हास्य-व्यंग्यः गोल्ड रश-यशपाल सिंह यश

ईरान-अमेरिका तनाव के बीच प्रधानमंत्री ने देशवासियों से सोना न खरीदने, पेट्रोल बचाने और अनावश्यक विदेश यात्राओं से बचने की अपील की। नेकीलाल समाचार पत्र में छपे इस समाचार पर चिंतन कर ही रहा था कि रसोई से पत्नी, लक्ष्मी की आवाज आई।

‘सुनिए, जरा एक किलो आलू ले आइए।’

‘ठीक है, एक थैला दे दो’, नेकीलाल ने शांत स्वर में कहा।

नेकीलाल उनमें से नहीं है, जो अपने हाथों की अंगुलियों में आधा दर्जन पॉलिथीन की थैलियाँ लटकाए बाज़ार से लौटते हैं और फिर इधर-उधर जमा कूड़े के ढेरों का रोना रोते हैं। वह हमेशा घर से थैला लेकर जाता है। वह तो बाजार आता-जाता भी पैदल ही है। ‘बात केवल पैसे की बचत की नहीं है। देश हित में पेट्रोल और पर्यावरण बचाने की भी है। बाजार है ही कितनी दूर। आधा किलोमीटर भी नहीं होगा, मगर जिसको देखो स्कूटर लिए जा रहा है। फिर शिकायत कि पेट्रोल महँगा है। अरे पेट्रोल खेतों में थोड़ा ही पैदा होता है कि अपनी इच्छा से रेट कम या ज्यादा कर लें? मगर लोगों का क्या। उन्हें तो किसी न किसी बात पर रोना ही है। करना-धरना कुछ नहीं, बस सरकार को कोसते रहो। और जब से ये व्हाट्सएप और यूट्यूब आए हैं तब से तो बेड़ा ही गर्क हो गया है। हर आदमी के पास अतुलित ज्ञान आ गया है। ऐसा लगता है कि हर किसी के पास देश की समस्याओं का समाधान है। केवल सरकार के पास नहीं है।’

इससे पहले कि नेकीलाल का यह राष्ट्रीय चिंतन अंतरराष्ट्रीयता की ओर बढ़ता पत्नी ने थैला थमाते हुए कहा,

‘आज शाम को ऑफिस से थोड़ा जल्दी आ जाना, बाज़ार जाना है।’

‘ठीक है, चलेंगे। क्या खरीदना है?’, नेकीलाल ने विनोदी स्वभाव में पूछा।

‘सोच रही हूँ कि थोड़ा सोना खरीद लें।’

‘क्या, सोना? मतलब गोल्ड!’, नेकीलाल की तो जैसे तपस्या ही भंग हो गई।
‘हाँ सोना, मतलब गोल्ड।’, लक्ष्मी ने वापस रसोई की ओर मुड़ते हुए सहजता से उत्तर दिया।
‘मगर क्यों, क्यों खरीदना है सोना?’
‘क्यों, सोना क्यों नहीं खरीद सकते। सब खरीदते हैं।’
‘मगर आज ही क्यों?’
‘क्यों, आज में क्या खराबी है? देखते नहीं रोज कितना महँगा होता जा रहा है’
नेकीलाल ने, बात बिगड़ती देख, खुद को सँभालते हुए कहा, ‘मेरा मतलब, अचानक सोना खरीदने की क्या आवश्यकता है?’
‘बात आवश्यकता की नहीं, सिद्धांत की है।’ लक्ष्मी की आवाज़ में तल्खी का स्वर था।
‘अरे नाराज़ क्यों होती हो। तुम्हें पता ही होगा, क्या समस्या चल रही है विश्व में आजकल। आज का अख़बार नहीं पढ़ा क्या?’
‘क्या सब खबरें बस अखबार में ही आती हैं? मैं जानती हूँ क्या छपा होगा, इसीलिए कह रही हूँ कि यह सिद्धांत की बात है। मैं पूछती हूँ कि हर बात की सज़ा आम आदमी ही क्यों भुगते। यह मत खरीदो, वह मत खरीदो।’
नेकीलाल का माथा ठनका, ‘ज़रूर लक्ष्मी ने कोई उलटी-सीधी बयानबाजी सुन ली है, जिसका असर उस पर हो गया है।’

