशोर आचार्य, अरुण कमल, वर्तिका नंदा, भगवत रावत , विनोद कुमार शुक्ल और ओम भारती के बाद प्रस्तुत है लेखनी के इस अंक में सुपरिचित हिंदी कवि श्री प्रतापराव कदम के नए कविता संग्रह ''उसकी आंखों में कुछ''पर डॉ.ओम निश्चल का आलेख।
कविता कटाक्ष: वक्रताऍं और व्यंजनाऍं
उसकी आँखों में कुछ
प्रतापराव कदम
राधाकृष्ण प्रकाशन,7/31,अंसारी रोड,
दरियागंज, नई दिल्ली
मूल्य: 200रुपये
कविता एक ऐसी विधा है जो पकड़ में आ जाए तो जिस वस्तु पर भी दृष्टि पड़ जाए, वही कविता की अंतर्वस्तु में बदल जाए। न आए तो सारी की सारी कोशिशें काव्याभ्यास की कवायद-भर लगती हैं। कविता के प्रति समाज की उत्तरोत्तर विमुखता इस बात की ओर इशारा करती है कि यह विधा सिरमौर होने के बावजूद आज की पीढ़ी से कट रही है। कविता के संस्कार समाज में जैसे विकसित होने चाहिए थे, वैसा न होना भी इसकी शायद एक वजह है। प्रतापराव कदम के चौथे संग्रह 'उसकी ऑंखों में कुछ' को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि वे अभी भी अपनी कविता के लिए किसी ठोस मुहावरे की तलाश में हैं। प्रतापराव कदम कविता में किसी बनावटी तेवर से नहीं, सहजता से पेश आते हैं, बल्कि कहें कि एक सामाजिक के तौर पर वे जो अनुभव करते हैं, उसे कविता की अंतर्वस्तु में ढाल देते हैं।
एक अरसा कविता में गुजार देने के बाद हम प्रतापराव कदम से यह उम्मीद अवश्य करते हैं कि उनकी कविता किसी सिद्ध मंत्र की तरह लोगों को अभिभूत करेगी और आज के जटिल समय में भी मनुष्यता के पक्ष में उठने वाली आवाजों से अपना सरोकार कायम करेगी। इस दृष्टि से देखने पर हम पाते हैं कि वे कविता में बहुत श्रम करने वाले कवियों में हैं। 'निठारी तो हड़ियॉं का एक चावल है' यों देखने में एक प्रतिक्रिया-भर प्रतीत होती है पर अंदर धँसने पर कविता की चमक औचक कौंधती है। 'हमें विजेता का अहसास भी उन्हें रौंदकर हुआ' जैसी पंक्ति एक जुमला भर नहीं है, यह एक विचार-सी लगती घटना पर कविता की पालिश है। दूसरी कविता 'हितैषी कहॉं सब्र करते हैं' में कवि का कहना कि 'जीते जी का संसार यह' - सहजता में ही जीवन की एक बड़ी बात कह जाना है। 'जच्चा बच्चा वार्ड' कविता में हर पैदाइश की खबर लेता ईश्वर चौकीदार इनाम इकराम जोड़ता घटाता हुआ भी यह ध्यान रखता है कि वैसे तो चाहे लड़की हो या लड़का कोई फर्क नहीं, पर कहीं यह चौथी जचगी तो नहीं! 'लानत भेजता हूँ' कवि के सरोकारों का संकेतक है। आज के वक्त में भी शारीरिक विचित्रताओं के साथ पैदा शिशु को भगवान मान लिए जाने का अंधविश्वास कम नही हुआ है जिस पर कवि एक सख्त फटकार लगाता है। यही हाल देवालय में रखे उस लोटे का है जो तमाम कर्मकांड-पाखंड का साक्षी भले बना हो, किसी की प्यास बुझाने के काम नहीं आता।
कविता हो और कटाक्ष न हो, व्यंजनाऍं और वक्रताऍं न हों तो भला कविता फिर क्या हुई? वह तो एक शुष्क गद्य का विस्तार हुआ। पर यह कटाक्ष किसके पक्ष में है, देखने की बात यह है। प्रताप के इस कटाक्ष को 'दुम' में देखा जा सकता है। सूदखोर के सामने बकायेदार के चिरौरी की मुद्रा में खड़े होने भर से कवि को उसकी दुम निरीहता में हिलती दिखायी देती है। पर सवाल यह कि यह कटाक्ष उस ठाकुर पर क्यों नहीं जिसकी वजह से एक गरीब उसके सामने हाथ जोड़े रिरियाता हुआ खड़ा है। प्रताप मुहावरों का ध्यान रखते हैं। एक कविता में वे कहते हैं, दाढ़ी हिलाने से क्या कभी ताजी हवा आती है, खिड़कियॉं खोलनी पड़ती हैं। उनकी निगाह में वे ग्राम्या युवतियॉं भी हैं जो खेती किसानी में रमी हैं। कदम समाज के रंग ढंग देखते हुए आगे बढ़ते हैं। अचरच नहीं कि उनके यहॉं मुस्लिम समुदाय पर कई कविताऍं हैं। मुस्लिम समाज से उनकी रब्त-जब्त का पता 'फ़ज़र की नमाज के वक्त इमलीपुरा' और 'अब्दुल्ला सर का इहलोक परलोक' जैसी कविताओं से चलता है। इसी के चलते मदरसों के हालात का तज़्किरा करते हुए 'इतना तक नहीं जानते मौलाना!' कहते हुए वे मौलाना पर भी कटाक्ष उछालने में बाज नहीं आते। जाति व्यवस्था पर भी एक कविता में नजर डालते हुए वे कहते हैं कि जिस जाति-समाज का कोई अतीत नहीं होता, वह सचमुच दरिद्र है पर जो जाति-समाज अतीत में ही खोया रहता है वह तो सड़ांध मारते तालाब की तरह है----नदी की कल-कल छल-छल जिसके ख्वाब में नही है। यानी वही, ताजा हवा के लिए खिड़कियॉं भी खुली रखो, बाहर की आबोहवा भी आने दो--कवि का खुला संदेश है। 'वाह उस्ताद' उन लोगों की कारगुजारियों की एक झलक है जिनके हमेशा पौबारह होते हैं---जिनकी जातीयता, क्षेत्रीयता और धर्मांधता की भट्ठी में किसान-मजदूर-कामगार सब केवल हविष्य-भर हैं और वे सदैव 'कस्मै देवाय हविषा विधेम?' की जुगत भिड़ाते हुए पाए जाते हैं।
तमाम धूर्तों के धतकरम बॉंचते हुए कदम एक यहॉं ऐसे शख्स की बात करते हैं जो हर छलफरेब में माहिर होते हुए भी एक सच्चे आदमी का जिक्र होते ही बगलें झॉंकने लगता है। पर वही आदमी तो दिनोदिन कम होता जा रहा है। वे हर तरह के पाखंड में शामिल उन पुजारियों की खबर लेते हैं जो बकरे को तिलक कर भले छोड़ दें पर धरम के नाम पर देवदासी बनाने के कारोबार में भी जो उतने ही शातिर ढंग से तल्लीन हैं। कदम की एक कविता कागज पर है । कागजी कार्रवाइयों का चिट्ठा। कागजी राहत, कागजी खुशहाली। समूचा देश ऐसी ही कागजी योजनाओं के नाम पर चल रहा है। इन कविताओं में कहीं विष्णु खरे का प्रसंग है तो कहीं मकबूल फिदा हुसैन का। कहीं प्रेम का पर्याय बन चुके राबर्ट गिल और पारो का प्रसंग है तो कहीं फेसबुक का नकली समाज है। यहॉं तक कि थाने में देवालय का नजारा भी कवि ने दिखाया है। यानी कदम ने हर कदम पर दीख पड़ती विडंबनाओं को अपने संज्ञान में लेने का यत्न किया है सिवाय इस विडंबना के कि संग्रह के रोमैंटिक शीर्षक 'उसकी आंखों में कुछ' से इन कविताओं की अंतर्वस्तु का कोई तालमेल नहीं दीखता।
कभी कभी एक कविता कहने के लिए भले छोटी हो पर एक बड़े रूपक का ताना बाना हमारे सामने रखती है। 'भरम' ऐसी ही कविता है जिसमें कवि ने बॉंस की खपच्चियों के ऊपर रखे मटके से रचे बने उस बिजूके की याद दिलाई है जिसे किसान आवारा पशु-पक्षियों से अपनी फसल को बचाने के लिए खेतों में खड़ा करते हैं ताकि ऐसे पशु पक्षियों को उनमें किसी चौकीदार के होने का भरम बना रहे और फसल नष्ट न होने पाए। यह देश आज ऐसे ही भरम और टोटकों के सहारे चल रहा है। कदम के यहॉं खंडवा इलाके की भाषा की झलक भी यत्र तत्र दिखती है। पर अपनी काव्यभाषा से ज्यादा कदम की निगाह कविता की थीम पर रही है, इसीलिए वह देखने में कुछ रूक्ष और अनगढ़ बेशक लगे, अपने लक्ष्य में वह संजीदा दिखती है। यों तो कदम की कुछ कविताऍं सपाट और वक्तव्यों का समूहन भी लगती हैं पर उनमें भी कविता का सत्व कहीं न कहीं दिख जाता है। गौरतलब यह कि कवि यदि अपने समय, बाजार, अनैतिकताओं और जीवन के दुहरे मानदंडों को बखूबी समझता है तब उसका अन्वय कविता में कैसा भी हो, वह कवि की विश्वसनीयता को एक आधार तो देता ही है। कदम ने यहॉं मनुष्यता के पक्ष में अपनी आवाज़ की विश्वसनीयता दर्ज की है, इसमें संदेह नहीं।
बुरी तरह मारा गया विष्णु गणपत चौधुले चार गुल्ले किये उसके उसने जिस बाई को रखा था उसी के सामने काट डाला उसे पर बाई ने हाजिर-नाजिर रखकर कहा उसने नहीं देखा किसी को वह तो खोली के भीतर थी किवाड़ खोलकर ड्योढ़ी पर सोया था विष्णु उसने न घूं-घां की आवाज सुनी न बचाओ-बचाओ चिल्लाने की उसे तो सुबेरे-सुबेरे मालूम हुआ जब कुल्ला करने, संडास के लिए उठी वह। विष्णु गणपत चौधुले यह नाम नहीं होता उसका कुछ और होता तो भी क्या फर्क पड़ता छूरा लहराते कहा था उससे रहेगी अब तू मेरे साथ अपनी मरजी से बैठी थी वह जिसके साथ उसे डरा-भगा जबरदस्ती रखा उसे विष्णु ने। गणपत चौधुले का बेटा विष्णु यशवन्त, रमेश, मधु से छोटा था तीन बहनें थी उसकी सुशीला, वच्छिला तीसरी का नाम नहीं मालूम वच्छिला को छोड़ दिया था खाबिंद ने वह मायके में बारदान सीकर करती थी गुजारा पर उसके किस्से हवा में उड़ते उसकी सीवन उधेड़ते रहते थे विष्णु कई बार टकरार भी करता मेरी बहन के बारे में कुछ बोला तो.....
ये सारी बातें खण्डवा के धनगर मोहल्ले की हैं धनगर महाराष्ट्र की पिछड़ी जाति में भी पिछड़ी ढ़ोर-डंगर चराना, हम्माली झूठे बर्तन में गुजर-बसर तपासती अपनी देवी माहकू बाई के साथ कब मध्यप्रदेश के खण्डवा आ गयी मालूम नहीं ऐसे ही गणपत चौधुले भी आये माहकू बाई को चार बायी चार के ओटले पर बैठाया साल में दो-चार बार ढोल-ढमाकों के साथ माहकू बाई की पूजा होती सारे धनगर झुंड के झुंड नदी की ओर जाते गुंडी उठाये नदी का जल लाया जाता, जिसे नीम की पत्तियों से छींटा जाता माहकू बाई पर फिर किसी के आंग में आती माहकू बाई एक साथ दो-चार के भी उनके कपाल पर खूब लगाया जाता कूंकू पूछा जाता भूत-भविष्य वे कुछ बताते, समझ में आता कुछ नींबू काटा जाता देव शांत होते अजीबो-गरीब हरकत करते जैसे बहुत थक गये, दूर से आये थे आंग में
विष्णु को मैंने अपनी उसारी से कई बार देखा जिनके आंग में देव आते थे उनके सामने नींबू काटते पूछते उसे उसका भूत-भविष्य
मुझे इन सबसे अलग ग्यारह बजे रात की पड़ौस की कडबी की मशीन की घटना याद है मैंने छत से झाँक कर देखा कहा कौन है बाहर आओ कडबी की मशीन के पीछेसे एक छाया डोलती निकली, जो विष्णु की थी
ऊपर देख उसने धीरे से कहा हमारे जात की है, भांडे घसकर लौट रही थी मैंने पकड़ लिया, आप सो तब तक उसकी गिनती शुरूआती गुंडो में ही थी छटे हुओ में तो वह बाद में शामिल हुआ तब जब उसने उसको पकड़ने आयी महिला सब इंस्पेक्टर को चाकू दिखा दौड़ाया था पच्चीस-पचास पुलिस जवानों के साथ जब वह वापस आयी तब तक भाग चुका था वह। चाकूबाजी की उसकी कई घटनाएँ चर्चा में थी जिन ब्याज का धंधा करने वालों के लिये वह उगाही का काम करता था अब नेता थे वे उसका कोई भाई ऐसा नहीं निकला कहीं न कहीं खप गये सब बहन वच्छिला को छोड़ चर्चा में कोई नहीं तो फिर विष्णु ऐसा कैसे ?
चाल में उसके पोस्टमार्टम किये टुकड़े यह तो नहीं कहूँगा पड़े थे वह बाई भी वहीं थी जिसको उसने रखा था उसकी आँखों में कुछ था पर आँसू नहीं थे पुलिस ने रंजिश का मामला बताया।
उसकी कुंआर की दोपहर
उसकी न सुबह होती है न शाम बस दोपहर होती है कुंआर की दोपहर और होता है कोर्ट के आदेश से मध्याह्न भोजन जिस पर नज़र होती है सरपंच अफसर ठेकेदार की। एक प्रायमरी स्कूल का छात्र याने सौ ग्राम गेहूँ और एक रूपये दस पैसे मिडिल के छात्र के साथ जुड़ जाते कुछ और ग्राम कुछ और पैसे मास्टर घुंघआते छप्पर में लगाता हिसाब कितने ग्राम किसके किसके कितने पैसे
कुंआर की दोपहर जिसमें मृग की कस्तूरी पकती है पके हुए भोजन पाने की आस में बैठे हैं वे जिनकी न सुबह है न शाम पर इन बच्चों में सरपंच का बच्चा नहीं है नहीं है अफसर ठेकेकार का बच्चा जैसे इमारत ढहने पर श्रमिक दबता है लाठी चार्ज में चपेटे में आता है अभागा वैसे ही क्या ये बच्चे।
घृणा
घृणा कोई अच्छी चीज नहीं प्रेम की तरह दुई धारी तलवार है घृणा सामने वाले को मारे न मारे जो पकड़े होता है उसे ही काटती है / अपनों से बूमरेंग होती है घृणा अक्सर वार करने वाले के ही मत्थे पड़ती है।
इतिहास की कोख से सभ्यता के विकास तक यह बताती है हमें हमारी मनुष्यता में कसर है पशुओं की उतनी नहीं जितनी हमारी बपोती है घृणा। घृणा कोई अच्छी चीज नहीं प्रेम की तरह।
हितैषी कहाँ सब्र करते हैं
एक आदमी एक जगह से हटता है हवा तुरंत खाली जगह कर देती है आकाश, किसी और छत किसी और सिर होता है बदहवाश दौड़ यह कोई एक छूट जाता है तो रूकता नहीं दूसरा शटल की खटर-खट में कोई एक गिर-कट जाता बनता दूसरे की परेशानी का सबब उफ्, अब यह मरा देर करेगा
एक ही आत्म-हत्या दूसरे की अनुकंपा क्रिया-करम से पहले ही हितेषी करते चर्चा
जीते जी का संसार यह नही तो, हितैषी कहाँ सब्र करते हैं ।
लानत भेजता हूँ मैं
लानत भेजता हूँ मैं मज़म्मत करता हूँ तुम्हारी इस अंधी आस्था की तुम्हारे इस पाखंड की कि तीन मुँहा बालक पैदा हुआ माँ की जान हलक में अटकी और पिता को जब कुछ सूझ नहीं रहा था तो तुमने त्रिपुण्डधारी कहा देखो तीन मुँह है ब्रहा्रा, विष्णु, महेश की तरह चमत्कार है यह प्रभु चमत्कार जचकी के बाद ही दायी ने कहा था पर बजाय अस्पताल जाने के डॉक्टर से सलाह मशविरा के तुम चीखे, चमत्कार है चमत्कार कितनी भीड़ उमड़ी फिर कितनी लम्बी लाईन कितने नारियल हार फूल कितना चढ़ावा तुम्हारे चमत्कार के चक्कर में एक बालक चल बसा पीछे पीछे माँ बाप पागल सा बकता है ऑय-बॉय-सॉय तुम्हारी खोपड़ी में तुम्हारे खड़ाऊ से लगाता नहीं चार
मैं लानत भेजता हूँ मज़म्मत करता हूँ।
जलते कटते फटते हैं माण्डे
गुजरता हूँ जब भी यहाँ से लौट आता हूँ हमेशा की तरह अरशद के आसपास होता हूँ देखता हूँ उसे माण्डा बनाते उसके हाथों की जादुगरी बिना बेलन पाट के/आटे के लोन्दें को हाथों ही हाथों में माण्डे की शक्ल में ढलते रूमाल की तरह तहाते।
मत कहो इसे उलटी तगारी टोक दिया था उसने मुझे तवा है यह इस तरह से बनाया हुआ कि चौतरफा आंच लगे, सीके ठीक से। एक रोटी में, नहीं माण्डे में कितनी आग होती है पानी, मिट्टी, हवा, आकाश कितना। वह खेत भी जिसमें अंकुराते है दाने आटा बनने के पहले पहल पानी होता है, जिसमें बुदबुद सी आँखे खोलते है दाने धूप की थपकार, हवा तरंगों पर आकाश निहारते निहारते किसान पसीने की गंध महसूसते आटा बनते है दाने और अरशद हाथों माण्डा पुष्टि करते बार-बार आग, पानी, हवा, मिट्टी आकाश की तहा कर रखे जाते वक्त तक। फिर अपनी निरर्थकता को रोते कि इसे गुस्सा नहीं आया, आग तो थी अरे इसके चेहरे पर पानी नहीं इसकी वज़ह से कितने अंकुराने से रह गये कितना संकीर्ण यह, आकाश कहाँ है हवा ने तो कभी भेदभाव नहीं किया। कई बार यह सोचते-सोचते तवे पर ही जल जाते है माण्डे कट-फट जाते है जगह-जगह से
अरशद इसका कारण कुछ और बताता है।
नींद
जैसे नदी में मछली रात में नींद वैसे ही गहरे और गहरे तल में उधर किनारे कोई छपक छपक कुनमुनाती तल में मछली उचट जाती नींद।
गूँज
वह इको पॉइंट था अपना नाम ले चीखा आश्वस्त हुआ फिर चौतरफा उसी की तो गूँज है।
जन जन के जीवन में अमृत बन बरसो माँ, विजया बन उतरो माँ, जीवन संग्राम में. दूर हटें अन्यायी निशिचर दानवता के, आज हो पराजित वह मानव का शत्रु ,दिव्य ज्योति बिखराओ,अन्य कलुष मिट जाये, हाथों में खड्ग लिए आओ माँ, कालिका, विजया बन उतरो माँ, जीवन संग्राम में. अन्यायी रक्तबीज जीवित है आज भी , आज भी पुकारती है, पीडिता बसुन्धरा, मानव-उद्धार हेतु, दानव संहार करो, कल- सर्प हाथ लिए आओ रक्तदंतिका!, विजया बन उतरो माँ, जीवन संग्राम में, पलता अभावों का महिषासुर हर घर में, आँखों में अश्रु लिए पूछती है भूमिसुता, संतापित जीवन का हर पल अर्पित तुमको, भूखे नौनिहालों को, तृप्ति दो, प्यार दो, मात्रु भाव साथ लिए,आओ माँ,अन्नदा, विजया बन उतरो माँ, जीवन संग्राम में. सदियों से उत्पीडित कलुषित भावनाओं को, बुद्धि, ज्ञान, वैभव का अद्भुत वरदान दो, मन की अज्ञानता का, अंध तिमिर नाश करो, ज्ञान का प्रकाश लिए आओ माँ, शारदा विजया बन उतरो माँ, जीवन संग्राम में. नवल सृजन नवल भाव,नवल राग साथ लिए, जन-मन के सपनो में रंग नए भर जाओ. इच्छित कामनाओं की पूर्णता साकार करो, आशा विश्वास लिए आओ माँ सिद्धिदा. विजया बन उतरो माँ, जीवन संग्राम में.
मन ने चाहा जब भी—
मन ने चाहा जब भी ,खुद से बातें करना, तब एक नदी गहराती है, मेरे अन्दर, एक पूरा आकाश उतरता है , मेरे घर आँगन में. मौसम के भेजे गए दूत सपने बन कर , मेरी पलकों पर सजते हैं,मोती जैसे,- -जैसे बरसे घन सावन के. मै शांत ,नदी के तट पर खोई लहरों सी, और खिली सितारों सी, नीले नभ आँगन में, तब कहीं गूंज उठता , मेरे मन का कोई कोना, अक्षर अक्षर स्वर लय की दुनियां में बिंध कर मै क्या सोचूं,क्या याद करूँ, कैसे भूलूं,? कैसे भर लूँ जीवन में, सुधियों का कोना. हर रोज सताती है मुझको, मेरे सुलझे,अनसुलझे प्रश्नों की दुनियां, मै समाधान की चाह लिए चलती रहती, और दूर कहीं,सूने नीले अम्बर पट पर, कुछ और कहानी नियति नटी बुनती रहती. कैसे कह दूँ, कैसे फरियाद करूँ मन ने चाहा जब भी खुद से बातें करना, तब एक नदी गहराती है मेरे अन्दर,
--दोष किसका था?
सीखा था हमने , संस्कारों का हर नया पुराना पाठ, माता-पिता को आदर, अपनों से स्नेह,अपनापन, आज-हम सिखाते हैं अपने बच्चों को, पारिवारिक विघटन,-दूरियां,-अकेलापन, महत्वाकांक्षाओं की उंची और उंची ..उड़ान, हम-'अपने'सपनो के पंख लगा 'उन्हें' उतार देते हैं, शून्य आकाश की नीरव शून्यता में, -''उड़ो!..और ऊँचे!..उड़ते रहो!'' जब तक थक न जाएँ तुम्हारे पाँव, तुम्हारी साँसों में टूट टूट बिखर जाये - माता पिता का प्यार,दुलार, तुम्हारा बचपन, संगी साथी की शरारतें, और जब उठा न सकें तुम्हारे कंधे, --हमारे सपनों का बोझ, ''- ''तब-झूल जाना फांसी के फंदों में, किसी नदी नाले में डूबकर- या रेल की पटरियों पर ..जिन्दा लाश की तरह- माँ बाप की आँखों में आंसुवों का सैलाब देकर, डुबो देना अपनी हताशा, निराशा, रंगीन प्यालों के बीच, किसी खो गए अपनेपन की तलाश में - अर्थहीन,अनजानी इंटरनेट की रंगीनियों में भटक जाना, फिर तुम्हारे दिशाहीन भविष्य को तलाशते , एक प्रश्न फिर भी कौंधेगा - ''दोष किसका था?'' किसने सिखाया इन्हें - अपने सपनो को रौंदने की कला, समय अब भी शेष है मित्र!, रोक लो इन्हें, ये तुम्हारा आज,और कल का भविष्यत् हैं, इन्हें खिलने दो ,मुस्कराने दो, अपने सपनो. अपने अरमानो के वृन्तों पर, इन्हें दीवारों पर टंगी तस्वीर नहीं, अपने घर -आँगन की खुशियाँ बनने दो ''
- पद्मा मिश्रा
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हम जानते हैं
हर इंसान में सरकार होती है एक दिन के लिए जिम्मा मिले तो आश्वस्त करता हू दर्द की परछार्इया भूली-बिसरी बात होगी बदल जायेगी सत्ता की परिभाषा
नहीं होगी घोटाले बाज की बेल अन्ना को जेल संसद, सांसदों की नही जीत जनता की होगी जन के अधिकारों की अब नही कटौती होगी
होने को कुछ भी हो सकता है ?
हे राम !
अलविदा भाजपा
या कांग्रेस
बेमानी लोकशाही जब लोक के लिऐ होगी जनता तब चुप नहीं होगी।
न राजा, न प्रजा, न वह माहौल जिसमें जीने के लिए आदमी मजबूर हो रहे है यहां तक कि आत्मदाह करने के लिए भी अधजली जिंदा लाश होकर कैसा लगता है आर्शीवाद! कभी सोचा है तुमने?
कितनी गंदी लगती है तुम्हारी भावुकता, जिससे तुम बहलाना चाहते हो इस देश को? प्रयत्न से, पूजा से मनुष्य के भीतर सहेजी हुर्इ आग अब हवन कुंड से बाहर आ गयी है और सारा देश श्मशान हो रहा है
तुम्हारी भूल कितने घरो को जलायेंगी कितने शरीर भस्मसात होंगे
यह शहर है
नकली मान्य सिद्धान्त गढ़ने वाले कितने घर है, रीत की नीति वाला बड़ा अजीब सा यह शहर है।
चारो तरफ लूट-खसोट वाला कहर है, मक्कारों वाला बड़ा अजीब सा यह शहर है।
कल तक जो सीखते थे मुझसे हुनर है बेखबरी दिखाने वाला बड़ा अजीब सा यह शहर है
बिस्तर पर पड़ा याद करता ना पूछा क्या खबर है अजीब दोस्ती वाला बड़ा अजीब सा यह शहर है
पहचान की मुहर को भूलते इधर है मुँह मोड़ने वाला बड़ा अजीब सा यह शहर है।
क्या लिखूँ मैं
हृदय तृष्णा या जीवन प्रेरणा क्या लिखूँ मैं सर्वोत्तम श्रृखला या स्मृति ज्वाला जिसने सारा जीवन बिचलित कर डाला जिसे ढूढ़ता मेरा मन मतवाला
श्रम संघर्ष से अप्रत्याशित वह अप्रिय घरना अंवाछित कलाधंकार में हो गर्इ विलुप्त क्या लिखू में यह निश्क्रम जो देखा है निश्चय
गया था इलाहाबाद उड़े थे कर्इ प्रतिवाद सब कहते थे यह तुम्हारा है जिसे मैने संघर्ष स्वीकारा था क्या लिखू मैं वह शब्द अतिरिक्त जिसकी प्रतिक्रिया ने सारा जीवन कर दिया मुक्त क्या लिखू मैं यही धरना सशक्त।
किस कदर प्रतीक्षारत
किस कदर प्रतीक्षारत मतवाला मानसून इस अरबी शब्दो को सच करता है जून
मानसून शब्द हमारी जीवन शैली में, संस्कृति में रच बस गया है इस भूखंड को मानसून ने बहुत प्रभावित किया है
जब गायब होता है तो हा-हाकार मचा देता है हमसे कुछ लेता नहीं हमे हर दम देता ही देता है
जीवन की नैया को नर्इ दिशा में खेता है जब बिन बरसे निकलता जून खोजने लगते हम मानसून
मन्नत मनाते गच्चा न दे मानसून प्रकृति के इस विराट खेल का अंदाजा इसी बात से पता चलता है
भारत के पशिचमी तट पर करीब 75 अरब टन जल बरसता है आसमान में चमत्कारी परिवर्तन होता है पूरा का पूरा आलम महकता है
झमाझम पानी लिखता है जीवन की नर्इ कहानी चहु ओर जमी पर छा जाता रंग धानी
उमंग उल्लास लाता पानी, मछलिया और जाल खुशियों से भर जाता पानी के आने से फिर एक साल।
राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है , कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है. - राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त कुछ समय पहले अमरीका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो के प्रोफ़ेसर, ए के रामानुजन ( 1929 – 1993 ) के ' 300 Ramayanas ' शीर्षक लेख की चर्चा समाचारों में रही . यह लेख दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विषय के बी.ए. (आनर्स) स्तर के पाठ्यक्रम में 2006 से निर्धारित था. अतः यह कहना उचित होगा कि विद्वानों की दृष्टि में यह एक उपयोगी लेख है ; पर कुछ लोगों को इसकी विषयवस्तु आपत्तिजनक लगी और उन्होंने इसे पाठ्यक्रम से हटाने की मांग की . विश्वविद्यालय के न मानने पर मामला सुप्रीम कोर्ट में गया . कोर्ट के आदेश पर इस लेख की जांच करने के लिए इतिहास विभाग के चार सदस्यों की एक विशेषज्ञ समिति बनाई गई . यद्यपि चार में से केवल एक ही सदस्य ने इसके विपक्ष में राय दी, फिर भी विश्वविद्यालय ने बढ़ते विवाद को देखकर इसे 2011 में पाठ्यक्रम से हटा दिया. इस निर्णय को कुछ लोगों ने सत्य की जीत बताया तो कुछ ने सत्य की हार.
अन्य लोगों की भांति मैंने भी बचपन में रामायण कहानी के रूप में सुनी थी . तब हम लोग रामकथा से संबंधित किसी भी कहानी / ग्रन्थ को रामायण ही कहते थे ( आम आदमी आज भी इसी शब्द का प्रयोग करता है ) . बाद में तुलसी कृत “ रामचरित मानस “ और वाल्मीकि कृत “ रामायण “ पढ़ने का तथा दोनों की रामकथाओं में जो अंतर है, उसे जानने का अवसर मिला ; पर जब डा. कामिल बुल्के (1909 – 1982 ) का शोधग्रंथ " रामकथा : उत्पत्ति और विकास " (1950 ) पढ़ा तो रामकथा के सम्बन्ध में वह सब जानने को मिला जो अभी तक अज्ञात था. बुल्के जी के इस ग्रन्थ को डा. धीरेन्द्र वर्मा जैसे विद्वान ने उस समय " रामकथा संबंधी समस्त सामग्री का विश्वकोश " कहा था. बुल्के जी जब तक जीवित रहे , अपनी पुस्तक के नए संस्करण में नवीन सामग्री देकर इसे अद्यतन करते रहे. मैंने सोचा कि रामानुजन का उक्त लेख स्नातक स्तर के इतिहास के विद्यार्थियों के लिए निर्धारित किया गया है. यह अवश्य ही अद्यतन सामग्री से युक्त होगा, अतः मैंने उसे पढ़ने का निश्चय किया.
रामानुजन का उक्त लेख ( इसका आकार The Collected Essays of A. K. Ramanujan में 30 पृष्ठों का है ) इस प्रश्न से प्रारम्भ होता है - “ कितनी रामायण ? तीन सौ ? तीन हज़ार ? “ ( फादर बुल्के ने अपने अनुसन्धान में लगभग 300 रामकथाओं का उल्लेख किया है. रामानुजन ने अपने लेख के शीर्षक में उसी संख्या को आधार बनाया है ) और फिर इस प्रश्न का उत्तर देने वाली जो लोक कथाएं प्रचलित हैं, उनमें से एक कहानी की रामानुजन ने विस्तार से चर्चा की है . राम सभा में बैठे थे , एकाएक उनकी अंगूठी अंगुली से निकलकर गिर गई और ज़मीन में छेद करते हुए उसमें गायब हो गई. राम ने हनुमान को अंगूठी ढूँढने का काम सौंपा. हनुमान अलौकिक शक्ति संपन्न थे. अतः अतिलघु शरीर धारण कर उस छेद में घुस गए और पीछा करते - करते पाताल लोक पंहुच गए.
