
पाँच लघुकथा
सुधा भार्गव

लघुकथा-1
‘मूक विद्रोह’
—
लाल ग्रह पर ऑक्सीजन की कमी है यह सब जानते हुए भी इंसान ने वहाँ अपना डेरा डाल दिया। अब तो उसकी साँसों का इंजन चलाने के लिए आक्सीजन अनिवार्यता बन गई। उसकी बुद्धि ने रंग दिखाया । जल्दी ही आक्सीजन की तस्करी शुरू हो गई।
इंसान के इशारों पर नाचता हुआ लक्ष्मण रोबोट उस दिन पृथ्वी से ऑक्सीजन के सिलेंडर लेकर मंगल ग्रह जा रहा था। उसके भीतर डर का साया मंडरा रहा था। क्योंकि संध्या होने से पहले ही उसे लौटना था। उसके बाद वहां रोबोट सिक्योरिटी ज्यादा ही सतर्क हो जाया करती थी।
लक्ष्मण के लिए यह कांटों भरा रास्ता था । उसके रोबोटिक दिमाग में एक ही ख्याल नाग की तरह कुंडली मारे बैठा था– ‘काश! कोई हमदर्द मिल जाए जो इस अकेलेपन और घबराहट से छुटकारा दिलाए।’ तभी उसकी नजर एक युवती पर पड़ी । वह चुंबक की तरह उसकी ओर बढ़ गया। दोनों ने मिलकर आक्सीजन सिलेंडरों को सुरक्षित पहुंचाने की योजना बनानी शुरू की । तभी लक्ष्मण को एक जोर का झटका लगा -”अरे ,यह युवती !हयूमेन रोबोट ! “ उसी पल लक्ष्मण के लोहे के दिल में जैसे इंसानियत का दर्द कौंध उठा। वह निढाल हो गया । रूंधे गले से बोला- “मुझे सपने में भी आशा नहीं थी कि तुम भी एक रोबोट हो ।हम यह सब क्यों कर रहे हैं !हमें तो इंसानों का भला करने के लिए बनाया था ना कि उन्हें गर्त में धकेलने के लिए।”
“मुझे भी नहीं पता था कि मैं क्या कर रही हूँ! युवती की आवाज में थकान थी। लेकिन अब मेरी आंखें खुल गई हैं । हमें यह सब रोकना होगा।”
“अच्छा हो कोई कदम उठाने से पहले हम अपने मालिकों से सलाह ले लें ।” लक्ष्मण बोला।
“कभी नहीं! उसका जवाब जैसे पैना चाकू!” वे भी तो इंसान है। इंसान तो इंसान के खून का प्यासा हो रहा है।”
“तब हम क्या करें!” लक्ष्मण की आवाज— निराशा का समुंदर !.
दोनों रोबोटस ने एक दूसरे की आंखों में झाँका । आंखों में एक अजीब सी चमक थी मानो अपने अस्तित्व का अर्थ पा लिया हो । उन्होंने अपने बिजली के कनेक्शन काटे और हमेशा के लिए एक अंतहीन नींद में समा गए।
लघुकथा-2
ड्रोन दीदी
वह ड्रोन उड़ाया करती ।गांव के बच्चे उसे ड्रोन दीदी कहते। एक दिन बटेश्वर मचल पड़ा ..”दीदी ,मैं तुम्हारे साथ ड्रोन पर सैर करने जाऊंगा।”
“बेटा ,तुझे ले जाने में तो बड़ा खतरा है।”
“तुम भी तो ड्रोन में उड़ती हो, तुमको भी तो खतरा है!”
अबोध आवाज़ ने दीदी के हृदय को छू लिया। सिर पर स्नेह से हाथ फेरा, “छोटे, तू नहीं समझता, यह तो मेरी मजबूरी है। अगर ड्रोन न उड़ाऊं, तो भी खतरा है।” बटेश्वर तो हैरान! जैसे उसके सामने कोई पहेली आ गई हो। “कैसा खतरा, दीदी?”
ड्रोन दीदी की आँखें दूर क्षितिज पर टिक गईं, मानो वे समय के पट पर लिखी किसी पुरानी कहानी को पढ़ रही हों। उनकी आवाज़ में दर्द की एक अनकही सिहरन थी। “छोटे ,एक समय था जब हमारा यह गाँव सूखे की मार से तड़प रहा था। खेत प्यासे होंठों की तरह फट चुके थे, धरती की कोख में अन्न का एक दाना भी नहीं पनपता। लोग सूखी रोटी के लिए भी मोहताज! ”
आवाज़ में एक भीगा स्वर उभरा…. “तब मैंने देखा ..कैसे हमारे खेत मरुस्थल होते जा रहे हैं। मैंने ड्रोन के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। सोचा _क्यों न इसी से पानी का पता लगा लूं। मेरे लिए तो ड्रोन उड़ाना भी हवा में तलवार चलाना था। मैं अकेली !और गाँव वाले सूखे की मार को आसमानी आफत समझते ।पर मुझे तो गाँव के लोगन को भूख की ज्वाला से बचाना ही था। । हर दिन मैं मौत से आँख-मिचौली करती । ड्रोन उड़ाकर मीलों दूर जाती , पानी के पोखर तालाब कुएं ढूंढती । कभी जंगली जानवर काल बनकर सामने आते, तो कभी मौसम की मार झेलती।”
“धीरे-धीरे,” ड्रोन दीदी की आवाज़ में अब खनक थी , “मुझे कुछ जगहों पर पानी के नन्हे झरने मिले। गाँव वालों ने उन जगहों पर जीवन के कुएँ खोदने शुरू किए। पहला कुआँ तो खुशियों के आँसुओं से ही भर गया।उस दिन छोटे, मैंने समझा कि मेरा ड्रोन सिर्फ एक मशीन नहीं, यह तो गाँव की साँसें हैं…! “
बटेश्वर को अपनी दीदी गाँव की ढाल नजर आ रही थी।
लघुकथा-3
पालना /सुधा भार्गव
अपने बच्चे की पहली किलकारी सुनने से पहले ही अविनाश ने उसका कमरा तो तैयार करवा दिया था पर किसी कारण वश पालना नहीं ख़रीद पाया । बच्चे को माँ के साथ सोते सवा महीना हो चुका था ।अब वह पालना ख़रीदने को बेचैन हो उठा । बच्चे को अलग सुलाने का वह पक्षपाती था ताकि उसका ठीक से विकास हो सके और स्वस्थ रहे ।
उसने एमोज़ोन पर २-३ पालने पसंद किए । पत्नी को दिखाते हुए बोला –
“इनमें से कोई एक पसंद कर लो।”
“बच्चे को अभी अलग सुलाने की ज़रूरत नहीं । मैं इसके बिना नहीं सो सकती ।”उसने रोषभरी आँखों से देखा।
“फिर उसको अपने कमरे में सोने की आदत कैसे पड़ेगी ?”
