डॉ. वासुदेव वेंकट रमण, नितिन उपाध्ये,ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र

पांच लघुकथा

डॉ. वासुदेव वेंकट रमण

लघुकथा-1
फाटक
रात गहरी थी। दफ़्तर की ऊँची इमारत नींद में डूबी पड़ी थी। सड़क सुनसान थी, हवा में हल्की सरसराहट थी।
पुराना चौकीदार वर्दी उतारते हुए मुस्कराया— “लो बेटा, अब ये ड्यूटी तुम्हारी हुई।”
युवक ने वर्दी हाथ में लेते हुए हल्की मुस्कान दी— “क्या इस वर्दी से भी पहचान बदल जाती है?”
बूढ़ा ठठाकर हँसा, बोला— “वर्दी तो नई मिल जाएगी, बेटा… पर पहचान वही रहेगी।” इतना कहकर वह धीरे-धीरे अंधेरे में गुम हो गया।
पीछे से दफ़्तर का बाबू साइकिल पर निकला। युवक को देख हँस पड़ा— “इतनी पढ़ाई करके भी… फाटक?”
बाबू के पैडल की खटखट दूर होती गई। युवक चुप रहा, बस वर्दी के बटन कसकर बंद कर लिए।
अब वह अकेला फाटक पर खड़ा था। वर्दी उसके कंधों पर ढीली लटक रही थी, मानो किसी और के लिए सिली गई हो। हाथ में टॉर्च, कमर पर सीटी। उसने उँगलियों से सीटी को छुआ—उस पर धूल जमी थी, होंठों तक लाई तो बस धातु की ठंडक चुभ गई।
शीशे के दरवाज़े में उसकी परछाईं झिलमिलाई। वह ठिठक गया। उस चेहरे में अपनी नहीं, पिता की आकृति उभर आई थी—झुकी पलकों और थकी आँखों वाली वही आकृति, जैसे आईना बरसों पुरानी याद लौटा रहा हो।
उसने झोली से एक प्रमाणपत्र निकाला। टॉर्च की रोशनी में अक्षर धुँधले पड़ गए थे। होंठों से बुदबुदाया— “पढ़ाई ने दरवाज़े खोलने का वादा किया था… और मैं आज भी फाटक पर खड़ा हूँ।”
उसने काग़ज़ मोड़ा, फिर और मोड़ा, और कसकर मुट्ठी में दबा लिया। फाटक के लोहे को हथेली से छुआ। धातु की ठंडक भीतर तक उतर गई। होंठ काँपे, पर सीटी मौन रही। उसने मुट्ठी खोली—प्रमाणपत्र की स्याही उसकी हथेली पर पिघल गई थी।

लगुकता-2
घुटती पीढ़ी

राहुल अपने कमरे में बैठा था। दरवाज़ा बंद, खिड़की भी। किताबें, नोट्स और इंटरनेट के पन्नों का ढेर उसके चारों ओर बिखरा था। दिमाग़ में सूचनाओं का शोर था, पर भीतर एक अजीब-सी चुप्पी।
माँ की आवाज़ दरवाज़े के बाहर से आई—“थोड़ा खा लो बेटा, इस बार टॉप करना है।”
पिता की आवाज़ और भारी थी—“नौकरी की तैयारी पर ध्यान दो। घर की हालत देख रहे हो न?”
दोस्तों के मैसेज चमकते—“कुछ नया कर यार, स्टार्टअप खोलते हैं!”
राहुल हर बार “हाँ” कहता, मगर उसकी साँसों में “ना” का बोझ अटका रह जाता।
वह खिड़की के पास जाता। सलाख़ों पर उँगलियाँ फेरते हुए उसे लगता—“मेरे भीतर भी यही जंग जम गई है… कितनी कोशिश करता हूँ, पर खुलती ही नहीं।”
डायरी खोलकर लिखना चाहता, पर पन्ने खाली रह जाते। कभी ग़ुस्से में वह पेन से चेहरे बनाने लगता—कुछ रोते, कुछ चीखते, कुछ बिल्कुल मौन। उसे लगता जैसे वे चेहरे उसी के भीतर दबे पड़े हैं।
खिड़की के बाहर कभी बच्चों की हँसी सुनाई देती, कभी पंछियों की चहचहाहट, कभी सड़क से गाड़ियों का शोर। उसे लगता, बाहर ज़िंदगी बह रही है, और मैं भीतर फँसा हूँ।
एक रात बिजली चली गई। अँधेरे में राहुल ने खिड़की की सलाख़ों को ज़ोर से धकेला। जंग टूटी, खिड़की चरमराकर खुल गई। बाहर से ठंडी हवा आई, लैम्पपोस्ट की पीली रोशनी भीतर पड़ी। पत्तों की सरसराहट और कहीं दूर से गाने की धुन भी सुनाई दी।
उसने गहरी साँस ली और फुसफुसाया—“यही तो चाहिए था… कोई रास्ता।”
डायरी का पहला पन्ना खोला। काँपते हाथों से लिखा— “मैं घुट रहा हूँ… मुझे सुनो।”
शब्द काँपते थे, मगर काग़ज़ पर टिक गए। उसी क्षण उसे याद आया, डायरी के एक पुराने पन्ने पर बचपन में लिखा था—“मैं बड़ा होकर आसमान छूऊँगा।” उसने वह पन्ना भी देखा, आधा अधूरा। लगा मानो यह सफर वहीं से टूटा है।
सुबह माँ दरवाज़ा खोलकर भीतर आई। कमरे में हवा का नया झोंका था। मेज़ पर खुली डायरी रखी थी। पहले पन्ने पर ताज़ा वाक्य, और पीछे अधूरा बचपन का सपना।
माँ ने पढ़ा और चुप रह गई। कुछ कहना चाहती थी, मगर शब्द गले में अटक गए। खिड़की से आती हवा ने पन्नों को हिलाया—जैसे वही कह रहे हों—
“हम सब घुट रहे हैं… हमें सुनो।”

