
पाँच लघुकथा. 
गीता चौबे गूंज
लघुकथा-१
वसुधा की जीवन-रेखा
“अरे! सुना तुमने? वसुधा वेंटिलेटर पर है…” मंगल के मुख से सुनकर शनि हतप्रभ था।
पूरे सौर-मंडल में हड़कंप मची हुई थी। सभी ग्रह चिंतित थे कि वसुधा की जीवन-लीला समाप्त हो गयी तो उसके बच्चों का क्या होगा? सभी बेमौत मारे जाएँगे।
शुक्र जो स्वभाव से ही गरम मिजाज का था, गुस्से से लाल होता हुआ बरस पड़ा,
” उसके बच्चों ने ही तो उसकी यह हालत कर डाली है। अब भुगतें! अच्छा हुआ कि हम जीवनरहित हैं वर्ना हमारा भी वही हाल होता जो आज वसुधा का है।”
” अरे! ऐसा न कहो। हमारे सौर-मंडल में एक वसुधा ही तो है जो कितनी खूबसूरत है। जहाँ पे जीवन है, हरियाली है। जल है, वायु है, खुशियाँ हैं। हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि वह जल्दी से ठीक हो जाए। “, जुपिटर भी इस आनलाइन कान्फ्रेंस में शामिल हो गया था।
तभी सभी के मोबाइल पर एक मेसेज फ्लैश हुआ…
‘वृक्षों से बनी दवाइयाँ और आक्सीजन चढ़ाने से वसुधा के जीवन-रेखा की वक्रता रफ्तार पकड़ने लगी है…’।
” थैंक गाॅड! अब पृथ्वी पर जंगलों की अनिवार्यता मनुष्यों को समझ आ गयी होगी”… सूर्य ने भी चैन की साँस ली।
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लघुकथा-२
पशुता
“मीनू! आजकल तुम बिल्कुल दिखाई नहीं देती। किट्टी-ग्रुप भी छोड़ दिया। क्या बात है?”
“वो माँजी गाँव चली गयीं हैं। पिंकी को अकेली छोड़कर कैसे आ सकती हूँ? उसकी परीक्षाएँ भी चल रही हैं।”
“अरे! तो ट्यूशन लगा दो न!”
“ट्यूशन तो लगाया ही है, पर आजकल किसी पर भरोसा करना मुश्किल है। ”
“हाँ, सही बोल रही हो मीनू! लड़की जात चाहे किसी भी उम्र की हो, अकेली छोड़ना खतरे से खाली नहीं है। आए दिन पेपर में बलात्कार की खबरें आती रहतीं हैं।”
“वही तो! बेटी की सुरक्षा को दाँव पर लगाकर मैं एन्जॉय कैसे कर सकती हूँ?”
“हाँ, मैं तो इस मामले में खुशकिस्मत हूँ कि मुझे बेटा है जो है तो तुम्हारी बेटी की ही उम्र का, पर लड़का है न, इसलिए मैं इस तरह की चिंता से मुक्त हूँ।”
“पशुओं में लिंग-निर्धारण की समझ कहाँ होती है। इसी पशुता से बचने के लिए हमें तीसरी आँख खुली रखनी है।”।
काँपती आवाज में सुधा बुदबुदा उठी…
‘मेरे बेटे सोनू के मुरझाए चेहरे के पीछे कहीं ऐसा ही कुछ तो नहीं! पड़ोस वाले लड़के से ट्यूशन पढ़ने जाने से बचने का बहाना बनाना उसकी मजबूरी तो नहीं…!’