समझदार पति-पत्नी वो होते हैं जो तूफान आने से पहले ही हवा का रुख भाँप लेते हैं। इससे पहले कि यह बात राजनीतिक जंग का रूप धारण करती, नेकीलाल ने थैला उठाकर बाज़ार जाने में ही भलाई समझी।

‘भला जिस चीज की हमें जरूरत ही नहीं, वह महँगी हो या सस्ती हमें क्या फ़र्क पड़ता है। और फिर महँगी होने को तो दुनिया में हजार चीजें महँगी हो रही हैं, क्या सब को घर में भर लें? पता नहीं लोग क्यों इस सोने के पीछे दौड़ते हैं?’ ऐसे ही ख्यालों से उत्तेजित नेकीलाल कब बाजार पहुँच गया उसे पता ही नहीं चला।

मगर यह क्या? हर सब्जी के दाम चढ़े हुए हैं। ‘पेट्रोल के दाम बढ़ें, यह तो समझ आता है मगर आलू ! मुनाफाखोरी की भी हद है इस देश में। बस मौका मिलना चाहिए।’

‘क्यों भैया यह आलू अचानक 30 से 35 कैसे हो गया? क्या यह भी ईरान से आता है?’ नेकीलाल ने झुँझलाकर पूछा।
‘हमारे खेत में तो उगता नहीं है साहब, जो अपनी मर्जी से भाव ऊपर नीचे कर दें। हर चीज महँगी हो रही है। सोने का भाव देखो कितना बढ़ गया है।’

फिर वही सोना। बात नेकीलाल की सहनशक्ति के बाहर हो रही थी। ‘लगता है जैसे पूरे देश में गोल्ड रश मचा हुआ है।’

‘सोने का आलू से क्या संबंध, क्या आलू में से सोना निकलता है?’, नेकीलाल ने मजे लेने के अंदाज में कहा।
‘संबंध-वंबंध हम नहीं जानते साहब। मगर यह बात तो सच है कि कोई भी संकट आए पिसती बेचारी गरीब जनता ही है। मैं पूछता हूँ कि हमें ही सोना क्यों नहीं खरीदना चाहिए। गरीब हैं तो क्या हुआ?’

इससे पहले कि नेकीलाल कुछ उत्तर दे पाता, एक भिखारी ने आकर सामने हाथ फैला दिया। नेकीलाल ने आलू के दूकानदार द्वारा लौटाया गया पाँच रुपये का सिक्का उसके हाथ में धर दिया।

‘पाँच रुपए में क्या आता है साहब, कितनी महँगाई है।’, भिखारी ने कहा।
‘क्यों तुझे भी सोना खरीदना है क्या?’, नेकीलाल के मुँह से जैसे अनायास ही निकल गया।
‘अरे नहीं साहब। हम सोने को कहाँ रखेंगे? हमारे पास तो सोने तक का ठिकाना नहीं है। मगर बात सच है साहब। सब चीजों की मार हम गरीबों पर ही क्यों पड़े।’

नेकीलाल कुछ और सुनने की हालत में नहीं था। वह आवेश में मुड़ा और पास ही खड़े एक ऑटो में अपना थैला टिकाकर जल्दी से उसमें बैठ गया। ‘शांति कॉलोनी’।

नेकीलाल को अपनी भूल का अहसास तब हुआ, जब ड्राइवर ने ऑटो स्टार्ट करके आगे बढ़ा दिया और नेकीलाल की आँखों के सामने लगे मीटर में लाल रंग में अट्ठाइस रुपए लिखा हुआ चमका। उसके कानों पर लक्ष्मी का संभावित वाक्य दस्तक देने लगा, ‘इससे अच्छा तो गली में ही पाँच-दस रुपए ज्यादा में खरीद लेती।’ लेकिन अब तो बात हाथ से निकल चुकी थी। ऑटो वाले को अब मना करना ठीक नहीं था। एक तो यह उसके उच्च आदर्शों के विरुद्ध होता और दूसरे वह सुबह-सुबह किसी और नए झंझट को न्यौता नहीं देना चाहता था।

अब उसके लिए सबसे आवश्यक था इस अनावश्यक खर्च और उससे भी अधिक अपने इस ‘सिद्धांत-विरोधी’ कृत्य को उचित ठहराने वाला कोई ठोस कारण तलाश करना और वह भी जल्दी। जब कोई भी तर्क साथ न दे तो क्रोध सबसे बड़ा सहयोगी बन जाता है। नेकीलाल ने भी उसी का सहारा लिया।

