
चौथा बंदर
अल्लम गल्लम, ऊल जुलूल
अटरम सटरम, ऊट पटाँग
शरीफ़ नाम का था एक बंदर
सारा दिन, उसका था काम
छीना झपटी, लूट खसोट
धमा चौकड़ी, कूद फलांग
तहस नहस करके एक पेड़
निकल रहा था घर को फाँद
जिसकी छत पर सूख रहे थे
आम के पापड़, चादर टांग
उन्हें चुराने की कोशिश में
मारी ऊँची, तेज छलाँग
लेकिन पापड़, के लालच में
तुड़वा बैठा अपनी टांग
देख कूदते, बंदर जी को
मुर्ग़े ने दी, ज़ोर से बाँग
फैल गया ये समाचार कि
चोर की टूट गई है टांग
डॉक्टर मामा दौड़े आए
कहा बच गई तुम्हारी जान
मल्लम पट्टी, सुई लगाके
प्लास्टर बांध दी, टूटी टांग
बंदरिया से बोल गए कि
बिटिया इसका रखियो ध्यान
करने देना नहीं इसे अब
धमा चौकड़ी, कूद फलांग
इस घटना के बाद शरीफ़
तंग कियों से माफ़ी माँग
बन बापू का चौथा बंदर
“ना बुरा करो” “ना बुरा करो” का
लगा बाटनें जग में ज्ञान

यादों भरी सुराही
पानी छिड़का, छत महकी
सूरज डूबा, शाम हुई
हवा ने ठंडी साँस भरी
गर्मी दिन की शांत हुई…
उड़ी पतंगें रंग बिरंगी
पेंच लड़ातीं, गोता खातीं
कभी इधर तो, कभी उधर को
अपने रंगों पे इठलातीं
फिर वो दमका आसमान में
कहता है जिसको जग सारा
छह महीने को भोर का
छह महीने को शाम का तारा
तकिये बिस्तर चादर आए
बिन सिलवट के बिछे…बिछाए
परछाइयाँ भी संग आ बैठीं
माचिस ने जब दिये जलाए…
सिरहाने पे रखी सुराही
थी जो नानी की हमसायी
जिसके पानी में नानी ने
किस्सों की थी खूब घुलाई
जिसके मुंह पे बैठा रहता
नानी का एक उल्टा ग्लास
रोज सोचते कब निकलेगा
चखेंगे, किस किस्से का स्वाद?…
आसमान ने इतने सारे
कैसे बिछा रखे हैं तारे?
क्यों इसमें से टूट टूटके
धरती पे गिरते हैं सारे?
आँखें बंद कर, यही सोचते
अब हम सब, सो जाएँगें
फिर कल उठकर इस दुनिया की
दौड़ में हम, खो जाएँगें