
पाँच लघुकथा.

अंजना गर्ग
लघुकथा-१
दवाई
‘ अजी सुनते हो, शीला ( घर में काम करने वाली) को दवाई दिलवा लाओ।’ कौशल्या ने अपने पति इंदर सिंह से ऊंची आवाज में कहा ताकि शीला को सुन जाए और बोलती बोलती पति के पास कमरे में पहुंच गई।
‘ क्यों हमने इन काम वालियों का ठेका उठा रखा है। अपने आप ले आएगी किसी नीम हकीम से। इनको महंगी दवाई की जरूरत नहीं होती।’ इंदर सिंह ने तल्ख सी आवाज में अपनी पत्नी से कहा।
‘ पर मेरी बात तो सुनो, मैं भी इतनी बावली नहीं हूं। दवाई आप दिलवा लाओ। पैसे मैं इसकी तनख्वाह से काट लूंगी। सस्ती दवाई से हाथ पक गया और ठीक न हुआ तो एक तो हमें इन्फेक्शन करेगी दूसरा कहीं छुट्टी मार ली तो, इतनी ठंड में मेरी तो नानी याद आ जाएगी। इसलिए दवाई दिलवा लाओ। एहसान का एहसान और अपना उल्लू भी सीधा।’ कौशल्या ने धीमी आवाज में अंतिम शब्दों पर जोर देते हुए कहा।
इंदर सिंह ने सोचने वाली मुद्रा में सिर हिलाया और बोला, ‘ भागवान तू तो वाकई समझदार हो गई।’
***
लघुकथा-२
“शब्दों का ज़हर”
वह अक्सर बात-बात पर कुत्तिया, हरामजादी, बहन —– जैसे अपशब्द फेंकता था —
कभी पत्नी पर, कभी दोस्तों पर तो कभी काम करने वालों पर।
अपशब्द उसके मुँह से ऐसे निकलते थे जैसे साँसें — बिना रोक, बिना सोच के निकलती है।
बेटी छोटी थी, पर सब देख और सुन रही थी।
सुनते-सुनते वही शब्द उसकी भाषा का भी हिस्सा बन गए।
गुड़िया से खेलते हुए, या मोहल्ले के बच्चों से झगड़ते समय —
उसके मुँह से वही गालियाँ निकलतीं जो उसने पिता से सीखी थीं।
पहले तो बच्चों ने हँसकर टाल दिया,
फिर डरने लगे।
धीरे-धीरे मोहल्ले के लोगों ने अपने बच्चों को उसके साथ खेलने से मना कर दिया।
अब वह अकेली पड़ गई
और चिड़चिड़ी होती गई।
कभी किताबें ज़मीन पर फेंकती,
तो कभी माँ पर चिल्लाती।
कभी अपने पिता से ही लड़ पड़ती।
माँ-बाप हैरान थे —
“बच्ची इतनी बिगड़ कैसे गई?”
अब उन्हें कौन बताए कि
बच्चे बोलना नहीं सीखते — सुनकर बोलते हैं।
और जो सुना वो ही अगर ज़हर हो,
तो जुबान से फूल नहीं, कांटे ही निकलेंगे।
***
लघुकथा-३
वेंटिलेटर
यमराज जी के दूत ने आत्मा नंबर 422 से पूछा, ‘ तुम जब भी इधर से निकलते हो नीचे मृत्यु लोक में जरूर देखते हो, क्या है वहां ऐसा?’
‘ मेरा शरीर।’
‘ पागल हो क्या? दस दिन हो गए तुम्हें यहां आए हुए। तुम्हारा शरीर तो कब का अग्नि के हवाले कर दिया गया होगा।’ दूत ने उस की तरफ देखते हुए समझाने वाले अंदाज में कहा।
‘ वही तो नहीं हुआ।’ आत्मा ने दुखी होकर कहा।
‘ क्या मतलब- – – -?’
