राजशेखर चौबे, सुरेश वाहने, मृनाल आशुतोष

पाँच लघुकथा

राजशेखर चौबे
रायपुर, छत्तीसगढ़

लघुकथा-१
रांग नंबर
मैंने अपने बचपन के मित्र अजीत को फोन लगाया और कहा – हलो । उधर से आवाज आई – हलो । मैंने अजीत की आवाज़ पहचान ली थी । अचानक फोन कट गया। दरअसल कल ही मैंने अपने बचपन के दोस्त अजीत से फोन कर उसके पास घूमने के लिए आने की इच्छा व्यक्त की थी । अजीत सरकारी विभाग में क्लास वन अफसर है और इन दिनों श्रीनगर में पदस्थ है। मैंने अजीत को फिर से फोन लगाया , उधर से अजीत की आवाज आई – हलो । मैंने भी कहा – हलो अजीत ।
हम दोनों एक दूसरे की आवाज पहचान गए थे ।तुरन्त ही उधर से आवाज आई – रांग नंबर !

लघुकथा-२
चैंपियन की हार
वह फ्रीस्टाइल कुश्ती का विश्व चैंपियन है और अभी तक हारा नहीं है । उसे एक गुमनाम मरियल पहलवान ने चैलेंज कर दिया और उसने दो शर्तें रखीं ।
पहला – कुश्ती उसके बताए ग्राउंड में ही होगी , दूसरा कुश्ती किसी एक के हार मानने तक चलती रहेगी । चैंपियन द्वारा चैलेंज स्वीकार कर लिया गया । चैंपियन व दर्शक गण बताए गए ग्राउंड में पहुंचे लेकिन उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि दंगल कीचड़ में होना था। विश्व चैंपियन व मरियल पहलवान दोनों ही निश्चिन्त दिखाई दे रहे थे । कुश्ती प्रारंभ हुई । मरियल तुरंत चित्त हो गया। चैंपियन मरियल को लगातार उठाकर उठाकर पटक रहा था परंतु उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी । उसे जितनी जोर से पटका जाता वह उतना ही अधिक आनंदित होता । सभी इस अभिनव कुश्ती का मजा ले रहे थे । दोनों ही पहलवान मुस्तैदी से डटे हुए थे । विश्व चैंपियन थकने लगा अंततः उसने अपनी हार स्वीकार कर ली । मरियल पहलवान विजयी घोषित किया गया । बाद में उसकी जीत का रहस्य खुला ।बताया गया कि मरियल पहलवान सूअर प्रजाति का है और कीचड़ में पटका जाना उसका प्रिय शग़ल है ।

लघुकथा-३
दो लड़कियों की बातचीत हादसे के बाद
पहली- ओह गॉड ! हमारे साथ ही ऐसा क्यों हुआ !
दूसरी- मुझे आदमखोर मर्दों की भीड़ ने नंगा कर मेरे शरीर के साथ खिलवाड़ किया । मेरे साथ तो…
पहली- क्या तो!
दूसरी- सामूहिक बलात्कार भी हुआ ।
पहली- ओ गॉड!!!! वैसे कौन छूटा है यहां!
दूसरी- क्या कह रही है!!!
पहली- मुझे तो लगता है गॉड है ही नहीं । सॉरी गॉड ! होते तो हमें सेफ करते जैसे भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को किया था!
पहली- आज किसी भी द्रोपदी की रक्षा के लिए कोई भी भगवान कृष्ण बनकर आने वाले नहीं है, क्योंकि यह कलयुग है ।
दूसरी- क्या हमारा कसूर यह है कि हम दूसरे रिलीजन के हैं ?
पहली- नहीं हमारा कसूर यही है कि हम लड़कियां हैं , हम औरतें हैं । हरेक धर्म की महिलाओं के साथ रेप होता है,यहां कोई सुरक्षित नहीं है
दूसरी- जिस शरीर से हमें प्यार था और जिस पर हम नाज करते थे, आज उसी शरीर से घृणा हो रही है ।
पहली- काश हमारा शरीर इतना सुंदर न होता ।
दूसरी-जब तुम गॉड के पास जाओगी तो उनसे क्या कहोगी!
पहली – मैं गॉड से कहूंगी कि मुझे अगला जनम किसी भी हालत में नहीं चाहिए। और तुम… तुम गॉड से क्या कहोगी ?
दूसरी – मैं गॉड से केवल एक ही बात कहूंगी कि वे भविष्य में लड़कियों का उत्पादन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से करें,जिनके भीतर सब कुछ हो, सिवाय भावनाओं के, ताकि वे इस दर्द को झेल सकें !