लघुकथा-3
“मैं भी बोलूँगी”

सुबह का सूरज चढ़ आया था। खेत से लौटकर रामबाई ने आँगन में चूल्हा सुलगाया। धुएँ से खाँसते-खाँसते आँसू बह निकले। वह दाल चढ़ा ही रही थी कि पड़ोसन सुनीता हाँफती हुई आ पहुँची। हाथ में पुराना स्मार्टफोन था।
“सुन, देख ज़रा… शहर की कोई लड़की है। अपने बड़े साहब के खिलाफ़ सब लिख डाला है।”
रामबाई ने संकोच से मोबाइल थामा। स्क्रीन पर लिखा था— “उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा—चुप रहो, वरना नौकरी चली जाएगी। लेकिन आज मैं चुप नहीं रहूँगी।”
मोबाइल काँपते हाथों से नीचे खिसक गया। गाल पर उँगलियाँ गईं—नीला पड़ा निशान अब भी जला रहा था। “तो औरतें बोल भी सकती हैं?” भीतर कहीं सवाल उठा।
दिन भर काम करते-करते वही वाक्य कानों में गूँजता रहा—“आज मैं चुप नहीं रहूँगी।”
कुदाल चलाते-चलाते हथेलियाँ पसीज गईं। मन में डर की सरगोशी—“सबके सामने बोल दी तो हँसी उड़ाएँगे, घर से निकाल देंगे।” फिर कहीं गहराई से दूसरा स्वर—“तो कब तक सहूँगी?”
शाम को चौपाल पर पंचायत बैठी। रामबाई भीड़ के किनारे जाकर बैठ गई। तिरछी निगाहें चुभीं।
“अरे, औरत पंचायत में? इसे घर नहीं संभलता क्या?”
रामबाई का गला सूख गया। पाँव जैसे ज़मीन से चिपक गए। आँखों के सामने फिर वही मोबाइल स्क्रीन चमकी। “अगर वह बोल सकती है… तो मैं क्यों नहीं?”
उसके होंठ हिले। आवाज़ काँपी, पर निकल पड़ी—
“मैं भी बोलूँगी।”
सन्नाटा खिंच गया।
“मुझे रोज़ पीटा जाता है। नशे में गाली, मार… अब और नहीं सहूँगी।”
लोग जड़ हो गए। किसी की हँसी गले में अटक गई, किसी की पलकें झुक गईं।
रामबाई वहीं खड़ी थी—थरथराते बदन के साथ, लेकिन आँखों में पहली बार अजीब-सी चमक थी।
सुनीता ने पास आकर धीमे से कहा—
“देखा? शहर की चीख़ से गाँव की चुप्पी टूट गई।”

लघुकथा-4
शीर्षक : पहचान-पत्र

गली धुएँ और शोर से भरी थी। जलते टायर की गंध हवा में तैर रही थी। अचानक एक आदमी गिर पड़ा। उसके सीने से खून बह निकला और सड़क पर लाल धार फैल गई।
एक अधेड़ झुककर नब्ज़ टटोलने ही वाला था कि पीछे से नौजवान ने बाँह पकड़ ली—
“रुक… पहले देख ले, अपना है या उनका।”
जेबें खंगाली गईं। सिक्के, टूटा मोबाइल, मुड़ी-तुड़ी पर्चियाँ… पर पहचान-पत्र नहीं।
नौजवान हँस पड़ा—
“झंझट से बच गया।”
पीछे से बूढ़ा काँपते स्वर में बोला—
“पर… इंसान तो है।”
उस पर दूसरा युवक झल्लाकर बोला—
“यही सोचने वाले ही सबसे पहले मारे जाते हैं।”
भीड़ में से किसी ने कहा—
“हटाओ इसे, सड़क गंदी हो रही है।”
इतना कहते-कहते एक बच्चा आगे आया। उसकी आधी जली हुई गेंद हाथ में थी। उसने गेंद दबाकर लाल धार को छुआ। उँगली लाल हो गई। वह मासूमियत से बुदबुदाया—
“मास्टरजी तो कहते हैं, सब बराबर हैं… तो यह बराबरी कहाँ गई?”
कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
फिर नौजवान हँसकर बोला—
“बच्चा है… बड़ा होगा तो समझ जाएगा।”
इस बीच घायल की साँसें थम गईं। आँखें खुली रह गईं, जैसे वही सवाल दोहरा रही हों।
एक युवक ने कहा—
“अब इसे जलाएँ या दफ़नाएँ?”
दूसरे ने कंधे उचकाए—
“छोड़ो… नगर पालिका वाले आकर उठा ले जाएँगे।”
भीड़ धीरे-धीरे छँट गई।
केवल एक आदमी ठेलेवाले को पुकारकर बोला—
“यहाँ पानी डाल जा, बदबू न फैले।”
पानी की धार खून से मिलकर बह निकली।
साथ ही बच्चे की किताब का पन्ना उड़कर उसी लाल धार में गिर पड़ा।
स्याही घुल गई, और आख़िरी शब्द बहते-बहते मिट गए—
“सब बराबर हैं।”
बच्चा गेंद को किनारे रखकर वही खड़ा रहा।
गेंद की गीली सिलाइयाँ खुलती जा रही थीं, जैसे भीतर से फुसफुसा रही हों—
“बराबरी कहाँ गई?”