इधर राम के दरबार में ब्रह्मा और वशिष्ठ जी आए और राम से एकांत में बात करने की इच्छा व्यक्त की. निश्चय यह हुआ कि अगर एकांत में कोई विघ्न डाले तो उसका सिर काट दिया जाए. अतः एकांत की व्यवस्था सुनिश्चित करने की दृष्टि से राम ने लक्ष्मण को द्वार पर खड़े रहने को कहा. अन्दर एकांत वार्ता चल रही थी कि विश्वामित्र जी आए और तुरंत राम से मिलना चाहा . लक्ष्मण ने रोका तो उन्होंने अयोध्या को भस्म कर देने की धमकी दी . विवश होकर लक्ष्मण विश्वामित्र के आने की सूचना देने के लिए अन्दर गए. यद्यपि तब तक एकांत वार्ता समाप्त हो चुकी थी जिसमें राम को यह बताया गया कि मर्त्यलोक में आपका कार्य पूरा हो चुका है, अतः अब आपको रामावतार रूप त्याग कर ईश्वर रूप धारण कर लेना चाहिए ; और यद्यपि राम ने विश्वामित्र की बात जानने के बाद लक्ष्मण के अन्दर आने को गलत नहीं बताया, पर लक्ष्मण ने अपने को एकांत वार्ता के सम्बन्ध में राम के आदेश का पालन न करने का दोषी मानते हुए सरयू में जाकर शरीर त्याग दिया . तो फिर राम ने भी लव - कुश का राज्याभिषेक करके सरयू में प्राण त्याग दिए .
उधर पाताल में भूत निवास कर रहे थे. इस आगंतुक बन्दर को वहां भूत-राजा के सामने पेश किया गया . उसने हनुमान से आने का प्रयोजन पूछा . अंगूठी की बात कहने पर उसने एक थाल में हज़ारों अंगूठियाँ दिखाईं और हनुमान से पूछा कि तुम इनमें से कौन सी अंगूठी ढूंढ रहे हो. सभी अंगूठियाँ एक सी थीं . अतः हनुमान अंगूठी पहचान ही नहीं पाए. तब भूतों के राजा ने कहा कि इस थाली में जितनी अंगूठियां हैं, उतने ही राम अब तक हो चुके हैं. जब तुम धरती पर लौटोगे तो तुम्हें राम नहीं मिलेंगे . राम का यह अवतार अपनी अवधि पूरी कर चुका है . जब भी राम के किसी अवतार की अवधि पूरी होने वाली होती है, उनकी अंगूठी गिर जाती है. मैं उसे उठा कर रख लेता हूं . यह सुनकर हनुमान वापस लौट आए.
इस प्रकार इस लोक कथा के अनुसार तो अनेक रामायणों की आवश्यकता “ राम के विभिन्न अवतारों “ का वर्णन करने के लिए हुई, पर यह जिज्ञासा बनी ही रहती है कि फिर उपलब्ध सभी राम कथाओं की मूल कथावस्तु एक ही क्यों है ? लेखक ने भी इसकी कोई चर्चा नहीं की है . हाँ, उसने आश्चर्य के साथ इस तथ्य का उल्लेख अवश्य किया है कि " रामायण " का प्रभाव केवल इस देश में नहीं, बल्कि दक्षिण तथा दक्षिण -पूर्व एशिया के देशों तक पहुंचा. इसीलिए देशी - विदेशी विभिन्न भाषाओं में अलग - अलग नामों से " रामायण " मिलती है . वास्तविकता यही है कि रामकथा को अपने काव्य का आधार बनाने वाले प्रथम कवि वाल्मीकि अवश्य हैं, पर बाद के कवियों ने वाल्मीकि का अनुकरण करने के बजाय इस कथा में अपनी कल्पना के अनुरूप नए - नए रंग भरे हैं, यही कारण है कि उनमें पर्याप्त अंतर मिलते हैं .
लेखक ने कुछ प्रसंग लेकर इन अंतरों की ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास किया है . जैसे, अहल्या संबंधी कथा . ( यह ध्यान रखने योग्य है कि वाल्मीकि रामायण में अहल्या की कथा उन्हीं दोनों काण्डों - बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड में आती है, जिन्हें प्रक्षिप्त माना गया है .) अपने निबंध में लेखक ने पहले वाल्मीकि रामायण ( संस्कृत ) और कंबन के रामावतारम ( तमिल ) के इस कथा से संबंधित अंश का अंग्रेजी में अनुवाद प्रस्तुत किया है . वाल्मीकि रामायण में अहल्या छद्मवेशधारी इंद्र को आते ही पहचान लेती है, इसके बावजूद रतिक्रिया के लिए उनका निमंत्रण स्वीकार करती है ,जबकि रामावतारम में वह बाद में - रतिक्रिया के दौरान उसे पहचान तो लेती है, फिर भी रतिक्रिया से विरत नहीं होती . गौतम मुनि का शाप भी दोनों ग्रंथों में अलग तरह का है. रामायण में वे इन्द्र को अंडकोष विफल होने का शाप देते हैं, और अहल्या को शाप देने के साथ ही स्वयं शापमोचन की बात भी कह देते हैं , जबकि रामावतारम में इन्द्र के शरीर पर सहस्र योनियाँ हो जाने का शाप देते है जिसे बाद में देवताओं की प्रार्थना पर सहस्र आँखें हो जाने में बदल दिया जाता है, और अहल्या जब शापग्रस्त होने पर क्षमायाचना करती है तब उसे शाप मुक्ति का उपाय बताया जाता है .
निबंध में लेखक ने दोनों ग्रंथों की कथा में जो अंतर है, उसे स्पष्ट करते हुए लिखा है , " इन दोनों विवरणों के कुछ अंतरों को देखिए . वाल्मीकि के यहां इंद्र जिस अहल्या का शीलभंग करते हैं, वह स्वयं इच्छुक है . कम्बन के यहां अहल्या यह अनुभव तो करती है कि वह गलत कर रही है, लेकिन वह उस निषिद्ध आनंद को छोड़ भी नहीं पाती क्योंकि पहले ही यह संकेत किया जा चुका है कि उसका विद्वान पति पूरी तरह अध्यात्मलीन है . ............इन्द्र को हज़ार योनियाँ धारण करने का शाप मिलता है, जिसे बदल कर बाद में हज़ार आंखें कर दिया जाता है . अहल्या एक जड़ पत्थर में बदल जाती है . दोनों अपराधियों को दंडित करने वाला काव्यात्मक न्याय (Poetic justice ) उनके दुष्कर्मों के अनुरूप है . इंद्र उसी वस्तु के चिह्नों को धारण करते हैं जिसके लिए वे लालायित हो रहे थे, जबकि अहल्या किसी भी चीज़ के प्रति अनुक्रियाशील होने की क्षमता से वंचित कर दी जाती है .”
ऐसा ही एक और प्रसंग सीता के जन्म का देखिए . वास्तविकता तो यह है कि प्रारम्भिक रामकथाओं में इस विषय से सम्बन्धित तथ्यों का अभाव था , अतः बाद के साहित्य में अनेक प्रकार की एक - दूसरी से सर्वथा भिन्न कथाएं ( जनकात्मजा, भूमिजा, दशरथात्मजा , रावणात्मजा ) प्रचलित हो गईं ; पर लेखक ने इस विवाद की कोई चर्चा करने के बजाय एक लोककथा की चर्चा की है जिसमें बताया गया है कि रावण (यहाँ उसका नाम रावुला है ) और मंदोदरी संतानहीन हैं , अतः दुखी हैं . वन में जाकर वे दोनों तपस्या करते हैं जहाँ उनकी भेंट एक योगी से होती है जो और कोई नहीं, साक्षात शिव ही हैं. वे रावण को एक चमत्कारी आम देते हैं और पूछते हैं कि इसे पत्नी के साथ कैसे बांट कर खाओगे . रावण कहता है कि इस फल का मीठा गूदा मैं अपनी पत्नी को दूंगा और स्वयं इसकी गुठली चूसूंगा. योगी को संदेह होता है . अतः वह कहता है कि अगर तुम मुझसे झूठ बोलोगे तो अपने कर्मों का फल निश्चित रूप से भोगोगे. वस्तुतः रावण सोचता कुछ और है, पर करता कुछ और है . इसीलिए जब आम खाने की बारी आती है तो वह सारा गूदा स्वयं खा जाता है और मंदोदरी को गुठली देता है . परिणाम यह होता है कि रावण के ' गर्भ ' ठहर जाता है . रावण परेशान है पर गर्भ पलता जाता है और जब शिशु के जन्म का समय आता है तो रावण जोर से छींकता है , बस इसी छींक से जो शिशु बाहर आता है उसे रावण " सीता " नाम देता है . यह लोककथा कर्नाटक में प्रसिद्ध है जहाँ कन्नड़ भाषा बोली जाती है और कन्नड़ में ' सीता ' शब्द का अर्थ ही है, " उसने छींका " ; जबकि संस्कृत में सीता का अर्थ " हल से बनी रेखा " है. लेखक ने दोनों भाषाओं में सीता शब्द के इस अर्थगत अंतर की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए इसे ही संस्कृत और कन्नड़ काव्यों में सीता के जन्म संबंधी अलग - अलग कथाओं का आधार बताया है.
रामकथा से संबंधित कतिपय प्रसंगों का तुलनात्मक विवेचन करने के लिए लेखक ने विभिन्न काव्य ग्रंथों ( प्रमुख रूप से वाल्मीकि कृत रामायण , कंबन कृत रामावतारम , विमल सूरि कृत पउम चरिय, अध्यात्म रामायण , और स्याम देश की थाई भाषा की राम कियेन ) के साथ देश - विदेश में मौखिक रूप से प्रचलित लोक - कथाओं का, विशेष रूप से आदिम जातियों में प्रचलित लोककथाओं का भरपूर सहारा लिया है और आवश्यकतानुसार अपनी टिप्पणियां भी दी हैं . इस तरह, लेखक ने इस वास्तविकता से एक बार फिर हमारा साक्षात्कार कराया है कि हमारे पास वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में कही गई एक ही रामकथा नहीं है, बल्कि दूसरों द्वारा कही गई अनेक रामकथाएं भी हैं जिनके बीच अच्छे - ख़ासे अंतर मौजूद हैं.
रामायण को लेकर हमारे समाज की विचित्र स्थिति है. एक ओर तो वह वर्ग है जो राम और अपने - अपने समाज में प्रचलित वर्तमान रामकथा को इतिहास की एक घटना मानता है. उसने जिस भी रूप में रामायण सुनी / पढ़ी है, उसी रूप को ऐतिहासिक मानता है, प्रामाणिक मानता है , वास्तविक मानता है, विश्वसनीय मानता है, अंतिम सत्य मानता है, वेद वाक्य मानता है. प्रचलित रामायण की अतिरंजित - अस्वाभाविक बातों को " भगवान राम " का तथा अन्य पात्रों के दैवीय स्वरूप का प्रताप मानता है. समाज के एक वर्ग के लिए गोस्वामी तुलसीदास केवल कवि - साहित्यकार नहीं, " धर्म गुरु " हैं और रामचरित मानस " धर्म पुस्तक " है . अतः उसमें किसी भी प्रकार का विचलन उसे स्वीकार नहीं है ( यह दूसरी बात है कि जब हमारे कथावाचक “ अलौकिक तत्व “ बढ़ाने वाली कथाएं विभिन्न स्रोतों से लाकर उसमें जोड़ते हैं तो उन्हें सामान्य व्यक्ति अबोध - अज्ञानी बनकर श्रद्धापूर्वक भक्ति भाव से चुपचाप स्वीकार कर लेता है ) . संयोग से यह वर्ग संख्या की दृष्टि से बहुत बड़ा है . दूसरी ओर एक वर्ग वह है जो राम और रामकथा को इतिहास की घटना नहीं, पूरी तरह मनगढ़ंत पौराणिक कथा ( mythology ) मानता है . संख्या की दृष्टि से यह वर्ग भले ही छोटा हो, पर अपने को बुद्धिजीवी मानता है , सुशिक्षित मानता है, और संयोग से वर्तमान एकेडेमिक क्षेत्र में अपना विशेष दखल रखता है . इन दोनों के बीच कई वर्ग हैं . कोई पूरी की पूरी रामकथा को या उसके प्रमुख अंशों को रूपक मानता है और उसकी अपने ढंग से आध्यात्मिक व्याख्या करता है , तो कोई रामकथा को इतिहास की घटना मानते हुए उसके अतिरंजित - अस्वाभाविक तत्वों को प्रक्षिप्त मानता है , इसलिए उन्हें रामकथा से बाहर कर देना चाहता है . इन विरोधों के बावजूद एक ऐसी बात है जो इन सभी वर्गों पर लगभग समान रूप से लागू होती है, और वह यह कि रामकथा से संबंधित मूल ग्रंथों को पढ़ने वाले लोग बहुत कम , लगभग नहीं के बराबर हैं. जिस वाल्मीकि रामायण को रामकथा का आदिग्रंथ कहा जाता है, उसके पढ़ने वाले तो चिराग लेकर ढूँढने पड़ेंगे.
रामानुजन के लेख का विरोध करने वालों का कहना था कि इसमें ऐसी बातें कही गई हैं जो प्रचलित रामकथा से भिन्न हैं . अतः हमारी आस्थाओं पर प्रहार करती हैं. हमारे समाज के एक बहुत बड़े वर्ग ने ( इसमें हिदू, मुसलमान , सिख , ईसाई आदि सब शामिल हैं ) धार्मिक आस्थाओं के नाम पर सत्य की परख के अपने ऐसे मानदंड विकसित कर लिए हैं जिनका सत्य - असत्य का निर्णय करने के लिए न्याय शास्त्र , मीमांसा शास्त्र आदि में ऋषियों के बताए " प्रमाणों " से ( जो प्रत्यक्ष , अनुमान आदि तीन से लेकर आठ तक हैं ) या वर्तमान ऐतिहासिक खोजों से, पुरातत्वीय खोजों से कोई लेना - देना ही नहीं . लगभग दो वर्ष पूर्व तुलसीपीठ चित्रकूट के जगतगुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य ( संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के स्वर्णपदक विजेता, पी-एच. डी., डी.लिट.) ने जब आठ वर्ष के अनुसंधान के बाद तुलसी कृत रामचरित मानस के उपलब्ध पुराने संस्करणों से एवं हस्तलिखित पांडुलिपियों से मिलान करके वर्तमान प्रचलित संस्करण में 3000 ( तीन हज़ार ) अशुद्धियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया ( अशुद्धियाँ विभिन्न प्रकार की मिलीं , जैसे , नई पंक्तियाँ जोड़ दी हैं , अर्थ बदलने के लिए अनेक शब्द बदल दिए हैं आदि) और संशोधित संस्करण ( 2008 ) तैयार किया तो उनके कार्य की सराहना करने के बजाय अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् के महंत ज्ञानदास, राम जन्मभूमि न्यास के नृत्य गोपालदास जैसे तमाम साधु - संत विरोध में खड़े हो गए और न्यायालय तक पहुँच गए ( टाइम्स ऑफ़ इंडिया, मुंबई , 1 नवम्बर, 2009 . पृष्ठ 17 ) स्वामी रामभद्राचार्य जी को अपने कार्य को सही बताते हुए भी “ आस्थाओं को आहत करने के लिए " क्षमा मांग कर अपनी जान छुड़ानी पड़ी .
रामानुजन का यह लेख विश्वविद्यालय के “ इतिहास “ के पाठ्यक्रम में शामिल करने के कारण चर्चा का विषय बना ; पर मजेदार बात यह है कि इतिहास की दृष्टि से इसमें कुछ है ही नहीं . इसे पढ़कर रामकथा या उसके विकास के प्रति कोई ऐतिहासिक दृष्टि विकसित नहीं होती . जिन ' रामायणों ' की चर्चा इस लेख में की गई है, उनके बारे में यह तक नहीं बताया गया कि उनकी रचना किस कालखंड में हुई . इस लेख में यह तो स्पष्ट किया गया है कि रामकथा कहने वाले वाल्मीकि एकमात्र कवि नहीं हैं , पर यह नहीं बताया कि " रामायण " के सभी उद्गाता ( चाहे वे वाल्मीकि हों या कंबन आदि ) " कवि " हैं , " साहित्यकार " हैं , “ कलाकार “ हैं ; “ इतिहासकार " नहीं . यह भी नहीं बताया कि जिस मूल घटना को आधार बनाकर इन्होंने अपने - अपने ढंग से काव्य रचना की है, वह घटना ( रामानुजन की दृष्टि में ) ऐतिहासिक है या नहीं. यह भी नहीं बताया कि जिस राम को वाल्मीकि ने " आदर्श मानव ” के रूप में चित्रित किया था , उसे बाद के कवियों ने " भगवान विष्णु का अवतार " क्यों, कैसे और कब बना दिया. यह भी नहीं बताया कि रामकथा के कौन से प्रसंग किन ग्रंथों में मिलते या नहीं मिलते हैं . यह भी नहीं बताया कि रामकथा की ऐसी कौन सी विशेषताएं हैं जिनके कारण यह सभी भारतीय भाषाओं का तो कंठहार बनी ही, भारत के बाहर भी साहित्यकारों को सदियों तक आकर्षित करती रही . इस लेख को पढ़कर रामकथा कहने वाले कुछ कवियों की स्वतन्त्रता ( और एक सीमा तक " स्वच्छंदता " ) का तो पता चल सकता है , पर यह पता नहीं चलता कि इसके लिए उन्होंने " रामकथा " को ही क्यों चुना ?
मेरा सुझाव है कि यदि विश्वविद्यालय रामकथा के सम्बन्ध में विद्यार्थियों को प्रामाणिक जानकारी देना चाहता है तो उसे डा. कामिल बुल्के के ग्रन्थ को आधार बनाना चाहिए ( डा. बुल्के का मूलग्रन्थ तो हिंदी में है, पर कैनबरा विश्वविद्यालय , आस्ट्रेलिया के प्रो. रिचर्ड बार्ज ने उसका अंग्रेजी में अनुवाद भी किया है ) . रामानुजन ने तो केवल कुछ प्रसंगों की जांच - पड़ताल की है, वह भी अधूरी की है ; बुल्के ने अपने ग्रन्थ में पूरी रामकथा से संबंधित देश - विदेश में उस समय तक उपलब्ध लिखित - मौखिक सभी प्रकार की सामग्री का व्यवस्थित ढंग से उपयोग किया है, और तर्कसंगत निष्कर्ष निकाले हैं. उसका अध्ययन करने से राम और रामकथा का इतिहास भी पता चलता है और यह भी पता चलता है कि किन कवियों ने अपनी किस प्रकार की कल्पनाओं से उसे कब - कब नया रूप दिया . पाठक के मन में कोई दुविधा नहीं रहती , और हर चित्र स्पष्ट होता जाता है. रामानुजन के लेख को पढ़ने के बाद मैं तो यही कहूँगा कि बुल्के का ग्रन्थ आज भी " रामकथा संबंधी समस्त सामग्री का विश्वकोश है "
“माया” का पर्यायवाची है –कन्या ,देवी ,प्रकृति ,आदि ! माया ही विश्व की शक्ति है ! वही सम्पूर्ण संसार का सञ्चालन करती है !पुरुष पर नियन्त्रण प्रकृति का होता है ! लोक व्यवहार में इसके विकल्प रूप में कन्या का पूजन किया जाता है ! कंस ने नवजात कन्या का वध किया था ,उसका परिणाम पाच हजार सालों से पढते चले आ रहे है !फिर भी हमारे देश में कन्या भ्रूण हत्या की दर बढती जा रही है ! कन्या दान का विषय मानी जाती है ! आज तो वह इन जंजीरों को तोड़ कर स्वतंत्र होना चाहती है ! उसे पता नही होता है कि अच्छी पत्नी ,अच्छी माँ का जीवन में क्या महत्व होता है ?इनसे जुडी कोई शिक्षा उसके पास नही होती है ! माँ –बाप बिना कोई शिक्षा दिए ही उसको जीवन-संग्राम में धकेल देते है ! क = शक्तिशाली , न् = शून्यता, या= पूर्णता का पर्याय है – निराकार आत्मा जो है, किन्तु ऋत रूप है ! कन्या में सृजन शक्ति होती है ! माया ,महामाया ,योगमाया का विकास , जीवन के प्रति नजरिया , एकाग्रता जैसे गुणों को समझने कि सामर्थ्य इक नारी में ही होती है ! पुरुष इस प्रकृति में कमजोर होता है ! ‘ कन्या ‘ मात्र शरीर का नाम नही है ! शरीर जीवन के कार्य–श्रेत्र का निर्धारण मात्र है ! शरीर से कोमलता , चहेरे से निर्मलता और आखों में चपलता उसके जगत निर्माण के अस्त्र –शस्त्र है !
संतान पैदा करना उसका निर्माण नही है ! यह तो इस शरीर की नैसर्गिक क्रिया है ! कन्या का स्वरुप और लक्ष्य ही प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ वरदान है ! कौन दूसरा प्राणी है इस धरती पर जो माँ –बाप के साथ रहकर स्वयं को इस तरह तैयार करता हो , किसी दूसरे घर को प्रकाशमान करने के लिए ! न वह माँ – बाप के लिए जीती है , न स्वयं के लिए ! कन्या सारी दैविक शक्तियों का ज्ञान प्राप्त करती है ! इन्ही की सहायता से वह निर्माण,पोषण और निवृत्ति के लक्ष्य को पूरा करती है ! जिस जीव को शरीर में धारण करती है , वह स्वेच्छा से शरीर में प्रवेश करता है ! पूछकर , स्वीकृति लेकर नही आता है !देवता की तरह रहता है , पूजित होता है ,परिष्कृत और प्रशिक्षित किया जाता है ! माया का ‘माँ’ रूप इससे बढकर क्या होगा कि इस अनजान जीव का पोषण करके शरीर में लपेटकर विश्व को भेट करती है –अभिमन्यु बनाकर !
पितृ-ऋण, देव -प्राण की प्रतिष्ठा ही विवाह का प्रयोजन होता है ! कन्या एक बंधन युक्त आत्मा का वरण करती है और उसके मुक्त होने में उसकी सहायता करती है –उसकी स्वयं की दैविक शक्ति ! वही माया रूपी शक्ति स्वतंत्र घूम रही आत्मा को शरीर प्रदान कर लक्ष्य की ओर बढने के लिए जीने का मार्ग देती है ! उसके साथ क्या बीतता है ? उसे सहन कर पाने की शक्ति भी उसमे होती है ! जिस कन्या का संकल्प टूट जाता है , वह टूटे पत्थर की तरह और संकल्पवान हथोड़े की चोट खा-खाकर मूर्ति बन जाती है ! हर कन्या में ये दिव्य स्वरुप विद्यमान रहता है ! अत: वह पूज्यनीय है !
- डॉ. श्रुति मिश्रा
"शक्ति स्वरूपा बेटी !"
{शक्तिस्वरूपा नवरात्रि}
मौसम बदला बारिश थम गयी नदी सी बहती हुई शक्तिस्वरूपा नवरात्रि साजों के संग लहराई गरबा के शब्दों ने मुखरित कर लिया गीतों को नन्ही जान भी माँ के गर्भ में सरसराई अनजानी आशंकाओं से थरथराई रोज सुनती थी कि वह अनचाही है इंतज़ार था उसको कि शायद चरण पुज जाएँ इस उत्सव में लेकिन नवरात्रि के अंतिम चरण में हवा की लय बदल गयी उसकी पैदाईश टल गई रिश्तों के ताल तलैया रीते हो गए पीर पर्वत सी नहीं पिघली हिमालय से गंगा नहीं निकली हंगामा गरबे के ढोल में दब गया न कोशिश जारी रही न सूरत ही बदली बस बेटी के हिस्से का सूरज ही नहीं उगा माँ ने आह भरी उसका मौन संवादहीन हो कह रहा था अब नहीं दोहराऊंगी यह गलती तुझे वापस लाऊँगी अपने इस जीवन संघर्ष की शक्ति बनाऊँगी दुर्गा माँ का विसर्जन होने तक एक नई उर्जा और प्रेरणा पाकर माँ स्वयम से बोली हर साँस जब लूंगी तुझे ही जिऊँगी यह वादा रहा बेटी अर्थहीन नहीं होगी तेरी कुर्बानी अगली बार मौसम बदलेगा गरबे की स्वर लहरी छंदबद्ध होगी तब तेरे साथ मैं भी संगीतमय तरंगों में थिरकूंगी और हर थिरकन में मेरे शब्द होंगे कि बेटी शक्तिस्वरूपा दुर्गा होती है इसलिए उसका जन्म लेना हमारे लिए वरदान है क्यूंकि बेटी हमारे देश की शान है -आन है मान है हमारा अभिमान है ..!
आपने आज्ञा दी कि विजयादशमी पर एक लेख लिखो और वह भी फौरन से पेशतर, अर्थात् एक दिन के भीतर! आपकी आज्ञा तो सिर आँखों, पर आप ही बताइये कि अब यह विषय तो हाईस्कूल के निबंध के पर्चों तक मतरूक हो गया, कहां से मैं सामग्री पाऊँ? उस पर भी समय इतना कम आपने दिया है, जैसे मुझे अध्यक्षीय भाषण ही तो लिखना है। पर आप ठहरे पुराने ख्यालों के आदमी। आपको जमाने के अन्दाज का पता ही कहाँ है? अब हम लोग प्रगतिशील राष्ट्र हैं; हमारी शालीनता अब यह गवारा नहीं कर सकती कि हम पुरानी विजय-तिथियों को मनायें। हम विजेता होने पर गर्व करना हिंसा मानने लगे हैं और इसी से अब हम रामायण की कहानी ही बदल देना चाहते हैं। आपको रावण को जलाए जाने पर हर्ष होता हो; पर हमारे देवता की तो छाती फटती है। आपको अभी युग के बदलते हुए मूल्यों का, लगता है, कुछ ख्याल ही नहीं है! अब रामलीला बहुत ही शक्तिशाली माध्यम है-लोगों को अपने मत से रिझाने के लिये। राम, सीता, लक्ष्मण अब खिलौने हैं, हमारी सांस्कृतिक प्रदर्शनी को सजाने के लिये। शारदीय नवरात्र अब श्रीनगर बिहार के लिए सुन्दर सुअवसर है। आपको खबर ही नहीं, इधर जनवादिता के उदय और पुराने मूल्यों के विघटन के लिए बिलकुल कायापलट हो गयी। मैं क्या विजयदशमी पर लिखूँ? विजय में ही विश्वास घट गया, तो दशमी के समारोह का महत्व ही क्या रहा?
अगर यह लिखूँ कि यह विजय ऐतिहासिक तय नहीं थी, यह धरती की सांस्कृतिक विजय की रूपात्मक कहानी मात्र है, तो आप चौंकेंगे यह क्या? पर श्रीमान् संपादक महोदय, मिट्टी ने अंगड़ाई ली है, वह अपनी गोदी में अपनी बेटी को लेकर उठ खड़ी हुई है और वह राम से जवाब माँगती है-‘ अब बोलो, आते हो हमारी शरण में कि मैं तुम्हारे नारे बन्द कराऊँ? ‘ जो, सीता जन-संस्कृति की पुत्री थीं, अर्थात् वे खेतिहर की प्रभुता के जन्म की प्रतीक थीं! राम सामन्तीय संस्कृति द्वारा अर्थात् बुर्जुआ संस्कृति द्वारा किये गये आत्मविश्लेषण और विद्रोहात्मक चिंतन के प्रतीक मात्र थे। उन्होंने पूँजीवादी रावण के चंगुल से सर्वहारा संस्कृति की दुहिता का उद्धार किया! रामायण मानव इतिहास में आदिम साम्यवाद की स्थापना की कहानी है; पर उसको लिखने वाले दासता की मनोवृत्ति में पले ह्रासोन्मुख युग के राजकीर्त गायक थे। उन्होंने इस सीधी-सादी कथा को बाँकी, रंगीन और सरस बना डाला। इसमें पितृभक्ति, गुरुभक्ति, भ्रातृभक्ति, पतिभक्ति और स्वामिभक्ति जैसे निम्नोमुख आदर्शों का सन्निवेश करके इस ग्रन्थ को धार्मिक बना डाला। आप कहेंगे कि यह चिदानन्दी प्रलाप है। जी, क्या करूँ आपको कैसे समझाऊँ कि रामायण पर रूसी भूमिका लिखी जा चुकी है। तुलसीदास जनवादी विद्रोही करार दिये जा चुके हैं। भूखे-नंगे भिखमंगे महामानव की पदाक्रान्त आत्मा की आक्रोश भरी हुंकार की प्रतिध्वनि उनकी कविता से मिलाई जा चुकी है। तुलसी के राम वानर-भालुऔं के रूप में आदिमवासी संघ के अध्यक्ष की हैसियत से शोषित और उत्पीड़ित मानवता के ध्वजपात बने गली-गली घूम रहे हैं। आपको उन्हें चन्दन तिलक करने की पड़ी है! समय बड़ी तेजी से आगे बढ़ रहा है, और आप अभी अपनी धुन में हैं कि ‘श्री रामचन्द्र कृपालु भुज मन हरणभवभयदारुण! ‘ अब छोड़िए यह श्री, चन्द्र और कृपालु के व्यर्थ आडम्बर! अपने साथी को आप पहचानिये, वही जिन्होंने अपनी जटा आगे-पीछे छितरा दी है, पीठ पर काली तुणीर है, पर धनुष फेंक दिया है, हाथ में झंडा लिये आगे बढ़ते चले आ रहे हैं, मुँह लाल है, आँखें चढ़ी हुई हैं, पायजामा फटा हुआ है, दोनों बाहुमूलों पर और गले में हँसिया-हथौड़ा दगा हुआ है, कुर्ते का बटन खुला हुआ है। और वह देखिये, दसों मुँह बाये बड़े पेट वाला , बड़ी बाँह वाला रावण अकेला खड़ा हँस रहा है। नंगों-भूखों की अपार भीड़, इस पतनोन्मुख पूँजीवादी दानव को विचलित नहीं करती। वह सोने की लंका ऱाख होती देखकर भी परेशान नहीं है, क्योंकि उसके चंगुल में अभी सीता है। वह छटपटाती हुई जन-संस्कृति है, जो पूँजीवादी शोषण में व्याकुल पड़ी हुई है। अपने बाप का बैर भूलकर कितने अंगद, सिद्धांत के ऊपर भाई की कुरबानी करने वाले कितने सुग्रीव और मां-बाप दोनों को ठुकराने वाले कितने हनुमान वृक्ष सहित पर्वत उखाड़-उखाड़कर ढाह रहे हैं। कितने जाम्बवन्त दूर से ही मंत्र दे रहे हैं। कितने नल-नील पानी में पत्थर तैरा रहे हैं, पर रावण है कि अविचल है! किंतु आप विश्वास रखें कि राम विजयी होकर रहेंगे! ये वे पुराने धनुर्धर राजकुमार नहीं है, जिनके दिन के चौबीस घंटों में से सोलह घंटे मधुर मुस्कान में ही बरबाद हो जाते थे, जिनकी शक्ति शील में ही समाप्त हो जाती थी और जिनमें अपने से कोई आग न थी, जिन्दगी का अट्टाहास नहीं था, जो-कुछ भी ठंडा-सा उत्साह था, वह एक कमजोर भले मानस का मजबूत लोगों में पड़ने के कारण जबर्दस्ती उमड़ा हुआ उत्साह था। अब बताइये सम्पादक जी, आप विजयदशमी पर ऐसा लेख पसन्द करेंगे?
