रंजना जयसवाल, मेघा राठी, विभा रश्मि

पाँच लघुकथा

रंजना जयसवाल

लघुकथा-१
पुण्य
जेठ की भरी दोपहरी, धूप से मानो सड़क पिघल रही थी।मोहन ने सवारी को उतारा और गमछे से पसीने को पोछा।गर्मी और पसीने से चेहरा लाल हो गया था,गला भी सूखा जा रहा था। मोहन ने रिक्शा प्याऊ की तरफ बढ़ा लिया।वर्षो से उस बूढ़ी अम्मा को वहीं राहगीरों को पानी पिलाते देखा था। अम्मा ने तांबे के लोटे को उसकी तरफ बढ़ा दिया।मोहन एक सांस में गट-गट करके पानी पी गया।उसने अपनी कमीज के बाँह से अपने मुँह को पोंछा और अम्मा की तरफ मुस्कुरा कर कहा,
“अम्मा एक बात कहूँ?”
“हाँ-हाँ बोल न बेटा…”
“क्या मिलता है तुम्हें इस तरह सबको पानी पिलाकर।मैं रोज देखता हूँ, इस गर्मी में इंसान घर से निकलना नहीं चाहता और तुम बिना नागा रोज यहाँ राहगीरों को पानी पिलाने बैठ जाती हो। क्या मिलता है तुम्हें?”
अम्मा के झुर्रिदार चेहरे पर एक चमक आ गई
“एक बात बता पानी पीकर तुझे क्या मिला?”
“तृप्ति… संतुष्टि!”
“बस मुझे भी…”

लघुकथा-२
ड्राइवर
दरवाजे के बाहर गाड़ी की आवाज सुनकर मिस्टर शुक्ला ने खिड़की का पर्दा हटाया और देखने की कोशिश की।शायद सामने वाले मकान में कोई आया था।
“थैंक्यू भैया! आपको रात में आना पड़ा।”
“अरे कैसी बात करती हो। अच्छा अब मैं चलता हूँ, काफी देर हो गई है।”
मिस्टर शुक्ला के चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट थी, तभी शुक्लाइन ने कमरे में प्रवेश किया।
‘क्या हुआ? आप खिड़की से क्या देख रहे हैं?’
“सामने तुम्हारी वह समझदार पड़ोसन रात के ग्यारह बजे अपने पति के मित्र के साथ घूम कर आ रही हैं।”
“कौन सुजाता?”
“हाँ-हाँ सुजाता, मिसेज सुजाता।”
शुक्ला जी ने तंज कसा
“आज सुबह सुजाता ने बताया था उसके पति विपुल के बचपन के दोस्त आलोक के बच्चे का बर्थडे था। विपुल तो शहर के बाहर गया हुआ है, वह अकेली कैसे जाती?
“ड्राइवर को बुलवा लेती?”
“अरे ड्राइवरों का तो जानते ही हैं, गई तो ड्राइवर के साथ ही थी पर शाम के छः बजे के बाद कोई रुकना नहीं चाहता।”
“कोई जरूरी था जाना, यह कोई तरीका है रात के ग्यारह बजे गैर मर्द के साथ चली आ रही हैं।”
“गैर मर्द!”
शुक्लाइन सोचने लगी, पति के बचपन के मित्र पर हम भरोसा नहीं कर सकते पर उस ड्राइवर पर भरोसा कर सकते हैं जिसके न घर का पता है और न ही परिवार का…और अपनी बहन-बेटियों को भेज देते हैं सिर्फ भरोसे के तराजू पर!

लघुकथा-३
दाग
शायद सामने वाले मकान में कोई आया था।
“थैंक्यू भैया! आपको रात में आना पड़ा।”
“अरे कैसी बात करती हो।अच्छा अब मैं चलता हूँ, काफी देर हो गई है।”
मिस्टर शुक्ला के चेहरे पर व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट थी, तभी शुक्लाइन ने कमरे में प्रवेश किया।
‘क्या हुआ?आप खिड़की से क्या देख रहे हैं?।’
“सामने तुम्हारी वह समझदार पड़ोसन रात के ग्यारह बजे अपने पति के मित्र के साथ घूम कर आ रही हैं।”
“कौन सुजाता ?”
“हाँ-हाँ सुजाता, मिसेज सुजाता।”
शुक्ला जी ने तंज कसा
“आज सुबह सुजाता ने बताया था उसके पति विपुल के बचपन के दोस्त आलोक के बच्चे का बर्थडे था।विपुल तो शहर के बाहर गया हुआ है,वह अकेली कैसे जाती?
“ड्राइवर को बुलवा लेती?”
“अरे ड्राइवरों का तो जानते ही हैं,गई तो ड्राइवर के साथ ही थी पर शाम के छः बजे के बाद कोई रुकना नहीं चाहता।”
“कोई जरूरी था जाना,यह कोई तरीका है रात के ग्यारह बजे गैर मर्द के साथ चली आ रही हैं।”
“गैर मर्द!”
शुक्लाइन सोचने लगी। पति के बचपन के मित्र पर हम भरोसा नहीं कर सकते पर उस ड्राइवर पर भरोसा कर सकते हैं जिसके न घर का पता है और न ही परिवार का…और अपनी बहन-बेटियों को भेज देते हैं सिर्फ भरोसे के तराजू पर…!
डॉ. रंजना जायसवाल

