एक लघुकथाः लेखनी लघुकथा महोत्सव 25/26

एक लघुकथा

हो गई दुनिया मुट्ठी में
मदर्स डे पर मिला एक प्यारा उपहार, जिसे देख नयन छलछला उठे। भगवान का शुक्र है कि हमारे बच्चे दूर देश में रह कर भी हमसे आत्मीय रूप से जुड़े हैं।
इस प्यारे उपहार से मन खुशियों से भर गया। विदेशी फूलों का प्यारा गुलदस्ता और साथ में ढेरों विदेशी टॉफी। एक फैमिली फोटो भी साथ में था। मैं उसे देखते हुए सोचने लगी इस तस्वीर में मुग्धा और पार्थ अर्थात मेरे पोता और पोती, तो बड़े दिख रहें हैं। मुझे तो इनसे मिले साल भर से ज्यादा हो चुके हैं । फिर इनके साथ हम-दोनों कैसे हैं! मैं सोच में डूबी थी कि पीछे से पतिदेव ने कंधे पर हाथ रखा – “क्या सोच रही हो..?”
“वही जो आप सोच रहें हैं।”
“मतलब…”
“इस तस्वीर में मुग्धा और पार्थ इतने बड़े कैसे हो गए ..?”
“ये इस साल की तस्वीर है। ये लोग अभी छुट्टियों में नियाग्रा फॉल गए थे न वहीं की तस्वीर है।”
“हमलोग तो कभी नियाग्रा फॉल नहीं गए फिर इस तस्वीर में हम-दोनों कैसे हैं..?”
“ये एप्प का कमाल है। आजकल दुनिया वर्चुअल हो गई है। आप हो या नहीं हो आप हर जगह हो..”
ततक्षण एक क्लिक के स्वर उभरे और वॉट्स एप्प पर बेटा का भेजा हुआ एक वीडियो आ गया। वीडियो बहुत खूबसूरत था। हर नारी अपनी सुन्दरता को देख खुश हो जाती है। मैं कैसे नहीं होती। मेरे बचपन से लेकर अभी तक की तस्वीर। हर तस्वीर में मैं कितनी खूबसूरत लग रही थी। कहीं मैं अपनी माँ के साथ थी तो कहीं मेरी गोद में मेरे बेटा-बेटी बैठे थे। अंतिम कुछ तस्वीर में, मैं अपने पोता-पोती के संग थी।
मैं अकसर कहा करती थी कि मुझे दो ही वस्तु अपनी ओर आकृष्ट करती है। एक डेयरी मिल्क चॉकलेट और दूसरा रंग-बिरंगे गुब्बारे। इनमें दो तस्वीर ने मेरी इच्छाओं को मेरे सामने प्रस्तुत कर दिया। एक में मैं डेयरी मिल्क के टोपी व शॉल से सजी थी और दूसरे में मैं हजारों गुब्बारों से घिरी थी।
एप्प के इस कमाल को देख कर मैं सोच में पर गई, “बेटा को थैंक्स किस एप्प से भेजूँ!
हनुमान जी के समान दिल खोलने का कोई एप्प है क्या..!”
आजकल का का सबसे बड़ा गुरु तो गूगल है। सोचती हूंँ इस एप्प के बारे में वहीं किसी से पूछूंँ। पिछली बार ही तो बहू ने फेसबुक पर मेरा भी अकाउंट भी बना दिया था,यह कहते हुए कि “माँ इसकी सहायता से आप अपने पुराने मित्रों को भी ढूंढ सकती हैं।”
कमाल की दुनिया हो चुकी है, सब कुछ डिजिटल, रिश्ते भी ….
प्रियंका श्रीवास्तव’शुभ्र’

बेटा दो दिन के टूर से वापस आया और सीधा अपने कमरे में चला गया, जहां उसकी बीवी ने उसके जन्मदिन का केक और उपहार सज़ा रखा था, माँ ने आवाज़ सुनी तो रसोई से एक कटोरी लेकर सीधे बेटे के कमरे में चली गयी, उसको देखते ही बेटा चिल्लाया सठिया गयी हो क्या, पता नही बहु बेटे के कमरे में बिना नोक किये नही आना चाहिए , माँ उसी पल वापस निकल गयी, बेटा बोला पगला गयी है बुढ़ापे में ,
बहु बोली हाँ सही कहा पागल ही तो हो गई है इसीलिए जन्म देने वाली माँ अपने बेटे के जन्मदिन की खुशी में शाम से उसका मनपसंद हलवा बना रही है कभी दौड़ के बादाम ला रही है, कभी कांजु ढूढ रही है,शक्कर की जगह अपना वात्सल्य डाल रही है ,
बेटा स्तब्ध, उसी पल दौड़ कर रसोइ में गया जहां माँ कटोरी पकड़े खड़ी थी, बेटा सीधे माँ के चरणों मे लिपट गया,
माँ कुछ न बोली बस बेटे के सर पर आंसुओ के रूप में आशीषों की बौछार कर रही थी, और बेटे के आंसू जननी के चरण पखार क्षमायाचना कर रहे थे।
राम पारीक
शिलौंग

शराबी और यमदूत
एक शराबी नशे में धुत होकर घर आया। वह बड़बड़ा रहा था। पत्नी का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। इधर शराबी बड़बड़ा रहा था, उधर उसकी पत्नी भी चालू हो गई-“आज फिर पी कर आया है। सारी कमाई शराब में उड़ाता है।” पत्नी की बड़बड़ाहट के सामने शराबी की बड़बड़ाहट धीमी पड़ गई। शराबी भन-भन करते हुए गया और खाली चौकी पर पसर गया। थोड़ी ही देर में वह गहरी नींद में सो गया और देर रात वह मर गया।
यमदूत आया और उसे उठाकर ले जाने लगा। वह यमदूत के सामने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहने लगा-“यमदूत भाई, क्या आप मुझे एक दिन के लिए नहीं छोड़ सकते?” यमदूत बोला- “बिल्कुल नहीं, मेरी ड्यूटी रात 8:30 बजे ही समाप्त हो गई थी। मैं घर जाने ही वाला था कि तू मर गया। मेरे बॉस का आदेश हुआ कि जाओ, पहले उस शराबी को ले आओ, तब घर जाना। भूख से मेरी हालत खराब है। ज़्यादा दिमाग मत खाओ। चुपचाप मेरे साथ चलो।” शराबी बोला-“यमदूत भाई, मैं हाथ जोड़ता हूं। मेरी एक इच्छा अधूरी रह जाएगी। कम-से-कम 2 घंटे की ही मोहलत दे दीजिए।” यमदूत बोला-“ठीक है, बोलो क्या काम रह गया है तुम्हारा?” शराबी बोला-“मैं शराब पीकर घर आ रहा था। आधी बोतल शराब हाथ में थी, लेकिन बीवी के डर से रास्ते में ही झाड़ी में फेंक दिया है। यदि आप अनुमति दें तो मैं झाड़ी से बोतल निकाल कर पी लूं। मेरी आत्मा तृप्त हो जाएगी।” यमदूत बोला-“ठीक है, चलो पी लेना रास्ते में।” शराबी उस झाड़ी के पास पहुंचा और उसमें से शराब की बोतल निकाल कर गटागट पी गया। बोतल खाली करके वह रखने वाला था कि पत्नी ने भर बाल्टी पानी उसके ऊपर डाल दिया और तेज आवाज में चिल्लाने लगी-“आज तो मैं पूरे मोहल्ले वाले को बुलाकर इसकी करतूत बताऊंगी। अन्याय की भी हद होती है।” उसकी चिल्लाहट सुनकर पड़ोस की बिमला मौसी दौड़ी-दौड़ी आई और बोली-“क्या हुआ बेटी? क्यों और किस पर चिल्ला रही हो?” शराबी की पत्नी बोली-“क्या बताऊं बिमला मौसी, रात में शराब पीकर आया और चौकी पर सो गया। सुबह में क्या देखती हूं कि बगल में टेबुल पर रखी सर्दी की सीरप गटागट भी गया। बच्चों के लिए मंगवा कर रखा था। अब आप ही बताइए मैं क्या करूं?” तब तक और लोग जमा हो गए थे। सभी लोग उस शराबी की ही ग़लती बता रहे थे। तब तक उसका सारा नशा उतर चुका था। वह दीनता भरी निगाहों से सभी को देख रहा था। उस दिन उसे अपनी करनी पर पछतावा हो रहा था। उसी समय उसने शराब कभी न पीने की कसम खा ली।
सत्य नारायण मंडल
ग्राम-पिस्ता
पो.-खीरीबांध
थाना-बाईपास/जगदीशपुर
जिला-भागलपुर-812005

दुपट्टा
सावन की पहली बारिश थी। शहर के एक मैदान में एक छोटा-सा मेला लगा था। रंग-बिरंगी दुकानों के बीच तरह-तरह के फेब्रिक, रंग और डिज़ाइन से सजे दुपट्टों की भी एक दुकान थी।
रेणु और ज़ारा, दोनों सहेलियाँ, एक ही कॉलेज में पढ़ती थीं। दोनों पक्की सहेलियाँ थीं। दोनों की पसंद भी काफ़ी हद तक एक थी सिवाय रंगों के। रेणु को संतरी रंग बहुत भाता, तो ज़ारा को हरा रंग दिल से प्यारा था।
उस दिन दोनों मेले में घूमते हुए दुपट्टे की दुकान पर रुकीं। दुकानदार ने बड़ी मोहब्बत से उन्हें नए आये डिज़ाइन दिखाए। रेणु की नज़र एक सुंदर संतरी लहरियादार दुपट्टे पर पड़ी, तो ज़ारा को हरा गोटा-पट्टी वाला दुपट्टा पसंद आया। दोनों ने दुपट्टे खरीद लिये और रास्ते में चलते-चलते अपने-अपने दुपट्टों के रंगों और डिज़ाइन की तारीफ़ में क़सीदे काढ़ने लगी।
तभी पास से एक छोटी बच्ची दौड़ती आई, उसके कपड़े मैले और भीगे हुए थे। उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो दोनों सहेलियों को ठिठका गया।
रेणु ने अपना संतरी दुपट्टा उतारकर बच्ची के कंधों पर डाल दिया। ज़ारा ने हरा वाला निकालकर उसके सिर पर बाँध दिया।
बच्ची की मुस्कान में जो रंग था, वह किसी भी दुपट्टे से ज़्यादा चमकदार था।
उस दिन पहली बार, रेणु और ज़ारा को समझ आया कि रंग पहनने से नहीं, बाँटने से खिलते हैं।
-आभा खरे, लखनऊ

मानसिकता
हेलो ..हेलो
क्षिति
कैसी हो ?
ठीक
और कैसा चल रहा लॉक डाउन ?
वापस वैसा ही जैसा नई शादी में चलता था..
मतलब
फिर से….
कुछ हुआ है क्या ?
हाँ , वापसी हुई यहाँ तो पुरानी सभी बातें फिर से दोहराई जा रहीं, और पतिदेव की चुप्पी मुझे अब बहुत बुरी लगने लगी है, किशोरावस्था का बेटा और सास की वही पुरानी कहानी…
इतने सालों में सब बदल गया बस एक तेरी सास का छिछोरापन नहीं बदला।
जब बेटे बहु के बीच ही सोना रहता है उन्हें
क्यों ऐसी माएँ बेटे का विवाह करती हैं
तेरे ससुर क्या कहते है ?
कुछ नहीं वो दूसरे कमरे में पोते के साथ सोते हैं….
निधि मद्धेशिया
कानपुर

