आजाद भारत... आजादी के पैंसठ साल बाद भीकितना स्वाधीन ! कितना सुखी!
' तन जलता है¸ मन जलता है जलता जन–घन–जीवन एक नहीं जलते सदियों से जकड़े गर्हित बन्धन। दूर बैठकर ताप रहा है¸ आग लगाने वाला मेरा देश जल रहा¸ कोई नहीं बुझाने वाला।'
- शिवमंगल सिंह 'सुमन'
इस अंक मेः
कविता धरोहरः रामधारी सिंह दिनकर। वन्दे मातरम्ःकविः भगवती चरण वर्मा, जयशंकर प्रसाद, मोहम्मद इकबाल, श्यामलाल 'पार्षद', रामधारी सिंह' 'दिनकर ' , शिवमंगल सिंह 'सुमन' , गोपाल सिंह नेपाली, रामचन्द्र द्विवेदी 'प्रदीप , महेन्द्र भटनागर, रामदरश मिश्र, बृह्मजीत गौतम, शैल अग्रवाल, राजेश चेतन, रचना श्रीवास्तव, आदिल रशीद, सरस्वती माथुर । गीत और ग़ज़लः रामनिवास तिवारी ' इंडिया '। माह विशेषः सूरदास। माह के कविः विनोद कुमार शुक्ल । कविता आज और अभीः बीनू भटनागर, शैल अग्रवाल, इला प्रसाद, श्रुति मिश्रा, नलिन चौहान, सीतेश आलोक, अंशु हर्ष, श्यामल सुमन, शील निगम । तीज त्योहारः राखी हायकू-सरस्वती माथुर। बाल कविताः शिवराज भारतीय।
ललित निबंधः योगेश्वर। संस्कृतिःत्रिलोकी मोहन, राजस्थान। कविता में इन दिनो: ओम निश्चल। कहानी समकालीनः खुर्शीद हयात। कहानी समकालीनः अनीता रश्मि। कहानी समकालीनः वेद मोहला। कहानी विशेषः दिलीप भाटिया। लघुकथाः शैल अग्रवाल। धारावाहिकः दयानंद पाण्डेय। रूबरुः विजेन्द्र शर्मा ।स्मृति शेषः आदिल रशीद। तीज त्योहारः शकुन्तला यादव। संस्मरणः शैल अग्रवाल। मंथनः विजेन्द्र शर्मा । विमर्शः नगमा जावेद मलिक। मुद्दाः विक्रम आदितेय। चौपालःविजय कुमार सत्पति। हास्य व्यंग्यः संजीव निगम । चाँद परियाँ और तितलीः शैल अग्रवाल।
और
माह की साहित्यिक खबरों से भरपूर रंगारंग विविधा और वीथिका में कबिरा खड़ा बाजार में अपनी विचारोच्चेजक टिप्पणियों के साथ वेद प्रताप वैदिक ।
अगले माह के विषय की सूचना और विवरण 'अबाउट अस' पृष्ठ पर है।
देखते-देखते भारत ने आजादी के पैंसठ वर्ष पूरे कर लिए।बहुत कुछ बदला और सुधरा है इस बीच । आज भारत विश्व में एक ताकत की तरह उभर रहा है। कई कीर्तिमानहासिल किए हैं हमने धरती पर ही नहीं अंतरिक्ष में भी। यहाँ तक कि भगवान तत्व ढूँढने मेंभी हमारे वैज्ञानिकों की अहम् भूमिका रही है। पर धरती पर, हमारे अड़ोस-पड़ोस में,लाखों वैसे ही भूख से बिलखकर मर रहे है। खुद अन्न उगाने वाले किसान परिवार का पेट नभर पाने की वजह से आत्महत्या कर रहे हैं, मजदूर सड़कों और वर्क साइट्स पर दम तोड़ देते हैं और हम संज्ञा शून्य हैं इस संघर्षमय जीवन से। वैसे भी क्या बदल पाए हैं हम! 65 साल पहले विभाजित भारत-पाकिस्तान आज भीलड़े जा रहे हैं । न तो वे अपनी विभाजन रेखा से संतुष्ट हैं और ना ही अपने पडौसी से। कश्मीर अभी तक सुलग रहा है और घरों के अंदर परिवार और रिश्तों की डोर टूटती-सी नजर आती है। यौन अपराध की खबरें और और घिनौनी होती जा रही हैं, बढ़ रही हैं।
बात यहीं खतम हो जाती, कैसे भी संभाल ली जाती। निपट लेता एक अरब से ऊपर की जनसंख्या वाला भारत देश, हर आसन्न खतरे से। पर समस्या तो यह है कि कोई भी खुश नहीं आज के इस आजाद भारत में। राजा, प्रजा, नायक, अभिभावक, देश काराष्ट्रपति तक नहीं । सभी को संरक्षण और आरक्षण चाहिए। बैसाखी और सीढ़ियां चाहिए। घुन-सा व्याप्त भृष्टाचार चाटे जा रहा है देश को, इसके चरित्र को। हर हाथ में आज पत्थर है और हर जुबान पर एक मुद्दा । चेहरे जाने कैसे-कैसे गुबारों से मटमैले हैं और हम हैं कि आइने ही साफ किए जा रहेहैं।
वजह कई और कुछ भी हो सकती हैं। स्वतंत्र भारत में पली-बढ़ी जनता हो या नेता, प्रायः जिम्मेदारियों अब अहसास हीन हैं। क्योंकि न तो कुर्बानियां दी गई हैंऔर ना ही पराधीनता का दुख झेला गया है। सुलभ इस संस्कृति में हर आदमी अपने पद और ओहदेका भरपूर फायदा ले रहा है, लेना चाहता है। वह शायद कोई और वक्त था, जब मूल्य भिन्न थे जीवन के। जब भारतीय चरित्रवान और गरिमामय थे और अपनी साफछवि में गौरव लेते थे। आदर्श और सिद्धान्तों के लिए हर त्याग आसान था उनके लिए। आज तो तिजोरियां भरने और स्वमूर्ति गढ़ने से ही फुरसतनहीं..किसी भी पद पर हों अफसर से लेकर चपरासी तक ...डॉक्टर, नेता, अभियंता, जज, पुलिस सब। हम भूल चुके हैं कि आजादी सिर्फ मनमानी उच्छृंखलता ही नहीं, साथ में जिम्मेदारी और कर्तव्यबोध न हो तो यही आजादी फिसलन बन सकती है , चोट दे जाती है-
' यह वह भारत तो नहीं जिसके लिए लाखों ने शीश कटाए,जान गंवाई अपने ही खून का ले आचमन चोला लाल रंगाया जाने कब आएगी अपनी आजादी !'
नफे-नुकसान की नपी-तुली संस्कृति में जी रहेहैं हम। एक हाथ दो, तो दूसरे से लो। यही उपकार और परोपकार है। सारा दमखम छवि और तिकड़म की ही तो है। इसीलिए शायद आज भारत की पहचान इसका आध्यात्म और विवेक नहीं, बौलीवुडहै विश्व केआगे। कोई बुराई नहीं इसमें पर एक आत्माहीन शरीर शिव तत्व को खोकर शव ही तो है।
जैसा कि हर बदलाव के साथ होता है बहुत कुछ झरा और टूटाहै। विशेषतः हमारी आंतरिक संरचना और जीवन के मूल्य। भारतीय संस्कृति जोजुड़कर चलने, प्रेम और सद्भाव पर आधारित थी। करुणामयी थी , बड़ों का आदर करना, ध्यान रखना जानती थी, आज या तो सेक्स और शराब में डूब चुकी है या फिर सास भी कभी बहू थी जैसे कसैले घरेलू मुद्दों में उलझ कर रह गई है।पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित तेजी से बदल रही है यह और जो काम कानहीं उसे बेरहमी से फेंक रही हैं...भाई-बहन, मां-बाप..रिश्ते, सद्भाव सभी को।
निश्चित ही आज का यह भृष्ट भारत हमारे सपनों का भारत नहीं। क्या खो गया है हमारे पास से जिसे ढूँढना ही होगा तकि एक बार फिर हम भारतीय होने में गर्व का अनुभव कर सकें। कभी नारायण दत्त तिवारी तो कभी राखी सावंत ..सस्ता मनोरंजन बहुत हो चुका।क्या हमनेऐसे ही स्वतंत्र भारत का सपना देखा था? यदि नहीं, तो क्या थाहमारासपना औरइन सपनों को पूरा करने के लिए हम क्या कर सकतेहैं?जबाव शायद इन फुंफकारते सवालों के फनों में ही कहीं उलझे-लिपटेहैं । देखना यह है कि हमारे राम और कृष्ण के देश में आज भी कितने साहसीऔर सूझबूझ वाले हैं जो पुनः कालिया मर्दन करसकें!
आज के भारत का असली मुद्दासामाजिक विषमताओं का है...विषमताएं कुछ प्रकृति देय और अधिकांश हमारीअपनी संवेदन-शून्यता की वजह से...अन्याय और कुरीतियों के आगे मूक समर्पण या हमारेस्वभाव की बेबसी की वजह से...या फिर चलने दो जैसे चल रहा है वाली पलायनवादीप्रवृत्ति की वजह से।..ऐठीमालिकाना प्रवृत्ति और रीढ़ की हड्डी हीन जी हजूरी वाले इस मानसिक प्रदूषण की वजह से। जाति वाद और अपना अपना धर्म व सम्प्रदाय के स्थापन केकुकुरमुत्ती भेदभाव की वजह से हम आजतक वैसे ही विपन्न और असमर्थ हैं जैसे किपरतंत्र भारत में थे, जिससे उबरने के लिए कभी हजारों ने जान दी थीं।
मानाहर परिस्थिति बस में नहीं होती, प्रारब्ध का बड़ा हाथ होता है जीवन में और फिर प्रकृतिभी तो बदल रही है , अप्रत्याशित परिवर्तन आसपास का मौसम ही नहीं हमारा जीवन भी दूभर कररहे हैं परन्तु इस कठिन वक्त में सिर्फ मौसम ही नहीं हम भी तो बदल रहे हैं...आत्मसंरक्षण के भय और दबाव तले मानवता खो रहे हैं...स्वार्थी और संवेदना विहीन होते जारहे है।
आज के अमानुष और ताकतवरसमाज के अनगिनित कुरूप और घिनौने कुकर्मों की सड़ांधअब तोकरीब-करीबपूरे हीविश्व को दूषित कर चुकीहै, और हम ही नहीं, आने वाली कई-कईपीढ़ियां हरज़ानाभुगतने को मजबूर हैं।बहुतकुछ बदल रहा है और तेजी से बदल रहाहै। नजरिया हमारे मूल्य सभीकुछ।आज भौतिकता और ऐश्वर्य की अदम्य लालसा ही जीवन का ध्येय और शर्त बन चुकी नजर आती है औरनैतिकता व मानवीय मूल्य पिछड़ेपन की निशानी। सब चोरी कर रहे हैं और जबतक पकड़े न जाएं कोई भीचोर नहीं। अपने भारत में तोपकड़े जाने पर भी चोर नहीं। सफलताऔर ताकत ही प्रमाणपत्र है उँचे चरित्र के भी और ऊंचे ओहदे के भी। नेता याअभिनेता नहीं, चन्द धनाढ्यों की बात नहीं...कल का आम, लाचार और मजबूर आदमी भी अबत्वरित परिणाम चाहता है...कमा कर बराबरी नहीं कर सकता तो चोरी चकारी, लूटपाट याअपहरण किसी से भी नहीं हिचकिचाएगा वह ...जरूरत पड़े तो इस लालच में हत्या भी कर देगा...जैसा कि पहले थ्रिलर या हौरर मूवीज में होता था, क्योंकि उसने अपने हर आदर्श हर सिद्धांत को टूटते बिखरते देखा है, उनके सूत्रघार और ठेकेदारों तक को फिसलते देखा है।दौड़ में आगे रहने कीप्रवृत्ति ने किसको धक्का दिया किसके ऊपर पैर रखकर आगे बढ़े; सबभुलवा दिया है सबसे। जब आदमी आदमियत के गौरव को ही भूलता जा रहा है तो जिम्मेदारियों को कैसे याद रख पाएगा। ‘मैं ‘ का आकारइतना बड़ा हो गया है कि ‘हम’ ‘तुम’ सब विलुप्त हो चुके हैं। ध्यान न रखा तो यहहांफता भागता मैं भी थककर संज्ञाहीन होने में अधिक वक्त नहीं लेगा। इसकी बेचैनी औरहवस ही जरूर ले डूबेगी इसे।
बात बहुत पुरानी नहीं है, एक बहुत महत्वपूर्ण पद और प्रतिष्ठा के नेता जिनपर देश की बड़ी जिम्मेदारी थी, बातों ही बातों में पूछ बैठे थे -विदेश में बसे आप भारतवंशी क्या सोचते हैं भारत के बारे में ? और तब जो जबाव मुँह में आया था आज आपके साथ बांटना चाहती हूँ - एक ऐसी इमारत जिसकी नींव खोखली हो चुकी है, और छत जर्जर...देखना यह है कि बीचकी दीवारें कबतक और कैसे संभली रहेंगी, या खड़ी रह पाएंगी!
आप भी शायद जान-बूझकर अनजान बनें, पूछें -यह साहित्यिक भाषा समझ में नहीं आई- तो नींव यानी हमारा वर्किंग क्लास हमारे किसान और मजदूर...जो आज भी हड्डी-तोड़ मेहनत के बाद भी भूखे सोते हैं, बच्चों का, परिवार का पेट न भर पाने की ग्लानि में आए दिन आत्महत्या करने पर मजबूर हैं । और छत यानी हमारे शासक, अनुशासक, अभियंता और उद्योगपति, जिनके सहारे देश चलता है ...चलना चाहिए ...जो कर्तव्यों को भूलते नजर आ रहे हैं, अपनी ही हवस भरने में लगे रहते हैं। फिर यह बीच की दीवारें , यानी चन्द ईमानदार और सच्चे देश के नागरिक जो जी जान से देश के हित में सब कुछ न्योछावर करने के जजबे पर जीते हैं, देश की गाड़ी घसीट रहे हैं, कबतक गधों की तरह हर निठल्ले और नाकारों का भार ढोते, आक्रोश के ज्वालामुखी पर धधकते हुए भी, शांत और संतुलित रह पाएंगे। छोटी-छोटी सुविधाएं भी नहीं इनके पास, जबकि नेता अभिनेता सब अरबों में खेल रहे हैं। इनके लिए तो कभी पानी गुम तो कभी बिजली गुल। दवा और खाने पीनों की मिलावट से तो आज हर भारतीय संपन्न हो या विपन्न, परेशान ही नहीं डरा है।
खतरा बाहर से नहीं हमारे अपने अंदर से है। जागरूक हस्तक्षेप जरूरी है...समाज के आम आदमी, उसके रहन सहन , उसकी सोच, उसके साहित्य, उसके मनोरंजन सभी को जिम्मेदार होना पड़ेगा...नफे-नुकसान की बात भूलनी पड़े तो भूलनी होगी। ज़ाहिर है विश्वीकरण के इस युग में जीने के ही नहीं, रुचि और मनोरंजन के साधन भी बदल रहे हैं। स्पर्धा के मकड़ जाल में हरेक को कुछ नया परोसने और ढूंढने की अंधी चाह है। तुरंत की लोकप्रियता कीतलाशमें विवेक और जिम्मेदारी दोनों ही बहुत पीछे छूट गएहैं, न सिर्फ लेखकों से, अपितुप्रकाशकऔर प्रस्तुतकर्ताओं से भी...आधुनिक तकनीकियों से सब कुछ तुरंत ही सामने आ जाता है। अच्छा बुरा सब। इन्द्रजाल भी अपवाद नहीं। हाथ पर हाथ धरेहम तमाशबीन बने बैठे हैं और क्रूरता व अश्लीलता के चित्र व विडिओ बाजारोंमें, इन्द्रजाल आदि परघूमते रहते हैं। आसानी से उपलब्ध हैं। जानेकिस आस या उपहास में आए दिन लगातार भेजे और दिखाए जाते हैं...चित्रजिन्हें आम आदमीदेखते ही आंखें बन्द करने पर मजबूर हो जाए।सोचने पर मजबूर हूँकि वाकई में कौन इन्हें देखना चाहेगा, औरआखिर क्यों कोई इन्हें दिखानाभी ?...किसतरह केप्रभाव औरपरिणामकी अपेक्षा की जाती है इनसे...। क्या मानसिक न्यूनता औररुग्णता का नाम ही आज कला और साहित्य है। माना साहित्य तत्कालीन समाज का दस्तावेजहै पर भविष्य के प्रति इसके दायित्व को भी नहीं भूल सकता...हर यात्रा का पहलाकदम स्वयं से ही शुरु होता है और मंजिल स्वतः मिल जाती है यदि हम सही दिशा की तरफदेख रहे हों, तो। शोषण और पोषण की इस संस्कृति में अपने आस-पड़ोस, समाजमें तोकुछ बदल नहीं पाए, विश्व की समस्याओं सेजूझकर क्या हासिल कर पाएँगेहम !
इंगितमात्र कर देने सेतो हल नहीं निकल आते। जबतक हर आदमी अपने कामोंऔर अभिप्रायोंकीजिम्मेदारी नहीं लेता किसी भी बदलाव की अपेक्षा बेमानी हीहै।न तो कहीं कोई डरा याशर्मिन्दा है, और ना ही किसी की यातना में कोई कमी आ पाई है, यादिला पाया है, तो सिर्फइनकटे सिरों की तस्बीरों और चिनगारी भरी बातों से क्या फायदा ! आज भीतो हम आँखेंबन्द करकेमलाई खा लेते हैं। आज भीतोलाठी वाला ही भैंस हांकता है और आज भी तो शेरकीखाल ओढ़े गीदड़ ही राज करते हैं; क्योंकि आज भी तो अच्छी तरह सेसब कुछजानने, समझनेकेबावजूदभीसमाज के अपराधी और भ्रष्टों काहीहम राजतिलक कर आते हैं; क्योंकि आजभी तोबस बातें ही आसानहैं।
अमीर हों या गरीब, ध्येय प्राप्तिही एकमात्र लक्ष्य और साधन दोनों हैं आज। यही वजह है कि आमरोजमर्रा की खबरे तककिसी भी डरावनी तस्बीर से कम भयावह नहीं। पहले जिन बातों को सुनने मात्र से आदमीलाल हो उठता था आज हम उन्हें अनसुना करना सीख चुके हैं। अभाव और अतृप्ति से हाराइन्सान या तो आक्रोश में हैवान बन जाता है या फिर शुतुर्मुर्ग की तरह रेत में अपनेआँख कान दबा कर असहाय और अनजान। दोनों ही स्थितियाँ हानिकारक हैं। जरूरत आज मानवीय गुणों को बचा कर रखने कीहै। विषम परिस्थितियाँ ही विवेक और धैर्य की कसौटी होती हैं विशेषतः उनके लिए जोप्रबुद्ध हैं, सक्षम हैं, समाज के लिए कुछ कर सकते हैं। धैर्य और संयम नहीं खोनाचाहिए, ना ही भरोसा और आशाही।
हमारा इरादा समस्याएँ गिनने याउनके प्रति ध्यान आकर्षित करने मात्र का नहीं।
याद आ रही है बर्तोल ब्रेख्त की एक कविता-
' नया ज़माना यक्-ब-यक् नहीं शुरू होता । मेरे दादा पहले ही एक नए ज़माने में रह रहे थे मेरा पोता शायद अब भी पुराने ज़माने में रह रहा होगा ।
नया गोश्त पुराने काँटें से खाया जाता है ।
वे पहली कारें नहीं थीं न वे टैंक हमारी छतों पर दिखने वाले वे हवाई जहाज़ भी नहीं न वे बमवर्षक,
नए ट्राँसमीटरों से आईं मूर्खताएँ पुरानी । एक से दूसरे मुँह तक फैला दी गई थी बुद्धिमानी ।'
अँग्रेज़ी से अनुवाद : सुरेश सलिल
...धूल झाड़ने और सोचने की जरूरतहै, क्योंकिजबावइसी समाज में हैं और हमारेअपने अन्दर हीहैं। इन्सानियत में विश्वाश पुख्ता रखने के लिए त्याग और सद्भावना की मिसालें आज भी यदा कदा सुनने को मिल ही जाती हैं । भारत एक विशाल और सुन्दर देश है और रहेगा। विविध संस्कृतियों की इन्द्रधुषी छटा से भरपूर यह देश आज भी विविधता में एकता का न सिर्फ संदेश देता है अपितु जीता है और सारी घटनाओं और अफवाहों को भूलकर यूँ ही जीते रहना चाहिए इसे। कई तूफान पार किए हैं हमने, इस आधुनिकता की हवस और उच्छृंखलता से उबरने की शक्ति भी ढूँढ ही लेंगे, क्योंकि बहे जरूर हैं पर डूबे नहीं हैं। जीना अभी भी भूले नहीं हैं , आँसुओं से भी मोती की चमक ढूँढ लेना आता है हमें।
हमारी नदियाँ , पर्वत , रीति रिवाज जहां रंगों की अल्पना हैं .तीज-.त्योहार स्पंदन। सावन भादों तो दो ऐसे विशेष महीने हैं जब रिमझिम फुहारें ही नहीं, विभिन्न त्योहारों की बौझारें..गीत-संगीत, अंतस् सींच जाते है। नेह डोर से बांध जाते हैं। लेखनी के पाठकों को भारत के छाछठवें स्वतंत्रता दिवस के साथ-साथ आगामी त्योहार रक्षा बंधन और कृष्ण जन्माष्टमी की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ ।
भारत उतना ही महान है जितना कि ईसा से ५०००वर्ष पूर्व था . आज के जन मानस की जीवन शैली मैं जरूर अंतर आ गया है. पहले आध्यात्मिक उपलब्धि प्राप्त करना मुख्य लक्ष्य हुआ करता था .भौतिक उपलब्धि गौण लक्ष्य था तथा आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए साधन मात्र था. आध्यात्मिक उपलब्धि साध्य और भौतिक उपलब्धि हेय एवं साधन मात्र था. आज यह जीवन परिदृश्य बदल सा गया है .भौतिक उपलब्धि मुख्य लक्ष्य हो गया तथा आध्यात्मिक उपलब्धि भौतिक उपलब्धि के लिए साधन मात्र रह गया है . यह अत्यंत चिंतनीय विषय है. सच्चे भारतीय- संस्कृति -प्रेमी जन को इस हेतु स्व क्षमतानुसार उचित प्रयास करना ही चाहिए.
भारत के जन-वृन्द का दिवस ही चरित्र की प्रतिष्ठा से प्रारम्भ होता है. जागरण के समय ही परमपिता परमात्मा का स्मरण , माता-पिता को प्रणाम और नित्य कर्म के पश्चात यौगिक प्रक्रिया . यह एक अद्भुत दिनचर्या है. भारत में संध्या-वंदन का चलन रहा है. संध्या-वंदन के बाद ही अन्यान्य धार्मिक एवम सामाजिक अनुष्ठानों के सम्पादन कि स्वीकृति दी गयी है.संध्या-वंदन में पढ़े जाने वाले समस्त वैदिक मन्त्रों में एक ही ब्रह्म की वन्दना है. सूर्य देव को ब्रह्म स्वरूप मानते हुए मन ,वचन, कर्म से किये हुए समस्त पापाचरण से मुक्ति की प्रार्थना की जाती है. यह अपने आप में अद्भुत है. पाप से मुक्ति हेतु प्रायश्चित का यह दैनिक अनुष्ठान विश्व में और कहीं नहीं किया जाता.
संध्या वंदन में सूर्य देव को जल से अर्घ्य देने का विधान है. एक बार मेरे गुरु-श्रेष्ठ लक्ष्मी नारायण शास्त्री संध्या-वंदन कर रहे थे. मैंने बाल स्वभाव से पूछा- संध्या-वंदन में अर्घ्य देते समय जलांजलि को ऊपर उठा कर क्यों विसर्जन किया जाता है ? वे मुस्कराये और कहा-
"यह समस्त ब्रह्माण्ड पंच-तत्त्वों से विनिर्मित है. किसी भी एक तत्त्व की कोई उपादेयता नहीं ,प्रत्येक तत्त्व एक दूसरे से मिल कर सृष्टी की रचना में सहायक हुआ. जलांजलि में प्रथम जल को लेकर ऊपर उठाया ,यह जल को आकाश तत्त्व से मिलाया गया, जल के विसर्जन में जब जल ऊपर से छोड़ा जाता है तब यह वायु के मिलन का अवसर है. जल वायु से मिलता हुआ पृथ्वी की ओर बढ़ता है.वह अपनी ही गति से तेज तत्त्व को प्राप्त कर लेता है .इस तरह चार तत्त्व जल, वायु, तेज, और आकाश मिला दिये गए .अब ये पृथ्वी से मिलते है. यह मिलन ही सृजन करता है. ब्रह्म इसी तरह शिव रूप में तत्त्वों का विखंडन एवम विष्णु रूप में संयोजन करते हैं . हमें जीवन में सभी की उपादेयता संयोजन में ही देखनी चाहिए .सभी जड़ -चेतन पदार्थों में इन्हीं पंच तत्त्वों को देखना चाहिए और उनमें उस जीवन दाता ब्रह्म की अनुभूति करनी चाहिए . यही हमारी संस्कृति का मूल उत्स है". दिवस की ऐसी निर्मल एवं कोमल आरम्भ की प्रक्रिया भारत के सिवाय कहीं देखने को नहीं मिलती है.
भारतीय संस्कृति "भय से मुक्ति " की एक सशक्त प्रक्रिया है. भय तब तक बना रहेगा जब तक द्वैत्व स्थापित है. भय से मुक्ति के लिए ही भारतीय संस्कृति अपने अंतर में प्रतिष्ठित पुरुष को बाह्य अशरीरी पुरुष के साथ एक रूप होने का सन्देश देती है. जो कुछ जगत में विद्यमान है और जैसा आप अनुभव कर रहें हैं बस वैसा ही आपके अंतर में विद्यमान है. इस तरह द्वैत्व के स्थान पर अद्वैतव को स्थापित कर भय से मुक्ति का रास्ता दिखा दिया गया. यह ज्ञान से ही संभव है. ज्ञान सत्य और ब्रह्म नित्य है.
बिना ज्ञान के भय से मुक्ति नहीं .अज्ञान मोह का कारक है. मोह पाप का तथा पाप भय का कारक है. अतः मुक्ति के लिए आत्मज्ञान जरूरी है .आत्म ज्ञान ही आनंद का श्रोत्र एवम अभयत्व का हेतु है. यह भारत की सांस्कृतिक पराकाष्ठा की पहचान है. जिसे आज पश्चिम शारीरिक-भाषा के रूप में ले रहा है.जिसे सीखने -सिखाने के लिए होड़ मची है.पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है. भारतीय इस में पीछे नहीं है .वे अपने ही उत्पाद को अन्य का मान खरीदने के लिए दीवाने दिखाई दे रहें हैं .
चीन , यूरोप, अमेरिका जिस योग और अंतर-यात्रा की बात कर रहें हैं वह भारत की उन पर उधारी है. अंतर-यात्रा भारतीय साधना है. यहाँ अंतर की यात्रा चरित्र-शोधन एवम जबरदस्त चरित्र-प्रतिष्ठा की जीवन यात्रा है. बिना चरित्र के भला आत्मानंद स्वरूप ब्रह्म कहाँ मिलने वाला है ? श्रीमद भगवत गीता में अर्जुन प्रभु श्री कृष्ण से पूछते है- प्रभु श्री! आपको कौन सा व्यक्ति प्रिय है ? श्री कृष्ण कहतें हैं- अर्जुन ! जो व्यक्ति द्वेष से रहित रहते हुए सभी प्राणियों के साथ मित्रता और करुणा के साथ रहता हो ,अनासक्त एवम अहंकार रहित रहता हो, दुःख एवम सुख में सामान रहता हो ,जो स्वयं में सम्पूर्ण लोक को एवम सपूर्ण लोक में स्वयं को देखता हो ,जो हर्ष , क्रोध ,भय जैसे अनुदात भावों से मुक्त है वह ही मुझे प्रिय है. श्री कृष्ण ने उदात्त और उदार चरित्र को बता दिया .जिसका चरित्र उदात्त और उदार है, वही आत्मज्ञान का अधिकारी है,वही अन्तर यात्रा का अधिकारी हो कर विराट ब्रह्म की सायुज्यता प्राप्त कर सकता है. मुझे दुःख है कि आज विश्व भारतीय चेतना को पकड़ रहा है और भारतीय अपने आत्म कल्याण को भूल कर साधन को ही साध्य मान रहें हैं.
जीवन का उद्देश्य आनंद है. क्योंकि ब्रह्म के सच्चिदानंद स्वरुप से सत-चित तत्त्वों से सृष्टि का रचन हुआ .सृष्टि में नहीं है, तो आनंद तत्त्व नहीं .इसीलिए यह सृष्टि निरानंद कही और मानी गयी . जो नहीं है उसे तो प्राप्त करना है.आनंद नहीं है. उसे प्राप्त कर के ही जीवन सार्थक कर सकतें हैं .आनंद प्राप्त किया तो मान लो कि ब्रह्म मिल गया . उसे प्राप्त करने के ऋषियों ने छह मार्ग -अन्न ,प्राण ,चक्षु ,श्रोत ,मन और वाणी बताये. तपश्चर्या से इन मार्गों का निर्वाह करने का आदेश दिया . इसी से विज्ञान और आनंद प्रशस्त होता है. और तभी विराट ब्रह्म में लय होता है. यह सब अभी बहुत आगे की बात है. पश्चिम ने तो अभी सतही तोर पर इस विराट विषय का स्पर्श मात्र अनुकरण किया है. अभी उसे बहुत कुछ समझना शेष है.
