दो बाल कहानीः रानी सुमिता

पानी की बचत

कुश पाँच साल का था | जब मम्मी अपने कामों में व्यस्त होती तो वह चुपके से बाथरूम में चला जाता और नल चला कर देरी तक पानी से छप-छप करता | नहाने से ज्यादा उसे पानी से खेलना पसंद था | जग में पानी भर कर बाथरूम की सभी दीवारों पर पानी फेकता | बेसिन में नल खुली छोड़ देता और पानी से खेलता रहता।| जैसे ही मम्मी देखती बहुत गुस्सा होती।

पानी इस तरह बर्बाद नहीं करना चाहिए,तुम समझते क्यों नहीं, वह नाराज होकर कहती |
क्यों ? वह मासूमियत से पूछता |
क्योंकि एक दिन धरती से पानी खत्म हो जाएगा, मम्मी उसका भीगा सर पोछती हुई जबाव देती |
कैसे ? वह आश्चर्य से भर कर पूछता।
क्योंकि धरती के अंदर पानी कम होता जा रहा है, नदियां सूख रही हैं , मम्मी कुछ खीज कर जबाब देती।
तो क्या धरती के अंदर भी पानी है?, वह आश्चर्य से भर उठता।
हाँ बेटा, मम्मी तनिक मुस्काती |
पर बारिश तो पानी दे ही जाती है धरती को , उसके प्रश्न और उत्तर उछलते रहते |
उफ, तुम पानी नहीं बर्बाद करोगे बस…. मम्मी नाराज हो जाती और वहाँ से हट कर अपने कामों में लग जाती |
कुश कुछ दिन मम्मी के डर से पानी नहीं फेकता | पर हर चार-पाँच दिन पर मम्मी-बेटे के बीच यही बातचीत चलती| मम्मी सोचती कि कुश अभी बहुत छोटा है, उसे अभी सभी बातें समझाना मुश्किल है |
एक दिन कुश के चाचा की बेटी पायल उसके घर आई | पायल कुश से एक साल बड़ी थी | दोनों भाई-बहन खेलने-कूदने में व्यस्त हो गए | दोनों अपनी-अपनी साइकिलें उठा कॉलोनी में चलाने चल दिये | उनकी बातचीत भी जारी थी | कुश ने अपनी बड़ी दीदी को बताया कि मम्मी कहती है कि धरती के अंदर का पानी धीरे-धीरे खत्म हो रहा है | तुम्हें पता है दीदी कि धरती के अंदर पानी रहता है,उसने कौतूहल से अपनी दीदी की ओर देखा |
बिना कुछ जबाव दिये पायल ने कहा कि चलो हम देखते हैं | फिर क्या था दोनों भाई-बहन ने सामने पार्क में मिट्टी वाली एक जगह देखी | दोनों ने मिलकर वहाँ मिट्टी को हटाना शुरू किया |
अरे, कहाँ है पानी ? पानी तो सचमुच खत्म हो चुका है | नन्हें हाथों ने थोड़ी सी मिट्टी हटाई और बदले में पूरे कपड़े और हाथ-पाँव में मिट्टी लगा ली थी | दोनों देरी तक बैठे बातें करते रहे कि मम्मी ठीक ही कहती है पानी नहीं फेकना चाहिए| मिट्टी के नीचे पानी तो मिला ही नहीं | दोनों को तब तक मम्मी ने आवाज दी | दौड़े-दौड़े दोनों घर पहुंचे | मम्मी ने दोनों को इस तरह हाथ-पैर, कपड़ों पर मिट्टी लगाए देखा तो चौंक पड़ीं |
ये क्या किया है तुम दोनों ने|
पर हम तो पानी खोज रहे थे, पायल ने कुश की ओर देखते हुये मासूमियत से कहा |
क्या … मम्मी ने आश्चर्य से दोनों को देखा |
चलो, एक-एक कर नहा कर आओ …. ज्यादा कुछ बोले बिना वे खाना लगाने के लिए टेबल ठीक करने लगीं | शाम में सभी घूमने निकले | जब वे बड़े तालाब के पास पहुंचे तो दोनों भाई -बहन चिल्ला उठे,,, देखो, कितना पानी है ….
घर पर दोनों भाई -बहन बातें कर रहे थे,कितना पानी है सभी तालाबों में | फिर भी मम्मी जाने क्यों पानी-पानी करती रहती है ….
दादा जी ने बच्चों की सारी बातें सुन ली। वे पहले भी कुश और उसकी मम्मी के बीच की बहस सुन चुके थे |

