
सुबह-सुबह ही निकल जाते थे एहसान मियाँ शेख की बकरियों लेकर और सूरज चढ़ने के पहले लौट भी आते। एवज में इतना मिल जाता था जितना उन्होंने सोचा भी नहीं था। आराम से जिन्दगी कट रही थी और रोज का ही नियम बन चुका था यह उनका। पर जाने क्यों उस दिन बकरियाँ भी भटक रही थीं और खुद उनके अपने खयाल भी।
असह्य धूप थी । सांय-सांय करती तेज गरम हवा चल रही थी मानो कोई प्रेतनी विलाप कर रही हो, बिल्कुल सुबह के उस वाकए की तरह ही। पर प्रचंड औऱ सिर से पैर तक झुलसाती लू के थपेड़ों में भी होश नहीं खोया था उन्होंने। घंटों बुत-से बेमतलब खड़े अवश्य रहे थे उसी तपन में।
‘आसान कहां इन मुल्कों में रहना-बसना भी? कागज के खोके ही तो हैं हम, जबतक झालमुड़ी से भरे हुए तभी तक काम के, खाली होते ही कूडे के ढेर पर…फिर काहे की हाय-हाय… ‘दार्शनिक हो चला था वह अबतक और आँखों से आंसू भी जबरन ही बहे जा रहे थे । चोट गहरी थी और शिझा व पूरे संस्कारों पर थी। दृढ़ता से आंसू पोंछकर तब खुद को संभालने की कोशिश की,’ जरूरत ही क्या है इस सबकी? जड़ें पैसा नहीं, माटी मांगती हैं, प्यार और परवाह चाहती हैं, वह भी ऐसा जो रास आए। अपना या अपनों-सा ही हो माहौल। यह माटी ही तो पालती-पोसती है, गुण और संस्कार देती है?’
अठ्ठारह वर्षीय किशोर अब उस दिन को कोस रहा था जिस दिन वह अपनी खुशहाल जिन्दगी छोड़कर पैसों के लालच में यहाँ आ बसा था। ज्यादा वक्त नहीं हुआ था अभी, पर मन उखड़ चुका था उसका अब इस जगह से और फिर कुछ अनिष्ट का आभास बनकर भी तो बेचैन कर रहा था सुबह से ही…
पिछले इन नौ दस महीनों में आए दिन ही, करीब-करीब हर जुमे को चौक में सिर कटने की खबरें पढ़ी हैं और उठाई-गिरी के मामलों में किसी-न-किसी के हाथ कटने की खबर तो कोई नई बात ही नहीं। कितनों को मिलती है यह सजा जायज नाजायज, कोई गिनती ही नहीं इसकी तो….आरोप का सही गलत होना भी कोई मायने नहीं रखता इन सजाओं में। गलत भी हमेशा वही होता है, जो बाहर से आकर बसा है अमीरी के सपने देखता या फिर किसी मजबूरी या भुलावे में आकर ऐसा कर बैठता है। पर सारी गलती हमेशा उसकी ही तो रहती है, जो यूँ अपना वतन छोड़ा , औरों को अपनाया, उनपर भरोसा किया, फिर शेख तो कभी गलत होते ही नहीं ?’
आक्रोश और दुख से धधक रहा था वह और बेबस परिस्थितियों का वह मकड़जाल दमघोटू हो चला था उसके लिए ।
‘आप ही बताओ, मैं क्या करता, कैसे धोखा देता उसे जिसके साथ अभी सगाई की है, सुख-दुख में और जीवनभर साथ रहने का कौल लिया है? इतना गिरा-पड़ा भी तो नहीं हूँ कि बात की कद्र ही ना हो ! कैसे कहीं भी और किसी पर भी फिसल जाऊँ…आखिर इनसान हूँ, जानवर तो नहीं? नहीं, नहीं मान सकता मैं उनकी यह घिनौनी फरमाइश!
छी…बकरियाँ चराता हूँ , रूह तो गिरवी नहीं रख दी उनके पास!‘
गुलाबो ने तब ठंडा शरबत का गिलास हाथ में देकर कहा, ‘आराम से बैठकर बताओ, क्या हुआ था?