लघुकथा-5
ऑनलाइन

मोबाइल की स्क्रीन पर नीली रोशनी टिमटिमा रही थी। कमरे की खिड़की आधी खुली थी, भीतर दवा की गंध घुली हुई थी। बिस्तर पर लेटी महिला का चेहरा पीलापन लिए निःशब्द पड़ा था। नोटिफ़िकेशन की झड़ी लगी थी—
“जल्दी ठीक हो जाना ”
“यू आर स्ट्रॉन्ग ”
“मेरे प्रेयर्स तुम्हारे साथ हैं ”
स्क्रीन लगातार चमक रही थी। काँपती उँगलियों से उसने एक-एक “थैंक यू” टाइप किया, फिर फोन धीरे-से तकिए पर गिर पड़ा।
गला सूख रहा था। उसने पास रखे गिलास की ओर हाथ बढ़ाया—खाली था। खाँसी का दौरा उठा, शरीर हिलने लगा। उसने दरवाज़े की ओर देखा—सन्नाटा पसरा रहा।
फोन की स्क्रीन पर लिखा था—“हम सब तुम्हारे साथ हैं ।”
उसी क्षण उसका काँपता हाथ गिलास से छू गया, और खाली गिलास ज़मीन पर लुढ़कता चला गया।

पाँच लघुकथा

नितिन उपाध्ये, दुबई

लघुकथा-१

अचार
“दीदी जी, मेमसाहब तो बाज़ार गई है, शाम की पार्टी की खरीददारी करने” उसके सामने चाय का कप रखते हुए कामवाली ने बताया |
अगर बुलाया भी होता, तो शाम को आना उसके लिए संभव नहीं था | इसलिए उसने अपनी बेटी द्वारा मौसी के लिए हाथों से बनाया ग्रीटिंग कार्ड और बड़ी बहन को पसंद अचार और मुरब्बे की शीशियों को सामने टेबल पर रख दिया|
“दीदी जी आपके हाथ में तो जादू है, पिछले साल का मुरब्बा तो मेरे दोनों बेटों ने एक महिने में ही चट कर दिया था, औऱ मेरे घर वाले को भी आपके हाथ का अचार बहुत पसंद आया था|

लघुकथा-२
आज कल की बहुएं
बाबू जी आपकी चाय केतली में रखी हैं। साथ ही बिस्कुट और शाम को लेने वाली दवाई भी रखी है। अब आप बाहर बैठक में आ जाइये। मुन्नू अम्मा जी को लेने छत पर गया है। अब तक तो धुप भी उतर गई होगी। सर्दी के दिन हैं ना, शाम जल्दी ही हो जाती हैं। ये लीजिये अम्मा जी भी आ गई। अम्मा जी कल सुबह के छोलों के लिए कितने काबुली चनें भिगो दूं। एक बार अगर दही बड़े बनाने में लग गई तो फिर भूल न जाऊ। ये शाम को आते हुए रेखा जिज्जी और बच्चों को साथ लेकर आने वाले है । कल सेकंड सैटरडे हैं तो कँवर सा भी गांव से सीधा यही आ जायेंगे। मैंने टीवी पर आपका मनपसंद चैनल भी लगा दिया हैं। बस ज़रा सी देर में आप के कल रात वाले ड्रामे का पुन: प्रसारण शुरू होने ही वाला है । इतना कहकर सुधा रसोई में चली गई।
कल रात ही देखे हुए सास-बहु के ड्रामे को फिर से देखते हुए सासू जी बड़बड़ाई “ये आज कल की बहुएं, इनसे तो राम बचाये।

लघुकथा-३
“चूड़ियाँ”
“रुक्मि आज तो चलेगी न” गंगी ने खोली का पर्दा हटाकर पूछा ।
रात भर की जागी आँखों को उठाकर उसने गंगी की तरफ देखा और धीरे से सर हिला दिया । गोविंद को गये अभी तीन दिन भी नही हुए थे । दिहाड़ी के काम से देर रात घर आते समय उसकी साइकिल पर क्यों एक बेकाबू ट्रक को प्यार आ गया था, भगवान ही जाने । अभी तक तो उसकी चिता भी ठंडी नही हुई होगी, पर घर का चूल्हा अधिक देर ठंडा नही रह सकता था । अभी तक तो आस पास की खोलियों से उसके लिए खाना आ रहा था, पर दो दिन से ज्यादा अपने पड़ोसी को खाना खिलाने की इच्छा तो महलों में रहने वालों को भी नही होती । ऊपर से उसकी बस्ती में तो किसी की यह हैसियत भी नही थी ।
उसकी छोटी सी खोली में तीनों लोकों की दरिद्रता बेफिक्री से पैर पसार कर लेटी हुई थी और बची हुई जगह में दोनों बच्चें सो रहे थे । गोविन्द के रहते उसे कभी भी अपनी गरीबी पर रोना नहीं आया था, उसे लगता था की वह गोविन्द के दिल और घर की महारानी है । अपनी असहाय अवस्था आज उसे पहली बार इतनी तीक्ष्णता से चुभने लगी थी ।
वह उठी, मुँह पर पानी के छींटे मारे, पल्लू से मुँह पोछते हुए दरवाजे से लटके हुए शीशे के टुकड़ें में देखकर अपने बाल ठीक किए और आदतन सिंदूर की डिबिया उठा ली । फिर जैसे मानो बिजली के नंगे तार को छू लिया हो, उसी तेजी से उसे वही छोड़कर वह अपनी टोकरी की तरफ़ मुड़ी । टोकरी के आसपास उसकी रानी कलर की चूडियों के टुकड़े पड़े थे, जो परसों इसी गंगी ने फोडी थी । गोविंद कितने चाव से दस दिन पहले ही लाया था।
“अरे, जल्दी चल, औरतें सुबह सुबह नहा धो कर आने लगी होंगी| महाद्वार के पास जगह नहीं मिली तो धंधा क्या ख़ाक होगा” गंगी बाहर से बड़बड़ाई ।
टोकरी उठाकर बाहर आई तो उसे देख गंगी बोल पड़ी “अरी तेरे सूने माथे को देख कर सुहागनें देवी माँ के लिए सुहाग की चीजें तुझसे क्यों खरीदेंगी?” यह कहकर अपनी टोकरी से सिंदूर निकाल कर एक बड़ा सा टीका उसके सूने माथे पर बना दिया और उसी की टोकरी से सुहाग की हरी चूडियां निकाल कर उसकी दोनों कलाइयों में भर दी।

