
अव्यक्त आकृति
मैं सोचता हूँ कि
मजदूरों को रोशनी चाहिए
रसोईयों को भोजन
स्त्रियों को मुकुट
और अंधेरे को सूरज ।
नदी में पत्थर की तरह
वसंत नहीं उतर आएगा
मेरे विचारों में ।
कितना मुश्किल हो गया है
आज मिट्टी का दीप जलाना
इंटरनेट की ओर भागती
इस दुनिया में ।
जब हर चीज के अस्तित्व में
विश्व बाजार खुल गया है
और हमें पहचानने में
मुश्किल हो रही है
उन कच्चे मकानों को
जहां आस्था का दीपक
स्वाद के ताबुत में
बंद हो गये हैं ।
निःसंदेह आदमी
घोड़े के रेस में शामिल है
और जमीन खोद रहा हल
आंसूओं के पानी के बीच नम
तब नीड़ के उस धुंधली परत में
इमारत के चौकोर चमक को
हम कैसे सही आकार दे पाएंगें ।
-मोतीलाल/ राउरकेला

“कुंभ कैसे नहाओगे ?”
आई भोर आई
पंख पसारे चिड़ियों ने भी
गीत उच्चारे
मंदिर की घंटियाँ बोली
जागे सारे नदी किनारे
अम्मा भी प्रभाती गातीं
झट से घाट पर पहुंची
ले डुबकियां कुम्भ नहाई
मन में कुछ शगुन भी लायीं
कुमकुम मंगल का
बांध घर आयीं
एक दिन नन्ही पोती ने थी
जिद पकड़ी अम्मा मैं कुम्भ कहाँ नहाऊँ?
अम्मा मुस्काई बोली-
तू कैसे नहा पायेगी?
वहां कहाँ रही अब
पहले सी शुद्धाई?
मैंने तो बरसों का
नियम निभाया है
नाम को ही नहाया है
बस, आखिर में
घाट पर नहा कर
एक लोटा जल
घर से जो ले गयी थी
उससे फिर नहाया है
बन्नो, कुम्भ नाहन तो
अब भी मनभावन है
पर जल नहीं रहा
अब पावन है
इसलिए तू मन की गंगा में
नहा ले अब पर
चाहे कुछ भी हो जाए
विष घुली उस गंगा में
नहाने को अब कभी जाना मत और
जाये तो वहां मेरा
यह सन्देश लेती जाना
कहना लोगों को कि
गंगा को बचाओ पहले
फिर नहाओ
इस विरासत को कैसे भी बचाओ !
डॉ सरस्वती माथुर

साल आकर ….
साल आकर बड़ी तेजी से गुज़र जाते हैं
पर बदलते नहीं, जीवन के बही-खाते हैं
मंजिलें भूलना लाज़िम है मुसाफिरों के लिए
रास्ते रास्तों से हर जगह टकराते हैं
जन्म फुटपाथ पर, फुटपाथ पर ही उम्र कटी
पेट पर हाथ रख, पुटपाथ पर सो जाते हैं
जुल्म की धूप कड़ी, यातना हर लिम्त बढ़ी
लोग ताने हुए बेशर्मियों के छाते हैं
रोष, नाराजगी बेचारगी सब नामंजूर
दोस्तों, हम यहां इन्सानियत के नाते हैं
डॉ. शेरजंग गर्ग
साकेत, दिल्ली

