रीता रानी, मधूलिका सिन्हा, मिन्नी मिश्रा

पाँच लघुकथा

रीता रानी

लघुकथा-१
इनर इंजीनियरिंग

मोहना अपने शहर लौट रही थी। वास्तव में दुर्गापूजा की छुट्टियों में वह भोपाल गई थी , अपने भाई के पास और वहीं से अब छुट्टियों के समाप्ति के कगार पर होने के कारण वापसी का रुख था। अचानक ही मोहना की माता जी का मोहना के साथ आने का कार्यक्रम बन गया।

मोहना के पुरानी टिकट की रिजर्वेशन पक्की थी परंतु माँ के साथ हो लेने से पुराने टिकट को रद्द कर दोनों का फिर नया टिकट बना था।

निर्धारित तिथि को दोनों माँ – बेटी रेलवे स्टेशन पर मौजूद थे और ट्रेन के आने के बाद मोहना के भाई- भाभी ने उन दोनों को अंदर व्यवस्थित कर देना चाहा।सामान तो व्यवस्थित हो गए परंतु समयाभाव में और ज्यादा कुछ नहीं हो पाया। वास्तव में तत्काल में टिकट लेने के कारण मोहना और उसकी माँ दोनों को ऊपरवाली बर्थ मिली थी । समय पर ही ट्रेन खुल गई और अब मोहना के सामने सबसे बड़ी समस्या अपनी माँ के लिए नीचे की किसी बर्थ का इंतजाम करना था ।72 वर्ष की वृद्धा भला ऊपरी बर्थ तक चढ़ भी पातीं तो कैसे ?

काफी अनुनय – विनय के बाद अकेले यात्रा कर रहे , बायीं ओर के नीचे बर्थवाले सज्जन ,रात्रि में अपनी बर्थ बदलने को तैयार हो गए और वह उसकी माँ के ऊपरी बर्थ पर चले गयें। माँ को सोता देख मोहना भी अपने बर्थ पर जा लेटी परंतु पौ फटते ही उन सज्जन को अपनी सीट पर का अधिकार शायद याद हो आया और वे नीचे आ खिड़की के बगल अपना स्थान जमा बैंठें। मजबूरन उसकी माँ को भी उठ बैठना पड़ा।

दायीं ओर वाली निचली बर्थ पर एक सज्जन अपने 11-12 वर्षीय पुत्र के साथ यात्रा कर रहे थें।आमने-सामने की सीट पर बैठे दोनों देश-विदेश ,नौकरी – व्यवसाय, परिवेश- समाज– आदि कई-कई विषयों पर अपने गहन चर्चा में लगे हुए थे।वहीं बैठी मोहना के कानों में इस चर्चा का एक भी शब्द प्रवेश नहीं कर पा रहा था क्योंकि ट्रेन को मोहना के गंतव्य तक देर शाम ढले पहुँचना था और वह जानती थी कि माँ की कमर इतने घंटे का बैठना बर्दाश्त नहीं कर पाएगी और वह भी लगातार।

उसने अब दायीं ओर के सीट वाले सज्जन से प्रार्थना की कि आप बायीं ओर वाली सीट पर ही आकर बैठ जाएं और दायीं बर्थ को खाली कर दें ताकि वहाँ माँ लेट सके परंतु उनका पुत्र खिड़की से बाहर के रमणीक दृश्यों को देखने से चूक न जाए इसलिए उन्होंने इंकार कर दिया। हतप्रभ मोहना कभी उस सज्जन को देखती और कभी
उनकी गोद में औंधी पड़ी सदगुरु की पुस्तक को —“इनर इंजीनियरिंग – अ योगीज़ गाइड टू जॉय- आत्म इंजीनियरंग की पुस्तक– आनंद के लिए एक योगी की मार्गदर्शिका —न्यूयॉर्क टाइम्स की बेस्टसेलर ।

लगुकथा-२
रंग कैसे कैसे
कितनी तेज वर्षा थी उस दिन। छतरी में छुपते -छुपाते तेज कदमों से सड़क को नापते हुए वंदना तेजी से एक ऑटो के सामने आते ही उसमें बैठ गई। तेज बारिश के कारण ही सोमेश उसे लेने कहाँ आ पाए थे ? अंतिम सवारी होने के कारण बैठने की जगह पर्याप्त तो नहीं मिली थी। पर अभी फैल कर बैठने की कौन सोचे , बस बारिश से बचना था और जल्द -से -जल्द किसी तरह घर पहुँच जाना था। अपनी जगह के समायोजन के क्रम में ही वंदना ने अपनी नजर अन्य सवारियों पर डाली— पार्श्व में बिल्कुल किशोर वय की एक लड़की बैठी थी और उसके बगल में दो पुरुष सवारी। किशोरी शायद लौट रही थी कोचिंग- ट्यूशन से। गोद में एक नीले रंग का बैग रखा था उसने ।बच्चे सिर्फ स्कूल के भरोसे कहाँ रहते हैं -यही सोचते सोचते उसने एक सरसरी नजर उस लड़की पर डाली। पर वंदना की सरसरी नजर कुछ ठिठक सी गई। सहज नहीं लग रही थी वह उसे – चेहरे पर तनाव और बदन असमान्य अकड़न के साथ । कुछ तो अनापेक्षित है– छठी इन्द्रिय जैसे कह उठी। वंदना ने अपनी नजर को और विस्तार दिया। किशोरी के पार्श्व का पुरुष सहयात्री 40 – 45 के आस -पास के वय का , किशोरी की ओर अनावश्यक झुका हुआ एक विशिष्टकोण पर होना चाह रहा था। उस बच्ची में उसे रिया की शक्ल नजर आने लगी , रिया उसकी बेटी ।

वंदना ने अपनी जलती निगाह उस व्यक्ति पर डाली ही थी कि वह सहमता हुआ सीधे बैठने का अभिनय करने लगा। अपराध अनुभवपूर्ण आँखों के प्रतिकार से जल उठे दाह को तीव्रता से पढ़ लेता है।

सड़क पर बेतरतीब गिर रही बूँदों की झमझमाहट इतनी तेज थी कि उसके शाब्दिक प्रतिरोध के तर्क -वितर्क को भी वह बहा ले जाती, जबतक चालक और अन्य सवारी पूरे घटनाक्रम को समझते । त्वरित उपाय कुछ न समझ उसने ऑटो ड्राइवर को ऑटो किनारे लगाने को कहा। अब वह बच्ची की जगह पर और बच्ची उसकी जगह पर, जगह की अदला- बदली में दोनों ही पूरे भींगे हुए ,एक मौन संवाद दो स्त्रियों के मध्य सम्पन्न।

