" मेरे नगपति! मेरे विशाल! साकार, दिव्य, गौरव विराट्, पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल मेरी जननी के हिम-किरीट मेरे भारत के दिव्य भाल।"
-रामधारी सिंह 'दिनकर'
( हिमालय-विशेषांक))
( लेखनी-अँक 31 - सितंबर 2009)
इस अंक में- कविता आज और अभीः विनोद कुमार शुक्ल, दिनेश ध्यानी, तेजराम शर्मा, सत्येन्द्र श्रीवास्तव। माह विशेषः नागार्जुन, गोपाल सिंह नेपाली। कविता धरोहरः सोहनलाल द्विवेदी। माह की कवियत्रीः नलिनी पुरोहित। बाल कविताः रामेश्वर कम्बोज हिमांशु।
यात्राः शैल अग्रवाल। मन्थनः डॉ. पदमचन्द काश्यप। मुद्दाःदिनेश ध्यानी। परिचयः सरोज शर्मा। कहानी धरोहरः शैलेश मटियानी। कहानी समकालीनः अशोक गुप्ता। लघुकथाः देवी नागरानी, शैल अग्रवाल। प्रकृतिः संदीप साइलस। पर्यटनः दिनेश ध्यानी। परिदृश्यः दिनेश ध्यानी। चौपालः वेद प्रताप वैदिक। हास्य-व्यंग्यः अविनाश वाचस्पति। बाल कहानीः यहूदी लोककथा और खबरों से भरपूर विविधा।
कवि की कल्पना में, सत्य और ब्रह्म को तलाशते आध्यात्मिक व धार्मिकों के दर्शन और चिंतन में, लुटेरों और सैलानियों की दृष्टि व पर्यटन में, विस्तृत और अनमोल नैसर्गिक खजाने-सा हिमालय सदैव से ही विशेष आकर्षण रहा है। लोगों ने अपनी-अपनी तरह से इसे गरिमामण्डित और चित्रित भी किया है; छायांकन ही नहीं, ब्रश और शब्दों से भी, ऋषि मुनि और आदि कवियों ने तो मंत्र और ऋचाओं तक में। इतने अभिभूत और भयभीत रहे हैं हम इसके उद्दात और प्रचंड रूप से कि आदिदेव साक्षात शिव को सपरिवार वहीं बसा दिया है अपनी रक्षा व सुरक्षा के लिए।तबसे चला आ रहा वह पूजापाठ और मिथकों का सिलसिला, आज भी तो जारी है। प्रायः गुत्थी जितनी रहस्यमय होती है, आकर्षण और भय उतना ही तीव्र। स्वयं तुलसीदास ने भी तो रामायण में लिखा है कि बिन भय प्रीत नाहि जग माही। डरे चाहे कितने भी ..कितना ही इस बृहद् आकाश के नीचे फैले धवल इसके रूप में देवत्व को ढूंढे, परन्तु सतत् अपनी नियति, अपने पर्यावरण से जूझने वाले, कभी हार न मानने वाले माटी के इस पुतले मानव ने इसकी अजेय शिखरों पर चढ़कर अपनी विजय के झंडे भी तो खूब ही गाड़े हैं और सब कुछ देखता, सहता हिमालय, अपनी सारी गरिमा के साथ सदियों से अटूट, अडिग और अविचलित आज भी वैसे ही खड़ा है जैसे कि सदियों पहले खड़ा था ... अपनी उसी उन्नत ग्रीवा और उच्च भाल के साथ, भारत का सजग प्रहरी बना... विशाल और समर्थ कन्धों पर देश की सुरक्षा का भार उठाए। कभी आंधी-तूफानों से देश की छतरी बनकर तो कभी दुश्मनों की गोली-बारूदों के आगे ढाल बनकर...आश्रयदात्री कन्दराएं बनकर।...
वास्तव में कई अर्थों में हिमालय आज भी भारत का गौरव मुकुट...दृढ़ता और संकल्प का ...भारतीय अस्मिता का प्रतीक है; चाहे हम कैलाश पर्वत पर आसित शिव और पार्वती का स्मरण कर रहे हों, या फिर अपने सामंतशाही पड़ौसी देशों का, या फिर मात्र इसके हिमाच्छादित नैसर्गिक सौंदर्य का । आस्था के संदर्भ में तो आदिकाल से ही धर्मग्रन्थों की तरह ही प्रेरक और पुनः पुनः दर्शनीय रहा है यह हमारे लिए। इसकी चार धाम की यात्रा तो आज भी उतनी ही आस्था के साथ की जाती हैं जितनी कि पहले कभी पाणडवों ने या हमारे अन्य पूर्वजों ने की होगी, तब...जब सड़कें और यातायत के साधन नहीं थे, मौसम के प्रकोपों से बचने के लिए, ठहरने और विश्राम आदि के लिए सुलभ सुविधाएं नहीं थीं।
आज स्विटजरलैंड की परिकल्पना पर निर्मित औली जैसे नए पर्यटन स्थल इसे नये रूप में विकसित कर रहे हैं और नित नए आधुनिक स्वरूप तो दे ही रहे हैं, देशी-विदेशी पर्यटकों को भी, और भी अधिक मात्रा में अपनी ओर खींच रहे हैं। जो कि भारत और स्थानीय बेहद संघर्षमय जीवन बिताने वाली आबादी के आर्थिक फायदे...विकास के हित में है। सिर्फ चढ़ाई और अन्वेषण के लिए ही नहीं, अब हिमालय स्कीयिंग और गंगा नदी राफ्टिंग का भी केन्द्र बनती जा रही है। अच्छा लगा देखकर कि अब जोशीमठ बद्रीनाथ जाने के लिए ही नहीं, औली जाने के लिए भी मापचित्र पर जगह ले चुका है।
रहस्य व ज्ञान का भण्डार यही तो वह गिरिराज है जहां से एक तरफ तो तारने और उद्धारने को गंगा अवतरित हुई और दूसरी तरफ आनन्द और मोक्षदात्री जमुन जल प्रवाहित हुआ। बर्फ और धुंध से भरी इसकी कन्दराएं हजारों वर्षों से जाने कितने रहस्य , आसपास फैली वनस्थली कितनी जड़ी बूटियों का खजाना लिए बैठी हैं यह बातें हम आज भी इसकी फूलों भरी वादियों में घूमते,तुरंत ही ज्ञात हो जाती हैं। हाल ही में ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन और नरेन्द्रनगर के बेहद ही मोहक नैसर्गिक वातावरण में बने गढ़वाल नरेश के आनन्दा में रहने का सुअवसर मिला। दोनों ही जगह एक बात जिसने सर्वाधिक प्रभावित किया, वह थी कि कैसे अपनी-अपनी तरह से ये दोनों ही संस्थाएँ भारतीय संस्कृति के बहुमूल्य अंशों को सहेजने में प्रयासरत हैं। योग और साधना ही नहीं, स्वास्थ्य और सर्वांगणीय विकास की ओर भी पूर्णतः केन्द्रित हैं।
भारत की आध्यात्मिकता व गूढ़ता, विदेशियों की आंखों में सदा से ही एक चुम्बकीय शक्ति रही है और हिमालय से बड़ा मठ और पीठों का संग्रह तो शायद ही भारत में कहीं और मिले( आज जो तिब्बत और नेपाल में पहुंचकर हमसे खो चुकी है, वास्तव में वे बौद्ध, पाली और संस्कृत में लिखी पाण्डुलीपियां कितनी बहुमूल्य हैं...हमारी अगली पीढ़ियों के लिए उनका क्या महत्व है, इसे हम चाहकर भी नहीं नकार सकते) । डी.एन.ए. की तरह यही पाण्डुलीपियां ही तो हैं जिन्होंने पूर्वजों के ज्ञान और संस्कृति के अंश व सत्त हमारे लिए सहेज रखे हुए हैं। संतोष की बात है, देर से ही सही, इनकी सुरक्षा व संरक्षण के प्रति न सिर्फ संस्थान और शिक्षाविद् अपितु सरकार का भी ध्यान गया है और कुछ ठोस योजनाओं के साथ-साथ, ठोस कदम भी उठाए जा रहे हैं।
जीवन की मामूली से मामूली जरूरतों को भी अथक कठिनाइयों के बाद ही जुटा पाने में समर्थ पहाडी जनजीवन को पाले यह हिमालय आज अमीरों की क्रीडास्थली तो है ही, युगों से जत्थे-के जत्थे ऋषि-मुनी, वैज्ञानिक, अन्वेषक और सैलानी भी हिमालय के विविध रहस्यों को जानने और समझने के लिए इसकी दुर्गम राहों और कन्दराओं में भटकते रहे है। ... ध्यानस्थ रहते हैं परन्तु जिज्ञासा व पिपासा है कि और-और बढ़ती ही जाती है। यह बात दूसरी है कि आज बदलते परिवेश... बदलते युग के साथ-साथ, नई-नई तकनीकी जानकारी व उन्हें अपनाने और सीखने की जरूरत...अब यह भार मात्र गांव के वैद्यों और ओझाओं के कंधे नहीं संभल सकता। इस मृतप्राय विद्या को अब फिर नए युग की नई जरूरतों के साथ पुनर्जीवित करने की जरूरत है। देश की तरह ही, इसकी सुरक्षा, इसकी सीमाओं में भी सजगता और जागरूकता की जरूरत है। कई अर्थों में गरीब और अविकसित यह क्षेत्र अब मात्र भगवान भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। हमारी सांस्कृतिक धरोहरें, प्राचीन धर्म और आयुर्वैद ही नहीं, समाजशास्त्र व साहित्य से भी संबंधित पाणडुलीपियां भी, जो इसके कण-कण में बिखरी पड़ी हैं( कहते हैं कि इन्डस सभ्यता का विकास यहीं हिमालय की तराइयों में ही हुआ था और जिसे हम इन्डस कहते हैं वो वाकई में इसकी गोदी में अठखेलियां लेती सरस्वती नदी ही है.) और जिन्हें कई जगह तो हजारों क्या लाखों की संख्या में आक्रमणकारी विदेशियों ने जलाया व नष्ट-भ्रष्ट भी कर दिया है उन्हें ढूंढ-ढूंढकर सहेजने व समेटने की जरूरत है। उनका केन्द्रीकरण कर उन्हें राष्ट्रीय धरोहर की तरह संभालने की जरूरत है। ताकी आने वाली कई-कई पीढ़ियां उसके महत्व, उसके गौरव की साक्षी हो सकें, उसका आनन्द व फायदा ले सकें। मात्र किसी नैसर्गिक या मानवीय दुर्धटना में वे यूं नष्ट न होती चली जाएँ।
हिमालय भारत वासियों के लिए बृहद पर्वत श्रंखला ही नहीं...साक्षात शिव खुद...समस्त देवी-देवताओं का वास है....किसी दिशा किसी कोने से हम इसका अन्वेषण करें नित नए रूप और गूढ़ रहस्य सामने आएँगे। लेखनी का यह अंक इसी हिमालय के ' इर्दगिर्द' है। इसे जानने और समझने का एक छोटा-सा प्रयास है; मुख्यतः उन पाठकों के लिए जो भारत से, हिमालय से, सम्मोहित हैं या फिर इसे थोड़े और नजदीक से ...आज के नज़रिए से जानना चाहते हैं। ...
जो शाश्वत प्रकृति है उसमें पहाड़ है उनकी चट्टानों, पत्थरों में बार-बार उगते पेड़ और वनस्पतियाँ हैं।
वहाँ मैं जा रहा हूँ
वहाँ ऐसा एकांत हिमांचल है कि कोई पहले गया न हो वे मनुष्य की राह देख रहे हैं।
वे पर्वत, श्रेणियों में उसी तरह स्थिर हैं जैसे चित्र खिंचवाने के लिए एक समूह होता है बाहर उनके बीच एक मेरी जगह है वहाँ मैं स्थिर हो जाऊँगा क्या?
मैं स्थिर नहीं होऊँगा घूमूँगा, दौडूँगा, हँसूगाँ , चिल्लाऊँगा, रोऊँगा ....
इस एकांत में पहाड़ों को यह याद न आए कि एक समय था जब पृथ्वी में मनुष्य नहीं थे।
शायद उन्हें वह समय याद आ रहा हो जब पृथ्वी में मनुष्य नहीं थे।
-विनोद कुमार शुक्ल
पहाड़ पर दाड़िम
ओ ! रेसमू ओ ! लगनू ओ ! कांचणू समय आ गया है दाड़िम की कली की तरह कब खिलेगी इन पहाड़ी चट्टानों के बीच
अब बसंत दस्तक दे चुका है आंखों के नीचे काली रेखाओं के इतिहास में डूबने का यह समय नहीं टहनियों को लाल कलियों से हो जाने दो सराबोर शताब्दियों की दमित हंसी को अब मत रोका दाड़िम-सी दांतों की चमक फैल जाने दो पहाड़ पर शब्दों-सी लालिमा को फैल जाने दो आंखों के कोनों तक
खोल दो कलियों के मुंह हवा में तैर जाने दो पराग को फैल जाने दो पांचों द्वीपों में वहां अवरुद्ध पड़े कलियों के किवाड़ों को खुल जाने दो
कविता को न छू सकने का दर्द लिए वर्षों भीतर दबी रही जो आग, चट्टानों भरे इस नाले में लपटों में है आज इस नृशंस भू-भाग में गुम होती कलियों की कथाओं को मत दोहराने देना पीढ़ी-दर-पीढ़ी याद रखना प्रकृति से हुआ तुम्हारा मातृत्व का अनुबंध
कठोर चट्टानों को कसे दाड़िम की जड़ों अपने ऊपर भरोसा रखना खिली कलियां संजोये होगीं अभिशाप मुक्त जीवन के बीज इस पहाड़ पर
समय चट्टानों पर ज्वार-सा दे रहा है दस्तक कि सागर-सा पी जाओ पिघलते सूरज को शताब्दियों बाद आई इस निरभ्र प्रभात में
भविश्य की आंखों में आंखें डाल कर देखो ओ ! राजेश्वरी ओ ! लग्नेश्वरी ओ ! कंचन
तेजराम शर्मा
पहाड़
जैसे दिखते हैं सिर्फ वेसे नही होते। पहाड़ दो खड़े ड़ांड़ों बीच में गहरी घाटी नदी,जंगल घास-पात ही नही। पहाड़ बाहर से जितने शान्त जितने गंभीर दिखते हैं सिर्फ वेसे ही नही होते । पहाड़ रात की चॉंदनी में दोपहर की गर्मी में दौड़ते-भागते जानवरों तथा पक्षियों के कलरव में कितना आत्मीय कितना रमणीक लगते हैं समझ सकते हैं पहाड़ों पर रहने वाले लोग। पहाड़ जब ओढ़तेा है बर्फ की चादर तब किसी तपस्यारत ऋर्षि की भॉंति लगता है। सूरज की पहली किरण में किसी नयी-नवेली दुल्हन की तरह दमकते हैं ये पहाड़। अगर देखना-समझना है यदि उन्हें जानना है पर्यटक के रूप में नही जाना जा सकता इन्हें समझने के लिए यहां बसना होगा रहना होगा पहाड़ों के पास।।
-दिनेश ध्यानी
पहाड़ से मजबूत
पहाड़ों पर पहाड़ से भारी उलझी परतों को सहेजते-सहेजते पहाड़ बन गई है पहाड़ की बेटी। बाहर से दिखने में कोमल ममता की मूरत और अन्दर से चट्टान से भी मजबूत पहाड़ की नारी।
जानती है कि पहाड़ में यदि जीवन चक्र चलाना है तो पहाड़ से भी मजबूत बनना होगा तभी काम चलेगा। जानते हो जब पहाड़ बिगड़ता है तब किसी पर रहम नहीं करता वह सबकुछ तबाह कर देता है कभी भू स्खलन कभी बादल फटना कभी पहाड़ खिसकना और कभी-कभी अतिवृष्टि करना। पहाड़ को यदि उसके हाल पर छोड़ा गया होता तो पहाड़ से अधिक सहयोगी ममदगार, और रक्षक कोई नहीं होता लेकिन क्या करें मानव ने पहाड़ के अस्तित्व को ही समाप्त कर दिया है इसीलिए पहाड़ को भी अपना रौद्ररूप दिखाना पड़ता है पहाड़ की नारी पहाड़ में रहकर पहाड़ से सीख रही है किस तरह से आततायियों को अतिवादियों को और स्वार्थी तत्वों को सबक सिखाया जाता है।।
-दिनेश ध्यानी
पर्वत पूछता है
क्यों आते हो अकेले निरीह भटक रहे यात्री की तरह नित्य यहां
धूप, लू, अंधड़ से सूखी अनवरा भूमि से बटोर बन्द कसी मुठ्ठी में धूल रेत राख लिए...
आते हो और इन्हें यहां छींट जाते हो आंखों की कोटर से टपक रहे बूंद-बूंद सपनों के साथ
चुप कसे अधरों के अस्फुट स्वर बिंधा-बिंधा मौन हूंकती धमनियों की क्षत कराह...
फिर भी बतियाते हो पर्वत की परतों से
जैसे कह रहे हो मेरी इस भेंट को आस मित्र अर्पण को ओ पर्वत स्वीकारो अपना ही पर्त बना इसको भी गृहण करो, रूप दो...
लाया हूं कण-कण में घुटते मनुष्यों की चीत्कारें करे धरे का हिसाब
और उषस गान भी बच्चों के चिड़ियों के सहज गीत स्वप्न-स्वप्न में झरती, प्रभाती की स्वर लहरी ऩई उगे पौधों का ऋचा राग थकती जिह्वाओं के मुखर मंत्र कल की चेष्टाओं के शंखनाद
इन सबको जो भी हो जैसा है स्वीकारो अनादृत नहीं करो
ओ पर्वत हर नव समर्पण की अंजुरी में बंधा है समय चक्र इसको देते रहना पर्वत की दृढ़ता और कालजयी सपनों का सतत वृत्त - सत्येन्द्र श्रीवास्तव
अमल धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है। छोटे-छोटे मोती जैसे उसके शीतल तुहिन कणों को, मानसरोवर के उन स्वर्णिम कमलों पर गिरते देखा है, बादलों को घिरते देखा है।
तुंग हिमालय के कंधों पर छोटी बड़ी कई झीलें हैं, उनके श्यामल नील सलिल में समतल देशों से आ-आकर पावस की ऊमस से आकुल तिक्त-मधुर बिसतंतु खोजते हँसों को तिरते देखा है। बादल को घिरते देखा है।
ऋतु वसंत का सुप्रभात था मंद-मंद था अनिल बह रहा बालारुण की मृदु किरणें थीं अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे एक दूसरे से विरहित हो अलग-अलग रहकर ही जिनको सारी रात बितानी होती, निशा काल से चिर-अभिशापित बेबस उस चकवा-चकई का बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें उस महान सरवर के तीरे शैवालों की हरी दरी पर प्रणय-कलह छिड़ते देखा है। बादल को घिरते देखा है।
दुर्गम बर्फ़ानी घाटी में शत-सहस्त्र फुट ऊँचाई पर अलख नाभि से उठनेवाले निज के ही उन्मादक परिमल - के पीछे धावित हो-होकर तरल तरुण कस्तूरी मृग को अपने पर चिढ़ते देखा है, बादल को घिरते देखा है।
कहाँ गया धनपति कुबेर वह कहाँ गई उसकी वह अलका नहीं ठिकाना कालिदास के व्योम-प्रवाही गंगाजल का, ढूँढ़ा बहुत परंतु लगा क्या मेघदूत का पता कहीं पर, कौन बताए वह छायामय बरस पड़ा होगा न यहीं पर, जाने दो, वह कवि-कल्पित था, मैंने तो भीषण जाड़ों में नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर, महामेघ को झंझानिल से गरज-गरज भिड़ते देखा है, बादल को घिरते देखा है।
शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल मुखरित देवदारू कानन में, शोणित धवल भोज पत्रों से छाई हुई कुटी के भीतर, रंग-बिरंगे और सुगंधित फूलों से कुंतल को साजे, इंद्रनील की माला डाले शंख-सरीखे सुघड़ गलों में, कानों में कुवलय लटकाए, शतदल लाल कमल वेणी में, रजत-रचित मणि खचित कलामय पान पात्र द्राक्षासव पूरित रखे सामने अपने-अपने लोहित चंदन की त्रिपुटी पर, नरम निदाग बाल-कस्तूरी मृगछालों पर पलथी मारे मदिरारुण आँखों वाले उन उन्मद किन्नर-किन्नरियों की मृदुल मनोरम अँगुलियों को वंशी पर फिरते देखा है, बादल को घिरते देखा है।
- नागार्जुन
गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।
इतनी ऊँची इसकी चोटी कि सकल धरती का ताज यही। पर्वत-पहाड़ से भरी धरा पर केवल पर्वतराज यही।।
अंबर में सिर, पाताल चरण मन इसका गंगा का बचपन तन वरण-वरण मुख निरावरण
इसकी छाया में जो भी है, वह मस्तक नहीं झुकाता है। गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।।
अरूणोदय की पहली लाली इसको ही चूम निखर जाती। फिर संध्या की अंतिम लाली इस पर ही झूम बिखर जाती।।
इन शिखरों की माया ऐसी जैसे प्रभात, संध्या वैसी अमरों को फिर चिंता कैसी?
इस धरती का हर लाल खुशी से उदय-अस्त अपनाता है। गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।।
हर संध्या को इसकी छाया सागर-सी लंबी होती है। हर सुबह वही फिर गंगा की चादर-सी लंबी होती है।।
इसकी छाया में रंग गहरा है देश हरा, प्रदेश हरा हर मौसम है, संदेश भरा
इसका पद-तल छूने वाला वेदों की गाथा गाता है। गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।।
जैसा यह अटल, अडिग-अविचल, वैसे ही हैं भारतवासी। है अमर हिमालय धरती पर, तो भारतवासी अविनाशी।।
कोई क्या हमको ललकारे हम कभी न हिंसा से हारे दु:ख देकर हमको क्या मारे
गंगा का जल जो भी पी ले, वह दु:ख में भी मुसकाता है। गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।।
टकराते हैं इससे बादल, तो खुद पानी हो जाते हैं। तूफ़ान चले आते हैं, तो ठोकर खाकर सो जाते हैं।
जब-जब जनता को विपदा दी तब-तब निकले लाखों गाँधी तलवारों-सी टूटी आँधी
इसकी छाया में तूफ़ान, चिरागों से शरमाता है। गिरिराज, हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।
एक ओर नीचे गिरता जल प्रपात दूजी ओर नदियों की धार तीजी ओर...गोल गोल ऊँची सड़कें मानो पहनाती प्रकृति को हार मनमोहक-रमणीय- अलौकिक यह संसार जिसमें डूबता अचंभित मन देख अवर्णनीय चमत्कार।
(2)
कितना समेटूं प्रकृति तुम्हें बन्द आँखों में कितना भाव विभोर होऊँ तुम्हारी चमत्कारिक मुद्रा में कहीं मोतियों की लड़ी तुम कहीं मखमली घास की हरी साड़ी तुम हर मुद्रा दूजे को पिछाड़ती अति अलौकिक...मोहक तुम।
गंगोत्री
(1)
तुंग शिखर से बहता ममता का स्त्रोत फैले शांत देवदार से झांकता पिता का स्नेह पर्वत-पेड़-फूल मानो बरसा रहे हों नेह सारी प्रकृति खुद में समेटे तुम हो अखंड, नहीं रह जाता कुछ शेष लाऊँ कहां से दिव्य चक्षु देखने तुम्हारा मनमोहिनी वेश एक अद्भुत अवर्णनीय सृष्टि रचयिता सी तुम
गंगा
कितना पावन लगता है बैठ अकेले तुम्हें निहारना सूरज की एक-एक किरन का तुम तक आ छिटक जाना चट्टानों-पत्थरों-फूलों के बीच तुम्हारा अविरल बहना मानो कर्म का संदेश मूक देते जाना कितना पावन लगता है बैठ अकेले तुम्हें निहारना तुम्हारी सौम्यता में खुद को निहारना तुम्हारी कल-कल मधुर ध्वनि में तन-मन डूब जाना एकाकार के भावों में तन्मयता का ताना बुनना कितना पावन लगता है बैठ अकेले तुम्हें निहारना वर्षों से सृष्टि का पाप धोकर माता का अर्थ साबित करना सारी गंदगी खुद में समेट निःस्वार्थ भाव प्यार से समझाना जिस स्थल से गुजरो उसे तीर्थ स्थल बना देना कितना पावन लगता है बैठ अकेले तुम्हें निहारना
केदारनाथ
सोचा भी नहीं था कभी आऊँगी इतने पास तुम्हारे नैनों से हिम शिखर रसपान करूँगी तुम्हारे द्वारे तुम्हारे एक एक कण से खुद को रोमांचित करूंगी आह रे नयन अचंभित, मूक बन गए सारे के सारे कौन जाना चाहे जो एक बार आ जाए ... तुमतक सृष्टि न्यारे ।
बद्रीनाथ
चांदी देखी जहां तक भव्य मंदिरों आलीशान महलों, सुसज्जित दुकानों में, किन्तु प्राकृतिक चांदी जो बन... बद्रीनरायण का पहरेदार फैली पर्वतों के आर पार एक ही झलक में मुग्ध कर देती जीवन का सार छिटकती जब सूर्य किरणें उस पार भावविभोर हो मन पहुंच जाता वहाँ जिसे कहते स्वर्ग का द्वार!