शंखनाद
वह जो कहते थे
दोष उनका नहीं.
कपड़ों का है
बहन बेटियों के
नित नए पश्चिमी
इस हावभाव का है
मदान्ध ही तो हैं
निज विलासिता में।
अपनी ही
लोलुपता में लुप्त
सदियों से रौंदता
वस्तु-सा इस्तेमाल करता
इनका दर्प
भोगने का आदी जो
खुदको विधाता ही तो
समझने लगा है
पर निर्भया
तुम्हारे वे मौन
पलकों पर सूखे ठंडे जमे आंसू
और अथक जिजीषा
हारी कहाँ
पर्दाफाश कर गई है
कई कुर्सियां हिलीं
रावण भी सोचेगा अब
अपहरण से पहले।
पोंछ आंसू
मुस्कुराओ निर्भया,
व्यर्थ नहीं बलिदान तुम्हारा
साबित कर दिया है तुमने
आसान नहीं होता
सच का सामना या
साहस और हिम्मत को
यूँ ही रौंद पाना
जुड़ चुकी है नारी की
सदियों की व्यथा-गाथा
सारी त्रासदी अब तुमसे
मशाल बन गई हो तुम
नारी जो एक लहर थी
कोमल और सुकुमार
सुनामी है आज
सान्त्वना ले सको तो लो ,
अब जब जब दामिनी
चमकेगी, तड़केगी
गिरेगी बज्र बनकर
देखना तब तब कैसे कांपेगा व्यभिचार !
–शैल अग्रवाल

स्त्रीः एक अपरिचिता
मैं हर रात ;
तुम्हारे कमरे में आने से पहले सिहरती हूँ
कि तुम्हारा वही डरावना प्रश्न ;
मुझे अपनी सम्पूर्ण दुष्टता से निहारेंगा
और पूछेंगा मेरे शरीर से , “ आज नया क्या है ? ”
कई युगों से पुरुष के लिए स्त्री सिर्फ भोग्या ही रही
मैं जन्मो से ,तुम्हारे लिए सिर्फ शरीर ही बनी रही ..
ताकि , मैं तुम्हारे घर के काम कर सकू ..
ताकि , मैं तुम्हारे बच्चो को जन्म दे सकू ,
ताकि , मैं तुम्हारे लिये तुम्हारे घर को संभाल सकू .
तुम्हारा घर जो कभी मेरा घर न बन सका ,
और तुम्हारा कमरा भी ;
जो सिर्फ तुम्हारे सम्भोग की अनुभूति के लिए रह गया है
जिसमे , सिर्फ मेरा शरीर ही शामिल होता है ..
मैं नहीं ..
क्योंकि ;
सिर्फ तन को ही जाना है तुमने ;
आज तक मेरे मन को नहीं जाना .
एक स्त्री का मन , क्या होता है ,
तुम जान न सके ..
शरीर की अनुभूतियो से आगे बढ़ न सके
मन में होती है एक स्त्री..
जो कभी कभी तुम्हारी माँ भी बनती है ,
जब वो तुम्हारी रोगी काया की देखभाल करती है ..
जो कभी कभी तुम्हारी बहन भी बनती है ,
जब वो तुम्हारे कपडे और बर्तन धोती है
जो कभी कभी तुम्हारी बेटी भी बनती है ,
जब वो तुम्हे प्रेम से खाना परोसती है
और तुम्हारी प्रेमिका भी तो बनती है ,
जब तुम्हारे बारे में वो बिना किसी स्वार्थ के सोचती है ..
और वो सबसे प्यारा सा संबन्ध ,
हमारी मित्रता का , वो तो तुम भूल ही गए ..
तुम याद रख सके तो सिर्फ एक पत्नी का रूप
और वो भी सिर्फ शरीर के द्वारा ही …
क्योंकि तुम्हारा सम्भोग तन के आगे
किसी और रूप को जान ही नहीं पाता है ..
और अक्सर न चाहते हुए भी मैं तुम्हे
अपना शरीर एक पत्नी के रूप में समर्पित करती हूँ ..
लेकिन तुम सिर्फ भोगने के सुख को ढूंढते हो ,
और मुझसे एक दासी के रूप में समर्पण चाहते हो ..
और तब ही मेरे शरीर का वो पत्नी रूप भी मर जाता है .
जीवन की अंतिम गलियों में जब तुम मेरे साथ रहोंगे ,
तब भी मैं अपने भीतर की स्त्री के
सारे रूपों को तुम्हे समर्पित करुँगी
तब तुम्हे उन सारे रूपों की ज्यादा जरुरत होंगी ,
क्योंकि तुम मेरे तन को भोगने में असमर्थ होंगे
क्योंकि तुम तब तक मेरे सारे रूपों को
अपनी इच्छाओ की अग्नि में स्वाहा करके
मुझे सिर्फ एक दासी का ही रूप बना चुके होंगे ,
लेकिन तुम तब भी मेरे साथ सम्भोग करोंगे ,
मेरी इच्छाओ के साथ..
मेरी आस्थाओं के साथ..
मेरे सपनो के साथ..
मेरे जीवन की अंतिम साँसों के साथ
मैं एक स्त्री ही बनकर जी सकी
और स्त्री ही बनकर मर जाउंगी
एक स्त्री ….
जो तुम्हारे लिए अपरिचित रही
जो तुम्हारे लिए उपेछित रही
जो तुम्हारे लिए अबला रही …
पर हाँ , तुम मुझे भले कभी जान न सके
फिर भी ..मैं तुम्हारी ही रही ….
एक स्त्री जो हूँ…..
– विजय सत्पत्ति