उन्होंने एक दिन कुश को कहा, देखो तो कुश बेटा, मैंने शायद गलती से बाथरूम में नल खुला छोड़ दिया है, जरा बंद कर दो | कुश दौड़ कर गया और टप-टप टपकते नल को बंद कर आया | अब दादाजी उसे लगभग रोज कहीं न कहीं का नल ठीक से बंद करने को कहते | उसे कई बार घर के सारे नल चेक करने को भी कहते | एक दिन दादा जी के साथ कुश कॉलोनी के पार्क में घूम रहा था | तभी उसकी नजर उस नल पर पड़ी जिससे माली दादा पौधों में पानी डालते थे |
दादाजी देखिए, माली दादाजी ने नल ठीक से बंद नहीं किया है। पानी धीमी धार में गिर रहा है | मैं नल को अभी बंद कर देता हूँ… दादाजी के कुछ कहने से पहले वो संभल कर कदम रखते हुए नल को बंद कर आया | दादाजी ने पीठ थपथकर उसे शाबासी दी | और कहा तुमने आज पानी को उसी तरह सम्मान और प्यार दिया जैसे हम सबको देते हो |
मम्मी ने गौर किया कि अब कु administrationश बाथरूम में पानी बर्बाद नहीं करता |
दरअसल दादाजी ने बड़ी समझदारी से कुश की गलत आदत सुधार दी थी | एक दिन दादाजी ने टीवी पर कुश को पानी के महत्व पर एक कार्टून दिखाया, जिसमें पानी के विषय में बहुत सी बातें बताई गई थीं | यह भी बताया गया था कि नदियां किस तरह सूखती जा रही हैं और बारिश का पानी किस तरह धरती के नीचे न जा कर समुद्र में जा गिरता है |अगर हमने पानी की बचत नहीं की तो धरती के नीचे का पानी धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा | कुश को बहुत सी बात समझ में आई पर सारी बात अच्छी तरह समझ में नहीं भी आईं | उसे पर यह जरूर समझ में आ गया कि पानी की बचत बहुत जरूरी है| यही पानी का सम्मान है | कुश अब पानी का महत्व समझ चुका था। उसके अवचेतन मन में यह बात बैठ चुकी थी कि पानी उसी तरह सभी के लिए जरूरी है जैसे दादाजी और घर के बड़ों का प्यार उसके लिए जरूरी है।


