कहानी समकालीनः अघोरी-शैल अग्रवाल

बचपन से ही शमशान और कब्रिस्तान के बीच पत्थरों की शैया पर निश्चिंत सोने वाले अनाथ ने मौत में भी बस शांति ही देखी थी… शांति नींद की, शांति अंतिम विश्राम की।

शांति, सहजता और प्रकृति के पुनः पुनः सृजन और विनाश के एक निरंतर और अटूट उस नियम की।

इतने पास से देखा था उसने मौत को कि मौत से डरता नहीं था वह। फिर मन इतना उद्विग्न क्यों था उसका?

‘औलादें ही जब बगावत पर उतर आएँ, छाती पर चढ़कर बम बरसाएँ, तो माँ को तकलीफ़ तो होगी ही! आसान नहीं होता अपनों से ही चोट खाना और फिर उसे भूल पाना!’

काल भैरव की रात थी वह। असंख्यों की यह मौत सहज तो नहीं थी । मक्खी-मच्छरों की तरह मारा जा रहा था इन्सानों को…कैसे विचलित ना होता वह? पंछी तक तो भयभीत घोंसले छोड़ जाने कहाँ जा छुपे थे! पर वह कहाँ जाता, उसने तो दीक्षा ली थी आजीवन यहीं रहने की, जीते-जी ही जीवन-मृत्य से परे जाने की , उन रहस्यों को समझने की!

तीन दिन हो गए पर लाशों का सिलसिला नहीं रुका। ना ही उन आकाश से बरसते बमों का ही । सूरज डूबा नहीं कि बेरहम चालू हो जाता है… इतनी लाशें दफन होते और जलते, वह भी एक साथ, उसने पहले कभी नहीं देखी थीं ।

‘आहत हो चुकी है धरती माँ तन से भी और मन से भी! पर यह धरती जो दया-ममता से सब संभाल लेती है, आँधी-पानी, तूफान, सभी कुछ, सँभाल लेगी इसे भी।’

विश्वास था उसे यह भी।

हिंसा और विध्वंस के इस नृत्य ने वीतरागी की चेतना को सुन्न कर रखा था पर।

ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था अघोरी और ज्यादा सोचता भी नहीं था, पर आज उसकी कनपटियों को रौंदती सोच रुकने का नाम नहीं ले रही थी। संतान ही गहरे घाव दे रही थी माँ के अंग-अंग पर। वह भी आसमान पर चढ़कर नए-नए खिलौनों से अगन बरसाते हुए। आसमान जहाँ से रिमझिम जीवन दायी फुहारें बरसनी चाहिएँ, चांद-तारों से झिलमिल आकाश होता था मीठी नींद सुलाने को, मिसाइल और बम लगातार बरस रहे थे और सायरन का कानफोड़ू शोर भी था साथ में। भयभीत लोग इधर-उधर भाग रहे थे, छुप रहे थे, जहाँ जगह मिल जाए, वहीं…बंकर में, सीढ़ियों के नीचे, मेज़ के नीचे, जैसे कि तूफान के अंदेशे पर भ्रमित पक्षी चीत्कार करते उड़ते हैं इधर-उधर हर दिशा में। चारो तरफ़ गढ़्ढे ही गढ्ढे थे । जहाँ मुरदों के संग कई जिन्दा भी लुढ़के नज़र आ रहे थे। घायलों को अस्पताल ले जाने में सभी मदद कर रहे थे। अघोरी भी। कई जिन्हें वह अस्पताल छोड़कर आया था, रोते-बिलखते रिश्तेदारों के साथ फिर यहीं वापस आ गए थे। कइयों का तो कोई रोने वाला तक नहीं बचा था इस अमानवीय नर संहार में।

उसका जमीन पर पड़ा टेप-रिकौर्डर गा रहा था- ‘रंग महल के दस दरवाजे, ना जाने कौनसी खिड़की खुली थी। सैंया निकल गए मैं ना लड़ी थी’

‘लड़ी क्यों नहीं, रोका क्यों नहीं? जरूरी तो नहीं कि गलती पर ही सजा मिले? ज़्यादातर तो निर्दोष ही मारे जाते हैं इन लड़ाईयों में !’

