कविता आज और अभीः दृश्य-अदृश्य

हम सब…

हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर
अपने अपने घर पहुँचना चाहते

हम सब ट्रेनें बदलने की
झंझटों से बचना चाहते

हम सब चाहते एक चरम यात्रा
और एक परम धाम

हम सोच लेते कि यात्राएँ दुखद हैं
और घर उनसे मुक्ति

सचाई यूँ भी हो सकती है
कि यात्रा एक अवसर हो
और घर एक संभावना

ट्रेनें बदलना
विचार बदलने की तरह हो
और हम सब जब जहाँ जिनके बीच हों
वही हो

-कुंवर नरायण

सागर तट पर …..
(लहरों पर आकार लेती कविता)
जब मुक्त हवाओं का मौसम लहराता है ,
सागर सा मन फिर झूम झूम कर गाता है
लहरों सा चंचल जीवन का गतिमय आनन् ,
मन- भावों की सरिता को छूता मुक्त गगन ,
उन्मुक्त तरंगों का नर्तन मन भाता है .
सागर सा मन फिर झूम झूम कर गाता है .
झुक रहा गगन देखो सागर की थाती पर ,
जल दर्पण में बिम्बित कितने ही तारागण ,
नयनो की गागर में सपनों के मेघ पलें
मन का वह कोमल भाव छलक ही आता है ,
सागर सा मन फिर झूम झूम कर गाता है
मैं उदधि,समाहित मुझमे,कितनी नदियों का मन,
कितने तूफानो का साहिल ,मेरा यह अंतर्मन,
छू लो ,मेरी प्यार भरी गरिमा साथी !,
मन का हर कोमल गीत ,ह्रदय भरमाता है
सागर सा मन फिर झूम झूम कर गाता है।
जीवन तट सा ही है विशाल ,यह मुक्तांगन,
बालुकमयी धरती करती है अभिनन्दन ,
इस स्नेह सलिल के पावन तट पर हम दोनों ,
जैसे धरती का मन अम्बर अपनाता है ,
सागर सा मन फिर झूम झूम कर गाता है।
आरम्भ यहीं है ,अंत यहीं -आशाओं का ,
सतरंगीसपनो का मौसम -अभिलाषाओं का ,
उत्ताल तरंगों पर सोया मेरा सावन ,
सिहरा तन मन ,बूंदों का रिमझिम भाता है,….
सागर सा मन फिर झूम झूम कर गाता है।।।।।
पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर झारखंड

पगडंडी
कहीं दौड़ती भागती
कहीं पहाड़ों के दामन में
सोई-सी ………
वह नाज़ुक-सी पगडण्डी —
कभी ढलान की तरफ़ झुकी हुई
कभी ऊपर की तरफ़ उठी हुई
एकदम तन्हा व अकेली
ढूँढने निकली हो जैसे
कोई हमराज़ सहेली
जिससे पूछे वह
अपनी पहेली
है वह सचमुच में
बड़ी अलबेली
कभी देखे घाटियों से
उठते धुआं-धुआं से
बादलों को ………
कभी हैरान होकर निहारे
पहाड़ों के हाथों से गिरते
झरनों के प्यालों को
कहीं मचलती हुई नदिया
के पानी से खेले….
कहीं उबलते हुए चश्मे
की ज़ुल्फ़ें छेड़े
कहीं हरे-भरे पेड़ों की
गदराई जवानी …..
सोंचे मन ही मन
यह शाम है ……..
कितनी सुहानी !
कितनी मस्तानी !
-डॉ. नग़मा जावेद मलिक

तैरती हुई लड़कियां

पानी की बहती तेज धार में
नाचती हुईं
छपाक – छपाक
खेल रही है लड़कियां
जो तैरती हुई चली जाती
पोरसा भर पानी में
और पल भर में लौट आती
कगार की ओर

उनका तैरना
पंछियों के उड़ने से कम नहीं लगता
वे तैर रही हैं
रोहिल्ला मछलियों की तरह