लघुकथा-४

टुकड़े
“अरे सुन, ये अपनी सोसायटी में ये इतनी पुलिस क्यों आई है? क्या सामने वाली इमारत में कोई कांड हो गया है ? तू अभी वहाँ की पांचवीं मंज़िल से काम कर के आ रही है, तुझे तो सब पता होगा न !”
“अरे अम्मा जी, मैं लोगों के घरों में काम करने जाती हूँ । कोई आस-पास के घरों की टोह लेने थोड़ी ही जाती हूँ । मैं तो अपने काम से काम रखती हूँ।”
“सब जानती हूँ, तुम सब कामवालियाँ दोपहर के समय नीचे बगीचे में क्या खुसर-फुसर करती रहती हो। अब ज्यादा नखरें न दिखा, वैसे भी बिना बताये तुझे आज का खाना तो हजम नहीं होगा।”
“अरे अम्माजी आप तो बुरा मान गई, वहाँ आठवें माले पे वो लैला मजनूं का जोड़ा हैं न?”
“क्या दोनों में मारपीट हो गई?”
“अम्माजी आप थोड़ा सबर तो रखों, आपको तो पता ही होगा कि वह दोनों बिना शादी किये, वो क्या कहते है “लिव इन” में रह रहे थे ।”
” हाँ मैंने तो कितनी बार मुए सेक्रेटरी से कहा कि दोनों को निकाल बाहर करो, तो कहने लगा कि हम क्या कर सकते है, फ्लैट तो छोरी के बाप का है।”
“अम्माजी, इसीलिए तो वह लड़की उस लड़के पर रौब जमाती रहती थी, आखिर वह लड़का भी कब तक सहन करता । उनके झगड़े बढ़ गए थे, पर दो दिन से घर में से कोई भी आवाज नहीं आ रही थी, तो पड़ोसियों ने चढ़के रोशनदान से देखा तो क्या बैठक में खून ही खून….”
“हे राम! उस राक्षस ने बेचारी लड़की को मार डाला? अब तो वह उसके टुकड़े-टुकड़े कर के फ़ेंक देगा।”
“नहीं अम्मा जी, यहाँ तो उलटा ही किस्सा हो गया, वह लड़की ने पूतना बनकर उस लड़के के सर पर फुलदान दे मारा, और अब उसके टुकड़े करके फेंकने का प्लान कर रही थी।”

लघुकथा-५
मुर्दाघर
चौकीदारी और वह भी मुर्दाघर की ? आज जब उसे रोज रात सरकारी अस्पताल के मुर्दाघर की चौकीदारी का काम बताया गया तो उसकी तो हँसी ही छूट गई थी। अब भला बाहर से कौन जीवित व्यक्ति मुर्दाघर के अंदर जाना चाहेगा या कौन सा मुर्दा खुद-ब-खुद बाहर आ जाएगा? फिर उसे याद आया की पिछले सप्ताह कुछ कुत्ते एक शव को लेकर भागे थे और उनकी तस्वीर छपने पर प्रदेश की विधानसभा में हंगामा हो गया था। इसीलिए अब उसे रहवासी कॉलोनी की बजाय यहाँ मुर्दों की रखवाली में रात गुजारनी पड़ेगी। अकेले खड़े हुए डर तो लग रहा था, फिर भी उसने मुख्य अस्पताल से दूर मुर्दाघर के आसपास दो चार चक्कर लगाए और थक कर बैठ गया।
अंदर से कुछ आवाजें आई, तो वह ताला खोलकर अंदर गया। क्या पता कोई कुत्ता खिड़की से घुस आया हो? अंदर चबूतरों पर तीन लाशें पड़ी थी। उसने न चाहते हुए भी पहले शव पर से कपड़ा हटाया और चौंककर दो कदम पीछे हो गया। यह तो पीली कोठी वालों की नई-नवेली बहू थी। हर रोज रात को उसके कमरे से मार-पीट, ससुरालियों के चीखने चिल्लाने और घुटी-घुटी सिसकियों की आवाजें आती थी। कंचन सी काया वाली, एक जली हुई लकड़ी की तरह चबूतरें पर पड़ी थी। उसे इस हालत में देख थरथराते क़दमों से वह दूसरे चबूतरे का सहारा लेने बढ़ा तो वहां पड़े हुए शव पर उसकी नजर पड़ी। मानव-कंकाल सा वृद्ध पुरुष उसे जाना पहचाना लगा। ध्यान से देखा, तो कॉलोनी की दस-मंजिला इमारत में रहने वाले बाबा को पहचान गया। इनका बेटा दुबई में था और बहू खाने पीने को नहीं देती थी। उसने इन्हें कूड़े के ढेर से खाने की चीजें ढूंढते देखा था। आज शरीर पर पड़ी हुई चोटें कुछ और ही कहानी कह रही थी। पलटा तो पीछे के चबूतरे पर रखे शव पर गिरा। देखा तो कॉलोनी के बाहर फूल बेचने वाली लड़की थी। फूलों सी कोमल लड़की काँटों से बींधकर कटी-फटी पत्थर पर पड़ी थी। उसने गली के शोहदों को कई बार उसे छेड़ते हुए देखा था। पर इस मोहल्ले के बाकी लोगों की तरह, पराई आग में क्यों कूदना कहकर वह भी किसी मामलें में नहीं पड़ा था।
वह भागने लगा, तो कुर्सी से गिर गया। सामने देखा तो रात को उसने दरवाजे पर लगाया हुआ ताला अभी भी मुर्दाघर की रखवाली उसी मुस्तैदी से कर रहा था। वह समझ गया कि उसने आने वाले कल का सपना देखा है। सूरज की किरणें उसके चेहरे पर पड़ी और ड्यूटी के बाद वह मोहल्ले के थाने की तरफ चल पड़ा।