दाग (ब)
“हेलो पापा!”
“ हाँ बेटा वो आपने जो विमल भैया के बेटे के लिए लड़की की फोटो भेजी थी।वो लड़की कहाँ की थी।”
“गोरखपुर वाली…?”
“हाँ वही जिसका न बाप था और न ही भाई…”
“क्या हुआ किसके लिए पूछ रही हो।”
“मेरी ननद की ननद के लड़के की पिछले साल शादी हुई थी।उसकी बीबी एक महीने में ही छोड़कर चली गई थी।”
“अरे एक दिन रही हो या एक महीना दाग तो लग ही गया है!”
“बात तो तू सही कह रही है।हुआ क्या है?”
“मैंने सोचा विमल भैया के लड़के का रिश्ता उससे पक्का नहीं हो पाया तो उनके बेटे से ही चलवा दूँ।किसी का भला हो जाएगा।”
“बात तो तुम ठीक कह रही हो।पर क्या लड़की वाले मान जाएँगे?”
“क्यों नहीं आखिर दाग तो उन पर भी है। लड़की के न बाप है और न ही भाई…कल को मायके के नाम पर उसके पास होगा ही क्या…?”

लघुकथा-४
सरकारी काम
दफ़्तर के बाहर नीम के पेड़ के पास भीड़ लगी थी।
”राम सिंह क्या हो गया? इतनी भीड़ क्यों लगी है?”
बड़े बाबू ने पूछा
“परसों जो किसान आपसे मिलने आया था न…!”
“वही जो चार साल से दफ्तर के चक्कर लगा रहा है।
“जी बड़े बाबू,वही अपना गमछा गले में बाँध पेड़ से लटक गया है।”
बड़े बाबू के चेहरे पर एक मिनट के लिए शिकन आई।
“लोगों में धैर्य तो बिल्कुल रह ही नहीं गया है। समझाया था,सरकारी काम है। इन कामों में समय लगता है पर…”
बड़े बाबू ने अपने कमरे की ओर कदम बढ़ाया। अचानक उन्हें कुछ याद आ गया।
“राम सिंह! कल ही इस पेड़ को कटवा देना, पता चला कल कोई और लटक गया।”

लघुकथा-5
नर्क
“चल कब तक रोती रहेगी जल्दी से तैयार हो जा…”
शन्नो बाई ने आरती की पीठ पर धौल जमाते हुए कहा ,दो दिन पहले ही जुम्मन उसका प्रेमी शादी का झांसा देकर कोठे पर बेच गया था।आज उसकी बोली लगनी थी। सारी तैयारी हो चुकी थी,
“ख़रीदारों के आने का समय हो गया है और तू टेसुएँ बहा रही है।इस मरे चेहरे को कौन खरीदेगा, जा जल्दी से तैयार हो जा और वो जो जोड़ा दिया है पहन कर तैयार हो जा।”
शन्नो बाई ने उसके चेहरे को हथेलियों में भर लिया
“खरा सोना है तू एक लाख से कम नहीं लूँगी।”
आरती ने उसके पैर पकड़ लिए और गिड़गिड़ाने लगी
“छोड़ दीजिए मुझे…मेरे घर वाले मेरी राह तक रहे होंगे।मैं शरीफ घर की लड़की हूँ मैं यह सब नहीं कर पाऊँगी।”
“शरीफ़ यहाँ भी सब शरीफ़ ही आते हैं।”
“मैं आपकी बेटी की तरह हूँ अगर आपकी बेटी होती तो क्या आप उससे भी ऐसा काम कराती।”
आरती ने बिलख कर कहा,शन्नो बाई ने उसकी ठोड़ी को थोड़ा ऊँचा करके कहा
“तू तो मेरे बुढ़ापे का सहारा है,वो क्या कहते हैं सिकन्दर भाई पेंशन…”
शन्नो बाई अपनी ही बात पर ठठा मारकर हँस पड़ी, अचानक से उसका चेहरा कठोर हो गया
“तेरी जैसी न जाने कितनी लड़कियाँ यहाँ पर काम कर रही है। बहुत देखे हैं ऐसे नाटक…”
शन्नो को पिघलता ना देख आरती का रुख बदल गया।उसने नफरत भरी निगाहों से उसकी ओर देखते हुए कहा
“नर्क में जाओगी शन्नो बाई…बद्दुआ लगेगी तुम्हें मेरी…”
शन्नो बाई का चेहरा अचानक से कठोर हो गया।बीस साल से वह यहाँ पर काम कर रही थी। क्या-क्या नहीं देखा था उसने इन बीते बीस सालों में… उसने धीरे से बुदबुदाया
“जाने की क्या जरूरत है बीस साल से नर्क में ही तो है।”