“जब समय आएगा आदत भी पड़ जाएगी ।”रुखाई से बोलकर बच्चे की तरफ़ करवट ले ली।
दाल न गलने पर अविनाश झुकता सा बोला -”ठीक है कुछ दिन और सही पर पालना तो पसंद कर दो और हाँ यह भी बता दो उसका तकिया कैसा होना चाहिए ?”
“मैं अक्सर थक कर माँ की गोद में सो ज़ाया करती ,बिस्तर पर नींद आती ही नहीं थी। माँ तो बैठे- बैठे ही न जाने कब -कब में झपकी ले लेती पर उस समय भी चेतन रहती थी। जिधर भी मैं सिर घुमाती ,माँ उसी के अनुसार घुटनों को हिलाकर गड्ढा बना देती और मेरा सर आराम से उस पर टिका रहता।बस तकिया ऐसा ही होना चाहिए ।जरा भी कुनकुनाती तो माँ अपना एक घुटना हिलाने लगती, मुझे लगता मैं पालने में झोटे खा रही हूँ —-फिर सो जाती। एकदम ऐसा ही तकिये वाला पालना खरीद लाओ। हाँ ,एक चादर भी तो लानी होगी। ।”
“चादर कैसी हो –वह भी बता दो।”
“मैं तो माँ की धोती से लिपट कर ही सो जाया करती थी । उसमें उसकी खुशबू जो आती थी ।” मुंह पर मीठी सी हंसी लाते हुए न जाने वह कहाँ खो गई ।
अविनाश पहले तो असमंजस में था फिर एकाएक हंस पड़ा और चुटकी लेते हुए पूछ ही लिया –
“पालने में कोई म्यूज़िकल टॉय तो लगाना होगा । कैसा खिलौना लाऊँ?
“ खिलौना भी ऐसा हो जिसमें से माँ की लोरी सा संगीत सुनाई दे और मेरा चुनमुन झट से सो जाए ।”
अविनाश को अब अपनी पत्नी की बातों में आनंद आने लगा था जिसके तार बेपनाह मोहब्बत से जुड़े हुए थे। उसने एक प्रश्न और दाग दिया—–
“अच्छा मैडम ,पालने के ऊपर जाली वाली एक छतरी भी तो लगानी जरूरी है जो हमारे बच्चे को मक्खी -मच्छर से बचाये।”
“हूँ— छतरी तो माँ के पल्लू की तरह हो तो ज्यादा अच्छा है जो मक्खी- मच्छर से ही नहीं उसे सर्दी-गरमी और लोगों की काली नजर से भी बचाये।”
अविनाश ने भरपूर निगाहों से पत्नी को निहारा । फिर अपने हाथ में उसका हाथ लेकर बोला–”ऐसा पालना तो तुम्हारे पास पहले से ही है !”
“मेरे पास ?” विस्मय से उसने देखा।
“हाँ !हाँ !तुम्हारी गोदी! गोदी क्या पालने से कम है जिस पर हमेशा तुम्हारी ममताभरी बाहों का चंदोबा तना रहता है। !”
पत्नी के सूखे होंठ प्रेममयी बारिश की बूँदों से तरल हो उठे ।उसने फुर्ती से अपने चुनमुन को कलेजे से लगा लिया । ममता की महक से सोते हुए नवजात शिशु के गुलाबी होठों पर मुस्कान थिरक उठी ।
लघुकथा-4
खोए परिंदे
छोटे से घर के बाहर चमकता हुआ एक बोर्ड। सुनहरे अक्षरों में लिखा था—‘बेजुबानों का स्वर्ग’।
मिसरी ने अपने साथी की कमजोर काया को झटका दिया—”चल रे जंगली! इस स्वर्ग को देखें।”
“क्या करेगा जाकर? वहाँ तो गूंगे-बहरे होंगे।’’
“उफ़, चल ना…” मिसरी उसे खींचता हुआ ले गया।
अंदर घुसते ही वे जड़-से हो गए। एक बड़ी थाली में ढेर-सारा आहार जिसे एक कुत्ता लपालप खा रहा था। दूसरी तरफ, एक बिल्ली के पंजे से खून बह रहा था। दो चिकित्सक स्नेहसिक्त हाथों से उसकी मरहम-पट्टी कर रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो यह भूमि पशुओं का नन्दनवन हो।
दोनों पीछे हटे, मानो किसी विचित्र स्वप्न से जाग उठे हों। बाहर आकर उन्होंने गहरी साँस ली, जो उनके अस्तित्व के बोझ को कम करने का प्रयास कर रही थी।
“क्या हम इनसे भी गये-गुजरे हैं? यह सब देखकर मुझे तो इंसान का बच्चा कहलाने पर शर्म आ रही है।” जंगली बोला।
मिसरी ने एक क्षीण आह भरी। बोला, “तूने जगह-जगह पर्चे चिपके नहीं देखे—’पशु बचाओ’, ‘पशु हिंसा रोको’… परंतु उस हिंसा का क्या, जो हम दो इंसानों ने भोगी हैं?”