खैर, आपको अगर यह नहीं रुचता, तो कहिए तो मैं आध्यात्मिक व्याख्या प्रस्तुत करूँ। प्रार्थना-सभा में आपको ले चलूँ और आपको अल्लोपनिषद् की पुण्यवाणी के पाठ के साथ-साथ ‘ सखा धरममय अस रथ जाके। रिपु रन जीति सकहिं नहिं ताके।‘ से शुरु करके राम के विजय की मर्म कथा सुनाऊँ। राम तो अपने ही मन के सत्य हैं, जो निरंतर असत्य से अहिंसात्मक युद्ध या सविनय असहयोग करते रहते हैं। रावण किसी लंका का निवासी या किसी जात का अगुआ नहीं था, वैसा कहना इतिहास के साथ हिंसा करना होगा। रावण निश्चय ही हिंसा का और असत्य का प्रतीक है। उसने क्षमा की संतति का अपहरण किया था, राम उसे छुड़ाने गए थे। दूसरे शब्दों में राम भू-दान की पदयात्रा पर निकले थे। वे संचयशील, हिंसापरायण और असत्यपरायण सत्ताधारों से भू-दान मांगने निकले थे। वास्तव में बानर भालुओं की कोई सेना उनके साथ नहीं थी। लम्बी-लम्बी छड़ी लिए वह अत्यंत सात्विक आहार-विहार पर जीवन यापन करने वाले व्रतियों का समुदाय था, जो एक धावनशील सत्य के पीछे चल रहा था। राम-रावण युद्ध तो मानसिक संघर्ष का ही एक रूपक है, जिसे प्राचीन समय के युद्दपरायण युग के कवि ने लोगों को समझाने के लिए गढ़ा था। यह मानसिक संघर्ष प्रत्येक व्यक्ति के मन की लंका में छिड़ता है, सद् वृत्तियां असद् वृत्तियों पर विजय पाने के लिए विनय का सेतु बाँधती हैं; सम्पति की आकांक्षा को भस्म कर डालती है और असद्वृत्तियों के पाश में जकड़ी हुई शान्ति का उद्धार करती है। इस प्रकार राम की रावण-विजय तत्वतः हृदय परिवर्तन की ही काव्यात्मक परिभाषा है। दशरथ दसों इन्द्रियों के समूह हैं, कौशल्या कुशलमतिता है। वैदेही अकायिक साधना है। मारुति पंच-प्राणों के अधिष्ठाता हैं, सौमित्र विश्वमैत्री के स्वरूप हैं, भरत करुणा के आकार हैं, शत्रुघ्न हिंसात्मक लगते हुये भी उपेक्षा वृत्ति के ही प्रतिमान हैं, और राम मुदितावृत्ति के उत्कर्ष हैं। कुम्भकर्ण जड़ता है, रावण हिंसा है, विभीषण अनुक्रोश है, मन्दोदरी दया है और मेघनाथ क्रोध है। आप शायद घबराने लगे हों कि यह रूपक अभी कहीं और दूर तक खींचा जाएगा, पर आप धैर्य रखें, मुझे स्वयं इसके आगे जाने का धैर्य नहीं है। बहुत ही तितिक्षापूर्वक मैने यह व्याख्या अपने घर से दस कदम पर रहने वाले एक श्रीरामपार्षद सुजन के सुग्रीव अर्थात सुकंठ से सुनी है।
लीजिए आप तो जिद करते हैं कि मुझे वह सब नहीं चाहिये, जैसा मूर्ख-से-मूर्ख और गंवार-से-गंवार आदमी भी विजयदशमी त्योहार मनाता है, वैसा ही लिखो! उस मूर्ख और गंवार का अस्तित्व ही कहां है? बंगाल में गांव-गांव आप जो जगद्धात्री का जुलूस देखा करते थे, अब वहां नये-नये स्वाँग रचे जाने लगे हैं,“ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कमलिनी। दुर्गा शिवा क्षमा धात्री स्वधा स्वाहा नमोस्तुते। सर्वमंगलामांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यम्बिके गौरि नारायणि नमोस्तुते।।“ इन वन्दना के श्लोकों से जिस देवी का ध्यान किया जाता है, वह अब चंडी हो गयी है, उसे प्रसादित करने वाला कोई शिव नहीं। शक्ति जब अपरूप हो जाती है, तब वह काबू में नहीं रहती, वह साधक को ही खाने दौड़ती है। तब केवल राम-नाम का ही भरोसा बच रहता है, परन्तु राम-नाम का कीर्तन तो अष्टायाम तक होता है, शिव क्यों नहीं जगते, शक्ति क्यों नहीं उनके बस में आकर प्रसन्न होती? कारण आप जाकर उन बौड़मों से पूछिये, जो कहते हैं, नाम बिना रूप के अर्थशून्य है। राम-नाम कीर्तन करते हो, पर राम को भूल गये, राम के स्वरूप को भूल गये, शिव कहां से उदय होंगे? आप फिर कहेंगे, गाँव-गाँव दशहरा के दिन बागों में बगीचों से उड़ा-उड़ाकर नीलकंठ दिखाए जाते हैं, वे ही तो शिव के प्रतिनिधि हैं। गाँव-गाँव नये नवांकुर विजयचिन्ह के रूप में शिखा से बांधे जाते हैं, वही तो राम की विजय का अनुध्यान है और रामलीला की और सब कारवाई पूरी हो न हो; पर पुआल का और रद्दी कागज का रावण तो फूँका ही जाता है। इससे अधिक क्या हो सकता है? दस-पांच चेहरे लगाकर हुंकारते हुए कुछ जवान भी बानर और दैत्य बनकर उछल-कूद करते हैं, इससे अधिक राम के स्वरूप का कौन-सा चिंतन होगा ? इतने पर भी आपको प्रतीति नहीं होती, तो जब राम, सीता और लक्ष्मण चढ़ाए हुए बतासों का भोग लगाकर मेले में घूमने लगते हैं, तब तो आपकी दिलजमाई हो ही जानी चाहिये।
पर सम्पादक जी, गँवार आदमी तो हक्का-बक्का होकर देख रहा है कि कहीं-कहीं राम के चित्र जलाये जा रहे हैं क्योंकि वे द्रविड संस्कृति पर धावा बोलने वाली आर्य संस्कृति के प्रतिनिघि हैं। कहीं-कहीं राम दशरथ को तरेर रहे हैं, क्योंकि उन्होंने एक नहीं, दो नहीं, तीन विवाह किये हैं। ये राम सीता को मना रहे हैं कि तुम अयोद्धा लौट चलो, क्योकि नारी का मूल्य चढ़ गया है। ये राम निषादराज के चरण पखार रहे हैं, क्योंकि आदिवासियों की उपेक्षा का उन्हें प्रतिकार करना है। ये राम मेघनाद के आगे रो रहे हैं, क्योंकि तुमने लक्ष्मण को मारा तो अब मुझे भी मारो, क्योंकि ‘ मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वती समाः‘ का अर्थ-विपर्यय हो गया है। ये राम वशिष्ठ को राजनीति समझा रहे हैं कि रामराज्य में वर्गहीन समाज की व्यवस्था होनी चाहिये और ये राम धोबी के द्वार पर अनशन कर रहे हैं कि वह सीता के प्रति कहे गये आक्षेप-वचन वापस ले ले। उस हतबुद्धि गँवार की तो कल्पना ही उजड़ने लगती है। वह कैसे अपने मन के छोटे से रामलीला मैदान में इन विरोधी प्रदर्शनों को अपने मनोधिष्ठित लीला-रूपों के साथ बिठलाये? यह उसके जीवन-मरण का प्रश्न है, वह जिसे साध्य समझता है, उसे साधन मानने को वह कैसे अपने को विवश करे? वह जिसे जाति, देश और समय से परे मानता है, उसे जातीय, प्रादेशिक और समयापेक्षी आंदोलनों में कैसे घसीटे?
मैं तो किसी भी प्रकार इस सनातन गँवार भारतवासी को सुराह पर नहीं ला सकता, क्योंकि बहुत कुछ पढ़ने-लिखने के बावजूद आपको बहुत विश्रब्ध जानकर आपसे यह स्वीकार करता हूँ कि मेरा मन भी कुछ-कुछ गँवार है। कृपा करके इसे अपने तक ही रखें। मैं स्वयं नये मूल्यों के पैमाने पर हर एक पुरानी वस्तु की पैमाइश करने में असमर्थ हूँ। वर्षा की तरह बावना रसोद्रेक का परिमापन करना मेरे वश की बात नहीं हो पायी। इसी से स सुवस्तीर्ण महान देश के असंख्य जनों में युगों से जिस भावना ने राम का कार ग्रहण किया, उसे बहाना मेरे बूते की बात नहीं और उस भावना को अपनी बौद्धिक इंजिनियरी के प्रताप से बाँधकर नया मोड़ देना, इसमें से नयी प्रणालियाँ निकालना या उसमें से नयी शक्ति निकालना और उनसे नये कारखाने बनाने की योजना बनाना तो मेरी कल्पना के भी परे है। मैं तो केवल यही अनुभव कर सकता हूँ कि राम की विजय अभी कल ही हुयी है, सीता हमारे देखते-देखते हरी गयी है, रावम हमारे देखते-देखते धाराशायी हुआ है, चौदह वर्षों के वनवास के अनन्तर अपनी नगरी में लौटे हुये राम के स्वागत समारोह में मैं स्वयं सम्मिलित रहा हूं। मेरे ही मन में रघुबीर को रतहीन देखकर पीर उपजी है और मुझी को एक धनुर्धर ने शान्तवाणी में मृदुल कंठ से समझाया है कि भय न करो, मेरा रथ धर्ममय है, इस धर्मरथ पर ही मुझे चढाओ। मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि यह सारा जग ही सियाराममय है, इसलिये राम की विजय-यात्रा में मैं चलता हूँ। राम के तिलक में मेरे हाथ का अँगूठा चंदनयुक्त हो उठता है। सीता की अग्नि-परीक्षा में मेरी सुचिता ही परीक्षित होती है। लक्ष्मण के ओज में अपना ही सात्विक आक्रोश बोलता है। भरत की आद्रता में मैं स्वयं ही पिघलता हूँ और गुरू के अनुरोध में मैं ही मचलता हूँ!
तो सम्पादकजी, क्या यह सब असत्य है? मेरे जैसे असंख्य अबोध जन जिस सत्य के आलोक पर ही जाड़े की रात काट रहे हों, क्या वह सत्य कृत्रिम है? क्या यह प्रकाश तिमिर है? आप ही बताइये! और आप चाहते हैं कि मैं विजयादशमी पर लेख लिखूँ।
विजयानन्द दूबे और चिदानन्द चौबे का युग रहता, तो मैं आपसे कुछ और खरी-खरी बातें करता, पर मैं तो ग्रंथिल अभिव्यक्ति के युग में पल रहा हूँ। आपको धन्यवाद मात्र दे सकता हूँ कि आपने मुझे इस लेख के योग्य समझने की दया की; पर मैं विवश हूँ, मुझसे लेख नहीं बन नहीं पड़ेगा। जब मसाला ही नहीं है, तब विजया का अवतरण कैसे कराऊँ! शकर्राखंड पात्र में नीबू निचोड़कर कैसा लगेगा? क्या आपानक प्रस्तुत करूँ? वह क्या आपको रुचेगा। अतः क्षमा करें। सादर प्रणाम लें!
एक राजा निरबंसिया थे," माँ कहानी सुनाया करती थीं। उनके आसपास ही चार-पाँच बच्चे अपनी मुट्ठियों में फूल दबाए कहानी समाप्त होने पर गौरों पर चढ़ाने के लिए उत्सुक-से बैठ जाते थे। आटे का सुन्दर-सा चौक पुरा होता, उसी चौक पर मिट्टी की छह गौरें रखी जातीं, जिनमें से ऊपरवाली के बिन्दिया और सिन्दूर लगता, बाकी पाँचों नीचे दबी पूजा ग्रहण करती रहतीं। एक ओर दीपक की बाती स्थिर-सी जलती रहती और मंगल-घट रखा रहता, जिस पर रोली से सतिया बनाया जाता। सभी बैठे बच्चों के मुख पर फूल चढ़ाने की उतावली की जगह कहानी सुनने की सहज स्थिरता उभर आती।
"एक राजा निरबंसिया थे," माँ सुनाया करती थीं, "उनके राज में बड़ी खुशहाली थी। सब वरण के लोग अपना-अपना काम-काज देखते थे। कोई दुखी नहीं दिखाई पड़ता था। राजा के एक लक्ष्मी-सी रानी थी, चंद्रमा-सी सुन्दर और राजा को बहुत प्यारी। राजा राज-काज देखते और सुख-से रानी के महल में रहते।"
मेरे सामने मेरे ख्यालों का राजा था, राजा जगपती! तब जगपती से मेरी दाँतकाटी दोस्ती थी, दोनों मिडिल स्कूल में पढ़ने जाते। दोनों एक-से घर के थे, इसलिए बराबरी की निभती थी।
मैं मैट्रिक पास करके एक स्कूल में नौकर हो गया और जगपती कस्बे के ही वकील के यहाँ मुहर्रिर। जिस साल जगपती मुहर्रिर हुआ, उसी वर्ष पास के गाँव में उसकी शादी हुई, पर ऐसी हुई कि लोगों ने तमाशा बना देना चाहा। लड़कीवालों का कुछ विश्वास था कि शादी के बाद लड़की की विदा नहीं होगी।
ब्याह हो जाएगा और सातवीं भांवर तब पड़ेगी, जब पहली विदा की सायत होगी और तभी लड़की अपनी ससुराल जाएगी। जगपती की पत्नी थोड़ी-बहुत पढ़ी-लिखी थी, पर घर की लीक को कौन मेटे! बारात बिना बहू के वापस आ गई और लड़केवालों ने तय कर लिया कि अब जगपती की शादी कहीं और कर दी जाएगी, चाहें कानी-लूली से हो, पर वह लड़की अब घर में नहीं आएगी। लेकिन साल खतम होते-होते सब ठीक-ठाक हो गया। लड़कीवालों ने माफी माँग ली और जगपती की पत्नी अपनी ससुराल आ गई।
जगपती को जैसे सब कुछ मिल गया और सास ने बहू की बलाइयाँ लेकर घर की सब चाबियाँ सौंप दीं, गृहस्थी का ढंग-बार समझा दिया। जगपती की माँ न जाने कब से आस लगाए बैठीं थीं। उन्होंने आराम की साँस ली। पूजा-पाठ में समय कटने लगा, दोपहरियाँ दूसरे घरों के आँगन में बीतने लगीं। पर साँस का रोग था उन्हें, सो एक दिन उन्होंने अपनी अन्तिम घड़ियाँ गिनते हुए चंदा को पास बुलाकर समझाया था - "बेटा, जगपती बड़े लाड़-प्यार का पला है। जब से तुम्हारे ससुर नहीं रहे तब से इसके छोटे-छोटे हठ को पूरा करती रही हूँ अब तुम ध्यान रखना।" फिर रुककर उन्होंने कहा था, "जगपती किसी लायक हुआ है, तो रिश्तेदारों की आँखों में करकने लगा है। तुम्हारे बाप ने ब्याह के वक्त नादानी की, जो तुम्हें विदा नहीं किया। मेरे दुश्मन देवर-जेठों को मौका मिल गया। तूमार खड़ा कर दिया कि अब विदा करवाना नाक कटवाना है। जगपती का ब्याह क्या हुआ, उन लोगों की छाती पर साँप लोट गया। सोचा, घर की इज्जत रखने की आड़ लेकर रंग में भंग कर दें। अब बेटा, इस घर की लाज तुम्हारी लाज है। आज को तुम्हारे ससुर होते, तो भला..." कहते कहते माँ की आँखों में आँसू आ गए, और वे जगपती की देखभाल उसे सौंपकर सदा के लिए मौन हो गई थीं।
एक अरमान उनके साथ ही चला गया कि जगपती की सन्तान को, चार बरस इन्तज़ार करने के बाद भी वे गोद में न खिला पाईं। और चंदा ने मन में सब्र कर लिया था, यही सोचकर कि कुल-देवता का अंश तो उसे जीवन-भर पूजने को मिल गया था। घर में चारों तरफ जैसे उदारता बिखरी रहती, अपनापा बरसता रहता। उसे लगता, जैसे घर की अँधेरी, एकान्त कोठरियों में यह शान्त शीतलता है जो उसे भरमा लेती है। घर की सब कुंडियों की खनक उसके कानों में बस गई थी, हर दरवाजे की चरमराहट पहचान बन गई थी।
"एक रोज राजा आखेट को गए," माँ सुनाती थीं, "राजा आखेट को जाते थे, तो सातवें रोज जरूर महल में लौट आते थे। पर उस दफा जब गए, तो सातवाँ दिन निकल गया, पर राजा नहीं लौटे। रानी को बड़ी चिन्ता हुई। रानी एक मंत्री को साथ लेकर खोज में निकलीं।"
और इसी बीच जगपती को रिश्तेदारी की एक शादी में जाना पड़ा। उसके दूर रिश्ते के भाई दयाराम की शादी थी। कह गया था कि दसवें दिन जरूर वापस आ जाएगा। पर छठे दिन ही खबर मिली कि बारात घर लौटने पर दयाराम के घर डाका पड़ गया। किसी मुखबिर ने सारी खबरें पहुँचा दी थीं कि लड़कीवालों ने दयाराम का घर सोने-चाँदी से पाट दिया है आखिर पुश्तैनी जमींदार की इकलौती लड़की थी। घर आए मेहमान लगभग विदा हो चुके थे। दूसरे रोज जगपती भी चलनेवाला था, पर उसी रात डाका पड़ा। जवान आदमी, भला खून मानता है! डाकेवालों ने जब बन्दूकें चलाई, तो सबकी घिग्घी बँध गई। पर जगपती और दयाराम ने छाती ठोककर लाठियाँ उठा लीं। घर में कोहराम मच गया। फिर सन्नाटा छा गया। डाकेवाले बराबर गोलियाँ दाग रहे थे। बाहर का दरवाजा टूट चुका था। पर जगपती ने हिम्मत बढ़ाते हुए हाँक लगाई, "ये हवाई बन्दूकें इन तेल-पिलाई लाठियों का मुकाबला नहीं कर पाएँगी, जवानो।"
पर दरवाजे तड़-तड़ टूटते रहे, और अन्त में एक गोली जगपती की जाँघ को पार करती निकल गई, दूसरी उसकी जाँघ के ऊपर कूल्हे में समा कर रह गई। चंदा रोती-कलपती और मनौतियाँ मानती जब वहाँ पहुँची, तो जगपती अस्पताल में था। दयाराम के थोड़ी चोट आई थी। उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी। जगपती की देखभाल के लिए वहीं अस्पताल में मरीजों के रिश्तेदारों के लिए जो कोठरियाँ बनीं थीं, उन्हीं में चंदा को रुकना पड़ा। कस्बे के अस्पताल से दयाराम का गाँव चार कोस पड़ता था। दूसरे-तीसरे वहाँ से आदमी आते-जाते रहते, जिस सामान की जरूरत होती, पहुँचा जाते।
पर धीरे-धीरे उन लोगों ने भी खबर लेना छोड़ दिया। एक दिन में ठीक होनेवाला घाव तो था नहीं। जाँघ की हड्डी चटख गई थी और कूल्हे में ऑपरेशन से छ: इंच गहरा घाव था।
कस्बे का अस्पताल था। कंपाउंडर ही मरीजों की देखभाल रखते। बड़ा डॉक्टर तो नाम के लिए था या कस्बे के बड़े आदमियों के लिए। छोटे लोगों के लिए तो कम्पोटर साहब ही ईश्वर के अवतार थे। मरीजों की देखभाल करनेवाले रिश्तेदारों की खाने-पीने की मुश्किलों से लेकर मरीज की नब्ज़ तक सँभालते थे। छोटी-सी इमारत में अस्पताल आबाद था। रोगियों की सिर्फ छ:-सात खाटें थी। मरीजों के कमरे से लगा दवा बनाने का कमरा था, उसी में एक ओर एक आरामकुर्सी थी और एक नीची-सी मेज। उसी कुर्सी पर बड़ा डॉक्टर आकर कभी-कभार बैठता था, नहीं तो बचनसिंह कंपाउंडर ही जमे रहते। अस्पताल में या तो फौजदारी के शहीद आते या गिर-गिरा के हाथ-पैर तोड़ लेनेवाले एक-आध लोग। छठे-छमासे कोई औरत दिख गई तो दीख गई, जैसे उन्हें कभी रोग घेरता ही नहीं था। कभी कोई बीमार पड़ती तो घरवाले हाल बताके आठ-दस रोज की दवा एक साथ ले जाते और फिर उसके जीने-मरने की खबर तक न मिलती।
उस दिन बचनसिंह जगपती के घाव की पट्टी बदलने आया। उसके आने में और पट्टी खोलने में कुछ ऐसी लापरवाही थी, जैसे गलत बँधी पगड़ी को ठीक से बाँधने के लिए खोल रहा हो। चंदा उसकी कुर्सी के पास ही साँस रोके खड़ी थी। वह और रोगियों से बात करता जा रहा था। इधर मिनट-भर को देखता, फिर जैसे अभ्यस्त-से उसके हाथ अपना काम करने लगते। पट्टी एक जगह खून से चिपक गई थी, जगपती बुरी तरह कराह उठा। चंदा के मुँह से चीख निकल गई। बचनसिंह ने सतर्क होकर देखा तो चंदा मुख में धोती का पल्ला खोंसे अपनी भयातुर आवाज दबाने की चेष्टा कर रही थी। जगपती एकबारगी मछली-सा तड़पकर रह गया। बचनसिंह की उँगलियाँ थोड़ी-सी थरथराई कि उसकी बाँह पर टप-से चंदा का आँसू चू पड़ा।
बचनसिंह सिहर-सा गया और उसके हाथों की अभ्यस्त निठुराई को जैसे किसी मानवीय कोमलता ने धीरे-से छू दिया। आहों, कराहों, दर्द-भरी चीखों और चटखते शरीर के जिस वातावरण में रहते हुए भी वह बिल्कुल अलग रहता था, फोड़ों को पके आम-सा दबा देता था, खाल को आलू-सा छील देता था उसके मन से जिस दर्द का अहसास उठ गया था, वह उसे आज फिर हुआ और वह बच्चे की तरह फूँक-फूँककर पट्टी को नम करके खोलने लगा। चंदा की ओर धीरे-से निगाह उठाकर देखते हुए फुसफुसाया, "च्...च्... रोगी की हिम्मत टूट जाती है ऐसे।"
पर जैसे यह कहते-कहते उसका मन खुद अपनी बात से उचट गया। यह बेपरवाही तो चीख और कराहों की एकरसता से उसे मिली थी, रोगी की हिम्मत बढ़ाने की कर्तव्यनिष्ठा से नहीं। जब तक वह घाव की मरहम-पट्टी करता रहा, तब तक किन्हीं दो आँखों की करूणा उसे घेरे रही। और हाथ धोते समय वह चंदा की उन चूड़ियों से भरी कलाइयों को बेझिझक देखता रहा, जो अपनी खुशी उससे माँग रही थीं। चंदा पानी डालती जा रही थी और बचनसिंह हाथ धोते-धोते उसकी कलाइयों, हथेलियों और पैरों को देखता जा रहा था। दवाखाने की ओर जाते हुए उसने चंदा को हाथ के इशारे से बुलाकर कहा, "दिल छोटा मत करना जाँघ का घाव तो दस रोज में भर जाएगा, कूल्हे का घाव कुछ दिन जरूर लेगा। अच्छी से अच्छी दवाई दूँगा। दवाइयाँ तो ऐसी हैं कि मुर्दे को चंगा कर दें। पर हमारे अस्पताल में नहीं आतीं, फिर भी।" "तो किसी दूसरे अस्पताल से नहीं आ सकतीं वो दवाइयाँ?" चंदा ने पूछा। "आ तो सकती हैं, पर मरीज को अपना पैसा खरचना पड़ता है उनमें।" बचनसिंह ने कहा।
चंदा चुप रह गई तो बचनसिंह के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा, "किसी चीज की जरूरत हो तो मुझे बताना। रही दवाइयाँ, सो कहीं न कहीं से इन्तजाम करके ला दूँगा। महकमे से मँगाएँगे, तो आते-अवाते महीनों लग जाएँगे। शहर के डॉक्टर से मँगवा दूँगा। ताकत की दवाइयों की बड़ी जरूरत है उन्हें। अच्छा, देखा जाएगा।" कहते-कहते वह रुक गया। चंदा से कृतज्ञता भरी नजरों से उसे देखा और उसे लगा जैसे आँधी में उड़ते पत्ते को कोई अटकाव मिल गया हो। आकर वह जगपती की खाट से लगकर बैठ गई। उसकी हथेली लेकर वह सहलाती रही। नाखूनों को अपने पोरों से दबाती रही।
धीरे-धीरे बाहर अँधेरा बढ़ चला। बचनसिंह तेल की एक लालटेन लाकर मरीज़ों के कमरे के एक कोने में रख गया। चंदा ने जगपती की कलाई दाबते-दाबते धीरे से कहा, "कंपाउंडर साहब कह रहे थे।" और इतना कहकर वह जगपती का ध्यान आकृष्ट करने के लिए चुप हो गई। "क्या कह रहे थे?" जगपती अनमने स्वर में बोला। "कुछ ताकत की दवाइयाँ तुम्हारे लिए जरूरी हैं!" "मैं जानता हूँ।" "पर।" "देखो चंदा, चादर के बराबर ही पैर फैलाए जा सकते हैं। हमारी औकात इन दवाइयों की नहीं है। "औकात आदमी की देखी जाती है कि पैसे की, तुम तो।" "देखा जाएगा।" "कंपाउंडर साहब इन्तजाम कर देंगे, उनसे कहूँगी मैं।" "नहीं चंदा, उधारखाते से मेरा इलाज नहीं होगा च़ाहे एक के चार दिन लग जाएँ।" "इसमें तो।" "तुम नहीं जानतीं, कर्ज कोढ़ का रोग होता है, एक बार लगने से तन तो गलता ही है, मन भी रोगी हो जाता है।" "लेकिन ..." कहते-कहते वह रुक गई। जगपती अपनी बात की टेक रखने के लिए दूसरी ओर मुँह घुमाकर लेटा रहा। और तीसरे रोज जगपती के सिरहाने कई ताकत की दवाइयाँ रखी थीं, और चंदा की ठहरने वाली कोठरी में उसके लेटने के लिए एक खाट भी पहुँच गई थी। चंदा जब आई, तो जगपती के चेहरे पर मानसिक पीड़ा की असंख्य रेखाएँ उभरी थीं, जैसे वह अपनी बीमारी से लड़ने के अलावा स्वयं अपनी आत्मा से भी लड़ रहा हो चंदा की नादानी और स्नेह से भी उलझ रहा हो और सबसे ऊपर सहायता करनेवाले की दया से जूझ रहा हो।
चंदा ने देखा तो यह सब सह न पाई। उसके जी में आया कि कह दे, क्या आज तक तुमने कभी किसी से उधार पैसे नहीं लिए? पर वह तो खुद तुमने लिए थे और तुम्हें मेरे सामने स्वीकार नहीं करना पड़ा था। इसीलिए लेते झिझक नहीं लगी, पर आज मेरे सामने उसे स्वीकार करते तुम्हारा झूठा पौरूष तिलमिलाकर जाग पड़ा है। पर जगपती के मुख पर बिखरी हुई पीड़ा में जिस आदर्श की गहराई थी, वह चंदा के मन में चोर की तरह घुस गई, और बड़ी स्वाभाविकता से उसने माथे पर हाथ फेरते हुए कहा, "ये दवाइयाँ किसी की मेहरबानी नहीं हैं। मैंने हाथ का कड़ा बेचने को दे दिया था, उसी में आई हैं।"
"मुझसे पूछा तक नहीं और..." जगपती ने कहा और जैसे खुद मन की कमजोरी को दाब गया - कड़ा बेचने से तो अच्छा था कि बचनसिंह की दया ही ओढ़ ली जाती। और उसे हल्का-सा पछतावा भी था कि नाहक वह रौ में बड़ी-बड़ी बातें कह जाता है, ज्ञानियों की तरह सीख दे देता है।
और जब चंदा अँधेरा होते उठकर अपनी कोठरी में सोने के लिए जाने को हुई, तो कहते-कहते यह बात दबा गई कि बचनसिंह ने उसके लिए एक खाट का इन्तजाम भी कर दिया है। कमरे से निकली, तो सीधी कोठरी में गई और हाथ का कड़ा लेकर सीधे दवाखाने की ओर चली गई, जहाँ बचनसिंह अकेला डॉक्टर की कुर्सी पर आराम से टाँगें फैलाए लैम्प की पीली रोशनी में लेटा था। जगपती का व्यवहार चंदा को लग गया था, और यह भी कि वह क्यों बचनसिंह का अहसान अभी से लाद ले, पति के लिए जेवर की कितनी औकात है। वह बेधड़क-सी दवाखाने में घुस गई। दिन की पहचान के कारण उसे कमरे की मेज-कुर्सी और दवाओं की अलमारी की स्थिति का अनुमान था, वैसे कमरा अँधेरा ही पड़ा था, क्योंकि लैम्प की रोशनी केवल अपने वृत्त में अधिक प्रकाशवान होकर कोनों के अंधेरे को और भी घनीभूत कर रही थी। बचनसिंह ने चंदा को घुसते ही पहचान लिया। वह उठकर खड़ा हो गया। चंदा ने भीतर कदम तो रख दिया, पर सहसा सहम गई, जैसे वह किसी अंधेरे कुएँ में अपने-आप कूद पड़ी हो, ऐसा कुआँ, जो निरन्तर पतला होता गया है और जिसमें पानी की गहराई पाताल की पर्तों तक चली गई हो, जिसमें पड़कर वह नीचे धँसती चली जा रही हो, नीचे अँधेरा एकाँत घुटन पाप!