पाँच लघुकथा

मेघा राठी, भोपाल

लघुकथा-१
मृगतृष्णा
राधा ने सोने के पहले नित्य की तरह अपनी सपनों की पोटली खोली। एक- एक कर वह प्रत्येक सपने को निरख-परख रही थी। ” तुम प्रतिरात इस पोटली को खोलकर क्यों बैठ जाती हो? सो जाया करो न।”, खिड़की की मुंडेर पर बैठे चकोर ने अपनेपन से कहा।
” सपनों के बिना नींद भी तो नहीं आती। सपने न हों तो जीवन अधूरा है। ” कहती हुई राधा ने सबसे चमकीले सपने को छूने के लिए हाथ बढ़ाया और फिर पीछे खींच कर सपनों के ढेर को उलटने-पलटने लगी।
” क्या हुआ? तुम नित्य उस सपने को स्पर्श करती हो मगर ओढती क्यों नहीं?”, आज चकोर यह प्रश्न करने से खुद को रोक नहीं सका ।
राधा ने तृषित आंखों से उस चमकीले सपने को देखा और चकोर की आंखों में देखते हुए रहस्यमय स्वर में कहा, ” श्श्श्श पगले , उसमें सघन कुंजों में कान्हा के साथ अत्यंत मनोहारी पल है।”, कहती हुई राधा के मुख पर आई लाज भरी मुस्कान देख चकोर भी मुस्कुरा उठा।
” तो उसे छूकर वापिस रख क्यों दिया।”, चकोर ने राधा के मन की थाह लेने की लिए पूछा।
” क्योकि….. क्योकि उस अतीत को जीने की चाहत केवल प्यास जगाती है चकोर। मृगतृष्णा की तरह इनके पीछे भागते रहने पर जो आशाएं साथ हैं वे भी दम तोड़ देंगी।”, मलिन होती मुस्कान के साथ छलकती आंखों पर संयम रखने का प्रयास करती राधा ने कहा।
” मगर कभी- कभी यह मृगतृष्णा जीवन जीने का उद्देश्य भी तो बन जाती है न राधा।”, आकाश में खिलते चंद्रमा को देखकर उसके समीप जाने के लिए उड़ने के पहले पंख खोलते हुए चकोर ने कहा।
” मृगतृष्णा केवल भटकाती है चकोर , जैसे तुम रोज चंद्रमा के पास जाने के लिए उड़ान भरते हो मगर जा नहीं पाते।”, राधा की बात सुन चकोर ने ठिठक कर राधा को देखा। राधा के हाथ में एक ठोस पारदर्शी सपना था जिसे पलकों पर रखकर वह सोने जा रही थी।

