मुद्दाः कैदी कौन- डॉ. सुनील ‘सावन’

हवालात का हर कैदी अपराधी नहीं होता है। बन्दी गृह में बहुत से विचारक होते हैं, समाज सुधारक होते हैं, देशभक्त होते हैं और होते हैं समाज सेवी। जिन साहित्यकारों का साहित्य उन्हें रास नहीं आता है उन साहित्यकारों को भी जेल की रोटियां तोड़नी पड़ती हैं। एक भारतीय आत्मा माखनलाल चतुर्वेदी ने कारागार के भीतर ‘कैदी और कोकिला’ नामक कविता रचते हुए देश की तात्कालिक स्थिति का यथार्थ चित्रण किया है। उन्होंने काली जंजीरों और काली दीवारों के प्रतीकों के माध्यम से देश की काली गुलामी का अद्भुत चित्र प्रस्तुत किया है। जब कविता का गांधी भवानी प्रसाद मिश्र ने अपने ओजस्वी शब्दों से आम आदमी को जगाने के लिए कलम उठाई तब अंग्रेजों को रास नहीं आया और उन्हें हवालात की हवा खानी पड़ी। बंदी गृह में बैठे-बैठे भवानी जी ने ‘घर की याद’ नामक कविता लिख डाली। इस कविता में उन्होंने अपनों को याद करते हुए कैदखाने की भयावह स्थिति का भी ज़िक्र किया है। उन्होंने साफ़ शब्दों में लिखा है कि ज़िन्दगी में एक ऐसा वक्त भी आता है जब आदमी को आदमी से डर लगता है। वह नहीं चाहते हैं कि उनके घर वाले जेल की जहन्नुम सी ज़िन्दगी से वाक़िफ हों।

अपराध करके जेल जाना पाप है लेकिन हक के लिए लड़ते हुए जेल जाना पाप नहीं है। अपने हक के लिए लड़ना चाहिए। सच का साथ सदैव देना चाहिए भले ही काला पानी की सजा हो जाए। यदि बापू जेल जाने से डर गये होते तो आज हम आजादी से कोसों दूर रहते। जेल वह पावन भूमि है जहां कान्हा ने जन्म लिया था। इसीलिए हवालात में कभी चप्पल पहनकर प्रवेश नहीं किया जाता है। जेल वह संगम स्थल है जहां संत और शैतान का मिलन होता है। वहां का हर कैदी अपराधी नहीं होता है। कोई फंसा होता है तो कोई फंसाया गया होता है। सच पूछिए तो गेहूं के साथ घून पिसाया होता है। कभी-कभी अति का भला और भोला होना भी हवालात का कारण बन जाता है।

जेल का लगभग हर कैदी मैत्री भाव से रहता है। एक दूसरे का मनोबल बढ़ाते हुए जीवन काटता है। कुछ दिनों में या तो वह विक्षिप्त हो जाता है या दार्शनिक। वहां वह जीवन को करीब से महसूस कर पाता है। वह समझ जाता है- जीवन का महत्व, जीवन में सहनशीलता का महत्व। वह वहां रहकर इतना सुन लेता है कि जीवन में सुनने के लिए कुछ रह नहीं जाता है।

अर्धरात्रि में मच्छर हांकते हुए एक कैदी दूसरे कैदी से कहता है, ‘जीवन में सुख-चैन से रहना है, तो सहना है।’

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने बहुत ही प्रेरक कहानी लिखी है- दो बैलों की कथा। हीरा और मोती नामक दोनों बैल कुछ पल के लिए कांजी हाउस में कैद हो जाते हैं। मेरी समझ से हीरा नरम दल का प्रतीक है और मोती गरम दल का। कांजी हाउस में कैद जानवरों की दयनीय दशा को देखकर दोनों विचलित हो जाते हैं। वह उन्हें आजाद करने की तरकीब सोचने लगते हैं, प्रयास करते हैं और सफल भी होते हैं। उनके अहर्निश अथक प्रयास से दीवार गिरते ही अधमरे से पड़े लगभग सभी जानवर चेत हो उठते हैं। लगभग सभी जानवर स्वतंत्र होने में सफल होते हैं लेकिन गधे टस से मस नहीं होते हैं क्योंकि वह अपनी सोच से गुलाम होते हैं- ‘यहां से भागने से क्या फायदा? कहीं फिर पकड़ लिये गये तो?’

कैदी सिर्फ वह नहीं है जो कारागार में कैद है
अपितु कैदी वह भी है जो अपने संकीर्ण विचार में कैद है।

तन के हवालात में मन है कैदी। मन के मोहबस में जीवन है कैदी।
जीवन के समरांगण में कौन नहीं है कैदी।
जो उन्मुक्त है, वही मुक्त है……

डॉ. सुनील ‘सावन’

कुशीनगर, उत्तर प्रदेश।

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