‘ अस्पताल वालों ने मेरे शरीर को वेंटिलेटर पर डाल रखा है।मोटा बिल बन रहा है। बेटी की शादी के लिए जोड़ा पैसा भी सारा लग गया। मेरी पत्नी सारा दिन मेरे लिए पूजा पाठ करती रहती है और पंडितों से करवाती रहती है। उस बेचारी को तो यह भी नहीं पता कि मैं कब का उसकी दुनिया छोड़ चुका – – – – – ‘
‘ लगता है इस अस्पताल के डॉक्टर का ही नंबर यमराज जी को कहकर पहले लगवाना पड़ेगा। तभी तेरे शरीर को मुक्ति मिलेगी।’ कहता हुआ दूत यमराज जी की ओर बढ़ गया।
***
लघुकथा-४
बराबरी
उस दिन घुमंतू अपने ही कमरे में खामोश बैठा था।
न कोई भीड़ थी, न कोई जलसा……
सिर्फ वह था… और उसका पुराना संदूक।
संदूक में चिठ्ठियाँ थीं, तस्वीरें थीं, अधपढ़ी डायरी थी…
और कुछ अनकहे अपराध बोध, जो अब तक बराबरी की बहसों में छिपे बैठे थे।
उसने एक ख़त निकाला — उसकी पत्नी सरला का लिखा हुया।
“प्रिय, तुमने हमेशा समाज की ऊँच-नीच देखी, लेकिन क्या कभी मेरी चुप्पी पढ़ी?
तुमने बराबरी की बातें कीं, लेकिन क्या कभी मुझे अपने बराबर समझा?
तुमने दुनिया को समझाया, मगर मुझे समझने की कोशिश की?
शब्दों में बराबरी थी… व्यवहार में नहीं।”
घुमंतू की आँखें नम थीं।
वह जानता था — सरला कोई नाराज़ स्त्री नहीं थी,
पर वह भी उन लाखों महिलाओं में एक थी
जो पुरुषों की ‘समझदारी’ के नीचे दबी बराबरी ढूँढती रही।
उसने आईने में खुद को देखा —
सिर पर सफेदी थी, चाल में थकावट… लेकिन आँखों में पहली बार
एक असली सवाल था…..
“क्या मैं भी उस पितृसत्ता का हिस्सा रहा,
जिस पर कटाक्ष करता रहा?
क्या मेरी बराबरी सिर्फ शब्दों की थी,
या कभी मैंने खुद झुककर देखा था?”
उसे याद आया —
जब सरला ने कहा था कि वह भी नौकरी करना चाहती है,
तब उसने कहा था,
“घर में बच्चों को कौन देखेगा? तुम नौकरी के लिए नहीं बनीं सरला…”
वो पल… बराबरी नहीं, निर्णय था। एकतरफा।
आज उसे समझ आ रहा था,
बराबरी अधिकार नहीं, आदत है।
रोज़मर्रा की छोटी बातों में, छोटी चुप्पियों में।
घुमंतू ने कलम उठाई —
कोई भाषण नहीं, कोई व्यंग्य नहीं…
बस एक वसीयत—
“मेरे जीवन में जो भी स्त्रियाँ थीं — माँ, बहन, पत्नी, बेटी या दोस्त —
अगर मैंने कभी उन्हें बराबरी से कम समझा हो,
तो मैं माफी चाहता हूँ।
और जो पुरुष मेरी तरह ‘बोलते बहुत हैं, सुनते कम हैं’ —
उन्हें मैं यही कहना चाहूंगा:
बराबरी चिल्ला कर नहीं आती… वो चुप रहकर निभाई जाती है।”
***
लघुकथा-५
यमलोक में दस्तक
वो यमलोक के द्वार पर दस्तक दे रही थी। आंखों में आंसू नहीं, आग थी। लेकिन द्वारपाल उसे भीतर आने से रोक रहे थे।
“तुम्हारा समय अभी नहीं आया,” उन्होंने दोहराया।
“पर मैं कब आई अपनी मर्ज़ी से? उस दरिंदे ने पहले मेरी अस्मिता रौंदी और फिर मेरा गला दबाकर जीवन छीन लिया।”
“तो वापस जाओ अपने शरीर में,” एक दरबारी ने आदेश जैसा कहा।
वो हँसी — कड़वाहट भरी, राख जैसी।
“कौन-सा शरीर? जो इनसाफ से डरने वालों ने रातों-रात जला डाला? सबूत मिटा दिए, अब मैं कहाँ लौटूं?”
