जब से चुनाव की घोषणा हुई है और झटपट दस- दस हजार रूपये खाते में ट्राँस्फर हुए हैं, तब से पूरे सूबे का पारा हाई हो गया है।
और इसी दस- दस हजार ने लोगों के घरों का पारा इस ठंडी में भी बढ़ा दिया है। औरत और मर्द दोनों में लड़ाई होने लगी है। औरत को दस हजार मिला है। और मर्द को नहीं। लिहाजा मर्द यानी पति नाराज है। और अपनी औरत से ही लड़ने लगा है। कायदे से आदमी को अपनी औरत से नहीं लड़ना चाहिए। क्योंकि औरत को सरकार से ये मिला है। आदमी को सरकार से लड़ना चाहिए।
मर्द औरत से दस हजार में से कुछ झीटना चाहता है। औरत भी सरकार की तरह ही है। केवल लेना जानती है, देना नहीं। औरत महामक्खी चूस है। वो पैसे पर हाथ धरना तो छोड़िये हाथ में लेकर देखने भी नहीं देना चाहती।
लोगों की शिकायत हो गई है कि बहन को साले ने दस -दस हजार रूपये खाते में दिया है। लेकिन बहनोई को साले ने एक हजार भी खाते में नहीं दिया है। अब ये पहली बार हुआ है कि रसूखदार लोगों से गरीबों का रिश्ता हुआ है। नहीं तो ये लेने और ठगने वाले नेताओं ने कभी दिया है किसी को कुछ! नेताजी तो अपनी देह का मैल भी ना दें !
पैसे ने औरत का मन बढ़ा दिया है। औरत जामे से बाहर हुई जाती है। मर्द का धैर्य औरत की इस हुक्म उदूली से चूका जाता है। औरत को दस हजार मिलने पर वो हवा में उड़ने लगी है। वो एक दिन की अमीर हुई है। इसीलिए इतरा रही है। उसके तो पाँव ही जमीन पर नहीं पड़ रहें हैं। उसको लगता है कि वो नियंता बन गई है। पैसा मिलते ही वो पति को कुँए का मेंढक मान रही है। वो ज्ञान बघारने लगी है। मर्द चुपचाप जैसे दीक्षा लेकर गुरूवर की बात सुन रहा है। वो ज्ञान दे रही है। वही आज्ञाकारी नारी अब अवज्ञा कर रही है। मर्द को लग रहा है कि उसके घर की औरत बिगड़ रही है। और बिगाड़ने में जो पूरी तरह हाथ है वो सरकार का है। जो औरत को मजबूत और मजबूत किए देती है। मर्द को कमजोर और कमजोर किए देती है। दरअसल धोबी का कुत्ता आदमी बना हुआ है। ना अब घर का है ना घाट का। बेचारा किधर जाए ? समझ नहीं पा रहा है। उसकी बुद्धि हेरा गई है। औरत तो आदमी का विरोध कर ही रही है। आदमी भी सरकार से विरोध कर रहा है। सारे झगड़े कि जड़ ये सरकार ही है।
औरत कह रही है। हमको तो दस हजार मिल गया है। पति को जहाँ जाना है, वो जाए।
आदमी भी कम कुँठित कहाँ है। वो पत्नी को गुलाम समझता है। वो सरकार से दो कदम आगे है। सरकार डाल- डाल की सोचती है। तो वो पात- पात के बारे में सोचता है। वो ठान चुका है, कि वो औरत को वोट देने नहीं देगा। मन मर्जी नहीं करने देगा। बीमारी नई -नई है। ऊँगली शुरू में ही काट दी जाए तो पूरा शरीर बच सकता है । औरत उसकी खरीदी हुई जरगुलाम है। वो सरकार से बदला लेगा। बदला लेने के बहुत से तरीके हैं।
खासकर औरत जिसको वोट देना चाहती है। पुरूष ने औरत को लपेटे में ले लिया है। इस तरह से देखा जाए तो लपेटे में औरत नहीं सरकार आ गई है। और सरकार पिट रही है। उसकी औरतों के मत लेने की दिली इच्छा दिल में ही दबकर रह गई है।