पूरी तरह तैयार
लड़का पूरी तरह तैयार हो कर आया था… सूट, टाई और पॉलिश से चमकते जूते।
“कहाँ जाना है? ” रोबीली आवाज़ ने पूछा।
“ऊपर जाना है।”
“क्यों जाना है ऊपर… अभी तुम उसके लिए तैयार नहीं दिखते ।”
“मैं पूरी तरह तैयार होकर आया हूँ… मेरे पास सारी डिग्रीयाँ हैं ।”
“वो काफ़ी नहीं ।” आवाज़ ने हिकारत से कहा।
“डिग्रियां काफ़ी नहीं तो फिर और क्या चाहिये ?” लड़का कन्फ़्यूज़ दिखने लगा।
“ऊपर जाने के लिए तुझे अपने कुछ हिस्से देने होंगे।” सपाट और ठण्डा जवाब आया।
“हिस्से…! मतलब?” लड़के की आँखें कुछ ज़्यादा ही फैल गईं
“अच्छा, ज़रा उचक कर दफ्तर के अंदर दाईं तरफ देखो और बताओ क्या हो रहा है?” उसने आदेश दिया।
लड़के ने पंजों पर सारा भार डाला और ध्यान से सुनने लगा। ” अरे ! वो दफ्तर का बाबू उस दूसरे आदमी से फ़ाइल आगे सरकाने के पैसे मांग रहा है।”
आवाज़ आग बबूला हो चिल्लाई “कान निकाल दोनों और रख यहाँ दहलीज़ पर । ये अंदर के माहौल के लायक नहीं हैं ।”
लड़के ने सहम कर कान निकाल कर रख दिए ।
आवाज़ एक बार फिर गूँजी…”अब बाईं तरफ़ देख कर बता कि वहाँ क्या हो रहा है ?”
उसने भरसक प्रयत्न किया… जो कुछ देखा उसे अवाक् करने के लिये काफ़ी था।
“बोल न क्या देखा ?”
“वो बड़े साहब किसी आधी उम्र की युवती के साथ अश्लील …”
“चुप ,चुप ,चुप जाहिल । तू तो बिल्कुल लायक नही अंदर जाने के । निकाल, अभी की अभी निकाल ये आँखें और रख यहाँ पायदान के नीचे। अंदर बस बटन एलाउड हैं।”
“जी ”
उसने मिमयाते हुए कहा और आँखें निकाल कर दे दीं । अंधेरे को टटोलते हुए पूछा “अब जाऊँ ?”
“अभी कैसे । ये पैर भी काट कर रख। ”
“फिर मैं चलुंगा कैसे?” अब वह लगभग बदहवास हो चला था।
“अंदर बैसाखियाँ दे दी जाएँगी रैड-टेपीज़म ब्रांड की । चल-चल जल्दी कर और भी हैं लाइन में वरना ।”
लड़के ने पैर भी काट कर दे दिए।
गरीबी मुस्कुराते हुए दफ्तर के द्वार से हट गई और बोली “जा अब तू पूरी तरह तैयार है।”

सुषमा गुप्ता

तटस्थ
उस दिन अचानक टीवी पर न्यूज़ देखते हुए सुजीत बाबू बहुत बेचैन होकर सुनैना जी को आवाजें लगाने लगे। वह किचन से झल्लाते हुए निकलीं,
” आप इतना चिल्ला क्यों रहे हैं… क्या धरती फट गई है या फिर आसमां गिर पड़ा है। तसल्ली से बात करना तो आपने सीखा ही नहीं है?”
पत्नी के गुस्से का उन पर कोई असर नहीं हुआ बल्कि व्याकुल होकर और भी तेज़ी से बोले,
” हॉं भई हॉं ! ऐसा ही समझो। जल्दी यह बताओ … दिवाकर, दिव्या और बच्चे इस समय कहॉं पर है?”
सुनैना जी तमतमा गईं,
” कहॉं है …इसका क्या मतलब है? आपको तो पता है न…वे चारों कश्मीर यात्रा पर हैं।”
” अरे देवी जी, तभी तो पूछ रहा हूॅं। अभी अभी न्यूज़ में देखा है कि पहलगाम में आतंकी हमला हो गया है…।”
कहते कहते सुजीत बाबू हकलाने लगे थे और सुनैना देवी तो चक्कर खाकर गिरने वाली थी। किसी तरह कॉंपते हाथों से फोन लगाया। थोड़ी देर से ही सही,पर दिवाकर ने फोन उठाया और बोला,
” पापा, आप बिल्कुल मत घबड़ाइए। हमलोग सुबह पहलगाम की ओर निकलने ही वाले थे पर दिव्या को हल्की हरारत सी महसूस हो रही थी…”
सुनैना जी बीच में रोते हुए बोलने लगीं,
” अरे, ईश्वर का लाख लाख शुक्र है। अब वहां नहीं जाना है। तुरंत वापिस लौट आओ।”
दिवाकर ने अपने माता-पिता की चिंता को समझ लिया था। प्यार से बोला,
” यस, हमलोगों ने भी सभी समाचार देखें। चारों ओर बहुत खलबली मची हुई है। एयरलाइंस वालों ने आपदा में अवसर तलाश कर दूना किराया बढ़ा दिया है।”
सुजीत बाबू भगवान के आगे नतमस्तक होते हुए
व्यग्रता से बोल पड़े,
” अरे बेटा, आजकल किसी को किसी से कोई मतलब ही नहीं है। ये एयरलाइंस वाले भी कौन से हमारे सगे हैं। वैसे भी ऐसे मौकों पर पैसा नहीं देखा जाता। जान है तो जहान है। तुम कुछ भी आगा पीछा सोचना छोड़ कर तुरंत वापसी के टिकट कटवा लो।”
सुजीत बाबू ने झटके से टीवी बंद कर दिया और अपने ड्राइवर को बुला कर खुशी के वेग से चिल्ला ही पड़े,
” अरे शंभू, जल्दी से गाड़ी निकाल कर हल्दीराम की दुकान से कुछ मीठा नमकीन ले आ। इस खुशी के अवसर को सेलीब्रेट तो करना बनता है न।”
शंभू बेचारा एकटक उनका चेहरा देख रहा था। टीवी पर रोते बिलखते लोगों को देख कर उसकी आत्मा फटी जा रही थी। वह कांपते पैरों से कार की तरफ़ बढ़ने लगा।
नीरजा कृष्णा
पटना

मौसम और भूख
“अरे.. इतनी ठंड में.. काम पर आ भी गए?”
“मालिक.. भूख का कोई मौसम नहीं होता। पेट की आग ऐसी होती है। आप.. काम बतला दीजिए, बस।”
कनक हरतालका


आज का द्रोणाचार्य
राज्यस्तर पर दसवी बोर्ड परीक्षा में अब्बल स्थान प्राप्त करने पर स्वास्तिक को शिक्षा मंत्री द्वारा सम्मानित किया जा रहा था।इस गौरवान्वित अवसर पर अपने होनहार छात्र को शील्ड व प्रमाणपत्र ग्रहण करते देख स्वास्तिक के गुरू विशंभर शाह गद्-गद् हो गये। ताली बजाते हुये खुशी से तरल हुई ऑखों में अतीत के चलचित्र तैर गये।
सरकारी पाठशाला में कक्षा दसवी में अध्ययनरत बच्चों में मेरा ध्यान अमय के प्रति गुरूधर्म के साथ अपने ही भाईचारे की भावना से ग्रस्त हो गया।जबकि स्वास्तिक और अमय दोनों ही शिक्षा ग्रहण करने में टक्कर थे। पर मैं अमय पर अतिरिक्त ज्ञान की गंगा उड़ेलकर स्वास्तिक के साथ द्विभाती कर देता। सही काम करके लाने पर भी उसकी फटकार लगाता। अमय के साथ घर पर ट्यूशन लेने की बात पर सुनकर भी अनसुनी कर देता।
मेरी अवहेलना ने स्वास्तिक को और दृढ़ निश्चयी बना दिया । उसकी लगनशीलता मेहनत का परिणाम देख मेरे गुरू धर्म को पल भर के लिए कटघरे में खड़ा कर दिया जब अर्द्धवार्षिक परीक्षा में स्वास्तिक को अमय से आधा प्रतिशत कम प्राप्त हुआ।
अपनी ओर देखती स्वास्तिक की चमकती ऑखों को देखते तो कभी दोनों की अंकसूची को उलट-पुलट करते। अंतर्द्वंद्व से बाहर निकल स्वास्तिक को शाबासी देते हुये कहा।
“कोई भी समस्या हो कभी भी सूकूल या घर पर आकर निदान कर सकते हो।”
अतीत से विचरण करते विशंभर शाह पैरों पर हाथों के स्पर्श से चेते।चरणस्पर्श करते स्वास्तिक को भावविभोर होकर उसकी पीठ थपथपाई और अपनी जेब से कलम निकालकर उसके हाथ में थमा दी।
बबीता गुप्ता
बिलासपुर, छत्तीसगढ़

नाम
“यह कैसा नाम रखा है आपने अपने बेटे का मिस्टर राय?” थॉमस ने जब अपने ऑफिस में साथ काम करने वाले रोहित से यह बात पूछी तो रोहित को कोई आश्चर्य नहीं हुआ।
” क्यों क्या हुआ मिस्टर थॉमस?”
“आप पाँच साल से विदेश में रह रहे, हमारे साथ काम कर रहे, उठना बैठना कर रहे हमारे साथ,आपके बेटे का फ्यूचर भी यही सेट होगा और बेटे का नाम भरत ..?वह भी जब बड़ा होगा तो आप से यह सवाल करेगा।”
“सवाल नहीं करें इसलिए तो अभी ही उसका नाम भरत रख दिया है। विदेश में रहने और उठने बैठने से हम अपने संस्कार और संस्कृति तो नहीं ना भूलेंगे दोस्त और बेटा मेरा, यह फंक्शन भी मेरा पारिवारिक है, जो चाहे मैं नाम रखूँ। क्या आप लोग इंडिया जाकर अपनी बेटी का नाम वहाँ के नाम से रखोगे ?”
“कभी नहीं।”
” फिर मुझसे यह उम्मीद क्यों कर रहे हो ?भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा है ।इससे अच्छा कोई नाम हो ही नहीं सकता मेरे बेटे के लिए। पता नहीं बेटे को लेकर देश जा पाऊँ या नहीं।उसे अपने नाम से तो देश की खुशबू और संस्कार जरुर मिलेंगे इसलिए बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि नाम सोच समझ कर रखना चाहिए।”थाॅमस को उसका जवाब मिल चुका था।
” ठीक कहा रोहित! सॉरी मुझे माफ कर देना। यह मुझे थोड़ा ओल्ड फैशन और टिपिकल लगा इसलिए मैंने कह दिया था। हम तो जो फैशन में रहता है वही नाम रख लेते हैं, इतना नहीं सोचते शायद इसीलिए मेरे बेटे अपने नाम के अनुरूप बन गए हैं और मैं सोचता रहा कि यह कैसे हो गया ।मैं भी पता नहीं बच्चों को इंडिया घुमा पाऊँ या नहीं ।”
“अच्छा चलो! बाकी लोग हमारा इंतजार कर रहे होंगे ।हम लोग कुछ ज्यादा ही सीरियस हो गए ।”रोहित ने थॉमस को गले लगाते हुए बोला।
“आप सच्चे भारतीय हो रोहित! यही बात आपने कही होती तो शायद में इतनी शांति से इसका जवाब नहीं देता और लड़ाई हो जाती है पर आपने अपने संस्कारों का पालन करते हुए मुझे समझाया और समझा भी। थैंक्स दोस्त ।”रोहित को अपने देश और देश की मिट्टी पर गर्व महसूस होने लगा और अपने माता-पिता के संस्कारों पर भी जिसने उसका व्यक्तित्व ऐसे बनाया और वह भी अब अपने बेटे को यही संस्कार देगा।
डॉ मधु कश्यप
वाराणसी

उससे मिलना
मन को विश्वास नहीं हो रहा था,क्या हुआ उस दिन….
क्या यह कोई सपना था? इतने लंबे अरसे बाद वो कैसे मेरे सामने ….
वो जब तक मेरे सामने था मुझे वहां से हिलने तक का मन नहीं कर रहा था, क्योंकि उसके हल्के नीले रंग के शर्ट के किसी सिलवट में मेरे दिल का एक नन्हा सा टुकड़ा अटक कर रह गया था।
उससे वो छोटी सी मुलाकात मुझसे मेरी सुकून चैन सब छीन रही थी।
मैं न चाह कर भी उसके ख्यालों में गोता खा रही थी। बहुत मुश्किल था दिखावटी हंसी के पीछे दर्द को छुपाना,….
एक बार मिलने की चाहत, उसके बदन की खुशबू , उसका मुझसे मिलने के लिए बेकरार आंखें।
फिर से महसूस करना चाहती थी।
बहुत समझाया और संभाला अपने आप को….
जिंदगी का एक बेहद खूबसूरत पल, पल भरमें बीत गया….
मैंने उसे और उसने मुझे सिर्फ आंख भर देखा ।
वो फिर कभी नहीं आया …
फिर कभी नहीं .…
शायद कभी नहीं आएगा……