'तुम्हारी राजधानी न भावै राणा वृंदावन जाऊंगी।' मीरा का यह संगीत संपूर्ण भारत का संगीत है। भारतभूमि का संगीत-संदेश है। संतों, भक्तों महात्माओं की साधना का संगीत है। राजधानी नहीं, वृंदावन भारत का अंतर्मुखी जीवन-संदेश-वृंदावन चलो। राजधानी छोड़ो। सुख-शान्ति राजधानी नहीं वृंदावन में है। जहां आनन्द कृष्ण की मुरली बज रही है। नाम ले-लेकर बज रही है। 'नाम समेतं, कृत संकेतं '। वृंदावन जाने का संकेत। राधा-राधा कहकर बज रही है। मीरा, मीरा बोल रही है। वन-पर्वतों, नदी-झरनों, पथ-वीथियों आदि के घेरों को तोड़ती-फोड़ती बज रही है। कहीं कोई दीवार नहीं। रोक रुकावट नहीं। देश-काल की सीमा लांघती भारत के कोने-कोने में बज रही है। वंशी धुन सुनने के लिए काल ठहर गया है। असंख्य कानों, अंतहीन, अनंत रोमछिद्रों से सुनी जा रही है। मुरली ध्वनि की हवा बह गई है। मंद-मंद मुरली वायु। मुरली की मंद-मंद वायु । सभी दिशाओं में एक साथ बह रही है। खिड़की दरवाजों का कोई बन्धन नहीं। आंगन, अमराई एवं करील कुंजों में बज, बह रही है।
वृंदावन की इस मधुर ध्वनि को राजस्थान में मीरा, बंगाल में चैतन्य, असम में शंकरदेव, माधवदेव, तामिल आलवार, तैलंग वल्लभाचार्य, निंबार्क, महाराष्ट्र के महानुभाव, विठ्ठल भक्त, कन्नड़ के मध्वाचार्य, गुजरात में नरसी आदि सुन रहे हैं। यह ध्वनि संपूर्ण भारत को जोड़े हुए है। कंधार के महानुभाव मंदिर में भी यह ध्वनि गूंज रही है। सभी दिशाओं के कान खुल गए हैं। असंख्य रोमांचित हैं। कोटि-कोटि कान, दिशा-विहीन कान ब्रजबल्लभ के संगीत से उद्वेलित हैं। सृष्टि में पहली बार ऐसा मधुर, मोहक संगीत बजा है। नहीं, बजता नित्य है। संगीत सनातन है, अनादि, अनंत है। पहले के लोगों ने भी सुना होगा, हम नहीं जानते। शायद महाभारत के शंखनाद में यह संगीत दब गया हो। कौन बताए? आज तो सभी जातियों, वर्गों, धंधों के स्त्री, पुरुष यह संगीत सुन रहे हैं। चांदनी रात में, अंधेरे के शून्य में यह ध्वनि और मधुर-मादक बन जाती है। यह परा वाणी है। जन-जन की परा, पश्यंती, मध्यमा से एकाकार हो रही है। परा की परिणति वैखरी गूंगी होकर चिल्लाती है---कृष्ण...कृष्ण...कृष्ण। कृष्ण पुकार साकार हो गई है। लोक और वेद साथ-साथ बज रहे हैं। सन्यासी और गृहस्थ दोनों प्रणत हैं। दोनों के हृदय में बज रही है।
यह ध्वनि वसंत की प्रतीक्षा नहीं करती। स्वयं वसंत हैं। वसंत बनाती है। इसे सुनकर वसंत भागता आता है। मधु भी, माधव भी। मधूक पुष्पों में रस छलक रहा है। पलाश वन दहक रहे हैं। रस लोभी भ्रमर सहकार के लिए दौड़ रहे हैं। आधी रात पावलों ने अपना हृदय खोल दिया है। लोक मन में उचाट है। भोग छूट रहा है। घर वन और वन घर हो रहा है। वृंदावन की गोपियों ने घर छोड़ दिया है। पति, पुत्र, माता-पिता, गुरुजन कुछ भी नहीं। जो जैसे हैं वैसे ही भागी आ रही हैं। रेती पर रमण, रेती रमण। कृष्ण...कृष्ण...कृष्ण...क्या चमत्कार है इस बांस बंसुरिया में? माधव की मादक मदिरा भरी फूंक में? सारे कंठ कृष्ण-कंठ हो गए हैं। कंठ-कंठ में कृष्ण हैं। टहकार चांदनी का रास शुरु हो गया है। चंद्रमा का आनन्द प्रकाश है। आनन्द...आनन्द...और आनन्द ...अनन्त आनन्द। आनक दुंदुभि के नंदन का आनंद नाद।
कृष्ण में कर्ष है। खींचना। खींचते जाना। कृष्ण सबको खींच रहे हैं। सबकी ओर खिंच रहे हैं। राधा पर खिंचे हैं, गोपी भाव में खिंचे हैं। राधा...राधा...राधा...राधा कृष्ण पर खिंची है। कृष्ण, कृष्ण पुकार रही है। श्रंगार बाधन बन गए हैं। प्रियपथ पर चलती, कहते श्रृंगार राधा में माधव के, माधव में राधा के श्रृंगार बज रहे हैं। एक कृष्ण अनेक हो गए हैं। एक-एक गोपी गले में एक-एक कृष्ण की गलबहियां। कोमल, शीतल, तृप्त, उत्तेजक गलबंहियां। कंस के गले का फंदा कस रहा है। राधा कृष्ण की गलबांही कंस के गले को डस रही है। नागिन ने जकड़ लिया है। उसकी नींद उचट गई है। मथुरा खाली हो रही है। लोग वृंदावन भाग रहे हैं। वृंदावन वनवारी ही रक्षक है। ' वृंदावन जाऊंगी...' बांसुरी सबको खींच रही है।
राजधानी में प्रेम नहीं। प्रेम संगीत नहीं। यहां केवल युद्ध पटह पटपटा रहे हैं। सभी दिशाओं की जड़ता हिल गई है। वीणा, मृदंग, पखवाज, खोल, झांझ, मजीरा आदि सभी वाद्य कृ,ण कीर्तन में लगे हैं। राधा कृष्ण बजा रहे हैं। वृंदावन बजा रहे हैं। वंशी ने सबकी माया, मोह, आसक्ति छीन ली है। सब कृष्ण समर्पित हैं। कृष्ण के लिए। कृष्णाया प्रति गोपी के साथ कृष्ण हैं। कृष्ण केवल मेरे हैं। मेरे साथ हैं। मैं कृष्ण के साथ हूं। मैं कृष्ण हो गई हूँ। कुछ देर पूर्व राधा थी। आधा थी। अराधिका थी। अब कृष्ण हूँ। पूर्ण राधा, पूर्ण कृष्ण।
कृष्ण अपना रस-रूप द्वारका नहीं ले गए हैं। उनका रस रूप वृंदावन में है। वे वृंदावन से कभी अलग नहीं होते हैं---' कबहुं न होत निनार ' । उद्धव गोकुल आ रहे हैं। गोपियों को समझाने आ रहे हैं। कृष्ण उद्धव से कहते हैं - देखो, गोकुल के वन मेंडरना नहीं। मैं वहां मंत्री (मित्र), रस रूप में सदा रहता हूं। व्रजदेवी भी तुम्हारी रक्षा करेंगीं। वैष्णव जहाँ जाता है, वहां वहां वृंदावन बस जाता है। वैष्णव वृंदावन बसाता है। महात्मा गांधी ने एक वृंदावन बसाया। मन वृंदावन। भीतर का वृंदावन। प्रार्थना सभा का, अहिंसा के सत्य का वृंदावन। सगुण वृंदावन। निर्गुण-सगुण वृंदावन। बूगोल से बड़े आचरण का वृंदावन। सत्य, अहिंसा का आडंबरहीन पाराकृत वृंदावन। असत्य और हिंसा की राजनीति को गांधी पसंद नहीं। संतन ढिंग बैठने वाली मीरा का भजन, नरसी का वैष्णव जन पसंद नहीं। गांधी यमुना के कालिय को भगा न सके। उसने गांधी का वध कर दिया। वृंदावन को अपने जहर से जला दिया। मरकर भी कंस के वंश का विस्तार रुका नहीं।
वृंदावन सभ्यता, संस्कृति और धर्म है। मानवता का ज्योति-सतंभ है। वृंदावन में राधा-कृष्ण का ऐक्य है। फिर भी संत सनातन में समता का अभाव था। उन्होंने राधा का स्थानी मीरा से मिलना अस्वीकार कर दिया--मैं स्त्री से नहीं मिलता। राजरानी का ज्ञान जगा। समर्पण ने पूछा, ' क्या वृंदावन में कृष्ण के अतिरिक्त भी कोई पुरुष है?' सनातन की आँखें खुल गईँ। नहीं, पुरुष तो केवल श्री कृष्ण हैं। वही सबके पुर में शयन करते हैं। द्रौपदी की लाज बचाने वाले कृष्ण ने गोपियों के वस्त्र उतार लिये। णीरा भी लोक-लाज का आवरण उतारकर आई थीं। स्त्री भाव से भक्ति का विकास हुआ। समर्पण स्त्री शक्ति है। कृष्ण पति, प्रभु, भर्ता हैं। सबका भरण करने वाले। अहंता, ममता में भेद है। अहं पुरुष है। ममता स्त्री है। दोनों के हटते ही स्त्री-पुरुष का भेद हट जाता है। तब जीवमात्र स्त्री है। प्रकृति की प्रकृति। अपना भोग, छप्पन भोग प्रभु को समर्पित कर दो। प्रभु समर्पित भोग मुक्ति बन जाता है। कृष्ण ने गोपियों के भोग को स्वीकार किया, स्वयं योगेश्वर बन गए। अच्युत। काम को पुत्र बनाया। अच्युत का पुत्र काम।
कृष्ण का रसिक मन वृंदावन में ही छूट गया। उसे राधा ने चुरा लिया था। कृष्ण ने स्वयं दे दिया था। कृष्ण को डर है, राधा उनके और खिलौने न चुरा ले।
' मत ले जाय चुराय राधिका कछुक खिलौने मेरो। '
जगत् खिलौनों पर दोनों का दावा बराबर का है। राधा को वंशी प्रिय है। कृष्ण के होठों की जूठी वंशी। राधा ने पूर्ण समर्पण किया। कृष्ण की वंशी भी दे दी। फिर भी कृष्ण को संदेह है। राधा उनकी वंशी चुरा सकती है। वंशी राधा की है, किन्तु उसकी शोभा राधा के पास रहने में है। राधा को देखकर ही वंशी बजती है। सप्त स्वर निकालती है। राधा के विना वंशी किस काम की ?वृंदावन के बाहर वंशी नहीं बजी। नहीं बजेगी। बज नहीं सकती है।
वृंदावन के बाहर शंख बजेगा, शंख ध्वनि। सुदर्शन चक्र चलेगा। प्रभु का चक्र परिवर्तन, जन्म-मरण, उत्पत्ति-विनाश सब सुदर्शन है। कालचक्र कंस का काल आ गया। सुदर्शन आ गया है। कृष्ण गोकुल में खेलते हैं। मथुरा में मातुल वध करते हैं। द्वारका को बसाते हैं। नगर, राज, परिवार सब। गोकुल से लौटते उद्धव को राधा ने बांसुरी दे दी। ' कीरति कुमारी सुरबारी दई बांसुरी। ' किन्तु कृष्ण को अब बांसुरी नहीं, युद्धास्त्र चाहिए। वे मातुल-बध करेंगे। मामा शकुनि ने महाभारत करा दिया था। कृष्ण अपने घर में महाभारत नहीं होने देंगे। जीवन में कभी-कभी अनुचित जैसा कार्य भी करना पड़ता है। कृष्ण को कंस मामा को मारना पड़ा। शायद इसलिए भी कि वह देवता के अंश का नहीं था, असुरोत्पन्न था। असुर ने उसे छल से उत्पन्न किया था। उसकी मां के साथ असुर छल हुआ था। छलवाला बलवाले से मारा गया।
राधा यह सब जानती थी। कृष्ण को अब वंशी नहीं चाहिए। किंतु राधा को तो कृष्ण की बांसुरी ही चाहिए। चक्र सुदर्शन जितना भी महत्वपूर्ण हो। वह राधा के किसी काम का नहीं है। प्रेम का मार्ग, राधा कृष्ण प्रेम का मार्ग तो पूर्णतः अहिंसक है। यहां तो रूठने में भी मजा है। क्रोध भी प्रेम को बढ़ाता है। प्रेम का क्रोध। क्रोध का प्रेम। राधा और क्या देती ? बांसुरी ही तो सबसे प्रिय है। कृष्ण ने उसे स्वीकार नहीं किया। मथुरा, द्वारका नमें कभी बांसुरी नहीं बजी। भला रणछोड़ क्या बांसुरी बजाता। भागना भी उसकी रणनीति है। वह सच का भगोड़ा नहीं है। भक्तों ने रणछोड़ की भी पूजा की, उसे पूज्य माना।
राधा, मीरा रणछोड़ राणा की पूजा नहीं करेगी। राधा की एकमात्र इच्छा है-कृष्ण गोकुल लौंटें। वह मथुरा, द्वारका नहीं जाएगी। स्त्री कहीं नहीं जाती। पुरुष को ही आना है। श्री कृष्ण, आओ। तुम्हारा रणछोड़ नाम राधा को पसंद नहीं। राजस्थान में रणछोड़ राणाओं की कमी नहीं। कहां-कहां तक गिनाएं ? किसे-किसे बुलाएं ? मीरा राजस्थान छोड़ेगी। उसे राणाओं की बूमि पसंद नहीं है। युद्ध और कलह से मन ऊब गया है। ऐसे में एकमात्र कृष्ण ही शरण हैं। कुकुक्षेत्र के योगी कृष्ण नहीं। गोकुल के प्रेमी कृष्ण नट-नागर। छछिया भर छाछ पर नाचने वाले कृष्ण। गाय गोपी के पीछे घूमनेवाले कृष्ण।
कृष्ण ने बहन सुभद्रा को अपने शिष्य सखा को दे दिया। बलराम को यह पसंद नहीं। बलराम अर्जुन को अपहर्ता समझते हैं। कृष्ण समझाते हैं, बलराम को मनाते हैं। सब में मेरी अनुमति थी। मेरी अनुमति के बिना अर्जुन सुभद्रा का अपहरण नहीं कर सकते। राजस्थान के राणा कृष्ण-रहित हैं। उनमें बलराम जैसी शक्ति भी है। ऐसे में उनकी इच्छा या अनुमति बेमतलब है। तथाकथित रणछोड़ ने गोकुल, मथुरा एवं द्वारका को अपना शक्ति केन्द्र बनाया। राणा का एक भी शक्ति केन्द्र नहीं रह गया है। सब पर मुगल अधिकारी हैं। रणछोड़ कृपा करते हैं। राजशक्ति रखकर भी राजा नहीं हैं। राजा बनाते, मिटाते हैं। राजा उनका खिलौना है क्रीड़ा मृग। राणा मुगलों के हाथ का खिलौना हैं। वे मुगल कृपाकांक्षी हैं। शक्ति के द्वारा मुगल उनका सबकुछ छीन ले रहे हैं। ऐसे में मीरा ललकारती है। मुझे राजधानी नहीं, राणा की राजधानी नहीं, गोकुल की यमुना किनारे का रास चाहिए। राजधानी में रस नहीं है। रस केवल रास में है, भागवत कीर्तन में है।
मीरा रानी है। राजघ राने की है। किंतु राजघराना छोड़ती है। कृष्ण हवेली में जाती है। रानी मीरा अकेली नहीं है। अनेक राजाओं , रानियों ने राजमहल छोड़ा है। मनुष्य भौतिक सुख से ऊबता है। जवाहरात को देह पर टांगे-टागे थकता है। जवाहरात बोझ बन जाते हैं। सुख सूख जाता है। औपचारिकता उपचार चाहने लगती है। मन में दर्द उठता है। सत्ता छोड़ने का दर्द। साधारण बनने का दर्द। तब राजसत्ता, शरीर सुख का केन्द्र तुरंत छूट जाता है। बुध्द, महावीर, सनातन रूप आदि का छूटा था। स्त्रियों में अक्क, लल्ला, मीरा, अंडाल का छूटा था। इन सबने अपने को कृष्ण से जोड़ा। राजधानी से नहीं, कृष्म भूमि से। रेशमी फाड़ोक कंबल लपेटे। खुद नाचो। खुद बजाओ। नाच-नाचकर कृष्ण को रिझाओ। राधा को मनाओ। काम, कंस प्रतीक कालिय ने संपूर्ण ब्रज-जल को गंदा कर रखा है। यमुना जहरीली हो गई है। उस कालिया को भगाओ।
अंडाल तमिल में गा रही है। अक्क कन्नड में, महानुभाव संत मराठी में, नरसी गुजराती में, मीरा राजस्थानी, विद्यापति मैथिली, चैतन्य और चंडीदास बंगला, अष्टछाप के कवि ब्रजभाषा में गा रहे हैं। जयदेव की संस्कृत अत्यंत सरल हो गई है। ललित लता बन गई है। सर्वत्र राधा-कृष्ण संगीत का कोमल मलय समीर ही बह रहा है। मंद-मंद मुरली का प्रभाव घना हो उठा है। कृष्ण आनंदित हैं, अपने ही प्रतिबिंब के साथ क्रीडारत हैं। जैसे बालक अपने प्रतिबिंब के साथ खेलता है।
बुद्ध, महावीर, मीरा आदि राजपरिवार के थे। इन्होंने राजघराने के कुत्सित कुरूप को देखा था, भोगा था।
उन्हें विरक्ति हुई। वे कृष्ण शरण में आईं। जूता ठोंकते रैदास शरण में। त्याग के चरम पर पहुंची। भोग नहीं, योग का चरम। मीरा ने अपना दर्द कृष्णार्पित कर दिया। कृष्ण ही दर्द की दवा है। ' सांवलिया वैद '। संसार रोग है, भव रोग। कृष्ण वैद हैं। संपूर्ण समर्पण साँवरिया वैद की दवा का मूल्य है। मीरा को राणा की राजधानी नहीं भाती है। यह रण में लगे कृष्ण की राजधानी है। मथुरा द्वारका नहीं, वृंदावन।
मीरा का संगीत देश-देश घूम रहा है। राजस्थान के मारवाड़ी देश-देश घूम रहे हैं, देश-देश को समृद्ध कर रहे हैं, मीरा का संगीत फैला रहे हैं। वैष्णवता के मुख्य आधार हैं। व्यापार के केन्द्र हैं। मीरा मारवाड़ी हैं। गुजराती हैं। व्रजी हैं। हिन्दी की हैं, मीरा के गीत इन भाषाओं को लांघ रहे हैं। जगह-जगह रास, रस का उडुराज उदित है। राधा-कृष्ण संगीत के पर्याय हो गए हैं। साहित्य, संगीत, कला सब में राधा-कृष्ण की पुकार है। अनेक पठान, मुगल, शेख, सैयद भी कृष्ण संगीत के प्रेमी बने। राधा-कृष्ण की मधुर झांकियों ने उनका उद्धार किया।
मीरा विद्रोहिणी थीं। सभी भक्त विद्रोही हैं। भक्ति विद्रोह है। भौतिकता से विद्रोह, भोग से विद्रोह, संसार शरण से विद्रोह। कृष्ण शरण। कृष्ण शरण का रस अलौकिक है। अतः अकथनीय भी है।
मीरा शंख नहीं, सितार बजाती है। शंख में महाभारत है। सत्ता परिवर्तन का महाभारत शंख भय उत्पन्न करता है। सितार में आत्मिक शक्ति है---सत्ता नहीं, स्वभाव परिवर्तन की शांति। बांसुरी , सितार सत्ता नहीं, स्वभाव बदल रहे हैं; अहिंसक स्वभाव समाज बना रहे हैं।
कृष्ण की बाल-लीलाओं का जैसासजीव, सरस और मनोहारीचित्रण सूरदास ने अपने पदों में किया है, वह आज भी अप्रतिम है और हिन्दी साहित्य वकृष्ण भक्तोंके लिएअमूल्य धाती है । प्रस्तुत हैं उन्ही में से चन्द चयनित पदः
जन्माष्टमी विशेष
जसोदा हरि पालने झुलावै। हलरावै दुलरावै मल्हावै जोई चाहै सोइ कछु गावै।। मेरे लाल को आउ निंदरिया काहे न आनि सुवावै। तू काहै नहिं बेगहिं आवै तोको कान्ह बुलावै।। कबहुं पलक हरि मूंद लेत हैं कबहुँ अधरफरकावैं। सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि करि सैन बतावै।। इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि जसुमति मधुरै गावै। जो सुख सूर अमर मुनि दुरलभ सो नंद भामिनीपावै।।
काहू जोगी की नजर लागी है मेरो कुंवर, कन्हैयारोवै।। घर घर हात दिखावे जसोदा, दूध पीवे नहीं सोवै।। चारो डंडी सरल सुन्दर, पालने भेजु झुलावै।। मेरी गली तुम छिन मति आवो, अलख अलख मुख बोलै।। राई लवण उतारै यसोदा सुरप्रभु को सुलावै।
मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो। भोर भई गइयन के पाछै, मधुवन मोहिपठायो। चार पहर बंसीबट भटक्यो, सांझ परे घर आयो।। मैं बालक बहिंयन को छोटो,छींको केहि विधिपायो। ग्वाल बाल सब बैरि पड़े हैं, बरबस मुंहलपिटायो।। यहि लै अपनी लकुटि कंमरिया, बहुतहि नाचनचायो। सूरदास तब बिंहसि जसोदा,लै उर कंठलगायो।।
मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ। मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तूजसुमति कब जायौ? कहा करौं इहि के मारेंखेलन हौंनहि जात। पुनि-पुनि कहत कौन है माता, कोहै तेरौ तात? गोरे नन्द जसोदा गोरीतू कतस्यामल गात ? चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत, हँसत-सबै मुसकात। तू मोहीं को मारन सीखी, दाउहिंकबहुँ न खीझै। मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै। सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमतही कौ धूत। सूर स्याम मौहिं गोधन की सौं, हौं माता तू पूत॥
मैया मोरी कबहुं बढ़ैगी चोटी। किती बेर मोहि दूध पियत भइ यह अजहूं है छोटी॥तू जो कहति बल की बेनी ज्यों, ह्वै है लांबी मोटी। काढ़त गुहत न्हवावत जैहै नागिन-सी भुई लोटी॥ काचो दूध पियावति पचि पचि देति न माखन रोटी। सूरदास त्रिभुवन मनमोहन हरि हलधर की जोटी॥
ग्वाली तैं मेरी गेंद चुराई, ग्वाली तैं मेरी गेंदचुराई। खेलत गेंद परी तेरे अंगना, अंगिया बीच छिपाई।। काहे की गेंद काहे का धागा कौन हाथ बनाई। फूलन की गेंद रेशम का धागा जसुमति हाथ बनाई।। झूटे लाल झूट मति बोलो अंगिया तकत पराई। जो मेरी अंगिया में गेंद जो निकसे भूल जावो ठकुराई।। हंस हंस बात करतग्वालिन सों उतते जसोदा आई। सूरदास प्रभु चतुर कन्हैया एक गये दो पाई।।
बूझत स्याम कौन तू गोरी। कहां रहति, काकी है बेटी, देखी नहीं कहूं ब्रज खोरी॥ काहे कों हम ब्रजतन आवतिं, खेलति रहहिं आपनी पौरी। सुनत रहति स्त्रवननि नंद ढोटा, करत फिरत माखन दधि चोरी॥ तुम्हरो कहा चोरि हम लैहैं खेलन चलौ संग मिलि जोरी। सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि बातनि भुरइ राधिकाभोरी॥
बरखा की फुहारें ही नहीं, प्यार-मनुहार और आभार के कई बड़े अवसर लेकर आता है अगस्त का महीन। भाई बहन के आपसी स्नेह का पर्व, योगेश्वर श्री कृष्ण का जन्मोत्सव और देश की आजादी का उत्सव... राखी, जन्माष्टमी और पन्द्रह अगस्त...ये तीन दिन... तीनों नाम लेते ही यादों की बाढ़ आ जाती है। आंखें मछली सी मचल-मचल स्मृति-प्रवाह में तैर आती हैं।
व्यक्तिगत स्तर पर राखी की अनगिनत खट्टी-मीठी यादें हैं। भाई-बहन की आपसी छेड़छाड़ और अनगिनत वे मीठे पल जब भाइयों की आरती उतारकर, उनकी कलाइयों पर खुद की बनाई नई-नई डिजाइन की राखियां बांधा करते थे...एक दूसरे को मन पसंद मिठाइयां और पकवान खिलाते न थकते थे ...भाई-बहन के प्यार और रिश्ते का महत्व समझते-समझाते, हंसते-लड़ते और फिर रूठते-मनाते पूरा दिन ही मीठी-मीठी यादों और कहकहों में गुजर जाता था...और उस एक दिन, राखी की दुहाई दे-देकर, एक-दूसरे से कुछ भी करवा लिया जाता था ...बहन होना अच्छा और विशेष लगा करता था तब।
मुख्यतः बहन भाई की कलाई पर अपने स्नेह का धागा बांधकर उसकी लम्बी उम्र की कामना करती है इस दिन, सदा विजयी होने का आशीर्वाद देती है और भाई उसकी मान-मर्यादा और हर खुशी की रक्षा का वचन। इसीलिए राखी के त्योहार को रक्षाबन्धन भी कहते हैं जिसमें महत्वपूर्ण बस भाई बहन का पारस्परिक स्नेह ही है और वह राखी का एक धागा...या नेह की डोर है जिसको बहन भाई की कलाई बाधती है और भाई बहन की रक्षा के वचन में उस प्रेम की डोर के साथ आजीवन बंधा रह जाता है। हर साल ही इस एक दिन को त्योहार की तरह मनाकर भाई-बहन अपने नेह-संकल्प को दृढ़ करते चलते हैं|
राखी का त्योहार कब और कैसे शुरु हआ इसके बारे में भी कई-कई कहानियां हैं और अन्य त्योहारों की तरह, रक्षा बन्धन के साथ भी कई कहानियाँ जुडी हुई हैं। एक कहानी यह भी है कि एक बार राजा इन्द्र की राक्षसों से लडाई छिड गई। लडाई कई दिनों तक होती रही। न राक्षस हारने में आते थे, न इन्द्र जीतते दिखाई देते थे। इन्द्र सोच में पड़गए। वह अपने गुरु वृहस्पति के पास आकर बोले ,"गुरुदेव, इन राक्षसो से मैं न जीत सकता हूँ न हार सकता हूँ। न मैं उनके सामने ठहर सकता हूँ, न भाग सकता हूँ। इसलिये मैं आपसे अन्तिम बार आर्शीवाद लेने आया हूँ। अगर अबकी बार भी मैं उन्हें हरा न सका तो युद्ध में लडते लडते वहीं प्राण दे दूँगा। उस समय इन्द्राणी भी पास बैठी हुई थी। इन्द्र को घबराया हुआ देखकर बोली, " पतिदेव, मै ऐसा उपाय बताती हूँ जिससे इस बार आप अवश्य लडाई में जीतकर आयेगे। इसके बाद इन्द्राणी ने गायत्री मंत्र पढ़कर इन्द्र के दाहिने हाथ मे एक डोरा बाँध दिया और कहा, पतिदेव यह रक्षाबन्धन मै आपके हाथ में बाँधती हूँ। इस रक्षाबन्धन को पहन कर एक बार फिर युद्ध में जायें। इस बार अवश्य ही आपकी विजय होगी। इन्द्र अपनी पत्नी की बात को गाँठ बांधकर और रक्षा बन्धन को हाथ में बधवाकर चल पड़े। इस बार लड़ाई के मैदान में इन्द्र को ऐसा लगा जैसे वह अकेले नही लड़ रहे इन्द्राणी भी कदम से कदम मिलाकर उनके साथ लड रही है। उन्हे ऐसा लगा कि रक्षाबन्धन का एक-एक तार ढ़ाल बन गया है और शत्रुओं से उनकी रक्षा कर रहा है। इन्द्र जोर शोर से लड़ने लगे। इस बार सचमुच इन्द्र की विजय हुई। तब से ही रक्षाबन्धन के त्योहार का प्रचलन हुआ। यह त्योहार सावन की पूर्णिमा को मनाया जाता है इसलिये इसे सावनी या सलूनो भी कहते हैं।
परन्तु यह बहन की भाई को राखी बाँधने की प्रथा भारत में राजस्थान से शुरु हुई मानी जाती है। वहां यदि किसी औरत पर कोई मुसीवत आती थी तो वह मनोनीत वीर पुरुष को अपना भाई कहकर राखी भेज दिया करती थी। राखी का मतलब होता था बहिन की रक्षा का भार उठाना। कहते हैं कि एक बार रानी कर्णवती ने बादशाह हुमायूं को इसी उद्देश्य से राखी भेजी थी। वह मुसलमान था फिर भी राखी का न्योता पाकर अपनी मुँहबोली बहिन की रक्षा के लिये आया। कहते हैं तभी से बहिनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बाधने लगी हैं। कहीं कहीं गुरु और शिक्षक भी समाज के समर्थ वर्ग को उनकी दीर्घायु की कामना करते हुए राखी बांधते हैं और बदले में उनसे अपनी और समाज की रक्षा का वचन लेते हैं।
इसी महीने आता है वह लाडला पंद्रह अगस्त का दिन भी...जिसके लिए हम भारतीयों के मन में एक अलग ही गौरव, एक पूरा इतिहास जीवित कर देता है। पूरे देश ही नहीं, पूरे विश्व में ही हर भारतीय इस दिन मन ही मन भारत से जरूर ही जुड़ता है। भारत में तो बच्चे-बड़ों सभी के लिए यह आज के स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा त्योहार है ही। और यह जोश व श्रद्धा सुबह से ही दिखने लग जाता है। बच्चे-बच्चे का सुबह-सुबह ही सफेद उजले कपड़े पहनकर ध्वजारोहण के लिए जाना और अभूतपूर्व उत्साह मन में लिए वे देशभक्ति के तरह-तरह के गीत समवेत स्वरों में गाना । फिर हर बोल का उपस्थित मनों पर गहरा और स्थाई असर छोड़ जाना, याद दिलाना कि इस आजादी के लिए पूर्वजों और अग्रजों ने क्या -क्या त्याग नहीं किए थे...सुख-चैन क्या, अपनी जानतक वार दी थी देश पर...कभी-कभी तो शायद यह तक सोचना कि उस समय हम खुद क्यों नहीं पैदा हुए, जाने कितने युग पुरुषों को एकसाथ देखने और सुनने का सौभाग्य मिलता!
तिरंगे में लिपटा बचपन भी कम जोश नहीं देता था...विध्यालय के प्रांगण में लहराते तिरंगे से उड़ती वे सफेद गुलाब और गेंदे की केसरिया पंखुरियां जब हरी पत्तियों के संग जन-गण-मन की स्वर-लहरियों पर तैरती परिसर में बिखरती थीं, तो पूरे ही तो रंग जाते थे सब, हरे सफेद और जोगिया, तिरंगे के तीन रंगों में... और एक वह गीत जो कोई गाए या नहीं गाये, स्वतः ही दिनभर कानों में गूंजता रहता था...' मेरा रंग दे बसंती चोला माँ.. '।
वैसे भी ये वे दिन होते हैं जब बातबात पर मन रोमांचित हो उठता है...उमंगों के पंख-चढ़े पैर हवा से बात करते हैं और सपनों में डूबी देश की युवा आंखें देश और समाज के लिए...परिवार के लिए नित नए संकल्प लेती हैं। हम सभी तो कभी कुछ ऐसे ही थे और फिर हरसाल ही तो एक साल और सयाने हो जाया करते थे ...देश, परिवार, इतिहास और रीत-रस्मों के बारे में कुछ और नया जानने व सीखने के लिए...।
अभी एक जोश और उल्लास से उबर ही पाते थे कि जन्माष्टमी की धूम शुरू हो जाती...
भगवान श्री कृष्ण का भादो कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन जन्म हुआ था। इस स्मृति में जन्माष्टमी का त्यौहार आज भी भारत के विभिन्न प्रान्तों में विशेषतः उत्तर प्रदेश और राजस्थान में खूब ही धूमधाम से मनाया जाता है। कृष्ण आज भी भारतीय चेतना में ज्ञान और आनन्द के प्रतीक हैं। कर्मयोगी हैं। जो जी भरकर जीने में...शाश्वत आनन्द में विश्वास करते हैं। रास रचाते हैं। मुरली बजाते हैं। भक्तों के भक्त हैं और दुष्टों से संहारक हैं। बचपन से ही उन्हें नवनीत या जो कि मूल तत्व है, वही पसंद है। त्वरित बुद्धि हैं साथ में नीर क्षीर विवेकी भी, इसीलिए योगेश्वर कहलाए। होठों पर सुख -शांति और आनंद का संगीत है। बांसुरी है और उंगलियों पर दुष्ट संहारक चक्र। सर पर मोरपंख है जिसकी आंख दिव्य दृष्टि की तरह सब देख और समझ रही है। नेह, कपट, धूर्तता, सरल वात्सल्य सब। कृष्ण समय और परिस्थितियों के पारखी हैं। गोकुल में माखन खाने वाले ने वृंदावन में रास रचाया और मथुरा जाकर शंखनाद किया चक्र उठाया। चक्र जो असुरों को भ्रमित करता है। नचाता- दौड़ाता है। उनका नाश करता है। ऐसे अलौकिक सखा कृष्ण की तरफ हम आज भी आत्मोत्थान के लिए देखते हैं। शान्ति सुख चैन के लिए देखते हैं। भगवान मानते हैं और उनके जन्मोत्सव पर प्रमुख मंदिरों में आज भी कृष्ण लीला की झाकियाँ सजती हैं । जगह-जगह शोभायात्रा निकाली जाती हैं और आधी रात को कृष्ण जन्म के बाद ही श्रद्धालु भोजन करते हैं।
बड़ों के ब्रजवासी (हमारी बाल-पीढ़ी विशुद्ध बनारसी थी) होने की वजह से हमारे यहां भी जन्माष्टमी का एक विशेष महत्व था और हर साल ही जन्माष्टमी बहुत ही उत्साह व धूमधाम से मनाई जाती थी। बीसियों वे झांकियां जो हम भाई बहनों ने मिलकर हर साल ही सजाई थीं, आजभी तो रेखांकित हैं मानस पटल पर! घर के बड़ों का व्रत होता था जन्माष्टमी के दिन, पर हम बच्चों को खुली छूट थी फलाहारी पकवान और मेवा से बने तरह-तरह के व्यंजनों का दिनभर भोग लगाते रहने की। एक अथक उत्साह से भरे सुबह-सुबह ही गंगा जल से धुले पूजा के उस कमरे में जब हम मां, दादी,ताई, चाची, सभी की रंग-बिरंगी और मंहगी बनारसी साड़ियों को (चाहे वे चाहें या न चाहें) दीवार पर लटका दिया करते थे तो तुरंत ही वह कमरा एक अद्भुत दिव्य रेशमी आभा से झिलमिलाने लग जाता था। फिर इसपार से उसपार तक कमरे को ढकते दो बड़े तख्त बिछवाए जाते थे, जिसपर कृष्ण-लीला की झांकी के लिए मंच बनता था और उनपर सफेद बुर्राक नयी पल्लियों के बिछते ही मन एक अजीब शान्ति और सौम्यता से भर उठता था। फूल-माला, तुलसी व कदम्ब और वैजन्ती के फूलों से गुंथी अशोक के पत्तों की बनी, मनोहारी बन्दनवार के लटकते-लटकते तो अच्छी तरह से महसूस होने लगता था कि आज का दिन विशिष्ट है और श्री कृष्ण व कृष्ण-लीलाओं को ही समर्पित है। बुरादे को रंग-रंगकर बेहद लगन और धैर्य के साथ सड़कें बनाई जाती थीं, बाग-बगीचे , पूरी मथुरा नगरी और नंदगांव सभी कुछ बनता था। घर के बड़े-बूढ़े, नौकर चाकर सभी को लपेट लेते थे हम अपने उस बाल-सुलभ जोश में। कोठरी से वह भारी बक्सा निकलवाया जाता था जिसके अन्दर सजे-धजे बैठे कृष्ण भगवान गोपियों सहित पूरे साल आराम फरमाते रहते थे...और तब राधा कृष्ण ही नही, वासुदेव, देवकी, यशोदा ,राजा नन्द व गोपी, ग्वाले...यहां तक कि कंस और उसके तरह तरह के राक्षस, गाय-बछड़े सभी तो निकल आते थे अपना वार्षिक दर्शन देने के लिए।
बेहद तरतीब और लगन से सजते थे वे कृष्ण-लीला से जुड़े भांति-भांति के खिलौने---वासुदेव की टोकरी में बैठे नंदगांव जाते कृष्ण, जिनकी वर्षा से रक्षा स्वयं शेषनाग कर रहे होते थे और यमुना नदी का पानी जो उनके पैर छूने के लिए ही उमड़ आता था व नवजात कृष्ण के पैर छूते ही, तुरंत ही उतर भी जाया करता था...कालिया मर्दन सभी कुछ तो दर्शनीय और अनहोने आश्चर्य से भर देता था मन को।
माखन खाते कृष्ण, पूतना वध करते कृष्ण, और बिजली के सहारे घूम-घूमकर रासलीला करते कृष्ण---जितनी गोपियां उतने कृष्ण...पूरा वह कमरा ही कृष्णमय हो उठता था , फूलों और धूपबत्ती से महकता-गमकता। दिन भर कृष्णलीला के तरह-तरह के गीत गूंजते रहते चारो तरफ ...हारमोनियम ढोलक और मंजीरे लिए बैठी भक्त मंडली के साथ-साथ, कमरे-कमरे रेडियो पर और मां-दादी के होठों पर भी। मानो जैसे उस एक दिन के लिए हमारा घर, घर न होकर, नन्दगांव, बरसाना बन जाता था, मथुरा बृंदावन बन जाता था। सामने बड़े-बड़े थालों में तरह-तरह के मेवा-पकवान और कतरियां व फल-फूल सजे रहते और वहीं रंग बिरंगी बत्तियों की आभा में झिलमिलाते हम सभी बच्चे-बूढ़े पालथी मारे बेसब्री से रात का इन्तजार करते, जब एक तरफ मथुरा के मन्दिर से कृष्ण के जन्मोत्सव का रेडियो पर आंखों देखा हाल आता और दूसरी तरफ शंखनाद और घंटों की आवाज के बीच चांदी के पालने में खीरे के अन्दर छुपे लड्डू गोपाल हमारी कौतुकमय और नींदभरी आंखों के आगे पुनः जनमते। अजीब उल्लास और भक्ति की लहर छा जाती थी खुशी से दमकते हमारे चेहरों पर, जितना उल्लास सजे-धजे पालने में बैठे कृष्ण को झुलाने का होता था उतना ही स्वादिष्ट प्रसाद- पंजीरी और चरणामृत पाने को भी तो...।
औरफिर अंत में वह पहली बार इंगलैंड आने के कुछ महीने बाद ही, भाई का आंसू भीगा पत्र, जिसमें लिखा था अबकी बार जन्माष्टमी पर कुछ अच्छा नहीं लगा, कोई उत्साह नहीं था, आप नहीं थीं। मानो विछोह के उस पल ने हमें दूर ही नहीं किया, जीवन की जिम्मेदारियों से बांधकर, तुरंत ही बेबस होना...बड़ा होना भी सिखला दिया।
और तब पहली बार पता चला कि स्नेह जो हमें जी भर-भरकर पुलकाता है, रुलाता भी है ... इतने वर्ष बाद, आज भी, चाहे-अनचाहे याद आ ही तो जाता है सब।...
वो अंधेरी राते, वो बेचैन सासे, कुछ आँसू ,कुछ आँहें, लम्बी डगर, कंटीली राहें। थके पैरों के ये छाले, डराने लगे वही साये, क्या बीतेंगी ये रातें, इन्हीं रातों मे कहीं चमके, कभी जुगनू, कभी दीपक, इन्हीं की रौशनी मे हम, अपना सूरज ढूढने निकले। वो घुँआ वो अंगारे, धधकते से वो शोले, अगन सी जलती ये आँखें, उम्मीदों को ही झुलसायें इसी पल कतरा बादल का, फुहार बनके आजाये, नई आशा जगा जाये।
-बीनू भटनागर
कौन जाने...
कौन जाने घर कहाँ,देश कहाँ पर्वत से रहे तुम जीवन में नदी सी दुनिया बह चली समंदर हंसा ख्वाइशों का सामने, बोलो, तुम भटके थे या मैं भटकी!!
