कहानी समकालीनः जाल-शैल अग्रवाल

सुबह-सुबह ही निकल जाते थे एहसान मियाँ बकरियों लेकर और सूरज चढ़े, उसके पहले लौट भी आते थे रोज। पर आज जाने क्यों बकरियाँ भटक रही थीं और उनके खयालात भी।

असह्य धूप थी अब। तेज गरम हवा चल रही थी, बिल्कुल सुबह के उस वाकये-सी ही प्रचंड औऱ सिर से पैर तक झुलसाती-सी ही।

‘आसान नहीं इन मुल्कों में रहना-बसना भी!’

एक आह सी उठी सीने में और आँखों में आंसू बनकर तैरने लगी।
‘फिर जरूरत ही क्या इसकी? जड़ें पैसा नहीं, अपनी माटी मांगती हैं। और मजहब नहीं यह माटी ही हमें पालती-पोसती है। संस्कार देती है।’

अब एहसान उस दिन को कोस रहा था जिसदिन वह अपनी खुशहाल जिन्दगी को छोड़ पैसों के लालच में यहाँ आ बसा था। आए दिन ही तो, करीब-करीब हर जुमे को ही चौक में सिर कटने की खबरें पढ़ी हैं उसने और उठाईगिरी के मामलों में किसी-न-किसी के हाथ कटने की खबर तो कोई नई बात नहीं। कितनों को मिलती है यह सजा, कोई गिनती ही नहीं। आरोप का सही गलत होना भी कोई मायने नहीं रखता .हाँ। गलत भी हमेशा वही इनसान है यहाँ, जो बाहर से आया है। सारी गलती भी हमेशा उसीकी, क्योंकि जो सामने खड़ा, वह तो शेख है। और शेख गलत हो ही नहीं सकते?’

अट्ठारह वर्षीय किशोर आक्रोश और दुख से धधक रहा था अब।

बेबस परिस्थितियों का वह मकड़जाल दमघोटू हो चला था उसके लिए।

‘आप ही बताओ, मैं क्या करता, कैसे धोखा देता मासूम को जिसके साथ अभी सगाई की है, सुख-दुख में साथ रहने की कसमें खाई हैं? फिर इतना गिरा-पड़ा भी तो नहीं! नहीं मान सकता मैं उनकी यह घिनौनी फरमाइश। छी…बकरियाँ चराता हूँ , रूह तो गिरवी नहीं रख दी इनके पास?‘
गुलाबो ने तब ठंडा शरबत का गिलास हाथ में देकर कहा, ‘आराम से बैठकर बताओ, क्या हुआ था।
‘कुछ नहीं। एकदिन अचानक ही मुझसे मालकिन बोलीं, कि मैं तुझसे निकाह करने को नहीं कह रही , बस मौज-मजे के लिए कभी-कभी मेरे पास आ जाया कर…बोल, कबूल कहता है तो कानोंकान खबर नहीं होने दूंगी किसी को मैं।‘
सुनते ही जमीन में गड़ गया था।

बीस साल बड़ी हैं मुझसे। अम्मी जैसी इज्जत करता था अभीतक उनकी मैं… उनके ही मुँह से ऐसी घटिया बात? इतनी बेहूदी हरकत! अकेला पाते ही अब भी बस वही जिद लगातार,‘क्या सोचा, कुछ सोचा भी या नहीं तुमने?’ आप ही बताओ, क्या सोचूँ, जब कि मुमकिन ही नहीं यह । अब तो उनके सामने तक जाने में खौफजदा हूँ। और आज तो एक नई ही धमकी दे दी गई है। सुबह-सुबह ही बोलीं, ‘रात भर नहीं सोई हूँ, तेरे ही ख्वाब आते रहे हैं। मेरी ख्वाइश पूरी कर, वरना और भी तरीके आते हैं बात मनवाने के। खुश किस्मत है कि भा गया है , वरना तेरे जैसों की औकात ही क्या है!‘
अठ्ठारह वर्षीय एहसान भय से थरथर कांप रहा था।
‘क्या करेंगी आप मेरे साथ?’ पूछने पर दोबारा आँखें तरेरकर बोली थीं, ‘याद है हफ्ते पहले करीम का सिर जो चौराहे पर सरेआम धड़ से अलग हुआ था। मेरी ही एक सहेली ने शिकायत की थी, क्योंकि वह भी बहुत ऐंठता था और बात नहीं मानता था।‘
‘बहुत डर लग रहा है मुझे। बस वतन वापस जाना चाहता हूँ अब। मुझे नहीं चाहिएँ पैसे और यह नौकरी। इन दो ही महीने में मक्का-मदीना सब हो गए मेरे। मदद करो मेरी खालाजान आप। बाहर निकालो मुझे यहाँ से‘
फूट-फूटकर रोता किशोर गुलाबो के पैरों पर पड़ा अपने आंसुओं से पैर धो रहा था उसके और मुरझाते गुलाब-सा ही गुलाबो के चेहरे का भी पूरा रंग ही उड़ चुका था अबतक।
तुरंत उठाकर सीने से लगा लिया उसने तड़पते-बिलखते मासूम को और दृढ़ता से अपना मुँह पोंछते हुए बोली,
‘इसके पहले कि कोई कयामत बरपे, यहाँ से महफूज निकालना होगा तुम्हे। फिकर मत करो पर , अल्लाह कोई-न-कोई राह जरूर ही दिखाएगा।‘

