
तीन लघुकथा
सीमा वर्मा
हाउस नंबर बी vi 369
गुरु नानक देव गली-1
पुरानी माधोपुरी
लुधियाना (पंजाब)
पिनकोड 141008
मोबाइल 9988063780
लघुकथा-१.
भोर की पहली किरण
जिंदगी बीत गई थी। उसके पति को गुज़रे ज़माना हो चला था। बच्चे नए सफ़र की उड़ान पर थे। वह भी अब अपने मन का करना चाहती थी। थोड़े पैसे जमा थे उसके पास। साग भाजी का खर्चा तो गाँव के खेतों से ही पूरा पड़ जाता था, दाई माँ जो थी वह उन सब घरों की। उससे मालिश करवाते ही औरतें भली चंगी हो जाती और उसे अच्छा खासा मेहनताना देतीं।
अब तो उसका बस एक ही सपना था जो उसके दिमाग पर हावी होने लगा था।
इससे पहले कि उसकी साँसें थम जाए और दिल की दिल में रह जाए, इन्हीं खयालों में डूबी वह उठ बैठी। पलंग के नीचे पड़े बक्से को बाहर निकाल,पोटली में रखे पैसे देख पुरसुकून हो, मन ही मन सुबह निकलने का निश्चय करके पुनः लेट गई।
वृंदावन जाकर वहीं बस जाने का सपना धीरे- धीरे उसे नींद के आगोश में लेने ही लगा था कि अचानक दरवाज़े पर आहट हुई।
“कौन?” वह चौंककर उठ बैठी।
“ताई.. मैं नक्कु!”
“नक्कु!” उसका नाम दोहराती वह दरवाज़े की ओर भागी।
दरवाज़ा खुलते ही दर्द से कराहती वह वहीं लुढ़क गई।
नौ महीने की गर्भवती नक्कु जमील की घरवाली थी। जबसे वह शहर गया, वापिस नही लौटा था।
उसे पलंग पर लिटा वह पानी गर्म करके ले आई।
दर्द से ज़र्द पड़ता चेहरा देख वह घबरा गई। फिर भी उसे हौंसला देते हुई बोली, “तू डर मत, सब ठीक हो जाएगा, बस हिम्मत रख।”
बच्चे के रुदन के साथ ही नक्कु चल बसी।
दुःखी मन से उसने बच्चे को साफ़ कपड़े में लपेटा और पड़ोसियों को आवाज़ दी। आवाज़ सुनते ही वह चले आए।
भोर की पहली किरण के साथ नक्कु के पार्थिव शरीर को मिट्टी के हवाले कर बच्चे को सीने से लगा वह अपने कमरे में लौट आई और धीरे से बक्सा वापिस पलंग के नीचे सरका दिया।
***
लघुकथा-२
एक था भोला
तीन दिन बीत चुके थे मगर भोला ना आया। नानी रोज़ रोटी बनाकर उसका इंतजार करती।
यह नाम भी तो नानी ने ही दिया था उसे। वह रोज़ाना रोटी के समय उसके दरवाज़े पर आवाज़ करने लगता और नानी रोज़ उसे रोटी देती। तीन दिन पहले जिस वक्त वो आया था, नानी परेशान सी थी, प्यार से भोला बुलाने की बजाय ज़ोर से चीख पड़ी थी,”चला आता है रोज़ मुँह उठाए, जैसे और कोई काम ही नहीं है, सेवा करो बस महाराज की।” दरअसल उसी को लेकर तो नाना से नानी की खट-पट हो गई थी।
नानी बड़बड़ाती हुई रोटी लेकर जैसे ही बाहर आई भोला को वहां ना पाकर परेशान हो गयी। उसने उसे इधर उधर बहुत ढूँढा मगर वह कहीं भी ना मिला। फिर उस दिन तो नानी के गले से निवाला भी ना उतरा।
“अजी सुनती हो!” कहते हुए नाना जी घर में घुसे और व्यंग्य से मुस्कुराते हुए बोले, “अरे तुम्हारा लाड़ला! आज मंदिर के बगल में बैठा दिखा।”
“क्या?” कहते हुए तेज़ क़दमों से नानी घर से बाहर की तरफ़ भागी।
मंदिर के पास जैसे ही भोला ने उसे देखा अपना मुँह दूसरी और फेर लिया। नानी ने उसके कान उमेठते हुए कहा, “मैं बेकार में ही तुझे बैल बुद्धि कहती थी, तुझे भी इंसानों वाला रोग लग गया जो अब तुझे मान-मनौव्वल चाहिए।”
भोला ने धीरे से अपने कान हिलाए मगर मुँह दूसरी तरफ़ ही घुमाए बैठा रहा।
इस बार नानी रो पड़ी, “जा, मैं ही तुझसे मोह लगा बैठी थी, तू तो बैल का बैल ही रहेगा।” जैसे ही नानी के आँसू उसके चेहरे पर पड़े वह सींग लहराता फ़ोरन उठ खड़ा हुआ और सिर झुकाए, पूँछ हिलाता नानी के पीछे-पीछे घर की ओर चल दिया।
***
लघुकथा-३
मखमली डिब्बा
निम्मी जब भी बाज़ार जाती बरबस ही उसकी निगाहें उस गली की ओर उठ जाती मगर चाहकर भी वह उस तरफ़ जा ना पाती। बहुत दिनों से कुछ ऐसा था जो उसे अपनी ओर खींच रहा था।
आज अनायास उसके क़दम उस गली की ओर मुड़ गए। इसी गली में तो उसका बचपन बीता था। शाम होते ही सारे बच्चे एक साथ खूब धमाचौकड़ी मचाते थे। उनके बीच कोई भेदभाव नहीं था।
एक-एक घर को वह निहारती जा रही थी। उसे लग रहा था कि अभी कोई खिड़की से उसे आवाज़ दे देगा। मगर यह तो शायद उसका वहम ही था। उसे वह दिन भी याद था जब उन्हें अपनी जान बचाकर रातों-रात वहाँ से भागना पड़ा था।
अपने घर के सामने आते ही उस के कदम ठिठक गए। घर की खस्ता हालत देखकर उसका मन भर आया। अचानक अपना नाम सुनकर उसने पीछे मुड़कर देखा मम्मी की अजीज़ सहेली सलमा आंटी सामने खड़ीं थीं। उन्हें देखते ही उसकी आँखें छलछला आईं।
वह उसका हाथ पकड़कर अपने घर के अंदर ले गईं। फिर तो ना जाने कितनी सारी बातें थीं जो खत्म होने का नाम ही ना ले रही थी।
विदा होने से पहले एक मखमली डिब्बा लाकर उन्होंने उसके हाथ में रख दिया। वह चौंक कर उन्हें देखने लगी। तभी उसकी धुंधली यादों में यह डिब्बा उसकी आँखों के सामने आ गया।
ओह…. यह डिब्बा तो उसकी माँ का था।
लंबी सांस लेकर सलमा आंटी बोली, “मैं कब से इंतजार कर रही थी कि कोई आए तो मैं यह अमानत उसे सौंप दूँ।” वह अपनी रुलाई ना रोक सकी और सलमा आंटी के गले लग गई और बोली, “कौन कहता है कि हम बँट गए, हम तो आज भी एक ही हैं।”

तीन लघुकथा
जया शर्मा प्रियंवदा
फरीदाबाद, हरियाणा
लघुकथा-१
गांव की रज्जो
आधी उम्र बीत गई रज्जो को अपनी पहचान अपनों के बीच खोजते खोजते । रज्जो के कान में जब आवाज आती है हमें यह सब पसन्द नहीं, हम ऐसा खाना नही खा सकते, हम लोग जा रहे हैं घर का ध्यान रखना, अपने आप को उस हम से अलग थलग पाती, हम शब्द में पूरा परिवार और दूसरी तरफ अकेली जिम्मेदारियों का बोझ उठाती रज्जो ।मां ने कुछ भी न सिखाया हर चूक के लिए वजह वह अकेली रज्जो ।
अपने माता पिता भाई बहनों को याद करने की इजाजत मांगने पर अब पीछे को भूल यहां मन लगाने की चेतावनी मिलती ।
मायके से फोन पर भाभी ने बताया जिज्जी बच्चे छुट्टियों में आपके घर घूमने आ रहें हैं, बहुत खुशी हुई पर सोचा मेरा भी कोई घर है मायका भी पराया और ससुराल में दूसरे घर से आई है शब्द गूंज उठे कान में ।
सर में दर्द या बुखार कहने पर, सारे बहाने हमें पता हैं कि चोट गहरी आघात वाली होती, घर में सब बीमार पड सकते हैं पर वह नहीं ।ज़िन्दगी भर के लिए टीस देने वाला समय वह भूलना चाहती है पर रह रह कर याद आ ही जाता है ,