बचनसिंह अवाक् ताकता रह गया और चंदा ऐसे वापस लौट पड़ी, जैसे किसी काले पिशाच के पंजों से मुक्ति मिली हो। बचनसिंह के सामने क्षण-भर में सारी परिस्थिति कौंध गई और उसने वहीं से बहुत संयत आवाज में जबान को दबाते हुए जैसे वायु में स्पष्ट ध्वनित कर दिया - "चंदा!" वह आवाज इतनी बे-आवाज थी और निरर्थक होते हुए भी इतनी सार्थक थी कि उस खामोशी में अर्थ भर गया। चंदा रुक गई। बचनसिंह उसके पास जाकर रुक गया। सामने का घना पेड़ स्तब्ध खड़ा था, उसकी काली परछाई की परिधि जैसे एक बार फैलकर उन्हें अपने वृत्त में समेट लेती और दूसरे ही क्षण मुक्त कर देती। दवाखाने का लैम्प सहसा भभककर रुक गया और मरीज़ों के कमरे से एक कराह की आवाज दूर मैदान के छोर तक जाकर डूब गई। चंदा ने वैसे ही नीचे ताकते हुए अपने को संयत करते हुए कहा, "यह कड़ा तुम्हें देने आई थी।" "तो वापस क्यों चली जा रही थीं?" चंदा चुप। और दो क्षण रुककर उसने अपने हाथ का सोने का कड़ा धीरे-से उसकी ओर बढ़ा दिया, जैसे देने का साहस न होते हुए भी यह काम आवश्यक था। बचनसिंह ने उसकी सारी काया को एक बार देखते हुए अपनी आँखें उसके सिर पर जमा दीं, उसके ऊपर पड़े कपड़े के पार नरम चिकनाई से भरे लम्बे-लम्बे बाल थे, जिनकी भाप-सी महक फैलती जा रही थी। वह धीरे-धीरे से बोला, "लाओ।" चंदा ने कड़ा उसकी ओर बढ़ा दिया। कड़ा हाथ में लेकर वह बोला, "सुनो।" चंदा ने प्रश्न-भरी नजरें उसकी ओर उठा दी। उनमें झाँकते हुए, अपने हाथ से उसकी कलाई पकड़ते हुए उसने वह कड़ा उसकी कलाई में पहना दिया। चंदा चुपचाप कोठरी की ओर चल दी और बचनसिंह दवाखाने की ओर।
कालिख बुरी तरह बढ़ गई थी और सामने खड़े पेड़ की काली परछाई गहरी पड़ गई थी। दोनों लौट गए थे। पर जैसे उस कालिख में कुछ रह गया था, छूट गया था। दवाखाने का लैम्प जो जलते-जलते एक बार भभका था, उसमें तेल न रह जाने के कारण बत्ती की लौ बीच से फट गई थी, उसके ऊपर धुएँ की लकीरें बल खाती, साँप की तरह अंधेरे में विलीन हो जाती थीं।
सुबह जब चंदा जगपती के पास पहुँची और बिस्तर ठीक करने लगी तो जगपती को लगा कि चंदा बहुत उदास थी। क्षण-क्षण में चंदा के मुख पर अनगिनत भाव आ-जा रहे थे, जिनमें असमंजस था, पीड़ा थी और निरीहता थी। कोई अदृश्य पाप कर चुकने के बाद हृदय की गहराई से किए गए पश्चाताप जैसी धूमिल चमक?
"रानी मंत्री के साथ जब निराश होकर लौटीं, तो देखा, राजा महल में उपस्थित थे। उनकी खुशी का ठिकाना न रहा।" माँ सुनाया करती थीं, "पर राजा को रानी का इस तरह मंत्री के साथ जाना अच्छा नहीं लगा। रानी ने राजा को समझाया कि वह तो केवल राजा के प्रति अटूट प्रेम के कारण अपने को न रोक सकी। राजा-रानी एक-दूसरे को बहुत चाहते थे। दोनों के दिलो में एक बात शूल-सी गड़ती रहती कि उनके कोई सन्तान न थी राजवंश का दीपक बुझने जा रहा था। सन्तान के अभाव में उनका लोक-परलोक बिगड़ा जा रहा था और कुल की मर्यादा नष्ट होने की शंका बढ़ती जा रही थी।"
दूसरे दिन बचनसिंह ने मरीजों की मरहम-पट्टी करते वक्त बताया था कि उसका तबादला मैनपुरी के सदर अस्पताल में हो गया है और वह परसों यहाँ से चला जाएगा। जगपती ने सुना, तो उसे भला ही लगा। आए दिन रोग घेरे रहते हैं, बचनसिंह उसके शहर के अस्पताल में पहुँचा जा रहा है, तो कुछ मदद मिलती ही रहेगी। आखिर वह ठीक तो होगा ही और फिर मैनपुरी के सिवा कहाँ जाएगा? पर दूसरे ही क्षण उसका दिल अकथ भारीपन से भर गया। पता नहीं क्यों, चंदा के अस्तित्व का ध्यान आते ही उसे इस सूचना में कुछ ऐसे नुकीले काँटे दिखाई देने लगे, जो उसके शरीर में किसी भी समय चुभ सकते थे, जरा-सा बेखबर होने पर बींध सकते थे। और तब उसके सामने आदमी के अधिकार की लक्ष्मण-रेखाएँ धुएँ की लकीर की तरह काँपकर मिटने लगीं और मन में छुपे सन्देह के राक्षस बाना बदल योगी के रूप में घूमने लगे।
और पन्द्रह-बीस रोज बाद जब जगपती की हालत सुधर गई, तो चंदा उसे लेकर घर लौट आई। जगपती चलने-फिरने लायक हो गया था। घर का ताला जब खोला, तब रात झुक आई थी। और फिर उनकी गली में तो शाम से ही अँधेरा झरना शुरू हो जाता था। पर गली में आते ही उन्हें लगा, जैसे कि वनवास काटकर राजधानी लौटे हों। नुक्कड़ पर ही जमुना सुनार की कोठरी में सुरही फिंक रही थी, जिसके दराजदार दरवाजों से लालटेन की रोशनी की लकीर झाँक रही थी और कच्ची तम्बाकू का धुआँ रुँधी गली के मुहाने पर बुरी तरह भर गया था। सामने ही मुंशीजी अपनी जिंगला खटिया के गड्ढ़े में, कुप्पी के मद्धिम प्रकाश में खसरा-खतौनी बिछाए मीजान लगाने में मशगूल थे। जब जगपती के घर का दरवाजा खड़का, तो अंधेरे में उसकी चाची ने अपने जँगले से देखा और वहीं से बैठे-बैठे अपने घर के भीतर ऐलान कर दिया - "राजा निरबंसिया अस्पताल से लौट आए कुलमाँ भी आई हैं।"
ये शब्द सुनकर घर के अँधेरे बरोठे में घुसते ही जगपती हाँफकर बैठ गया, झुँझलाकर चंदा से बोला, "अंधेरे में क्या मेरे हाथ-पैर तुड़वाओगी? भीतर जाकर लालटेन जला लाओ न।" "तेल नहीं होगा, इस वक्त जरा ऐसे ही काम।" "तुम्हारे कभी कुछ नहीं होगा न तेल न।" कहते-कहते जगपती एकदम चुप रह गया। और चंदा को लगा कि आज पहली बार जगपती ने उसके व्यर्थ मातृत्व पर इतनी गहरी चोट कर दी, जिसकी गहराई की उसने कभी कल्पना नहीं की थी। दोनों खामोश, बिना एक बात किए अन्दर चले गए। रात के बढ़ते सन्नाटे में दोनों के सामने दो बातें थीं-- जगपती के कानों में जैसे कोई व्यंग्य से कह रहा था - राजा निरबंसिया अस्पताल से आ गए! और चंदा के दिल में यह बात चुभ रही थी - तुम्हारे कभी कुछ नहीं होगा।
और सिसकती-सिसकती चंदा न जाने कब सो गई। पर जगपती की आँखों में नींद न आई। खाट पर पड़े-पड़े उसके चारों ओर एक मोहक, भयावना-सा जाल फैल गया। लेटे-लेटे उसे लगा, जैसे उसका स्वयं का आकार बहुत क्षीण होता-होता बिन्दु-सा रह गया, पर बिन्दु के हाथ थे, पैर थे और दिल की धड़कन भी। कोठरी का घुटा-घुटा-सा अँधियारा, मटमैली दीवारें और गहन गुफाओं-सी अलमारियाँ, जिनमें से बार-बार झाँककर देखता था और वह सिहर उठता था फिर जैसे सब कुछ तब्दील हो गया हो। उसे लगा कि उसका आकार बढ़ता जा रहा है, बढ़ता जा रहा है। वह मनुष्य हुआ, लम्बा-तगड़ा-तन्दुरूस्त पुरूष हुआ, उसकी शिराओं में कुछ फूट पड़ने के लिए व्याकुलता से खौल उठा। उसके हाथ शरीर के अनुपात से बहुत बड़े, डरावने और भयानक हो गए, उनके लम्बे-लम्बे नाखून निकल आए वह राक्षस हुआ, दैत्य हुआ आदिम बर्बर!
और बड़ी तेज़ी से सारा कमरा एकबारगी चक्कर काट गया। फिर सब धीरे-धीरे स्थिर होने लगा और उसकी साँसें ठीक होती जान पड़ीं। फिर जैसे बहुत कोशिश करने पर घिग्घी बँध जाने के बाद उसकी आवाज फूटी, "चंदा!"
चंदा की नरम साँसों की हल्की सरसराहट कमरे में जान डालने लगी। जगपती अपनी पाटी का सहारा लेकर झुका। काँपते पैर उसने जमीन पर रखे और चंदा की खाट के पाए से सिर टिकाकर बैठ गया। उसे लगा, जैसे चंदा की इन साँसों की आवाज में जीवन का संगीत गूँज रहा है। वह उठा और चंदा के मुख पर झुक गया। उस आँधेरे में आँखें गड़ाए-गड़ाए जैसे बहुत देर बाद स्वयं चंदा के मुख पर आभा फूटकर अपने-आप बिखरने लगी। उसके नक्श उज्ज्वल हो उठे और जगपती की आँखों को ज्योति मिल गई। वह मुग्ध-सा ताकता रहा।
चंदा के बिखरे बाल, जिनमें हाल के जन्मे बच्चे के गभुआरे बालों की-सी महक दूध की कचाइंध शरीर के रस की-सी मिठास और स्नेह-सी चिकनाहट और वह माथा जिस पर बालों के पास तमाम छोटे-छोटे, नरम-नरम-नरम-से रोएँ रेशम से और उस पर कभी लगाई गई सेंदुर की बिन्दी का हल्का मिटा हुआ-सा आभास नन्हें-नन्हें निर्द्वन्द्व सोए पलक! और उनकी मासूम-सी काँटों की तरह बरौनियाँ और साँस में घुलकर आती हुई वह आत्मा की निष्कपट आवाज की लय फूल की पंखुरी-से पतले-पतले ओंठ, उन पर पड़ी अछूती रेखाएँ, जिनमें सिर्फ दूध-सी महक! उसकी आँखों के सामने ममता-सी छा गई, केवल ममता, और उसके मुख से अस्फुट शब्द निकल गया, "बच्ची!"
डरते-डरते उसके बालों की एक लट को बड़े जतन से उसने हथेली पर रखा और उँगली से उस पर जैसे लकीरें खींचने लगा। उसे लगा, जैसे कोई शिशु उसके अंक में आने के लिए छटपटाकर, निराश होकर सो गया हो। उसने दोनों हथेलियों को पसारकर उसके सिर को अपनी सीमा में भर लेना चाहा कि कोई कठोर चीज उसकी उँगलियों से टकराई। वह जैसे होश में आया। बड़े सहारे से उसने चंदा के सिर के नीचे टटोला। एक रूमाल में बंधा कुछ उसके हाथ में आ गया। अपने को संयत करता वह वहीं जमीन पर बैठ गया, उसी अँधेरे में उस रुमाल को खोला, तो जैसे साँप सूँघ गया, चंदा के हाथों के दोनों सोने के कड़े उसमें लिपटे थे!
और तब उसके सामने सब सृष्टि धीरे-धीरे टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरने लगी। ये कड़े तो चंदा बेचकर उसका इलाज कर रही थी। वे सब दवाइयाँ और ताकत के टॉनिक उसने तो कहा था, ये दवाइयाँ किसी की मेहरबानी नहीं हैं, मैंने हाथ के कड़े बेचने को दे दिए थे पर उसका गला बुरी तरह सूख गया। जबान जैसे तालु से चिपककर रह गई। उसने चाहा कि चंदा को झकाझोरकर उठाए, पर शरीर की शक्ति बह-सी गई थी, रक्त पानी हो गया था।
थोड़ा संयत हुआ, उसने वे कड़े उसी रूमाल में लपेटकर उसकी खाट के कोने पर रख दिए और बड़ी मुश्किल से अपनी खाट की पाटी पकड़कर लुढ़क गया। चंदा झूठ बोली! पर क्यों? कड़े आज तक छुपाए रही। उसने इतना बड़ा दुराव क्यों किया? आखिर क्यों? किसलिए? और जगपती का दिल भारी हो गया। उसे फिर लगा कि उसका शरीर सिमटता जा रहा है और वह एक सींक का बना ढाँचा रह गया नितांत हल्का, तिनके-सा, हवा में उड़कर भटकने वाले तिनके-सा।
उस रात के बाद रोज जगपती सोचता रहा कि चंदा से कड़े माँगकर बेच ले और कोई छोटा-मोटा कारोबार ही शुरू कर दे, क्योंकि नौकरी छूट चुकी थी। इतने दिन की गैरहाजिरी के बाद वकील साहब ने दूसरा मुहर्रिर रख लिया था। वह रोज यही सोचता पर जब चंदा सामने आती, तो न जाने कैसी असहाय-सी उसकी अवस्था हो जाती। उसे लगता, जैसे कड़े माँगकर वह चंदा से पत्नीत्व का पद भी छीन लेगा। मातृत्व तो भगवान ने छीन ही लिया वह सोचता आखिर चंदा क्या रह जाएगी? एक स्त्री से यदि पत्नीत्व और मातृत्व छीन लिया गया, तो उसके जीवन की सार्थकता ही क्या? चंदा के साथ वह यह अन्याय कैसे करे? उससे दूसरी आँख की रोशनी कैसे माँग ले? फिर तो वह नितांत अंधी हो जाएगी और उन कड़ों की माँगने के पीछे जिस इतिहास की आत्मा नंगी हो जाएगी, कैसे वह उस लज्जा को स्वयं ही उधारकर ढाँपेगा?
और वह उन्हीं ख़यालों में डूबा सुबह से शाम तक इधर-उधर काम की टोह में घूमता रहता। किसी से उधार ले ले? पर किस सम्पत्ति पर? क्या है उसके पास, जिसके आधार पर कोई उसे कुछ देगा? और मुहल्ले के लोग ज़ो एक-एक पाई पर जान देते हैं, कोई चीज खरीदते वक्त भाव में एक पैसा कम मिलने पर मीलों पैदल जाकर एक पैसा बचाते हैं, एक-एक पैसे की मसाले की पुड़िया बँधवाकर ग्यारह मर्तबा पैसों का हिसाब जोड़कर एकाध पैसा उधारकर, मिन्नतें करते सौदा घर लाते हैं; गली में कोई खोंचेवाला फँस गया, तो दो पैसे की चीज को लड़-झगड़कर - चार दाने ज़्यादा पाने की नीयत से - दो जगह बँधवाते हैं। भाव के जरा-से फर्क पर घंटों बहस करते हैं, शाम को सड़ी-गली तरकारियों को किफायत के कारण लाते हैं, ऐसे लोगों से किस मुँह से माँगकर वह उनकी गरीबी के अहसास पर ठोकर लगाए!
पर उस दिन शाम को जब वह घर पहुँचा, तो बरोठे में ही एक साइकिल रखी नजर आई। भीतरवाले दरवाज़े पर जब पहुँचा, तो सहसा हँसी कीदिमाग पर बहुत ज़ोर डालने के बाद भी वह आगन्तुक की कल्पना न कर पाया।भीतरवाले दरवाज़े पर जब पहुँचा, तो सहसा हँसी की आवाज सुनकर ठिठक गया। उस हँसी में एक अजीब-सा उन्माद था। और उसके बाद चंदा का स्वर - "अब आते ही होंगे, बैठिए न दो मिनट और! अपनी आँख से देख लीजिए और उन्हें समझाते जाइए कि अभी तन्दुरूस्ती इस लायक नहीं, जो दिन-दिन-भर घूमना बर्दाश्त कर सकें।" "हाँ भई, कमजोरी इतनी जल्दी नहीं मिट सकती, खयाल नहीं करेंगे तो नुकसान उठाएँगे!" कोई पुरूष-स्वर था यह।
जगपती असमँजस में पड़ गया। वह एकदम भीतर घुस जाए? इसमें क्या हर्ज है? पर जब उसने पैर उठाए, तो वे बाहर जा रहे थे। बाहर बरोठे में साइकिल को पकड़ते ही उसे सूझ आई, वहीं से जैसे अनजान बनता बड़े प्रयत्न से आवाज को खोलता चिल्लाया, "अरे चंदा! यह साइकिल किसकी है? कौन मेहरबान।"
चंदा उसकी आवाज सुनकर कमरे से बाहर निकलकर जैसे खुश-खबरी सुना रही थी, "अपने कंपाउंडर साहब आए हैं। खोजते-खोजते आज घर का पता पाए हैं, तुम्हारे इन्तज़ार में बैठे हैं।" "कौन बचनसिंह? अच्छा अच्छा। वही तो मैं कहूँ, भला कौन।" कहता जगपती पास पहुँचा, और बातों में इस तरह उलझ गया, जैसे सारी परिस्थिति उसने स्वीकार कर ली हो। बचनसिंह जब फिर आने की बात कहकर चला गया, तो चंदा ने बहुत अपनेपन से जगपती के सामने बात शुरू की, "जाने कैसे-कैसे आदमी होते हैं।" "क्यों, क्या हुआ? कैसे होते हैं आदमी?" जगपती ने पूछा। "इतनी छोटी जान-पहचान में तुम मर्दों के घर में न रहते घुसकर बैठ सकते हो? तुम तो उल्टे पैरों लौट आओगे।" चंदा कहकर जगपती के मुख पर कुछ इच्छित प्रतिक्रिया देख सकने के लिए गहरी निगाहों से ताकने लगी। जगपती ने चंदा की ओर ऐसे देखा, जैसे यह बात भी कहने की या पूछने की है! फिर बोला, "बचनसिंह अपनी तरह का आदमी है, अपनी तरह का अकेला। "होगा पर" कहते-कहते चंदा रुक गई। "आड़े वक्त काम आने वाला आदमी है, लेकिन उससे फायदा उठा सकना जितना आसान है उतना म़ेरा मतलब है कि जिससे कुछ लिया जाएगा, उसे दिया भी जाएगा।" जगपती ने आँखें दीवार पर गड़ाते हुए कहा। और चंदा उठकर चली गई।
उस दिन के बाद बचनसिंह लगभग रोज ही आने-जाने लगा। जगपती उसके साथ इधर-उधर घूमता भी रहता। बचनसिंह के साथ वह जब तक रहता, अजीब-सी घुटन उसके दिल को बाँध लेती, और तभी जीवन की तमाम विषमताएँ भी उसकी निगाहों के सामने उभरने लगतीं, आखिर वह स्वयं एक आदमी है बेकार यह माना कि उसके सामने पेट पालने की कोई इतनी विकराल समस्या नहीं, वह भूखों नहीं मर रहा है, जाड़े में काँप नहीं रहा है, पर उसके दो हाथ-पैर हैं शरीर का पिंजरा है, जो कुछ माँगता है कुछ! और वह सोचता, यह कुछ क्या है? सुख? शायद हाँ, शायद नहीं। वह तो दु:ख में भी जी सकने का आदी है, अभावों में जीवित रह सकने वाला आश्चर्यजनक कीड़ा है। तो फिर वासना? शायद हाँ, शायद नहीं। चंदा का शरीर लेकर उसने उस क्षणिकता को भी देखा है। तो फिर धन शायद हाँ, शायद नहीं। उसने धन के लिए अपने को खपाया है। पर वह भी तो उस अदृश्य प्यास को बुझा नहीं पाया। तो फिर? तो फिर क्या? वह कुछ क्या है, जो उसकी आत्मा में नासूर-सा रिसता रहता है, अपना उपचार माँगता है? शायद काम! हाँ, यही, बिल्कुल यही, जो उसके जीवन की घड़ियों को निपट सूना न छोड़े, जिसमें वह अपनी शक्ति लगा सके, अपना मन डुबो सके, अपने को सार्थक अनुभव कर सके, चाहे उसमें सुख हो या दुख, अरक्षा हो या सुरक्षा, शोषण हो या पोषण उसे सिर्फ काम चाहिए! करने के लिए कुछ चाहिए। यही तो उसकी प्रकृत आवश्यकता है, पहली और आखिरी माँग है, क्योंकि वह उस घर में नहीं पैदा हुआ, जहाँ सिर्फ जबान हिलाकर शासन करनेवाले होते हैं। वह उस घर में भी नहीं पैदा हुआ, जहाँ सिर्फ माँगकर जीनेवाले होते हैं। वह उस घर का है, जो सिर्फ काम करना जानता है, काम ही जिसकी आस है। सिर्फ वह काम चाहता है, काम।
और एक दिन उसकी काम-धाम की समस्या भी हल हो गई। तालाब वाले ऊँचे मैदान के दक्षिण ओर जगपती की लकड़ी की टाल खुल गई। बोर्ड तक टंग गया। टाल की जमीन पर लक्ष्मी-पूजन भी हो गया और हवन भी हुआ। लकड़ी की कोई कमी नहीं थी। गाँव से आनेवाली गाड़ियों को, इस कारोबार में पैरे हुए आदमियों की मदद से मोल-तोल करवा के वहाँ गिरवा दिया गया। गाँठें एक ओर रखी गईं, चैलों का चट्टा करीने से लग गया और गुद्दे चीरने के लिए डाल दिए गए। दो-तीन गाड़ियों का सौदा करके टाल चालू कर दी गई। भविष्य में स्वयं पेड़ खरीदकर कटाने का तय किया गया। बड़ी-बड़ी स्कीमें बनीं कि किस तरह जलाने की लकड़ी से बढ़ाते-बढ़ाते एक दिन इमारती लकड़ी की कोठी बनेगी। चीरने की नई मशीन लगेगी। कारबार बढ़ जाने पर बचनसिंह भी नौकरी छोड़कर उसी में लग जाएगा। और उसने महसूस किया कि वह काम में लग गया है, अब चौबीसों घंटे उसके सामने काम है उसके समय का उपयोग है। दिन-भर में वह एक घंटे के लिए किसी का मित्र हो सकता है, कुछ देर के लिए वह पति हो सकता है, पर बाकी समय? दिन और रात के बाकी घंटे उन घंटों के अभाव को सिर्फ उसका अपना काम ही कर सकता है और अब वह कामदार था।
वह कामदार तो था, लेकिन जब टाल की उस ऊँची जमीन पर पड़े छप्पर के नीचे तखत पर वह गल्ला रखकर बैठता, सामने लगे लकड़ियों के ढेर, कटे हुए पेड़ के तने, जड़ों को लुढ़का हुआ देखता, तो एक निरीहता बरबस उसके दिल को बाँधने लगती। उसे लगता, एक व्यर्थ पिशाच का शरीर टुकड़े-टुकड़े करके उसके सामने डाल दिया गया है। फिर इन पर कुल्हाड़ी चलेगी और इनके रेशे-रेशे अलग हो जाएँगे और तब इनकी ठठरियों को सुखाकर किसी पैसेवाले के हाथ तक पर तौलकर बेच दिया जाएगा।
और तब उसकी निगाहें सामने खड़े ताड़ पर अटक जातीं, जिसके बड़े-बड़े पत्तों पर सुर्ख गर्दनवाले गिद्ध पर फड़फड़ाकर देर तक खामोश बैठे रहते। ताड़ का काला गड़रेदार तना और उसके सामने ठहरी हुई वायु में निस्सहाय काँपती, भारहीन नीम की पत्तियाँ चकराती झड़ती रहतीं धूल-भरी धरती पर लकड़ी की गाड़ियों के पहियों की पड़ी हुई लीक धुँधली-सी चमक उठती और बगलवाले मूँगफल्ली के पेंच की एकरस खरखराती आवाज कानों में भरने लगती। बगलवाली कच्ची पगडंडी से कोई गुजरकर, टीले के ढलान से तालाब की नीचाई में उतर जाता, जिसके गंदले पानी में कूड़ा तैरता रहता और सूअर कीचड़ में मुँह डालकर उस कूड़े को रौंदते।
दोपहर सिमटती और शाम की धुंध छाने लगती, तो वह लालटेन जलाकर छप्पर के खंभे की कील में टाँग देता और उसके थोड़ी ही देर बाद अस्पतालवाली सड़क से बचनसिंह एक काले धब्बे की तरह आता दिखाई पड़ता।
गहरे पड़ते अँधेरे में उसका आकार धीरे-धीरे बढ़ता जाता और जगपती के सामने जब वह आकर खड़ा होता, तो वह उसे बहुत विशाल-सा लगने लगता, जिसके सामने उसे अपना अस्तित्व डूबता महसूस होता।
एक-आध बिक्री की बातें होतीं और तब दोनों घर की ओर चल देते। घर पहुँचकर बचनसिंह कुछ देर जरूर रुकता, बैठता, इधर-उधर की बातें करता। कभी मौका पड़ जाता, तो जगपती और बचनसिंह की थाली भी साथ लग जाती। चंदा सामने बैठकर दोनों को खिलाती।
बचनसिंह बोलता जाता, "क्या तरकारी बनी है। मसाला ऐसा पड़ा है कि उसकी भी बहार है और तरकारी का स्वाद भी न मरा। होटलों में या तो मसाला ही मसाला रहेगा या सिर्फ तरकारी ही तरकारी। वाह! वाह! क्या बात है अन्दाज की!"
और चंदा बीच-बीच में टोककर बोलती जाती, "इन्हें तो जब तक दाल में प्याज का भुना घी न मिले, तब तक पेट ही नहीं भरता।" या - "सिरका अगर इन्हें मिल जाए, तो समझो, सब कुछ मिल गया। पहले मुझे सिरका न जाने कैसा लगता था, पर अब ऐसा जबान पर चढ़ा है कि।"
या - "इन्हें कागज-सी पतली रोटी पसन्द ही नहीं आती। अब मुझसे कोई पतली रोटी बनाने को कहे, तो बनती ही नहीं, आदत पड़ गई है, और फिर मन ही नहीं करता।"
पर चंदा की आँखें बचनसिंह की थाली पर ही जमीं रहतीं। रोटी निबटी, तो रोटी परोस दी, दाल खत्म नहीं हुई, तो भी एक चमचा और परोस दी।
और जगपती सिर झुकाए खाता रहता। सिर्फ एक गिलास पानी माँगता और चंदा चौंककर पानी देने से पहले कहती, "अरे तुमने तो कुछ लिया भी नहीं!" कहते-कहते वह पानी दे देती और तब उसके दिल पर गहरी-सी चोट लगती, न जाने क्यों वह खामोशी की चोट उसे बड़ी पीड़ा दे जाती पर वह अपने को समझा लेती, कोई मेहमान तो नहीं हैं माँग सकते थे। भूख नहीं होगी।
जगपती खाना खाकर टाल पर लेटने चला जाता, क्योंकि अभी तक कोई चौकीदार नहीं मिला था। छप्पर के नीचे तख्त पर जब वह लेटता, तो अनायास ही उसका दिल भर-भर आता। पता नहीं कौन-कौन से दर्द एक-दूसरे से मिलकर तरह-तरह की टीस, चटख और ऐंठन पैदा करने लगते। कोई एक रग दुखती तो वह सहलाता भी, जब सभी नसें चटखती हों तो कहाँ-कहाँ राहत का अकेला हाथ सहलाए!