झरना मुखर्जी
वाराणसी

बदलाव

ऑफिस में प्रमोशन की लिस्ट लगी थी। नोटिस बोर्ड के सामने भीड़ जमा थी। आरव का नाम सबसे ऊपर देखकर तालियाँ बजीं। वह मुस्कुराया, पर कुछ चेहरों की मुस्कान अचानक गायब हो गई।
‘वाह! प्रमोशन? लगता है किस्मत खुल गई इसकी!’
एक ने ताना कसा।
किस्मत?अरे भाई, बिना कुछ जोड़-तोड़ के ये मुमकिन नहीं, दूसरे ने फुसफुसाया।
दिन भर यही फुसफुसाहट अफवाहों का रूप लेती रही-
बॉस को खुश किया होगा, तभी ये आगे निकला है।
इतने साल से मेहनत करने वाले लोग पीछे, और ये ऊपर!
आरव सुनता रहा, चुप रहा। कल तक जो लोग दोस्त थे,आज सांप क्यों बन गए?
शाम को लिफ्ट में जाते हुए उसने सुना-
‘इसे गिराना पड़ेगा, वरना हम सबका रास्ता रोक देगा।’
घर पहुँचा तो उसकी नज़र गली के बच्चों पर पड़ी। एक बच्चा सीढ़ी पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था, और दूसरा बार-बार उसका पैर खींच रहा था। आरव ने दोनों को अलग किया और मुस्कराकर कहा-
‘अगर तुम इसे गिराओगे, तो खुद ऊपर कैसे चढ़ोगे?’
यह सुनकर बच्चा चुप हो गया। आरव के मन में गूंज उठा-यही तो हो रहा है मेरे साथ।
अगले दिन ऑफिस की मीटिंग में आरव ने एक वाक्य कहकर सबको खामोश कर दिया-
दोस्तों, किसी को गिराकर आप ऊँचे नहीं हो सकते। जीत का असली स्वाद तब है जब आप किसी को चढ़ने में सहारा देते हैं। याद रखिए-
सीढ़ी बनने में ही सच्ची ताकत है, सांप बनने में नहीं।
उसके शब्द जैसे सबके दिल में उतर गए। कमरे में पहली बार खामोशी थी, पर यह खामोशी बदलाव का वादा कर रही थी।
रेनू शब्दमुखर

मातृ -शक्ति
“यही चित्र “पिता “को पूरी तरह अभिव्यक्त कर रहा है।पिता कोई भी हो, कैसा भी रूप हो, उनका साथ हमेशा सुरक्षा का अहसास देता है।
“पितृ -दिवस” पर प्रथम पुरुस्कार इसी को जाता है”कहते हुए मुख्य अतिथि ने जैसे ही पुरुस्कृत चित्र पर से आवरण हटा कर विजेता का नाम घोषित किया, विजेता के रूप में अपना नाम सुन मनस्वी चौंक पड़ी।उसने तो चित्र रखा ही नहीं था,फिर कैसे ?गर्ल्स कॉलेज में चल रहे पितृ-दिवस के इस आयोजन के अंतिम दिन सबका आना अनिवार्य न होता तो वो कभी आती भी नहीं।
ये चित्र उसका अधूरा सपना था।जन्मदाता के बारे में उसकी सोच का,जिसे उसने चित्रकला की बारीकियाँ सीखते ही सर्वप्रथम उकेरा था,अपने पिता की गोदी में छुपी नन्ही-सी बेटी का। पर जब असलियत पता चली तो उसने इस चित्र छुपा कर रख दिया था,क्योकि पिता नाम से ही उसके मन में टीस उठने लगती थी।
उसके साथ ही बैठी उसकी रूममेट रिया मनस्वी को बधाई देते हुए उससे आ लिपटी तो उसे समझते देर नहीं लगी कि ये कारस्तानी उसी की है। “ये तुमने ठीक नहीं किया रिया” वो कह उठी।
अपना नाम बार-बार पुकारे जाते सुन वो लड़खड़ाते हुए उठी।फिर संभल कर दृढ़ और सधे क़दमों से आगे बढ़ कर स्टेज पर पहुँची। माइक हाथ में लेते हुए उसने चित्र को चुनने के लिए धन्यवाद देते हुए आगे कहा-
“स्त्री की कोख में पनपकर बच्चा जन्म लेता है तो सबको पता चल जाता है उसकी माँ के बारे में।पर मात्र स्त्री को ही पता होता है इस बच्चे के जनक का नाम। अगर एक नासमझ -नाबालिग की कोख में कोई अनजान पापी जबरन बीज रोपित करे तो वो होने वाले बच्चे को कैसे बतायेगी कि उसका जनक कौन है?
ये चित्र मेरा सपना जरुर था पर पूरा किया मेरी माँ ने।आज मुझे ये बताते हुए कोई संकोच नहीं है कि इस जबरन रोपे हुए बीज को नष्ट करने के बदले समाज से लड़ते हुए उन्होंने मुझे जन्म दिया।
मैंने स्वयं अपना ये चित्र नहीं रखा था प्रतियोगिता हेतु।पर आज मैं चाहती हूँ कि “पितृ -दिवस “के बदले “मातृ -शक्ति “रूप में इसका चुनाव कर पुरुस्कृत किया जाये।
महिमा वर्मा

पिज्जा…
आज मिनी का मन कहीं नहीं लग रहा था…कल शाम की ही तो बात है जब अपनी मां से बहुत लड़ाई करी थी पिज़्ज़ा के लिए.. माँ ने कितनी बार ही समझाया था उसे कि पिज़्ज़ा सेहत के लिए अच्छा नहीं होता है… और वह लोग इतने अमीर भी नहीं कि रोज रोज पिज्जा खिला पाएं बेटी को… मिनी ने बड़ी बेरुखी से उनसे कह दिया था…” हाँ माँ मुझे पता है बेटी को नहीं खिला सकती अगर… मैं आपकी बेटी हूँ ना अगर बेटा होता तो तुम जरूर खिलाती पिज़्ज़ा और रोज रोज खिलाती चाहे जैसे भी .. मैनेज करती लेकिन खिलाती क्योंकि तब तुम मन से खुश रहती.. मैं अक्सर सुनती रहती हूँ बाबा दादी के ताने… शायद उन तानों का ही गुस्सा तुम मुझ पर उतारती रहती हो… और मेरे मन का कुछ भी नहीं करने देती हो ”
और मिनी गुस्से में बिना कुछ खाए पिए सो गई थी… और सुबह उठकर भी माँ से बात नहीं करी थी और सीधे स्कूल चली आई… स्कूल में भी मिनी ने किसी से बात नहीं किया…. और लंच के समय टहलती हुई स्कूल के पीछे ग्राउंड में चली गई…जहाँ एक मात्र हड्डी का ढांचा बनी कुतिया अपने 5 बच्चों को…दूध पिला रही थी… पांच छोटे छोटे प्यारे प्यारे पिल्ले मां के मात्र हड्डी बचे शरीर के ढांचे से अपना पेट भरने के लिए तरह तरह से प्रयास कर रहे थे… देख मिनी की आंखों में आंसू आ गया… और दौड़ कर क्लास में गई और अपना बैग खोल टिफिन निकाल खाने लगी… उसकी आंखों से अविरल आंसुओं की धार बता रही थी… आज शायद वह माँ का मतलब जान चुकी थी!
सीमा मधुरिमा
लखनऊ

कुत्ते की मौत…
हिंदी पाठ में “कुत्ते की मौत” मुहावरा मिला, वह भी कुछ ऐसे उदाहरण के साथ : “कृष्ण ने कंस को कुत्ते की मौत मारी”। रुककर मैंने छात्रों से पूछा :
– वैसे तुम लोगों को पता है कि वास्तव में कुत्ते की मृत्यु कैसे होती है? प्राकृतिक व सहज रूप से हो तो?
उनमें से कुछ लोग मेरी तरह गांव में बड़े हुए थे तो उन्हें पता था। कुत्ता एक भद्र पशु होता है। जीवन भर मनुष्य का साथ निभाकर, अपना पूरा प्यार और निष्ठा मनुष्य को देकर वह अपनी मृत्यु से भी अपने स्वामि के लिए कोई असुविधा नहीं खड़ा करना चाहता है। कुत्ते को जब अनुभव होता है कि मृत्यु आनेवाली है तो वह चुपचाप घर और गांव से दूर चला जाता है और कहीं जंगल में शांति से ढेर होकर प्रकृति में विलीन हो जाता है। बूढ़ा कुत्ता अचानक घर से गुम हो जाए तो लोगों को पता होता है, ढूँढते भी नहीं…
कुत्ते के लिए मुझे बहुत बुरा लगता है। अपने सबसे निष्ठावान मित्र, उतने सुंदर तथा बुद्धिमान प्राणी को मनुष्य ने कितनी क्रूरता से गाली-गलौज का पात्र बना दिया है अनेक भाषाओं में…
कुछ ही दिन पहले उन्हीं छात्रों के साथ महाभारत के अंतिम खंड की चर्चा की थी जिस में विशेष ध्यान कृष्ण के देहांत पर दिया गया था।
– तो क्या बोलोगे? सच्चे अर्थों में कुत्ते की मौत कौन मरा था?
वे चुप रहे पर उनकी आँखों में एक भावुक सी चमक दिखी…
कंस की मृत्यु एक दुष्ट मनुष्य की मृत्यु थी। इस प्रकार एक निर्दोष पशु का निरादर करने की क्या आवश्यकता है? और अपना पूरा जीवन मानव-जाति की सेवा तथा मानव-चेतना के विकास को समर्पित करके गहरे वन में जाकर अपना शांतिपूर्ण अंत खोजनेवाले कृष्ण को लेकर हमारे मन में तो बस अलौकिक प्रकार के अलंकार आते हैं अधिकतर… पर वे तो उतने ही लौकिक भी थे जितने दिव्य…
हाँ भक्तो, सुनो और चाहो तो पत्थर मारो मुझो! इस लोकोक्ति का यदि प्रयोग करना अनिवार्य है तो कृष्ण ही कुत्ते की मौत मरे थे। सौभाग्य हो तो मुझे भी एक दिन ऐसे ही मरना है…

यूरी बोत्वीकिन
यूक्रेन


‘दाना पानी ‘
घर के बाहर लगे नीम के पेड़ की घनी शाखाओं में चुपचाप बैठा नर गौरैया एकाएक बोल उठा ,” अरी भाग्यवान! नीचे देख रही हो खाली पड़े पात्र।”
” हाँ प्रिय, आज बाजरे और पानी के दोनों पात्र खाली हैं!”
” पता नहीं क्या हुआ? दादा जी भूलने वाले लोगों में तो नहीं हैं! ” रुआंसा सा स्वर उभरा।
तभी एक शाखा पर उभरी निंबोली बोल उठी ,” कई दिनों से मुझे तोड़ने भी नहीं आ रहे हैं। अच्छा लगता था जब वे मुझसे बतियाते थे और कहते थे – री कड़वी! बहुत गुणकारी है तू!!”
” क्या हुआ आज ? दादा जी तो ठीक हैं न !”
” शायद नहीं! वे घर छोड़कर जा रहे हैं। कल कहते सुना था मैंने। ” निंबोली बोली।
” कहाँ? ” नर गौरैया के स्वर में वेदना थी।
” पता नहीं!! तबियत खराब होगी?”
घर के अंदर से आ रही जोर जोर की आवाजों ने उसका ध्यान अपनी ओर खींच लिया। दादा जी का लड़का चिल्ला रहा था किसी पर।
” यह तो रोज हो रहा है यहाँ आजकल! कुछ दिनों से!!” निंबोली ने स्पष्ट किया।
तभी दरवाजा खुला और दादाजी अपना एक बैग लगभग घसीटते से बाहर निकले। चीं– चीं- चीं– गौरैया ने उनका ध्यान अपनी ओर खींचा वे आँखों में आँसू भरे उसकी ओर देखकर बोले :
” मैं जा रहा हूँ, चीं चीं! अपने नये घर कभी न लौटने के लिए! तुम भी जाओ कहीं और। अब तुम्हारा अन्न जल उठ गया है यहाँ से! जैसे मेरा—”
नीम की सभी शाखाओं ने तेज तेज डोलकर जैसे अपना विरोध जताया। गौरैया का जोड़ा कुछ देर तक अपने को टिकाये रखने की कोशिश करता रहा। और अंततः दोनों उड़ चले एक नया ठिकाना खोजने के लिए।
अन्न और जल के दोनों खाली पात्र एक दूसरे को ग़मगीन नजरों से निहार रहे थे।□
– अशोक जैन, गुरुग्राम


बी पॉजिटिव

वॉर्ड के बाहर खड़ी अपूर्वा बेचैन थी राहुल के इंतजार में। वो अपने जीजा हरीश के लिए खून लाने गया था ब्लड बैंक। इधर हरीश पर एक-एक पल भारी पड़ रहा था।
अपूर्वा राहुल को खाली हाथ देखते ही गुस्से और बेबसी से बिफर उठी “तुम खाली हाथ? तुम्हें पता है न हरीश को हर हफ्ते ब्लड नही चढ़ाया जाएगा तो नहीं बचेंगे!