डॉक्टर ने उसको संक्रमण क्या बता दिया मां की ममता जाग पड़ी रसोई बनाने परोसने से उसे दूर कर अन्य काम करने को कह दिया गया, और एक नासूर जो हमेशा रिसता है उसकी यादों में बेटे के पास न जाने का क्रूर आदेश ।
संक्रमण ठीक हो गया चेतावनी का कार्यकाल समाप्त पर उसकी याद आज भी क्रूर ही है ।
किस ने कराया यह रिश्ता रज्जो के सामने ही निर्मल बुआ का यह पूछना एक झापड़ की तरह गाल पर आज भी छाप छोड़ता है ।
समय बीत रहा है पल पल परिवार में रज्जो से अपेक्षा बढती जा रही हैं, सामने वाले का व्यवहार उसकी सोच, मेरा कर्तव्य मेरा व्यवहार मेरा, सोच ज़िन्दगी जीए जा रही है ।
मन में कसक सी उठती है कि मुझे बोझिल व्यवहार से सींचने वालों को अहसास है कि कहीं वे गलत हैं कभी वह सोच पाएंगें हमने किसी की भावनाओं को छिन्न भिन्न किया है ।
अब उम्र हो चली सब कुछ चल रहा है मन में कसक रहती है कुछ लोगों को अहसास हो, कि किया है उन्होंने किसी की भावनाओं से खिलवाड़ जिससे उसकी यादें धुंधली हो सकें ।
एक बात ने रज्जो को मजबूती दी कि दुनिया रज्जो को गलत समझ कर उपेक्षित करे तो करे, अगर रज्जो गलत नहीं है तो रज्जो ने रज्जो को गलत न समझा रज्जो अडी रही डटी रही ।
***
लघुकथा-२
जरूरतमंद की दुआ
बेटी को विदा करते हुए रेखा के मम्मी पापा ने रेखा और उसकी सास, ननद के लिए भी अपनी हैसियत के हिसाब से अच्छी साडियां दीं थी, पर साडियों को देखते ही सास ननद ने बोलना शुरू कर दिया, इससे अच्छा तो सौ पचास रुपये ही दे देते और पैसे मिलाकर ढंग की साडी अपनी पसन्द की खरीद लेते , ऐसा कूडा भेजने की क्या जरूरत थी, हम नहीं पहनते ऐसी गंवारूं साडियां ।
रेखा का मन बुझ गया, ससुराल में आंसू बहाने की जगह आंसू पीने पडते हैं, कुछ न बोल सकी रेखा ।
ननद की आवाज़ ने रेखा को झकझोर दिया, ननद बोले जा रही थी, मां मन्दिरों के आगे बडे भिखारी बैठे रहते हैं, उनको दे देना यह कपडे लत्ते, बेचारों का तन ढकेगा, तो दिल से दुआ देंगें ।
रेखा की सहेली मीता ने एक बार सहेलियों के बीच बैठे बैठे कहा था, अगर कोई उल्टा सीधा बोल रहा हो, और आप चुपचाप सुन रहे हो तो, मतलब आप भी गलती कर रहे हो, चुप रहकर दबने और बुरा बनने से अच्छा है कि गलत को गलत कहकर बुरे बनो ।
रेखा के दिमाग में मीता की आवाज़ गूंजने लगी, तभी रेखा बोल पड़ी, सही बात है दीदी जिसको जरूरत है उसको ही देना चाहिए, यह साडियां गरीबों को दे दूंगीं , उनके मुंह से मेरे मम्मी पापा के लिए दिल से दुआ निकेलेगी ।
हैरान होकर सास ननद रेखा का मुँह देख रहीं थीं ।
***
लघुकथा-३
प्रमाणपत्र
दसवीं क्लास में पढने वाली मेरी बेटी आराध्या कल जब स्कूल से घर वापस आई तो आते ही कहने लगी मम्मी मेरे स्कूल में कल सीबीएससी के टैन्थ बोर्ड के लिए सब बच्चों का डाटा जमा किया जाएगा, वर्थ सर्टिफिकेट,, आधार कार्ड की फोटो लेकर जाना है और हां मैडम ने कहा है कि जो बच्चे जनरल न हों ,वे सब बच्चे जातिप्रमाणपत्र लेकर आएं, आराध्या ने मुझसे पूछा मम्मी मुझे भी जाति प्रमाणपत्र लेकर जाना होगा, मैंने उसे समझाया कि नहीं तुमको सार्टिफिकेट नहीं ले जाना, हम जनरल हैं ।
आज जब स्कूल से आराध्या घर वापस आई तो दरवाजे से बोलती आ रही थी, मम्मी एक बात बताऊं ,मेरी सहेली निखिला जनरल नहीं है वो कह रही थी कि आज मेरी मम्मी मेरा जाति प्रमाणपत्र जमा कराने आएंगीं मम्मी ने कहा है कि अगर सार्टिफिकेट नहीं दिया तो स्कूल वाले जनरल में डाल देंगें ,फिर आगे चलकर कॉलेज के एडिमिशन और नौकरी में भी दिक्कत होगी ।मैं आराध्या की बातें मेरे कानों में गूंज रही हैं अभी तक।

तीन लघुकथा
पवन शर्मा
भीतर का दरवाज़ा
एक –
घर में सब कुछ ठीक था। दरवाज़े मज़बूत, दीवारें सफ़ेद और खिड़कियों में सुंदर परदे।
पर जब भी रात होती, माँ चुपचाप रोने लगती। कोई कारण नहीं बताती।
बेटा, जो अब बड़ा हो गया था, कई बार पूछ चुका था, “क्या हुआ माँ?”
वो बस एक ही बात कहती, “कुछ दरवाज़े बाहर नहीं, भीतर खुलते हैं… और भीतर खुलने वाले दरवाज़े जब खुल जाएँ, तो बहुत कुछ ढह जाता है।”
सालों बाद, जब बेटे ने एक दिन खुद को टूटते हुए पाया तो उसने माँ के पुराने कमरे में जाकर दीवार छूकर देखा।
वहाँ कोई दरवाज़ा नहीं था, पर एक पुरानी आवाज़ भीतर से आई, “अब तू समझेगा मुझे।”
***
दो –
उसे आदत थी—हर शाम छत पर बैठकर चाय पीने की।
पत्नी पहले उसके साथ बैठती थी, फिर कुछ महीनों बाद बालकनी में, फिर खिड़की के पास, और अंत में एक फ़ोटो में।
लेकिन उसकी जगह उस फ़ोटो से उठकर एक छाया हर शाम आती थी। सिर्फ़ कुछ मिनट बैठती, चाय नहीं पीती, कुछ नहीं बोलती।
एक दिन उसने कहा, “तू आ जाती है, पर बैठती क्यों नहीं पूरी तरह? थकती नहीं क्या?”
छाया पहली बार बोली—“जब तक तुम मुझे जाने नहीं दोगे, मैं आती रहूँगी। मैं थकी नहीं, पर अब तुम थक गए हो।”
वो देर तक चुप रहा। फिर अगली शाम उसने अकेले चाय पी और कुर्सी खाली रखी।
उस दिन के बाद छाया नहीं लौटी।
***
तीन –
“दादी, तुम हर शाम इस खिड़की के पास क्यों बैठती हो?” छोटी पोती ने पूछा।
दादी की आँखें सूरज की आख़िरी किरण को छू रही थीं।
धीरे बोलीं, “क्योंकि इसी रोशनी में तुम्हारे दादा मुझे पहली बार चुपचाप देख रहे थे।”
“पर उन्होंने तो कुछ नहीं कहा था?”
“हाँ… लेकिन कुछ न कहना, कभी-कभी बहुत कुछ कह जाना होता है।”
पोती चुप हो गई।
उसने दादी की झुर्रीदार उंगलियाँ थामीं। दादी ने सिर्फ़ उसकी आँखों में देखा… और फिर से वही ख़ामोशी खिल गई— जैसे वर्षों बाद कोई मौन दोबारा बोला हो।

तीन लघुकथा
स्नेह गोस्वामी
लघुकथा-१
डर से आगे
रेल की पटरी के बीचों-बीच बैठ कर घुटनों में सिर दिये गेहूं और चावल के दाने चुनती औरत को देख मेरी सांसे रुक गई।
“ओए मरना है क्या?”
उसने शायद सुना ही नहीं। उसी तरह रेल की पटरी पर उकड़ू बैठी मालगाड़ी के डिब्बे से गिरे दाने चुनती रही।
मैंने चिल्ला कर कहा – “ अभी अभी कोई गाड़ी चिल्लाती हुई आ जाएगी। तुम सुनती क्यों नहीं हो। रेल से कट कर दो टुकङे हो जाओगी । तुझे डर नहीं लग रहा?“
उसने अपना सिर उठा कर जलती नज़रों से देखा- “तुम ने भूख से रोते चिल्लाते बच्चों को देखा है?”
