दो बाल कहानी- सीमा व्यास

बोबो बादल
एक था नन्हा सा बादल। नाम था बोबो। वह नीले आसमान के घर में सबके साथ रहता था।
एक दिन उसने नीली दुनिया से झांककर रंग – बिरंगी धरती को देखा । उसे हरे -हरे पेड़, नीला समुद्र, ऊंचे पहाड़, हरे-भरे बगीचे बहुत पसंद आए। उसने सोचा, कितनी सुंदर है धरती की दुनिया। काश ! मेरा घर उस रंगीन दुनिया में होता।
तभी उसे एक पतंग आसमान में उड़ती हुई दिखाई दी। वह लपककर उसकी डोर पर बैठ गया। पास के दूसरे बादल ने उसे रोकना चाहा,’बोबो, ऐसे मत जाओ।’ पर बोबो ने एक न सुनी। कुछ देर में पतंग कटकर नीचे आने लगी। बोबो को पतंग के साथ झूलते हुए नीचे आने में बहुत मजा आया।
पतंग एक पेड़ पर अटक गई। पेड़ की हरी भरी टहनियों ने बादल को देखा तो उसे अपनी बांहों में झुलाया। पंछियों ने उससे बातें की। पर हवा चली तो झूमती डालियों ने बोबो को एक ओर फेंक दिया। बोबो ने घबराकर आँखें बंद कर लीं।

आँखें खोलीं तो देख वह पास के एक पहाड़ से टकरा रहा था। पहाड़ की छोटी बड़ी चोटियों ने कुछ देर तो हल्के गोले को पहाड़ पर घूमाया। उससे खेला। फिर तो पहाड़ की नुकीली चोटियां उसे चुभने लगीं। उनके तीखे, सख्त रूप से बोबो की देह छिलने लगी। उनसे घबराकर भागा तो बोबो पास की नदी में जा गिरा।
नदी की लहरों को हल्का -फुल्का बादल बहुत भाया। लहरें उसे इधर से उधर फेंकने लगीं। पानी की फुहारों से भीगने में बोबो को बड़ा आनंद आ रहा था। पर बड़ी, तेज लहरों ने आगे बहने की जल्दी में बोबो को पास के बगीचे की ओर फेंक दिया।

भीगा बोबो बगीचे में धप्प से गिरा। वहां कुछ बच्चे फुटबॉल खेल रहे थे। बोबो को देखते ही बच्चे फुटबॉल छोड़ बादल को छूकर देखने लगे। कोई धप्पा मार रहा था तो कोई चिकोटी काट रहा था। कोई उस पर बैठता तो कोई उसे लात मारता। बच्चों से परेशान होकर बोबो को रोना आ गया।

पास में कुछ बच्चे पतंग उड़ा रहे थे। बोबो का मन हुआ कि फिर से पतंग पर बैठकर अपने घर चला जाए। पर बच्चों से पतंग उड़ ही नहीं रही थी।
पास से गुजरते हाथी दादा ने रोते बोबो को देख लिया। प्यार से उसके पास आए। बोबो ने हाथी दादा की सूँड पर बैठकर आसमान से आने की पूरी कहानी बताई। हाथी दादा ने पहले तो बोबो को घर में बिना बताए धरती पर आने के लिए डांट लगाई। फिर प्यार से समझाया। बोबो चुप हुआ तो उसे आसमान के घर में भेजने का उपाय सोचने लगे।
तभी उन्हें दोस्त बाज दिखा। जो बहुत ऊपर तक उड़ता था। हाथी दादा ने बाज से कहा कि वे बोबो को आसमान तक छोड़कर आएं।
बाज ने कहा, बोबो पहले वादा करे कि अब कभी अपना घर छोड़कर नहीं जाएगा। माता-पिता को बताए बिना घर से निकलेगा भी नहीं। दुनिया में सबसे प्यारा अपना घर ही होता है।
बोबो ने आंसू पोंछते हुए वादा किया कि अब वह कभी बिना कहे कहीं नहीं जाएगा। और धरती के घर तो कभी नहीं।
बोबो को सबक मिलते ही बाज अपने पंजों में पकड़कर बोबो को आसमान में छोड़ आए। उन्हें धन्यवाद देते हुए बोबो कह रहा था, ‘सबसे न्यारा, घर है हमारा।

