माह के कविः ऋतुराज

भरतवाक्य

नाटक ख़त्म हुआ

अब यहाँ रुकने का कोई अर्थ नहीं है
व्यर्थ होते हुए भी जो टिका है

उसमें विश्वास पैदा करूँ तो चलूँ
अभिनय की कला में सबसे विकट आशंका

संवाद भूलने की नहीं है जितनी कि
मनमाने संवाद बोल जाने की

यही हुआ
ऐसा तो मैंने लिखा ही नहीं था

न कोई अतिवचन किया था नेपथ्य से
फिर भी उनके शब्दों ने अभिनय का अर्थ ही बदल दिया

व्यर्थ हुए को उन्हें याद दिलाऊँ तो चलूँ

कला अनुभव

१)
आस-पास कोई भी चित्र नहीं है अमृता शेरगिल का

सिर ढके कातर आँखों वालीं अँधेरे की स्याही में लिपटीं
औरतें नहीं हैं

सुपर बाज़ार की शेल्फ़ों से विदेशी परफ़्यूम लपकती कोई हैं
नई रानियाँ रवि वर्मा की

जो प्लेटिनम और हीरों से सजीं
हिंसा और प्रेम की कथा गाती फ़िल्म देखने बैठी हैं

हुसैन के भारी-भरकम काष्ठ चेहरे यहाँ बदली हुई शक्लों में
बहुरुपिए बनकर बाज़ार भ्रमण को निकले हैं

भूपेन की तंग गली के मकान की खिड़कियों से झाँकते
हँसते-बिसूरते शिशु चेहरे भी नहीं हैं

सॉफ़्टी, पित्ज़ा, फ़्रेच-फ़्राइज़ खाते बेडौल मोटे बच्चे
वीडियो खेल के लिए कंप्यूटर की ख़ाली सीट के इंतज़ार में खड़े हैं

बहुत पीछे छूट गई है धूल और दया
बहुत पीछे छूट गए हैं अँधेरे में धूमिल प्रकाश के बीच

महाभारत देखते लोग
यहाँ स्वामीनाथन की वह चिड़िया कभी-कभी

तितलियों की तलाश में आया करती थी
लेकिन दो उल्लुओं ने जब से यहाँ बैठना शुरू किया है

वह ग़ायब हो गई है
लकड़ी के काले तख़्तों से चिने हुए शिकारे नहीं खड़े हैं नदी में

इसलिए यहाँ रामकुमार भी नहीं हैं
आठ-दस मंज़िला इमारतों के स्वर्ग की ओट में

चाँद छिपा खड़ा है
सूरज दूसरी तरफ़ से बाँहों में कस रहा है पानी की टंकियों को

मानो छत पर लड़ाई चल रही हो पानी और प्रकाश के लिए
एक बहुत बड़े जूते में रखे मोबाइल के लिए

चिंचलांकर यहाँ क्यों आएँगे
जूट से बने झूले की जगह यहाँ रोप-वे जो है

जीवन की सपाट सतह को लुभावनी रखने के लिए
अनेक सौंदर्य प्रसाधन हैं

लेकिन कटी-पिटी खरोंचें भरी आत्मा की मूरत पर
अनंत अतृप्ति की व्याकुलता है

शायद अभी तक यहाँ रवींद्र की बूढ़ी छाया
सँवलाई धूप में ठहरी है

कला अनुभव
२)
भिन्न-भिन्न कला वस्तुएँ इतनी भिन्न तो नहीं हैं

उनमें व्यर्थता का भाव लगभग एक जैसा है
उनके प्रशंसक ख़रीदार समान हैसियत के लोग हैं

वे जो बैंकों से मोटी रक़म उधार लेकर अपनी पूँजी बढ़ा रहे हैं
बीच के रास्ते से निकलते हुए

हाशिए के लोगों पर दयादृष्टि डाल रहे हैं
ऐसे करोड़ों लोगों के वास्ते जीवनयापन के

न्यूनतम साधन उपलब्ध करवा रहे हैं
फिर भी इन वस्तुओं पर अलग-अलग नाम क्यों लिखे हैं

हाशिए के व्यक्तियों को हाशिए पर नाम लिखने में
शायद लज्जा आई होगी

शायद नाम को संक्षिप्त करते वक़्त ख़ुद को बहुत लघु समझा होगा
हो सकता है वस्तुओं के खेल में यह मात्र प्रपंच हो

