
महल था खड़ा सख़्त लेके जड़ें जो,
अभी तख़्त से चरमराने लगे हैं ।
कहाँ राज समझे जमाने लगे हैं।
निरर्थक समय यूँ बिताने लगे हैं।
दबे हाथ में रेत के कण फिसलते,
वृथा ज़िंदगी को बताने लगे हैं ।
कभी जागती चेतना सुप्त होती ,
सदा सत्य को क्यूँ भुलाने लगे हैं ।
रहे एक कोना सुरक्षित सदा ही ,
कि दुविधा हृदय की छिपाने लगे हैं ।
चले ओढ़ चादर पुरानी “सदा “की
रहे मूक अब कसमसाने लगे हैं।

दीप से अनेक दीप यूँ जलाइए ।
हो जहाँ तिमिर कहीं उसे भगाइए ।
राग द्वेष दूर हर दिलों उजास हो,
वैर भाव भूल अब गले लगाइए ।
लक्ष्य साध बढ़ चले सुपथ तभी मिले,
रीत तो सुकर्म की नहीं भुलाइए ।
दीप जो जले मिटा निजी वजूद को,
प्रेरणा मिली सुधर्म को निभाइए ।
जाति भेद में नहीं पड़े कहीं कभी,
चाँद मिल चले सभी खुशी मनाइए।

चारों दिशा है मौन देखो थम गया कुछ भी नहीं।
रुकती कहां है जिंदगी छोड़ा गया कुछ भी नहीं।
हर श्वास में उलझा सवालों का गदर बिछड़ा अमन,
कब चैन की मुरली बजे मुट्ठी बंधा कुछ भी नहीं।
चाहत अनेकों सब अधूरी रह गई प्रिय क्या कहें,
मंजर अनोखा सब लुटा हाथों बचा कुछ भी नहीं।
तकदीर की बातें कहें , अंजान कर्मों की सजा,
प्रभु जो मिला संताप अंतस में बसा कुछ भी नहीं।
दुश्वारियां ऐसी है राहों में बिछी शूलें कई ,
बचते रहे फिर भी चुभे चंदा दवा कुछ है नहीं।

द्वंद में घिरते ज़माने की ख़ुशी कम हो रही है ।
आज का अद्भुत चलन यह बंदगी कम हो रही है ।
बह रही चहुँओर देखो दुःख चिंता की हवायें ,
सज रही पीड़ा अधर मंजुल हँसी कम हो रही है ।
झूमती गाती बहारें राह भूली मौन किंचित,
ज़िंदगी वीरान सी अब रोशनी कम हो रही है।
स्वार्थ ऐसा आपसी रिश्ते दिखे बेजान से यूँ,
नेह का सौदा निराला दिलकशी कम हो रही है।
अब सितारे चाँद शोख़ी से परे गमगीन है क्यों ,
हैं सकल ऊर्जा निलंबित तिश्नगी कम हो रही है।

साज छेड़े प्रीत के , हर दुख भुलाने के लिए ।
प्यार की धुन को बजा,साथी रिझाने के लिए।
बोल मीठे बोलकर यूँ जीत पायेंगे हृदय,
वक्त थोड़ा ही बचा हँसने हँसाने के लिए ।
क़ीमती हर पल नहीं खोना ज़रा सा वक़्त भी ,
एक क्षण होता बहुत बिगड़ी बनाने के लिए ।
ईश के हाथों टिका बनना बिगड़ना जान लें ,
है मनुज के पास क्या जीवन सजाने के लिए ।
साधना कर ध्यान से तब भाव में हो शुद्धता ,
है क्षणिक दुख को समझ चिंता मिटाने के लिए ।
सृष्टि ये प्रभु ने बनायी बीज शुभ कर्मों पड़े।
नित्य पूजन वंदना हो मुक्ति पाने के लिए ।
जीव सागर में बहे जो नाव सी अनुभूतियाँ ,
आज लेती डुबकियाँ सब मोक्ष पाने के लिए।
नेह धागों से बँधे मन मुस्कुराने के लिए ।
कोशिशें सबके दिलों में घर बनाने के लिए ।
ठोकरें खाकर समझ फिर दोष निज के दूर कर ,
मंज़िलें होगी निकट जीवन सजाने के लिए ।
सृष्टि सारी बस सिखाती, है भला देना यहाँ,
चाँद सूरज दे रहे ऊर्जा जमाने के लिए ।
मौन बसुधा ये सिखाये किस तरह जीना यहाँ,
धैर्य,संयम दीप अंतर में जलाने के लिए ।
हम रहें कल या नहीं बस ईश ही यह जानता ,
कर्म ऐसे हो दिलों अमरत्व पाने के लिए ।

बात इंसा राग की चलती यहाँ देखो।
स्वार्थ परिता में लगा सारा जहां देखो।
निज सुखों में डूब भूले कर्म की गाथा,
जान ले आदर्श को दिल से गवां देखो।
ढूँढते हैं ज़िंदगी वैभव विलासों में,
चैन मिलता है सखी जग में कहाँ देखो।
दीन दुखियों के लिए हो दर्द सीने में,
सज रही मुस्कान अधरों पर वहाँ देखो।
बेबसी क़िस्से बयां करते नयन कोमल,
उड़ चले उपहास में करुणा वफ़ा देखो।
बिक रहे बाज़ार में सद्भाव के मोती ,
लालसा बच ही गई धन की सदा देखो।
खर्च होती जा रही इंसानियत अमोल,
बच गई झूठी क़सम चंदा असत देखो।

चंदा प्रहलादिका
शिक्षा-बी ए आनर्स (हिन्दी साहित्य)कोलकता
आठवीं कक्षा से ही कविता लेखन में संलग्न
दसवीं कक्षा में पहला रेडियो प्रोग्राम, एवम पत्रिका में कविता प्रकाशित
अभ्युदय काव्य समूह -अध्यक्ष
अभ्युदय बंगाल शाखा- मुख्य सचीव
अज्ञेय,महादेवी वर्मा,जयशंकर प्रसाद से प्रभावित साहित्य एवम दर्शन का गहरा अध्ययन ।
काव्य लेखन स्वांतः सुखाय के लिए।
हिन्दी कवियित्री, गायिका
मदर टेरेसा अवार्ड 2020 प्राप्त
महिला काव्य मंच में सम्मानित
एवम् अनेकों सम्मान एवम पुरस्कार प्राप्त ।
लोक संस्कृति संस्था में सक्रिय सदस्य ।
मारवाडी संस्कृति मंच में सक्रिय सदस्य।
अन्तराष्ट्रीय मारवाडी सम्मेलन मे सदस्य ।
नवसंध्या सास्कृतिक संस्था में सक्रिय सदस्य।
भारतीय विकास परिषद की सदस्य
अखिल भारतीय अंतराष्ट्रीय महिला समिति की सदस्य
अनेकों सांस्कृतिक एवम् साहित्यिक कार्यक्रमों में मंच संचालन
काव्य गोष्ठियों में कविता पाठ एवम गीत प्रस्तुति ।
समाज सेवा में सक्रिय रूप से संलग्न
अनेकों पत्र पत्रिकाओ मे कविता प्रकाशित ।
अहसास काव्य पुस्तक(सम्मिलित संग्रह )
पुष्प परिमल-सम्मिलित काव्य संग्रह भावनाओं के अंकुर-एकल काव्य संग्रह
मुखरित मौन -एकल काव्य संग्रह
यशोधरा एक व्यथा- खंडकाव्य
गूँज अनुगूँज -एकल छंद काव्य संग्रह
वृथा नहीं ये रागिनी – एकल छंद काव्य