लेटे-लेटे उसकी निगाह ताड़ के उस ओर बनी पुख्ता कब्र पर जम जाती, जिसके सिराहने कँटीला बबूल का एकाकी पेड़ सुन्न-सा खड़ा रहता। जिस कब्र पर एक पर्दानशीन औरत बड़े लिहाज से आकर सवेरे-सवेरे बेला और चमेली के फूल चढ़ा जाती घूम-घूमकर उसके फेरे लेती और माथा टेककर कुछ कदम उदास-उदास-सी चलकर एकदम तेज़ी से मुड़कर बिसातियों के मुहल्ले में खो जाती। शाम होते फिर आती। एक दीया बारती और अगर की बत्तियाँ जलाती, फिर मुड़ते हुए ओढ़नी का पल्ला कन्धों पर डालती, तो दीये की लौ काँपती, कभी काँपकर बुझ जाती, पर उसके कदम बढ़ चुके होते, पहले धीमे, थके, उदास-से और फिर तेज सधे सामान्य-से। और वह फिर उसी मुहल्ले में खो जाती और तब रात की तनहाइयों में बबूल के काँटों के बीच, उस साँय-साँय करते ऊँचे-नीचे मैदान में जैसे उस कब्र से कोई रूह निकलकर निपट अकेली भटकती रहती।
तभी ताड़ पर बैठे सुर्ख गर्दनवाले गिद्ध मनहूस-सी आवाज में किलबिला उठते और ताड़ के पत्ते भयानकता से खड़बड़ा उठते। जगपती का बदन काँप जाता और वह भटकती रूह जिन्दा रह सकने के लिए जैसे कब्र की ईंटों में, बबूल के साये-तले दुबक जाती। जगपती अपनी टाँगों को पेट से भींचकर, कंबल से मुँह छुपा औंधा लेट जाता। तड़के ही ठेके पर लगे लकड़हारे लकड़ी चीरने आ जाते। तब जगपती कंबल लपेट, घर की ओर चला जाता।
"राजा रोज सवेरे टहलने जाते थे," माँ सुनाया करती थीं, "एक दिन जैसे ही महल के बाहर निकलकर आए कि सड़क पर झाडू लगानेवाली मेहतरानी उन्हें देखते ही अपना झाडूपंजा पटककर माथा पीटने लगी और कहने लगी, "हाय राम! आज राजा निरबंसिया का मुँह देखा है, न जाने रोटी भी नसीब होगी कि नहीं न जाने कौन-सी विपत टूट पड़े!" राजा को इतना दु:ख हुआ कि उल्टे पैरों महल को लौट गए। मंत्री को हुक्म दिया कि उस मेहतरानी का घर नाज से भर दें। और सब राजसी वस्त्र उतार, राजा उसी क्षण जंगल की ओर चले गए। उसी रात रानी को सपना हुआ कि कल की रात तेरी मनोकामना पूरी करनेवाली है। रानी बहुत पछता रही थी। पर फौरन ही रानी राजा को खोजती-खोजती उस सराय में पहुँच गई, जहाँ वह टिके हुए थे। रानी भेस बदलकर सेवा करने वाली भटियारिन बनकर राजा के पास रात में पहुँची। रातभर उनके साथ रही और सुबह राजा के जगने से पहले सराय छोड़ महल में लौट गई। राजा सुबह उठकर दूसरे देश की ओर चले गए। दो ही दिनों में राजा के निकल जाने की खबर राज-भर में फैल गई, राजा निकल गए, चारों तरफ यही खबर थी।" और उस दिन टोले-मुहल्ले के हर आँगन में बरसात के मेह की तरह यह खबर बरसकर फैल गई कि चंदा के बाल-बच्चा होने वाला है।
नुक्कड़ पर जमुना सुनार की कोठरी में फिंकती सुरही रुक गई। मुंशीजी ने अपना मीजान लगाना छोड़ विस्फारित नेत्रों से ताककर खबर सुनी। बंसी किरानेवाले ने कुएँ में से आधी गई रस्सीं खींच, डोल मन पर पटककर सुना। सुदर्शन दर्जी ने मशीन के पहिए को हथेली से रगड़कर रोककर सुना। हंसराज पंजाबी ने अपनी नील-लगी मलगुजी कमीज की आस्तीनें चढ़ाते हुए सुना। और जगपती की बेवा चाची ने औरतों के जमघट में बड़े विश्वास, पर भेद-भरे स्वर में सुनाया - "आज छह साल हो गए शादी को न बाल, न बच्चा न जाने किसका पाप है उसके पेट में। और किसका होगा सिवा उस मुसटण्डे कम्पोटर के! न जाने कहाँ से कुलच्छनी इस मुहल्ले में आ गई! इ़स गली की तो पुश्तों से ऐसी मरजाद रही है कि गैर-मर्द औरत की परछाई तब नहीं देख पाए। यहाँ के मर्द तो बस अपने घर की औरतों को जानते हैं, उन्हें तो पड़ोसी के घर की जनानियों की गिनती तक नहीं मालूम।" यह कहते-कहते उनका चेहरा तमतमा आया और सब औरतें देवलोक की देवियों की तरह गम्भीर बनी, अपनी पवित्रता की महानता के बोझ से दबी धीरे-धीरे खिसक गई।
सुबह यह खबर फैलने से पहले जगपती टाल पर चला गया था। पर सुनी उसने भी आज ही थी। दिन-भर वह तख्त पर कोने की ओर मुँह किए पड़ा रहा। न ठेके की लकड़ियाँ चिराई, न बिक्री की ओर ध्यान दिया, न दोपहर का खाना खाने ही घर गया। जब रात अच्छी तरह फैल गई, वह हिंसक पशु की भांति उठा। उसने अपनी अँगुलियाँ चटकाई, मुट् बाँधकर बाँह का जोर देखा, तो नसें तनीं और बाँह में कठोर कंपन-सा हुआ। उसने तीन-चार पूरी साँसें खींचीं और मजबूत कदमों से घर की ओर चल पड़ा। मैदान खत्म हुआ ककड़ की सड़क आई सड़क खत्म हुई, गली आई। पर गली के अँधेरे में घुसते ही वह सहम गया, जैसे किसी ने अदृश्य हाथों से उसे पकड़कर सारा रक्त निचोड़ लिया, उसकी फटी हुई शक्ति की नस पर हिम-शीतल होंठ रखकर सारा रस चूस लिया। और गली के अँधेरे की हिकारत-भरी कालिख और भी भारी हो गई, जिसमें घुसने से उसकी साँस रुक जाएगी घ़ुट जाएगी।
वह पीछे मुड़ा, पर रुक गया। फिर कुछ संयत होकर वह चोरों की तरह नि:शब्द कदमों से किसी तरह घर की भीतरी देहरी तक पहुँच गया। दाईं ओर की रसोईवाली दहलीज में कुप्पी टिमटिमा रही थी और चंदा अस्त-व्यस्त-सी दीवार से सिर टेके शायद आसमान निहारते-निहारते सो गई थी। कुप्पी का प्रकाश उसके आधे चेहरे को उजागर किए था और आधा चेहरा गहन कालिमा में डूबा अदृश्य था। वह खामोशी से खड़ा ताकता रहा। चंदा के चेहरे पर नारीत्व की प्रौढ़ता आज उसे दिखाई दी। चेहरे की सारी कमनीयता न जाने कहाँ खो गई थी, उसका अछूतापन न जाने कहाँ लुप्त हो गया था। फूला-फूला मुख। जैसे टहनी से तोड़े फूल को पानी में डालकर ताज़ा किया गया हो, जिसकी पंखुरियों में टूटन की सुरमई रेखाएँ पड़ गई हों, पर भीगने से भारीपन आ गया हो।
उसके खुले पैर पर उसकी निगाह पड़ी, तो सूजा-सा लगा। एड़ियाँ भरी, सूजी-सी और नाखूनों के पास अजब-सा सूखापन। जगपती का दिल एक बार मसोस उठा। उसने चाहा कि बढ़कर उसे उठा ले। अपने हाथों से उसका पूरा शरीर छू-छूकर सारा कलुष पोंछ दे, उसे अपनी साँसों की अग्नि में तपाकर एक बार फिर पवित्र कर ले, और उसकी आँखों की गहराई में झाँककर कहे- देवलोक से किस शापवश निर्वासित हो तुम इधर आ गई, चंदा? यह शाप तो अमिट था।
तभी चंदा ने हड़बड़ाकर आँखें खोलीं। जगपती को सामने देख उसे लगा कि वह एकदम नंगी हो गई हो। अतिशय लज्जित हो उसने अपने पैर समेट लिए। घुटनों से धोती नीचे सरकाई और बहुत संयत-सी उठकर रसोई के अँधेरे में खो गई।
जगपती एकदम हताश हो, वहीं कमरे की देहरी पर चौखट से सिर टिका बैठ गया। नजर कमरे में गई, तो लगा कि पराए स्वर यहाँ गूँज रहे हैं, जिनमें चंदा का भी एक है। एक तरफ घर के हर कोने से, अन्धेरा सैलाब की तरह बढ़ता आ रहा था ए़क अजीब निस्तब्धता असमँजस। गति, पर पथभ्रष्ट! शक्लें, पर आकारहीन।
"खाना खा लेते," चंदा का स्वर कानों में पड़ा। वह अनजाने ऐसे उठ बैठा, जैसे तैयार बैठा हो। उसकी बात की आज तक उसने अवज्ञा न की थी। खाने तो बैठ गया, पर कौर नीचे नहीं सरक रहा था। तभी चंदा ने बड़े सधे शब्दों में कहा, "कल मैं गाँव जाना चाहती हूँ।" जैसे वह इस सूचना से परिचित था, बोला, "अच्छा।" चंदा फिर बोली, "मैंने बहुत पहले घर चिट्ठी डाल दी थी, भैया कल लेने आ रहे हैं।" "तो ठीक है।" जगपती वैसे ही डूबा-डूबा बोला। चंदा का बाँध टूट गया और वह वहीं घुटनों में मुँह दबाकर कातर-सी फफक-फफककर रो पड़ी। न उठ सकी, न हिल सकी। जगपती क्षण-भर को विचलित हुआ, पर जैसे जम जाने के लिए। उसके ओठ फड़के और क्रोध के ज्वालामुखी को जबरन दबाते हुए भी वह फूट पड़ा, "यह सब मुझे क्या दिखा रही है? बेशर्म! बेगैरत! उस वक्त नहीं सोचा था, जब जब मेरी लाश तले।" "तब तबकी बात झूठ है।", सिसकियों के बीच चंदा का स्वर फूटा, "लेकिन जब तुमने मुझे बेच दिया।"
एक भरपूर हाथ चंदा की कनपटी पर आग सुलगाता पड़ा। और जगपती अपनी हथेली दूसरी से दाबता, खाना छोड़ कोठरी में घुस गया और रात-भर कुंडी चढाए उसी कालिख में घुटता रहा। दूसरे दिन चंदा घर छोड़ अपने गाँव चली गई। जगपती पूरा दिन और रात टाल पर ही काट देता, उसी बीराने में, तालाब के बगल, कब्र, बबूल और ताड़ के पड़ोस में। पर मन मुर्दा हो गया था। जबरदस्ती वह अपने को वहीं रोके रहता। उसका दिल होता, कहीं निकल जाए। पर ऐसी कमज़ोरी उसके तन और मन को खोखला कर गई थी कि चाहने पर भी वह जा न पाता। हिकारत-भरी नजरें सहता, पर वहीं पड़ा रहता। काफी दिनों बाद जब नहीं रह गया, तो एक दिन जगपती घर पर ताला लगा, नजदीक के गाँव में लकड़ी कटाने चला गया। उसे लग रहा था कि अब वह पंगु हो गया है, बिलकुल लंगड़ा, एक रेंगता कीड़ा, जिसके न आँख है, न कान, न मन, न इच्छा।
वह उस बाग में पहुँच गया, जहाँ खरीदे पेड़ कटने थे। दो आरेवालों ने पतले पेड़ के तने पर आरा रखा और कर्र-कर्र का अबाध शोर शुरू हो गया। दूसरे पेड़ पर बन्ने और शकूरे की कुल्हाड़ी बज उठी। और गाँव से दूर उस बाग में एक लयपूर्ण शोर शुरू हो गया। जड़ पर कुल्हाड़ी पड़ती तो पूरा पेड़ थर्रा जाता।
करीब के खेत की मेड़ पर बैठे जगपती का शरीर भी जैसे काँप-काँप उठता। चंदा ने कहा था, "लेकिन जब तुमने मुझे बेच दिया।" क्या वह ठीक कहती थी! क्या बचनसिंह ने टाल के लिए जो रूपए दिए थे, उसका ब्याज इधर चुकता हुआ? क्या सिर्फ वही रुपए आग बन गए, जिसकी आँच में उसकी सहनशीलता, विश्वास और आदर्श मोम-से पिघल गए? "शक़ूरे!" बाग से लगे दड़े पर से किसी ने आवाज लगाई। शकूरे ने कुल्हाड़ी रोककर वहीं से हाँक लगाई, "कोने के खेत से लीक बनी है, जरा मेड़ मारकर नंघा ला गाड़ी।" जगपती का ध्यान भंग हुआ। उसने मुड़कर दड़े पर आँखें गड़ाईं। दो भैंसा-गाड़ियाँ लकड़ी भरने के लिए आ पहुँची थीं। शकूरे ने जगपती के पास आकर कहा, "एक गाड़ी का भर तो हो गया, बल्कि डेढ़ का अब इस पतरिया पेड़ को न छाँट दें?" जगपती ने उस पेड़ की ओर देखा, जिसे काटने के लिए शकूरे ने इशारा किया था। पेड़ की शाख हरी पत्तियों से भरी थी। वह बोला, "अरे, यह तो हरा है अभी इ़से छोड़ दो।" "हरा होने से क्या, उखट तो गया है। न फूल का, न फल का। अब कौन इसमें फल-फूल आएँगे, चार दिन में पत्ती झुरा जाएँगी।" शकूरे ने पेड़ की ओर देखते हुए उस्तादी अन्दाज से कहा। "जैसा ठीक समझो तुम," जगपती ने कहा, और उठकर मेड़-मेड़ पक्के कुएँ पर पानी पीने चला गया।
दोपहर ढलते गाड़ियाँ भरकर तैयार हुईं और शहर की ओर रवाना हो गईं। जगपती को उनके साथ आना पड़ा। गाड़ियाँ लकड़ी से लदीं शहर की ओर चली जा रही थीं और जगपती गर्दन झुकाए कच्ची सड़क की धूल में डूबा, भारी कदमों से धीरे-धीरे उन्हीं की बजती घंटियों के साथ निर्जीव-सा बढ़ता जा रहा था।
"कई बरस बाद राजा परदेस से बहुत-सा धन कमाकर गाड़ी में लादकर अपने देश की ओर लौटे, "माँ सुनाया करती थीं," राजा की गाड़ी का पहिया महल से कुछ दूर पतेल की झाड़ी में उलझ गया। हर तरह कोशिश की, पर पहिया न निकला। तब एक पण्डित ने बताया कि 'सकट' के दिन का जन्मा बालक अगर अपने घर की सुपारी लाकर इसमें छुआ दे, तो पहिया निकल जाएगा। वहीं दो बालक खेल रहे थे। उन्होंने यह सुना तो कूदकर पहुँचे और कहने लगे कि हमारी पैदाइश सकट की है, पर सुपारी तब लाएँगे, जब तुम आधा धन देने का वादा करो। राजा ने बात मान ली। बालक दौड़े-दौड़े घर गए। सुपारी लाकर छुआ दी, फिर घर का रास्ता बताते आगे-आगे चले। आखिर गाड़ी महल के सामने उन्होंने रोक ली। राजा को बड़ा अचरज हुआ कि हमारे ही महल में ये दो बालक कहाँ से आ गए? भीतर पहुँचे, तो रानी खुशी से बेहाल हो गई। "पर राजा ने पहले उन बालकों के बारे में पूछा, तो रानी ने कहा कि ये दोनों बालक उन्हीं के राजकुमार हैं। राजा को विश्वास नहीं हुआ। रानी बहुत दुखी हुई।"
गाड़ियाँ जब टाल पर आकर लगीं और जगपती तखत पर हाथ-पैर ढीले करके बैठ गया, तो पगडंडी से गुजरते मुंशीजी ने उसके पास आकर बताया, अभी उस दिन वसूली में तुम्हारी ससुराल के नजदीक एक गाँव में जाना हुआ, तो पता लगा कि पन्द्रह-बीस दिन हुए, चंदा के लड़का हुआ है।" और फिर जैसे मुहल्ले में सुनी-सुनाई बातों पर पर्दा डालते हुए बोले, "भगवान के राज में देर है, अंधेर नहीं, जगपती भैया!" जगपती ने सुना तो पहले उसने गहरी नजरों से मुंशीजी को ताका, पर वह उनके तीर का निशाना ठीक-ठीक नहीं खोज पाया। पर सब कुछ सहन करते हुए बोला, "देर और अंधेर दोनों हैं!" "अंधेर तो सरासर है त़िरिया चरित्तर है सब! बड़े-बड़े हार गए हैं," कहते-कहते मुंशीजी रुक गए, पर कुछ इस तरह, जैसे कोई बड़ी भेद-भरी बात है, जिसे उनकी गोल होती हुई आँखें समझा देंगी। जगपती मुंशीजी की तरफ ताकता रह गया। मिनट-भर मनहूस-सा मौन छाया रहा, उसे तोड़ते हुए मुंशीजी बड़ी दर्द-भरी आवाज में बोले, "सुन तो लिया होगा, तुमने?" "क्या?" कहने को जगपती कह गया, पर उसे लगा कि अभी मुंशीजी उस गाँव में फैली बातों को ही बड़ी बेदर्दी से कह डालेंगे, उसने नाहक पूछा।
तभी मुंशीजी ने उसकी नाक के पास मुँह ले जाते हुए कहा, "चंदा दूसरे के घर बैठ रही है क़ोई मदसूदन है वहीं का। पर बच्चा दीवार बन गया है। चाहते तो वो यही हैं कि मर जाए तो रास्ता खुले, पर रामजी की मर्जी। सुना है, बच्चा रहते भी वह चंदा को बैठाने को तैयार है।" जगपती की साँस गले में अटककर रह गई। बस, आँखें मुंशीजी के चेहरे पर पथराई-सी जड़ी थीं। मुंशीजी बोले, "अदालत से बच्चा तुम्हें मिल सकता है। अब काहे का शरम-लिहाज!" "अपना कहकर किस मुँह से माँगूँ, बाबा? हर तरफ तो कर्ज से दबा हूँ, तन से, मन से, पैसे से, इज्जत से, किसके बल पर दुनिया संजोने की कोशिश करूँ?" कहते-कहते वह अपने में खो गया। मुंशीजी वहीं बैठ गए। जब रात झुक आई तो जगपती के साथ ही मुंशीजी भी उठे। उसके कन्धे पर हाथ रखे वे उसे गली तक लाए। अपनी कोठरी आने पर पीठ सहलाकर उन्होंने उसे छोड़ दिया। वह गर्दन झुकाए गली के अँधेरे में उन्हीं ख्यालों में डूबा ऐसे चलता चला आया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर कुछ ऐसा बोझ था, जो न सोचने देता था और न समझने। जब चाची की बैठक के पास से गुजरने लगा, तो सहसा उसके कानों में भनक पड़ी - "आ गए सत्यानासी! कुलबोरन!" उसने जरा नजर उठाकर देखा, तो गली की चाची-भौजाइयाँ बैठक में जमा थीं और चंदा की चर्चा छिड़ी थी। पर वह चुपचाप निकल गया।
इतने दिनों बाद ताला खोला और बरोठे के अँधेरे में कुछ सूझ न पड़ा, तो एकाएक वह रात उसकी आँखों के सामने घूम गई, जब वह अस्पताल से चंदा के साथ लौटा था। बेवा चाची का वह जहर-बुझ तीर, "आ गए राजा निरबंसिया अस्पताल से।" और आज "सत्यानासी! कुलबोरन!" और स्वयं उसका वह वाक्य, जो चंदा को छेद गया था, "तुम्हारे कभी कुछ न होगा।" और उस रात की शिशु चंदा!
चंदा का लड़का हुआ है। वह कुछ और जनती, आदमी का बच्चा न जनती। वह और कुछ भी जनती, कंकड़-पत्थर! वह नारी न बनती, बच्ची ही बनी रहती, उस रात की शिशु चंदा। पर चंदा यह सब क्या करने जा रही है? उसके जीते-जी वह दूसरे के घर बैठने जा रही है? कितने बड़े पाप में धकेल दिया चंदा को पर उसे भी तो कुछ सोचना चाहिए। आखिर क्या? पर मेरे जीते-जी तो यह सब अच्छा नहीं। वह इतनी घृणा बर्दाश्त करके भी जीने को तैयार है, या मुझे जलाने को। वह मुझे नीच समझती है, कायर नहीं तो एक बार खबर तो लेती। बच्चा हुआ तो पता लगता। पर नहीं, वह उसका कौन है? कोई भी नहीं। औलाद ही तो वह स्नेह की धुरी है, जो आदमी-औरत के पहियों को साधकर तन के दलदल से पार ले जाती है नहीं तो हर औरत वेश्या है और हर आदमी वासना का कीड़ा। तो क्या चंदा औरत नहीं रही? वह जरूर औरत थी, पर स्वयं मैंने उसे नरक में डाल दिया। वह बच्चा मेरा कोई नहीं, पर चंदा तो मेरी है। एक बार उसे ले आता, फिर यहाँ रात के मोहक अँधेरे में उसके फूल-से अधरों को देखता निर्द्वन्द्व सोए पलकों को निहारता स़ासों की दूध-सी अछूती महक को समेट लेता।
आज का अँधेरा! घर में तेल भी नहीं जो दीया जला ले। और फिर किसके लिए कौन जलाए? चंदा के लिए पर उसे तो बेच दिया था। सिवा चंदा के कौन-सी सम्पत्ति उसके पास थी, जिसके आधार पर कोई कर्ज देता? कर्ज न मिलता तो यह सब कैसे चलता? काम पेड़ कहाँ से कटते? और तब शकूरे के वे शब्द उसके कानों में गूँज गए, "हरा होने से क्या, उखट तो गया है।" वह स्वयं भी तो एक उखटा हुआ पेड़ है, न फल का, न फूल का, सब व्यर्थ ही तो है। जो कुछ सोचा, उस पर कभी विश्वास न कर पाया। चंदा को चाहता रहा, पर उसके दिल में चाहत न जगा पाया। उसे कहीं से एक पैसा माँगने पर डाँटता रहा, पर खुद लेता रहा और आज वह दूसरे के घर बैठ रही है उसे छोड़कर वह अकेला है, ह़र तरफ बोझ है, जिसमें उसकी नस-नस कुचली जा रही हैं, रग-रग फट गई है। और वह किसी तरह टटोल-टटोलकर भीतर घर में पहुँचा।
"रानी अपने कुल-देवता के मन्दिर में पहुँचीं," माँ सुनाया करती थीं, "अपने सतीत्व को सिद्ध करने के लिए उन्होंने घोर तपस्या की। राजा देखते रहे। कुल-देवता प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी दैवी शक्ति से दोनों बालकों को तत्काल जन्मे शिशुओं में बदल दिया। रानी की छातियों में दूध भर आया और उनमें से धार फूट पड़ी, जो शिशुओं के मुँह में गिरने लगी। राजा को रानी के सतीत्व का सबूत मिल गया। उन्होंने रानी के चरण पकड़ लिए और कहा कि तुम देवी हो! ये मेरे पुत्र हैं! और उस दिन से राजा ने फिर से राज-काज संभाल लिया।"
पर उसी रात जगपती अपना सारा कारोबार त्याग, अफीम और तेल पीकर मर गया क्योंकि चंदा के पास कोई दैवी शक्ति नहीं थी और जगपती राजा नहीं, बचनसिंह कंपाउंडर का कर्जदार था। "राजा ने दो बातें कीं," माँ सुनाती थीं, "एक तो रानी के नाम से उन्होंने बहुत बड़ा मन्दिर बनवाया और दूसरे, राज के नए सिक्कों पर बड़े राजकुमार का नाम खुदवाकर चालू किया, जिससे राज-भर में अपने उत्तराधिकारी की खबर हो जाए।" जगपती ने मरते वक्त दो परचे छोड़े, एक चंदा के नाम, दूसरा कानून के नाम।
चंदा को उसने लिखा था, "चंदा, मेरी अन्तिम चाह यही है कि तुम बच्चे को लेकर चली आना अभी एक-दो दिन मेरी लाश की दुर्गति होगी, तब तक तुम आ सकोगी। चंदा, आदमी को पाप नहीं, पश्चाताप मारता है, मैं बहुत पहले मर चुका था। बच्चे को लेकर जरूर चली आना।"
कानून को उसने लिखा था, "किसी ने मुझे मारा नहीं है क़िसी आदमी ने नहीं। मैं जानता हूँ कि मेरे जहर की पहचान करने के लिए मेरा सीना चीरा जाएगा। उसमें जहर है। मैंने अफीम नहीं, रूपए खाए हैं। उन रूपयों में कर्ज का जहर था, उसी ने मुझे मारा है। मेरी लाश तब तक न जलाई जाए, जब तक चंदा बच्चे को लेकर न आ जाए। आग बच्चे से दिलवाई जाए। बस।" माँ जब कहानी समाप्त करती थीं, तो आसपास बैठे बच्चे फूल चढ़ाते थे। मेरी कहानी भी खत्म हो गई, पर...
बाहर के सारे दरवाज़े बंद थे और अन्दर कमरे में अशांति थी . शान्ति की तलाश जारी थी और हर एक का चेहरा घबराया घबराया सा था . शायद कि वह किसी बड़े खतरे के इंतज़ार में थे , अचानक बाहरके दरवाज़े पे दस्तक हुयी और सब लोग हैरान हो कर खामोश हो गए .
दस्तक होती रही और लोग सुनते रहे क्योंकि सब डरे हुए थे . बाहर का दरवाज़ा खुलने पर कहीं कोई तूफ़ान न नाज़िल हो जाये .
मगर तूफ़ान का रास्ता कब रोका जा सकता है . तूफ़ान को जब आना होता है तो आ कर रहता है . तूफ़ान को आगे बढाया जा सकता है , मगर तूफ़ान को रोक लेना अब तक संभव नहीं हो सका .
दरवाज़े पे दस्तक तेज़ होती जा रही थी और महसूस होता था कि दरवाज़ा टूट जायेगा . सारे लोग डर के मारे ऊपर की मंज़िल पर जाने लगे और बाहर दस्तक की आवाज़ तेज़ होती गयी . लोगों को महसूस हुआ कि वह ग़लती कर रहे हैं . दरवाज़ा खोल ही देना चाहिए . मगर दरवाज़ा खुलने पर बचाव की क्या सूरत होगी इस पर किसी ने विचार नहीं किया . चिंतन करने की फुर्सत भी किसे थी ?
कमरे के अन्दर से एक व्यक्ति ने दरवाज़े पर आ कर पूछा -------------- " कौन है ? "
दस्तक रुक गयी . मगर कोई जवाब नहीं मिला , क्योंकि दरवाज़े पर दस्तक देने वाला अजनबी था और अजनबी के पास परिचय के लिए कुछ नहीं था कि वह अन्दर वाले को बता सकता कि वह कौन है ?
ख़ामोशी ने जिज्ञासा , विस्मय और भय को बढ़ा दिया , मगर एक व्यक्ति के आगे बढ़ने से इतना ज़रूर हुआ था कि अन्दर के सारे लोगों को ताक़त मिल गयी थी और वह भी उसके पीछे पीछे आ कर दरवाज़े के पास खड़े हो गए .
एक ने कहा --------- " दरवाज़ा खोल दो ."
दुसरे ने कहा -------- '' साला कोई जवाब ही नहीं देता ."
तीसरे ने कहा -------- "वह अकेला लगता है , हमलोग इतने सारे हैं वह क्या कर लेगा हमारा ? "
चौथे ने कहा --------- '' ज़रा गौर कर लो कहीं किसी परेशानी में हम न पड़ जाएँ ."
पाँचवे ने कहा -------- " क्या हम सब मिल कर परेशानी का मुकाबला भी नहीं कर सकते . खोल दो दरवाज़ा क्या कर लेगा , मृत्यु सत्य है मृत्यु पर हमारा विशवास है . मृत्यु तो अपने समय पर ही आएगी फिर हमें डर कैसा ?
छठे ने कहा ----------" अपने हित को ध्यान में रखना भी ज़रूरी है .... परामर्श से काम लो यार !"
अभी यह कानाफूसी हो ही रही थी कि दस्तक फिर शुरू हो गयी और अन्दर वालों में से एक ने हिम्मत कर के दरवाज़ा खोल दिया .
बाहर खड़ा भिक्षुक अपना अजनबी चेहरा लिए हुए हाथ फैलाता हुआ अन्दर की तरफ अपना पाँव बढाने लगा , और अन्दर के लोग पीछे हटने लगे . भिक्षुक कुछ अलग मुखाकृति का आदमी था . इसके चेहरे पे एक कशिश थी , परम पूज्य था वह . लोग पीछे हटे और भिक्षुक ने उन्हें ढाडस दिलाया .
घबराओ नहीं मैं भी इन्सान हूँ तुम्हारे ही जैसा, मैं तुम्हारा कुछ लेने नहीं आया हूँ . कुछ देने के लिए आया हूँ . तुम बेचैन थे शांति के लिए रास्ता तलाश कर रहे थे . भौतिकता के संसार में सिमटे सिमटाये लोग मैं तुम्हें बाहर के संसार का निमंत्रण देने आया हूँ .
तुम सब के अन्दर एक शक्ति स्रोत है जो स्वयं को प्रकट करने हेतु फूटना चाहता है . स्वयं को पहचानो तुम कौन हो ?
तुम क्यों हो ?
तुम्हें इस धरती पर क्यों भेजा गया है .?
तुम कुछ हो तभी तो हो कुछ न होते तो बना कर इस धरती पर भेजे क्यों जाते .... तुम्हें तो इस संसार में सबसे सुन्दर बना कर भेजा गया .... मगर अफ़सोस की तुम तुम नहीं रहे . वर्तमान की तरफ पीठ कर के बैठ गए हो और आने वाले कल की सोच रहे हो ----------------
चलो मेरे साथ आगे पाँव बढाओ . घबराओ नहीं तेज़ हवाओं की चोटें लगेंगीं , थपेड़ों को सहना पड़ेगा .... आ जाओ मेरे साथ मैं तुम्हारा नेतृत्व करूंगा .
सारे के सारे लोग जो घबराये हुए थे एक सुकून का एहसास करने लगे . मगर शंका अब भी बनी हुयी थी . संदिग्ध दृष्टि से लोग अब भी भिक्षुक को घूर रहे थे .
शंका के चौबारे पर खड़े लोग .
उभरती हुई संदिग्ध दृष्टि .
दृष्टि अब किसी के पास है कहाँ ...?
सब दृष्टिहीन हो चुके है ....
शायद हाँ !
शायद नहीं !!
मगर एक सवाल अपनी जगह क़ायम था कि क्या यह इनकी अपनी दृष्टि थी . वह दूर दृष्टि जो दादी माँ और नानी माँ के पास हुआ करती थी , गाँव के पंडित श्याम दत्त मिश्र के पास हुआ करती थी . वह दृष्टि तो अब लुप्त होती जा रही है , और हम शायद दृष्टिहीन होते जा रहे हैं .... अंधे हो गए हैं .... आँखों पर काला चश्मा लगाये भागे जा रहे हैं , तेज़ रफ़्तार जिंदगी के साथ -----------
"इसके पीछे चलना कहाँ तक मुनासिब होगा , यह शांति कहाँ से दे पायेगा , इसके पास है क्या ? चेहरा भी है तो हमसब से जुदा , पता नहीं कहाँ ले जायेगा , किस मंज़िल पर ले जा कर छोड़ेगा हमें -------? मुझे कुछ नहीं चाहिए तुम वापस जा सकते हो " एक ने हिम्मत करके कहा .
दुसरे ने कहा--------- " नहीं नहीं तुम जा सकते हो , तुम क्यों चले आये , ? तुम्हें कैसे पता चला कि हमसब शान्ति कि तलाश में हैं ."
तीसरे ने कहा --------" यह कोई बहुत बड़ा जादूगर लगता है . हमारी बातों को जान चूका है , और अब किसी भ्रष्ट रास्तों पर ले जाना चाहता है . नहीं हम नहीं जायेंगें तुम अकेले जाओ ."
नवागत को कोई सूत्र अब तक नहीं मिल पाया था जिन से वह इनको विश्वास में ले पाता . उस ने कहा शक मत करो देखो मेरी तरफ देखो , मैं तुम्हारा कुछ लेने नहीं आया हूँ , कुछ देने आया हूं.
एक ने फिर पूछा ---------- " तुम को कैसे मालूम हुआ कि हम सब घबराये हुए हैं और शान्ति कि तलाश में हैं . नहीं बाबा ! अपना रास्ता लो हमें सुख शान्ति नहीं चाहिए ---- हम दरवाज़ा बंद करेंगें ."
नवागत भिक्षुक ने कहा ------'' दरवाज़ा बंद नहीं होता मेरे प्यारे ! दरवाज़ा कभी बंद नहीं होता . एक दरवाज़ा बंद करने से कई दरवाज़े खुल जायेंगें . और हर दरवाज़ा तुम्हें नई आवाज़ देगा और उस वक़्त फैसला तुम्हारे बस में नहीं होगा . तुम पागल हो जाओगे . तुम्हारे सोचने कि शक्ति जवाब दे जाएगी . एक ही रास्ता है दरवाज़ा खुला रहने दो और फिर देखो प्रकृति क्या चाहती है , क्या मांगती है हम से ------- हम क्या चाहते हैं -----तुम क्या चाहते हो ? ये वृक्ष ,ये पहाड़ , ये चाँद- तारे , ये झरने तुम से क्या कह रहे हैं ------ और ये आंधी ------------??
अभी ये बातें हो ही रही थीं कि बाहर आसमान में बदल उमड़ आये और चरों तरफ अँधेरा छा गया . तेज़ हवाओं ने दरवाज़े के पट तोड़ डाले और बड़े ज़ोरों कि गरज आसमानों में पैदा हुई .
तूफ़ान आ गया ! तूफ़ान आ गया !!
"हर तरफ आंधियां ही आंधियां हैं ' किस कमरे में जाओगे ?" भिक्षुक ने कहा .
" किस दरवाज़े को बंद करोगे ?'' भिक्षुक ने प्रश्न किया .
कहाँ पनाह लोगे मेरे प्यारे !
तूफ़ान बढ़ता जा रहा है . जल्दी फैसला करो . अब तो दीवारें भी हिलने लगी हैं . ऐसा न हो कि तुम्हारा ये ' घर ' ध्वस्त हो जाये और तुम -----------
कहो कहाँ है शांति ,कहाँ है सुख ?
अब तो कानन विस्तृत में तूफ़ान का मुकाबला करना तुम्हारा मुक़द्दर बन चूका है ---------- चलो मैदान की तरफ हम भी निकलें , तुम भी निकलो . प्रकृति करवट ले रही है . पुराण और इतिहास के मूल्य आज सामने आ रहे हैं .पल में प्रलय होने को है . बादलों की गरज , तेज़ हवाओं से पैदा होने वाली भय ........... अस्त व्यस्त जिंदगी --------- व्याकुलता ----- विनाश !
चलो चलो वह देखो अनंतर की दीवार गिर पड़ी . आगे का रास्ता अभी खुला है बंद नहीं .
सारे लोग भिक्षुक के पीछे पीछे ख़ामोशी के साथ चलने लगे कि इस वक़्त बचाव का बस यही एक रास्ता था .
भिक्षुक इन्हें ले कर आगे बढ़ता रहा और तूफ़ान की उस सरहद पर ला कर खड़ा कर दिया जहाँ शोले बरस रहे थे . दिमाग जल रहा था - आदमी आदमी नहीं रह गया था -
तूफ़ान कब थमेगा कौन जनता है . तूफ़ान की अपनी फितरत है . यह प्रकृति का कौन सा मिज़ाज है ------- भिक्षुक यहाँ क्यों आया था ?