पर्वतों की धवल हिम्माच्छादित ऊँची-ऊँची चोटियां और पास में ही हिमखंडों को समेटे बहती, एक बेहद ठंडी पथरीली नदी; मन अभूतपूर्व ताजगी व शांति से भरा हुआ था। आस-पास में फैले प्रकृति के उस अनोखे सौंदर्य और विराटता से पूर्णतः अभिभूत। माना सामने कैलाश पर्वत नहीं, सुमेरु और नर-नारायण थे, शेषनाग थे, बंदर पूंछ थी, परन्तु रहस्य अलौकिकता और मोहकता में कहीं कोई कमी नहीं थी। आँखें हर दृश्य को कैमरे की तरह मन में उतार लेना चाहती थीं। आस्था और उमंग के संगम पर खड़ा मन अनायास ही कालीदास और उनके महाकाव्य मेघदूत को याद कर आया;
(अर्थात्, हे मेघ )-फिर जरा ऊपर उठकर कैलाश का अतिथि होना/चटक उठी थी जिसके शिखरों की सन्धियां/ दसकंधर रावण की बीस बांहो मे कसकर/ दर्पण का काम लेती है देव बालाएं जिससे/ ऐसा वह कैलाश/ कर्पूरगौर करूणापति भगवान शंकर के/दिन दिन पुंजीभूत सित उज्जवल अट्टहास तुल्य/फैल रहा नीले आसमान मे/ कुमुदाभ अमल धवल चोटियों की ऊंचाइयां लेकर ( अनुवादः बाबा नागार्जुन)।
शिव और विष्णु का रूप धरे ये पर्वत अभी भी तो वैसे ही उन्मुक्त अट्टाहास करते खडे थे आंखों के आगे...अपनी वही अलौकिक आनंद की अविस्मरणीय और दिव्य ज्योति लिए। धवल दांतों की सुरम्य वे पंक्तियां कभी मनोहारी लगतीं, तो कभी कंधे के गोश्त में धंसती-सी चली जातीं। दृश्य केदारनाथ का था। केदार पर्वत का वह प्रथम साक्षात्कार ही शायद इस यात्रा का चरमोत्कर्ष बनकर आज भी मानस पटल पर उभरता है। हाथ पैरों को सुन्न करती ठंड मष्तिष्क तक पहुंचती जा रही थी। बर्फीली हवा पर सवार समस्त भारत का पूरा ही पौराणिक इतिहास बन्द आँखों के आगे था ... करीब-करीब समाधिस्थ मन गूढ़ स्मृति कन्दराओं में जा बैठा था , जहां शिव-पार्वती और विष्णु व बृह्ना ही नहीं, गणेश और वेदव्यास, भीम और सारे पांडव सभी थे । अपने सारे ज्ञान, समस्त देवत्व...समस्त पौरुष के साथ...आंख-मिचौली खेलती मानव की कभी हार न मानने वाली अदम्य, अपराजेय इच्छा के साथ....सारे विश्वास, सारे छल कपट के साथ। कहानियां और गाथाएं प्रामाणिक और अप्रामाणिक बिखरी पड़ी थीं चारो तरफ। चाहे वह बद्रीनाथ के आगे सरस्वती उद्गम के पास मृतप्राय द्रौपदी को छोड़कर आगे बढ़ जाने की बात हो, या हेमकुणड के पास फूलों की वादी में बालक का भेष रखकर विष्णु द्वारा शिव से छल किए जाने की और फिर खुद सुरम्य उस पर्वत को लेकर बद्रीनाथ में जा बसने की ही बात हो. ..किसी परी-पुराण से कम रोमांचक और अविश्वसनीय नहीं था सब कुछ...।
बृह्म कमल जो बस रात को ही खिलता है और कस्तूरी मृग विश्वसनीय होकर भी कितने अविश्वसनीय थे...कितने कल्पना को आन्दोलित करने और उकसाने वाले थे । सच और मिथक के मिले-जुले कोहरे ने चेतना को एक अविस्मरणीय धुंध से ढक दिया था और रह-रहकर एक बात बारबार झकझोरे जा रही थी आज हमारे पास जब इतनी यांत्रिक सुविधाएं हैं फिर भी हमें यह हिमालय इतना दुरूह और रहस्यमय क्यों लगता है और इसकी यात्रा व पर्यटन इतने रोमांचक और जोखम भरे? तब की सोचो, जब पूर्वजों के पास सुविधाएं नहीं थीं, सड़कें नहीं थी। कारें नहीं थी। हेलीकौप्टर नहीं थे, तब तो यह यात्रा वाकई में कठिन रही होगी और आस्था व विश्वास की अडिग लाठी के सहारे ही पूरी हो पाती होगी। वन्दनीय है उनका साहस और आश्चर्य चकित करने वाली है वह वैराग और मोक्ष की कामना । या शायद वे भी मात्र पर्यटक ही थे और हिमालय की चुम्बकीय पुकार को अनदेखा और अनसुना नहीं कर पाते थे ? मन खुद ही सवाल पूछता और अगले पल ही जवाब भी ढूंढ लाता।
दो वर्ष पहले दिसंबर में आए थे यहां और इस बार जून में, अर्थात भरी गर्मी और भरी सर्दी दोनों ही ऋतुओं में हिमालय को जी भरकर देखने का सौभाग्य मिला। पिछली बार जोशीमठ में नरसिंह भगवान के मन्दिर में पूजा और फिर औली तक जाना अपने आप में एक अद्भुत अनुभव था। एक आस रह गई थी तब कि पट बन्द होने के कारण बहु चर्चित और प्रसिद्ध बद्रीनाथ के मन्दिर तक जाना नहीं हो पाया। जागेश्वर, बागेश्वर और चितई जैसे कई अद्भुत और यादगार मन्दिर देखे थे तब हमने। चितई का मंदिर , जहां भगवान के दरबार में चिठ्ठी छोड़ी जाती है और मान्यता पूरी होने पर श्रद्धालु बड़े-बड़े पीतल के घंटे चढ़ाते हैं। पूरा मन्दिर घंटों से पटा पड़ा था। मानो सकारात्मक उर्जा का भंडार बन चुका था वह मन्दिर। हाल ही में राजश्री प्रोडक्शन विवाह फिल्म में भी इस मन्दिर और आसपास के मनोहारी इलाके का छायांकन किया गया है।
मंदिर ही नहीं वहां तक पहुंचने वाले रास्ते भी कम रोमांचक नहीं थे। रात के घुप अन्धेरे में झिलमिल भीमताल में पड़ती आसपास की पहाड़ियों की टिमटिमाती रौशनी भुलाए नहीं भूलती। और सूरज की किरणों के साथ जगमग अलकनन्दा के दूध से धुले पानी में जब पहाड़ों और आसपास के वनस्पति की परछांई दिखती, तो मन एक अजब पुलक से भर उठता था। पहाणों से घिरी वादी में बहती नदी का घुमावदार सड़कों के सहारे-सहारे हमारे साथ-साथ चलना, वाकई में आज भी अविस्मरणीय ही तो है सबकुछ। दोनों तरफ खड़ी ऊंची-ऊंची पहाड़ियों के संरक्षण में संयत बहती नदी का मौका मिलते ही, अगले ही मोड़ पर अचानक ही एक दम उछृंखल हो जाना... पानी में चमकते वे गोल-गोल काले पत्थर, जो दूर से ही इतने चिकने और इतने सुन्दर दिखते थे कि मन बच्चों की तरह मचल जाता - एक-एक को उठाकर घर ले चलो, कहने लगता। सैकड़ों स्वयंभू शिवलिंग अवतरित हो गए थे चारो तरफ। किनारे-किनारे लटकी सूखी टहनियां भी तो कहीं हिरण का रूप लिए खड़ी हो जातीं तो कहीं शेर और हंस का और फिर उनके आगे-पीछे दौड़ते बादल बारबार शोर करते, नटखट बच्चों के झुंड की याद दिलाने लग जाते। सामने खड़े पहाण कभी साहसी सैनिकों से तने दिखते, कभी कमर झुके वृद्ध और विदा लेते पूर्वजों की तरह मन को बेहद अकेला और सूना कर जाते। धूप-छांव-सी हजारों स्मृतियां आती-जाती रहती मन में। रास्ते में लोमड़ियां और खरगोश ही नहीं, अल्मोड़ा के पास रात के अन्धेरे मे अचानक ही दौड़कर चीते के छोटे-से बच्चे का उस सूनसान सड़क को पार कर जाना और हमारी जीप का चुपचाप बगल से निकल जाना, आज भी तो याद है हमें अपना वह आधी-आधी रात तक सड़कों पर दौड़ने का दुस्साहस। थोड़े समय में बहुत ज्यादा घूमना और देखना जो बाकी था। वैसे भी रात की नीरवता का नशा मादक होता है। अंधेरे और उजाले के गडमड से छांकती हर चीज पलपल नए रूप और नए रहस्य लेकर आंखों के आगे आती है और सामान्य को भी असाधारण बना डालती है। वह हिमालय के पहाड़ और जंगलों की समय बेसमय की निर्भीक यात्रा... और जगह जगह खड़े वे अद्भुत छोटे-बड़े मन्दिर , दूर से ही दिखती, बिखरी पड़ी तरह तरह की मूर्तियां ...जिनमें से कई तो यूं ही वक्त और मौसम को अपने ऊपर ओढ़े सदियों से इन पहाड़ियों पर आने-जाने वालों का मार्गदर्शन करती खड़ी हैं, वे भांति भांति के पर्यटकों और पर्यटक विभाग द्वारा लिखे शिलालेख...सबकुछ सदा के लिए सज चुका है यादों के एलबम में। अल्मोड़ा में मिला गौरीशंकर रुद्राक्ष... कसौली का सूर्योदय व सूर्यास्त..सभी कुछ ही बेहद रहस्यमय व रोमांचक था। भारत के भूगोल ने हमेशा ही आश्चर्यचकित किया है। कभी नौर्वे में खड़े होकर खिलनमर्ग और सोनमर्ग की याद आई है, तो कभी औली में घुटने तक बरफ में डूबकर स्विटजरलैंड के टिटलिस की। तो कभी रूस के पीटर्सबर्ग की पैलेस ने राजस्थान के महलों और राजे-महाराजों की शान-शौकत और रूप-सज्जा की याद दिलाई है। मन की शायद यह कण-कण में भारत को खोजते रहने की बेचैनी ही है जो स्वीडेन और आयरलैंड तक में भारत की...भारतीय संस्कृति की...राम और कृष्ण की याद दिला चुकी है। शायद वे थोड़े से ही लोग थे दुनिया में तब, इतनी आबादी नहीं थी और पर्यटक अपने साथ-साथ यादें और कहानियां लेकर इधर-उधर जा बसे। समय और पर्यावरण के साथ धीरे-धीरे लोगों की शकल-सूरत, भाषा-भूषा सबमें ही परिवर्तन होता चला गया होगा।
विस्तृत हिमालय-पर्यटन का यह दूसरा मौका था । हम दोनों और मित्र दम्पति चार लोगों का काफिला चला था लंदन से। इंगलैंड में ब्रिज खेलते हुए जिस यात्रा की रूपरेखा अनौपचारिक बातचीत के दौरान रची गई थी, अब साकार रूप ले आखों के आगे घट रही थी। हरिद्वार, ऋषिकेश और मसूरी होते हुए हम एक सुन्दर और सुरम्य घाटी में आ पहुंचे थे। यात्रा की असली शुरुआत हरिद्वार नहीं बरकोट को ही कहना शायद ज्यादा सही होगा। यूँ तो रास्ते में पड़े छोटे-से और सुन्दर गांव मनेरी को भी भूलपाना असंभव ही है। गंगा किनारे सारी सुख-सुविधाओं से लैस शिविर में हमें रात गुजारनी थी। गंगा अभी सौम्य और शांत नहीं हो पाई है यहां पर... वही पहाड़ी किशोरी की सारी उन्मुक्तता लिए इसका कलकल निनाद किसी सुमधुर संगीत से कम नहीं था। अगले दिन सुबह ही सूरज के उगने से पहले ही यमुनोत्री के लिए रवाना होना था हमें। रास्ता जोखिम भरा हो सकता था इसलिए सभी की सलाह थी कि अन्धेरे से पहले ही लौट आना उचित होगा। सुबह के छह बजे ही मंदिर के घंटों और आरतियों के पावन स्वरों के बाद, स्थानीय पण्डित जी से टीका लगवाकर और भगवान का प्रसाद और आशीर्वाद व उनकी शुभकामनाएं लेकर हमने अपनी चारधाम की यात्रा की शुरुवात की। इस तरह की यात्रा का पहला मौका था इसलिए मन में जोश तो था ही पर साथ-साथ आशंका और उद्वेलन भी। छोटा भाई और भाभी, जो उन्ही दिनों कैलाश पर्वत और मानसरोवर की यात्रा पर गए थे, उनके एक सहयात्री की कैलाश पर्वत की परिक्रमा करते समय अचानक गिरकर देह त्यागने की खबर ने मन को बेहद उद्विग्न कर ऱखा था। कहीं इस तरह के खतरों से खेलना दुस्साहस ही तो नहीं?
जैसे-जैसे हम पहाड़ पर ऊपर चढ़ते जा रहे थे, मन में प्रकृति की हरियाली और रूप का एक अजब उल्लास भरता जा रहा था। दूर पहाड़ी पर बना बौद्ध-बिहार मन को बेहद शांत करता लगा। हर मोड़ पर जहां खतरे की संभावना होती एक देवालय दिखाई दे जाता। किसी में शिव के प्रतीक स्वरूप डमरू, किसी में त्रिशूल तो कहीं मात्र एक लाल कपड़ा ही रखा दिख जाता, जो मानव की अपराजेय आस्था और विश्वास की कहानी कहते जान पड़ते।
कितनी सौंदर्य-पुजारी और कितनी भक्त हूँ, नहीं जानती, परन्तु दोनों भाव साथ-साथ चल रहे थे मन में। शिव की अद्भुत भक्ति के साथ एक बात और जो उभर कर आई थी, वह थी हमारे धर्म शास्त्रों और सोच में पांच की संख्या की अपार महिमा। पांच महासागर और पांच महाद्वीप तो हैं ही, पंच परमेश्वर का भी पंचाभिषेक ही होता है। यह अधम शरीर भी पंच तत्वों का ही बना है। मन जाने इस संख्या से जुड़े कितने संदर्भों को ढूंढ लाया था तुरंत ही। देवों की इस पावन भूमि में भी हर चीज पांच की संख्या में ही विभाजित मिली। पता नहीं यह एक महज इत्तफाक था या वाकई में कोई गूढ़ रहस्य...पंच प्रयाग, पंच केदार और पंच बद्री। प्रस्तुत है इन पंच रूपों का संक्षिप्त विवरण;
पचं प्रयागः जिस प्रकार प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती के दर्शन होते हैं, उसी प्रकार यहाँ पंच प्रयाग के अलग- अलग दर्शन किए जाते हैं। ये पंच प्रयाग मुख्य नदियों के संगमों पर स्थित हैं। देव प्रयागः हरिद्वार से 93 कि. मी. की दूरी पर भागिरथी तथा अलकनंदा के संगम पर स्थित है। शिव मन्दिर और रघुनाथ मन्दिर यहाँ के मुख्य आकर्षण है। यहीं से ही भागीरथी नदी गंगा के नाम से जानी जाती है। संगम पर गंगा की घारा के मध्य टीला डोण्डेश्वर का मंदिर प्रसिद्ध है। रूद्र प्रयागः देव प्रयाग से 71 कि. मी. अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदियों के संगम पर स्थित है। यहाँ नारद जी ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या की थी। यहाँ के चामुण्डा देवी व रूद्रनाथ के मन्दिर दर्शनीय है। कर्ण प्रयागः रूद्र प्रयाग से 31 कि. मी. की दूरी पर कर्ण प्रयाग है। यहाँ पर अलकनंदा तथा पिण्डर नदी का संगंम है। कहा जाता है कि कर्ण ने यहाँ पर कठोर तपस्या की थी। यहाँ उमा और कर्ण का मन्दिर दर्शनीय है। नन्द प्रयागः कर्ण प्रयाग से 21 कि. मी. की दूरी पर नन्द प्रयाग है। यहाँ पर अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदियों का संगंम है। भगवान विष्णु को पुत्र के रूप में प्राप्त करने के लिए नन्द वंश के राजा ने यहाँ पर तपस्या की थी। यहाँ गोपाल जी का मन्दिर दर्शनीय है। विष्णु प्रयागः गंगा जी की सहायक नदी अलकनंदा नाम से प्रसिद्ध है। अलकनंदा एवं धौली गंगा के संगम को ही विष्णु प्रयाग कहते हैं। यहाँ भगवान विष्णु की प्रतिमा और विष्णुकुण्ड दर्शनीय है।
पंच केदार श्री केदारनाथः यह सोन प्रयाग से 19 कि.मी. की दुरी पर स्थित है। श्री तुंगनाथः गोपेश्वर से 19 कि. मी. की दूरी पर तुगंनाथ का मन्दिर है। इसके निकट आकाश गंगा नामक श्रोत है। तुंगनाथ शिखर तीन जलधाराओं का उद्गम स्थल है। मद महेश्वरः माला चट्टी से 25 कि. मी. की दूरी पर मद महेश्वर महादेव का मन्दिर है। चौखम्भा की तलहटी पर 3289 मी. की ऊंचाई पर स्थित यह एक अद्वितीय मन्दिर है। यहां के जल की कुछ बूदें ही मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रयाप्त मानी जाती है। कल्पेश्वरः हेलंग से 9 कि. मी. की दूरी पर कल्पेश्वर महादेव का मन्दिर है। यह ऋषि-मुनियों की तपोभूमि है। ऋषि अधर्य ने यहां पर कठिन तपस्या करके सुप्रसिद्ध अप्सरा उर्वशी का सृजन किया था। रूद्रनाथः मण्डल चट्टी से 24 कि.मी. की ऊंचाई पर भगवान रूद्रनाथ का मन्दिर है। अपने पूर्वजों के क्रिया-कर्म, तर्पण आदी तथा उनके प्रति श्रद्धा अर्पित करने के लिए धर्मावलंबी यहां आते हैं।
पंच बद्री केदारखण्ड स्थित श्री बद्रीनाथ के सनातन धर्म के सर्वश्रेष्ठ आराघ्य देव श्री बद्रीनाथ के पांच स्वरूपों की पूजा अर्चना होती है। नारायण के पाचों रूपों की पांच बद्रियाँ निम्न प्रकार से है। विशाल बद्री के नाम से बद्रीनाथ, पंच बद्रियों में से एक है। बद्रीनाथ का श्रद्धेय मंदिर पौराणिक गाथाऔं, कथनों और घटनाऔं का अभिन्न अंग है। इसकी पवित्रता धर्मशास्त्रों में स्पष्ट शब्दों में अंकित है। स्वर्ग, धरती और पाताल में तीर्थ स्थल है लेकिन बद्रीनाथ जैसा न कोई है न होगा। कहा जाता है कि जब गंगा देवी मानव जाति के दुःखों को हरने के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई तो पृथ्वी उनका प्रबल वेग सहन न कर सकी। अतः गंगा की धारा बारह जल मार्गों में विभक्त हुई। उसमें से एक है अलकनंदा का उद्गम। यही स्थल भगवान विष्णु के निवास स्थान के गौरव से शोभित होकर बद्रीनाथ कहलाया। आदिगुरू शंकाराचार्य की व्यवस्था के अनुसार बद्रीनाथ मन्दिर का मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य से होता है। अप्रैल-मई से अक्टूवर-नवम्बर तक मंदिर दर्शनों के लिये खुला रहता है। बद्रीनाथ ऋषिकेश से 300 कि.मी., कोटद्वार से 327 कि.मी. तथा हरिद्वार, देहरादून, कुमाँऊ और गढ़वाल के सभी पर्यटन स्थलों के सुविघाजनक मार्गों से जुड़ा है। चरण पादुका, तप्तकुण्ड, ब्रह्मकपाल, नीलकुण्ड और शेषनाथ यहां पर अन्य दर्शनीय स्थल हैं।
विशाल बद्रीः (श्री बद्रीनाथ में) श्री बद्रीनाथ की देव स्तुति का पुराणों में विशेष वर्णन किया जाता है। ब्रह्मा, धर्मराज तथा त्रिमूर्ति के दोनों पुत्रों नर तथा नारायण ने बद्री नामक वन में तपस्या की, जिससे इन्द्र का घमण्ड चकनाचूर हो गया। बाद में यहीं कृष्ण तथा अर्जुन के रूप में अवतरित हुए तत्पश्चात एक नारद शिला के नीचे मूर्ति के रूप में बद्रीनारायण मिले। जिन्हें बद्री विशाल के नाम से जाना जाता है। श्री योगध्यान बद्रीः (पाण्डुकेश्वर में) जोशीमठ तथा पीपलकोटी पर ध्यान बद्री का मन्दिर स्थित है। कौरवों से विजय प्राप्त कर, भय के कारण पांडव हिमालय की तरफ आये और यहां उन्होंने राजा परीक्षित को अपनी राजधानी हस्तिनापुर सौंप दी तथा स्वर्गरोहण से पूर्व यंहा घोर तपस्या की। भविष्य बद्रीः (सुनाई, जोशीमठ के पास) जोशीमठ से 15 कि.मी. की दूरी पर भविष्य बद्री का मन्दिर स्थित है। आदि ग्रन्थों के अनुसार यही वह स्थान है जहां बद्रीनाथ का मार्ग बन्द हो जाने के पश्चात धर्मावलम्बी यहां पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। वृद्ध बद्रीः (अणिमठ पैनीचट्टी के पास) जोशीमठ से 8 कि.मी. दूर 1380 मी. की ऊंचाई पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि जब मनुष्य ने कलयुग में प्रवेश किया तो भगवान विष्णु इस मन्दिर में चले गये। यह मन्दिर वर्ष भर खुला रहता है। आदि बद्रीः कर्ण प्रयाग-रानी खेत मार्ग पर कर्ण प्रयाग से 18 कि. मी. दूर स्थित है। यहां 16 छोटे मन्दिरों का समूह है। ऐसा विशवास है कि इन मन्दिरों के निर्माण की स्वीकृति गुप्तकाल में आदीशंकराचार्य ने दी थी जो कि हिन्दू आदर्शों के प्रचार-प्रसार को देश के कोने-कोने में फैलाने के लिए संकल्पित थे।
धर्मस्थानों के प्रत्यक्ष और सांकेतिक महत्वों को गुनते-बुनते और बाहर फैली प्रकृति को आखों से जी भरकर सराहते, कैसे रास्ता निकल गया, पता ही नहीं चल पाया।
हनुमान और जानकी चट्टी पार करते ही हमें कार छोड़ देनी थी और आगे की यात्रा डोली या चार कंधों के सहारे थी।...'चार कंधे' अजीब-सा अहसास था। जाने कैसे-कैसे संदर्भ आ जुड़े, सबको परे थकेलते चुपचाप खुद को भगवान को समर्पित कर डाला और उस कुर्सीनुमा डोली में जा बैठे। सामने बर्फीले पहाड़ थे पर धूप और गरमी इतनी कड़क कि पसीने चू रहे थे। हर पांच मिनट पर ठेडे पानी की बोतल से खुद को तर करते हम चल पड़े उस दुर्गम रास्ते पर। रास्ता वाकई में बेहद कठिन था। क्या कभी यहां कोई दुर्घटना हुई है...मान लो मोड़ पर फिसल ही जाएं। डोली हाथ से छूट जाए...या इसकी लकड़ी पुरानी और कमजोर हो,...तब...? भय के तरह-तरह के राक्षसों ने डराना चाहा तो आंखें बन्द कर लीं। जहां चढ़ाई ज्यादा कठिन लगती, अपने आप चलने... उतरने की जिद करने लग जाती। चारो कुली कहूँ या सहयात्री, वे युवक हंसमुख और साहसी थे और उनका तो यह रोज का ही काम था। बीच-बीच में जब रास्ता ज्यादा बोझिल हो जाता तो आसपास के जनजीवन, रीति-रिवाजों और इलाके में फैली गरीबी और अशिक्षा आदि के बारे में बातें करते-करते कब हम यमुनोत्री के मंदिर तक जा पहुंचे, पता ही नहीं चला। जहां पहुंचने में इतनी कठिनाइयां महसूस हो रही थीं, वहां पहुंचे तो इतनी भीड़ थी कि मेले का-सा वातावरण था चारो तरफ। श्रद्धालुओं का जोश और उनके द्वारा निष्कृमित गन्दगी...किसी कुण्ड में डुबकी लगाना तो पूर्णतः असंभव ही लगा। यमुना को उसके उद्गम पर ही हमने पूजा के नाम पर इतना दूषित कर दिया है, विश्वास ही नहीं हो पाया। पर, औरों की तरह हमने भी बैठकर पूजा की ही, कौतुक वश ही सही, पानी के उबलते कुंड में चावल भी उबाले और फिर उतरते वक्त काल भैरव के दर्शन किए। मान्यता है कि बिना इनके दर्शन के यात्रा पूरी नहीं होती। हमारा एक धाम पूरा हो चुका था... वापस कैम्प में सामने बैठकर सुरम्य वादियों को निहारते हुए विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि इतना आसान था सब।... हां , सामने पहाड़ी पर दिखती आग की रौशनी जरूर मन बेचैन कर रही थी...पता नहीं वन में ये आग खुद लग जाती हैं या स्वार्थवश लगाई जाती हैं, पर लगती जरूर हैं और जगह-जगह लगी मिली !
अगला पड़ाव गंगोत्री था। जहां यमुना के उद्गम तक जाना दुर्लभ है, गंगा के उद्गम गोमुख तक 16 कि. मी. की पैदल यात्रा करके पहुंचा जा सकता है। परन्तु उसके लिए भी पहले से अनुमति लेनी पड़ती है। निश्चय हुआ कि हम भी बस मन्दिर तक ही जाएंगे। गंगोत्री के मन्दिर तक कार जा सकती थी। रास्ता पथरीला और ऊबड़-खाबड़ जरूर था, पर बेहद ही रम्य और शांत था। बीचबीच में हर-हर गंगे का उच्चारण करते एकाकी साधुजन या उनकी टोलियां दिख जाती थीं। महेन्द्र सिंह थापा द्वारा बनाए गंगा के इस मंदिर के बाहर की गली अब पर्यटकों के लिए एक छोटे-से बाजार का रूप ले चुकी है, जहां तरह-तरह के यात्रा से संबंधित चित्र और उपहार आदि खरीदे जा सकते हैं। हमने भी कुछ दुर्लभ पुष्तकें और चित्र हिमालय के ऊपर खरीदे और फिर उन्हें वहीं कहीं अपनी डायरी और कुछ अन्य वस्तुओं के साथ, रास्ते में ही खो भी दिया। खैर ...मंदिर का प्रांगण श्रद्धालुओं से खचाखच भरा हुआ था। चोर और श्रद्धालु सब साथ-साथ..और हर चीज की परची कट रही थी। प्रसाद तक की। एक आदमी प्रसाद के मीठे चावलों के लिए गिड़गिड़ा रहा था जिसे उसे अपने बेटे को जरूर ही खिलाना था। पर पंडित या बनिया जो भी हो दो दाने भी बिना पैसे के नहीं दे सकता था। इतना भृष्ट और महाजनी समाज हमारा...वह भी ऐसी जगहों पर, मन विस्तृणा से थक चुका था। पैसे के सहारे पूजा, भक्ति, विश्वास सभी कुछ मिल सकता है, वरना कुछ नहीं। चुपचाप वहां से निकल नदी के किनारे आ गई। वातावरण में शांति और पुलक पुनः वापस आ मिले थे।
चंद मिनटों बाद ही लौटते वक्त पुनः ‘ ऐ बीबी भंडारा करवा दे, तेरी अगली-पिछली, सभी पीढ़ियां तर जाएंगी।‘ ‘ मेरी बेटी की शादी करवा दो, बस पच्चीस हजार रुपए की ही तो बात है।‘ ‘ नाश्ता और चाय पानी...। ‘ . ‘ दुपहर का खाना...भण्डारा..। ‘.‘ अभिषेक के आठ हजार।‘ ‘ अब 11 हजार। ‘ यहां पर तर्पण के बाद फिर कहीं और तर्पण की जरूरत ही नहीं।‘ जितने मुंह उतनी ही बातें थीं और उतनी ही मांगें थीं चारो तरफ। परलोक सुधारने के लालच में या भगवान से और अधिक पाने के लालच में लोग अपनी-अपनी सामर्थ अनुसार और-और ले-दे रहे थे। भिखारी, पंडित, कुली सबकी मांगों से जैसे-तैसे निबटता मन और आगे बढ़ते पैर एक-के-बाद एक मुकाम पूरे किए जा रहे थे परन्तु निर्लिप्त और निर्वीकार। ...
अगली सुबह एक बार फिर हम जोशीमठ के लिए चल पड़े थे। आस-पास फैले प्रकृति के सौंदर्य और विराटता से अभिभूत ही नहीं, खो चुका था मन बिना जाने ही कि कौन-सी बात ज्यादा अभिभूत कर रही थी, यह अथक आस्था और पूर्ण समर्पण की पौराणिक कहानियां या मनोहारी प्रकृति!
