
साल बीसवाँ है लगा, बनी लेखनी शान।
दुआ बधाई दे रही , मिले कीर्ति सम्मान।।
वर्षगाँठ शुभकामना , शैल करो स्वीकार ।
भरे ‘लेखनी’ शक्ति सुख , यश की खिले बहार।।
डॉ मंजु गुप्ता

लेखनी के विगत उन्नीस वर्ष और वहाँ का लेखा जोखा
सुश्री शैल अग्रवालजी के कुशल संपादन में विगत उन्नीस वर्षों से द्विमासिक इंद्रजाल पत्रिका * लेखनी/Lekhni* का प्रकाशन हो रहा है. लेखनी द्विभाषीक और द्विमासिक पत्रिका है, जो ब्रिटेन से प्रकाशित होती है. इसमें साहित्य, संस्कार और सोच से संबंधित विषयों पर लेख-आलेख-कविताएँ,लघुकथाएँ, संस्मरण आदि प्रकाशित होती हैं. इस द्विमासिक पत्रिका में देश-विदेश के लगभग एक सौ से अधिक लेखकों की रचनाएँ प्रकाशित होती है. यदि पिछले उन्नीस बर्षों का लेखा-जोखा किया जाए तो विगत वर्षों से २००० से अधिक संख्या में नामी-गिरामी लेखक स्थान पा चुके हैं..पाठकों के पास उनका अपना ओपशन होता है कि वह अपने पसंदीदा लेखक/-कवि-/लघुकथाकार की रचनाओं का पाठ करना चाहता है, उसके नाम पर क्लिक करने ही एक अगला पृष्ठ खुलता है, जिसमें वह अपने प्रिय लेखक की रचना को आराम से पढ़ सकता है और यदि वह उसे संकलित करना भी चाहता हो, तो बड़े आराम से ऐसा कर सकता है।
पत्रिका के प्रकाशन को लेकर संपादिका सुश्री शैलजी काफ़ी सजग रहती हैं, उसकी गुणवत्ता का आकलन करती हैं, तब जाकर उसे अपनी पत्रिका में स्थान देती है. उनकी इस लगनशीलता का ही सुखद परिणाम है कि पत्रिका विगत उन्नीस वर्षों से अनवरत प्रकाशित हो रही है.
संपादिका स्वयं लेखनी की सशक्त हस्ताक्षर है. एक कहानीकार-, एक कवि होने के नाते उनका अपना सृजन अनवरत जारी रहता है. वे चाहें तो अपनी रचनाएं अन्य पत्र-पत्रिका में प्रकाशनार्थ प्रेषित कर सकती है लेकिन वे एक बड़े कैनवास को लेकर चलती है कि क्यों न एक स्वतंत्र पत्रिका का प्रकाशन किया जाए, जिसमें देश-विदेश के लेखक भी इसमें स्थान पा सकें. मुझे लगता है कि इसी व्यापक सोच के चलते आपके मन में पत्रिका के प्रकाशन का विचार कौंधा होगा. सिर्फ़ विचार ही नहीं कौंधा बल्कि आपने “लेखनी” नाम की पत्रिका का श्रीगणेश करते हुए अनयान्य लेखकों के लिए एक बड़ा स्पेस खोल दिया है. आपको इस कृत्य के लिए आत्मीय बधाइयां/शुभकामनाएं.
मुझे याद नहीं पड़ता कि मैं कब से इस पत्रिका से जुड़ पाया था, लेकिन इतना तो कह ही सकता हूँ कि विगत कई वर्षों से मैं इस पत्रिका में स्थान पाता रहा हूँ.
भगवत गीता में “अक्षर” को परम ब्रह्म कहा गया है- अक्षरं ब्रह्म परंमम्. अक्षर माने जिसका क्षरण न होता हो-उसे अक्षर कहते हैं .इन्ही अक्षरों के संयोजन से ही शब्द बनते है और इन्हीं शब्दों को संग्रहित करने की परम लालसा से ओतप्रोत सुश्री शैल अग्रवाल जी ने पत्रिका “ लेखनी “ के प्रकाशन का बीड़ा उठाया था..
मुझे लगता है कि जयशंकरप्रसाद की इन पंक्तियों के बरअक्स सुश्री शैल जी का चिंतन प्रारम्भ होता है. वे लिखते हैं-
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथायें आज कहूँ क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्मकथा अभी समय भी नहीं थकी सोई है मेरी मौन व्यथा.
सुश्री शैलजी के पास अपनेपन का भाव है, सेवा भाव है. सेवाभाव से सदा प्रेम ही उपजता है. यही कारण है कि वे जन-प्रिय हैं. इसीलिए उनकी बातें ध्यान से सुनी जाती है. फ़िर वे एक अच्छे नाविक की तरह है, जो अपने लोगों को साथ लेकर यात्रा करती है. उनका मार्गदर्शन करती है. वे केवल मार्ग ही नहीं दिखलातीं, अपितु एक सच्चे हितैषी की तरह पूरे समय साथ बनी रहती हैं.
हेनरी फ़ोर्ड ने अपने वक्तव्य मे लिखा है-“ आपका सच्चा मित्र वही है,जो आपके भीतर छिपे सर्वश्रेष्ठ को बाहर निकाले” सच ही कहा गया है कि, जहाँ प्रतिभा चलती है, वही पथ बन जाता है. और श्रेष्ठी जिस मार्ग से चलते हैं, लोग उसका अनुसरण करते हैं. यही एकमात्र ऎसा कारण था कि लोग “ लेखनी “ के साथ जुड़ते चले गए और धीरे-धीरे कारवां बनता चला गया.
आज वे अपनी उम्र का ७९ वां पड़ाव पार कर चुकी हैं. इस उम्र में भी वे सजग और सक्रीय है तथा “लेखनी” पत्रिका का कुशलतापूर्वक संपादन कर रही है.
मेरा अपना मानना है कि भौतिक उपलब्धियां तथा आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त करने के अलग-अलग मार्ग हैं. आध्यात्मिक उर्जा प्राप्त करने के लिए अपने आपको तपाना पडता है. स्वयं प्रकाशित होना होता है ,तब कहीं जाकर आप दूसरों का पथ-प्रदर्शन कर सकते हैं. वेदों में ऋषियों ने आव्हान किया है कि –“हम निरन्तर श्रेष्ठता की ओर अग्रसर होते रहें. प्रकाश को ग्रहण करें और प्रकाशवान हो जाएं” सुश्री शैल जी ने अपने आपको तपाया है और स्वयं प्रकाशित्र हुई है, यदि मैं सुश्री शैल अग्रवालजी को एक विराट लाइट हाउस कहूँ तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, ईश्वर से प्रार्थना है कि आप सदैव स्वस्थ और प्रसन्न बनी रहें और अपने
पूरे प्राणपन से पत्रिका निकलती रहे।…
गोवर्धन यादव
वरिष्ठ लेखक कवि और पत्रकार