घबराया हुआ राहुल बोला “दीदी तुमने जो डीएम की चिट्ठी दी थी उसे दिखाने के बाद, ब्लड बैंक के बड़ा बाबू ने कहा कि आज बी पॉजिटिव ग्रुप का ब्लड नही है। लेकिन एक चपरासी ने बताया कि बिना पैसे दिए यहां कोई खून-वून नहीं मिलेगा चाहे प्रधानमंत्री की ही चिट्ठी ले आओ।”

हरीश की हालत धीरे-धीरे और खराब हो रही है। अपूर्वा बदहवास सी दौड़ पड़ी डॉक्टर को बुलाने ।

देखते ही डॉक्टर ने कहा “ये दवाइयाँ और ब्लड तुरंत ले आइए। आप लोगों को बहुत पहले कहा था अब तक क्या कर रहे हैं?”

अपूर्वा- ”डॉक्टर साहब हम लोगों के पास पैसे नहीं हैं इसलिए इंतजाम नहीं हो पा रहा है! प्लीज़ आप मदद कीजिये।”
डॉक्टर- ”अस्पताल में स्टॉक ही नहीं है।”

अपूर्वा रोती हुई घबराई सी बाहर निकली ही थी कि नर्स ने पास आकर फुसफुसाया –

“मैडम, बाहर मत जाइए। अस्पताल की कैंटीन के पास शुक्ला मेडिकल स्टोर के पास जाइए। वहां सब इंतजाम हो जाएगा।”

अपूर्वा तेज कदमों से लगभग दौड़ते हुए शुक्ला मेडिकल स्टोर पहुंचती है । दुकानदार दस हजार रूपए देने पर तत्काल सभी इंतजाम हो जाने का आश्वासन देता है।
अपूर्वा-“लेकिन दस हजार कहां से लाऊं भैया! पैसे होते तो सरकारी अस्पताल में भर्ती क्यों कराते? सब कुछ बेच कर अब लाख कोशिशों के बाद भी एक बोतल खून के भी पैसे नही है!”

शुक्ला उसके गले में मंगलसूत्र को देखकर मुस्कुराता है और वह तुरंत मंगलसूत्र गले से निकाल कर उसके हाथों में रख देती है।
शुक्ला “अरे अरे! ये क्या…? ये सब हम नहीं लेते। नगद रूपया दीजिए…!”

हाथ जोड़ी मौन अपूर्वा के आंखों से बस आंसू बह रहे थें। शुक्ला की जैसे मन की मुराद पूरी हो गई हो, दस हजार के ऐवज में उसे कम से कम तीस हजार का मंगलसूत्र जो मिल रहा था। उसने चुप से मंगलसूत्र रख लिया और अंदर चला गया।

अपूर्वा की नजरों के सामने उसके खुशहाल वैवाहिक जीवन की मधुर स्मृतियां कौंध गईं – जब शादी की सालगिरह में हरीश ने उसे मंगलसूत्र उपहार में दिया था और बदले में कभी गले से नहीं उतारने का वचन लिया था। और उसी दिन की तो यह बात थी कि रेस्टोरेंट से आते वक्त अचानक उसे चक्कर, थकान और नाक से खून आने लगा। जाँच हुई तो रिपोर्ट ने घर की नींव ही हिला दी – “एप्लास्टिक एनीमिया”।

डॉक्टर सारे रिपोर्ट देखकर बोला “अब हरीश को कुछ महीनों के अंतराल पर हमेशा ब्लड चढ़ाना पड़ेगा क्योंकि उसके शरीर अब खुद ब्लड बन नहीं पायेगा ।”
पहले कुछ महीनों,फिर कुछ हफ्तों और फिर कुछ दिनों के अंतराल पर खून और दवाईयों के कारण घर का एक एक कीमती सामान बेचना पड़ा और यहां तक कि आज ये मंगलसूत्र। हरीश हमेशा कहा करते – बी पॉजिटिव।

लो बहिनजी! की आवाज़ से उसकी तंद्रा टूटी। वह तेज़ क़दमों से हरीश के वार्ड में जैसे पहुंची ,राहुल रो रहा था। अपूर्वा हरीश के बेड के पास दौड़ी परंतु हरीश वहाँ था कहाँ , वह तो अपनी अनंत यात्रा पर निकल चुका था। सुध खोती अपूर्वा के अंसतुलित हाथों से गिर चुकी खून Iकी बोतल वहाँ के फर्श को लाल कर चुकी थी।

अर्पणा सन्त सिंह
जमशेद पुर

चोरानंद

कुछ साल पहले इसी शहर में एक सीधा-साधा साधु भीड़ के द्वारा मार दिया गया था। रात में बंद दुकान के बाहर बैठे हुए साधु को देखकर भीड़ जमा हो गयी।
एक ने पूछा-”कौन हो?”
उत्तर आया साधु हूँ।
भीड़ से दूसरी आवाज उभरी
”भला कोई खुद बताएगा मैं चोर हूँ!”
तीसरी तेज आवाज आयी
”मारो स्साले को”
कई आवाजें गूँजी मारो…मारो…
पब्लिक के लात-घूँसे उसकी साँसे थम जाने के बाद ही रुके।
आज इसी शहर में साधु बनकर एक चोर आया है।
भीड़ जमा है
उसने ख़ुद अपना परिचय दिया
”मैं चोर हूँ”
भीड़ से एक आवाज आयी
”वाह! कितनी सच्चाई है दिल मेँ।”
दूसरी आवाज उभरी
”सच बात है भला कौन चोर नहीं इस दुनिया में’
तीसरी तेज आवाज आयी
”बोलो चोरानंद बाबा की….”
कई आवाजें एक साथ गूँजीं
जय….
जय-जयकार से पूरा शहर गूँज उठा
© प्रवीण श्रीवास्तव ‘प्रसून’
ग्राम : सनगांव पोस्ट बहरामपुर ,फतेहपुर,उ.प्र.
पिन कोड- 212622
मोबाइल/व्हाट्सएप-8896865866
ईमेल- praveenkumar.94@rediffmail.com

सूर्योदय पश्चिम में
: :
रविवार का दिन था। घर में मन नहीं लग रहा था तो मिस्टर एवं मिसेज शर्मा ने गाड़ी उठाई और चल दिए शहर के बाहरी हिस्से में बने वृद्धाश्रम की ओर। वहाँ मेन गेट में प्रवेश करते ही वृद्धाश्रम के मैनेजर ने उन्हें देख लिया और देखते ही उसकी त्योरियाँ चढ़ने लगीं।
उन्होंने पहुँचते ही बड़ी विनम्रता से नमस्कार किया तो मैनेजर ने बड़े ही अनमने ढ़ंग से नमस्कार का जवाब देते हुए पूछा- ‘‘कहिए क्या काम है ?’’
वे कुछ कहते उससे पूर्व ही वह स्वयं बोल पड़ा- ‘‘हाँ-हाँ माँ को वृद्धाश्रम भेजना है।’’
‘‘नहीं-नहीं…………।’’
‘‘तो पिता को………….?’’
‘‘अजी, नहीं जी………..।
‘‘तो क्या दोनों को……….?’’
‘‘जी नहीं भाईसाहब…………।’’
वे फिर अपनी बात पूरी करते उससे पहले ही मैनेजर बोलने लगा- ‘‘लोग यहाँ अपने बूढ़े एवं अशक्त माँ-बाप को लेकर आते हैं। फिर कोई उन्हें वापस लेने नहीं आता और न ये वापस जाना चाहते हैं। तो जगह खाली हो तो कहाँ से ?
सारे कमरे भरे पड़े हैं। रखें कहाँ इन्हें ? ये बेचारे ऊपर जाएँगे तभी जगह खाली हो पाती है। आप ऐसा करो। अपना नाम, पता, सम्पर्क नम्बर लिखवा दो, जब जगह खाली होगी तब आपको सूचित कर देंगे। उस समय ले आइएगा….।’’
वह रुका तब शर्मा युगल ने मैनेजर को सारी बात इस प्रकार बताई- ‘‘महाशय, माँ-बाप कोई जानवर नहीं होते जिन्हें वृद्धाश्रम भेजा जाए। हमारे माता-पिता अभी छः महीने पहले गुजर गए। उनके बिना घर काटने को दौड़ता है। सूना-सूना सा लगता है। हम चाहते हैं कि कोई ऐसा वृद्ध युगल दंपती हो जो हमारे घर में हमारे साथ हमारे माँ-बाप की तरह रह सके तो हम उन्हें इसी समय ले जाने को तैयार हैं। हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि उन्हें हमारे घर-परिवार में कोई तकलीफ नहीं होगी….।’’
मैनेजर की आँखें फटी की फटी रह गईं। अपनी बीस साल की नौकरी में इस तरह की बात वह पहली बार सुन रहा है।
क्या आज सूरज पश्चिम में उदय हुआ है ?
माणक तुलसीराम गौड़

प्रश्न
यज्ञसेनी, युग-युगांतर से भटक रही है, अपने प्रश्नों के साथ। द्वापर से कलयुग तक आते-आते उसकी वेशभूषा,भाषा सब बदल गई है अब वो साफ-साफ पूछती है,”चीरहरण का दृश्य देखकर पीड़ा होती है या लार टपकता है?”
नीना मंदिलवार


अमृतकाल
ऑफिस से लौटने का, यह मेरा रोज़मर्रा का रास्ता था, जिसमें वह बहरूपिया, नियत स्थान पर स्वांग बनाये, नित्य ही दिख जाता था, पर उसका आज का स्वांग देख, मैं अनायास ही ठिठक गया। आज उसने गाँधी का बहरूप रचा था। वह गाँधी के तीन बंदरों वाली मुद्रा में, खुद को सिल्वर रंग से रँगे, रजत प्रतिमा सा, जड़वत बैठा था। उसने अपनी आँखों, कानों और मुँह को अपनी उँगलियों से, कस कर बन्द कर रखा था। पर, आश्चर्य की बात ये थी कि, रोज नोटों से भरी रहने वाली, उसके आगे बिछी चादर, आज खाली थी।
गाँधी और उनके बंदरों का यह अनूठा घालमेल, मुझे चकित कर गया। कौतूहल वश स्वयं को रोक न सका, और उसके समीप जाकर, पूछ ही बैठा, “क्यों भाई, तुम अकेले ही गाँधी और उनके तीनों बन्दर क्यों बने हुए हो?”
बिना हल्की सी जुम्बिश, बिना आँखें खोले, उँगलियों से कसे, होठों को खोलते हुए, वो बमुश्किल बस इतना ही बोला, “मैं लोकतंत्र हूँ।”
– विनय विक्रम सिंह

सन्नाटा
बहुत सालों बाद गरिमा अपने गांव गई है…. मायके की गलियों में पैर रखते ही उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा…. मां ने आखरी समय में कहा था कि हमारे घर की रखवाली कामवाली दीदी और उसके पति करते हैं तो जब मन करे चलीं जाना…. मां को गए हुए भी पांच साल हो गए थे पर उसे कभी ना मायके की और ना ही घर की याद आईं…. इस बार भी बच्चे ज़िद नहीं new Zealandकरते तो वो शायद यहां क़दम भी नहीं रखतीं।
दरवाजा खटखटाते ही चुपके से अपने आप दरवाजा खुल गया… गरिमा ने धीरे धीरे घर में क़दम रखा और वो हैरान रह गई कि उसकी मां ने जैसे चीजें रखी थी वैसी की वैसी ही है और घर साफ-सुथरा रखा है…. उसने कामवाली दीदी को आवाज लगाई…. दोनों पति-पत्नी चाय-नाश्ते की ट्रे लिए हाजिर हुए। चाय-नाश्ते के बाद गरिमा अपने कमरे में गई और थकावट की वजह से थोड़ी देर में उसकी आंख लग गई। एक-दो घंटे की नींद के बाद गरिमा तैयार होकर आई तो देखा कि डाइनिंग टेबल पर उसका पसंदीदा खाना लगा हुआ है… उसने खाना खाया और गांव का चक्कर लगाने निकल पड़ी… शाम होते ही जैसे वो वापस आई कामवाली दीदी और उसके पति का अजीब सा व्यवहार देखकर दंग रह गई फिर भी उसने कुछ नहीं कहा और कमरे में जाकर सो गई। आधी रात में किसी की होती घुसपुस से उसके नींद टूट गई…. उसने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया पर सुबह जब वो फिर से गांव में चक्कर लगाने गई तो सब उसे हैरानी से देख रहे थें…. आज रात भी कल जैसा ही हुआ…. दो-तीन दिन ऐसे ही निकल गए।
आज जब गरिमा गांव उसकी पुरानी सखी की मां से मिलकर आईं तो उसकी बातों ने उसे झंकझोर कर रख दिया और गरिमा की हिम्मत ही नहीं हो पा रही थी कि वो वापस अपने घर जाए…… लड़खड़ाते कदमों से अपने दिल को मजबूत कर जैसे ही गरिमा ने अपने घर की दहलीज पर कदम रखा उसके सामने एक बड़ा सा पेपर कहीं से आकर गिरा।
गरिमा पेपर पढ़ते पढ़ते पसीने से लथपथ हो गई और उसकी आंख से आंसु बहने लगे…. कांपते हाथों से उसने मां की अलमारी खोली तो उसमें से घर के दस्तावेज और कुछ गहने कपड़े हाथ लगे…. वो मां के गहने कपड़े को सीने से लगाए कब-तक रोती रही उसे पता भी नहीं चला और रोते हुए आंख भी लग गई…. पर आज सूरज कमरे तक आए पर ना आज उसकी नींद टूटी और ना ही उसके पसंदीदा खाना नज़र आया….. महसूस हुआ तो सिर्फ और सिर्फ सन्नाटा। असल में जब गरिमा की मां का देहांत हुआ उसके बाद से उसके कहने वाले रिश्तेदारों ने कामवाली दीदी और उसके पति को परेशान करना शुरू कर दिया था और आए दिन किसी भी बहाने से उन्हें प्रताड़ित करते और घर, जमीन, गहने कपड़े सब हथियाने को तैयार रहते मानों कि सब की नजर गरिमा की मां के मौत पर ही गडी़ हुई थी परंतु कामवाली दीदी और उसके पति को गरिमा की मां ने घर के सदस्य की तरह रखा हुआ है तो दोनों पति-पत्नी नमकहरामी नहीं करना चाहते हैं परंतु लोगों के ज्यादातर प्रताड़ित करने पर एक दिन दोनों की मौत हो गई वो घर में आग लगने की वजह से….
पर क्या था कि दोनों पति-पत्नी ने सबकुछ गरिमा के हाथों में देने का प्रण लिया था तो उनका देह तो जल गया पर आत्मा नहीं…. गरिमा के आते ही दोनों पति-पत्नी ने सबकुछ गरिमा के हवाले कर अपनी आत्मा को मुक्ति दे दी।