- शैल अग्रवाल
कहा मैंने शहर से
कहा मैंने शहर से ‘‘जगह दो नदी को
बहने दो उसकी निष्च्छल, उज्ज्वल धारा को पूरने दो कलेजा धरती का’’
नहीं दी नगर ने जगह नदी को अपनी ऊँची इमारतों के पांवों को धंसने दिया नदी के सकुचाए तटों पर कंक्रीट के चैड़े सीमेंटी पटरों से पाट दिया बहती धारा की छाती को
कहा मैंने गृहवासियों से ‘‘जगह दो नदी को बहने दो उसकी कल कल उज्ज्वल धारा को नम होने दो धरा को’’
नहीं दिया गृह धारकों ने जगह धारा को धरा को घेर-घेर बना लिए एक मंजिले-दुमंजिले मकान सिकुड़ गई नदी बंटती रही उपधाराओं में नाली जैसा रूप धर कर इधर से उधर डोलती रही
कहा मैंने बार-बार बहुतों से बहुत बार सुनी नहीं उन्होंने मेरी बात रुचि नहीं उन्हें मेरी गुहार
उनमें से कई हुए नाराज मेरी अन-अपेक्षित दखल-अंदाजी पर उन्हें था गहरा एतराज नाराज मैं रही लगातार नगर, शहर और ग्रामवासियों से उनकी निर्मम लापरवाही से बीतते दशकों के बीच वर्षों के हुजुम आगे बढ़ गए मनुष्य आसुरत्व के बीच ठिढके रहे
अब धरा है नाराज नगर-डगर, धूप-छांव के बीच प्यासे डोल रहे थलचर, नभचर, जलचर जल चाहिए सबों को ! वाकई जल हम सबों को चाहिए, कुछ घंटों के अंतराल पर प्यास से कंठ सूख जाता है रह-रह कर
नाराज नहीं है अगर तो वह है नदी हल्की बारिश होते ही वह झिलमिला उठती है वरना वह तो सूख गई है जमीं के नीचे जाकर बैठ गई है
समाज, सभ्यता और संस्कृति को पोशित करने वाली धारा लुप्त हो गई है
लोग जल खोजने निकल पड़े हैं चंद्रमा और मंगल पर लेकिन वहाँ नहीं है नदियों के पैरों की नम्र छाप
जल को तलाशते मनुष्यों के हाथ-पैर और मन-प्राण ब्रह्मांड में भटक रहे हैं
-इला प्रसाद
मैं
मिला जो एक पल खाली, तो सोचा क्या साकार हूँ मैं ? ईश्वर की कोई अमर कृति , या पन्ना बेकार हूँ मैं ?
फूलो से लदी कोई डाली हूँ , या काँटो का झाड़ हूँ मैं ? मै हूँ वॅशी की 'धुन मधुर , या युद्ध का कर्कश नाद हूँ मै ?
यही सोचते हुये फिर , एक पल बीत गया ! फिर हारी मै और वक्त जीत गया !
विचारो की टूटी कड़ी , जब एक वृद्ध से टकरा गयी, बढ गयी धड़कन ह्रदय की , और अंधेरा छा गया !
देकर सहारा बाजुओ का , जल्द मैने इसको उठाया, हाथ रख सर पे बोला , बेटी एक वरदान हो तुम!
इस विस्तृत संसार मे, मानवता की पहचान हो तुम, बात उसकी सुनकर, ह्रदय मेरा भर गया,
ढूढ रही थी जिसको मै, आज मुझको मिल गया!
डा. श्रु्ति मिश्रा
समुद्र के किनारे
समुद्र के किनारे-किनारे वे साथ चलती हैं उनके पीछे चलती है उनकी उम्र
आकांक्षाएँ इधर-उधर डोलती हुईं मन यहाँ-वहाँ ठिठकता हुआ
लड़की की निगाह में जादू की परछाईं है गुजरती हुई मर्सीडीज की कतार वैभव का लालित्य रचती है किशोरी उस लालित्य की भंगिमा को निहारती हुई
मोहित
स्त्री की नज़रों में आकाश है प्रगाढ़ नील आकाश उस आकाश में हल्के उड़ते हुए बादल हैं पल-पल आकार बदलते हुए आकाश स्त्री के शरीर के अंदर भी है
गृहाकाश, शरीराकाश और साक्ष्याकाश को निहारती मायालोक की तहों को भाँपती हुई स्त्री हतप्रभ है
चार पैर उतरती हुई शाम में साथ चलते हैं उनकी निगाहें एक दूसरे को बिना काटे बिना हुए हुए एक साथ जमीनी वैभव और आकाशीय उद्भवों को करीब से देखती हैं
वे साथ चलती हैं
- इला प्रसाद
शहर और लड़की
डाल पर चहकती हैं चिडि़या, पेड़ों पर झूलती हैं लड़कियां आसामान में उड़ान भरती है चिडि़या, आकाश में नई मंजिलों की छूती हैं लड़कियां कुल्हाड़े से केवल पेड़ ही नहीं कटते, बसेरे भी उजड़ जाते हैं चहचहाहट के संगीत के साथ किलकिलारियां भी मद्वम हो जाती है जंगल की हरियाली ही नहीं, शहर की हरीतिमा भी खो जाती है एक का उजड़ता है घरौदा तो दूसरी के सपने बिसूर जाते हैं एक की खो जाती है दिशा तो दूसरी के सपने गुम हो जाते हैं एक जीते जी शहर में, अचानक क्फर्यू की मुर्दगी पसर जाती है दूर कहीं पुलिस की जीप के बजते सायरन से चिडि़या ही नहीं लड़कियां भी सहम जाती हैं अपनी लाचार सिमटती दुनिया में और सिकुड़ जाती है हौंसले हवा हो जाते हैं, दोनों के ये किसकी नजर लगी है जंगल को जो शहर के नाम पर उजाड़ा जा रहा है जबकि शहर में जंगलराज छा रहा है यह कैसा है सभ्यता का अतिचार गमलों में बोनसाई लगाकर खेतों में पापुलर पेड़ उगाकर शहर में जंगल लग रहा है जंगल में शहर बस रहा है -नलिन चौहान
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संग
सूरज की सुनहली रश्मियों में लिपटी वह बारजे पर खड़ी रही पहाड़ अपनी समूची सतह फैलाए हुए हाथी जैसी पीठ पर सूर्य को लाद लेने का उपक्रम कर रहे थे साड़ी का गहरा हरापन सुनहले नारंगी बूटों को संभालता खड़ा था सबके पीछे खड़ा था उसका मन जो उस वक्त उदास होना चाहता था वह नहीं चाहती थी उदासी
मन को संभाले समेटे वह खड़ी रही शाम की रंगीन बूंदों के संग उसका चित्त भरम में डूबता उतराता रहा वक्त डूबने उतराने के भरम के बीच बीतता रहा स्वयं को निरपेक्ष भाव से निहारता उसका मन उसके संग खड़ा रहा वह स्वयं के संग संग उसे चाहिए था वक्त का दिया हुआ संग उसके मन में मन उसके संग
विचारों की गंध के पीछे बढ़ने पर उबड़ खाबड़ धरती को समेटती घाटी सामने थी घाट खंड के पांव पर लहराती बल खाती काली सड़क दूर पहाड़ों पर ष्यामलता की झाईं और पहाडि़यों की परतों के पीछे सूरज का सुनहला पीला थाल अचानक क्षितिज पर स्थित दमकती अदृष्य लकीरें सूर्य के पग संभालने में अति व्यस्त हो उठीं
तभी शाम दौड़ती आई पीले पुष्प और लाल कलियों के मनके से लदीं झाडि़याँ घास की पर्त के पीछे पसरी धरती धुंएँ की लकीरों के मध्य बँटा आसमान
सभी कुछ उसके करीब कोई भी उसके करीब न था
-इला प्रसाद
क्योकि तुम बड़े और में बच्चा हूँ
सुबह की धुप में आलस की अंगडाई सिर्फ में ले सकता हूँ तुम नहीं क्योकि तुम बड़े और में बच्चा हूँ
नज़रे चुराकर दूध का ग्लास नाली में में बहा सकता हूँ तुम नहीं क्योकि तुम बड़े और में बच्चा हूँ
सड़क पर भरे बारिश के पानी में छपाक छयी में कर सकता हूँ तुम नहीं क्योकि तुम बड़े और में बच्चा हूँ
दीवारों पर अपनी कल्पना की चित्रकारी में रंग में भर सकता हूँ तुम नहीं क्योकि तुम बड़े और में बच्चा हूँ
कही भी रोना , कभी भी हँसना उसी क्षण अपनी भावनाओ को प्रदर्शित में कर सकता हूँ तुम नहीं क्योकि तुम बड़े और में बच्चा हूँ
ये जीवन जो तुम जी रहे हो में बाद में भी जी सकता हूँ पर मेरा जीवन सिर्फ में जी सकता हूँ तुम नहीं क्योकि तुम बड़े और में बच्चा हूँ
-अंशु हर्ष
असमंजस
मैने ढोल नहीं बजवाए मिठाई नहीं बाँटी मन में मेरे लड्डू भी नहीं फूट पाए...
क्षमा करना मुझे मेरी बेटी...!
तुम्हारे जन्म पर नाच नहीं पाया मेरा मन अनायास ही कुछ ऐसे बादल घिर आए
कोई दुर्भावना कोई कटुता नहीं थी तुम्हारे प्रति
मात्र अपनी सामर्थ्य पर अविश्वास...
अथवा छाया रही हो किसी आतंक की कि घिर गया मैं अनायास ही असमंजस में,
क्षण भर को लगा मुझे कि मुस्कराना नहीं है मेरे बस में।
भूल गया मैं संस्कृति और परम्परा का वह सारा ज्ञान
कन्या को देता रहा जो कहीं देवी, तो कहीं ममता की मूर्त्ति
कहीं लक्ष्मी सरस्वती या दुर्गा का सम्मान
जाने कब रावण के बलाग्रह ने रोप दिया था शंका का बीज हर पिता के मन में
और फिर न जाने कितने रावण आए कभी अलाउद्दीन खिलजी तो कभी आदम खाँ बनकर
कभी किसी शहंशाह, सूबेदार दरोग़ा या जमीदार के रूप में
देते ही चले गए त्रास भरते ही चले गए जो चिन्ता और भय परिवार के जीवन में
टूटता था हर बाप छाती कूटती पछाड खाती थी माँ खौलता था भाई का रक्त
और देखने वाले आंतकित... हर बार... जब उठती थी कोई बेटी
कारण जो भी हो व्यक्तिगत, या राजनैतिक हवस, प्रतिशोध या आक्रोश
आतंकित... अराजकता अन्याय और अपसंस्कृति से बचाता ही चला गया हर पिता अपनी बेटी को
भाई अपनी बहन को छिपाता ही चला गया पर्दों के पीछे
इतना पीछे कि पोंछने को भी आतुर हो गए उनके हाथ उसका संकेत चिन्ह गर्भाशय से भी...
कि कहीं ममता की मूर्ति उनकी
तोड़कर कोई वहशी मिट्टी में न मिलाए ले जाकर उनकी सरस्वती को किसी कोठे पर न नचाए बेचकर उनकी लक्ष्मी
किसी लखटकिए का कंठहार न बनाए दषित कर किसी दुर्गा को समाज को दुर्गति का द्वार न दिखाए।
किन्तु जानता हूँ यह भी कि ममता के बिना जीवन में रह ही क्या जाएगा!
बिना सरस्वती के संस्कार कहाँ से आएगा;
बिना लक्ष्मी के भी वैभव का स्वप्न तो बस सपना ही रह जाएगा
और बिना प्यारी सी बेटी के सूने आँगन को पैजनियों की रुनझुन से कौन गुँजाएगा।
भाग्य की इस सुन्दर भेंट का अस्वागत भला कौन कर पाएगा!
और ज्ञात है मुझे यह भी कि घोलता रहा है यथार्थ अपनी कटुता निरन्तर जीवन में मधुर रस में
क्षमा करना मुझे मेरी बेटी। घिर गया था मैं असमंजस में क्षण भर को लगा मुझे कि मुस्कराना नहीं है मेरे बस में...
-सीतेश आलोक
बेच रहे तरकारी लोग
प्रायः जो सरकारी लोग आज बने व्यापारी लोग
लोकतंत्र में बढ़ा रहे हैं प्रतिदिन ये बीमारी लोग
आमलोग के अधिकारों को छीन रहे अधिकारी लोग
राजनीति में जमकर बैठे आज कई परिवारी लोग
तंत्र विफल है आज देश में भोग रहे बेकारी लोग
जय जयकार उन्हीं की होती जो हैं अत्याचारी लोग
पढ़े लिखे भी अब सडकों पर बेच रहे तरकारी लोग
मानवता को भूल, धर्म पर करते मारामारी लोग
चमन सुमन का जल ना जाए शुरू करें तैयारी लोग ।
-श्यामल सुमन
दीवारें बोलती हैं ...
सुना है दीवारें भी सुना करती हैं, हाँ, आपने भी सुना होगा. दीवारों के भी कान होते हैं, हाँ, दीवारों की आँखें भी होती हैं. बड़े-बड़े सुनसान आलीशान महलोंनुमा बंगलों में तो कभी-कभी, इन्हें गुनगुनाते,हँसते-हँसाते,चहचहाते,चुलबुलाते महसूस किया है. लेकिन इंसानों की आहट पाते ही ख़ामोश पड़ जाती हैं ये दीवारें, ऊँची-ऊँची,ठोस, बर्फीली पर्वत-श्रृंखलाओं में बैठे किसी शांत मौनी-बाबा की सी. चुपचाप, ख़ामोशी से किसी चिर-साधना में विलीन रहा करती हैं. ये दीवारें...
उजड़े-पुराने किलों की चारदीवारियों में तो अपनी पुरानी यादों में, सुगबुगाती, आँहें भर-भर कर ,उखड़ी-उखड़ी साँसों में जिया करती हैं, ये दीवारें... कभी गुफ्तगू करती हैं,कभी छेड़तीं हैं एक दूसरे को व्यंग्य से, कभी सहम सी जाती हैं कुछ भयानक हादसों की परछाइयों से. बंद कमरों के आगोश में बहुत कुछ सहा है,भोगा है,देखा भी है, पर ख़ामोशी की ज़ुबान ओढ़ कर, किसी से कुछ कहे बगैर ही, सुख- दुःख के अनगिनत राज़ दिल में संजो कर रखतीं हैं. ये दीवारें...
गवाह हैं ये कुछ भयानक हादसों की, पर कुछ राज़ भी हैं जो, इन ख़ामोश दीवारों के लम्बे सायों में उलझ कर रह गयें हैं. काश! ये मूक दीवारें, हम इंसानों के बीच भी कुछ बोल पातीं काले धुऐं से गहराये , अनेकों सुनसान राज़ ख़ामोश है इनके आगोश में, न जाने कितने सबूतों को अपनी ख़ामोश ज़ुबान के आगोश में लपेटे बैठी हैं... केवल एक प्रतीक्षा में...कि... कोई मसीहा तो समझे इनकी भाषा,शायद ऐसी आस रखती हैं , ये दीवारें... हाँ ऐसी ही आस रखती हैं... ये दीवारें... अगर कोई पढ़ पाता इनकी भाषा तो समझ पाता कि वाकई में ये बोलती हैं, हाँ ये दीवारे बोलती हैं . देश में आयोजित खेलों के घोटालों के राज़ खोलतीं हैं. जी हाँ दीवारें बोलती हैं, जी हाँ दीवारें बोलती हैं. दहेज़ के अभाव में जलती हुई बेटियों की चीखों के राज़ खोलती हैं. और तो और, नौकरशाहों, भ्रष्ट अफसरों और नेताओं की भी पोल खोलती हैं. न्यायालयों में बिकने वाले अन्याय के राज़ खोलती हैं. जी हाँ दीवारें बोलती हैं, हाँ ये दीवारें बोलती हैं. कारगिल में शहीद जवानों की विधवाओं के आँसुओं के राज़ खोलती हैं. कौन कहता है कि ये दीवारें नहीं बोलतीं? ये दीवारें ही तो हैं, जो रेडियो में, टी.वी. पर और समाचार पत्रों में, सफ़ेद कपड़ों में छिपे भ्रष्टाचारियों के राज़ खोल रहीं हैं. आलीशान फ्लैटों की लूट-खासोटों के राज़ खोल रहीं हैं , जी हाँ दीवारें बोलतीं हैं, दीवारें बोलतीं हैं. और इसी तरह बोलती रहेंगी, बस ज़रुरत है तो समझने वालों की, इनकी भाषा पढ़ने वालों की... आज आज़ादी के पैंसठ वर्ष के बाद भी अगर हम पढ़ नहीं पाए इन दीवारों की भाषा, तो समझो व्यर्थ गया बलिदान उन शहीदों का जो मिट गए और छोड़ गए, हमें सांस लेने के लिए आज़ाद भारत में...
चार पेड़ों के एक-दूसरे के पड़ोस की अमराई पेड़ों में घोंसलों के पड़ोस में घोंसले सुबह-सुबह पक्षी चहचहा रहे थे यह पड़ोसियों का सहगान है- सरिया-सोहर की गवनई।
पक्षी, पक्षी पड़ोसी के साथ झुंड में उड़े। परन्तु मेरी नींद एक पड़ोसी के नवजात शिशु के रुदन से खुली।
यह नवजात भी दिन सूर्य दिन को गोद में लिए है सूर्य से मैंने दिन को गोद में लिया।
अपने अकेले होने को एक-एक अकेले के बीच रखने अपने को हम लोग कहता हूँ। कविता की अभिव्यक्ति के लिए व्याकरण का अतिक्रमण करते एक बिहारी की तरह कहता हूँ कि हम लोग आता हूँ इस कथन के साथ के लिए छत्तीसगढ़ी में- हमन आवत हन।
तुम हम लोग हो वह भी हम लोग हैं।
आकाश से उड़ता हुआ एक छोटा सा हरा तोता ( गोया आकाश से एक हरा अंकुर ही फूटा है. ) एक पेड़ में जाकर बैठ गया. पेड़ भी ख़ूब हरा भरा था. फ़िर तोता मुझे दिखाई नहीं दिया वह हरा भरा पेड़ ही दिखता रहा.
कोई अधूरा पूरा नहीं होता और एक नया शुरू होकर नया अधूरा छूट जाता शुरू से इतने सारे कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते
परंतु इस असमाप्त – अधूरे से भरे जीवन को पूरा माना जाए, अधूरा नहीं कि जीवन को भरपूर जिया गया
इस भरपूर जीवन में मृत्यु के ठीक पहले भी मैं एक नई कविता शुरू कर सकता हूं मृत्यु के बहुत पहले की कविता की तरह जीवन की अपनी पहली कविता की तरह
किसी नए अधूरे को अंतिम न माना जाए ।
पहाड़ को बुलाने 'आओ पहाड़' मैंने नहीं कहा कहा 'पहाड़, मैं आ रहा हूँ। पहाड़ मुझे देखे इसलिए उसके सामने खड़ा उसे देख रहा हूँ। पहाड़ को घर लाने पहाड़ पर एक घर बनाऊंगा रहने के लिए एक गुफ़ा ढूँढूंगा या पितामह के आशीर्वाद की तरह
चट्टान की छाया
कहूंगा यह हमारा पैतृक घर है।
अभी तक बारिश नहीं हुई ओह! घर के सामने का पेड़ कट गया कहीं यही कारण तो नहीं ।
बगुले झुँड में लौटते हुए संध्या के आकाश में बहुत दिनों से नहीं दिखे एक बगुला भी नहीं दिखा बचे हुए समीप के तालाब का थोड़ा सा जल भी सूख गया यही कारण तो नहीं ।
जुलाई हो गई पानी अभी तक नहीं गिरा पिछली जुलाई में जंगल जितने बचे थे अब उतने नहीं बचे यही कारण तो नहीं ।
आदिवासी! पेड़ तुम्हें छोड़कर नहीं गए और तुम भी जंगल छोड़कर ख़ुद नहीं गए शहर के फुटपाथों पर अधनंगे बच्चे-परिवार के साथ जाते दिखे इस साल कहीं यही कारण तो नहीं है ।
इस साल का भी अंत हो गया परन्तु परिवार के झुंड में अबकी बार छोटे-छोटे बच्चे नहीं दिखे कहीं यह आदिवासियों के अंत होने का सिलसिला तो नहीं ।
आकाश की तरफ़ अपनी चाबियों का गुच्छा उछाला तो देखा आकाश खुल गया है ज़रूर आकाश में मेरी कोई चाबी लगती है! शायद मेरी संदूक की चाबी!!
खुले आकाश में बहुत ऊँचे पाँच बममारक जहाज दिखे और छुप गए अपनी खाली संदूक में दिख गए दो-चार तिलचट्टे संदूक उलटाने से भी नहीं गिरते!
घर-बार छोड़कर संन्यास नहीं लूंगा अपने संन्यास में मैं और भी घरेलू रहूंगा घर में घरेलू और पड़ोस में भी।
एक अनजान बस्ती में एक बच्चे ने मुझे देखकर बाबा कहा वह अपनी माँ की गोद में था उसकी माँ की आँखों में ख़ुशी की चमक थी कि उसने मुझे बाबा कहा एक नामालूम सगा।
अब कभी मिलना नहीं होगा ऎसा था और हम मिल गए दो बार ऎसा हुआ
पहले पन्द्रह बरस बाद मिले फिर उसके आठ बरस बाद
जीवन इसी तरह का जैसे स्थगित मृत्यु है जो उसी तरह बिछुड़ा देती है, जैसे मृत्यु
पाँच बरस बाद तीसरी बार यह हुआ अबकी पड़ोस में वह रहने आई उसे तब न मेरा पता था न मुझे उसका।
थोड़ा-सा शेष जीवन दोनों का पड़ोस में साथ रहने को बचा था
पहले हम एक ही घर में रहते थे।
मैं दीवाल के ऊपर बैठा थका हुआ भूखा हूँ और पास ही एक कौआ है जिसकी चोंच में रोटी का टुकड़ा उसका ही हिस्सा छीना हुआ है सोचता हूँ की आए! न मैं कौआ हूँ न मेरी चोंच है – आख़िर किस नाक-नक्शे का आदमी हूँ जो अपना हिस्सा छीन नहीं पाता!!
शहर से सोचता हूँ कि जंगल क्या मेरी सोच से भी कट रहा है जंगल में जंगल नहीं होंगे तो कहाँ होंगे ? शहर की सड़कों के किनारे के पेड़ों में होंगे ।
रात को सड़क के पेड़ों के नीचे सोते हुए आदिवासी परिवार के सपने में एक सल्फी का पेड़ और बस्तर की मैना आती है पर नींद में स्वप्न देखते उनकी आँखें फूट गई हैं ।
परिवार का एक बूढ़ा है और वह अभी भी देख सुन लेता है पर स्वप्न देखते हुए आज स्वप्न की एक सूखी टहनी से उसकी आँख फूट गई ।
बोलने में कम से कम बोलूँ कभी बोलूँ, अधिकतम न बोलूँ इतना कम कि किसी दिन एक बात बार-बार बोलूँ जैसे कोयल की बार-बार की कूक फिर चुप ।
मेरे अधिकतम चुप को सब जान लें जो कहा नहीं गया, सब कह दिया गया का चुप । पहाड़, आकाश, सूर्य, चंद्रमा के बरक्स एक छोटा सा टिम-टिमाता मेरा भी शाश्वत छोटा-सा चुप ।
ग़लत पर घात लगाकर हमला करने के सन्नाटे में मेरा एक चुप- चलने के पहले एक बंदूक का चुप ।
और बंदूक जो कभी नहीं चली इतनी शांति का हमेशा-की मेरी उम्मीद का चुप ।
बरगद के विशाल एकांत के नीचे सम्हाल कर रखा हुआ जलते दिये का चुप ।
भीड़ के हल्ले में कुचलने से बचा यह मेरा चुप, अपनों के जुलूस में बोलूँ कि बोलने को सम्हालकर रखूँ का चुप ।
हिंदी कविता में एक ऐसा शख्स भी है जो अपनी तरह से लिखता है। जिसका हिंदी साहित्य के अनुशासन से भले ही कोई सीधा ताल्लुक न हो, पर जिसके काव्यानुशासन पर उँगली नहीं उठाई जा सकती। कविता और गल्प दोनों से सघन रिश्ता रखने वाले विनोद कुमार शुक्ल की कविताऍं एकबारगी देखने पर कलावादी प्रत्ययों से संसाधित जान पड़ती हैं किन्तु उनमें गहरे प्रवेश करने पर पता चलता है कि वे अमूर्तन को स्थानीयताओं से मूर्त एवं प्रयोजनीय बना देते हैं। इस बार वे आदिवासियों को लेकर जिस काव्यात्मक दृढ़ता से पेश आए हैं, वह उन्हें अपनी ज़मीन से जोड़ता है। अचरज नहीं कि अपरिग्रह का अभ्यासी यह कवि शब्द शक्तियों की टोह में लगातार लगा रहने वाला है जैसे कोई खगोलविद नक्षत्रों की रहस्य-लीला को समझने में। ‘कविता में इन दिनों’ के तहत नंद किशोर आचार्य,अरुण कमल,वर्तिका नंदाऔर भगवत रावत के बाद इस बार वरिष्ठ कवि विनोद कुमार शुक्ल के नए कविता संग्रह ‘ कभी के बाद अभी’ पर एक नजर।
कविता सुनती है सताई हुई कौमों की कराह
कभी के बाद अभीः
विनोद कुमार शुक्ल
राजकमल प्रकाशन प्रा.लि.
1 बी, नेताजी सुभाष मार्ग,
नई दिल्ली-110002
मूल्य: 200रुपये
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हिंदी में उपलब्ध तमाम कवियों में एक कवि ऐसा भी है जो अपनी प्रकृति,अपनी समझ, अपनी भाषा और , पर क्या वे सब उस कवि की अनुभव-छायाओं को पकड़ पाए ? वह पूरी तार्किकता और अनुभवगम्य विविधताओं के साथ, जिन्हें पढ़ने का एक धीरज भरा सलीका चाहिए और यह भी कि उन्हें पढ़ते हुए आपके और उनकी कविता के अलावा पूरा एकांत हो। कविताओं में अपने जीवनानुभवों की एक अलग दुनिया निर्मित करता है। विनोद कुमार शुक्ल ऐसे ही कवि हैंहैंकविता की संरचना में बरते जाने वाले उपकरणों तथाकल्पना व यथार्थ के सुविनियोग में बहुत विरल है। उसे समझना आसान नहीं। पर इसमें संशय नहीं कि वह उत्कट ऐंद्रियसंवेद्य कवि है। उस पर बहुतों ने लिखा है
कथा संसार की ही तरह कविता में भी विनोद कुमार शुक्ल ने सदैव अपना अलग रास्ता अख्ितयार किया है। वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहन कर विचार की तरह के साथ ही विनोद कुमार शुक्ल ने अपनी कविता को चालू कविता की आबोहवा से बचा कर रखा है। उनके कविता संग्रहों सब कुछ होना बचा रहेगा और अतिरिक्त नहीं के साथ उनके ताजा संग्रह कभी के बाद अभी में भी उनका यही तेवर बरकरार है। वे सीधे सादे वाक्यों से कविता की शुरुआत अवश्य करते हैं किन्तु आगे चल कर वह एक ऐसे तार्किक और चिंतनशील विन्यास में खो जाती है कि हम ‘ज्यों चतुरन की बात में बात बात में बात’ जैसी मुग्धमयता के मुरीद हो उठते हैं। किन्तु अनभ्यस्त पाठक के लिए उनकी कविताऍं कोई इतनी मेड इजी भी नहीं हैं। उनकी कविताओं का आनंद वही ले सकता है, वाक्य की इकाइयों से बनने वाली अर्थ संरचना पर जिसकी बखूबी पकड़ हो। जो अव्ययों, विशेषणों, क्रियाओं और योजक पदों तक से कविता की प्रतीति संभव कर सकता हो। विनोद जी कविता की सृष्टि को खेल की तरह लेते हैं और वाक्यों की व्याकरणिक संघटना से अपने अनुभवों को एक नई काव्यभाषा के पैरहन में बदल देते हैं। उनकी कविता अपने अचूक और सावधान चिंतन का परिणाम लगती है। वे अपने अवलोकन से किसी भी क्रिया को स्वाभाविक रूप से घटता हुआ नहीं देखते, उस घटना के पीछे घटती हुई अन्य चीजों को बार बार घटने के लिए एक उत्प्रेरक तत्व की तरह उकसाते हुए भी पेश आते हैं। उनकी कविता की बानगी उन्हीं के शब्दों में: एक अच्छी घटना/तुम घटने पर रहना/बल्कि घट जाना/बार बार घट जाना/ प्रत्येक मनुष्य का जीवन/हर क्षण अच्छा मुहूर्त है/सुख की घटना के लिए।
आरंभ से ही विनोद कुमार शुक्ल का यही मिजाज़ रहा है कि अक्सर वे चालू भाषा और जानी पहचानी काव्य युक्तियों से काम नहीं लेते। इसीलिए उनके जैसा कवि परिदृश्य में और नही है जो ऐसे प्रयोगों का जोखिम उठाए । किसी भी लोकप्रियता और उद्धरणीयता के मोह में पड़े बिना वे एक तरफ अपनी कविता को भाषा, तर्क और नई उपपत्तियों से जोड़ते हैं तो दूसरी तरफ वे कविता की प्रयोजनीयता की ओर से भी मुँह फेरे नही रहते। आखिर वे ही हैं जिन्होंने लिखा है, ‘जो सबकी घड़ी में बज रहा है, वह सबके हिस्से का समय नही है।‘ /हृदय से मनुष्यता गिर जाती है।‘ : जो प्रकृति के सबसे निकट हैं/जंगल उनका है।, बल्कि अपने स्थापत्य में अनूठी और विरल है। वे लिखते हैं: मैं उनसे नहीं कहता जो निर्णय लेते हैं/ क्योंकि वे निर्णय ले चुके होतेहैं। : ‘ मृत्यु कभी भी हो/परन्तु अंतिम सॉंस लेने के लिए/मेरे पास हमेशा समय रहेगा।‘ या ‘ बाहर झरे चंपा के फूल को मैं उठा लेता हूँ और एक ‘अतिम नहीं सॉंस’ लेता हूँ।‘ उनकी कविता संरचना में यह ‘नहीं सॉंस’ जैसा अटपटापन प्रूफ शोधकों को कितनी बाधा पहुँचाता होगा जो कवि की ही तरह चौकस और सावधान न हों।पर यही तो उनकी विशेषता है जो उनके काव्य और कथासंसार में गद्य को अपनी तरह से बरतने से संभव हुई है। ‘मृत्यु के बाद’ की पंक्तियॉं हैं पर विनोद कुमार शुक्ल की कविता वैसे नहीं पहचानी जा सकती जैसे उनके अन्य समकालीनों की । वह एक सपाट पाठ की तरह पठनीय या व्याख्येय नही हैवे पृथ्वी के संसाधनों पर पहला हक उनका समझते हैं जो इसके मूल निवासी हैं। तभी वे कहते हैंया ‘झुकने से जैसे जेब से सिक्का गिर जाता है
आखिर इतने अटपटेपन से वे कविता में क्या कहना चाहते हैं? कविता के बारे में एक कविता में वे कहते हैं :’ कविता जानबूझ कर लिखता हूँ/जानबूझ कर कौन सी कविता/यह अंत तक पता नहीं होता/यानी शुरू से/ परन्तु एक स्थिति में कविता/स्वयं होने के लिए आपसे सहयोग करने लगती है/ यानी अंत तक/ यद्यपि कविता का अंत नहीं होता।‘ याद रहे कि मुक्तिबोध ने भी कहा था ‘खत्म नहीं होती कविता’। परन्तु शुक्ल का अंदाजेबयॉं अलग है। मुक्तिबोध के गहरे सान्निध्य में रहते हुए भी उनकी कविता उनसे कितनी अप्रभावित रही है, यह देखने की बात है जबकि मलय को मुक्तिबोध के प्रभावों में अवलोकित आकलित करने का चलन हो चला है। मुक्तिबोध, मलय और शुक्ल तीनों की कविताऍं दुर्बोध हैं। पर विनोद कुमार शुक्ल के यहॉं यह दुर्बोधता कुछ अलग किस्म की है। --- जीवन के आसान से दिखने वाले पहलुओं में कुछ अलक्षित अर्थ उपजा लेने की सयत्न कोशिश। इसीलिए वे न तो मुक्तिबोध से कम चिंतनशील कवि है न उनसे कम दुर्बोध। वे अपनी सरलता को व्यंजित करने की कोशिश करते भी नहीं दीखते। जैसे वे चाहते हों कि यदि कविता के शहदीले पाठ तक पहुँचना है तो इस दुर्बोधता के कॉंटे के बीच से गुजरना लाजिमी है।यह जानबूझ कर पैदा की गयी दुर्बोधता है
विनोद कुमार शुक्ल अपनी ही तरह के अंदाजेबयॉं के पहले और अंतिम प्रयोक्ता हैं। स्वभाव से ही मितभाषी और अमूर्तनों के अभ्यासी शुक्ल अब अपनी ही उपजाई इस कला के व्यामोह में गिरफ्तार से हो गए लगते हैं। बेशक, कविता का यह सर्वथा एक नया सौंदर्यबोध है जो इसके अंत:पुर में प्रवेश करने और रम जाने पर एक सात्विक से आस्वाद का सृजन करता है। यही वजह है कि विष्णु खरे उन्हीं के एक पद के हवाले से अपना मत प्रकट करते हुए कहते हैं कि उनकी कविता वह जलप्रपात है जिसमें सब आवाजों का कोरस समाया हुआ है तथा उनका कवि ऐसे रोमांचक आयाम उद्घाटित कर रहा है जो नितांत अप्रत्याशित थे। अक्सर दूसरों के हिंदुत्ववादी पद-प्रत्ययों की गहरी आलोचना करने वाले खरे उन्हें यह क्लीन चिट भी देते हैं कि उनकी कविताओं में प्रयुक्त ये प्रत्यय उनकी निजी आस्था और एक आध्यात्मिक सांस्कृतिक कलात्मक परंपरा विशेष का पर्याय हैं जिसका लेना-देना किसी मनुवादी हिंदुत्व से नहीं है। इस संग्रह में भी जीवन-मृत्यु, राजिम के आठवीं शती के मंदिर, मृत्यु के बाद, हुमा मंदिर के सामने जैसी कविताओं तक में उनकी निजी आस्था में कहीं भी उनकी हिंदुत्ववादी आस्था बलवती होती नहीं दिखती।
उनकी कविता किसी मूल्य या संदेश का संधान नही है। वह वाक् में, शब्द में, अर्थ में, रस में, ध्वनि में, रीति में, वक्रोक्ति में, उक्तिवैचित्र्य मे— यहॉं तक कि किसी असंभवता में भी कुछ खोजने बीनने और रचने से उद्वेलित है। वह जीवन को अच्छी उम्मीदों के साथ जीने का जतन सिखाती है।---वे कहते हैं। ‘अच्छे से एक दिन रहूँ तब तक अमर रहूँ’ में एक भी दिन को अच्छी तरह से जीना उम्मीद और आश्वस्ति के साथ जीना है। उनकी इन कविताओं में दंगे, कर्फ्यू, आदिवासी, जंगल, विस्थापनानुभूति, पड़ोस, पड़ोसी और पड़ोस-भाव पर तो कविताऍं हैं ही, अलगाववादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध यह ख्वाहिश भी है : ‘सिर उठा कर मैं बहु जातीय नहीं,सब जातीय/बहु संख्यक नहीं/ सब संख्यक होकर/ एक मनुष्य खर्च होना चाहता हूँ/एक मुश्त(लोगों और जगहों में, पृ.15) वे दंगे की दहशत में भी मरने के लिए इस इसरार के साथ उद्यत दिखते हैं ताकि किसी मुसलमान के हाथों मरें तो उन्हें हिंदू न समझा जाए और किसी हिंदू के हाथो मरें तो उन्हें मुसलमान न समझा जाए। वे अगली कविता में यह भी कहते हैं कि ‘/मुसलमान कहूँ/ अगर मुसलमान हुआ तो अपनी जान मुसलमान कह कर न बचाऊँ/हिंदू कहूँ(अगर रोज कर्फ्यू के दिन हों) ।‘हत्यारा अगर हिंदू हुआ तो अपनी जान हिन्दू कह कर न बचाऊँ।‘ ‘जीवन को मैंने पाया इसे भूला नहीं’
स्थानिकता का वैश्विकता से क्या रिश्ता है, यह विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं को पढ़ कर जाना जा सकता है। दुनिया भर के आदिवासी इन दिनों विस्थापन के संकट से गुज़र रहे हैं। इन कविताओं में भरपूर स्थानिकता है। इतनी कि उन्हें हिंदी के उस अंचल का कवि कहा जा सके जहॉं बस्तर और दंतेवाड़ा जैसे दुर्गम आदिवासियों के इलाके हैं। जहॉं अभी अभी सलवा जुडूम का दमनचक्र चल रहा है। राजिम, रायपुर, छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस, बिलासपुर, हबीब तनवीर, रज़ा और राजनंदगॉंव के प्रसंगों के बहाने कवि अपनी स्थानिकता को तो चरितार्थ करता ही है, वह अपनी कविता को लोगों के सुख-दुख और लोकाचार के निकट भी ले जाता है। वह यथार्थ के बहुस्तरीय पहलुओं का अनावरण करने की इच्छा रखता हुआ उस वैश्विक यथार्थ के निकट जाना चाहता है जो ऐसे ही खंड खंड यथार्थों से बना है। ‘गंगातट’ में यही स्थानिकता है जिसमें रमे हुए ज्ञानेन्द्रपति को वैश्विक संकटों की आहट सुनाई देती है। ऐसी ही आहट शुक्ल को छत्तीसगढ़ की ज्वलंत सामयिकता से सुनाई देती है। आज छत्तीसगढ़ का दहकता हुआ यथार्थ आदिवासियों के विस्थापन और उन पर होने वाले उत्पीड़नों का यथार्थ है, प्राकृतिक संसाधनों को खँखोरती सर्वग्रासी पूँजीवादी व्यवस्था का यथार्थ है। कविता कला की समस्त चुनौतियों को अपने मूड़े-माथे उठाए हुए वे जहॉं भाषा की शक्ति और सामर्थ्य का पूरा उपयोग करते हैं वहीं अपने इस दायित्व से मुँह नहीं मोड़ते कि किसी भी कला की प्रयोजनीयता अंतत: उसकी सामाजिक उपयोगिता में है। इस दृष्टि से विनोदकुमार शुक्ल इस बात के पूरे समर्थक हैं कि आदिवासियों की बेदखली दरअसल आकाश से चॉंदनी की बेदखली है। वे इस बात से मुतमइन हैं कि आदिवासियों की तथाकथित हिंसक कार्रवाई दरअसल अपनी जान बचाने की कार्रवाई है। यह अपने को बचाने के लिए खुद को मार डालने की कार्रवाई है। कवि के शब्दों में यही आदिवासी सच है।
आदिवासियों को हिंसक बताने की मानसिकता पर एक बातचीत में उन्होंने माना है कि आदिवासियों के पास जो तीर धनुष जैसा हथियार है, ये उनकी अपनी रक्षा के लिए और शिकार से पेट भरने का उनका अपना साधन हैं। इसको उतना और वैसा ही प्राकृतिक मानना चाहिए जैसे किसी हिरण के सींग होते हैं, जिससे वह अपना बचाव करता है। लेकिन अगर हिरण एक झुंड में खड़ा हुआ है और हिरण के सींग का नुकीलापन आकाश की तरफ मुखातिब है, ऐसे में उससे अपने बचाव के लिए हवाई हमले की बात करना कैसी सोच है? इसी तरह उनकी नजर में विकास की अवधारणा बाजार की आवश्यकता के अनुरूप बनाई जाती है। उनकी दृष्टि में प्रदूषण के उद्भावक गरीब लोग नहीं, बल्कि कल-कारखाने चलाने वाले अमीर लोग हैं। क्योंकि गरीब तो कचरा बीनने वाला है, पैदा करने वाला नहीं। यह पश्चिमी सभ्यता-रहन-सहन, उपभोक्तावाद और तकनीक का कचरा है जो अमीर देशों की देन है। कविताओं में उनकी यही दृष्टि गुँथी हुई दिखती है।
विनोद कुमार शुक्ल की इन कविताओं की मौलिकता उनकी अपनी उपार्जित मौलिकता है। यदि उनकी रचना में कोई मैनरिज्म या रीतिवाद दिखता भी है तो वह उसी तरह है जैसे कि हर लेखक का अपना मैनरिज्म होना ही चाहिए। इस दुनिया को भी वे उसी तरह अपने तरीके से देखते हैं जैसा कि एक कवि को करना चाहिए। यह मैनरिज्म: यह एक वाक्य में है, रहा शब्द को रेखांकित कर रहा हूँ, पैदल अपने पड़ोस में जा रहा हूँ, गेंद का पड़ोस, जितने सभ्य होते हैं, मेरा दुख गया पड़ोस में, रहा, दूसरों के करीब हूँ और मृत्यु के बाद जैसी कविताओं में स्पष्ट झलकता है। पर कहा जाए तो यही तो शुक्ल के कवित्व का वैशिष्ट्य भी है। उक्ति वैचित्र्य से ज्यादा उक्ति वैशिष्ट्य। , एक शब्द या एक मिलते-जुलते भाव से जीवन को देखने की इतनी रीतियॉं विकसित कर लेना उनकी कविता को सर्वांग सम्पूर्ण बनाता है। उसका सौष्ठव कभी एक शब्द में झलकता है तो कभी एक भाव में, कभी एक अवधारणा में, कभी एक क्रियापद में, योजक शब्द में तो कभी किसी अव्यय तक में भी।: अपनी लोकप्रियता के अचूक आधार के रूप में अपनाते हैं। जब उपयोगितावाद की रौ में किसी भी साहित्यिक उत्पाद से कुछ न कुछ संदेश देने की अपेक्षा की जाती है, उनकी कविता सीधे कोई संदेश जारी करने के बजाय चीजों की माइक्रो-एनालिसिस में जाती है और लगातार दृश्यमान संसार के मुलम्मे को खुरचती हुई उसके वास्तविक कथ्य और रूप का अनावरण करती है। यह सौष्ठव उस प्रगीतात्मकता की अनुपस्थिति के बावजूद है जिसे कविगण प्रायएक वाक्य
विनोद कुमार शुक्ल की कविता इतने कलात्मक लटके झटकों से बनी है कि वह किसी भी आसान सी श्रेणी या सॉंचे में फिट नहीं बैठती। हॉं, शमशेर के-से वाक्संयम से बनी बुनी उनकी कविता जीवन के तमाम नए चित्र हमारे समक्ष रखती है जो कविता में पहली बार देखने को मिलते हैं। : उन्हें कलावादी कहना उस कलात्मकता का तिरस्कार है जो कविता-कला की पहली और बुनियादी शर्त है और जिसे वे एक जिद की तरह सम्हाले हुए हैं। अनेक नए बिम्ब हम उनके यहॉं देखते हैं। बाजार होते हुए समय और निष्करुण होती सत्ता के बारीक से बारीक गठजोड़ की खबर वे हमें देते हैं। , स्थगित मृत्यु-जैसे जीवन के पड़ोस में आ धमकने से कितना भिन्न है, यह शुक्ल की कविताऍं बताती हैं। चुप रहने में भी जीवन की उम्मीद- भरी धड़कन सुन पड़ती है तो रज़ा के चित्रों को देखना सूर्यवृत्त को सुबह-सु्बह खिलते हुए देखना है। छत्तीसगढ़ के विभाजन ने भी यहॉं कई कविताऍं दी हैं। शुक्ल के यहॉं विस्थापन के कई कचोटभरे बिम्ब हैं।अक्सर राजनैतिक विभाजन को स्वीकार न करने वाला कवि-मन यहॉं मौजूद है। यह सुसंयोग ही है कि एक तरफ कवि 63 का हो रहा है और दूसरी ओर 36गढ़ राज्य बन रहा है। राजिम के आठवी शती के मंदिर में तो माथा टेकने और चरण स्पर्श से घिस कर चिकनी और सपाट हो चुकी प्रतिमा के पैरों की उँगलियों की वजह में मन ही मन का चरण स्पर्श और दूर से मत्था टेकना भी वह शामिल कर लेता है। हमेशा कम बोलने वाली उनकी कविता अपनी चुप्पी में भी बेहद मुखर होती है और अनेक वाचाल कवियों के समक्ष एक चुनौती पेश करती है। इसी संग्रह में एक ‘पड़ोस’ को लेकर ही उनकी बहुमुखी कल्पना बेहद सक्रिय हो उठी है। उसकी अनेक रंगतें और अर्थच्छायाऍं कई कई कविताओं में दिखती हैं। उन्हें चंद्रमा पड़ोसी की तरह दिखता है तो जीवन घर से ज्यादा पड़ोस में अनुभव होता है। अकेलापन इसलिए महसूस होता है कि कवि स्वयं के पड़ोस में नहीं रहा। पड़ोस में नया नया और पृथ्वी के पड़ोस में होनाइसलिए सामान्यत
कवि के सरोकार बताते हैं कि वह ऐसे फीके रंग का हिमायती है जिस पर समय की मार पड़ी है। ‘मुझे बिहारियों से प्रेम हो गया’—में बाहर जाकर रोजी कमाते तथा केवल किसी बोली और भाषा विशेष से पहचान लिए जाने का खतरा उठाते बिहारियों की तरह ही कवि को छत्तीसगढियों के भी हालात लगते हैं। वह चिंतित है कि एक भाषा में बचाओ दूसरे प्रदेश की भाषा में जान से मारे जाने का कारण बन जाता है और एक ही प्रांत में होना उस प्रांत का बंदी जैसा बन जाना, भले, नए राज्य बनने से देश के स्वतंत्र होने जैसी खुशी होती हो। कहॉ रहे वे नागरिक जिन्हें वह देशवासी कह कर पुकारे। बिहारी हो या छत्तीसगढ़ी, उसका स्थायी पता उससे खो गया है। -खाने के लिए भागती हुई प्रजातियों में बदल गया है।, कविता ही मनुष्य को बड़ा बनाती हो। इस तरह शुक्ल की कविता परदुखकातर है। वह आदिवासियों को उनके जन्मजात अधिकारों से बेदखल किये जाने का शोक मनाती है तो उन्हें सभ्यता के जगमगाते हुए मंच पर बसाने के पीछे की हिंस्र मानसिकता का खुलासा भी करती है। कहना यह कि शुक्ल की कविता उन आवाजों को अनसुना नही करती जो सताई हुई कौमों की कराह से आती है तथा अपनी कलात्मक जिद में यह भूल नहीं जाती कि मनुष्य का जन्म किसी भी कविता के जन्म से बड़ा है।
कहानी तो हम सब के अन्दर समुन्दर की लहरों की तरह उभरती डूबती रहती हैं .