पाँच लघुकथा

ब्रजेन्द्र नाथ मिश्र, जमशेदपुर

लघुकथा-१
अहं – पुष्टि की भूल

मैं अपनी पत्नी के साथ रात की बस से यात्रा करते हुए स्टैंड पर उतरा था. सामान डिकी से निकाला गया था. मेरी ओर दो रिक्शे वाले बढ़े थे. मैंने एक रिक्शे वाले से बात की. भाड़ा तय कर लिया गया. वैसे मैं ऑटो से भी जा सकता था. तब तक श्रीमती जी ने एक ऑटो वाले से बात कर ली. अब मैं बड़े पेशोपेश में फंस गया. अगर ऑटो पर सवार होता हूँ, तो रिक्शा वाले का दिल टूट जाएगा. मैंने उसके साथ बात कर ली, तो सुबह – सुबह उसकी आँखों में एक उम्मीद की किरण जगी. उसने सोचा होगा कि आज की शुरुआत, जिसको उनकी भाषा मे ‘बोहनी’ कहा जाता है, अच्छी हुई. इतने में ऑटो वाले ने सारा सामान अपने ऑटो पर लाद दिया. उस रिक्शा वाले की सुबह – सुबह आँखों में जगी उम्मीद की किरण को बुझते हुए मैं नहीं देख सकता था. मैं बच्चों और पत्नी सहित ऑटो पर बैठ गया. ऑटो स्टार्ट हो चुका था. मैं ऑटो से उतर गया. ऑटो वाले ने ऑटो रोक दिया था. मैं उस रिक्शा वाले के पास दौड़कर पहुँचा. उसे वाजिब किराया जो रिक्शा से जाने पर लगता, मैंने उसकी शर्ट की आगे वाली जेब में डाल दिए. वह आश्चर्यचकित था. उसने अपने जेब से नोट निकाले. उसने मुझसे कहा, “आप बिना मेरे मेहनत किए पैसे कैसे दे सकते हैं?
मैंने कहा, “पहले मैंने आपसे बात की थी न. इसलिए आपके ये पैसे बनते हैं. जहाँ तक आप कहते हो कि बिना मेहनत के आपसे पैसे कैसे ले सकता हूँ. तो आप चलिए मैं आपके साथ ही चलूँगा.” कहकर मैं उसके रिक्शा पर बैठ गया.
उधर मेरी पत्नी और बच्चे मेरा इंतजार कर रहे थे.
रिश्ता वाले ने संजीदा होकर कहा, “आप रिक्शा से उतरिए.”
मैं उसके रिक्शे से उतर गया. उसने मेरे दिए हुए नोट मेरी शर्ट की पॉकेट में डालते हुए कहा, ” आप उधर जाइए. आपकी पत्नी और बच्चे आपका इंतजार कर रहें हैं. मैं चुपचाप सिर झुकाए अपनी पत्नी और बच्चों के साथ ऑटो में बैठ गया. मेरा अंतर्मन मुझे झकझोर रहा था, किसी को गरीब और लाचार समझते हुए दान देकर अपने अहं – पुष्टि को चैरिटी या दान समझने की भूल नहीं करनी चाहिए.

लघुकथा-२
प्यार ऐसे क्यों आता है?