ऑटो चल पड़ा। बारिश अब फुहार में बदल चुकी थी । अब तक वंदना का जब्त आक्रोश फूटना ही चाह रहा था कि वह शख्स एक रैली को जाते हुए देख हड़बड़ा कर ड्राइवर के कंधे थपथपाने लगा ताकि वह वहीं पर गाड़ी रोक दे।ड्राइवर ने किसी तरह जगह बनाते हुए ऑटो रोका ।वह व्यक्ति अब उस रैली का हिस्सा था और उसके हाथों में भी एक तख्ती थी -” मेरा शरीर मेरा है , यह कोई वस्तु नहीं है।” अनेक गूँजते नारों के साथ अब वह कदमताल कर बढ़ चुका था ।

लघुकथा-३

अभौतिक उपार्जन

परीक्षाओं का दौर चल रहा है। कुछ कक्षाओं की बोर्ड परीक्षा समाप्त हो चुकी, कुछ की शेष है। जिन कक्षाओं की बोर्ड परीक्षा सन्निकट है ,छात्र पूरी तन्मयता में डूबे हैं,कुछ मौसमी रुग्णता के बावजूद कक्षा में उपस्थित । दो दिन पहले कक्षा में एक बालक खाँसता हुआ दृष्टिगोचर हो रहा था, आज यह संख्या एक से बढ़कर तीन थी।अभी -अभी विदा हुए कोरोना के भयावह मंजर ने खाँसी को भूत – प्रेत से कम डरावना भी नहीं बना दिया है।

संक्रमण के फैलाव को बाधित करने हेतु मैंने यूँ ही सरलता से कहा”आप में से जिनको भी खाँसी हो रही है, वे मास्क लगाकर विद्यालय आएँ।” तुरंत ही एक छात्रा मेरी पंक्ति के खत्म होने के साथ ही मुस्कुराते हुए बोल पड़ी -“नहीं तो परीक्षा के दिन हम सभी लेटे हुए नजर आएंगे।”

इस हास -परिहास के बीच श्यामपट्ट पर लिखती मैं जब बच्चों की ओर मुड़कर देखती हूँ तो बस निःशब्द रह जाती हूँ । एक छात्र मास्क लगाए हुए दिख रहा है–कपड़े की नहीं अपितु कागज की–पतली रस्सी उसके कानों पर चढ़ी है। उसके मासूम नेह और गुरु परायणता ने मेरे अंतर्मन के किन-किन परतों को भिंगो दिया– शब्दातीत है।मेरे पेशे का अभौतिक उपार्जन है यह ।

लघुकथा-४
वास्तविक आराधक

कल दोपहर के सूर्य की चढ़ान के साथ ही ढाक , मंजीरे , ढोल , शंख की समवेत ध्वनियाँ हर भक्त को सड़क किनारे ला खड़ा कर दे रही थी । ट्रकों पर जाती ऊँची – ऊँची दुर्गा की भव्य प्रतिमाएँ ,भक्ति व उल्लास में डूबी स्वर लहरियाँ, खड़े भक्तों के नेत्रों में भवानी के अंतिम दर्शन को भर लेने की ललक, स्त्रियों के नाक से लेकर पूरी माँग तक खींची सिंदूर की गहरी प्रशस्त लाल रेखा, अबीरों के छीटें ,हर पण्डाल के कार्यकर्त्ताओं की अतिव्यस्तता –सब मिलकर एक अलग ही दृश्य का अनावरण कर रहे थे। प्रशासन द्वारा सभी स्थलों की दिशा निर्धारित थी और समय भी –बस उसका अनुपालन करते हुए सबको शहर के जल स्रोतों में माता की प्रतिमा का विसर्जन कर देना था और इस तरह समाप्त हो गई माँ दुर्गा की दस दिवसीय आराधना ।

इस लम्बे उत्सवीय व्यस्तता के बाद आई आज की सुबह कुछ ज्यादा ही शांत लग रही है ,रविवार भी है आज। परंतु मधुरिमा सुबह ही उठकर रसोई में लग गई । न लगे तो प्रकाश बिना नाश्ता किये ही चल पड़ेंगे । उनकी टीम भी तो नदी घाट पर पहुँचने वाली होगी ।

खाने की मेज पर नाश्ता रखते हुए मधुरिमा ने कहा -“पहले नगर निगम वालों को तो आकर साफ कर लेने दो फिर तुम और तुम्हारी टीम अपना समय देना।” ” तुम तो जानती हो, निगम वाले भी यही देख रहे होंगे कि कब “नदियाँ पुकारें “आये और काम में लग जाये।”– प्रथम कौर मुँह में डालते प्रकाश बोले । “तुम चल पाती तो तुमसे भी आज मूर्तियों , कपड़ों , पूजन सामाग्रियों — आदि से पटे घाट और दूषित हो उठी जलधारा देखी न जाती।” “बहुत समझाने पर भी कहाँ सारी पूजन सामाग्रियाँ बनाये गड्ढों में डाली जा रही हैं, और बातें तो छोड़ ही दो ।” “आता हूँ, बड़ी आर्त्त हृदय से पुकार रही होगी माँ खरकई।”

अपने दो मास के पुत्र का रुदन सुन मधुरिमा शयनकक्ष की ओर बढ़ गई। थपकाते हुए उसे सोचती रही — आदिशक्ति का वास्तविक आराधक कौन ?
लघुकथा-५
लाईट हाउस

ट्रेन धड़धड़ाती पटरी पर अपनी पूरी रफ्तार में दौड़ी चली जा रही थी। स्वप्रेम में केंद्रित स्नेहा प्रकृति से मौन संभाषण में लगी हुई थी ,तभी एक मधुर स्वरलहरी उसके श्रवण तंत्रिकाओं से आकर टकराई ।सुनना बड़ा सुखद लगा ।मन को मिला सुख दृगों में उत्सुकता की तरंगों को जन्म देने लगा-कौन है? अहा, इतनी मधुर और सुरीली आवाज ।भाषा भी पहचानी हुई –शुद्ध बांग्ला।