लघुकथा-४
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस
विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर मैंने अपने पत्रकार मित्र को बधाई दी और पूछा – क्या आप स्वतंत्र हैं ? उसने कहा पूछकर बताता हूं । उसने अपने संपादक को फोन लगाया और पूछा – क्या हम स्वतंत्र हैं ? संपादक ने कहा पूछकर बताता हूं ।उसने मालिक को फोन लगाया और पूछा – क्या हम स्वतंत्र हैं ?
मालिक ने कहा
पूछकर बताता हूं। उसने ऊपर फोन लगाया और पूछा- क्या हम स्वतंत्र हैं ? ऊपर से बताया गया जी हां आप स्वतंत्र हैं । पत्रकार मित्र ने मुझे बताया कि वह स्वतंत्र है ।

लघुकथा-५
उपहार
हम दोनों गृह प्रवेश में मिले उपहारों की सूची बनाने लगे । एक-एक उपहार को खोल-खोलकर एक कॉपी में नोट करने लगे । एक बड़े से उपहार पर मेरी नजर पड़ी । मैंने देखा उस पर मेरे विभागीय साथी शर्मा जी का नाम था ।
उपहार खोलने पर उसके भीतर एक “सीनरी ” निकली । उसे देखकर मेरा बिदकना स्वाभाविक था ।
मैं – इतना छिछोरा गिफ़्ट !
यह गिफ़्ट डेढ़ सौ रुपए से अधिक का नहीं है।
पत्नी – हाँ हाँ , यह गिफ़्ट डेढ़ सौ रुपए का ही है ।
मैं – (आश्चर्य से) – तुम्हें कैसे मालूम ? पत्नी – क्योंकि उन्हें उनके गृह प्रवेश में इस गिफ्ट को हम लोगों ने ही दिया था ।

पाँच लघुकथा

सुरेश वाहने

लघुकथा-१
दोपाया कुत्ता

दो लंगोटिया यार सोनू और मोनू बीस साल बाद मिले। रात थी, तो तुरंत हाथ धोकर खाने के लिए बैठ गए। खाते हुए उनके बीच बातें हो रही थी।

सोनू ने कहा -“आज दोपहर दफ्तर से मैं लौट रहा था। शहर के पास सड़क किनारे एक बकरे को दो खूंखार कुत्ते घेरकर हमला करते दिखे। पास के पेड़ के नीचे कुछ युवक मोबाइल चला रहे थे‌। बचने के लिए बेबस बकरे की मर्मांतक आवाज परिवेश में गूंज रही थी। पर उसे बचाने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था। मुझसे रहा नहीं गया। किसी तरह पत्थर मारकर कुत्तों को भगाया। फिर युवकों के असंवेदनशीलता पर उन्हें खूब लताड़ा। इस पर एक ढीठ युवक झल्लाकर मुझे ही खरी-खोटी सुनाने लगा।”

मोनू ने पूछा -“क्या कह रहा था वो नालायक?”
सोनू ने कहा -“वह कह रहा था कि हम इस लोमहर्षक दृश्य का वीडियो बना रहे थे। आप बीच में आकर हमारी मेहनत पर पानी फेर दिया।”

मोनू ने कहा -“इन गधों को धिक्कार है! यही काम बचा है इनके पास। किसी की जान जा रही है और ये मूर्ख उसे बचाना तो दूर, उल्टा उसी का वीडियो बना रहे। व्यू और लाइक के पीछे ये दीवाने देश के माथे पर कलंक हैं। मैं तो कहता हूँ कि आप जैसे दयालु लोग न होते, तो धरती कब का फट जाती और दुनिया उसमें समाकर समाप्त हो जाती। खैर बकरे को अस्पताल पहुँचाकर उसका इलाज तो करवाया न आपने मित्र?”

सोनू ने उत्तर दिया -“अब पशु चिकित्सक कहाँ ढूंढता मित्र? उसे उठाकर घर ही ले आया कार से।”

मोनू -“ये अच्छा किया आपने। पर बकरे की कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही मित्र!”

सोनू ने हॅंसते हुए कहा-“पर दिखाई तो दे रही है न मित्र, थाली में?”