खुले आसमान के नीचे धरती की गोद में पला बढा वह अनाथ अघोरी बेफिक्र ही जिया था, जैसे कि अन्य जीव जन्तु पल-बढ़ जाते हैं,पर अब तो इस नैसर्गिक विधान में ही उसे बाधा दिख रही थी। न जीवन सहज होगा और ना मौत ही।… खबरों की मानें तो आम आदमी ही पिस रहा था इस अहम और वहम की लड़ाई के बीच। जिन्होंने यह लड़ाई शुरु की और करवाई वह तो बहुत सुरक्षित थे और सदा रहेंगे इस सबसे परे। तन की अगन तो आदमी शीतल करले नदिया में डुबकी लगाकर, पर यह जो नफरत की अगन है, तन मन दोनों को ही झुलसाने लगती है, पूर्ण विनाश कर रही है दुनिया का। जीव-जन्तु, मानुस और पाखर, सभी को तोड़ती-फोड़ती, मिनटों में भस्म किए दे रही है।… कोई अंत ही नहीं दिखता भयभीत करती इस लड़ाई का ?

‘क्यों करता है पर आदमी इस तरह की लड़ाइयाँ? शांति से भी तो सुलझाई जा सकती है हर बात! पाप-पुण्य और सही गलत का तो कोई भेद ही नहीं रहा अब! आदमी के बस का है भी तो नहीं इस जटिल और लालची संहार को रोक पाना ! अच्छा हुआ जो काली माँ खुद ही धरती पर उतर आईं रणभेरी बजाती और हाथों में खप्पर और खड्ग लेकर। लपलप करती जीभ से सब लपकती और निगलती, अत्याचार के हर रक्तबीज को मिटा कर ही दम लेंगी अब तो वह।‘

बगल में ठंडी पड़ी चिलम फिरसे सुलगा ली थी अब अघोरी ने। अकेले-अकेले आख़िर कबतक ख़ुद से ही बात करता रहता वह? वहीं पटिया पर लेटकर सबकुछ भूलकर सोने की भी कोशिश की उसने।

पर चित थिर नहीं था आज उसका।

मिसाइलें आकाश में अभी भी पटाके और फुलझड़ी की तरह ही लगातार फूट रही थीं। इधर की भी और उधर की भी । कुछ तो गिरने से पहले ही नष्ट कर दी जातीं, पर कुछ गिर भी रही थीं, कभी ठीक न होने वाले घाव देतीं। मौत और पीर की गंध को फैलते देर नहीं लगती। आदमी तो आदमी जानवर तक विलाप कर रहे थे अब तो।

उड़ती लपटों के धुँए के साथ मन तक काला हो चला था अब तो उसका।

खबरिया चैनलों की तो पूरी मौज ही आ गई थी मानो। दिन-रात मनचाहा और मन-गढ़ंत, सब कुछ परोसा जा रहा था । संयम और विवेक के बजाय ऊल-जलूल खबरों का ही बोलबाला था चारो तरफ। मानो उन्हें भी बस पटाखे ही फोड़ने थे। मुख्यतः आरोप और प्रत्यारोप ही लगते रहते। बेवजह की ही बहस थीं चौबीस घंटे की। फिर भी भयभीत सभी चिपके बैठे रहते वही सब सुनते और देखते हुए। मानो बम गिरा तो तुरंत ही खबर मिल जाएगी उन्हें और बचा लेंगे कैसे भी वह खुद को जानलेवा उस वार से।