समुन्दर में मैं हूँ
मुझ में समुन्दर
बारिश की बूँदें समुन्दर में
और समुन्दर बारिश की बूंदों में .
मुझे करीब से देखो
पहचानो !
उभरती डूबती लहरें तुम से क्या कह रही हैं ?
आदमी !
साँप से भी ज़हरीला आदमी !!
आदमी हरे भरे दरख्तों की जड़ों को कुरेदता आदमी इन दरख्तों को काटने के मुआमले में शर्मनाक किरदार निभाता आदमी -
आदमी - सुख में साथ देता , दुख में साथ छोड़ता आदमी-
आदमी बीमार परीशाँ को देख कर मुस्कुराता आदमी ----
आदमी अब आदमी कहाँ रह गया है - वह तो भगा जा रहा है , तेज़ धूप में बारिश में , आंधी और तूफ़ान में , मंजिल का पता नहीं , वह तो है किसी और राह का मुसाफिर , मगर भगा जा रहा है , टेढ़ी मेढ़ी पगडण्डीयों पर ..........
अजमत ए आदम की गुम होती तहरीक क्या तुम्हें बेचैन नहीं करती मेरे ननकू !
कहानी अब शुरू होती है , मेरे प्यारे ननकू !!
आज कल रातों में नींद नहीं आती - जाग जाती है राबिया अक्सर रातों में खांसते खांसते - देखती है वह दायें बाएं , एक तरफ सोयी अपनी बेटियों को , दूसरी तरफ अपने शौहर को , जिस के चेहरे पर एक इत्मीनान है की वह अपनी गिरफ्त से जाने नहीं देगा , शायद दोनों की रूहें मुहब्बत की डोर से बंधी हैं -
रूह का रिश्ता एक बीमार बीवी और शौहर का -
शौहर के चेहरे में कभी वह कभी अपनी माँ को देखती है , तो कभी अपने वालिद को कि आज कि माएँ तो कुत्ते के बच्चों को गोद में ले कर प्यार करती हैं , मगर खुद उनकी बेटियां नौकरानी कि गोद में पलती हैं बढती हैं -
माँ एक गुमशुदा पंछी कि तरह और हमारा आज का कल्चर , कुत्ता कल्चर !
आदमी कुत्ता - कुत्ता आदमी .
"सावधान यहाँ कुत्ते रहते हैं "
आदमी कहाँ रहते हैं कहाँ बसते हैं -?
घरों में आदमी के चेहरों की जगह कुत्तों ने ले ली -
हम तरक्की कर रहे हैं मेरे दुलारे ननकू !
घरों में आदमी के चेहरों कि जगह कुत्तों ने ले ली - पुरानी सुनहरी क़दरों की जगह नई क़दरों ने ले ली फ़िरोज़पुर डिविज़न के काला बकरा स्टेशन पर बैठे राबिया और ननकू दुरंतो एक्सप्रेस का इंतज़ार कर रहे हैं और राबिया कहानी सुना रही है - ननकू सोच रहा है की यह कहानी राबिया अपनी सुना रही है या फिर कोई और राबिया मालकिन के अन्दर रच बस गयी है -
वैसे मालकिन ने जिंदगी में बहुत उतार चढ़ाव देखे हैं -
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"काला बकरा "स्टेशन पर कहानी आगे बढती है - प्लेटफार्म नंबर २ पर , चंद क़व्वाल कहीं जा रहे थे , उनके इर्द गिर्द भीड़ जमा थी , किसी ने भीड़ में से फरमाईश की और फिर फ़िल्मी गानों पर लिखी गयी नातों पर ,हाथों में झंडे लिए लोग झूमने लगे - पान खा कर क़व्वाली की महफ़िल जम गयी -
हर किस्म की हवाएं बह रही हैं .हवाएं ठंडी भी , गर्म भी ... इंसानी जिंदगी के मुताबिक भी . इन हवाओं पर किस की हुकूमत है ? मगर क़व्वाली में किसी और को मुरादें पूरी करने वाला कहा जा रहा था ...
"ननकू ! कहाँ गुम हो गया रे ... क्या सोच रहा है ? क्या देख रहा है ??"
"कहीं नहीं मालकिन , सफ़र में एक तरह के ख़यालात नहीं आते , मैं शऊर की रौ में बह रहा था ,सामने भीड़ को देख कर , भीड़ की मंजिल का हमें पता नहीं होता ..."
"चल , कहानी सुन ! आने वाले दिनों में तुझे कहानी सुनाने वाला चेहरा नहीं दिखाई देगा ".
राबिया का बीमार जिस्म काँप रहा है , कमजोरी से डर रहा है , डर रहा है मौत की आहट से , मगर वह मरना नहीं चाहती , निजात पाना नहीं चाहती इस तकलीफ से , जो इस के लिए रहमत हैं , उसकी जन्नत हैं . रब की कुर्बत है ...
राबिया रो रो कर सारी रात जागती है , जिस्म की तकलीफ की शिद्दत आजकल कुछ ज्यादह बढ़ गयी है . रूह ज़ख़्मी है , मगर वह उसे रब की रहमत मानती है . रात के एक बजे से सुबह के छः बजे के सरे लम्हे कभी लेटे लेटे तो कभी बैठे बैठे गुज़र जाते हैं - सोचती चलो उठ कर "तहज्जुद" पढ़ लें - लेकिन जिस्म में न तो "फ़जिर ' पढने की ताक़त है , न ही तहज्जुद की ..न ही खड़े होने की ताक़त है न ही बैठने की ...लब हिल रहे हैं , इशारों में रुकू और सजदे हो रहे हैं .
"काला बकरा "स्टेशन पर कहानी आगे बढती है - प्लेटफार्म नंबर २ पर , चंद क़व्वाल कहीं जा रहे थे , उनके इर्द गिर्द भीड़ जमा थी , किसी ने भीड़ में से फरमाईश की और फिर फ़िल्मी गानों पर लिखी गयी नातों पर ,हाथों में झंडे लिए लोग झूमने लगे - पान खा कर क़व्वाली की महफ़िल जम गयी -
हर किस्म की हवाएं बह रही हैं .हवाएं ठंडी भी , गर्म भी ... इंसानी जिंदगी के मुताबिक भी . इन हवाओं पर किस की हुकूमत है ? मगर क़व्वाली में किसी और को मुरादें पूरी करने वाला कहा जा रहा था ...
"ननकू ! कहाँ गुम हो गया रे ... क्या सोच रहा है ? क्या देख रहा है ??"
"कहीं नहीं मालकिन , सफ़र में एक तरह के ख़यालात नहीं आते , मैं शऊर की रौ में बह रहा था ,सामने भीड़ को देख कर , भीड़ की मंजिल का हमें पता नहीं होता ..."
"चल , कहानी सुन ! आने वाले दिनों में तुझे कहानी सुनाने वाला चेहरा नहीं दिखाई देगा ".
राबिया का बीमार जिस्म काँप रहा है , कमजोरी से डर रहा है , डर रहा है मौत की आहट से , मगर वह मरना नहीं चाहती , निजात पाना नहीं चाहती इस तकलीफ से , जो इस के लिए रहमत हैं , उसकी जन्नत हैं . रब की कुर्बत है ...
राबिया रो रो कर सारी रात जागती है , जिस्म की तकलीफ की शिद्दत आजकल कुछ ज्यादह बढ़ गयी है . रूह ज़ख़्मी है , मगर वह उसे रब की रहमत मानती है . रात के एक बजे से सुबह के छः बजे के सरे लम्हे कभी लेटे लेटे तो कभी बैठे बैठे गुज़र जाते हैं - सोचती चलो उठ कर "तहज्जुद" पढ़ लें - लेकिन जिस्म में न तो "फ़जिर ' पढने की ताक़त है , न ही तहज्जुद की ..न ही खड़े होने की ताक़त है न ही बैठने की ...लब हिल रहे हैं , इशारों में रुकू और सजदे हो रहे हैं .
एक तरफ बीमार जिस्म दूसरी तरफ ठण्ड का मौसम शुरू हुआ ही है कि खांसी परीशां करने लगी .सारा जिस्म तकलीफ से जुंबिश कर रहा है , दिमाग को छोड़ कर , दिमाग ही तो इन्सान का सब से बड़ा दुश्मन है , अगर यह अपने पीछे की तरफ छूटती जिंदगी को याद दिलाने का काम छोड़ देता तो शायद राबिया थोडा सुकून पा जाती .
राबिया सोचती है कि कोई इन्सान कौमा में चला जाता है या उसका ब्रेन डेड हो जाता है तो उसके रिश्तेदार , मिलने जुलने वाले कहने लगते हैं कि बस वह ख़त्म ही हुआ समझो . तख्लीक्कार इस जहाँ में मरने से पहले शायद अपनी तखलीक को थोड़े वक़्त के लिए सुकून दे देता है . जिस में कुछ याद नहीं रहता सिर्फ साँसें चलती रहती हैं -
राबिया कई मर्तबा कौमा में जा चुकी है . उसके रिश्तेदार उस के मरने का इलान भी कर चुके थे . मगर आज भी वह जिंदा है .
राबिया को अच्छी तरह से याद है , आठ साल कि उम्र में अपनी अम्मी से सुनी हुई वह कहानी जो अल्लाह जाने सच थी या झूठ .
आज भी याद है वह आदम खोर इंसानों की कहानी .
कभी पुराने ज़माने में आदम खोर कबीले हुआ करते थे . अगर कोई मुसाफिर वहां फँस जाता था तो सेहतमंद हुआ तब तो ठीक है . मगर उसकी तबियत ज़रा भी ख़राब रही तो कबीले वाले रात ही में उसे मार कर , भून कर खा जाते थे .
बचपन में राबिया ने जब यह कहानी सुनी थी तो उसे दस दिन तक नींद नहीं आई थी .एक खौफ़ , एक डर उसके अन्दर जाग गया था . एक खौफ़ज़दा बच्चे की तरह वह सोचती रहती थी कि कैसे एक बीमार आदमी को मार देते होंगे , कैसे खा जाते होंगे . शायद राबिया कि जिंदगी में पहली मर्तबा आज की तरह नींद आँखों से कोसों दूर चली गयी होगी . अब तो राबिया को ऐसा लगता है कि पहले तो कुछ कबीले ही आदम खोर हुआ करते थे , लेकिन आज आदमखोरों में से इन्सान को ढूँढना पड़ता है .
आदम खोर घर के आँगन में भी , और आँगन के बहार भी !
आँगन !
आदम खोर !!
फिजा ज़हरीली होती जा रही है और मौत कि तिजारत में लगे हैं , ताजिरान ए वक़्त .
राक्षस संस्कृति ....
आदमखोर मार डालता है एक बीमार को ज़ख़्मी कर देता है उसकी रूह को , लहूलहान कर देता है शरीर के हर अंग को . हाथ मुंह धोता है , डायनिंग टेबल पर खाना खाता है .शराब पीता है , सूद का चखना लेता है , रहता है मुस्लमान की तरह !
" मालकिन आप बिल्ली को कितना प्यार करती थीं "
ये जुमले अदा करते हुए ननकू ने कहानी में ब्रेक लगा दिया , मगर यह कोई कमर्शियल ब्रेक नहीं था .
" हाँ रे ननकू ! अगर तुम्हारा दिल एक बिल्ली भी नहीं ले सकती तो समझ लो वह मुर्दा हो चूका है , उसे काले पत्थर के साथ रख दो "
" दुरंतो एक्सप्रेस एक घंटे देरी से प्लेटफार्म नंबर एक पर आएगी यात्रियों को हुई असुविधा के लिए हमें खेद है ." अनौन्स्मेंट हो रहा था और कहानी फिर शुरू हो गयी --
माँ के सामने दम तोड़ गया एक मासूम बच्चा .
आदम खोर कुत्तों ने नोच नोच कर मार डाला . गाँव में काफी आक्रोश था . बच्चा को बचाने के लिए गाँव वालों ने काफी कोशिश की , मगर आदम खोर कुत्तों के आगे किसी की न चली . गाँव वालों का कहना था कि एक साल पहले एक बीमार मास्टर जी को भी आदम खोर कुत्तों ने नोच कर मार डाला था . गाँव वाले बताते हैं कि हड्डा गाँव में बागमती नदी के किनारे सैकड़ों आदम खोर कुत्ते रहते हैं , जो बीमार जानवरों , मरे हुए जानवरों के मॉस को नोंच नोंच कर खाते खाते आदम खोर हो गए और सरयू नदी के किनारे नामालूम लोगों की जो लाशें मिली थीं . उसके बाद आस पास के इलाके में भी आदम खोर कबीला की अफवाह अफवाही थी .
आदम खोर चेहरा बिगाड़ देता है जिंदगी का .
बनाता है अपना शिकार
सुनहरी तहजीब को
"रौशन " को ,
और फिर पोस्टमार्टम के बाद लाश घर वालों को सौंप दी जाती है .
अगर राबिया को शौहर की शकल में इन्सान न मिला होता तो आज उसकी हड्डियाँ भी बाक़ी नहीं होतीं , काबर उसे कब का निगल गयी होती .
राबिया बीमार है, सख्त बीमार , इतनी बीमार की किसी पल का ठिकाना नहीं , जिस्म बेहद कमज़ोर , लेकिन रूह बेहद मज़बूत .राबिया को अपना बचपन याद आता है . जब उसकी दादी माँ सख्त बीमार पड़ी थीं तो मोहल्ले की पुरानी सहेलियां जो उन्हीं की तरह बूढी थीं . नाश्ते के बाद से ही आ जाया करती थीं , कोई सर में तेल लगा रही होतीं , तो कोई बालों में कंघी , कोई कमज़ोर पाँव में तेल की मालिश , फिर कोई उनकी साडी बदल रही होतीं . तो कोई राबिया के ब्याह के गीत गाने लगतीं --
खोलो न किवड़िया जल्दी आवें मेरी लाडो
तुमरा टीका लिए हम खड़े हैं जी लाडो
अरे जल्दी आवें मेरी लाडो ........
तुमरा बेसर लिए हम खड़े हैं जी लाडो
तुमरा कंगन लिए हम खड़े हैं जी लाडो
अरे आवें मेरी लाडो ............
....
यह गीत सरहद के उस पार से आई दादी माँ की बड़ी बहन ने सुनाया था , और इस गीत को " आपा नानी" ने ढोलक की थाप , सुर और ताल के साथ आर्यवर्त की ज़मीन से उपजे काले काले चावल के दानों जैसे लफ़्ज़ों को एक नई ज़बान अत कर दी थी .
" बन्नो तेरी अँखियाँ सुरमेदानी / बन्नो तेरा बनना लाख का रे /बन्नो तेरी जोड़ी है हजारी ...."
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राबिया को शादी के वक़्त के हर चेहरे याद आने लगे . शौहर की बेलौस मुहब्बतें , उसके स्पर्श से न जाने कितने रंग बिरंगे ख्वाब , खुशियों से भरे सपने उसकी आँखों में तैरने लगे . ज्यों ज्यों दोनों बेटियां बड़ी होने लगीं . राबिया की आँचल की छाँव में निखरने लगीं , संवरने लगीं , दोनों जहाँ में अपनी शिनाख्त कायम रखने की खातिर तो उसका शौहर जिसे प्यार से वह खुसरू पुकारा करती थी कहने लगा था ---
बेटियां शबनम की बूंदों सी होती हैं .बेटियां काँटों की राह पर चल कर भी , दूसरों की राहों में फूल बिछाती हैं , बेटियों की आवाजें , उनकी हंसी , नर्म नर्म हथेलियाँ , और उन हथेलियों पर लिखी एक इबारत " अच्छी तरबियत " एक प्यारा सा एहसास दिल में जगाती हैं .
अब तो माँ के सर से " आँचल " सरकता जा रहा है ,
'आँचल ' जिस में हमारी सुनहरी संस्कृति के ज़री बूटे जड़े होते थे ,
'आँचल ' जिंदगी की तपती दोपहर में ठंडी छाँव दिया करते थे ......... वह धानी रंग चुनरिया अब कहाँ लहराती है ....
नेक बख्त लोगों का चेहरा भी धीरे धीरे घर के " आँगन " से गुम होता जा रहा है , अब तो घरों में सिर्फ दरवाज़े हैं ,आँगन तो हमारे घरों से कब का गायब हो चूका है .
अन्नार
मज़ख
ऐ मेरे क़दीम ज़माने के दरख़्त !
तुम अपनी हरी भरी टहनियों को एक दुसरे पर मार कर आग बरसाओ ना .
लज्ज़त और सरूर बख्शने वाली शराब को छोड़ , दुनियावी शराब के नशे में भीड़ आगे ही आगे बढ़ी चली जा रही है , अंजाम से बे खबर . लोगों के दिलों में यह गुमान हो गया है कि इनका मालिक जब्बार ओ क़ह्हार नहीं सिर्फ रहीम ओ करीम है -
गरीबों को नवाजने वाला कौन ?
मुश्किल कुशा कौन ?
दस्तगीर कौन ?
मगर हम किसे पुकार रहे हैं ??
किस से मदद मांग रहे हैं ???
घर के आँगन में उगे हरे भरे पौधे आँखों को सुकून देते हैं , ठंडक पहुंचाते हैं . गर्मी के मौसम में राबिया अपने घर के आँगन में पौधों का खास ख्याल रखती थी .ख्याल भी सिर्फ इस लिए रखती थी कि इनकी हरी हरी पत्तियां रब की तस्बीह में मसरूफ हैं .
राबिया बोलती थी कि हर आदमी की जिंदगी में हमेशा एक सा मौसम नहीं रहता है . कभी हथेलियाँ गर्म हवाओं से सख्त हो जाती हैं तो कभी बारिश कि बूंदों से नम !
जिंदगी में हर तरह के मौसम को वह अपनी खुशकिस्मती मानती थी , वह शाकिरा और साबीरा (धर्यवान ) जो ठहरी .
राबिया कि जिंदगी में भी ऐसा मौसम आया जो उसे जिंदगी की , रिश्तेदारों की हकीकत समझा गया . जब धुप में मुरझाते पौधों को पानी से सींचने और धुप से बचाने की बजाये , सारे लोग उसके आँगन के सारे पौधों को जड़ से काटने में जुट गए और उसे अपने हिस्से की सब से बड़ी "नेकी" समझने लगे . किसी को यह एहसास तक नहीं हुआ , कहीं ये बाग़ की हरियाली गुम न हो जाये इंसानी रिश्तों की तरह ....!
ज्यादा सुर्ख मिटटी से पौधे सूखने लगते हैं और नमी वाली मिटटी से पौधों को चिलचिलाती गर्मी में नई जिंदगी मिलती है . मगर राबिया की जिंदगी की बगिया में सारे खुनी रिश्ते सुर्ख मिटटी डालने में जुट गए .
पौधे और इंसान में फर्क .
पौधे को स्प्रे से पानी दिया जाता है , और बीमार को ...
बासी कढ़ी में मक्खी गिरी आगे मेरी अम्माँ !
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राबिया को फिर बचपन की कहानियों में बसा वह कबीला डराने लगा , जैसे ही उसे याद आने लगी खुनी रिश्तेदारों की वह बातें , वह मुकालमे...
" मेरी बेगम कोई नर्स नहीं जो बीमार बेटी का ख्याल रखें ."
" बीमार की अयादत तभी मुमकिन है , जब वह अच्छे से बात करे "
"मेरी बेटी मर गयी ''
" बीमार बीवी से सच्ची मुहब्बत , जोरू की गुलामी "
.....इस तरह की कई आवाजें उस का पीछा कर रही थीं ,और हर आवाज़ की अपनी एक शकल थी ....
मगर वह जिस का creatinine बढा हुआ हो , जिसका urea बढा हुआ हो , जिस का hb सिर्फ ४ हो , जो बिलकुल सेहतमंद रहा हो और अचानक ये सब रोग साथ हो गए हों .... वह जो कौमे की हालत में हो .... वह जो ..... वह जो .....
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" राबिया उसके शौहर और दोनों बेटियों को यहाँ से निकल फेंको , बीमार बेटी को घर में पनाह न दो , एक दिन सारी जायदाद हड़प लेंगें , राबिया की खिदमत में आप तबाह हो जायेंगें , आपके बेटे और बहु के लिए कुछ नहीं बचेगा ." एहसान मामू चीखे .
राबिया की अम्मी को अपनी नवासियों का ख्याल आया . इस लिए वह बोलने लगीं , बेटियां अभी बहुत छोटी हैं , बीमार माँ को कैसे संभालेंगी , अभी तो खुद उनको ऊँगली पकड़ कर चलने की उम्र है .
दूसरी तरफ किसी से कोई मदद मिलती न देख राबिया का शौहर लम्बी छुट्टी ले कर , राबिया की खिदमत में लग गया कि इसके लिए राबिया की जिंदगी ज़रूरी थी , राबिया एक बीमार उसके लिए रहमत थी ज़हमत नहीं , एक बीमार से इश्क में रब की कुर्बत थी , जन्नत थी .....
वह राबिया जो , नौ माह तक खाना कैसे खाया जाता है , अपने पाँव पर कैसे चला जाता है .... भूल गयी थी .... अपने दुबले पतले शौहर की गोद में , एक मासूम बच्चे की तरह पलने लगी , बाथ टब में नहा नहा कर निखरती रही ,अपने शौहर और बेटियों की उँगलियाँ पकड़ कर , कभी कंधों का सहारा ले कर चलना सीखती रही ,मासूम सी , छोटी सी बेटियां अपने हाथों से खाना बना कर" बंद कमरे" में खिलाने की कोशिश करती रहीं कि वह चेहरे अब सामने न आयें जिन्हों ने एक ब्बीमर को बिस्तर पर तड़पने के लिए छोड़ दिया था ..
मगर इंसानियत को शर्मसार करने वाले चेहरे बीमार और तीमारदार के सामने आते रहे .
डायलाग ही डायलाग .... अदाकारी ही अदाकारी ..... मुखौटे .... अलग अलग रंगों के मुखौटे !
राबिया के मामूं जान चीखे " उस के शौहर ने निकाह पढ़ा है , शादी के बाद बेटी का माँ बाप पर कोई हक नहीं रहता , और वह भी बीमार बेटी , राबिया को संभालेगा इसका शौहर , बीमार की तीमारदारी भी करेगा , और अपनी बेटियों को संभालेगा भी ..."
" बीमार बीवी पर सीर्फ उसके शौहर का फ़र्ज़ होता है बाजी !बाजी बात को समझो ! आरज़ू चिल्ला चिल्ला कर अपनी बहन को समझा रहे थे .
"राबिया को भूलने की कोशिश करो , आखिर वह कितने दिनों की मेहमान है , क़बर में पाँव लपके जाये हैं , अपनी जवान और तंदरुस्त बहू में अपनी बेटी को तलाश लो .."
.......... और वह जो राबिया की बीमारी में उस के शौहर ने एक बीमार बीवी की ख्वाहिश के एहतेराम में , ख़ूबसूरत सा घर बनाया .अपना ट्रांसफर कराया , सब से जूनियर हो कर एक बीमार की जबान से निकले हुए जुमले को पूरा करने की खातिर , उस शहर में आ गया जहाँ बीमार राबिया के माँ बाप रहा करते थे , सिर्फ इस लिए कि राबिया कि यह ख्वाहिश थी कि माँ बाप के पास थोड़ी तकवियत मिलेगी ....... वर्ना उसका शौहर जिस पद पर कार्यरत था वहां इलाज की सारी सुविधा उपलब्ध थी , हर माह उसके इलाज में २५ हज़ार का खर्च आता था ..... जो उसे अपनी जेब से नहीं देना पड़ता था ....... उसे किसी चीज़ की कमी नहीं थी .... कमी थी तो सिर्फ परदेस में अकेलेपन की . ..... एक हँसता मुस्कुराता परिवार , मुहब्बतें ऐसी कि एक पल भी कोई एक दुसरे से जुदा नहीं होते ...... पति पत्नी और दो बेटियां हंसी की गोद में खेलता था ये परिवार ...फटे चिटे कपड़ों में लिपटे ,. फकीरों को अपने बिस्तर पे बिठा कर खाना खिलाता था ये परिवार , जाड़े की ठिठुरती रात में कांपते हुए " सूरदास " को अपना नया कोट ख़ामोशी से दे दिया करता था ये परिवार ..... बहुत कुछ अच्छाई तो इनकी पोशीदा रहती थीं .... ज़ाहिर नहीं करते थे ये .
तस्बीह के दानों पर उँगलियाँ थिरकती रहीं
सजदे होते रहे
मुसल्ले आबाद होते रहे ......... हर आदमी एक दुसरे की आजमाईश का जरिया बनता रहा . गरीब दौलतमंद से और बीमार सेहतमंद से आजमाया जाता रहा . अज़ीम किताब सिर्फ आँखों से चूमने , सीने से लगाने , ताक पर रखने और क़सम खाने के लिए इस्तेमाल होती रही.