उसने फिर दोनों हाथों से यमलोक का द्वार पीटा।
“मुझे यमराज से मिलना है।”
“यहां भी वही हाल? जैसे पृथ्वी पर प्रजा को राजा से नहीं मिलने देते, वैसे ही यहां?” उसकी आवाज़ में पीड़ा और व्यंग्य दोनों थे।
शोर सुनकर यमराज स्वयं प्रकट हुए।
“कौन हो बेटी, और क्या चाहती हो?” उन्होंने गंभीरता से पूछा।
“प्रभु, मैं अभागी , सताई गई एक नारी हूँ। अभी तो मैंने जीना शुरू किया था कि हैवानों ने जीवन ही लूट लिया। मैं उनसे बदला लिए बिना कैसे शांति पाऊँ? मुझे वापस भेजिए… किसी भी रूप में।”
यमराज कुछ क्षण मौन रहे।
“पर तुम्हारा शरीर अब नहीं रहा, राख हो चुका है। अब लौटने का क्या लाभ?”
“तो क्या यहां भी मेरे साथ अन्याय ही होगा? पृथ्वी पर तो सुनवाई नहीं थी, पर यहां भी वही हाल? कहाँ जाएँ हम बेटियाँ, जिन्हें मरने के बाद भी न्याय नहीं मिलता?” उसकी चीख यमलोक की दीवारों से टकराई।
यमराज ने चित्रगुप्त की ओर देखा। चित्रगुप्त ने अपने बहीखाते से सिर उठाकर कहा,
“जा बेटी। तुझे वरदान है — तू अब शक्ति है। जिस औजार या वाहन में तू प्रवेश करना चाहे, कर सकेगी। जहां तू उन्हें मोड़ना चाहे, वे वहीं मुड़ेंगे। अब तू नारी नहीं, न्याय की अग्नि है।”
कुछ ही देर में यमलोक के द्वार पर वे राक्षस पड़े थे — काँपते, पछताते।
और वह?
वह उनके ऊपर पैर रखे, शांत, मगर पूर्ण आत्मसंतोष के साथ यमराज के समक्ष खड़ी थी।

पाँच लघुकथा

उमंग जौली सरीन
देहली
लघुकथा-१
बरगद के आँसू
शहर के बाहर बड़े से फार्म हाउस में किसी स्कूल के बच्चे पिकनिक का आनन्द ले रहे थे। उनकी उत्साह से भरी आवाज़ें ऐसे लग रहीं थी जैसे झुंड में पँछी चहचहा रहे हों। कोई झूला झूल रहा था, कोई रस्सी के पुल पर संतुलन बना कर चल रहा था। कहीं क्रिकेट तो कहीं बैडमिंटन खेला जा रहा था। स्कूल की अध्यपिकाएँ बच्चों के साथ साथ घूम रहीं थीं।
कुछ समय बाद खाना खाने के लिये बच्चे पेड़ो के झुरमुट के नीचे रखी खाटों पर बैठ गए। झुरमुट में पीपल, नीम, अमलतास और कई अन्य पेड़ थे। गर्म गर्म खाना परोसा जा रहा था।
बच्चों की पसन्द का खाना था। वैसे भी सब साथ मिल कर खायें तो स्वाद और बढ़ ही जाता है। खाना खा कर टिश्यू से हाथ मुँह पोंछते हुए मान्या ने रूपा को कोहनी मारी, “देख देख उस गंवार ईशा को। मुँह पोंछने के लिये आज भी घर से छोटा तौलिया लाई होगी।”
रूपा ने भी खिल्ली उड़ाते हुए स्वर में कहा, “इसे पता ही नहीं होगा टिश्यू होता किस लिये है। गांव से आई है न।मॉडर्न तरीके क्या जाने?”