सार्वजनिक स्थान की शिष्टता का पालन करते हुए लोग भला कहाँ ऐसे गाते हैं ट्रेन में —- इस प्रश्न से उलझी हुई स्नेहा अपनी जगह बदलकर, आई तटस्थता को थोड़ा तोड़ना चाह रही थी कि दूसरे कंपार्टमेंट में ऊपर वाली सीट पर नजर गई।एक स्त्री मलीन कपड़ों में, छोटे-छोटे बाल, कंबल लपेटे अन्य यात्रियों से थोड़ी अलग सी दिख रही थी। एक पल की दृष्टि ने ही इतना तो ग्रहण कर लिया कि वहाँ कुछ असामान्य तो है।

थोड़ी देर बाद वह महिला एक अन्य महिला के साथ शौचालय की ओर जाती दिखी । मन संदेह में लिपटे अनेक प्रश्नों से जूझने लगा। साथ वाली महिला एक लघु स्मित के साथ पास से गुजर गईं – पौरुषिक वेशभूषा, दृढ़ व्यक्तित्व की आभा से युक्त। तीन लोगों का समूह था इनका , जिसमें एक पुरुष सदस्य की भी उपस्थिति थी।

भारतीय रेलवे से बढ़िया समाजशास्त्र का अध्याय कोई हो ही नहीं सकता। किलोमीटरों और घंटों का सान्निध्य धीरे -धीरे सबके एकांतिक व्यक्तित्व के घेरे को तोड़ने लगता है । चर्चा- परिचर्चाएं,सहयोग, मुस्कान —कितने ही रंग बिखरने लगते हैं और इन्हीं रंगों के बीच टूटते घेरों के मध्य ज्ञात हुआ कि उस मानसिक रूप से असंतुलित महिला के दोनों साथी राजस्थान पुलिस के हेड कांस्टेबल हैं । इन दोनों के पास मानव तस्करी के अनेक कहानियाँ थीं। उन्हीं कहानियों में से इस कहानी का वे सुखद अंत करने निकले थें ।

नवीन स्वपनों और श्रम की तलाश में निकली यह युवती अपने दल से भटककर मुंबई में सामूहिक शारीरिक दुराचार का शिकार होती है, पर यंत्रणा यही समाप्त नहीं होती। इस जाल से निकल भागने की कोशिश में आगे उदयपुर शहर भी इसे पाश्विक दुःखों से ही घेर लेता है। अपने गाँव पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर से मुंबई और उसके बाद उदयपुर तक की यात्रा में शारीरिक यंत्रणाओं का शिकार होते-होते अपना मानसिक संतुलन खो चुकी यह महिला गुमशुदावस्था में उदयपुर के एक एनजीओ को मिली थी, जिसने उदयपुर पुलिस से संपर्क स्थापित कर, उसके घर वालों की पहचान कर, सकुशल घर वापसी की उसकी व्यवस्था की है।

इन दोनों पुलिसकर्मियों का अनुभव सुन रही थी स्नेहा– अभी के सामान्य दिनों की बात अलग है। जब कोरोना में सभी अपने आप को सुरक्षित रखने के लिए अपने-अपने घरों में कैद हो रहना पसंद कर रहे थे , वैसे दौर में भी वे कम से कम 20 राज्यों की यात्रा कर चुके थे, गुमशुदा लोगों को उनके घर तक पहुँचाने के क्रम में। वे आगे बता रहे थे –“सभी कर्मी इस ड्यूटी को लेना भी नहीं चाहते, क्योंकि घर छोड़कर यात्राएँ करनी पड़ती हैं और कई बार तो टिकट भी ढंग की बोगियों में प्राप्त होने की बात कौन करे, आरक्षित सीट तक नहीं मिलती –और अगर पीड़ित की मानसिक दशा ऐसी हो,तो उसको उसके गंतव्य तक पहुँचाना एक चुनौती ही है।”

स्नेहा की बॉगी की पीड़िता भी बार-बार बीड़ी पीने की माँग कर रही थी—चलती ट्रेन में उसकी इस इच्छा को, जो कई -कई बार उग्र रूप ले लेती थी, कभी पूरा करना और कभी उसे बहला-फुसलाकर रखना — सबकुछ देख रही थी स्नेहा।

पुलिस की भ्रष्टाचार से ओतप्रोत गहरी पूर्वाग्रही छवि थी स्नेहा के मन में। आये दिन वह अपने शहर की ट्रैफिक पुलिस को हेलमेट या सीट बेल्ट नहीं पहनने पर कुछ पैसे लेकर अपनी जेब में रखते हुए देखा करती है। जैसे सड़क पर खड़े ही हों– सुचारू यातायात व्यवस्था के लिए नहीं वरन् उगाही के लिए । स्थानीय थाने की धीमी चलती जीप से उतरकर पुलिसकर्मी को सड़क किनारे बैठे गरीब सब्जी वालों से मुफ्त में सब्जियाँ बटोरते देखा है, ठेले वालों से रंगदारी वसूल करते देखा है ,तो बड़े-बड़े मामलों में,जहाँ बड़ी राशि कमाने की पूरी गुंजाइश हो ,उनका व्यवहार कितना स्तरहीन और लूटपाट का होता होगा, वह हमेशा सोचती ।

परंतु आज स्नेहा की आँखों ने अद्वितीय उज्जवल प्रकाश में दूसरी छवि देखी है। वह सोचती रही -सच , समाज के गहरे अंधेरों के बीच कुछ लोग लाइट हाउस की तरह होते हैं ,मानवता का भार अपने कंधों पर उठाए खड़े ।

पाँच लघुकथा

मधूलिका सिन्हा, गुरुग्राम, हरियाणा

लघुकथा-१

कोई तीसरा

सविता को रात भर नींद नहीं आई। सुबह पांच बजे ही उठकर वह मॉर्निंग वॉक पर निकल गई। वॉक क्या होना था, वह तो बस अपनी उहापोह से बाहर निकलने के लिए घर से निकल गई।

अच्छी भली जिंदगी चल रही थी। शेखर और सविता दोनों एक दूसरे के लिए प्यार और इज़्ज़त का भाव रखते। हाँ ये सच था कि सविता बहुत मुखर थी और शेखर उतना ही चुप,नशांत रहने वाला। लेकिन सविता की छोटी से छोटी बात का भी पूरा ध्यान रखता था।