सामने रहस्यमय केदारनाथ की पहाड़ी थी। यदि यमुना को भक्ति और गंगा को कर्म कहें, तो चन्द मिनटों की उड़ान के बाद हम उस पुरातम मंदिर में पहुंचने वाले थे जिसे मोक्ष का द्वार कहते हैं। कैसा है मन्दिर ...देखने को मन उतावला था। उत्साह इतना कि सुबह तीन बजे उठकर ही एक बाल्टी गरम पानी से नहा लिए। होटलवाले ने बतलाया कि कैसे जाड़ों में तो उनके आंगन तक में बर्फ का ढेर लग जाता है। वहीं जैसे तैसे आंच जलाकर पानी गरम करने की व्यवस्था हो पाती है। एक-के-बाद एक कई उन पहाड़ों के ठंडे रोमांचक किस्से...मन ही नहीं भर पा रहा था। सामने अहमदाबाद से एक और श्रद्धालुओं का ग्रूप आया हुआ था। और पूरी रात उन्होंने भजन गा-गाकर ही निकाल दी थी। वैसे भी सोने से फायदा भी क्या...सुबह चार बजे से अभिषेक पूजा शुरू हो जाती है। और दो बजे से परची कटनी। शिव बैल का रूप ले पाणडवों से जा छुपे थे गुप्त काशी में और उसी भागते और जमीन में अंतर्ध्यान होते बैल की पीठ को ही साक्षात् शिव मानकर भक्तगण आजतक केदार धाम में पूजते आए हैं। कान पूरे मनोयोसे पंडित जी की बातें सुन रहे थे और आँखें सामने पर्वत की धवल-उज्जवल चोटियां, उन पर उड़ता श्वेत-नील बादलों का झीना आंचल...( जो उजाले और अंधेरे की उस संधि बेला में और भी रोमांचक लग रहा था) नैसर्गिक उस रूप को बूंद-बूंद पी रही थीं। यही वह जगह थी, जहां कभी पाण्डवों ने बैल के रूप में छुपे शिव को ढूँढ निकाला था और फिर भोले बाबा ने उनकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर सश्रृंगार बद्रीनरायण का रूप ले, उन्हें अपने मंगलकारी दर्शन करने का आदेश दिया था। आधी धरती में समाए इसी बैल के पीठ की प्रतिमा की ही पूजा होती है यहां केदारनाथ के मंदिर में, देखकर ही विश्वास हो पाया था। कहते हैं यह वही बैल है जिसका मुंह पशुपति नाथ के रूप में काठमांडू में जाकर प्रकट हुआ और वहां पर पूजा जाता है। अचानक ही कई रहस्यों की गुत्थियां खुलने लगीं, वरना बीस साल पहले जब पशुपतिनाथ गई थी तो यही सोचकर संतुष्ट थी कि शिव दयालु हैं और उपेक्षित व निर्बलों की सहायता करते हैं, इसीलिए पशुपतिनाथ कहलाते हैं। विस्मित मन श्रद्धालुओं को देख रहा था, उनकी मनःस्थिति जानना चाह रहा था। उनके और अपने विचारों की परख, तुलना और पड़ताल किए जा रहा था। गरम और शीत आस्था और विचारों के परोक्ष-अपरोक्ष सोतों में डुबकी ले रहा था। घी का प्रयोग बहुलता से हो रहा था चारो तरफ। हर दर्शक अपने हाथों से शिव का घी से अभिषेक करना चाहता था। शिव ही नहीं हर मूर्ति को श्रद्धालु घी से लेप रहे थे। धूप, कपूर और घी की महक से वहां इतनी ठंड में भी एक उष्मित धुंए का नशा-सा छा चुका था चारो तरफ। कुल मिलाकर अद्भुत वातावरण था और पाण्डवों द्वारा बनवाया यह पांच हजार साल पुराना मन्दिर जाने क्यों एक उपलब्धि...एक मंजिल पर पहुंचने का अहसास दे रहा था मन को। मंदिर का परिसर पांडवों की प्रतिमाओं से सजा हुआ था। और बीच में एक भव्य नन्दी की प्रतिमा थी। जिसके निकट जाकर लोग कान में उससे अपनी-अपनी फरमाइशें भी कहते दिखे। शिव के बेहद निजी जो हैं नन्दी...शायद शिव तक फरियाद पहुंच ही जाए। इच्छा पूरी ही हो जाए। अंदर के कक्ष में शांति थी एक निर्लिप्त शांति...शायद मूर्ति का रूप साधारण से हटकर और रहस्यमय था इसलिए। पंडितजी के निर्देश पर हाथ यंत्रवत् पूजा कर रहे थे, बिना किसी कामना, बिना किसी लिप्सा के।‘ इस मंदिर में जो मांगों वही मिल जाता है। अब आंखें बन्द करके तुम भी कुछ मांग लो। ‘ पूजा पूर्ण होते ही पण्डित जी ने कहा। ‘ क्या मांगू ...सबकुछ तो दिया है उसने। फिर वह तो सब जानता ही है! ‘ -स्वतः ही पुनः मुंह से निकल जाता है, परन्तु पंडित जी की रहस्यमय मुस्कान और कौतुकमय दृष्टि अगले पल ही अंतस् भेद देती है। तो क्या इन्हें भी इन सब बातों पर विश्वास नहीं या फिर यह सोच रहे हैं, कि ’ ऐसा नास्तिक यहां पर क्यो, जब विश्वास ही नहीं, तो क्यों कर रही है यह इतने मनोयोग से सारे पूजा-पाठ और कर्म-कांड !’ जरूर ही सोचा होगा यही उन्होंने, पर अब कैसे समझाऊं उन्हें कि यह...अंतर्मन के सारे रहस्यों को तो मैं खुद भी नहीं जान पाती। .सुबह-सुबह ...सही कहूं तो रात में ढाई बजे नहाधोकर हम मंदिर की ओर चल पड़े थे। सुबह तीन बजे की पूजा और अभिषेक की टिकट कटी थी हमारी। पर अब पौ फट चुकी थी और उजाले ने अंधेरे की चादर को समेटना शुरू कर दिया था। मन नियति के अनकहे आयोजन पर आश्चर्य चकित था। पूजा कराने वाले पण्डित जी न सिर्फ फरुक्खाबाद ( ससुराल) से थे, अपितु परिवार के एक-एक सदस्य को जानते भी थे। उन्ही और सिर्फ उन्ही का हमें यहां केदारनाथ में मिलना एक सुखद इत्तफाक...पूर्वजों की इच्छा-सा ही लगा। चलते वक्त उन्होंने सूखा हुआ एक बृह्म कमल भी प्रसाद स्वरूप ला कर दिया हमें।
सुबह-सुबह सात बजे ही फाटा के लिए वापसी थी हमारी। इसी बीच आदिगुरु शंकराचार्य की समाधि भी देखनी थी। कहीं कुछ छोड़ने को जिज्ञासु और पिपासु मन तैयार ही नहीं था। अनंत और असीम से मानो पूर्णतः जुड़-सी गई थी। बिना नाश्ता किए, बिना आराम किए अगले पल ही आदिगुरू शंकराचार्य के मंदिर को दर्शन के लिए चल पड़े हम। सुबह सात बजे ही हेलीपैड वापस पहुंचना था और शंकराचार्य का मंदिर भी अवश्य ही देखना था। दौड़ते भागते दर्शन किए। मूर्ति सुन्दर और रहस्यमय थी, पर मन्दिर थोड़ा उपेक्षित और वीरान-सा। सभी श्रद्धालु केदारनाथ के दर्शन को ही ललायित थे। उस भीड़ से तो रास्ता भी बड़ी मुश्किल से ही मिल पा रहा था।
एक बार फिर हम गुप्त काशी में वापस आ गए। यही वह जगह थी जहां पाण्डवों को दर्शन न देने की जिद लिए शिव बनारस से आकर छुप गए थे। और पशुओं के झुंड में बैल का रूप धरे हुए भीम ने इन्हें ढूँढने की अद्भुत और सफल तरकीब भी यहीं पर आजमाई थी। नर और नारायण आमने सामने खड़े दोनों पर्वतों पर पैर रखकर भीम खड़े हो गए थे और कहा था कि शिव रूपी बैल अन्य जानवरों की तरह उनके पैरों के बीच से नहीं गुजरेगा। हुआ भी वही और तब हारकर शिव ने अपने अर्ध-नारीश्वर रूप के दर्शन दिए।..लोक-परलोक के दर्शन कराती वे कहानियां और गाथाएं, प्रामाणिक और अप्रामाणिक बिखरी पड़ी हैं इस क्षेत्र में चारो तरफ। हर दिन एक उत्सव और मेला। हर मील-दो मील पर जहां बस्ती वहां एक पौराणिक मन्दिर। चाहे वह शिव से छल करके, बालक का भेष रखे विष्णु द्वारा मां पार्वती को लुभाकर, इस सुरम्य पर्वत पर बद्री विशाल के आ बसने की बात हो या गुरु साहब की हेमकुणड के पास रम्य फूलों की घाटी में ज्ञान और प्रवचन की।...मन संभव-असंभव हर गाथा पर विश्वास न करते हुए भी, करना चाह रहा था। लग रहा था अपनों के साथ, अपने इतिहास के बीच में आ खड़ी हुई हूँ और एक बार फिर से सब कुछ जी रही हूँ। किस्से कहानियों और गुफा कन्दराओं में ही सही, अपनों से पूर्णतः जुड़ गई थी। ऐसा ही कुछ रामेश्वरम् और कन्याकुमारी में भी लगा था। जब उस पुल से श्री लंका को देखा था या उछाल मारती तीन सागर की लहरों को मिलते हुए देखा था वहां, एक ही जगह पर सूरज की लाल-सुनहरी आभा में मंडित होकर डूबते देखा था। या फिर जब मदुराई और कन्याकुमारी के गान्धी संग्रहालयों को देखा था, जहां उनकी निजी वस्तुओं रखी थीं। खून से रंगा, बदरंग व जारजार कपड़े का वह टुकड़ा... जिससे गोली पार हुई थी कैसी कैसी समृतियां और मनोभाव मन में जगा गया था । काश्...ऐसा न हुआ होता। कोने-कोने लिखे उनके उद्गारों को पढ़ा था। तब भी कुछ ऐसी ही अलौकिक अनुभूति हुई थी, शरीर के परे, काल के परे पहुंच जाने वाली। वही, अनुभूति इस वक्त उस वीरान, सुनसान-सी बर्फ ढकी चोटी पर पहुंच कर भी हो रही थी...कहते हैं आवाजें नहीं मरतीं और कान सनसनाती हवा में गीता के उपदेश और वेदों की ऋचाओं को ढूंढ रहे थे।... ‘यदि पाप नहीं किया है तभी झरने की बूंदें गिरेगीं आपपर, वरना नहीं।‘ शिव-पार्वती का विवाह... उनके विवाह कुँड की प्रज्वलित अग्नि, जिसे जलाने के लिए, लगातार जली रखने के लिए, आज भी जाने कितने जंगल-पर-जंगल कट रहे हैं। घटती ओजोन लेयर और पर्यावरण का इन गाथाओं के आगे कोई महत्व नहीं ...मन कौतुहल और अवसाद दोनों से ही एकसाथ भर-भर आता और आंखें छलकने लग जातीं अपनी असमर्थता पर, चीजों को ठीक से न समझने और मानने वाले अंतर्द्वन्द्व पर....क्या सही है, क्या गलत , कुछ नहीं समझ में आ रहा था। ‘ शिव और पार्वती आज भी सफेद नाग के एक जोड़े के रूप में रहते हैं यहां पर। ध्यान से और पूर्ण श्रद्धा के साथ देखो तो दर्शन भी देते हैं। मंदिर के अंदर टौर्च ले जाना मत भूलना, बेटी।‘ ‘ यहां तर्पण करो तो पूर्वज खुद आकर स्वीकार करते हैं। सीधे विष्णुलोक चले जाते हैं। मोक्ष प्राप्त करते हैं।‘ ‘ ए मूर्ख, गंगाजल को गंदा कहती है। ‘ आवाजें जिन्हें भूलना, आसान नहीं। किसी परी-पुराण से कम रोमांचक और अविश्वसनीय नहीं होते हुए भी, विश्वसनीय-सा भी हो चला था सब कुछ। अभिषेक पर अभिषेक करता मन उन स्वयंभू भविष्य बद्री के बारे में भी सोचने लग जाता था जिन्हें नरसिंह भगवान की पतली कलाई के टूटते ही स्वयं ही प्रकट हो जाना होगा। कमल जो एकबार बस रात को ही खिलता है और कस्तूरी मृग जो अपनी ही सुरभि को ढूंढता फिरता है। विश्वसनीय होकर भी कितने अविश्वसनीय थे वे...कितनी कल्पना को आन्दोलित और उत्तेजित कर रही थीं वे सारी अद्भुत गाथाएँ और मान्यताएँ । सीताजी धरती में यहीं समाई थी। वह सुमेरू पर्वत भी सामने था जिसकी मथनी बनाकर समुद्र-मंथन हुआ था। मानो बचपन से आज तक सुना-पढ़ा सब साकार रूप ले सामने आ खड़ा हुआ था। पुरुष और प्रकृति की एकात्मकता का एक अभूतपूर्व अहसास था कण-कण में। मानव स्वभाव की दुरूहता थी...सहजता थी, मिथ्यापन और छल-कपट की निरर्थकता भी तो थी साथ-साथ। आंखें भीग-भीग आती थीं बारबार। वैराग्य स्वतः ही फुंकारने लगे ऐसा उजाड़ और वीरान भी था वह रूप।
पर बद्रीनाथ की छटा कुछ दूसरी ही थी। चारो तरफ भीड़ ही भीड़...एक हर्ष और उत्साह से भरा।...लगातार कुछ होते रहने का अहसास था चारो तरफ। ढेरों दुकानें थीं, छोटे बड़े होटल और रेस्टोरैन्ट थे अन्य शहरों की तरह ही, जिनमें शोर गुल के बीच गाने बज रहे थे। तरह-तरह के और भारत के हर प्रान्त से व्यंजन उपलब्ध थे। ढलान और छोटा सा पुल पार करते ही सामने बद्री विशाल का चिर-प्रतीक्षित और भव्य मंदिर दिखाई दे रहा था और साथ-साथ थी दिन-रात, लगातार असंख्य श्रद्धालुओं की चलती रहती लम्बी कतार।
.मंदिर की सज्जा में बेहद चटक नीले, गुलाबी रंगों का प्रयोग राजपूत शैली की याद दिला रहा था। शाम की पूजा के पहले अंदर के कक्ष में प्रांगण में बिठा दिया गया था हमें। वहां कुछ श्रद्धालु अपनी-अपनी तरह से पूजा-पाठ कर रहे थे। पास ही रखी सहस्त्रनाम की पुष्तक को मैने भी उठाकर पढ़ना शुरू कर दिया। विष्णु के इतने नाम और इतने अवतार; संदर्भों की बृहद जानकारी थे वे नाम। वैभव-मडित वातावरण था गर्भगृह में एक बार हम फिर रावल जी और उनियाल जी के सानिध्य में उन्ही के साथ सहस्त्र नामों का जाप कर रहे थे... सहस्त्र विष्णु जाप धूप-दिए के धुँए से गमकता और तुलसी की मालाओं के ढेर से दबा –ढका विष्णु का वह रूप...आस्था और जिज्ञासा मानो एक साथ श्रद्धा का रूप लेकर आ बैठी थी मन में। सुबह का अभिषेक और श्रृंगार एक दूसरी ही गरिमा लिए हुए था। बाहर लगी सैकड़ों की लाइन सुबह चार बजे से इन्तजार कर रही थी और चन्द भाग्यशाली हम अन्दर बैठकर भगवान के स्नान और श्रृंगार के साक्षी बने। यह भी भगवान की विशेष कृपा ही है कि उनका पंचाभिषेक देख पाए हम। अन्य सभी संस्थाओं की तरह ही, सारी व्यवस्था में यहां भी नगद-नारायण की महिमा ही सर्वोपरि दिखी, चाहे बद्रीनाथ की बात करें या बाला जी की।
बद्रीनाथ से आगे अगली सुबह हम अपने अगले पड़ाव पर थे। अगला पड़ाव यानी कि त्रिवेणी की तीसरी कड़ी सरस्वती के उद्गम स्थल पर। सामने सैन्य टुकड़ी के बारूदों का धुंआ दूर पहाड़ी पर अभी भी उठता दिख रहा था। बगल में ही गणेश गुफा और बेदव्यास गुफा थी...गुफाएं जिनके पत्थर तक बेलपत्र का आभास दे रहे थे। जहां बैठकर महाभारत लिखी गई थी। ‘ यही वह गुफा है जिसमें बैठकर गणेश जी ने पूरा महाभारत लिखा था और वेदव्यास ने सुनाया था।‘ मन और मस्तिष्क मानो एलिस बने वंडरलैंड में घूम रहे थे। ‘कैसा रहा होगा वह गणेश और वेदव्यास का स्वरूप...क्या कोई ग्रामवासी थे ...विद्वान थे उस जमाने के, ऋषि या शूरवीर थे.. थे भी या... उस काल में कैसा रहा होगा मानव, उसकी जीवन शैली ... क्या वाकई में-यदा यदा हि धर्मस्य हानिर्भवति भारतः...भगवान स्वयं मानव रूप लेकर आते हैं इस धरा पर..?’ कई सवाल एक साथ ही घुमड़ रहे थे मष्तिष्क में और मन बहुत कुछ जान लेना चाहता था, आस्था जुड़ जाना चाहती थी पूर्णतः यथार्थ और किंवदनितियों की सीमा लांघकर!
सामने सरस्वती नदी बह रही थी। थोड़ा आगे चलकर सरस्वती का उद्गम स्थल था और यह पुलिया थी जिसे पार करने को द्रौपदी को मना किया गया था। वह जगह थी जहां मृतप्राय और थककर गिरी द्रौपदी को छोड़कर पांचों पाण्डव आगे बढ़ गए थे। उनके प्रिय अर्जुन, महाबली भीम, नकुल, सहदेव और सत्य व धर्म-धारक युध्धिष्ठिर, सभी। द्रौपदी पर आरोप था कि पांचों की पत्नी होने पर भी उसने मन-ही-मन अर्जुन को क्यों अधिक चाहा।...
‘‘ यही भारत का आखिरी भू-खंड, आखिरी चोटी है, इससे आगे तिब्बत और चीन है। देश की सुरक्षा को तैनात हमारे जवान अभ्यास कर रहे हैं वहां पर।‘ मन जानना तो सब चाहता था पर मानना नहीं। गाइड ने बताया तो वर्तमान में वापस लौट आई...वर्तमान जो अतीत से कम रोचक और थोड़ा तकलीफ देह भी लगा। हमारे शिव का वास कैलाश पर्वत, मानसरोवर, कुछ भी तो अब भारत में नहीं ...कोहिनूर हीरे की तरह इन आस्था के शिखरों के दर्शन के लिए भी विदेश यात्रा ही करनी पड़ेगी अब हमें... कटु य़थार्थ जो बहुत कुछ खो जाने की जानकारी और टीस दे रहा था। लौटते वक्त देव प्रयाग और कर्ण प्रयाग को पार करते और विवादास्पद टिहरी बांध के पुनः चक्कर लगाते हम एकबार फिर सुरम्य श्रीनगर (गढ़वाल) में आ टिके थे। यहीं पर भगवान राम ने सहस्त्र कमलों से शिव का अभिषेक किया था। होटल भव्य और सुन्दर था। ऊबड़-खाबड़ रास्तों से डरें नहीं तो शिव के उस पुराने मन्दिर का मात्र पांच मिनट का ही रास्ता था। मन सामने बहती गंगा के जल को स्पर्श करने को तरस रहा था। हर जगह उस शीतलता को आँखों से ही पीती रही। यही सोचकर कि जल्दी क्या है कहीं भी स्पर्श कर लूंगी पर अब जब लौटने का वक्त आ गया तो इच्छा अदम्य हो चली। सारे खतरों की परवाह न करती अकेली ही निकल पड़ती हूँ। ' ए बीबी, यहीं से डूंग जाओ सर्र से पहुंच जाओगी वहां नदी के पास। सामने ही तो है भगीरथी।' वह पहाड़िन जाने कहां से आकर बगल में खड़ी हो चुकी थी और मेरे असमंजस का आनन्द ले रही थी । पर यूं डूंग जाना इतना आसान तो नहीं...मैं कहूँ , इसके पहले ही वो पुनः हंस पड़ती हैं। ' अब झूठ थोड़े ही बोलूंगी भला मैं ... आप कोई मुझे बुरे लगे हो क्या...जान से प्यारे हो आप तो हमें, जी। आप ही लोगों के इन्तजार में तो पूरा बरस निकाल देवें हैं हम।' एकबार फिर सहारा देने को वह अपना हाथ फैलाती है। पर नीचे ढलान देखते ही मेरी हिम्मत छूट जाती है। नहीं, संभव हुआ तो सड़क के, सही रास्ते से ही जाऊंगी, मैं। कहते हुए पैर स्वतः ही वापस मुड़ जाते हैं। कठिन मार्ग पर साधना और अभ्यास बिना आगे नहीं बढ़ा जाता...याद दिलाता अंतर्मन मुझे बारबार सचेत कर रहा था। फिर गंगा तो सब जगह है। मेरे अपने शहर (बनारस) में भी है।
हम बढ़ चले थे नरेन्द्र नगर, अगले पड़ाव की ओर जहां गढ़वाल नरेश के होटल-कम-पैलेस आनंदा के भव्य परिसर में हमने यात्रा के अंतिम चार दिन बहुत ही आराम और आनंद से मन माफिक बिताए। कोई सुनिश्चित दिनचर्या नहीं..कहीं भागने या जाने की जल्दी नहीं। योग करते, वेदान्त समझते और प्रकृति व स्वास्थवर्धक जड़ी-बूटियों से समिश्रित पेय और खान-पान का भरपूर आनंद लेते हुए। प्रकृति अपनी पूरी छटा के साथ फैली हुई थी चारो ओर। कमरे की बालकनी में बैठो तो कभी मोर आ जाते तो कभी गोरिल्ला। इस पूरी यात्रा में कितनी तरह-तरह की चिड़िया देखीं और कितनी बार अदरक और तुलसी का शीतलता पहुंचाता ठंडा पेय लिया, गिनती नहीं। योग और हिमाचल संस्कृति पर किताबों का अच्छा संग्रह था। इतना सब कुछ था देखने और करने को पर समय के अभाव में बेहद सतही तौर पर ही पढ़ और जान पाए। फिरभी मन बेहद शांत और प्रफुल्लित था...अपने देश की प्राकृतिक और जीवन शैली की विविधता को इतने पास से देखने और अनुभव करने का भरपूर मौका मिला था। चन्द दिनों के अन्दर यायावारी से लेकर राजसी ठाट-बाट- सभी का अनुभव हुआ ।
आधुनिक हर सुख-सुविधा से लैस हमारी यह चारधाम यात्रा कठिन तो थी, पर उतनी कठिन नहीं जितना मन इंगलैंड में बैठकर आशंकित था। बरसों बाद मसाले के नमक के साथ स्वादिष्ट जामुनों का स्वाद लेते और कार में चल रही ए.आर. रहमान. की नवीनतम सी.डी. को सुनते, दिल्ली से बीस दिन पहले जो यात्रा हमने शुरु की थी, उसका ऐसा सुखद और भव्य समापन... याद मात्र से मन पुलक उठता है। ... ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- --
मन्थन
डॉ. पदमचन्द काश्यप
हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक एकता की सबसे मजबूत कड़ी ये देवता ही हैं। इन्होंने घर को गांव से जोड़ा, गांव को दूसरे गांव या परगने से, परगने के देवता ने दूसरी रियासत से, दूसरे जिले से और उन्होंने समूचे पर्वतीय क्षेत्र से ही नहीं, देश के अन्य भागों से भी जोड़ा है।...
हिमाचल के देवताओं को विश्लेषण की सुविधा के लिए हम सात वर्गों में बांट सकते हैः (1) घर अथवा गरिहा (2) घर का देवता अथवा गृह देवता (3) ग्राम देवता (4) खुंद व अन्न देवता (5) क्षेत्र देवता (6) पौराणिक देवी देवता, तथा (7) महादेउ या देऊ नाग।
घौरे गरिहा
घौरे गरिहा वस्तुतः गृहलक्ष्मी का पर्याय-सा दिखता है। यह देवता अमूर्त है, केवल एक भाव मात्र है, अनुभूति है। घर में कोई अनुचित व्यवहार न हो, अनैतिक कार्य न हो, यह निश्चित करने के लिए ही शायद इस दैवी शक्ति की कल्पना की गई हो। यदि कोई अनुचित कार्य या बात घर में की जाए तो तुरंत कहा जाता है “ ऐसा मत कहो, घर की गरिहा कांप जाएगी।“ इस प्रकार की शक्ति स्वयं घर बन जाता है, उसी के कमरे को कोनों और दरवाजों को धूप दीप ‘ धूप पाची ’ दिया जाता है। यह शक्ति केवल परिवार के लिए ही है। उस घऱ में रहने वाले लोगों को ही इस गरिहा की अनुभूति होती है।
गृह देवता
दूसरा गृह देवता है। यह देवता सामान्यतः कोई पूर्वज पितर सा रहता है। या परिवार का कोई ’सती ’ हुई स्त्री होता है। ’सती के बुटड़े’ इसी श्रेणी में आते हैं। उसे कहीं कहीं ’तया’ कहा जाता है, यह मंगल एवं अमंगलकारी दोनों गुणों वाला है और नई फसल आने पर इसकी पूजा की जाती है। इसकी कोई प्रतिमा भी होती है, कहीं नहीं भी होती है। इसी गृह देवता का एक विशुद्ध मंगलकारी स्वरूप भी है, वह घर की रक्षा करता है, कुटुम्ब का त्राणदाता है और बरीन्द के अर्ध्य का अधिकारी है। कहीं-कहीं यह कुल देवता या कुलजा का रूप भी ले लेता है। इसकी मान्यता के पीछे घर की रक्षा, सुख-समृद्धि की प्राप्ति का विशेष उद्देश्य रहता प्रतीत होता है। यह कामना है भी स्वाभाविक, विशेषकर जब हम देखते हैं कि हिमालय में बहुधा घर दूर-दूर, बस्ती से बाहर होते हैं। कहीं धार पर, चोटी पर, कहीं पर्वत के ढलान पर, कहीं तेज बहती नदी के किनारे। जहाँ भी कमाने योग्य थोड़ी बहुत जमीन मिले, वहीं पर डाल दिया जाता है। घर का इन्हसार व्यक्ति की अपनी इच्छा या अपनी छांट पर नहीं होता है, उसका एकमात्र आधार केवल भूमि का सुलभ होना है, जिससे अन्न पैदा किया जा सके, पशुओं के लिए चारा मिल पाए। यदि निकट में कहीं झरना हो, चश्मा हो तो बहुत अच्छा, किन्तुन भी हो, तब भी काम चल जाता है। मील दो मील ऊपर-नीचे से पीने के लिए पानी लाया जा सकता है। इस प्रकार के घर के लिए कोई रक्षक शक्ति नितांत अनिवार्य है। कई बार सारे-सारे दिन यह घर खाली निर्जन रहता है। परिवार के सभी लोग बाहर खेतों में, घासनियों में, जंगल में, काम करने गए होते हैं, घर अरक्षित रहता है। तब यही गृह देवता उसकी रखवाली करता है।
ग्राम देवता
ग्राम देवता सारे गांव का देऊ है, अतः हिमाचल में जितने गांव हैं प्रायः उतने ही देवता हैं। इसलिए उनका पृथक-पृथक उल्लेख असंभव है। यही वह देवता है जिसके इर्द-गिर्द वहाँ का सम्पूर्ण सामाजिक एवं धार्मिक जीवन घूमता दीख पड़ता है। ऐसा लगता है कि इसी देवता की धुरी पर हिमाचली मानव का अस्तित्व है, या यों कहें कि यही देवता है जिसके हाथ की वह कठपुतली है। जब जैसे चाहे नचा ले।
इस देवता का मतलब है हर दूसरे-तीसरे महीने नियमित भोज, नाचना-गाना। इस देऊ का अर्थ है समय-समय पर छोटे-मोटे उत्सव। इनमें कई स्थानों पर नर-नारी सामूहिक रूप से उपस्थित होते हैं। यहां मनोविनोद के अन्य साधन नहीं हैं, अतः ये देव ही मनोविनोद के अवसर प्रदान करते हैं। इतना ही नहीं, यदि मांस खाना हो तो देवता को अर्पित कर खा लो, अच्छा भोजन चाहिए, तो देवता के देउरे में भोज का आयोजन कर लो या उसका कोई पर्व मना लो। जब भी खाने का मन करे, देवता को चढ़ा दो, और ले लो। नाचना-गाना हो, कहीं मिलना-जुलना हो, वर्तमानभविष्य के मुतल्लिक जानना हो, तो देवता को पूछ लो। गर्ज कि यह देवता हर मर्ज की दवा है।
इन ग्राम देवताओं के प्रति लोगों के मन में अद्भुव भाव हैं। यदि एक ओर ये देवता लोगों के सर्वस्व हैं, जिनकी जरूरत कदम-कदम पर, प्रातः उठते ही पड़ती है, तो दूसरी ओर उन्हें कोटेश्वर महादेव और गोली नाग की तरह नदी में भी फेंका जा सकता है। उनका सत ( सद् प्रकृति) क्षीण हो जाने पर तूबी या घड़े में बन्द कर कूड़े-करकट के बीच भी डाला जा सकता है। कहीं-कहीं ऐसे उदाहरण भी मिले हैं जब किसी देवता को दंडित किया गया और जेल में बंद कर दिया गया। कैद से मुक्ति तभी मिली जब उसने भविष्य में सद्व्यवहार, सद्आचरण का आस्वासन दिया। यों भी यदि देवता अर्ज मारुज न माने, या कष्टों के निराकरण के लिए कोई प्रभावशाली कदम न उठाए, तो उसे सजा मिल सकती है और उसका ’ डांट बांध ’ का अधिकार उसी पर प्रयुक्त हो सकता है। एक ओर इतना डर कि ग्राम देवता के प्रति मन में लेशमात्र भी अश्रद्धा का भाव न आने पाए और उसके इशारे पर खेत में जुते बैलों को छोड़कर दो-चार दिन उसे नचाया घुमाया जाता है, तो दूसरी ओर उसके साथ बराबरी का व्यवहार भी किया जाता है। उसे निमित्त बनाकर सामाजिक दायित्व निभाए जाते हैं , पुन (पुण्य) प्राप्त किया जा सकता है। वह नाचने-गाने, मेला-त्योहार में लोगों का साथी होता है। यहां तक कि उसके जिम्मे प्रेमी या प्रेमिका को ढूँढ लाने का काम भी सौंपा जाता है, या उस काम में उसकी सहायता ली जाती है। वह कर न पाए तो निराशा का ठिकाना नहीं रहता, असमर्थता की पराकाष्ठा हो जाती है, उस रमणी की तरह जो “ देउआ-देवी न पूछिया थौकी, थौकी देशा-देशी न भाली। फिरी बी लोभी नी मिलू आपणा, बोह मैं विपता घाली। “ अपने ’लोभी ’ को देश-विदेश में खोज आई और सभी देवी-देऊओँ को पूछ कर हार गई, लेकिन प्रेमी को पा न सकी और फलस्वरूप अत्यंत विपत्ति में फंस गई।
हिमाचल में देवता के चार उपकरण जरूर होने चाहिए, एक रथ या जमाण,दूसरा मुखोट, तीसरा गूर, जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे और चौथा कोठी। कहीं हर रोज पूजा के लिए कोई मन्दिर भले ही न हो, लेकिन कोठी अवश्य चाहिए, जहां जमाण, मुखोट आदि रखे जा सकें। सामान्यतः ग्राम देवता का देऊरा होता ही है, जहां कोई पिंडी या मुखोट मूर्ति का काम देता है। बड़ा देऊरा हो, तो देवता का रथ (जमाण) भी होगा। इस तरह यहदेवता मूर्त है, साकार ही नहीं, बृहदाकार है। इस परिवेश में वह नाचने गाने, मेला त्योहार में लोगों का साथी है। बिना देवता के मेला हो नहीं सकता और बिना रथ के देवता। रथ के बिना न देवता और न नाच! हां. जब देवता रथ पर आरूढ़ होकर मेलास्थल पर न आना चाहे तो उसके मन्दिर में ही नाटी लग सकती है।
खूंद देवता
इस नाच-गाने और अन्य सामाजिक दायित्व को निभाने में परगने या खूंद व अल्ल का देवता भी सहायक होता है। यह देवता आरंभ में शायद ग्राम देवता ही था, लेकिन अपनी परजा (प्रजा) के अन्यत्र आ बसने के कारण उनके साथ हो लिया। जहां-जहां इसकी प्रजा आ बसी, यह देवता उन-उन स्थानों, गावों का देवता भी बन गया। इस पद की प्राप्ति उसे सहज रूप से नहीं हुई। उस गांव में पहले से माने जाने वाले देवता के साथ उसका काफी संघर्ष रहा, और उस संघर्ष में अधिक बल दिखाने के बाद और अपने प्रतिद्वन्द्वी को हर बात में निर्बल, हीन सिद्ध करने के उपरान्त ही उसकी मान्यता बनी। इस तरह के संघर्षों की कथाएं अनेक आख्यानों में हैं, और देवता का गूर आत्म-परिचय देते हुए उनका उल्लेख करता है। इस प्रकार सेये देवता ग्राम देवता से परगना या खूंद देवता बन जाते हैं, क्योंकि आम तौर पर किसी गांव से बाहर जाकर बसने वाले लोग दूर न जाकर आसपास के ही गांव या इलाके में जाते हैं, जिससे अपने भाई-बन्धों से कट न जाएं और सामाजिक मेलजोल भी बना रहे।
क्षेत्रीय देवता
एक और देवता है जिसका प्रभाव-क्षेत्र काफी बड़ा है और अनेक परगनों, पुरानी रियासतों और आधुनिक जिलों तक फैला है। इस प्रकार का देवता सामान्यतः स्वयंभू है। देवता संबंधी लोक गाथाएं इस तरह के देवता से भरी पड़ी हैं। इस श्रेणी के प्रायः सभी देवताओं ने या तो लोगों को स्वप्न से आकर अपने लिए देउरा बनाने को कहा, या गवालों ने आकर गृहस्थों को बताया कि उनकी दुधारु गाएं किसी पिंडी पर दूध देती हैं। वहीं पर उनकी पूजा का प्रबंध किया गया। कुछ एक ऐसे देवता भी हैं जिन्हें दूसरी जगह से बुला कर लाया गया है जिससे वे किसी अन्यायी, क्रूर देवता, राक्स, राजा या राणा से मुक्ति दिला सकें।