उधर ईशा खाना परोसने वाली सहायिका को टिश्यू लौटाते हुए कह रही थी, “आँटी मैं इसे इस्तेमाल नहीं करती।मैं घर से अपना तौलिया लाई हूँ।”
“पर क्यों बेटा?”
“आँटी ,आप को पता है इन्हें बनाने में कितने वृक्षों की कटाई की जाती है।इसके अलावा, टिश्यू पेपर बनाने के लिए बहुत अधिक पानी की खपत होती है और कई प्रकार के रसायनों का उपयोग किया जाता है, जो पानी और मिट्टी को प्रदूषित करते हैं। मम्मी कहती है हमें पर्यावरण को बचाने की हर कोशिश करनी चाहिए।”
सेविका कुछ समझी ,कुछ नहीं। पर अमलतास ने मुस्कुरा कर नीम को देखा, नीम ने पीपल को। अमलतास ने उस बच्ची पर हौले से कुछ पीले फूल बरसा दिए, नीम ने लाड़ में अपनी पकी हुई पीली निबौलियों को ठीक उसके सामने गिरा दिया, पीपल के पत्ते झूम कर नाच रहे थे।
थोड़ी दूर खड़े बूढ़े बरगद ने सिहर कर एक सिसकी ली और डस्टबिन में पड़े ढेरों टिश्यूज़ पर कुछ बूँदे टपका दीं।
***
लघुकथा-२
लक्ष्मी पूजन
“लच्छमी ,आज घर की एक एक चीज़ अच्छे से साफ करनी है तुझे । एक घण्टा ज्यादा रुक जाना ,दीवाली की सफाई में टाइम तो लगेगा ही न। इनाम भी तो मिलेगा तुझे।”
रीमा भाभी की बात में इनाम वाला शब्द गुड़ से भी मीठा लगा था लच्छमी को ,उसके कानों ने उसे सबसे ध्यान से और प्यार से सुना । खुश हो कर दिमाग ने सुंदर कल्पनायें बुन लीं, हाथों ने रफ़्तार पकड़ ली ।
“भाभी, अब के पाँच सौ रुपये से कम न लूँगी दीवाली की सफाई के , कहे देती हूँ , पड़ोस के बाकी दोनों घरों से भी इतने ही लिए हैं । ” फुर्ती से काम करते हुई लच्छमी बोली थी ।
रीमा ने भी हँस कर कहा, “ठीक है ले लेना । अच्छा बाहर की बालकनी भी साफ करनी है तुझे।” उसने मन ही मन पाँच सौ रुपये के काम का पूरा हिसाब बिठा कर बोला।
आनन फानन लच्छमी घर की सफाई में जुट गई। आख़िर मालकिन के घर में लक्ष्मी जी का स्वागत होना था और वह तो साफ सुथरे घर में ही होना चाहिये ।
तीन घण्टे बाद लच्छमी ने घर को लक्ष्मी जी के स्वागत के लिए झाड़ पोंछ कर आईने सा कर दिया।अपनी सूक्ष्म दृष्टि से रीमा ने मुआइना किया।भली भांति देखने पर भी कहीं कुछ कमी न दिखी तो पाँच सौ का नोट लच्छमी को थमा दिया।साथ में मिठाई भी ।
दूसरे माले की बिमला आँटी के यहाँ खाना बनाना था, उनके बेटी दामाद आने वाले थे । लच्छमी ने खाना बनाना शुरू किया तो 2 घण्टे बाद पूरी रसोई गमक रही थी।हींग जीरे वाले आलू ,मसालेदार छोले,पूरी,रायता सब तैयार कर दिया । पाँच सौ रुपये वहाँ से भी मिले ।
एक ही दिन में दो हज़ार रुपये कमा कर लच्छमी की ख़ुशी का ठिकाना न था।बदन की टूटन, थकन सब पैसों की गर्मी का सेक पा कर दूर होती जा रही थी ।
तब तक रात होने को आई । अपने घर की दीवाली का सामान भी तो लेना था । दौड़ते भागते खरीदारी की और लदी फदी घर पहुंची । थकान से चूर हो गई थी।खोली में पहुँचते ही सामान रख कर बेटी को आवाज दी , “अरी बिल्लो ,सब सामान समेट ले और दीवाली की तैयारी कर ले ।मैं दस पाँच मिनट सुस्ता लूँ । थकान से बदन टूट रहा है । ”