लघुकथा-२
देश

“अरे पता कीजिये, देश कहाँ लापता हो गया? हम राज किस पर करेंगे!” नेता जी ने फोन पर अधिकारियों को हड़काया। फिर अपने अनुयायिओं से कहा,” आप लोग यहाँ खड़े-खड़े मुँह क्या देख रहे हैं? जाइये कोई तो होगा जिसने देश को जाते हुए देखा होगा, जाकर ढूँढिए उसे।” सब चले गए।
नेता जी ने टीवी ऑन कर दिया।
“विश्व मानचित्र से देश के लापता होने के बाद अब प्रश्न उठता है कि हम किस देश के नागरिक के रूप में जाने जाएँगे। हमारी सीमाएँ पड़ोसी देशों से घुल-मिल गयी हैं।” एक चैनल पर न्यूज रीडर बहुत चिंतित अंदाज में स्टूडियो में आये विद्वजनों से पूछ रही थी।
नेता जी ने एक-एक करके सभी चैनल बदले,हर चैनल पर एक ही समाचार था। झल्ला कर नेताजी ने टीवी बन्द कर दिया। वे घर से बाहर निकलकर टहलने लगे। उनके पीछे उनके सुरक्षा गार्ड पूरी मुस्तैदी से चल रहे थे।
” हा- हा- हा, जिसे मुल्क की सुरक्षा करनी चाहिए उसे तो अपनी ही ज्यादा चिंता है।” कहते हुए एक आदमी सिर से पाँव तक कम्बल में ढका उनके सामने आ खड़ा हुआ।
” कौन हो तुम?’ नेताजी का प्रश्न पूरा होने के पहले ही सुरक्षाकर्मियों ने उस व्यक्ति को घेर लिया। एक ने आगे बढ़कर उसका कम्बल हटा दिया।
” उफ़्फ़,” बदबू के भभके के साथ उसकी विकृत शक्ल देखकर सब एकदम पीछे हट गए।
” क्या हुआ? मुझे ही ढूँढ रहे थे तुम लोग! मैं ही हूँ तुम्‍हारा देश।”
” नहीं..नहीं तुम हमारे देश नहीं हो सकते! वो तो बहुत स्‍वस्‍थ और सुंदर है।” नेताजी के साथ खड़े सुरक्षाकर्मियों में से एक ने कहा।
अब तक वहाँ कई लोग इकट्ठे हो चुके थे।
” हाँ सही बात है, यह हमारा देश नहीं है।’’ भीड़ में से आवाजें आई।
” तुम सबने वही देखा जो तुम्हें दिखाया गया, मगर असली देश को किसी ने नही देखा।” उसने दर्द भरी आवाज में कहा। ” कभी मुझे भ्रष्टाचार के नाम पर नोंचा, तो कभी जातिवाद के नाम पर लहूलुहान कर दिया। सब अपने-अपने फायदे के लिए मुझे नोंच-खसोट रहे हो। अब मैं ये कोढ़ अपने शरीर पर फैलता नहीं देख सकता। मैं इच्छा मृत्यु की कामना करता हूँ।” देश लड़खड़ाते कदमों से वहाँ से जाने के लिए उद्धत हुआ।
तभी भीड़ को चीरते हुए किशोर-किशोरियाँ और युवा देश के सामने आकर खड़े हो गए। देश ने प्रश्नवाचक नजरों से उन्हें देखा। उनकी आँखों में शर्मिंदगी के साथ एक संकल्प की चमक देख, देश के होंठो पर हल्की सी मुस्कान फैल गयी।