भाविनी केतन उपाध्याय
हैदराबाद

स्वतंत्रता

“मेमसाब आज मैं शाम को काम पर नहीं आ पाऊंगी। मुझे आज अपने बच्चों के स्कूल स्वतंत्रता दिवस देखने जाना है।”
“असम्भव”मेम साब बोलीं।
“मेडम प्लीज़”कमली ने निवेदन किया।
“तू जानती नहीं आज मुझे इंडिपेंडेंस डे पर एक टीवी शो में स्पीच देनी है।आज तुम्हें दिन भर घर पर ही रहना होगा।”मेमसाब ने गुस्से भरे लहजे में कहा।
“मेमसाब कल मैं दुगना काम कर दूँगी।आज शाम की छुट्टी दे दीजिए।”
मेमसाब चिल्लाते हुए बोलीं”कल से आने की जरूरत नहीं है।हम दूसरी सर्वेंट की व्यवस्था कर
लेंगे।”
कमली ने अपनी आर्थिक मजबूरी के कारण हथियार डाल दिए।वह काम में व्यस्त हो गई।
कुछ ही देर में मेमसाब की स्पीच टीवी पर आने लगी।
“स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।आज के दिन हमें कामगारों को काम से मुक्त रखना चाहिए ताकि वे अपने परिवार के साथ स्वतंत्रता का सही आनंद ले सकें।”
राकेश भटनागर भ्रमर
शिवपुरी मध्य प्रदेश

माँ का बरसाती वाला कमरा
केमिस्ट से माँ की दवाई लेने गई तो उसने मुझसे पूछा, “किसका है ये पर्चा?”
“मेरी माँ का।”
“क्या बीमारी है माँ को?”
“दिल की बीमारी है।”
“क्या उम्र है उनकी ?”
“उन्हें अपनी उम्र ठीक से पता नहीं । लेकिन जिस तरह वे अपने जन्म का जिक्र करती हैं उस हिसाब से वे पैंसठ साल के करीब की हो गई हैं।”
उसने कुछ दवाइयाँ निकाल कर मेरे सामने रखी और बोला “ठीक से देखकर बताओ, “यही दवाई खाती हैं तुम्हारी माँ?”
मैंने देखा बाकी सब दवाइयाँ तो ठीक थी लेकिन एक दवाई मुझे अलग सी लगी। मैंने उसको बताया कि “ऐसी तो कोई दवाई मैंने उनके पास कभी नही देखी।”
उसने एक दूसरी दवाई निकाली और मुझसे फिर से पूछा “ये वाली?”
“हाँ, हाँ, ये वाली।”
“बस नाम ही अलग है इनका, वरना सॉल्ट तो वही है।”
दवाइयाँ लिफाफे में रखते हुए उसने कहा,”इस पर्ची पर लिखा स्पष्ट नहीं दिख रहा, ये भीग कैसे गई?”
“भैया, माँ बरसाती वाले कमरे में रहती है, ये पेपर उनके ही कमरे में खूंटी पर टँके रहते हैं। किसी दिन बौछार आई होगी तो भीग गए होंगे ।”
उसने ने दवाइयाँ और बिल मेरी तरफ बढ़ा दिये तो मैंने पर्स से रुपये निकाल कर उसकी तरफ।
अपनी रकम काटकर बाकी के रुपये मुझे लौटाते हुए उसने मेरी आँखों मे झांकते हुए पूछा – “अपने स्कूल के सर्टिफिकेट तो तुमने अलमारी में सम्भाल कर रखे हुए होंगे ना? …और बच्चो की रिपोर्ट कार्ड भी सम्भाल कर रखती हो ना !
नीता सैनी, दिल्ली

रक्षासूत्र
सुबह से संजना अनमनी सी खिड़की के पास बैठी बाहर की चहल पहल देख रही है।
आजकल हर त्योहार सोशल मीडिया की वजह से ज्यादा ही तड़कीला भड़कीला और
दिखावटी हो गया है और भावनाएं उतनी ही शून्य होती जा रही हैं। राखी बांधने वाले की भावनाओं से ज्यादा महत्व राखी कितनी महंगी है और संग लाए उपहार की होती है। भले सालों एक दूसरे के सुख-दुख से कोई सरोकार न रहे पर एक दिन महंगे गिफ्ट का आदान-प्रदान कर रक्षाबंधन मनाया जाने लगा है।
यह सब सोच संजना का मन कसैला हो गया उसकी वर्षों की तपस्या उसे व्यर्थ नजर आती थी । बहुत कम उम्र से ही माता पिता और भाई बहन की जिंदगी बनाने में खुद को होम कर चुकी अब वह नितांत अकेली रह गयी है। सब अपनी दुनिया में मस्त हैं माता-पिता भी अब रहे नहीं । न चाहते हुए भी बचपन की राखी आज बहुत याद आ रही थी।
तभी कॉल बेल बजा। संजना ने दरवाजा खोला तो सामने दोनों बहनें और भाई खड़े थे। बेमन से उसने उन्हें अंदर बुलाया पर जाने क्यों रिश्तों पर से मुखौटा उठ जाने के बाद उन्हें देखकर भी मन उदासीन सा रहा। अंदर आते ही दोनों बहनें उससे लिपट गईं और भाई ने चरण स्पर्श किया। बस इतने से ही उसके अंदर दबा भावनाओं का ज्वार फूट पड़ा। भाई आया है आज रक्षाबंधन के दिन और उसने तो राखी भी नहीं खरीदी है।
इसी उधेड़बुन में लगी थी कि तबतक छोटी बहन एक थाली में तीन राखी लेकर आ गई।भाई ने कहा, “आज हम तीनों तुम्हें राखी बाँधेंगे, इस राखी की हकदार तुम हो, मैं नहीं ‌।तुमने हमें जिस तरह मांँ के जाने के बाद संभाला फिर पापा के बाद तुमने अपना जीवन हम सबके लिए कुर्बान कर दिया,वह कोई भाई भी नहीं करता होगा।और देखो तुम्हें अकेला छोड़ हम सब अपनी दुनिया में मशगूल हो गये। हमें माफ कर दो दीदी।”
बस इतने से ही संजना के मन का सारा मैल आ़ंसू बनकर बाहर बह निकला। चारों भाई बहन गले लग कर खूब रोए । संजना के हाथ में तीन खूबसूरत राखियांँ चमक रही थी। उसके तप को पहचान मिली थी उसके भाई बहनों द्वारा। आज रक्षाबंधन की एक नई परिभाषा गढ़ी गई थी।
रश्मि सिंह

श्राद्ध

गाँव के किनारे, मिट्टी और फूस से बने एक छोटे-से घर में रहते थे रामस्वरूप और उनकी पत्नी जगवंती।
गरीबी उनकी देह पर झुर्रियों की तरह दर्ज थी, पर बेटे शिवकुमार के भविष्य को सँवारने की चाह उनके भीतर अब भी जीवित थी।
पता नहीं क्यों ,गांव देहात में जब श्राद्ध के दिन आते तो दोनों सोचते कि की बेटा तो जीवन में हम दोनों का ख्याल रखेगा श्राद्ध का कर्मकांड भी इतने मन से करेगा कि अगले जन्म में भी वही उनका बेटा बनेगा। संभवतः दोनों तर ही जाएंगे।
अपने होनहार और जिगर के टुकड़े पर दोनों बलिहारी जाते।
दिनभर खेत-मज़दूरी कर जो चंद अनाज के दाने जुटते, उनमें से बड़ी जतन से तीन थालियाँ सजतीं।
शिवकुमार की थाली हमेशा भरी रहती—दो रोटियाँ, थोड़ा-सा गुड़ या आलू की सब्ज़ी।
रामस्वरूप और जगवंती अपनी थाली में आधी-आधी रोटी रख लेते।
जगवंती अक्सर हँसकर कहती—
“अरे, बेटा खाएगा तो हमारी थाली भी तृप्त हो जाएगी।”
रामस्वरूप चुपचाप सिर हिला देता और पानी से अपनी भूख बुझा लेता।
बेटा बड़ा हुआ। गाँव से पढ़ाई कर शहर चला गया। नौकरी मिली, शादी हुई और नई ज़िंदगी के फेर में वह माँ-बाप से दूर होता गया।
फोन पर औपचारिक हालचाल ही बचा। गाँव आना जैसे एक बोझिल कर्तव्य हो गया।
इधर माँ-बाप बूढ़े और अशक्त होते गए।
कई रातें बिना चूल्हा जले बीतीं।
कभी नमक-रोटी, कभी सिर्फ पानी।
बेटे के घर में उसके पोते पोतियों के साथ खेलने – खाने , बेटे बहू की सेवा के इंतज़ार में आँखें ओर ख्याल सूखते चले गए।
फिर एक दिन रामस्वरूप ने चुपचाप दुनिया छोड़ दी।
श्राद्ध का दिन आया।
आँगन में पत्तलें बिछीं। पंडित जी बैठे और थाली भर-भरकर खीर-पूरी खाते रहे।
शिवकुमार अपने हाथ से परोस रहा था।
गाँव की औरतें बुदबुदाईं—“जिनके जीते-जी एक गिलास पानी न दिया, दो रोटियां नहीं दी,आज पंडित को थाली सजाकर खिला रहा है।”
ये वाक्य शिवकुमार के दिल में नश्तर की तरह चुभे। उसकी आँखों के आगे पिता का झुका हुआ चेहरा और माँ की आधी जली रोटियाँ घूम गईं। उसके हाथ काँपने लगे। श्राद्ध समाप्त हुआ।
लोग लौट गए। आँगन के कोने में माँ जगवंती चुपचाप बैठी थी।
शिवकुमार उसकी गोद में सिर रखकर फूट पड़ा—“माँ! मैंने तुम्हें जिंदा रहते कभी अपने हाथ से रोटी नहीं खिलाई। पिताजी चले गए, अब तुम्हें खोने का डर मुझे खाए जा रहा है।”
जगवंती ने काँपते हाथों से उसके आँसू पोंछे और धीमे स्वर में कहा— “बेटा, माँ-बाप को रोटी खिलाने का असली श्राद्ध जिंदा रहते होता है। अब जो बीत गया, उसे बदलना तेरे बस में नहीं।
लेकिन आज से संकल्प ले, आगे किसी माँ-बाप को भूखे न रहने देगा।”
शिवकुमार माँ को शहर ले आया। अब वह रोज़ उसके लिए अपने हाथों से थाली सजाता।
रोटी सेंकते हुए कहता—“माँ, अब तेरी हर निवाला मेरी ओर से है।”
माँ मुस्कुरा देती, लेकिन उसकी आँखों की गहराई में कहीं छुपा दर्द अब भी तैर जाता।
समय का पहिया घूमता रहा। एक दिन माँ भी बिस्तर पर पड़ी।
डॉक्टर ने कहा—“उम्र हो चली है, बहुत उम्मीद मत रखिए।”
शिवकुमार दिन-रात उसकी सेवा करता।
अंतिम क्षणों में माँ ने बेटे का हाथ थामा और कहा—
“बेटा, अपनी गलती का बोझ मत ढो।
बस वचन दे—अपने बच्चों को यही सिखाना कि जिंदा माँ-बाप को दो रोटियाँ खिला देना,
ताकि उनके जाने के बाद पछताना न पड़े।”
कुछ ही देर में उसकी साँसें थम गईं।
शिवकुमार ने सिर झुकाकर माँ के चरण पकड़े और रो पड़ा।
उस दिन उसे समझ आया—माँ-बाप की दो रोटियाँ ही सबसे बड़ा धर्म, सबसे बड़ा कर्म और सबसे सच्चा श्राद्ध है।
कुछ दिनों बाद शिवकुमार ने एक ऑनलाइन सेवा शुरू की जिसमें बूढ़े और असहाय माता पिता की देखभाल की जाती थी। खाने में काफी कुछ होता था पर दो रोटियां शिव कुमार अपने हाथों से रखता और चुपके से आंखों की कोर पोंछ लेता बस ।