लड़कियां डूबना नहीं चाहती
जीना चाहती हैं
दूबों की तरह अंखुवाते
सपनों के लिए

पानी में गोता लगाती
मनचली लड़कियों को देखते ही
सहसा याद आ जाती
मन में दुबकी पड़ी
नानी के कहानियों की जलपरियां
जिसे खोजने चुपके से चला आता राजकुंवर
जहां इनकी छुपा – छुपी देखता था वह

हवा के तिनके – सा बहते ये दिन
इन गदराई लड़कियों के
सबसे सुनहरे पल हैं
जब वे कर रही होती हैं
तैराकी की दौड़ !

लक्ष्मीकांत मुकुल

सड़क पर…

सड़क पर तेजी से जाते हुए सवार ने देखा …..
एक वृद्ध व्यक्ति गिर कर ,
कराह रहा था ,

कराह थी तीव्र पीड़ा की
पैरों में चोट लगी थी शायद ,
उसे देख कर मन भर आया

बहुत दूर …..
किसी गाँव में बैठा हुआ ,
वृद्ध पिता याद आया ,

लेकिन ….
घडी में दस बज रहे थे ,
उसे ऑफिस समय पर पहुँचना था

वरना देर से पहुँचने पर ,
आज फिर वेतन कट जायेगा ,
और पिता की दवाओं का खर्च
कहाँ से आयेगा,

एक लम्बी साँस लेकर
वह चल पड़ा उस रास्ते पर …
जो उसके ऑफिस की ओर जाता था …..!

– अमित तिवारी

इन दिनों

पिछले कुछ दिनों से दुनिया का हर बच्चा
मुझे आकर्षित करता है
यूं तो बच्चे आकर्षित करते रहे हैं
मुझे हमेशा से
उनकी मुस्कान, उनकी आंखें, उनकी मासूमियत
उनकी चंचलता, उनकी सुंदरता
लेकिन अब आकर्षित करने लगा है मुझे
उन बच्चों का अकेलापन, उनकी विद्रूपता
आकर्षित कर रहा है मुझे उनका
मिट्टी और धूल में लिथड़ा उपेक्षित चेहरा
उनकी उपेक्षा मुझे आकर्षित कर रही है

इन दिनों सड़क पर चलते-चलते
जब मेरे भीतर चल रहा होता है
ढेर सारी व्यस्तताओं का लेखा-जोखा
और ढेर सारी व्यस्तताओं से पल भर भी
न चुरा पाने की खीझ, तब
ये बच्चे किसी सड़क किनारे रोते-बिलखते
और पुचकारने पर सिहर जाते
मेरी सारी व्यस्तताओं में से खुद के लिए
समय निकाल ले जाते हैं

मैं ठहर जाती हूं पल भर वहीं
जैसे यहीं थी मैं पिछली कई सदियों से
कि नहीं पंहुचना मुझे कहीं
न आफिस, न घर
नहीं याद आता कोई छूटता काम मुझे

मैं सोच में पड़ जाती हूं
आखिर क्या अंतर है इन बच्चों में और
मेरी बेटी मे, जो फूल सी पल रही है
हमारे संरक्षण में कि
जिसका छींकना मुझे विचलित कर देता है
कि जो रोती है तो लगता है
ज्यों चाकू की पैनी धार रखी हो मेरी किसी उभरी नस पर

ये बच्चे भी उतने ही मासूम हैं
उतने ही प्यारे, हो सकते हैं ये भी
उतने ही चंचल
पर कुछ रोकता है इन्हें चहकने से

नहीं खिल पाते हैं जैसे
खिलता है कोई निर्द्वन्द्व फूल

मेरा मन उछलने लगता है
कि मैं छू लूं उन बच्चों को और
ये जी सकें कोमल स्पर्श का आनंद
कि उठा लूं इन्हें गोद में
और पोंछ दूं चेहरे और जीवन की सारी गर्द