महासु इन देवताओं के प्रतिनिधि के तौर पर लिया जा सकता है। किरमत दानू के अत्याचारों से उसकी प्रजा पीड़ित थी। विशेष कर उसकी नरमांस भक्षण की आदत से। लगभग सभी परिवार उसकी इस भूख का शिकार हो चुके थे। एक ब्राह्मण की चार कन्याओं को दानू पहले ही खा चुका था। अब अन्तिम कन्या की बारी थी। तभी उसकी पत्नी को स्वप्न में काश्मीर के किसी देवता ने सुझाया कि वह उसकी कन्या की रक्षा कर सकता है। पव्बर और टोंस नदी के क्षेत्र में रहने वाला यह गरीब ऊणा भाट जेहलम के किनारे रहने वाले स्वप्न में देखे देवता से एकदम अपरिचित था। उसने न कभी उसका नाम सुना न ही उसे देखा था। पता करते-कराते वह हाटकोटी पहुंचा और वहां नाग पंडित से जानकारी प्राप्त की और काश्मीर का मार्ग पूछा। देवता की कृपा से मार्ग में उसके मानों पंख लग गए, पलक झपकते ही वह काश्मीर जा पहुंचा। वहां उसे चेकरिया वजीर मिला। यह वजीर उसे देवता राजा के पास ले गया। देवता राजा सोने की मूर्ति के रूप में था। उसका नाम था महासु। एक सप्ताह के अनंतर महासु अपने दलबल, तीन भाई, चार वजीरों के साथ ऊणा भाट के खेत में प्रकट हो गया। भीषण युद्ध में उसने किरमत दानू और उसकी सेना को परास्त किया। यह साधारण युद्ध नहीं था। इसमें दोनों ओर का काफी नुकसान हुआ। किरमत ने अपनी जान गंवाई। महासु और उसके भाई भी क्षत-विक्षत हो गए। एक की टांग टूट गई, दूसरे का बाजू और तीसरे ने आंखें ही खो दी। अक्षत रहा तो केवल चाल़डू महासु।
यह गाथा महासु की कथा तो बताती ही है इसका प्रतीकात्मक और ऐतिहासिक महत्व भी है। इसकी मान्यता सिरमौर, सोलन, शिमला, मंडी और कुल्लू जिलों में काफी है। कई परिवार तो महासु देवता के मंदिर में जाकर चूड़ाकर्म संस्कार तक करवाते हैं। वैसे यह कार्य पौराणिक देवी-देवताओं, विशेषकर अम्बिका के मन्दिर में किया जाता है।
कोट ईश्वर और खेगसू की खसुम्भा तथा मरेच्छ देवता भी इसी श्रेणी में आते हैं। भेद केवल इतना है, कि इन देवताओंको बुलाया नहीं गया था, वे खुद आए और अपने तेज से लोगों को मजबूर किया कि इनकी पूजा की जाए। कोट ईश्वर और मरेच्छ कुछ-कुछ अमांगलिक स्वरूप लिए भी दीखते हैं। हाटकोटी का रहने वाला कोट ईश्वर एक समय राक्षसी वृत्ति का हो गया था और अपने ही लोगोंपर अत्यार करने लग पड़ा था। उसके जुल्मों से बचने के लिए उसकी प्रजा ने य उपाय निकाला कि देवता को दूर जाकर सतलुज नदी में बहा दिया जाए। उसे तूंबी में बंद कर दिया गया, लेकिन मार्ग में वह बच निकला और भाग कर उसने अन्यत्र प्राण बचाए। किंतु आदत तो आदत ही रहती है। यहां भी उसने लोगों को सताना शुरु किया और नाग बनकर गायों का दूध पीने लग पड़ा। उसने अपने लिए मंदिर की मांग की, जब बन गया तो उसे जगह पसंद नहीं आई। लोगों को दूसरी जगह, कोटी में, नया मंदिर बनाना पड़ा। अब कोट ईश्वर ने आसुरी वृत्तियों को त्याग दिया और एक बार फिर मंगलकारी देवता बन गया और महादेव के तौर पर उसकी मान्यता अनेक गांवों में होने लगी। खेगसू की खसुम्भा कोटेश्वर महादेव की बहन है जो हाइकोटी से उसके साथ आई थी और खेगसू के दायें किनारे खेगसू में स्थापित हो गई थी। इस देवी का प्रभाव कुल्लू औरशिमला जिले में है।
मरेच्छ देवता कोटेश्वर महादेव का बजीर है। उसका पुराना नाम क्या रहा होगा, कहा नहीं जा सकता। मरेच्छ शब्द तो स्पष्टतः म्लेच्छ ही है। इसे तिब्बत से आया हुआ माना जाता है। बेचारा कोई बौद्ध भिक्षु रहा होगा जिसका नाम दिथू था। वह आठवीं-नवी शताब्दी में यहां आया होगा। तब बज्रयान-मन्त्रयान का बोलबाला था। लेकिन बाद में वैष्णवों के जोर पकड़ने पर दिथू के मांसाहार के कारण उसे म्लेच्छ समझा जाने लगा। उस पर यह आरोप भी लगा कि वह नरमांस-भक्षी है। कोट ईश्वर ने इस लांछन पर उसे कैद कर दिया। उसे मुक्ति तब प्राप्त हुई, जब उसने मांस का पूरी तरह त्याग कर विशुद्ध वैष्णव रीति अपनाने का वचन दिया। डूम एक और देवता है जिसका केन्द्रीय स्थान तो फागू का कटियाणा गांव माना जाता है, लेकिन यात्रा कुठाड़, महलोग, बुशैहर, कोटखाई, जुब्बल, बाघल, कोटी आदि पुरानी रियासतों की किया करता है। यह मंगल अमंगल दोनों का कर्ता है। एक लोक गाथा के मुताबिक डूम कांगड़ा नगरकोट से आकर यहां बसा, तो दूसरी गाथा इसे हाटकोटी देवी की कृपा से उत्पन्न खलनिध कनैत का पुत्र मानती है। जो भी हो, यह देवता घी-दूध पसंद करता है और यदि कोई गृहस्थ इसे घी-दूध देने में हील-हुज्जत करे, तो उसकी गाएं-भैंसें सुखा देता है।
कांगड़ा से आकर जुनगा, क्योंथल में निवास स्थापित करने वाला एक और देवता है, जिसे उचित नाम न होने के कारण जुनगा देवता ही कहा जाता है। यह नादौनसे आया माना जाता है। वस्तुतः यह कोई राजकुमार था, जिसने इस इलाके में आकर अपने आपको देवता घोषित करवा दिया। इस तरह के स्वयं घोषित देवताओं का दसवीं-बारहवीं शताब्दियों में इस प्रदेश में बड़ा जोर रहा। इस काल में इन राजकुमारों ने अपने लिए राज्य भी हथिया लिए और लोगों की धार्मिक भावना का अपना प्रभुत्व मजबूत बनाने के लिए इस्तेमाल भी किया और अपने को देवता बना डाला। सिरमौर से आए मुड़ पड़ोई देवता ने कोटी में अपना राज्य भी बनाया और देवत्व भी प्राप्त किया। इसमें राजकुमार की सहायता उसके कुलदेवता नरोलिया ने की थी। नरोलिया और राजकुमार समय बीतने पर एकाकार हो गए और कौन मनुष्य रहा, कौन देवता था अब यह कहना कठिन है, क्योंकि मूर्ति एक ही है।
(आदि शेकराचार्य-केदारनाथ) लेखक की पुष्तक (हिमाचली संस्कृति का इतिहास) से साभार
गंगा राजनीति मुद्दा नही भारतीय अस्मिता का प्रतीक है
अभी हाल ही में दिल्ली में गंगा नदी को बचाने के लिए दो दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में आये हुए बुद्धिजीवियों तथा पर्यावरण प्रेमियों का दर्द यही था कि गंगा को किसी भी सूरत में बचाया जाना चाहिए। विकास के नाम पर गंगा की बलि नही दी जानी चाहिए। भारत सरकार सहित तमाम सामाजिक कार्यकर्ता गंगा नदी की दुर्दशा के प्रति चिंतित दिखाई दे रहे हैं। गंगा को राष्ट्रीय नदी भी घोषित किया गया है। गंगा के नाम पर विचार गोष्ठियां, सेमिनार तथा अनेक सम्मेलन आयोजित किये जा रहे हैं। गंगा सहित तमाम भारतीय नदियों के स्वास्थ्य को लेकर जो हायतौबा मचाया जा रहा है। मध्यप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा है कि लोगों की आस्था का काई विकल्प नही है। चंद मेगावाट बिजली के लिए यदि कोई सरकार गंगा के प्रति लोगों की भावनाओं का आदर नही करती है, तो फिर ठीक नही। दूसरी ओर प्रसिद्ध पर्यावरणविद् प्रोफेसर जी. ड़ी. अग्रवाल का कहना है कि गंगा को बचाने के लिए अब समझौते और आश्वासनों से काम नही चलेगा इसके लिए महात्मा गांधी के नक्शे कदम पर चलना होगा। कई विद्धानों का कहना है कि गंगा के प्रवाह को नही रोका जाना चाहिए तथा गंगा को बचाने के लिए कोई भी कुर्बानी देनी पड़े हम देंगे।
मध्य हिमालय में वर्षों से बढ़ रहे मानवीय हस्तक्षेप तथा विकास के नाम पर अनियंत्रित निर्माण तथा इस क्षेत्र में दिनोंदिन हो रहे कटान तथा विस्फोट से मानवकृत भूस्खलन, भू-कटाव आदि की स्थितियां विकसित हो रही हैं। यह प्रक्रिया विगत कई दशकों से जारी है और यह क्षेत्र आये दिन भू-स्खलन तथा भू-कटाव का शिकार हो रहा है इसका जीता जागता उदाहरण है उत्तरकाशी का बरूणावत पर्वत जो कई गांवों तथा लोगों के जीवन को लील गया है और आज भी खतरा बना हुआ है। इस क्षेत्र में जो भी विकास कार्य हो उसमें पर्यावरण तथा स्थानीय परस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए, लेकिन एशिया का सबसे बड़े टिहरी बांध को बनाते समय क्या इन सभी मानदण्ड़ों का ध्यान रखा गया? क्या इस भूकम्प प्रभावित तथा हलचल ग्रसित क्षेत्र में इस तरह के भीमकाय बांध सुरक्षित हैं? इस पर पर्यावरण तथा गंगा प्रेमियों की नजर क्यों नही पड़ी? वे क्या कारण हैं कि विश्व प्रसिद्ध टिहरी बांध चुपचाप बन गया और आज गंगा के नाम पर इतना हायतौबा मचाया जा रहा है? ऐसे तमाम प्रश्न हैं जो रह-रहकर हमारे जेहन में उठते हंै और गंगा प्रेमियों की सजगता तथा उनकी चिन्ता को और बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है। हमारा निवेदन सिर्फ इतना है कि जो भी नीति बने सर्वजनसुखाय, सर्वजन हिताय बने तथा जो भी समस्या हो उसको समाधान की ओर ले जायें मात्र गाल बजाकर तथा कुछ समय की अति सक्रियता और उसके बाद का सूनापन समस्या को भटकाव की ओर ही ले जाता है।
लेकिन इन महानुभावों से हम कुछ निवेदन करना चाहते हैं कि अचानक उभरे इस गंगा प्रेम में बिलाप करने वाले लोगों को दशकों से धीरे-धीरे तिल-तिलकर मर रही इन नदियों की कराह क्यों नही सुनाई पड़ी? गंगा यमुना में गिराये जा रहे शहरों के मल तथा मवेशियों के कंकाल, रक्त तथा कूड़ाकरकट को रोकने के लिए किसी ने कुछ तो किया होता किसी ने आवाज तो उठाई होती लेकिन आज जब गंगा हो या यमुना या और कोई नदी जब मृतप्राय: हो चुकी हैं तो इन पर्यावरण प्रेमियों तथा गंगा प्रेमियों को इन नदियों की सुध लेने की सूझी और अचानक इनका गंगा प्रेम हिलोरे मारने लगा है। देश की राजधानी दिल्ली में यमुना नदी एक विषैले नाले में तब्दील हो चुकी है और उसकी सफाई के नाम पर अब तक करोड़ों का वारा-न्यारा किया जा चुका है लेकिन यमुना का पानी किसी सीबर की गन्दगी से भी बिषैला हो चुका है। सिर्फ लुभावने नारे लगाकर कब तक भरमाया जा सकता है? जब तक असल मरज तथा समस्या की ओर ईमानदारी से कदम नही उठायेंगे तथा इच्छाशक्ति से कार्य नही करेंगे तब तक गंगा हो या यमुना किसी भी नदी को नही बचाया जा सकता है।
पिछले वर्ष उत्तरकाशी के मणिकर्णिका घाट पर १३ जून, २००८ से प्रसिद्ध पर्यावरणविद् प्रो. जी.डी. अग्रवाल ने आमरण अनशन शुरू किया था, उनका कहना था कि सरकार ने टिहरी बांध बनाकर पहले ही गंगा को टिहरी में बंधक बना दिया हैं वहीं मनेरी-भाली जलविद्युत परियोजना के तहत गंगा को उसकी मुख्य धारा से विरक्त कर १४ किलोमीटर लम्बी सुरंग में ड़ाल दिया गया है। हाल ही में पुन: प्रोफेसर अग्रवाल ने गंगा को बचाने के लिए अनशन शुरू कर दिया है। यह सही है कि गंगा सहित देश की तमाम नदियों की हालात इतनी खराब हो चुकी है कि लगता है कि ये नदियां नही कोई गंदा नाला हैं लेकिन यह सब एक साल या एक दो साल में तो हुआ नही है फिर इस सबके पीछे न तो पर्यावरण जिम्मेदार है और न विदेशी ताकतें फिर इन नदियों की सुध इतने सालों तक क्यों नही ली गई? जहां तक टिहरी बांध का सवाल है टिहरी बांध दशकों में बनकर तैयार हुआ है तब इस बांध से होने वाले नुकसान का आकलन करके विरोध क्यों नही किया गया? पौराणिक काल से ही भारत में नदियों को देवता और उनके जल को भी परम पवित्र तथा जीवनदायक माना जाता था लेकिन आज तो धर्म-कर्म की बात करने वाले को ही देशद्रोही घोषित किया जा सकता है।
टिहरी शहर को डुबोकर तथा स्थानीय हजारों लोगों को उनकी माटी से बेदखल करके बनाये गये टिहरी बांध का विरोध क्यों नही किया गया? क्या इसलिए नही कि इससे फायदा बाहरी लोगों को होगा? क्या इसलिए इसका विरोध नही किया गया कि इस बांध से कुछ लोगों को रोजगार तथा उनके अपनों को ठेका मिल जायेगा तथा कई शहरों में जगमहाट हो जायेगी? अगर पर्यावरण और गंगा की इतनी ही फिकर है तो फिर इतने विशाल बांध को बनता देख हमारे पर्यावरण प्रेमी तथा गंगा के हितैषी चुप क्यों थे? टिहरी बांध कोई आज या अचानक तो नही बन गया है इसे बनने में दशकों लगे हैं फिर आज जब कि टिहरी बांध दिल्ली सहित कई प्रदशों के लोगों का गला तर कर रहा है तथा लोगों के जीवन में जगमग कर कर रहा है तो फिर अब इसका इतना सुस्त विरोध क्यों किया जा रहा है? जब टिहरी बांध बन रहा था तब इसका विरोध क्यों नही किया गया? इतने साल तक गंगा और यमुना को मरता देखने की हमारी क्या मजबूरी थी?
गंगा हो या यमुना या और कोई अन्य नदी सबसे पहले यदि हम वास्तव में इन नदियों को खोया गौरव लौटाना चाहते हैं तो हमें उन सब कारणों के मूल में जाना होगा जिस कारण ये नदियां दूषित हो रही हैं। जब तक हम मूल में नही जायेंगे तब तक यों ही धरना, प्रदर्शन या किसी प्रकार का आन्दोलन या कार्य दूरगामी असर नही दिखा सकता है।
प्रोफेसर अग्रवाल ने जब पिछले साल अनशन किया था तब उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवनचन्द खण्डूरी ने ६०० मेगावाट लोहरी-नागपाला व ४८० मेगावाट की पाला-मनेरी जलविद्युत परियोजनाओं को निरस्त कर दिया। मुख्यमंत्री के इस कदम की सर्वत्र प्रशसा की गई। वर्तमान भाजपा प्रदेश सरकार के मुखिया होने के नाते जनरल खण्डूरी ने तुरन्त कर्यावाही की और जनहित में पहल की लेकिन टिहरी बांध बनाने का निर्णय तो केन्द्र सरकार का था और केन्द्र में तब भाजपा नही कांग्रेस सरकारें रही हैं फिर पहले इस बांध का विरोध क्यों नही किया गया? टिहरी बांध बनाने के लिए इस क्षेत्र की जनता ने जो खोया है उसका किसी को अहसास शायद ही हो।
उत्तराखण्ड लोकमंच के अध्यक्ष तथा जन सरोकारों के प्रति कई दशकों से जूझ रहे श्री उदयराम ढ़ौंड़ियाल का कहना है कि टिहरी बांध हो या अन्य कोई बांध जो भी उत्तराखण्ड में बनता है उसका खामियाजा स्थानीय जनता को पहले उठाना पड़ता है लेकिन फिर भी हम विकास की राह में रोड़ा नही बनना चाहते हैं लेकिन हम भी चाहते हैं कि किसी क्षेत्र या नदी आदि का संतुलन न बिगड़े लेकिन सिर्फ राजनीति के लिए किसी योजना का विरोध करना उचित नही है। श्री ढ़ौंड़ियाल ने कहा कि जो लोग आज गंगा बचाने के लिए परेशान हैं उनको टिहरी बांध बनते समय किन मजबूरियों से चुप रहना पड़ा था? इसका भी जबाव हमें चाहिए। श्री ढ़ौंड़ियाल का कहना है कि उत्तराखण्ड में हो रहे विकास कार्यों का राजनीति के तहत विरोध किया जा रहा है। अगर नदियों को बचाना है तो पहले हिमालय सहित देश के तमाम क्षेत्रों के लिए नीति बने तथा उसका कठोरता से पालन हो। सिर्फ राजनीति और अपनी दुकान चमकाने के लिए विकास का विरोध नही होना चाहिए। हिमालयी क्षेत्र की जनता तथा यहां की नदियों के अस्तित्व को बचाये रखते हुए विकास कार्य किये जाने चाहिए। पर्यावरण तथा नदियों को सूखने से बचाया जाना चाहिए लेकिन सिर्फ कागजों पर इस चिन्ता को नही उकेरा जाना चाहिए धरातल पर भी उसका असर दिखना चाहिए।
गंगा नदी कोई राजनीति तथा अपनी भड़ास निकालने का यंत्र नही है। गंगा हमारी अस्मिता का प्रतीक तथा हमारी संस्कृति व सभ्यता को जीवंत रखने वाली नदी है। गंगा हमारी कामना को आकार देती है हमें मोक्ष दिलाती है। आज विकास की अन्धी दौड़ ने इस विराट नदी के अस्तित्व पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। गोमुख से निकली गंगा अपने उद्गम स्थल से ही प्रदूषित होनी शुरू हो गई है। प्रतिवर्ष हजारों कांवड़ियों के यहां आने से गंगा के उद्गम का यह क्षेत्र उनके गन्दे कपड़ों, मलमूत्र त्याग करने, प्लास्टिक अन्य कई प्रकार की हलचलों के कारण यहां का वातावरण प्रदूषित हो चुका है। इस बात की ओर किसी का ध्यान क्यों नही जाता है। ठीक है हिमालय के इस अतिस संवदेनशील क्षेत्र में इस तरह की पनबिजली योजनायें बनाने से पहले सोचा जाना चाहिए लेकिन जो क्षति गोमुख तथा इसके आस-पास हो रही है उसको क्यों नही रोका जा रहा हैं? गोमुख क्षेत्र में मानवीय हरकतों पर लगाम क्यों नही लगाया जा रहा है? गोमुख ग्लेशियर प्रतिवर्ष २० से ३० मीटर पीछे खिसक रहा है। स्थिति इतनी भयावह है कि देवप्रयाग जहां अलकनन्दा तथा भागीरथी नदी मिलकर बहती हैं वहां भी यह काफी प्रदूषित हो चुकी है, हरिद्वार और ऋर्षिकेश की तो बात ही और है। गंगा गोमुख से गंगा सागर तक समुद्र में मिलने के अपने यात्रा मार्ग में गंगा पॉंच-छ: राज्यों दर्जनों शहरों से होकर गुजरती है। मध्य हिमालय में समुद्रतल से लगभग १४००० चौदह हमार फिट की उंचाई पर स्थित गोमुख ग्लेशियर से बंगाल की खाड़ी में गंगा सागर तक गंगा लगभग २५०६ किलोमीटर लम्बी यात्रा तय करती है। गंगा नदी के तट पर प्रमुख तीर्थों में ऋर्षिकेश, हरिद्वार, वाराणसी तथा इलाहबाद प्रयाग आदि आते हैं। अपने उद्गम से जैसे जैसे गंगा आगे बढ़ती गई उसमें प्रदूषण इस कदर बढता गया कि गंगा सागर जाते-जाते यह जीवनदायिनी नदी एक विषैले नाले के रूप में तब्दील हो जाती है। गंगा के किनारे बसे शहरों की गन्दगी, मल-मूत्र तथा उद्योगों का विषैला-जहरीला पदार्थ, अधजले मानव व मवेशियों के अवशेष आदि जगह-जगह ड़ाले जाते हैं। धार्मिक आयोजनों तथा पूजा आदि करने के बाद अति धार्मिक तथा सहिष्णु लोग अपनी पूजा सामग्री तथा कूड़ा करकट आदि सब गंगा में विसर्जित कर देते हैं। धर्म के ठेकेदार अपने पापों का प्रायश्चित इन नदियों को गन्दला करके करते हैं। हालात यह हैं कि हरिद्वार में भी गंगा का पानी पीने लायक नही रह गया है। गंगा का जल कई वर्षों तक बोतल आदि में बन्द रखने से खराब नही होता था लेकिन आज तो समूची गंगा ही विषैली बना दी गई है। और तो और शहरों से मानवीय मल तथा वैध-अवैध कसाईखानों से मवेशियों का खून तथा मांस भी गंगा में फेंककर गंगा को दूषित किया जा रहा है। इस पर किसी की नजर क्यों नही जा रही है? यदि इस तरह की हरकतों को नही रोक सकते हैं तो मात्र भूख हड़ताल तथा गंगा पर सेमिनार करने से कुछ लोगों को बयान देने का अवसर मिल सकता है लेकिन गंगा को दूषित ही रहेगी।
गंगोत्री ग्लेशियर विश्व के विशाल ग्लेशियरों में गिना जाता है यह लगभग ५५६ किलोमीटर लम्बा है इसमें गोमुख ग्लेशियर ३० किलोमीटर है। एक अनुमान के अनुसार १९३५ से लेकर १९५० तक इस ग्लेशियर की पिघलने की दर सामान्य थी लेकिन १९५२ के बाद यह क्रम लगातार बढ़ता गया और सबसे अधिक १९९४ से २००८ के बीच यह ग्लेशिर पिघला। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि गंगोत्री ग्लेशियर प्रति वर्ष यह ग्लेशियर २५ से ३० मीटर पीछे खिसक रहा है। यही हाल रहा तो आने वाले बीस सालों में मध्य हिमालय से निकलने वाली छोटी-बड़ी नदियां सूख जायेंगी कईयों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। गंगोत्री ग्लेशियर आने वाले पचास सालों में समाप्त हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो तब सदानीरा कही जाने वाली नदी सूख जायेगी।
गंगा नदी की की सफाई तथा प्रदूषण मुक्त बनाने की कवायद पर अब तक लगभग २२ करोड़ रूपये खर्च किये जा चुके हैं लेकिन गंगा का प्रदूषण कम नही हो रहा है। उत्तराखण्ड राज्य प्रदूषण बोर्ड के अनुसार गंगा नदी पर बैक्टीरिया की मात्रा प्रति मिलीलीटर १०६० पाई गई यही हाल इसकी सहायक नदियों का है। हरिद्वार में तो यह मात्रा बढकर ५५०० प्रति मिलीलीटर हो गई है। आगे तो यह स्थिति और भी खतरनाक रूप बढ़ रही है। अगर समय रहते गंगा सहित तमाम नदियों को बचाया नही गया तो वह दिन दूर नही है जब ये नदियां पूरी तरह से सूख जायेंगी जिससे मानव सहित तमाम जीव-जगत का अस्तित्व भी संकट में पड़ जायेगा। क्योंकि नदियों के बिना हम अधिक समय तक जीवित नही रह सकते हैं इसलिए समय रहते ईमानदारी पूर्वक इन नदियों को बचाया जाना चाहिए।
यह सच है कि मध्य हिमालयी क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों से लगातार बढ़ रहे मानवीय दखल तथा ग्लोबल वार्मिंग तथा वनों के कटान के कारण इन नदियों पर संकट पहले ही चल रहा है उस पर अनियंत्रित विकास की अवधारणा ने इस क्षेत्र को खतरे में ड़ाल दिया है । यहां कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां जंगलों में हर साल आग लग जाती है कई मामलों में तो स्थानीय जनता जंगलों को आग के हवाले कर देती है इस कारण भी नदियों का जल स्तर घट रहा है। कई कारण है जिनसे गंगा सहित कई नदियों का अस्तित्व खतरे में है। किसी भी विकास कार्य को विरोध या समर्थन अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर नही किया जाना चाहिए उसे समग्र रूप से देखा जाना चाहिए। यह तभी संभव है जब हम उचित समय पर उचित निर्णय तथा कार्यवाही करेंगे। गंगा को बचाने के लिए ईमानदार पहल जरूरी है विकास तथा नदियों की जीवन्तता में तारतम्य बिठाया जाना चाहिए तभी जीवन सुखी रह सकता है। अन्यथा कुछ वर्षों बाद नदियां सूख जायेंगी तब हमें अपनी भूल पर पछतावा करने के अलाव कुछ हासिल नही होगा। इसलिए गंगा के चिन्तित समुदाय के साथ सभी चिन्तित हैं लेकिन समय रहते कार्यवाही और उचित समय पर पहल जरूरी है।
आज के युग के पर्वतीय प्रदेश के कथाकारों के रूप में शिवानी के बाद संभवतः शैलेश मटियानी का नाम ही सर्व प्रथम जहन में आता है। माटी पुत्र रमेश मटियानी की शैलेश मटियानी और एक लेखक बनने की गाथा कितनी संघर्षमय थी, परिचय दे रही हैं सुश्री सरोज शर्मा;
शैलेश मटियानीः एक परिचय
हिन्दी के प्रतिष्ठित कथाकार शैलेश मटियानी का जन्म 14 अक्टूबर 1931 को अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना गांव में हुआ। तब कौन जानता था, उस साधारण परिवार में जन्मा बालक एक दिन हिंदी कथा साहित्य का शिखर-पुरुष बनेगा। लेकिन मटियानी जी को यह उपलब्धि सहज ही नहीं मिली। उनका सारा जीवन-व्यक्ति के तौर पर भी और साहित्यकार के स्तर पर भी संघर्षों से भरा रहा। उन्ही के शब्दों में कहें तो उसमें न जाने कितने उपन्यासों के लिए कथावस्तु मौजूद है। मटियानी जी बारहवें वर्ष में थे, तभी उनके माता-पिता दो भाई-बहनों के साथ उन्हें छोड़कर स्वर्ग सिधार गए। यहीं से उनके जीवन का कठिन दौर शुरू होता है। वह पांचवीं कक्षा में पढ़ रहे थे। अब उन्हें अपने चाचाओं के संरक्षण में रहना था। परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि पढ़ाई छूट गई और चाचाओं के घर और कारोबार में हाथ बटाने का काम शुरू करना पड़ा, जिसमें बूचड़ की दुकान पर काम करना और जुए की नाल उघाना प्रमुख थे। चाचाओं के आश्रय में वह करीब आठ साल रहे। इसी दौरान पांच सालों के अंतराल के बाद जैसे-तैसे पढ़ाई फिर से शुरू करके वह मिडिल तक पहुंचे। पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय न मिलने के बावजूद अपने ‘ अभिशप्त छात्र जीवन ‘ में उन्होने अपनी विलक्षण प्रतिभा से अध्यापकों को अभिभूत कर दिया। उनका स्नेह उन्हें बराबर मिलता रहा। वे उन्हें प्रोत्साहित भी करते रहे और चाचाओं पर उन्हें पढ़ाने के लिए दबाव भी बनाते रहे। यह अध्यापकों का स्नेह-प्रोत्साहन था कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद वह हाइस्कूल कर गए।
मटियानी जी के संवेदनशील व्यक्तित्व में लेखक बनने के बीज शुरू से ही मौजूद थे, जो एक लेखक मित्र कुंवर सिंह तिलारा के संपर्क में आने से अंकुरित होने लगे। 1950 में उन्होंने कविताएं-कहानियां लिखनी शुरू कर दी थीं। किंतु अल्मोड़ा की पत्रिकाओं से उन्हें सिर्फ उपेक्षा और घृणा ही मिली। अल्मोड़ा का घनघोर आभिजात्य उनकी प्रतिभा को स्वीकार करने को तैयार ही नहीं था। बल्कि जितना हो सकता था, तिरस्कृत करने में लगा हुआ था। इस तिरस्कार ने उन्हें तोड़ा नहीं बल्कि लेखक बनने और सिर्फ लेखक ही बनने के विचार को मजबूती दी। कभी-कभी आश्चर्य होता है कि जिसका परिवेश जुआरियों-शराबियों का रहा हो, जिसे पढ़ने के लिए पाठ्यपुष्तकों के लिए भी पर्याप्त साधन और समय न मिला हो, उसके मन में लेखक बनने का विचार कैसे आया ? इसका जवाब तो ईश्वर ही दे सकता है जिससे वह निरंतर प्रार्थना करते थे- ‘ हे माता सरस्वती, मुझे किसी भी तरह लेखक अवश्य बना देना। ‘
जल्दी ही उनकी प्रार्थना स्वीकार हुई। ‘जहाँ चाह वहाँ राह ‘ को चरितार्थ करती मटियानी जी की दो कहानियां अमर कहानी तथा रंगमहल पक्षिकाओं में छपी। लेकिन अब परिस्थितियां इतनी विकट हो गई थीं कि उनके लिए अल्मोड़ा-बाड़ेछीना रहना कठिन हो गया। वह दिल्ली चले आए। चाचा के घर से ‘ घी का चौथाई ‘ चुराकर उसे उन्नीस रुपयों में बेचकर दिल्ली आने की व्यवस्था की। यहां वह अमर कहानी के संपादक आचार्य ओमप्रकाश गुप्ता के यहां रुके। कुछ समय नौकरी भी की। इस दौरान उनकी बारह कहानियां छपीं। लेकिन जल्दी ही उनका मन दिल्ली से भर गया। उन्होंने इलाहाबाद जाने का निश्चय किया और उसके लिए धन की व्यवस्था अमर कहानी के लिए शक्ति ही जीवन है और दोराहा नामक दो लघु उपन्यास लिखकर की।
1951 के अंत में पहली बार इलाहाबाद पहुंचे। मटियानी जी को इलाहाबाद के इस दौर ने न तो आर्थिक रूप से स्थापित होने में मदद की, न वहां साहित्यकार के रूप में ही उनका स्वागत हुआ। लेकिन इसने उन्हें यथार्थ से रू-ब-रू करवा दिया। उनमें आत्मविश्वास का संचार किया। इलाहाबाद में वह माया कार्यालय गए क्षितीन्द्र जी से मिलने, लेकिन क्षितीन्द्र जी ने उनसे कोई बात नहीं की, पर शमशेर बहादुर सिंह का रास्ता जरूर दिखा दिया। शमशेर जी ने उन्हें बड़ी आत्मीयता से लिया। न केवल अपने घर में टिकने की जगह दी बल्कि उन्हें काम दिलवाने की भी भरसक कोशिश की। पहले उन्हें एक परिचित के माध्यम से ‘लीडर प्रेस‘ की कैंटीन में काम दिलवाया। वह काम सिर्फ एक ही दिन चला। उसके बाद शमशेर जी ने उन्हें ‘पंत जी ‘ के पास पत्र देकर भेजा, जिसमें उन्हें घरेलू काम पर रखने की गुंजाइश के साथ-साथ उनकी साहित्यिक प्रतिभा का भी जिक्र था। पंत जी के पास पहाड़ी आदमी के लिए कोई नौकरी नहीं थी ( क्योंकि उनका पहाड़ी नौकर चोरी करके भाग गया था) न ही उनके पास मटियानी जी की साहित्यिक उपलब्धियों को देखने की फुर्सत थी।
पंत जी के उपेक्षापूर्ण व्यवहार ने उनके अंतर्मन को किस कदर झकझोरा, यह उनके शब्दों से ही स्पष्ट है-‘ ...मेरी कायर कुंठित होती चली जा रही आत्मा के, मेरे मृतप्राय स्वाभिमान के मुंह पर जैसे दूसरी बार (पहली बार क्षितिन्द्र की उपेक्षा) एक करारा तमाचा पड़ा था। ...वह दिन है और आज का दिन है-मैं फिर किसी साहित्यकार की शरण में नहीं गया कि मुझे आश्रय मिले।‘
