कहानी समकालीनः युद्ध में बुद्धः शैल अग्रवाल

पल भर पहले ही सायरन का वह डरावना-बचो या मरो वाला बदहवास शोर था और फिर सब धुँआ-धुँआ।…
कुछ भी हो सकता था -अंग-भंग हो सकते थे, मर सकते थे वे और अगर उनकी कृपा रही तो बच भी सकते थे। तुरंत ही एक भगदड़ सी मच गई थी चारो तरफ। फिर मौत का ठंडा सन्नाटा पसरते भी देर न लगी थी।..देखते-देखते.पलभर में ही फूल और पक्षियों से हरा-भरा उनका शहर एक भयानक दुःस्वप्न में तब्दील हो गया। दुश्मन ठिकाने ढूंढ-ढूंढ कर हमला कर रहा था, जहाँ -जहाँ लोग छिपे बैठे थे, जान-माल के लिए प्रार्थना कर रहे थे, चुन-चुनकर उन्ही जगहों पर।
जैसे-तैसे अपने ही शहर से जान बचाकर भागे थे वे। घर से तो तीन ही निकले थे और अचानक ‘रुको’ की आवाज पर रुक भी गए थे । समर्पण में हाथ भी ऊपर कर दिए थे …पर …
सायरन से भी तेज धौंकनी थीं अब उसकी धड़कनें। कनपटी तक को तिरकाती और नगाड़े-सी गूंजती उसके अंदर-ही अंदर।
हड्डियाँ कंपाते उस भय में पत्थर का चांद ही साक्षी था अमानवीय पल का, वह भी दूर आसमान पर बैठा हुआ । क्रूर, निर्मम नर-संहार का गवाह तो, परन्तु बन्द खिडकियों की झिर्रियों से झांकते अन्य देशवासियों की तरह ही उनके बहते दर्द में साझा नहीं। असहज रूप से चुप थे सभी। कोई नहीं आया था मदद को। बिखरी लाशों-से बेजान। पर टेलिविजन पर आती खबरें तो नहीं , घट रहा था सब उनकी भयभीत आंखों के आगे।
पराई आंच में झुलसने कोई क्यों आता?
जान पर आन पड़े तो देशभक्ति और वीरता जैसे शब्दों का कोई अर्थ भी तो नहीं रह जाता!…
दम तोड़ती झटपटाहट में उसका भी तो विश्वास उठता जा रहा था, भाईचारा, मानवता, दया, करुणा, जैसे शब्दों से। चारो तरफ अकाल था इंसानों का भी और उसूलों का भी। ऐसा भयभीत समय था वह, जिसमें कोई किसी का नहीं। पर आश्चर्य की बात तो यह थी कि जिन्दा था वह, अकेला और असहाय होने के बावजूद भी।
सरगे भागा जा रहा था। अंधेरे में डूबी, बड़े-बड़े पेड़ों से ढकी, सूनी पगडंडी पर झींगुरों की झुनझुन और हिस्सहिस्स आवाजें रह-रहकर सुनाई दे जाती थीं, और कुछ नहीं। पर डर नहीं रहा था वह।
जिस भय से अभी-अभी गुजरा था, उसके आगे अब हर भय बहुत छोटा था।
घर, मां-बाप…परिचित और आराम देने वाली हर चीज से दूर, मात्र जिन्दा रहने के लिए भाग रहा था वह- कहाँ और कबतक, नहीं जानता था, पर।
पूरा देश ही लड़ रहा था सुरक्षा के लिए, अपनों के लिए, अस्तित्व के लिए। वह तो बस इस बड़ी-सी लड़ाई की एक छोटी सी कड़ी मात्र था- टूटी, अलग छिटकी और महत्वहीन कड़ी। पर हर कड़ी का अपना एक महत्व होता है ! उसका भी होगा- क्या? यह तो वक्त ही बताएगा। -समझा ही लिया था कैसे भी बारह वर्षीय किशोर ने खुद को। पर सबकुछ ठीक-ठीक समझ पाना, जिन्दा रहने जैसा ही मुश्किल होता जा रहा था उसके लिए।