यूं तो बच्चे करते रहे हैं मुझे आकर्षित
लेकिन इन बच्चों के प्रति मेरा आकर्षण
नया है बिल्कुल टटके फूल जैसा

इन दिनों मैं हुई हूं अधिक संवेदनशील
अधिक मनुष्य हुई हूं मैं इन दिनों
इन दिनों मैं फूल को फूल कहती हूं
और नहीं ढूंढ पाती कोई कांटा उसमें
इन दिनों मैं कांटों को भी फूल कहना चाहती हूं
इन दिनों मैं मां हुई हूं
मैंने रचा है एक जीवन और
हर जीवन से मुझे प्रेम हो गया है

मैं चाहती हूं कि मुस्कुरा सके
हर वह चीज़ जिसमें धड़कती है जान
हर चीज़ मुझे सुंदर दिखती है इन दिनों

कितना सुखद होना है मां होना
काश हर जीवन जन्म दे सके एक नए जीवन को
जिस दिन जीवन से मृत्यु नहीं
जीवन जन्मेगा
सृष्टि और कई रंगों से भर जाएगी.
-ज्योति चावला

प्यार के समंदर में

बीसियों वर्ष बाद मिलने पर
झूम उठे थे उनके तन मन
डूबते-उतराते बोला था वह
जी करता है
फिर से अतीत में खो जाऊँ
कह दूं कि कितना प्यार है तुमसे
अच्छा नहीं लगे तो बुरा मत मानना
कुछ भी तो कभी कहा ही नहीं तुमसे

सजल आँखें पोंछती हंस पड़ी थी वह –
कितना बचकाना था वह प्यार हमारा
बड़े तो हम बिछुड़ने के बाद ही हुए
जब जाना कि जीवन मनमानी ही नहीं
जीना और निभाना भी पड़ता है इसे…

शैल अग्रवाल


दृश्य-अदृश्य

जैसे तारे टूटते हैं
और फिर रोज उग भी आते हैं
लौट आऊँगा मैं वापस तुम तक
दूर कहीं भी जाकर

तसल्ली देती, समझती और सब सहती
देखती रही वह आँसू भीगी साँसें उखड़ती
आकुल उसका तलवा कभी माथा सहलाती
अंतिम विछोह का था कष्ट अपार

जाओ उन्मुत्त होकर हर बंधन से मुक्त
हज़ार तारे नभ में, हज़ार प्राणी जग में
जीवन नया, छूट जाएगी पहचान पुरानी
पर प्यार कभी ना होता जर्जर

कोई पहचान छोड़ना जरूर
वरना पहचानूंगा कैसे तुम्हें
बोला था पथिक बेचैन होकर
अनजानी डगर पर चलने से पहले

सुबक पड़ी थी तब असमर्थ आहत
बोली थी फिर भी नम आँखें पोंछ
चाहत चलती रहती मंत्र प्रार्थना सी
उलझते टूटते रहते कलावे सांसों के…

शैल अग्रवाल

नया अनुभव

मैनें चिड़िया से कहा, मैं तुम पर एक
कविता लिखना चाहता हूँ।
चिड़िया नें मुझ से पूछा, ‘तुम्हारे शब्दों में
मेरे परों की रंगीनी है?’
मैंने कहा, ‘नहीं’।
‘तुम्हारे शब्दों में मेरे कंठ का संगीत है?’
‘नहीं।’
‘तुम्हारे शब्दों में मेरे डैने की उड़ान है?’
‘नहीं।’
‘जान है?’
‘नहीं।’
‘तब तुम मुझ पर कविता क्या लिखोगे?’
मैनें कहा, ‘पर तुमसे मुझे प्यार है’
चिड़िया बोली, ‘प्यार का शब्दों से क्या सरोकार है?’
एक अनुभव हुआ नया।

मैं मौन हो गया!

-हरिवंश राय बच्चन

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