और वह फिर से अनाज चुन कर अपनी झोली में डालने लगी।
***
लघुकथा-२
सैल्फी क्वीन
कई दिनों के बाद एक परिचिता के यहाँ जाने का सुयोग हुआ । सोचा , अचानक जाकर थोङा चौंका दूँगी , पहले से फोन क्या करना और इरादा बनते ही मोपेड उठाकर चल दी । आशा के विपरीत दरवाजा खुला हुआ था । स्टील के बरतन बेचने वाली एक टोकरे में सात आठ छोटे बङे बरतन सजाए बैठी कपङों का ढेर उलट पलट रही थी और सुमति हाथ में एक मझोले आकार का भगोना थामे खङी थी । मुझे देख अभिवादन की सारी औपचारिकताएं
भूलकर सुमति ने शिकायत के लहजे में मुझे संबोधित किया – “ मीरा तू बिल्कुल सही समय पर आई है । देख न इतने कपङे निकाल दिए फिर भी ये बरतनवाली इस भगौने के बदले में दो चादर और माँग रही है “ ।
मैंने सरसरी निगाह जमीन पर ढेर हुए कपङों पर डाली । ढेर के अधिकांश सूट सुमति ने कुछ महीने पहले सारा बाजार भटककर बङी मुश्किल से पसंद किए थे ।
“ पर सुमति , ये सब तो नये लग रहे हैं और यह पीला वाला सूट तो हमने इकट्ठे कुछ दिन पहले ही लिया था “ ।
“ ये पीला सूट ! इसमें तो मैं ढेर सारी सैल्फी लेकर फेसबुक और वाटस एप पर डाल चुकी । तूने भी तो लाईक कर कमैंट किया था “ ।
ओह समस्या यहाँ है । सेलफीक्वीन की सेल्फी पुरानी लगने से बचाने के लिए सूटों को देना जरुरी ही तो था । मेरे सलाह देने से पहले ही एक चादर अतिरिक्त देकर सुमति ने भगौना ले लिया था और भगौने के साथ अलग अलग पोज में सेल्फी लेने में मस्त हो गयी थी।
***
ळगुकथा-३
युद्ध में पनपा प्रेम
पूरा शहर खाली हो चुका था।
नहीं । रह रह कर खतरे का सायरन बज उठता या कहीं कोई मिजाइल , बम जैसा कुछ फटने की भयानक सी आवाज आती फिर दो चार मिनट के लिए शांति छा जाती । गलियों में कुत्ते मांस के लिए लङ रहे थे । गिद्ध और चील अलग लाशों पर दावत उङा रहे थे । देश के सोलह साल से ऊपर के सभी पुरूषों को अनिवार्य सेवा के अन्तर्गत मशीनगन थमा दी गई । देश का अस्तित्व जब खतरे में हो तो नवयुवकों को मातृभूमि की रक्षा करनी ही होगी । औरतों बच्चों और बूढों को सुरक्षित देश की सीमा से निकाल दिया गया था । देश की सरहद से बाहर जाकर अपना मुस्तकबिल तलाश करने के लिए । घरों में मरीज या अशक्त चलने फिरने में असमर्थ लोग ही बाकी थे । डरे सहमे घबराए लोग । एक सात आठ साल का बच्चा सीढियों के नीचे घुटनों में सिर छिपाए सिसक रहा था । अचानक उसे अपने कंधे पर सख्त हथेली का स्पर्श महसूस हुआ । बच्चे ने सिर ऊपर उठाया । एक वर्दीधारी क्रूर चेहरे वाला सैनिक उस पर झुका हुआ था । लङके की आँखों में खौफ दुगना हो गया । उसने अपने भूख प्यास से सूख गये होठों पर जीभ फिराई और दोबारा कछुए की तरह इकट्ठा हो गया ।
बच्चे तेरे घर के लोग कहाँ हैं
पता नहीं।
तूने कुछ खाया
बच्चे ने नकार में सिर हिलाया !
फौजी ने अपने पिट्ठू बैग से मुट्ठी भर बादाम निकाल कर उसकी ओर बढाए – ले खाले
म ले लिए । बोतल से पानी का घूंट पीकर पानी उसकी ओर बढा दिया ।
तुम यहीं रहना , मैं थोङी देर बाद फिर आता हूँ ।
बच्चे ने पानी का एक घूंट भरा और रास्ते पर टकटकी लगा दी ।

तीन लघुकथा
मनीषा सहाय सुमन
लघुकथा-१
खुशियों की मुठ्ठी
एक हाथ में गुब्बारे और दूसरे हाथ में दस- बारह गुलाब! करीने से गूंथी चोटी! जिसमें लाल रिबन लगे हैं! श्याम वर्ण ! लेकिन टकाटक चमकदार चेहरा! फूलदार फ्राक पहने रेड लाईट पर वह अपनी पूरी योग्यता के साथ फूल और गुब्बारे बेचने की कोशिश में जुटी है! कभी किसी से तो कभी किसी से आग्रह, न निराशा, न हताशा।
मेरे सामने आकर खड़ी हो गई …..
“दीदी …गुब्बारे ले लो ! ”
मैने कहा , “किसके लिये लूँ, घर में कोई बच्चा नहीं है, सब बड़े हो गये हैं।”
झट से उसने गुलाब को मेरे आगे बढ़ाया, मुख पर मुस्कान को सजाकर —
“दीदी! फिर साहब के लिये गुलाब ही ले लो!”
उसकी अदाएँ कमाल की थी, दक्ष व्यवसायी की तरह ! मेरी मुस्कुराहट से उसे आत्मबल मिला , वह मेरे पीछे- पीछे चलने लगी।
मैने रूक कर पूछा… “कितने का है एक गुलाब?”
झट से एक आगे कर कहा —
“दस रूपय का दीदी।”
अब वह निश्चिंत लगने लगी। उसने मुझे जीत लिया। मैने पूछा-
” गुब्बारा? ”
आँखों में आशा भरकर झट से बोली –
“पंद्रह रूपय केवल!”
अगल- बगल चल रहे लोग भी रूक गये। मैने झट से पचास का नोट बढ़ाया। दो गुलाब दो गुब्बारे ले लिये ! गुलाब मैंने रख लिये , गुब्बारे उसे गिफ्ट कर दिए !
रूपय को खुशी से मुठ्ठी में भींचकर वह आईसक्रीम की दुकान की ओर भागी।
उसकी खुशी देख कर मेरा मन- मस्तिष्क भी आनंद की अनुभूति से भर उठा। गुलाब दुसरे दिन मुरझा गये ,पर उससे मिली खुशियों से भरी मुठ्ठी आज भी महक रही है।
***
लघुकथा-२
टैलेन्टेड
नेहा ने चाय के साथ बिस्किट व नमकीन टेबल पर रखा । चेहरे पर थकावट थी , लेकिन स्माईल बिखेरते हुए कहा , “आज ऑफिस में बहुत काम था….थक गई हूं मैं!”
सास – ससुर ने चाय का कप उठाया । उसकी बात को अनसुना करते हुए टी.वी पर चल रहे इंडिया गॉट टेलेंन्ट पर ध्यान केन्द्रित करना ही मुनासिब समझा। उनका बेटा दीपक भी टीवी प्रोग्राम देखने चला आया।
नेहा ने चाय का कप उठाया और अपने कमरे में चली गई। उसकी इस हिमाकत से सास ने दीपक से कहा,
” बेटा, रोज का यही तमाशा है नेहा का, ऑफिस से आते ही चाय का कप लेकर अपने कमरे में महारानी जी पसरने चली जाती है।”
ससुर शर्मा जी ने प्रतिक्रिया व्यक्त की ,
” आजकल की कमाऊ बहुओं के दिमाग तो…..”
दीपक बीच में ही कह उठा-
” इंडिया गॉट टेलेंट में कमाऊ बहुओं का नाम भी आना चाहिए, क्यों पापा ?”
शर्मा जी को हॅऺसी आ गई और ठहाका लगाते हुए उन्होंने कहा –
” आयोजक तुम्हारे जैसे मजनू पति होगें तो यह भी हो सकता है बेटा!”
बेटा भी कहां चुप रहने वाला था। व्यंग भरे लहजे में कहा, “भारतीय समाज में आज नारी एकमात्र ऐसी टेलेंटड प्राणी है जो रोटी बनाने के बाद रोटी कमाने जाती है और आकर फिर रोटी बनाती हैं।”
शर्मा जी ने टी.वी. का वाल्यूम बढ़ाना ही मुनासिब समझा।
***
लघुकथा-३
समय
लोगों से बेवजह बात करना समाजिक होने में कोई दिलचस्पी नही ! पर समाज से अलग होकर हम रह भी नही सकते। एकाकी रहने का सुख, खुद से बातें करना और खुद ही समझ कर मुस्कुराना, यह सब आम आदमी के लिये सनकी होने के लक्षण हैं। इसी सनक ने आलीशान जीवन नाम शोहरत पैसा दिया मुझे!
बस एक बार दिमाग में कुछ अटक जाए तो कोई भले ही उस बात को छोड़ दे या भूल जाए पर उसे पूरा करके ही चैन लेना ही जीवन का उदेश्य हो!