सविता पार्क के बेंच पर बैठी अनुलोम- विलोम करने लगी। लेकिन दिमाग कब शांत रहने लगा।

आज वह इस समस्या का हल ढूंढ कर रहेगी।
जब से वह मिसेज शर्मा से मिली है, उनकी बातें उसपर बहुत असर डालने लगी है।

वह हमेशा कहती कि यदि पति आपसे कुछ न कहे आपकी तारीफ न करे, गाहे – ब – गाहे तोहफे न दे तो इसका साफ मतलब है कि वह आपसे प्यार नहीं करता।

यदि पति स्पेस देने के नाम पर पत्नी को अकेला छोड़े या कोई रोक -टोक न करे तो समझ लो कि तुम्हारी अहमियत उसकी जिंदगी में न के बराबर है।

और भी कई बातें जो लगभग सारे शेखर में थे।

सविता बहुत परेशान थी और शेखर के प्रति उसका व्यवहार भी बदला- बदला सा हो गया। शेखर ने भी गौर किया। एकाध बार जानने की कोशिश भी की। फिर अपने स्वभावानुसार “जब बताना उचित लगेगा तब बताएगी ” यह सोच चुप रह गया।
इन बातों ने आग में घी का काम किया।

मतलब शेखर मुझसे प्यार नहीं करता, मैं भी कितनी भोली हूँ जो उसके चाल को नहीं समझ सकी।
लेकिन अब नहीं। आज अभी ही शेखर से बात करूँगी। ये सोच वह घर की ओर चल दी।

उसने सोचा कि मिसेज शर्मा को धन्यवाद देती चलूँ जिसने उसकी आँखे खोल दी।

उनके घर पहुंच डोरबेल की तरफ हाथ बढ़ाया ही था कि भीतर से दोनों पति-पत्नी के चीखने चिल्लाने की आवाज़ें आने लगी।

वह रुक गई। शायद झगड़ा हो रहा है।
अरे क्या बात हुई जो आज ये परफेक्ट कपल में लड़ाई हो रही है। तभी मिसेस शर्मा की बातें उसे सुनाई दी

“तुममें कुछ भी ऐसा नही है जैसा पड़ोस के शेखर जी में है। वो अपनी पत्नी और उसके परिवारवालों की कितनी इज़्ज़त करते हैं। सबसे बड़ी बात कि वो समझते हैं कि सविता सिर्फ उनकी पत्नी नहीं लेकन एक अलग व्यक्तित्व भी है। और तुम मुझे अपनी जागीर समझते हो। बस तुम्हारे कहे पर ही चलूँ।

मुझे हर वक़्त एक परफ़ेक्ट कपल दिखने के लिए सबके सामने नाटक करना पड़ता है , पचास झूठ बोलने पड़ते हैं। असल एक दूसरे के लिए तो वो दोनों बने हैं।
कुछ सीखो उनसे। दोनों ने एक दूसरे को ,वो जैसे हैं वैसे ही स्वीकारा है।

सविता ये सब सुन भौचक रह गई। तो क्या …

दरवाजे की ओर बढ़ते उसके हाथ ठिठक गए और दिमाग का ताला खुल गया।

***

लघुकथा-२
अतिक्रमण
रेणुका जी चाय की प्याली के साथ2025 सोफे पर बैठ गई और टीवी ऑन कर समाचार लगा दिया, प्रतिदिन की तरह|

प्रतिदिन की तरह समाचार भी वही सब, मार-धाड़ , राजनैतिक खींचातानी, घटनाओं- दुर्घटनाओं से भरी पड़ी थी| पिछले तीन-चार दिनों से भीषण बारिश का समाचार देख दी दहल रहा था|

इस बरसात सिर्फ बारिश ही नहीं हो रही थी बल्कि असमान से जैसे आफत बरस रही है। हिमाचल प्रदेश के शिमला, कुल्लू, मनाली जैसे पर्यटक स्थल ही नहीं बल्कि जम्मू वैष्णव देवी मार्ग, साथ अर्धकुमारी में हुई भयानक बारिश और भूस्खलन ने तबाही मचा दी| देश के कई राज्यों और शहरों का यही हाल है| कहीं पुल टूट रहे हैं, कहीं रास्ते बिखर रहे हैं और तो और रिहायशी इलाकों में भी जलभराव घरों के अंदर भी प्रवेश ले लिया है|

रेणुका जी ने टीवी बंद कर दिया| वह सोचने लगीं ,ये तो सच है कि बदरीनाथ, केदारनाथ, वैष्णव देवी जैसी तीर्थ यात्राएं कभी सुगम न थीं| बारिश और बर्फ हर वर्ष इनके रास्ते बाधित करते थे|

लेकिन इस बार बारिश का जो तूफानी वेग है, जितने भूस्खलन हुए, बादल फटे यह बीते कई सालों से बहुत जयादा है| पहाड़ी नदियों का उफान हर किनारे को तोड़ बाजार, घर, होटल, रास्ते और इंसान सभी को जलमग्न करने पर तुली है|

हमने भी तो हद पार कर दी| जंगल के जंगल कट रहे हैं जिससे मिट्टी की सघनता ख़त्म| जानवरों के घर छिन रहे हैं| अनियंत्रित शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के चलते प्राकृतिक जलश्रोत पाट दिए जाते हैं|

इंसानों की भीड़, पहाड़ों में जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण बन रहा है|

दिमाग में सवाल ही सवाल|
क्या सिर्फ मौसम में बदलाव आया है? या इसका दूसरा स्वरुप भी है| बेचैनी में रेणुका जी उठ कर टहलने लगीं|

नहीं ! यह तो आक्रोश है प्रकृति का| तांडव हैं नदियों का और भयानक क्रोध है ईश्वर का|

नदियों का रास्ता छीन कर मनुष्यों ने अपनी दुनिया बना ली| अब नदियाँ अपने रास्ते के हर रोड़े को मटियामेट कर अपना रास्ता खुद बना रही हैं| प्रकृति अपनी हीलिंग स्वयं करती है।

उन्होंने एक लम्बी सांस ली|

जब हम अपनी छोटी सी भूमि पर किसी का अतिक्रमण सहन नहीं करते,  तो प्रकृति अपनी धरा पर इतना विशाल अतिक्रमण कैसे बर्दाश्त करेगी?