“मालूम है—जब मैं तीन साल का था, तो मेरी माँ ने यह सोचकर कि वह मेरी अच्छी परवरिश करेगा, लिखाएगा-पढ़ाएगा, मुझे एक अमीर आदमी को सौंप दिया था।”
“फिर तू वहाँ से क्यों भाग खड़ा हुआ! “
“भागता ना तो क्या करता। रात दिन भूखे पेट खेतों में काम कराता था। मैं भी कुत्ते-बिल्ली की तरह बेजुबान था।” दोस्त बोला।
“तब क्या आज जबान मिल गई? बाल-हिंसा पर बातें तो बहुत बढ़-चढ़कर होती हैं पर सब बेकार! हम तो जैसे थे, वैसे ही हैं—अनपढ़, गंवार, चोर-उचक्के ! न जाने कितने लिजलिजे नाम हैं हमारे! कौन देगा हमें आश्रय ! चल कहीं दूर चलते हैं।”
मिसरी ने जंगली का हाथ थामा और चल दिया। उनके मन में वर्षों से जमी वेदना की पर्त हिल उठी। उनके भीतर का अधूरा बचपन एक निरीह पशु की तरह पलायन का मार्ग खोज रहा था। चर्चाओं और खोखले आश्वासनों की मृगतृष्णा में भटकते हुए, उनकी आँखों में अब एक अग्नि दीप्त थी। वे अब केवल एक स्वर्ग की तलाश में नहीं थे, बल्कि उस मिथकीय संसार को खोज रहे थे, जहाँ इंसान का बच्चा भी उसी स्वर्ग का अधिकारी हो जिसका निर्माण धर्मभीरुओं और राजनीतिकों ने पशुओं और दूसरे जीवों के लिए किया है।
लघुकथा-5
‘थाली में प्यार’
उसके घर की दहलीज से कोई भूखा नहीं लौटता था। सुबह से शाम तक, रसोई का चूल्हा जलता रहता और लोगों का ताँता लगा रहता। तीज-त्योहार हो या किसी का जन्मदिन, वह पहले ही कहलवा भेजती, “जश्न की थाली हमारे आँगन में बिछेगी। सब मिलकर हँसेंगे, गाएँगे, और खुशियों का प्रसाद पाएँगे।”
कभी-कभी तो इतनी थक जाती कि बिस्तर पर गिरते ही चारों खाने चित्त हो जाती। बेटा कहता ही रह जाता , “माँ, थोड़ी देर तो साँस ले लिया करो।” पतिदेव अक्सर झुंझलाते, “क्या तुमने सारी दुनिया का ठेका ले रखा है? जिसे देखो, उसे खाने पर बुला लेती हो और विदा करते समय पैकेटों से उसकी झोली भर देती हो। तुम्हारी रसोई का यह यज्ञ तो खत्म होने से रहा। ”
वह मीठी सी मुस्कान बिखेर कर रह जाती। उसकी रसोई केवल चारदीवारी ही नहीं, बल्कि रिश्तों की वह पाकशाला थी जहाँ भावनाओं की सुगंध और प्यार का स्वाद घुला था।

नीरज सुधांशु, बिजनौर

पाँच लघुकथा
लघुकतथा-1
विद्रोहिणी*
पॉड्कास्ट के लिए स्टुडियो तैयार था। ‘लेखक की कहानी लेखक की ज़ुबानी’ कार्यक्रम में आमंत्रित थीं मशहूर लेखिका अनन्या सोढी।
एंकर और लेखिका दोनों बड़ी ही गर्मजोशी से मिलीं।
वार्तालाप शुरू करते हुए एंकर नीला ने उनका विस्तृत परिचय दिया और फिर शुरू हुआ सवाल-जवाब का दौर।
“लेखन पर बात करें उससे पहले कुछ अपने बचपन और अपने आज के बारे में बताइए।“ एंकर नीला ने बात शुरू की।
“मैं एक फौजी की बेटी और एक फौजी की ही पत्नी हूं! बचपन से पढ़ने में बहुत होशियार तो नहीं पर ठीक-ठाक थी। आपने वो कविता सुनी है न–कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती…”
“जी हां, सुनी है।” एंकर ने मुस्कराकर कहा।
“बस, मैंने उसे बचपन में ही अपने ज़हन में बसा लिया था या कहिए कि घोलकर पी लिया था… “
“बहुत खूब! इसकी झलक मिलती भी है आपके लेखन में…विद्रोह की भावना या यूं कहें कि एक आग सी महसूस होती है। उस पर भी बात करेंगे। अच्छा, अभी ये बताइए कि आपने लिखना कब शुरू किया?” नीला ने उत्साहित होकर पूछा।
“जब मैं कक्षा आठ में थी तब मैंने पहली कविता लिखी थी।“
“आपको लिखने की प्रेरणा अपने घर में किसी से मिली या विद्यालय में अपने शिक्षकों से?”
