अपनी बातः युद्ध के विरुद्ध


ना ना , हम युद्ध की बात नहीं कर रहे, उसका विकराल और असह्य ताण्डव तो प्रत्यक्ष और चारो तरफ है और जाने कितनों को रोज निगल रहा है। हर मुहाने पर ही तो लड़ाइययाँ हैं आज इस आधुनिक समाज में….चाहे वह समाज हो परिवार हो या व्यक्तिगत जीवन, या फिर नजदीकी रिश्ते ही क्यों नहीं?…प्रेम. विश्वास और सद्भाव ही नहीं, मानो जीना ही भूलता जा रहा है कुंठाओं का बंडल बना आज का इनसान। आश्चर्य नहीं कि इस युग की सबसे बड़ी बीमारी मनोविकार और अकेले पन और असफल इच्छाओं से उत्पन्न उदासीनता है।
इस सर्वव्यापी युद्ध से उत्पन्न तबाही को कैसे रोका जाए, सशक्तिकरण की यह होड़ विनाश के शस्त्रों पर केन्द्रित न होकर कैसे विकास , स्वास्थ और सामूहिक समृद्धि व शांति पर केन्द्रित हो, इस पर ही सोचना होगा सभी को। ताकि आम आदमी जी सके…चन्द की जिद में फंसा मक्खी-मच्छर की तरह न मारा जाए।
रेशम की यह गुत्थी इतनी उलझी दिखती है कि सिरे या समाधान नजर ही नहीं आते कहीं । पर तोड़ना नहीं , सुलझाना है इसे क्योंकि मानवता की जीवन डोर है यही और जिम्मेदारी हम सभी की… जी हाँ हम सभी की।
कौन नहीं चाहता सुरक्षित होना… चैन से जीना? पर युद्ध थमते क्यों नहीं?
क्यों नए-नए मोर्चे खुलते चले जाते हैं पलपल? रिश्तों तक में धोखाधड़ी और स्वार्थ का ही वर्चस्व है। दूसरा हर व्यक्ति और समाज बस एक सामान उपयोग के लिए आज के उपभोक्ता मानव के लिए।
यह नारी सशक्तिकरण की मांग, दलित और असहायों के हितों के संरक्षण की मांग , उच्छृंखल होने का मुक्ति पत्र हो मानो, सद्भाव नहीं समाज का। पर हर स्वतंत्रता या प्रिविलेज एक जिम्मेदारी भी है, अपने प्रति भी और दूसरों के प्रति भी।
आधुनिक यानी समय के साथ-साथ चलना, और बेवजह के युद्ध के विरुद्ध खड़े होना इस युग की सबसे बड़ी मांग बनती जा रही है। सोचिए कितना कुछ है जो झुंकता जा रहा है इसकी कभी ना बुझने वाली आग में जो स्व के साथ-साथ दूसरों के विनाश पर भी आमदा है। लगातार आती और विचलित करती खबरें विनाश के कगार पर खड़ी हैं मानो। बचाने की जिम्मेदारी सभी की है, संभलने की भी और संभालने की भी। एक साहित्यकार की तो और भी ज्यादा। शब्दों को बृह्म कहा गया है हमारे वेदों में और कलम को तलवार से भी तेज।
लडाइयों का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना कि इनसान का। इनसान का ही क्यों शायद सृष्टि का भी। कहते हैं कि विघटन से ही नए का जन्म होता है। पर मानव समाज के संदर्भ में देखें तो सहजीवन से ही विकास हुआ था हमारा। जुड़ने पर पहले परिचितों की बस्तियाँ बनी होंगी फिर गांव और शहर और अंततः राष्ट्र। इस सहयोग व सहकारिता, साझी बुद्धि से ही मानव सभ्यता आज के इस उत्कृष्ट और आरामदेह बिन्दु पर पहुँच पाई है क्योंकि मानें या न मानें अभी तक सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना ही प्रमुख थी समाज में बेवजह की स्पर्धा या बैर नहीं।
सोचना यह है हमें कि क्यों ये लडाइयाँ या युद्ध जारी हैं आज भी और कम होने के बजाय बढ़ते ही जा रहे हैं?