रेणुका जी चाय की प्याली के साथ2025 सोफे पर बैठ गई और टीवी ऑन कर समाचार लगा दिया, प्रतिदिन की तरह|

प्रतिदिन की तरह समाचार भी वही सब, मार-धाड़ , राजनैतिक खींचातानी, घटनाओं- दुर्घटनाओं से भरी पड़ी थी| पिछले तीन-चार दिनों से भीषण बारिश का समाचार देख दी दहल रहा था|

इस बरसात सिर्फ बारिश ही नहीं हो रही थी बल्कि असमान से जैसे आफत बरस रही है। हिमाचल प्रदेश के शिमला, कुल्लू, मनाली जैसे पर्यटक स्थल ही नहीं बल्कि जम्मू वैष्णव देवी मार्ग, साथ अर्धकुमारी में हुई भयानक बारिश और भूस्खलन ने तबाही मचा दी| देश के कई राज्यों और शहरों का यही हाल है| कहीं पुल टूट रहे हैं, कहीं रास्ते बिखर रहे हैं और तो और रिहायशी इलाकों में भी जलभराव घरों के अंदर भी प्रवेश ले लिया है|

रेणुका जी ने टीवी बंद कर दिया| वह सोचने लगीं ,ये तो सच है कि बदरीनाथ, केदारनाथ, वैष्णव देवी जैसी तीर्थ यात्राएं कभी सुगम न थीं| बारिश और बर्फ हर वर्ष इनके रास्ते बाधित करते थे|

लेकिन इस बार बारिश का जो तूफानी वेग है, जितने भूस्खलन हुए, बादल फटे यह बीते कई सालों से बहुत जयादा है| पहाड़ी नदियों का उफान हर किनारे को तोड़ बाजार, घर, होटल, रास्ते और इंसान सभी को जलमग्न करने पर तुली है|

हमने भी तो हद पार कर दी| जंगल के जंगल कट रहे हैं जिससे मिट्टी की सघनता ख़त्म| जानवरों के घर छिन रहे हैं| अनियंत्रित शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के चलते प्राकृतिक जलश्रोत पाट दिए जाते हैं|

इंसानों की भीड़, पहाड़ों में जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारण बन रहा है|

दिमाग में सवाल ही सवाल|
क्या सिर्फ मौसम में बदलाव आया है? या इसका दूसरा स्वरुप भी है| बेचैनी में रेणुका जी उठ कर टहलने लगीं|

लघुकथा-३
वक्त-वक्त की बात

लगता है कल की ही बात है। रिद्धि हमेशा मुझसे शिक़ायत करती रहती थी। कहती है –
” दीदी आप ही मेरे घर आया करें मेरा जाना तो सम्भव नहीं हो पायेगा।”

कहती, “मैं क्या करूँ मुझे समय ही नही मिलता। सुबह से कब रात हो जाती है पता ही नहीं चलता।”
कभी-कभी मैं भी आश्चर्य करती और कह देती थी-

“ऐसा क्या करती रहती हो भई ,सभी अपने घरों में काम करती है,पति, बच्चे परिवार कौन नहीं देखता। पर समाज में भी तो मिलना-जुलना जरूरी है। बहुत सी औरतें बाहर काम भी करती हैं और घर-बाहर दोनों अच्छी तरह सम्भालती है और तुझे सिर्फ घर संभालना इतना भारी लगता है।”

ये सब सुन वह बिल्कुल रुआँसी हो जाती और इसे अपनी कमी मान बैठती। “शायद मैं ही सही तरीके से चीजों को मैनेज नही कर पा रही हूं दीदी।” वह कहती –

“अब क्या बताऊँ ,सुबह जबसे नींद खुलती है कि काम शुरू हो जाता है।बच्चों को बिस्तर से उठाना ही तो बड़ा काम है ,फिर उन्हे स्कूल के लिए तैयार करना नाश्ता बनाना फिर स्कूल भेजना, और तब लगता एक बड़ा काम हो गया। फिर बारी आती है, पति की ऑफिस जाने तक उनके पीछे-पीछे लगे रहना पड़ता है।अब क्या कहूँ दीदी, न देखूँ तो कब क्या छोडकर ऑफिस चले जायेंगे और आने पर चिक-चिक शुरू। ऐसे ही पचासों काम है।बाई ,माली, बच्चों के आने की फिक्र ,उनकी पढ़ाई ,तरह तरह के खाने की ज़िद और कितना कहूँ और क्या-क्या कहूँ आपसे। इनसब के बीच अपनी सुध भी नही रहती।  चैबीस घण्टे कैसे बीत जाते हैं पता ही नहीं चलता।
बस दीदी मैं तो सोचती हूँ कब बच्चे बड़े होंगे और इन कामों से छुटकारा मिलेगा। मैं तो थक गई ये सब करते- करते।”

वो दुखी नही थी हाँ थोड़ी परेशान और उलझी हुई जरूर रहती थी। तब लगता रिद्धि सही कहती है। शायद वह सही ढंग से मैनेज नहीं कर पा रही है। ऐसे ही धूप-छाँवं के बीच सालों निकल गए। बच्चे बड़े हो गए और सेटल भी। अब तो वो दूसरे शहरों में रहते हैं। क़भी – कभी छुट्टियों में ही आना होता है उनका।

आज भी उससे बातें होती है तो बस मन की पोटली खोल देती है रिद्धि। अपने उसी लहज़े में कहती –

“क्या करूँ दीदी अब तो मन ही नहीं लगता घर में अकेले।बच्चे बाहर चले गए तो लगता कोई काम ही नहीं।अकेली बैठे – बैठे बोर हो जाती हूँ। याद है न दीदी मैं कितना कहती थी कि कब ये बड़े होंगे और मुझे इनके कामों से छुटकारा मिलेगा। पर अब लगता है कि ये क्यों बड़े हो गए।उन कामों के बिना तो जिंदगी ही अधूरी सी लगती है। ढूंढ – ढूंढ कर कामों में व्यस्त रखती हूँ खुद को। क्या करूँ चौबीस घंटे इतने लंबे हो गए कि बीतते ही नहीं।”

उसका गला भर आया, उसके आंसुओं को,उसके खालीपन को मैं महसूस कर सकती थी।

सच दुनिया की रीत यही है और फिर उसके साथ मैं भी उदास हो जाती।

चौबीस घण्टे भी कितने अजीब होते  हैं न! कभी पल में बीत जाते हैं, तो कभी एक पल भी सदियों के समान लगता है।