‘कुछ नहीं। हर दिन थोड़ा घर का काम करवा लेती थीं, थोड़ा घर का काम करवा लेती थीं मालकिन फिर एकदिन अचानक ही मुझसे बोलीं,कि इधर आ, सुन मेरी एक बात सुन, कमरा दूंगी यहीं रह जा, मैं तुझसे निकाह करने को नहीं कह रही , बस मौज-मजे के लिए कभी-कभी मेरे पास आ जाया करना…बोल, कबूल कहता है तो कानोंकान खबर नहीं होने दूंगी किसी को मैं इस बात की और तेरी भी जिन्दगी सुधर जाएगी। यह बदन यूँ धूप में तपने को तो नहीं?‘
सुनते ही सकते में था मैं, जमीन में गड़ गया था।
बीस साल बड़ी हैं मुझसे। अम्मी जैसी इज्जत करता था … उनके ही मुँह से ऐसी घटिया बात? इतनी बेहूदी हरकत! कुछ तो लिहाज करतीं अपनी और मेरी उम्र का…अकेला पाते ही अब भी बस वही जिद जारी है लगातार,‘क्या सोचा, कुछ सोचा भी या नहीं ?’ अब आप ही बताओ, क्या सोचूँ, जब कि मुमकिन ही नहीं यह सब मेरे लिए। अब तो उनके सामने तक जाने में खौफजदा महसूस करता हूँ। और आज तो एक नई ही धमकी भी दे दी। सुबह-सुबह ही बोली थीं, ‘रात भर सोई नहीं हूँ, तेरे ही ख्वाब आते रहे हैं। मेरी ख्वाइश पूरी कर, वरना और भी तरीके आते हैं अपनी बात मनवाने के हमें। खुश किस्मत है कि भा गया है, वरना तेरे जैसों की औकात ही क्या!‘
बोलते हुए भी एहसान भय से थरथर कांप रहा था और गुसाबो उसे चुप खडी एकटक देख रही थी। एक टूटे पुल-सी चुप्पी फैल गई थी अब उन दोनों के बीच, चुप्पी जो टूटकर भी दोनों किनारों से जुड़ी रह जाती है। पर न तो गुलाबो ही कुछ समझ ही पा रही थी कि अगला कदम क्या हो या क्या होना चाहिए और ना एहसान ही?
वह तो साफ-साफ कह तक नहीं पा रहा था कि क्या हुआ था उसके साथ, कितनी घिनौनी और लोलुप थीं मालकिन की आँखें उसे पूरा ही नंगा करती-सी।
शराफत ने मानो ताले लगा रखे थे उसकी जुबां पर…
‘क्या करोगी आप मेरे साथ?’ पूछने पर दोबारा आँखें तरेरकर बोली थीं, ‘याद है हफ्ते पहले करीम का सिर जो चौराहे पर सरेआम धड़ से अलग हुआ था। मेरी ही एक सहेली ने शिकायत की थी, क्योंकि वह भी बहुत ऐंठता था और बात नहीं मानता था हमारी।‘
‘बहुत डर लग रहा है मुझे। वतन वापस जाना चाहता हूँ, बस। मुझे नहीं चाहिएँ पैसे और यह नौकरी भी। इन नौ ही महीने में मक्का-मदीना सब हो गए मेरे तो। मदद करो मेरी खालाजान। बाहर निकालो मुझे यहाँ से।‘
फूट-फूटकर रोता किशोर गुलाबो के पैरों पर पड़ा अपने आंसुओं से पैर धो रहा था उसके और मुरझाते गुलाब-सा ही गुलाबो के चेहरे का भी पूरा रंग भी उड़ चुका था अबतक।
इनसान ही इनसान की मदद करता है पर इनसान भगवान भी तो नहीं! जानती थी वह ।
तुरंत उठाकर सीने से लगा लिया उसने तड़पते-बिलखते मासूम को और दृढ़ता से उसके आंसू पोंछते हुए बोली,
‘इसके पहले कि कोई कयामत बरपे, यहाँ से महफूज निकालना ही होगा तुम्हे। फिकर मत करो पर । अल्लाह मियाँ कोई-न-कोई राह जरूर ही दिखाएँगे।‘
कह तो दिया परन्तु अब नेकी कर दरिया में डालने वाली गुलाबो की आँखों की नींद भी उड़ चुकी थी। रात भर बस एक उधेड़-बुन-सी ही चलती रही दिमाग में। कितने जोश से पड़ोस के रहीम चाचा के इकलौते और जहीन शहजादे को अपना भतीजा कहकर लाई थी वह अलीगंज से यहाँ पर, वह भी यह कहकर कि इन्सान बनाकर ही लौटाएगी उन्हें बेटा, वह भी अगले पांच साल में ही-‘चंदा-सी दुल्हन और अपनी पक्की कोठी न हो तब कहना आप, चचाजान !’