अनु ने अर्थशास्त्र आनर्स में कॉलेज में प्रवेश लिया था। कॉलेज के इस वर्ष के अंगरेजी वाद – विवाद प्रतियोगिता में उसने भाग लिया था। उसके तर्कों ने पूरी श्रोता – दीर्घा को चमत्कृत कर दिया था। उसकी सफ़ेद सलवार सूट की पोशाक, उसका दमकता गोरा रंग और वाद – विवाद के समय उसके विशिष्ट हावभाव के द्वारा विषय पर पकड़ के साथ विचारों के सम्प्रेषण की शैली ने गजब का प्रभाव डाला था। वह अपने वक्तृत्व – कला और व्यवहार के कारण बहुत ही कम समय में पूरे कॉलेज में मशहूर हो गई थी। उससे नज़दीकियां बढ़ाने में कई छात्र जुगत भिड़ाने में लग गए थे। मसलन, उसका संपर्क – क्षेत्र, सहेली – क्षेत्र, पिता के ऑफिस के क्षेत्र आदि की जानकारियां भी इसमें शामिल थी। लेकिन कहीं से कोई भी उसे आकर्षित करने में सफल नहीं हो पाया था।
प्रणव उसका पड़ोसी था। वह भौतिकी पी जी का विद्यार्थी था। अनु कभी – कभी उससे अर्थशास्त्र में सांख्यिकी (स्टेटिस्टिक्स) के सवालों को हल करने में मदद लिया करती थी। प्रणव उसे इसतरह समझाता था कि अनु को सांख्यिकी से सम्बंधित सवाल बिलकुल आसान लगने लगे थे। शायद प्रणव की सांख्यिकी की समझ और समझाने के ढंग दोनों ही अनु को प्रभावित कर रहे थे। कभी – कभी अनु अपने मन की सीमा रेखा के पार कोई अनकही, अपरिभाषित आकर्षण भी महसूस करने लगी थी। परन्तु प्रणव ने अनु के सफ़ेद लिबाश की असलियत जाने बिना अपने मन को किसी उलझन में नहीं डालने का मन बना लिया था।
एक दिन उसने अनु से पूछ दिया, “तुम सफ़ेद सलवार सूट में अच्छी तो लगती हो, लेकिन क्या रंगीन शेड के कपड़े तुझे पसंद नहीं?”
अनु ने हंसकर जवाब दिया था, “मैं चाहती तो नहीं कि कोई आग सुलग जाए,
गर सादगी मेरी जलाये, तो मैं क्या करूँ?”
और यह चर्चा इसी तरह टल गई थी या टाल दी गई थी।
X X X
अनु के पिताजी का स्थानांतरण दूसरे दूर के शहर में हो गया था। अनु भी कॉलेज में अर्थशास्त्र आनर्स के फाइनल के परीक्षाफल में अब्बल रही थी। अब उसके आगे की पढ़ाई दूर के ही शहर में होगी। आज अनु आख़िरी बार प्रणव से मिलने आई थी। उसी ने प्रणव का हाथ पकड़कर कहा था, “प्रणव, मेरी शादी छह महीने पहले ही हो गई थी जब मैं हैदराबाद में थी। मेरे पति आई पी एस अफसर थे। उन्हें एक दिन कमिश्नर से फोन आया, ‘आप नक्सल प्रभावित क्षेत्र में जवानों की एक टुकड़ी लेकर रेड करें। वहाँ खूखार जोनल कमांडर के होने की पक्की सूचना मिली है।” वे रात में ही निकल गए। जब वे एक दिन के बाद लौटे तो तिरंगा में लिपटे हुए थे। यही है मेरी सफ़ेद लिबाश का राज, प्रणव।”
वह प्रणव का हाथ अपने हाथ में लिए आंसुओं से तर करती रही, और प्रणव सोचता रहा, “क्या प्यार ऐसे आता है, जिंदगी में? अगर प्यार ऐसे आता है, तो प्यार क्यों आता है जिंदगी में?”