वह हमें कौन सा नया अर्थ समझाने आया था ?
हम आंधी और तूफ़ान का मुकाबला करते रहते हैं , कोई भिक्षुक कोई सन्यासी . कोई सूफी आता है . नयी रौशनी फैलती है और ज़माना फिर आगे बढ़ने लगता है .
भिक्षुक अब भी घूम रहे हैं , मगर हमारे घरों के दरवाज़े बंद हैं , दस्तक हो रही है मगर हम नवागत भिक्षुक को संदिग्ध नज़र से देख रहे हैं .
हवाएं तेज़ हवाएं हवाएं गर्म हवाएं फसलों का पकना मेघों का आकर लेना धरती की प्यास बुझना
हवाएं हमारे जीवन का प्रतीक तेज़ हवाओं के थपेड़ों को सहते हुए हमें जागना है यही तो जीवन की सत्य साधना है .
बस-स्टॉप से उनकी ससुराल सात मील दूर थी. जाने का कोई साधन नहीं था, पैदल के अतिरिक्त. रास्ता ऊबड़-खाबड़,ऊंचा-नीचा और कहीं-कहीं बेहद धूलभरा. मई की दोपहर और आकाश से टपकते अंगारे. चारों ओर दूर-दूर तक फैले ठुंठियाए खेतों में चेहरे को झुलसा देने वाली गर्म हवा बौखलाई-सी दौड़ रही थी.
सिर को तौलिए से बांधकर मैं एक योद्धा की भांति भुलभुलाई धूल और तपती ऊंची-नीची धरती को नापता हुआ तेजी से कदम घसीटने का प्रयत्न कर रहा था. लू से बचने के लिए पैंट की जेब में प्याज की दो गांठें पत्नी ने ठूंस दी थीं. मैं थोड़ी-थोड़ी देर में बैग से थर्मस निकालकर कुछ घूंट पानी हलक के नीचे उतारता जा रहा था. रास्ता एक गांव के बीच से होकर निकलता था. निपट तपती दोपहरी में वह गांव चौपालों में दुबका पड़ा था.
मन चाह रहा था कि मैं भी किसी चौपाल में दोपहर गुजार दूं. इजाजत चाहने पर शायद कोई मना भी नहीं करता, लेकिन 'शर्ट' की जेब में पड़ा उनका पत्र उस बात की अनुमति नहीं दे रहा था-- दो वर्षों बाद मिला था. लिखा था, 'पत्र पाते ही चले आओ. मैं घोर संकट में हूं.'
और मैं रात की गाड़ी पकड़कर चल पड़ा था. रातभर ट्रेन में नींद न आ पायी थी. सोचता रहा था उनके बारे में. वे मेरी सगी बहन न थीं. पड़ोस में रहती थीं, अपने ताया के साथ. सीधी-सादी, कम बोलने वाली, प्रतिक्षण काम में लगी रहने वाली. फिर भी ताई-ताया की नजरें उनके प्रति कभी सीधी नहीं रहती थीं. सप्ताह में कम-से कम एक बार उनकी ताई कोई-न कोई बहाना निकालकर उन्हें जब तक पीट न लेतीं, उन्हें चैन न मिलता.
वे दोपहर में कभी-कभी अपनी ताई-ताया से छिपकर खेलने मेरे घर आ जातीं. हम दोनों तब तक खेलते रहते, जब तक उनकी ताई की कर्कश आवाज हमारे कानों से न टकराती.
"परकासो---- कहां मर गयी करमजली !" उनकी ताई चीखती तो वे सहमकर मेरी मां से चिपट जातीं. मां उन्हें बहुत चाहती थीं. उनके सिर पर हाथ फेरती हुई कहतीं,"चिन्ता मत कर, बेटी--- मैं तेरी ताई को कह देती हूं कि तू अनु के साथ खेल रही है."
वे तब भी सहमी ही रहतीं; क्योंकि वे जानती थीं कि मां के कहने से उस समय ताई कुछ नहीं बोलेंगी, लेकिन बाद में उन्हें मारेंगी जरूर. यही नहीं, तीन-चार दिन तक वे खेलने के लिए घर से निकल भी न पाएंगी.
और वही होता. ताई उन्हें किसी-न किसी ऎसे काम में लगा देतीं कि न वह काम खत्म कर पातीं, न निकल ही पातीं. लेकिन जब भी मौका पातीं, सीधे मेरे घर आ पहुंचतीं. पड़ोस में एकमात्र मेरा घर ही था, जहां वे खेलने जातीं. वे बोलतीं कम जरूर थीं, लेकिन हर क्षण मुस्कराती रहती थीं. उम्र में मुझसे चार-पांच साल बड़ी थीं, इसीलिए मैं उन्हें पहले परकासो दीदी और कुछ दिनों बाद केवल दीदी कहने लगा था. मेरे कोई बहन नहीं थी इसलिए उम्र के बढ़ने के साथ हमारा यह रिश्ता काफी प्रगाढ़ होता गया था. आज वे किस संकट में पड़ गई हैं, समझ नहीं पा रहा था.
वैसे संकट उनके साथ बचपन से ही लगे रहे हैं. जब वे बहुत छोटी थीं--- दूध-पीती बच्ची, तब उनके पिता चल बसे थे. मां ताई-ताया की प्रताड़ना सहकर भी उनके साथ रहने के लिए मजबूर थीं, क्योंकि उनके मायके में कोई भी नहीं था. दुधमुंही दीदी को छाती से चिपकाए उनकी मां खेतों में काम करने जाती. उन्हें किसी झाड़ी की छाया में लिटाकर वह दिन भर काम करती रहतीं. मां ने मुझसे बताया था कि नन्ही दीदी पैर चला-चलाकर खेला करतीं ---- झाड़ी पर आ बैठी चिड़ियों से गूं-गा बतियाया करती थीं और जब भूख लगती, चीख-चीखकर मां को बुला लेती थीं.
दीदी मुशिक्ल से पांच-छह साल की हुई थीं कि एक दिन मां भी उन्हें ताई-ताया को सौंपकर पति के पास चली गई. मां के आंखें बन्द करने के तुरन्त बाद ही ताई ने उनके नन्हें कोमल हाथों को लगा दिया था बर्तन मांजने और झाड़ू लगाने में. अपनी ताकत भर दीदी बर्तन ठीक से ही मांजती, लेकिन ताई को उनकी सफाई पसन्द न आती और दीदी पर दो चार हाथ पड़ ही जाते. हर दिन दो-चार हाथ खाती हुई ही वे बड़ी हुई----इतनी बड़ी कि मेरे घर खेलने आना भी बन्द कर दिया. मैं भी आठवीं पास कर हाईस्कूल में पहुंच गया और साइकिल से पांच मील दूर के इण्टर कॉलेज में जाने लगा. दीदी ने खेलने आना तो बन्द कर दिया था, लेकिन मां से मिलने वे प्रायः आ जाया करतीं. कुछ देर बैठतीं और मेरी पढ़ाई के बारे में पूछ लेतीं. उनकी खुद भी पढ़ने की इच्छा रही थी. एकाध बार घर में कहने पर ताया चीखकर बोले थे, "लड़कियों को पढ़ाने का रिवाज हमारे वंश में कभी नहीं रहा---- तू पढ़कर क्या मुंशीगिरी करेगी.?"
दीदी मन मारकर रह गई थीं.
पढ़ाई की बात चलने पर रुआंसे स्वर में वे कहतीं, "चार अच्छर पढ़ लेती तो चिट्ठी तो लिख सकती थी. लेकिन......" वे बेहद उदास हो जातीं.
एक दिन मां ने बताया, दीदी की शादी की बात चल रही है. शायद जल्दी ही तय हो जाएगी. मैं उस दिन सोचता रहा---"दीदी अब चली जाएंगी. एकमात्र दीदी--- सगी से भी अधिक,मैं किससे बातें किया करूंगा? किसे दीदी कहा करूंगा?' हमारे यहां आज भी लड़कियों --विशेषकर गांव की लड़कियों की नियति शादी ही है. वह कभी न कभी होनी ही थी और उन्हें जाना ही था.
दीदी का अब मेरे घर आना लगभग बंद हो गया था. कभी-कभार ही उनके दर्शन हो जाया करते थे. कुछ दिन बाद वे भी बन्द हो गए. वे पूरी तरह चहारीदीवारी के अन्दर रहने लगीं. कहीं न आने-जाने का उनके ताया का सख्त आदेश था. वे उनकी शादी दूर के गांव में तय कर आए थे--- एक किसान परिवार में. लड़का दोजहा था-- दीदी से पन्द्रह साल बड़ा. इधर-उधर दूसरों से सुनी बातों के आधार पर मां ने बताया था कि पहली पत्नी से शायद उसे एक पांच साल का लड़का भी है. मां दीदी के ताया को हल्की-सी गाली देती हुई भर्राए गले से बोली थीं, "करम फूट गए, उस बे मां-बाप की बच्ची के. बूढ़ा-खूसट बच्ची की जायदाद समेटने के लिए उसे दूर-दराज एक दोजहे के गले मढ़ने जा रहा है."
लेकिन मां के या किसी और के सोचने से दीदी की शादी टलनी नहीं थी. महीना-तारीख -दिन सब पहले ही निश्चित कर आये थे उनके ताया. और एक दिन आतिशबाजी और बैंडबाजों की आवाज गांव में गूंज उठी थी, जिसने दीदी की सिसकियों को बेरहमी से दबा दिया था. एक काले, बदसूरत-से आदमी के साथ गुलाब-सी सुन्दर दीदी एक-एक कर अग्नि के फेरे लेने लगी थीं---- आजीवन एक सूत्र में बंध जाने के लिए.
दीदी की शादी करके उनसे पूरी तरह से छुट्टी पा ली थी उनके ताया ने. एक प्रकार से भुला ही दिया था उन्हें. उनकी शादी के कुछ दिन बाद ही मैं पढ़ने के लिए शहर चला गया. दो साल तक उनके बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं चला--वे कैसी हैं, सुख में या दुख में! दो साल बाद एक दिन मां को किसी से पता चला कि वे बहुत कष्ट में हैं. पति उन्हें मारता -पीटता और घर से लेकर खेतों तक का काम करवाता है. मां ने उनकी खबर लेने के लिए किसी तरह उनके ताया से पता लेकर उन्हें तीन पत्र लिखवाए. लेकिन उत्तर नहीं आया. 'आता भी कैसे? दीदी पढ़ी-लिखी होतीं तो अवश्य अपने बारे में दो शब्द लिख भेजतीं. लेकिन----' मां कहती और आंखें गीली कर लेतीं.
गर्मी की छुट्टियों में मां ने जिद की उन्हें देख आने को. मुझे जाना पड़ा. भटकता-पूछता किसी प्रकार रेलवे स्टेशन से सात मील की पैदल यात्रा करके पहुंच गया था उनकी ससुराल रहमतपुरा. उस दिन भी निपट दोपहर थी. घर के सारे लोग इधर-उधर जमीन पर ढेर थे, लेकिन दीदी बेझर (जौ-चना) कूटकर साफ करने में व्यस्त थीं पसीने से तर-बतर.
*****
पति से दीदी ने मेरा परिचय दूर के रिश्ते के भाई के रूप में करवाया था. मैं दो दिन रहा था तब. उन दो दिनों में ही बहुत कुछ समझने को मिला था. दीदी ने दुखी स्वर में कहा था, "ताया ने पता नहीं किस जनम का बदला लिया है मुझे यहां ब्याह कर. ये सब कसाई हैं --- निरे कसाई. जरा-जरा सी बात में रुई की तरह धुनने लगते हैं. लड़के को सिर चढ़ा रखा है. वह और मेरे खिलाफ उनके कान भरता रहता है. कई बार तो मन करता है कि किसी कुएं-तालाब में कूद जाऊं-----." वे और अधिक दुखी हो उठी थीं.
उसके बाद एक-एक कर बारह वर्ष बीत गए. पढ़ाई समाप्त कर मैं नौकरी में आ गया और दिल्ली में पोस्ट हुआ. अपनी शादी में दीदी को लेने गया था. बहुत मिन्नतें करने के बाद उनके पति इस शर्त पर उन्हें भेजने को राजी हुए थे कि मैं शादी के तुरन्त बाद उन्हें वापस पहुंचा जाऊंगा. दीदी गांव में सबसे मिलीं, बहुतों के घर भी गईं, लेकिन अपने ताया के घर झांकने भी नहीं गईं.
दीदी के प्रति मां का लगाव पहले की अपेक्षा कुछ अधिक ही बढ़ गया था. उनके जाने के बाद मां कई दिनों तक उदास रही थीं यह कहते हुए, "फिर पहुंच गई बेचारी कसाइयों के घर---- कितना दुष्ट है उसका पति---- कहता है बच्चे पैदा करने के लिए तेरे साथ शादी नहीं की. की है अपने सुख और बेटे की देख-भाल के लिए---- भाग फूट गए बच्ची के!"
मेरे दिल्ली वापस लौटते समय मां ने कहा था, "कभी-कभी परकासो के पति को खत लिख दिया कर आदरपूर्वक जिससे उसे यह न लगे कि परकासो को पूछने वाला कोई है ही नहीं. जालिम मूढ़ है उसका पति---- बेटा, जरा सोच-समझकर खत लिखा करना."
और मैं साल में कम से -कम दो पत्र अवश्य लिख देता था---- कभी दीदी के नाम तो कभी उनके पति के नाम. कभी-कभी उनके उत्तर भी आ जाते थे. प्रायः दीदी ही उत्तर लिखवा भेजती थीं, "सरब श्री सर्वोपमा जोग लिखी---- यहां सब राजी-खुशी है. तुम्हारी राजी-खुशी सदा भगवान से नेक मनाया करती हूं---- " से शुरू होकर पत्र में खेत-खलिहान, बाग आदि के समाचार होते और अंत में उर्मिला के लिए ढेर सारा प्यार और आशीष होता.
लेकिन उनका यह पत्र संक्षिप्त और पहले के पत्रों से भिन्न था. और यह मेरे किसी पत्र के उत्तर में नहीं था. वे अवश्य किसी कठिनाई में हैं. मेरे कदम कुछ और तेज हो गए. जूतों के अन्दर तलवे जलने लगे थे, और शरीर पसीने से लथपथ हो रहा था.
******
दीदी के सिर और हाथ में पट्टियां बंधी थीं. स्पष्ट था कि उनके साथ पशुवत व्यवहार किया गया था. उन्हें देख क्षणांश के लिए मन उत्तेजित हुआ, लेकिन अपनी स्थिति का ज्ञान होते ही शांत हो गया और सोचने लगा, 'हम किस आधार पर यह दावा करते हैं कि स्वतंत्रता के बाद यहां क्रान्तिकारी सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन हुए हैं---- जब कि यहां की सामान्य नारी आज भी दलित है, शोषित है, उपेक्षित और पीडित है.'
शाम को उनके पति से मैंने बात की, "दीदी की तबीयत कुछ खराब लगती है. अगर इज़ाजत दें तो कुछ दिनों के लिए मैं उन्हें दिल्ली ले जाऊं."
मेरी बात सुनते ही वे फट पड़े, "ले जाओ अपनी बदजात बहन को. मैं इसे फूटी आंखों भी नहीं देखना चाहता---- साली जुबान चलाती है."
"तो क्या तुम्हीं को भगवान ने जुबान दी है." खम्भे की ओट से दीदी का स्वर सुनाई पड़ा. मैं स्तम्भित उस ओर देखने लगा. यह आश्चर्यजनक परिवर्तन देख रहा था उनमें. शायद बर्दाश्त की भी कोई सीमा होती है.
"ज्यादा चबर-चबर की तो नटई पर पैर रखकर जुबान खींच लूंगा---- मादर-----कहीं की!" उनके पति क्रोध से कांपने लगे थे.
"जरा हाथ तो चला कर देखो---- अच्छा न होगा."
दीदी विद्रोहियों की भांति तनकर खड़ी हो गई थीं. पति आगे बढ़े, लेकिन मैं बीच में आ गया और उन्हें किसी प्रकार समझाकर बाहर ले गया. वे सिर पर हाथ रखकर बैठ गए और बोले, "भाई, तुम इसे कल सुबह ही ले जाओ. तुमने देख लिया न इसका रंग-ढंग. अगर यह दो -चार दिन यहां और रही तो मैं कुछ अनर्थ कर बैठूंगा."
दीदी तो पहले ही तैयार थीं. बोलीं, "मैं भी अब यहां नहीं रहना चाहती, अनूप. जिन्दगी भर वापस न आने की कसम खाकर जाना चाहती हूं."
अगले दिन चलते समय वे न तो पति से बोलीं और न ही सौतले बेटे से. चुपचाप पिछौरी ओढ़ निकल पड़ी थीं घर से.
दिल्ली आते ही उन्होंने आदत के मुताबिक घर का अधिकांश काम अपने सिर ओढ़ लिया. उर्मिला कुछ अस्वस्थ भी रहती थी---- सातवां महीना चल रहा था उसका. दीदी सुबह नाश्ता बनातीं. पम्मी को उठातीं, स्कूल जाने के लिए तैयार करतीं और उसे बस में चढ़ाने भी जातीं. फिर दोपहर उसे लेने जातीं. उनका आगमन अकस्मात हुआ था, लेकिन इससे उर्मिला को बहुत राहत मिली थी.
और जब उर्मिला ने बेटे को जन्म दिया तो दीदी की खुशी का पारावार न रहा. तीन दिन बाद जब उर्मिला अस्पताल से वापस घर आयी, दीदी ने पड़ोस की औरतों को इकठ्ठा कर लिया. किसी के यहां से ढोलक भी मांग लायी थीं और ढोलक पर उनके सोहर बजने लगे थे---
"हुए मेरी जान लौकुश बन में हुए,
जो घर होती सास कौसिल्या--------"
उन्होंनें उर्मिला को चार महीने तक काम छूने नहीं दिया. कहतीं, "तुम्हारा काम सिर्फ मुन्ने को सम्भालना है."
पम्मी उनसे इतना हिल गई कि उनसे ही खाना खाती और उन्हीं के पास सोती.
दीदी को आए लगभग दस महीने बीत गए थे. एक दिन पत्र आया, उनके सौतले बेटे का मेरे नाम. लिखा था, "बापू सख्त बीमार हैं---- हालत अच्छी नहीं है."
दीदी उस समय पम्मी के साथ 'अक्कड़-बक्कड़ बम्बे भो---- 'खेल रही थीं. पत्र हाथ में देख पूछ बैठीं, "कहां से आया है?"
"आपकी ससुराल से." मैंने कहा और पढ़कर उन्हें सुना दिया. सुनते ही उनके चहरे पर उदासी की पर्त जम गई. बिना कुछ कहे वे किचन में चली गईं. पम्मी उनके पीछे-पीछे जा पहुंची, "बुआ, आप मुझसे नालाज हो गईं?"
"नही बेटे, तुम चलो, मैं अभी आती हूं."
थोड़ी देर बाद वे वापस आयीं तो मुझे लगा जैसे वे किचन में कुछ काम करने के बाहने रोती रही हैं.
रात में उन्होंने तबीयत ठीक न होने का बहाना कर खाना नहीं खाया. आधी रात के बाद अचानक नींद खुलने पर मुझे दीदी के कमरे से सिसकने की आवाज सुनाई दी, लेकिन उसे भ्रम समझकर मैं फिर सो गया.
सुबह नियमपूर्वक उठकर उन्होंने पम्मी को तैयार कर स्कूल भेज दिया. उर्मिला को नाश्ता दिया और मेरा नाश्ता लेकर मेरे पास आ बैठीं. मैं नाश्ता करता रहा और वे मेरे चेहरे की ओर रह-रहकर देखती रहीं. क्षण भर बाद मैंने पूछ ही लिया, "दीदी, आप कुछ----."
"हां, अनूप---- मैं कुछ कहना चाह रही थी----."
"हां-हां, कहो न!"
"तुम आज रात की गाड़ी से मुझे वहा पहुंचा दो."
"क्या कह रही हैं आप? आपने तो वहां कभी----"
मैं आगे कुछ कहता इससे पहले ही वे बोलीं, "अनूप, वे हृदयहीन हैं और हो सकते हैं, लेकिन मैं तो नहीं------ अगर उन्हें कुछ हो गया तो----- नहीं, अनूप, वे सारी बातें गुस्से के साथ ही खत्म हो गईं." उनकी आंखें गीली हो आयी थीं.
वारत्यौहारों का सिलसिला भारत वर्ष में साल भर चलता ही रहता है कर्इ त्यौहार आते हैं और लोगों को हर्षित करते हुऐ नये नये रिवाजों का सिलसिला छोड जाते हैं इसी कारण ज्यादातर लोगों को इनका इंतजार बेसब्री से रहता है और उनमें समाज का हर तबका रहता है। और एक ऐसा सिलसिला शुरु हुआ जो नया होते हुए भी पुराना था। यह कहानी है एक बस्ती की जो बयाना जं. के पास बसी है कच्ची बस्ती ....बस्ती क्या है 15-20 छोंपडियों के जुट्टे हैं, रहने को तो बस यहा 90 प्रतिशत युवतियां ही रहती है उनमें कुछेक के साथ कहने भर की मां रहती हैं कुछेक जमाने की मारी खरीदी हुर्इ भी रहती हैं। इन सभी को अगर हम खुले शब्दों में कहें तो रण्डी और सभ्य भाषा में कहें तो ऐसी लडकियां जो हर रोज सुहागिन होकर रह जाती हैं वेसी कि वैसी कुवांरी। हां तो दोस्तो आप अब इन की विरादरी समझ ही चुके होंगें। बताना इसलिए जरुरी था कि आप तो आप हैं आजकल तो सरकार भी जात पूछती है। चलिऐ लगे हाथ अब यहां का माहौल भी देख सुन लें। दिन भर यहां आराम रहता है वो बात अलग कि कोर्इ जरुरत का मारा आ ही टपके । बाकी सभी आाराम फरमाते रहतें हैं। कुछैक नर्इ नवेलीयों को छोडकर। सही मायने में इनकी जिन्दगी शुरु होती है रात के पहर में और सुबह के पुलिस की गाडी के चक्कर तक चलती है। यहां सन्नाटा नहीं सिसकियां गूंजती हैं कुछ मजे की तो कुछ मजबूरी की। ये रात की रानीयां दिन के उजाले के शरीफों की पूरी खिदमत करती हैं उनकी खुमारी के साथ साथ जेब का बजन तो बिलकुल ही कम कर देती हैं। खैर छोडो! अभी इन झोंपडियों में इंकलाब आ गया। हुआ कुछ यूं कि मंजरी ने अपने बाप को पीट-पीट कर मार डाला । क्योंकि वह मंजरी को शहर में मजदूरी करने नहीं जाने दे रहा था। वैसे उसका भी ख्याल दुरुस्त था। जब वो ही धन्धा छोड देगी तो उनका खानदानी सिलसिला कैसे आगे बढेगा
क्योकी यही उनका पेशा था जब घर बैठे ही धन आता है तो उस धन्दे को छोडने की बात तो उन झोंपडियों की शान में गुस्ताकी ही तो थी वरना उनके यहां तो जोरु और बेटीयों को बस यही तो सिखाया जाता है। बस ये कह लो कि उनके घरानों का नाम उनकी छोरीयां ही तो करती हैं। और मंजरी वह इसे ही तोडने चली थी। धो बैठी जान से हाथ बेचारी और तो और उसे उसकी हमजोलीयों ने ही पीट पीट कर मार डाला उसे।
बस्ती की खबर बस्ती में ही दफन हो जाऐ इसलिए तुरत फुरत बाप बेटी को जला भी दीया। मंजरी शुरु से ही आजाद ख्यालात की थी एकबार उसका दिल अपने एक ग्राहक पर ऐसा आया कि वह उसके साथ चलने को ही उद्वत हो गर्इ। और वह वेचारा उजाले का शरीफ रात की रानी के प्रस्ताव पर गश खा गया। लेकिन मंजरी ने भी उसे जब छोडा जब हर सप्ताह उसने उसके पास आने का बादा कीया । वो भी बिल्कुल फ्री में। और आगे चलकर इस जोडी ने दो गुल खिलाऐ। और वो ही ले डूबे उसे क्योकि मंजरी उन्हें अपने जैसा नहीं बनाना चाहती थी। क्योंकि उसे उनमें अपने उजाले के शरीफ का अक्स जो दिखता था। और मंजरी की मौत के बाद वो दोनों गुल उन झोंपडियों की दुनिया से निष्काषित कर दिये गये। उनमें बडे की उम्र 8 साल व छोटे की उम्र 7 साल थी माफ करना जी उनके नाम भी सुन लो बडी थी बेटी कंजी और छोटे थे मुन्ना भार्इ। ये भी मा पर ही गये थे तभी तो भीख मांगने के बजाय दर दर भटकते रहे लेकिन एक आसरा जो हरेक का होता है रेलवे स्टेशन उन्हें भी मिल गया। बच्चे थे पर वो भी जानते थे कि दया और झूठन से जिन्दगी नहीं चलती । तभी तो वो भी वही करने लगे जो बाकी वहां के बच्चे करते थे यानि कचरा बीनने का काम। कबाडियों से मिलने वाले औने पौने दाम और साथीयों की फुहड बातें सुनते सुनते 5 बर्ष गुजर गये। आजकल कंजी रेलगाडियों में चोरी झुपे तो कभी टी.टी. को दस बीस रुपये देकर सामान बेचती थी और कभी जब ज्यादा सामान बिक जाता तो मानो त्यौहार आ गया हो ऐसे खुश हो जाते दोनों। लेकिन वह नादान इस बात से बिल्कुल बेखबर कि ज्यादा सामान उसके तरीके से नही बलिक उस जबानी की दस्तक से बिकता था जो उसकी जिन्दगी में आ लगी थी । क्योकि पब्लिक है ही जबानी की दीवानी। तभी तो आजकल स्टेशन पर कर कर्इ कंजी को अपना समझते थे। लेकिन वो दोनों गुल इस से अनभिज्ञ जिन्दगी को खुशी खुशी ढो रहे थे। रक्षाबन्धन की बजह से स्टेशन पर चहल पहल होने लगी थी। इसी से दोनों भार्इ बहिन खुष हो रहे थे कि अब माल ज्यादा बिकेगा तो वो ज्यादा कमायेंगें। वैसे आजकल तो मुन्ना ने भी सामान की ढकेल पर सी.डी. रख के बेचना शुरु कर दीया था। त्यौहार की मांग को देखते हुए ढकेल पर भीड रहती थी इसी कारण मुन्ना की बजाय अबकी बार कंजी कैसेट लेने गर्इ थी। तो वहां कुछ मनचलों ने उसकी की जबरदस्ती सीडी बना दी वो रोते रोते मुन्ना के पास आर्इ। वो दोनों जं. की पुलिस चोकी पर गये तो उनकी फरियाद सुनकर प्रभारी को दया आ गर्इ। उसने कंजी से पूछा ''बताओ ! तुम्हारे मां बाप कहां हैं?'' साब जी! मां सालों पहले प्रेमनगर की बस्ती में बर्इयरों ने पीट पीट कर मार दी थी और बापू पहली बार सुन रहें हैं ........कंजी बोली। और फिर चमक उठी प्रभारी की आंखें और वह दहाड... उठा ''हरामजादी रण्डउी की औलाद धन्दा करती है ज्यादा रुपये नहीं मिले तो चली आर्इ रपट लिखाने....घर का बिस्तर समझा है थाने को कोर्इ भी आये और लेट कर चला जाये...और उसने मुन्ना को धर लिया लात घूसों पर। '' और बेचारी कंजी पैर पकडती रही... फिर प्रभारी ने मुन्ना को लाकअप में बंद कर दीया। साब जी! हम माफी मांगते हैं अब कभी इधर नहीं आयेंगे.....बस अबकी बार हमारे मुन्ना को छोड दो................कंजी बोली। '' आ जाना सां को ..... जा फूट अब यहां से.....।'' कहकर पुलिस के एक सिपाही ने उसे भगा दीया। बेचारी कंजी सबकुछ समझ गयी ..कि सांझ को क्या होगा क्योंकि उसने भी 8 बरस रातों की चहल पहल में गुजारे थे।लेकिन कर भी तो क्या सकती थी बेचारी एक बहिन जो ठहरी। और वैसे भी अगले दिन रक्षाबंधन जो था। कहते है इस दिन बहिन भार्इ को एक धागा बांध कर अपनी रक्षा का भार उसे सोंपती है लेकिन यहां सब कुछ उलटा था और....... सांझ के समय एक बहिन अपने भार्इ को बचाने के लिए बलि होने चली आर्इ। अबकी बार उसे स्वागत कक्ष में जगह मिली। मैं आ गर्इ साब जी..! कंजी बोली तो जरुर लेकिन उस के स्वर में ऐसी मिमियाहट थी जैसी बकरे की हलाल होने पहले होती है। ''अच्छा! तब जरा हमें भी तो देख हम अबकी बार तुम्हारा बार त्यौहार कैसे रंगीन करते हैं।'' चौकी प्रभारी अपनी आदतन बेशर्म हंसी में हंसते हुए बोला। उसके बाद जो सिलसिला शुरु हुआ उसने सी.डी वाले मनचलों की कसर भी पूरी कर दी। एक तरफ भार्इ लाकप में रो रहा था दूसरी तरफ बहिन की चीख। कंजी रात भर ...... बिना रुके झेलती रही उनको और जब सुवह मुन्ना को छोडा गया तो कंजी ने दीवार के सहारे खडे होते हुए अपने टूटे हुए सलवार के नारे की ही राखी बांध दी क्योकि उसके जाने का समय जो आ चुका था। और कंजी मर गर्इ। बाकी रह गर्इ मुन्ना की चीख......जी......जी.. ! और फिर से शुरु हो गर्इ नर्इ कहानी क्योकि जैसे ही मुन्ना ने पुलिस पर आरोप लगाने शुरु किये वैसे ही उसे इस गुस्ताखी की ऐसी सजा मिली कि अगले दिन के अखबारों की हैडलाइन थी बहिन भार्इ के रिश्ते को हवस के प्यासे भार्इ ने रक्षाबंधन के दिन ही डसा! बलत्कारी भार्इ जेल में और बहिन ने शर्म के कारण आत्महत्या की । इधर मुन्ना खामोश रह गया उधर प्रभारी के अधिकारी गण उसे त्यौहार की मिठार्इ के साथ साथ प्रमोशन की बधार्इ दे रहे थे।
खैर सिलसिला जारी है अभी क्योंकि अभी त्यौहार की रात तो बाकी है।
मेरे एक अज़ीज़ दोस्त बहुत दिनों बाद मुझसे मिलने घर आए और चाय के दौर के साथ नयी- पुरानी बातों को याद करके बीते पलों की बस्तियों में पहुँच गए।
मेरी आप बीती सुनकर वह दोस्त दौड़ में मुझसे आगे निकलते हुए कहने लगा- “वो दिन भी क्या दिन थे, लोग अक्सर मेरे पास अपनी अपनी मांग लेकर आ जाते और मैं उनकी झोलियाँ भर देता।“
“क्या मतलब?” मैंने सावली नज़रों से उसकी ओर देखा।
“अरे, सच कह रहा हूँ। कोई दस हज़ार, तो कोई पचास हज़ार, और कभी कोई सौ रुपये भी ले जाता।“ उसने अपनी डींग की भावना को बरक़रार रखते हुए कहा ।
“तो क्या उन दिनों आप इतने अमीर थे जो उन्हें आसानी से उन्हें इतने पैसे दे देते?” मेरे सवाल अब जवाब की तलब में बेक़ारार थे।
“ अरे भाई जो भी था, ठाठ तो वही देने का रहा, और न देने का सवाल ही कहाँ उठता था !”