सुदेश वत्स
बैंगलुरु

भय
सीमा ट्यूशन सेंटर से बाहर आई तो देखा रोड लाइट्स जल चुकी थी , आज उसे ज्यादा ही देर हो गयी थी। जब भी सेंटर में मीटिंग होती उसे देर हो ही जाती , मगर आज समस्या ये थी कि ऑटो और बस की आज हड़ताल थी और उसे पैदल ही अपने घर तक जाना था।
आज ठण्ड और दिनों से कुछ ज्यादा ही थी शायद इसीलिए सड़क पर आवाजाही काम थी। सीमा ने तेज तेज कदमो चलना शुरू किया। छोटी सड़क पर मुड़ी तो अचानक उसे अपने पीछे किसी के कदमो की आहात सुनाई दी। सड़क दूर तक वीरान थी इसीलिए सीमा अनजाने भय से डर गयी।
उसके पीछे की पदचाप उसे अपने कुछ नज़दीक आती हुई महसूस हुई तो उसने कुछ और तेज चलना शुरू कर दिया। ” माँ सही कहती है वाकई मैं लापरवाह हूँ , आज फिर फोन घर भूल आई , अगर पास होता तो अभी नरेश भैय्या को फ़ोन कर के बुला लेती। ” सीमा मन ही मन बुदबुदाई।
अब तो सामने घर की गली थी मगर कल ही किनारे जलने वाला एक मात्र बल्ब भी बच्चो की बॉल का शिकार हो गया था । इसलिए गली भी अँधेरे में डूबी थी , सीमा ने सोचा अगर पीछे वाले व्यक्ति ने ज़रा भी कुछ कहा तो वो शोर मचा देगी, गली में कोई न कोई तो निकल ही आएगा।
अरे ! सीमा रुक, आगे गहरा गड्ढा है , आज ही पाइपलाइन ठीक करने वाले आये थे उन्होंने सारा खोद डाला है , मैं मोबाइल से टोर्च दिखाता हूँ , आजा मेरे साथ ”
ये आवाज़ पड़ोस में रहने वाले गीता काकी के बेटे नरेश भैया की ही थी जिन्हे सीमा बचपन से राखी बांधती थी , सीमा को यूँ लगा जैसे किसी ने उसे जीवनदान दे दिया हो।
“मैं तुझे इतनी देर से पकड़ने की कोशिश कर रहा हूँ मगर तू तो एक्सप्रेस ट्रैन की तरह भाग रही है , क्या बात है ? सब ठीक है ? ” भैया ने सीमा से पूछा। ” हाँ भैया सब ठीक है , वो आज ठण्ड ज्यादा है , और मुझे देर भी हो गयी है बस इसीलिए जल्दी-जल्दी चल रही थी , घर पर माँ इन्तेजार में होंगी। ” सीमा ने जवाब दिया।
सीमा ये सोचने पर मजबूर हो गयी कि हम कैसे युग में जी रहे है जहाँ अपने पीछे आने वाले कदमों की आहट भी किसी लड़की को भयभीत करने के लिए काफी है, चाहे पीछे आने वाला उसका भाई ही क्यूँ न हो।
डा. शालिनी गोयल


शीर्षक
जब दुकानदार शोध प्रबंध का एक-एक अध्याय टाइप करने के लिए अपने कर्मचारियों को दे रहा था, तब सभी की अलग-अलग लिखावट देखकर वह अचंभित रह गया।…. पर मुझे इससे क्या लेना- देना! मुझे तो टाइप करके देना है और अपना मेहनताना लेना है। यह सोचकर वह बात उसने अपने दिमाग से हटा दी। लेकिन…
ढोल के भीतर ऐसी पोल देखकर शोध-प्रबंध के शीर्षक का हौंसला टूट गया। वह स्वयं को बहुत निरीह सा महसूस कर रहा था। काश…. मेरे इस शोध प्रबंध के सारे अध्याय वही शोध छात्र लिखता तो मुझे सार्थकता मिलती, लेकिन यहां तो गाइड ने दूसरे विद्यार्थियों से ही लिखवा लिया? यकायक उसके दिमाग में ऐसा विचार कौंधा कि उसकी आत्मा कांप उठी !….यदि हर जगह रुपया ही रुपया चलेगा तो शिक्षा की अहमियत ही क्या….? ऐसे पढ़े-लिखे लोग समाज में गंदगी ही तो फैलाएंगे…..! समाज को विकृत करेंगे!
हमेशा खामोश रहने वाला ‘शीर्षक’ आज वाचाल हो गया था।.
-डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल


समय का चक्र
बहू ने जैसे ही खाने की थाली लाकर मेज पर रखी, बिस्तर पर लेटी बीमार सरोज जी के चेहरे पर चमक आ गई। खाने की खुशबू ने उनकी भूख और जगा दी थी। पास में बैठे हुए बेटे ने उनको सहारा देकर उठाया और थाली उन्हें पकड़ा दी।
सरोज जी ने देखा सब्जी उनकी मनपसंद थी। बहुत खुश होकर, उन्होंने खाना शुरू किया पर मुंँह में कौर जाते ही मिर्च- मसाले की अधिकता से उनका मुंँह जल गया। वह तुरंत बेटे से बोलीं , ” बहू से कितनी बार कहा है कि मिर्च कम डाले। मेरे मुंँह और पेट दोनों में जलन होने लगती है पर वह हमेशा ज्यादा ही डाल देती है। बुढ़ापे में इतना मिर्च-मसाला नुकसान करता है।”
“अच्छा मम्मी कह दूंँगा पर वही बात है। अब क्या कहूंँ,” कहकर बेटा चुप हो गया।
“कहो ना जो भी बात है। मैंने कौन से बड़ी फरमाइश कर दी है। मेरी सब्जी अलग बना दो फिर जो तुम लोगों को खाना हो खाओ,” वह बोलीं।
“मम्मी ऐसे ही दादी भी तो आपसे कहती थीं और आप गुस्सा हो जाती थीं कि अलग सब्जी बनाने में कितना झंझट है । आपकी बहू भी वैसा ही सोचती है। फीकी सब्जी सबको तो नहीं अच्छी लगेगी। खैर कह देता हूंँ,”
इतना कहकर बेटा कमरे से बाहर चला गया।
सरोज जी दो मिनट तो अवाक बैठी रहीं फिर उन्होंने दाल में डुबोकर रोटी खाना शुरू कर दिया।
आशा श्रीवास्तव

“तलाक ”
मोना तलाक के कागज लेकर कोर्ट पहुंच गई थी। थोड़ी देर बाद सुनवाई होनी थी। बेटे का हाथ पकड़े वह कोर्ट में जाकर बैठ गई थी…….
तभी थका हारा सा फाइलें हाथ में लटकाये अमित को आता देख कही वो भी आहत सी हो गई …… तलाक की तवील प्रक्रिया निभाते निभाते टूट चुके थे दोनों……….
अन्तिम कुछ सुनवाई बची थी …….उसके बाद दोनों अलग हो जाने वाले थे…..
सुनवाई होने के बाद सब बाहर आ गयें ………
लगातार उन दोनों का बेटा अपनी माँ से पूछता रहा “मम्मी आप दोनो की क्लास कब खत्म होगी मुझे पापा से मिलना है “……अपने आंसू छुपा मोना ने मासूम की तरफ देखा तो वह सिहर उठी अभी तो शुरूआत है कैसें बहकायेगी वो अपने कलेजे के टुकड़े को …..
काश कि उसने कुछ दिन अपनी सास की थोड़ी सख्ती बर्दाश्त कर ली होती तो रोज की कलह ये दिन ना दिखाती……
आज उसे थोड़ा थोड़ा अमित की माँ का दर्द भी महसूस हो रहा था अपने बेटे का दुःख कौन सी माँ सह पाई हैं भला……..
काश कि कुछ दिन सब्र से काम लेती तो शायद दोनों इतने मजबूर ना होतेऔर बेटा इतना निरीह सा न दिखता…..
बाहर आते ही नटखट बेटा भागकर बाप के गले लग गया ..
“पापा आप मेरी पेरेन्टस टीचर मीटिंग्स में क्यो नही आते हो”….कहकर रो पढ़ा मासूम …
अबकि बार आप मेरे साथ चलना सब बच्चों के पापा मम्मी साथ आते हैं ….
कहकर रुआंसा हो गया ….
अब अमित से भी रहा नही गया आखिर बोल ही पड़ा “हाँ बेटा मम्मी से कहना इस बार मुझे भी साथ ले चले.”…..
अर्दली की आवाज गूंज रही थी “कोर्ट की कार्यवाही शुरू हो गई है”
उसे क्या पता कि फैसला तो हो चुका है…….।
अपर्णा गुप्ता


रेडियो पर वही गाना बज रहा था..
ज्योंही गाड़ी होटल के सामने रुकी, बाबूजी ने गेट खोलने के लिए हाथ आगे बढ़ाया, इतने में ही रोहन उतरकर गाड़ी से आया और गेट खोल हाथ पकड़कर पिताजी को गाड़ी से उतरने में सहायता की। फिर अपने साथ हाथ पकड़कर होटल में लेकर गया, होटल में रेडियो पर वही पुराना गाना बज रहा था, ‘आज उंगली थाम कर तेरी तुझे मैं चलना सीखलाऊं, कल बांह थामना मेरी जब मैं बुड्ढा हो जाऊं….
बाबूजी मुस्कुरा कर रोहन को देखने लग गए। बचपन की यादें आँखों के सामने तस्वीर बनकर छा गई।
शशि लाहोटी, कोलकाता

एक पल का जादू
स्मिता की जॉब चली गई। वह जहाँ काम करती थी, वह फैक्ट्री बंद हो गई। उसका बेटा एक प्राइवेट स्कूल में तीसरी कक्षा में पढ़ता था। अगले दो महीने तक तो वह स्कूल की फ़ीस भरती रही लेकिन आगे के लिए स्कूल फ़ीस के पैसे नहीं थे। उसने बेटे को एक सरकारी स्कूल में दाख़िला करवा दिया।
शाम को वह छुट्टी से कुछ देर पहले ही स्कूल चली गई। यूँ ही एक टक स्कूल बिल्डिंग को देखती रही। अपनी परिस्थितियों को लेकर मन में उदासी से भरी वह बेटे के प्राइवेट स्कूल को याद करती सीढ़ियों के पास खड़ी थी।
तभी स्कूल के सबसे छोटे बच्चों की छुट्टी हुई और वे पंक्ति बद्ध एक दूसरे के पीछे कक्षा से बाहर निकलने लगे। तभी एक बच्चे का सीढ़ियों पर पैर फिसला और उसने लपक कर स्मिता की उँगली पकड़ ली। वह बच्चे को सँभालती उस से पहले ही बच्चा अपने हाथों के सहारे पैरों पर खड़ा हो गया और उसे देखकर ऐसे मुस्कुराया जैसे वह अपनी माँ को देख रहा हो! उस बच्चे को देखकर बाक़ी बच्चे भी स्मिता को देखकर वैसे ही मुस्कुराने लगे। उस पल कोई जादू सा जगा, उसे लगा जैसे सारे बंद दरवाज़े खुल गए हों! मन पर बिछे जाले हट गए हों।
उस मासूम स्पर्श एवं नन्ही मुस्कुराहट ने स्मिता की सारी उदासी दूर कर दी। अब उसे बेटे को इस पब्लिक स्कूल में पढ़ाने का क्षोभ न रहा। वह खुशी खुशी बेटे की प्रतीक्षा करती खड़ी रही।
-पूजा अनिल, स्पेन