लघुकथा-३
अलिखित रिश्ता

कृष्णचन्द्र वैसे कवि नहीं था। परंतु दोस्तों के बीच वह तुकबंदी कर कुछ – कुछ सुना दिया करता था। लोग भी इतने बेवकूफ थे या वह उन्हें आसानी से बेवकूफ बनाने में सफल हो गया था कि वे उसे कवि समझने लगे थे। लोगों को क्या मालूम कि कविता मात्र तुकबंदी नहीं होती है। जब भावों के घनीभूत बादल शब्दों के जलकण के रूप में बरसते हैं, तभी कविता की अजस्र सरिता प्रवाहित होती है। उसके मित्र इन सभी स्थापनाओं से अनभिज्ञ होते हुए भी कृष्णचन्द्र को कवि मान बैठे थे। इसीलिए उन्होंने उसका नाम कृष्णचन्द्र से बदलकर कविकृष्ण कर दिया था।
कविकृष्ण की रुचि कविताएँ पढ़ने में थी। उसे गद्य लिखना अच्छा लगता था। उसे कथा – साहित्य का फलक अधिक पसन्द था। इसीलिए उसने कथा – साहित्य के विभिन्न आयामों को समझने के लिए हिंदी पाठकों के बहुचर्चित वेबसाइट पर “पाठकों से संवाद” धारावाहिक के द्वारा स्वातंत्र्योत्तर भारत में कथा – साहित्य के विकास और ग्रामीण पृष्ठभूमि पर लिखी प्रेमचन्द की कहानियों और रेणु की आंचलिकता पर अपने दृष्टिकोण को रख रहा था। इस संवाद के क्रम को काफी पाठकों द्वारा सराहना मिल रही थी।
एक पाठक या कहें पाठिका की टिप्पणी कविकृष्ण के “पाठकों के संवाद” के पिछले 50 (पचास) सप्ताहों से लिखे जा रहे धारावाहिक लेख पर तुरंत आ जाया करती थी। इस बार उसकी टिप्पणी जब इस सप्ताह के प्रकाशित भाग के तीसरे दिन दिन भी नहीं आयी, तो कविकृष्ण का मन विचलित हो उठा। कई आशंकाएं मन में घिरने लगी। क्या हो सकता है? कहीं उसकी तबियत तो खराब नहीं हो गयी? वह कितनी अच्छी समीक्षा लिखती थी, उसके लेखों पर।
पिछले अप्रैल में जब कोविड संक्रमण के हल्के लक्षण से ग्रस्त होने के कारण दो सप्ताह तक वह अपने “पाठकों से संवाद” के क्रम को जारी नहीं रख सका था, तब उसके कितने मैसेज आ गए थे-
“आपका लेख क्यों नहीं आ रहा है? आपके लेख से मैं ऊर्जा प्राप्त कर पूरे सप्ताह मनोयोगपूर्वक अपने कार्य सम्पन्न करती हूँ। लग रहा है, कहीं कुछ दरक रहा है, जिंदगी में…कहीं अधूरेपन की आशंका घेर रही है…कहीं कुछ अदृश्य – सा, अनकहा – सा रह जा रहा है…कुछ तंतु चटक रहे हैं…बहुत खाली – खाली – सा लग रहा है…और भी बहुत सारे मैसेज कविकृष्ण ने देखे थे, जब वह स्वस्थ होकर लिखने और पढ़ने की स्थिति में आ गया था।
कविकृष्ण ने अपनी अस्वस्थता के बारे में सीधे और सहज ढंग से अपने संदेश में लिख डाला था।
उसपर उसके उत्तर से वह हतप्रभ रह गया था, “आपको पता है कि आपकी लेखनी से निकले शब्दों को जबतक मैं अंतरतम में उतार नहीं लेती, तबतक मेरा सारा अध्ययन अधूरा लगता है। आपने नए शब्दों से मेरा परिचय कराया है। मैं साहित्य में रुचि नहीं रखती थी, आपने रुचि जगा दी है। उस रुचि के अंकुर को आपने पोषण दिया है। आप इसतरह ‘लेखनी का मौन’ नहीं धारण कर सकते। आपको लिखना होगा…लिखते रहना होगा…जबतक मेरा लेखन परिपक्व नहीं हो जाता…”
कविकृष्ण ने लिखते रहने का निश्चय किया। उसे मैसेज कर दिया था, “मेरी लेखनी नहीं रुकेगी… “पाठकों से संवाद” का यह क्रम तबतक आगे बढ़ता रहेगा जबतक मेरी लेखनी चलती रहेगी…”
इस सप्ताह उसी की टिप्पणी नहीं आयी।
कविकृष्ण की लेखनी में थरथराहट सी होने लगी…कुछ भी आगे लिखने का मन नहीं कर रहा था…वही आशंकाएं घेरने लगी थी…अनावश्यक अनहोनी के अनकहे आख्यान अनायास मन के आकाश में मंडराने लगे थे…इनमें सबसे अधिक तबियत खराब होना, यह भी उतना बड़ा कारण नहीं लगा था…तबियत इतना खराब हो जाना कि लिखने की ऊर्जा भी नहीं बची हो…मोबाइल पर भी टंकण की स्थिति न हो…इससे उसका मन अधिक विचलित हो गया था।
कविकृष्ण ने भी दृढ़ निश्चय कर लिया था कि पिछले भाग पर जबतक उसकी कोई टिप्पणी नहीं आती है, वह आगे का भाग प्रकाशित नहीं करेगा… भले ही “पाठकों से संवाद” के इस क्रम को यहीं विराम देना पड़ जाय।
इस सप्ताह के भाग के प्रकाशन के चौथे दिन उसका मेसेज आया था,
“मेरा मोबाइल हैंग हो गया था…मैं न कुछ पढ़ पा रही थी, न लिख पा रही थी…उसके बाद मोबाइल डिस्चार्ज हो गया…रिपेयर के लिए देना पड़ा…उसका चार्जिंग पोर्ट खराब हो गया था…अभी ठीक है…मैंने आज ही आपके लेख पर टिप्पणी लिखी है…
आप आँचलिकता पर अपनी विवेचना जारी रखें…मैं ऊर्जस्वित हूँ…हर्षित हूँ…सादर!”
कविकृष्ण के अंतर्मन में उठ रहीं सारी आशंकाओं की विपरीत दिशाओं पर विराम लग गया था।
कविकृष्ण “पाठकों से संवाद” के आगे के क्रम को बढ़ाने के पहले अपनी उद्विग्नता के बारे में सोचने लगा…कोई बंधन या अनुबंध तो है नहीं, फिर मात्र टिप्पणी नहीं आने से वह चिंतित क्यों हो गया?…कुछ तो रेशे हैं जो अदृश्य होते हुए भी बाँधने लगते हैं…
उसे जब कुछ नहीं लिखने का मन होता है तो वह एफ एम के रेडियो चैनल पर गाने सुनने लगता है…उसने एफ एम रेडियो चालू कर लिया था…एक गीत आ रहा था..
“हमने देखी है इन आँखों की महकती खुशबू,
हाथ से छू के इसे रिश्तों का इल्जाम न दो।
कविकृष्ण ने लिखना शुरू किया ‘पाठकों से संवाद’ लेकिन लिख गया…
“अलिखित रिश्ते को अघोषित ही रहने दो…”