तिनके की तासीर
अज्जू खेल के मैदान से घर लौट ही रहा था कि अचानक उसके जूते में कुछ घुसा। घुसा क्या अगले ही पल वह चुभने लगा। अज्जू लंगड़ाता हुआ कुछ कदम चला। कुछ कदम यानी अब्दुल चाचा के अहाते तक। वे सामने ही खाट के पास टाट बिछाए बैठे दिख गए तो सलाम करते हुए उनके पास चला गया। सींक का मुड्डा खींचकर उस पर बैठा ही था कि चाचा ने अपनी खनकदार आवाज में पूछा, ‘कहो बरखुरदार, कौन सी आफत मोल ले आए ?‘
‘मोल नहीं लाया चाचा, ये आफत तो खुद ब खुद घुस आई। वो भी मेरे जूते में।‘ इतना कहकर अज्जू ने जूता निकालकर झटकारा। अज्जू के जूते से हवा में लहराता कुछ गिरा तो चाचा के खरल में मूसली से नीम घोंट रहे हाथ रूक गए। हाथ क्या रूके उनकी आगे पीछे होती दाढ़ी, पीठ, टोपी सबकी गति थम गई। उन्होंने गर्दन उठाकर कहा ‘हुंह! देखो, जरा से तिनके की ताकत, कुछ देर को तुम्हारी आफत बन गया। वैसे आ कहां से रहे हो भरी दुपहरी ?‘
‘सुबह से मैदान में गया था चाचा। खूब खेला आज तो। बड़े दिनों बाद सब दोस्त इकट्ठा हुए थे। इतने दिनों से तो परीक्षा का हौव्वा बना रखा था घरवालों ने। सच चाचा, वे न कहें तो हमें कभी परीक्षा से डर न लगे। पता है चाचा, सबने मिलकर तन्नू को हरी घास में खूब पटका। मजा आ गया।‘ अज्जू ने जूते के तस्मे कसते हुए कहा।
‘वाह! क्या अजब खेल है कुदरत का। हरी घास में तुमने जी भर धूमामस्ती कर ली, घास को कुचल-मसल दिया। और उसी के एक तिनके ने तुम्हें दो कदम चलने से लाचार कर दिया।‘ चाचा फिर खरल में मूसल चलाने लगे।
अज्जू ने उनकी हिलती दाढ़ी के साथ आगे-पीछे होते हुए पूछा,‘चाचा, एक बात बताइए। हरी घास इतनी नर्म,मुलायम होती है, और उसी का यह तिनका इतना चुभनेवाला क्यों ?‘
‘तासीर, बेटा सब तासीर का खेल है।‘ चाचा ने कुछ और नीम की पत्तियां खरल में डालीं।
‘तासीर ? मैं कुछ समझा नहीं। तासीर यानी क्या ?‘
‘तासीर यानी प्रकृति या कह लो स्वभाव, चाहो तो गुण भी कह सकते हो। जैसे तुम्हारा स्वभाव है, मेरा स्वभाव है, वैसे ही घास का भी स्वभाव है और इस तिनके का भी स्वभाव है।‘
‘ता… सी…. र‘ अज्जू ने अपरिचित शब्द के हिज्जे कर जोर से बोलते हुए समझने का प्रयास किया।
‘सबकी तासीर अलग-अलग होती है। घास में भी दूब जिसके मैदान में तुम खेल रहे थे वह नरम, मुलायम, ठंडी और खुशबूदार होती है। ठंडी है तो इसे पीसकर लेप लगाने से जलन, खुजली षांत होती है। नर्म दूब धोकर चबाने से मुंह के छाले भी ठीक हो जाते हैं। और देखो, पानी सूखते ही दूब तिनका बन चुुभने लगती है। तुम्हारी आफत….‘ कहते हुए चाचा हंसे तो उनकी हिलती दाढ़ी देख अज्जू को भी हंसी आ गई।
‘आप ये क्या कर रहे हैं चाचा ?‘ अज्जू ने खरल में झांकते हुए पूछा।
‘ तेरी चाची के लिए नीम की पत्तियां पीस रहा हूं। देख जरा गर्मी बढ़ते ही उसके पैर के दाद – खाज ने फैलना शुरू कर दिया है। न रोका तो वह खुजा-खुजाकर उसे बढ़ा लेगी। आधा गिलास नीम का रस भीतर से कीड़ों को मारेगा और खून साफ करेगा। जानते हो गांधीजी भी रोज एक गिलास नीम का रस पीते थे। ‘
‘ ओ इतना कड़वा नीम का रस ? क्या उन्हें भी इसी तरह की खुजलीवाली बीमारी थी ?‘ अज्जू ने नीम की डाल से पत्तियां तोड़ उन्हें पानी में डालते हुए पूछा।
‘ नहीं रे, गांधीजी तो स्वस्थ रहना चाहते थे। इसलिए नीम का रस पीते थे। खून साफ रहेगा तो यूं भी कोई बीमारी पास नहीं फटकेगी। मै भी पी लेता हूं हफ्ते में तीन दिन। यूं नाक पकड़ के। और इधर देख, ये रखी है नीम की छाल। इसे घीसकर तेरी चाची के पैर पर लेप लगा दूंगा। पके नीम की छाल रोग के सारे कीड़ों को मार देगी। हफ्ते-दस दिन में तो तेरी चाची चंगी हो जाएगी।‘ चाचा ने रस को गिलास में छानते हुए बताया।
अज्जू ने भी छाल घिसने की कोषिष की। फिर कौतुक से पूछा,‘ चाचा, अगर चाची को छाल का लेप पिला दें और नीम का रस लगा दें तो ?’