गंगा बुआ

गाँव के बुजुर्गों का कहना था कि जब तक वह नदी बहती है, तब तक यह गाँव जिंदा रहेगा। लेकिन शहर के विस्तार ने नदी को संकीर्ण कर दिया था। कभी कलकल बहने वाली धारा अब मटमैले पानी से भरी थी, और कुछ जगहों पर तो सूख ही गई थी।
गंगा बुआ उसी नदी के किनारे पैदा हुई थीं। नदी से उनका रिश्ता ऐसा था, जैसे मछली का पानी से। जब भी कोई पूछता, “बुआ, तुम अकेली कैसे जी लेती हो?” तो वे मुस्कुराकर कहतीं, “जब तक मेरी नदी है, तब तक मैं अकेली नहीं हूँ।”
लेकिन इस बार सूखा लंबा खिंच गया। नदी का पानी लगभग गायब हो चुका था। गंगा बुआ दिन-रात सूखी तलहटी को निहारतीं, मानो कोई अपना छूट गया हो। गाँव के लोग व्यस्त थे—किसी को रोज़गार की चिंता थी, किसी को महंगाई की। नदी का सूखना उनके लिए एक खबर मात्र थी, लेकिन गंगा बुआ के लिए यह उनके प्राणों का सूख जाना था।
एक सुबह गाँव वालों ने देखा कि गंगा बुआ उसी सूखी नदी की तलहटी में चुपचाप लेटी थीं—शायद अपने जल के बिना मछली की तरह तड़पते-तड़पते सदा के लिए सो गई थीं। गाँव में सन्नाटा था, और आसमान भी उस दिन कुछ ज्यादा ही धुंधला था, जैसे उसने भी अपना जल कहीं खो दिया हो।
पवन शर्मा

सती
नंदू की आई समुद्र किनारे 30-35 औरतों के साथ अपनी मछली का टोकरा भर रही थी। सभी औरतें यहां से मछलियां भरती थीं । फिर मछली बाजार में बेचने चली जाती थीं।
आज नंदू कि आई कह रही थी-” मैं तो सती हूं सती।”
” कैसे सती, सती तो अपने आदमी के साथ जल जावे हैं । ” एक ने कहा। “सती का येई मतलब थोड़े ना है ।मैंने उसकी कितनी सेवा की । हगा – मूता समेटा मैंने। उसको बिस्तर पर खाना दिया । फिर मरा तो अपनी चूडी़ बेचकर तेरहवीं की पूजा आदि की। उसकी राख ,हड्डियां समुद्र में सिराने ले गई। जहां हर नदी आकर मिलती है। क्या नहीं किया उसके लिए ।”
तभी बब्बन की आई बोल पड़ी- “काहे की सती ?आदमी बीमार पड़ेगा तो क्या घसीट कर बाहर निकाल देंगे ।अरे ,सब कुछ करेंगे उसके लिए। हर कोई करता है ।और तेरा आदमी मार -मार कर तेरी हड्डियां चूरमा बना देता था। दारू में धुत्त रहता था । गालियां देता था। एक रुपया तो कमाता नहीं था।तू जो कमाती थी तेरे को मार मार कर तेरे रुपए छीनकर दारू पीता था । और तू मेरे पास आकर रोती थी, कि उसका बाप जैसे मेरे लिए महल लिख कर चला गया है । नासपीटा कल का मरता आज मर जाए ।मैं श्राद्ध कर्म कर दूंगी पर यह नहीं चाहिए मुझे । अब तू सती बनती है । अरे सती एक पवित्र शब्द है सुनती देखती नहीं सती का मतलब ?नंदू की आई ,ऐसे आदमी की सती, विधवा तो दूर ,मैं तो उसकी घरवाली कहलाना भी पसंद ना करूं। तू तो सती बनने चली है ।
नंदू की मां आंखें विस्फारित करके उसे देखती रह गई। सच्चाई सुनकर आंखें खुलीं अथवा…….
प्रमिला वर्मा
अहिल्या नगर ( अहमदनगर )

*विरोध*

“अम्मा जी! ननदोई जी के साथ हम होली नहीं खेलेंगे, उनके ढंग ठीक नहीं हैं। वो होली के बहाने इधर–उधर छूने लगते हैं!”
कहते–कहते शिप्रा का चेहरा क्रोध से भर गया!
“देख बहू! तुम्हारे ननदोई बड़े आदमी हैं .. अगर जरा-बहुत हाथ लग भी जाए , तो इग्नोर कर दिया करो, ऐसी बातें कही नहीं जाती हैं , औरतों को थोड़ा सहनशील होना चाहिये।”
अपने मुँह में पान की गिलौरी रखते हुए शिप्रा की सास ने जवाब दिया …
“नहीं दादी! अबकि अगर फूफा जी ने मम्मी को जरा भी रंग लगाया तो जान लेना …सलाद की तरह उनका हाथ काट डालूॅंगी और सबूत भी नहीं छोड़ूँगी! खबरदार ! जो किसी ने मेरी माँ की तरफ आँख भी उठाई तो।”
अपने हाथ से चाकू की धार को छूते हुए शिप्रा की बेटी, जो कि एक शेफ थी, बीच में बोल पड़ी!
एक चुभन भरा सन्नाटा चीख पड़ा। दादी विस्फारित नज़रों से चाकू की धारदार नोक को देखती रह गयीं।

रश्मि ‘लहर’


डॉक्टर कहता है…..
मात्र पन्द्रह दिनों में आज हम दोनों लौट आये थे शहर की सड़कों से गाँव की गलियों में ।फर्लांग भर के फ्लैट से आसमान जैसे आंगन में। किन्तु श्रीमती जी बहुत परेशान थीं , एकदम अशान्त !
आंगन में दौड़ती गिलहरियाँ ,चहकती चिड़ियाँ भी उन्हें सुकून नहीं दे पा रहीं थीं।
ऐसा नहीं था कि उन्हें बहू बेटे की याद आ रही थी बल्कि पूरे जीवन की मूवी फ्लेश बैक में चल रही थी। बल्कि यूँ कहिए शादी के बाद अपने रोमांस के पल ,अपने बेटे के जन्म
की खुशी के पल बेतरह याद आ रहे थे।
साथ ही उनके दिमाग में बहू -बेटे के व्यवहार के सोप ओपेरा का पुनः प्रसारण उन्हें साल रहा था।
रहन सहन ,खान पान तो ठीक था ,मुँह खोलने की गुंजाइश ही नहीं थी ।बहू का टॉप जीन्स, स्कर्ट और पिज्जा और नूडल्स को तो मान देना ही था किन्तु सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक बात व्यवहार और नजरअंदाजी का फ़्लैश बैक बार बार उन्हें दुख के सागर में गोते लगाने को मजबूर कर रहा था।
सुबह से शाम होने आई थी। वो हर बार एक नई पर कड़वी बात को याद करने लगती और फिर वही बिन बारिश की झड़ी!
मैंने इनका हाथ पकड़ा और कहा ,चलो हम पार्क में चलते हैं ।वहाँ तुम्हें एक बात बतानी है।
थोड़ी ना नुकुर के बाद ये तैयार हो गईं।
पार्क में जाकर हम झूले पर बैठ गए।
इन्होंने कहा ,बताओ ,क्या बात कहनी है ?
मैंने राज़ भरे शब्दों में इनके कान में कहा “डॉक्टर कहता है ,घाव को ठीक करना हो तो उसे बार -बार छूना नहीं चाहिए। ”
बात का अर्थ समझते ही ये खिलखिला कर हँसने लगीं।
पार्क में फूलों की महक और इनकी हँसी की खनक ने हवा को और खुशनूमा बना दिया था।
ज्योति अप्रतिम

रत्न की दुकान
बस में मेरे पास की सीट पर एक युवक बैठा था | काफी उदास और चिंतित दिखाई दे रहा था | बोरियत दूर करने के लिए मैंने पूछा आप कहाँ रहते हो और कहाँ जा रहे हैं | वो बोला कि मैं उज्जैन में रहता हूँ और कुछ काम से इंदौर जा रहा हूँ | मैंने पूछा टेंशन में क्यों दिख रहे हो | वो बोला हाँ आप सही कह रहे हैं , मैं पिछले एक दो साल से काफी परेशान हूँ | रुपये ,पैसे की चिंता नहीं है मगर घर में क्लेश, अशांति और मानसिक सुख नहीं होने से अवसाद में हूँ | मैंने पूछा आप क्या व्यवसाय करते हैं | वो बोला कि , लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए विभिन्न राशियों के रत्न , मोती और मूंगे बेचने की मेरी दुकान है |
– डॉ. हरीशकुमार सिंह ,उज्जैन

अदृश्य पहलू
“शिकायत आई है साब, क्या करें ?”
हवलदार ने एएसआई से कहा जो खाना खाने के बाद हाथ-मुँह धोने बाहर निकल रहा था।
“अगर मामला बलात्कार का है, तो दर्ज मत करना ! किसी बडे लोगों का काम भी हो सकता है। और अपनी ही नौकरी जाने का डर होगा ।”
“नहीं साब, यह अलग तरह की शिकायत है।” – उसने उदास होते हुए कहा।
एक अधेड़ उम्र के आदमी दोनों हाथों से सिर पकड़े हुए कुर्सी पर बैठा था। शहर में महिला हिंसा, बलात्कार और चोरी जैसी घटनाएँ बढ़ रही थीं। नागरिकों को पुलिस कार्यालय से बड़ी उम्मीद और भरोसा था ।
“क्या यह बलात्कारी है या कुछ और?” एएसआई ने कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की ओर देखते हुए हवलदार से पूछा।
“ऐसा नहीं है, साब । उनकी बात सुनकर तो मुझे भी डर लगा।”
“अरे, क्या है ऐसी डरावनी बात?”
“लंबे समय से मैं घरेलू हिंसा की शिकार हूँ। कृपया मेरी शिकायत दर्ज करेँ और मुझे न्याय दिलाइए साब।” – चेहरे पर नीले निशान दिखाते हुए उस पत्नी पीड़ित ने कहा।

इन्दिरा चापागाईं
(सूर्यविनायक ५ भक्तपुर , नेपाल)

रसीद
“तुमसे अच्छी तो नौकरानी होती…कमसकम समय पर काम तो कर देती”,अल्मारी से कमीज़ निकालते ही शुभम दहाड़ उठा।बात इतनी सी थी कि उस कमीज़ का बटन टूटा था।
बृंदा बच्चों को स्कूल की बस में बिठा कर अभी ही आई थी।अभी उसे शुभम का लंच पैक करके उसका नाश्ता मेज़ पर लगाना था।कल शाम से ही उसे बुखार भी था।
सुबह का समय बृंदा के लिए हवा सा उड़ता।घर में सबसे पहले पाँच बजे वो उठती और जब तक शुभम् आफिस के लिए नहीं निकल जाता वो चकरघिन्नी सी नाचती रहती…पर फिर भी शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब शुभम् उसे कोई ताना न मारता हो या गाहेबगाहे हाथ न उठाता हो।अपनी माँ की मरज़ी से उसने बारहँवी पास बृंदा से विवाह कर तो लिया पर उसके मन में हमेशा ही आफिस में कार्यरत स्मार्ट लड़कियों की एक अलग ही छवि थी जिसको वो गाहेबगाहे अपने शब्दों में प्रकट कर ही देता था।
“नौकरी वाली लड़कियों की स्मार्ट नैस अलग ही होती है और पैसे आते हैं सो अलग”,
रोज़ बृंदा चुप रह जाती थी पर आज वो मुखरा हो उठी,
“बेशक. ..नौकरानी अच्छी होती क्योंकि खाना बनाने से लेकर बच्चों को पढ़ाने,घर का रखरखाव,आतिथ्य सत्कार,बिना किसी छुट्टी के,उस हिसाब से उसकी सैलरी कमसे कम पचास-साठ हज़ार तो होती ही और ऊपर से..एक रात की कीमत..ज़रा हिसाब लगा लेना।नहीं तो कल के तमाचे की रसीद मेरे गाल पर अभी भी छपी है कहो तो थाने में हिसाब लगवा दूँ! ”
मंजू सक्सेना
लखनऊ