अव्यक्त सपने
एक लड़की सपने देखती है
रोज-रोज
नए-नए,
आचार-विचार के
आसमानी ऊँचाइयों के,
अधूरी गहराइयों के,
ठहरी हवाओं के,
लेकिन उन्हें
समझने की कोशिश में
और उलझ जाती है
इधर-उधर ताकती है
लेकिन कोई नहीं करता उन्हें
उसके लिए डीकोड,
क्योंकि वह भूल जाती है
कि कोई और नहीं
सिर्फ वह खुद कर सकती है
अपने सपनों की अभिव्यक्ति
इसीलिए उसके ख्वाब
रह जाते हैं अव्यक्त
बन कर मन में
उमड़ते-घुमड़ते प्रश्न !
डॉ.रीता हजेला ‘अराधना’

अब वक़्त नहीं
अब वक़्त नहीं नज़रे नीची कर चलने का,
अब आँखों में बिजलियाँ लेकर चलेंगे हम …
बहुत किये चूल्हा चौका बस अब और नहीं,
अब बेलन नहीं, लैपटॉप लेकर चलेंगे हम …
बहुत हुआ भेदभाव, बहुत दबाया हम को,
अब आजादी की मशाल जला चलेंगे हम …
नी माँ! भाई को भी घर के काम सिखा दे,
… नहीं तो इस की बीबी के ताने सहेंगे हम,
पापा जी, अब आप मुझे दहेज़ नहीं देना,
अब जायदाद में हिस्सा लेकर रहेंगे हम …
मत उकसाओ हमे, मत ललकारों हमे,
अब उखड़े तो, माँ चंडी का रूप धरेंगे हम …
वो दामिनी सोयी नहीं, जगा गई हम को,
सावधान !! अब कभी चुप नहीं रहेंगे हम …
-नीलम नागपाल मदिरता

अपने अपने सुख-
‘ आराम नहीं, विश्राम नहीं,
सड़क पर खड़े पेड़-सा
जो चाहे फल तोड़े, पत्थर मारे
आते-जाते कुत्ते सा
टांग उठाए और
गंदा करके भागे यह तो जीवन नहीं।
फरक है और
फरक करना सीखो
अपने-पराए में…
आश्रय, हरेक का आथित्य
इतनी स्नेहमयी होना भी
ठीक नहीं,
खुद को मत भूलो।’
तरु की गरिमा कब घटी पर कुत्ते की औकात से
नम आंखें और भीगी स्मिति लिए
वह उठी और ठाकुर जी की
दिया बाती कर आई
यही मनाती, आरती गाती
कि अगले जनम में भी
नारी या फिर
तरु हो कर ही आए वह ,,,
कुंदन सा तपता जीवन
सेवा में ही बिताए।
समझ न पाया वह
नारी मन की पहेली को
दुख की अनोखी
उस सहेली को,
‘अभागी हैं बेचारी
मूर्ख है, मूर्ख ही रहेगी
पिसती, है जीवन भर
और यूँ ही पिसेगी…’
खुद यूँ तपकर
फल और छांव देने का सुख
लेने वाले की किस्मत में कब…
सुख और सपने
सबके अपने-अपने
नारी भी कब जान पाई
उसके स्वार्थी हित को…
-शैल अग्रवाल