लघुकथा-३
करेले
” मुझसे तो करेले ठीक बनते ही नहीं मम्मी, कड़वाहट रह जाती है। आप पता नहीं कैसे बनाती हो!”, सब्जी के थैले से करेले निकालकर टोकरी में रखकर धोते हुए अंकिता ने कहा।
अंकिता की शादी कुछ माह पूर्व ही हुई थी। तीन दिन पहले ही वह ससुराल से पहली बार मायके आई थी। इन तीन दिनों में उसकी ज्यादातर बातों का अर्थ यही था कि वह कितनी भी कोशिश कर ले लेकिन उसके ससुराल वाले हमेशा नाखुश ही रहते हैं।
उस दिन अंकिता जब अपनी सहेली से बात कर रही थी तब उसकी बातें मम्मी ने भी सुनी थीं। ” मुझे बिलकुल पसंद नहीं आता जब मेरी ननद कॉलेज जाने के पहले मेरे कमरे में तैयार होने आ जाती है। उसका भी अपना कमरा है पर यहां मेरे कॉस्मेटिक प्रयोग करने को जो मिल जाते हैं उसे…मैने तो एक दिन साफ कह दिया था कि कभी–कभी ठीक है ऐसे रोज–रोज सही नहीं लगता, तभी से मुंह फुलाए है।”
” तेरी सास ने कुछ नहीं कहा क्या? उनसे बात कर लेती।”, सहेली ने सुझाव दिया।
” उनको क्या कहती! उनको अपने आप ही सोचना चाहिए था पर उनकी लाडली को टोक दिया तो उनका मुंह भी सूज गया।.. मैं परवाह नहीं करती। मुझे तो जो कहना है साफ कहती हूं, पीठ पीछे कुढ़ने के जगह।”, अंकिता ने मुंह तो बना लिया था लेकिन उसके चेहरे पर एक दर्द भी घिर आया था ससुराल में अपनी जगह न बना पाने का जो उसकी मम्मी से छिपा नहीं रह सका था।
” शिखर को करेले बहुत पसंद हैं मम्मी लेकिन मुझसे तो …इसलिए मम्मी जी ही बनाती हैं।”, अंकिता करेले छीलकर प्लेट में रख रही थी। ” इनको आप ही बनाना मुझसे बिगड़ जाएंगे।”
” अंकिता , करेले फायदेमंद हैं और उनका कसैलापन आसानी से हटाया जा सकता है। आओ मैं बताती हूं कैसे…करेले साफ करने के बाद इनको नमक लगाकर कुछ देर के लिए छोड़ दो। नमक सारी कड़वाहट को पानी में बदल देगा फिर निचोड़ कर सारे मसाले भरकर सब्जी बना लो।”
अंकिता ने वैसा ही किया। रात में खाना खाते हुए सभी ने करेले की तारीफ़ की। अंकिता ने चखा, सचमुच…करेलों की कड़वाहट खत्म हो चुकी थी।
” अरे वाह मम्मी, यह तरीका तो बहुत अच्छा बताया आपने। अब मैं ऐसे ही बनाऊंगी पर… मेरी ससुराल में तो कोई तारीफ़ ही नही करता।”, अंकिता का मुंह लटक गया।
” अंकिता, रिश्ते भी करेले जैसे ही हैं , उन पर भी स्नेह का नमक लगाना जरूरी होता है। जब रिश्तों पर प्रेम की परत चढ़ा कर छोड़ दोगी तो कुछ समय में उनकी कड़वाहट भी खत्म हो जाएगी और जो बचेगा वह एक खूबसूरत रिश्ता होगा।” मम्मी की बात सुनकर अंकिता सोच में पड़ गई फिर उसके होंठों पर मुस्कुराहट आ गई।
” थैंक यू मम्मी, मैं भी अब करेले की तरह ही अपने रिश्तों को भी अच्छा बनाऊंगी।”, अंकिता की आंखों में चमक आ गई।
” तो इसी बात पर एक करेला हो जाय!”, कहते हुए मम्मी ने करेले का एक कौर अंकिता के मुंह में रख दिया।”

लघुकथा-४
उतरन
” दादी, आपने मेरे कपड़े कम्मो दीदी को क्यों दे दिए?” , पांच साल की मिन्नी ने दादी की गोद मे चढ़ते हुए पूछा।
” बेटा, ये कपड़े पुराने हो गए हैं, इसलिए।”, दादी ने मिन्नी को पुचकारते हुए समझाया।
” तो क्या कम्मो दीदी नए कपड़े नहीं पहनती?”, बातूनी मिन्नी ने आंखों में ढेर सारा आश्चर्य भर कर पूछा।
” पहनती हूँ न मिन्नी। दादीजी त्योहार के मौके पर नए कपड़े भी देती हैं लेकिन ये कपड़े दादी जी ने मेरी बेटी के लिए दिए हैं, जो आपके जितनी ही बड़ी है। हम इतने अच्छे कपड़े नही खरीद सकते इसलिए…. समझी! ” मुस्कुराती हुई कम्मो ने थैले में ही कपड़े उलट पुलट कर देखते हुए मिन्नी से कहा।
” ये भगवान के वस्त्र दादी जी?”, कम्मो थैले में भगवान के वस्त्र देखकर पूछ बैठी।
” तूने बताया था न कि पिछली जन्माष्टमी पर तूने लड्डू गोपाल लिए हैं। ये कपड़े अब हमारे ठाकुर जी के पुराने हो गए। तू अपने गोपाल जी को पहना लेना और हां, साथ मे एक छोटी थैली में ठाकुर जी के कुछ आभूषण भी हैं।”, दादी ने उदारता दिखाते हुए कहा।
” तो क्या कम्मो दीदी के गोपाल जी भी नए कपड़े नहीं खरीद पाते इसलिए आपने ठाकुर जी के पुराने कपड़े दिए हैं दादी? “, तभी मिन्नी ने कुछ याद करते हुए कहा, “मगर आप तो कहती थी कि भगवान के पास किसी चीज की कमी नहीं होती फिर !’
दादी और कम्मो की मुस्कुराहट सिमट कर फीकी हो गई थीं।