जाने क्यों सूफी भजन और कबीर के दोहे सुनने वाले उसके कान भी तो अब इन खबरों को ही सुनना चाहते थे। दुर्घटना से सावधानी भली, पर कैसी सावधानी और किसकी सावधानी? अपनी बेबसी और अपराध बोध से मुक्त नहीं हो पा रहा था वह और अघोरी सच में चिंतित था, धरती माँ के लिए, इस पर पलते-बढ़ते अपने छोटे-बड़े हर भाई-बन्धु के लिए।

मरघटे में ही रहा था जब से आँख खोली थी, मौत को करीब से जीता और खाता-पीता ही बड़ा हुआ था। सुख-दुख और जीवन मृत्यु से परे और दीन-दुनिया से बेखबर ही था अभी तक तो उसका जीवन। मौत कोई माने नहीं रखती थी? फिर अब इस आसमान से मौत छिड़कती शामों में ही क्या विशेष था, जो इतना विचलित था वह?

एक-आध दुर्घटना और हारी-बीमारी से हुई अकाल मृत्यु को भूल जाएँ, तो शमशान हो या कब्रिस्तान, जो भी आए पूरी जिन्दगी जीकर आए थे, परन्तु इन गिरते बमों से मरने वालों की तो कोई गिनती ही नहीं! कच्चे-पक्के सभी आ रहे थे? मौत नहीं, यह व्यर्थ का विध्वंस डरा रहा था अघोरी को। पूरे कांड की निरर्थकता विचलित कर रही थी। सभ्य कहे जाने वाले मानव की क्रूरता विचलित कर रही थी उसे।

‘मौत तो आनी ही है, पर वक्त पर आए तो ही सही, वरना प्रेत बनकर भटकाती है। पर इस समय तो कुछ सही-गलत था ही नहीं?’

बगल के शमशान में दफनाया गया, खून सने कपड़े लिपटा पूरा परिवार, और इधर भी तो दस-दस चिताएँ एक साथ ही जली थीं। एक ही मिसाइल में बरसों से साथ रहते, लड्डू-सेवियाँ बांटते-खाते दोनों ही घर-परिवार पूर्णतः नष्ट हो गए… बच्चे-बूढ़े सभी। वह भी एक ही पल में। इतना खून खराबा…वह भी धरम के नाम पर? कल की ही तो बात है जब पतलून उतार-उतार कर तसल्ली करने के बाद ही शुरु किया था आतंकियों ने अभागों को गोलियों से भूनना, वह भी भयभीत पत्नियों की याचना करती आँखों के आगे ही? काश्, वक्त की घड़ी वापस घुमाई जा सकती!’

हँस पड़ा था तब अघोरी भी अपनी इस असंभव और बचकानी सोच पर।

समय तो स्वयं महाकाल है, इससे भला कौन जीत पाया है?

चिलम के एक नहीं चार-चार सुड़के लगा चुका था वह अब तक। फिर भी शांत नहीं हो पा रहा था वह।

‘ जाने किस-किस धर्म के रहे होंगे? कितनी जिन्दगी, कितने सपने बाकी थे अभी इनके? क्या फरक पड़ता है पर अब इस सबसे भी ! मुरदों का तो कोई धर्म नहीं होता, सपने भी नहीं होते पत्थर सी जड़ी शून्य आँखों में। लाशें हैं बस। और लाशें कुछ महसूस नहीं करतीं। सच-झूठ नहीं कहतीं। फर्क नहीं पड़ता इन्हें, गाड़ दो या जला दो। कीड़े खा जाएँ या मछली। ताकतवरों का जाल है यह पूरा बस। अपनी ही रोटी सेंकने वालों की अंगीठी का उपला बन जाता है आम आदमी, चाहे धर्म की चाल का मोहरा बने या राजनीति की! एक ढकोसला ही तो है पर यह सब भी? नए समाज का नया चलन! धर्म और देश के ठेकेदार तरह-तरह के दाव-पेंच फेंकते हैं, डराने को, समझाने को। और कई तो सिर्फ अपने हथियार बेचने को। फिर भी समझ में नहीं आए, तो शातिर बन्दूक और बमों से बात करने लग जाते हैं।’