बड़े-बड़े सशक्त पेड़ और इमारतों ही नहीं, बख्तरबन्द सूरमाओं तक को धाराशायी होते देख चुका था वह पिछले कुछ घंटों में ही। ऐसे काले धुंए से निकला था, जो इमारतें ही नहीं, आत्मा तक को झुलसा देता है। माँ के चेहरे का एक पिलपिले टमाटर सा एक ही गोली में फटकर उसकी फटी आँखों के आगे बिखर जाना.. आँखें खुद ही तो बंद हो गई थीं उसकी। भाई की तरफ तो देख तक नहीं पाया था … धांय धांय दो और गोलियों की आवाज कान तक पहुँची ही थीं और खुद भी तो अचेत हो गया था वह।
अपनों के नाम पर आँख के कांपते पानी में चंद सूखे पत्तों सी अटकी यादें थीं, बस्स।
जब अपना कोई है ही नहीं, तो फिर क्या फायदा सोचने से भी,…मुरदों की मदद नहीं की जा सकती। भागना होगा उसे तो, जान बचाने को, पीछे छूटी यादों से, अपने देश से, मुर्दों की डरावनी बस्ती से।
अब कोई घर या देश नहीं उसका। शरणार्थी है वह। खबरों में देखे, सुने और लिजलिजे व मजबूर उस शरणार्थी शब्द का अर्थ ही नहीं, दर्द भी महसूस कर पा रहा था वह, वह भी बारह वर्ष की नाजुक उम्र में और एक ही दिन में।
जब उसका कोई घर ही नहीं, तो फिर कैसा देश और कैसी देशभक्ति!
जिसने शरण दे दी, वही आका और माई-बाप !
पर क्या मान लेगा मन यूँ आसानी से किसी को भी माई-बाप!
फिर क्या मात्र मानने से बन जाते हैं माँ-बाप । उसने तो किसी शाख से झरे फूल को वापस पेड़ पर खिलते नहीं देखा। रोकना चाहा तो भी नहीं रुक रहा था उसका सिर, पागलों की तरह हिले ही जा रहा था अपनी ही धुन और जिद में। वैसे ही जैसे कि कंधे से झूलते दोनों हाथ भागते पैरों के साथ कोई तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे।
धीरे-धीरे उसका भय अब निराशा का रूप ले चुका था, पर यह कैसे होने दे सकता था सरगे अपने साथ! यह तो हार थी, उसकी भी और उसके सपनों की भी।
भागने की गति और तेज कर दी। हवा पाकर तुरंत ही लावा से धधकते अक्रोश में बदल गई सारी उदासी। विद्रोह के बीजों को कांटों की खेप में पनपते पल न लगा। सुन्न पड़ते मन और मस्तिष्क को चीरते और चेताते-से वे आगे को धकेलते ही चले गए।
पर मस्तिष्क की गति पैरों से अधिक तेज थी, सायद। सोच रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी- अभी कल की ही तो बात है जब सबकुछ ठीक था। साधारण और आम था उसके परिवार में भी और मन में भी।
बातें जरूर हो रही थीं पर किसी को विश्वास नहीं था कि ऐसा भी होगा या हो सकता है। जिसपर उन्हें नाज था वह घर कोई भी आकर खंडहर कर देगा, पूरे खूबसूरत शहर को मुर्दों के शहर में पलटते देर न लगेगी । दूसरों की जिन्दगी से खेलने की इतनी ताकत तो किसी के पास नहीं होनी चाहिए। आखिर क्यों देते हैं ये अधिकार हम इन्हें!
माना, मुरदे हमला नहीं करते ,डराते नहीं, पर बन्दूक धारी सैनिक निश्चय ही डरा रहे थे उसे । औल्गा ने तो आँख उठाकर देखा भर ही था कि मार गिराया था उन्होंने , वहीं सैकड़ों भयभीत आँखों के आगे बीच सड़क पर ही। 14 का ही तो था भाई, अगर दो साल और बड़ा होता तो उसे भी बन्दूक मिल जाती! परन्तु तब भी क्या वह उनकी और खुद अपनी भी रक्षा कर भी पाता उन यमदूतों से?