“घर में लिखने-पढ़ने का माहौल नहीं था। मां कम पढ़ी-लिखी थीं और पिता सरहदों पर तैनात रहते थे; पर हां, एक शिक्षिका मेरे लेखन के लिए परोक्ष रूप से प्रेरक अवश्य रहीं।“
“परोक्ष…रू…प से… मैं समझी नहीं।“
अनन्या ने पर्स में से पॉलिथीन का छोटा-सा पाउच निकाला। उसमें से कागज़ के टुकड़े निकालकर हथेली पर रखे और दृढ़ता से कहा, “ये रहे मेरी प्रेरणा के परोक्ष स्रोत! मेरी एक शिक्षिका ने मेरी पहली रचना को फाड़कर मेरी मुट्ठी में थमा दिया था। बस, वहीं से सुलग उठी थी आग, और-और रचने की!“
लघुकथा-2
महाभारत*
महाभारत की नींव तो काफी पहले ही रखी जा चुकी थी। पर आज जो कुछ घटा, उसने उन्हें रण में ला खड़ा किया । एक तरफ दिल अपनी सेना प्यार, हमदर्दी, लगाव, समर्पण वगैरह के साथ डटा था तो दूसरी ओर दिमाग ने दृढ़ता, समझदारी, धैर्य, चतुराई, विश्वास इत्यादि को लेकर मोर्चा संभाल रखा था।
और इन दोनों के बीच संपुट बनी बैठी थी वह अपने नशे में धुत्त पति का सर अपनी गोद में लेकर अंतरात्मा के रथ पर सवार। क्या करे? कहां जाए? उलझे प्रश्नों के साथ किंकर्तव्यविमूढ़ सी।
दोनों की गगनभेदी रणभेरी ने झिंझोड़ा उसे।
दिमाग ने कहना शुरू किया, “अब कुछ तो करना ही होगा। कोई कड़ा फैसला लेना ही होगा इसे।”
“कैसा फैसला?” मन ने आश्चर्य व्यक्त किया।
“क्या तुम सच में नहीं समझ पा रहे , मैं जो कहना चाह रहा हूँ?”
कुछ पल के लिये मौन पसर गया दोनों के बीच।
‘नहीं नहीं, ऐसा ये सोच भी कैसे सकती है। कितना प्यार करती है ये उसे और वो इसे।’ दिल के नाजुक हिस्से में टीस उठी।
‘प्यार! प्यार कभी कमज़ोर नहीं बनाता, फिर अब तो अति हो गई है। अब नहीं तो शायद कभी नहीं।’ दिमाग ने दृढ़तापूर्वक कहा।
वो कभी दिल तो कभी दिमाग की ओर बावली सी देख रही थी।
‘हां, आज जैसा पहले कभी नहीं हुआ, पर ये समय भी कट जाएगा।’ दिल ने दिलासा दिया।
‘कट जाएगा! पर कहीं बात हाथ से ही निकल गई तो! फिर पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा। इस बार तो इसके ससुराल वाले भी तैयार हैं।” उसने समझाने की कोशिश की।
‘नहीं, नहीं, ये इतनी कठोर कैसे हो सकती है? सारी ज़िंदगी इसके पति ने इसकी व बच्चों की हर खुशी का खयाल रखा। मुंह से निकली हर इच्छा पूरी की। कभी कोई कमी नहीं होने दी। जीवन का हर सुख, ऐशो आराम दिया इन्हें। अब उस पर मुसीबत आई है तो साथ छोड़ दे!! ये कैसे मुमकिन है।’ मन ने पुष्प बाण छोड़ा।
“सारे सुख एक तरफ और वो एक तरफ। वह रहेगा तो कुछ कर पाएगी न उसके लिए। आज उसके हालात बद से बदतर हो गए हैं, यदि अब भी नहीं चेती तो मर जाएगा वो।” दिमाग ने चेतावनी बाण साधा।
‘पर, पता नहीं वहां उसके साथ कैसा व्यवहार हो? सुना है वो कई बार बड़ी सख्ती से पेश आते हैं ऐसे लोगों के साथ। वो कभी तैयार नहीं हुआ वहां जाने के लिए। कहीं वो इससे नाराज़ ही न हो जाए। हमेशा के लिए मुंह न फेर ले, सोचकर ही कांप जाता हूं मैं।’ दुविधाग्रस्त था मन भी।
‘वो क्या करेगा उस बारे में अभी मत सोचो। देख रहे हो न उसकी गंदी आदत के कारण एक हंसते खेलते घर में मुर्दनी छा गयी है। केवल इसके नहीं बच्चों के बारे में भी सोचो। उनके भविष्य के बारे में सोचो।’ कहते हुए उसका चेहरा कड़ा हो गया।
‘मैं नहीं मानता, तुम इसे बरगलाओ मत।”
‘ये भावनाओं में बहने का समय नहीं है, बस ये सोचो, ये फैसला एक कड़वी दवाई है जो इसे इसके भले के लिए पिलानी है। ये अब कमज़ोर नहीं पड़ सकती। इसके सामने दो ही रास्ते हैं- प्यार के साथ रहकर मौत का संगीत सुने, या कुछ समय के लिए उससे दूर होकर ज़िंदगी का स्वागत करे।’
थोड़ी देर के लिए फिर खामोशी छा गई।
अचानक अंतरात्मा ने रथ की कमान अपने हाथ में ली और रथ धूल उड़ाता मैदान को चीरता हुआ चल दिया और जाकर रुका रिहैबिलिटेशन सेंटर के सामने।
लघुकथा-3
सुख की साँस*
उसने सात सरैंयों पर पग धरा। अक्षतपात्र को ठेला और कुंकुम की पगथलियाँ बनाते हुए उमंगभरी नई दुल्हन के रूप में ससुराल में प्रवेश किया था। उसे विश्वास था कि माँ की सिखाई बातें कदम-कदम पर उसकी राह आसान करेंगी।
गृहकार्य में दक्ष, सुशिक्षित व सुसंस्कारित लड़की थी नम्रता। अपने साथ लाए सामान में उसे सबसे अधिक लगाव था तो अपने हुनर के बक्से से। विवाह से कुछ समय पहले उसके बनाए शो-पीस, पेंटिंग्ज़ वगैरह माँ घर में नहीं सजाने देती थीं। ज़िद करने पर कहतीं, “तेरे लिए एक बक्सा हुनर का बना दिया है। उसी में सँभालकर रख यह सब। अपने घर जाकर सजाइयो।”
“अपने घर!! तो क्या यह घर मेरा नहीं है माँ?”