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लघुकथा-३
तृप्ति
गंगा में अपने पूर्वजों का तर्पण कर लौटती सुधा पास में ही स्थित पार्क में कुछ देर के लिए रुक गयी जहाँ कुछ भिखारी बच्चों ने घेर लिया। सुधा ने लड्डू देने चाहे, पर उन्होंने लड्डू लेने से मना कर दिया और पैसे की माँग करने लगे।
सुधा ने भीख मँगवाने वाले गिरोह के बारे में सुन रखा था, इसलिए उसने तुरंत पूछा,
“तुम्हें पैसे क्यों चाहिए? भूख लगी है तो मिठाई या बिस्किट ही तो तुम्हारी भूख मिटा पाएगी। तो लो मिठाई और भूख मिटाओ। पैसे तो कतई नहीं दूँगी ”
सुधा की बात सुनकर सबसे छोटा बच्चा बोल पड़ा,
” सब लोग लड्डू या मिठाई ही देते हैं। नहीं मन करता अब यह सब खाने को।”
“तो क्या खाओगे? ”
” गोलगप्पा… ।”
” गोलगप्पा… ? ” सुधा की बात पर वही बच्चा बोला,
” और नहीं तो क्या… गोलगप्पा भी तो यहाँ पे मिलता है फिर भी कोई इसे नहीं देता!”
एक भिखारी के मुँह से गोलगप्पे खाने की बात सुनकर वहाँ से गुजर रहे एक आदमी ने व्यंग्य में कहा,
” अरे मैडम! आप भी कहाँ इन भिखारियों के फेरे में पड़ गयीं… माँगते हैं भीख, पर तृष्णा तो देखो इनकी…! ”
उस आदमी की बात सुनकर सुधा ने पलटकर जवाब दिया,
” भाईसाहब! भले ही ये भिखारी हैं, पर हैं तो इंसान ही न! मन पर वश किसका चला है? अगर इनका मन भी गोलगप्पे खाने का हो रहा है तो इनकी छोटी-सी तृष्णा को हम तृप्त नहीं कर सकते…?”
उधर बच्चे गोलगप्पे खा रहे थे, इधर सुधा सोच रही थी…’पितरों को तृप्त करना बहुत अच्छी बात है। अपनी सनातनी परंपरा को भी निभाना बहुत जरूरी है, किन्तु इन बच्चों के चेहरे पर आए तृप्ति के भाव भी तो कुछ कम नहीं!’
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लघुकथा-४
फ़रिश्ता
रोज की तरह गुब्बारे बेचती मनुवा की माँ आज बेटे की जिद पर उसे भी साथ लेकर आयी थी। इतने सारे गुब्बारों को देख मनुवा का मन भी मचल रहा था एक गुब्बारे लेने के लिए, पर माँ ने उसे एक बार बताया था कि दो पल की खुशी के लिए पेट को भूखा नहीं रख सकते। हालाँकि वह समझता था, फिर भी बालसुलभ इच्छा को दबाना भी मुश्किल लग रहा था। मन-ही-मन मना रहा था कि आखिरी गुब्बारे का कोई खरीदार न मिले।
इधर उसकी माँ सोच रही थी कि आखिरी गुब्बारा बेच कर वह मनुवा के लिए एक पीस पेस्ट्री खरीद देगी, आज उसका जन्मदिन जो था।
तभी एक लंबी-सी गाड़ी रुकी वहाँ और उससे एक आदमी उतरा। उसने उस गुब्बारे को खरीद लिया। उसने पचास रुपये का नोट दिया मनुवा की माँ को। छुटटे लाने के लिए वह बगल के दुकानदार के पास गयी। आने पर देखा कि वह आदमी और कार जा चुकी थी तथा मनुवा के हाथ में वह अंतिम गुब्बारा लहरा रहा था।
“बेटा! साबजी कहाँ गए? उनका गुब्बारा तुम्हारे हाथ में कैसे?”
“माँ वो भगवान जी थे, जो मेरे मन की इच्छा को समझ कर मुझे गुब्बारा देने आए थे… ऐसा उन्होंने कहा मुझसे और गाड़ी में बैठ कर चले गए।”
“हाँ बेटा! भगवान जी कभी-कभी अपने फ़रिश्तों को भेजते रहते हैं।”
लघुकथा-५
दोस्ती
“ खट… खट… खट…”
“ कौन?”