अब तो ये सवाल तक व्यर्थ थे और उनके अनुमान और भी अधिक डरावने ।
फिर भी आस नहीं टूटी थी उसकी ।
हर सैनिक टुकड़ी में झुकी और चोर आँखों से वह औलिविया आन्टी से लेकर निकोलाव अंकल तक, किसी भी परिचित चेहरों को ढूंढे जा रहा था। कुछ विशेष नहीं तो, एक डबल रोटी के टुकड़े की आस तो थी ही उसे, ताकि डरे पैरों में थोड़ी जान तो आए और थोड़ी और तेजी से भाग सके वह। कोई असंभव बात नहीं थी यह। खुद मां ने भी तो रोते विदेशी फौजी की परिवार से अपने मोबाइल पर बात करवाई ही थी, आखिर ।
परिचित और रिश्तेदारों से भरा पड़ा है इनका देश। अलग कब थे ये उनसे …कितनी भी धमकी दें , पड़ोसी हमला नहीं करेगा। भाई-भाई हैं- यही तो कह रहे थे घर में और अड़ोस-पड़ोस में सभी।
आम इतवार की दोपहर थी । खाना-पीना निबटाकर ताश खेल रहे थे मिल-बैठकर, जब पहली बार वह डारावना सायरन बजा था। पर हाथ की बाजी मिटा नहीं पाया था वह। दो-दो जोकर आए थे उसके पास। फूला नहीं समा रहा था मन-ही-मन। इन सायरनों का क्या – बस एक ड्रिल ही तो। और जोकरों का होना तो एक ताकत है । कुछ भी बन सकते हैं ये, बादशाह के संग बादशाह और गुलाम के संग गुलाम। किसी को भी जिता और हरा सकते हैं। खुश था वह। पर अब नहीं, क्योंकि जोकरों की असलियत और क्रूरता दोनों ही समझ और देख चुका है। साधु तो कभी राक्षस बनकर यही तो शुरु करते और करवाते हैं हर लड़ाई । कहीं हथियार बेचने को, तो कभी आजमाने को। अचानक ही ताश की गड्डी के जोकरों की शकल दोनों लड़ते देशों के नेताओं के चेहरे में तब्दील हो गई। नेता जो देशभक्ति के नाम पर मासूमों को बेघर कर रहे थे, अकाल मृत्यु दे रहे थे। बस अपनी बात मनवाने के लिए। वह भी तो एक आम दुक्की-तिक्की ही है इस पूरे खेल में. जिसका कोई अस्तित्व नहीं। मौत के मुंह में झुंकना, बस यही तो उन जैसों की नियति भी और बेबसी भी।
उसके पैरों की गति अपने आप तेज होती चली गई। करीब-करीब दौड़ रहा था वह अब। यूँ बेवजह ही अपनी कुर्बानी नहीं देना चाहता था ।
मां की निष्प्राण आँखें बना चांद अभी भी टकटकी लगाए उसे ही देखे जा रहा था और तब चांद से लिपटा वह काले बादल का टुकड़ा खून के उस बदनुमा धब्बे-सा लगा उसे, जो मां के इर्द गिर्द ही नहीं, सड़क के किनारे और इधर-उधर पड़ी लाशों के निकट भी जमा देखा था उसने। तो क्या यह चांद कुछ कहना चाहता है? कुछ भी तो समझ में नहीं आ रहा था। मां कहती थीं जब बड़ा होगा, सब समझ जाएगा- पर यह इन्तजार घातक था अब। बीचबीच में बहुत दूर से, या अपनी ही जगह पर जमे-थमे चांद से या फिर खुद ऊँची फुनगियों पर से, कौन जाने, शायद खुद उसके अपने गले से ही , उल्लू जैसी एक टुहू टुहू की डरावनी धुकधुकी सुनाई देने लग जाती और तब उसके दौड़ते पैर थम