उसी दिन उन्होंने इलाहाबाद छोड़ दिया। कुछ दिन मुजफ्फरनगर में घरेलू नौकर का काम किया, फिर दिल्ली लौट आए।
इसके बाद जीवन में एक नया मोड़ आया। दिल्ली से वह एक पहाड़ी मित्र के साथ बिना टिकट बंबई के लिए रवाना हुए। यहां उन्होंने लगभग आठ-नौ वर्ष बिताए, जिन्होंने उन्हें ‘ लेखक होने के उस मुकाम तक पहुंचा दिया जहां से वापसी संभव नहीं रही‘।
बंबई पहुंचते ही उनका सामान और मित्र दोनों गायब हो गए। कोई आसरा न होने के कारण उन्हें फुटपाथों की शरण लेनी पड़ी। यहां उन्होंने एक तथाकथित ‘असामाजिक बिरादरी‘ पाई जिसके लिए सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं है, जिनकी नारकीय परिस्थितियों में भी जीने की अदम्य इच्छा ने मटियानी जी को प्रभावित किया। वह उनके साथ फुटपाथ पर सोए, राह पर पड़े रोटी के टुकड़ों को बीना, भोजन की जुगाड़ में हवालातों के चक्कर लगाअ। भिखारियों की पंगत में बैठे, खून बेचा। कुल मिलाकर कहा जाए तो घोर उपेक्षा और तिरस्कार सहा, पर लेखक बनने का ख्वाब न टूटने दिया।
दरअसल वह इसे अपने लेखन के लिए उर्वरक मानते थे। प्रकाश मनु ने एक संस्मरण में उन्हें इस तरह उद्धृत किया है-‘ मैं शराब, सिगरेट या किसी भी नशे का सेवन नहीं करता- इसलिए कि शराब या कोई भी नशा लेने का मतलब है, मैं हार गया। यह मेरी मूल प्रतिज्ञा के खिलाफ है। दुख-दर्द जो भी मेरे हिस्से का है, उसे सहकर- सीधे-सीधे झेलकर ही मैं लेखक हूँ- तो मैं उसे सहूंगा। हर कीमत पर, हर हाल में.... ‘
करीब पांच-छह साल इन तोड़ देने वाली परिस्थियों में रहने के बाद 1956 में उन्हें ‘श्री कृष्ण पूरी हाउस‘ में प्लेटें साफ करने का काम मिला। मटियानी जी ने इसे वरदान से कम नहीं समझा। तीन-साढ़े तीन साल तक उन्होंने यही काम किया, साहित्य-साधना भी जारी रही। कई कहानी-कविताओं की रचना हुई। फिर बंबई भी छूट गया। पहाड़ से बंबई तक के इस दौर के अनुभव उनकी मेरी तैंतीस कहानियां, बोरीवली से बोरीबंदर तक, चौथी मुठ्ठी, हौलदार आदि कृतियों में दर्ज हैं। बंबई से अल्मोड़ा, फिर दिल्ली की यात्राएँ कीं लेकिन टिके फिर इलाहाबाद में जाकर ही।
उन्होंने पूरी तरह से लेखनी को ही आजीविका का स्रोत बना लिया था। पत्रिकाओं से आनेवाले पारिश्रमिक से चार बच्चों वाला घर न संभला तो उन्होंने विकल्प नामक अर्धवार्षिक पत्रिका निकालने का निश्चय किया और बाद में जनपक्ष। यह मटियानी जी की नैतिक ईमनानदारी ही थी कि विकल्प के पहले संपादकीय में वह स्पष्ट कर देते हैं कि ‘ पत्रिका का उद्देश्य आजीविका जुटाना है।‘ मटियानी जी लेखन के प्रति समर्पित थे, तो लेखकीय स्वतंत्रता के लिए भी प्रतिबद्ध थे। वह अपने विचारों व लेखकीय प्रतिष्ठा के प्रति कितने संवेदनशील थे, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी वैचारिकता से संबंधित एक खबर को तोड़-मरोड़कर छापने के लिए विरोधस्वरूप में धर्मयुग के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया। इसमें एक-एक करके सभी साथी पीछे हट गए और उन्हें भी हटने की सलाह दी गई। किंतु अर्थाभाव और साधनहीनता के बावजूद स्वाभिमानी लेखक ने अपने दम पर मुकदमा सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा। साहित्य जगत में उनके दो टूक और स्पष्टवादी स्वभाव का स्वागत नहीं हुआ, बल्कि अवसरवादिता के शिकार लोग उनसे चिढ़ते चले गए। सुधी आलोचकों ने उन्हें प्रेमचन्द के बाद के श्रेष्ठ आलोचकों में गिना। फिर भी कथाकार के रूप में उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं दी गई जिसके वह अधिकारी थे।
ऐसी उपेक्षा के वह आदी हो चुके थे, उसने उनकी रचनाओं को कभी प्रभावित नहीं किया। पर नियति की मार उन्हें झकझोर गई। 13 अप्रैल, 1992 को उनके छोटे बेटे की हत्या हो गई। इस हादसे के बाद उनका संतुलित रहना कठिन हो गया। 1995 में कलकत्ता में भारतीय भाषा परिषद् की एक गोष्ठी में उन्हें मानसिक रोग का पहला दौरा पड़ा। यह इतना जबर्दस्त था कि वह सात दिनों तक बेहोश रहे। उसके बाद इस रोग ने मृत्यु तक उनका पल्ला नहीं छोड़ा। उन्हें करीब आठ बार विक्षिप्तता के दौरे पड़े। इलाज बराबर चलता रहा। कुछ समय के बाद वह ठीक होते, तो लिखना फिर शुरु हो जाता था। पर वह सामान्य कभी नहीं हो पाए। अततः विक्षिप्तता में ही 14 अप्रैल, 2001 को उनका देहांत हो गया।
महमूद फिर जोर बांधने लगा, तो जद्दन ने दांया कान ऐंठते हुए, उसका मुंह अपनी ओर घुमा लिया। ठीक थूथने पर थप्पड़ मारती हुई बोली,“ बहुत मुल्ला दोपियाजा की-सी दाढ़ी क्या हिलाता है, स्साले ? दूंगी एक कनपट, तो सब शोखी निकल जाएगी। न पिद्दी, न पिद्दी के शोरबे, साले बहुत सांड बने घूमते हैं। ऐ सुलेमान की अम्मा, अब मेरा मुंह क्या देखती है, रोटी-वोटी कुछ ला। तेरा काम तो बन ही गया? देख लेना कैसे शानदार पठिए देती है। इसके तो सारे पठिए रंग पर भी इसी को जाते हैं।“
अपनी बात पूरी करते-करते, जद्दन ने कान ऐंठना छोड़कर, उसकी गरदन पर हाथ फेरना शुरू कर दिया। अब महमूद भी धीरे-से पलटा, और सिर ऊंचा करके जद्दन का कान मुंह में भर लिया, तो वह चिल्ला पड़ी, “ अरी ओ सुलेमान की अम्मी, देख तो साले इस शैतान की करतूत जरा अपनी आंखों से! चुगद कान ऐंठने का बदला ले रहा है। ऐ मैमूद, स्साले दांत न लगाना, नहीं तो तेरी खैर नहीं। अच्छा ले आई तू रोटियाँ? अरी, ये तो राशन के गेहूँ की नहीं, देसी की दिखती हैं। ला इधर। देखा तूने, हरामी कैसे मेरा कान मुंह में भरे था ? अब तुझे यकीन नहीं आएगा, रहीमन! ये स्साला तो बिल्कुल इन्सानों की तरह जज्वाती है! “
“जानवर तो गूंगा होता है, शराफत की अम्मा! अलबत्ता इंसान उसमें जज्बातों का अक्स जरूर ढूँढता है। तुम तो इस नामुराद बकरे का इतना ख्याल रखती हो, मां अपनी औलाद का क्या रखती होगी!“
रहीमन ने दोनों रोटियां जद्दन को पकड़ा दी थीं और बकरा अब रोटी के टुकड़े चबाने में व्यस्त हो गया था। एक टुकड़ा जब वह पूरी तरह निगल लेता, तो सिर से जद्दन को अपने सींगों से ठेलने लगता था।
“ सब्र नाम की चीज तो खुदा ने तुझे किसी भी बात में बख्शी ही नहीं।“ कहते हुए जद्दन ने फिर अपना रुख रहीमन की ओर कर लिया, “ इंसान जब बूढ़ा हो जाता है, तब कोई ऐसा उसे चाहिए, जो उसके ‘आ‘ कहने से आए और ‘जा‘ कहने से जाए। दुनिया वालों की दुनिया जाने, सुलेमान की अम्मा! मेरा तो एक नामुराद मैमूद ही है, जिस साले को इस खुल्दाबाद की नबी वाली गली से आवाज लगाऊं कि- ‘ मैमूद !‘ ‘ मैमूद! ‘ ‘ मैमूद ! ‘ तो चुगद नखास कोने के कूड़ेदान पर पहुंचा हुआ पीछे पलटता है और ‘बैं-बैं‘ करता वो दौड़ के आता है मेरी तरफ कि तू जान, सगी औलाद क्या आएगी! बस, साला जब कुनबापरस्ती पे निकलता है, तो मेरी क्या खुदा की भी नहीं सुनेगा। फिर भी आवाज लगा दूँ, तो एक बार ‘बैं‘ कर लेगा, भले ही बाद में अपनी अम्माओं की तरफ दूनी रफ्तार से दौड़ पड़े...।“
अपनी बात पूरी करके जद्दन हंस पड़ी, तो उसके छिदरे और कत्थई रंग के भद्दे दांतों में एक चमक-सी दिखाई दे गई। जर्जर टले लगे और बदरंग। बुरके में से बुढ़ापे का मारा हुआ चेहरा उघाड़े रहती है जद्दन, तो चुड़ैलों की-सी सूरत निकल आती है।
“ जब इस कसाइयों के निवाले का किस्सा बखानने लगती हो तुम, शराफत की अम्मा, मीरगंज वालियों की-सी चमक आ जाती है तुममें! “ अपनी काफी दूर निकल चुकी बकरी को एक नजर टोह लेने के बाद रहीमन ने मजाक किया और खुद भी हंस पड़ी।
“ तुम खुद अब कौन-सी जवान रह गई हो, रहीमन? आखिर तजुर्बेकार औरत हो! तुम जानो, एक ये बेजुबान जानवर और दूसरे मासूम बच्चे-बस, ये दो हैं, जो इंसान को उम्र, उसके जिस्म और उसकी खूबसूरती-बदसूरती पे नहीं जाते, बल्कि सिर्फ नेकी-बदी और नफरत-मुहब्बत को पहचानते हैं। हमारे शराफत की बन्नो तो तुम्हारी हजार बार की देखी हुई है। खूबसूरती और नूर में उसके मुकाबले की हाजी लाल मुहम्मद बीड़ी वालों या शेरवानियों के हियां भी मुश्किल से मिलेंगी रहीमन!...मगर तू ये जान के मेरा मैमूद उसकी शक्ल देखते ही मुंह फेर के, पिछाड़ी घुमा देता है। बदगुमान कैती है, नाकाबिले बर्दाश्त बू मारता है और ये कि ‘ अम्मा, हमारे बच्चों को छोड़ देगी, लेकिन यह बकरा नहीं छूटेगा।‘... मैं कैती हूँ, तेरी कमसिनी और खूबसूरती पे लानत है। लाख पौडर-इत्र छिड़के तू, मेरा मैमूद तेरे कहे पे थूक के नहीं देगा। ...जानवर और बच्चे तो इंसान की चमड़ी नहीं, नीयत देखते हैं, नीयत! मजाल है कि नवाबजादी के हाथों से एक गस्सा मेरे मैमूद के मुँह की तरफ चला जाए! तुझ पे खुदा रहम करेगा, रहीमन! देखना, पहले तो तीन, नहीं दो पठिए तो कहीं गए ही ना!...खुदा कसम, ये रोटियां तूने इस नामुराद के पेट में नहीं, मेरे पेट में डाल दी हैं। ...मुहल्ले वाले तो, बस, सरकारी मवेशी समझकर चले आते हैं। ये नहीं होता कमनियतों से कि दो रोटियां या मुट्ठी-भर दाना भी साथ लेते आएं। अरे भई, मैमूद जो धूप में खेल के वापस आने वाले मासूम बच्चों की तरे मुरझा जाता है, ये तो सिर्फ जद्दन को ही दिखाई देता है, या ऊपर वाले खुदा को। तू जान, पिछले बरस की बकरीद के आस-पास पैदा हुआ था। अब याददाश्त कमजोर पड़ चुकी, लेकिन शायद, ये ही जुम्मे या जुमेरात के रोज पैदा हुआ होगा और अब साल ऊपर साढ़े तीन महीने का हो लिया। “
जद्दन महमूद की पीठ पर हाथ फेरते हुए खटोले पर से उठ खड़ी हुई थी कि ''अच्छा, सुलेमान की अम्मा, चलूँगी। शराफ़त के अब्बा की दुपेर की नमाज़ का वक्त हो रहा है। सुना है, आज शहनाज़ के अब्बा लोग भी आने वाले हैं रायबरेली से।'' तभी रहीमन ने कहा कि ''तुम सवा-डेढ़ साल का बताती हो, मगर इसके रान-पुट्ठे देख के कोई तीन से नीचे का नहीं कहेगा! बीस-पच्चीस सेर से कम गोश्त नहीं निकलेगा इस बकरे में। लगता है, तुमने रोटी-दाने के अलावा घास से परवरिश की ही नहीं?'
हालाँकि रहीमन ने सारी बातें महमूद की प्रशंसा में कही थीं, लेकिन जद्दन का पूरा चेहरा त्यौरियों की तरह चढ़ गया, ''अरी ओ रहीमन, आग लगे तेरे मूँ में। मतलब निकल गया तेरा, तो मेरे मैमूद का गोश्त तौलने बैठ गई? तेरा खाबिन्द तो बढ़ई है, री, ये कसाइयों की घरवालियों की-सी बातें कहाँ से सीखी हो? या खुदा, हया और रहम नाम की चीज इंसानों में रही ही ना! गोश्तखोरों की नज़र और कसाई की छुरी में कोई फर्क थोड़े ना होता है। अरी रहीमन, कहे देती हूँ -- आगे से ऐसी बेहूदी बातें न करना और आइंदे से अपनी बकरी कहीं दूसरी जगे ले जाना। कोई सुसरा पूरे खुल्दाबाद में मेरा एक मैमूद ही थोड़े ठीका लिए बैठा है।''
''अरी जद्दन, अब बड़े घरानों की बेगमों के-से तेवर बहुत न दिखाओ! बकरा न हो गया, सुसरा हातिमताई हो गया तुम्हारे वास्ते!'' रहीमन ने भी झिड़क दिया और व्यंग-भरी आवाज़ में बोली -- ''वो जो एक मुहावरा है, तुमने भी सुना होगा -- बकरे की अम्मा आखिर कब तक दुआएँ करेगी? और जद्दन, सुनाने वाले को सुनना भी सीखना ही चाहिए।
हमसे पूछो, तो हकीकत ये है कि तुम्हारे तो औलाद हुई नहीं। सौतेले को न तुमने कलेजे के करीब आने दिया और न उन नामुरादों से तुम्हारे सीने में दूध उतारा गया। बस, ये ही वजह है कि तुम इस दाढ़ीजार बकरे को 'मेरा मैमूद, मेरा मैमूद!' पुकार के अपनी जलन बुझाती हो।''
जद्दन आगे बढ़ती हुई, ऐसे रूक गई, जैसे बिच्छू ने काट लिया हो। उसका चेहरा गुस्से में तमतमाने के बाद, लाचारगी से स्याह पड़ गया, रहीमन, जो जी तूने मेरा दुखाया है, खुदा तुझे समझेगा। और रै गया 'बकरे की अम्मा' वाला मुहावरा, तो इंसान की अम्मा की ही दुआ कहाँ बहुत लम्बे तक असर करती है? करती होती, तो तेरा बड़ा बेटा सुलेमान आज जवान हो चुका होता और तू सिर्फ़ नाम की 'सुलेमान की अम्मा' न रह जाती! एक लमहा चुप कर, रहीमन! खुदा मुझे माफ़ करे, मैं तेरे ऊपर बीते का मज़ाक उड़ाना नहीं चाहती थी -- सिर्फ़ इतना कैना चाहती हूँ, दर्द इंसान को अपने जज़्बातों का होता है। जिससे जज़्बाती रिश्ता न हो, उसका काहे का स्यापा? सूलेमान की अम्मा, इतना मैं भी जानती हूँ कि बकरे ने आखिर कटना-ही-कटना है। कसाइयों से कौन-सा बकरा बचा आज तलक? मगर मेरी इतनी इल्तजा ज़रूर है परवर-दिगार से, मेरी नजरों के सामने ना कटे। शराफत के अब्बा से कै भी चुकी हूँ, इस नामुराद को जब बेचने लगो, तो पहले तो शहर का -- कम-से-कम मोहल्ले का फासला ज़रूर रखना। और वो तेरी बात मैं ज़रूर माने लेती हूँ कि खुदा के यहाँ बकरे की अम्मा की दुआ बहरे के कानों में अजान हैं। यह भी ठीक है, सौतेले ने मुझे सगी अम्मा की-सी इज़्ज़त नहीं बख्शी, यह कैना सरासर झूठ बोल के दोखज में जाना होगा मगर मुहब्बत जो मुझे इस जानवर ने दी, अम्मा-अब्बा ने दी होगी, तो दी होगी।''
रहीमन से कोई उत्तर बन नहीं पाया। वह सिर्फ़ यह देखती रह गई कि जद्दन ने बुर्के के पल्लू से अपनी आँखें पोछीं और बकरे की पीठ थपथपाती हुई, अपने घर की तरफ़ बढ़ गई।
जद्दन जब तक घर पहुँची, अशरफ नमाज़ पर बैठ चुके थे।
पाखाने की बगल की संकरी कोठरी में बकरे को बंद करते हुए, जद्दन बोली, ''शराफत के अब्बा दूपेर की नमाज पर बैठ चुके। अब तू कहाँ मारा-मारा फिरेगा। शाम के वक्त निकालूँगी। इस साल अभी से लू चलने लगी।''
खाने पर बैठे, तो अशरफ बोले, ''शराफत की अम्मा, रायबरेली वालों का संदेशा आया था, तुम्हें मालूम ही होगा। हम लोग तो तंगदस्ती मे चल रहे हैं, मगर मेहमानों के सामने तो अपना रोना रोया नहीं जाता, इज़्ज़त देखनी पड़ती है। शराफत और जहीर से बात हुई थी। लड़के ठीक ही कह रहे थे कि अब्बा, बाज़ार में दस रुपए किलो का भाव है। पाँच-छँ जने शहनाज की पीहर से रहेंगे और भले-बुरे में दस-पाँच अपनी आपसवालों के लोगों को बुलाना ज़रूरी-सा होता है। दूसरों की दावत खाते हैं, तो अपनी शर्म रखनी ही पड़ेगी। शराफत तो यही कहता था कि अम्मा से पूछ के देख लें। तुम्हारे बकरे को कटवा लेते तो घर की ठुकेगी नहीं। खाली रोगनजोश उबाल देने से तो काम चलेगा नहीं। कबाब और कोफ्ते बड़ी बहुत अच्छे बनाती हैं। पिछले बरस जब हम लोग रायबरेली गए थे शहनाज के अब्बा ने दो तो बकरे ही कटवा दिए थे और मुर्गियों की गिनती कौन करे। चार-पाँच दिन कुल जमा रहे होंगे, गोश्त खा-खाकर अफारा हो गया। गरीब हम लोग उनके मुकाबले में ज़रूर हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि अपनी कमनियती का सबूत भी दें।''
अशरफ भूमिका बाँधते जा रहे थे और जद्दन का चेहरा खिंचता जा रहा था। घर के सभी लोग जानते थे कि अम्मा से बकरे को निकालना इतना आसान नहीं होगा। अशरफ जब बातें कर रहे थे, शहनाज चुपके-चुपके अपने बच्चे को पुलाव खिला रही थी और सहम रही थी कि कहीं अम्मा आसमान की तरह न फट पड़ें। मुँह उसका दूसरी ओर था, लेकिन कान जद्दन की ओर लगे हुए थे। ज्यों ही जद्दन ने धीमी लेकिन क़ड़वी आवाज़ में कहा कि ''शराफत की लैला तो मेरे मैमूद की जान को आ गई है।'' शहनाज दबे स्वर में बोली, ''अम्मा, ये तोहमत हमें ना दीजिये। ये बैठे हैं सामने, पूछ लीजिए, हम तो लगातार मने करते रहे हैं कि अम्मा बहुत जज़्बाती है, उनकी कोई न छेड़े। खुराफातें ये करेंगे और अम्मा का गुस्सा अपने बेटों की जगह, हम बेकसूरों पर गिरेगा।''
शहनाज के कहने में कुछ ऐसी विनम्रता और सम्मान की भावना थी कि जद्दन का रूख बदल गया, 'शराफत के अब्बा, बकरे को मैंने कोई छाती पे बाँध के थोड़े ले जाना है? रहीमन ठीक ही तो कैती थी कि जद्दन आपा, बकरे की माँ कहाँ तक खैर मना सकती है! मेरी ख्वाहिश तो सिर्फ़ इतनी हैं कि इस साले नामुराद जानवर के उठने-बैठने, हगने-मूतने की बातें भी मेरी याददाश्त का हिस्सा बन गई हैं। छोटा मेमना था, तब तुम लोगों ने ही खुद देखा और हज़ार बार टोका कि अम्मा बकरे की औलाद की तरह साथ सुलाती है। क्या करती, सर्दी इतनी पड़ती थी और बिना माँ का ये बच्चा था! खैर, मेरी तो इतनी-सी सलाह है कि मेहमान आएँ, तो उनकी इज़्ज़त हमारी इज़्ज़त है। जहीर से कहिए, कहीं उधर कटरे-कंडेलगंज की तरफ़ के कसाइयों के हाथ बेच आए और इसके पैसों से चाहे फिर गोश्त ले आए, या दूसरा बकरा खरीद लाए। इसका तो गोश्त भी बू मारेगा। और, खुदा जानता है, मैंने तो अपना जी अब खुद ही कसाइयों-सा बना लिया कि इस हरामजादे को तो कटना ही है। मैं ही उल्लू की पठ्ठी थीं, जो इसको खुराक देकर गोश्तखोरों के लिए मोटा करती रही।
हालाँकि सारी बातें जद्दन ने काफी ठंडे स्वर में और उदासीनता बरतते हुए कहीं थीं, लेकिन सभी जानते थे कि क्रुद्धता उसके जिस्म में इस समय खून की तरह दौड़ रही होगी।
अपनी हताशा और उदासीनता को कमरे में पतझर के पत्तों की तरह गिराती हुई-सी जद्दन उठ खड़ी हुई, तो शहनाज बोली, ''बकरे का गोश्त बू देगा, यह कहने के पीछे अम्मा का खास मकसद है। आप इन दोनों से कह दीजिएगा कि अम्मा से जिद न करें।''
अशरफ मियाँ ने एक लम्बी सांस ली और बोले, ''इसको देखता हूँ, तो बीते हुए दिन याद आने लगते हैं। शराफत और जहीर जब छोटे थे, तभी बड़ी चली गई थी। इसने हम लोगों को कभी इस बात का अहसास नहीं होने दिया कि बूढ़े की बीवी मर गई है या बच्चों की अम्मा! तुम लोग तो अब देख रही हो, जब न इसमें आब रही, न ताब! बकरा कट ही जाए, तो अच्छा है। मार पागलों की तरह धूप में मारी-मारी फिरती है। वह सुसरा कभी ठिकाने तो रहता नहीं। कटे, तो थोड़े दिन हाय-तौबा कर लेगी, और क्या! रोज़-रोज़ की फजीहत तो दूर होगी। देखना मेहमानों के सामने अम्मा यों टल्ले लगा बुरका पहने न चली आएँ! वक्त की मार भी क्या मार है। देखती हो, अधसाया करके उठ गईं। जब तुम लोगों की उम्र की थीं, तब बारामती की किस्में देखी जाती थीं कि जर्दा पुलाव के लिए बारीक वाली बासमती हो। अब यह राशन के चावलों को पीला करना तो हल्दी की बेइज़्ज़ती करना है।''
इसी वक्त बड़ा बेटा जहीर आ गया, तो उसको सारी स्थिति बतायी गई। वह लापरवाही के साथ बोला, 'आप लोग बेकार में बात बढ़ाये जाते हैं। अम्मा को मैं समझा दूँगा। अब यह कोई उनकी बकरे के पीछे दौड़ने की उम्र हैं? सड़क पर भागती दिखती हैं, तो शर्मसार होके रह जाते हैं हम लोग। भूखी-प्यासी और फटेहाल दौड़ी चली जाएँगी। मेरी मानिये, तो सलीम कसाई को बुलवा लें और मेहमानों के आने से पहले खाल उतारकर, कीमा कूंटने रख दे। राने पुलाव में डलवा दीजिए और इस वक्त के मीट में सीना-चाप-गरदन की बोटियाँ ठीक रहेंगी। जो खातिर घर की चीज़ से हो सकती है, बाज़ार से दो-ढ़ाई सौ में भी नहीं होंगी।
जुबेदा की अम्मा भी यही कहती थीं कि सोला रुपए वो देंगी, तीस-बत्तीस रुपए, शायद, ये शहनाज भी देने वाली थीं कि ''अम्मा अपने बेटों को तो बख्श देंगी, हमें नहीं।'' अब इन बेवकूफों को कौन समझाये कि दो किलो घासलेट और तेल-मसाला करते-करते सौ रुपए निकल जाएँगे। राशन का चावल तो मेहमानों के लिए पुलाव में इस्तेमाल होगा नहीं और ढंग की बासमती साढ़े चार-पाँच से कमती का सेर नहीं। इंसान को अपना वक्त और सहूलियत देख के चलना चाहिए, जज़्बातों पर चलने के दिन लद गए।'' ''कहते ठीक हो, बेटे! मेरी भी राय यही है। ज़रा तुम अम्मा से मिलकर, ऊँच-नीच समझा दो। ज़िद्दी ज़रूर हैं, लेकिन नासमझ नहीं।'' आवाज़ साफ़-साफ़ सुनायी दे गई। जहीर की घरवाली यह कहते हुए उठ खड़ी हुई कि ''तुम लोग शुरू करो, मैं जरा अब्बा हुजूर के हाथ धुलवा दूँ।''
खाना खा चुकने पर जहीर सीधे भीतर के कमरे में गया कि अम्मा सोयी होगी, लेकिन शहनाज ने बताया, ''यों कहकर निकल गई हैं कि जरा रिजवी साहब के घर तक जाएँगी। उनके घर पिछले हफ्ते गमी हो गई थी। कहकर गई है कि शायद शाम हो जाए, देर से लौटेंगे। मेरा ख़याल है, अम्मा ने समझ लिया है कि अब बकरा बचता नहीं। गमी में शरीक होना तो एक बहाना है। घर से दूर जाना चाहती होंगी।'
शहनाज धीमे से हँसना चाहती थी, लेकिन सिर्फ़ उदास होकर रह गई। जहीर ने बाहर निकलकर, अपने ग्यारह-बारह साल के बड़े लड़के से कहा, 'जुबैद, ज़रा सलीम को बुलाकर लाइयो। मेहमानों के आने तक में सफ़ाई हो जाए, तो ही ठीक है। जुबेद की अम्मा, भई, तुम लोग ज़रा बाहर वाला कमरा मेहमानों के लिए ठीक-ठाक कर देना।
शहनाज के अब्बा लोगों को किसी तरह की कमी की शिकायत न हो। बेचारे हर फसल पर चले आते हैं और हर बात का लिहाज रखते हैं। खुद तुम्हारे साथ अपनी सगी बेटी से ज़्यादा मुहब्बत का बर्ताव करते हैं। तुम दोनों जने प्याज़ और मसाले वगैरह पीसकर तैयार कर लेना। बाकी बाज़ार का सामान शराफत लेता आएगा। सलीम आ जाए, तो उससे कह देना, गंद जरा-सी भी न छूटे आँगन में। पोंछा लगवा लेना। खून के धब्बे वगैरह देखेंगी अम्मा तो, और बिगड़ेंगी। तुम लोगों से कुछ कहने लगें, तो कह देना, जुबेद के अब्बा ने ज़बर्दस्ती कटवा दिया। मैं उन्हें समझा लूँगा।'
शाम की जगह घड़ी-भर रात बीत चुकने के अहसास में ही, जद्दन घर वापस लौटी और गली में से होते हुए, घर के पीछे वाले सँकरे आँगन में निकल गई। खटोला गिराकर उस पर लेट गई और, आस-पास के नीम-अँधेरे में अपने-आपको छिपा लेने की कोशिश में, आँखें बन्द कर लीं।
मेहमान आ चुके थे और उनके तथा आपस के लोगों की बातचीत यहाँ पिछवाड़े भी सुनायी दो रही थी। छोटे बच्चों को बाहर लेकर आई, तो शहनाज ने देखा और करीब आकर, पाँव दबाती हुई बोली, ''अब्बा आ गए हैं। आते ही आपकी बाबत पूछ रहे थे कि अम्मा ने पुछवाया है, कैसी हैं। कभी रायबरेली की तरफ़ आने की इस्तजा करवा रही हैं। मैंने भी अब्बा से कहा है कि अब की बार मैं अम्मा के साथ ही आऊँगी। अम्मा, तुम खाना कहाँ खाओगी? मेहमानों का दस्तरखान तो वहीं बाहर बैठक में बिछेगा। जल्दी खा-पी लेने की बातें कर रहे थे सभी लोग। कोई मज़हबी किस्म की फिल्म शहर में कहीं लगी हुई है!''
''मेरे लिए दो रोटियाँ यहीं भिजवा देना। मेरा न जी ठीक है, न पेट। जुबैद को जरा भेज देना, मैं उससे कुछ मँगवा लूँगी। तुम सब लोग आराम से खाओ-पिओ। मेरी फिक्र ना करना। अब तो कोई सर्दी ना रही। मैं यहीं सो जाऊँगी। अपने अब्बा हुजूर से मेरा सलाम कैना और कैना कि सुबह दुआ-सलाम होगी, अभी अम्मा का जी ठीक नहीं।''
शहनाज ने अनुभव किया कि जद्दन की आवाज़ मरते वक्त की-सी हो आयी है। निहायत हल्की और बेजान। वह चाहती थी कि कुछ बातें करके, उसकी उदासीनता को कम करने की कोशिश करे, लेकिन इस डर से चुप रह गई कि कहीं अंदर इकठ्ठा किया हुआ दु:ख गुस्से की शक्ल में बाहर फूट आया, तो पूरे घर का वातावरण बदल जाएगा। आज के वक्त को तो अब यों हीं टल जाने देना अच्छा है।
वापस लौटकर उसने बताया, 'तो जहीर और अशरफ मियाँ, दोनों ने मुँह बना लिया। 'हम लोगों ने तो हरचंद वही कोशिश की है कि कहीं से उस नामुराद बकरे की कोई चीज अम्मा को दिखे ही नहीं। वो तो इतनी संजीदा है गई हैं, जैसे बकरे का हलाल किया हुआ सर आँगन में टँगा हुआ हो। कह रही थीं, गोश्त-पुलाव वगैरा कुछ मत भेजना।'' शहनाज ने कहा, तो अशरफ मियाँ उठ खड़े हुए। बोले, 'जब उसे खिलाना हो, हमें बुला लेना। क्यों, भई जुबेद, तुम कहाँ तशरीफ ले जा रहे हो? जरा बैठक में मेहमानों के करीब रहो।''
चाचा जी ने पिछवाड़े भेजा था, बड़ी अम्मा के पास। उन्होंने चार आने हमें दिए हैं कि ''जाओ, शंभू पंडत की दुकान से आलू की सब्जी ले आओ।''
'अबे, इधर ला चवन्नी। जा, मेहमानों को पानी-वानी पूछना। अम्मा को हम देख लेंगे। शहनाज बेटे, ऐसा करो -- एक थाली में पुलाव और बड़े कटोरे में गोश्त लगाकर हमें दो दो। हम ले जाकर समझा देंगे। वाकई, बहुत बेवकूफ़ किस्म की औरत है। जहीर, तुम बाहर बैठक में बस्तरखान बिछाने में लगो। शराफत के अलावा और एक-दो लड़कों को साथ ले लो।''
पुलाव की थाली और गोश्त का कटोरा शहनाज ने ही पहुँचा दिया। खटोले की बगल में रखकर, पानी लाने के बहाने तुरन्त लौट आई। अशरफ मियाँ ने करीब से माथा छुआ और बोले, 'क्यों, भई, ऐसे क्यों लेटी हो? तबीयत तो ठीक है ना? अरी सुनो, सारे किये-कराये पर मिट्टी न डालो। तुम रूसवा रहोगी, तो सारी मेहमाननवाज़ी फीकी पड़ जाएगी। सारा घर कबाब-गोश्त उड़ाए और तुम उस शंभू पंडत के यहाँ के पानीवाले आलू मँगवाओ, ये तो हम लोगों को जूती मारने के बरोबर है। ऐसी भी क्या बात हो गई, जो तुमने खटिया पकड़ ली? गोश्त से तुम्हें कभी परहेज़ रहा नहीं। बिना शोरबे के रोटी गले के नीचे तुम्हारे उतरती नहीं। अब इस हद तक जज़्बाती बनने से तो कोई फ़ायदा नहीं। आखिर जिन बकरों का गोश्त तुम आज तक खाती आई हो, उनके कोई चार सींग तो थे नहीं! लो, शहनाज़ खाना दे गई है। गोश्त वाकई बहुत लज़्ज़तदार बना है। जहीर तो दूसरा बकरा भी ढूँढ़ने गया था, मगर लौटकर यही कहने लगा कि ''अब्बा, अपना बेचने जाओ तो सौ के पचास देंगे और दूसरों का खरीदने जाओ, तो पचास के सौ माँगेंगे। तुम तो घर की इस वक्त जो अंदरूनी हालत है, जानती ही हो।''
जद्दन ऐसे उठी, जैसे कब्रिस्तान में गड़ा हुआ मुर्दा खड़ा हो रहा हो। तीखी आँखों से अशरफ मियाँ की ओर उसने देखा और आवाज़ मेहमानों तक न पहुँचे, इस तरह दबाकर बोली, ''जहीर के अब्बा, नसीहतें देने आए हो? मेरी तकलीफ़ तुम लोग समझोगे? रिजवी के यहाँ घंटों पड़ी रही हूँ, तो कैसे यही मेरे तसब्वुर में आता रहा कि अब तुम लोग मेरे मैसूद के सिर को धड़ से कैसे जुदा कर रहे होंगे -- जार-जार रोती रही हूँ और रिजवी की बीबी यों समझ के मुझे समझाये जा रही है कि मैं उसके बदनसीब भाई की बेवक्त की मौत पे रो रही हूँ। आज ससुरा सवेरे-सवेरे से बार-बार मेरे कान मुँह में भरे जाता था और मैं थूथना पकड़कर, धक्का दे देती थी।
मैं क्या जानूँ कि बदनसीब चुपके से कान में यही कहना चाहता है कि ''अम्मा, आज हम चले जाएँगे!'' तुम लोग समझोगे मेरी तकलीफ़ कि कैसे मेरे लबों पर 'मैमूद' की सदा आएगी और खत्म हो जाएगी?''