कह तो दिया उसने परन्तु अब नेकी कर दरिया में डालने वाली गुलाबो की आँखों की नींद तक उड़ चुकी थी। रातभर बस एक उधेड़-बुन-सी ही चलती रही । पड़ोस के रहीम चाचा के इकलौते और जहीन शहजादे को अपना भतीजा कहकर लाई थी वह अलीगंज से यहाँ पर। वह भी यह कहकर कि इन्सान बनाकर ही लौटाएगी और वह भी अगले पांच साल में ही।
‘चंदा-सी दुल्हन और अपनी पक्की कोठी न हो तब कहना आप भी चचा !’
कोठी की कौन कहे अब तो एक नई ही बिसात बिछी दिख रही थी, जिसमें राजा न सही तो रानी के अगाड़ी भी था एहसान और घोड़ी की दुल्लत्ती खाने को उसके पिछाड़ी भी। अभी तक तो कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी, पर न करे खुदा अगर ऐसी कोई सच्ची-झूठी बदचलनी की शिकायत लिखवा दी गई, तो फिर तो कोई सुनवाई ही नहीं थी। खास करके बाहर से आकर बसे और उन जैसे लोगों के लिए। मौत ही बस एकतरफा रास्ता रह जाती है फिर तो और अठ्ठारह वर्ष की उम्र वाकई में बहुत छोटी है इस निरर्थक और दारुण सजा के लिए।
एहसान मियाँ के जानतक के लाले थे अब तो और वक्त नहीं था ज्यादा गुनने-बुनने तक को।
तभी फुदकती सुरैया आई और ‘अम्मी’ कहकर लिपट गई उससे। ध्यान नहीं गया पर गुलाबो का बेटी पर उस वक्त। दिमाग तो रौकेट की चाल से पूरे कायनात की परिक्रमा दे रहा था-पर क्या करे, कैसे करे, कुछ सोच ही नहीं पा रही थी।
वापस भेजने का अर्थ था -सब हलाल और हर सपने का खातमा।
जल्दी में कोई कदम नहीं लेना चाहती थी वह, पर यहाँ रहने में एहसान के लिए खतरे-ही-खतरे थे। मालकिन की नजर पड़ चुकी थी तीखे नाकनक्श और सुगढ़ व युवा शरीर पर। पालतू बनाना चाहती थी उसे अपनी हवस मिटाने को…खिलौने की तरह इस्तेमाल करना चाहती थी उसका। और इसका अर्थ क्या होता है भलीभांति पता था गुलाबो को। बात मान ली तो जिन्दगी नरक, शरीर बीमारियों का घर और नहीं मानो तो बीच चौराहे पर सर धड़ से अलग। फिर तो बोरी में बन्द होकर ही वतन को वापसी। नहीं ऐसा नहीं होने देगी वह, उमर ही क्या है अभी ?
सुबह-सुबह बेटी सुरैया को भी भेज दिया उसने एहसान के साथ मालकिन की बकरियाँ चराने। सुरैया की पिछले हफ्ते ही एहसान के साथ सगाई की थी उसने खूब धूमधाम के साथ और अगले महीने अलीगंज जाकर दोनों की शादी करने का भी इरादा था। शायद दोनों को साथ-साथ देखकर मालकिन के तेवर कुछ नरम हों?
पर पासा तो बिल्कुल ही उलटा पड़ा। हालात और भी बिगड़ गए। अब तो सुरैया भी खटकने लगी थी उनकी आँखों में। बात-बात पर डांटती और छिड़कती थी मालकिन। एहसान के साथ जाने के बजाय घर पर ही रोक लेतीं उसे। झाड़ू पोंछा सब करवाती और फिर भी अगर समय बचता तो अपने हाथ-पैरों की मालिश के लिए रोक लेतीं।
गुलाबो को भी पता चली पूरी बात और उलझन कम होने के बजाय और बढ़ गई। उसकी तो मानो सारी खुशियाँ ही दांव पर लग चुकी थीं अब।
कोई बड़ी मिल्कियत नहीं थी यहां पर। सब्जी का ठेला लगाता था शौहर पर काम जम चुका था और इतनी आमदनी हो जाती थी कि वतन में भी पक्का घर बनवा चुकी थी गुलाबो और यहाँ भी कोई कमी नहीं।