सातों ज़मीनों में धंस जाने वाले चेहरे , सख्त अज़ाब से बेखबर दुनिया हासिल करने में जुटे रहे
राबिया ने जब बगावत करने की कोशिश की कि वह नहीं जाएगी , आखिर इसके शौहर ने उसकी खातिर ट्रांसफर ले लिया है , कवार्टर छोड़ दिया है . सारा सामान यहाँ आ गया है .... आखिर ये सब उसके शौहर ने किसके लिए किया .... वह अब यहाँ से नहीं जाएगी , आखिर वह इस घर की बेटी है , उसका भी घर के लोगों पर हक है , इस घर के आँगन में वह पली बढ़ी है , थोड़े दिनों की तो बात है , सेहत वापस लौट आएगी तो वह चली जाएगी , परदेस में बीमार बीवी और दो नन्ही मासूम बेटियों को शौहर कैसे संभालेंगें .
सारे रिश्तेदारों ने एकजुट हो कर राबिया और उसके परिवार को घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया ..... अपने पराये हो गए और गैर अपने बन गए .... उसने जो घर बनाया था , बीमारी की हालत में भी एक अरमान को दीवारों पे सजाया था वह सब एक फकीर की तरह छोड़ सफ़र पर निकल पड़ी .....
बीमार चेहरा जब घर से निकल गया तो बाबा कह रहे थे " आई एम रिलेक्स टू डे "
उस रात जब वह व्हील चेयर से उतर कर ट्रेन में बैठी तो फिर उसे सारी रात नींद नहीं आई कि " आदमखोर '' कबीला आज भी जिंदा है , और उसके घर में आ गया है , सारे सेहतमंद लोग मिल कर बीमार का काम तमाम कर देंगें या उसे मौत दे कर तकलीफ से छुटकारा दिला देंगें .
लेकिन उसके शौहर ने उसे समझाया कि नहीं राबिया ऐसा कोई कबीला नहीं है , मेरा यकीन करो , मेरे साथ नए आशियाने चलो , तुम्हें इस बात का यकीन हो जायेगा , आखिर अपने' घर ' पहुँच कर उसे यकीन हो चला कि यहाँ ऐसा कोई कबीला नहीं है और उसे फिर से मीठी नींद आने लगी .
आज एक ज़माने के बाद उसके बाबा का फोन आया . अपने किये पर शर्मिंदा थे , वह कह रहे थे , बहुत बड़ा गुनाह हो गया .... मैं अब तुम्हारे लिए दुआएं किया करता हूँ .... मैं और तुम्हारी अम्मी तुम्हारे पास आना चाहते हैं ... तुम्हारा भाई बीमार पद गया है , बहू की भी सेहत ख़राब हो चुकी है , घर में हर वक़्त मियाँ बीवी में झगडा होता रहता है .... तुम्हारे पास हमलोग सुकून के लिए आना चाहते हैं .
आज राबिया बहुत खुश है , अब उसे लग रहा है , ऐसा कोई कबीला दुनिया में नहीं बचा है , अब वह सकून की नींद सोएगी . अब कोई दर नहीं .
बहुत दिनों के बाद आज उसका दिल चाय के बाद अख़बार पढने के लिए चाह , अख़बार उठाया तो सामने के सफहा पर खबर थी कि अम्रीका में नेवी के चार अफसरों को जज साहिब ने माफ़ कर दिया , जो जहाज़ डूबने के बाद एक बोट पर जान बचाने के लिए समुन्दर में निकले थे
खाना पीना ख़त्म होने के बाद भुखमरी की हालत में , जब अपनी अपनी जान बचाने की नौबत आई तो इन चारों ने साज़िश रच कर , पांचवें बीमार साथी को मार डाला और खा गए . इत्तेफाक से वह चरों बच गए . बोट किनारे लगी तो उन्हों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया , उन पर मुक़दमा चला और आखिर में जज साहिब ने उन्हें माफ़ कर दिया , ताकि एक और आदम खोर क़बीला तैयार हो जाये .क्योंकि उन चरों को एक बीमार आदमी के खून का ज़ायक़ा मिल गया था .
राबिया फिर छटपटाने लगी .कि आज भी आदम खोर क़बीला वजूद में है , हर मुल्क में है , हर घर में है , हर आँगन में है , अब इस बीमार की जान शायद ही बचेगी ., और राबिया ज़ोर ज़ोर से रोने लगी , उस के शौहर और दोनों बेटियां दौड़ कर उस के क़रीब आये ,
शौहर ने कहा , हाँ ये सच है कि आदम खोर चरों तरफ हैं , लेकिन तख्लीककार / रचनाकार ने तुझे एक सेनापति और दो सिपहसालार दिए हैं ,जो तेरी हिफाज़त का ज़रिया बने हुए हैं , तुझे मेरा ये " घर " क़िला के तौर पर दिया गया है . उस रब ने तुझे वह सब कुछ वापस लौटा दिया है जो ज़िंदा रहने कि शर्त हुआ करती है . वह कितना अज़ीम है जिसके इशारे पर यह कायनात हरकत में है , हम लोग हर तरह से तेरी हिफाज़त का सबब बनेंगें .
चुप हो जाओ , खौफ को दिल से निकाल फेंको --------
और राबिया अपनी जिंदगी लोरी आंसुओं के साथ गुनगुनाने लगी :
जिंदगी के ३६ वें पड़ाव पर
जब मैं चलना भूल गयी थी
और तुम ने ऊँगली पकड़ कर चलना सीखाया था
तब मैं ने तुम्हें "पापा ' पुकारा था .
जब मैं खाना भूल गयी थी , और तुम्हारी नर्म हथेली की उँगलियों ने
खाना सिखाया था
तब मैं ने तुम्हें " माँ "पुकारा था .
ये भी एक इत्तेफाक है कि......
तुम मुझे नौ माह तक अपनी गोद में लिए
ज़माने की तेज़ धुप और बारिश से बचाते फिरते रहे
मुहब्बतें , रहमतें साथ चलती रहीं ...............
तब मैं ने तुम्हें अपना प्यारा दोस्त कहा था !
"तुम" मेरे लिए क्या हो ," मैं 'तुम्हारे लिए क्या ?
ये तो मैं जानू , तुम जानो हो और रब जाने है ....
मैं जब तुम से दूर चली जाऊं
जब '' मैं " मैं न रहूँ
अपने रब की हो जाऊं !
और तुम्हारे पास रह जाएँ सिर्फ यादें
कभी आंसू न बहाना !
जिंदगी लिख जाएगी तुम्हारी हथेली पे एक नई इबारत .... एक नया एतबार !!
और राबिया बहते हुए आंसुओं को पोछते हुए , शौहर और बेटियों की " गोद ' में आराम की नींद सो गयी .
कहानी तो समुन्दर की लहरों की तरह उभरती डूबती रहती है मेरे दुलारे ननकू , कि आदम खोर क़बीला आज भी जिंदा है .
नजर-गुजर से बचाने के लिए सोनवा ने अपने इकलौते छउआ गनौरी के पैर, तलहथी, छाती, माथे के बीचों-बीच काजल का टीका लगाया और सास से कह उठी - ”इके बेतराय लेऊँ.” सास मुन्नी अपनी साड़ी ठीक कर बक्से पर रखे आधे फटे खोल को उठा सहेजने लगी. पीठ पर छौव्वा को लाद अपने बेतरा में उसको सुरक्षित कर लेने की आश्वस्ति पा वह खोल के दोनों छोरों को मिला गाँठ बाँधने लगी. गनौरी की कमर थोड़ी तिरछी हो गई तो बेतरा ठीक से बाँधना मुष्किल. उसके दोनों पैरों को फैला, पीठ के छउआ को इधर-उधर हिलाकर वह निश्चिंत हो गई. फिर नए सिरे से गाँठ बांधी. खोल के एक छोर को कँधे से, दूसरे को पीठ की ओर से काँख के नीचे से लाकर गाँठ बाँध, वह झुक कर बाँसों के गट्ठर को उठाने लगी. दशहरे का समय था. पंडालों के लिए बाँस ले जाना था. दोनों सास- पतोहू उसी के लिए तैयार हो रही थीं. रात के दो बजे के लगभग ही वे दोनों और सेनारी बाँसों के झुरमुट के पास पहुँच गए थे. तेज हथियार से रेत-रेतकर बाँसों को काटा और वहीं सूख गई लताओं को रस्सी की तरह इस्तेमाल कर कई गट्ठर तैयार कर लिए. भिनसरे का उजास फैलते ही वे समझ गईं कि चार बज गए हैं. रात की घड़ी तारों का सफर, चंद्रमा की चाल थी. दिन की घड़ी रक्ताभ बाल अरूण से लेकर तेज प्रकाशवाले सूर्य की चाल. सदियों से समय नापने का यह पैमाना आज भी उनका साथ दे रहा था. वे तीनों गट्ठरों को ला- लाकर झोपड़ी के बाहर रखकर खाना बनाने, खाने की तैयारी में लग चुकी थीं. छह कोस की दूरी पैदल ही तय करनी थी. इसलिए सुबह ही गाँव से निकल पड़ना जरूरी था. कहते हैं कि दशहरे के समय डायन - बिसाही आदि अपने मारक मंत्रों से, मारक नजरों से अहित करते हैं. इसलिए छोटे - छोटे बच्चों को काजल का टीका लगाना जरूरी था. सेनारी को भी सोते समय रात में ही छाती, माथा, दोनों पैर के तलवे एवं दोनों तलहथी पर टीका लगा चुकी थी मुन्नी. मुन्नी के बचाव के तरीके को अपनाती दो साल पुरानी बहू ने टूटे पलंग के चारों पायों में अजवायन, कड़ुआ तेल, कपूर से बना काजल का टीका लगाया था. झोपड़ी के बाँसों, छोटे से मेज के पायों, टूटे टीन के बक्से एवं बक्से में पड़े छोटे से डब्बे में भी दीठौना लगाकर निश्चिंत हो गई थी सेनारी- की अब कोई डायन-बिसाही सिद्धि -प्राप्ति के लिए कितनी भी कोशिश कर ले, उसके घर के सामानों, बच्चे एवं सेनारी पर कोई असर नहीं होगा. ”ओ सेनारी का करत हीं, चइल अइब.” ”हाँ, जल्दी चइल. रास्ते में मेला से डंकडोरवा आउर कजरौटी कीनेंगे (खरीदेंगे)” सोनवा ने गट्ठर उठाते हुए कहा और सबसे आगे चल पड़ी. सोते हुए छउआ को देखती रही वह. उसकी दस वर्षीया ननद गीता ने भी एक पतले गट्ठर को उठाकर सर पर रख लिया और सोनवा के पीछे चल पड़ी. फिर सास और सेनारी ने भी उनका अनुसरण किया. दशहरे के आगमन के साथ ही जगह-जगह मेलों का आयोजन षुरू हो जाता है. कहीं पशु मेला, कहीं टिकुली-बिंदी, सिंदूर-फीता, सिलौटी-लोढ़ा, बर्तन-बासन के साथ सामान्य मेला. मेले में हाथ से चलानेवाला झूला. और यही झूला सोनवा और मुन्नी के लिए सबसे बड़ा लालच है. पर जब बाँस पहुँचाकर लौटेगी, तभी तो यह झूला चलता हुआ मिलेगा. अभी तो मेले का रंग जम ही रहा है. कहीं-कहीं हलवाई अपनी भट्ठी में लकडि़याँ सुलगा काली-चीकट कढ़ाई चढ़ाकर जलेबियाँ तलना षुरू कर चुके थे. एक तरफ धुसके - कचैड़ी की धूम थी. दूसरी तरफ चाउमीन -इडली की. कहीं गठरी-मठरी, तो कहीं बालुशाही-रसगुल्ले! एक तरफ जादू के सामान्य कारनामे का पोस्टर, दूसरी तरफ खिलौनों का संसार!सब कुछ बड़ा मन ललचाउ . कोई अपने बर्तनों को सजा रहा था. रात मेले में ही सोए हुए दुकानदार अपनी दुकानदारी सजा चुके थे. मुन्नी ने सोए हुए पोते को जगाते हुए मेले के अंदर प्रवेश किया. साथ में सोनवा भी थी. डोरियार को ढँूढती हुई वे उस जगह पहुँच गई, जहांॅ डोरियार अपनी फटी चटाई बिछाकर डंडकडोर, हाथ-पैर की लाल-काली डोरियाँ आदि सजा चुका था. ” एक ठो डंडकडोर, आउर दो जोड़ी हाथ-पैर के डोरी देना तो.” मुन्नी ने बच्चे को पीठ से आगे की ओर कमर पर लाते हुए कहा और कमर में खोंसकर रखी, फटे ब्लाउज के टुकड़े से बनी, कच्ची सिलाईवाली थैली की डोर ढीली करने लगी. ”एक ठो कजरौटी भी चाही माय.” ”हाँ - हाँ कीन (खरीद) देबऊ.” थैली से निकालकर अठन्नी - सिक्के जोड़कर उसने डोरियार को पैसे दिए और वहीं किनारे बैठकर मुन्नी ने बच्चे के हाथ-पैरों में फुदने लगी काली-काली डोरियाँ पहना दीं. डंडकडोर पहनाने के लिए उसे बेंतरे के बाहर निकालना पड़ा. गनौरी नींद से जागकर टुकर-टुकर ताकने लगा. उसके कमर के खुले हिस्से में दोनों ने मिलकर डंडकडोर पहना दिया और एक ओर से पकड़ कमर की नाप के बराबर डोर की बंॅध कस दी. डोरी से बॅंधे लाल फुदने इधर-उधर डोलने लगे. लेकिन यह क्या! पीठ पर बिठाते ही उसी खोल में कॅगारू के बच्चे सा दुबका छउआ हाथ-पैर फेंकने लगा. यह देख सोनवा मेला परिसर से बाहर आकर एक किनारे बैठकर सुस्ताते सेनारी और गीता के पास बैठ गई. गनौरी को पीठ से कमर की ओर लाकर वहीं से वह दुधमुँहे बच्चे की क्षुधा षांत करने लगी. बेतरा बाधक नहीं था. बच्चा सोनवा की पीठ पर हाथ मारता अपनी भूख मिटाता रहा. थोड़ी ही देर बाद गनौरी पुनः कंध्ेा पर हाथ मारता हुआ पीठ पर बॅंधे बेतरे में हुलस रहा था और वे चारों तेज कदमों से गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे. पूजा पंडाल में अन्य मजदूर भी पहुँच चुके थे. वे पहले पहुँच चुके बाँसों को गड्ढे में डाल खड़ा कर रहे थे. वे चारों अपने सर के बोझ को जमीन पर पटक पैसे की आषा में खड़े हो गए. गनौरी का हिलकना कम हो गया था. और अचानक चिहुंक कर जो वह रोया, तो सोनवा जल्दी से उसके हाथ-पैर के दीठौने को देखने लगी कि कहीं टीका मिट तो नही गया. कहीं डायन-बिसाही जीत तो नय गई? ” नइजर लगा का ?” ” नय माय, मिटलई नय हय.” उसने धॅंुधले हो गए हथेली और पैर के काजल के टीके की ओर देखते हुए कहा. ‘‘ फिर का बाइत हय? काले कादंत हऊ छौव्वा? भुखल तो नय हय?’’ बच्चे को पीठ से आगे की ओर खींचकर सोनवा फिर से व्यस्त हो गई. वे लोग जल्दी से जल्दी वापस गांॅव आकर दूसरी खेप का गट्ठर उठा दूसरे पंडाल में पहुंॅचाने के लिए उतावले हो रहे थे जबकि पूजा - पंडाल के आयोजक पैसों के लिए खिच-खिच कर रहे थे. तभी चार-पाँच लोग उधर तेजी से आते दिखे. ”आप लोगों में सेनारी कौन है?” ”यहाँ तो सेनारी नाम का कोई आदमी काम नहीं कर रहा है.” एक मजदूर बोला, जो गड्डे में मिट्टी भर रहा था. ” यहाँ सेनारी नाम का मजदूर लकडि़याँ लेकर आता है न?” ”हम हँय सेनारी साहब, का बाइत हय?” सेनारी हाथ में रेजगारी थामे वहीं से चिल्लाया, जहाँ वह खड़ा था. वे लोग लपकते हुए आगे आए. ”तुम सेनारी हो?” ”जी साहब!” ”तुम ही घोड़ा नाच दिखलाते थे?” “ऊ तो बीतल बाइत हो गया.” “क्यों, अब घोड़ा नाच नहीं दिखलाते?” ”अइब कौन पूछता हय ऊ सब नाच-वाच को. अइब सिनेमा, टीबी यही सब देखता हय लोग.” ”देखेंगे! इस बार लोग विलुप्त होते इस नाच को जरूर देखेंगे. हम सब ने तय किया है कि हमारे पूजा पंडाल के पास एक तरफ मंच पर लगातार घोड़ा नाच दिखलाया जाएगा. बहुत खोजने पर दो नाम सामने आए. एक तुम्हारा और एक.......” ‘‘.......जारज!’’
”हाॅं! जाॅर्ज! सुना है, तुम दोनों मिलकर षादी-ब्याह में ख़ूब रंग जमा दिया करते थे.” एक व्यक्ति ने उसके कंॅधे पर हाथ रखा. ”जी साहब.” ”तो इस बार तुम, जाॅर्ज....” ”.....नय साब. ई नाचेगा तो खाएगा का?” ”नय हम नाचेेंगे. माय, तोय चुप रह.” ”पईसा - वईसा भी मिलेगा का साब?” मुन्नी से रहा नहीं जा रहा था. ”माय! पईसा के माइर गोली. हम तो नाच करेंगे साहब.” वह बीते दिनों की याद करता हुआ मजबुरीवष किए गए कामों की भीड़ में आनंद के उन क्षणों को फिर से जीने की इच्छा से भर उठा. ”तुम्हारा गदहपचीसी (किषोरावस्था) का उमर हय का? बुद्धू जैसा बात करता हय.’’ मुन्नी अचानक जोर से बोल पड़ी. ‘‘ माय तोंय ना....गदहपचीसी की उम्र में ही क्या पगलाते हैं. लोग?” वह तो नाच के लिए हमेषा से पागल है. बचपन से ही अपने बाबा, आजा को देखकर उनकी नकल उतारता रहा है. पैरों में घॅंघरू बाॅंधकर नाचता रहा है. ”अरे, अब तू फिर से घोड़वा नाच से का पा लेगा?” मुन्नी ने हाथ नचाया. उसने आमंत्रण स्वीकार लिया. ”ठीक है, तो बेल-वरण से ही आ जाना. साथ में और चार - पाँच साथियों को लाना.” ”जी साहब!” मुन्नी चिढ़ गई. जैसे ही वे लोग वापस लौटने लगे, उसके गुस्से का विस्फोट हो गया. ”जइसन के बाँस-बसऊड़ा, वइसन के सूप-दौरा! (जैसा बाँस, वैसा ही सूप) तोइर बाप भी पूरा जिनगी नाच-नाच करत रहऊ, अइब तोंय...” वह चुपचाप चलता रहा. इस समय वह किसी बात से नाराज नहीं हो पा रहा था. बक - झक कर अंत में मुन्नी चुप हो गई. ”सीधा का मुँह बिलार चाटता हय रे. तोंय सीधा हीं, ऊ पइसा के बातो नय किया.” सेनारी का काला हाथ थाम वह कहने लगी. पर उसकी आँखों में नकली घोड़ा की पूंॅछ के पास खड़े जाॅर्ज की छवियाँ तैर रही थी. पैसे की कोई चाहत उन आँखों में नहीं थीं. अपने बाप के साथ पूरे पंद्रह वर्ष तक वह घोड़ा-नाच के हर आयोजन में उपस्थित रहता था. खुद भी वह नकली घोड़े का मुखौटा आदि बनाता रहा. कई बार नाच में षामिल हुआ और बहुप्रषंसित भी. साथ में दूसरे घोड़े के बीच में जाॅर्ज रहता था. इतने वर्शों बाद मिले इस अवसर को वह चूकना नहीं चाहता था. वह बाप के पेषे और षौक को जीवित भी रखना चाहता था. ”चल गीता - सोनवा, आइज झूला झूल हामर तरफ से.” ‘‘ आठ-दस बेर घूमना है, घूम.....का याद करेगी.’’ सेनारी ने अॅंटी से पैसे से निकाल दिखलाते हुए कहा. मेला टांड़ के पास पहुँचते ही वह चहक उठा. मेला टांड में एक तरफ लकड़ी का हथझूला लगा था. चारों वहाँ जाकर खड़े हो अपनी बारी का इंतजार करने लगे. ठेलमठेल! हाथापाई! सोनवा और गीता और लोगों को ढकेल कर किसी तरह एक झूले पर बैठने में कामयाब हो गईं. झूलेवाले की नसें फूल गई थीं. हाथ की उभरी नसों पर पसीने की बूँदें चुहचुहा रही थीं. पर वह रूकने का नाम नहीं ले रहा था. सबको झूले पर झुलाने की जैसे कसम खाई हो उसने. चूंॅ ..... चूंॅ! की आवाज के साथ कील पर घूमता झूला अनवरत खिलखिलाहटों के बीच परवान चढ़ता रहा. दस चक्कर के बाद फिर से पैसे देकर दुबारा दस चक्कर घूम वे दोनों उतरीं. ”बड़ा मइजा लगा.” कहते हुए मुन्नी की गोद से बच्चे को गीता ने थाम लिया. ”ऐइसने मइजा हमको घोड़वा नाच में लगता हय.” सेनारी ने कनखी से माय को देखा. मुन्नी ने मुंॅह ऐठा. सेनारी की ओर देखा, पर कहा कुछ नहीं. दूसरे दिन से गीता, सोनवा एवं मुन्नी ही बाँसों के गट्टर लेकर जोते रहे, सेनारी, जाॅर्ज, मीतवा, ठेंगवा, फुलवा के संग अपने एवं उनके फटे पड़े घोड़े को ठीक करता रहा. झोपड़ी क एक कोने में लालमुँहा घोड़ा कब से पड़ा था. आटे की लेई बना उसकी फटी चिल्फियों में रंग-बिरंगे कागज चिपकाकर वह इतना खुष था, जितना कभी मजदूरी से मिले पैसों से भी नहीं होता था. जब घोड़े का मुँह सुधर गया, वह उसके पिछले हिस्से में झड़ चुकी पूँछ की चिंता में पड़ गया. कब से सूखाकर रखी गई मकई की बालियों के साथ चमकदार बाल को एकसार कर उन्हे पूँछ की जगह लेई से चिपका, ऊपर से कागज से ढँक दिया. दिनभर की मेहनत के बाद घोड़ा तो एकदम मैदाने-जंग में जाने के लिए तैयार था. अब स्वयं पर ध्यान देने की जरूरत थी. उसने टूट चुके घुँघरूओं को निकाला और मिट्टी तेल में रूई डुबोकर एक-एक घुँघरू को साफ करने लगा. किरासन तेल की महक चारों ओर फैलने लगीं. लेकिन यह महक उसे बहुत भली लग रही थी. थोड़ी देर में घॅंुघरू चमक उठे. षाम होते-होते उसके अन्य साथी भी आ पहुँचे. षाम का सूर्य लाल हो चुका था. ”ऐ सेनारी, ई घोड़वा का मुँह देखो, ठीके नय हो रहा हय.” उसने सर उठाकर देखा - ”ई घोड़वा हेकई कि गदहा. आउर तोर घोड़ा का मुँह ठेंगवा ?...... एकदमे मुसा माफिक. लाइन जारज, हाम ठीक कर देंगे.” वह हथौड़े से जूझने लगा. अचानक एक लकड़ी की कील ठोंकते हुए हथौड़े की चोट ऊँगली पर लगी. खून रिस आया. झट मीतवा ने पास की मिट्टी उठा उसकी चोटिल ऊँगली पर रगड़ दी. घाव पकने, दर्द करने की चिंता मिट्टी रगड़ते ही दूर हो गई. दूसरे दिन की कड़ी मेहनत के बाद सबके घोड़े, घुँघरू, रंग - बिरंगी पोषाकें तैयार थीं. उस दिन मुन्नी झोपड़े की झिलंगी खटिया पर लेटी कुढ़ती रही और सेनारी साथियों के संग घोड़ा-नाच का अभ्यास करता रहा. ”दम साध कर सीखना पड़ेगा, समझा. नय तो को बात नय बनेगा.” उसने ढेंगवा को बारंबार बरजा. ‘‘ तुम मन नहीं लगाता है.’’ ”छम - छम!! ....” की समवेत आवाजें मुन्नी का जी हलकान करती रही. ”का बेस, लकड़ी बेचे जाइत रहे. का जे सुझलय इके.” तीन-चार बजे से ही जंगल का रूख करनेवाला सेनारी अब नाच के अभ्यास में लगा रहता. मुन्नी रह-रहकर झॅंुझलाती. ‘‘जइसन के बाॅंस-बॅंसउड़ा, वइसन के सूप-दौरा.’’ सेनारी अनसुना किए रहता. बस! उसे अपना हुनर अच्छी तरह से दिखलाना है. झोपड़ी के अंदर ठक! ठक! की आवाजें सुन-सुनकर वह एकदम नाराज होती रही. पर उसके बस में कुछ नहीं रहा. घॅंुघरू की छम-छम में वह विगत के दर्द को याद करती रही. एक समय था, उसे यह छम-छम ने नृत्यकला से नफ़रत करना सिखा दिया था. सेनारी के साथियों का आना उसेे अब फूटी आॅंख नहीं सुहा रहा है. पता नहीं, उसके बेटे को किसकी नजर लग गई. बेटे के चेहरे पर विभिन्न प्रकार का रंग और चमकीला डे्रस उसके अंदर भय भर रहा था. सेनारी के बाबा का वह ड्रेस उसने कितने यत्न से छिपाकर रख दिया था. पता नहीं कैसे सेनारी के हाथ लग गया. वह उसे धोकर, सुखाकर प्रेस कर चुका था. घर में रखे कोयले के प्रेस में जब उसने कोयला दहकाया था, तभी मुन्नी की आॅंखें दहक उठीं थीं. उसे कैला की आॅंखों की चमक याद आ गई थी. ऐसे ही...ऐसे ही कैला ड्रेस को प्रेस करता, उसे सहेज कर रखता, घॅंुघरू बाॅंधता, चेहरे पर रंग लगाकर गालों में लाली लगाकर, आॅंखों में काजल डालकर, नकली म्ॅंूाछें लगाता था. चेहरे पर एकदम राजा लोग के जैसा भाव लाता था और अकड़कर राजाओं की तरह चलता था. नाचते बखत दोनों हाथ घोडे़ की रास को पकड़े हुए दोनों ओर कड़क ढंग से फैले हुए रहते.
सेनारी भी तो ऐसे ही अकड़ रहा है. वैसे ही दोनों हाथ से रास को पकड़कर सामने के मैदान में अभ्यास कर रहा है. ‘‘बेकार मेहनत कर रहा है. अइब कोय ई नाच-फाच देखता हय? मना कइर दे. ’’ मुन्नी जब-तब उसे रोकने का प्रयास करती. पर सेनारी नहीं मानता.
बेल-वरण के दिन से ही मंच पर सेनारी साथियों के संग नकली घोड़े के बीच घुसा, हाथ में लकड़ी की तलवार पकड़े हुए नाच रहा था. कभी लड़ाई के दृष्य दर्षकों को लुभा रहे थे. तेज रोषनी में सिगरेट की पन्नी लगी तलवार चमक - चमक जाती. काले चेहरों पर रंग रोगन की चमक भी दर्षनीय थी. उसके चमरौंधा जूतों की चर्र - मर्र में घुँघरू की आवाज में खो जा रही थी. छम......छनन....छम की आवाज ढाक, ढोल , नगाड़े की ढम... ढम... ढिका... ढिका... से होड़ कर रही थी.
खूब नाचा वह, खूब नाचा. घोड़े के मुँह को ऊपर और पूँछ वाला भाग नीचे करता, कभी मुँह आगे की ओर झुका पूँछ को उठा देता. कभी सीधे घोड़े के साथ ऐसी फिरकिनी लेता कि घँुघरूओं की छम..... छम से पूरा वातावरण गूँज उठता. कभी लगता था, उसके घँुघरू बंघे पैरों में किसी ने घोड़े की दुलकी चाल की खूबसूरती भर दी हो. आत्मा का सारा सौंर्दय झोंक दिया - भूख, तकलीफ सब भुलाकर. कमाने - खाने की फिक्र्र नहीं थी. वह अज़ब आनंदलोक में विचरने लगा. दषहरा की रातें सुनहरी हो उठीं। नवमी की रात! भीड़ संभाले नहीं संभल रही थी. सेनारी का घोड़ा-नाच देखते हुए एक दर्षक ने अचानक दस का सिक्का मंच पर उछाल दिया. फिर क्या था दो, पांॅच-दस, पचास-सौ के रूपयों, सिक्कों से मंच भरता गया. यह अंतिम रात्रि थी जब उसे अपना सारा हुनर दिखला देना था. उसने दिखलाया भी. उसने मन नही मन अपने पिता को याद किया. उसे अपने बाबा कैला मंच पर खड़े दिखाई दिए. हाथ में तलवार लेकर नकली घोड़े के बीच घुसे हुए. मुॅंह पर खूब सारे रंग-रोगन लगाए हुए. उनका हाथ आषीर्वाद की मुद्रा में उठा हुआ. देर तक दोनों बाप-बेटे की आॅंखें जुड़ी रहीं. आयोजकों की ओर से अचानक माइक पर यह उद्घोशणा - ”सबसे अच्छा नाच दिखलाने के लिए सेनारी एवं उसके साथी को दस हजार का पुरस्कार दिया जाता है. बाकी नर्तकों को भी पांच - सौ रूपये दिए जाते हैं.’’ ‘‘ भाईयों! बहनों! इनके नृत्य कारण ही हमारे पंडाल एवं पूजा - समिति को प्रथम पुरस्कार से नवाजा गया है.”
सेनारी ने सुना, सोनवा ने सुना. सेनारी ने झुककर घोड़े के मुँह और आँखों के बीच में चूम लिया. उसके कान के पास मुँह ले जाकर उसने कहा - ”अइब हाम तोके कभी नहीं छोड़ेंगे.” सेनारी फिर सभी नर्तकों के साथ नाच में तल्लीन हो गया. छम..... छम..... ढम...... ढम...... छन...... छनन! अपने इकलौते छउआ केा बेतरा में बाँधे हुए किनारे सोनवा खड़ी थी. मुन्नी तो गुस्से के मारे आई नहीं, पर सोनवा का मन नहीं माना था. उसने अपने बच्चे को आगे लाकर उसके कपोल चूमे और सेनारी के पैरों की लय और गति में खो गई. उसी महीने हवाओं में तैर रही थी एक खबर - ”सेनारी की नाच को लंडन में आयोजित होनेवाले भारत महोत्सव में भाग लेने के लिए चुना गया है.”
जब आत्महितकारी दल ने एक अविश्वास प्रस्ताव के बल पर नई सरकार बनाने की घोषणा की, तो पूरे देश में अप्रत्याशित सनसनी फैल गई। हर व्यक्ति की जिह्वा पर एक ही प्रश्न था – क्या मनोनीत प्रधान मंत्री, घोटाला प्रसाद देश में वर्षों से फैली जड़ता से जनता को मुक्त करा पाएंगे? क्या वे सचमुच देश को ऐसा प्रजातंत्र दे पाएंगे जिसमें सरकार वे काम करेगी जिनसे जनता का वास्तविक हित होगा? क्या कागजों पर लिखी नीतियों पर सचमुच अमल होगा? क्या जनता वस्तुतः जनार्धन बन जाएगी?