“ तो क्या देने की कोई मजबूरी थी?”
“हाँ थी! मैं बैंक में कैशियर जो था !”
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शर्तोंपरशादी
“रुको! आगे क़दम न रखना”
सजी-धजी नवेली दुल्हन आशीर्वाद लेने के लिए पाँवों की तरफ़ झुकी ही थी कि बिजली की तरह कड़कती आवाज़ ने उसे चौंका दिया। अभी तो ग्रहप्रवेश बाक़ी था, वह घर की चौखट के बाहर थी और भीतर से अनादर भारी आवाज़।
उसका पति आँखों में बेबसी लिए, गुमसुम नज़रों से पिता की ओर देखता रहा, एक लाचारी को झेलते हुए इतना ही कह पाया... ‘पिताजी.......’
‘’अरे चुप कर, अभी छ: महीने भी न हुए, एक से जान छुड़ा भी न पाये हैं तो दूसरी ले आया। यह घर के अंदर तब ही पाँव रख पाएगी जब यह लिखकर देगी कि यह तुझसे तलाक़ नहीं लेगी।“
नवेली दुल्हन पति की ओर सवाली निगाहों देखते हुए गणित जोड़ने लगी कि आखिर मजरा क्या है? “ पहली वाली हनीमून के बाद लौटी तो अलग ही तेवर थे, दस दिन में तलाक के लिए अर्ज़ी दी और 50 लाख की मांग कि जिसकी भरपाई मैंने जैसे खुद को गिरवी रखकर की है, अब यह दूसरी शादी! तुम दोनों की अनबन मुझे कहीं का नहीं छोड़ेगी। घर में बसना चाहती हो तो लिखकर देना होगा !! मुझे घर में अपनी बहू चाहिए, कोई लुटेरन नहीं !
हिन्दुस्तान में ग़ज़ल ने पिछले 300 साला माज़ी में मुख्तलिफ़ - मुख्तलिफ़ रास्तों पे सफ़र किया है ! फ़क़ीरों की ख़ानकाहों में पैदा हुई ग़ज़ल शाहों के दरबार से होते हुए कभी मयकदे में जाम के साथ छलकने लगी तो कभी महबूब की ज़ुल्फों की असीरी उसे रास आ गई ! एक तवील अरसे तक ग़ज़ल सिर्फ़ हुस्न , शराब, ज़ुल्फ़,घटा और महबूब के पहलु में कयाम करती रही और बाद में इसे ही रिवायत का नाम दे दिया गया ! ये कच्चे गोश्त की दुकान ग़ज़ल को क़फ़स के माफ़िक लगने लगी ! ग़ज़ल की इस बैचेनी को हमारे अहद के सुख़नवरों ने महसूस किया और नए - नए पहलु उन्होंने ग़ज़ल को दिये जिससे ग़ज़ल रिवायत के मखमली रास्ते से जदिदीयत की उबड़ -खाबड़ राह पे आ गई ! ग़ज़ल को एक लफ़्ज़ मिला "बच्चा " जिसने ग़ज़ल को संवेदना की एक मूरत बना दिया ! इस लफ़्ज़ के आने से ग़ज़ल में शे'र का कैनवास बहुत बड़ा हो गया और जब-जब इस लफ़्ज़ की आमद हुई उस शे'र की किस्मत ही संवर गई ! 70 के दशक के बाद ग़ज़ल के लिए ये लफ़्ज़ ग़ज़ल की ज़रूरत बन गया ! जब निदा फ़ाज़ली को लगा कि इस लफ़्ज़ में ताजगी के साथ - साथ बड़ी मासूमियत है तो क्यूँ ना इसे शे'र बनाया जाय हालांकि वे जानते थे कि अगर घर से मस्जिद दूर है तो नमाज़ घर बैठ कर भी पढ़ी जा सकती है मगर बच्चे को शाइरी में लाना था और नतीजा ये हुआ कि इस शे'र को बे-पनाह मुहब्बत मिली:---
अस्सी के शुरूआती दौर में उर्दू के एक रिसाले में शकील जमाली का ये शे'र छपा जिसे पढ़कर बशीर बद्र ने कहा कि ये हमारी ग़ज़ल में इजाफा है ! नई ग़ज़ल में वो इज़ाफा भी "बच्चे " लफ़्ज़ के इस्तेमाल से आया :--
येसरकशीकहाँ हैहमारेख़मीर में लगताहैअस्पतालमें बच्चेबदलगये
शकील जमाली ने बच्चे के मनोविज्ञान का अपनी शाइरी में ख़ूब इस्तेमाल किया:--
कोईस्कूलकी घंटीबजा दे येबच्चामुस्कुराना चाहताहै
वक़्त के साथ - साथ मुफ़लिसी की टीस भी ग़ज़ल में आ गई ! बच्चों की खिलौनों की ज़िद के आगे एक मज़बूर बाप बहाना ढूँढने लगा तो दूसरे ने बच्चे के खिलौने के लिए अपना सब कुछ दांव पे लगा दिया ! मुनव्वर राना ने गुरबत और बच्चे की ज़िद के बीच की इस कशमकश से बहुत से शे'र निकाले जो बड़े मक़बूल हुए :--
बच्चों की ज़िद और मुफ़लिसी के दामन में से बहुत से दूसरे शाइरों ने भी शे'र निकाले और अपनी बात अलग ज़ाविये से कही :--
ग़रीबबच्चोंकी ज़िदभीनकरसकापूरी तमामउम्रखिलौनों केभावकरता रहा
(हसीबसोज़)
तनख्वादूर ,खिलौनोंकी ज़िदऔरबहानेबचे नहीं आज देर से घर जाउंगा बच्चे जब सो जायेंगे
(पवन दीक्षित )
महंगेखिलौनेदे नसकामैंयेमेरीलाचारी है लेकिनमेरीबच्ची मुझकोजाँसेज़ियादाप्यारी है
(अतुलअजनबी)
आगयावहफिरखिलौनेबेचने सारेबच्चोंको रुलाकरजाएगा
(ओमप्रकाशयती)
बच्चों की ज़िद और उनकी मांगें जब अपना सब कुछ ताक़ पर रख कर भी एक बाप पूरी नहीं कर पाता ! उस वक़्त अपने आप को वह असहाय महसूस करता है उसकी इस हालत को मैंने भी इन दो मिसरों में इस तरह बयान किया :--
खूँटीपरईमानतक, दियाबापनेटांग ! फिरभीबाकीरह गई , बच्चोंकी कुछमाँग !!
खिलोनों के बाद अगरकोई बच्चों को रुला कर जाता है तो वो है गुब्बारे वाला और इस तरह बच्चों की गुब्बारा लेने की चाह ने भी ग़ज़ल को नया मफहूम दिया:--
दुःखकापहलापाठ पढ़ायाग़ुरबतने कलबच्चेने छुआनहींगुब्बारे को
कई बार मजबूरियों के आगे विवश हो इन्सान जब बच्चों की तमन्ना पूरी नहीं कर पाता और फिर घर उसे खाली हाथ जाना पड़ता है उस वक़्त उसकी क्या मन-स्थिती होती है राजेश रेड्डी ने इसे क्या खूब शाइरी बनाया ! ये मिसरे अब राजेश रेड्डी साहब की दस्तरस में नहीं रहे यानी आवारा हो गया ये शे'र:--
शामकोजिसवक़्तखाली हाथजाताहूँ मैं मुस्कुरादेतेहैं बच्चेऔरमरजाताहूँ मैं
दूसरी तरफ़ दिनभर की थकनके बाद बच्चोंमें पहुँचने को आदील रशीद ने यूँ शे'र बनाया :-
बच्चे की मासूमियत को शाइरी में दिल समझा गया और अक़ील नोमानी ने इसे ज़हन से इस तरह अल्हेदा रखा गया :--
तुझको मासूम कहा जाए कि ज़ालिम ऐ दोस्त दिल है बच्चों की तरह ज़हन है क़ातिल की तरह
बच्चों की जिदें कुछ और तरह की भी होती है एक शाइर के मन को वे आहत करती हैं और वो मन अगर वसीम बरेलवी साहब का हो तो पीड़ा शब्द बनकर इस तरह काग़ज़ पे उतरती है :--
ग़ज़ल के दयार में अपनी पुख्ता जगह बना चुका ये बच्चा अब नादान नहीं रहा ये बड़ा चालाक हो गया ! परवीन शाकिर ने बच्चे की इस चालाकी को शाइरी बनाया तो उनका शे'र दुनिया भर में मशहूर हो गया :--
मगर बच्चे कितने भी चालाक हों जाए बच्चे तो बच्चे ही रहते हैं ! बच्चों को माँ-बाप की मजबूरियों से फरेब भी खाना पड़ता है और ये फरेब जब ग़ज़ल की शक्ल अख्तियार करता है तो इस तरह :--
भूके बच्चों की तसल्ली के लिए माँ ने फिर पानी पकाया देर तक
(नवाज़ देवबंदी)
पत्थर उबालती रही एक माँ तमाम रात बच्चे फरेब खा के चटाई पे सो गये
(क़ैसर उल जाफरी)
हुमेरा रहमान नेजब शाइरी की माला में बच्चे नाम का मोती पिरोया तो ऐसी माला बनी कि इस माला का हर जगह जाप होने लगा :--
यही बच्चा जब धीरे - धीरे बड़ा होने लगा तो इसके तेवर भी बदल गये और मलिकज़ादा जावेद को कहना पड़ा :--
सम्हलकरगुफ़तगूकरना बुज़ुर्गों केबच्चेअब पलटकरबोलते हैं
दिलकेटूकड़ेअज़ाब देनेलगे हमकोबच्चेजवाब देनेलगे
ये शे'र कहने के बाद मलिकज़ादा साहब को महसूस हुआ कि बच्चों पे गुस्सा करना जायज़ नहीं है तो उन्होंने यहाँ तक भी कहा:--
अपनेबच्चोंपे क्यूँकरूँग़ुस्सा हरकमीउनमेंख़ानदानी है
मगर कमियों और नादानियों के बावजूद बच्चों ने बड़ों को हमेशा सिखाया कि ज़िंदगी का फ़लसफ़ा क्या है ,ज़िंदगी कैसे जी जाती है! हस्ती मल हस्ती ने बच्चों से मुतास्सिर हो क्या ख़ूब कहा :--
इसी तरह अपने बच्चों को देखकर शमीम बीकानेरी ने भी जो समझा उन्होंने उसे ऐसे ग़ज़ल बनाया :---
अपने बच्चो को जो देखा तो समझ में आया घर पहुंचता है सरे -शाम परिंदा कैसे
जब बड़े- बड़े मोतबर शाइर "बच्चे" लफ़्ज़ को अपने मिसरों में बाँधने लगे तो बच्चे का ग़ज़लों में इस्तेमाल शाइरी की रिवायत का हिस्सा बन गया ! इस लफ़्ज़ में सुख़नवरों को इतना जादू नज़र आने लगा कि बच्चे का शे'र में आ जाना शे'र के कामयाब होने की गारंटी हो गया ! मेराज फैजाबादी ने अपने एक शे'र में"बच्चे " लफ़्ज़ को बांधा तो वो शे'र उनकी पहचान बन गया :--
मुझको थकने नहीं देता ये ज़रूरत का पहाड़ मेरे बच्चेमुझेबूढानहीं होने देते
पवन दीक्षित ने जब बच्चे का इस्तेमाल इस कडवे सच को काग़ज़ पे उकेरते हुए किया तो सुनने वाले इस हक़ीक़त से सन्न रह गये:--
ऐसा नहीं कि हमारे शाइरों ने सिर्फ़ बच्चों की ज़िद और आदमी की बेचारगी ,उसकी मुफ़लिसी को ग़ज़ल बनाया बल्कि बच्चों को अगर कोई नसीहत भी दी गई तो वो भी शाइरी के ज़रिये दी गई:--
भाई रिताज़ मैनी ने जब देखा कि दो भाइयों के बीच में कैसे दरार पड़ जाती है ,एक आँगन में दो आँगन कैसे हो जाते है ...कहीं इसकी जड़ें बचपन से तो जुड़ी नहीं है तभी उन्होंने भी बच्चों से कह डाला :--
हर आदमी के अन्दर एक बच्चा होता है ये बात और है कि किसी के अन्दर का बच्चा बच्चा बना रहता है किसी के अन्दर का बच्चा वक़्त से पहले ही बूढा हो जाता है अपने अन्दर के बच्चे को ज़िन्दा रखना भी एक कमाल है ! आलम खुर्शीद ने इसे ऐसे कहा है :-
एक छोटा सा बच्चा मुझमें अब तक ज़िन्दा है छोटी - छोटी बात पे अब भी रो सकता हूँ मैं
वसीम बरेलवी ने अपने जज़बात और अहसासात यूँ कहे :-
किसी ने रख दिये ममता भरे दो हाथ क्या सर पर मेरे अन्दर का कोई बच्चा बिलख कर रोने लगता है
शकील आज़मी ने भी अपने अन्दर के बच्चे को ज़िन्दा रखने के लिए क्या -क्या जतन किये :--
वरना मर जाएगा बच्चा मेरे अन्दर का तितलियाँ रोज़ पकड़ना मेरी मज़बूरी है
बच्चे का अपना एक किरदार होता है उसे क्या सिखाना है उसे क्या नहीं सिखाना मुनव्वर साहब ने इसी मौज़ूँ से शे'र कुछ इस तरह निकाला :--
इन्हें फ़िरकापरस्ती मत सीखा देना कि यह बच्चे ज़मी से चूमकर तितली के टूटे पर उठाते हैं
बच्चों का घर में खेलना -कूदना, उनका उत्पात मचाना एक बार तो अखरता है मगर जब वे घर में नहीं होते या वे घर में बड़े अनुशासन से सहमे -सहमे रहें तो फिर घर ,घर नहीं लगता तभी तो पवन कुमार सिंह को मजबूर हो कहना पड़ा:--
बेतरतीब सा घर ही अच्छा लगता है बच्चों को चुप-चाप बिठा कर देख लिया
आज के दौर के बच्चों का दुर्भाग्य है कि वे अपने बचपन में ही जवान तो क्या बूढ़े होने लगे हैं ..अब ना तो पहले सी मौज -मस्तियाँ रहीं है ना ही पहले के से घरों में आँगन रहें है तभी तो फैयाज़ फ़ारूक़ी साहब को ये कहना पड़ा :-
हमारे वक़्त के बच्चों की कैसी बदनसीबी है पले बचपन जहाँ अब घर में वो आँगन नहीं होता
बच्चों ने भी अपने आप को आज के हालात् में ढाल लिया है उन्हें ना तो खुले आँगन की दरकार है ना ही बारिशों में काग़ज़ की नाव की तभी तो मुझे भी ये लिखना पड़ा :--
कहाँ गयी वो लोरियां ,कहाँ गये वो चाव ! बच्चों ने भी फाड़ दी, काग़ज़ वाली नाव!!
भाई शकील आज़मी ने इसे इस अंदाज़ में कहा :--
नावकाग़ज़की नाअबकेथपकियाँ बच्चोंकीथी बाढ़कापानीगली मेंयूँहीबहतारह गया
आज के इस चका -चौंध भरे माहौल में अपने अन्दर के बच्चे को ज़िन्दा रखना बड़ा दुश्वारतरीन काम है तभी तो मुनव्वर राना बस यही दुआ करते है:--
मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से फ़रिश्ता हो जाऊं माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं
कम से कम बच्चों के होंटों की हँसी की ख़ातिर ऐसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊं
यूँ तो बच्चों को लेकर बहुत से शे'र कहे गये पर मैंने कुछ मिसाल के तौर पे रखे मगर ये सच है कि इस लफ्ज़ में कोई ना कोई तो बात है कि किसी मिसरे में "बच्चा "लफ़्ज़ का आजाना ही उस मिसरे के महकने के लिए काफ़ी है ! ये सब इस लफ्ज़ की ताक़त है इसके साथ जुड़ा हस्सास है और इस लफ्ज़ में लिपटी हुई मासूमियत है ! कुछ लोग अपनी शाइरी को भीड़ से अलग रखने की कोशिश और फारसी ,अरबी के मुश्किल अलफ़ाज़ को बरतने के चक्कर में ग़ज़ल से कुश्ती करते रहतें है तभी तो मुनव्वर राना फरमाते है :--
ग़ज़ल तो फूल से बच्चों की मीठी मुस्कराहट है ग़ज़ल के साथ इतनी रुस्तमी अच्छी नहीं होती
बच्चे की मुस्कराहट एक मुद्दत की थकन कम कर देती है , बच्चे की मासूमियत के आगे एक बार तो ज़ुल्म की रूह भी कांपने लगती है ! बड़े से बड़ा संगदिल इन्सान भी बच्चे के आगे मोम की तरह पिघलने लगता है इस बात को मुनव्वर राना ने शाइरी का लिबास पहना दिया :--
तलवार तो क्या मेरी नज़र तक नहीं उठी उस शख्स के बच्चों की तरफ़ देख लिया था
इस मज़मून को लिखने के पीछे मेरा मकसद यही था कि कुछ तो कमाल इस लफ़्ज़ में है के बड़े- बड़े उस्ताद शाइरों ने भी अपने क़लाम में इसे बांधा ! शाइरी में बच्चे का इस्तेमाल करना उतना आसान नहीं है जितना लगता है इसके लिए पहले ख़ुद बच्चा होना पड़ता है ! क्यूँ ना हम भी अपनी रोज़मर्रा की मसरूफ ज़िंदगी में कम स कम एक पल के लिए ही फिर से बच्चे हो जायेँ …
फूल से मासूम बच्चों की ज़बां हो जायेंगे मिट भी जायेंगे तो हम इक दास्ताँ हो जायेंगे
(वाली आसी)
आख़िर में इसी दुआ के साथ कि हमारे अहद के सुख़नवर इसी तरह अपनी गज़लात में बच्चों को लाते रहे और हम बच्चों से बेपनाह मुहब्बत करते रहें क्यूंकि बच्चे तो सिर्फ़ बच्चे होते हैं चाहे वे किसी भी ज़ात या मज़हब के हों ! भाई आदील रशीद की इसी दलील के साथ ...
मैं दुनिया के हरेक बच्चे से यूँ भी प्यार करता हूँ बच्चा सांप का भी हो तो ज़हरीला नहीं होता
एक था राजा। राजा के चार लड़के थे। रानियाँ? रानियाँ तो अनेक थीं, महल में एक 'पिंजरापोल' ही खुला था। पर बड़ी रानी ने बाकी रानियों के पुत्रों को जहर देकर मार डाला था। और इस बात से राजा साहब बहुत प्रसन्न हुए थे। क्योंकि वे नीतिवान थे और जानते थे कि चाणक्य का आदेश है, राजा अपने पुत्रों को भेड़िया समझे। बड़ी रानी के चारों लड़के जल्दी ही राजगद्दी पर बैठना चाहते थे, इसलिए राजा साहब को बूढ़ा होना पड़ा।
एक दिन राजा साहब ने चारों पुत्रों को बुलाकर कहा, पुत्रों मेरी अब चौथी अवस्था आ गई है। दशरथ ने कान के पास के केश श्वेत होते ही राजगद्दी छोड़ दी थी। मेरे बाल खिचड़ी दिखते हैं, यद्यपि जब खिजाब घुल जाता है तब पूरा सिर श्वेत हो जाता है। मैं संन्यास लूँगा, तपस्या करूँगा। उस लोक को सुधारना है, ताकि तुम जब वहाँ आओ, तो तुम्हारे लिए मैं राजगद्दी तैयार रख सकूँ। आज मैंने तुम्हें यह बतलाने के लिए बुलाया है कि गद्दी पर चार के बैठ सकने लायक जगह नहीं है। अगर किसी प्रकार चारों समा भी गए तो आपस में धक्का-मुक्की होगी और सभी गिरोगे। मगर मैं दशरथ सरीखी गलती नहीं करूँगा कि तुम में से किसी के साथ पक्षपात करूँ। मैं तुम्हारी परीक्षा लूँगा। तुम चारों ही राज्य से बाहर चले जाओ। ठीक एक साल बाद इसी फाल्गुन की पूर्णिमा को चारों दरबार में उपस्थित होना। मैं देखूँगा कि इस साल में किसने कितना धन कमाया और कौन-सी योग्यता प्राप्त की। तब मैं मंत्री की सलाह से, जिसे सर्वोत्तम समझूँगा, राजगद्दी दे दूँगा। जो आज्ञा, कहकर चारों ने राजा साहब को भक्तिहीन प्रणाम किया और राज्य के बाहर चले गए।
पड़ोसी राज्य में पहुँचकर चारों राजकुमारों ने चार रास्ते पकड़े और अपने पुरुषार्थ तथा किस्मत को आजमाने चल पड़े। ठीक एक साल बाद - फाल्गुन की पूर्णिमा को राज-सभा में चारों लड़के हाजिर हुए। राजसिंहासन पर राजा साहब विराजमान थे, उनके पास ही कुछ नीचे आसन पर प्रधानमंत्री बैठे थे। आगे भाट, विदूषक और चाटुकार शोभा पा रहे थे। राजा ने कहा, 'पुत्रों ! आज एक साल पूरा हुआ और तुम सब यहाँ हाजिर भी हो गए। मुझे उम्मीद थी कि इस एक साल में तुममें से तीन या बीमारी के शिकार हो जाओगे या कोई एक शेष तीनों को मार डालेगा और मेरी समस्या हल हो जाएगी। पर तुम चारों यहाँ खड़े हो। खैर अब तुममें से प्रत्येक मुझे बतलाए कि किसने इस एक साल में क्या काम किया कितना धन कमाया' और राजा साहब ने बड़े पुत्र की ओर देखा।
बड़ा पुत्र हाथ जोड़कर बोला, 'पिता जी, मैं जब दूसरे राज्य में पहुँचा, तो मैंने विचार किया कि राजा के लिए ईमानदारी और परिश्रम बहुत आवश्यक गुण है। इसलिए मैं एक व्यापारी के यहाँ गया और उसके यहाँ बोरे ढोने का काम करने लगा। पीठ पर मैंने एक वर्ष बोरे ढोए हैं, परिश्रम किया है। ईमानदारी से धन कमाया है। मजदूरी में से बचाई हुई ये सौ स्वर्णमुद्राएँ ही मेरे पास हैं। मेरा विश्वास है कि ईमानदारी और परिश्रम ही राजा के लिए सबसे आवश्यक है और मुझमें ये हैं, इसलिए राजगद्दी का अधिकारी मैं हूँ।'
वह मौन हो गया। राज-सभा में सन्नाटा छा गया। राजा ने दूसरे पुत्र को संकेत किया। वह बोला, 'पिताजी, मैंने राज्य से निकलने पर सोचा कि मैं राजकुमार हूँ, क्षत्रिय हूँ - क्षत्रिय बाहुबल पर भरोसा करता है। इसलिए मैंने पड़ोसी राज्य में जाकर डाकुओं का एक गिरोह संगठित किया और लूटमार करने लगा। धीरे-धीरे मुझे राज्य कर्मचारियों का सहयोग मिलने लगा और मेरा काम खूब अच्छा चलने लगा। बड़े भाई जिसके यहाँ काम करते थे, उसके यहाँ मैंने दो बार डाका डाला था। इस एक साल की कमाई में पाँच लाख स्वर्णमुद्राएँ मेरे पास हैं। मेरा विश्वास है कि राजा को साहसी और लुटेरा होना चाहिए, तभी वह राज्य का विस्तार कर सकता है। ये दोनों गुण मुझमें हैं, इसलिए मैं ही राजगद्दी का अधिकारी हूँ।' पाँच लाख सुनते ही दरबारियों की आँखें फटी-की फटी रह गईं।
राजा के संकेत पर तीसरा कुमार बोला, 'देव मैंने उस राज्य में जाकर व्यापार किया। राजधानी में मेरी बहुत बड़ी दुकान थी। मैं घी में मूँगफली का तेल और शक्कर में रेत मिलाकर बेचा करता था। मैंने राजा से लेकर मजदूर तक को साल भर घी-शक्कर खिलाया। राज-कर्मचारी मुझे पकड़ते नहीं थे क्योंकि उन सब को मैं मुनाफे में से हिस्सा दिया करता थ।। एक बार स्वयं राजा ने मुझसे पूछा कि शक्कर में यह रेत-सरीखी क्या मिली रहती है? मैंने उत्तर दिया कि करुणानिधान, यह विशेष प्रकार की उच्चकोटि की खदानों से प्राप्त शक्कर है जो केवल राजा-महाराजाओं के लिए मैं विदेश से मँगाता हूँ। राजा यह सुनकर बहुत खुश हुए। बड़े भाई जिस सेठ के यहाँ बोरे ढोते थे, वह मेरा ही मिलावटी माल खाता था। और मँझले लुटेरे भाई को भी मूँगफली का तेल-मिला घी तथा रेत-मिली शक्कर मैंने खिलाई है। मेरा विश्वास है कि राजा को बेईमान और धूर्त होना चाहिए तभी उसका राज टिक सकता है। सीधे राजा को कोई एक दिन भी नहीं रहने देगा। मुझमें राजा के योग्य दोनों गुण हैं, इसलिए गद्दी का अधिकारी मैं हूँ। मेरी एक वर्ष की कमाई दस लाख स्वर्णमुद्राएँ मेरे पास हैं।' 'दस लाख' सुनकर दरबारियों की आँखें और फट गईं।
राजा ने तब सब से छोटे कुमार की ओर देखा। छोटे कुमार की वेश-भूषा और भाव-भंगिमा तीनों से भिन्न थी। वह शरीर पर अत्यंत सादे और मोटे कपड़े पहने था। पाँव और सिर नंगे थे। उसके मुख पर बड़ी प्रसन्नता और आँखों में बड़ी करुणा थी। वह बोला, 'देव, मैं जब दूसरे राज्य में पहुँचा तो मुझे पहले तो यह सूझा ही नहीं कि क्या करूँ। कई दिन मैं भूखा-प्यासा भटकता रहा। चलते-चलते एक दिन मैं एक अट्टालिका के सामने पहुँचा। उस पर लिखा था 'सेवा आश्रम'। मैं भीतर गया तो वहाँ तीन-चार आदमी बैठे ढेर-की-ढेर स्वर्ण-मुद्राएँ गिन रहे थे। मैंने उनसे पूछा, भद्रो तुम्हारा धंधा क्या है?' 'उनमें से एक बोला, त्याग और सेवा।' मैंने कहा, 'भद्रो त्याग और सेवा तो धर्म है। ये धंधे कैसे हुए?' वह आदमी चिढ़कर बोला, 'तेरी समझ में यह बात नहीं आएगी। जा, अपना रास्ता ले।' स्वर्ण पर मेरी ललचाई दृष्टि अटकी थी। मैंने पूछा, 'भद्रो तुमने इतना स्वर्ण कैसे पाया?' वही आदमी बोला, 'धंधे से।' मैंने पूछा, कौन-सा धंधा? वह गुस्से में बोला, 'अभी बताया न! सेवा और त्याग। तू क्या बहरा है?'
'उनमें से एक को मेरी दशा देखकर दया आ गई। उसने कहा, 'तू क्या चाहता है?' 'मैंने कहा, मैं भी आप का धंधा सीखना चाहता हूँ। मैं भी बहुत सा स्वर्ण कमाना चाहता हूँ।' उस दयालु आदमी ने कहा, 'तो तू हमारे विद्यालय में भरती हो जा। हम एक सप्ताह में तुझे सेवा और त्याग के धंधे में पारंगत कर देंगे। शुल्क कुछ नहीं लिया जाएगा, पर जब तेरा धंधा चल पड़े तब श्रद्धानुसार गुरुदक्षिणा दे देना।' पिताजी, मैं सेवा-आश्रम में शिक्षा प्राप्त करने लगा। मैं वहाँ राजसी ठाठ से रहता, सुंदर वस्त्र पहनता, सुस्वादु भोजन करता, सुंदरियाँ पंखा झलतीं, सेवक हाथ जोड़े सामने खड़े रहते। अंतिम दिन मुझे आश्रम के प्रधान ने बुलाया और कहा, 'वत्स, तू सब कलाएँ सीख गया। भगवान का नाम लेकर कार्य आरंभ कर दे।' उन्होंने मुझे ये मोटे सस्ते वस्त्र दिए और कहा, 'बाहर इन्हें पहनना। कर्ण के कवच-कुंडल की तरह ये बदनामी से तेरी रक्षा करेंगे। जब तक तेरी अपनी अट्टालिका नहीं बन जाती, तू इसी भवन में रह सकता है, जा, भगवान तुझे सफलता दें।'
'बस, मैंने उसी दिन 'मानव-सेवा-संघ' खोल दिया। प्रचार कर दिया कि मानव-मात्र की सेवा करने का बीड़ा हमने उठाया है। हमें समाज की उन्नति करना है, देश को आगे बढ़ाना है। गरीबों, भूखों, नंगों, अपाहिजों की हमें सहायता करनी है। हर व्यक्ति हमारे इस पुण्यकार्य में हाथ बँटाये : हमें मानव-सेवा के लिए चंदा दें। पिताजी, उस देश के निवासी बडे भोले हैं। ऐसा कहने से वे चंदा देने लगे। मझले भैया से भी मैंने चंदा लिया था, बड़े भैया के सेठ ने भी दिया और बड़े भैया ने भी पेट काटकर दो मुद्राएँ रख दीं। लुटेरे भाई ने भी मेरे चेलों को एक सहस्र मुद्राएँ दी थीं। क्योंकि एक बार राजा के सैनिक जब उसे पकड़ने आए तो उसे आश्रम में मेरे चेलों ने छिपा लिया था। पिताजी, राज्य का आधार धन है। राजा को प्रजा से धन वसूल करने की विद्या आनी चाहिए। प्रजा से प्रसन्नतापूर्वक धन खींच लेना, राजा का आवश्यक गुण है। उसे बिना नश्तर लगाए खून निकालना आना चाहिए। मुझमें यह गुण है, इसलिए मैं ही राजगद्दी का अधिकारी हूँ। मैंने इस एक साल में चंदे से बीस लाख स्वर्ण-मुद्राएँ कमाई जो मेरे पास हैं।'
'बीस लाख' सुनते ही दरबारियों की आँखें इतनी फटीं कि कोरों से खून टपकने लगा। तब राजा ने मंत्री से पूछा, 'मंत्रिवर, आपकी क्या राय है? चारों में कौन कुमार राजा होने के योग्य है?' मंत्रिवर बोले, 'महाराज इसे सारी राजसभा समझती है कि सब से छोटा कुमार ही सबसे योग्य है। उसने एक साल में बीस लाख मुद्राएँ इकट्ठी कीं। उसमें अपने गुणों के सिवा शेष तीनों कुमारों के गुण भी हैं - बड़े जैसा परिश्रम उसके पास है, दूसरे कुमार के समान वह साहसी और लुटेरा भी है। तीसरे के समान बेईमान और धूर्त भी। अतएव उसे ही राजगद्दी दी जाए। मंत्री की बात सुनकर राजसभा ने ताली बजाई।
दूसरे दिन छोटे राजकुमार का राज्याभिषेक हो गया। तीसरे दिन पड़ोसी राज्य की गुणवती राजकन्या से उसका विवाह भी हो गया। चौथे दिन मुनि की दया से उसे पुत्ररत्न प्राप्त हुआ और वह सुख से राज करने लगा। कहानी थी सो खत्म हुई। जैसे उनके दिन फिरे, वैसे सबके दिन फिरें।
शारदीय नवरात्र देवी पूजा के लिए प्रसिद्ध है l भारतीय दर्शन की आद्यशक्ति प्रकृति है l नवरात्रों में शक्ति की उपासना भी दुर्गा के रूप में सर्वव्यापी है !शक्ति के नौ स्वरुप हमारे जीवन की खुशियों को बनाए रखें ,इसलिए पूजा वंदना की परंपरा है !शक्ति की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा की अराधना के मूल में विजयी और शक्तिमान होने की भावना सबसे ऊपर होती है !