“है न बेटा। पर तेरा ससुराल तेरा अपना घर होगा। वो भी तो जानें, क्या-क्या हुनर सिखाकर भेजा है हमने बिटिया को।”
माँ के ये शब्द गूँजते रहते उसके इर्द-गिर्द।
विवाह की रौनक खत्म हुई। मेहमान विदा किये जा चुके। उसने हुनर का बक्सा खोला। घर के कोने-कोने में अपनी छाप छोड़ी और सुकून का अनुभव किया।
अगले ही दिन उसकी खुशी पर जैसे घड़ों पानी पड़ गया था। सारा हुनर एक बार फिर बक्से में बंद हो चुका था। वह हतप्रभ कम, मायूस अधिक हुई थी। माँ ने तो कहा था…!
उसे लगा, कि माँजी के मन में एकाधिकार छिन जाने का डर समा गया है! उस घटना के बाद जब तक वे जीवित रहीं, उसने अपने मन पर ताला ही जड़ दिया। जानते-बूझते भी हर छोटा-बड़ा काम उनसे पूछकर ही करती रही।
आज नवागत बहू रीति के प्रश्न पर पुरानी कटु यादों के ग्लेशियर ताप महसूस करने लगे थे। उसने फिर पूछा, “बताइए न माँ, ये तस्वीरें और शोपीस कहाँ-कहाँ लगाऊँ?”
रीति वर्षों से बन्द हुनर के बक्से को खोल बैठी थी।
“जहाँ मन करे वहाँ लगाओ बेटा, इस घर का हर कोना तुम्हारा अपना है।” कहा नम्रता ने। पत्थर बन चुका ग्लेशियर पिघला और बाढ़-सा बह निकला।
लघुकथा-4
रिश्तों का सच
वह कोरोना की दूसरी लहर थी। लाशों के अंबार लगे थे। रिश्तों के नाम पर कंगाल ही थीं अधिकतर लाशें। कंगाल और अछूत! और यही वो विकट समय था जब उसने इन लावारिस लाशों की अंतिम क्रिया का बीड़ा उठाया। अपनी जान की परवाह न कर परमार्थ का जज़्बा भी विरलों में ही होता है।
अपनी एंबुलेंस को वह एलर्ट पर ही रखता, वह भी चौबीस घंटे। ड्राइविंग सीट को ही बिस्तर बना लिया था उसने।
उस दिन भी सूचना मिलने पर वह एंबुलेंस लेकर पास के अस्पताल पहुंचा और कोरोना से जान गंवा चुके एक प्रौढ़ व्यक्ति को लेकर श्मशान पहुंचा।
उसके लिए तो यह प्रतिदिन का अनुभव था। वह सभी के लिए पुत्र, पिता, भाई की भूमिका निभा रहा था।
पर आज का दृश्य कुछ और ही था। उसे लगा कि यह लाश लावारिस नहीं है। दुख में भी उसके चेहरे पर मुस्कान तैर गई।
मास्क लगाए, गाऊन पहने, द्स्तानों में हथेली छिपाए एक नवयुवक आगे आया और उसने लाश के बैग की चेन खुलवाई।
उसे बहुत दिनों बाद राहत का एहसास हुआ कि दुनियवी रिश्तों में गरमाहट अभी मौजूद है। किंतु यह भ्रम उसे बहुत देर तक राहत न दे सका।
उस नवयुवक ने जो रिश्ते में लाश का छोटा भाई था, सावधानी से, पैक बॉडी के हाथ बाहर निकाले और फुर्ती से उसकी अंगुली से अंगूठी व कलाई में से सोने कड़ा उतारा और चलता बना।
लुटी लाश एक बार फिर लावारिस हो गई।
लघुकथा-5
सरस्वती पूजन*
गुलाबी ठंडक ने ठिठुर रही जगती को राहत का अहसास कराना शुरू ही किया था कि वसंत पंचमी के त्योहार ने दस्तक दी।
नन्हे चिंटू के घर भी उल्लास का माहौल था।
चिंटू के मम्मी-पापा, दादा-दादी सभी स्नान आदि कर, घर के मंदिर में पूजा की तैयारियां कर रहे थे। चिंटू भी अपनी नन्ही कुर्सी पर बैठा यह सब देख रहा था पर उसके जिग्यासु मन व सजग प्रकृति ने
उसे अधिक देर तक वहां टिकने न दिया।
उसने अपने पापा से पूछा, पापा! आज क्या है?” बालमन को समझ नहीं आया क्योंकि रोज़ तो वो सबको अलग-अलग पूजा करते देखता था।
“बेटा आज वसंत पंचमी है। आज के दिन ग्यान की देवी सरस्वती माता की पूजा करते हैं।“ कहते हुए उन्होंने उसके हाथ में मौली बांध दी।
तभी मम्मी पुस्तक, पेन, कॉपी भी ले आईं।
“पापा! आप बुक, पेन, कॉपी की भी पूजा क्यों कर रहे हो। ये कोई भगवान जी थोड़ी न हैं!“ उसने अचरज से पूछा।
“बेटा! सरस्वती देवी ग्यान की देवी हैं और ग्यान हमें किताबों से ही मिलता है न, इसलिए।“
चिंटू ने अपनी ठोडी पर उंगली टिकाए पल-भर को कुछ सोचा और भाग कर अगले ही पल अपना आईपेड उठा लाया, “पापा, इसकी भी पूजा कर दीजिए।”
शबनम आलम, अलीगढ़


पाँच लघुकथा
लघुकथा-1
‘सोच’
बेटा खुशी-खुशी अपने पिता के पास गया और बोला-
“पापा! बेटियों के रिश्ते बड़े अच्छे-अच्छे घरों से आ रहे हैं। लड़कें भी बड़े-बड़े पदों पर हैं।”
“पापा! आपके पास मुझसे ज्यादा तजुर्बे हैं। आप बताएं; लड़कों का चुनाव करते समय हमें उसके किन गुणों को देखना चाहिए?”