अघोरी अब हाँफने और थकने लगा था फिर भी सोच की धौंकनी उसे चिंता की चिता में ही झोंके जा रही थी।

‘ समझते क्यों नहीं यह कि सब यहीं पर है, हूरें भी और जल्लाद भी। नरक की वह खौलती कढाई भी और चश्मे चमचम भी… सब यहीं! यहीं मिल जाता है एक-एक करम का अच्छा-और बुरा, सारा फल। उपदेश और धमकियों से नहीं चलती दुनिया। सर्वशक्तिमान होने का भ्रम चाहे कितना भी पाल लें, पर ऊपर वाले की ही बनाई है यह दुनिया और रहेगी भी। पर उसका भी कोई अपना संविधान तो होगा ही, कायदे कानून तो रहने ही चाहिएँ?‘

आसमान को तकते-तकते, सोचते-सोचते खुद अपने ही विचारों की उग्रता से उफन चुका था अघोरी। और तब उसे शांत करने को सलोनी, आकर उसके पैरों मे अपना मुंह रगड़ने लगी, तलवे चाटने लगी । अघोरी ने भी तुरंत ही उसे गोदी में उठा लिया। भूखी थी शायद, या फिर हमेशा की ही तरह लाड़ आ रहा था उसपर।

दुनिया भर से वीतराग अघोरी बहुत प्यार करता था अपनी इस जंगली बिल्ली को। जैसे कि वह बिल्ली भी इस जानवरों की तरह ही रहते और जीते अघोरी से । जाने किस जनम का नाता था दोनों के बीच कि बरसों से एक दूसरे का पूरा कुनबा ही बन गए थे दोनों एक दूसरे के लिए। हर सुख-दुख में साथ खड़े। जाड़ा, गरमी, बरसात संग-संग वहीं खुले आसमान के नीचे गुजारते और सहते।

अधजली लाश से नोंचा गोश्त का वह ताजा भुना कौर अपने मुँह से निकालकर उसने बिल्ली के मुंह में डाल दिया और पल में ही लपलप करती गटक भी गई वह सारा । फिर उसकी बाहों में मुँह रगड़ती प्यार से उसकी तरफ देखने लगी, मानो कह रही हो-‘ बस, अब थोड़ा तुम भी खा लो।‘

और बिल्ली को तृप्त देखकर उसका अघोरी भी पूरा तृप्त हो चुका था।

‘ बस, अब तो वह समाधि लगाएगा , ताकि दिमाग को बेरहमी से रौंदते ये घोड़े थोड़े शांत हो पाएं! पर क्या यह संभव भी है यह? नहीं, समाधि नहीं ताण्डव करेगा वह भी अब, जैसा भोले-भंडारी ने किया था, प्रलय काल में।
हाँ, यही ठीक रहेगा।‘

बेचैन मन फिर चीत्कारा ‘ पर कैसे और कब रोक पाएगा मासूमों के इस बेरहम नर-संहार को तेरा यह नाच? सृजन या विध्वंस , कुछ भी तो तेरे बस में नहीं, पागल। सोच अघोरी, कुछ और सोच। यह जिद और घमंड सबसे बड़े कीड़े हैं जो आज के आदमी के अंदर महामारी मचाए हुए हैं। बाहरी कीड़ों से भी ज्यादा खतरनाक, इन बमों से भी ज्यादा विनाशक, मिनटों में घोघला कर देते हैं सभी को।‘

बारबार गरम राख मलता, चिताओं को एकटक घूरता अघोरी पिछले तीन दिन से सोया तक नहीं था…तभी से शायद, जब से यह रण-भेरी शुरु हुई। जात-पात और धरम पूछकर मारे गए मासूम, अपहरित किए गए ।

खबरें थी ही चिता की लपटों-सी ही झुलसाने वाली।…

‘कोई गिनती ही नहीं अत्याचारों की। मानो मानवता ही नहीं। कहीं पर भी और किसी को भी मारा जा रहा है, वह भी बे-सिर-पैर के न्याय के नाम पर? यह भी तो सही नहीं! माना चने के साथ घुन पिसते हैं, पर इनसान तो कीड़े-मकोड़े नही? जाने कितने जनम के बाद मानव योनी मिलती है क्या बस यूँ व्यर्थ होने को?’