“ प्रिया, दरवाजा खोलो! मैं धूप, तुम्हारे बचपन की सखी।”
“मैं किसी धूप को नहीं जानती। अब तो मैं बड़ी हो गयी हूँ। मेरी सहेलियाँ भी बदल गयी हैं। अब तो एल ई डी, ट्यूबलाइट, डिस्कोलाइट आदि के साथ ही मेरा समय बीतता है। ये मेरी पक्की सहेलियाँ बन गयी हैं।”
“ऐसे कैसे भूल सकती हो मुझे? याद है! बचपन में तुम और मैं कैसे आँगन में आँख-मिचोली खेला करते थे। जाड़े के दिनों में तुम्हारा हर काम मेरी ही छत्रछाया में हुआ करता था। तब तुम कितनी तंदुरुस्त थी। आजकल तो तुम मरियल-सी लगती हो। तुम्हारी फोटो देखी थी मैंने तुम्हारे स्टेट्स पर।”
“तुम मेरा स्टेट्स देखती हो?”
“क्यों नहीं देखूँगी? जिससे हम प्यार करते हैं, उसकी हर खबर रखते हैं।”
“झूठ! तुम तो उस बस्ती वाली सुगनी की दोस्त बन गयी थी। अपनी शादी के बाद मैं शहर में चली गयी। तब तो तुमने कोई खोज-खबर नहीं रखी मेरी। आज दशकों बाद मेरी याद कैसे आ गयी?”
“ऐसा न कहो! मैंने कभी तुममें और सुगनी में कोई भेद नहीं किया। तुमने ही अपनेआप को चारदीवारियों में कैद कर लिया था। मैं तुम्हारे पास आती भी तो कैसे? एक सुराख भी तो नहीं छोड़ा था?”
“फिर आज कैसे दस्तक दी?”
“मैंने सुना तुम्हारी तबीयत बहुत खराब हो गयी है। डाॅ ने तुम्हें धूप का सेवन करने को बोला है।”
“हाँ, उसके लिए मैंने जाने कितनी गोलियाँ खायीं, पर कुछ खास फायदा नहीं हुआ।”
“तो लो! मैं अपनी दोस्ती निभाने आ गयी। ऐसा करो तुम अपनी पूरबवाली बालकनी को जिसमें तुमने कबाड़ भर रखा है, को साफ कर मेरे लिए थोड़ी-सी जगह बना दो! एक चेयर डाल कर बैठ जाओ! मैं रोज एक घंटा तुम्हारे साथ बिताऊँगी और तुम्हें पूरी तरह से ठीक करके ही मानूँगी।”
“सच! दोस्त हो तो ऐसी! हाय! कस्तूरी मेरे पास थी और मैं वन-वन भटक रही थी।”

पाँच लघुकथा

स्व. विजय विभोर
लघुकथा द्वारा आशा विजय ‘विभोर’ पत्नी स्व. श्री विजय ‘विभोर’
रोहतक (हरियाणा)
लघुकथा-१
शगुन
“अरे यार ! शादी के सीजन ने तो जान निकाल कर रख दी।” रामेश्वर ने शगुन के लिफाफे पर नाम लिखते हुए कहा।
इस महीने शादियों का बड़ा तगड़ा साहा है। एक-एक दिन में पांच-पांच शादियों के निमंत्रण आ जाते हैं। रामेश्वर के घर भी आज तीन शादियों के आए हुए थे। सभी अजीज थे इसलिए सबके यहाँ जाना भी मजबूरी था। क्योंकि तीनों ही निमंत्रण लड़की वालों की तरफ से थे। लड़के वालों की तरफ से होते तो कोई बहाना बनाकर टाल भी देते।
” सच कहते हो पूरा बजट हिल गया, शादी किसी और के घर होती है रुपयों की होली हमारे घर जल जाती है। अब एक ड्रेस से ज्यादा-से-ज्यादा दो शादियाँ ही निपटाई जा सकती हैं।” तैयार होते हुए शर्मीली ने अपने पति की हाँ में हाँ मिलाई।
“अच्छा! ये बताओ, शगुन के कितने- कितने रुपए डाल दूँ?”