पिछले कुछ वर्षों में घोटाला प्रसाद जी ने देश के प्रशासन में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने का वायदा किया था। वह वायदा वे भूले नहीं । पदग्रहण करने की शपथ लेते ही उन्होंने अपनी नई नीति की घोषणा की। उन्होंने स्वीकारा कि भ्रष्टाचार देश के जन-जीवन में घुन की तरह इस सीमा तक फैल गया है कि उसने समस्त सामाजिक जीवन को खोखला कर डाला है। उन्होंने यह भी माना कि भ्रष्टाचार के घुन से मुक्ति पाए बिना देश की प्रगति संभव नहीं। घोटालाप्रसादजी इस वस्तुस्थित से पूर्णतः परिचित थे कि जिस अभियान को लेकर वे चले हैं, वह कोई सरल कार्य नहीं था। उन्होंने इस प्रकार के सभी पूर्व अभियानों को चलाने वालों और उन अभियानों की नियति का विस्तृत अध्ययन किया था। ताजा इतिहास ऐसे अनगिनत नेताओं की करुणागाथा से भरा हुआ था, जो बड़े उत्साह से चले तो थे भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए, परन्तु स्वयं उसकी चपेट में आकर स्वयं नष्ट हो गए थे। ऐसे नेताओं की कहानियां न केवल असफल अभियानों की गाथाएं सुनाती थीं, अपितु जनसाधारण के स्मृतिपटल पर हास्यात्मक उपाख्यानों का पर्याय बन कर रह गई थीं। घोटालाप्रसाद अपना नाम ऐसे असफल नेताओं की सूची में लिखवाने को कदापि तैयार नहीं थे। उन्होंने इस समस्या पर लम्बे समय तक विचार करने और अनेक योग्य व्यवस्थापकों से परामर्श करने के बाद एक क्रान्तिकारी योजना बनाई थी। उस योजना के अनुसार भ्रष्टाचार उन्मूलन का एकमात्र उपाय था: उसका परदाफाश करना। अपने सनसनीखेज भाषण में घोटालाप्रसाद ने जनता को ललकारा कि वे विचार करें कि भ्रष्टाचार हमारे समाज में क्यों पनप रहा है। आखिर समाज में भ्रष्टाचार है क्यों? अपने ही प्रश्न का स्वयं ही उत्तर देते हुए उन्होंने कहा: “भ्रष्टाचार के विराट वृक्ष की जड़ें सरकारी जटिल नियमों की ओट में पोषण पाती हैं। ये नियम महत्वाकांक्षी व्यक्तियों की प्रगति में कदम-कदम पर बाधा डालते हैं। ऐसे व्यक्ति जहां भी नजर उठाते हैं, उन्हें नियमों की ऊंची दीवारें दिखाई देती हैं। वे स्वयं को नियमों की भूलभुलैया में गुमराह हुआ पाते हैं। जाल में फंसी मछली की तरह वे नियमों के बन्धन से छुटकारा पाने के लिए व्याकुल हो जाते हैं। वे पाते हैं कि वे जो कुछ भी करना चाहते हैं, वह किसी-न-किसी सरकारी नियम के विरुद्ध है। ऐसी परिस्थिति में जकड़ा हुआ एक इंसान क्या करे? बेबस, लाचार लोग तब उन भ्रष्ट अधिकारियों का मुंह निहारते हैं, जो उन्हें नियमों के चक्रव्युह से बाहर निकलने में सहायता करे। इसके लिए लोग सरकारी अधिकारियों को मुंह-मांगी कीमत देने को विवश हो जाते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि जो नियम अच्छी व्यवस्था के लिए बनाए गए थे, वे ही नियम जनता के शोषण का माध्यम बन गए हैं। और यह तो अधिकांश लोग अपने अनुभव से जानते हैं कि जब कोई एक बार इन अधिकारियों के चंगुल में आ जाता है, वह उनकी पकड़ से बाहर नहीं जा सकता, भले ही वह कितना भी चिल्लाए या छटपटाए।
इस समय सरकारी नियम जौंक की तरह जनता का खून चूसने का माध्यम बन गए हैं। हे देशवासियो, आज मैं शपथ लेता हूं कि जब तक आपके गलों में बंधे इन असहनीय नियमों से आपको मुक्ति नहीं दिला दूंगा, तब तक मैं चैन की सांस नहीं लूंगा। मेरी सरकार केवल एक नीति अपनाएगी – किसी भी व्यक्ति के पीछे जितनी आवाज, उसके उतने ही अधिकार।”
वह भाषण नीति का घोषणा-पत्र था। उसमें व्याख्या के लिए स्थान नहीं था। परन्तु लोगों को उसकी अधिक देर तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी; वह शीघ्र ही प्रकट हो गई। नई नीति कि अनुसार, उदाहरण के रूप में, यदि कोई आवेदक अपने आवेदन-पत्र के साथ नगरपालिका के खजाने में एक लाख रुपए जमा कराने की घोषणा करे, और उसकी वह राशि अन्य प्रत्याशियों द्वारा सुझाई गई राशि से अधिक हो, तो उसे उस नगरपालिका के क्षेत्र के सभी विद्यालयों में पुस्तकें बेचने का एकाघिकार प्राप्त हो जाएगा। इसी तरह यदि किसी गांव का सरपंच दो सौ मतदाताओं के हस्ताक्षर सहित आवेदन-पत्र भेजे, तो उसके गांव से सड़क निकालने की योजना पर पूरी गंभीरता से विचार किया जाएगा। और यदि आवेदन-पत्र के साथ पांच लाख रुपया भी क्षेत्रीय विकास आयोग को भेजी जाए, तो सड़क-निर्माण के विरुद्ध समस्त याचिकाएं रद्द कर दी जाएंगी।
सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार नियमों को शिथिल करने की एक नई प्रक्रिया तुरन्त लागू की जाने वाली थी। इस क्रान्तिकारी नीति को स्पष्ट करने के लिए नमूने के रूप में अनेक उदाहरण दिए गए थे, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं:
पांच लाख रुपए गैस निगम को भेंट करने वाले व्यक्ति को अपने चुने हुए क्षेत्र में गैस वितरण करने का अधिकार उसी प्रकार प्राप्त होगा, जैसे दस लाख रुपए की भेंट पैट्रोल स्टेशन खोलने की अनुमति प्राप्त करा सकेगी।
बीस लाख रुपए से कोई भी व्यक्ति अपनी पसन्द के स्थान पर कोई भी लघु उद्योग चालू करने का अधिकारी होगा। पचास लाख रुपए की राशि मध्य वर्ग के उद्योग और एक करोड़ रुपए की राशि भारी उद्योग शुरू करने के लिए पर्याप्त होगी।
विदेशी व्यापार का द्वार मात्र दो करोड़ रुपए से खोला जा सकेगा, जो अर्पित की गई धनराशि के समानुपात में बढ़कर किसी भी विदेशी बाजार में भारत का प्रतिनिधित्व करने का एकाधिकार प्राप्त कराने की क्षमता रखेगा।
घोटालाप्रसाद की नई खुली नीति व्यवसाय में सुविधाएं दिलाने या जनकल्याण के कार्यों आदि तक ही सीमीत नहीं थी, अपितु उसका दखल राजनैतिक गतिविधियों में भी होना था। उदाहरण के रूप में जहां एक हजार मतदाताओं के हस्ताक्षर के आधार पर कोई भी व्यक्ति एक छोटे नगर की किसी भी पार्टी के आंतरिक चुनावों में अपना प्रतिनिधि नियुक्त कर सकता था, वहां राष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रतिनिधि बैठाने के लिए बीस हजार हस्ताक्षर आवश्यक थे। यहां तक कि पचास हजार हस्ताक्षरों द्वारा किसी भी पार्टी के किसी भी सदस्य को दोबारा चुनाव लड़ने के लिए चुनौती दी जा सकती थी।
स्पष्टतः घोटालाप्रसादीय योजना बड़ी क्रान्तिकारी थी जिसका प्रभाव जन-जीवन के हर पक्ष पर पड़ना था। समाज के अति निर्बल और असंगठित वर्ग से लेकर शक्तिवान और सुसंगठित लोगों तक, कोई भी उस योजना के प्रभाव से बच नहीं सकता था। योजना पर व्यापक रूप से चर्चाएं हुईं। जनता की मांग के कारण रेडियो और दूरदर्शन पर पूर्व-घोषित कार्यक्रम रद्द करके घोटालाप्रसादीय योजना पर विस्तृत वाद-विवाद प्रसारित किए गए। समाचार पत्रों के लिए तो मानो और कोई विषय सूझ ही नहीं पड़ता हो, हर कहीं घोटालाप्रसाद और उनकी नियमों से छुटकारी दिलाने की योजनाएं छा गई थीं। सुर्खियां, विश्लेषण, विवेचन और सम्पादकीय। चन्द गिने-चुने मतवालों को छोड़कर सभी सम्पादकों ने घोटालाप्रसादीय योजना की तारीफ के पुल बांध दिए थे। यद्यपि नए प्रधानमंत्री की तारीफ के आधार पर जीवन-वृत्ति में वृद्धि या उन्नति से सम्बन्धित कोई धारा योजना के अंतर्गत नहीं थी, परन्तु कोई भी सम्पादक राष्ट्रनेता की दिव्यदृष्टि के वर्णन की होड़ में पीछे नहीं रहना दीख पड़ता था। कुछ धुरन्दरों ने लिखा कि वह योजना प्रशासन प्रणाली में ऐसी क्रान्ति लाएगी जो वर्षों की अव्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेंकेगी। अधिकांश सम्पादकीयों के अनुसार देश में एक ऐसा नया प्रभात आने वाला था जिसकी किरणें असंख्य लोगों को नियमों के घने कोहरे से मुक्ति दिला सकेंगी।
राष्ट्र को अपनी मूलभूत योजना प्रस्तुत करने के बाद जब घोटालाप्रसाद अपने कार्यालय में पहुंचे, तो उनकी मेज पर प्रमुख समाचारपत्रों और दूरदर्शन पर हुए कार्यक्रमों में उनकी योजना पर की गई टीका-टिप्पणी की एक विस्तृत रिपोर्ट रखी थी, जिसे पढ़कर वे आत्मविभोर हो उठे। एक अनोखा सुख था वह, जो वर्णनातीत था। उस आनन्द-सरिता में गोते खाता उनका मन अतीत की गहराइयों में डूबे किशोरावस्था के क्षणों में जा पहुंचा। धीरे-धीरे यादें ताजी होने लगीं। उनमें से सबसे पहली स्मृति थी हाई स्कूल परीक्षा की समाप्ति पर हुए अपने पिता से वार्तालाप की। किस तरह वे दुबकते-झिझकते अपने पिता के पास पहुंचे थे सहायता मांगने के लिए। किस तरह उन्होंने अपने पिता को बताया था कि यदि वे अंगरेजी में अंक बढ़वा दें, तो उनके पुत्र का एक वर्ष खराब होने से बच सकता था। उनके सामने अपने पिता का गुस्से से तमतमाता चेहरा आ खड़ा हुआ जिस पर अभी भी पढ़ा जा सकता था – क्या मजाल इस छोकरे की जो प्रधानाचार्य बनारसीदास से अनैतिक कार्य में सहयोग की मांग करे। आखिर बनारसीदास एक धार्मिक व्यक्ति थे। उनकी निष्पक्षता और ईमानदारी की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। वे किस तरह पूरे जीवन में अर्जित अपना यश एक नादान लड़के के कहने में आकर नष्ट कर सकते थे, भले ही वह स्वयं अपना ही पुत्र क्यों न हो। लेकिन घोटालाप्रसाद भी कच्ची गोली नहीं खेले थे। खूब गिड़गिड़ाए। खूब आंसू बहाए। और जब सारे रोने-धोने का कोई असर होता दिखाई नहीं दिया, तो एक नया हथियार उन्होंने फेंका: “केवल इस बार काम करा दीजिए। भविष्य में खूब मेहनत करूंगा और आपको कभी भी शिकायत को मौका न आने दूंगा।”
बेचारे बनारसीदास एक विचित्र दुविधा में पड़ गए थे। एक ओर थे उनके जीवन-सिद्धान्त, और दूसरी ओर था रोता-तड़पता, सहायता मांगता उनका पुत्र। जब बच्चा गलती मानकर उसका निराकरण करने का वचन दे रहा हो, तो उसकी सहायता करना भी तो एक पिता का कर्तव्य हो जाता है। एक विषय में अपने पुत्र के अंक बढ़वा देना बनारसीदास के लिए कोई असाध्य कार्य नहीं था। दुखी मन से ही सही, परन्तु जो वचन उन्होंने अपने पुत्र को दिया, उसे पूरा कर ही दिया। अपने इस कृत्य पर उन्हें गर्व तो नहीं था, परन्तु उसे सन्तान-प्रेमवश स्वीकार अवश्य कर लिया। लेकिन परीक्षा-परिणाम ने जो रहस्य खोला, वह उनके लिए असहनीय हो गया। उनका पुत्र सभी विषयों में अउत्तीण रहा था, सिवाए अंगरेजी के। उन्होंने अपना माथा पीट लिया: “बेटे, तुमने मेरे माथे पर कालिख पोत दी है। मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहा अब।”
यादें थीं कि घुमड़-घुमड़कर प्रकट होती जा रही थीं। हाईस्कूल परीक्षा में दोबारा बैठे, पूरी तैयारी के साथ। एक बार गलती हुई, सो हुई। दोबारा नहीं। इस बार लगाम पिता के हाथ में नहीं, पुत्र के हाथ में थी। परीक्षा होने से पहले ही पूरी जानकारी इकट्ठा थी – किस विषय की कापियां जांच के लिए किस अध्यापक को पास भेजी जाने वाली हैं। परीक्षाएं समाप्त होते ही उन सबसे एक-एक करके सम्पर्क किया गया। पिता का हवाला दिया गया और प्रत्येक अध्यापक से कहा गया कि अन्य सभी परचे तो ठीक हैं, केवल आपके विषय में कमी हो गई है। “वैसे तो पिताजी स्वयं आने वाले थे, लेकिन मैंने ही उनसे कहा कि आपका तो नाम ही काफी है; इतनी-सी छोटी बात के लिए वे आते अच्छे भी तो नहीं लगते।”
स्वभावतः परीक्षा-परिणाम मनोवांछित ही रहा। विश्वविद्यालय की स्नातक परीक्षा का समय आते-आते उस कार्य प्रणाली में काफी सुधार कर लिए गए थे। परीक्षा आरम्भ होने के ठीक पन्द्रह मिनट बाद घोटालाप्रसाद पानी पीने के लिए आज्ञा मांगकर कक्ष से बाहर जाते, जहां एक स्नात्कोत्तर छात्र मित्र उनकी प्रतीक्षा में तैनात होता जिसे एक छोटा-सा परचा पकड़ाकर घोटालाप्रसाद परीक्षा-कक्ष में लौट जाते। पूरे एक घंटे बाद फिर प्यास लगने का नाटक करके जब प्याऊ पर पहुंचते, तो उनका मित्र वहां प्रतीक्षारत मिलता। कागजों की प्राप्ति और फिर जुटकर लिखाई। सभी कुछ कितना सहज था।
कानून की परीक्षा के समय तो कार्य-प्रणाली पूरी तरह परिमार्जित हो गई थी, जिसके अंतर्गत खाली कापियां पहले से ही जुटाकर घर पर रख ली गई थीं। वहीं मित्रों ने बैठकर प्रश्नों के उत्तर तैयार किए और पहुंचा दिए घोटालाप्रसाद के पास परीक्षा कक्ष में। वह शायद पहले विद्यार्थी थे जो अपने हाथ से एक भी शब्द लिखे बिना ही कानून के स्नातक बन गए थे।
शिक्षा जगत से बाहर निकल कर जब वकालती जीवन के अखाड़े में उतरे, तो घोटालाप्रसाद का मन उमंगों से भरा हुआ था। एक अजीब-सी खुमारी थी। सारे संसार जीतने के सपने थे। सभी को न्याय दिलाने की तड़प थी। जीवन के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने की महत्वाकांक्षाएं थीं। मात्र एक ही कमी थी – मुवक्किल। किसी ने उनका नाम तक नहीं सुना था। सवेरे से लेकर शाम तक दफ्तर में बैठते, लेकिन कोई भूल से भी उन्हें अपना मुकदमा लड़ने के लिए आमंत्रित न करता। जो इक्का-दुक्का मामले उनके पास किसी तरह आते भी, वे इतने दुर्बल होते कि उन जैसा नौसीखिया तो क्या, शायद कोई महान्यायवादी भी उन्हें न जीत पाता। ऐसे हरेक मुकदमे में मिली हार उन्हें अपने व्यक्तित्व की कमजोरी का एहसास दिलाती दीखती, जिसकी पीड़ा से उनकी आत्मा बेचैन हो उठती। मश्वरा लेकर अपना मामला किसी दूसरे वकील के हाथ अपना मामला सौंपने वाला हर मुवक्किल उनका परित्याग करता अनुभव होता। आर्थिक कठिनाइयां बढ़ने के साथ ही मन में आत्मग्लानि का भाव पनपने लगा था। कटुता महत्वाकांक्षाओं का स्थान लेती जा रही थी। जीवन एक असहनीय बोझ बन गया था।
यह मात्र संयोग ही था कि छात्रावस्था के एक मित्र कोलम्बो योजना के अंतर्गत जन-कल्याण अधिकारियों की कार्यक्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से लन्डन में हुए एक प्रशिक्षण शिविर से भारत लौटे थे। वह जब घोटालाप्रसाद से मिलने आए, तो तटकर-मुक्त दुकान से खरीदी स्काँच व्हिस्की की एक बोतल भी साथ ले आए। घोटालाप्रसाद ने बोतल रख तो ली, परन्तु बड़े असमंजस में पड़ गए। करें, तो क्या बोतल का! पीते-पिलाते तो थे नहीं। फिर ऐसी चीज को घर में रखने में अनेक प्रकार की कठिनाइयां हो सकती थीं। ईश्वर न करे, यदि प्रधानाचार्य बनारसीदास देख लें, तो तूफान ही खड़ा कर दें। ऐसी बला से मुक्ति पाने का सबसे सरल उपाय यह था कि उस बोतल को किसी उपयुक्त व्यक्ति को भेंट कर दिया जाए। उन दिनों उनके नगर में डकारनाथ आवास अधिकारी के रूप में नियुक्त थे। बड़ा दबदबा था उनका। उनके बारे में वकीलों के क्षेत्रों में अनेक अफवाहें उड़ा करती थीं, जिनकी सचाई की पुष्टि कभी किसी व्यक्ति ने पेश नहीं की थी। अलबत्ता दो बातें सभी मानते थे। पहली तो यह कि डकारनाथ ऐसे बैठकबाज व्यक्ति थे जो ऐरे-गैरे-न्त्थूखैरों को फटकने भी नहीं देते थे, और दूसरी यह कि जो उनके दरबार में एक बार स्वीकृति पा जाता, उसके समस्त संकट दूर हो जाते थे।
बोतल पाने का डकारनाथ से अधिक उपयुक्त अधिकारी और कौन हो सकता था, परन्तु समस्या यह थी कि उन्हें बोतल भेंट करना तो दूर घोटालाप्रसाद को उनसे नजर मिलाने तक का साहस नहीं था। न जाने क्या कह दें! कितना अपमान कर दें!
अनेक दिनों तक हृदय मंथन चला। अनेक योजनाएं डकारमाथजी से मिलने वाली डपट की संभावनाओं की सचाई के प्रकाश में ओझल हो गईं। आखिर एक दिन बहुत साहस करके वे डकारनाथ के कार्यालय में जा पहुंचे। अपनी फटफटिया को खड़ा कर ही रहे थे, कि अपने मौहल्ले में रहनेवाला एक व्यक्ति, जोड़ूदास दिखाई पड़ा। हालत कितनी भी खस्ता हो, आखिर थे तो वकील साहब! जोड़ूदास जैसे किसी व्यक्ति को मुंह लगाना उनकी शान के विरुद्ध था। लेकिन उस दिन न जाने क्यों उसकी ओर देखकर बोले: “भाई,जोड़ूदास आप यहां क्या कर रहे हैं?”
“वकील साहब, मैं तो यहां काम करता हूं। साहब का चपरासी हूं।”
“डकारनाथजी के यहां ?”
“जी, हां।”
“अच्छा ! लो बताओ! मैं भी कितना नादान हूं! बगल में चुहिया और शहर में ढिंढोरा! तुम्हारे साहब से मिलना था।”
“लीजिए यह कौन-सी बड़ी बात है। अभी मिलवा देता हूं।”
घोटालाप्रसाद को अपने सौभाग्य पर विश्वास नहीं हुआ। “नहीं, आज नहीं। फिर कभी। --- भाई मेरे, इतने निकट रहते हो। कभी दीखते ही नहीं। कभी घर आओ। तब बताउंगा।”
जोड़ूदास को सवेरे ही अपने द्वार पर उपस्थित पाकर उनकी बाछें खिल गईं। “भाई, कोई विशेष काम नहीं था। बस होली के मौके पर यह नजराना तुम्हारे साहब को पहुंचाना था।” घोटालाप्रसाद ने उपहार दिए जाने वाले कागज में करीने से लिपटी व्हिस्की की बोतल पकड़ा दी। साथ में था पचास रुपए का नोट। “यह है तुम्हारा इनाम।”
“वकील साहब, इसकी क्या जरूरत थी ! मौहल्लेदार होकर क्या मैं इतना भी काम नहीं कर सकता!” जोड़ूदास ने बोतल थामकर खींसे निकाले।
“वह तो ठीक है, लेकिन इनाम तो जायज है।” घोटालाप्रसाद ने नोट उसकी जेब में ठूंस दिया।
घोटालाप्रसाद को आज तक याद है; लगभग एक महीने बाद बुलावा आ गया था। “हमारे बेटे का जन्मदिन है आगामी रविवार को। कुछ मित्रों को बुलाया है। आप भी आइए।”
घोटालाप्रसाद ने तुरन्त उन मित्रों से सम्पर्क किया जो या तो स्वयं विदेशों में रह चुके थे या जिनका सम्पर्क प्रवासी मित्रों या सम्बन्धियों से था। न जाने किस प्रकार स्काँच व्हिस्की की छह बोतलें जुटाईं और उनका पुलन्दा बनाकर जा पहुंचे जन्मदिन के आयोजन में। वहां पहुंचे, तो आंखें खुली रह गईं। एक छोटे बच्चे के जन्मदिन पर इतने बड़े आयोजन की उन्होंने कल्पना तक नहीं की थी। कोठी के सामनेवाले लाँन में एक बड़ा शामियाना लगा था जो मेहमानों से खचाखच भरा हुआ था।
शामियाने के शीर्षभाग में एक बड़ी मेज पर एक बड़ी केक सजी हुई थी। मेज के निकट मित्रों और हितैषियों द्वरा दिए गए उपहारों का एक पहाड़ खड़ा था। वह सब कल्पनातीत था। घोटालाप्रसाद को सब कुछ बड़ा अटपटा लगा। झिझक के मारे वह एक कोने में जाकर खड़े हो गए। तभी डकारनाथ बड़ी आत्मीयता से आकर बोले: “अरे! वकील साहब, वहां अकेले क्यों खड़े हैं। इसे अपना ही घर समझिए। पार्टी का आनन्द लीजिए।” उस आत्मीयता की गरमी में उनकी सारी झिझक लोप हो गई। वह मेहमानों से ऐसे मिलने लगे, जैसे उन्हें वर्षों से जानते हों। जल्द ही वह घड़ी आ पहुंची जिसका सभी, विशेषतः बच्चे, बड़ी अधीरता से प्रतीक्षा कर रहे थे। श्रीमती नाथ के आग्रह पर सभी लोग केकवाली मेज के चारों ओर जाकर खड़े हो गए। किलकारियां मारते, अपने मित्रों से घिरे, डकारनाथ के दस वर्षीय पुत्र ने जब केक काटा, तो सारा शामियाना ‘हैपी बर्थडे टू यू’ की जादुई तरंग में बह गया। घोटालाप्रसाद बच्चों की निश्छलता में इतने डूबे कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि पूरे शामियाने में उनके अतिरिक्त और कोई वयस्क नहीं बचा था। तभी जोड़ूदास हाजिर हुआ। “वकील साहब, आपको साहब ने कोठी के अन्दर आने को कहा है।”
वह दुबकते-सुकड़ते जोड़ूदास के पीछे यूं चले जैसे कोई आज्ञाकारी सेवक अपना कर्तव्य निभा रहा हो। बैठक में एक दूसरी ही दुनिया थी। नगर के बड़े-बड़े अधिकारी वहां जमा हो गए लगते थे। पुलीस के उप-अधीक्षक बिना वर्दी के एक बढ़िया सूट में विराजमान थे। जिलाधीश महोदय थे। जिला समाज कल्याण अधिकारी वहां शोभा बढ़ा रहे थे। विकास अधिकारी सपत्नीक पधारे थे। गायिका मिस सरगम चहचहा रही थीं। खान-पान पूरे जोरों पर था। यद्यपि सेवा के लिए परिवेषकों का प्रबन्ध था, परन्तु डकारनाथ स्वयं अतिथियों की अगवानी कर रहे थे। घोटालाप्रसाद को चाय का प्याला पकड़े देखकर हैरानी से बोले: “चाय! कुछ और लीजिए – व्हिस्की या वौडका।”
“जी, मैं तो पीता नहीं।”
“वाह, वकील साहब!” डकारनाथ ने ठटाका लगाया। “खुद पीते नहीं, पर दूसरों को खूब पिलाते हैं।”
“जी, ऐसा ही समझ लीजिए।” घोटालाप्रसाद के गाल तमतमा गए थे; मानो चोरी करते हुए पकड़े गए हों। बड़ी विचित्र स्थिति पैदा हो गई थी। मेहमान अटपटा अनुभव करे, तो मेजबान की भी तो इज्जत घटती है। डकारनाथ स्थिति को संभावने में बड़े कुशल थे। उन्होंने तुरन्त विषय बदला। “आप हमारे महकमे में वकालत क्यों नहीं करते?”
“जी।” घोटालाप्रसाद सटपटाए। “कभी अवसर ही नहीं मिला।”
“यह कमी तो अब दूर करनी ही पड़ेगी।” डकारनाथ ने कहा। “हमारे एक मित्र हैं। उनके एक मकान में एक बुढ़िया पिछले तीस साल से बैठी है। दो सौ रुपए महीने में घर संभाला हुआ है। न घर खाली करती है, न किराया बढ़ाती है। --- अब तक तो उन्होंने कुछ नहीं कहा, परन्तु अब उनका बेटा जवान हो गया है; उसके रहने का प्रबन्ध करना आवश्यक हो गया है। ----यदि कहें, तो उनसे कहूं कि आपसे सम्पर्क कर लें।”
सत्तर वर्ष की एक विधवा से मकान खाली कराना कोई सरल काम नहीं था। फिर भी घोटालाप्रसाद ने मामला न केवल लिया बल्कि उस पर खूब मेहनत भी की। पेशी के समय उन्होंने एक ऐसे युवक की कुण्ठामय करुण गाथा कचहरी के सम्मुख रखी जो अपना घर होते हुए भी अपना घरबार बसाने के बदले माता-पिता के साथ रहने को विवश था। काश! उस बूढ़ी स्त्री से मकान खाली करा कर उसे स्वयं अपने घर में जाकर रहने की उसकी तीव्र इच्छा, जो उसका मानवीय अधिकार था, पूरी करने में अदालत उसकी सहायता करे।
यह पूर्ण अधिकाकार से नहीं कहा जा सकता कि जीत उनकी बेजवाब कानूनी बहस के फलस्वरूप मिली थी या डकारनाथ को अपने मित्र और उसके पुत्र को मानसिक कष्ट से छुटकारा दिलाने के उद्देश्य से परदे के पीछे से पहुंचाई सहायता का प्रभाव था। यह तो सर्वथा सत्य था कि अदालत ने फैसला घोटालाप्रसाद के मुवक्किल के पक्ष में सुनाया था। पिछले बीस वर्षों में जो बड़े-बड़े धुरन्दर नहीं कर पाए थे – बाकायदा तय हुए किराए को बिना किसी अन्तराल के देने वाले किराएदार को, वह भी ऐसा जिसका कोई देखनेवाला न हो और जो उस मकान से बाहर कर दिए जाने पर बेघर हो जाए, घोटालाप्रसाद सड़क पर निकाल फिंकवाने में सफल हो गए थे। उस जीत से सारे शहर में तहलका मच गया। उनकी ख्याति दूर-दूर तक जा पहुंची। आवास के विकट मामलों के लिए एक ही वकील है – घोटालाप्रसाद। कैसी भी दयनीय परिस्थियां हों, कितने भी लम्बे काल से किराएदार मकान में रह रहा हो – घोटालाप्रसाद को अपना वकील बनाइए और किराएदार का सामान सड़क पर फिंकवाकर वहां बढ़ी हुई दरों पर नया किराएदार बिठाइए या पूरी इमारत को गिराकर उसके स्थान पर शानदार फ्लैट बनवाइए। आपको कोई रोकने-टोकनेवाला नहीं था।
वकालत से राजनीति की दुनिया में प्रवेश दिलाने में डकारनाथ का परोक्ष रूप से हाथ रहा था। हुआ यह कि पिछले संसदीय चुनाव के समय तत्कालीन पदस्थ सांसद कल्याणसिंह का पलड़ा बड़ा हल्का दिखाई दे रहा था। उनके चुनाव अभियान को चेतना देने के उद्देश्य से एक सभा बुलाई गई थी। लोग अनेक प्रकार की कठिनाइयों का बखान कर रहे थे। वहां उपस्थित एक भी पार्टी-कार्यकर्ता न तो कोई व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत कर रहा था, और न ही कोई आशाजनक समाचार दे पा रहा था। निराशा के अंधकार में डूबी उस सभा के सामने डकारनाथ मानो आशा की एक किरण लेकर उतरे, जब उन्होंने एकाएक खड़े होकर सभा को सम्बोधित किया: “मित्रों, मैंने इस सभा में आने का निश्चय केवल इस कारण किया है कि मुझे इस पार्टी – आत्महित दल के भविष्य में पूरा विश्वास है। इस दल के पास सब कुछ है। अच्छे लोग हैं। अच्छी नीतियां हैं। उन नीतियों को जनता के सामने रखने के लिए आवश्यक धन और अन्य साधन हैं।” एक क्षण के अंतराल के बाद उन्होंने अपना गला खंखारा। अपनी बात जारी रखते हुए उन्होंने कहा। “बस एक कमी है - एक अच्छे अभियान संयोजक की। आप एक अच्छा संयोजक चुन लीजिए, पार्टी को सफलता अवश्य मिलेगी। मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं, न केवल इस सीट के लिए बल्कि इस बात के लिए भी कि चुनावों के बाद आपकी पार्टी विरोधी दल से उठकर सरकार बनाने में भी समर्थ हो सके।”
तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बहुत से लोग खड़े होकर बोलने लगे। पहले तो किसी की समझ में यह नहीं आया, कि हो क्या रहा है। परन्तु जब डकारनाथ के बार-बार आग्रह करने पर सभा में थोड़ी व्यवस्था आई, तो अनेक लोग एक साथ कहने लगे, “हम आपको अपना अभियान संयोजक नियुक्त करने को तैयार हैं।”
डकारनाथ ने उन्हें रोका। “मित्रों, आप मुझे इस पद के योग्य समझते हैं, यह आपकी सहृदयता है। इसके लिए मैं आप सबका आभारी हूं। लेकिन आप जानते हैं कि मैं एक सरकारी कर्मचारी हूं। --- मैं राजनीति में सक्रिय भाग नहीं ले सकता। परन्तु एक काम मैं अवश्य कर सकता हूं। मैं आपको एक ऐसे व्यक्ति का नाम सुझा सकता हूं, जो आपके चुनाव अभियान को सफल बनाने की क्षमता रखता है।”
सभा एक ही मांग से गूंज उठी। “कृपया सुझाइए।”
अपना नाम अपने क्षेत्र के संसदीय चुनाव में पार्टी के अभियान संयोजक के पद के सुझाव पर घोटालाप्रसाद जितने आश्चर्यचकित हुए थे, उतने ही उस सभा में बैठे अन्य सब लोग भी। डकारनाथ ने उन्हें चुनाव-अभियान का भार उठाने योग्य समझा था, तो वह अवश्य ही उसके योग्य होंगे। इसमें शंका का प्रश्न उठ ही नहीं सकता था। घोटालाप्रसाद को सर्वसम्मति से अभियान-संयोजक का पद सौंप दिया गया। अपने भाग्य को सहारते, सभी के प्रति कृतज्ञता, विशेष रूप से डकारनाथजी के प्रति आजन्म ऋणि रहने की शपथ लेते, वह जुट गए अपने नए पद पर। शीघ्र ही उस संसदीय चुनाव क्षेत्र के लिए आत्महित दल की नई रणनीति उभरकर आई। इसके अनुसार दो-तीन बातों पर विशेष ध्यान दिया गया। प्रथम तो यह कि क्योंकि जाति से कल्याणसिंह ठाकुर थे, इसलिए इस बात पर अधिक से अधिक जोर दिया जाए कि उस चुनाव क्षेत्र के सभी ठाकुरों का कर्तव्य है कि वे अपनी जाति के उम्मीदवार को ही अपना मत दें। दूसरी यह कि जिन क्षेत्रों में अभी तक महाविद्यालय नहीं हैं, वहां पार्टी वचन दे कि वहां पार्टी महाविद्यालय स्थापित कराएगी। जब कुछ लोगों ने इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाया कि विरोधी दल की किसी पार्टी के लिए वह कर पाना संभव नहीं है, तो घोटालाप्रसाद ने उन्हें याद दिलाया कि उनकी पार्टी हमेशा विरोधी दल का भाग तो नहीं बनी रहेगी। और जब सत्ता हाथ में होगी, तो तब नई परिस्थिति होगी। नई परिस्थिति में हम नई नीति बना लेंगे। तीसरी यह कि चुनावों के दौरान दलितों, निर्धन वर्ग के कुछ चुने हुए लोगों को यथा संभव, सीधी आर्थिक सहायता दी जाए और उसका भरपूर प्रचार किया जाए।
घोटालाप्रसाद इस तथ्य से पूरी तरह परिचित थे कि कुछ वार्ड ऐसे थे, जहां सत्ताधारी दल का प्रभाव अधिक था। उन्होंने तमाम चुनाव अधिकारियों की सूची तैयार की और उनमें से आत्महितकारी दल की नीतियों से सहानुभूति रखनेवालों को छांटा। तब स्थानीय चुनाव आयुक्त के कार्यालय में कार्यरत कुछ मित्रों की सहायता से उन अधिकारियों की नियुक्ति सत्ताधारी पार्टी से सहानुभूतिवाले वार्डों में कराई। इन अधिकारियों के कर्तव्यों में निरक्षरों, नेत्रहिनों आदि मतदाताओं की सहायता करना भी था। अधिकारियों की यह सहायता कल्याणसिंह को विजय दिलाने में बड़ी उपयोगी सिद्ध हुई।
इसे संयोग कहिए या नियति, कि चुनावों में विजय पाने के कुछ समय बाद ही कल्याणसिंह अचानक दिल का दौरा पड़ने पर चल बसे। घोटालाप्रसाद ने उपचुनावों में आत्महितकारी दल की ओर से खड़े होकर न केवल आक्समिक समस्या का निराकरण कर दिया, बल्कि शीघ्र ही संसद में अपने दल की स्थिति मजबूत कर दी। संसद में अपनी पार्टी का बहुमत बनाने के लिए उन्होंने क्या कुछ नहीं किया! देश के कोने-कोने में गए। अपने दल के सांसदों का मनोबल बढ़ाया। इसके साथ ही दूसरी पार्टियों के असंतुष्ट सांसदों से मेल-जोल भी बढ़ाया और उन्हें अपने दल में भर्ती होने के लिए प्रोत्साहित किया। इन प्रयत्नों में खुली चैकबुक नीति सर्वोपरि थी। यदि अफवाहों पर विश्वास करें, तो जब भी दूसरी पार्टी में असंतोष की रत्ती भर भी भनक पड़ती, घोटालाप्रसाद चैकबुक लेकर पहुंच जाते थे; परन्तु शायद वह उनके साथ अन्याय हो। अवश्य ही उनकी सफलता के पीछे उनका परिश्रम और निष्ठा महत्वपूर्ण रही होगी। अंततः जब अविश्वास प्रस्ताव को समय आया, तो सब कुछ तैयार था। सत्ताधारी दल के ही लगभग एक चौथाई सांसदों ने अपने ही दल के विरुद्ध मत देकर अपनी ही पार्टी का तख्ता पलट दिया। जनता ने जिन लोगों को सत्ता सोंपी थी, उन्होंने सत्ता घोटालाप्रसाद के हाथ सोंप दी। वह एक अकल्पनीय साजिश थी या नियति, कौन जाने?
एक क्षण के लिए उन्हें लगा कि अविश्वास प्रस्ताव में उनकी विजय मात्र एक स्वप्न थी। परन्तु तभी वरिष्ठ अधिकारियों का दल कर्तव्यपरायणतापूर्वक उनके सामने आ खड़ा हुआ। उनकी मेज पर ताजा समस्याओं की एक मिसल रखी थी, जिससे स्पष्ट था कि वह कोई स्वप्न नहीं, एक वास्तविकता थी। देश भी उस वास्तविकता को जितनी जल्द समझ ले, उतना ही उसके हित में होगा। देश के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा जा रहा था।
मम्मी पापा के अंधविश्वास, संकीर्ण मानसिकता एवं रूग्ण मानसिकता के कारण तुम इस संसार में नहीं आ पाई एवं हर राखी पर मेरी सूनी कलाई मेरे नयन छलकाती रहीं। जिस समय तुम्हें इस संसार में आने से रोका गया था, मैं बहुत छोटा था, वरना शायद विरोध प्रकट तो करता ही। बडा़ होने पर अकस्मात मम्मी की डायरी से मुझे सब कुछ पता चल गया। अब मैं वैज्ञानिक हूँ। जीवन साथी से विवाह पूर्व साक्षात्कार में मैंने स्पष्ट कर दी थी मन की पीडा़ एवं प्रायश्चित भरा संकल्प भी कि हम कन्या भ्रूण हत्या जैसा जघन्य पाप नही करेंगे। भरे गले से किए मेरे संकल्प को सुन मीता ने भी छलकती आंखों से अपनी पूर्ण सहमति प्रकट कर विश्वास का रिश्ता मजबूत किया था। यही नहीं, मेरे सृजन कक्ष में लगे ‘‘लड़की‘‘ के फोटो को उसने तुरन्त अपने मोबाइल में भी ‘‘सेव‘‘ कर लिया था। मीता मेरी जीवन संगिनी रही। सुख दुगुना, दुख आधा करती, ‘‘गुड-न्यूज‘‘ का परिणाम नन्ही गुडि़या पाकर हम दोनों ही निःशब्द हैं। मुझे लग रहा है कि तुम जो मेरी बहन बनकर नहीं आ पाई, अब हमारी बेटी बनकर आई हो। इस रक्षा बन्धन को बेटी के नन्हे हाथों में राखी का धागा देकर अपनी कलाई पर बांधूंगा, मीता का कृतज्ञ हूँ कि मुझे अजन्मी बहन इतने वर्षों बाद बेटी के रूप में मिली है। मिली में हम दोनों को बहन-बेटी सब कुछ मिल गई है। हम दोनों ईश्वर के कृतज्ञ हैं। मेरा प्रायश्चित पूरा हुआ। मेरा कोई दोष नहीं था। इसलिए तुम मेरी बेटी बन इस संसार में आ गई। सुबह का भूला शाम को घर आए, तो एसे भूला हुआ नहीं कहते।
बूढ़े शरीरों में कोई जोश नहीं था फिर भी बेटे की जिद पर अटैची लग ही गईं दोनों की। बहू ने तमककर सुनाया - मैंने क्या कभी जिद की है आपके बेटे से कि मुझे अकेले साथ लेकर घूमने चलो, तो बात अनसुनी कर दी उन्होंने , पर जब आठ साल के पोते ने अटैची में ताले लगते देख कहा -ओह नो, क्या ये दादा-दादी भी साथ चलेंगे? अपनी फैमिली के साथ बस क्यों नहीं जा सकते हमलोग-- तो माथे की नस जोर से तिड़की और धम्म् कानों के पास, आँखों के आगे मानो एक बेआवाज धमाका हुआ अंदर तक बींधता...बम-सा फटा कुछ।
डबडबाई आँखों के आगे पल भर में ही सुखी परिवार और बुढ़ापे की लाठी जैसे दिवा स्वप्नों के भग्नावशेषों के साथ ही ताले-ताली.. पूरा भविष्य सब मानो किरच्-किरच् जमीन पर बिखरा पड़ा था ।...