मानो भूल चुका था कि वह एक अघोरी है…जीवन मृत्यु से परे की जीवन-शैली जीता और मानता। मृत्यु के पार के रहस्यों को समझना, वह भी जीवन के दलदल में फंसे बगैर ही लक्ष रहा है उसके जीवन का। फिर यह मोहपाश के जाले क्यों जकड़ रहे हैं उसे?

शाम के सात बजते ही दोनों तरफ से सायरन की कानफोड़ू आवाज शुरु हो जाती है और अघोरी की बेचैनी भी। असह्य हो चली है मौत को बेहद पास से देखने वाले अघोरी के लिए भी यह अमानवीय लीला अब तो।

‘अभी तक जो देखे थे उसने, अपनी-अपनी जिन्दगी पूरी जीकर आए थे शमशान में । पर ये तो बिना जिए ही, आधे-अधूरे, कच्चे-पक्के सभी…मानो जीने मरने का कोई अर्थ ही नहीं रह गया? मानो पूरी दुनिया ही शमशान बन गई है। बस चिताएँ ही चिताएँ हैं चारेो तरफ। वह भी दोषी निर्दोषी, बच्चे-बूढ़े, सभी की!‘

टेप रिकौर्डर तेज वौल्यूम में गा रहा था, ‘ रंग महल के दस दरवाजे, जाने कौन-सी खिड़की खुली थी। सैंया निकल गए मैं ना लड़ी थी।’

‘पर किसके आदेश और किस कानून तहत यह सब? ‘

लाल आँखों वाले अघोरी की आँखें अब कुछ ज्यादा ही लाल दिख रही थीं और राख सने बाल थोड़े और बेतरतीब और उलझे-उलझे-से तनकर खड़े हो गए थे,

‘ किसकी योजना है यह? कौन अदृश्य नचा रहा है इन बेजान कठपुतलियों को? ‘

सारी अपनी दिनचर्या और योग-साधना, भूख-प्यास, सब कुछ को मानो भूल चुका था चिंतित अघोरी।

‘ईश्वर तो निश्चय ही नहीं हो सकता यह, इतना कठोर नहीं है वह! पर किसने दिया यह ईश्वर -ईश्वर खेलने का अधिकार इन गैर-जिम्मेदार इनसानों को? ‘

अघोरी अब अपनी सोच से भी तेज रफ्तार में नाच रहा था। बेसुध-सा बस नाचे ही जा रहा था,एक बीमार और हठी नाच था वह। पैर थकते तो चिता की गरम राख मल लेता उनपर । वह भी सीधे वहीं से उठाकर, जहाँ हड्डियां तड़क रही होती थीं। उँची-ऊँची लपटें उठ रही होती थीं। और अगर मन थकता तो शांत बैठा, उसी अधजली राख में जाने क्या कुरेदने और ढूंढने लग जाता । हथेली पर रखकर अधजली हड्डियों के टुक़ड़े सहलाता, मानो दुलार रहा हो। और तब उसके अपने ही बहते आँसू तसल्ली देते उसे। अश्रु-भीगी श्रद्धांजलि देता, पर सोच का ताण्डव नहीं रुकता। पूरी रात निकाल दी थी उसने इंतजार में, पर आज तो निर्मम नींद ने पलभर को भी नहीं सुलाया था उसे मन के अंदर चल रहे इस विकट आग-पानी के खेल के चलते।

