
मोटूराम
कभी इधर तो कभी उधर को
चलते जाते मोटूराम ।
मोटर वाला भी चकराया
कहाँ जा रहे मोटूराम ।
बीच सड़क में घबरा करके
गिरे अचानक मोटूराम ।
चोट लगी घुटनों पर भारी
उठते कैसे मोटूराम .

मेंढक जी
छाता लेकर मेढक निकले
जैसे अपने घर से।
गरज-गरजकर ,घुमड़-घुमड़कर
बादल जमकर बरसे ।
भीगे सारे कपड़े उसके
हो गयातेज़ बुखार ।
कछुए ने देदी दवाई
और लगे इंजेक्शन चार ।

सवाल ?
प्यारा- प्यारा चन्दा मामा
लिये साथ में आता तारे ।
पंख लगाकर सूरज आता
रोज़ सवेरे पास हमारे ।
तितली को सुन्दर रंगों के
ये कपड़े पहनाए किसने ?
ठण्डी- ठण्डी हवा चलाई
सुन्दर फूल खिलाए किसने ?

हाथी दादा
आँखें छोटी सूप –से कान
दाँत हैं पैने –लम्बे ।
चले झूमते हाथी दादा
पैर हों मानो खम्बे ।
पकड़ सूँड से ऊँची डाली
पत्ते तोड़ है खाता ।
लकड़ी ढोता ,पानी पीने
पहुँच नदी में जाता ।
बादल छाए
आसमान में बादल छाए
रिमझिम-रिमझिम जल बरसाएँ।
मोर नाचता है मस्ती में
खुशियाँ छाई हैं बस्ती में ।
डाल- डाल पर झूला झूलें
झूल-झूलकर बादल छूलें ।
तरह –तरह के पंछी गाते
बच्चे हँसते दौड़ लगाते ।

मीठी बोली
कुहू-कुहू कर कोयल बोली
कानों में मिसरी –सी घोली ।
बाग़ बगीचे गूँज उठे हैं ,
नाच उठी बच्चों की टोली ।
डोल रही है डाल-डाल पर ,
सबके मन में खुशियाँ भरती ।
मीठे प्यारे गीत सुनाकर ,
सबको अपने वश में करती ॥

जब खेलने आए बच्चे
जब खेलने आए बच्चे-
हवा चली जी , हवा चली ;तेज चली जी ,तेज चली
टूटे पत्ते , छूटे पत्ते , बिखरे पत्ते ,पत्ते –पत्ते
पत्ते दौड़े ,आगे-आगे
पीछे –पीछे ,हम भी दौड़े
कभी इधर को ,कभी उधर को ,नहीं पकड़ में ,वे आ पाए
हम भी हारे , वे भी हारे आए पास में चुपके- चुपके
अब पकड़ में आए पत्ते ; सबने सभी उठाए पत्ते ।

लोरी
छोटी-छोटी बकरी छोटी –छोटी गैया
गैया चराए मेरे छोटे कन्हैया ।
छोटे-छोटे हाथ छोटे-छोटे पाँव
ठुमक- ठुमक जाए गोरी के गाँव ।
आँखों में दिखता है आसमान
पतले –से होठों पर छाई मुस्कान ।
किलक-किलक में सारे गुणगान
तुतली-सी बोली में छिपे भगवान ।

पार्क
दादा और दादी के संग
रोज पार्क में जाते हम ।
दौड़ लगाते हर कोने में
नहीं पकड़ में आते हम ।
कभी झूलते हैं झूले पर
फूले नहीं समाते हम ।
तितली के पीछे भी दौड़ें
उसे पकड़ ना पाते हम ।

धूप की चादर
घना कोहरा छा जाता है ,ढकते धरती अम्बर ।
ठण्डी-ठण्डी चलें हवाएँ , सैनिक -जैसी तनकर ।
भालू जी के बहुत मज़े हैं-ओढ़ लिया है कम्बल ।
सर्दी के दिन बीतें कैसे ठण्डा सारा जंगल ।
खरगोश दुबक एक झाड़ में काँप रहा था थर-थर ।
ठण्ड बहुत लगती कानों को मिले कहीं से मफ़लर ।
उतर गया आँगन में सूरज बिछा धूप की चादर ।
भगा कोहरा पल भर में ही तनिक न देखा मुड़कर ।
–
प्यारे पक्षी
पक्षी हमको लगते प्यारे ,
बोली व रंग न्यारे – न्यारे ।
मीठी बोली सूरत काली ,
उड़ती कोयल डाली-डाली ।
फुर्र-फुर्र गौरैया आती ,
चहक-चहककर हमें जगाती ।
हरे पंख चोंच है लाल ,
मिट्ठू तोता खाता माल ।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’