अगले दिन ही खरबूजे तरबूजे लेने जाना था। मदद के लिए उसने एहसान और सुरैया को भी भेजने का फैसला लिया। फैसला कठिन था और संयम व हिम्मत मांगता था। पर उन्ही के भले के लिए था और जरूरी भी था। जिन्दगी की बखिया पूरी उखड़े इसके पहले ही हर ढीले और टूटे टांके को संभालना था उसे। रख लिया मन पर पत्थर।
समझदार ही नहीं बहादुर भी थी गुलाबो। बिल्कुल तैनात फौजी की तरह ही ज्यादा वक्त नहीं लगा उसे सोचने और करने में।
चलते समय जब अपनी करीब-करीब सारी जमा-पूंजी ही बच्चों को सौंप दी तो दोनों के साथ-साथ शौहर की आँखों में भी सवाल थे। पर गुलाबो ने आँखें नीचीं करके भीगी पलकें पोंछ लीं। कुछ नहीं समझाया या बताया। दोनों देशों के बीच बना वह पुल रोज के छोटे-मोटे व्यापारियों के लिए अल्लाह की दुआ-सा ही था। जोड़ दिया था दोनों मुल्कों को भी और इनसानों को भी। जैसे ही उस पार पहुँचे, भूख लग आई और कुछ और करने के पहले खाना खाने की सोचने लगे। पर डिब्बा खोलते ही तो तीनों के होश उड़ गए। खाने के साथ-साथ चिठ्ठी भी थी, जिसमें साफ-साफ लिखा था कि पहली ही उड़ान से छोड़ दो देश। वापस नहीं लौटना। जाल बिछ चुका है और सुरक्षित जगह नहीं रही यह। बाज की नजर है उनपर और शिकारी ने भी अपने दाने फेंक रखे हैं। और हाँ, चिठ्ठी पढ़ते ही नष्ट कर देना। संभव हो तो खा लेना इसे भी। मुझसे राफ्ता करने की कोशिश मत करना और ना ही पुराने शहर या पते पर ही जाकर रहना अब। जल्दी-से-जल्दी मैं भी आती हूँ और खुद आकर फोन करूंगी। मेरा इन्तजार करना। मेरा यहाँ रुकना इसलिए जरूरी था कि किसी को शक न हो। मेरी फिक्र मत करना। शीघ्र ही मिलती हूँ आकर और अगर ना भी आ पाई तो तुम सबकी खुशी में ही मेरी खुशी है। तुम्हारे साथ ही हंस जी लूंगी मैं, यह मान जानकर कि इतना ही साथ था हमारा और इतनी ही जिन्दगी बख्शी थी अल्लाह मियाँ ने मुझे। आखिर इन कमबख्त सांसों का भी तो सभी का अपना-अपना कोटा होता है। बहुत बहुत दुआओं के साथ तुम सबके साथ सदा,
तुम्हारी अपनी गुलाबो।
तीनों भौंचक से एक-दूसरे को देख रहे थे। सोचने-समझने तक के लिए ज्यादा समय नहीं था उनके पास। जैसा गुलाबो ने कहा वैसा ही किया तीनों ने।
और तब चन्द घंटे बाद ही हैदराबाद के हवाई अड्डे से एक टैक्सी तीनों को नए और अनजाने सफर पर ले जा रही थी।
उधर गुलाबो ने भी तुरंत पुलिस में जाकर रपट लिखवा दी कि पति और बच्चे जो कल सुबह के गए हैं अभीतक लौटे ही नहीं , उसे बहुत फिक्र हो रही है उनकी। मदद करे पुलिस उसकी।
इसके पहले कि कुछ छान-बीन तक हो पाए रोती-कलपती गुलाबो ने भी अपना सामान बांध लिया था। रूह की पुकार यही थी।
पर शेखनी के तो मानो सारे मंसूबों पर पानी फिर चुका था। शिकार को ऐसे कैसे भागने दे सकती थी?
पुलिस को साथ लेकर तुरंत गुलाबो के घर पहुँची। पर अबतक तो वहाँ पूरी कहानी ही बदल गई।
‘जी , साहब आपतक ही आ रही थी मैं रपट वापस लेने को। सुबह-सुबह ही बच्चों का फोन आया। वतन पहुँच चुके हैं। अब्बू की तबियत खराब हो गई है अचानक ही और मुझे भी बुला रहे हैं, मैं भी जा रही हूँ आज ही।…’
खिसयानी शेखनी समझ रही थी पर क्या कहती कि असलियत क्या थी सारी जल्दबाजी की… खास करके अब, जब परिंदे निशाना साधने से पहले ही शाख से उड़ भी चुके थे।…

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