लघुकथा-४
पूरण की फसल
———————
बाँध का पानी पिछली रात को छोड़ दिया गया है। पूरण धान की रोपणी के बाद अच्छी फसल के सपने संजोए रात में सोया था। आज सुबह अपने खेत के ऊपर मटमैले पानी के फैलाव को वह देख रहा है और देख रहा है, अपने सपनों को ढहते हुए, देख रहा है, पानी में हाल में रोपे गए धान के पौधे को धार में बहते हुए…
देख रहा है अपने बैलों के चारे के अभाव में दम तोड़ते हुए …देख रहा है अपनी मां की खाँसी के इलाज के अभाव में छटपटाते हुए … देख रहा है बिटिया की शादी के लिए पैसे नहीं जुटाने की स्थिति में जमीन को गिरवी रखते हुए … देख रहा है बैंक के कर्जे की किश्त नहीं जमा करने पर खुद को फंदे से…
नहीं, नहीं वह अपने सपने को पानी की धार में ऐसे बिलाते हुए नहीं देख सकता। उसने बैंक के ऋण से ही उत्तम कोटि के अच्छे बीज और खाद का इंतजाम कर फसल लगाई थी। खाद अभी बचा ही हुआ था, जिसका इस्तेमाल वह पौधों को खड़ा हो जाने बाद भादो के महीने में करने वाला था।
उसका घर ऊँचे टीले पर बना था, इसलिए घर में पानी नहीं घुसा था। वहीं से छत पर खड़ा हुआ वह चारो ओर फैले समंदर की मानिंद जलजमाव को अपने कातर नयनों से निहार रहा था।
अपने घर के ऊंचे छत पर, बैठ गगन की भींगीं छाँह,
पूरण अपने भींगे नयनों से देख रहा है प्रलय प्रवाह।
इतने में वह देखता है कि एक बड़े से काठ के कुंदे के एक छोर पर बड़ा सा अजगर और दूसरे छोर पर भींगे पँख लिए मैना बैठी है और कुंदा तेजी से बहा जा रहा है। वह सोचता है अगर सामान्य स्थिति होती तो अजगर मैना को झपटकर निगल जाता। पर आज उसे अपनी जान बचाने की फिक्र अधिक है, बनिस्वत कि जान लेने की। जब खुद की जान पर बन आती है तो हर जीव में जीजिविषा प्रबल होती है और भयंकर जीव भी अहिंसक हो जाता है। जीजिविषा ने ही दोनों को सहयात्री बना दिया है।
पूरण भी अपनी जीजिविषा को जगा हुआ महसूस करता है। वह जीयेगा और अपने सपने पूरे करेगा… वह अपने सपने को मरने नहीं देगा।
★★★★★
अब पानी धीरे धीरे उतरने लगा है। खेत में रोपा हुआ धान का एक भी पौधा नहीं बचा है। पर खेत की मिट्टी के ऊपर भूरे मटमैले मिट्टी की एक और परत पसर गयी है। पूरण ने मन में ठान लिया है खेती को फिर शुरू करेगा। वह पारंपरिक खेती के ढंग को ही बदल देगा।
वह बैंक के ऋण के बचे पैसे से सब्जियों जैसे भिंडी, टमाटर, बैगन, लौकी, नेनुआ, करेला आदि का बीज ले आता है। अपनी डेढ़ एकड़ की जमीन के आधे भाग में वह इन सारे बीज को रोप देता है। आधे भाग को वह छोड़ देता है, जिसमें अगहन में वह गेहूँ लगा देगा। तीन महीने के भीतर ही सब्जियाँ लहलहा उठती हैं। बाढ़ में बह आई मटमैली मिट्टी की उर्वर गोद में इतनी अच्छी सब्जियों की फसल की संभावना को पहले किसी ने देखा ही नही था। वह किसी तरह के रासायनिक उर्वरक का उपयोग नहीं करता है।
इसलिए सब्जियाँ ऑर्गेनिक के नाम दूगने दाम पर बिकने लगती हैं। शहर के मॉल वाले और बड़े-बड़े होटल वाले सीधे पूरण की ऑर्गेनिक सब्जियाँ उसके खेत के पास से ट्रकों में भर-भरकर ले जाते हैं। उसे नकद पैसे मिलते हैं। पूरण अपने सपने को सच होते हुए देखता है।
उसका नैराश्य भाव दूर हो जाता है। उसके जीवन में आशा की कोंपलें बढ़ने लगती है।

लघुकथा-५
दुग्धपान
———-
ट्रेन के उस जनरल डिब्बे के खचाखच भरे होने और भीषण उमस वाली गर्मी होने के कारण, डिब्बे की छत से लटके चल रहे पंखे भी यात्रियों के पसीने की मिश्रित गंध को दूर करने में अक्षम प्रतीत हो रहे थे. ट्रेन हर लोकल स्टेशन पर रुकती कुछ यात्री चढ़ते और कुछ उतर जाते. डिब्बे के अंदर की भीड़ जस की तस थी. मुझे बैठने की जगह मिल गयी थी, इसलिये मैं राहत का अनुभव कर रहा था. वह महिला अपने बच्चे को पीठ पर बांधे थी. बच्चा लगातार रोये जा था. महिला कभी बच्चे की ओर अपनी गर्दन घुमा कर देखती, कभी अपनी – अपनी सीटों पर बैठे सवारियों की तरफ कातर भाव से देखती.
बच्चा उमस भरी गर्मी के कारण रो रहा था, या उसे प्यास लगी थी. सारे सीटों पर बैठे यात्री इससे निरपेक्ष अपनी यात्रा में आंनद के आनंद में लीन थे.
बच्चे के रुदन की आवाज तेज हो गयी थी. उसकी माँ को मालूम था कि बच्चा क्यों रो रहा है. इस बार आई पसीने की बूंदों के साथ अपनी आँखों में आ गईं नमी को भी उसने पोंछा था. उसकी करुणार्द, अश्रु विगलित दृष्टि सामने अपनी – अपनी सीटों पर बैठे यात्रियों को देखते – देखते मुझपर आ कर टिक गईं. मुझसे हट्टे – कट्ठे जवान लोगों ने अपनी सीट छोड़ने की जहमत नहीं उठाई. परन्तु मुझसे रहा नहीं गया. वृद्ध होते हुए भी मैं अपनी सीट से उठ गया.
वह महिला उस सीट पर बैठी. जैसे ही उसने अपने बच्चे को अपना दुग्धपान कराया, बच्चा चुप हो गया… डिब्बे में शांति छा गईं. उमस वाली पसीने की गंध अभी भी व्याप्त थी.
-0-

error: Content is protected !!