
अबूझ
दीमक कुतरता रहा लकड़ी
और मकड़ी जाला बुनती रही
पर सोच के कपाट बन्द ही रहे
प्रश्न कई थे सभी के इर्दगिर्द
और समस्याएँ भी कई
और उत्तर कोई भी नहीं
पूछने वाले कई थे मदद को
पर करने वाला कोई नहीं
कुछ असमर्थ थे और कुछ बेकार
कुछ पीठ पर लद कर चले
कुछ को चलना आया ही नहींं..

अनकही
वह कहता था
वह सुनती थी
जारी था एक खेल
कहने सुनने का
खेल में थी दो पर्चियाँ
एक में लिखा था ‘कहो’
एक में लिखा था ‘सुनो’
अब यह नियति थी
या महज़ संयोग
उसके हाथ लगती रही
वही पर्ची
जिस पर लिखा था ‘सुनो’
वह सुनती रही
उसने सुने आदेश
उसने सुने उपदेश
बन्दिशें उसके लिए थीं
उसके लिए थीं वर्जनाएँ
वह जानती थी
कहना सुनना
नहीं हैं केवल क्रियाएं
राजा ने कहा ज़हर पियो
वह मीरा हो गई
ऋषि ने कहा पत्थर बनो
वह अहिल्या हो गई
प्रभु ने कहा निकल जाओ
वह सीता हो गई
चिता से निकली चीख
किन्हीं कानों ने नहीं सुनी
वह सती हो गई
घुटती रही उसकी फरियाद
अटके रहे शब्द
सिले रहे होंठ
रुन्धा रहा गला
उसके हाथ कभी नहीं लगी
वह पर्ची
जिस पर लिखा था – ‘ कहो ’
– शरद कोकास

इच्छा
अंतिम समय जब कोई नहीं जाएगा साथ
एक वृक्ष जाएगा
अपनी गौरेयों-गिलहरियों से बिछुड़कर
साथ जाएगा एक वृक्ष
अग्नि में प्रवेश करेगा वही मुझसे पहले
‘कितनी लकड़ी लगेगी’
श्मशान की टाल वाला पूछेगा
ग़रीब से ग़रीब भी सात मन तो लेता ही है।
लिखता हूँ अंतिम इच्छाओं में
कि बिजली के दाहघर में हो मेरा संस्कार
ताकि मेरे बाद
एक बेटे और बेटी के साथ
एक वृक्ष भी बचा रहे संसार में।
– नरेश सक्सेना

कौन किसे संभालता
कौन किसके बिना यहाँ अधूरा
जल में घ़ड़ा या घ़ड़े में जल
जल जो खारा और आँसू भीगा
सोंधी माटी से मिल हो जाता मीठा
घट जो अंतस तक रीता
तृप्त और शीतल कब जल बिना
एक दूजे के पूरक दोनों
एक दूजे में डूब भीगकर
संग-संग खेले तिरके बिखरे
यही नियति थी दोनों की
यही नियम जीवन का भी
सर्वोत्तम और सार्थक बस वही
प्रीत-प्यार का अनूठा पल
जल में डूबा था घट जी भर
घट में सिमट गया जल जब
घट और जल कलकल बहते
क्या हुआ जो अंततः बिखरे टूटे
मगन उनका यह आवारापन
ज्यों पानी का एक बुदबुदा
मछली की आँखों में जा छुपे
बह निकले फिर अगले पल ही
एक आँसू बना…
-शैल अग्रवाल