बाल कोनाः बाल कविताएं-रश्मि सिंह


होमवर्क

छोटे छोटे कदम बढ़ाते
मुन्नु तो चल पड़ा स्कूल,
पर डरता-डरता कदम बढ़ाता
आगे बढ़ फिर पीछे आता,
होमवर्क जो गया था भूल।
अपनी गल्ती पर पछताता
याद आ रहा सर का रूल।
मन ही मन प्रण करता जाता
नहीं कभी कोताही होगी।
समय प्रबंध करके है चलना,
अब खेल से पहले पढ़ाई होगी।
बात बड़ों की मान बनेगा
माँ पापा की आँख का तारा।
ध्यान से सबकी बात सुनेगा
बन सर मैडम का स्टूडेंट प्यारा।
ये सारी बातें सोचता जाता
आँखों के मोती पोंछता जाता
इतने में आ पहुँचा स्कूल
पर यहाँ तो छाया सन्नाटा था
गेट पे मोटा ताला लटका था
सर पीट लिया अब मुन्नू ने
हॉलीडे कैसे गया वह भूल
झूम उठा था खुशी से वह
होमवर्क का डर तो भागा
पर झटपट किया खुद से वादा
जाते ही घर सबसे पहले
होमवर्क वो करेगा पूरा
फिर नहीं कभी डरेगा मुन्नू
जाने में अपने स्कूल!!

नन्हे सिपाही

बेशक छोटे उम्र में हम
जोश नहीं पर किसी से कम
देश पे अपने मर मिटने का
जज़्बा पूरा रखते हम!

भगत, राजगुरु या आजाद
मंगल पांडे,मनु या अश्फाक
वीरता के सुन किस्से इनके
जोश से हैं भर जाते हम!

छब्बीस जनवरी पंद्रह अगस्त
इसका इंतजार रहता हमको
जब तिरंगे की शान में
जन गण मन हैं गाते हम!

गर्व हमें भी होता जब
दुनिया में परचम लहराता
धरती से ले अंतरिक्ष तक
भारत अपनी धाक जमाता!

इतना प्यारा देश हमारा
प्यारा और लगेगा तब
भूल के जाति और धरम
मिलजुल के जब रहेंगे हम!

जोकर

लंबी टोपी सर पे रखता,
चेहरे पे जाने क्या मलता।
रंग-बिरंगे झालरवाले,
चमकीले कपड़ों में फबता।

उलटी सीधी हरकत करता,
मुख सबके मुस्कानें धरता।
खिलखिलाते भोले बच्चे जब,
खुद खोया बचपन जी लेता।

जब जब जोकर एंट्री लेता,
खुशियाँ झोली भर कर देता।
आँसू भूख समेटे भीतर,
तंगहाल जीवन स्वयं जीता।

चंद पैसों की खातिर खटता,
हँसता हंसाता मन में रोता।
बचपन अपना खोकर जोकर,
घर भर की है रोटी जुटाता।

हाथी

न्यारे बड़े हैं हाथी राजा,
नदी नहाना बहुत सुहाता।
भर कर सूंँड़ में पानी सारा,
रहे उड़ाते मानो फव्वारा ।
खाने के शौकीन बड़े हैं,
पेटूमल जी तनिक अड़े हैं।
यूं तो शांत बड़े हैं रहते,
गुस्साए फिर शामत करते।
मीलों चल चलकर जाते हैं,
बोझा भर-भर पहुँचाते हैं।
चल लेते हैं जिस रस्ते पर,
नहीं भुलाते वो जीवन भर।
हम मानव के दोस्त कहाते
वफादारी भी खूब निभाते।


मिल जाते जो प्रभु कहीं…

मिल जाते जो प्रभु कहीं
लेते पूछ फिर प्रश्न कई!
मन में हैं जो रहे घुमड़
क्या पाते उत्तर सही-सही?

पूछते उनसे कितने प्रश्न
धरती बनाई कैसे कब?
क्यों ऐसे कड़कती बिजली
कैसे बरसता बादल झमझम?
नभ नीला और सूरज पीला
क्यों दिखते चंदा मामा आधे?
क्या लगती उनको भी ठंडी
जो सो जाते हैं ओढ़ रजाई?

पुछते उनसे ये भी जरा
भुट्टे में मोती किसने भरा?
मटर की सारी फलियों में
किसने डाले दाने गिन गिन?
नदी में उसने ही डाली मछली
चिड़ियों को पंख दिए जिसने
हर तितली के पंखों पर किसने
इतनी प्यारी-प्यारी रंग बिखेरी!

प्रश्न कई हैं और अभी
इक दिखते सब इंसां जब
जाति धर्म का भेद हैं क्यूं फिर?
सब को बनाया तूने ही जब
क्यों उनमें फिर नफरत पनपी?
इक जादू अब और दिखा दो
गिराकर ऊँच-नीच की दीवारें
अब मिलजुलकर के रहें सभी!!

सोचो कैसा होता जग

सोचो कैसा होता जग
जब उल्टा -पुल्टा होता सब
चढ़ पेड़ पर जब चाहे
टॉफी तोड़ के ले आए
चाहे जितना खाते हम
सच कितने मजे उड़ाते हम…

मेंढक हवा में टर्राते
मछली पेड़ से ले आते
रंग बिरंगी तितली रानी
पानी में करती मनमानी
पीछे भाग न पाते हम
सच कितने मजे उड़ाते हम…

बेखौफ घूमती बिल्ली मौसी
छुपता फिरता नटखट टॉमी
वो शेर बनी फैलाती आतंक
चिड़िया रानी बड़ी सयानी
रहती जल की रानी बन
सच कितने मजे उड़ाते हम…

अप्पू राजा की पीठ में चढ़
हवा में उड़ते उसके संग
बादलों की सैर भी होती
परियों से मिल आते हम
मम्मी ढूंढ-ढूंढ हो जाती तंग
सच कितने मजे उड़ाते हम…..

-रश्मि सिंह
राँची, झारखंड
मोबाइल नंबर 8986619388

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