खतरा तो सभी के लिए था और अघोरी के लिए भी । पर अघोरी को होश ही कहाँ था अब। बात भी तो साधारण नहीं, बेहद जटिल थी। मानवता का निर्मम संहार कर रही थी । मिसाइलों के डर से लोग घरों में बन्द थे। पर अघोरी श्मशान के बीच में जलती लकड़ी हाथ में लिए चक्कर पर चक्कर लगा रहा था, जैसे कि एक तूफान में फंसी पत्ती बेबस घूमती ही रह जाती है।

बेचैन अघोरी को देख-देख जानवर थी तो क्या, सलोनी भी बेचैन हो चली थी ।
थोड़ी देर तो उसके संग-संग उछलती-कूदती फिर सामने बैठकर देखने लग जाती उसे। कहते हैं न कि बिल्लियों के तार उस लोक से जुड़े होते हैं और जानवरों को तो मौत तक का पूर्व-आभास मिल जाता है।

बिल्ली बिलखती रही, रोकती रही उसे। पर सब व्यर्थ।

‘होनी और तूफान किसके रोके रुके हैं?

अघोरी के पैरों में उसी आवेश के साथ लिभडी सलोनी तुरंत ही पैरों के तीव्र आवेग से छिटककर दूर जा पड़ती और दूर जाते ही, तुरंत वापस आ लिभड़ती उसके बिजली से थिरकते पैरों में।

नाचने और कूदने का यह खेल अथक चलता रहा, ऊपर आकाश में बिजली-सी तड़कती मिसाइलों का भी।

पर ना तो अघोरी ही थका या रुका और ना तो उसकी बिल्ली ने ही हार मानी।

हाँ अघोरी की एक ही अनियंत्रित लात से उसका टेप रिकौर्डर अवश्य खड़-खड़ करता हुआ दूर जा गिरा और साथ-साथ उसकी सलोनी भी।

चंचल और परवाह करने वाली इस सलोनी को भगवान ने भी तो बेहद मन से ही रचा था । तभी तो सलोनी नाम रखा था अघोरी ने उसका। दिखते ही मोह लेती थी। फुर्तीला और भक् सफेद शरीर हवा सी उड़ती सलोनी का, मानो आकाश में बहता सफेद बादल हो। अभी उसकी गोदी में तो अगले पल ही सामने की छाड़ में चूहे ढूंढती। कभी-कभी तो घंटों के लिए आँखों से ओझल भी हो जाती थी, पर ढूँढ ही लेता था अघोरी उसे और बिल्ली अघोरी को।

दूर से ही दिख जाती थी सलोनी, माथा और सिर काले, मानो घने बाल हों सिर पर और रेशमी चमकीला सफेद फर पूरे बदन पर। पूरी तैयार लगती थी हमेशा। बीच माथे से सिर तक काला तिलक भी, जो उसकी चमकती आँखों की चमक को दुगना-तिगना कर देता था। और तन्दरुस्त इतनी कि एक ही छटके में उछलकर खड़े और छह फीट के अघोरी की गोदी में बैठ जाती थी।

पूरी तरह से फिदा था मसान-सा काला-कलूटा अघोरी अपनी गोरी-चिट्टी सलोनी पर और उनका यह दिन रात-सा संग साथ उर्जा से भर देता था उसके एकांत को। पर उस दिन उसे होश नहीं था ना ख़ुद का और ना ही अपनी प्यारी सलोनी का ही।

थमे तो वो कान-फोड़ू सायरन भी नहीं थे, रह-रहकर बजे ही जा रहे थे।

‘ कहाँ और किस पर टूटेगा अब यह कहर ? ‘

हर धमक पर पैर पूछते अघोरी से और तब उसका सिर और हाथ-पैर और तेजी से अनियंत्रित होकर घूमने लग जाते।

थिरता नहीं थी अब वहाँ उस सन्नाटे भरे शमशान में भी, जो हमेशा रहती थी उसके वीतराग स्वभाव में । उसकी जगह एक बेचैन हड़बड़ी और उग्रता ने ले ली थी… अनिश्चितता ने ले ली थी और आसन्न विनाश के सिहराते भय ने भी शायद।…

कैसे रोके ?