2, फुटबाल मैच

रोहन और प्रणव बहुत अच्छे दोस्त थे | दोनों के घर एक ही मुहल्ले में थे| बस रोहन पहली गली में रहता और प्रणव तीसरी गली में | दोनों में इतनी गहरी दोस्ती थी कि दोनों रोज मिलते थे | साथ बैठ कर पढ़ाई करते थे | दोनों साथ ही स्कूल के लिए अपनी-अपनी साईकिल से निकलते | पहले रोहन का स्कूल आता था दोनों दोस्त एक दूसरे को
बाय -बाय कहते और प्रणव अपने स्कूल की ओर बढ़ जाता जो दो किलोमीटर आगे था |
रोहन पढ़ाई में बहुत मेहनत करता जबकि प्रणव हफनमौला था | वह पढ़ता कम था पर रिज़ल्ट रोहन के बराबर ही ले आता था | वह रोहन को अक्सर चिढ़ाता कि इतनी पढ़ाई की कोई जरूरत ही नहीं होती | पर रोहन के अपने तर्क थे कि पढ़ाई केवल नंबर के लिए नहीं होती | उसे पढ़ना अच्छा लगता है और वह पढ़ाई गहराई में जा कर करता है | वह केवल परीक्षा के समय महत्वपूर्ण प्रश्नों को याद कर नंबर लाने में विश्वास नहीं करता है | दोनों आठवीं की परीक्षा पास कर नवीं कक्षा में हाल में प्रवेश कर चुके थे |
पढ़ाई के साथ-साथ दोनों खेल में भी बहुत अच्छे थे | रोहन फुटबाल का बेहतरीन खिलाड़ी था जबकि प्रणव एक धावक था लेकिन फुटबाल भी खेलता था| एक बार दोनों हाई स्कूलों के बीच फुटबाल की अंतरविध्यालीय प्रतिस्पर्धा आयोजित की गई थी | तीन राउंड में यह प्रतियोगिता आयोजित होने वाली थी | रोहन Donald Trump अपनी टीम का गोलकीपर था | इस प्रतियोगिता को लेकर दोनों टीमों में बहुत उtonightत्साह था | प्रणव को उसके स्कूल ने अतिरिक्त चार खिलाड़ियों में शामिल किया था |
प्रथम दिन के खेल में रोहन की टीम ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया | रोहन ने शानदार प्रदर्शन करते हुये तीन गोलों को रोका और उसकी टीम 3-2 से विजयी रही | प्रणव पूरे मैच में अपनी टीम के खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाता रहा | एक बार तो उसने रोहन का भी ध्यान भटकाने की कोशिश की | बेशक परिणाम रोहन की टीम के पक्ष में गया पर रोहन को अपने दोस्त का अपने प्रति किया गया तरीका पसंद नहीं आया | माना वह फील्ड में नहीं था पर वह अतिरिक्त खिलाड़ी के रूप में शामिल था | रोहन चाहता तो उसकी शिकायत आयोजकों को कर सकता था | उसने घर जाते वक्त प्रणव को समझाने की कोशिश की पर उसने उसके हाथों को झटक दिया और कहा कि
तुझे तो अपने गोलकीपर होने पर बहुत घमंड हो गया है | मैं फील्ड में होता तो तुझे बताता | रोहन अवाक प्रणव का मुँह देखता रह गया |
पर ये तो प्रतियोगिता है मेरे भाई …उसके मुंह से किसी तरह निकला |
प्रतियोगिता है तभी तो मैं चाहता हूँ कि मेरी टीम जीते …मैं जीतूँ ….
अब रोहन को भी गुस्सा आ गया।
मेरी टीम… हुंह… तू कहाँ टीम में है …तू जिस पोजीशन पर है उन्हें कभी खेलने का मौका भी मिलता है ?

प्रणव रोहन का कॉलर पकड़ने आगे बढ़ा पर तब तक रोहन उसका हाथ झटक अपने घर की ओर बढ़ गया |

दो दिन के बाद शनिवार को दूसरे राउंड का मैच था | दोनों टीमों ने कमर कसी हुई थी | इस बार दोनों टीम के खिलाड़ियों ने अनेक फाउल किए | दर्शकों में भी खूब हल्ला होता रहा | अंत में दोनों टीम 1-1 से बराबर पर रही | इस बार दोनों टीमों के गोलकीपरों ने बहुत दमदार प्रदर्शन किया जिसका नतीजा यह रहा कि खेल ड्रा पर आकर रूका | आज रोहन और प्रणव अपनी अपनी साईकिल से घर लौट रहे थे लेकिन दोनों में कोई एक दूसरे से बात नहीं कर रहा था | उनके साथ ही उनके मोहल्ले में रहने वाले आकाश भैया भी मैच देखने के बाद अपनी बाइक से घर लौट रहे थे | आकाश भैया प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे | वे दोनों दोस्त अक्सर उनके पास अंग्रेजी और गणित पढ़ने जाते थे | उन दोनों को देख बाइक रोक कर आकाश भैया बोले,

देखो ये होती है खेल भावना | तुम दोनों की दोस्ती पर गर्व है | दो पक्के दोस्त और दो अलग टीम ! वाह !