कोठी की कौन कहे अब तो सही-सलामत वापस उन तक पहुँच जाए यही बहुत होगा।
एक नई ही बिसात बिछी दिख रही थी,जिसमें राजा न सही तो रानी के अगाड़ी भी था एहसान और घोड़ी की दुल्लत्ती खाने को उसके पिछाड़ी भी। अभी तक तो कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी, पर न करे खुदा अगर ऐसी कोई सच्ची-झूठी बदचलनी की शिकायत लिखवा दी गई, तो फिर तो कोई सुनवाई ही नहीं थी यहाँ। खास करके बाहर से आकर बसे और उन जैसे लोगों के लिए तो नहीं ही। शेख, मौलवी सब मिले होते हैं। मौत ही बस एकतरफा रास्ता रह जाती है फिर तो।…
और अठ्ठारह वर्ष की उम्र वाकई में बहुत छोटी है इस निरर्थक और दारुण सजा के लिए। जानतक के लाले दिख रहे थे और वक्त नहीं था ज्यादा गुनने-बुनने तक को।
तभी फुदकती सुरैया आई और ‘अम्मी’ कहकर लिपट गई उससे।
पर ध्यान नहीं गया गुलाबो का बेटी पर भी । दिमाग रौकेट की चाल से पूरे कायनात की परिक्रमा दे रहा था उस वक्त- क्या करे, कैसे करे,पर कुछ सोच नहीं पा रही थी वह उस वक्त। वापस भेजने का अर्थ था -सब कुछ हलाल और हर सपने का खातमा और यह फैसला आँखों में भविष्य के सपनों का धराशायी खंडहर बनकर किरक रहा था।
जल्दी में कोई कदम नहीं लेना चाहती थी वह, पर यहाँ रहने में एहसान के लिए खतरे-ही-खतरे थे। मालकिन की नजर पड़ चुकी थी उसके तीखे नाकनक्श और सुगढ़ व युवा शरीर पर। पालतू बनाना चाहती थी वह उसे हवस मिटाने को…खिलौने की तरह इस्तेमाल करना चाहती थी उसका। पहले शेख और राजे हिजड़ों को ही रखते थे हरम में पर अब तो …और इसका अर्थ क्या होता है भलीभांति जानती थी गुलाबो। बात मान ली तो जिन्दगी नरक, शरीर बीमारियों का घर और नहीं मानो तो बीच चौराहे पर सर धड़ से अलग। फिर तो बोरी में बन्द होकर ही वतन को वापसी। नहीं ऐसा नहीं होने देगी वह, उमर ही क्या है अभी इसकी!…
अगले दिन बेटी सुरैया को भी भेज दिया एहसान के साथ मालकिन की बकरियाँ चराने।
सुरैया की पिछले हफ्ते ही एहसान के साथ सगाई की थी उसने और अगले महीने खूब धूमधाम के साथ अलीगंज जाकर दोनों की शादी करने का भी इरादा था उसका। मिठाई का डिब्बा तो मालकिन के यहाँ भी भेजा ही था उसने?
शायद दोनों को साथ-साथ देखकर मालकिन के तेवर कुछ नरम हों जाएँ!
पर पासा बिल्कुल ही उलटा पड़ा।
हालात और बिगड़ गए।
अब तो सुरैया भी खटकने लगी थी उनकी आँखों में।
बात-बात पर डांटती और छिड़कतीं। एहसान के साथ जाने के बजाय घर पर ही रोक लेतीं । झाड़ू पोंछा सब करवाती और फिर भी अगर समय बचता तो अपने हाथ-पैरों की मालिश के लिए बिठा लेतीं।
गुलाबो को जब पता चला पूरी बात का तो उलझन कम होने के बजाय और बढ़ गई।
सारी खुशियाँ ही दांव पर लग चुकी थीं अब तो उसकी।
कोई बड़ी मिल्कियत नहीं थी यहां पर। सब्जी का ठेला लगाता था शौहर। पर काम जमा-जमाया था और इतनी आमदनी हो जाती थी कि वतन में भी पक्का घर बनवा चुकी थी गुलाबो और यहाँ भी कोई कमी नहीं थी खाने-पीने की। फिर…? फैसला कठिन था और संयम व हिम्मत मांगता था। पर उन्ही के भले के लिए था और जरूरी भी था। जिन्दगी की बखिया पूरी उखड़े इसके पहले ही हर ढीले और टूटे टांके को संभालना था , सो रख लिया मन पर पत्थर। बिल्कुल तैनात फौजी की तरह ही ज्यादा वक्त नहीं लगा उसे सोचने और करने में भी। समझदार ही नहीं बहादुर भी थी गुलाबो।
अगले दिन ही खरबूजे तरबूजे लेने जाना था खाविंद को। मदद के लिए उसने एहसान और सुरैया को भी भेजने का फैसला लिया।
चलते समय जब अपनी करीब-करीब सारी जमा-पूंजी ही बच्चों को सौंपी, तो दोनों के साथ-साथ शौहर की आँखों में भी कई सवाल थे। पर गुलाबो ने आँखें नीचीं करके भीगी पलकें पोंछ लीं। कुछ नहीं समझाया या बताया उन्हें उस वक्त।