लघुकथा-४
वो एक गौरैया

सामने जो नीम का पेड़ है, उसकी शाखाओं पर गौरैया अपना घोंसला गाहे- ब- गाहे बना ही लेती है।

एक सुबह जब प्रभा जी ने दरवाजा खोला तो उसी पेड़ पर बने घोसले में गौरैया की आवाजाही दिख गई। उन्हें देखकर अच्छा लगा। याद आ गया सुबह गौरैया का उड़ना, दिनभर पता नहीं कहाँ-कहाँ से उड़ान भर शाम को घोंसले में आना नियम था। फिर थोड़े दिनों में उसी घोंसले में अंडे देती , और उन अंडों से ची-ची करते उसके बच्चे निकलते। फिर जैसे उसकी दिनचर्या बदल जाती।

अब वह दिन भर इधर-उधर बौराती नहीं थी , बल्कि बार- बार लौट कर घोंसले में आती अपने बच्चों को देखती उन्हें दाना खिलाती फिर फुर्र से उड़ जाती थी। शायद अगली खुराक की तलाश में।

मौसम बारिश का तो न था फिर भी
रात से ही बारिश ज़ोरों पर थी। तेज़ हवा तूफान का संकेत दे रहा था। उसी गरज- बरस के बीच उन्होंने खिड़की के पर्दे लगाए और सो गईं।

सुबह जब उनकी आँखें खुली तो देखा पर्दे से झांकती सूरज की किरणें अंदर आ रही है। अच्छा लगा। बारिश थम गई। वह बालकनी का दरवाज़ा खोल बाहर निकली की सामने घोंसले पर नज़र टिक गई।
अरे यह क्या ! वह चौंक गईं।

घोंसला हवा से तितर- बितर हो गया था। दिल धक से हो गया। वह आगे बढ़कर देखने लगीं की बच्चे कहाँ हैं। उन्हें कुछ दिखाई न दिया।

इतने में देखा कि गौरैया, उस घोंसले को बचाने की जुगत कर रही है। अपनी नन्ही चोंच से बिखरे घोंसले में एक- एक तिनका लगा कर, फिर से बनाने में लगी है। समझ गईं कि बच्चे अंदर ही होंगे।

पता नहीं क्यों प्रभा जी को अपने दिन याद आ गए।
पंद्रह साल पहले, जब अचानक एक दिन आकाश जी की हृदयगति रुक गई और वह उन्हें छोड़कर चले गए थे।
तब बच्चे बहुत छोटे थे। ऐसे ही तूफान से घिर गई थीं वो। घर, परिवार ,समाज। कितनी ही बातें, कितनी ऊंच-नीच देखी। उस वक़्त वो भी अधर में लटकी गौरैया सी ही हो गई थीं। लेकिन उन्होंने भी ऐसे ही तिनका-तिनका कर अपना घोंसला सम्हाल लिया था।

इतने में देखा, गौरैया पंख फैलाए उड़ चली अपने गंतव्य की ओर। उन्होंने उसे जाते देखा। बस आँखो के किनारे भीग गए।
सच, बड़ी हिम्मत चाहिए। जो उनमें भी है और गौरैया में भी।

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लघुकथा-५
डर के आगे जीत है
सालों से यह सिलसिला लगातार चल रहा था। कभी सप्ताह कभी महीना ,पर शिवि और अक्षय में घमासान शुरू हो ही जाता। घर, बाहर ,परिवार बात कुछ भी हो।

लड़ाई छोटी सी बात से शुरू होती और अंत धमकी के साथ होता। यानी अक्षय उसे हमेशा धमकाता कि ऐसा ही रहा तो वह उसे तलाक दे देगा। वह इतने गुस्से में लाल हो चुकी आंखों से देखते हुए कहता कि डर से शिवि के प्राण सूख जाते। वह चुप हो दूसरे कमरे में चली जाती।

ऐसे में वह हमेशा सोचती की यदि अक्षय सचमुच उसे तलाक दे देगा तो वह क्या करेगी। इतनी पढ़ी लिखी भी नहीं है कि अपने पैरों पर खड़ी हो जाए।

फिर वह जानती थी कि उसके घरवाले भी उसे ही दोषी मानेंगे। इसीलिए अक्षय की गलती होने के बावजूद शिवि ही झुक जाती।

अक्षय , शिवि के इस डर को भलीभाँति समझ गया था।
आज भी वही हुआ। नाश्ते के बाद शिवि ने अक्षय से कहा

” आज फिर स्कूल से रोहन,उनके बेटे,  की शिकायत आई है। एक तो रिजल्ट खराब किया है, दूसरा दोस्तों से लड़ाई झगड़ा भी करता रहता है।”

“तो इसमें मैं क्या करूँ?” अक्षय ने तैश में पूछा

“तुम नहीं तो कौन करेगा। मैने कितनी बार कहा है कि रोहन बडा हो रहा है। उसपर ध्यान दो। यदि  वह मेरी नहीं सुनता तो तुम उसे समझाव , उसकी पढ़ाई पर थोड़ा ध्यान दो। उसके जीवन उसके करियर का सवाल है।”

“अब ये सब भी मैं ही करूँ, तुमसे एक बच्चा भी नहीं सम्हलता।”

“हाँ नहीं सम्हल रहा है तभी कह रही हूँ। तुम सिर्फ काम देखो और मैं बाकी हर चीज़ के लिए खपती रहूँ। बेटा सिर्फ मेरा नहीं है। तुम्हें भी उसपर ध्यान देने की ज़रूरत है।”
बात आज उसके बेटे के जीवन की थी।

बात से बात निकलती गई। घर रणक्षेत्र बन गया, कि तभी अक्षय ने अपना तुरुप का पत्ता खोला।

“तुमसे घर नहीं सम्हलता, बच्चे को नहीं सम्हाल पाती तो एक काम क, आज ही बोरिया बिस्तर बांधो और जहाँ चाहे चली जाओ। मैं सब सम्हाल लूँगा।”

आज शिवि के कानों में यह वाक्य पिघले शीशे की तरह उतरा। उसने एक बार अक्षय को देखा और कमरे  में चली गई।

शायद अक्षय मन ही मन अपनी जीत पर खुश हो रहा था कि तभी शिवि कमरे से अपना ट्राली बैग लेकर बाहर निकली।