दोनों दोस्त आकाश भैया से आँखें नहीं मिला पा रहे थे | दोनों जल्दी-जल्दी साईकिल चलाते हुये एक दूसरे की नजरों से से दूर जाने की कोशिश करने लगे पर यह संभव न था क्योंकि दोनों को जाना तो एक ही दिशा में था |

मंगलवर को फ़ाइनल और अंतिम मैच था | उस दिन दोनों स्कूलों की छुट्टी थी | प्रणव के स्कूल की टीम में एक खिलाड़ी को अचानक बुखार आ गया तो अंतिम मैच में प्रणव को टीम का हिस्सा बनने का मौका मिल गया | अब दोनों दोस्त खेल के मैदान में आमने -सामने थे | असली प्रतिपर्धी की तरह ,एक दूसरे को टक्कर देने को तैयार | दोनों टीमें मैच में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना चाह रही थी | प्रणव का स्कूल किसी भी हाल में मैच को जीतना चाहता था ताकि विरोधी टीम टूर्नामेंट जीत नहीं पाये | खेल धीरे-धीरे गति पकड़ने लगा था | तभी प्रणव ने फुटबाल हिट के समय आहिस्ते से रोहन को टक्कर मारी | दोनों की नजरें मिली पर प्रणव के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी | तभी प्रणव की टीम का भूषण गोल दागने में सफल रहा | इस टीम में उत्साह का माहौल था | बड़ी मुश्किल के बाद ये गोल हुआ था | पर जल्दी ही रोहन की टीम ने गोल बराबर कर लिया |अब मात्र दस मिनट ही बचे हुये थे | प्रणव ने डी एरिया में रोहन की टीम के राजेश को हाथ से टक्कर मार दिया | नियम के अनुसार रेफरी ने प्रणव को लाल कार्ड दिखला दिया | अब प्रणव को मैदान छोड़ कर जाना ही पड़ा | रोहन को प्रणव की इन हरकतों पर बहुत गुस्सा आ रहा था | अब पेनल्टी किक रोहन की टीम के हिस्से आया था | और अंतिम मिनट में किक गोल में बदल चुका था | 2-1 गोलों से रोहन की टीम इस मैच को और इस टूर्नामेंट को 2- 0 से जीत चुकी थी | शहर का वह खेल मैदान दर्शकों के उत्साह से भरा हुआ था | रोहन के अच्छे प्रदर्शन के कारण उसकी तारीफ हो रही थी | उसे प्लेयर ऑफ द मैच का पुरस्कार दिया गया था | सब उसे और पूरी टीम को बधाई दे रहे थे पर उसकी नजरें प्रणव को खोज रही थी | वह उसे दूर खड़ा दिखा | उसने उसे आवाज लगाई पर वह मुड़ कर जाने लगा | रोहन चाह कर भी उसकी ओर भाग कर नहीं जा पाया, वह अपनी टीम से घिरा हुआ था और सब खुशी मना रहे थे |

तभी प्रणव के कंधे पर किसी का हाथ पड़ा, मुड़ कर देखा तो आकाश भैया मुस्कुरा रहे थे | उन्होने उसे गले लगा लिया फिर हाथ पीछे कर उनके पीछे छुपे प्रणव को सामने कर दिया, कहा, ये सब क्या चल रहा है तुम दोनों के बीच … मैं सब समझ गया हूँ … चलो दोनों दोस्त गले मिलो …पर दोनों एक दूसरे को देखते रहे …प्रणव हाथ छुड़ा कर भाग खड़ा हुआ |

अगले दिन दोनों स्कूल की छुट्टी थी | फिर पढ़ाई सामान्य तरीके से चलने लगी पर अब दोनों दोस्त साथ स्कूल नहीं जाते थे …. आकाश भैया के पास पढ़ने अलग-अलग जाते | एक दिन आकाश भैया ने दोनों को एक तय समय पर बुलाया | आज दोनों दोस्त एक ही समय उनके घर पर थे | तीन सप्ताह के बाद वे दोनों आमने -सामने थे | आकाश भैया ने दोनों को एक-एक पेज दिया और कहा…
देखो, तुम दोनों आज एक दूसरे के विषय में कुछ लिखना है | दोनों उनका चेहरा देखने लगे |
रानी सुमीता, भोपाल

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