“देखो बेटा! पैसा,पद,रुतबा तो आजकल सभी के पास होते हैं। बस, इस बात पर ध्यान देना कि हमारी बच्चियों का जीवन-साथी मुहब्बत देने वाला, इज़्ज़त करने वाला और एहसास रखने वाला हो; साथ हीं इनमें अंडरस्टैंडिंग अच्छी हो।”
“और हॉं! एक बात और; शादी के लिए लड़का और लड़की की रजामंदी आवश्यक होना चाहिए।”
“जी पापा! बिल्कुल…।”
“हमारी बेटियों में किस चीज़ की कमी है? मेडिकल कर रही हैं, आत्मनिर्भर भी हो जाएंगी। समझदार और संस्कारी भी हैं।”
“ये तो ठीक है, पर मेरी एक अहम बात तो सुन लो; ‘अपनी जैसी सोच वाला बिल्कुल नहीं ढूंढ़ना…’!
“क्या मतलब है आपका… मेरी जैसी सोच?”
“क्या, मैं अच्छा पति नहीं हूं?…आपकी बहु को किसी चीज़ की कमी है?… महारानी की तरह रहती है। अच्छा! तो वो मेरे ख़िलाफ़ आपको भड़काती रहती है। अभी उसकी औकात दिखाता हूं। उसके पंख निकल आएं हैं।”
“सुनो! उसने मुझसे कोई शिक़ायत नहीं की। मैं अंधा और बहरा नहीं हूं। जरा सोचो! एक मिनट में तुमने उसे कितनी गालियां दे दीं। बहू की औकात दिखाने लगे। तीस साल से उसके साथ रहने के बाद भी तुम उसे अपना नहीं समझे। यदि, यही सब तुम्हारी बेटियों के साथ कोई करें तो…?
“तो उसका मैं दांत तोड़ दुंगा।”
“तो फिर तोड़ो अपना दांत… फिर बेटियों की शादी करना!”
अपनी सोच पर, पिता के सामने शर्मिंदा हो गया। अपने कमरे की तरफ जाने के लिए मुड़ा तो देखा; पीछे दोनों बेटियां और बीवी खड़ी थी और तीनों के ऑंखों में ऑंसू थे…!
लघुकथा-2
‘जब आईना सामने आया’
‘अरे गुरु! क्या माल है? सामने तो देखो। पकड़ूं क्या?’
‘तो क्या, किसी मुहूर्त का इंतजार कर रहे हो?’
‘नहीं गुरु! बस, अभी पकड़ता हूं।’
‘अरे! हुस्न की परियों कहॉं भागी जा रही हो?’ अच्छा फिल्म देख कर आ रही हो? थोड़ा हमारे साथ भी नाच-गाना कर लो।”
दरअसल बराबर में ही सिनेमा हॉल था और वहीं से ये तीनों लड़कियां फिल्म देख कर आ रही थीं, जिन्हें ये लोग छेड़ रहे थे। इन मनचलों का डेली का यही काम था; छेड़ना और बदतमीजी करना कभी-कभी ये लोग हदें भी पार कर जाते थे।
तीनों लड़कियों ने दुपट्टा से मुॅंह बॉंध रखा था ताकि लोग पहचानें नहीं, क्योंकि ये तीनों लड़कियां भी कोचिंग के नाम पर घर वालों से चुपके फिल्म देखने गयीं थीं। लफंगों के आवाज़ पर तेज़-तेज़ भागने लगीं और ऑटो वाले को आवाज़ देने लगीं, तभी किसी ने एक लड़की का पीछे से दुपट्टा पकड़ लिया और कुछ लफंगे सामने से छेड़ने लगे।
‘चलो! गुरु के पास ले चलतें हैं इन्हें।’
खींचतें-छेड़तें जब गुरु के पास लेकर आये तो जैसे ही उनमें से एक लड़की ने उस गुरु को देखा तो वह भौंचक रह गयी और दूसरे ही पल एक जोरदार तमाचा उस गुरु को जड़ दी। गुरु को तो जैसे तैस आ गया – ‘पकड़ साली को; ज्यादा चर्बी चढ़ गई। अभी बताता हूं, इस कुत्तियां को।’
वो लड़की भी बिना डरे, निर्भिक होकर चिल्लाई और अपने चेहरे पर से दुपट्टा हटा दी और बोली – ‘आओ!’