“अच्छा मम्मी, ” बेटी का जवाब सुन कर वह खाट पर लेट गई ।थकान से टूटे बदन को नींद ख़ूब पहचानती है । झट से अपने आगोश में ले लेती है।पल भर में ही वो गहरी निद्रा में पहुंच गई थी।जब आँख खुली तो बेटी ने घर जगमग कर रखा था । उसका घरवाला भी लौट आया था और मुढढे पर बैठा चाय सुड़क रहा था । लच्छमी हड़बड़ा कर बोल उठी थी ,” बिल्लो इत्ती रात हो गई री , तैने जगाया क्यों न ? ”
अचानक देखा तो बिल्लो चूने के घोल में अपनी मुट्ठी भिगो कर लक्ष्मी जी के चरण बना रही है जमीन पर।हर दीवाली ये चरण बनते थे , खोली के दरवाजे से कमरे के कोने तक आते थे वहाँ ,जहाँ एक स्टूल पर लक्ष्मी गणेश जी की मूर्तियां रखी जाती थीं।वही स्टूल मंदिर बनता था हर त्योहार पर।
पर आज बिल्लो चरण बनाती बनाती उसकी खाट की तरफ क्यों आ रही है ?
“इधर काहे आ रही है छोरी , लक्ष्मी जी का स्टूल तो उधर है,,,,,”कहते कहते उसे याद आया भागादौड़ी में वह लक्ष्मी गणेश लाने तो भूल ही गई थी।मंदिर बना ही न होगा। ” हत्त तेरे की ,अब पूजा कैसे होगी ?”
तभी बिल्लो ने अपनी मुठ्ठियों से आखिरी चरण उसकी खाट तक बनाये और एक मीठी नटखट मुस्कान से कहा, ,”मम्मी घर की असली लक्ष्मी तो घर में आ चुकी हैं ,, देखो न मुझे टुकुर टुकुर तक रही है खाट पर बैठी।अब लक्ष्मी के चरण यहीं तक तो आएंगे।”
“हाय मरजानिये,पाप लगाएगी माँ को !चल बाहर गली से मैं अभी ख़रीद लाती हूँ। लक्ष्मी माई माफ़ कर देना छोरी को “कह के वो भगती हुई बाहर चली गई ।
स्वर्ग में बैठे विष्णु जी ने हँस कर लक्ष्मी जी से कहा,”बिल्लो अपनी माँ से ज़्यादा समझदार है।”
***
लघुकथा-३
लँगड़ी सोच
“अरे लँगड़े ,लाइन में पीछे खड़ा हो। बीच में मत चल सबकी स्पीड कम हो जाती है ।”कक्षा की लाइन में मोहन ने चन्दर को धकेल कर पीछे कर दिया।
“लंगड़ दीन बजाए बीन,गिनती गिनता एक दो तीन।”सुरेश,आलोक, विनोद सभी उसकी खिल्ली उड़ा रहे थे।आलोक ने लँगड़ाते हुए चल कर उसकी नकल उतारने का अभिनय किया और गाने लगा,
“टुक टुक कर के आयेगा लँगड़ा,
रेस में दौड़ न पायेगा लँगड़ा।”
सारे लड़के उसकी पंक्तियाँ दोहरा दोहरा कर ठहाके लगाने लगे।
नयन ने चन्दर की तरफ देखा ,उसके शांत चेहरे पर क्रोध, आवेश या दुःख रत्ती भर भी न था।यह सबआज की बात नहीं बल्कि रोज का किस्सा था।कक्षा के लड़के चन्दर का मज़ाक उड़ाते और उसे तंग करते रहते थे।चन्दर का धैर्य नयन को हतप्रभ करता था।
दोपहर में खाने की छुट्टी के समय नयन और चन्दर एक साथ खाना खा रहे थे। नयन बोला, “चन्दर ,उन लड़कों से तुझे इतना जलील किया, तुझे गुस्सा नहीं आया? अपनी छड़ी से एक जमाता ,अक्ल ठिकाने लग जाती उनकी।”
चन्दर शांत स्वर में बोला, “नयन मुझे कतई गुस्सा नहीं आया। बल्कि उन पर दया आ रही थी क्योंकि असल में दिव्यांग वो लोग भी हैं।बस अंतर इतना सा है कि मैं तन से और वो मन से विकलांग हैं। हमारे तन की दिव्यांगता सिर्फ़ हमें कष्ट देती है पर उनके मन की अपंगता तो दूसरों पर भी प्रहार करती है।और नयन, उनकी दिव्यांगता ज्यादा बुरी है।हमारे तन की दिव्यांगता हम साध लेते हैं क्योंकि हम उसे स्वीकार करते हैं। और ये लोग तो अपनी मानसिक दिव्यांगता की घातकता से न तो परिचित हैं न उसे स्वीकार करते हैं तो ये बिना उपचार के ही रहेंगे, सदा मन से बीमार, मन से लँगड़े। अब बताओ उन पर गुस्सा करूँ या तरस खाऊँ?”