हैरान मोनू ने कहा -“ओह! एक बात बोलूँ मित्र?”

सोनू ने कहा -“हाँ मित्र।”

व्यंग्य कसते हुए मोनू ने कहा -“तुमने वहाँ चौपाया कुत्ता देखा था मित्र। मैंने आज दोपाया कुत्ता देख लिया।”

लघुकथा-२
मुर्गा

कसाई संकेत करता और मुर्गें दौड़े चले आते। कसाई चुनकर मुर्गा उठा लेता। देखते ही देखते मुर्गा मांस में बदल जाता। पत्रकार अचंभित होकर यह सब देख रहा था।

पत्रकार ने एक हट्टे-कट्टे मुर्गे से पूछा -“भाई! आप लोग स्वयं कटने के लिए इतने उतावले क्यों हुए जा रहे हो?”

मुर्गे ने सीना फुलाते हुए कहा -“मालिक के लिए जान देना तो गौरव की बात है, सौभाग्य की बात है।”

पत्रकार ने कहा -“पेट भर खाना, घूमना-फिरना, सोना और उमर भर जीना; ये तुम्हारा मौलिक अधिकार है। देखो इन स्वतंत्र उड़ती-चहकती चिड़ियों को और उनसे तो प्रेरणा लो।”

मुर्गे ने समझाते हुए कहा -“भाई मेरे सुनो।मालिक हमको दाना-पानी देता है। कमरे में जाली लगाकर सुरक्षा देता है। टीके और दवा का भी प्रबंध करता है। हम स्वामीभक्त हैं, इसलिए उनके एक आवाज पर मर-मिटने के लिए हम तैयार रहते हैं।”

पत्रकार ने वास्तविक षड़यंत्र का खुलासा करते हुए कहा- “कसाई तो इसलिए ये सब करता है कि तुम वजनदार हो जाओ। उसका ध्येय तुम्हें काटकर, मांस बेचकर अधिक से अधिक धन कमाना ही है।”

मालिक के खिलाफ बातें सुनकर मुर्गा आगबबूला हो गया- “तुम गद्दार लोग क्या जानो कि आस्था क्या होती है? परंपरा क्या होती है? संस्कृति क्या होती है? हमें बरगलाने का प्रयास मत करो। हम वफादार लोग हैं। मालिक के लिए बलिदान होने से रोकने वाले तुम होते कौन हो?” कहते हुए मुर्गे ने पत्रकार पर हमला कर दिया।

पत्रकार बचाव में पीछे हटा। कसाई सब देख-सुन रहा था। उसने मुर्गे से ओजस्वी स्वर में कहा- “शाबाश मेरे शेर। मुझे तुम्हारी भक्ति पर गर्व है।”

मुर्गा फूला न समाया और जाकर कसाई की गोद में बैठ गया। कसाई ने उसे चूमा, सहलाया और फिर गर्दन पर छुरा फेर दिया।

लघुकथा-३
श्रमिक

एक पत्रकार संध्या 7 बजे श्रमिक बस्ती पहुँचा। वह श्रमिकों से अपने चैनल के लिए संवाद करना चाहता था।
उसने एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति से पूछा -“आप क्या काम करते हैं?”
व्यक्ति ने सहजता से उत्तर दिया -“साहब! मैं श्रमिक हूँ।”

पत्रकार ने दूसरा प्रश्न दागा -“श्रमिक की परिभाषा क्या है?”

श्रमिक ने सकुचाते हुए बताया -“जो चड्डी-बनियान फटने के बाद भी उसे पहनने को मजबूर हो, वही श्रमिक है।”

पत्रकार उत्तर सुनकर सकते में आ गया। उसके मुँह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे। उसे आज अपने श्रमिक होने का पहली बार अहसास हुआ।

लघुकथा-४
भरोसा

ग्राहक ने उलाहना देते हुए पूछा -“कहाँ चल दिए थे भाई दुकानदारी छोड़कर? ये सुराही कितने की है?”

सड़क किनारे मिट्टी के पके बर्तन और मूर्तियां बेचने वाले कुंभकार ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया -” उद्वेग को रोका नहीं जा सकता साहब! शौचालय गया था हल्का होने। सुराही मात्र डेढ़ सौ रूपये की है!”

मूल्य चुकाकर ग्राहक ने फिर टोका -“मगर दुकान भगवान भरोसे छोड़कर मत जाया करो यार! कोई चोर-उचक्का सामान उठाकर ले गया तो?”