अक्षय कुछ पूछे इससे पहले ही उसने कहा –
“मैं जा रही हूँ, कहीं भी, बस मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना।”

और रोहन का हाथ पकड़ वह दरवाजे से निकल गई।

अक्षय किंकत्वविमूढ़ सा उसे देखता रह गया।

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पाँच लघुकथा

मिनी मिश्रा, पटना

लघुकथा-१
माँ
“कई लोग तुझ में कूड़ा, कचरा डालते हैं; कोई पॉलिथीन फेंकता है, तो कोई प्लास्टिक के डब्बे ! फैक्ट्री से निकला गंदा, प्रदूषित पानी भी तुम्ही में बहाया जाता है। जानवर मर जाते हैं, तो लोग उन्हें भी फेंक देते हैं।
इतना ही नहीं, कोई आत्महत्या करने के लिए छलांग लगाता है, तो कोई… लाश को बहा देता है। मतलब, लोग अपने किए सारे पाप को तुममें उड़ेल देते हैं, फिर भी तुम गुस्सा नहीं होती हो, और न ही अधीर? तुम कैसे सब सहन कर लेती हो?”
किनारे पर लगी नाव ने दुःखी और आश्चर्यचकित होकर गंगा से पूछा।
“क्या करूँ! जब से विकास हुआ है, हमारी स्थिति बद से बदतर होती गई है। पहले जमाने के लोग अधिक पढ़े-लिखे नहीं होते थे, लेकिन मेरे लिए उनके हृदय में अपार श्रद्धा होती थी। अब लोग अधिक पढ़-लिख गए हैं, परंतु श्रद्धा घट गई है। दूसरी बात, पहले जमाने के लोग मेरे समीप श्रद्धालु के रूप में आते थे, अब …पर्यटक के रूप में आते हैं। मौज- मस्ती करके सारा कचरा मुझमें डाल देते हैं। फिर भी मुझे सब सहन करना पड़ता है। क्योंकि मैं माँ हूँ न!”
गंगा ने करुण स्वर में जवाब दिया। उनकी आँखों से मटमैले आँसू बह निकले।

लघुकथा-२
वेदना
“रामू, जा..फिर से स्टूल उठाकर ले आ।” दीपक बाबू ने जैसे ही नौकर को आदेश देते हुए कहा, तो स्टूल सावधान हो उठा।
“मालिक, कुछ ही देर पहले मैं इसे लाया था। उसी पर चढ़कर सभी पंखों की सफाई की थी।” नौकर ने आहिस्ते से कहा।
“रामू, पंखा तो साफ़ हो गया, परंतु अभी भी बरामदे के कोने में जाला लटक रहा है।” स्टूल को मालूम हो गया कि फिर उसे जाना पड़ेगा!
“जी मालिक, अभी लाया..।” रामू स्टूल को उठा ले आया और जाला साफ़ करने लगा। सफ़ाई खत्म करते ही रामू ने स्टूल को यथास्थान जाकर पटक दिया।
स्टूल ज़ोर से कराह उठा, “अरे! तुम आराम से मुझे रख नहीं सकते? मैं तुम्हारे बूढ़े मालिक के उम्र का हूँ! आजकल के लोग उम्र का लिहाज ही नहीं रखते..! क्या जमाना आ गया! औकात देखकर ही खोज ख़बर ली जाती है। देखो, बाकी महंगे फर्नीचर को, घर में उनकी देखभाल बच्चों की तरह होती है, और मैं… परित्यक्ता की तरह एक कोने में पड़ा रहता हूँ!”
तभी गाँव से आए बूढ़े मालिक को लाठी के सहारे… रास्ता टटोलते इधर आते देख, मैं अपनी वेदना को तत्क्षण भूल , बूढ़े मालिक के डगमगाते कदम को निहारने लगा।
फिर अपने चारों पाए पर ज़ोर डाल कर देखा, शुक्र है कि वे अभी डगमगा नहीं रहे हैं।

लघुकथा-३.
कठोरता और नमी
“बताइए मुझे बच्चे नहीं हुए, इसमें मेरा क्या कसूर है? रोज़- रोज़ के ताने से मैं तंग आ गई हूँ। हमारी शादी को मात्र तीन साल ही हुए हैं, और आपकी माता जी को लगता है जैसे युग बीत गया…।
एक तो ऑफिस का टेंशन, वहाँ से थके-हारे घर आओ, और यहाँ अनगिनत काम मुँह बाये खड़े रहते हैं। ऊपर से आपकी माताजी मौका मिलते ही राग अलापना शुरू कर देती हैं – “हे भगवान! पोता-पोती का सुख कब नसीब होगा? आजकल की कामकाजी लड़की …न जाने क्या सब उल्टा पुल्टा सोंचती रहती है।” यह सुनते-सुनते मेरे कान पक गये।
“लेकिन, इतना सब जानते हुए भी आप हमेशा खामोश रह जाते हैं। आपका यह व्यवहार मुझे अच्छा नहीं लगता है। तुरंत जाकर अभी माता जी को समझाइए कि आपकी फैमिली प्लानिंग क्या है?” पत्नी ने झल्लाकर कहा।
“ओह! देवी जी… ज़रा तमीज से बातें करना सीखो, मेरी माँ है, तो तुम्हारी भी माँ हुई न। ऊँचे स्वर में उन्हें जवाब देना शोभा नहीं देता।” पति ने समझाते हुए कहा।
“अच्छा जी अब पाठ पढ़ाना बंद कीजिए। माँ हैं आपकी, मुझे तो हर वक्त वो सासू माँ ही दिखती हैं। हर बात के लिए मुझे ही दोषी ठहराती …”
तभी सासू माँ को इधर आते देख, मेरे मुँह पर ताला लग गया। मैं घबरा गई। परंतु मेरा मन निर्भीक बन सोचता रहा, “आज तो घर में महाभारत होकर ही रहेगा।”
“अरे…बहू! भगवान के लिए लड़ना बंद करो, परदे की ओट से मैंने तुम दोंनो की सारी बातें सुन ली है। यह सच है बहू कि मैं तुम पर ताने कसती रही। परंतु, यदि तुम्हें अभी बच्चे नहीं चाहिए तो मुझे कोई हड़बड़ी नहीं है। तुम दोनों ही मेरे प्यारे बच्चे हो।”
सासु माँ के मुँह से ऐसी चुपड़ी बातें सुनकर मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया। मैं झल्लाकर बोली, “तो फिर आप दिन-रात पोता-पोती की रट क्यों लगाती रहती हैं?
सुन कर मुझे बहुत ज्यादा टेंशन हो जाता है।”
“सुनो बहू , एक तो कैरियर के चलते तुम दोनों ने देर से शादी की, उस पर से अधिक उम्र में तुम्हें बच्चे पैदा होंगे….तो कितनी समस्याएं होगीं, कुछ पता भी है?” अपने हाथ की पत्रिका खोलकर मुझे दिखाते हुए उन्होंने गंभीरता से कहा,
“पढ़ो इस आलेख को –‘बड़ी उम्र में गर्भधारण से नुकसान’।
फिर भी अगर समझ नहीं आए तो नेट पर सर्च कर लेना, गृहस्थी के मामले में अभी तुमलोग बहुत कच्चे हो।” सासू माँ ने अपने दोनों हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में ऊपर उठा दिए। मैंने देखा, उनकी आँखों में नमी उतर आई थी।
उन्हें देखकर आज पहली बार मुझे अहसास हुआ कि सास के अंदर एक माँ का दिल भी होता है।