नयी नारी
तुम नहीं कोई पुरुष की ज़र-ख़रीदी चीज़ हो,
तुम नहीं
आत्मा-विहीना सेविका मस्तिष्क-हीना,
गुड़िया हृदयहीना!
नहीं हो तुम वही युग-युग पुरानी पैर की जूती किसी की,
आदमी के कुछ
मनोरंजन-समय की वस्तु केवल!
तुम नहीं कमज़ोर
तुमको चाहिए ना
सेज फूलों की!
नहीं मझधार में तुम
अब खड़ीं शोभा बढ़ातीं
दूर कूलों की! अब दबोगी तुम नहीं
अन्याय के सम्मुख,
नयी ताक़त, बड़ा साहस ज़माने का
तुम्हारे साथ है!
अब मुक्त कड़ियों से तुम्हारे हाथ हैं!
तुम हो न सामाजिक न वैयक्तिक
किसी भी क़ैदखाने में विवश
अब रह न पाएगा
तुम्हारे देह-मन पर आदमी का वश
कि जैसे वह तुम्हें रक्खे रहो, मुख से अपने
भूल कर भी
कुछ कहो!
जग के करोड़ों आज युवकों की तरफ़ से
कह रहा हूँ मैं—
”तुम्हारा ‘प्रभु’ नहीं हूँ,
हाँ, सखा हूँ! और तुमको
सिर्फ़ अपने
प्यार के सुकुमार बंधन में हमेशा बाँध रखना चाहता हूँ!”
– डॉ. महेन्द्र भटनागर

वह
वह दुबकी बैठी है
चार दीवारों के अन्दर
ज्ञान के आलोक से अछूती
पर्वत में कंदरा सी
तो आओ
उसके विवेक को जागृत करें,
उसमें नवचेतना धरें,
समय तो सूरज बनकर
कबसे बिखेर रहा है
उसके लिए
किरणें ज्ञान की
वह उठना नहीं चाहती
चूल्हे की ऊँचाई से उपर तो आओ
उसके मन की संकीर्णता को दूर करें
उसमें नवचेतना भरें,
विशाल नभ तो
कब से
चीख-चीख कर
पुकार रहा है उसे
अपने ह्रदय में
स्थान देने के लिए।
वह देखना नहीं चाहती
स्याह बुरके
या घूंघट को उठाकर
दुनिया की खूबसूरती
तो आओ
उसकी सोच को प्रखर करें
उसमें नवचेतना भरें,
अपनी खुशबू पर इतराता
उपवन का यौवन तो
कब से व्याकुल है
उसकी एक नजर भर के लिए।
वह जुटा नहीं पाती हिम्मत
दो बोल बोलने को
अपने पक्ष में
तो आओ
उसका गूंगापन दूर करें
उसमें नवचेतना भरें,
कौए से भिड़ने वाली
पिद्दी सी चिड़िया तो
कब से सिखा रही है उसे
उसके आंगन में आकर
अपनी रक्षा के लिए
लड़ना, चीखना
विनोद ध्रब्याल राही

आह्वान
सुना रही चुनौतियां, शर्मसार देश को
झटक दिया है द्रौपदी ने, फिर से मुक्त केश को
अब रमा सरस्वती के, रूप को तिलांजलि
त्याग को ममत्व को, आखिरी जलांजलि
दुशासनों के रक्त से, कब धुलेंगी वेणियां
तार तार अस्मतें, बिलख रही है बेटियां
जांघ दुर्योधन की आज, कोई बढ़के तोड़ दो
समाज के पितामहों, अब तो मौन तोड़ दो
ओ चक्रपाणि हो कहां, पुकारती है मानवी
आसमान फट पड़ा, दरक के धंस गई ज़मीं
कोख में उबाल ले रहा है, रक्त सृष्टि का
क्यों वासना के पंक में, यूं आदमी फिसल रहा
ये श्रावणी फुहार अब, धधक उठी है ज्वाल सी
तू वतन की आबरू है, शक्तिपुंज दामिनी
प्रचण्ड श्रृंखला पुरूष भी, बढ़के अपना हाथ दो
कसम है मां के दूध की, राखियों का साथ दो।।
-मुन्नी शर्मा