हर किसी में अँधेरों में देखने की क्षमता नही होती है। जो अँधेरों को जीते हैं शायद वही अँधेरें के परे देख पाते हैं।
किसी ने जब हाथों को छुआ तो मानो उसके ठंडे हाथ का स्पर्श बदन में कंरेट सा दौड़ गया, सोंच की दलदल में फँसा लगा, की कोई दैविय शक्ति का मालिक है।
समय के साथ जिंदगी की दौर में कितना कुछ पीछे छूटता जाता है पर मन से कहाँ जाता है।
मैं और यह वृद्धा भवन दोनों आमने सामने खड़े हैं! सभी अपना सर्वश्रेष्ठ देने में लगे हैं, वहीं एकबार फिर हम एक दुसरे को देख मुस्कुरा रहें हैं।
समय शायद फिर खुद को दोहरा रहा है।
तीन लघुकथा
सुनीता भट्ट गोजा
जम्मू-कश्मीर (जम्मू)
लघुकथा-१
कन्या पूजन।
रागिनी अपना कमरा बंद करके पलंग के कोने में बैठी रोए जा रही थी। आंसू गालों पर मूसलाधार बारिश की तरह बहे जा रहे थे। अचानक उसकी सास कमला की तीव्र आवाज़ उसके दिल को चीर गयी”अरि ओ बहू! कब तक बैठ कर शोक मनाती रहोगी।उठो! बहुत हो गया विलाप,रसोई में आकर मेरा हाथ बंटाओ। ”
जल्दी अपने आंसू पोंछ दुःखी मन से रसोई में चली गई रागिनी। दो दिन पहले बीती हुई घटना याद कर बारबार उसकी आंखें भर आती।
कमला रागिनी को देखकर बोली, “रागिनी तुम जल्दी से पूरियां तल लो।हलवा मैंने बना लिया है। पूजा का मूहर्त बीता जा रहा है कन्या पूजन के लिए कन्याएं क्यों नहीं आई अब तक? मैं जाकर उनके घर से ही ले आती हूं उन्हें ।तुम पूजा की तैयारी करो। शायद माता रानी की कृपा हो जाए और तुम्हें भी एक बेटा हो”। कहते कहते वह बाहर की ओर दौड़ पड़ी। रागिनी को सास की बात तीर की तरह चुभ गई ।पर यह सोच कर कि अब सास के तानें फिर से सुनने पड़ेगें ,बेमन सी पूजा की तैयारी करने लगी। तभी कमला उदास सी मुंह लटकाती दरवाज़े से अन्दर आती दिखी। रागिनी ने बुझे मन से पूछा, “कन्याएं कहां है ? पूजा का सामान तैयार है।”
कमला रोनी सूरत बना कर बोली कि उनके घर वालों ने उन्हें उसके साथ भेजने से मना कर दिया और बोले,” तुमने अपने घर की तीन-तीन कन्याओं को बहू के पेट में ही मार दिया और अब पूजा के लिए बाहर कन्या ढूंढ़ रही हो।”
ये कहते ही कमला की आंखों से पछतावे के आंसू ज़ार ज़ार बहने लगे।
***
लघुकथा-२
इंसान और जानवर
मेरे घर के आंगन में एक ऐरोकेरिया का पेड़ है।
इस पेड़ को मेरे स्वर्गीय ससुर जी ने लगवाया था, जिन्हें बागवानी का बहुत शौक था। मैं अधिकतर छुट्टी वाले दिन बाहर आंगन में बैठती और उस ऐरोकेरिया के पेड़ को निहारती रहती तो पिता जी की यादों को ताज़ा कर लेती। एक दिन मैंने देखा कि उस पेड़ पर सुंदर सी चिड़िया के जोड़े ने एक सुंदर सा घोंसला बनाया है। मैं समझ गई कि इस चिड़िया ने अब अंडे देने हैं।
मैंने आफिस जाने से पहले रोज़ का यह नियम बना लिया कि मैं दीवार पर कुछ दाने डाल देती और एक कटोरे में पानी रख देती उन पक्षियों के लिए ताकि उन्हें इधर-उधर ना भटकना पड़े।
एक दिन मुझे कुछ जल्दी ही घर से आफिस जाना पड़ा तो मैंने जाते हुए अपने बेटे को दाना डालने के लिए कहा।
लेकिन जब मैं वापिस घर लौटी तो मैंने देखा कि एक बिल्ली दबे पांव पेड़ से उतर रही है और उसके मुंह में चिड़िया के अंडे हैं और कुछ दीवार पर टूटे पड़ें हैं।
मेरी आंखों से अश्रु धारा बहने लगी और बार बार यही सोच आती कि काश मैंने स्वयं ही दाना दीवार पर डाला होता तो इन्हें अपने अंडों से दूर दाना ढूंढने ना जाना पड़ता।
मैं इसी सोच में थी कि क्या देखती हूॅं,एक लम्बा भद्दा सा पुरुष गली से निकल रहा है जिसके हाथ में एक पिंजरा है जिसमें वही सुंदर सी चिड़िया का जोड़ा कैद है।
मेरे हाथ से बैग गिर गया और मैं बुत की तरह खड़ी देखती व सोचती रही इंसान और जानवर में क्या अंतर है ?…
***
लघुकथा-३
कागज़ात।
काजल आज बहुत खुश थी। क्यों न हो वह आज एक अरसे के बाद भारत आई थीं और दिल्ली में अपने पिता के घर जा रही थी। दिल में एक अजीब सी खुशी का अहसास था, “सब से मिलूंगी, कितने खुश होंगे मां-बाबा, सुरेश भैय्या और बच्चे। बच्चे तो काजल बुआ कहते कहते मेरे आगे पीछे घूमेंगे।”
इन्हीं ख्यालों में खोयी वह टैक्सी से बाहर देखें जा रही थी और टैक्सी कब दरवाज़े पर आकर रुक गई उसे पता ही नहीं चला।
“मेडम आपका पता आ गया।” टैक्सी वाले ने काजल से कहा।
काजल जल्दी से बैग उठाकर टैक्सी से उतर गयी और तेज़ क़दमों से घर की और दौड़ पड़ी।सोसाईटी के चोकीदार ने गेट खोला और काजल को दुआ सलाम की। काजल ने चोकीदार से कहा,”काका कैसे हो, बहुत बूढ़े लग रहे हो,घर में सब कैसे हैं? सब ठीक है बिटिया रानी। अच्छा मैं शाम को आपसे मिलती हूॅं।” कहती कहती वह अंदर की ओर दौड़ी।
‘मां-बाबा, भैय्या-भाभी देखो मैं आ गई!’ बोलती बोलती मां बाबा के कमरे की ओर गयी, वहां उसने अपने भतीजे धीरज को देखा उसे लाड़ करते उसने पूछा, ‘मां बाबा कहां हैं?’
धीरज कुछ कहता इससे पहले सुरेश ने कहना शुरू किया,”काजल मां बाबूजी परली तरफ छोटे कमरे में शिफ्ट हो गए हैं, जगह कम थी, बच्चों को भी कमरा चाहिए।”
काजल का मन दुखी हो गया वह मां बाबा से लिपट कर फूट फूटकर रोने लगी।
इतने में सुरेश अंदर आया और बोलने लगा,” काजल रोना बंद करो, बात समझो, यहां जगह की तंगी है हम किसी पाॅश कालोनी में बडा फ्लैट खरीदने वाले हैं तुम्हें कागज़ातों पर हस्ताक्षर करने के लिए ही बुलाया है।

तीन लघुकथा
गार्गी राय
लघुकथा-१
उजास
(टेलीफ़ोन-शैली )
“हेलो!पापा,प्रणाम।”
“… … …”
“बधाई का पूरा श्रेय तो आपको जाता है ..आपने मेरा मनोबल बढ़ाया तभी तो मैं उपन्यास रच पायी।”
“… … …”
“हाँ!आप तो शुरू से कहते थे कि अपनी ऊर्जा
पढ़ने-लिखने में लगाओ।दूसरों की बातें एक कान से सुनों दूसरी से निकाल दो लेकिन तब इतनी समझ कहाँ थी?कम उम्र में शादी और ज़िम्मेदारी में मैंने अपने आप को खो दिया था।”
“… … …”
“हाँ पापा!विपरीत परिस्थितियों से निकलने में
वक्त तो लगता है न और इस पावन कार्य में पतिदेव का भी साथ रहा।यह मेरे लिए सुखद रहा।देर आई दुरुस्त आई।”
“… … …”
“हाँ!आप ठीक ही कहते थें जब जागो तब सबेरा।मैंने इसे गाँठ बाँध ली।आपकी इसी पँक्ति ने मेरी तन्द्रा भंग की बस फ़िर क्या…।”
“… … …”
“एक और ख़ुशख़बरी!अगले महीने मुझे राज्य सरकार सम्मानित करने के लिए बुला रही है।”
“… … …”
“पापा!मैं भी बहुत ख़ुश हूँ ..मेरा विदुषी नाम रखने की सार्थकता मुझे अब समझ में आ रही है।”
“… … …”
“नही!अब पीछे मुड़कर नही देखना है..लेखनी के साथ-साथ अगला पड़ाव एक संस्था खोलने की है …जो साहित्यिक प्रतिभाएँ, चूल्हे में ख़ुद को झोंके हुई हैं, उन्हें उनके वज़ूद से मिलाना है।”
“… … …”
“फ़िलहाल!तो मैं अपने बगिया में अपने पसंदीदा पुस्तक के साथ गौरैया के चहकने का आनंद ले रही हूँ।”
***
लघुकथा-२
श्राद्ध का उत्सव
“श्राद्ध के दिन तुम क्या पहनोगी सफ़ेद कुर्ती ही ना? “
पिंकी ने उतावली होकर नवविवाहित अपनी बड़ी बहन महिमा से पूछा ।
कुछ निराश होते हुए महिमा ने कहा,”नही यार!मम्मी बोल रही है अभी हमारी शादी को एक साल भी नहीं हुए …सफ़ेद पहनना मेरे लिए शुभ नही होगा …ऑफ-व्हाइट या बेज कलर का कुर्ती पहन लो।”
तभी चाची ने सहजता से सभी को दुनियादारी का पाठ पढ़ाते हुए कहा “सभी ने तैयारी पूरी कर ली है।कल तक सब मेहमान आ जाएँगे ।रिंकी भी अमेरिका से आज आ जायेगी।बेस्ट फ़ोटोग्राफ़र को मैंने फ़ोन कर दिया है।एक जैसे कपड़े और मेकअप हो तो फ़ोटो अच्छा आता है।”
समीप बैठी मर्माहत दादी सबकी बातें सुन भुनभुना रही थी …”काश! सभी लोग बीमार दादा जी से जीते जी ही मिल लिए होते और एक लोटा पानी का सुख दे देते तो आज उनकी आत्मा अतृप्त नही जाती।”
इस गहमागहमी में दादा जी तो पीछे छूट गये हैं।
चारो तरफ़ पसरा है केवल श्राद्ध का उत्सव ।…
***
लघुकथा-३
बसेरा
“ अहहा! मिल गया …हम इसी घने पेड़ पर अपना बसेरा बनायेंगे।”
चिड़ा ने उतावला होकर चिड़ियाँ से कहा।
“ एक बार पूछ लो!पेड़ भैया को कोई आपत्ति तो नहीं है?”