ठठाकर हॅंसते हुए कुंभकार ने कहा -“चिन्ता न करें साहब! ये फुटपाथिया दुकान भगवान भरोसे बिलकुल नहीं है।”

ग्राहक ने आश्चर्य से पूछा -“तब किसके भरोसे है? यहाँ कोई कैमरा-सैमरा भी तो नहीं लगा है।”

निश्चिन्त कुंभकार ने उत्तर दिया -“ग्राहक भरोसे।”

लघुकथा-५
प्रार्थना

वह अत्यंत चतुर व्यक्ति था। वह बिना चूके प्रतिदिन प्रार्थना करता था।

मेरे अड़ोस में गांधी जैसा अहिंसा का पुजारी पैदा हो, जो अन्यायी सत्ता के खिलाफ लंगोट धारण कर शांतिपूर्ण आंदोलन कर सके।

मेरे पड़ोस में लालबहादुर जैसा देशभक्त नेता पैदा हो, जो अभावों में रहते हुए देश का नेतृत्व कर प्राण न्यौछावर कर सके।

मेरे घर के सामने भगतसिंह जैसा क्रांतिकारी पैदा हो, जो लोकतंत्र के लिए लड़ते हुए फांसी पर हँसते-हँसते झूल सके।

मेरे घर के पीछे अम्बेडकर जैसा महापुरुष पैदा हो, जो अपने परिवार की चिन्ता न कर अपने दलित, शोषित, पीड़ित समाज के स्वाभिमान के लिए जिन्दगी भर संघर्ष कर सके।

मेरे घर के ऊपर रहने वाले परिवार में बुद्ध पैदा हो, जो सारी सुख-सुविधाओं का त्याग कर भारत को विश्वगुरु बनाने में योगदान दे सके।

मेरे घर के नीचे रहने वाले परिवार में नरेन्द्र दाभोलकर जैसा सामाजिक कार्यकर्ता पैदा हो, जो समाज से अंधविश्वास मिटाते हुए गोलियाँ खा सकें।

देश में आईएएस, आईपीएस अधिकारी बनकर देश की सेवा करने वाला भी तो जरूरी है। ऐसा महत्वपूर्ण संतान मेरे घर में ही पैदा हो।

पाँच लघुकथा

मृणाल आशुतोष, समस्तिपुर

लघुकथा-१
बैसाखी

शाम में थोड़ा देर से पहुँचते ही पाठक जी ने धीरे से आवाज़ लगायी,”अरी दीक्षा की माँ, कहाँ हो?”
“अरे, कपड़े प्रेस कर रही थी।”
“छोड़ो वह सब!ये, लो मिठाई।”
“क्या हुआ जी!”
“आज फाइनल हो गया। मिश्रा जी, आज तैयार हो गए।”
“वाह। पी डब्ल्यू डी से रिटायर ऑफिसर का इकलौता बेटा, मार्केट में दो मंजिला मकान,
गाँव में दस बीघा जमीन। लगता है, भगवान की हम पर बहुत कृपा है।”
“सच कहती हो। भाग्यवान!”
“बहु, ओ बहु! कहाँ सो रही हो? तुम भी मिठाई लो। दीक्षा बेटा, लो तुम भी मुँह मीठा करो।”
“माँ, सब तो ठीक है पर लड़का क्या करता है?”
“तू लड़के को छोड़। वहाँ रानी की तरह राज करेगी, राज!”
“हाँ, जैसे भाभी यहाँ राज कर रही है!”
“क्या?क्या कहा तुमने?”
“माँ, माँ मैं किसी बैसाखी वाले से शादी नहीं करूँगी।”