‘दोनों देशों के बीच बना यह पुल रोज के छोटे-मोटे हम जैसे व्यापारियों के लिए अल्लाह की दुआ-सा ही है। जोड़ दिया है दोनों मुल्कों को भी और इनसानों को भी। संभल कर जाना, अल्लाह मियाँ तुम्हारा साथ दें।’
कहकर बस दरवाजा भेड़ लिया।
अब उन तीनों के सीने में तो धुकधुकी थी। गुलाबो की सांसें भी धौंकनी सी-ही चल रही थीं। घड़ा भर पानी पीकर चुपचाप बिस्तर पर जा पड़ी। फिर न कुछ खाया ही गया उससे ना पिया ही।
उधर जैसे ही वो तीनों उस पार पहुँचे, भूख लग आई और कुछ और करने के पहले खाना खाने की सोचने लगे। पर डिब्बा खोलते ही तो तीनों के होश ही उड़ गए। खाने के साथ-साथ चिठ्ठी भी थी। और चिट्ठी भी ऐसी वैसी नहीं, पूरी खतरे की घंटी जैसी, जिसमें साफ-साफ लिखा था कि पहली ही उड़ान से छोड़ दो देश। वापस नहीं लौटना उन्हें।
जाल बिछ चुका है यहाँ पर और सुरक्षित जगह नहीं रही है यह। बाज की नजर है उनपर और शिकारी ने भी अपने दाने फेंक रखे हैं।
और हाँ, चिठ्ठी पढ़ते ही नष्ट कर देना। संभव हो तो निगल ही लेना इसे भी बांटकर पानी के साथ। ताकि कोई सबूत ना बचे। बुरे वक्त में दीवारों के भी कान हो जाते हैं और निश्चित ही बुरा वक्त चल रहा है यह हमारा। मुझसे राफ्ता करने की कोशिश भी मत करना और ना ही पुराने शहर या पते पर जाकर रहना ही तुम लोग।
जल्दी-से-जल्दी मैं भी आती हूँ और खुद आकर फोन करूंगी। मेरा इन्तजार करना। मेरा यहाँ रुकना इसलिए जरूरी था कि किसी को शक न हो। मेरी फिक्र मत करना। शीघ्र ही मिलती हूँ आकर और अगर ना भी आ पाई तो तुम सबकी खुशी में ही मेरी खुशी है। तुम्हारे साथ ही हंस जी लूंगी मैं, यह मान जानकर कि इतना ही साथ था हमारा और इतनी ही जिन्दगी बख्शी थी अल्लाह मियाँ ने मुझे। कमबख्त इन सांसों का भी तो सभी का अपना-अपना एक निश्चित कोटा ही है आखिर। फिर फिकर किस बात की?
बहुत बहुत दुआओं के साथ तुम सबके साथ सदा,
तुम्हारी अपनी गुलाबो।’
तीनों भौंचक से एक-दूसरे को देख रहे थे अब।
सोचने-समझने तक के लिए ज्यादा वक्त नहीं था उनके पास अब। जैसा गुलाबो ने कहा वैसा ही किया तीनों ने और चन्द घंटे बाद ही हैदराबाद के हवाई अड्डे से एक टैक्सी तीनों को नए और अनजाने सफर पर ले जा रही थी।
उधर गुलाबो ने भी तुरंत ही पुलिस में जाकर रपट लिखवा दी कि पति और बच्चे जो कल सुबह के गए हैं शाम होने को आई अभी तक लौटे ही नहीं हैं और उसे बहुत फिक्र हो रही है उनकी। पुलिस मदद करे उसकी और पता लगाए-कहाँ हैं, कैसे हैं?
इसके पहले कि कुछ छान-बीन तक हो पाए रोती-कलपती गुलाबो ने भी अपना सामान बांध लिया था।
जानती थी कि सुरक्षा के लिए वक्त की पुकार यही थी।
खबर मिलते ही शेखनी के तो मानो सारे मंसूबों पर ही पानी फिर गया।
शिकार को ऐसे कैसे भागने दे सकती थी वह?
पुलिस को साथ लेकर तुरंत गुलाबो के घर जा पहुँची।
पर अबतक तो वहाँ पूरी कहानी ही बदल चुकी थी।
‘अदाब साहब, आपतक ही आ रही थी मैं अपनी रपट वापस लेने को। अच्छी खबर यह है कि सुबह-सुबह ही बच्चों का फोन आ गया। बस जरा परेशानी वाली खबर तो है कि अब्बू ठीक नहीं। बच्चे वतन उनके पास पहुँच चुके हैं। अब्बू की तबियत अचानक खराब हो गई थी और हमारे अलावा कोई और नहीं है उनकी देखभाल करने को। मैं भी जा रही हूँ आज ही।’
खिसयानी शेखनी ने भी सुना और देखा सब ।
पर क्या कहती किसी से कि असलियत क्या समझ में आ रही थी उसे सारी इस जल्दबाजी की … खास करके अब, जब परिंदे आजाद थे और निशाना साधने से पहले ही फुर्र भी हो चुके थे!…