जद्दन काफी देर तक फूट-फूटकर रोती रही और अशरफ मियाँ हक्का-बैठे रहे। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि स्थिति अब सँभले कैसे! आखिर उन्होंने यही तय किया कि चुपचाप खाना उठा ले जाना ही ठीक है।
वह थाली-कटोरा उठाते कि जद्दन जहरबुझी आवाज़ में बोल उठी, ''तुम बेदर्दों से ये भी न हुआ कि मैं अव्वल दर्जे की गोश्तखोर औरत जब कै रही हूँ कि 'बेटे शहनाज, हमें गोश्त-वोश्त न देना।'' तो इसकी कोई तो वजह होगी? और जहीर के अब्बा, इंसान दाढ़ी बढ़ा लेने से पीर नहीं हो जाता। तुम ये मुझे क्या नसीहत दोगे कि सभी बकरों के दो सींग होते हैं? इतना तो नादीदा भी जानता है। दुनिया में तो सारे इंसान भी खुदा ने दो सींग वाले बकरों की तरह, दो पाँव वाले बनाए? लेकिन औरत तो तभी राँड होती है, जब उसका अपना खसम मरता है। अम्मा तो तभी अपनी छाती कूटती है, जब उससे उसका बच्चा जुदा होता हो। ये मैं भी जानती हूँ कि मेरे मैमूद में कोई सुर्खाब के पर नहीं लगे थे, मगर इतना जानती हूँ कि मेरी तकलीफ़ जितना वह बदनसीब समझता था, न तुम समझोगे, न तुम्हारे बेटे ! समझते होते, तो क्या किसी हकीम ने बताया था कि मेहमानों को इसी बकरे का गोश्त खिलाना और तुम भी भकोसना, नहीं तो नजला-जुकाम हो जाएगा? जहीर के अब्बा, उसूलों का तुम पे टोटा नहीं, मगर इस वक्त अब हमें बहुत जलील न करो। शहनाज से कहो, उठा ले जाए, नहीं तो फेंक दूँगी उधर! जुबैद से कह देना, अब पंडत के हियाँ से सब्जी लाने की भी कोई ज़रूरत ना रही। मेरा पेट तो तुम लोगों की नसीहतों से ही भर चुका।''
अशरफ मियाँ नीचे झुके और थाली-कटोरा उठाते हुए, वापस आ गए, ''लो बेटे, रखो! ज़िद्दी औरत को समझाना तो खुदा के बस का भी नहीं। उसे उसके हाल पर छोड़, मेहमानों की फिक्र करो।''
उस कहानी में कहीं संतूर नहीं है. कोई ऐसा आदमी भी नहीं जिसने कभी संतूर देखा हो। उस कहानी में एक गूंगा-बहरा लड़का है, बस।
मैंने अपनी यह कहानी चार पांच जगह भेजी और यह हर जगह से उल्टे पाँव लौट आई। हर वापसी पर वह लड़का मुझे देर तक भर उत्साह से वह सब बताता रहा जो उसने अलग अलग सम्पादकों के पास जा कर देखा सुना, और हर वापसी के बाद मेरी यह कहानी ज़्यादा सच्ची होती गयी।
उस लड़के का बाप गाँव का एक बढ़ई है। वह आरी रंदा चलाता है। उसका गूंगा बहरा लड़का उस से ज़्यादा फुर्ती से और बेहतर बढ़ईगिरी करता है। वह अपने बाप को लकड़ी के भारी कुंदे अपने देखते उठाने नहीं देता। वह मां के साथ नदी तक जाता है और लौटते समय पानी की गागर मां के सिर पर नहीं होती। इस लिहाज़ से वह एक अच्छा लड़का है। पर ख़ाक अच्छा लड़का है..? जब फरार हो जाता है तो अपने मां-बाप को उस से कहीं ज़्यादा हलकान कर देता है। उसके पड़ोसी उसकी मां की मनुहार सुन कर चिंतित तो होते हैं, लेकिन उसे खोजने जाने की कोशिश से कतराते भी हैं। कारण यही, कि हमेशा उसके मिलने की जगह इतनी अजीब होती है कि किसी के ध्यान में ही नहीं आती। खोजने वाला दूर पास की छत्तीस जगह खोजता रहे और वह बावला भुसौले में बैठा पिंजरे में तोते से बतियाता मगन हो।
वह गूंगा बहरा लड़का तोते से बतियाता है, इसलिये सम्पादक उसकी कहानी को लौटा देते हैं। वह लड़का अपनी आदत से मजबूर हैं, और मां-बाप लाचार.. जब बाप के जूते में बेटे का पैर समा जाय, तो उस पर हाथ भी नहीं उठाया जा सकता।
मेरी कहानी में एक और गड़बड़ है।
न बाप के पास जूता है, न बेटे के पास, और उस बावले की मां अक्सर उस पर अपने हाथ चटका देती है। लेकिन यह गुत्थी है कि यह बात सम्पादकों को कैसे पता चल गई है....?
उस दिन की बात करें।
वह बावला फिर घर से फरार था। कहाँ, कौन जाने ? गाँव में किसी ने उसे इधर देखा तो किसी ने उधर, लेकिन जिधर भी वह देखा गया तेजी से बेचैन भागते देखा गया। इस से ज़्यादा किसी को कुछ पता नहीं था। हालांकि गाँव में अभी यह चलन बाकी है कि एक की चिंता दूसरे लोग सुन कर ठहर जाते हैं। इस लड़के के मां-बाप चिंतित थे इसलिए उसके पास पड़ोस में भी चिंता घनी थी. लेकिन किसी के पास कोई सुराग कहाँ था…
कल सांझ से ही बेमौसम बादल बूंदी का माहौल बना हुआ था, फिर आधी रात को ज़बरदस्त आंधी आयी जो देर तक बवंडर मचाती रही। घर भर जाग गया। बवाला भी उठा. पिता के साथ उसने लकडी और औजार बाहर सहन से लाकर कोठरी में रखे। मां के बाहर फैले कपड़े कथरी भीतर ला कर फैलाए. उसके बाद ही सब राम राम कर के सोये। सब के साथ बावला भी सोया। लेकिन भोर मे ?..बवाला किसी को नज़र नहीं आया। न मां को, न बाप को। गाँव भर में टूटे पेडों और इत-उत तहस नहस का नज़ारा फैला हुआ था। सब दिशा मैदान जाने वालों की नज़र चहुँदिश केवल नुक्सान आंक रही थी।
करीब आठ घंटे बीत गए, दोपहरिया चढ़ आयी। आंधी बौछार दे कर रात गई लेकिन सबेरा सूखा सहज ही आया। वैसी ही खिली धूप, वैसे ही मिजाज़ में सूरज देवता।
अचानक गफूरन उस बावले के दरवाजे पर आ खड़ी हुई और उसने जोर से बवाले के बाप का नाम लेकर आवाज़ दी।.संतराम बढ़ई तत्काल बाहर आ गया। गफूरन की उम्र संतराम से बरस-दो बरस ही ज़्यादा होगी बस, लेकिन उसकी ठसक का क्या कहना..
' कहाँ है बावला, बुलाओ..'
संतराम भी उखड़ गया, " जिया, यहाँ कहाँ है बावला .. सबेरे से लापता है.. जाने कहाँ गया, देखें तो कहाँ देखें..?"
" हैं..? पहुंचा नहीं अभी.. दो घंटे तो हुए होंगे उसे गए..."
अब संतराम चौंका। आहट सुन कर बवाले की मां भी बाहर आ गयी।
" बताओ जिया, बताओ.. उसे कहाँ से आना था..कहाँ था वह इतनी देर..? हमने तो उसे रात के आंधी तूफान के बाद नहीं देखा.."
गफूरन रोआंसी हो आयी।
"वह सूरज उगने के पहले ही मेरे पास पहुँच गया था.."
"क्या.. मसान पर ?" बवाले की मां का सवाल था।
" हाँ. आंधी में मेरा छप्पर उड़ गया था। धन्नी के गिरने से बर्तन चूल्हा चूर हो गए थे और मैं सिर थामे बैठी थी।" बात कहते कहते गफूरन रो पड़ी।
करीब बरस भर हुआ उसका मर्द गफूर हैजे के हाथ चढ़ गया था. गाँव के चलन के खिलाफ गफूरन अपने आदमी की अर्थी के साथ कब्रिस्तान गई थी और फिर गाँव के भीतर नहीं लौटी। वहीँ मसान के पास एक झोपडी डाल कर बस गई। उसके पति के ऊपर बेटी के ब्याह के टाइम लिया गया कर्जा था। उस कर्जे के एवज में गफूरन ने अपनी गाँव वाली बखरी साहूकार को सौंपी और उस से उरिन हो गयी। गाँव से करीब कोस भर का रास्ता, बीच में जंगल, लेकिन गफूरन ने जो ठाना वह पत्थर की लकीर।
गफूरन के रोने से आसपास लोग जुट आये। गफूरन ने बताया कि उसकी झोपडी की हालत का अंदाज़ लगा कर बावला वहां आया था, और हाल देख कर तुंरत पलट कर चल दिया था।
जब वह वापस लौट कर आया तो उस के पास एक साईकिल थी। उस के हैंडिल में काम के औजारों का झोला लटका हुआ था और कैरिअर पर एक बड़ा सा गट्ठर लदा था।
न जाने कितनी देर जुट कर वह मेरी झोपडी सुधारता रहा और पांव पटक पटक कर अपना गुस्सा जताता रहा।
" गुस्सा ? गुस्सा किस बात का ?"
" यही, कि गाँव वापस चलो। पहले एक दिन वह मेरे पास आया था। मैं चूल्हे पर रोटी पो रही थी। मैंने जैसे ही ईंधन के लिए एक चैला उठाया, उसके नीचे से एक लंबा सा काला बिच्छू निकल पड़ा...
बस, तभी से एक ही रट, गाँव वापस चलो।
खैर, मेरी झोपड़ी खड़ी कर दी बावले ने, पीछे की दीवार भी साध दी। धन्नी को जस की तस टिका कर एक बार ठठा कर हंसा और किलक कर धम्म से नीचे कूद कर मेरे सामने आ गया, जैसे पांच बरस का मुन्ना हो।
मैं उस एक टक देखती रही, संतराम यह बेटा मेरा क्या लगता है जो मुझे इतना रिझाता है ? फिर उसने अपने पेट पर हाथ थपथपा कर इशारा किया, भूख।
मेरी झोपड़ी में भला और क्या होता.. मैंने अफरा तफरी में आटा मला, उसमे चुटकी भर नमक दिया और एक बटलोई में चूल्हे पर आलू चढ़ा दियी। पेट की आग के लिए इतना बहुत था।"
बुक्का फाड़ कर गफूरन फिर रोई।
" हाय मेरा नसीब..जब तक मैं रोटी चोखा ला कर उसके आगे रखती, बावला वहां से जा चुका था। वहां न साईकिल थी न वह खुद. मैं ढूँदती भी तो उसे कहाँ ढूँदती। बस वहाँ से निकली और यहाँ चली आयी।"
गफूरन ने हाथ में थामी पोटली सामने रख दी. उसमे रोटी चोखा बंधा हुआ था, कि राह में बावला जहां दिख जाएगा वहीँ खिला देगी।
एकदम सन्नाटा छा गया.। गफूरन का छप्पर सजाने के बाद कहाँ गया होगा भूखा प्यासा बावला..
" चलो उसे खोजें.." आस पास खड़े लोगों में से एक आदमी ने सलाह दी। उनमे हरबंस भी था जिसकी साईकिल और औजार अभी दो घंटा पहले बावला वापस कर गया था..
उस भीड़ मैं भी था..कस्बे का स्कूल मास्टर, जो इस गाँव में ही पैदा हुआ था लेकिन अब वहां गाहे-बा-गाहे का ही मेहमान था। मैं बवाले और संतराम बढ़ई को ज्यादा नहीं जानता था।
जो चार लोग बवाले को खोजने चले मैं उनके साथ मिल कर पांचवां हो गया। खोजना कठिन था लेकिन पहचानना आसन था। हमें एक पंद्रह सोलह साल का गूंगा बहरा लड़का ढूँढना था।
आंधी तूफान से टूटे पेड़ों और कुछ उड़े गिरे छप्परों के बीच से हम चले। एक सयाने ने अपने कदम जंगल की तरफ बढाए, जिसके उस पार उस बुढ़िया की झोपड़ी और मसान था। हम सब उसके पीछे चल पड़े। इस तरफ, उस तरफ, सब तरफ देखते हुए। अचानक मेरे कान में कहीं से संतूर बजने की आवाज़ आई। मैं ठिठक कर रुक गया।
मुझे अनदेखा करते हुए एक दूसरे सयाने ने सुझाव दिया,
" उधर चल कर देखते हैं, वहां मीठी झरबेरियाँ बहुत हैं, बावला भूखा है, उधर हो सकता है.।"
सब उधर बढ़ गए लेकिन मैंने उनका साथ छोड़ दिया। मैं उस तरफ चलने लगा जिधर से संतूर बजने की लहर मुझे खींच रही थी।
मैं उसी राह पर बढ़ चला। कुछ दूर चलने के बाद जंगल से नीचे ढलान शुरू हो गई। सामने नदी थी। ढलान से जंगल की हद भी ख़तम होती थी, इसलिए वहां से जंगल का अँधेरा ख़त्म होने लगा.। मैं ढाल की तरफ बढ़ने लगा। सामने एक घना पेड़ था... और तभी मैंने देखा कि उस पेड़ के नीचे, उसके तने से पीठ टिकाये कोई बैठा हुआ है और संतूर की आवाज़ मानो उसी तरफ से फूट रही है।
मैं तेजी से कदम बढ़ कर एक दम उस पेड़ के पास पहुँच गया। एक पंद्रह सोलह साल का लड़का जो निश्चित रूप से बवाला ही था, वहां बैठा था और एकटक नदी की तरफ देख रहा था। उसके चहरे पर एक मुस्कान थी और संतूर की संगीतलहरी उसी की मुस्कान से बह रही थी।
कुछ देर मैं वहां खडा रहा, उसकी एकाग्रता नहीं टूटी. मैंने उसके कंधे पर हाथ रख दिया। उसने सिर उठाया। मैंने अपना हाथ बढ़ दिया. उस लड़के ने मेरा हाथ थाम लिया। मैंने हौले से उसे वहाँ से उठाया और साथ लेकर चल पड़ा। उसने मेरे आने और उसे ले जाने पर कोई प्रतिरोध नहीं जताया। मेरी ओर से भी उसके लिए कोई प्रश्न, कोई जिज्ञासा नहीं थी।
हम चल दिए. संतूर की तरंग मेरे साथ चलती रही और मेरे भीतर उतरने लगी..ध्वनि और छाया में बवाले का वह चेहरा मेरे चित्त में सघन हो गया, जिसे लिए वह एकटक नदी देख रहा था।
मैंने उस संतूर वादक को अपनी कहानी में उतार दिया है। मेरी यह कहानी निश्चित रूप से एक नायाब कहानी है, जो देर सबेर कहीं जा कर वहां से वापस नहीं लौटेगी।
दरअसल, यह संतूर की आवाज़ दुनिया में सबके हिस्से की चीज़ है. ..।
अमर अपने माता -पिता का इकलौता बेटा था। दोनों ने लाड प्यार के आँचल में ममता की छाँव तले उसे पालकर बड़ा किया। उसकी हर आरजू को पूरा करने को तत्पर रहते थे जानकी और वासुदेव। ज्यों ज्यों अमर प्राइमरी से मिडिल, फिर मिडिल से हाई स्कूल का फासला तय करता रहा, उसकी खूबियाँ भी प्रेम का पानी पाकर निखरती रही। शक्ल सूरत से तो वह मनमोहक था पर बुद्धिमान भी बहुत साबित हुआ. जब वह कालेज पहुंचा तो माँ-बाप के सामने अमरिका जाकर पढने की इच्छा प्रकट की, और साथ में वह वादे भी करता रहा कि वह पढ़ाई पूरी करते ही वापस आकर पिता के नक्शे-कदम पर चलकर, यहीं पर बसेरा डालकर उन दोनों की देखभाल भी करता रहेगा। इस प्रकार माता पिता की ममता का क़र्ज़ भी उतारता रहेगा। उसकी मीठी बातें और सलीकेदार सोच सुनकर दोनों जानकी और वासुदेव बहुत खुश हुए और अपनी बाकी तमाम उम्र की जमा पूँजी लुटाकर उसे बाहर रवाना करने में मदद की। यूं वक्त आने पर अमर उनकी आँखों में नए सपने सजाकर उनकी आँखों से दूर चला गया. पहले अमर जल्दी जल्दी उन्हें ख़त लिखा करता था, उन्हें यह पढाई के बारे में, अपने बारे में, माहौल के बारे में, बताता था. पर बहुत जल्द ही उन खतों की रफ़्तार ढीली पड़ गयी और वक्त ऐसा आया की वासुदेव के लिखे हुए खतों का जवाब आना ही बंद हो गया। और यूं दो साल और बीत गए। निराशा आंखें उठाये हर सूनी डगर पर ख़त के इंतज़ार में पथराई आँखों से निहारा करती थी।
और एक दिन डाकिया एक बडा सा लिफाफा उन्हें दे गया, जिसमें ख़त के साथ साथ कुछ फोटो भी थे। जल्दी में वासुदेव ख़त पढने लगा जिसको सुनते सुनते उसकी पत्नि जानकी वहीं बेहोश हो गयी। ये अमर की शादी के फोटो थे जो उसने वहाँ की अंग्रेज़ लड़की के साथ कर ली थी और ख़त में लिखा था " पिताजी हम दोनों फकत पांच दिन के लिए आपके पास आ रहे हैं और फिर घूमते हुए वापस लौटेंगे। एक खास बात है अगर हमारे रहने का बंदोबस्त किसी होटल में हो जाये तो बेहतर होगा। पैसों की ज़रा भी चिंता न केजियेगा।" यह खबर थी जो पढने के बाद वासुदेव का बदन गुस्से से थर थर कांपने लगा, जिसे काबू में रखते हुए वह अपनी पत्नी को होश में लाने की कोशिश करता रहा और वहीं ज़मीन पर बैठकर बच्चों की तरह रोने लगा। उम्मीदें और अरमान सब बिखर गए, सामने अपनी ममता का महल टूटा हुआ खँडहर सा लगा। जिसको अपने लहू से सींचा वो ही उस अपनाइयत को भूल कर गैर देश को अपना मान बैठा. वह अपना तो किसी हाल में भी नहीं, मगर अपनों से भी बदतर है. ऐसा बेटा प्यार तो छोडो, नफरत के काबिल भी नहीं है, यही कुछ सोचते सोचते आँख से गर्म आंसू बहने लगे। दूसरे दिन सुबह तार के ज़रिये बेटे को जवाब में लिखा
" तुम्हारा हाल पढ़ा पढ़कर जो दिल को धक्का लगा है उसी को कम करने के लिए हम पति-पत्नी कल तीर्थों के लिए रवाना हो रहे हैं, कब लौटेंगे पत्ता नहीं और अब हमें किसी का इंतज़ार भी नहीं। इसलिए तुम पराये मुल्क को अपना समझ कर नये रिशतों को निभाने की कोशिश करना। यहाँ अब तुम्हारा अपना कोई नहीं है."...वासुदेव
- देवी नागरानी
***
लानत
जब से रामखिलावन खेतीबारी बेचकर बेटे के पास रहने शहर आए, वक्त पंख लगाकर उड़ रहा था। पत्नी से बेटे की सराहना करते न थकते। बेटे को पढ़ाने लिखाने में कितनी परेशानियां झेलीं, कितनी रात भूखे पेट सोए, पत्नी के जेवर क्या , घर के बर्तन भांडे तक सब गिरवी रख दिए थे, धीरे-धीरे अभाव और दुख के वे सारे दिन भूलते जा रहे थे वह। अब तो गांव के वही, सेठ-साहूकार बड़े प्यार और अदब से दुआ-सलाम करते हैं उनसे । ऊपर वाले का रहम है कि मेहनत रंग लाई और बेटा आज एक आला दर्जे का पुलिस औफिसर है। रुतवा और शान के साथ-साथ, नौकर, बंगला, गाडी, आज क्या नहीं है उसके पास। बाकी कि सारी उमर यहीं बेटे के पास. उसके बनाए बड़े से इस बंगले में, पोते-पोतियों के साथ हँसते-खेलते ही गुजारेंगे अब तो, ' -सोच-सोचकर ही आंखें खुशी से छलकती रहतीं दोनों की। असल में पोते-पोती के प्यार में इतने मगन हो गए थे वे कि दीन-दुनिया का होश ही नहीं था। रहता भी कैसे, प्यार भी तो जबर्दस्त था पूरे परिवार में!
उस दिन बंगले में एक खास बैठक थी। बेटे के सभी संगी-साथी, नामी-गिरामी अफसर आए हुए थे। रामखिलावन पोते को आइसक्रीम दिलाकर लौट रहे थे। अचानक आइसक्रीम कमरे के ठीक सामने बरामदे में गिर गई। आदतन तुरंत ही कन्धे पर पड़ा अंगोछा उतारा और चमचमाता संगमर्मर का फर्श साफ कर दिया उन्होंने। फिर रोते पोते को गोदी में भरकर, पुचकारते हुए बोले, ' चलो दूसरी दिला लाता हूँ, अभी।'
" बड़ा भला और मेहनती नौकर है तुम्हारा। लगता है गांव से नया-नया आया है, अभी।'' एक साथी अफसर उनकी तत्परता को देखकर, बोले बिना न रह पाया। "कहां मिलते हैं ऐसे नौकर वरना आजकल तो ... काम न करने का बहाना ढूँढते रहते हैं सब-के-सब।"
गर्व और आत्मविश्वास के साथ उनकी नजरें बेटे की तरफ घूम गयीं। पता ही नहीं, विश्वास था कि बेटा अभी कहेगा –' नहीं, नहीं, क्या कह रहे हो आप, क्यों अधर्म का भागी बनाते हो मुझे, यह तो मेरे पिताजी हैं।'
पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। बेटा चुपचाप बगलें झांकता रहा। नजरें चुराए इधर-उधर देखता रहा। एक बार भी नहीं स्वीकारा कि, ' नहीं, नौकर नहीं, पिता हैं वे।'
माना कि सरल और अनपढ़ गंवार थे रामखिलावन। मोटा खाते और पहनते थे परन्तु स्वाभिमान के धनी थे। शानशौकत, झूठी मान-मर्यादा की जरा भी कीमत नहीं थी, आँखों में। जिस बेटे के लिए हर दुख-दर्द सहे, हर परिस्थिति से जूझे, आज उसी का यह रवैया...अपने संगी-साथियों के आगे पहचानने तक में तौहीन महसूस कर रहा था! कैसे बर्दाश्त कर पाते वह! ...' लानत है इस नेह और पुत्रमोह पर।... ऐशो-आराम की जिन्दगी पर! आखिर क्या कमी रह गई ... चूक कहां हुई उनसे इसके लालन-पालन और आचार-संस्कार में...! धृतराष्ट्र तो जनम से अंधा था , पर उनकी तो दोनों आंखें थीं फिर वे कैसे इतने अंधे रहे ?' ' आंखों के आगे नाचते काले-पीले धब्बों को परे धकेलता, बिलबिलाता सरल मन कुछ भी तो नहीं जान पा रहा था।
मन आत्मग्लानि से भर चुका था और दर्द पहली बार असह्य था। मानो रेत से बीन कर टूटे-नुकीले कांच खिला दिए गए थे। मानो भरे बाजार अपनों के हाथों नंगे हो चुके थे वे। इसके पहले कि मन बदले या पोते का मुंह देखकर कमजोर पड़ जाएं, आंखें उसी गंदे अंगोछे से पोंछ, बेचैन और उबकाई लेती मनःस्थिति में भी लड़खड़ाते-से ही सही, उठ खड़े हुए वे और अगले पल ही बोरिया-बिस्तर बांध, चुपचाप गांव की ओर वापस चल दिए... इस प्रण के साथ कि ' मरते दम तक बेटे की तो शकल भी नहीं देखेंगे। भले ही लावारिश फेंक दी जाए, पर उनकी लाश को हाथ तक न लगा पाए, वह।'
मेरे एक मित्र को मोटा कहो तो कहता है गाली दे दो, सह लूंगा पर दोबारा मोटा कहा तो नहीं छोडूंगा, तेरा सिर अवश्य फोडूंगा। मोटा होने का श्राप भी बोनस में दूंगा। मैं सोचता हूं मोटा ही तो कहा है, गाली तो नहीं दी है ... लेकिन यह सच है कि आज मोटापा गाली का पर्याय हो गया है। घूमने फिरने और पैदल चलने में एक बुनियादी फर्क है। घूमा फिरा यूं ही जाता है जबकि पैदल चलकर मोटापा घटाने की कोशिश जाती है।
मेरा वह मित्र तबसे बहुत मुदित है जबसे उसने ''जवान बने रहने के लिए खाएं रसगुल्ला`` खबर का नेत्र सेवन किया है। उसका तर्क है कि जवानी के दिनों में फिगर को मेंटेन नहीं किया जाता, वो तो ऐसे ही मेंटेन रहती है। ऐसे एंटी ऑक्सिडेंट हर्बल रसगुल्ले उपलब्ध हो गए हैं जो बीमारियों से भी निजात दिलाएंगे और रसना को रस भी भरपूर देंगे। जवानी भी बरकरार रहेगी। इनके निर्माण के लिए हाई टेक्नालॉजी की दरकार भी नहीं है।
जाधवपुर यूनिवर्सिटी के फूड डिपार्टमेंट ने ऐसा खास उपयोगी रसगुल्ला तैयार कर लिया है जिससे उम्र बढ़ने पर भी आंखों की रोशनी कायम रहेगी, कैंसर, कुपोषण, हाई कॉलेस्टॉल और फेफड़ों की बीमारी शरीर को छू तक नहीं पाएंगी बशर्ते आप हर्बल रसगुल्लों का सेवन करने के लिए तैयार रहें। विटामिन कैप्सूल और गोलियों से सस्ते एंटी ऑक्सीडेंट मिली खाद्य सामग्री विदेशों में प्रचुरता से उपलब्ध है। अब भारत में मिलने की शुरूआत भी हो चुकी है। तो नया नारा है रसगुल्ला खाइए और मोटापा भगाइए।
मोटापे की वजहें हैं बेफिक्री और बेफिक्री से ठूंसे जाना। जो मिला जब मिला सब ठूंस लिया। जो किया धरा, वो गपागप ठूंसने का लजीज कार्यक्रम रहा। दुनिया गोल स्वाद अनमोल का नारा इन्हें सदा सुहाना लगता है। ऐसे लोग स्वाद के गुलाम होते हैं। पेट में कब गया, कितना गया, क्या गया कि तनिक भी परवाह नहीं। जितना चलने पर वस्तु मुंह में समा जाए, उतना चलेंगे। फिर चलने पर ब्रेक और जीभ पर नो ब्रेक क्योकि जीभ अनब्रेकेवल रही है। चाहे जिस तरफ घुमा फिरा लहरा लो। सिर्फ फिसलती है और सब कुछ निगलती उगलती चलती है।
जिव्हा के कारण मोटापा बेबारिश के भी पनपता फलता है। चलते पैर नहीं इसलिए समूची जिम्मेदारी पैरों की। जीभ चाहे कितनी ही चला लो, इससे चाट लो, चूस लो, चबा लो पर मोटापा इंक्रीज होगा। पैदल चले नहीं तो खामख्वाह मोटापे की बुराई की सारी बदनामी पैरों के सिर। वैसे पैरों के सिर नहीं, सिरे हुआ करते हैं।
जीभ बेसिर पैर की सब बखान देगी। किसी को मोटा कह दे तो चांटा पड़े गाल पर और मचेगा बवाल। किसी पर थूकने पर आ जाये तो उसका घूँसा पड़ेगा थोबड़े पर और जबाड़ा बाहर। जिसको एक खास अंदाज में दिखा भर दो, उसके खून में आगरा की आग लग जाएगी। जीभ वाहन के ड्राइवर के माफिक एकदम गायब हो जाएगी। जब नजर आएगी तो खूब चिल्लाएगी। दर्द कहीं भी हो, चिल्लाती जीभ ही है। मानो उसे कितना प्रताड़ित किया जा रहा है। यह भी रस खींचने का उपक्रम भर है। जबकि आप भी जानते हैं कि ३२ गार्ड इसकी रखवाली के लिए सदा चौकस रहते हैं। इससे कब निजात मिलने वाली है।
पैदल चलने से सिर्फ रोग ही दूर नहीं हुआ करते। मोटापा भी दूर हुआ करता है। इसके भी अपवाद हैं। मेरे दूसरे मित्र रोज सुबह घड़ी देखकर आधा घंटे पैदल चलते थे कि रोग दूर होगा। पर रोग क्या दूर होता, उनके तो पैर दर्द करने लग गए। उनके दोनों पैर सूज सूज कर सूजनशाह बन गए। अब डॉक्टर के पास जाने के लिए भी रिक्शे या ऑटो के मोहताज हो गए हैं। मेरे मोटे मित्र को पूरा विश्वास है कि अब वे चाहे पैदल न चलें, बस हर्बल रसगुल्ले खाते रहें तो उनका मोटापा छूमंतर हो जाएगा।
जिव्हा की तो दास्तां ही निराली है जितना मर्जी चाट लेगी, चूस लेगी, उगल देगी, थूक देगी। इंसान रस की चाह में मोटापे के टॉप गिअर में पहुंच जाएगा और ये बारंबार कहेगी रस ना। हर्बल रसगुल्ले खाओ, रस लो और बस भी न करो और रसना बारंबार बस तलाशती नजर आएगी। जवान बने रहने का यह नायाब नुस्खा न जाने कितने शरीर के धनी मोटे लोगों को प्रचुर लाभ पहुंचाएगा, इस पर रिसर्च की जा सकती है। मेरे मित्र मुझे ढूंढते इधर आ निकलें, इसलिए मैं तो पतली गली पकड़ निकलता हूं।