पत्नी ने नेकीलाल को ऑटो से उतरते हुए देखा तो बोली, ‘क्या बात है, तबीयत तो ठीक है?’
‘क्यों, मेरी तबीयत को क्या हुआ?’ नेकीलाल ने गंभीर स्वर में कहा।
‘नहीं, ये एक किलो आलू लेकर ऑटो में आए हो।’
‘तो क्या हुआ? मैं क्या ऑटो में नहीं आ सकता?’
‘आ तो सकते हो, मगर आज क्यों आए हो?’
‘क्यों, आज क्यों नहीं आ सकता? जब तुम आज सोना खरीद सकती हो, तो मैं भी ऑटो में आ ही सकता हूँ। सारी ज़िम्मेदारी क्या मैंने ही उठा रखी है।’
‘ओह यह बात है। मुझसे नाराज़ हो।’
‘तुम्हीं से क्यों नाराज़ होऊँ, मुझे तो ऐसा लगता है जैसे सारे हिंदुस्तान को आज ही सोना खरीदना है। हो सकता है सब विदेश जाने की तैयारी भी कर रहे हों।’

अब समझदारी दिखाने की बड़ी लक्ष्मी की थी। उसने मौके की नज़ाकत भाँपते हुए कहा, ‘अरे बाबा मैंने तो ऐसे ही मजाक में कह दिया था। कल से इतने वीडियो देख-देख कर दिमाग खराब हो गया था।’

नेकीलाल को गहरा संतोष था कि केवल तीस रुपए के उस अनावश्यक खर्च की ही नहीं, बल्कि अपने ‘गैर-सैद्धांतिक’ कृत्य की भी सारी ज़िम्मेदारी वह बड़ी सफाई से पत्नी के खाते में डाल चुका था, और सोना खरीदने का राष्ट्रीय संकट भी फिलहाल टल चुका था। फिर भी उसने बनावटी गुस्सा दिखाते हुए कहा, ‘अच्छा मजाक किया तुमने, सुबह-सुबह तीस रुपए का नुकसान कर दिया।’
‘चलो, फिर भी सस्ते में छूट गए।’, लक्ष्मी ने पति के हाथ से थैला लेते हुए नटखट स्वर में कहा।
‘हाँ, यह बात तो है।’ नेकीलाल ने राहत भरे स्वर में कहा और मन ही मन सोचा —
‘मैं तो सस्ते में छूट गया, लेकिन आज कोई न कोई फँसेगा जरूर।’
यशपाल सिंह ‘यश’

जन्म : 1 अप्रैल 1956

जन्म-स्थान : भंगेला (मुजफ्फरनगर) उत्तर प्रदेश

ईमेल : yeshpalsinghyash@gmail.com

फोन : 8920190892

वर्तमान निवास : सी 1202, पायलट कोर्ट, एस्सेल टावर, एम जी रोड, सेक्टर 28, गुड़गांव (हरियाणा)

शैक्षणिक योग्यता : B.Sc., M.A. ( English Literature), CAIIB, Certificate in Food and Nutrition, Post Graduate Diploma in Dietetics and Public Nutrition.

अनुभव : आईडीबीआई बैंक में 37 साल की सेवा के उपरांत 31 मार्च 2016 को उप महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त ।

प्रकाशित लेखन : कविताओं का एक संग्रह, ‘मंजर गवाह हैं’ अप्रैल 2016 में, दूसरा ‘आँखिन देखी’ 2021 में, तथा तीसरा, ‘जीवन गरम चाय की प्याली’, 2022 में प्रकाशित। ‘संपूर्ण भगवद्गीता दोहों में’ 2023 में और ग़ज़ल संग्रह, ‘बूँद भर सागर’ 2024 में प्रकाशित।

अन्य महत्वपूर्ण साहित्यिक गतिविधियां : दूरदर्शन तथा आकाशवाणी से कविताओं का प्रसारण। अपने यूट्यूब चैनल Science and Poetry से भोजन, स्वास्थ्य और विज्ञान संबंधित प्रसारण। लेखों और कविताओं का विभिन्न पत्र/पत्रिकाओं में प्रकाशन।

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