“आप मुझे लिफाफे पर लिखे नाम बतलाते जाओ मैं आपको बताती हूँ किसे कितना शगुन देना है?”
“गुप्ता जी”
“गुप्ता जी!…… वही जो प्रोफेसर साहब हैं?……इनके यहाँ तो ग्यारह सौ डाल दो। बड़ा महंगे वाला कार्ड और मिठाई का डब्बा पहले ही दिए गए थे।”
“शर्मा जी।”
“इनके यहाँ भी ग्यारह सौ ही डालने पड़ेंगे।” अपने चिंटू के जन्मदिन पर महंगे वाला गिफ्ट लाए थे। उनके स्टेटस का कुछ तो ख्याल रखना पड़ेगा।”
“माली भीम सिंह की लड़की की शादी का कार्ड भी आया हुआ है।”
“कब की है….?” बिना किसी खुशी को जाहिर किए शर्मीली बोली।
“उसके यहाँ भी आज की शादी है। मैं तो बताना ही भूल गया था….. (अपना बचाव सा करते हुए रामेश्वर कह रहा था)….. उसका घर रास्ते में ही पड़ता है। भीम सिंह ने कार्यक्रम घर पर ही रखा हुआ है।”
“एक सौ एक डाल दो। दो मिनट के लिए उसके यहाँ भी रुक लेंगे।” शर्मीली में बुरा-सा मुँह बनाते हुए कहा।
रामेश्वर सोचने लगा शर्मीली भी कितनी भोली है। कन्यादान का अर्थ होता है जो साधनहीन व्यक्ति अपनी बेटी की शादी कर रहा है उसकी थोड़ी-सी मदद कर दी जाए। लेकिन आजकल उल्टा ही रिवाज चल पड़ा है, जिस आदमी की मदद करनी चाहिए उसके यहाँ कम शगुन डालते हैं और जिनके यहाँ भगवान का दिया सब कुछ है उनके यहाँ…….. उसने चुपके से भीम सिंह के लिफाफे में भी ग्यारह सौ का शगुन रख लिया।
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लघुकथा-२
समर्पण
शादी के बाद सभी रिश्तेदार अपने-अपने घर जा चुके थे। शाम का खाना बनाने की तैयारी थी।
शालिनी की सासू माँ, “उफ़ इस शादी के चक्कर में तो कई दिन हो गए ढंग का खाना खाए हुए। आज तो मैं अपने हाथों से कुछ अच्छा सा बनाती हूँ।”
“हाँ माँ जी! चलो मैं भी आपकी मदद करती हूँ ?” शालिनी बोली।
“अरे नहीं! सारी उम्र तुझे ही तो बनाना है। अभी कुछ दिन तो मेरे हाथ का बना खाना खा लो। हमारे स्वाद का भी पता चल जाएगा तुझे।”
शालिनी और मधुर की अरेंज मैरिज हुई है। शादी से पहले मिलना तो दूर फोन पर बात भी नहीं की है एक दूसरे से। शादी के बाद भी आज पहली बार एक दूसरे से ढंग से बातचीत होगी। खाना बनाकर तैयार होने पर सासू माँ खाना उनके कमरे में ही रख गयीं। सब्जी देखकर मधुर बड़ा खुश हुआ।
“अरे वाह, माँ ने मेरी मनपसंद अंडाकरी बनाई है कई दिनों बाद आज खाने में स्वाद बैठेगा।”
अंडाकरी की खुशबू लेते हुए वह आत्मविभोर हो रहा था। लेकिन शालिनी खुश नहीं थी, वह बोली, ” मेरे लायक खाने को कुछ नहीं है इसमें।”
“अरे इतनी अच्छी अंडाकरी बनी है…… जमकर खाओ।” मधुर की खुशी का ठिकाना नहीं था।
” मैंने कभी अंडे नहीं खाए।”
“लेकिन हमारे घर में तो लगभग हर रोज अंडे खाए जाते हैं अब तो तुम्हें अंडे खाने ही नहीं, बल्कि बनाना भी सीखना होगा।”
“नहीं मैं ऐसा नहीं कर सकती मुझे घिन्न आती है।” शालिनी ने नाक सिकुड़ते हुए कहा।
“देखो ! हमें जीवन भर साथ रहना है, इसलिए एक दूसरे की पसंद नापसंद, खान-पान सबके साथ सबका ध्यान रखकर ही चलना होगा। नहीं तो दाम्पत्य जीवन में बड़ी गड़बड़ होगी।” मधुर बड़े सहज भाव से बोला।