प्यार का अकाउंट

पिछले एक सप्ताह से सुनयना को फोन मिला रहा हूँ, घण्टी बजती रहती है, लेकिन फोन पिक नहीं कर रही है । मेरे वाट्सएप देखने भी बंद कर दिये हैं । कॉलेज के ज़माने के साथी हैं, कैंटीन के सारे बिल मुझसे ही भरवाये थे उसने । जब संगी-साथियों के बीच पार्टी देने का नंबर सुनयना का आ जाता था तो चुपके से बिल का भुगतान मुझे ही करना होता था । क्या उसे नहीं पता था कि मैं उसके आगे-पीछे चक्कर क्यों काटता रहता हूँ, क्यों उसके सारे बिल भरता हूँ ? मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ, सुनयना । बहुत ज़्यादा, तभी तो मैंने बत्तीस साल का होने के बाद भी आज तक शादी नहीं की । बस्स,तुम्हारे इंतज़ार में….
आज जबकि मैं कई लाख रुपये महीने का आदमी बन चुका हूँ, तुम प्राइवेट बैंक में असिस्टेंट मैनेजर लग चुकी हो, अब यह रवैया क्यों ? प्यार करती हो तो ‘हाँ ‘ कहो,नहीं तो मुझे अब इस मोड़ से मुड़ जाने दो ।
एक बार फिर ट्राई करता हूँ । कॉल कनेक्ट हो गई । मेरा सौभाग्य, सुनयना ने फोन उठा लिया-” हूँ, कहो, क्या चाहते हो, जनाब ?”
“तुमसे मिलना है, अभी-इसी वक्त….”
“इस समय तो मैं बैंक में हूँ ।”
“ठीक है, मैं वहीं आ जाता हूँ ।”
“हाहाहा… आ जाओ और यहां मैं तुम्हें न पहचानूं तो….”
“हाहाहा…. तो मैं तुम्हें अपनी जेब में रखा आधार कार्ड दिखाऊंगा,पैनकार्ड दिखाऊंगा, चैकबुक दिखाऊंगा । ‘बैंक वाली’ हो, तब तो पहचान ही जाओगी….”
“आइए, ज़नाब आइए ।मैं इंतज़ार कर रही हूँ ।”
अंधा क्या चाहे, दो आँखें और पौने घण्टे बाद ही मैं उन दो खूबसूरत सी आँखों के सामने था ।
आज तो दिन मेरा था । मैडम ने कॉफी पिलायी । लगातार मिलने का बहाना चाहिए था तो अपनी ब्राँच में मेरा खाता भी खोल दिया । अब कौन रोकेगा मुझे ?
हफ्ते बाद फिर सुनयना की तड़पा देने वाली याद आ गई । सीधे बैंक,सरप्राइज विजिट । आखिर बैंक का खाताधारक हूँ, निरा आशिक थोड़े ही हूँ ।
“सर,सुनयना मैडम का पिछले सप्ताह ही नैनीताल तबादला हो गया ।परसों ही अपने पति और बच्चे के साथ वे यहां से नैनीताल शिफ्ट हो गई हैं । ” सुनयना की सीट पर बैठी देवीजी ने समझाया ।
“क्या….? अभी पिछले सप्ताह तो मैं…. पति-बच्चे….?” कुछ सूझ नहीं रहा था ।
“इक्यावन नये खाते खोलने की शर्त पर ही उनकी प्रमोशन और ट्रांसफर होनी थी । उन्होंने भागदौड़ करके पचास खाते तो खोल दिए थे । लेकिन पिछले कुछ दिनों से एक नया खाता नहीं खुल पा रहा था । जिस कारण वे बहुत परेशान चल रही थीं कि तभी आप फरिश्ते बनकर आये और आपने नया खाता खुलवा कर उनका टारगेट पूरा करवा दिया ।”
“मैं….फरिश्ता?आपको पता है मेरे चार बैंकों में पहले से ही अकाउंट्स हैं ।”
देवीजी पिघल गईं-“सर ।सुनयना मैडम तो अब चली गई हैं । आप कहें तो मैं आपके इस खाते को ‘क्लोज’…”
“नहीं । इस अकाउंट को अब खुला ही रहने दो ।यह ‘प्यार का अकाउंट’ है ।”
मुकेश शर्मा

मनी प्लांट

नए घर में सारा सामान करीब करीब जम गया था।पूरे दो दिन लगे सारे सामान को ठीक करने में।अब बारी थी मनी प्लांट की जिसे लाकर आंगन में रख दिया था आखिरी में सेट करने के लिए।
अरे यह क्या? सारी बेलें मुरझा कर नीचे गिर चुकीं थीं। मीता का मन दुखी हो गया।इतने प्यार से बड़ा कर के एक एक बेल चढ़ाई थी लेकिन मकान बदलने के चक्कर में प्यारा मनी प्लांट बर्बाद हो गया।
फिर बची हुई बेलों को सुलझाने कर ऊपर चढ़ाने
लगी साथ ही विचारों की बेलें भी चढ़ने लगीं।
अचानक ही इन बेलों में उसे अपना जीवन नज़र आने लगा।याद आ गया अपने मात- पिता का घर,याद आ गया उसे अपने ब्याह का दिन ,रस्में और विदाई।इस मनी प्लांट की बेल की तरह ही तो उसे अपनी जगह छोड़नी पड़ी थी।सभी अपनों को छोड़ कर दूसरी जगह अपना आशियाना बनाना पड़ा था।
मुरझाई तो थी लेकिन अपनी कटी हुई जड़ों को समेट कर धीरे धीरे उस जगह पर भी फिर खिल कर अपनी मंजिल ढूंढना शुरू कर दिया था।
सोचते हुए आँसू छलक पड़े आँखों से।
कोई देख न ले ,सोचते हुए जल्दी से उन्हें पोंछ कर वह फिर उन बेलों से फिर आशियाना सजाने लगी।
सोच रही थी फिर खिल जाएंगी मेरी तरह। लड़कियों से कम नहीं ये मनी प्लान्ट की बेलें!
ज्योति व्यास

बड़ी अम्मा
“हमारे पैगम्बर साहब की शिक्षा है कि मज़दूर का पसीना सूखने से पहले उसकी मज़दूरी दे देनी चाहिए….”पान चबाते हुए बड़ी अम्मा ने शान से अपने मोहल्ले की महिलाओं की मंडली में कहा….”हममें भेदभाव नहीं होता, चाहे बादशाह हो या मज़दूर, सब एक ही सफ़ में एक साथ खड़े होकर नमाज़ पढ़ते हैं….कोई छोटा बड़ा नहीं होता….वो कहते हैं न कि
” एक ही सफ़ में हो गए खड़े, महमूद और अयाज़
न कोई बंदा रहा, न कोई बंदा नवाज़”
सिलपची में पान की पीक थूक कर उन्होंने तनी हुई गर्दन के साथ फिर कहा,
“यहां महमूद जो है वो बादशाह है और अयाज़ एक मजदूर है…”
चाय-नाश्ता हुआ और महफ़िल ख़त्म हुई…. सब औरतें अपने-अपने घरों को सिधारीं और बड़ी अम्मा छालिया काटने में मशगूल हो गईं…
खाना बना के और बावर्चीख़ाना साफ करके, हमीदा बी फारिग हुई और बड़ी अम्मा के पास जा खड़ी हुई….
“बड़ी अम्मा! वो मेरी तनख्वाह दे देते जी!”
“अरे हमीदा! क्या जब देखो पैसा-पैसा करते रहती है, लेे चल ज़रा पांवों की मालिश कर दे….”
हमीदा सरसों का तेल गरम कर लेे आई और
बड़ी अम्मा के तख़त के पास फर्श पर बैठ गई। संगमरमर के ठंडे फर्श ने उसकी रीढ़ की हड्डी में सिहरन पैदा कर दी। ठंड में गरम तेल की मालिश का सुकून पाने बड़ी अम्मा ने पैर फैला दिए और हमीदा के खुरदुरे हाथों से मालिश का लुत्फ़ उठाने लगीं….
आधे घंटे तक हमीदा पांव मलती रही। शाम के अंधेरे गहरे होने लगे। इशा की नमाज़ का वक्त हो गया। बड़ी अम्मा ने एक नींद लेे ली, अब पांव मले जाएंगे तो नींद तो आएगी ही न, आखिर दिन भर बैठे-बैठे दुखने जो लगते हैं…..
“बड़ी अम्मा! बड़ी अम्मा!
हमीदा की तेज़ आवाज़ से बड़ी अम्मा बेचारी नींद से बेदार हो गईं….
“हो गया बड़ी अम्मा…”
करवट लेकर बड़ी बेज़ारी से उन्होंने हमीदा को देखा….
“ठीक है जा….”
“बड़ी अम्मा, वो मेरी तनखा दे देते जी…”
मीठी नींद से जगाए जाने पर झुंझलाई बड़ी अम्मा ने क़हर बरसाती नज़रों से हमीदा को देखा और बटुए से सौ रुपए निकाल कर उसके हाथों में रख दिए….
“जा, अभी मेरे पास चिल्हर नहीं है, कल लेे जाना ….”
हमीदा उन सौ रुपयों को मुट्ठी में दबाए सोच रही थी कि मेरी पांच हजार की तनख़ाह देने बड़ी अम्मा को कितने बड़े नोट का चिल्हर चाहिए? राशन, दवाई, किराया, बच्चे की कॉपी, पेन लेना है, इन सौ रुपयों में क्या होगा?
हमीदा की आंखों में आंसू थे और बड़ी अम्मा के होठों पर शातिर मुस्कान…. आख़िर उनकी तो आदत ही थी, कम से कम पंद्रह दिन ज़्यादा हो जाने पर ही तनख़ाह देने की…..क्या है न, इससे हमीदा काम नहीं छोड़ सकती थी, आख़िर इतनी कम तनख्वाह में दस घंटे की नौकरी और धोबी, बावर्ची, भिश्ती सबका काम करने वाली मजबूर मज़दूर उन्हें और कहां मिलती?
इस्लाम की शिक्षाएं, कहीं कोने में आराम कर रही थीं, अगली किसी महफ़िल में नुमाइश के लिए और हमीदा की आंखों में उमड़ती घटाएं हर बार की तरह, इस बार भी उसका दामन भिगोए जा रही थीं….
किश्वर अंजुम
भिलाई
छत्तीसगढ़

और वह मरी नहीं….
गू-मूत से सनी वह चौराहे पर बेहोश पड़ी थी , उस पर सैकड़ों मक्खियां भिनभिना रहीं थी ।
राह चलते राहगीर बता रहे थे ,थोड़ी देर पहले तक तो सही थी ।
अभी ,अचानक इसे ठोकर लगी और ….
पिछले बीस सालों से एक बात वह रोज़ बताती थी ,वह था उसका पिछला जन्म
“ना बऊ , तुमै बताबैं हम पिछले जलम में मालिन हते ,हम फूल बेंचन गये हे, रत्ता मैं हमैं ठुक्कर लगी औ हम मरि गे, जाऊ जलम में हमें , एक ठुक्कर लगैगी औ हम मरि जांगे ।”
एक दिन उसने बताया था
” बऊ जी , हम जब सात साल के हे, तो हमारो विआहु कद दओ ।
सतरा साल के हे हमाये आदिमी ।”
ठुक्कर लगैगी औ हम मरि जांगे।
फिर एक दिन उसने कहा –
” मैइने अपने आदिमी कौ औ अपनी जिज्जी कौ एक संग देखो ,
तो मैनें हल्ला काटो वानै मोय मारिके निकाद दओ, जिज्जी को अपने संग धल लौ।”
ठुक्कर लगैगी औ हम मरि जांगे।
फिर कभी उसने कहा –
” मैइने अपने बच्चन को चौका बासन करिके पालो ।
बऊ जी ,तऊ नास-पीटे लड़े मरे जाय रये।जाने केती शराब पीयत।मोय मात्त।”
ठुक्कर लगैगी औ हम मरि जांगे।
पिछले बीस सालों में पचासों बार सुनी इस पिछले जनम की कहानी को वह इतने चाव से सुनाती जैसे कोई परीकथा हो या कोई थ्रिलर।
दो दिन की छुट्टी के बाद वह बर्तन धोने आई थी ,एकदम चुप।
सुबह के अतिव्यस्त शेड्यूल के बावजूद मैंने उसे छेड़ दिया ,
” क्या बात ताई कहाँ थी, दो दिन ? आज इतनी चुप क्यों ? आज नहीं सुनाओगी अपने पिछले जनम की कहानी।”
उसकी झुर्रियों में मानो ज्वार भाटा चढ़ आया था । सारा नमक आँखो में इकट्ठा होकर उसे अँधा किये दे रहा था मटमैले पल्ले की कोर से आँखों में जमा नमक की पर्त हटा कर बोली ;
” का बतायें बऊ, हमाओ बड़ो लड़का मरि गओ , औ छोटे ने लड़ाई के मारे बाके घरै मोय नाय जान दओ ।
मैइने बाकी लासउ नाय देखी । अब कहां पावौगीं फेरि बाकौ मुंह देखन ताईं।
ठुक्कर लगैगी औ हम मरि जांगे।

ठोकर लगी और वह मरी नहीं….
और वह मरी नहीं….

शिखा रमेश तिवारी

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