सभी सुरक्षा डूंढ रहे थे, पर अघोरी नहीं। सच पूछो तो उसके लिए कोई सुरक्षित जगह थी ही नहीं। एक प्रलय मची हुई थी भीतर-बाहर। और डूबता तो बस हाथ-पैर ही मार सकता है!
खगोल गणना , ज्योतिष विद्या, उसके हर ज्ञान पर धिक्कार था । कुछ भी तो सही नहीं कर पा रहा था वह कठिन और दारुण इन परिस्थितियों में। घिन आ रही थी उसे अब इस पाखंडी दुनिया से ही नहीं, खुद से भी ।

लपटे-ही-लपटें थीं अब उसके अंदर भी और बाहर भी।

और उसे तो बस शांति चाहिए थी इस जलन से। खुद अपने लिए भी और सिर-कटी मुरगी-सी झटपटाती इस दुनिया के लिए भी।

बेचैन मन शांति तलाशता बुद्धि और विवेक से दूर जा छिटका था, जैसे कि उसकी प्यारी बिल्ली अब उसकी सुरक्षित गोदी से ।
वाकई में नहीं जान पा रहा था पर वह। सच कहें तो उस अर्ध-विक्षिप्त अवस्था में उसे तो इतनी समझ तक नहीं थी कि एक मिसाइल ठीक उसके सामने, चार हाथ की दूरी पर ही आ गिरी थी।

थोड़ा होश आया तो,‘कहाँ आराम फरमा रही हो सलोनी रानी?’ बेचैन मन ने पुकारा और बयार-सी घूमती आँखें हर दिशा में ढूंढने भी लगीं उसे ।

पर बिल्ली कहीं नहीं दिखी।

‘आ जाएगी।‘

ना तो वह ही बिल्ली को छोड़कर कहीं गया था कभी और ना ही बिल्ली ने ही उसे छोड़ा था कभी पिछले पाँच साल से। पूरे जतन से ध्यान रखता है अघोरी …अक्सर ही खुद से भी ज्यादा। ज्यादा देर दूर नहीं रह सकते दोनों एक-दूसरे से। इसबार उठकर फिर से इधर-उधर देखा, ढूंढा अघोरी ने। सलोनी-सलोनी जी भरकर आवाजें भी दीं, पर एक म्याऊँ तक वापस सुनाई नहीं दी उसे।

चिंता की तो बात थी यह, पर खिलंदड़ी बिल्ली समझदार है, यह भी जानता था अघोरी।

‘ ज़रूर झाड़ में बैठी आराम फरमा रही होगी? फिर जाएगी भी कहाँ, है ही कौन इसका उसके सिवा इस शमशान में!’

जाप की तरह समझा रहा था अघोरी खुद को अब बारबार। पर सोच जब उस दिशा में, झाड़ की तरफ घूमी तो देखा उसने कि झाड़ तो ऊँची-ऊँची लपटों में धू-धू जल रहे थे ।

बेचैन अघोरी तब पागलों की तरह दौड़ा उस ओर, पर बहुत देर हो चुकी थी । रूई के गोले-सा वह छोटा शरीर लपटों से बाहर एकबार उछला तो जरूर उसकी तरफ, पर पल में ही फिर भस्म भी हो गया उसकी भयभीत आँखों के आगे ही।

उस नन्हे शरीर को मिटने में ज्यादा देर नहीं लगी थी।

अब अघोरी अपने दुःख के साथ -साथ गहरे पश्चाताप में था, सलोनी की चमकीली आँखें पुकारती ही रह गईं थीं उसे!