लघुकथा-५
तमाशा बन्द हो गया
” डुग -डुग – डुग, साहेबान अब ये बंदरिया, नहीं- नहीं बन्नो! सबको चाय बना कर पिलाएगी। “, डमरू बजाते मदारी के इतना कहते ही बन्नो ने फटाफट रसोई में जाकर गैस स्टोव जलाया और चाय बना कर सबको दी। सब खिलखिला रहे थे कि मदारी ने बंदरिया की रस्सी को पकड़कर हिलाया और कहा,” बन्नो फ़िल्म देखने जाएगी?”
बंदरिया ने गर्दन हिलाकर हामी भरी।
” किसके साथ? क्या कहा? पास आकर कह।”
बंदरिया ने मदारी के कान में कुछ कहा।
” बोलती है सहेली के साथ जाएगी। बन्ने को टाइम नहीं इसलिए। अकेले नहीं जाएगी, बन्ना कहेगा तभी जाएगी।”
बंदरिया ने न में सिर हिलाया।
” बन्ने देख, ये मना कर रही है!”, मदारी के पीछे से बंदर सामने आया और बंदरिया के एक डंडा मारकर दाँत दिखाकर गुस्सा करने लगा। भीड़ ताली बजाने लगी। बन्नो सहम कर एक कोने में खड़ी हो गई।
” बस- बस ये समझ गई है, अब नहीं करेगी। तू जा कर अपना काम कर बन्ने। बन्नो मेहमान आ रहे हैं शाम को, क्या-क्या बनाओगी?”, मदारी ने बंदरिया की रस्सी थोड़ी ढीली छोड़ते हुए पूछा।
जबाब में बंदरिया रसोई में जाकर कुछ बनाने लगी । थोड़ी देर में प्लेट सजाकर मदारी के पास लाई।
” क्या- क्या लाई हो बनाकर! बन्ने आ जा तू भी खा ले।”
बंदर मदारी के पास बैठ कर खाने लगा। मगर दो कौर खाते ही उसने खाना थूक दिया और डंडा उठाकर बंदरिया के पीछे भाग कर गुस्सा दिखाने लगा। बंदरिया मदारी के पीछे छिपने लगी मगर मदारी ने रस्सी कस कर उसे अपने सामने कर लिया।
” क्या हो गया बन्ने? इतना गुस्सा क्यों?”
बंदर ने कुछ चीखते हुए कहा।
” अच्छा-अच्छा, नमक तेज हो गया।”, बंदरिया को एक चपत लगाकर मदारी ने तेज आवाज में कहा “आगे से मत भूलना, नहीं तो बहुत पिटेगी। “,

बंदर ने गुस्से में आगे आकर फिर कुछ कहा।
” अरे, ये बन्ना क्या कहता है तू कपड़े सुखाने के बहाने छत पे किसी को देखती है। किसे देखती है?”, मदारी ने डंडा दिखाकर पूछा। डंडा देखकर बन्नो का स्वाभिमान जाग उठा और वह अपने असली रूप सरला के किरदार में आ गई।
” बस करो, मुझे नचाना। रोज पड़ोसियों के सामने मेरा तमाशा बनाते शर्म नहीं आती!”, सरला ने अचानक अपने गले मे बंधी रस्सी फेंकते हुए कहा,” रिश्ते निभाने के नाम पर अब बंदरिया बन कर नहीं नाचूंगी मैं।
माँ-बेटे सरला के इस रूप को देख कर चुपचाप सोफे में धंस गये । तमाशा देखने वाली भीड़ भी धीरे- धीरे गुम होती चली गई।