जाते। हाथ में पकड़े रूमाल को थोड़ा और गले में पीछे को धकेल देता वह। चाल और भी तेज हो जाती उसकी। नहीं चाहता था वह कि कोई उसे ढूंढे, या फिर औली की तरह गोली मार दे। पता नहीं दोस्त या दुश्मन, कहाँ के सैनिक थे वे, जिन्होंने ढाल बनाकर दुश्मन के आगे खड़ा कर दिया था उसे , यह सोचकर कि बच्चे पर तो गोली नहीं ही चलाएगा कोई. परन्तु गोली चली थी और दोनों ही तरफ से चली थी।
दो ही ठाँय-ठाँय में तीनों ढेर होकर गिर पड़े थे। उसके पैरों से भी खून बह रहा था। पर उसे गोली नहीं लगी थी। लग सकती थी, पर। और अपने इसी भय से तो दूर भाग रहा था वह। फिर भी साथ-साथ ही तो चल रहा था यह, बिछड़े माँ-बाप और भाई की यादों की तरह ही। पर मुरदों के लिए तो कुछ भी नहीं किया जा सकता, ना ही उन्हें कोई शिकायत ही होती, फिर ये लगातार के आंसू क्यों? लड़की तो नहीं वह ।
हैलमेट पहने बन्दूक थामे खड़ा सेनिक, जिसने मां पर गोली दागी थी, उसके लिए भी अदना सा वह कितना महत्वहीन रहा होगा, तभी तो पलटकर देखा तक नहीं उसे, छोड़ दिया यूँ ही मरा या अधमरा समझकर। या फिर जैसे बेआवाज हाथ से छूटे गीले कपड़ों के ढेर-सा धप् औंधे मुंह गिरा था वह, उन्हें लगा होगा कि खतम तीनों । पर ऐसा कैसे हो सकता था? किसी को तो बचना ही था परिवार में। बन्दूक हाथ में लेकर जाने से पहले माथे को चूमकर यही तो कहा था पापा ने-जाओ तुम तीनों यहाँ से दूर चले जाओ, मेरी खातिर। किसी शान्त और खुशहाल धरती पर जाकर रहना, फलना-फूलना। यह तो अब बस युद्धभूमि है और युद्धभूमि में गिद्ध ही जी पाते हैं, इन्सान नहीं। मौत की यह भयावह महक अब उसे भी तो बेचैन कर रही थी और वह भाग रहा था, अकेला ही, कैसे भी छुपता-छुपाता, इस सबसे दूर ।
हाथ के रूमाल को उसने मुंह में ठूंस लिया था, ताकि कोई आवाज बाहर ना निकले। रोने की भी नहीं। पर पैर के नीचे आते इन सूखे पत्तों को कैसे शांत करे- उम्र से पहले ही बड़ा और समझदार हो गया था वह और वह भी मात्र एक ही दिन में।
चाहे घनी झाड़ियों वाले जंगल के रास्ते से आगे बढ़े या फिर खुली सड़क से, डर तो दोनों ही तरफ था।
जंगल में अगर शेर-चीते थे, तो खुली सड़क पर बम बारूद से भरे टैंक। जिनपे सवार यम से सैनिक किसी पर भी गोली चला सकते थे। कौन ज्यादा खतरनाक है जान पाना मुश्किल था और उनसे बच पाना और भी मुश्किल। पर हारेगा नहीं वह, लाशों पर से उठकर, उन पर चलकर ही तो यहाँ तक पहुँचा है – फिर अब डर किस बात का!
सूखे पत्तों की किचिर-किचिर दूरतक सुनाई न दे इसलिए जूते उतारकर हाथों में ले लिए उसने।
पर फेंके नहीं पाया। फेंक ही नहीं सकता वह तो कुछ भी। एक फूटी कौड़ी तक नहीं थी जेब में और नहीं जानता कि कब और कैसे कमाने लायक होगा, कभी होगा भी या नहीं!