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लघुकथा-४
कुशल क्षेम
” बहु कैसी हो?कोई दिक्कत परेशानी तो नहीं है ? “सुधा के सिर पर हाथ फेरते हुये दूर के नाते के ताया ससुर जी बोले ।
“ठीक हूँ ताया जी” , सिर झुका सुधा ने कहा ।
सुधा के पति की 2 महीने पहले मृत्यु हो गयी थी । तब से ताया जी अक्सर आ जाया करते थे।
“अरे शालू बिटिया दिखाई नहीं दे रही ।” ताया जी ने इधर उधर देखते हुये कहा ।
सुधा ने शालू को आवाज़ दी ,पर उसका कोई उत्तर नहीं आया । दो चार बार और बुलाने के बाद वो बोली,”ताया जी , मैं ही बुला कर लाती हूँ ।”
कमरे में जा कर देखा तो दस साल की शालू कोई किताब पढ़ रही थी ।
सुधा बोली, “कब से आवाज़ दे रही हूँ शालू , तू जवाब ही नहीं दे रही ।ताया जी आये हैं ,तुझे बुला रहे हैं ।चल कर नमस्ते कर उनको”
शालू ने नज़र उठा कर मां को देखा और बोली, “नहीं मुझे नहीं जाना । नमस्ते करूँगी तो गोद में बिठा लेंगे ,,गाल भी बहुत खींचते हैं ,इतनी जोर से ,मुझे दर्द होने लगता है।मम्मी मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।मैं नहीं जाने वाली। ”
बहुत कुछ पढ़ लिया , माँ ने बेटी की मासूम आंखों में, बाहर आ कर दृढ़ स्वर में बोली, “ताया जी शालू पढ़ाई कर रही है। और जी हम बिल्कुल ठीक हैं मैं अपनी बेटी को संभालने में पूरी तरह सक्षम हूँ । आप चाय लेंगे क्या ? ”
“नहीं नहीं बहु ,मैं भी थोड़ा जल्दी में हूँ” कह कर ताया जी उठ खड़े हुये ।
***
लघुकथा-५
खाने का डिब्बा
“भैया सूट दिखाओ न कोई बढ़िया ,” मैंने दुकान में काउंटर के पीछे खड़े लड़के से कहा ।
” जी मैडम दिखा रहा हूँ । ये देखिए सब लेटेस्ट रंग और डिज़ाइन निकाले हैं । कितनी सुंदर कढ़ाई की हुई है इस पर ,दुपट्टा भी तो कितना सुंदर है ।
“क्या भैया , इतनी देर में तुमने कुल 8, 10 सूट दिखाए हैं , कुछ अनमने से ढंग से दिखा रहे हो । ठीक से दिखाओ नहीं तो किसी दूसरी दुकान पर देखें ।” मुझे वो लड़का ज़रा सुस्त सा लगा ।
“नहीं तो मैडम “,कुछ घबरा कर बोला ,”आप फ़िक्र न करें , सभी डिजाइन दिखाऊँगा आपको । “कनखियों से वो अपने मालिक की तरफ देखने लगा ।
तभी मालिक ख़ुद आ कर बोला,” अरे मैडम , नया लड़का है मैं दिखाता हूँ आपको नए नए डिज़ाइन । और लड़के चल तू खुले हुए सूट तह करता जा ।”
उसके बाद लगभग 1 घण्टे मालिक ने खुद मुझे सूट दिखाए। कुछ सूट ख़रीद लिये मैंने। शाम के 5 बज चुके थे ,ज़ोर से भूख लग रही थी ।