असमंजस
मैने ढोल नहीं बजवाए
मिठाई नहीं बाँटी
मन में मेरे लड्डू भी नहीं फूट पाए…
क्षमा करना मुझे
मेरी बेटी…!
तुम्हारे जन्म पर
नाच नहीं पाया मेरा मन
अनायास ही कुछ ऐसे बादल घिर आए
कोई दुर्भावना
कोई कटुता नहीं थी तुम्हारे प्रति
मात्र अपनी सामर्थ्य पर
अविश्वास…
अथवा छाया रही हो
किसी आतंक की
कि घिर गया मैं अनायास ही
असमंजस में,
क्षण भर को
लगा मुझे
कि मुस्कराना नहीं है मेरे बस में।
भूल गया मैं
संस्कृति और परम्परा का
वह सारा ज्ञान
कन्या को देता रहा जो
कहीं देवी, तो कहीं ममता की मूर्त्ति
कहीं लक्ष्मी
सरस्वती
या दुर्गा
का सम्मान
जाने कब रावण के बलाग्रह ने
रोप दिया था शंका का बीज
हर पिता के मन में
और फिर न जाने कितने रावण आए
कभी अलाउद्दीन खिलजी
तो कभी आदम खाँ बनकर
कभी किसी शहंशाह, सूबेदार
दरोग़ा या जमीदार के रूप में
देते ही चले गए त्रास
भरते ही चले गए जो चिन्ता और भय
परिवार के जीवन में
टूटता था हर बाप
छाती कूटती पछाड खाती थी माँ
खौलता था भाई का रक्त
और देखने वाले आंतकित…
हर बार… जब उठती थी कोई बेटी
कारण जो भी हो
व्यक्तिगत, या राजनैतिक
हवस, प्रतिशोध या आक्रोश
आतंकित…
अराजकता अन्याय और अपसंस्कृति से
बचाता ही चला गया
हर पिता अपनी बेटी को
भाई अपनी बहन को
छिपाता ही चला गया
पर्दों के पीछे
इतना पीछे कि
पोंछने को भी आतुर हो गए उनके हाथ
उसका संकेत चिन्ह
गर्भाशय से भी…
कि कहीं
ममता की मूर्ति उनकी
तोड़कर कोई वहशी मिट्टी में न मिलाए
ले जाकर उनकी सरस्वती को
किसी कोठे पर न नचाए
बेचकर उनकी लक्ष्मी
किसी लखटकिए का कंठहार न बनाए
दूषित कर किसी दुर्गा को
समाज को दुर्गति का द्वार न दिखाए।
किन्तु जानता हूँ यह भी
कि ममता के बिना
जीवन में रह ही क्या जाएगा!
बिना सरस्वती के
संस्कार कहाँ से आएगा;
बिना लक्ष्मी के भी
वैभव का स्वप्न तो बस सपना ही रह जाएगा
और बिना प्यारी सी बेटी के
सूने आँगन को
पैजनियों की रुनझुन से कौन गुँजाएगा।
भाग्य की इस सुन्दर भेंट का
अस्वागत भला कौन कर पाएगा!
और ज्ञात है मुझे यह भी
कि घोलता रहा है यथार्थ
अपनी कटुता निरन्तर
जीवन में मधुर रस में
क्षमा करना मुझे
मेरी बेटी।
घिर गया था मैं असमंजस में
क्षण भर को लगा मुझे
कि मुस्कराना नहीं है मेरे बस में…
– सीतेश आलोक