बुद्धिजीवी
ताजे तरतीब से कटे लॉन पर टुकड़े-टुकड़े बिछी धूप... कहीं सोना सा बिखरा था तो कहीं राख पुती थी। ऐसे ही एक चमचमाते घास के छोटे से कालीन पर गिलहरी, बिल्ली और कबूतर, तीनों साथ-साथ पीठ के बल लेटे दिखे और धूप का एक शोख टुकड़ा छतरी सा तना था उनके ऊपर। मन किया तस्बीर खींच ले अजूबे की। जानी दुश्मन और यूँ साथ-साथ- हंसे बिना न रह सकी वह। यही तो सह अस्तित्व है, वसुधैव कुटुम्बकम वाला। यही तो दुनिया है ...जरूरतों के मुताबिक चलती। वैसे भी एक प्रतीक्षित मेहमान है धूप ठंडे-ठिठुरे इस देश मे...आते-आते जाने कहां खो जाती है अक्सर। उसका मन किया थोड़ी देर और चुपचाप यूँ ही लेटी रहे आँखें बंद किए। घर के काम तो होते ही रहेंगे, देर-सबेर! सुख चीज़ ही ऐसी है; आदमी खुद बखुद कैदी बन जाता है - पैरों पर पड़ती गुनगुनी धूप का आनंद लेती मोहिनी धूप की तरफ थोड़ा और सरक गई ।
छत छूती शीशे की हीरे-सी चमकती खिड़कियों से मानो पूरा आकाश उतर आया था कमरे में। सुबह से आंख-मिचौली खेलती धूप अब सोफे तक पसर चुकी थी, अपनी गरम मुलायम चद्दर से उसे ढकती-उढ़ाती। मुंहलगी सहेली बनी कब्जा कर चुकी थी कमरे के चप्पे-चप्पे पर... उसकी निजता पर भी। मोहिनी को धूप का यह उद्दंड आत्मविश्वास भरा हंसता-खिलखिलाता अतिक्रमण अच्छा ही नहीं, सुखद लग रहा था। अब तो उदास होने की भी गुंजाइश नहीं बची थी। ‘ बेटी दूर चली गई तो क्या, मैं आ गई हूं ना’- गुनुगनी धूप बेहद नरमाहट से बारबार गुदगुदा रही थी उसे... मानो हंसा कर ही दम लेगी।
घंटों यूँ ही लेटी भी रहती वह अगर फोन की घंटी बज-बजकर कई-कई आवाजें न देती उसे।
रोमा थी- बच्चों के फोटो डाले हैं फेसबुक पर। तुरंत ही देखो मां- जिद किए जा रही थी।
होठों पर आई मुस्कान पोंछती लैपटॉप उठा लाई वह। रोमा जबसे शादी करके अपने घर में जा बसी है, दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन चुका है यह। घंटे दो घंटे बेटी से बातचीत करके ही कुछ और कर पाती है...वरना दिन बड़ा आधा-अधूरा-सा लगता उसे। दिन कैसे गुजरा- पता न चले, यही तो चाहती है वह भी। मित्रों की संख्या बढ़ती जा रही है फेसबुक के पन्ने पर। वैसे तो आम के आम और गुठलियों के दाम-सी ही बात है यह भी। कई मित्र मिले। कई तो बहुत अच्छे। हाँ, यह भी सही है कि इनमें से कइयों का परिचय-पता कुछ भी नहीं जानती वह, पर ना करना भी तो नहीं आता उसे। मित्र मानने में क्या बुराई है किसी को। कोई हाय-हलो करे तो बात भी कर लेती है, यह बात दूसरी है कि मेले की सी भीड़-भाड़ ही रहती है चारोतरफ।
हाय दीदी, खोलते ही कमल था इस बार चैट पर। नव निर्वाचित आई. ए. एस औफिसर। मैं देश के लिए अपने समाज के लिए बहुत कुछ करना चाहता हूँ। उसका उत्साही युवा चरित्र मोहिनी के मन माफिक ही जोशीला था।
मेरी एक मैगजीन भी है। क्या आप हमारी मैगजीन के लिए लिखोगे? आपको पढ़ा है मैंने । आपके विचार अच्छे लगे मुझे।
हाँ-हाँ क्यों नहीं। सहज स्वीकृति दे दी थी उसने। पर जब लिंक पर गई तो मानो कुंठाओं से जर्जर सड़ी-गली बदबूदार जगह पर जा पहुँची थी वह। जिन्दगी का इतना घिनौना और विद्रूप रूप तो देखा ही नहीं था उसने।
कैसी लगी मेरी साइट आपको? कमल बेचैन था जानने को।
मुझसे और मेरे परिवेश से मिलता-जुलता तो कुछ भी नहीं है वहाँ पर। हिम्मत करके कह ही दिया था उसने। मैं तुम्हारी क्या मदद कर पाऊंगी अपने विचारों से।
क्या इसीलिए यह ज्यादा जरूरी नहीं कि आप लिखो हमारी मैगजीन में ताकी हमें भी आपके पास आने का, आपकी जिन्दगी में झांकने का मौका मिले। हम भी कुछ सीख सकें आपकी संपन्न और साफ-सुथरी जिन्दगी से।
अब मोहिनी चतुर्वेदी के पास बच कर निकल पाने का कोई रास्ता नहीं था। उसके चारो तरफ बुद्धिजीवियों की एक नई तरह की दुनिया उठ खड़ी हुई थी। कुंठित, भ्रमित, विक्षिप्त बुद्धिजीवी।
अगला दिन और भयावह था । कम्प्यूटर खोलने तक में डरने लगी थी वह तो अब। नया-नया बना मित्र कमल ही था इसबार भी और समस्या कुछ कुछ फिल्मी-सी।
मदद करो मेरी दीदी।
आतुर-सी आवाज लगी थी उसे।
हाँ-हाँ , क्यों नहीं ! बोलो क्या समस्या है?
सारी ममता आवाज में उमड़ आई थी दीदी शब्द सुनते ही।
समस्या तो जरा टेढ़ी है। मेरी गर्ल फ्रैंन्ड है न। हम पांच साल से साथ रह रहे हैं।
हाँ , हाँ , क्या लड़ाई हो गई उससे।
नहीं , वह पिल खाना भूल गई । लगता है प्रेगनेंट है। शादी के लिए जिद कर रही है! बताएँ, क्या करूँ?
मेरे भाई हो तो सही और इज्जत वाला काम करो। अपनी जिम्मेदारी संभाल लो।
यह कैसा बुर्जुआ ओल्ड मेन्टैलिटी का जबाव है दीदी। आपसे यह अपेक्षा नहीं थी। बच्चा तो वही संसार में आना चाहिए जिसका मां-बाप को इन्तजार हो , है ना ?
पर, अब जो आ ही रहा है , उसे मारना भी तो पाप है । तर्क पर विचलित होते हुए मोहिनी ने तुरंत ही प्रत्युत्तर दिया।
न तो मैं यह शादी कर सकता हूँ, और ना ही यह जिम्मेदारी निभा सकता हूँ। बस एक आपसी समझौता था हमारा साथ रहने का।
क्यों, वजह ? मोहिनी पूरी तरह से भ्रमित थी, आहत भी। वह अभी भी उतनी ही सहजता से कहे जा रहा था-
क्योंकि मैं औलरेडी शादीशुदा हूँ । मेरे दो बच्चे हैं। एबौर्शन तो कराना ही होगा उसे, अगर साथ रहना चाहती है। आम बात है यह तो आजकल। आप तो विदेश में रहती हो, सब जानती समझती हो। आपसे क्या छुपाना।
चुपचाप कम्प्यूटर बन्द कर दिया उसने। नहीं, फिसलन के इस सुख को समझ पाना उसके बस में नहीं। कितना बदल चुका है देश ...युवा... उनका चरित्र. और देश का भविष्य. भी।..क्या इसी आजादी का सपना था हर आँख में?
और यह देखिए सुबह का सूरज सचमुच मुनमुन के लिए खुशियों की कई किरन ले कर उगा। अख़बार में ख़बर छपी थी कि सभी शिक्षा मित्रों को ट्रेनिंग दे कर नियमित किया जाएगा। दोपहर तक डाकिया एक चिट्ठी दे गया। चिट्ठी क्या पी. सी. एस. परीक्षा का प्रवेश पत्र था। मुनमुन ने प्रवेश पत्र चहकते हुए अम्मा को दिखाया तो अम्मा भावुक हो गईं। बोली, ‘तो अब तुम भी अधिकारी बन जाओगी?’ और फिर जैसे उन का मन कांप उठा और बोलीं, ‘अपने भइया लोगों की तरह!’मुनमुन अम्मा का डर समझ गई। अम्मा को अंकवार में भर कर बोली, ‘नहीं अम्मा, भइया लोगों की तरह नहीं, तुम्हारी बिटिया की तरह! पर अभी तो दिल्ली बहुत दूर है। देखो क्या होता है?’
पीसीएस की तैयारी तो आधी अधूरी पहले ही से थी, उस की। पर मुनक्का राय की सलाह मान कर मुनमुन ने स्कूल से छुट्टी ले ली। लंबी मेडिकल लीव। और तैयारी में लग गई। दिन-रात एक कर दिया। वह भूल गई बाक़ी सब कुछ। जैसे उस की ज़िंदगी में पीसीएस के इम्तहान के सिवाय कुछ रह ही नहीं गया था। बांसगांव के लोग तरस गए मुनमुन की एक झलक भर पाने के लिए। बांसगांव की धूल भरी सड़क जैसे उसकी राह देखती रहती। पर वह घर से निकलती ही नहीं थी। वह अंदर ही अंदर अपने को नए ढंग से रच रही थी। गोया खुद अपने ही गर्भ में हो। खुद ही मां हो, खुद ही भ्रूण। ऐसे जैसे सृजनकर्ता अपना सृजन खुद करे। बिखरे हुए को सृजन में संवरते -बनते अगर देखना हो तो तब मुनमुन को देखा जा सकता था। वह कबीर को गुनगुनाती, ‘खुद ही डंडी, खुद ही तराजू, खुद ही बैठा तोलता।’ वह अपने ही को तौल रही थी। एक नई आग और एक नई अग्नि परीक्षा से गुज़रती मुनमुन जानती थी कि अगर अब की वह नहीं उबरी तो फिर कभी नहीं उबर पाएगी। जीवन जीना है कि नरक जीना है सब कुछ इस परीक्षा परिणाम पर मुनःसर करता है, यह वह जानती थी। अम्मा कुछ टोकतीं तो मुनक्का रोकते हुए कहते, ‘मत रोको, सोना आग में तप रहा है, तपने दो!’
जाने यह संयोग था कि मुनमुन का प्रेम कि मुनमुन की इस तैयारी के समय मुनक्का राय और श्रीमती मुनक्का राय दोनों ही कभी बीमार नहीं पड़े। न कोई आर्थिक चिंता आई। हां, इधर राहुल का भेजा पैसा आया था सो मुनमुन को वेतन न मिलने के बावजूद घर खर्च में बाधा नहीं आई। बीच में दो बार मुनमुन के स्कूल के हेड मास्टर भी आए ‘बीमार’ मुनमुन को देखने। पर वह उन से भी नहीं मिली। मुनक्का राय से ही मिल कर वह लौट गए।
कहते हैं न कि जैसे सब का समय फिरता है वैसे मुनमुन के दिन भी फिरे। समय ज़रूर लगा। पर जो मुनक्का राय कहते थे कि, ‘सोना आग में तप रहा है, तपने दो!’ वह सोना सचमुच तप गया था। मुनमुन पीसीएस मेन में सेलेक्ट हो गई थी। अख़बारों की ख़बरों से बांसगांव ने जाना। पर अब की इस ख़बर पर आह भरने के लिए गिरधारी राय नहीं थे। न ही ललकार कर मुनमुन के नाम से चनाजोर गरम बेचने वाले तिवारी जी। मुनमुन ने तिवारी जी को इस मौके़ पर बहुत मिस किया। बधाई देने वाले, लड्डू खाने वाले लोग बहुत आए बांसगांव में उस के घर। पर मुनमुन के भाइयों का फ़ोन भी नहीं आया। न ही घनश्याम राय या राधेश्याम राय का फ़ोन। दीपक को फ़ोन कर के ज़रूर मुनमुन ने आशीर्वाद मांगा। दीपक ने दिल खोल कर आशीर्वाद दिया भी। हां, रीता आई और थाईलैंड से विनीता की बधाई भी फ़ोन पर। बहुत बाद में राहुल ने भी फ़ोन कर खुशी जताई।
ट्रेनिंग-व्रेनिंग पूरी होने के बाद मुनमुन अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक तहसील में एसडीएम तैनात हो गई है। बांसगांव से आते वक्त उस ने अम्मा, बाबू जी को अकेला नहीं छोड़ा। बाबू जी से बोली, ‘छोड़िए यह प्रेक्टिस का मोह और चलिए अपनी रानी बिटिया के साथ!‘
‘अब बेटी की कमाई का अन्न खाएंगे हम लोग?’ अम्मा बोलीं, ‘राम-राम, पाप न पड़ेगा!’
लेकिन मुनक्का राय चुप ही रहे। पर जब मुनमुन ने बहुत दबाव डाला तो वह धीरे से बोले, ‘तो क्या इस घर में ताला डाल दें?’
‘और क्या करेंगे?’ मुनमुन बोली, ‘अब मैं आप लोगों को इस तरह अकेला नहीं छोड़ सकती!‘ फिर उसने जोड़ा, ‘छुट्टियों में आते रहेंगे!’
‘फिर तो ठीक है!’ मुनक्का राय को जैसे राह मिल गई।
‘लेकिन!’ मुनमुन की अम्मा ने प्रतिवाद किया।
‘कुछ नहीं अब चलो!’ मुनक्का राय बोले, ‘इस का भी हम पर हक़ है। अभी तक हमारे कहने पर यह चली। अब समय आ गया है कि इस के कहे पर हम चलें।’ वह ज़रा रुके और पत्नी का हाथ थाम कर बोले, ‘चलो बेटी चलते हैं।’
मुकदमों की सारी फाइलें वग़ैरह उन्हों ने जूनियरों और मुंशी के सिपुर्द की। घर का बाहर वाला कमरा जूनियरों को चैंबर बनाने के लिए दे दिया। और अपनी नेम प्लेट दिखाते हुए जूनियरों से बोले, ‘यह नाम यहां और बांसगांव में बना रहना चाहिए। उतारना नहीं यह नेम प्लेट और न ही हमारे नाम पर बट्टा लगाना। और हां घर में दीया बत्ती करते रहना। मतलब लाइट जलाते रहना।’ जूनियरों ने हां में हां मिलाई।
बाक़ी घर में ताला लगाते हुए मुनक्का राय बांसगांव से विदा हुए सपत्नीक मुनमुन बेटी के साथ। और बोले, ‘देखते हैं आबोदाना अब कहां-कहां ले जाता है!’ फिर एक लंबी सांस ली। संयोग ही था कि पड़ोसी ज़िले में धीरज भी अब सीडीओ हो गया था। कभी कभार कमिश्नर की मीटिंग में धीरज, मुनमुन आमने-सामने पड़ जाते हैं तो मुनमुन झुक कर धीरज के चरण स्पर्श करती है। धीरज भी मुनमुन के सिर पर हाथ रख कर आशीष देता है। पर कोई संवाद नहीं होता दोनों के बीच। न सार्वजनिक रूप से न व्यक्तिगत रूप से।
ऐसी ही किसी मीटिंग के लिए एक दिन जब मुनमुन कलफ लगी साड़ी में गॉगल्स लगाए अपनी जीप से उतर रही थी तो वह बीएसए सामने पड़ गया, जिसने सुनीता के पति की शिकायत पर उस से जवाब तलब करने के लिए उस को बुलाया था। देखते ही वह चौंका और ज़रा अदब से बोला, ‘मैम आप !’और फिर जैसे उछलते हुए बोला, ‘आप तो बांसगांव वाली मुनमुन मैम हैं!’
‘हूं।’ वह गॉगल्स ज़रा ढीला करती बोली, ‘आप?’
‘अरे मैम मैं फला बीएसए।’ वह ज़रा अदब से बोला, ‘जब आप ....... !’
‘शिक्षा मित्र थी....!’
‘जी मैम, जी.... जी!’
‘तो?’ मुनमुन ने ज़रा तरेरा!
‘कुछ नहीं मैम, कुछ नहीं। प्रणाम!’ वह जैसे हकला पड़ा।
‘इट्स ओ.के.!’ कह कर मुनमुन बिलकुल अफ़सरी अंदाज़ में आगे निकली। तब तक धीरज अपनी कार से उतरता सामने पड़ गया। तो उसने हमेशा की तरह झुक कर चरण स्पर्श किया। और धीरज ने भी हमेशा की तरह उस के सिर पर हाथ रख कर आशीष दिया। निःशब्द! इस बीच मुनमुन ने कानूनी रूप से राधेश्याम को गुपचुप तलाक भी दे दिया। बड़ी खामोशी से। भाइयों को यह भी पता नहीं चला।
हां, राधेश्याम अब भी कभी कभार पी-पा कर बांसगांव आ जाता है। कभी मुनक्का राय के ताला लगे घर का दरवाज़ा पीटता है तो कभी पड़ोसियों के दरवाजे़ पीटता है। इस फेर में वह अकसर पिट जाता है। पर उसे इस का बहुत अफ़सोस नहीं होता। वह तो बुदबुदाता रहता है कि, ‘मुनमुन मेरी है!’ लोग उसे बताते भी हैं कि मुनमुन अब यहां नहीं रहती। अब वह भी अपने भाइयों की तरह अफ़सर हो गई है। राधेश्याम बहकते हुए लड़खड़ाती आवाज़ में कहता है, ‘तो क्या हुआ! है तो मेरी मुनमुन!’
मुनमुन भी कभी कभार अम्मा बाबू जी को ले कर बांसगांव आ जाती है। क्या करे वह बेबस हो जाती है। वह रहे कहीं भी पर उस के दिल में धड़कता तो बांसगांव ही है। बांसगांव की बेचैनी उसके मन से कभी जाती नहीं। कभी-कभी वह हेरती है उन तिवारी जी को बांसगांव के बस स्टैंड पर जो मुनमुन नाम से एक समय चनाजोर गरम बेचते थे। वह तिवारी जी, जो वह जानती है कि अब जीवित नहीं हैं। तो भी। करे भी तो क्या वह! सुख-दुख, मान-अपमान, सफलता-असफलता सब कुछ दिखाया इस बांसगांव ने। अल्हड़ जवानी भी बांसगांव की बांसुरी पर ही उसने गाई, सुनी और गुनी। और फिर जवानी बरबाद भी इसी बांसगांव के बरगद की छांव में हुई। उन दिनों वह गाती भी थी, ‘बरबाद कजरवा हो गइलैं !’तो भला कैसे भूल जाए इस आबाद और बरबाद बांसगांव को यह बांसगांव की मुनमुन। संभव ही नहीं जब तक वह जिएगी, जैसे भी जिएगी, बांसगांव तो उसके सीने में धड़केगा ही। लोग जब तब उस के बदले अंदाज़ या साहबी ठाट-बाट पर चकित होते हैं या उस से उस के संघर्ष पर बात करते हैं तो वह लोगों से कहती है, ‘स्थाई तो कुछ भी नहीं होता। सब कुछ बदलता रहता है। सुख हो,दुख हो या समय। बदलना तो सब को ही है।’ फिर वह जैसे बुदबुदाती है, ‘हां, यह बांसगांव नहीं बदलता तो क्या करें?’
‘उ तो सब ठीक है।’ एक पड़ोसिन कहती है, ‘मुनमुन बहिनी शादी कब कर रही हो?’
मुनमुन चुप लगा जाती है। जहां मुनमुन एस. डी. एम. है वहां भी अधिकरी कॉलोनी में उस की एक पड़ोसी औरत ने उसी के घर में उसी से ठीक मुनक्का राय के सामने पूछ लिया है, ‘दीदी आप ने अब तक शादी क्यों नहीं की?’ वह मुनमुन के विवाह और तलाक के बारे में नहीं जानती। यहां कोई भी नहीं जानता। मुनमुन जनाना भी नहीं चाहती। पर वह औरत अपना सवाल फिर दुहराती है कि, ‘दीदी आप ने अब तक शादी क्यों नहीं की?’
‘इन्हीं से पूछिए !’ मुनमुन धीरे से बाबू जी को इंगित करते हुए कहती है।
मुनक्का राय ने कोई जवाब देने के बजाय छड़ी उठा ली है। और टहलने निकल गए हैं। रास्ते में सोच रहे हैं कि क्या मुनमुन अब अपना वर भी खुद ही नहीं ढूंढ सकती? कि वह ही फिर से ढूंढना शुरू करें। मुनमुन के लिए कोई उपयुक्त वर। क्या अख़बारों में विज्ञापन दे दें? या इंटरनेट पर? घर लौटते वक्त वह सोचते हैं कि आज वह इस बारे में मुनमुन से स्पष्ट बात करेंगे। वह अपने आप से ही बुदबुदाते भी हैं, ‘चाहे जो हो शादी तो करनी ही है मुनमुन बिटिया की!’
आज की ग़ज़ल की तस्वीर देख कर ये तो माना जा सकता है कि नई नस्ल के नुमाइंदे ग़ज़ल के साथ इन्साफ तो कर रहे है मगर भीड़ से अलग नज़र आने की फ़िक्र में कुछ शाइर कई बार ग़ज़ल के सर से दुपट्टा भी उतार लेते है और फिर अदब की सतह पर जब ग़ज़ल उतरती है तो उस शाइर को कम और ग़ज़ल को ज़ियादा शर्मिंदगी उठानी पड़ती है ! सुर्ख़ियों में रहने की चाह ,शुहरत की भूख , मुशायरे के मंच की जादूगरी ये सब ला-इलाज़ बीमारियाँ नस्ले - नौ को भी अपनी गिरफ़्त में लेती जा रहीं है !इन सब के बावजूद भी नई पीढ़ी में ग़ज़ल से सच्ची मुहब्बत करने वाले कुछ लोग है जो इमानदारी से अपना काम कर रहें हैं मगर विडंबना ये है की ऐसे लोगों की तादाद हमारे मुल्क को ओलम्पिक में मिलने वाले तमगों से ज़ियादा नहीं है ! नई नस्ल के एक ऐसे ही ग़ज़ल- गो है अखिलेश तिवारी जिनसे पिछले दिनों भाई आदिल रज़ा "आदिल" और फ़ारूक़ इंजीनियर साहेब के तुफ़ैल से जयपुर में मिलने का मौका मिला ,मुख़्तसर सी ये मुलाक़ात दोस्ती में कब तब्दील हो गई पता ही नहीं चला !उनके कुछ अशआर जब सुने तो लगा कि बाद-मुद्दत कानों के साथ - साथ रूह को भी सुकून मिला है ! "अखिलेश तिवारी" से मिलवाकर आदिल भाई और फ़ारूक़ साहब ने वो कर्ज़ा मेरे सर चढ़ा दिया जिसे शायद इस जन्म में उतारना तो मेरे लिए मुमकिन नहीं है ! अखिलेश तिवारी से मिलने और उनके क़लाम से रु-ब-रु होने की तमन्ना तब से दिल में मचल रही थी जब कमलेश्वर जी द्वारा संपादित "हिन्दुस्तानी गज़लें " पढ़ते हुए मेरे ज़हन -ओ- दिल एक मतले और शे'र पर आ कर ठहर गए थे :-
अखिलेश तिवारी मूलतः तो शाइरों के गढ़ कैफ़ी आज़मी के शहर आज़म गढ़ (यू.पी ) के रहने वालें है पर इनके वालिद श्री गिरीश दत तिवारी रेलवे में स्टेशन मास्टर थे सो उन्हें मुलाज़मत के चलते अलग -अलग जगह रहना पडा ! अखिलेश तिवारी का जन्म बीना (मध्य प्रदेश ) में 27 मई 1966 को हुआ ! इन्सान की ज़िन्दगी का सबसे ख़ूबसूरत वक़्त उसके बचपन के दिन होते है अखिलेश भाई का ये मस्ती का दौर बीना में ही गुज़रा उनकी तमाम तालीम यहीं हुई !अपनी स्नातक तक की पढ़ाई उन्होंने सागर विश्वविद्यालय से की ! महज़ 22 साल की उम्र में रेलवे में बतौर सहायक विद्युत् ड्राइवर की नौकरी अखिलेश भाई ने अपने लिए चुन ली और एक साल तक कोटा रतलाम खंड पे न जाने कितने मुसाफ़िरों को उनकी मंज़िल तक पहुंचाते रहे ,रेल की नौकरी रास नहीं आई तो 1989 में भारतीय रिजर्व बैंक का दामन थाम लिया और आज तक पूरी वफ़ा के साथ मुलाज़मत का सफ़र जारी है ! फिलहाल अखिलेश तिवारी सहायक प्रबंधक के पद पर जयपुर में पदस्थापित है !
अखिलेश तिवारी का पत्र -पत्रिकाओं के लिए लिखना तो कॉलेज के ज़माने से था पर बैंक की नौकरी में जब नागपुर आये तो ग़ज़ल से लगाव हो गया !
ग़ालिब और मीर को पढ़कर ग़ज़ल से मुहब्बत बढती चली गई 1990 के शुरू का ये वो दौर था जब अखिलेश साहब को नक्ता और मख्ता में भी फ़र्क़ मालूम न था ! कुछ तो शलभ "नाज़" जैसे अदीब की सोहबत का असर हुआ, कुछ ग़ज़ल का शौक़ भी जुनून में तब्दील होने लगा और इस तरह अखिलेश तिवारी के अन्दर का शाइर खुल कर बाहर आने लगा ! दो साल बाद इनका तबादला कानपुर हो गया जहाँ सही मायने में अखिलेश तिवारी की शाइरी की परवरिश हुई ! यहाँ के ख़ुशगवार माहौल में अखिलेश शे'र कहने लगे और मरहूम नक्श इलाहाबादी साहब से कभी - कभी इस्ला भी लेने लगे !अपनी शाइरी के इब्तिदाई सफ़र में ही अखिलेश तिवारी एक मंझे हुए कूज़ागर (कुम्हार) की तरह अपने ख़याल की मिट्टी में लफ़्ज़ों के पानी को मिलाकर ख़ूबसूरत ग़ज़ल की सुराहियाँ बनाने लगे इनके शुरूआती दौर के कुछ अशआर मेरी इस बात पे सच्चाई की मुहर लगाते है :--
कानपुर कि शाइराना फ़िज़ां में अखिलेश तिवारी के अन्दर का शाइर बहुत जल्द जवान हो गया ! अपने मुतआले (अध्ययन ) को ही इन्होने अपना उस्ताद बना लिया और वक़्त के साथ - साथ अखिलेश ग़ज़ल की कठीन और उबड़ -खाबड़ पगडण्डी पे बड़ी आसानी से चलना तो क्या दौड़ना सीख गये ! शाइरी का अपना एक रहस्य होता है ये वो समय था जब अखिलेश उस रहस्य को जान चुके थे और अखिलेश तिवारी इस तरह के शे'र कहने लगे कि कानपुर के कई तनक़ीद वाले ये सोचने लगते कि ये नीली - नीली आँखों वाला मासूम सा नौजवान क्या ऐसे शे'र कह सकता है ?" ऐसे" वाले अशआर मुलाहिज़ा फरमाएं :--
अखिलेश तिवारी ने शाइरी में रिवायत का जो सबक ग़ालिब और मीर के दीवान से सीखा उसे अपने अन्दर इस तरह तहलील कर लिया है अगर वे ख़ुद भी चाहें तो रिवायत का साथ नहीं छोड़ सकते आज के दौर में रवायत का दामन थामे रखना भी आसान थोड़ी है उन्होंने ख़ुद अपने एक शे'र में कहा है :--
ग़ज़ल कहना किसी मीनाकारी से कम नहीं है ये तो मुआमला शीशागीरी का है ! एक ही बात को मुख्तलिफ़ -मुख्तलिफ़ शाइर अलग - अलग ज़ाविए (कोण ) से कह्ते है ! इशारों और अलामतों के ज़रिये अपनी बात कहने के फ़न में अखिलेश महारथ रखते है !परिंदे और पिंजरे को प्रतीक बनाकर एक ऐसी ग़ज़ल अखिलेश तिवारी की क़लम से निकली जो आज उनकी शनाख्त बन गई है :-
वैसे तो हर इन्सान में एक परिंदा होता है और एक शिकारी भी पर अखिलेश तिवारी को इतना पढ़ लेने के बाद ये तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इनमे सिर्फ़ एक मासूम सा परिंदा है जो पिंजरे की छत को ही अपना आसमाँ समझता है अगर उसके पर निकलने लगते है तो ये परिंदा अपने परों को ख़ुद ही नोच लेता है क्यूंकि अखिलेश तिवारी उसकी क़फ़स है और इस क़फ़स से उसे मुहब्बत हो गई है !
दो मरतबा मुशायरे में भी अखिलेश भाई को सुनने का अवसर मिला ,मुशायरे के मंच की विद्या बड़ी अजीब होती है अखिलेश तिवारी आते है बिना किसी तमहीद और अदाकारी के तहत में अपना क़लाम पढ़कर चले जाते है वे न तो सामईन से दाद की गुज़ारिश करते है न किसी से ये कह्ते है कि आपकी तवज्जो चाहता हूँ उनका सधा हुआ क़लाम अपनी दाद ख़ुद बटोरता है और तवज्जो तो स्वयं ही मजबूर हो जाती है अखिलेश को सुनने के लिए ! उनके इन मिसरों से आप अन्दाज़ा लगा सकते है :--
ग़ज़ल की राह पर तक़रीबन बीस साल से अखिलेश अपना शाइरी का सफ़र मुसलसल जारी रखे हुए है वो भी बिना किसी अदबी माफिया के सहारे के, हाँ अगर उन्होंने कोई सहारा लिया है तो वो है रवायत का , ग़ज़ल का जो परम्परागत स्वरुप है उसको उन्होंने कभी नहीं छोड़ा है अगर मैं ये कहूँ तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अखिलेश शाइरी के मैदान के संजय मांजरेकर है जो कि अपना हर स्ट्रोक शास्त्रीयता के साथ खेलते थे ! मैं ये बात एक हबीब की हैसियत से नहीं कह रहा उनके अशआर मजबूर करते है ये कहने के लिए :--
अखिलेश तिवारी ने जो दो दशक से शाइरी की इबादत की थी वो किताब की शक्ल में अभी - अभी मंज़रे आम पे आई है !लोकायत प्रकाशन , जयपुर ने इसे बड़ी ख़ूबसूरती और दिल से छापा है ! इसका नाम उनके एक शे'र के मिसरे में से लिया गया है जो अपने आप में मुकमल मिसरा है " आसमाँ होने को था " अखिलेश तिवारी को 2005 में लखनऊ महोत्सव में अदब की ख़िदमत के लिए नवाज़ा गया ,राजस्थान पत्रिका ने भी अखिलेश भाई को सम्मानित किया और जयपुर का प्रतिष्ठित पुरस्कार "कमलाकर कमल " से भी अखिलेश तिवारी नवाज़े गये है !
यूँ तो शाइरी में एहसास के आगे लफ़्ज़ फीके पड़ जाते हैं पर अखिलेश तिवारी लफ़्ज़ों को बरतने के फ़न से ख़ूब वाकिफ़ है उनका लफ़्ज़ों का इन्तिख़ाब कमाल का होता है उनके कुछ शे'रों में तो ऐसे लगता है कि एहसास पे लफ़्ज़ भारी पड़ रहें है :--
याद को लश्कर लफ्ज़ के साथ बाँधना और दिगंबर शब्द का अदभुत प्रयोग इस बात की तस्दीक करता है कि अखिलेश लफ़्ज़ों की माला पिरोने में सिद्धहस्त हो गये है !
झूठ ने चाहें कितने भी पैरहन बदल लिए हो मगर अखिलेश तिवारी कि शाइरी पैरहन नहीं बदलती है वो अपनी ग़ज़ल की रेल को तहज़ीब और रवायत की पटरी से उतरने ही नहीं देते उनके ये अशआर तो इस बात की पुरज़ोर वक़ालत करते है :--
अखिलेश तिवारी की ग़ज़ल में वो सब बाते नज़र आती है जो एक ग़ज़ल के मदरसे में सिखाई जाती है उनकी ग़ज़ल में अगर रुमान का शे'र है तो उसमे सूफियाना झलक भी मिलती है
किसे जाना कहाँ है मुनहसिर होता है इस पर भी
भटकता है कोई बाहर तो कोई घर के भीतर भी
फ़लसफ़ों की किताब खोलकर ज़िन्दगी को ज़िन्दगी की तरह नहीं जिया जा सकता मगर अखिलेश तिवारी की शाइरी अपने आप में फ़लसफ़ों की एक मुकमल किताब है उनके कुछ शे'रों में तो एक- एक मिसरा ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा है
क़द और बढ़ता है सर को ज़रा सा ख़म करके न हो तो देख कभी अपने "मैं" को हम करके उस एक सच से मुसीबत में जान थी कितनी मज़े में कट भी गई ज़िन्दगी भरम करके देख आवारगी से क्या हुआ हासिल मुझको अपने कांधों प लिए फिरती है मंज़िल मुझको
ग़ज़ल किसी मूर्तिकार की बनाई हुई मूरत की तरह होती है संगतराश पत्थर को तराश कर उसे एक ख़ूबसूरत शक्ल में तब्दील कर देता है फिर लगता है कि मूरत अभी बोल पड़ेगी ठीक इसी तरह शाइर अपने कहन के शिल्प से बेजान से लफ़्ज़ों में जान फूँक देता है ! अखिलेश की शाइरी का सबसे ताक़तवर पहलू है उनका शिल्प मिसाल के तौर पे उनके ये अशआर :--
वो क़लमकार बहुत खुशनसीब होता है जिसकी क़लम ऐसा कुछ लिख जाती है कि वो तहरीर फिर किसी दौर की मोहताज़ नहीं रहती वो क़लाम चाहें किसी भी दौर में पढ़ा जाय बस यूँ ही लगता है कि ये तो आज का ही है ! ऐसे बहुत से शे'र अखिलेश तिवारी के खाते में है जिन्हें तीन सौ साल पहले का कहा जा सकता है , आज का भी और तीन सौ साल बाद का भी बतौर मिसाल उनके ये शे'र :--
अपनी मुलाज़मत के सिलसिले में अखिलेश भाई को तीन साल लखनऊ रहने का मौक़ा मिला लखनऊ से तो गुज़रने भर से ही तहज़ीब लिपट जाती है फिर ऐसा कैसे हो सकता था कि उनके कहन में लखनऊ की ख़ुशबू न आये :--
जिस तरह अखिलेश तिवारी नई उम्र के पुराने शाइर है उसी तरह उनकी शाइरी नई बोतल में पुरानी शराब की मानिंद है ! जैसे तवील उम्र तक बंजर ज़मीन पर तमन्ना के दरख्त को हरा -भरा रखना एक करिश्माई काम है वैसे ही अपने एहसासात से बिना बगावत किये हुए अपने लफ़्ज़ों को मआनी देना भी एक दुश्वारतरीन काम है और ये काम अखिलेश बड़ी आसानी से कर रहे है ! शाइरी के अथाह महासागर में अखिलेश लहरें गिन-गिन कर शनावर(तैराक ) नहीं हुए है इसके लिए वो समन्दर की तह तक डूब कर गये है !अपनी शाइरी को मोतबर करने के लिए उन्होंने अपने लफ़्ज़ों को उन्ही की आंच में दहका कर अलाव किया है तभी तो लम्हों की दहलीज़ पे आकर सदियाँ उनकी तख़लीक को सलाम करती है ! अदब को ये एतबार तो अखिलेश तिवारी पे हो गया है कि अपनी तलाश में चाहें वो ख़ुद खो जाएगा मगर ग़ज़ल को ग़ज़ल के पैकर में हिफ़ाज़त से रखेगा ! आख़िर में इसी दुआ के साथ कि अखिलेश तिवारी के लहजे से ख़ाकसारी यूँ ही टपकती रहे ,उनका मिज़ाज परिंदा सिफत बना रहे और ग़ज़ल अपने बेहतरीन हाल ,ख़ूबसूरत मुस्तक़बिल के लिए मुतमईन रहे इस गुमान के साथ कि मुझे अखिलेश तिवारी जैसे शाइर कह रहे हैं !