नव शब्द का अर्थ नवीन भी होता है और नौ की.संख्या भी l भारतीय धर्मशास्त्रों के अनुसार देवी दुर्गा के भी नौ रूप माने गए हैं, रात्र का अर्थ है- यज्ञ l वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु के आगमन काल में जो देवी शक्ति कम होती है ,उसी शक्ति को दुबारा प्राप्त करने के लिए जो यज्ञ ,जप -पूजा पाठ किया जाता है ,उसे नवरात्र कहतें हैं ! नव दुर्गा के नौ दुर्गों के पूजन की परंपरा पौराणिक काल से ही चली आ रही है !मार्कण्डेय पुराण में दुर्गा के नौ स्वरूपों का वर्णन मिलता है !ये हैं -शैलपुत्री ,ब्रह्मचारिणी ,चन्द्रघटा ,कूषमांडा ,स्कन्द माता ,कात्यायनी ,कालरात्रि ,महागौरी और सिद्धयात्री !शारदीय नवरात्रि में दुर्गा पूजा महापूजा कहलाती है ! इस जगत का सृज़न ,पालन और संहार करने वाली आध शक्ति एक ही है ! उसके लोक कल्याणकारी रूप को दुर्गा कहते हैं ! दुर्गा है आद्यशक्ति : तंत्रागम के अनुसार देवी संसार के प्राणियों को दुर्गति से निकालती है ,इसलिए दुर्गा कहलाती है l दुर्गा पार्वती का दूसरा नाम भी है l हिन्दुओं के शाक्त संप्रदाय में भगवती दुर्गा ही पराशक्ति और सर्वोच्च सत्ता के रूप में मानता है l वेदों में तो दुर्गा का कोई जिक्र नहीं है पर उपनिषद देवी के रूप में मानता है l उपनिषद में देवी उमा हेमवती (उमा हिमालय की पुत्री )का वर्णन है lपुराण में दुर्गा को आद्या शक्ति माना गया है !दुर्गा असल में शिव की पत्नी पार्वती का दूसरा रूप है ,जिसकी उत्पति राक्षसों का नाश करने के लिए देवताओं की प्रार्थना पर पार्वर्ती ने की थीl इस तरह दुर्गा युद्ध की देवी है lदेवी दुर्गा के खुद कई रूप हैंl.उनका मुख्य रूप गौरी है यथा शान्तमय ,सुंदर और गौर रूप !उनका सबसे भयानक रूप काली का है ,वही काला रूप lविभिन्न रूपों में दुर्गा पूजी जाती है !कन्या पूजन का विधान : चाहे कन्याकुमारी हो ,मुंबई की मुम्बा देवी हों ,अबू की अम्बा देवी हो ,हरिद्वार की मनसा देवी और चंडी हो अष्टभुजा या काली हो ,विन्ध्याचल की विन्ध्वेश्वरी हो ,सभी आदिकाल से शक्ति उपासना का प्रतीक है और हमारे धार्मिक -सामाजिक जीवन के राग राग में समां गईं हैं!महाभारत के शुरू में श्री कृष्ण ने अर्जुन को प्रथम भगवती शक्ति की उपासना का आदेश दिया था l महिषासुर के दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की l ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं ने एक सामान बल लगाया था !महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और कहा जाता है कि इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गयी थीl नौ दिनों तक देवी महिषासुर संग्राम हुआ और आखिरकार महिषासुर का वध करके महिषासुर मर्दिनी कहलाईं l नवरात्रि कि नौ रातों में तीन हिन्दू देवियों -पार्वती ,लक्ष्मी और सरस्वती के नौ स्वरूपों कि पूजा होती है ,जिन्हें नव दुर्गा कहते हैंl नवरात्रि में नव कन्याओं को देवी स्वरुप मान कर पूजन कर उन्हें श्रद्धा के साथ ,सामर्थ्य अनुसार भोजन और दक्षिणा देना अत्यंत शुभ और श्रेष्ठ माना गया है lनवरात्रि व्रत के विधान में कन्या पूजन का विशेष महत्व है इसलिए उपवास के अंतिम दिन कन्याओं को घर बुला कर हलवा ,पूड़ी और छोले (चने)का प्रसाद खिलाया जाता है lखाना खिलाने के साथ कन्याओं को खुश करने के लिए कुछ भेंट इत्यादि देने की परंपरा है l ऐसा माना जाता है कि नव दुर्गा स्वरुप को प्रिय श्रृंगार का सामान जैसे चुनरी या चूड़ी आदि देना शुभ होता है ! देवी स्वरूपा :कन्या पूजन की परंपरा के पीछे मान्यता है कि वह देवी स्वरुप है और जितना महत्व लड़के का होता है ,उतना ही लड़की का होता है l दसवें दिन विसर्जन करते हैं तो मानते हैं कि वह अपने लोक चली गईं ,इसलिए देवी को घर की कन्या कि तरह ही विदा करना चाहिए !इस धरा की महकती मिट्टी की महिमा है कि कन्या को देवी स्वरुप माना है ,क्यूंकि आगे जाकर वह जननी बन जाती है ! देवी भगवत के अनुसार "समस्त विधाएं ,कलाएं ,ग्राम देवियाँ और सभी नारियां इसी आदिशक्ति कि अंशरूपिणी हैं .माँ कल्याणी हैं ,वही पत्नी हैं ,गृह लक्ष्मी ,बिटिया राजनंदिनी है और नवेली बहु के कुमकुम चरण ऐश्वर्य लक्ष्मी आगमन का प्रतीक है l हर रूप में वह आराध्या है !शील ,शक्ति और शोर्य का विलक्ष्ण संगम है भारतीय नारी भी!ये शक्तियाँ अलौकिक हैं ,नौ पवित्र दिनों की नौ शक्तियाँ नवरात्रि में थिरक उठती हैं l अदृश्य नहीं हैं ,वे यहीं हैं ! त्योहारों पर व्यंजन परोसती के रूप में अन्नपूर्णा ,श्रृंगारित स्वरुप में गृहलक्ष्मी बनकर, बौद्धिक प्रतियोगिता में दर्ज कराती सरस्वती और मधुर संगीत में स्वरलहरी उच्चारित वीणापाणि के रूप में ,शौर्य दर्शाती दुर्गा भी वही है ,उल्लासमयी थिरकन रचती रोम रोम में पुलकित अम्बा भी वही है !
आधी रात का समय था, अर्धनिद्रा में निमीलित मेरी आंखे समवेत नारी स्वर में गाये जारहे एक गीत को सुन कर अचानक जाग उठीं. ''गाँव के आरीआरी मारे सिसकारी, आरे माई नैहर में सुन लीं,सासुरे में पियवा बा नादान,...''
मै उस गीत की इतनी बेबाक और उन्मुक्त अभिव्यक्ति पर चौंक उठी. ...फिर याद आया, मेरे घर से तीसरे मकान में आज बेटे की बरात विदा हुई थी, वहीं ये आयोजन हो रहा था. मै भी उत्सुकतावश वहां जा पहुँची, एक बुजुर्ग महिला ने मेरा स्वागत किया, और मै भी उत्सव में शामिल हो गयी. उस बुजुर्ग अम्मा ने ही बताया की इसे ''डोम कच 'कहते हैं. जब वर अपनी बरात लेकर प्रस्थान करता है तो पीछे छूट गयी सारी महिलायें इसी प्रकार नृत्य, गान, नाटक आदि करती हुई सारी रात जागती हैं, सुबह होने तक. वहां वधु के घर जब विवाह की रस्मे प्रारम्भ होती हैं ,इधर डोम कच प्रारम्भ हो जाता है. विवाह समपन्न होने तक सारी रात यह नृत्य गान -नाटिका चलती रहती है. एक नाटक खेला जाता है, जिसकी रोचकता यह होती है घर के सारे पुरुषों के बरात के संग चले जाने परअकेली महिलाए बिंदास हो पूरे खुलेपन के साथ भावनाए अभिव्यक्त करती हैं. ''डोम कच , नकटा या नकटौरा नाटक शब्द का ही अपभ्रंश रहा होगा ,कालान्तर में जिसे उच्चारण की सुविधा की दृष्टि से ''नकटा' या नकटौरा ''कहा जाने लगा. लोक नाट्य की यह परम्परा जब ''डोम कच'' के नाम से जानी गयी तो इसका अभिप्राय यही था की पूर्व में संभ्रांत घरों की महिलायें सार्वजनिक टूर पर समाज के सामने नहीं आ पाती थीं .और नाटक, नृत्य आदि में उनका भाग लेना सामाजिक लोक लाज की दृष्टि से वर्जित था ,अत; जाट जाटिन,धोबिन, ,या डोम डोमिन के द्वारा ही इस इस नाटक को अभिनीत किये जाने की परम्परा का निर्वाह किया जाता रहा होगा. जिस प्रकार की उन्मुक्तता और बिंदास पन उन गीतों में प्रस्तुत किया जाता है, वह संभ्रांत महिलायें उतनी सहजता से प्रस्तुत नहीं कर पाती होंगी, .......पर आज समय बदल गया है. आज तो पढी लिखी महिलायें भी बढ़ चढ़ कर इस गीत, नाटक में हिस्सा लेती हैं, ...शायद इसी बहाने सास ननदों पर कटूक्तियां कर अपने मन का सारा तनाव भी धो पोंछ कर बहा डालती हैं. ----- ''ये जी, सासू के बोलिया कैसन लागेला, जैसे हरियर मिरिचिया तितैया लागेला''[हे सखी, सासू का ताना मारना तुझे कैसा लगता है?.सखी उत्तर देती है-जैसे हरी मिर्च का तीखा स्वाद''---पर कभी कभी इन गीतों में एक अव्यक्त मार्मिकता भी छिपी होती है--''सासू मोरी मारे रामा, बांस के छौंकिया , ननदिया मोरी सुसुकत पनियां के जाय'' गीतों में वार्तालाप ,छेड़छाड़, नोक झोंक से भरा यह नाटक बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, का लोकप्रिय, एवं प्रचलित ,अनिवार्य परम्परा है. ,यह रंग कर्म का वह पक्ष है जिसमे आवश्यकतानुसार पात्रों की संख्या घटाई, बढ़ाई जा सकती है.संवाद जोड़े जा सकते हैं, और इसमें सिर्फ महिलायें ही भाग ले सकती हैं. ऐसा भी कहा जा सकता है की पुरुषों की अनुपस्थिति मेंमहिलायें अपनी शक्ति और रुतबे का प्रदर्शन कर पुरुषोचित आचरण करती हैं ,स्वांग भरती हैं, वैसी ही वेश भूषा में सज धज कर तैयार होती हैं. या यो कहें की एक रात की सत्ता का वैभव प्रदर्शित कर राजसी सुख का अनुभव करती हैंइस नाटक में दूल्हा दुल्हन से लेकर पंडित, वैद तक सारी भूमिकाएं महिलायें ही निभाती हैं. पुरुष वेश धारण कर...विवाह होता है ,पंडित आते हैं और विवाह की सारी रस्मे दोहराई जाती हैं. ..हास परिहास के साथ. इसी बीच वर की माँ विवाह मंडप में सुहाग चुनरी ओढ़ कर घूँघट निकाले, ..एक अखंड दीप जला कर चुपचाप बैठी रहती है. जिसमे दो बातियाँ जलाई जाती हैं, कहते हैं जब विवाह समपन्न हो जाता है तब जलते जलते दोनों बातियाँ एकाकार हो जाती हैं,अर्थात वधू पक्ष के घर विवाह संपन्न हो गयाऔर आगे का जीवन मंगलमय रहेगा.फिर महिलायें खुल कर हास परिहास करती हुई मंडप के चारो और गोल घेरे में घूमती हुई गीत गाती हैं जिसे ''झूमर'' कहते हैं. उन्मुक्तता इतनी की शारीरिक अंगो का उल्लेख कर एक दुसरे को छेड़ती हैं.और तरहतरह रोचक गीत गाकर केवातावरण में उत्साह व् रस घोल देती हैं. ---- ''काला रे बालम मोरा काला,ससुर लाये बुढ़िया, जेठ लाये जवानी, काला लाया रे सौत बारह बरस की ''-----फिर दूल्हा दुल्हन का चुमावन होता है.इसके पूर्व एक चारपाई के पाए को, या लकड़ी के पाटी को गीले आटे से थाप कर सिर का आकार दिया जाता है, इसमे नाक, मुंह बनाकरबच्चे की तरह कपडे पहनाकर कहीं छुपा दिया जाता है ताकि आने वाली वधू उसे देख न सके. इसे ''जलुवा'' कहते हैं. कुछ हास परिहास के बाद दुल्हन गर्भवती हो जाती है.और इस जलुवे को ही पुत्र रुपमे जन्म दिलवाया जाता है. जलुवा की नाक, आँख बनाते समय भी महिलाए नाटकीय भाव भंगिमा से समझाती हैं की इसकी नाक लम्बी है, बहू लम्बी नाक वाली आयेगी, इसकी आँखें छोटी हैं बहू कानी आयेगी.गर्भवती महिला सासू, देवर, ननद ,जेठानी आदि से गर्भावस्था के दौरान तरह तरह की फरमाईश करती है,यह भी गाकर ही नाटक में व्यक्त किया जाता है ,वह कुछ मांगती है और पीछे से सारी महिलायें ''वाह वाह जी वाह वह ''कहती हुई ताल देती रहती हैं. ---- ''इ बालम ,बनारस जैबे''--वाह वाह जी वाह वाह '' बनारस के साड़ी लैबे''--वाह वाह जी वाह वाह '' ओ बलम, जलेबी खाबे --वाह वाह जी वाह वाह ' इसी प्रकार यह नाटक आगे बढ़ता है,तब कोई महिला मछली बेचने वाली बन कर आती हैऔर मछली के मूल्य के रूप में उसे मांग लेती है. --''-माछ ले लो माछ,'' का भाव? ''तोहरे भाव'' इसी प्रकार फ़ूल वाली, मिठाई वाली, साग वाली, चाट पकौड़ी वाली का वेश धर कर नाचती गाती महिलाए आती रहती हैं और नाटक आगे बढ़ता है. सभी को विदा करते करते वधू को प्रसव वेदना शुरू हो जाती है,तब वैद की पुकार होती है धोती कुरता पगड़ी पहने कंधे पर लाठी लिए, लालटेन लटकाए वैद आता है,और उस गर्भवती महिला से इलाज के बहाने छेड़छाड़ भी करता है. और तमाम नाटकीय घटनाओं और हास परिहास के बाद बच्चे का जन्म होता है. और नाल काटने के लिए बैद चाक़ू मांगता है. तब कोई तलवार लाता है, कोई भाला, अंतत; एक भोंथरी सी छोटी छुरी से नाल काटी जाती हैकोई महिला बच्चे के स्वर में रोंती है और सारीमाहिलायें उल्लास में भर सोहर गा उठती हैं----''गोकुला में बाजत बधैया,नन्द घर सोहर हो, ..ललना जन्मे हैं कृष्ण कन्हैया, महल में उठे सोहर हो''ले आओ सोने के हंसुवावा मै राम नार काटूँ, कन्हैया, नार काटूँ ,,ले आओ परई के सुपवा मै राम पवारावों हो. '' फिर बच्चा एक से दूसरे हाथों मेंगुजरता हुआ आशीषें पाता है,''बाबुल के घुँघर घुँघर बाल बहुत नीक लागे, अजब छवि लागेला हो, आहो ठुमक हुमक धरे पौना जसोदा जी के आँगन, अंगना सुहावन हो''--- अंत में शिशु को वर की माँ के हाथो में सौंप कर उसके हाथो में चावल देकर सारी महिलायें चुमावन करती है, आशीष देती हैं. दुल्हन का स्वांग करने वाली महिला और बाकी अभिनेत्रियाँ को साड़ी, सिंदूर, अनाज और मिठाई का खोइंछा दिया जाता है. वहां उपस्थित सारी महिलाओं को खीर पूडी खिलाकर तेल सिंदूर देकर विदा किया जाता है. आज कल यह परम्परा लुपप्राय हो रही है. क्योंकि बरात में महिलायें भी जाने लगी हैं. और इसे करने का उत्साह भी पहले जैसा नहीं रहा. बढ़ती आधुनिकता ने हमारी अनेक परम्पराओं को भुला दिया है. मनोरंजन के अनेक साधनों के आ जाने के कारण व् महिला संगीत के नाम पर पश्चिमी धुनों पर थिरकने के जूनून ने इस लोक नाट्य परम्परा को लगभग विस्मृत कर दिया है. ....हम अपनी परम्पराओं को भूलें नहीं, उसका उत्सव मनाएं ताकि कुछ पल के लिए ही सहीइनमे भाग लेने से आपसी कटुता दूर होती है, हास परिहास से मन की बोझिलता कम होती है. और सामाजिक समरसता तो बढ़ती है ही ।
हल्दी का प्रयोग लगभग सभी प्रकार के खाने में किया जाता है। यह व्यंजनों के स्वाद में तो इजाफा करती ही है साथ ही इसमें अनेक औषधीय गुण भी होते हैं। त्वचा, पेट और शरीर की कई बीमारियों में हल्दी का प्रयोग किया जाता है। हल्दी के पौधे से मिलने वाली इसकी गांठे ही नहीं बल्कि इसके पत्ते भी बहुत उपयोगी होते हैं। आइए हम आपको हल्दी के गुणों के बारे में बताते हैं।
हल्दी का प्रयोग करने से लाभ –
दाग, धब्बे व झाइंया मिटाने के लिए हल्दी बहुत फायदेमंद है। चेहरे पर दाग या झाइंया चेहरे के दाग-धब्बे और झाइयां हटाने के लिए हल्दी और काले तिल को बराबर मात्रा में पीसकर पेस्ट बनाकर चेहरे पर लगाएं।
हल्दी को दूध में मिलाकर इसका पेस्ट बना लीजिए। इस पेस्ट को चेहरे पर लगाने से त्वचा का रंग निखरता है और आपका चेहरा खिला-खिला दिखेगा।
लीवर संबंधी समस्याओं में भी इसे बहुत उपयोगी माना जाता है।
सर्दी-खांसी होने पर दूध में कच्ची हल्दी पाउडर डालकर पीने से जुकाम ठीक हो जाता है।
पेट में कीड़े होने पर 1 चम्मच हल्दी पाउडर में थोडा सा नमक मिलाकर रोज सुबह खाली पेट एक सप्ताह तक ताजा पानी के साथ लेने से कीड़े खत्म हो जाते हैं।
खांसी होने पर हल्दी का इस्तेमाल कीजिए। अगर खांसी आने लगे तो हल्दी की एक छोटी सी गांठ मुंह में रख कर चूसें, इससे खांसी नहीं आती।
अगर त्वचा पर अनचाहे बाल उग आए हों तो इन बालों को हटाने के लिए हल्दी पाउडर को गुनगुने नारियल तेल में मिलाकर पेस्ट बना लें। अब इस पेस्ट को हाथ-पैरों पर लगाएं। ऐसा करने से शरीर के अनचाहे बालों से निजात मिलती है।
धूप में जाने के कारण त्वचा अक्सर टैन्ड हो जाती है। टैन्ड त्वचा से निजात पाने के लिए हल्दी पाउडर, बादाम चूर्ण और दही मिलाकर प्रभावित स्थान पर लगाइए। इससे त्वचा का रंग निखर जाता है और सनबर्न की वजह से काली पड़ी त्वचा भी ठीक हो जाती है। यह एक तरह से सनस्क्रीन लोशन की तरह काम करता है।
मुंह में छाले होने पर गुनगुने पानी में हल्दी पाउडर मिलाकर कुल्ला करें या हलका गर्म हल्दी पाउडर छालों पर लगाएं। इससे मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं।
चोट लगने या मोच होने पर हल्दी बहुत फायदा करती है। मांसपेशियों में खिंचाव या अंदरूनी चोट लगने पर हल्दी का लेप लगाएं या गर्म दूध में हल्दी पाउडर डालकर पीजिए।
हल्दी का प्रयोग करने से खून साफ होता है जिससे शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढती है।
उछलू बंदर बहुत नटखट था| सुबह से शाम तक शैतानी और ऊधम बस उसका एक ही काम था|कभी इस पेड़ से उस पेड़ तो कभी इस डाल से उस डाल कूदता रहता था|खूब मस्ती करता था दिन भर,परंतु दिमाग का वह बहुत तेज था| उसे प्राकृतिक दृश्य बहुत अच्छे लगते थे||कल कल बहती नदी के किनारे वह घंटों बैठा रहता,नीले जल को निहारता और उछलती हुई लहरों को देखकर खुश होता रहता| नदी के पीछे सुदूर पर्वतों को देखता और सोचता कितने सुंदर होते हैं पर्वत|उसे हरे भरे पेड़ अच्छे लगते,वह डालियों को निहारता और उस पर बैठे पक्षियों की आवाज़ सुनकर आनंदित होता रहता|उछलू सोचता काश उसके पास कागज़ और रंग होते तो वह लकड़ी की कूची बनाकर सुंदर चित्रकारी करता|नदी बनाता उसमें तैरने वाले डोंगे बनाता और बतखों को कागज़ पर उतार देता| नीले आकाश के तारों को भी जमीन पर लाकर कागज़ पर उतारने की इच्छा हो आती|पर क्या करता ,रंग कागज़ कुछ भी तो नहीं था उसके पास|नदी किनारे रेत से खेलता उदास बैठा रहता| एक दिन वह पास की बस्ती की एक दुकान में गया और दुकानदार से कुछ कागज़ और रंग मांगे|दुकानदार बहुत उदार था उसने चित्रकारी का सब सामान उछलू को दे दिया| उछलू ने दुकानदार को भरोसा दिलाया कि जैसे ही चित्रकारी के पैसे मिलेंगे वह उधारी चुका देगा| उसकी योजना थी कि वह अपने सब मित्रों के चित्र बनायेगा और उन्हें बेचकर पैसे कमायेगा| सबसे पहिले उछलू ने नदी का चित्र बनाया ,पानी बनाया उछलती हुईं लहरें बनाईं और तैरती हुई नाव बनाई| नदी के पीछे वाले हरे भरे वृक्षों से लदे पहाड़ बनाये|उसकी चित्रकारी की बात बहुत जल्दी जंगल में आग की तरह चारों तरफ फैल गई कि उछलू बहुत अच्छी चित्रकारी करता है| एक दिन गिल्लो गिलहरी उसके पास आई और कहने लगी" उछलू भैया उछलू भैया मेरा चित्र बना दो न|" "चल हट आइने में अपना मुँह देखा है कभी,चित्र तो सुंदर लोगों का बनाया जाता है|" उछलू ने चिढ़ते हुये जबाब दिया| "भैया मैं भी तो सुंदर हूँ चिकना शरीर सुंदर प्यारी पूंछ और कैसी होती है सुंदरता?" गिल्लो इठलाकर बोली| "ठीक है आजा ,परंतु चित्र बनवाने के दस रुपये लगेंगे|" "क्या? किंतु मैं पैसे कहाँ से लाऊंगी?" "ले आना किसी आदमी के घर से, पास में बहुत से घर हैं|" "ठीक है तुम चित्र बनाओ मैं रुपये लाकर दूंगी|" जब चित्र बन गया तो उसे देखकर गिलहरी बहुत खुश हुई और बस्ती के एक घर में घुसी और घर मालिक के पेंट की जेब से एक दस का नोट ले आई और उछलू को दे दिया| अब तो जंगल के दूसरे जानवरों में भी उछलू से अपने अपने चित्र बनवाने की होड़ लग गई|सरकू शेर दौड़ता हुआ आया और बोला मैं जंगला का राजा हूं मेरा चित्र बहुत सुंदर और अच्छा बनना चाहिये उछलू|" "क्यों नहीं राजा साहब आपका चित्र तो मैं ऐसा बनाऊंगा कि दुनियाँ वाह वाह कर उठेगी परंतु.......|" "परंतु क्या उछलू" शेर ने पूछा| " फीस कुछ ज्यादा लगेगी"उछलू इठलाकर बोला| "अबे कितनी लगेगी ?मैं इस जंगल का राजा हूं जो मांगोगे दूंगा|"शेर ने थोड़ा अकड़ते हुये जबाब दिया| "महाराज सौ रुपये ठीक रहेंगे क्योंकि आप राजा हैं और इससे कम लेने पर आपके पद और कद का अपमान होगा,स्टेटस सिंबल भी तो कोई चीज़ है|" अरे बिल्कुल उछलू भाई सौ क्या मैं दो सौ दूंगा,आखिर राजा हूं मुझे पैसे की क्या कमी|"शेर अपनी तारीफ सुनकर गदगद हो गया था| और अकड़कर सीधा बैठ गया| उछलू ने बहुत शानदार चित्र सरकू शेर का बना दिया| शेर पास के ही एक घर में दहाड़ता हुआ घुसा और घर मालिक का कुर्ता उठा लाया उसमें से दो सौ रुपये निकाले और कुर्ता वहीं छोड़ दिया|उछलू अपने नाम के अनुरूप जोर से उछलने कूदने लगा| उसने चित्र बनाने के भाव भी बढ़ा दिये|सरकू ने जब दो सौ रुपये दिये हैं तो अब मैं छोटे जानवरों से सौ और बड़े जानवरों से डेढ़ सौ रुपये लूंगा|सुबह से शाम तक वह चित्र बनाता और अपना मेहनताना बसूलता और एक पेड़ की खोह में रखता जाता| अब तो उछलू मालामाल हो गया|उसको अपने धन की रखवाली करना पड़ती| जहाँ दूसरे बंदर उछलते कूदते कहीं भी घूमते रहते उछलू बंधुआ होकर रह गया|उसे डर लगा रहता कि कोई उसके रुपये न चुरा ले जाये| उसने सोचा अब वह धनवान हो ही गया है कोई भी बंदरिया उससे खुशी खुशी विवाह कर लेगी और धन की रखवाली भी कर लेगी| वह ठाठ से रहेगा| पास में बिंदो बंदरिया रहती थी |वह बहुत सुंदर थी और मिलनसार भी थी|उछलू सीधा उसके पास गया और शादी का प्रस्ताव उसके सामने रखा 'बिंदो बिंदो क्या तुम मुझसे शादी करोगी?" देखो मैं जंगल का सबसे धनवान जानवर हूं,मेरे पास बहुत सारे रुपये हैं मैं तुम्हें रानी बनाकर रखूंगा|, देश विदेश कि सैर कराऊंगा|" "शादी और तुमसे, बिंदो मुँह फेर लिया|तुम जैसे धन जोड़ू से कौन शादी करेगा|"बिंदो का रूखा, टके सा जबाब सुनकर उछलू को बड़ा ताज्जुब हुआ| "मत कर, मुझे कमी है क्या "ऐसा कहकर वह बुक्की बंदरिया के पास जा पहुँचा"बुक्की बुक्की तुम मेरे साथ शादी कर लो मजे में रहोगी,मेरे पास इतना पैसा है कि तुम जो चाहोगी मैं तुम्हारे कदमों में डाल दूंगा खूब सारे गहने बनवा दूंगा|" "क्या मुझे पागल कुत्ते ने काटा है जो तुझ जैसे आदमी के गुणों वाले बंदर से शादी कर अपनी जिंदगी बर्बाद कर लूंगी|चल हट यहां से और कहीं ठिकाना देख|"
उछलू फिर भी निराश नहीं हुआ|उसे विश्वास था कि उसके पास बहुत सारा धन होने के कारण कई सुंदर और जवान बंदरियां शादी करने को तैयारा हो जायेंगी| वह दौडता हुआ बकली बंदरिया के पास जा पहुंचा|बकली पेड़ की शाखा पर आराम कर रही थी|उसने नीचे से ही आवाज़ लगाई" बकली, मैं तुम्हारे पास बहुत ही जरूरी काम से आया हूँ जरा नीचे तो आओ|" " अभी तो मैं आराम कर हूं,कल आना|' बकली ने अंगड़ाई लेते हुये जबाब दिया| "बकली सोच ले ,मैं तेरे पास अपनी शादी का प्रस्ताव लेकर आया हूँ मौज करेगी एक बार हाँ बोल दे बस देख फिर मैं तेरे लिये आसमान से तारे भी तोडकर ला सकता हूँ ,चल मेरे साथ देख कितने सारे रुपये मैंने खोह में जमा करके रखे हैं|" बकली उसके साथ चल पड़ी|एक पेड़ की खोह में उछलू ने खूब सारे पैसे एकत्रित करके रखे थे|बकली जोर से हँसने लगी|"अरे पागल हम बंदरों का इन पैसों से क्या काम, भगवान ने हमें इतने सुंदर हरे भरे वृक्ष रहने को दिये हैं इनमें मीठे मीठे फल लगे हैं, धरती सा हरा भरा बिछौना है ऊपर नीले आकाश की चादर है फिर इन पैसों का तू क्या करेगा| क्या तू आदमी बन गया है पैसे तो इंसान ही जोड़ते हैं और जोड़ते जोड़ते मर जाते हैं| हम ओ बंदर मस्त कलंदर हैं सारे जंगल में विचरते हैं जहाँ फल मिल गये खा लिये, जहाँ जल मिल गया पी लिया||तुमने तो बंदर धर्म छोड़कर आदमियत अपना ली है|फेक दो ये रुपये मैं अभी तुमसे शादी कर लेती हूँ| इतने में बिंदो और बुक्की भी वहां आ गईं|तीनों ने बंदर के गले में हाथ डाल दिये| उछलू घबड़ा गया खोह में घुसा और सारा धन निकालकर बाहर फेकने लगा|तीनों बंदरियों ने वह सारा धन उठाकर दूर सड़क पर फेक दिया| अब उचलू से विवाह करने के लिये तीनों बंदरियाँ तैयार |उछलू चित्र तो बनाता है किंतु बिल्कुल मुफ्त में|
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चलने वाले घर
पता नहीं चलने वाले घर, अब क्यों नहीं बनाते लोग| बाँध के रस्सी खींच खींच कर, इधर उधर ले जाते लोग|
कभी आगरा कभी बाम्बे, दिल्ली नहीं घुमाते लोग| एक जगह स्थिर क्यों हैं घर, पहिया नहीं लगाते लोग|
पता नहीं क्यों कारों जैसे, सड़कों पर ले जाते लोग| अथवा मोटर रिक्सों जैसे, घर कॊ नहीं चलाते लोग|
पता नहीं घर स्थिर क्यों हैं , बिल्कुल नहीं हिलाते लोग| कुत्तों जैसे बाँध के पट्टा, नहीं क्यों टहलाते लोग|
कब से भूखे खड़े हुये घर खाना नहीं खिलाते लोग| नंगे हैं बचपन से अब तक, वस्त्र नहीं पहनाते लोग|
एक दूसरे को आपस में, कभी नहीं मिलवाते लोग| मिल न सकें कभी घर से घर, यही गणित बैठाते लोग|
ऊँच नीच कमजोर बड़ों को, जब चाहा उलझाते लोग| जाति धर्म के नाम घरों को, आपस में लड़वाते लोग|