चलो पहले कुछ खा लूँ ,फिर बाकी की खरीदारी कर लूँगी । सोच कर दुकान से बाहर आ गई । थोड़ी ही दूर आई थी कि याद आया गाड़ी की चाबी वहीं छूट गई है । वापिस लौट कर दुकान में घुसी तो मालिक उस लड़के को ज़ोर से डांट रहा था ,”क्यों बे राजू जरा ढंग से काम नहीं होता तुझसे । कैसे मरे मरे तरीके से कपड़े दिखा रहा था रे , नालायक कहीं का । तेरा काम भी मुझे करना पड़ा । मुझे सब पता है तुम लोग के लंच का टाइम हो गया है न । ओये एक दिन देर से खायेगा तो मर नहीं जाएगा पर बिक्री नहीं करेगा तो निकाल दूंगा ,फिर खाना खाने लायक पैसे ही नहीं होंगे ।चल पहले गाहक निपटा ठीक से । ”
राजू सिर झुकाकर सुन रहा था , धीरे से बोला भी, “मालिक आज घर से भी कुछ खा कर नहीं आया तो भूख के मारे चक्कर आ रहे थे ।” मालिक तब तक बिना सुने जा चुका था । लड़के ने खाने के अधखुले डिब्बे को अच्छी तरह बंद कर के काउंटर के नीचे सरका दिया और दूसरे ग्राहक को सूट दिखाने लगा ।
मुझे सुबह भरपेट किये नाश्ते के बाद भी लग आयी अपनी भूख पर लज्जा आ रही थी। दुकान से बाहर आकर देर तक वह खाने का अधखुला डिब्बा मेरी आँखों के सामने आता रहा ।

पाँच लघुकथा

स्नेह ‘विशेष’
रोहतक, हरियाणा
लघुकथा-१
माँ की पसंद
बिमला अपने पति सुरेश से बोली- “पंडित रामफल जी को बोल देना कल सुबह 9:00 बजे तक जरूर आ जाएंगे। तुम्हारी माता जी का श्राद्ध जो है। और हाँ सुनो माँ जी को क्या-क्या पसंद था, बता दो। फिर ना कहना कि तुम्हारी माँ का श्राद्ध मैंने अच्छे से नहीं किया।” लेकिन बचपन से और माँ के जाने तक सुरेश ने माँ को हमेशा पिताजी और बच्चों की पसंद का खाना बनाते ही देखा था। बचपन से बड़े होने के बाद तक उसने कभी देखा या सुना ही नहीं कि किसी ने माँ से कहा हो कि आज अपनी पसंद का खाना बनाओ ना। सुरेश ने दिमाग पर बहुत जोर डाला पर उसे याद ही नहीं आया कि माँ की क्या पसंद थी।
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लघुकथा-२
ऐसा भी होता है
स्नेहा पहली बार गर्भवती हुई थी। काम करते-करते अचानक एक दिन बहुत सारा द्रव्य बहने लगा। उसने सकुचाते हुए सास को बताया तो उन्होंने कहा – “कोई खास बात नहीं है।”
दस दिन बाद प्रसव पीड़ा जोरों पर थी। पति अस्पताल लेकर गए। डॉक्टर ने जांच की तो पाया कि गर्भाशय में द्रव्य सूख चुका है। उन्होंने स्नेहा से पूछा, “क्या घर में किसी को बताया नहीं था।”
वो बोली, “मैंने सासू माँ को बताया था। लेकिन उन्होंने कहा -“कोई खास बात नहीं है।”
यह सुनते ही डॉक्टर को अत्यंत क्रोध आया और वह बोली,”वो तुम्हारी सास है या तुम्हारी दुश्मन। पता नहीं कैसे यह बच्चा बच गया। वरना उन्होंने तो इसे मारने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।”
स्नेहा यह सुनकर सन्न रह गई। उसे यकीन ही नहीं हुआ, जिनको उसने सगी माँ से ज्यादा आदर मान दिया और इतनी सेवा की। वह इस हद तक भी गिर सकती है।