चिड़ियाँ ने चिड़े को व्यवहारिकता समझाते हुए कहा।
तुम्हारा यहाँ रहना ठीक नही …कहीं और ठिकाना ढूँढ लो।”
पेड़ ने दोनों की बातें सुनकर आदेशात्मक लहज़े में कहा।
“लेकिन क्यों ?…हम दोनों एक दूसरे के पूरक हैं …प्रकृति भी हमारे साथ को ऐसे ही बनाया है …जहाँ तुम,वहाँ हमारी प्रजाति ..क्या हमारा रहना तुम्हें पसंद नही भैया?”
चिड़ियाँ ने उदास होते हुए घने पेड़ से कहा।
एक लंबी साँस भरते घने पेड़ बोला “नही..नही चिड़ियाँ रानी! तुम्हारा रहना हमें बहुत सुहाता है …तुम्हारा चहकना मेरा अकेलापन दूर करता है …तुम्हारे बच्चों को अपने आग़ोश में बढ़ते देखना, मेरे लिए एक सुखद अनुभूति है …परंतु …।”
“परंतु क्या भैया?”
चिड़ियाँ ने आश्चर्य से पूछा।
पेड़ ने रुँधे गले से कहा, “सुना है कल से सड़क-चौड़ीकरण होगा।”

तीन लघुकथा
इला सिंह
लखनऊ
लघुकथा-१
‘खास तो हम हैं’
काम करते-करते बिंदिया अचानक रसोई से कमरे में आ खड़ी हुई ,-“आंटी,मेरी चूड़ी टूट गई।एक ही चूड़ी थी मेरे हाथ में ।प्लीज ,मेरे को एक चूड़ी दो न ।नही तो आदमी मारेगा ।”
“चूड़ी तो ये ले “मैंने उसे कुछ चूड़ियाँ देते हुए कहा-“लेकिन इसमें मारने वाली कौन-सी बात है ,मारेगा क्यूँ?”
“अरे आंटी ,इन मर्दों की बात…. “,वह शर्माते हुए बोली -“कहता है तू मुझे मारना चाहती है ।”
“तेरे चूड़ी न पहनने से ही वह कैसे मर जाएगा ,भाई ।”
“वही तो आंटी …इत्ते घर जाती हूँ काम करने ,बाई लोग आजकल कोई चूड़ी – सिंदूर नही पहनती ।एक दिन मेरी चूड़ी टूट गई और मैं ऐसे ही घर चली गई ।इत्ता मारा मेरे को मेरे मरद ने।मैंने बाई लोग का बताया कि उनके मरद को तो कुछ नहीं होता ।तो भड़क गया -“साली ,ये सब सीखने जाती हैं वहाँ ।ये बाई लोग के कुलक्छ्न सीखेगी सब ।”
“क्या करता है तेरा आदमी ?”
“कुछ नहीं आंटी ,बस शराब पीकर झगड़ा ,मार-पिटाई ।”बिंदिया चूड़िया हाथ में चढ़ाते-चढ़ाते बोली ।
उसके प्यारे हाथों को देखकर मुझसे रुका नहीं गया और कुछ तस्वीरें उसकी उतार लीं ।फोटो खींचते-खींचते ही कहा,- “हम्म्म्,मतलब तुम ही घर चलाती हो ।”
“हाँ आंटी ।क्या करूँ फिर …तीन बच्चे हैं… ।”
“अच्छा बिंदिया ,जानती है आज ‘महिला दिवस ‘है ।”
“ऐं…”वो नासमझ की तरह मुझे देखती रह गई।
“अरे… महिला दिवस….मतलब औरतों का दिन ….”
“औरतों का दिन ?मतलब आंटी।”कह वह जोर से हँस पड़ी ।
“अरे भाई ,आज औरतों को बताया जाता हैं कि वो कुछ खास हैं ।वो भी इंसान है ।उन्हें उनके हकों के बारे में बताया जाता है ।”मैं खिसियाकर बोली ।
“ओsss.,”अपने ओ को लम्बा खींचते हुए वह बोली -“हक तो पता नहीं ,आंटी …पर खास तो हम हैं …,अब देखो ना…हमारे चूड़ी-बिंदी न पहनने से ही कितना डर जाते हैं ये लोग ।”कहते हुए बिंदी हँसते हुए जीने से नीचे उतर गई।
उसकी हँसी देर तक मेरे कानों में गूंजती रही …
***
लघुकथा-२
किस्मत
बेटा पहली बार नौकरी पर जा रहा था।निशा तैयारी में लगी थी ।लगभग सब तैयारी हो ही चुकी थी।कुछ छुटपुट सामान थे जो पास के छोटे बाजार से लेने आई थी।
सामान खरीदते हुए ध्यान आया कि एक प्लास्टिक का कपड़े धोने वाला ब्रश और ले ले ।अंत:वस्त्र, रूमाल इत्यादि तो हाथ से ही धोने होंगे ।कई दुकानों पर देखा लेकिन कपड़े धोने वाला ब्रश नहीं मिला।
वह बाजार में सड़क किनारे ठेलों पर चलने वाली प्लास्टिक दुकानों पर आ गई। उसे निश्चित था कि यहाँ अवश्य प्लास्टिक ब्रश मिल जाएगा जैसा वह चाह रही थी।दो-चार ठेलों पर घूम-घूम कर देखा लेकिन सबके यहाँ लकड़ी के हैंडल में प्लास्टिक ब्रिस्टल लगे ब्रश थे जिनके ब्रिस्टल भी बड़े दूर- दूर लगे थे मतलब घनापन नहीं था ब्रिस्टल में ।
एक ठेले पर निशा ने देखा लकड़ी के हत्थे वाले ब्रशों के बीच एक प्लास्टिक हत्थे वाला ब्रश पड़ा था जिसके ब्रिस्टल भी खूब घने थे।वह खुश हो गई। मगर ठेले वाला अपने ठेले पर था नहीं ।
निशा इधर-उधर देखती रही कि शायद आसपास ही होगा ठेले वाला ।काफी देर ठेले वाले का इंतजार कर वह पास के ठेले वाले से पूछने लगी कि इस ठेले का दुकानदार कहाँ है?उसके अनभिज्ञता जताने पर उसने ठेले के ऐन पीछे लगी दुकान पर बैठे लड़के से पूछा।उसने भी कंधे उचका दिए।
निशा काफी देर इंतजार करने के बाद वहाँ से लौटने का सोच पलटी ही थी कि बीस-बाइस साल का खिलंदड़ा-सा युवा आ दुकान पर रखे सामान को व्यवस्थित करने लगा ।
“तुम्हारी दुकान है ये?” निशा ने थोड़े संशय से ही पूछा।
“ जी, मैडम! मेरी ही दुकान है।” वह अब हल्का गुनगुनाने लगा था।
“अच्छा, यह कपड़े धोने वाला ब्रश दो।”
“ लीजिए, बीस रूपये का है।”
निशा ने ब्रश लेकर बीस का नोट उसके हाथ में पकड़ाया।
लौट रही थी मगर फिर उससे रुका नहीं गया और बोल पड़ी – “ इतनी -इतनी देर के लिए दुकान यूँही छोड़ देते हो?चोरी का डर नहीं लगता?”
“ डर किस बात का ,मैडम!चोरी कर भी लेगा तो मेरी किस्मत थोड़ेई चोरी कर लेगा।” कह बेफिक्र-सा वह फिर गुनगुनाने लगा।
तभी एक महिला आई और हाथ में लिए दो चाकू उसे दिखाते हुए बोली ,- “ हाँ भैय्या, ये दो चाकू उठा ले गई थी ।तुम दुकान पर थे नहीं।अभी घर लौट रही थी कि देखा तुम लौट आए हो ।ये लो अपने पैसे वरना मुझे कल आना पड़ता।”
लड़का पैसे हाथ में ले निशा की तरफ देख मुस्करा रहा था।
उसका उसकी किस्मत पर विश्वास उसकी आँखों में चमक रहा था…!
***
लघुकथा-३
तेनु ताज पवा दूंगा
बन जा तू मेरी रानी,तेनु महल दवा दूंगा
बन मेरी महबूबा, मैं तेनु ताज पवा दूंगा
सुन मेरी रानी ss रानी, बन मेरी रानी ss रानी
शाहजहाँ मैं तेरा,…तेनु मुमताज बना दूंगा
रिंगटोन बना यह गाना चौंका गया ।ऐसी रिंगटोन?
फोन की रिंगटोन थोड़ा झटका दे रही थी ।रिंगटोन बजने तक अजीब ख्याल आते रहे ।
फोन उठने पर उधर से उदास आवाज आई , “हैलो…”
“मैडम, आपके सभी पेपर्स क्लीयर हो गये हैं,कल आप बच्चों के साथ आफिस पहुंच जाइए।”
“जी ,मैडम !”