लघुकथा-२
बथुआ

स्कूल से आते ही मुनियाँ ने बस्ता पटका और दौरी लेकर खेत की ओर निकल पड़ी। अपनी सहेलियों को आवाज़ देकर बुलाया। फिर दो मिनट रुकने को कह वापस घर की ओर भागी।
“माय, हम जा रहे हैं बथुआ तोड़ने।”
माँ का जबाब तो नहीं आया पर फुफेरी बहन पारूल पूछ बैठी,”मैं भी चलूँ तुम्हारे साथ?”
“हा हा हा!तुम चलोगी बथुआ तोड़ने!दिल्ली से आयी हो दो चार दिन के लिये। आराम करो घर में।”
“मुझे भी साथ ले चलो न! प्लीज।”
“चलो जब एतना ज़िद कर रही हो तो।”
घर से मुश्किल से पचास लग्गा दूर केदार मिसिर का दस कट्ठा का प्लाट था। उसमें मकई के छोटे छोटे पौधे से ज्यादा बथुआ के पौधे ही थे। सब सहेली बथुआ तोड़ने में भिड़ गयीं। दस मिनट भी नहीं बीता होगा कि गन्दी-गन्दी गालियाँ कानों को चुभने लगीं।
“अरे सब कोय भागो!सनकहबा आ रहा है। भागो जल्दी।”
“पारूल भाग! पकड़ लिया तो मारेगा भी और घर पर आकर बेज्जत भी करेगा।” मुनियाँ भागते हुये चीखी।
जिस बात का डर था वही हुआ। मिसिर जी ने पारूल को पकड़ लिया, “रे, केकर बेटी है? तुम को पहले कभी हम देखे नहीं!”
“मेरे पापा का नाम मिस्टर विनोद सिन्हा है।”
” अच्छा!हमरा गाँव में तो कोई मिस्टर हय्ये नहीं है। किसके यहाँ आयी है?”
“रामचन्दर महतो नाम है मेरे मामाजी का।”
“अच्छा तो रमचंदरा के यहाँ आयी है। अब ई बताओ। बथुआ तोड़ने में मकई का जो नुकसान हुआ, ऊ कौन भरेगा।”
“कितने का नुकसान हो गया आपका?”
” तीन-चार सौ रुपिया का।”
“मैं भर दूंगी। पर, आपने जो हमारा नुकसान किया, वह कौन भरेगा?”
“हम क्या नुकसान कर दिये तुम्हरा?”
“गन्दी-गन्दी गालियाँ जो दिये आप! उसका क्या?”
…….
“क्या हुआ? मुँह में ताला लग गया। मेरे नाना की उम्र के हैं आप। आपकी पोती-नतनी के बराबर हैं हम सब!”
“हाथ जोड़ते हैं,अब इससे आगे कुच्छो मत कहो। भयंकर गलती हो गिया हमसे। दक्खिन मुँह घुर के कहते हैं कि हम जीवन में कभियो किसी को गाली नहीं देंगे।”

लघुकथा-३
अनवरत…

‘ये आकाशवाणी का दिल्ली केंद्र है। समाचार मिला है कि कल रात चलती बस में एक लड़की के साथ चार युवकों ने सामूहिक बलात्कार किया। इतनी वीभत्सता दिखाई कि उसके……’ पड़ोस में बजते रेडियो की आवाज़ से सरिता की नींद टूट गयी।
मुँह से ‘ओह’ की आवाज़ निकली। उसने अपनी आँखें भींच ली। क़ई पुरानी घटनाएं मस्तिष्क पटल पर विचरण करने लगीं। एक स्वर उभरा…
‘ये वॉइस ऑफ अमेरिका है। कार्यालयीय महिला कर्मचारी द्वारा लगाए गए यौन शोषण के आरोप की पुर्व राष्ट्रपति द्वारा आत्मस्वीकृति से पूरी दुनिया में हलचल मच गयी है।’
एक और स्वर उभरा…
‘ये बी बी सी लंदन है। समाचार है कि राजपरिवार के एक सदस्य ने अपनी नौकरानी के साथ महीनों जबरन यौन संबंध बनाया।’
एक स्वर और…
‘ये डॉयचे वेले(जर्मन रेडियो) है। समाचार मिला है कि कुछ दिन पहले एक महिला सांसद के आत्महत्या का कारण एक मंत्री द्वारा लगातार यौन शोषण था।’
एक और स्वर…
‘ये देववाणी है। मैं स्वर्ग से नारद बोल रहा हूँ। समाचार है कि देवराज इंद्र ने वेश बदलकर एक ऋषिपत्नी के साथ…’
‘देश और काल कोई भी हो, स्त्री का हमेशा शोषण ही…..।’
एक और आवाज़ तेजी से उसके कानों में आई …अब बहुत सारी आवाजें सिसकने लगीं।