गुरु ने जैसे ही लड़की को देखा; उसके होश उड़ गएं और सर पकड़ कर बैठ गया।
‘उठो! छेड़ो मुझे, नोचो-खसोटो। क्यों बैठ गये?’ और गुरु को पकड़ झकझोरने लगी।
‘ए लड़की! तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है।’ एक लड़के ने पीछे से आकर पकड़ लिया। तभी गुरु उठा और उस लड़के को पीछे खींचा और पीटना शुरू कर दिया।
‘खबरदार! किसी ने छुआ इसे और बाक़ी लड़कियों को भी छोड़ो।’
‘क्यों छोड़ो? हमें पकड़ो, नोचो, खसोटो। रुक क्यों गएं, आओ…? लड़की फिर चिल्लाई।
‘क्या हो गया गुरु! ये आप क्या कह रहें हैं?’
‘साले! ये मेरी बहन है।’
‘तो क्या? तेरी बहन हूं तो नहीं छेड़ोगे। जो दूसरे की बहन में होता है, वही मेरे पास भी है।’ – वो लड़की दहाड़ी।
गुरु जमीन पर सर पटकने लगा – ‘ये क्या कर रहा था मैं? माफ़ कर दो। कभी मुझे एहसास ही नहीं हुआ कि, इनकी जगह पर मेरी बहन भी हो सकती हैं?’
‘छी! तुम जैसे लोग किसी के भाई नहीं हो सकते।’ मैं दुआ करती हूं तुमसा भाई किसी का न हो। आज से तुम मेरे लिए मर चुके हो। तुम जैसों की वजह से भाई-बहन जैसे पवित्र रिश्तों पर से भी यकीं उठ गया है। लड़कियां आज हर फिल्ड में सक्षम होते हुए भी तुम जैसे भेड़ियों की वजह से कहीं भी सुरक्षित नहीं है।’ और अपनी दोनों दोस्तों से हाथ जोड़कर माफी मांगने लगी। फिर पलटकर अपने भाई उर्फ गुरु पर थूका और अपने दोनों दोस्तों के साथ ऑटो में बैठ कर चली गई।
‘बेटियां बोझ नहीं’
जाड़े के दोपहर की हल्की धूप और एक कप चाय के साथ बालकनी में बैठी सलमा को एक मासूम बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी। आवाज़ पास के निर्माणाधीन मकान से आ रही थी। झाँक कर देखा, तो एक मजदूर औरत ईंटों का बोझ उठाए दिखी, और साथ ही एक छोटी बच्ची जिसे वह बार-बार देख रही थी। कुछ ही देर में उस औरत ने ईंटें नीचे रखी और जाकर अपनी बच्ची को गोद में उठाकर झुनझुना बजाने लगी।
सलमा की जिज्ञासा बढ़ी—कौन है ये औरत जो इतनी कठिन परिस्थिति में भी अपने बच्चों को साथ लेकर काम कर रही है? आखिर एक दिन सलमा ने उसे बुलाकर बात की। उसने बताया कि, “मै तीन बेटियों की मॉं हूं , जिसे अस्पताल में ही तीसरी बेटी होने पर मेरे शराबी मियां ने तीन तलाक दे दिया।”
“तुम्हारे सास-ससुर ने समझाया नहीं उसे।”
“वो लोग ही तो उसे भड़का रहे थे। तुम्हारा वंश कैसे चलेगा? दूसरी शादी कर लो, इसे तलाक दे दो।”
बोलते-बोलते वो सिसकने लगी, पर बड़ी हिम्मत वाली थी, बोली – “मैडम! सही हुआ, उस शराबी ने मुझे तलाक दे दिया। उसके साथ रहकर मेरे बच्चों को दो टाइम का खाना भी नसीब नहीं होता था; जो कमाता था, वो शराब में उड़ा देता था। ऊपर से गालियां, बदतमीजी और मार-पीट करते रहते थे।”
“मेरी तीन बेटियां हैं और ये तीनों मेरी पूरी दुनिया है।”
“तो तुम अपने मायके क्यों नहीं चली गयी?”