लघुकथा-४.
वरदहस्त
डीएम साहब की पर्सनल असिस्टेंट होने के नाते प्रिया का रौब दफ्तर में किसी अफ़सर से कम नहीं था। उम्र कम थी, लेकिन तीखे शब्दों और तुनकमिज़ाजी में वह सब पर भारी पड़ती थी। उसकी ज़ुबान अक्सर ऐसी चलती कि जैसे हर वाक्य में तंज हो, हर बात में हिकारत।
वह हर आगंतुक से ऊँची आवाज़ में बातें करतीं, “क्या हर रोज़ का यही काम है आपको? देखिए, साहब अभी मीटिंग में हैं, और आप लोग तो डेरा दाल कर ही बैठ गए यहाँ!अगले हफ्ते आना, तब देखेंगे!”- यही सब बहाने बनातीं।
कभी, कोई बुज़ुर्ग आया होता, कभी कोई ग्रामीण… कोई बीमार बेटे की फाइल लिए खड़ा होता, तो कोई विधवा पेंशन की अर्ज़ी पकड़े विनती कर रही होती। लेकिन प्रिया की निगाहों में सब “डिस्टर्बेंस” थे। चपरासी भी उसका आदेश पाए बिना किसी को वहाँ फटकने नहीं देता और प्रिया… वह तो हर तीसरे आगंतुक को तिरस्कार से देखती, “बैठा रहने दो, थक हारकर आप ही चला जाएगा,” वह चपरासी से कहती।
लेकिन… वहीं अगर कोई धीरे से नोट उसकी टेबल के नीचे सरकाता, या फिर उसके लिए चाय-समोसे लाता, तो वह मुस्कराकर कहती, “अभी भिजवाती हूँ फाइल, आप यहीं रुकिए।”
अक्सर दफ्तर में कानाफूसी होती, ” प्रिया के सिर पर डीएम साहब का वरदहस्त जो है … वरना इतनी हिम्मत होती इसकी?”
आज एक ग्रामीण अधेड़ व्यक्ति, जिसकी अर्ज़ी उसने साहिब तक पहुँचने ही नहीं दी थी, फिर आया था। वह प्रिया को देखकर सकपका गया, उसने डरते-डरते हाथ जोड़कर नमस्ते की। लेकिन उसे देखकर प्रिया मुस्कराई और चपरासी से बोली, “इनके लिए पानी लाओ, बहुत दूर से आए हैं।” इस अप्रत्याशित व्यवहार को देखकर वह व्यक्ति हैरान था।
फिर प्रिया ने बड़े ही विनम्र स्वर में कहा, “आप अंदर जा सकते हैं, साहब फ्री हैं अभी।”
वह आदमी चौंका। पानी पीते हुए उसने चपरासी से फुसफुसाकर पूछा, “भाई, इनको क्या हो गया है? ये इतना कैसे बदल गईं?”
चपरासी मुस्कराया, आँख दबाकर बोला, “जिस साहब की ये बहुत चहेती थीं न, उनका ट्रांसफर हो गया है। और नए साहब बहुत कड़क हैं… उसूलों के पक्के।”
हतप्रभ-सा वह आदमी साहब के केबिन की ओर बढ़ा और केबिन की ओर देख‌ कर बुदबुदाया, “वरदहस्त अगर हटा लिया जाए… तो ज़ुबान भी शराफ़त सीख ही लेती है।”

लघुकथा-५.

सोच में अमीरी
“माँ, बगल वाली आंटी के दुकान में देख़ो कितनी भीड़ है। चलो, उसी में से मछली खरीदते हैं। जरूर वहाँ ताजी मछलियाँ होंगी, तभी इतनी भीड़ है।”
“सुनो, मैं उसकी दुकान से कभी मछली नहीं खरीदती हूँ। सामने वाली दुकान से ही लेती हूँ। ” माँ ने कड़क आवाज़ में जवाब दिया।
“माँ! आज मैं तुम्हारे साथ आई हूँ, मेरी बात मान लो..प्लीज।” बेटी मनुहार करने लगी।
“अरे बेटी ! उसे देखो, अपने पेटिकोट और साड़ी को घुटनों से ऊपर समेटे हुए वो निर्लज की भांति कैसे बैठी है। इसलिए वहाँ मर्दों की अधिक भीड़ लगी रहती है। लो-मेन्टेलिटी की बेहाया औरत है!”
उसने कीमती पर्स को कंधे पर संभालते हुए जवाब दिया।
बेटी की खामोश नजरें …अब माँ के डीप गले वाली ब्लाउज से झाँक रहे उभार पर चिपक गई। वह माँ के उभार को उसी के आँचल से ढँकने का प्रयत्न करते हुए बोली ,
“बेचारी गरीब है! मछली के छींटे पड़ने से कपड़े खराब न हो जाये, शायद… इसलिए इस तरह से बैठी होगी!”
बेटी के मुँह से अप्रत्याशित जवाब सुनते ही माँ का मेकअप पसीने के साथ बहने लगा और उसकी तनी गर्दन हारे खिलाड़ी की झुक गयी।
“माँ! सोच में अमीरी झलकनी चाहिए, पहनावे में नहीं।” कहने के साथ बेटी के कदम मछली वाली औरत की ओर चल पड़े।
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