जैसे ही आप व्यास नदी को अपनी बगल में कुलाचें मारते देखते हैं अंतहीनता का एक हृदयस्पर्शी भाव आपको एक मधुर गीत की भांति गुनगुनाता है। मनाली की ओर बढ़ते हुए जैसे ही आप मंडी से आगे बढ़ते हैं, यह न जाने कहां से प्रकट होती है। यह आपका साथ कभी नही छोड़ती और आपको हिम के समान धवल प्रकृति के अंचल में ले जाती है।ब्यास गोल चट्टानों के ऊपर से बहती हुई एक प्रश्नवाची मुद्रा में पर्वत के आधार तक बहती रहती है। कभी नदी का पाट चौड़ा होता है तो आप जलराशि की शांत सतह को देख सकते हैं जिसके नीचे तेज बहाव दृष्टिगोचर होता है। कभी कभार टेढे मेढे पर्वत पाट को संकरा कर देते हैं और यह एक दूसरे के बेहद करीब आ जाते हैं। फिर एक तंग घाटी व्यास को अवरुद्ध कर देती है और यह एक उफनती धारा में बदल जाती है। मार्ग के दोनों ओर सेव, बादाम और शहतूत के पुष्प गुच्छ अपने विभिन्न रंगों को आपकी नजरों और अप्रैल के सूने आकाश में बिखरा देते हैं।
सड़क नदी के तट के करीब से गुजरती है और आप नदी की गुनगुनाहट सुन सकते हैं। मौसम अपना वादा भूल जाता है और उसमें सहसा परिवर्तन दिखाई देता है। पिघळती हुई हिम प्रचुर मात्रा में जल में परिवर्तित होकर सड़क के ऊपर से एक अकड़ भरे जुलूस की भांति गुजरती है। आप बिना जाने-बूझे एक छोटी नदी को पार कर जाते हैं। यह सड़क वैसी ही बेवफा है जैसी एक रखैल।
ब्रेक खराब हो जाने के कारण हमें मरम्मत के लिए आट में रुकना पड़ा। इसके कारण थोड़ी देर बाद रात के आगमन के संकेत दिखाई देने लगे।विशाल पर्वतों का दृश्य जो निगाहों के समान सीधा बढ़ता है वास्तव में प्रभावशाली लगता है। अनेक गुफाएँ और वृत्ताकार वृक्ष धीरे-धीरे अँधेरे के आगोश में खोते जाते हैं। जब हम आगे बढ़े तो एक रोयेदार पूंछ और छरहरे टांगों वाली चालाक लोमड़ी हमारा रास्ता काट गई।
चांदनी से नहा कर हिमाच्छादित शिखर चांदी के समान दमकते हैं। चंद्रमा की मृदु किरणें पर्वत के जिस भाग पर पड़ती हैं वह उनमें भीग कर एक विचित्र आभा से आलोकित हो उठता है। छिपे हुए भाग अँधियारी परछांई की भांति दिखते हैं और एक रहस्यमयी आकर्षण उत्पन्न करते हैं। ब्रेक का खराब होना वाकई में वरदान सिद्ध हुआ क्योंकि तभी हमें हिम की धवल छवि के सौंदर्य का रसपान करने को मिला। अपने गंतव्य स्थल पर पहुंचने से पूर्व ही हमने व्यास नदी के तट पर डेरा डाल दिया। बहते हुए जल की कलकल ने रास्ते की थकान को उतार दिया।
मनाली की सुबह अलौकिक होती है-आँखें खोलने पर आपके समक्ष एक अद्भुत नजारा होता है। चारो तरफ हिमाच्छादित शिखरों वाले विशाल भव्य पर्वत वनदेवता की भांति खड़े दिखाई देते हैं। दूर उस स्थान पर जहां सोलंग और रोहतांग की घाटियां आरंभ होती हैं धौलाकार पर्वत हिम से ढके हुए दिखते हैं। प्रीनी हिमनद और इसकी एकाकी हमता चोटी तथा ढलाने क्रीम से ढकी सतह की भांति लगती है। समस्त क्षेत्र एक पात्र की भांति लगता है। जिसे मानो दोनों हथेलियां जोड़कर बनाया गया हो। इस आनंद से परिपूर्ण पात्र में मनाली शहर बसा है और जो अब ब्यास के दोनों ओर भी उग गया है। इस्पात के नाजुक पुल से जब आप गुजरते हैं तो वह चरमराता है और ऐसा लगता है कि मानो वह बहती बयार, गड़गड़ाती नदी और वर्षा की बूंदों की टपटपाहट को प्रतिध्वनित कर रहा हो। वैसे वह इस शहर के विभिन्न भागों को जोड़े रखने का काम करता है।
शांत बैठिए और चारों तरफ बिखरे सौंदर्य का निगाहों से रसपान कीजिए। पर्वत के सामने जमी हुई नदी को ढूंढ निकालने का आनंद उठाइये। बर्फीली हवा ने इसके बहाव को अवरुद्ध करके इसे आगे बढ़ने से रोक दिया है। यह पर्वत की दृढ़ता से मंत्रमुग्ध होकर ढहर सी गयी लगती है। आपकी नजरें घूमती हुई पर्वतों को सहलाती हैं और उनपर सब तरफ खड़े चीड़ के वृक्षों के बीच जमी हिम की चादरों का आनंद उठाती हैं और सहसा उन्हें पर्वतों से झूमता लहराता जल प्रपात दिखाई देता है। पर्वतों के शिखरों से उत्पन्न निर्मलतम वरदान। दूर से आप इसकी आवाज नहीं सुन सकते लेकिन जब आप इसे इतनी ऊँचाई से उतरते हुए देखते हैं तब आपको इसकी प्रचंडता का अहसास होता है।
यदि मौसम सर्द हो जाता है और आप कंपकपी महसूस करते हैं तो यकीन मानिए आपको दूर ऊंचाई पर हिमपात देखने का अवसर मिलेगा। चीड़ के हरे भरे पेड़ों से ढके पर्वत धवल होने लगते हैं। रूई के फाहों के समान गिरती हिम हर संभव वस्तु और दरारों को हिम की चादर से ढक देती है। हरियाली घटती जाती है और धवलता बढ़ती जाती है। यह प्रकिया वास्तव में मंत्रमुग्धकारी है।
मनाली शहर का दृश्य आपके भीतर आनंद और अवसाद दोनों की अनुभूति कर देता है। शहर की सुंदरता का आनंद और भंगुरता की पीड़ा साथ-साथ उत्पन्न होती है। यह कल्पना उंची उड़ान भरती है और आप स्वप्न जगत में खो जाते हैं। ऐसा लगता है मानो आप हिम रानी को परिधान धारण करते हुए देख रहे हैं। जब वह अपने अमूल्य आभूषणों को धारण करने लगती है तो सहसा उसकी आभूषण पेटिका खुल जाती है और उसके सुंदर मोती, नीलम, हीरे, पुखराज, स्वर्ण कंठहार सभी इस आनंद से परिपूर्ण घाटी में बिखर जाते हैं। ब्यास के तट और आकाश की ओर बांहें फैलाते हुए पर्वतों में जहां जहां यह आभूषण गिरे वह स्थान जगमगा उठे।
चमचमाती हिम को स्पर्ष किए बगैर आप यहां से लौट नहीं सकते। ग्रीष्म के दौरान हिम की मात्रा घट जाती है। लेकिन फिर भी आपको मनाली से 12 कि.मी. दूर केयलोग मार्ग पर एक एक मनोरम गांव कोठी से कुछ ही दूर हिम को स्पर्श करने का अवसर मिल सकता है। शीतकाल के दौरान हिम समस्त मनाली को अपने आगोश में ले लेती है। हिम से ढकी ढलानों का आप आनंद उठा सकते हैं। इन पर एक बच्चे के समान फिसलने का आनंद अद्भुत है। चढ़ाई चढ़ने में जिनको कठिनाई होती है उन्हें विकराल सी दिखने वाली याक की सवारी मिलती है जबकि चुस्त दुरुस्त लोग चपल गति से इन ऊंचाइयों का सफर तय करते हैं।
अब तक आप सर्दी से किटकिटाने लगे होंगे। वापसी में वशिष्ठ गांव में ठहरिये जहां गंधक के गर्म सोते हैं। इनमें स्नान करने से आपके शरीर में पुनः ताजगी और उष्मा का संचार होने लगेगा। श्रद्धालुओं के लिए ब्यास के दूसरे तट पर हडिम्बा मंदिर है। हडिम्बा महाभारत के धर्मग्रन्थ में वर्णित भीम की पत्नी थी। यह मंदिर 1553 ईसवी का है।
कुल्लु के विशेष शालों की खरीद के उत्सुक लोगों को माल पर शापिंग करने से फायदा हो सकता है। इस क्षेत्र की अनगिनत सुन्दर स्त्रियां इनको हाथकरखों पर बुनती हैं। पर्वतों, मंदिरों, बागों पुष्पों से जुड़ी उनकी धारणाएँ इन बुनाइयों में दिखाई देती हैं। उनके विचारों के इन्द्रधनुषी रंग और हृदय से उपजी भावनाएं इन कलावस्तुओं में चहुंओर दिखाई देती है।
यदि आप ट्रेकिंग के शौकीन हैं तो कुछ समय और यहां रुकिए। मनाली वह स्थान है जहां आपके सशक्त पैरों और बलशाली फेफड़ों का परीक्षण होता है। मनाली से रानी सुई 420 0 मीटर, लामा डुघ से (11कि.मी., 2 दिन) मनाली से भुन्चर, (रूमसु, चंद्रखनी, मलाना, कसोल, जरी से होकर 74 कि. मी., 7 दिन और चंद्रखनी पर 3650 मीटर की ऊंचाई को नापते हुए भी) और मनाली से केलोंग (हमता, चंद्रताल और बरालछा दर्रों से होकर) आदि अनेक ट्रेकिंग मार्ग हैं जो आपको जीवन पर्यंत याद रहेंगे। प्रकृति की मनोरमता और विराटता का इतना घनिष्ठ संसर्ग आपको शायद ही कहीं अनुभव करने को मिलेगा।
मनाली की धौलाधर पर्वत श्रंखला के सौंदर्य से आप शायद ही कभी तृप्त हो पायें। दिन के विभिन्न पहरों के साथ साथ यह विभिन्न छटाएँ बिखेरती हैं। सूर्योदय पर गुलाबी रंगत, दोपहर में चटकीली आभा, संध्याकाल में मंडराते बादल और फिर हिमाच्छादित शिखरों के पीछे से उभरते प्रेमासिक्त चंद्रमा की किरणें शिथिल दिलोदिमाग को असीम शांति से सिक्त कर देती हैं।
लंका विजय के बाद जब भगवान श्री राम सीता जी व लक्ष्मण सहित अयोध्या आ गये, अयोध्या में राजकाज सही चल रहा था लेकिन राजा राम को शंका थी कि प्रजा उनके बारे में न जाने क्या-क्या धारणा रखती है। इसलिए उन्हौंने अपने कुछ दूत लोगों की बातें सुनने के लिए लगा रखे थे। एक दिन एक दूत ने सूचना दी कि एक धोबी अपनी पत्नी को ड़ांट रहा था और कह रहा था कि तू रातभर कहां रही? जा मेरे घर से निकल जा। धोबी कह रहा था कि मैं तेरे लिए कोई राम थोड़े ही हूं जो रावण के घर रही सीता को दुबारा अपने घर रख लूँ। दूत की बात सुनकर राजा राम को काफी दु:ख हुआ। लोकलाज के भय से राम ने सीता को दुबारा त्यागने का मन बनाया और लक्ष्मण को बुलाकर सीता को वन में छोड़ आने का हुक्म दिया। बड़े भाई श्री राम की आज्ञा से लक्ष्मण जी सीता माता को रथ पर बिठाकर दूर जंगल में छोड़ आये। कहते हैं कि लक्ष्मण जी सीता जी को उत्तराखण्ड देवभूमि के ऋर्षिकेश से आगे तपोवन में छोड़कर चले गये। जिस स्थान पर लक्ष्मण जी ने सीता को विदा किया था वह स्थान देव प्रयाग से ४ किलोमीटर आगे पुराने बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित है। तब से इस गांव का नाम सीता विदा पड़ गया। यहां से चार किलोमीटर आगे चलने पर वह स्थान आता है जहां सीता माता जी ने अपनी कुटिया बनाई थी। उस स्थान को सीता कुटी कहते हैं। इस स्थान को सीता सैंण भी कहा जाता है। यहां के लोग कालान्तर में इस स्थान को छोड़कर यहां से काफी ऊपर जाकर बस गये और यहां के बावुलकर लोग सीता जी की मूर्ति को अपने गांव मुछियाली ले गये। वहां पर सीता जी का मंदिर बनाकर आज भी पूजा पाठ होता है। कुछ समय बाद सीता जी अपनी कुटी छोड़कर बाल्मीकि ऋर्षि के आश्रम आधुनिक कोट महादेव चली गई। त्रेता युग में रावण, कुम्भकरण का वध करने के पश्चात कुछ वर्ष अयोध्या में राज्य करके राम ब्रह्म हत्या के दोष निवारणार्थ सीता जी, लक्ष्मण जी सहित देवप्रयाग में अलकनन्दा भागीरथी के संगम पर तपस्या करने आये थे। इस संबध में केदारखण्ड में लिखा है कि:-
यत्र ने जान्हवीं साक्षादल कनदा समन्विता। यत्र सम: स्वयं साक्षात्स सीतश्च सलक्ष्मण।। सममनेन तीर्थेन भूतो न भविष्यति। केदार. १३९-३५-५५
जहां गंगा जी का अलकनन्दा से संगम हुआ है और सीता-लक्ष्मण सहित श्री रामचन्द्र जी निवास करते हैं। देवप्रयाग के उस तीर्थ के समान न तो कोई तीर्थ हुआ और न होगा।
पुनर्देवप्रयागे यत्रास्ते देव भूसुर:। आहयो भगवान विष्णु राम-रूपतामक: स्वयम्।। केदार. १५०-८०-८१
केदारखण्ड ;अध्याय १५८-५४-५५द्ध में भी दशरथात्मज रामचन्द्र जी का लक्ष्मण सहित देवप्रयाग आने का उल्लेख है। अध्याय १६२-५० में भी रामचन्द्र जी के देवप्रयाग आने और विश्वेश्वर लिंग की स्थापना करने का उल्लेख है।
राम भूत्वा महाभाग गतो देवप्रयागके। विश्वेश्वरे शिवे स्थाप्य पूजियित्वा यथाविधि।।
देवप्रयाग से आगे श्रीनगर में रामचन्द्र जी द्वारा प्रतिदिन सहस्त्र कमल पुष्पों से कमलेश्वर महादेव जी की पूजा करने का वर्णन है। रामायण में सीता जी के दूसरे वनवास के समय में रामचन्द्र जी के आदेशानुसार लक्ष्मण द्वारा सीता जी को ऋषियों के तपोवन में छोड़ आने का वर्णन मिलता है गढ़वाल में आज भी दो स्थानों का नाम तपोवन है एक जोशीमठ से सात मील उत्तर में नीति मार्ग पर तथा दूसरा ऋषिकेश के निकट तपोवन है।केदारखण्ड के १५०-८७ और १४९-३५ में रामचन्द्र जी का सीता और लक्ष्मण जी सहित देवप्रयाग पधारने का वर्णन मिलता है।
देव प्रयाग में रघुनाथ जी का प्राचीन मंदिर है। वहां से दो-तीन मील आगे श्रीनगर मार्ग पर सीता कुटी, विदा कुटी स्थान है। सीता कुटी में सीता जी का प्राचीन मंदिर है। मालूम होता है कि देवप्रयाग में श्री रामचन्द्र जी ने सीता कुटी-विदा कुटी तक आकर किसी उपयुक्त ऋषि आश्रम में सीता जी को छोड़ आने के लिए लक्ष्मण जी के साथ विदा किया था। सीताकुटी-विदाकुटी से कुछ मील आगे मुछयाली गांव में सीता जी का मंदिर है। मुछियाली गांव से ३ मील ऊपर सीतावनस्यूं की ओर सल्ड गांव में भी सीता जी का प्राचीन मंदिर है। सल्ड गांव से ४ मील आगे एक परम रमणीक समतल उपत्यका है, जिसका नाम सीता जी के नाम पर सीतावनस्यूं है। स्मरण रहे कि गढ़वाल की अनेक पटि्यों के नामकरण उनके प्रभावशाली सामन्तो के नाम पर किये गये हैं, यथा कफोलस्यूं, रावतस्यूं, असवालस्यूं, ढौंड़ियालस्यूं, आदि परन्तु उन्हौंने अपनी इस पट्टी का नाम सीतावनस्यूं सीता जी के नाम पर रखा है जिससे कि इस क्षेत्र में सीता जी के प्राचीन ऐतिहासिक सम्बन्ध की पुष्टि हो जाती है। यहां पर सीतावनस्यूं के मध्य कोट महादेव में तीन नदियों के संगम पर बाल्मीकि ऋषि का आश्रम था। जिसकी प्रतिमायें आज भी यहां के निकटम फलस्वाड़ी गांव में हैं। महाकवि तुलसीदास जी ने भी रघुवंश में वर्णित जिस तपोवन में सीता त्याग किया गया था उस तपोवन की भागीरथी तीर पर होने की पुष्टि की है। यही इसी बाल्मीकि आश्रम में सीता जी ने दो जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। जिनका नाम लव-कुश पड़ा। यहीं पर राजा राम के अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को लव और कुश ने पकड़ लिया था और राजा राम की सेना को परास्त कर स्वंय राम को यहां आने के लिए विवश कर दिया था। जब राजा राम अपने घोड़े को छुड़ाने यहां आये तो लव और कुश उनसे काफी तर्क-वितर्क करने लगे। कहते हैं कि बात को बढ़ता देख सीता माता ने लव-कुश से कहा कि बेटा यही श्री राम हैं और ये तुम्हारे पिता हैं। सीता की बात सुनकर लव-कुश तो मान गये कि श्री राम हमारे पिता हैं। लेकिन श्री राम को फिर भी शंका हुई कि ये दोनो बालक मेरे ही पुत्र हैं। बाल्मीकि ऋर्षि के समझाने पर भी जब श्री राम को विश्वास नही हुआ तो श्री राम ने सीता माता को पुन: प्रमाण देने के लिए कहा। सीता माता ने धरती माता से विनती की कि हे! धरती माता मैं जिन्दगी भर मुसीबतों का सामना करते हुए अपने पतिव्रता धर्म को निभा रही हूँ आज तो मुझे राज महलों में होना चाहिए था लेकिन मैं तपोवन में इन श्री राम की धरोहर इन बच्चों का पालन पोषण कर रही हूँ। मैं जब रावण की कैद में थी तो तब श्री राम ने मेरे सतीत्व की अग्नि परीक्षा ली थी लेकिन आज फिर श्री राम को मुझपर विश्वास नही हो रहा है। इसलिए हे माता अब मेरे पास प्रमाण देने के सिवाय कुछ भी बाकी नहीं रह गया है। यदि मैं सच्ची पतिव्रता धर्म निभा रही हूँ तो अब आप मुझे अपनी गोद में ले लीजिये। बस फिर क्या था अचानक जोरदार आवाज के से साथ धरती फट गई और सीता माता खड़े-खड़े पृथ्वी में धंसने लगी रामचन्द्र जी ने सीता जी को ऊपर खींचने की कोशिश की लेकिन उनके हाथ सिर्फ सीता जी के बाल ही आये । तब से अब तक यहां पर सीता जी की मन इच्छा पूर्ति के कारण मनसार का मेला लगता है। यह घटना जिला पौड़ी गढ़वाल के सितोनस्यूं पट्टी के कोट महादेव के पास जिस खेत में घटी थी वह कोरसाड़ा गांव का है । फलस्वाड़ी के भट्ट लोग इसके पुजारी हैं। यह मेला कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है खेत में एक गोल पत्थर ;लोड़ीद्ध तथा बाबड़ घास की १६० चोटियां बनाकर पूजा होती है बाद में बाबड़ घास को ही प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। क्योंकि राम के हाथों में सीता जी के बाल ही आये थे। अनेकों नर और नारी अपने मनोती के लिए इस मनसार मेले में आते हैं। यहां आज भी माता सीता कई लोगों की मनोती पूरी करती है। सीतावनस्यूं के देवल गांव में लक्ष्मण जी के तेरह छोट-छोटे मंदिरों से घिरा हुआ एक विशाल प्रचीन मंदिर है। जिसके निकट एक विस्तृत भू-भाग में प्रतिवर्ष स्थानीय जनता द्वारा सदियों से सीता जी के पृथ्वी प्रवेश की घटना की स्मृति में दिवाली के बाद हर-बोधनी एकादशी के दूसरे दिन एक बड़ा मेला लगता है। जिसमें हजारों स्त्री-पुरूष सम्मिलित होते हैं सीता जी व लक्ष्मण जी आज भी इस क्षेत्र की जनता के आराध्य हैं। प्रचलित गाथा के अनुसार अश्वमेघ यज्ञ में सीता जी की कुशलता की सूचना पाकर रामचन्द्र जी लक्ष्मण को लेकर जो सीता त्याग के स्थान से परिचित थे, व कुछ अनुचरों सहित इस ऋषि आश्रम में पहुंचे। महर्षि बाल्मीकि ने सीता जी को निकटस्थ गांव में तपस्विनियों के घर रख छोड़ा था, राजा राम का आदेश पाकर गांव के लोगों ने सीता जी को ससम्मान , सजा-संवारकर गाजे-बाजों के साथ बेटी की तरह बिदाई की । स्थानीय परम्परानुसार दूण-कंण्डी के साथ ससम्मान रामचन्द्र जी के समक्ष एक विस्तृत खेत के मध्य में जहां सम्भवत: श्री रामचन्द्र जी लक्ष्मण जी सहित ठहरे हुए थे, तथा जहां पर स्थानीय लोक गाथानुसार राम के कटुव्यवहार से सीता जी पृथ्वी में प्रविष्ट हुयी थीं प्रस्तुत किया। आज भी जहां पर सीता जी धरती में समाई थी वहां पर कुरसाड़ा गांव वाले सीता जी के नाम पर एक गुड़िया बनाकर बाबड़ की १६० चोटियां बनाकर गुड़िया का त्रैणीबन्धन करते हैं तथा स्थानीय दहेज दूण-कण्डी के साथ जैसे यहां मायके से ससुराल जाते समय अपनी बेटियों को बिदा करते हैं उसी प्रकार से सीता जी को विदा करते हैं। गुड़िया को कन्धों पर उठाकर सारे गाजे-बाजे सहित खेत के मध्य में स्थित समाधि स्थल में छोड़ देते हैं। और दूसरी ओर गांव से लक्ष्मण मंदिर से लोग गाजे-बाजों के साथ फरस्वाड़ी के खेत में आते हैं। और पूजा पाठ के बाद सीता जी को धरती में समा देते हैं तो उसके सिर के बाबड़ रूपी घास के बालों को प्रसाद के रूप में बांट देते हैं। जिस क्षेत्र में सीता जी की समाधि स्थल है उसमें सदैव खेती होती है। खेत की लम्बाई-चौड़ाई इतनी है कि उसमें राजा राम ससैन्य ठहर सकते थे। यहां पर कोट महादेव के पास तीन नदियां लक्ष्मण गाड़, सीता गाड़ और बाल्मीकि गाड़ नाम की नदियां कोटमहादेव में मिलकर त्रिवेणी बनाती हैं। साथ ही नजदीक पर ही बाल्मीकि मंदिर, लक्ष्मण मंदिर और सीता मंदिर त्रेतायुग की याद दिलाते हैं। यहां पर लगने वाले मेले के प्रारम्भ में लक्ष्मण जी के मंदिर से लक्ष्मण जी की विशाल सेनाएँ रंगीन ध्वजायें फहराती हुई आती हैं। सात पुरोहित बिना हथियार से उस समाधिस्थल से जो उत्सव के बाद किसानों द्वारा हल से हम वार हो जाता है, मिट्टी हटा देते हैं। पृथ्वी गर्भ में लगभग एक हाथ नीचे जब एक छोटी सी लिंगाकार शिला प्राप्त होती है तो खुदाई बन्द कर पुरोहित समाधिस्थल की विधिवत पूजा करते हैं। पृथ्वी गर्भ में क्या रहस्य है यह अविदित है। किंवदन्ति है कि किसी शंकालु ने उसे पूरी तरह से खोद कर देखने का दु:स्साह किया परन्तु उसकी तुरन्त मृत्यु हो गई। यहां पर सीता जी की गुड़िया को सादर समर्पित करने के बाद सांयकाल को मेला समाप्त हो जाता है। और यात्रियों सहित लक्ष्मण मंदिर की रंगीन ध्वजायें वापस लक्ष्मण मंदिर को चली जाती हैं। उक्त तथ्यों के आधार पर यह बात साबित होती है कि जगत माता सीता जी को जब श्री राम ने लोक मर्यादा का निर्वहन करते हुए दुबारा वन में भेजा था तो उन्हें यहीं उत्तराखण्ड में ही छोड़ा गया था। सीता जी से संबधित कई लोक गीत और लोकमान्यतायें यहां प्रचलित हैं। उत्तराखण्ड भूमि जो कि सदियों से देव भूमि के नाम से जानी जाती है यहां पर भगवान श्री राम से लेकर पांचों पाण्डव अपनी मुक्ति के लिए आये थे। महाराजा दशरथ के नाम से भी देवप्रयाग के पास दशरथ पर्वत है जहां के बारे में कहा जाता है कि महाराजा दशरथ ने श्रवण कुमार को यहीं शब्द भेदी तीर से मारा था। यहीं दशरथ पर्वत पर श्रवण मंगरी देव प्रयाग से कुछ ही दूरी पर आज भी है। कहते हैं कि यहीं पर श्रवण अपने प्यासे माता-पिता के लिए पानी लेने गये थे। उत्तराखण्ड भूमि धन्य है जहां पर समय-समय पर भगवत जनों के चरण पड़े हैं। यहां की कण-कण में भारतीयता के दर्शन होते हैं। यही वह भूमि है जहां माता सीता ने अपने को धरती माता की गोद में सर्मपित किया।
***
धर्मशाला में स्थित है भगवान भागसूनाथ का मन्दिर।
उत्तराखण्ड सहित पूरा हिमालयी क्षेत्र सदियों से ऋर्षिमुनियों तथा शान्ति की तलाश में भटक रहे लोगों के लिए जिज्ञासा का केन्द्र रहा है। जिस प्रकार से उत्तराखण्ड में बद्री-केदार क्षेत्र तीर्थों, देवालयों की गरिमा के कारण पर्यटकों के लिए आकर्षक बना हुआ है तथा यहां के कण-कण में भगवान का वास माना गया है उसी प्रकार से ही हिमाचल प्रदेश में भी सैकड़ों मंदिर तथा तीर्थ हैं जो मानव कल्याण तथा धर्म ध्वजा को तत्पर हैं। सदियों से ही हिमालय को देवताओं का वास माना जाता रहा है हिमाचल प्रदेश भी उत्तराखण्ड की तरह ही धर्मपरायण तथा आध्यात्मिक साधना का केन्द्र रहा है। धर्मशाला नगरी के समीप धौलाधार पर्वतमाला के अंचल में अनेक तीर्थों और मंदिरों की भरमार यात्रियों के उत्साह का कारण बनी हुई है। कहा जाता है कि नागवंश के देवी-देवताओं का कभी इस भू-भाग पर साम्राज्य हुआ करता था। आज भी यह क्षेत्र नागभूमि के नाम से जाना जाता है।
भगवान भागसूनाथ मंदिर, धर्मशाला धौलाधार
धर्मशाला के करीब ही धौलाधार पर्वत पर स्थित भगवान शिव का भागसूनाग मंदिर अत्यंत प्राचीन स्थानों में से एक है। जिसकी कहानी प्राचीन ग्रथों में इस प्रकार कही गई है। कहाजाता है कि द्वापर युग में राजस्थान के असुरों का राजा भागसू हुआ करता था। उसकी राजधानी अजमेर में थी। एक बार उसके राज्य में कई महीनों तक वर्षा नही हुई जिस कारण भंयकर सूखा पड़ गया। लोगों की फसलें सूख गई तथा प्राणी पानी के लिए तड़पने लगे। प्रजा में हा-हाकार मच गया तथा लोग राजा से निवदेन करने लगे कि जैसा भी हो तत्काल कहीं से पानी का प्रबंध करें अन्यथा यहां जीवन समाप्त हुआ जाता है। अगर शीघ्र ही पानी का प्रबन्ध नही हुआ तो हमारे पास यहां से पलायन करने के अलावा कुछ भी उपाय नही रहेगा। राजा प्रजा की परेशानी जानता था इसलिए दिनरात इसी उधेडबुन में परेशान रहने लगा कि जनता को कैसे पानी उपलब्ध कराया जाए?