थका चांद पेड़ की एक डाल पर उलटा लटका अब सुस्ताने लगा था, पर वह नहीं।
आँखें अभी भी सड़क पर ही गड़ी हुई थी और उलटे लटके चांद की उसपर। मानो एक आँख रख रहा हो कि भटक न जाए वह अपने लक्ष से! पर जब बमों से उठते बादलों के धुँए से नहीं डरा-भटका, तो जंगल के अंधेरे और सूनेपन से कैसे डर सकता था वह भला!… उसे अपने इस भीषण दुख और क्षोभ के पल में भी हंसी आ गई बुद्धू चांद पर। पर चांद तो ठहरा चांद, टौर्च-सी लिए आगे-आगे चलता ही रहा, अपनेपन का, संग होने का अहसास देता। याद दिलाता, कि जरूरी है कि वह थककर हारे नहीं। क्योंकि उसका जिन्दा रहना बहुत जरूरी है। माँ की खातिर, देश की खातिर। जैसे कुछ बीज बचे रहते हैं पतझर में, बसंत की खातिर।
पर वह तो अब अपनी भूख और थकान में देश, माँ, सब को ही भूलने-सा लगा था। भूलने नहीं तो चिढ़ने तो अवश्य ही लगा था। ये नेता खुद तो कितनी सुरक्षा में रहते हैं और उसके जैसों को यूँ…पर, इतनी जिद तो बच्चे भी नहीं करते।,,,
आंखें बन्द हुई जा रही थीं उसकी। पर जगे रहना, चलते रहना जरूरी था उसके लिए।
जगे रहने के प्रयास में जोर-जोर से कुछ गाना चाहा उसने -ट्विंकल -ट्विंकल लिटल स्टार जैसा अगड़म बगड़म- कुछ भी । पर मुंह में ठुंसे रूमाल की वजह से एक शब्द बाहर न निकला। हिम्मत ही नहीं बची थी । मौत को दावत देने जैसी बात थी यह भी तो। तेज चूहे सा सरपट-सरपट बस दौड़ता ही रहा वह, वह भी निशब्द। पहले जब ऐसा करता था तो मां प्यार से जोकर कहकर मुस्कुराती थीं। और अच्छा लगता था उसे माँ का दिया यह जोकर नाम। पर अब वह किसी के हाथ का जोकर नहीं बनेगा- मां का भी नहीं।
अब गिरा, तब गिरा, कैसे भी घसीटता गया वह खुद को , जाने कितने घंटे और कबतक।
अचानक ही रात का अंधेरा फक् उजाले में पलट गया। जादू का पल था वह । सुबह सात के पहले तो कभी उठा ही नहीं। फूल, चिड़िया, इधर-उधर देखता रहा। मन बहलाने की कोशिश करता रहा पर भूख अब खुद मौत बनकर निगलने को तैयार खड़ी थी। एक और नया व दुखदायी अनुभव था, यह भी।
अचानक ही पास से कुत्तों के भोंकने की आवाज सुनाई देने लगी। आदमियों की चहलपहल और बातचीत की भी। तम्बुओं का शहर सा बिखरा पड़ा था उसकी भयभीत और विस्मित आँखों के आगे। राहत-सी मिली उसे और थोड़ा कौतुक भी जगा, तो लड़खड़ाते पैर स्वतः ही उस ओर मुड़ गए। कई बूढ़े बच्चे बैठे थे वहाँ, पर सभी बेघर और उदास, कुछेक थोड़े बहुत सामान से लंदे-फंदे तो कुछ बस भय और उम्मीद से। -सभी शरणार्थी -यह शरणार्थी शब्द बारबार ही उसकी जुबां पर आ-जा रहा था और परेशान कर रहा था उसे। डरा भी रहा था।
अचानक किसीने हाथ बढ़ाकर किनारे पड़े स्टूल को खींचा और उसे अपने पास बिठा लिया।
अब कोई डरो मत कह रहा था तो कोई सिर पर हाथ फेर रहा था । किसीने एक गिलास ठंडा पानी पकड़ा दिया , तो किसी ने गरम सूप सामने लाकर रख दिया, वह भी ताजी महकती गरम-गरम पाव के साथ। पडोसी देश के स्वयंसेवी थे ये, जिससे जो बन पड़े मदद कर रहे थे। मानवता मरी नहीं थी अभी, बमों से भी नहीं।
अनाथ की आँखों में आंसू आ गए।
पर लाचार, गली का कुत्ता तो नहीं वह, जो बर्तन देखते ही दुम हिलाए और लपलप चाटने लग जाए।
प्यार भरी मनुहार सुनते ही एक दबी रुलाई विकराल रूप लेकर फूट पड़ी बेबस भिंचे होठों से।