शालिनी शांत भाव से मधुर की बातें सुन रही थी। कुछ विचारने के बाद उसने रोटी का टुकड़ा तोड़ा और अंडाकरी में डुबो कर मुँह में डालने के लिए हाथ बढ़ाया, तभी मधुर ने उसका हाथ रोक लिया और अंडाकरी भी एक तरफ रख दी।
“क्या हुआ? मैं खा तो रही हूँ।”
“नहीं पगली मन मारकर खाना अच्छी बात नहीं है। तुम्हें यह नहीं अच्छा लगता तो यह तुम मत खाओ…. (शालिनी प्रश्नसूचक नजरों से मधुर को देख रही थी।) ….. हमें जीवन भर साथ रहना है। अब तुम्हें अंडाकरी पसंद नहीं है, तो अभी से मुझे भी यह पसंद नहीं है।”
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लघुकथा-३
नया नशा
वह सबसे कहता फिर रहा था, “मैं कभी कोई नशा-वशा नहीं करता। बौड़ी-सिगरेट, दारू-सारू सबसे कोसों दूर रहता हूँ।”
मैं बोला, “लेकिन तुम चौबीसों घण्टे मोबाइल से चिपके रहते हो। रात को 2-3 बजे भी तुरंत रिप्लाइ देते हो।” वह मेरी बातों को सुन तो रहा था, परंतु नजरें मोबाइल में गड़ाए हुए था।
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लघुकथा-४
सबक
जैसे ही लक्ष्मी के पिता महेश्वर को पता चला कि लक्ष्मी अपने सास-ससुर के साथ झगड़ा करके घर आयी है, तो उन्होंने लक्ष्मी के ससुराल फोन मिलाकर बात की। महेश्वर एक पंचायती आदमी था उसे सारी बात की हकीकत का विश्लेषण करने में देर नहीं लगी।
एक जोरदार तमाचे की आवाज़ लक्ष्मी के कान के नीचे हुई। कान के नीचे लगे तमाचे से उसको दिन में तारे नज़र आ गये। उसका कान जैसे सुन्न ही हो गया था। महेश्वर ने अपने जीवन में पहली बार अपनी बेटी पर हाथ उठाया था। कुछ देर बाद लक्ष्मी को पिता जी की आवाज सुनाई पड़ी- “लड़की! तुम्हारे अन्दर यह आराम परस्ती कैसे घर कर गयी? देखो तुम पति-पत्नी के बीच क्या खिचड़ी पकती है, इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। लोकिन तुम्हें मालूम होना चाहिए, अपने सार-ससुर के साथ कैसा व्यवहार करना है।… अरे! तुम्हारे सास-ससुर के स्थान पर यदि मैं और तुम्हारी माँ तुम्हारे घर तुमसे मिलने आते, तो भी क्या तुम अपने सास-ससुर के साथ किए गए व्यवहार सा ही व्यवहार करती? याद रख शादी के बाद सास-ससुर ही लड़की के माता-पिता होते हैं। उनके साथ किए गए तुम्हारे किसी भी बुरे व्यवहार का मैं साथी नहीं हूँ।”
अब लक्ष्मी को सास-ससुर के साथ किए गए अपने दुर्व्यवहार पर पछतावा हो रहा था। वह तुरन्त उलट पाँव ससुराल लौट गयी।
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लघुकथा-५
व्यवहार
गोलू बड़बड़ाता हुआ घर में घुसा। बैग टेबल पर पटक कर सोफे में धंस गया और जूते उतारने लगा।
दादा जी, “अरे मेरा गोलू इतना परेशान क्यूँ लग रहा है?” गोलू, यार दादा जी! ये साले ऑटो वाले भी बड़े हरामी है। पूरा आधे घंटे इंतजार करना पड़ा। कोई ऑटो वाला इधर आने को तैयार ही नहीं हुआ। बड़ी मुश्किल से एक आया।”
तब तक गोलू की मम्मी उसके लिए पानी ले आयी, पानी गोलू को दे हाथ से उसके माथे का पसीना पौंछा।
दादा जी, “…. तो क्या तुमने उसे धन्यवाद किया?”
