माह विशेषः बच्चे

एक बच्चे की हंसी

खो गई है
एक बच्चे की हँसी
यहीं कहीं इस भीड़ में।
कलियों से होंठों पर
जड़ दी गई हज़ारों कीलें
कँटीले विज्ञापनों की –
जिनमें प्रतिनायक के
टेढ़े-मेढ़े चेहरे हैं
और हैं उधार ली गई आवाज़ें
मकड़जाल में लिपटीं –
बेहुदी आकृतियाँ
खोखली हँसी
आपाधापी मचाती
दृष्टिहीन भगदड़ –
इसी में चिथ गए हैं
अंकुर – से नन्हें पाँव।
बुझ गई है दृष्टि
गले में फँसकर
रह गई है चीख
यहीं इसी अंधी भीड़ में
गुम हो गई
एक बच्चे की दूधिया हँसी
हो सके तो
ढूँढकर ला दीजिए।

-रामेश्वर कम्बोज हिमांशु

जिन्दगी है छोटी,
मगर हर पल में खुश हूँ,
स्कूल में खुश हु ,घर में खुश हूँ,
आज पनीर नही है, दाल में ही खुश हूँ
आज कार नही है, तो दो कदम चल के ही खुश हूँ
आज दोस्तों का साथ नही ,किताब पङके ही खुश हूँ
आज कोई नाराज है उसके इस अंदाज़ में भी खुश हूँ
जिसे देख नही सकती उसकी आवाज़ सुनकर ही खुश हूँ
जिसे पा नही सकती उसकी याद में ही खुश हूँ
बीता हुआ कल जा चूका है,
उस कल की मीठी याद में खुश हूँ
आने वाले पल का पता नही, सपनो में ही खुश हूँ
मैं हर हाल में खुश हूँ
ज्योति चौहान

मैं जल्दी पापा बन जाऊँ

मेरे मन में आता है यह –मैं जल्दी पापा बन जाऊं।
पापा बनकर जैसे चाहूं वैसे अपना समय बिताऊं।।

रोज सबेरे मुझे जगाकर,
पापा बहुत सताते हैं।
मुझसे कहते करो पढ़ाई,
लेकिन खुद सो जाते हैं।

मेरे मन में आता है यह- मैं भी यों ही मौज उड़ाऊं।
मेरे मन में आता है यह- मैं जल्दी पापा बन जाऊं।।

आफिस से घर आते पापा,
मम्मी चाय पिलाती हैं।
मैं विद्यालय से घर आता,
होमवर्क करवाती हैं।

मेरे मन में आता है यह- मैं भी चाय पियूं-सुस्ताऊं।।
मेरे मन में आता है यह-मैं जल्दी पापा बन जाऊं।।

पापा की गलती पर क्या-
कोई कुछ कर पाता है।
मुझसे गलती होती है तो-
मुझको पीटा जाता है।

मेरे मन में आता है यह- गलती हो पर मार न खाऊँ।
मेरे मन में आता है यह- मैं जल्दी पापा बन जाऊँ।।

-डॉ. कमलेश द्विवेदी

खेलोगे तुम अगर फूल से तो सुगंध फैलाओगे।
खेलोगे तुम अगर धूल से तो गन्दे हो जाओगे।

कौवे से यदि साथ करोगे, तो बोलोगे कडुए बोल
कोयल से यदि साथ करोगे, तो दोगे तुम मिश्री घोल

जैसा भी रंग रंगना चाहो, घोलो वैसा ही ले रंग
अगर बडे़ तुम बनना चाहो, तो फिर रहो बड़ों के संग।”

-सोहनलाल द्विवेदी

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