लघुकथा-४
आवाज़

रेड लाइट के पास आठ-दस साल का लड़का आवाज़ लगा रहा था।
“ग़ुब्बारे ले लो। ग़ुब्बारे ले लो। रंग-बिरंगे ग़ुब्बारे ले लो।”
ग़ुब्बारे आपस में बात कर रहे थे।
हरे रंग के ग़ुब्बारे ने लाल के ग़ुब्बारे से पूछा, “अच्छा बताओ। तुम्हारी अंतिम इच्छा क्या है?”
लाल रंग का ग़ुब्बारा थोड़ा सकुचाया। फिर बोला,
“मैं चाहता हूँ कि किसी बच्चे के जन्मदिन में सजाया जाऊँ।”
“और नीले ग़ुब्बारे! तुम्हारी इच्छा?
“मैं चाहता हूँ कि किसी भव्य आयोजन का हिस्सा बनूँ।”
“और सफ़ेद ग़ुब्बारे! तुम्हारी अंतिम इच्छा क्या है?
“मेरी चाहत है कि स्वतंत्रता दिवस पर मुझे खुले आसमान में छोड़ दिया जाए।”
“और तुम्हारी क्या इच्छा है?” लाल, नीले और सफ़ेद ग़ुब्बारों ने एक साथ हरे ग़ुब्बारे से पूछा।
“मेरी इच्छा है कि यह लड़का मुझे बेचने के बजाय मेरे साथ खेले।”
हरे रंग वाले ग़ुब्बारे ने जवाब दिया। लेकिन उसकी आवाज़ काफ़ी कमज़ोर लग रही थी।

लघुकथा-५
पुरस्कार

शहर की प्रतिष्ठित सांस्कृतिक-साहित्यिक संस्था द्वारा आज मेरा अभिनंदन किया जा रहा है। पत्नी गंभीर रूप से बीमार हैं। बच्चे महानगर में रोज़ी-रोटी की तलाश में संघर्ष कर रहे हैं। घर में कोई और नहीं है, इसलिए समारोह में शामिल होना मेरे लिए संभव नहीं। लेकिन आयोजक मानने को तैयार नहीं।
बचपन में मुझसे ट्यूशन पढ़ चुका है। आज भी वही सम्मान देता है। अधिकारपूर्वक बोला, “सर, मैं गाड़ी के साथ एक नर्स को भी भेज रहा हूँ। जब तक आप लौट नहीं आते, वह माताजी की देखभाल करेगी। बस दो घंटे के लिए आ जाइए।”
उसने मनाही के सारे द्वार बंद कर दिए थे।
न चाहते हुए भी मैं गाड़ी की प्रतीक्षा करने लगा। जैसे ही गाड़ी की आवाज़ सुनी, फटाफट कपड़े बदलकर बाहर निकला। नर्स घर के अंदर गई, और मैं गाड़ी में बैठ गया।
आयोजन की भव्यता देख मैं चकित रह गया। जब शहर के गणमान्य व्यक्तियों द्वारा मेरा सम्मान किया जा रहा था, तो सभागार में तिल रखने की भी जगह नहीं थी। तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा हॉल गूँज उठा। आँखों से छलकते आँसुओं को रोक पाना मुश्किल था।
पुरस्कारस्वरूप ग्यारह हज़ार नक़द, अंग-वस्त्र, शॉल, स्मृति-चिह्न आदि प्राप्त करते समय मेरे हाथ थरथरा रहे थे। मैं अधिक देर तक रुकने की स्थिति में नहीं था। आयोजक की ओर देखा, वह तुरंत मेरे पास आया और मैं उसके साथ बाहर निकल पड़ा।
“सर, कैसा लगा आयोजन? यह सब आपके लिए ही किया गया है!” उसका चेहरा गर्व से दमक रहा था।
“बहुत भव्य आयोजन था… बहुत ख़र्च हुआ होगा न?”
“हाँ सर, पाँच लाख से भी अधिक। लेकिन आपके सम्मान के लिए यह कुछ भी नहीं है!”
“अगर इसका आधा भी मिल जाता, तो पत्नी का इलाज हो जाता…!” गला रुँध गया। शब्द काँप गए। आत्मसम्मान ने ग़रीबी के आगे आत्मसमर्पण कर दिया था।
“आपके सम्मान के लिए पाँच लाख आसानी से इकट्ठा हो गए। लेकिन माताजी के इलाज के लिए पचास हज़ार भी जुटाना मुश्किल था!”
उसके रूखे स्वर सुनकर कलेजा फट गया। ऐसा लगा मानो किसी ने सीने में ख़ंजर उतार दिया हो।

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