सरगे क्रोश्चेनौफ था वह, मशहूर हृदयविशेषज्ञ डॉ. दिमित्रिस क्रौश्चेनौफ का बेटा। पिता को कई-कई उम्मीदें थीं उससे, जो शरणार्थियों के कैंप में पलने-बढ़ने वाली असहाय तो हरगिज ही नहीं थीं।
पहले आभार देना चाहता था वह। जाने कितनों की जान बचा रहे थे ये खुद अपनी जान को खतरे में डालकर। मदद करेगा वह भी इनकी, अगर जिन्दा रहा तो, अगर भगवान ने इस लायक बनाया, तो।
पता नहीं थकान का असर था या भावनाओं के आवेग का रुलाई के साथ एक हिचकी-सी उठी और मुंह में ठुंसा रूमाल दूर जा गिरा। अब वह बांध से छूटी नदी की तरह उफन-उफनकर रो रहा था। आसपास के लोग तरह-तरह से सांन्त्वना दे रहे थे, परन्तु कोई भी संभाल नहीं पाया- दुख और दर्द का मानो दौरा पड़ चुका था उसे।
कोई कहता-छोटा ही तो है, जाने क्या-क्या दुख देखा और भुगता है बेचारे ने…बात तो सही ही थी। पर आधी-अधूरी। किसी ने यह भी तो नहीं कहा कि वे हर ताश की गड्डी से जोकरों का अस्तित्व ही हटा देंगे, जिनकी वजह से, जिनकी जिद से, साधारण पत्तों की न तो कोई औकात रह जाती है और ना ही कोई वजूद। …दया ममता से दर्द मिटा पाना तो बहुत दूर की बात थी अब तो वह खुद को बहला तक नहीं पा रहा था। चुपचाप अपने ही गिरते आँसुओं से नमकीन हुआ सूप गटागट एक ही सांस में पी गया।
पता था कई आँखें उसपर ही थीं और निराश लोगों को और निराश नहीं करना चाहता था वह।
… सड़क की दूसरी तरफ युवाओं की लाइन लगी हुई थी, जो अपना नाम लिखवा रहे थे सेना में भरती होने के लिए। किसी के लिए भी लड़ सकते हैं ये… पैसों के लिए, गुस्सा शांत करने के लिए। शौर्य दिखाने के लिए। किसी इन्सान किसी देश, किसी के नही ये । इनकी वफादारी, इनका जुड़ाव और जबावदेही किसी से नहीं। खुद से भी नहीं। बेपैंदी के लोटे हैं, इनकी लड़ाई तो छोड़ो, शिकायत या दोस्ती और दुश्मनी तक किसी से नहीं।
लड़ाइयाँ कोई नहीं चाहता फिर भी लड़ाइयाँ होती हैं अपने निरर्थक और भयानक परिणामों के साथ। क्योंकि किसी का अहँ बड़ा हो जाता है , तो किसी का लालच। कौन रोकेगा इन्हें पर? नहीं चाहिए यह ताकत और शौर्य की जंग किसी को!
जोकर नहीं बनना चाहता वह। बचना और बचाना चाहता है वह तो, खुद को भी और दुनिया को भी ताकत और अहं के बीच उलझी बेवजह की इस तबाही से। कितने मर रहे हैं, मरेंगे, नही मरे तो भटकेंगे, गिनती ही नहीं अब तो।
उठकर अपने आँसू पोंछ लिए उसने- युद्ध तोड़ता ही नहीं, जोड़ता भी तो है । आंसू बहते हैं तो पोंछने वाले भी तो पैदा हो ही जाते है। जुड़े रहकर ही जीता जा सकता है इसे। वह भी तो पलायन नहीं, जुड़े रहना ही चाहता है, समाज से, देश से, अपनों से, अपने परिवार से। एक साधारण सी आम जिन्दगी के हर छोटे-बड़े सुख-दुख से। एक जिम्मेदार नागरिक और इन्सान है वह अपने देश और समाज का! पर कैसे, क्या कभी कुछ कर भी पाएगा वह ?
वाकई में कुछ भी तो समझ में नहीं आ रहा था उसके , जैसे कि उसे बहलाने -फुसलाने वालों को, कि कैसे चुप करायें उसे!
बुद्ध नहीं, एक प्रबुद्ध चाहिए था उस वक्त वहाँ पर,क्योंकि न तो उसके बहते आंसू ही थम रहे थे और ना ही पलट-पलटकर युद्धभूमि से आती वे वीभत्स, डरावनी खबरें ही ।…

शैल अग्रवाल
सटन कोल्डफील्ड, यू.के.

आणविक संकेतः shailagrawal@hotmail.com
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