राजा ने अपनी प्रजा से कहा कि तुम राज्य में ही रूको तथा मैं पानी की तलाश में जा रहा हूँ, अब मैं पानी का प्रबन्ध करके लौटूंगा। ऐसा कहकर राजा पानी की तलाश में निकल पड़ा। एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश को लांघता हुआ राजा न जाने कब नागों के प्रदेश में आ पहुँचा। यहां नागों के प्रदेश नागलोक में एक पहाड़ी के समीप वर्तमान भागसूनाग के समीप वाले टीले पर धौलाधार पर्वतमाला के बीच अनेक सुन्दर सरोवर तथा जलकुण्ड विद्यमान थे। वह यहां से ड़ल झील जो कि पहाड़ की चोटी पर १८००० फुट की दूरी पर था वहां पहुंचा। राजा यहां की अपार जलराशि को देखकर मोहित हो गया। उसने प्रण किया कि जैसा भी हो यहीं से जल लेकर जायेगा। वह दैत्य राजा मायवी तथा जादूगर तो था ही, यहां उसे एक झील दिखाई दी जो कि अथाह गहरी और नीले जल से भरी हुई थी तथा दो किलोमीटर की परिधि में फैली हुई थी। इस झील को ड़ल झील कहते थे। उस राजा ने इस झील का समूचा जल अपनी शक्ति के द्वारा अपने कमण्डल में भर दिया। उस स्थान से कमण्डल लेकर वह वापस अपने राज्य की ओर चलने लगा लेकिन रास्ते में उसे रात हो गई और वह यहां पर विश्राम के लिए रूक गया। उधर जब नागों ने देखा कि उनका सरोवर खाली पड़ा हुआ है तथा झील से किसी मानव के पदचिन्हौं की छाप भी दिखाई दे रही है तो वे उन पदचिन्हों की छाप के सहारे उस मानव की खाज में निकल पड़े जिसने उनके निवास को सुखा दिया था। नाग देवता पता करते करते उसी स्थान पर आ पहुंचे जहां राजा भागसू आराम कर रहा था। तब इसी स्थान पर भागसू के साथ नागों का युद्ध हुआ। उस युद्ध में कमंड़ल का जल नीचे गिर गया, जो तब से आज तक निरंतर जलधाराओं के रूप में प्रवाहित होता चला आ रहा है। यहीं इसी स्थान पर आज भी जलधाराओं के जल को चार कुण्डों में भरा गया है और इसी स्थान पर मंदिर बनाया गया है। युद्ध में नागों ने भागसू को परास्त कर दिया । वह समझ गया कि नाग भी भगवान शिव के ही स्वरूप हैं। उसने नागों से अपनी पराजय को स्वीकारते हुए कहा कि हे! देवता स्वरूप नागों मैंने आपके जल को चुराया है अत: अब मेरा अन्त निश्चित है। किन्तु अपनी प्रजा के हित में मुझे ऐसा करना पड़ा है, मेरे राज्य में भंयकर सूखा पडा हुआ है प्राणी त्राहि-त्राहि कर रहे हैं इसलिए मैं आपसे क्षमा प्रार्थना करता हूँ।
भागसू की इस विनम्र प्रार्थना से नागदेव शंकर शान्त हो गये और उसकी इच्छा के बारे में जानना चाहा। तब असुर राज भागसू ने कहा कि हे! प्रभो, यदि आप कृपा करें तो मेरी अन्तिम इच्छा यही है कि मेरे राज्य में पानी पहुँच जाए, जिससे वहां प्रजा की रक्षा हो सके और आप स्वयं शिव हैं इसलिए मैं चाहता हूं कि आपके हाथों मेरी मुक्ति हो, इसलिए मैं चाहता हूं कि आपके नाम के साथ-साथ मेरा भी नाम इस संसार में अमर रहे, ऐसा कुछ उपाय कीजिए । ऐसा कहने के बाद भगासू ने अपने प्राण त्याग दिये।
धौलागिरि पर्वत से गिरता जलप्रपात
इसके बाद नागदेव ने भागसू के राज्य में वर्षा की और जल के अनेक श्रोत बहा दिये। भागसू के प्रदेश की जनता जो पानी की कमी से बिलख रही थी उसे पानी मिल गया और भागसू को भगवान की कृपा से मुक्ति मिल गई। नागस्वरूप सदाशिव ने फिर अपने नाम के साथ उसका नाम जोड़कर उसे सदा-सदा के लिए अमरत्व प्रदान कर दिया। तभी से इस स्थान का नाम भागसूनाग तीर्थ क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध हुआ। नागदेव अपने आराध्य शिव का रूप धारण कर यहां प्रकट हुए। इस मंदिर में भगवान शिव का स्वयंभूलिंग भागेश्वर नाम से स्थित हो गया। स्वयंभू का अर्थ है जो स्वयं प्रकट हुआ हो। तब से आज तक इस स्थान में भागसूनाग देवता के रूप में भगवान शिव की पूजा होती है।
कुछ समय बाद यहां के राजा धर्मचन्द को भगवान शिव ने भागेश्वर के रूप में सपने में दर्शन दिये तथा कहा कि मैं इस स्थान पर निवास कर रहा हूँ इसलिए यहां पर मेरा मंदिर बनाया जाए तथा इस स्थान को भागेश्वर के नाम से जाना जाए। कालान्तर में राजा धर्मचन्द के नाम से ही इस नगरी का नाम धर्मशाला पड़ा है। भागसूनाग के ऊपर कुछ दूरी पर धर्मकोट गांव भी राजा धर्मचन्द के नाम से विद्यमान है। इसी ऊंचाई पर राजा धर्मचन्द के किले के अवशेष आज भी मिलते हैं। राजा धर्मचन्द द्वारा ही यहां मंदिर बनवाकर विधिपूर्वक भगवान भागेश्वर की स्थापना की। इस सिद्धपीठ पर निष्ठापूर्वक यदि कोई साधना, उपासना करता है तो भगवान भागसूनाग उसकी सम्पूर्ण मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
मंदिर के नीचे से निकलने वाले इस पवित्र जल में स्नान, पान आदि करने से नाना प्रकार के रोग और ब्याधियां समाप्त हो जाती हैं। यहां वर्षभर दूर-दूर से लोग भगवान भागसूनाथ के दर्शनों के लिए आते हैं। यहां के पानी को चार कुण्डों में बांधा गया है। यहां पर यात्रियों के लिए उचित खानपान तथा ठहरने की व्यवस्था है। मंदिर के साथ ही कुछ पुरानी समाधियां भी हैं कहा जाता है कि इनमें से एक समाधि ऐसे सिद्ध योगी की है, जिसने जीते जी ही समाधि ले ली थी। आज भी भागसूनाथ मंदिर में गरीब तथा यात्रियों के भोजन की व्यवस्था श्रृद्धालु तथा मंदिर कमेटी के सहयोग से होता है तथा धर्म की इस नगरी में भगवान भागसूनाथ की पूजा के साथ तब से आज तक यहां पर पवित्र जल की धारायें अविरल बह रही हैं।
धर्मकोट, धर्मशाला
जब भारत में अंगे्रज थे तब धर्मशाला में कुछ अंग्रेज अफसरों के ही बंगले थे लेकिन आजादी के बाद सन् १९६२ में तिब्बती धर्म गुरू दलईलामा के धर्मशाला आने पर यहां पर चहल पहल शुरू हो गई आज धर्मशाला में होटलों व मकानों की भरमार है यहां पर हर रोज हजारो यात्री तथा पर्यटक आते हैं। भागसूनाग के पास ही अंग्रेज अफसर के नाम पर मेकलोड़गंज के नाम से प्रसिद्ध स्थान भी आज पर्यटन के नक्शे पर अपनी जगह बना चुका है। यहां देशी विदेशी पर्यटकों का आना जाना बना रहता है। साथ ही पयर्टन और पर्वतारोहण का आनन्द लेने वालों में होड़ सी लगी रहती है। यहां धौलधार की हिमच्छादित पर्वत चोटियां जो कि मीलों तक फैली हुई हैं वे पर्यटकों तथा पर्वतारोहियों के लिए वरदान साबित हो रही है। भागसूनाग में दूर पहाडियों पर गिरते झरने तथा यहां की मनोरम वदियां पर्यटकों को बरवस ही अपनी ओर आकृष्ट करती हैं। जो यहां एक बार आ जाता है वह यहां से जाना नही चाहता है।
दिल्ली से धर्मशाला भागसूनाग शिव मंदिर की मोटर मार्ग से दूरी लगभग ५८२ किलोमीटर है यहां अपनी गाड़ी से भी आया जा सकता है और बस तथा जीप, कार किराये पर भी मिल सकती हैं। यहां पहुँचने के लिए दिल्ली से चण्डीगढ, होशियारपुर, कांगड़ा होते हुए पहुंचा जा सकता है।
भगवान भागसूनाग के बारे में कहा जाता है कि जो भी यहां पर अपनी मन्नत लेकर आते हैं और यहां भगवान भागसूनाग की पूजा करते हैं उनकी मनोकामना जरूर पूरी होती है। यहां का प्राकृतिक वातावरण आने वाले यात्रियों को खूब भाता है यहां का शान्त वातावरण तथा एकान्तवास प्रकृति के करीब रहने के इच्छुक लोगों के लिए भागसूनाग का इलाका काफी शान्त तथा लोकप्रिय है। यहां किसी भी मौसम में आयें लेकिन साथ में गरम कपड़े तथा जीवनरक्षक दवाईयां तथा टार्च आदि जरूरी चीजें लाना न भूलें। यहां ठहरने व खाने पीने की उचित व्यवस्था है बस आपको अपना टूर बनाकर आना है। फिर देर किसी बात की चलिए हिमालय की वादियों में भगवान भागसूनाग के दर्शन करके पुण्य कमायें और प्रकृति की समीपता और रमणीकता का आनन्द उठायें।
तत्कालीन उत्तर प्रदेश से अलग होने के लिए उत्तराखण्ड राज्य की परिकल्पना जिन अर्थों में की गई थी उसमें सबसे अहम था उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र के जनमानस का सर्वागींण विकास। इस विकास के मूल में रोजी-रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि बिन्दुओं का समावेश स्वयमेव था। कुमाऊँ गढ़वाल के पर्वतीय जिलों के लोगों को मानना था कि उत्तर प्रदेश के साथ रहने से हमारा विकास नही हो पा रहा है इसलिए अलग उत्तराखण्ड राज्य की मांग उठी। उत्तराखण्ड राज्य के लिए शान्तिपूर्वक एक लम्बा आन्दोलन चला जिसमें काफी बदलाव तथा ज्यादितियों का सामना उत्तराखण्ड के लोगों को करना पड़ा। १ अक्टूबर, १९९४ का मुज्जफर नगर, रामपुर तिराहा कांड़ अभी भी जनता के जेहन में ताजा है और जब उस बीभत्स कांड़ को याद करते हैं तो एक प्रकार की वेदना अन्दर तक चीर जाती है। यहां के दर्जनों लोगों ने राज्य के लिए अपना बलिदान दिया तथा कईयों को अपना जीवन खपाना पड़ा तब जाकर यह राज्य मिला। राज्य बनने के आठ साल बाद भी सवाल जस के तस हैं और समय-समय पर जनता के जख्मों पर नमक और छिड़का जा रहा है। आज उत्तराखण्ड का जनमानस अपने को छला हुआ महसूस कर रहा है। आम आदमी के हक हकूकों पर ड़ाका ड़ाला जा रहा है। जनता आज तक इस उम्मीद में थी कि हमें समय आने पर अवसर मिलेंगे लेकिन हुआ इसके ठीक उलट। सबसे पहली गलती केन्द्र की तत्कालीन भाजपा सरकार ने इस राज्य का नाम उत्तराखण्ड से उत्तरॉंचल करके की। दूसरी भयंकर गलती जो की उसका खामियाजा उत्तराखण्ड की जनता आज भी भुगत रही है और आने वाले कई दशकों तक उसे यह सालता रहेगा वह है उत्तराखण्ड राज्य में पर्वतीय जिलों व हरिद्वार के कुंभ क्षेत्र जो कि पहले से राज्य की सीमा में था तत्कालीन भाजपा सरकार ने इस के अतिरिक्त हरिद्वार , रूड़की, रूद्रपुर से आगे उधम सिंह नगर तथा नारसन तक का पूरा क्षेत्र जोड़ दिया। यह भौगोलिक विस्तार किसी भी लिहाज से उत्तराखण्ड के पक्ष में नही है। आज जो राज्य बना है उसमें यह मैदानी भूभाग जोड़ देने से इस पर्वतीय प्रदेश की परिकल्पना की गई थी तथा जिसके मध्यनजर राज्य मांगा था वह पूरी तरह से ध्वस्त हो गया। आज इस भूल का खामियाजा परिसीमन में पहाड़ से विधानसभा सीटों का कम होना है अभी हाल में ही उत्तराखण्ड में जब विधानसभा सीटों का परिसीमन दुबारा से कराया गया तो यहां पर्वतीय क्षेत्र में विधानसभा सीटें कम हो गईं तथा मैदानी क्षेत्रों में विधानसभा सीटें बढ़ गई हैं। इसका सीधा असर पर्वतीय क्षेत्र के विकास तथा राज्य विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व कम होना तो है ही लेकिन लोगों में ये शंका भी घर करती जा रही है कि यदि यही व्यवस्था रही तो आने वाले समय में उत्तराखण्ड के पर्वतीय जिलों से कोई भी मुख्यमंत्री नही बन पायेगा। दूसरी बड़ी बात यह है कि पर्वतीय जिलों की अपेक्षा मैदानी लोग सम्पन्न हैं इसलिए यह भी खतरा बना रहेगा कि मैदानी राजनेता धनबल पर विधायकों की खरीदफरोक्ख्त करके अपनी मर्जी का मुख्यमंत्री थोप देंगे। यह शंका निर्मूल नही है इसके परिपेक्ष्य में यह भी बताना सही होगा कि आज भी राज्य के संसाधनों तथा सरकारी योजनाओं पर बाहरी लोगों का कब्जा बना हुआ है। दूसरी तरफ यहां के संसाधनों पर यहां के मूल निवासियों का कोई हक नही है। इसका जीता जागता उदाहरण विश्व प्रसिद्ध टिहरीबांध है, बांध बना पहाड़ में, बेघर हुए पहाड़ के लोग और बांध के चारों ओर पर्यटन के उद्योग के लिए जमीन खरीद दी बाहरी माफिया ने, बांध की बिजली और पानी मिल रहा है उत्तर प्रदेश और दिल्ली वालों को। जिन लोगों को टिहरी से बिस्थापित करके देहरादून, हरिद्वार आदि जगहों पर बसाया गया था उनकी जमीनों को जमीन माफिया कब्जा रहा है और उनमें से अधिकांश लोग जमीन को औने-पौने दामों पर बेच कर बर्वाद हो रहे हैं। टिहरी के विस्थापितों के लिए न तो कोई ठोस योजना है न उनके परिजनों को बांध में नौकरी ही दी गई। आलम यह है कि बाहरी लोग नौकरियों पर कब्जा जमाये बैठे हैं और यहां के मूल निवासी मजदूरी के लिए भी भटक रहे हैं। यह कहां का इंसाफ है? अपनी जड़ों तथा अपने संस्कारों से कटने का दर्द क्या होता है यह वे ही लोग जानते हैं जिन्हौंने अपने बाप-दादाओं की पुश्तैनी जमीन को देश के तथा कथित विकास के लिए स्वाहा कर दिया और आज दो-दो, चार-चार बीघे के खेतों में सिमट कर रह गये हैं, और वह भी सुरक्षित नही है। भू माफिया की गिद्ध दृष्टि उनकी जमीन पर बराबर लगी रहती है। गांव में उन लोगों का समाज था आपसी नाते रिश्ते थे लेकिन आज वे लोग जिस वेदना को झेल रहे हैं उसकी भरपाई न तो किसी विकास से हो सकती है और किसी मुआवजे से उसका हिसाब चुकता किया जा सकता है। आज भी उत्तराखण्ड की नदियों पर बांध बनाने का षड़यंत्र जारी है। समझ में नही आता कि हम किस विकास के लिए और किसकी खातिर इस धरा को उजाड़ रहे हैं? टिहरी केे पानी बाहर वालों की प्यास बुझ रही है लेकिन यहां के लोग आज भी पानी के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। आज उत्तराखण्ड के अधिकांश गांवों में पेयजल की भारी किल्लत महसूस की जा रही है, टैंकरों तथा खच्चरों से पीने का पानी ढ़ोया जा रहा है। लेकिन किसी को भी उनकी सुध लेने की फुरसत नही है। प्रदेश की सरकारी योजनायें अधिकतर भगवान भरोसे चल रही हैं। तत्कालीन तिवारी सरकार के समय से प्रदेश में पेशावर कांड़ के महानायक वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली के नाम पर चन्द्रसिंह गढ़वाली स्वरोजगार योजना तथा चन्द्रसिंह गढ़वाली पर्यटन योजनायें चल रही हैं लेकिन चन्द्रसिंह गढ़वाली के परिजन किस हाल में जीवन यापन कर रहे हैं इसकी सुध लेने की फुरसत किसी नेता या सरकार के पास नही है। चन्द्रसिंह गढ़वाली को उनकी अल्मोड़ा की जमीन के बदले कोटद्वार के हल्दूखत्ता में चालीस बीघा जमीन पट्टे पर मिली थी वह जमीन तब से आज तक पट्टे पर ही है। गढ़वाली जी के दोनों बेटों का इंतकाल हो चुका है उनके एक नाती तथा एक पोती को तत्कालीन नित्यानन्द स्वामी सरकार ने रोजगार अवश्य दिया लेकिन उन्हें उक्त जमीन का हक नही मिला। आज राज्य बनने के बाद यह जमीन उत्तराखण्ड से उत्तर प्रदेश में जा चुकी है। इसलिए उनके परिजनों का दर्द और भी बढ़ गया है। इन पंक्तियों का लेखक स्वंय दो बार हल्दूखत्ता जाकर गढ़वाली जी के परिजनों को मिला उनके परिजनों का कहना है कि सरकार हमें जमीन का मालिकाना हक दे दे तो हम अपने हिसाब से इस जमीन पर निर्माण आदि करा सकते हैं। आज वे चाहकर भी खेती करने के अलाव कुछ नही कर सकते हैं और खेती का हाल यह है कि एक तरफ से मजदूर गेहूँ काट रहे थे दूसरी तरफ से बंदर फसल को चौपट कर रहे थे। गढ़वाली जी की बड़ी बहू कपोत्री देवी ने बताया कि यहां बंदर, जंगली सुअर फसल को बर्वाद कर देते हैं सालभर मेहनत करने के बाद तथा मजदूरों को देने के बाद अपने गुजारे लायक अन्न भी नही होता है। यहां के प्राकृतिक संसाधनों का यहां के लोगों को उचित फायदा नही मिल पा रहा है इससे भी यहां के लोगों में बेचैनी है। गंगा यमुना यहां से बहती हैं, वन तथा पर्यटन से भरपूर यह क्षेत्र विकास की दौड़ में आज भी पिछड़ा हुआ है। राज्य बनने के बाद यहां के लोगों के जीवन में कोई विशेष परिर्वतन नही हुआ हॉं भू-माफिया की तरह यहां राजनैतिक माफिया, जंगल माफिया, जल माफिया तथा अब विज्ञापन माफिया भी काफी सशक्त रूप में उभर रहा है। किसी भी योजना और विभाग में इस प्रकार के माफिया की पकड़ सीधी है और उसी के इशारों पर ही सरकारी योजनाओं की दलाली होती है। इस कारण यहां के मूल निवासियों के मनों मे काफी दर्द है। इस पर्वतीय क्षेत्र में नशे का कारोबार गॉंव-गॉंव और घर-घर में इस कदर हाबी हो चुका है कि बडे तो बड़े स्कूल जाते दस बाहर साल के अधिसंख्य बच्चे बीड़ी, तम्बाकू के अतिरिक्त शराब, चरस तथा पान मसाला व गुटखे आदि की चपेट में आ गये हैं। हालात इस कदर खराब हैं कि कई गांवों में तो महिलायें भी शराब का सेवन करने लगी हैं। पहाड़ के दूरस्थ गांवों में शराब पहुँचाने का काम यहां के कई फौजियों तथा सड़क मजदूरी करने आये नेपाली मूल के लोगों ने अधिक किया। आज हालात यह हैं कि जीते या मरते कोई भी काम हो शराब के बिना नही होता है। शराब माफिया यहां के बेरोजगार और लाचार लोगों को अपने शिंकजें में कसता जा रहा है। माफिया यहां के लोगों को शराब का आदी बनाकर उनसे अपने उदे्श्यपूर्ति के काम कराता है। किसी भी गांव चले जाइये आपको पीने का पानी भले ही न मिले लेकिन शराब आपको चौबीसों घंटे और कहीं भी मिल जायेगी बस आपके पास पैसा होना चाहिए। शराब पीकर दंगे करने का प्रभाव ही है आज इस पर्वतीय क्षेत्र में लोग अपने बच्चों की शादियां रात की जगह दिन में ही करने लगे हैं। सही मायने में सामाजिक ढ़ांचा चरमराने के कगार पर पहुँच गया है। इस बात का अहसास लोगों को है लेकिन कोई भी इसके खिलाफ आवाज नही उठा रहा है। इससे सामाजिक परिवेश में अन्दर ही अन्दर काफी तनाव है। पिछलें दस साल में शराब आदि नशें के कारण यहां हत्याओं तथा मारपीट का ग्राफ काफी बढ़ गया है। पहाड़ से पलायन आज भी जारी है। लोगों ने सोचा था कि राज्य बनने के बाद पलायन रूकेगा लेकिन रोजगार न होने के कारण यहां के लोगों को मजबूरन शहरों की ओर जाना पड़ता है। राज्य बनने से यहां न तो रोजगार के साधन बढ़े और न विकास ही हुआ। कृर्षि तथा पर्यटन की स्थिति यहां काफी लचर है। जो थोड़ी बहुत खेती होती थी उसे आज जंगली जानवर, बंदर, जंगली सुअर आदि तबाह कर जाते हैं इसलिए अब धीरे-धीरे लोग खेती करने से भी कतराने लगे हैं। हालत ऐसे ही रही तो आने वाले समय में यहां खाद्यान संकट से भी लोगों को दो चार होना होगा। पेयजल की किल्लत आये दिन बढ़ती जा रही है। इसलिए यहां का जन मानस अपनी दैनिक जरूरतों के लिए पहले से अधिक परेशान और लाचार हो गया है। न तो रोजगार है न प्राकृतिक संसाधन ही रहे उसपर राज्य के संसाधनों पर बाहरी लोगों का कब्जा। उत्तराखण्ड में सरकार ने बाहरी उद्यमियों को कई रियायतें देकर उद्योग लगाये हैं लेकिन उत्तराखण्ड का आदमी वहां भी नौकरी नही पा सकता है। कागजों पर तो सत्तर प्रतिशत रोजगार उत्तराखण्ड के लोगों के लिए है लेकिन धरातल पर कुछ भी नही है। और तो और यहां का आदमी दैनिक मजदूरी पर भी काम नही पा सक रहा है। इस संबध में प्रदेश के मुख्यमंत्री भुवन चन्द खण्डूरी ने उद्योगों को चेताया भी है कि यदि उन्हौंने नियम के अनुसार उत्तराखण्ड के लोगों को अपने यहां रोजगार नही दिया तो उनको दिये जाने वाली रियायतें वापस ले ली जायेंगी तथा उनको उत्तराखण्ड छोड़कर जाना होगा। इसके बावजूद भी कुछ खास फर्क नजर नही आ रहा है। यह प्रदेश तीन ओर से विदेशी सीमाओं से घिरा हुआ है। इसलिए यह क्षेत्र अति संवेदनशील है इस लिहाज से यहां अतिरिक्त अहतियात बरती जानी चाहिए लेकिन यहां के बारे में सोचने का समय शायद किसी के पास नही है। नेपाल की तरफ से उत्तराखण्ड में माओवादियों की घुसपैठ कुछ समय से काफी बढ़ गई है पिथौरागढ़ जिला जो कि नेपाल की सीमा से लगा हुआ है वहां आये दिन माओवादियों द्वारा वारदातें होती रहती हैं। असल में माओवादी चाहते हैं कि नेपाल के बाद अब उत्तराखण्ड में भी अपनी घुसपैठ की जाय। यहां के हालात तथा सरकारी उपेक्षा माओवादियों को उर्बरा जमीन दे सकती है। यदि समय रहते ध्यान नही दिया गया तो आने वाले समय में यहां हालात बिगड़ सकते हैं। सरकारें सब कुछ जानते हुए भी पहले से कुछ नही करते हैं जब हालात सीमा से बाहर चले जाते हैं तब शासन-प्रशासन की नींद खुलती है। उत्तराखण्ड के बारे में भी यदि सरकारें इसी तरह का उदीसीन रवैया अपनाती हैं तो वह दिन दूर नही जब यहां की शान्त वदियां अशान्त हो जायेंगी। यह बात भी याद रखनी होगी कि उत्तराखण्ड सीमान्त राज्य है इस लिहाज से भी यह अतिसंवेदनशीन क्षेत्र है। इसलिए यहां के लोगों को अधिक समय तक भगवान भरोेसे नही छोड़ा जा सकता है। यहां के संसाधनों का यहां के लोगों को उचित फायदा मिलना चाहिए। यदि हालात ऐसे ही रहे तो आने वाले समय में स्थिति और बिगड़ सकती है। कोई माने या न माने लेकिन उत्तराखण्ड में सबकुछ सामान्य नही है अन्दर ही अन्दर काफी कुछ सुलग रहा है और इस सब को सुलगाने में शासन प्रशासन द्वारा यहां के लोगों की घोर उपेक्षा प्रमुख कारण है। यह बात अलग है कि इसे अभी मुखर स्वर नही मिला है लेकिन यदि कोई ऐसा सोचता है कि उत्तराखण्ड में सबकुछ ठीक चल रहा है तो यह उसकी गलतफहमी है। यहां का जनमानस अन्दर ही अन्दर एक घुटन महसूस कर रहा है वह समझ नही पा रहा है कि हमने इतने संघर्षों के बाद जो राज्य पाया उसका फायदा हमें कम मिलेगा? उसके हिस्से के सुख पर बाहरी लोग ड़ाका ड़ाल रहे हैं और वह आज भी उसी तरह लाचार और विवश है जैसे पहले था। प्रसिद्ध समाज सेवी तथा उत्तराखण्ड लोकमंच के अध्यक्ष उदय राम ढ़ौड़ियाल का मानना है कि राज्य बनने के बाद इसकी बढ़ाई गई सीमायें तथा अब परिसीमन की जिन्न यहां के जनमानस को चैन से नही रहने दे रहा है। इसका असर आने वाले समय में देखा जा सकता है। वैसे भी हर किसी की सहन करने की एक सीमा होती है उत्तराखण्ड के जनमानस के धैर्य को इस तरह से नापना उचित नही है। देश के सत्ताशीनों को समझना चाहिए कि जिस परेशानी के कारण यहां के लोगों ने राज्य मांगा उस परेशानी को कम करने के बजाय यदि भिन्न-भिन्न तरीके से बढ़ाया जाता है या यहां की जनता को परेशान किया जाता है तो उसका धैर्य कभी तो जबाव दे सकता है। राज्य आन्दोलन के दौरान भी यहां की जनता पर जो जघन्य जुल्म हुए उनको भी यहां के जनमानस ने चुपचाप सहा और आज फिर एक बार यहां पर परिसीमन के द्वारा अशान्ति फैलाये जाने की संभावना प्रबल हो गई है। सरकार को इस दिशा में उचित कार्यवाही करनी होगी तथा इस शान्ति प्रिय क्षेत्र को अराजकता से बचाया जाना होगा। यदि यहां एक बार भी हालात खराब हुए तो उन्हें दुबारा सामान्य स्थिति में लाना मुश्किल होगा। इसलिए समय रहते सरकार को इस सीमान्त प्रदेश की मूलभूत समस्याओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, विकास तथा योजनाओं में ऐसी रणनीति बने कि विकास की किरण गांवों तक पहुँचे तथा विकास की बाट जोहते लोगों को कुछ सुकून मिल सके।
यदि जसवंतसिंह को जिन्नावाली किताब के कारण निकाला गया है तो यह घटना भाजपा का शाश्वत कलंक कहलाएगी| किसी पार्टी का संसदीय बोर्ड इतना गैर-जिम्मेदाराना फैसला कैसे कर सकता है ? संसदीय बोर्ड किसी भी पार्टी का दिलो-दिमाग होता है| लगता है, शिमला में उसे ठंड लग गई| पुस्तक-विमोचन के 26 घंटे में ही जसवंतसिंह का निष्कासन किस बात का सबूत है ? क्या इसका नहीं कि पुस्तक को पढ़े बिना ही हमारे भगवा मौलानाओं ने फतवे जारी कर दिए| 669 पृष्ठ की पुस्तक को नेता लोग तो क्या, मंजे हुए विद्वान भी एक दिन में नहीं पढ़ सकते| पार्टी का संसदीय बोर्ड तो सरकार के मंत्रिमंडल से भी अधिक शक्तिशाली निकाय होता है| यह निकाय अगर अपने एक वरिष्ठ साथी पर इस तरह अचानक गाज गिरा सकता है तो उस पर क्या भरोसा किया जाए ? यह किसी भी देश पर अकारण ही परमाणु बम भी गिरा सकता है| ऐसे गैर-जिम्मेदार संसदीय बोर्ड को भाजपा कार्यकर्ता क्यों बर्दाश्त करें ? ऐसे बोर्डवाली पार्टी को सत्तारूढ़ करने के पहले भारत की जनता को सौ बार सोचना होगा|
सबसे बड़ा आश्चर्य तो यह है कि लालकृष्ण आडवाणी संसदीय बोर्ड के सबसे वरिष्ठ सदस्य हैं और उनके रहते जसवंतसिंह को निकाल दिया गया| आडवाणी चुप क्यों रहे ? यदि चुप रहे तो उनका अपराध भीष्म और द्रोणाचार्य से भी अधिक संगीन है| वे खुद जिन्ना के मारे हुए हैं| उनका जिन्ना जसवंतसिंह के जिन्ना से कहीं ज्यादा खतरनाक था| अगर हम आडवाणी के जिन्ना और जसवंतसिंह के जिन्ना की तुलना करें तो इस नतीज़े पर पहुंचेंगे कि जसवंतसिंह को अगर पार्टी-निकाला दिया गया तो आडवाणी को कम से कम देश-निकाला तो दिया ही जाना चाहिए था| जसवंतसिंह ने अपनी पूरी पुस्तक में जिन्ना को कहीं भी 'महान' और 'धर्म निरपेक्ष' नहीं कहा है, जैसा कि आडवाणी ने जिन्ना के समाधि-स्थल की पुस्तिका में लिखा था| जसवंत की पूरी किताब पढ़ने पर ऐसा लगता है कि उन्होंने जगह-जगह जिन्ना को अतिवादी, घंमडी, अकड़बाज़, अदूरदर्शी, अंग्रेजियत का पुतला और 'विफल' राजनेता बताया है| सारे इतिहासकार मानते हैं कि जिन्ना अपने लक्ष्य में सफल रहे लेकिन जसवंतसिंह ने पाकिस्तान की वर्तमान दुर्दशा और भारत के मुसलमानों की दुविधा के आधार पर जिन्ना को 'विफल' बताने की कोशिश की है| उन्होंने जिन्ना के द्विराष्ट्रवाद का स्पष्ट विरोध किया है।
एक शहर में एक भिखारी था। था तो निर्धन और दीनहीन, जैसे-तैसे ही अपना गुजारा कर पाता था , परन्तु था बहुत ही सच्चा और ईमानदार। एक दिन उसे सड़क पर एक चमड़े की थैली पड़ी मिली। खोलकर देखा तो उसके अन्दर चमचमाती सौ सोने की अशर्फियाँ थीं। भिखारी अभी गिन ही पाया था कि सामने से एक धनवान व्यक्ति आता दिखलाई दिया, जो अपनी थैली को ढूँढ रहा था और साथ में यह भी घोषणा कर रहा था कि जो भी उसे उसकी खोई थैली ढूँढकर लाकर देगा, उसे वह इनाम देगा। भिखारी ने तुरन्त ही उसकी थैली उसे सौंप दी। धनी ने अशर्फियां गिनीं और शोर मचाना शुरू कर दिया कि थैली में 200 अशर्फियां थीं । 'तुमने सौ चुरा ली हैं, मैं तुम्हें दंड दिलवाऊंगा।' भिखारी को बेहद दुख हुआ, 'इनाम मिलना तो दूर, यह तो सजा की बातें कर रहा है।'
देखते-देखते भीड़ जमा हो गई। फैसले के लिए काजीजी को बुलाया गया। सारी बात सुनने समझने के बाद काजी ने धनी से कहा कि तुम कहते हो कि तुम्हारी थैली में 200 अशर्फियां थीं और इसमें तो मात्र सौ ही अशर्फियां निकलीं, इसलिए यह थैली तुम्हारी नहीं हो सकती। भिखारी ईमानदार है वरना वह थैली लौटाता ही क्यों। चूंकि अब इस थैली का कोई जायज दावेदार नहीं है इसलिए मैं आधी अशर्फियां शाही खजाने में डालता हूँ और आधी लाने वाले को इनाम देता हूँ। उपस्थित हर व्यक्ति बुद्धिमान काजी की सूझबूझ और न्याय की तारीफ कर रहा था और लालची धनी हाथ मल रहा था। अब तो झूठ बोलने पर मिलने वाले कोड़ों के डर से वह यह भी नहीं कह सकता था कि थैली वाकई में उसी की थी; बस मन में भिखारी की भी जमा-पूंजी हड़पने का लालच आ गया था।
(वर्णनः शैल अग्रवाल)
प्यारे बच्चे
सूरज मुझको लगता प्यारा लेकर आता है उजियारा । सूरज से भी लगते प्यारे टिम-टिम करते नन्हें तारे।
तारों से भी प्यारा अम्बर बाँटे खुशियाँ झोली भर-भर। चन्दा अम्बर से भी प्यारा गोरा चिट्टा और दुलारा ।
चन्दा से भी प्यारी धरती जिस पर नदियाँ कल-कल करती । पेड़ों की हरियाली ओढ़े हम सबके है मन को हरती ।
हँसी दूध–सी जोश नदी–सा भोले मुखड़े मन के सच्चे । धरती से प्यारे भी लगते खिल-खिल करते नन्हें बच्चे
इन बच्चों में राम बसे हैं ये ही अपने किशन कन्हाई । इन बच्चों में काबा-काशी और नहीं है तीरथ भाई ।