शायद यह नाम और वस्तु और उपभोक्ता के बीच में
एक आध्यात्मिक संवाद का संचार हो

क्योंकि उसकी क्रय-शक्ति नाम को कैसा भी अर्थ दे सकती है

कितना प्रामाणिक था उसका दुख
लड़की को दान में देते वक़्त
जैसे वही उसकी अंतिम पूंजी हो

लड़की अभी सयानी नहीं थी
अभी इतनी भोली सरल थी
कि उसे सुख का आभास होता था
लेकिन दुख बाँचना नहीं आता था
पाठिका थी वह धुंधले प्रकाश की
कुछ तुकों और लयबद्ध पंक्तियों की

माँ ने कहा पानी में झाँककर
अपने चेहरे में मत रीझाना
आग रोटियाँ सेंकने के लिए है
जलने के लिए नहीं
वस्त्र और आभूषण शब्दिक भ्रमों की तरह
बंधन हैं स्त्री-जीवन के

माँ ने कहा लड़की होना
पर लड़की जैसी मत दिखाई देना।


लहर

द्वार के भीतर द्वार
द्वार और द्वार
और सबके अंत में एक नन्हीं मछली
जिसे हवा की ज़रूरत है
प्रत्येक द्वार
में अकेलापन भरा है
प्रत्येक द्वार में
प्रेम का एक चिह्न है
जिसे उल्टा पढ़ने पर मछली
मछली नहीं रहती है आँख हो जाती है
आँख
आँख नहीं रहती है
आँसू बनकर चल देती है बाहर
हवा की तलाश में

सड़क का कर्ज था शिरीषों पर
निर्जन पगडंडी के बजाए
साफ-सुथरा रास्ता सब के लिए
और लो, जो तुम बीच में
अड़े हो
अपना सर्वस्व दे दो
दूसरों के लिए

इससे पहले कि धड़ अलग होंगे
फूटने दो फलियाँ फैलने दो बीज
कि चारों तरफ शिरीष-संतति रहे
भले ही हम न हों
न हो हमारा कर्ज उनके माथे

सब कोई आए अपना धन माँगने
ब्याज में फूल परागण
गंध देने से नहीं चला काम
कोयलों की कूक बुलबुलों के गान
तितलियों के नाच
सब व्यर्थ गए

सूदखोरों ने कहा ‘सिर्फ अधूरे ब्याज से
नहीं चलेगा काम
सिर्फ छायाएँ नहीं होतीं विश्राम
सिर्फ सुगंध से नहीं होती
मूलधन की वापसी
जन्म लेने से पहले तुम्हें सोचना था
कि भविष्य जीवन-मृत्यु का
संघर्ष होगा’

‘अन्नदाता, हम इस संसार से
चले जाते हैं
पर तब भी क्या
हमारे परिवार को काटेंगे पीटेंगे’

‘नहीं, तब नहीं
जब तुम्हारा कोई जमानती नहीं होगा’
नहीं, नहीं, नहीं
सड़क पर
घूमता था रोडरोलर
वे शिरीष जो अब नहीं रहे
कोई उनसे क्या कहेगा

मरूँगा नहीं

दूसरे-दूसरे कारणों से मारा जाऊँगा

बहुत अधिक सुख से
अकठिन सहज यात्राविराम से

या फिर भीतर तक बैठी
जड़ शांति से

लेकिन नहीं मरूँगा
कुशासन की कमीनी चालों से

आए दिन के मिथ्या स्पष्टीकरणों से
रेल आरक्षण की अनुपलब्धता से

पत्नी, बच्चों की लौट आने की
गुहार से तो क़तई नहीं

अनमिले मित्रों के भटकाव भरे
रास्तों पर चलने से बिल्कुल नहीं

इस सूखी धरती के
आक-धतूरे की प्यास देखकर

शायद और भी अधिक
जीवित हो रहूँगा

-ऋतुराज

ऋतुराज (1940–2026)
जन्म: 10 फ़रवरी 1940, भरतपुर, राजस्थान
निधन: 26 अक्टूबर 202६
The Indian Express
आप प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और लगभग चार दशक तक अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ाया। आपकी कविताएँ सामाजिक असमानता, हाशिए के जीवन, स्त्री‑अनुभव, भूख, गरीबी और मानवीय संवेदना को गहरी मार्मिकता के साथ व्यक्त करती हैं और वंचितों, पीड़ितों और समाज के हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ मानी जाती हैं।

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