पाँच लघुकथा

विभा रश्मि.
लघुकथा-१
‘ब्रेकअप’
शाम को सब कबीर के रूम पर जा रहे थे ।
“क्यों जाना है उसके घर ?”
“माँ ज़रूरी है जाना । उसे अकेला नहीं छोड़ना है । ”
“क्यों बीमार है क्या ? ”
“नहीं माँ , उसकी दोस्त थी न आपको बतलाया था न …। ”
“हाँ ! वो तो उसकी चार साल से दोस्त थी , शायद फ़र्स्ट ईयर से । ”
” हाँ , आप जब पिछली बार आयीं थीं मैंने आपसे शेयर किया था । उस लड़की से भी मिलवाया था । ”
“हाँ माँ , आज उसने कबीर से ब्रेकअप कर लिया । ”
क्या ? ऐसे नहीं हो सकता… ग़लत बात की है ।
” माँ चार साल तक इस्तेमाल किया राजीव की इंटेलिजेंस का , उसके टेलेंट का । सारी पढ़ाई – लिखाई व प्रोजेक्ट उससे पूछ पूछकर बनाए । ”
” अब फ़ाइनल इयर के एज़ाम शेष होते ही उसे ज़ोरदार झटका दिया । ”
” उस बेचारे की तो दुनिया ही लुट गयी अम्मा । वो तो सीरियस था रिलेशनशिप में ।”
“वो कुछ कर तो नहीं बैठेगा बेटा ? “माँ का चिन्तित स्वर ।
“नहीं अम्मा, डरो मत हम सब जा रहे हैं न उसे सँभालने। अब सब छोटे थोड़ी हैं, मेच्योर्ड हैं। ”
बेटी और उसके सभी दोस्तों का दल खाने -पीने के पैकेटों के साथ अपने साथी के यहाँ उसका ग़म ग़लत करने चल पड़ा था।
माँ खिड़की के शीशे से उन्हें जाते हुए देखती रही। सुनकर मन उनका भी उदास हुआ था ।
फिर ये सब लड़के-लड़कियाँ कबीर के साथ चार साल से पढ़ रहे थे । दोस्त के दुख में शरीक होने जा रहे युवा, ” जश्न मना कर” उसका दुख भुलाने में मदद करेंगे।
मन कहीं संतुष्ट भी था, युवाओं के नये ज़माने के इस फ़ैशनेबल “ब्रेकअप” से ।
ऐसे “ब्रेकअप” का “जश्न “अगर हमारे ज़माने में होता ,तो विरह के दर्द भरे हजारों गाने न तो लिखे जाते और न ही गाये ही जाते ।

लघुकथा-२
वारिस
मुहल्लों की छतों , गलियों और नुक्कड़ों पर खड़े ठाले युवाओं का दिल मुँह को आ गया ।
“वो काटा – वो काटा ” के शोर के साथ निगाहें भागती – कूदती और अति ऊर्जावान हो छतें गलियाँ टापती रहीं । अंत तक भागते – दौड़ते साँस फूल गयी थी, उस बेचारी पतंग की , और उसे लूटने वालों की भी । अंत में कटी पतंग लूट ही ली गयी । पर कई कोशिश करने वाले झुण्डों की हार भी हुई । उस किशोर मन के , एक बुढ़ऊ द्वारा पतंग की डोर थाम ली गयी । पतंग ने चैन की साँस ली और विजयी बूढ़े के साथ वो भी मुस्कुरा दी ।
बूढ़े के हाथों में पतंग थी । उन उन्मादी जनसमूहों के हाथों फटने – मिटने लुटने से पतंग बच गयी थी।
तभी बूढ़े के पोते ने उसे देख लिया और अपनी छोटी – छोटी दोनों हाथों की हथेलियाँ बूढ़े के सामने पसारे दीं ।
” दादू ! दादू! मेली लाल पतंग मुझे दे दो ना!”

लघुकथा-३
“बोझ”
अपने “रिटायर्मेंट” के दिन विदाई कार्यक्रम के बीच में बॉस अचानक फूट-फूट कर रो पड़े।
” देख रहे हो न संस्थान छोड़कर जाते समय बॉस के दिल में न जाने कितनी पीड़ा भरी होगी, जो अपने आवेग पर काबू नहीं पा सके और सबके सामने फफक कर रो दिये अपने स्वभाव के विपरीत।“
हर तरफ़ उनकी और उनके हिटलरी मिजाज़ की ही चर्चा हो रही थी। जिस को जैसा अनुभव प्राप्त हुआ था ,वो वैसी ही उनके स्वभाव की विवेचना कर रहा था।
ऑफ़िस के पके बालों वाले “बड़े बाबू” से रहा नहीं गया। वे पहली बार सभी कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। आखिर में वे “बम” से फट पड़े।
“नहीं जी, अपने सताए कर्मचारियों की साल दर साल बटोरी गई “हाय” का बोझा लेकर बॉस अपने घर कैसे जाते , बोलिए ? साब तो न जाने कब से अपने कर्मो के “अपराधी-भाव” के बोझ तले दबे जा रहे होंगे। इसलिए… आज ” सेंड ऑफ़ ” फ़ेयरवैल की बेला में “मौका था और ‘दस्तूर भी। सो वो रूमाल लगाकर रो दिए।”
उनकी बात सुनकर ऑफ़िस के कर्मचारियों की दबी-दबी सी मुस्कानें बिखर कर सिमट गईं।…
विभा रश्मि