गोलू, “धन्यवाद?…. किस बात का धन्यवाद। यह उसका काम था, जिसके बदले मैंने उसे रूपए दे दिए।”
दादा जी, “बेटा! अक्सर हमारे व्यवहार पर ही सामने वाले का व्यवहार निर्भर करता है।…. आप जिससे सेवाएँ ले रहे हो भले ही उसके बादले रुपए देते हो, लेकिन उसका धन्यवाद करना हमारा कर्तव्य बनता है, उसके कारण हमें सुविधा हुई।”
दादा जी की बातें सुनकर गोलू ने विचार किया, दादा जी सही तो कहा रहे हैं। आधे घंटे में कितने ही आटो वाले वहाँ से गुजरे किसी ने इधर आने की हिम्मत नहीं की…. लेकिन उस आटो वाले ने शायद मेरी मजबूरी को समझा। यदि वह भी नहीं आता तो मैं क्या करता?
गोलू, “आप सही कह रहे हैं दादा जी, आज से मैं भी धन्यवाद शब्द को अपनी दिनचर्या में शामिल करता हूँ।”
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पाँच लघुकथा
पद्मजा शर्मा
जोधपुर, राजस्थान
लघुकथा-१
लघुकथा –
”छुट्टी वाले दिन”
एक दिन हट्टे कट्टे मालिक ने पौंछा लगा रहे दुबले पतले नौकर से कहा –’श्याम ,थोड़ा ज़ोर से रगड़ो पौंछा। फर्श को सहलाओ मत । लग रहा है जैसे तुम्हारे शरीर में दम ही नहीं है ।’
रोज रोज की टोका टाकी से परेशान होकर मुंह लगे श्याम ने कहा –मालिक घी ,दूध ,दही ,मेवे आप खाते हैं ।दम तो आप में है । हम में कहाँ से आएगा दम?
दम क्यों नहीं आएगा ?तुम नहीं खाते क्या ?-मालिक ने डपटते हुए पूछा ।
श्याम ने सरलता से जवाब दिया -खाते हैं मालिक ,लेकिन अक्सर डांट, रूखी रोटी ,बची खुची सब्जी या फिर छाछ ।छुट्टी वाले दिन वह भी नसीब नहीं होती ।
बाल्टी का गंदा पानी नाली में बहाते हुए श्याम ने फिर कहा -मालिक एक बात कहूँ ?
क्या ?