माँ के शब्द कानों में हथौड़े की तरह टकराने लगे “अब तेरी सास ही तेरी माँ है।”
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लघुकथा-३
अनचाहा श्राद्ध
फोन की घंटी बजते ही रसोई घर से नीतू कमरे की ओर दौड़ी। एक हाथ से मोबाइल पकड़कर बातें करते हुए दूसरे हाथ से सब्जी चलाने लगी। दूसरी तरफ से माँ ने जाने क्या कहा, जिसे सुनकर नीतू थोड़ा उत्तेजित हो गई और बोली -“जब जीते जी ही मेरा अपनी सास से कोई वास्ता नहीं था तो अब उनके मरने के बाद मैं उनका श्राद्ध क्यों करूँ?” फिर आवाज को थोड़ा धीमे करते हुए बोली- “माँ बुरा मत मानना लेकिन तुम्हारे कहने से ही तो मैंने उनके बेटे के साथ मिलकर उनके साथ झगड़े किए और तुम लोगों के कहने से ही मैंने उन्हें कितना बदनाम किया।” एक क्षण के लिए दूसरी तरफ चुप्पी छा गई। लेकिन फिर माँ बोली -“बेटा बात प्रेम या श्रद्धा की नहीं.है। पंडित रामफल जी कह रहे थे कि यदि तुम लोगों ने उसका श्राद्ध नहीं किया तो वह तुझे भूत बनकर सता सकती है।” नीतू अचंभित सी बोली- “क्या?” फिर मन ही मन सोचने लगी कि जिसे जीते जी मरने के लिए छोड़ दिया उसके मरने के बाद केवल भय के कारण उसी का श्राद्ध। जाने क्यों नीतू को अपनी माँ से तथा स्वयं से अजीब-सी ग्लानि होने लगी।
***
लघुकथा-४
क्या सचमुच अंतर है
नन्हीं अंजलि सारा दिन उस कुत्तिया और उसके बच्चों को देखती रहती थी जो उनके घर के बरामदे के एक कोने में रह रहे थे। एक दिन अंजलि ने अपनी माँ से पूछा- “माँ एक बात बताओ यह कुत्तिया अकेली ही अपने बच्चों को क्यों संभालती है? इसके पापा कहाँ हैं?”
माँ बोली- “बेटा पशुओं में माँ ही बच्चों को पालती है। केवल मनुष्य ही माता-पिता दोनों के द्वारा पलता है।”
अच्छा!अपनी जिज्ञासु भोली-भोली आँखों को बड़ा करते हुए उसने पूछा- “माँ फिर आप हमें अकेले क्यों पाल रही हो? पापा हमें छोड़कर शीतल आंटी के घर क्यों चले गए?” पापा तो…..
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लघुकथा-५
पति परमेश्वर
अत्यधिक क्रोध एवं अहंकारी स्वभाव वाले पति के पैर दबाते हुए सावित्री बोली, “सुनिए अब आपके पैर दबाना छोड़ कर मैं सो जाऊँ क्या? सुबह से सारे घर का काम अकेले करते-करते थक भी जाती हूँ। सुबह 4:00 बजे फिर से उठना भी होता है।”
पति ने क्रोधित होकर जोर से उसे लात मारी और चिल्लाया तेरे बस की कुछ भी नहीं है। सावित्री बेचारी अपराधिन-सी आधी सोई आधी जागी बस रोती रही। अपनी माँ की बात उसे रह-रह कर याद आ रही थी कि पति परमेश्वर होता है। वह सोच रही थी, “क्या परमेश्वर ऐसा होता है?”
***