अभी भी तो पीछा कर रही थीं पर वो आँखें उसका।

शमशान के डोम ने कई बार पहले भी सावधान किया था उसे, ‘ ले डूबेगी यह बिल्ली ही एक दिन तुझे । दूर कर दे इसे। भून कर खा जा। इतना मोह ठीक नहीं। यह मोहमाया भरी जिन्दगी हम औघड़ सन्यासियों के लिए नहीं। ‘

पर वह तो उसके मोह में फँस चुका था। रोनी सी हंसी के साथ बस इतना ही बोला था तब
’ अघोरी हूँ , जीवभक्षी जानवर तो नहीं, जो जिन्दा को ही भून डालूँ!‘

जो टूट जाए, मोहजाल भी तो नहीं? सलोनी नष्ट होकर भी जीवित थी उसके लिए।

मुठ्ठी भर जलती राख उठाकर वह आँखों में भर लेता, ताकि और देख ना पाए दुःख के इस ताण्डव को, कानों में भर लेता, ताकि सुन ना पाए कुछ और । पर सब दिखाई देता रहा, सुनाई देता रहा । उसके बस में कुछ था ही नहीं अब, वह ख़ुद भी नहीं।

जानता था सलोनी वापस उछलकर उसकी गोद में अब कभी नहीं आ पाएगी और सलोनी जैसा दूसरा साथी अभागे को मिल ही नहीं सकता था कोई दूसरा ।

आरी-सा चीरता ही चला गया उसका बेरहम मलाल उसे,‘क्या अकस्मात और अनियंत्रित एक ही लात से धू-धू करती लपटों में जा गिरी थी वह या फिर निर्मम मिसाइल सच में उस पर ही आ गिरी थी और बेजुबान बचा तक नहीं पाई खुद को? बगल में ही तो खड़ा था पर वह, मदद तक नहीं मांगी उसने? पर अगर मांगती भी तो क्या कर पाता, वापस खींच तक तो नहीं पाया था उसे जलती चिता से! आँखों के आगे एक गोला-सा उझला और कितनी जल्दी राख भी हो गई ?’

चित्-पखेरू उड़-उड़कर बारबार उसी डाल पर जा बैठता था, जहाँ से सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा था उसे । सलोनी की चिता ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि आहत अघोरी ने मुँह फेर लिया उस ओर से ही नहीं, ख़ुद से भी।

औंधे मुंह गिरा-पड़ा जीवन-मृत्यु से वीतराग और शिथिल अघोरी अब फूट-फूटकर रो रहा था। वह काल भैरव की रात और नृत्य सब रुक गए थे कम-से-कम उस रात के लिए तो अवश्य ही। एक शांति थी अब उन टिमटिमाते तारों में भी, जैसे कि तूफ़ान आने से पहले होती है।

थोड़ी ही देर बाद उस नीरव वीराने में एक हृदय-विदारक चीख गूंजी और उसके साथ-साथ सब शांत भी हो गया फिर से।… रुदन, उसके शरीर का कंपन और तो और आकाश में उड़ते पक्षियों का चीत्कार तक।

पर मरघटे के भयावह और विचलित करते सन्नाटे को तोड़ते वो विद्रूप सायरन नहीं रुके हैं अभी भी। सुने जा सकते हैं कहीं भी और कभी भी, चाहे दुनिया के किसी भी कोने में रह रहे हों हम और आप… मानो अघोरी के आँसू, उसकी सारी फिक्र और परवाह, करुणा, मोह-ममता और प्रलयंकारी नृत्य, सभी का जिम्मा खुद इन सायरनों ने ही अपने ऊपर ले लिया हो।

कौन जाने अपशगुन है या फिर धरती का साझा दुख…समंदर की मछलियाँ और आकाश में चीलें सभी तो बेचैन हैं । कुत्तों ने भी तो घायल धरती की फटी छाती से मुँह उठाकर वापस रोना शुरु कर दिया है, याद में जो छोड़ गए असमय ही, छोड़कर जाएँगे आगे भी!…


शैल अग्रवाल
संपर्क सूत्रः shailagrawal@hotmail.com
shailagrawala@gmail.com

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