अन्यथा शून्य
जिस दिन
निर्मम न हो पवन
कहीं कोई लू-धूप से
अथवा शीत में ठिठुरकर
प्राण न त्यागे
जिस दिन
रोती हुई माँ की गोद में
सोने को विवश न हों
भूखे ही, शिशु अभागे
जिस दिन
होकर निराश जीवन से
कोई आत्म-दाह न करे
कोई ऊँची मीनार से
छलाँग न लगाए
कोई ईर्ष्यावश
अथवा पड कर लोभ में
किसी मित्र-सम्बन्धी को
विष न पिलाए
जिस दिन
साम्प्रदायिक उन्माद में
कोई गोलियाँ न चलाए
आतंक न फैलाए
जिस दिन
बलात्कार न हो कोई…
और हर विष-कन्या
अपना विष स्वयं ही पी जाए
जिस दिन
भीत न उठे घर के बीच
परिवार में न पड़े
कहीं कोई दरार
कोई नव-वधू, विवश करके
बिलखती सास को
हरिद्वार या वृंदावन का द्वार न दिखाए
जिस दिन
बहार के सुर बजें हर धड कन में
और सम्बन्धों में
वसन्त आ समाए
उस दिन…
बस उसी दिन, दे सको तो
देना मुझे सन्तान
इस भीड में अन्यथा
शून्य ही रहे मेरा योगदान।
अंत तक
– सीतेश आलोक

जैसे कालातीत गीत
बदला है नहीं कुछ
वही सुख
वही दुख
असंगतियां पहले सी
आधे सच खुले हुए
तर्क घिसे-पिटे हुए
ऊपरी मुलम्मों की चकाचौंध
असली रंग मिटे हुए
नारे हैं वही
वही मांगे हैं
सिर्फ नए हैं मुख।
आश्रित जिह्वाओं पर
वही प्रश्न—कल क्या हो?
आखों में वही अभ्र भ्रम के हैं
ऋचा-गान अब भी स्वरबद्ध है
कंठ किंतु
अवसर मौसम के हैं
दंश समय का अब भी
पैरों में
चालों का लेकिन है वही रुख।
समिधा है वही
वही हवन-कुंड
मंगतों की वैसी ही
लम्बी कतारे हैं
कुर्सी के आसपास वही झुंड
हाथों में वही
चुन चुनाहट है
सीने वही तेज
धुक धुक धुक
बदला है नहीं कुछ…
-सत्येन्द्र श्रीवास्तव

मौत हारी है हमेशा
आग लग जाये जहाँ में फिर से फट जाये ज़मीं।
मौत हारी है हमेशा ज़िंदगी रुकती नहीं।।
आँधी आये या तूफ़ान बर्फ गिरे या फिर चट्टान।
उत्तरकाशी भुज लातूर वो सूनामी अब जापान।।
मौत का ताण्डव रौद्र रूप में फँसी ज़िंदगी अंधकूप में।
लाख झमेले आने पर भी बढ़ी ज़िंदगी छाँव धूप में।।
दहशतों के बीच चलकर खिल उठी है ज़िंदगी।
मौत हारी है हमेशा ज़िंदगी रुकती नहीं।।
कुदरत के इस कहर को देखो और प्रलय की लहर को देखो।
हम विकास के नाम पे पीते धीमा धीमा ज़हर तो देखो।।
प्रकृति को हमने क्यों छेड़ा इस कारण ही मिला थपेड़ा।
नियति नियम को भंग करेंगे रोज़ बढ़ेगा और बखेड़ा।।
लक्ष्य नियति के साथ चलना और सजाना ज़िंदगी।
मौत हारी है हमेशा ज़िंदगी रुकती नहीं।।
युद्धों की एक अलग कहानी बच्चे बूढ़े मरी जवानी।
कुरुक्षेत्र से आजतलक तो रक्तपात की शेष निशानी।।
स्वार्थ घना जब जब होता है जीवन मूल्य तभी खोता है।
करुणभाव से मुक्त हृदय भी विपदा में संग संग रोता है।।
साथ मिलकर जब बढ़ेंगे दूर होगी गंदगी।
मौत हारी है हमेशा ज़िंदगी रुकती नहीं।।
जीवन है चलने का नाम रुकने से नहीं बनता काम।
एक की मौत कहीं आ जाये दूजा झंडा लेते थाम।।
हाहाकार से लड़ना होगा किलकारी से भरना होगा।
सुमन चाहिए अगर आपको काँटों बीच गुज़रना होगा।।
प्यार करे मानव मानव को यही करें मिल बंदगी।
मौत हारी है हमेशा ज़िंदगी रुकती नहीं।।
– श्यामल सुमन