ईमानदारी से देखें तो पहले लड़ाइयाँ उसूल या सिद्धान्तों को लेकर होती थीं, निर्बल की रक्षा और ज्यादती व अतिक्रमण को रोकने के लिए होती थीं क्योंकि तब इनसान सभ्य हो रहा था, सभ्यता की ओर बढ़ रहा था। धर्म की इन लड़ाइयों में स्वयं परमात्मा भी उनके साथ है ऐसा उसका विश्वास था। प्रभु जन्म लेकर आएगा धरा पर और सही का ही साथ देगा यही समझाते थे धर्मग्रंथ। पर आज इन विचारों पर धूल की मोटी परत चढ़ चुकी है और अधिकांश लड़ाइयाँ स्वार्थी आधिपत्य और वैभव को लेकर हो रही हैं, चंद की जिद पर हजारों रोज मर रहे हैं। ‘मेरी बात मानो वरना गोली खाओ’वाली हैं। अनावश्यक को हटाने के लिए हैं। सह अस्तित्व की तो छोड़ो, दूसरे जिन्दा क्यों हैं यह तक खलता है अब तो। ऐसे में इस वर्चस्व की लड़ाई को रोक पाना, मरती धरती को बचापाना दिन-प्रतिदिन मुश्किल-सा ही होता जा रहा है। डर है कि कहीं ऐसा न हो कि एकदिन सारे विकास के बावजूद, तकनीकी ज्ञान के बावजूद न हम बचें ना हमारी यह पृथ्वी ही।
बदलते मौसम , बढ़ती गरमी-सरदी, पानी की निरंतर बढ़ती जाती कमी, कई संकेत हैं जो सावधान कर रहे हैं कि बदलो सोच और रहन-सहन। अभी नहीं बदले तो शायद यह मौका ही न मिले। एक-एक बिंदु से ही सागर का अस्तित्व है माना पर कितना भी गुमान कर ले बिन्दु खुद सागर नहीं। सह अस्तित्व और एक-दूसरे की परवाह , संरक्षण अब और भी जरूरी है, जब इनसान की अपनी गलती, द्वेष भावना, घृणा और स्पर्धा की भावना ने अंतिम कगार पर ला खड़ा किया है।
वैज्ञानिक खोज और बृह्मांड के ज्ञान का कोई मतलब नहीं , जब हम यानी इनसान ही नहीं रहेंगे-लेखनी का यह युद्ध के विरुद्ध अंक इन्ही अहम् और वहम् की लड़ाइयों के विरुद्ध है। राग-द्वेष के विरुद्ध है, जो छोटी-छोटी बातों से शुरु होकर न संभलने वाला विकराल रूप ले रहे हैं चारो तरफ और नफरत व मायूसी ही नहीं, आए दिन ही हजारों की मौत का कारण बन रहे हैं। कई बार जटिल-से-जटिल समस्या का हल समस्याओं के अंदर ही होता है बस शांति से तलाशने की और समझने की जरूरत मात्र है। एकाग्र और संगठित होना ही आज की सबसे बड़ी आधुनिकता और जरूरत है ना कि स्वार्थी और मदान्ध होकर दूसरों को मक्खी-मच्छर की तरह रास्ते से हटाना ही समस्याओं का जबाव मानना।
लड़ाइयाँ पहले इतनी विध्वंसक नही थीं जितनी की आज हैं, क्योंकि उतने सशक्त और विष्फोटक शस्त्र नहीं इजाद किए गए थे। पर आजकी लड़ाइयाँ कहीं भी हों , कोई भी शुरु करे , सभी को प्रभावित करती हैं। यही चेताना चाहा है सभी रचनाओं ने इस अंक में। आदमी से आदमी होने की मांग और प्रार्थना है बस अंक,उम्मीद है अंक पसंद आएगा आपको और आप सभी अपनी कलम से जुड़ेंगे भी। सदा की भांति आगे भी आपकी रचना और प्रतिक्रियाओं का इन्तजार रहेगा।
अगला अंक हमने मनुष्य और जानवरों के सह अस्तित्व पर रखा है। क्या संबंध है आज इनका, क्या यह हम पर आश्रित हैं या हम खुद इनपर। क्या भविष्य है इनका? कैसे रोक सकते हैं हम इनकी विलुप्त होती प्रजातियों को? आपकी विचारोत्तेजक रचनाऔं का हमें इंतजार रहेगा। आप अपने पालतू जानवरों के संस्मरण, उनसे चिढ़ , आक्रोष , भय या स्नेह जो भी महसूस करते हों जानवरों के प्रति, लीपिबद्ध करें और हर हाल में २४ अगस्त तक भेज दें ।
भेजने का पता है-shailagrawala@gmail.com
Shailagrawal @hotmail.com
बरसात के इस सुहाने मौसम में पड़ने वाले सभी पावन पर्व और उत्सवों की शुभकामना के साथ,
शैल अग्रवाल

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