थकी-बोझिल आँसुओं से गीली आवाज सुन मन द्रवित हो उठा,- “तबीयत ठीक है आपकी ?देखिए ख्याल रखिए अपना…।”
भरे गले से जबाब आया , “जी ,…! ”
“चिंता मत करिए सब ठीक हो जाएगा। कुछ समय बाद पैसे की दिक्कत भी खत्म हो जाएगी। ”
“जी,…”
“आपके …फोन की …रिंगटोन…” न चाहते हुए भी मुँह से निकल गया।
” सुनी आपने?” उधर से हिचकियाँ फट पड़ी, “जबान पर हमेशा यही गाना, जब कभी मोटरसाइकिल धीरे चलाने को कहो तो ठहाका लगाकर हमेशा यही बात…आजकल तो एक्सीडेंट में मौत होने पर खूब पैसा मिलता है, मेरी मुमताज़! मर गया तो लाखों का जाऊँगा, तू रानी बन जाएगी …ताजमहल बनवाने का बंदोबस्त पक्का।”
“ऐसा सोचकर अपने को दुखी क्यों करती हैं,मैडम, मज़ाक में पति अक्सर ऐसी बातें कर देते हैं। उन्हें …। ”
उधर से हिचकियों संग फिर आवाज आई ,”अभी सरकारी लैटर मिला है …लाखों में खेलूंगी …रानी बना गए मुझे ।”
उसके रोते-टूटते शब्द कानों में शीशे जैसे पिघल रहे थे…
तीन लघुकथा
निवेदिता श्रीवास्तव निवि
लखनऊ
लघुकथा-१
वटवृक्ष
“माँ! आप ये पेड़ की पूजा क्यों कर रही हो … आप इसी पेड़ की क्यों कर रही हो?”,नन्ही सी अन्विता के पास जैसे प्रश्न खत्म ही नहीं हो रहे थे। मेरे चारों तरफ घूमते हुए अपनी बालसुलभ जिज्ञासा बरसा रही थी।
मैं भी मन्द मन्द मुस्कुराती पूजा करती रही। जब मैंने उसको प्रसाद दिया तो गले में झूल ही गयी कि अब तो बता ही दूँ।
“बेटा हम कई पेड़ों को पूजते हैं और नाम उसको चाहे जो दें, पर वो पूजा उस पेड़ की विशिष्टता की होती है।आज मैं बरगद की पूजा कर रही हूँ। जानती हो ये बरगद का वृक्ष हमारे परिवार, हमारे रिश्तों का प्रतीक है … जैसे इस वृक्ष के आसपास इसकी अनेक प्रशाखायें पल्लवित होती हैं, वैसे ही हम जैसे ही एक रिश्ते में जुड़ते हैं उसके साथ ही उससे जुड़े अनेक रिश्तों से भी जुड़ जाते हैं। एक बात और भी है कि जब मूल पेड़ कभी सूख भी जाता है, तब भी इसकी जड़ें अंदर ही अंदर दूसरी पौध बन उग आती हैं। ठीक ऐसे ही जब हमको लगता है कि कोई रिश्ता टूट गया तब वो टूटता नहीं, अपितु समय-समय पर अच्छी बुरी यादों के रूप में जिंदा रहता है।”
मैंने अन्विता को गोद में समेट लिया, “बेटा जैसे हम वृक्ष को पूजते हैं, ऐसे ही रिश्तों को भी पूजन की तरह सहेजना चाहिए।”
***
लघुकथा-२
प्रवासी पंछी
पोते के मुंडन समारोह की रीतियों को निभाने और अतिथियों के स्वागत के उत्साह से भरी हुई दिवी, जैसे एक पाँव पर ही पूरे उत्सव स्थल पर नृत्य करती हुई सी घूम रही थी कि समधिन निशा जी ने उसका हाथ पकड़ कर अपने पास ही बैठाते हुए, उसके हाथों में जूस का गिलास थमा दिया, “बहनजी, आप भी थोड़ा आराम कर लीजिये, फ़िर देखिये सब कुछ।”
परम् सुख की लहरों से उसका अंतर्मन अलोड़ित हो रहा था, “अरे नहीं बहन जी, अभी कहाँ बैठ सकती हूँ … यह तो हमारे नानी-दादी बनने का बड़ा अनमोल सुख देने वाला पल है। अभी तो बस सबकी दुआएँ बच्चों तक पहुँचाने में थकान पता ही नहीं चल रही है।”
निशा जी ने ठंडी सी साँस ली, “कह तो आप सही रही हैं, परन्तु सच्चाई तो यही है कि आपके आँगन की वंश बेल सँवर गई है। हमारा क्या … हम तो बेटी वाले हैं, हमारी किस्मत में तो पौधे की नर्सरी की तरह पालने-पोसने के बाद बेटी का विछोह ही लिखा है। इस माँ का दर्द तो एक बेटी की माँ ही समझ सकती है।”
दिवी के उत्साह ने जैसे एक साँस भर का विराम पा लिया हो, “हाँ बहन! सही कह रही हैं आप कि बेटे की माँ को भला बेटी की माँ का अनुभव कैसे हो सकता है। किसी भी तरह से समय चुरा कर भी, बेटियाँ मायके के नेह भरे दाने को चिड़िया सी चुगने के लिए अपने मायके के आँगन में पहुँच ही जाती हैं, पर ये बेटे न जिम्मेदारियों के बोझ तले एकदम प्रवासी पंछी से होते हैं जो मौसम बदलने पर ही आ पाते हैं और कभी-कभी मौसम आ कर चला भी जाता है पर बेटों के आने की बाट उनका आँगन जोहता रह जाता है।”
वह नम हो आयी पलकों को सुखाती हुई,अधरों पर मुस्कान सजाये चल दी थी अतिथियों का ध्यान रखने।
***
लघुकथा-३
उगता सूरज
शैली : संवाद शैली
आगे-पीछे झूलता हुआ हाथ आँखों के चंचल इशारे पर रुक कर, सड़क पर पड़ी पोटली उठाने को लपका ही था कि पोटली बोल पड़ी …
“रुको !”
“क्यों ?”
“क्या मैं तुम्हारी हूँ?”
“पता नहीं …”
“फिर मुझे देखते ही मुझ पर आधिपत्य जमाने की तुममें लालसा क्यों जाग गयी?”
“अरे! तुम सड़क पर पड़ी हुई हो, जिसकी निगाह पड़ेगी, वही तुमको ले जायेगा।”
“गलतफ़हमी मत पालो। मुझ पर किसी की नेमप्लेट नहीं लगी होने का मतलब ये नहीं है कि किसी का भी अधिपत्य मुझको स्वीकार करना पड़ेगा।”
“इस गलतफ़हमी में बिलकुल मत रहना कि तुम हमारी प्रधानता वाले समाज में ऐसे अकेली और सुरक्षित रहोगी।”
“मतलब क्या है तुम्हारा … क्या मेरी इच्छा और अस्तित्व का कोई अर्थ ही नहीं है?”
“अरे ओ पोटली ! तू और तेरी इच्छा है किस चिड़िया का नाम … इतने अच्छे से सँवर कर, इस आकर्षक कपड़े में लिपटी हुई तू, मुझको भा गयी है और अब तुझ पर मेरा अधिकार है।”
“तेरी इतनी हिम्मत कैसे हुई? मुझको इतना कमजोर समझने की भूल मत करना।”
“अच्छा! तू कर क्या लेगी मेरा … तुझको अपने मन की करनी थी तो अपने घर में छुप कर बैठी रहती न। आज तो मैं अपनी सारी चाहतें पूरी करूंगा। सबसे पहले तो आँखों की भूख शान्त करूँगा, फिर स्वादेन्द्रियों की … और तब भी मेरी कुछ हसरत बची रह गयी न तो बाजार में ले जाऊँगा तुझे, वहाँ भी तेरा कोई न कोई चाहनेवाला मुझको मिल ही जायेगा। अब मुझसे तुझको कौन बचा पायेगा … ”
“खुशफ़हमी में तू जी रहा होता तब भी कोई बात होती, परन्तु तू तो निरा ग़लतफ़हमी में ही साँसें ले रहा है। हाथ लगा कर तो देख जरा।”
आँखों में एक वीभत्स सी चमक जाग उठी और उसकी रौशनी में हाथ पोटली उठाने को लपका ही था कि पोटली ने आत्मरक्षार्थ आंतरिक बल की विद्युत तरंगे बिखेर दी और उसको छूते ही हाथ के मुँह से चीखें फूट पड़ीं ।
तीन लघुकथा
पवित्रा अग्रवाल
मोबाइलः 09393385447
चंगुल
“सुन रजिया मैं ने तुझे गुस्से में तीन बार तलाक बोल दिया था। अकेले में पहले भी बहुत बार बोल चुका हूँ, पहले तो तू ने कभी इस बात को तूल नहीं दिया था। आज ऐसा क्या हो गया कि सब को पता चल गया, क्या अब तू भी तलाक चाहती है?”
“मेरे तलाक चाहने या न चाहने से क्या होता है? यह तो बीबी से छुटकारा पाने का तुम मर्दों का हथियार है। रही बात सब को पता चलने की तो यह बात तुम्हारी अम्मी ने सुन ली थी। मुझ से पूछा तो मैं झूट नहीं बोल पाई। मैं तो वैसे भी तुम्हारे खानदान वालों की आँखों में खटकती हूँ। क्योंकि तुम ने अपनी मामू की बेटी से शादी करने के बदले मुझ से कर ली। अब अम्मी को मुझे उखाड़ फेंकने का मौका मिल गया है।”
“पर मैं उनकी हसरत कभी कामयाब नहीं होने दूँगा, तुझ से दोबारा निकाह करूँगा।”
“हमारे मजहब में दोबारा निकाह क्या आसन है?”
“आसन तो नहीं है.एक बार तुझे किसी ऐसे से निकाह करना पड़ेगा जो एक रात बाद ही तुझे तलाक दे दे।”
“मतलब मुझे उसके साथ एक रात गुजारनी होगी? हम बिस्तर होना पड़ेगा? अपने घरवालों को समझा कर बात फ़ैलने से रोक सको तो ठीक है वरना … ”
“वरना क्या ?”