मायके गई तो वहाँ भी भाभी के ताने और तिरस्कार मिले। अंततः बच्चों के साथ उसने खुद की झोपड़ी बनाई और मेहनत मज़दूरी शुरू कर दी।
उसने कहा— “मैडम! मेरे पास कुछ नहीं बचा था, सिवाय हिम्मत के।
मुझे अपने बच्चों को पढ़ाना है, उन्हें इस लायक बनाना है कि वे समाज को दिखा सकें कि बेटियां बोझ नहीं, खुदा की रहमत होती हैं।”
उस महिला की बातों ने सलमा को भीतर तक झकझोर दिया। जिन हाथों में झुनझुना था, उन्हीं हाथों से वह ईंटें ढो रही थी। वही हाथ अब अपनी और अपनी बेटियों की किस्मत खुद लिखने का सपना देख रहे थे।
लघुकथा-3
‘बेटियां बोझ नहीं’
जाड़े के दोपहर की हल्की धूप और एक कप चाय के साथ बालकनी में बैठी सलमा को एक मासूम बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी। आवाज़ पास के निर्माणाधीन मकान से आ रही थी। झाँक कर देखा, तो एक मजदूर औरत ईंटों का बोझ उठाए दिखी, और साथ ही एक छोटी बच्ची जिसे वह बार-बार देख रही थी। कुछ ही देर में उस औरत ने ईंटें नीचे रखी और जाकर अपनी बच्ची को गोद में उठाकर झुनझुना बजाने लगी।
सलमा की जिज्ञासा बढ़ी—कौन है ये औरत जो इतनी कठिन परिस्थिति में भी अपने बच्चों को साथ लेकर काम कर रही है? आखिर एक दिन सलमा ने उसे बुलाकर बात की। उसने बताया कि, “मै तीन बेटियों की मॉं हूं , जिसे अस्पताल में ही तीसरी बेटी होने पर मेरे शराबी मियां ने तीन तलाक दे दिया।”
“तुम्हारे सास-ससुर ने समझाया नहीं उसे।”
“वो लोग ही तो उसे भड़का रहे थे। तुम्हारा वंश कैसे चलेगा? दूसरी शादी कर लो, इसे तलाक दे दो।”
बोलते-बोलते वो सिसकने लगी, पर बड़ी हिम्मत वाली थी, बोली – “मैडम! सही हुआ, उस शराबी ने मुझे तलाक दे दिया। उसके साथ रहकर मेरे बच्चों को दो टाइम का खाना भी नसीब नहीं होता था; जो कमाता था, वो शराब में उड़ा देता था। ऊपर से गालियां, बदतमीजी और मार-पीट करते रहते थे।”
“मेरी तीन बेटियां हैं और ये तीनों मेरी पूरी दुनिया है।”
“तो तुम अपने मायके क्यों नहीं चली गयी?”
मायके गई तो वहाँ भी भाभी के ताने और तिरस्कार मिले। अंततः बच्चों के साथ उसने खुद की झोपड़ी बनाई और मेहनत मज़दूरी शुरू कर दी।
उसने कहा— “मैडम! मेरे पास कुछ नहीं बचा था, सिवाय हिम्मत के।
मुझे अपने बच्चों को पढ़ाना है, उन्हें इस लायक बनाना है कि वे समाज को दिखा सकें कि बेटियां बोझ नहीं, खुदा की रहमत होती हैं।”
उस महिला की बातों ने सलमा को भीतर तक झकझोर दिया। जिन हाथों में झुनझुना था, उन्हीं हाथों से वह ईंटें ढो रही थी। वही हाथ अब अपनी और अपनी बेटियों की किस्मत खुद लिखने का सपना देख रहे थे।
लघुकथा-4
जिस्म बोलते हैं’
‘जिस्म बोलते हैं’ – कुछ अजीब सा लगा न! मुझे भी लगा था। बात उन दिनों की है जब मैं छोटी थी और गांव में रहती थी। मेरे गांव में एक विधायक जी थे। नाम था रामखेलावन यादव। विधायक जी के मर्ज़ी के खिलाफ, उनके मां-बाप ने एक अनपढ़ लड़की से शादी कर दी थी। वो अपनी पत्नी को इतना नापसंद करते थे कि ताउम्र उनसे बात नहीं की, पर अपनी पत्नी की सारी जरूरतों को पूरा कर देते। उनके छ: बच्चे भी थे। यह एक विडंबना ही कही जाएंगी कि ‘जुबां बंद थे,पर जिस्में बोलतीं रहीं’। उस समय मुझे बिल्कुल विश्वास नहीं हो रहा था कि ये कैसे हो सकता है…?
आज मेरी कामवाली बाई कुछ परेशान दिख रही थी। मैंने उसकी परेशानी की वजह पूछा तो वह बोली; ‘मैम! मेरा मरद बड़ा अजीब आदमी है। दिनभर मुझसे बात नहीं करता है। ऐसा लगता है कि मैं उसके लिए अभिशाप हूं, पर रात में ऐसे लगता है… मेरा मतलब है कि… कुछ कहे बिना मेरी सारी बातें समझ लेता है। अकस्मात् मुझे विधायक जी और उनके छ: बच्चे याद आ गयें। आज मुझे विश्वास हो गया कि ‘जिस्म की भी अपनी भाषा होती है’। अर्थात् ‘जिस्म भी बोलते हैं।’
लघुकथा-5
‘बड़ा हुआ तो क्या हुआ’ (व्यंग्यपरक लघुकथा)
‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई, मेरे बराबर में खड़े होने की?’- पाम ट्री अकड़ते हुए बोला।
‘मुझे भी कोई शौक नहीं, तुम्हारे बराबर में रहने का। ये तो माली भाई ने तुम्हारे बराबर में ला खड़ा किया।’ – आम के पेड़ ने जवाब दिया।
‘देखो! हम दोनों साथ में लगे थे, पर तुम ठींगे के ठींगे रह गये और मैं शानदार, हरा-भरा और लंबा होकर शान से खड़ा हूं।’ – पाम ट्री ने व्यंग्य किया।
‘क्योंकि तुम अपने जटीलेदार मोटी-मोटी जड़ों से मेरे हिस्से के भी खाद, पानी, धूप सभी सोख लेते हो, पर मुझे कमजोर नहीं समझना। लड़ाइयां तो आमने-सामने होती हैं।’
माली से गुजारिश कर आम का पेड़ सामने वाली क्यारी में लग गया। एक महीने के अंदर में ही हरा-भरा और लंबी-लंबी डालियां निकल आई और एक साल में फल भी आ गये। पाम ट्री बस सीधे-सीधे लंबा भागा जा रहा था।
आज आम का पेड़ फल से लदी डालियों के साथ मुस्कुराते हुए बोला -‘बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे तार-खजूर / पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।’