कभी आप लगाकर देखो न पौंछा।
मालिक ने क्रोध में उत्तेजित होते हुए कहा -श्याम, तुम ज्यादा बोल रहे हो ।
श्याम ने शांति से कहा -मालिक आप ज्यादा खा रहे हैं मैं कुछ बोला ?मैं कभी ज्यादा बोलूँ तो आप भी सुन लीजिए ।
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लघुकथा-२
मांगेंगे नहीं
उनके बेटे का विवाह होने वाला था । उन्होंने कहा वे दहेज नहीं मांगेंगे । विवाह के चार दिन पहले जब उनके घर मैंने नया फर्नीचर ,नया टी वी, नई वॉशिंग मशीन ,नया पलंग ,नई ड्रेसिंग टेबल देखी तो पूछे बिना न रह सकी कि ये सब ख़रीदारी कब की और क्यों ?आपके पास तो सब कुछ है ।
वे बोले –ये सब तो राहुल के ससुराल से आया है ।
मैंने कहा -पर आप तो कह रहे थे कि दहेज नहीं मांगेंगे ।
वे लापरवाही से बोले –हाँ, हमने मांगा कहाँ । ये सब सामान तो राहुल के ससुराल वाले अपनी बेटी के लिए रख गए ।
तभी राहुल बोल पड़ा – आंटी , हमने यह थोड़े ही कहा था कि दहेज लेंगे नहीं ।हमने तो कहा था मांगेंगे नहीं ।
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लघुकथा-३
आदमी नहीं ग्राहक
उस कस्बे में कुछ ही दिनों में कई मॉल ,रेस्तरां और सिनेमा हॉल खुल गए ।जिसको देखो मॉल ,रेस्तरां की ओर भागता दिखाई देता । लोग जो थोड़ी बहुत कमाई बचा लिया करते थे वह भी अब जरूरत – बेजरूरत खर्च हो जाती थी । एक दिन कस्बे में जनगणना वाले आए ।पूछा -यहाँ कितने आदमी रहते हैं ।
भीड़ में कुछ लोग अंगुलियों पर धीरे -धीरे गिनने लगे -हजार ,डेढ़ हजार, दो हजार । तभी एक पागल ज़ोर से चिल्लाया -यहाँ एक भी आदमी नहीं रहता ।
चारों तरफ चुप्पी छागई ।सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे । तभी एक बुजुर्ग बोल पड़े –साहब, यहाँ आदमी नहीं ग्राहक रहते हैं ।
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लघुकथा-४
विधवा
माँ मेरे लिए ढंग की साड़ी लाना। सिल्क की। जिसे मैं पहन सकूँ।
बेटा तेरा पति मरा है । लोगों से घर भरा है थोड़ा धीरे बोल । और ऐसी बात सुनकर सास क्या कहेगी ? । 12 वें पर हल्की साड़ी ही दी जाती है । यह कोई खुशी का मौका थोड़े ही है ।तू विधवा हो गई है ।सधवा थोड़े ही है जो सिल्क पहनेगी ?
तो माँ ,मेरे लिए यह कोई गम की बात भी नहीं है ।तू तो जानती ही थी कि शहर में वह क्या गुल खिला रहा था । वैश्यालय जाता था । फिर उसे एड्स ने जकड़ लिया था । शराब पीता था । कभी मेरा या मनी का ख्याल किया ? वो तो मैं नौकरी करती थी इसलिए जीवन चल गया वरना क्या करते ।गाँव आता तो सिवाय मार पिटाई के क्या देकर जाता था ? मैं विधवा हो गई तो एक तरह से अच्छा ही हुआ । अब शांति का जीवन जी पाऊँगी । मैं सधवा से विधवा ही अच्छी हूँ ।
रोज बहू के साथ निर्मम बर्ताव करने वाली, कटु वचन बोलने वाली सास भी चुप थी और भीड़ खामोश ।
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लघुकथा-५
हुक्म
बाजार में खून खराबा हुआ । तोड़फोड़ होने लगी । शाम होते -होते दुकानों के शटर गिरने लगे । एक आदमी जान से हाथ धो बैठा तब पुलिस आई। लेकिन एक दुकान खुली थी जिसमें एक लड़का इत्मीनान से बैठा था ।बाहर की दुनिया से बाखबर होते हुए भी बेखबर । किसी ने उसे चिंतित स्वर में आगाह किया -सब दुकानदार दुकानें बंद कर चले गए तुम नहीं जाओगे ? जान को खतरा है ?
लड़के ने घड़ी की ओर देखते हुए तसल्ली से जवाब दिया -मालिक का हुक्म है रात आठ बजे से पहले दुकान बंद नहीं होनी चाहिए ।अभी तो आठ बजने में दो घंटे बाकी हैं ।अगर समय से पहले दुकान बंद कर दी तो मालिक काम से निकाल देगा ।
आदमी ने फिर कहा -अगर बलवाइयों की नजर इधर पड़ गई तो सब तहस नहस कर देंगे ।तुम समय से पहले जिंदगी से निकल जाओगे ।
लड़के ने पुरसुकून जवाब दिया -वो मेरी गलती नहीं होगी ।
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