“तुम्हारे गुस्से की आग सहते हुए भी अपने दो बच्चों की खातिर तुम से अलग नहीं हुई .अब यदि तलाक जग जाहिर हो चुका है तो तुम्हारे साथ दुबारा रहने के लिए मैं हलाला के चंगुल में फ़सने वाली नहीं हूँ… हम औरतों का मजाक बना कर रख दिया है ”
***
लघुकथा -2
चित्त भी उनकी पट्ट भी उनकी
घर पहुंचते ही पत्नी ने पूछा, “सुनो शास्त्री जी के पास हो आए?”
“हाँ”
आपने बताया कि उनके हिसाब से बनवाए इस नए मकान में रहते हुए करीब दो वर्ष हो गए हैं, पर परेशानियां रूप बदल बदल कर आ रही हैं। हम सुखी नहीं हैं। इस से ज्यादा सुखी तो हम पहले के मकान में थे, जिसमें उन्होंने वास्तु के हिसाब से बहुत से दोष गिना दिए थे।”
“हाँ मैं ने बताया कि इस घर में आने के बाद छोटे बेटे की नौकरी चली गई। बड़ी बहू का एबोर्शन हो गया। घर में अशान्ति रहने लगी है। मेरा व्यापार भी अच्छा नहीं चल रहा है, घर के खर्चे भी नहीं निकल रहे हैं।”
“क्या कहा उन्होंने ?”
“अब क्या कहेंगे? इन लोगों के पास हर बात का जवाब होता है। कहने लगे, “देखिए मैं ने आपका घर पूरी तरह से वास्तु के हिसाब से बनवाया है, पर आपके पड़ौस के वास्तु का, आपके काम करने की जगह के वास्तु का भी जीवन पर प्रभाव पड़ता है।
यह सब परेशानियां उसी की वजह से आ रही हैं।”
मैं ने कहा,”शास्त्री जी इस घर के सिवाय कुछ भी नहीं बदला है। मेरा व्यापार, बच्चों का आफिस सब पुरानी जगहों पर ही है।”
रूखे स्वर में चिढ़ कर बोले,”तो आपके पड़ौस का वास्तु प्रभावित कर रहा होगा, उसे मैं कैसे रोक सकता हूँ?”
***
लघुकथा 3
हाँ मैं पागल हूँ
‘अरे तू पागल हो गई है क्या? इस बच्चे को पास रख कर हम क्या करेंगे? समाज दस तरह की बातें बनायेगा और बच्चे को भी बहुत कुछ सहना पड़ेगा।’
‘समाज हमारी किस गलती के लिए बातें बनाएगा? क्या यह हमारी नाजायज औलाद है, या हमारे किसी पाप की निशानी है?’
‘तू समझती क्यों नहीं. हम कुछ नया नहीं कर रहे हैं, युगों से ऐसा ही होता रहा है, ऐसे बच्चों को हिजड़े आकर अपने साथ ले जाते हैं, बच्चो को पता भी नहीं चलता कि वह किस की औलाद हैं।’
‘अभी आपने कहा कि हमारे साथ रहा तो इस बच्चे को भी बहुत झेलना पड़ेगा…हमारे साथ नहीं रहा तो क्या उसे कुछ भी नहीं सहना पड़ेगा? अपने पडौस में देख लो रमेश जी की बेटी के दोनों हाथ नहीं है पर उसने पैरों की उँगलियों से लिख कर दसवीं पास कर ली है। स्कूल में उसे अपाहिज होने की वजह से बहुत झेलना पड़ता है। मेरे मामा का बेटा जन्म से अँधा है पर वह उसका पालन कर रहे हैं। मेरा बच्चा तो हर तरह से स्वस्थ है, क्या हुआ जो वह लड़का या लड़की की श्रेणी में न आकर किन्नर है। मैं उसे अच्छी शिक्षा दूँगी, उसका अच्छा भविष्य बनाऊंगी । उसे तालियाँ बजा कर घर घर से उगाही करने के लिए नहीं छोडूंगी. भले ही सब मुझे पागल कहें, यही मेरा अंतिम फैसला है।’
तीन लघुकथा
रागिनी श्रीवास्तव
मुंबई
लघुकथा-१
विवश
पापाजी की लंबी अस्वस्थता से घर की व्यवस्था डगमगा गई थी। विनीत की नई कंपनी में अभी बहुत स्कोप नही बन पा रहा था। काट छांट कर गृहस्थी चलाते चलाते आज वो खुद को बहुत असहाय महसूस करने लगी थी। ना जाने क्या सोच मायके की कॉल बेल बजाते हुए आँखे और गला दोनों भर रहे थे मगर उसने किसी तरह खुदपर नियंत्रण कर रखा था।
“अरे अनु! तू अकेले अचानक कैसे आई?” -माँ की आँखों मे प्रश्न था मगर पूछा नही।
“कैसी हो बेटी?”
“ठीक हूँ माँ, और सब भी ठीक है।”- माँ को आश्वस्त करते हुए उसने कहा था।
“दीदी ये लो न आगरा का पेठा… आज सुबह ही ये मीटिंग से वापस आए हैं।-
“सौम्य, अन्वेषा, बुआ को परेशान ना करो। थोड़ा आराम करने दो ,मैं चाय लाती हूँ।”
बुनाई करती माँ बेटी की चमकती साड़ी से संतुष्ट थी।
“खाना खा कर जा बेटी, आकाश तुझे छोड़ देगा।”
“नही माँ, अब मैं चलती हूँ… घर जाना जरूरी है”।- बच्चों को दुलारते हुए उसने कहा।
“फिर आना दीदी”। -कहते हुए भाभी ने खोइछा डाल दिया था।
***
लघुकथा-२
चश्में का नंबर।
पति ने लगातार बड़बड़ाते हुए तीनों रोटियां खा ली थी। हाथ धुलते वक्त भी जब नही रहा गया तो अपनी भड़ास निकाल ही ली “आज पचास साल से बिना शिकायत किए तुम्हारी जली रोटियां खा रहा हूँ… दिखता न हो तो चश्में का नंबर बदल लो”।
पत्नी ने धीरे से थाली हटा ली। इतने सालों से एक ही बात सुन-सुनकर उसके कानों ने सुनना, जुबान ने कुछ कहना लगभग बंद कर दिया था।
रात काफी हो चुकी थी पति को नींद नही आ रही थी। आज शाम सैर को जाते हुए बायां पैर थोड़ा मुड़ गया था। उस वक्त तो पता नही चला पर अब दर्द से परेशान हो करवट बदल रहा था।
अचानक मुँह से आवाज़ निकलने ही वाली थी कि जाने कब बगल में सोई पत्नी मूव लेकर आ गई।
कमरे की हल्की रोशनी में भी पत्नी के हाथ पर पड़े छालों के निशान साफ दिख रहे थे। अचानक पति को लगा चश्मा बदलने की जरूरत उसे भी है।
***
लघुकथा-३
घर
बुआ… कहाँ हो तुम ?
स्कूल से आते ही रिचा दौड़ते हुए अपने कमरे मे गयी जहाँ उसकी बुआ सुनिधि कपड़ो मे तह लगा रही थी ।”क्यों तुम तो कह रही थी कि इस बार पूरे वन वीक के लिए आऊँगी मगर अभी तो 3 दिन ही हुए हैं,बाहर वेद कह रहा है कि तुम आज ही फूफाजी के घर जा रही हो।” कहते हुए रिचा बुआ के गले से लटक गयी और रुआंसी हो गई थी। “बेटा अभी तो मै जा रही हूँ मगर जब तुम्हारे स्कूल मे सर्दी की छुट्टियाँ लगेंगी तो पूरे वन वीक तेरे साथ रहूंगी अभी जाने दे , वहाँ दादी की तबियत भी थोड़ी खराब है”…अंतिम वाक्य सुनिधि के गले में ही अटक गया था क्योंकि सच तो कुछ और ही था। माँ पापा के जाने के बाद भाई भाभी के साथ एक हफ़्ते रुकना बहुत ज्यादा लगता था और बिना उनके आग्रह के रुकने में शर्म भी आती और भाभी का औपचारिक व्यवहार पीड़ा से भर देता था। सुनिधि सोच रही थी इधर रिचा का रोना शुरू हो गया और बाल-सुलभ जिद्द भी। “तुम हर बार यही कहती हो बुआ कि इस बार बहुत दिन रुकूँगी”। “रो मत रिचा… देख बेटा शादी के बाद ससुराल ही लड़की का घर होता है… बार बार मायके नही आ सकती”। “फ़िर तो बुआ मैं भी शादी के बाद वन वीक के लिए नही आ पाऊँगी”। “अरे नही बेटा ये तो तुम्हारा घर है”-सुनिधि ने कहा। “पर बुआ ये तुम्हारा भी तो घर है न”…नौ वर्षीया रिचा का रोना बन्द हो चूका था।

तीन लघुकथा
अर्चना शर्मा
कोटा. राजस्थान
लघुकथा-१
अपने पराये
लोहा व स्वर्ण धातु आपस में बहस कर रहे थे।
स्वर्ण ने इठला कर लोहे से कहा …” तुम काले बदसूरत रोज पिटते हो फिर भी मेरे जैसे सुंदर नहीं हो …”
लोहा बोला ” हां तुम्हारा कहा सही है। मैं पिटता हूॅ॑ अपने ही भाई हथोड़े से, लेकिन पिटते तो तुम भी हो,वो भी हम से, यानी की पराये लोहे के हथोड़े से,तब ही तुम्हारी खूबसूरती बढ़ती है और तुम आभूषण बन कर लोगों की सजावट में चार चांद लगा पाते हो।
हम जो भी है लेकिन हमारे बगैर तुम किसी काम के नहीं बन पाते…
हमें कोई दुःख नहीं।
हम अपनों से पिटते है लेकिन तुम परायों से।”
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लघुकथा-२
बुराई-भलाई
बुराई ने गुलाबों से कहा – ” दुष्ट बनों लोगों को दुःख दो । ”
तो गुलाबों ने अपने चारों तरफ काॅ॑टे उगा लिए। लोग छिटक कर दूर हो गये।
किन्तु भलाई ने कहा – ” तुम अब भी अपने फूलों की सुन्दरता एवं सुगंध से लोगों को भरपूर खुशीयों के संग सुख पहुॅ॑चा सकते हों। ”
और गुलाब चारों तरफ महकने लगे।
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लघुकथा-३
शर्म
शर्म
स्टेशन के पास मेरी कार रुकते ही,एक भिखारी कार के पास दौड़ कर आया।
मुझे भी दयावश पर्स में हाथ डालना पड़ा … मात्र दो रुपये का सिक्का हाथ में आया, उसे ही उसके कटोरे में डाल दिया।
भिखारी सिक्का देखते ही बड़ा क्रोधित हो कर चिल्लाया … ” बड़े कार वाले बनते हो, शर्म नहीं आती … दो रुपये देते हुए ! कम से कम पॉ॑च रुपये तो देते। ”
मैं हतप्रभ रह गयी…
बहुत देर तक शर्म शब्द कानों में सीसा घोलता रहा।
‘ भीख देना शर्म है या लेना ! ‘

तीन लघुकथा
सीमा रानी
लघुकथा-१
शुद्धीकरण
शिवानी की जैसे ही आंखें खुली तो वह अपने आप को अस्पताल की बिस्तर पर देखकर चौंक उठती है,”अरे मैं यहाँ कैसे”?