मैं लौटने के इरादे से जा रहा हूँ मगर सफ़र सफ़र है मेरा इंतज़ार मत करना ..साहिल सहरी हिंदी उर्दू साहित्य मे दिलचस्पी रखने वाला शायद ही कोई शख्स हो जिस ने ये शेर न सुना हो ये मशहूर शेर साहिल सहरी नैनीताली का है जिन्होंने कभी दिमाग का कहना नहीं माना हमेशा दिल का कहना ही किया उसी दिल ने आज उनके साथ बेवफाई की और धड़कन बंद हो जाने के सबब आज सुब्ह ८.30 बजे उनका निधन हो गया... अल्लाह उन्हें जन्नत मे ऊंचा मुकाम अता फरमाएसाहिल सहरी का जन्म 4 नवम्बर 1949 को नैनीताल में हुआ उनका असली नाम रहीम खान था उनके पिता रहमत अली खान भी एक उस्ताद शायर थे और अहकर देहलवी तखल्लुस फरमाते थे क्युनके उनकी माँ और साहिल सहरी की दादी पुरानी दिल्ली के एक इल्मी अदबी बाजौक घराने से तआल्लुक रखती थी इसलिए उन्होंने अपने तखल्लुस में नैनीताल मे पैदा होते हुए भी दिल्ली की निस्बत को प्राथमिकता दी इस तरह ये बात दलील के साथ कही जा सकती है कि साहिल सहरी को शायरी का ज्ञान बिरासत में मिला और शायरी उनके खून में शामिल थी.साहिल सहरी के लिए ये बात भी कही जाती थी के जो लोग उनके पास उठे बैठे तो शायर हो गए तो भला साहिल सहरी साहिब की पत्नि उनके प्रभाव से कैसे बचतीं साहिल सहरी की पत्नि निशात साहिल ने भी उनकी रहनुमाई में बड़ी पुख्ता शायरी की है उनकी औलादों में 6 बेटियां 1 बेटा है. एक बहुत पुरानी कहावत है के मछली के बच्चों को तैराकी सीखनी नहीं पड़ती ये हुनर उनमे पैदाइशी होता है उनकी औलादों में भी शायरी के गुण जन्मजात पाए गए और उनकी बेटियों ने वालिद के नक़्शे क़दम पर ही चलते हुए हमेशा मेआरी शायरी की उनकी एक बेटी तरन्नुम निशात ने अपने मेंआरी कलाम से अदब की खूब खिदमत की और शादी के बाद अपने परिवार को समय देने के कारण खुद को मुशायरों से दूर कर लिया लेकिन शेर अब भी कहती हैं. उनकी छोटी बेटी नाजिया सहरी इस समय मुशायरों में बहुत कामयाब शायरा है. तथा पूरे भारत के कवि सम्मेलनों और मुशायरों उनको उनको पसंद किया जाता है.मरहूम साहिल सहरी से मेरी बड़ी कुर्बत थी वो मुझ से बहुत मुहब्बत करते थे हमेशा मेरा होसला बढ़ाते थे.और जब देहली आते तो ज़रूर मुलाक़ात करते.उनसे मेरी पहली मुलाक़ात तब हुई थी जब मैं ने और हामिद अली अख्तर ने एक कुल हिंद मुशायरा व कवी सम्मलेन "एक शाम डाक्टर ताबिश मेहदी के नाम " दिल्ली में कराया था जिसमे वो अपने बेहद अज़ीज़ शागिर्द जदीद लहजे के मुनफ़रिद शायर व् कवि और उत्तरांचल पावर कारपोरेशन में DGM के पद पर कार्यरत जनाब इकबाल आज़र के साथ तशरीफ़ लाये थे जिन पर वो बहुत फख्र करते थे क्यूँ कि इकबाल आज़र साहेब में एक खास बात ये है के वो ब यक वक़्त उर्दू और हिंदी भाषा में शायरी करते हैं जो के एक व्यक्ति का दायें और बाएं हाथ से लिखने जैसा बेहद कठिन काम है लेकिन इकबाल आज़र साहेब उसको उतनी ही आसानी से कर लेते है जितनी आसानी से नट रस्सी पर सीधा चलता है.साहिल सहरी साहब ने मुझे बहुत से मुशायरों में खुद भी बुलाया और दूसरी जगह भी प्रमोट किया ये कह कर के "अच्छी शायरी को अच्छे लोगों तक पहुंचना चाहिए ये हम अदीबों की ज़िम्मेदारी है मैं स्वयं भी और मेरी टूटी फूटी शायरी भी उनके इस सच्चे जज्बे की हमेशा शुक्रगुज़ार रहेगी.स्वर्गीय साहिल सहरी बड़े साफ़ दिल बड़ी साफ़ साफ़ बात करने वाले इंसान थे किसी तरह की मसलहत {diplomacy}और गीबत {निंदा} को बिलकुल पसंद नहीं करते थे एक बार उनका यही मिसरा " सफ़र सफ़र है मेरा इंतज़ार मत करना" तरह के तौर पर दिया गया जिस पर मैं ने कुछ यूँ गिरह लगायी जो उनके इस बड़े शेर से बिलकुल उलट थी के ये बात सच है मगर कह के कौन जाता है " सफ़र सफ़र है मेरा इंतज़ार मत करना" आदिल रशीद{2005} कुछ "अजब से लोगों ने" कुछ "अजब से अंदाज़" में उनको ये शेर सुनाया और उनको "कुछ अजब " से मतलब समझाने चाहे उन्होंने उन्हें कोई भी उत्तर दिए बिना जेब से मोबाइल निकाल कर उन के सामने ही मुझे फ़ोन लगाया और आदत अनुसार हँसते हुए कहा "बरखुरदार मुबारक हो हमारा रिकॉर्ड तोड़ दिया" मैं सटपटा गया और घबराते हुए मैं ने कहा "उस्ताद मैं समझा नहीं" तो उन्होंने हँसते हुए बगैर किसी का नाम लेते हुए कहा " कुछ लोग मुझे तुम्हारा ये शेर सुना रहे हैं जो तुमने मेरे मिसरे पर मिसरा लगाया है मैं ने सोचा के तुमने अच्छा काम किया है तो इनके सामने ही तुम्हे मुबारकबाद दे दूँ" मेरे उस वक़्त भी और बाद में भी कई कई बार इल्तिजा {प्रार्थना}करने पर भी उन्होंने मुझे उन "अजीब से लोगों "के नाम कभी नहीं बताये और अब अगर वो उनके नाम बताना भी चाहें तो बता नहीं सकते क्यूँ के रूहें बोलती नहीं उनको अपनी बात कहने के लिए जिस्म की ज़रुरत होती है.और जिस्म तो आज सुपुर्दे खाक हो गया मैं ने जब-जब उनसे ऐसे "अजीब आदमी नुमा प्राणियों" के विषय में बात की उन्होंने यही कहा के आदिल मियां तुम अपना काम {साहित्य सेवा} करते रहो इस साहित्य के सफ़र में तुमको अभी बहुत से अजीब अजीब प्राणी मिलेंगे साहिल सहरी भी पेशे से घडी साज़ थे और मैं भी पेशे से घडी साज़. एक बार जब मैं ने उन्हें अपना ये शेर सुनाया ''औरों की घड़ियाँ हमने संवारी हैं रात दिन और अपनी इक घडी की हिफाज़त न कर सके"तो उनकी आँख नम हो गई और उन्होंने मेरे सर पर हाथ रख कर मुबारकबाद दी और कहा मुझे ख़ुशी के साथ अफ़सोस है आदिल रशीद कि ये शेर मुझे कहना चाहिए था.मरहूम साहिल सहरी सच्चे शायर सच्चे इंसान थे उन्होंने कभी मुशायरे पढने के लिए जोड़ तोड़ की राजनीती नहीं की,कभी दाद हासिल करने के लिए अपने ही बन्दों द्वारा फरमाइश की पर्ची भेजने का भोंडा ढोंग भी नहीं किया वो अपने आप को संतुष्ट करने के लिए शेर कहते थे.अच्छे शेर कहने और सुनने का उन्हें जूनून था अक्सर रात के पिछले पहर उनका फोन आ जाता और हमेशा की तरह वही एक जुमला होता "भाई कोई अच्छा शेर सुना दो" जब मैं अपना या अपने हाफ़िज़े में से किसी और का कोई अच्छा शेर उन्हें सुना देता तो एक लम्बी ठंडी सांस लेते हुए कहते अब नींद आ जायेगी वो अक्सर शेर कहने के लिए पूरी पूरी रात जागते इसी लिए उन्होंने अपने एक शेर मे कहा भी कि ये हमसे पूछो के किस तरह शेर होते हैंके हम सहर की अजानो के बाद सोते हैंसाहिल सहरी के उस्ताद कुंवर महिंदर सिंह बेदी "सहर" थे इसी लिए वो सहरी लिखते थे. साहिल सहरी कुंवर महिंदर सिंह बेदी "सहर" जिन्हें सब "आली जा " कहते थे के बेहद अज़ीज़ शागिर्द थे जिसका ज़िक्र आली जा ने यादो का जश्न में बड़ी ही मुहब्बत से किया है.जो लोग आली जा की ज़िदगी में आली जा से एक मुलाक़ात करने या आली जा का शागिर्द होने के लिए साहिल सहरी के आगे पीछे घूमते थे आली जा की आँखे बंद होते ही उन्ही लोगों ने साहिल सहरी के पीछे से गाल बजाने शुरू कर दिए लेकिन उनके मरते दम तक उनके सामने नज़रे उठाने कि हिम्मत न कर सके. साहिल सहरी को हमेशा इस बात का गिला रहा के लोगों ने उनसे लिया तो बहुत कुछ मगर जो उनका हक था वो तक कभी नहीं दिया. कई ऐसे कच्ची मिटटी के दीये जिन्हें साहिल सहरी ने आफ़ताब{सूरज जैसा प्रकाशमान} किया था मौक़ा पड़ने पर उन्होंने अपने मुहसिन{अहसान करने वाला} का हाथ जलाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.साहिल सहरी साहिब से यूँ तो मशवरा करने वालों कि गिनती बहुत ही जियादा है लेकिन चन्द शागिर्द जिनका नाम साहिल सहरी साहिब बड़े ही फख्र से लेते थे उनमे ख्याल खन्ना कानपुरी,मशहूर नाजिम ऐ मुशायरा एजाज़ अंसारी दिल्ली,इकबाल आजर देहरादून,वसी अहमद वसी फरुखाबाद,अबसार सिद्दीकी खटीमा शकील सहर एटवी, के नाम काबिले ज़िक्र हैं .उनका एक ग़ज़ल संग्रह "सफ़र सफर है" 2005 में प्रकाशित होकर मशहूर हो चूका था और उनकी ज़िन्दगी में ही उनके अज़ीज़ शागिर्द इकबाल आजर साहेब के हाथो उनकी दूसरी किताब पर काम शरू हो चूका था जिसे अब फख्रे साहिल सहरी जनाब इकबाल आजर "कुल्लियाते साहिल सहरी " के नाम से मुरत्तब {संकलित}कर रहे हैं.जो जल्द ही प्रकाशित होगा साहिल सहरी को उर्दू हिंदी मे उनके योगदान के लिए अनेको सम्मान मिले दूरदर्शन आकाशवाणी ऍफ़ एम् चैनलों पर उनका कलाम प्रसारित हुआ तथा भारत और भारत से बाहर पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुआ एक समय पर मुशायरों पर राज करने वाला बड़ा शायर मुशायरे के माईक से शेर की तरह दहाड़ने वाला शायर {जिसकी नकल करके बहुत से शायर मुशायरों में बहुत कामयाब हुए} अपनी बढती उम्र के साथ रफ्ता रफ्ता मुशायरों से दूर होता गया और आखिरकार आज दुनिया से भी दूर हो गया लेकिन अगर वो चाहे भी तो साहित्य और साहित्य प्रेमियों के दिल से दूर नहीं हो सकता उनके कहे अशआर अदब पारों में हमेशा महफूज़ {सुरक्षित} रहेंगे ।
भारत .( देश) का प्रधानमंत्री निवास ... अन्ना के लगभग १०० समर्थकों ने सुरक्षा कर्मियों की आंख में धूल झोंक कर , अचानक सात रेस कोर्से रोड स्थित प्रधानमंत्री निवास निवास जा कर हंगामा किया , नारे .बाजी की , दीवालों पर अपशब्द लिखे , पर्चे फेंके , कोयले के टुकड़े फेंके और दीवाल फांद कर अन्दर घुसने की कोशिश की .. अन्ना ने इसे लोगों का गुस्सा बताया .
अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया अपनी अपनी पत्नियों के सात जंतर मंतर पर अनशन स्थल के पीछे बने कमरे में विश्राम करते हुए शनिवार २९ जुलाई २०१२
सवाल
१: अगर ये १०० लोग आतंकवादी होते तो , क्या आलम होता , इसकी कल्पना कर ही रोंगटे खड़े हो जाते है ?
२; हमारी सुरक्षा व्यवस्था कितनी लचर और नाकारा है , क्या इसका जीवंत उदाहरण नहीं है ये घटना ?
३ : ज़ब अति विशिस्ट लोगों की सुरक्षा में इस कदर लापरवाही बरती जाती है तो आम लोगो का होगा ?
४: सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदारी किसकी है और इस घटना में लापरवाही के लिए कौन ज़िम्मेदार है ,?
५:जनता ज़वाब चाहती है कि ज़ब देश के प्रधान मंत्री की सुरक्षा व्यवस्था , वह भी दिल्ली में , का तंत्र इतना लचर है तो देश की सुरक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है .
६;सुरक्षा में लापरवाही के ज़िम्मेदार लोगों (अधिकारीयों ) के खिलाफ क्या जाँच की गयी और दोषी लोगों के खिलाफ क्या कार्यवाही की गयी ?
७: सुरक्षा तंत्र और अन्ना टीम में शामिल पूर्व अधिकारियों के बीच कंही कोई साठ गांठ तो नहीं थी .
८: देश का ख़ुफ़िया तंत्र क्या इतना नाकारा है की उसे अपनी ज़मीन पर खुले आम होने वाली गतिविधियों की भी जानकारी नहीं मिल पाती सवाल
९ : क्या अन्ना से सरकार इतना डरी हुई है क़ि देश को उनको मनमानी /मर्जी पर छोड़ दिया गया है ?
गुवाहाटी की उस लड़की के नाम : ब्रह्मपुत्र आज सिसक सिसक कर रो रही है!!!
भाग एक :
हेबाला [ श्री भूपेन हजारिका अक्सर north -east की लडकियों को बाला कहतेथे. ] ; तो हे बाला , हमें माफ़ करना , क्योंकि हम तुम्हारे लियेकिसी कृष्ण को इस बारधरती पर अवतरित नहीं कर सके. actually कृष्ण भी हमसे डर गए है . उनका कहना है कि वो दैत्य से लड़ सकते है , देवताओं से लड़सकते है .जानवरों से लड़ सकते है; लेकिन इस आदमी का क्या करे ......!!!तो वोजान गए है कि हम आदमी इस जगत के सबसे बुरी कौम में से है . न हमारा नाशहोंगा और न ही हम आदमियों का नाश होने देंगे. कृष्ण चाहते थे कि वहां कोईआदमी कृष्णबन जाए . लेकिन वो भूल गए , धोखे में आ गए . वहां हर कोई सिर्फ और सिर्फआदमी ही था . और हर कोई सिर्फ दुशाशन ही बनना चाहता था . कोई भी कृष्ण नहींबनना चाहता था. In fact अब कृष्ण outdated हो गए है . वहां उन लडको मेंसिर्फ आदमी ही था . वहां जो भीड़ खड़ी होकरतमाशा देख रही थी ,. वो भी आदमियों से ही भरी हुई थी . तो हे बाला हमेंमाफ़ करना . क्योंकिहम आदमी बस गोश्त को ही देखते है , हमें उस गोश्त मेंहमारी बेटी या हमारी बहन या हमारी कोई अपनी ही सगी औरत नज़र नहीं आती है .
भाग दो :
दोष किसका है : मीडिया का जोकिआये दिन अपने चैनेल्स पर दुनिया की गंदगी परोसकर युवाओ के मन को उकसातीहै. या इस सुचना क्रांति का जिसका का दुरूपयोग होता है और युवा मन बहकतेरहता है . या हमारे गुम होते संस्कारों का , जो हमें स्त्रियों का आदर करनासिखाते थे.या हम माता -पिता का जो कि अपने बच्चो को ठीक शिक्षा नहींदेपा रहे है .या युवाओ का जो अब स्त्रियों को सिर्फ एकभोग की वस्तु हीसमझ रहे है .टीवी में आये दिन वो सारे विज्ञापन क्या युवाओ को और उनके मनको नहीं उकसाते होंगे.फिल्मो में औरतो का चरित्र जिस तरह से जिन कपड़ोमें दर्शाया जा रहा है . क्या वो इन युवा पीढ़ी कोइस अपराध के लिये नहींउकसाते होंगे ? कहाँ गलत हो रहा है . किस बात की कुंठा है. और फिर तन कामहत्व इस तरह से कैसे हमारे युवाओ के मन में गलत घर बना रहा है . क्यामाता-पिता का दोष इन युवाओ से कम नहीं ? क्यों उन्होंने इतनी छूट दे रखी है. कुछ तो गलत हो रहा है , हमारी सम्पूर्ण सोच में . और अबहम सभी को ; एक मज़बूत सोच औरrethinking की जरुरत है .
भाग तीन :
तो बाला , हमें इससे क्या लेना देना कि अब सारा जीवन तुम्हारे मन में हम आदमियों कोलेकर किस तरह की सोच उभरे. कि तुम सोचो कि आदमी से बेहतर तो जानवर ही होतेहोंगे . हमे इससे क्या लेना देना कि तुम्हारे घरवालो पर इस बात का क्या असरहोंगा . हमें इससे क्या लेना देना कि तुम्हारी माँ कितने आंसू रोयेंगी .हमें इससे भी क्या लेना देना कि तुम्हारे पिता या भाईको हम आदमी औरहम आदमियों की कुछऔरते पीठ पीछे ये कहा करेंगी , कि ये उस लड़की के पिता है या भाई है .हमें इस बात से क्या लेना देना , कि अगर तुम्हारी कोई छोटीबहन हो तो हमआदमी उसे भी easily available ही समझेंगे .इससे क्या लेना देना कि अबतुम्हारी ज़िन्दगी नरक बन गयी है .और जीवन भर , अपने मरने तक तुम इस घटनाको नहीं भुला पाओंगी. हमें इससे क्या लेना देना कि अब इस ज़िन्दगी में कोईभी पुरुष अगर तुम्हे प्रेम से भी छुए तो तुम सिहर सिहर जाओंगी . और अंत मेंहमें इससे क्या लेना देना कि तुम ये सब कुछ सहन नहीं कर पाओ और आत्महत्याही कर लो . हमें क्या करना है बेटी. हम आदमी है . ये हमारा ही समाज है .
भाग चार :
अब चंद आदमी ये कहेंगे किउस लड़की को इतनी रात को उस पब में क्या करना था. क्या ये उस लड़की की गलतीनहीं है . अब चंद आदमी येभी कहेंगे कि आजकल लडकियांभी तो कम नहीं है .अब चंद आदमी ये भी कहेंगे कि उस लड़की ने proactive ड्रेस पहन रखी थी .लडकिया अपने ड्रेस से और अपनी बातो से लडको को [? ] [ आदमियों को ] उकसानेका कार्य करती है .अब चंद आदमी ये कहेंगे कि उस लड़की के माँ बाप को समझनहीं है क्या जो इतनी रात को उसे पब भेज रहे है . वो भी ११ वी पढने वाली लड़कीको . अब चंद आदमी येभी कहेंगे कि उस लड़की का चरित्र भी ठीक नहीं होंगा .अब चंद आदमी ये कहेंगे कि देश सिर्फ ऐसी लडकियों और औरतो की वजह से हीख़राब होते जा रहा है . मतलब ये कि ये चंद आदमी पूरी तरह से सारा दोष उसलड़की पर ही डाल देंगे . ये चंद आदमी ये भी नहीं सोचेंगे कि north -east हमारे देश के सबसे अडवांस states है और वहां पर ज्यादा gender biased घटनाएं नहीं होती है .. [ except जब हमारी so called सेना के चंद जवानआदमी वहाँ की औरतो का जब तबदोहन करते रहते है ] . और अब ये चंद आदमी इसदेश में तय करेंगे कि औरते ख़राब होतीहै .
भाग पांच :
तो हे बाला, हम सब का क्या .हम थोड़ा लिखना पढना जानते हैतो इसीलिए हम थोड़ा लिख कर पढ़कर बोल कर अपनागुस्सा जाहिर करते है . दरअसल उस तरह के लिखने पढने वाले अब नहीं रह गए हैकि जिनके कहे से क्रान्ति आ जाती थी और न ही उनकी बातो को सुनकर जोश मेंकुछ करने वाले बन्दे रह गए है . तुम तो ये समझ लो कि हम सबका खून ठंडा होचला है . और और एक तरह से नपुंसक ही है . हाँ , हमें दुःख है कि तुम्हारेसाथ ये हुआ. ये तुम्हारे साथ तो क्या , किसी के भी साथ नहीं होना था. हमेंदुःख है कि आदमी नाम से तुम्हारा परिचय इस तरह से हुआ है . लेकिन हाँ , हमये भी कहना चाहते है कि सारे आदमी ख़राब भी नहीं होते. क्योंकि जिसपत्रकारने ये सब हम तक ये सब बात पहुंचाई , वो भी एक भला आदमी ही है . बस तुम इतनीसी बात को याद रखोकि बेटी, ये बाते भी एक आदमी ही लिखरहा है . ईश्वरतुम्हे मन की शान्ति दे.हाँ एक बात और , मुझे ये तो पता नहीं कि ये समाज कबबदलेंगा , लेकिन मैं आज एक बात तुमसे और सारी औरतो से कहना चाहता हूं , कि "अबला तेरी यही कहानी, आँचल में दूध , औरआँखों में पानी" वालीस्त्रियों का ज़माना नहीं रहा . समाज ऐसे ही घृणित जानवरों से भरा पड़ा है .इनसे तुम्हे खुद ही लड़ना होंगा. तो खुद को तैयार करो और इतने सक्षम बनो किहर मुसीबत का तुम सामना कर सको.औरहाँ , ईश्वर से ये भी प्रार्थना हैकि जीवन में कोई आदमी तुम्हे ऐसा जरुर दे , जो कि तुम्हारे मन से आदमी केनाम से जो डर बैठ गया होंगा ; वो उसे ख़त्म करे , उसे जड़ से निकाल दे.आमीन !!
भाग छह :
ब्रह्मपुत्र की लहरों को सबसेज्यादा गुस्सेल और उफनती कहा गया है . आज ब्रम्हपुत्र जरुर रो रही होंगी किवो एक नदी है और उसी की धरती पर ऐसा एक बच्ची के साथऐसा घृणित कार्यहुआ. हे ब्रम्हपुत्र , मैं सारे आदमियों की तरफ से तुमसे माफ़ी मांगता हूं.इतना ही मेरे बस में है!!! और बस में ये भी है कि मैं एक कोशिश करूँ किअपने आस पास के समाज को दोबारा ऐसा करने से रोकूँ. और बस में ये भी है किमैं अपने बच्चो को और वो दुसरे सारे बच्चो को बताऊँ कि औरत एक माँ भी होतीहै और उन्हें जन्म देने वाली भी एक औरत ही है . और मेरे बस में ये भी है किमैं उन सभी कोऔरत की इज्जतकरना सिखाऊ. हे ब्रम्हपुत्र मुझे इतनीशक्ति जरुर देना कि मैं ये कर सकूँ.
भाग सात :एक कविता : दुनिया की उनतमाम औरतो के नाम , उन आदमियोंकि तरफ से जो ये सोचते हैकिउन औरतो कावतन उनके जिस्म से ज्यादा नहीं होता है :
जानवर
अक्सर शहर के जंगलों में ; मुझे जानवर नज़र आतें है ! आदमी की शक्ल में , घूमते हुए ; शिकार को ढूंढते हुए; और झपटते हुए.. फिर नोचते हुए.. और खाते हुए !
और फिर एक और शिकार के तलाश में , भटकते हुए..!
और क्या कहूँ , जो जंगल के जानवर है ; वो परेशान है ! हैरान है !! आदमी की भूख को देखकर !!!
मुझसे कह रहे थे.. तुम आदमियोंसे तो हम जानवर अच्छे !!!
उन जानवरों के सामने ; मैं निशब्दथा , क्योंकि ; मैं भी एक आदमीथा !!!
हमसे पिछली पीढ़ियों के साहित्यकार बड़े भाग्यवान थे कि उनके पल्ले साहित्य का हरा भरा मैदान आया था जिसके कारण वे उस हरी भरी भाव भूमि की हरी- हरी घास पर क्षण भर से लेकर जीवन भर तक साहित्यिक कुलांचे भर सके थे. उस लेखकीय दौर का जलवा ही कुछ ऐसा था कि उस ज़माने में जिस किसी को भी उस मैदान में घुसने का मौका मिला, वह जीवन भर वहीँ लोट लगता रहा. उस प्राकृतिक हरे मैदान की तासीर " राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य , कोई कवि बन जाए सहज सम्भाय्व" जैसी थी. जैसे ही कोई नया साहित्यप्रेमी उस मैदान में पग धरता था, उसके मन में कल्पनाओं के फूल खिलने लगते थे. उस मैदान पर जिधर नज़र डालिए उधर भावों, अनुभूतियों व रसों से सिंचित शस्य श्यामल घास के ऊपर साहित्यकर्मी तितलियों की तरह से रंगीन छटाएं बिखेरते नज़र आते थे. उस उन्मुक्त वातावरण में प्रकृति की स्वाभाविक गोद में आराम से बैठ साहित्यकार को रचना करते देखना कितनी सुखद अनुभूति होती होगी. एक हाथ में नोटबुक लिए, दूसरे हाथ से पेन मुंह में दिए, आकाश की ओर ताकता बैठा भावुक कवि इंतज़ार कर रहा है कि कब रचना सुंदरी धीरे धीरे उतर क्षितिज से आएगी और उसकी नोटबुक में समा जायेगी. प्रतीक्षा के ऐसे ही किसी क्षण में कवि ने अचानक पेन मुंह से हटाकर नीचे रख दिया और उस निर्मल, सुगधित व रससिक्त घास का एक तिनका उठा कर मुंह में दबा लिया. उस तिनके से निचुड़े हुए रस का वह असर हुआ कि सम्पूर्ण रचना अपने आप आँखों के सामने साकार हो गयी. साहित्य के मैदान में एक और फूल खिल गया. कवि जी को भी समझ आ गया कि लेखन का गुण न आकाश को ताकने में है और न ही पेन चबाने में, बल्कि इस रसवंती घास के भावपूर्ण रस में वह प्रभाव है जो लिखने को सहज संभाव्य बनाता है. कवि जी ने घास के कुछ और तिनके उठा कर चबाये और उनकी लेखनी धडाधड रचनाएं उगलने लगीं-कविता,लम्बी कविता, महाकविता,खंडकाव्य , महाकाव्य . अन्य रचनाकार भी उस घास को चबाते गए और कहानी , नाटक, उपन्यास,जीवनी से साहित्य को समृद्ध करते गए. किन्तु इस सामूहिक चराई कार्यक्रम का दुष्परिणाम ये हुआ कि उस साहित्यिक झुण्ड में कुछ कोरे चरैये भी आ मिले . उन चरैयों ने उस मैदान की ऐसी घनघोर चराई कि जिससे वह हरा भरा मैदान सरकारी योजनाओं की तरह से सफाचट हो गया. जब हमारी पीढ़ी का कलम भांजने का नंबर आया तब तक उस कुदरती मैदान को एक स्टेडियम का रूप देकर उस पर विभिन्न वादों, गुटों व मंडलियों के रेशों से निर्मित पौली ग्रास बिछा दी गयी थी. पौली ग्रास यानि कि कुदरती हरी घास से भी ज्यादा हरी घास. एक एक कृत्रिम रेशा नाप तौल कर व सहेज कर सिंथेटिक आधार से जोड़ा हुआ. सतह इतनी चिकनी व सपाट की बैठने को पैर उठाओ तो उसकी खूबसूरती कुचलने को मन न करे. जूतों से छू भर दो तो मैली हो जाए. अब ऐसी 'सौफिसटीकेटेड ग्रास " पर बैठ कर कोई भला कैसे लिख सकता है. वह भीगी धरती की सोंधी खुशबु , वह घास पर बिखरी ओस की बूँदें, वह तिनके उठा कर मुंह में दबाना और फिर कल्पना के लोक में उड़कर चले जाना.वह सब इस पौलीग्रास में कहाँ संभव है. यह तो आज के चरित्र सी दिखावेबाज़ है. ऊपर से चिकनी पर अन्दर से कठोर है. दौड़ती ज़िन्दगी की रफ़्तार का प्रदर्शन है और देखने में एक सी सतह लगते हुए भी स्वनामधन्य समीक्षकों व मठाधीशों की तरह से बीच में से उठी है. आधुनिक व्यवहारकुशल बुद्धिजीवियों की तरह से दूर से मुस्करा कर बुलाती है पर पास जाने पर अपनेपन की भीनी भीनी खुशबु नहीं देती है. मैं कुदरती मैदान के धोखे में अपनी लेखनी उठाये इधर चला आया था. हरी घास पर क्षण भर बैठ कर लिखने की उम्मीद थी पर यहाँ तो पौलीग्रास पर लेखक,[कवि खिलाड़ियों की तरह से बेसब्री से इधर उधर दौड़ते हुए मिले , एक दूसरे को छकाते हुए, अपना दल बनाते हुए और मिल कर दूसरे दलों पर हमला करते हुए. इस वैज्ञानिक घास की तासीर ही कुछ ऐसी है. यह हरी भी है और घास भी है पर इस घास का तिनका उठा कर उसके रस को चखा नहीं जा सकता है. ऐसी घास पर चलना भावों की लेखनी का नहीं , सख्त लकड़ी की बनी कलम का काम है. शायद इसीलिए इस पर भागते दौड़ते लेखक अपनी लेखनियों को हॉकी की तरह से ताने रखते हैं.
बच्चों, एकलव्य की कहानी महाभारत से है। यह एक समर्पित बहादुर भील बालक की कहानी है। जब धनुर्विद्या के सर्वोत्तम गुरु द्रोणाचार्य ने उसकी निम्न जाति की वजह से उसे शिक्षा देने से मना कर दिया , तो वह निराश नहीं हुआ। अपितु उनकी मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उसने उन्हें ही गुरु मानकर प्रणाम किया और आशीर्वाद लिया व खुद ही अभ्यास आरंभ कर दिया। एक दिन जब गुरु का कुत्ता भोंक-भोंक कर उसकी साधना में विघ्न डाल रहा था तो उसने तीरों से उसका मुंह भर दिया, पर ऐसे कि न तो उसके मुंह में चोट लगे और न ही वह भोंक पाए। कुत्ता इसी अवस्था में वापस द्रोणाचार्य के पास वापस पहुँचा।
देखकर दंग रह गए वह। यह विद्या तो वह अर्जुन को भी नहीं सिखा पाए जो कि उनका सबसे प्रिय और उनकी आंखों में सबसे होनहार शिष्य था। कौतुकवश वे तुरंत ही उस योग्य धनुर्धर की खोज में निकल पड़े। कुछ ही दूरी पर उन्हें वह गरीब भील बालक दिख गया। क्या तुम्हीने यह बाण चलाए थे, यदि हाँ, तो किस गुरू से सीखी यह विद्या। जी आपसे ही। कहकर उसने द्रोणाचार्य के पैर छूए और उन्हें उनकी वह मिट्टी की प्रतिमा दिखा दी जिसे प्रणाम करके वह रोज अभ्यास करता था। अब गुरु का दिमाग तेजी से एकबार फिर वक्रगति से चलने लगा। अगर शिक्षा ली है तो बिना गुरु-दक्षिणा दिए तो तुम्हारी दीक्षा पूरी हो ही नहीं सकती।
जी, मांगिए। वह गरीब अभागा बालक गद्गद् था।
मुझे अपने दाहिने हाथ का अंगूठा दो। गुरु जी ने मांगा।
अपनी वर्षों की साधना भूल, यह जानते हुए भी कि बिना दाहिने अंगूठे के अब वह धनुष कभी नहीं उठा पाएगा, बाण नहीं चला पाएगा, मिनट भर भी बिना हिचके अपना दाएं हाथ का अंगूठा काटकर गुरु जी के चरणों पर रख दिया।
तो बच्चों जंगल राज्य तब भी था। वह नहीं चाहते थे कि दुनिया में कोई भी अर्जुन से अच्छा धनुर्धर हो। एक भील बच्चा तो हरगिज ही नहीं।...
-शैल अग्रवाल
जंगल में आजादी
जंगल में भी खुशियाँ छाई, आजादी का दिन आया। हंसी-ख़ुशी और बड़े चाव से, सबने वन को खूब सजाया।
बन्दर मामा ने सुन्दर सा, ऊंचा मंच बनाया। कोयल, मोर, पपीहे ने मिल, राष्ट्र-गान था गाया।
वनराजा ने ली सलामी, झंडा भी फहराया। आजादी हित मर मिटने का, सबको पाठ पढ़ाया
कदम ताल से ताल मिलाकर, बजे बैंड शहनाई। ढ़ोलक बोली ताक धिना-धिन, नाच उठा लोमड़ भाई।
हाथी-भालू और गिलहरी, खुश-खुश दिखते सारे। देख की खातिर मिट जाएंगें, गूंज रहे थे नारे।
खील, बताशे बंटी मिठाईयाँ सबने जी भर खाई। एक बनेंगें नेक बनेंगें, शपथ हमें है भाई।