‘तू तो अलटप्पू का अलटप्पू ही रहेगा। अभी तासीर की बात बताई थी ना ? इन दोनों की तासीर भी अलग है। एक भीतर से असर करती है दूजी बाहर से। प्रकृति की हर वस्तु की तासीर भिन्न है। अब देख, गन्ने से ही गुड़ बनता है और गन्ने से ही षकर। पर एक की तासीर गर्म और दूसरी की ठंडी। दूध की तासीर गरम है और उससे बने दही की ठंडी। हरे धनिये की तासीर ठंडी होती है और हरी मेथी की गरम।अनाजों में भी गेहूं गर्म तासीर का होता है और चावल ठंडी तासीर का।और भी …..‘
‘ बस बस चाचा, इतना तो मुझे याद भी नहीं रहेगा। पर ये तो बताइए चाचा, आप कैसे जानते हैं इन सबकी तासीर के बारे में ? मेरा मतलब है कहां लिखा रहता है ये सब ?‘ अज्जू ने सामने रखी बाल्टी से पानी लेकर हाथ धोए। मटके से पानी का गिसाल भरा और चाचा के सामने बैठ गया।
चाचा समझ गए बच्चा जिज्ञासु है। इस तासीर के बच्चे भी आजकल गुम होते जा रहे हैं। वे उठे, तहमद को फिर से कसते हुए दुने उत्साह से बताने लगे,‘ अगरचे सब जानकारियां किताबों से ही मिलतीं तो हमारे पुरखे इतने जानकार न होते मियां। अनुभव… तजुर्बा… यही है सबसे बड़ी पाठशाला। ये जो आज तुम्हें सब बना-बनाया मिलता है ना, इसे पुरखों ने सालों की मेहनत के बाद हासिल किया है। मनुष्य तो तबसे इल्म हासिल करता रहा है जब किताब-पट्टी ईजाद भी नहीं हुई थी।‘
‘ चाचा….चा…चा… कितनी कठिन भाषा बोलते हैं आप। अभी तो एक शब्द तासीर को ही समझकर निपटा था कि आपने इतने सारे नये शब्द बोल दिए। मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा कि क्या-क्या सीखूं -समझूं आपसे ?‘ अज्जू ने फुटबाॅल की तरह सिर को दोनों हाथों में पकड़कर कहा।
चाचा हंसे, दाढ़ी पर हाथ फेरा, दरवाजे से भीतर झांककर घड़ी देखी और अज्जू के सर पर हल्की सी चपत लगाते हुए बोले,‘ जनाब, अभी तो बस इतना समझ लीजिए कि आपको घर से निकले काफी वक्त हो चला है। अपनी मां और पिताजी की तासीर तो भली तरह जानते हो। ज्यादा देर हुई तो खाना मिलना मुश्किल होगा। वे अपनी तासीर पर उतरें उससे पहले ही घर पहुंच जाओ।‘
‘ ओ चाचा, सच में ? कितने बज गए ?‘ अज्जू की निगाहें आसपास घड़ी तलाषने लगीं।
उठकर जाते हुए अज्जू से चाचा ने पूछा,‘ बरखुरदार, जरा बताओ तो वो तिनका है कहां ?‘ अज्जू जमीन में सिर गाड़कर देखने लगा। ‘अरे चाचा, जरा सा तिनका तो था, उड़कर गया होगा किसी और के जूते में घुसने।‘
‘तिनका है तो इस तरह बोलोगे ? ये जो जरा सा तिनका है न, इसके बारे में संत कबीर कह गए हैं, तिनका कबहुं न निन्दिये, जो पांवन तर होय। कबहुं उड़ी आंखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय। यानी एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो, जो तुम्हारे पांव के नीचे दब जाता है या तुम्हारे जूते में घुस जाता है। यदि वह उड़कर आंख में गिर जाए तो बहुत तकलीफ होती है।‘ चाचा ने उसे दो केरियां पकड़ाते हुए कहा।
‘ निंदा ? अरे चाचा, मैं तिनके को कभी कुछ नहीं कहूंगा। सच्ची।‘ अज्जू ने केरियों को जेब के हवाले करते हुए कहा।
‘शाबास बेटा। आज एक अच्छे शागिर्द की तरह मेरे हाथ लग ही गए हो तो एक गहरी बात भी बता दूं। ये जो पानी की नमी है न, सिर्फ घास को ही नहीं इंसान को भी नर्म बनाती है। इसलिए इंसान भी तब तक ही प्यारा है जब तक उसमें पानी है। बिन पानी सब सून… कबीरदास जी ही कह गए। तो बेटा, अपना पानी कभी मरने मत देना। जाओ… खूब खुष रहो।‘
अज्जू गौर से चाचा की संजीदा बात को सुन रहा था, जो उसे जरा भी समझ नहीं आई थी। उन्हें सलाम करते हुए बोला, ‘चाचा, और कल मैदान से लौटते समय फिर आऊंगा आपकी पाठशाला में। अभी तो जाता हूं घर, वहां मम्मी – पापा इंतजार कर रहे होंगे। उन्हें भी तो बताना है तासीर की… नहीं… नहीं…. तिनके की कहानी।‘ और अज्जू ने घर की ओर दौड़ लगा दी।
सीमा व्यास
562, ए,एम,
स्कीम नं. 140
इंदौर
09406852215

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