लघुकथा-४
‘ मौन शब्द ‘
” सुनो! वे दोंनो सुबह से ही झगड़ रहे हैं आज ।”
बहू-बेटे की खूब नोक – झोंक, रूठना-मनाना जारी है ।”
घबरा कर अधेड़ पत्नी अपने पति से बोली ।
जब उसकी घबराहट कम न हुई तो फिक्रमंद हो वो पुनः बोल पड़ी –
” सुनो न! उनके बेड रूम से तेज़ स्वर में बहस सुनाई पड़ रही है। खूब झगड़ रहे है दोनों।”
“क्यों, क्या हुआ? ” पति का स्वर ।
“शिकायत चल रही है, दो साल हो गये शादी को, बहू ने न जाने कितनी बार हमारे बेटे से प्यार का इज़हार किया। पर हमारे बेटे ने, ” वो खास शब्द” नहीं बोले पलट के जो आजकल बोलने का बहुत फ़ैशन हो गया है। ”
“क्याss नहीं बोले? कौss न से शब्द ?” पति का अनाड़ी सा सवाल ।
“वो ss ही ss …।”
पत्नी के नेत्रों में इस उम्र में भी रंगीन बल्बों की लड़ियाँ जल उठी थीं ।
“अच्छा ss ..अच्छाss।”
पति समझ गये। उन्हें लगा पत्नी कहीं वो ” ख़ास शब्द ” बोल न पड़े।
आगे बढ़ कर उन्होंने अधेड़ पत्नी की मुलायम हथेली अपनी दोनों हथेलियों में कैद कर उसे चुप करा दिया और उसे असीम प्यार से तकने लगे।
विभा रश्मि

लघुकथा-५
बंधुआ
” मिट्टी ढुलाई के लिये चार गदहे मिल गए । आधा किराया पेशगी दे आया ।”
घनश्याम मिस्त्री निश्चिंत था ।
गधों का मालिक पेशगी टेंट में खोसता हुआ बोला –
” अपनी मर्ज़ी से बोझा लाद लेना । तीस – चालीस किलो बोझ ढो लेते हैं। बहुत मज़बूत पट्ठे हैं मेरे। पर इनके आराम का ध्यान रहे। हरी घास के आस-पास ही बाँधना।”
भाड़ा पेशगी देते हीं गधे घनश्याम के हुए।
दोनों गधों को तुरंत काम पर पेल दिया गया।
जानवर का हौसलापस्त न हो जाए इसलिए दोपहर बाद ढुलाई का काम रोककर, घनश्याम भी कुछ देर सुस्ताने बैठ गया। गधों को भी पेट भरने के लिये उसने आज़ाद छोड़ दिया।
बरसात का मौसम, हर तरफ़ हरियाली का साम्राज्य। हवा में लहलहाती हरी-हरी नरम घास का स्वाद गधों के मुँह में घुल-घुल गया था।
ढुलाई का काम लेकर घनश्याम ने लद्दू गधों के एक आगे और एक पीछे के पैरों में रस्सी बाँधकर छोड़ दिया, जिससे वे निकट की चर लें।
किश्तों में घास चरने से पेट कहाँ भरा था उनका? तिस पर सारा दिन घनश्याम के बदतमीज़ लड़के की संटी पे संटी , सटाक ….सटाक ।
आखिर दर्द से वे दोनों टूटकर कर्राहाने लगे , “ढेंचू …ढेंचू …ढेंचू-ढेंचू ।’
अधबने मकान में रेत-ईंटों के ढेर के सामने अपनी माई को हाड़ पेलता देख मजदूरन का बेटा दुखी होकर बोल उठा –
” माई! गदहा को ऊ लइका रुला दिया न।”
“कहाँ रो रहा है? उ तो अइसे ही बोलता है, ढेंचू ढेंचू.।” माई ने नादान बेटे को समझाया ।
“नाहीं अम्मा उ रोता है। देख रोना पहचानती नहीं तू ? अपने गाँव में भी गदहा अइसा हीं रोता था न ।”
लड़का तुरंत उठ खड़ा हुआ । किसी से पूछना नहीं था उसे कुछ । दुखी गधों के पैरों की रस्सी खोलकर उसने दोनों गधों को आज़ाद कर दिया ।
“अब गदहा नहीं रोएगा माई ।” लड़के ने मानो किला फ़तह कर लिया था ।

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