सिस्टरः “दो दिन पहले कोई महिला आपको यहाँ पर छोड़ कर गई थी। आपका एक्सीडेंट हुआ था मैडम। आप बहुत बुरी स्थिति में थी। आपका बहुत खून भी बह गया था। उसी ने खून देकर आपकी जान बचाई। आप तो दो दिनों से बेहोश थी।”
“पर मेरे घर के लोग कहाँ है? वे लोग तो मुझे ढूंढ रहे होंगे, परेशान होंगे।
सिस्टर मेरा फोन कहाँ है?”
शिवानी अपने चारों ओर देखते हुए सिस्टम से कहती है।
“मैडम, मैं खुद ही फोन कर देती, पर आपके पास फोन नहीं था। लगता है एक्सीडेंट की वजह से आपका फोन कहीं गिर गया था।” ।
शिवानी- “पर वो महिला कौन हैं? मैं उससे मिलना चाहती हूँ।”
सिस्टर – “मैडम, वह तो प्रतिदिन यहाँ आती है और बाहर से ही आपका हाल पूछ कर चली जाती हैं। वह अंदर आना नहीं चाहती।”
पर आप कहती हैं तो मैं पुनः कोशिश करती हूँ और उन्हें लेकर आती हूँ।”
“अभी वह बाहर ही बैठी हुई है।”
शिवानी उस महिला को देखते ही बोल पड़ी,”धन्यवाद बहन! आपकी वजह से अब मैं स्वस्थ हो गई हूँ,पर आप बाहर से ही क्यों चली जाती हैं अंदर क्यों नहीं आती।”
“बहन, मेरा नाम सकीना है। शायद आपने मुझे पहचाना नहीं। एक महीना पहले आप सूर्य भगवान की आराधना कर रही थी। सभी आपके सुप मे दूध डाल रहे थे। मैं भी दूध डालने लगी। तभी आपके परिवार वाले मुझे यह कह कर बाहर कर दिए कि मेरे दूध डालने से आप अपवित्र हो गई। गंगाजल से आपको नहाया गया फिर जाकर आगे की पूजा आराधना हुई। इस वजह से मैं डर गई थी।”
“मानवता की कोई जात नहीं होती।”
यह कहकर शिवानी, सकीना को गले से लगा लेती है।
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लघुकथा-२
ग़मगुसार
बेटी की शादी को अभी चार दिन ही बीते थे, पर घर की दीवारों पर बंधी झालरें अब उदासी की तरह लटकने लगी थीं। हल्दी और महावर की गंध भी कोनों में अटकी थी,लेकिन शीला की आँखों में केवल थकान बची थी,शारीरिक और मानसिक दोनों। बरसों की जमा-पूंजी, रिश्तेदारों की उम्मीदें और समाज की रस्में निभाते-निभाते वह भीतर से बिल्कुल खाली हो गई थी। तभी अचानक दरवाज़े पर ढोलक की थाप और तालियों की आवाज़ गूंजी। “घर की मालकिन कहाँ है? हमलोग बधाइयाँ देने आए हैं!” दरवाज़ा खोला तो रंग-बिरंगे कपड़ों में लिपटे, काजल से भरी बड़ी आँखों वाले कुछ किन्नर खड़े थे। सबसे आगे पुष्पा किन्नर थी, जिसने मुस्कराते हुए अपनी हथेली हवा में नचाई,”छोटी बेटी की शादी हुई है,इस बार कुछ अच्छा मिलना चाहिए!” शीला ने थकी मुस्कान ओढ़ ली, “हाँ बहन, तुम लोगों के बिना तो कोई भी खुशी अधूरी ही लगती है।” पुष्पा ने गौर से देखते हुए कहा- “पर ये आँखें तो कुछ और कह रही हैं।तेरी आँखों मे आँसू क्यों हैं?” शीला ने पलकों को ज़ोर से झपकाया, “नहीं -नहीं ऐसी बात नहीं है,थोड़ी थकान है बस।” “मालकिन,” पुष्पा किन्नर बोली, “इस बार बधाइयाँ इक्कीस हज़ार में ही होंगी। और दो साड़ी ऊपर से!” शीला का चेहरा थोड़ा बुझ गया। वह धीरे से बोली, “बहन, बेटी की शादी में बहुत खर्च हो गया। अब तो बहुत कर्ज भी चढ़ गया है। थाली में चावल, हल्दी, सिक्का और पाँच हज़ार का सगुन रखा है। तुम लोगों को खाली नहीं भेजूंगी, पर इक्कीस हज़ार अभी मुमकिन नहीं है।” पुष्पा किन्नर हाथ खींचते हुए मुस्कराई। “हम लोग तो बधाइयाँ गाएंगे ही, हम लोग तो खुशी के मौके पर ही आते हैं और किसी को दुखी तो नहीं कर के नहीं जा सकते।” यह कहकर पुष्पा ने अपने झोले से एक लिफाफा निकाला और शीला की हथेली पर रख दिया। “ये क्या है?” “कुछ रुपए है।” “तुम…?” “हाँ बहन!पहले तुम अपना कर्ज़ चुकाओ। बड़ी बेटी की शादी में, गृह प्रवेश में, और नतनी के जन्मोत्सव पर इस घर से बहुत कुछ पाया है। अब लौटाने का वक़्त है। हम लोग सिर्फ खुशी के हीं साथी नहीं हैं, समय पड़ने पर तो हम लोग आंसू भी पोंछते हैं।” यह कहते हुए किन्नर टोली ढोल बजाते हुए सीढ़ियाँ उतरने लगी।
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लघुकथा-३
भूख
देवी लाल पुल की रंगाई-पुताई करके थक गया था। हाथ भी नहीं चल रहे थे। आज काम करने की इच्छा बिल्कुल भी नहीं हो रही थी। भैया के बुलावे के इंतजार में पूरा ध्यान घर की ओर लगा था। दस साल के देवीलाल और तेरह साल के भैया के सर पर जब कैंसर पीड़ित माँ को छोड़कर बाबूजी चल बसे थे। तभी से पैसे की तंगी के कारण छोटी उम्र से ही दोनों काम करने पर मजबूर हो गये। सड़क किनारे छोटी-छोटी पुलिया की रंगाई पोताई का काम मिल गया था। कैंसर जैसी भयावह रोग के घर में आते ही कंगाली ने जैसे अपना डेरा ही जमा लिया था। महीनों बाद कुछ अच्छे पैसे मिले थे। दोनों भाईयों ने फैसला किया कि आज क्यों न कढ़ी – चावल बनाया जाए। माँ भी बहुत दिनों से अच्छा खाने को तरस गई है। तभी सुरेश की आवाज़ आयी-अरे देवी लाल तेरे भैया तुझे बुलाने भेजे हैं। देवी ने आव न देखा ताव! कुदता हुआ पुलिया से नीचे उतर आया और चार फलांग मे ही घर पहूँच गया। गर्मा गर्म कढ़ी चावल सामने थी। भैया ने उँगली से दुसरी ओर इशारा किया। सामने माँ, खाट पर दम तोड़ चुकी थी। देवी लाल के पैरों तले से जमीन खिसक गयी। दोनों भाइयों नेएक-दूसरे को देखा! माँ तो अब मर ही चुकी हैं। किसी को बता दिया तो पुरे दिन खाना भी नहीं मिलेगा। फिर कल का क्या भरोसा? दोनों एक-दूसरे की अनकही को समझ चुके थे। अनगिनत सवाल आँखों में लिए दोनों भाई खाने में व्यस्त हो गए।
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