कहानी समकालीनः पाखी-शील निगम

अपने पति संजय की स्टडी में मेज़ पर रखी एक फाइल जिस पर लिखा था- पाखी चौधरी वर्सेस रघु चौधरी डिवोर्स, देख कर में चौंक पड़ी. पाखी नाम तो बहुत ही जाना-पहचाना था. विवाह भी दो साल पहले हुआ था पाखी का रघु चौधरी से. पर वो तो विवाह के एक महीने में ही अपने पति के साथ विदेश चली गयी थी.विवाह के बाद के हनीमून के किस्से भी सुनाये थे जिसमें वह रघु के उस पर टूट कर प्यार करने और उस पर जान तक दे देने की अदा पर मैं उसके भाग्य पर रश्क करने लगी थी. पर ये अचानक तलाक… बात कुछ समझ में नहीं आयी. फाइल खोल कर देखी तो उसी के घर का नाम-पता लिखा था, मोबाईल नंबर भी था. झट से फ़ोन लगाया. फ़ोन पाखी ने ही उठाया. आवाज़ पहचानते ही पहला सवाल मेरे मुँह से निकला, “पाखी ये क्या, तुम दुबई से वापस कब आयीं?और अब ये तलाक? मुझे खबर तक नहीं की?”
“नहीं, दी, आने से पहले ही मेरा मन बहुत अशांत था सो किसी को कोई खबर नहीं की.”
“दीदी मानती हो और इस तरह की बातें करती हो,पर यह तलाक क्यों? रघु तो तुम्हें बहुत प्यार करता था?”
“हाँ प्यार तो शुरू में उन्होंने मुझे बहुत किया पर धीरे-धीरे मैं उनकी कुछ हरकतों और आदतों से परेशान होने लगी.वहाँ रहना तक मुश्किल हो गया.”
“फ़ोन पर कुछ नहीं बता पाऊँगी दी, मिलने पर ही बता दूँगी.”
“अच्छा ऐसा करो तुम शाम को मेरे घर आ जाओ.खाना भी यहीं खा लेना. पर यह तो बताओ, तुमने संजय को अपना वकील बनाया उनसे भी कोई बात नहीं की?”
“मैने कुछ नहीं किया दी,राम भैया ने ही सारी कार्यवाही की है. मैं तो सिर्फ अपने चार कपड़े और पास-पोर्ट लेकर वापस आ गई थी. सारी बातें सुन कर भैया और पापा तैश में आ गए. माँ ने समझाया भी,इतनी जल्दबाजी में कोई फैसला मत लो, पर उन्होंने एक न मानी और तलाक की अर्ज़ी दाखिल कर ही दी. जिन-जिन कागज़ों पर मेरे दस्तख़त की जरूरत थी मुझसे करवा लिए.”
“और तुमने दस्तख़त कर भी दिए? रघु से बात की कि नहीं इस बारे में?”
“आने से पहले से ही वो मुझसे बात तक नहीं करते थे.घंटों अपने कमरे में पड़े-पड़े न जाने क्या सोचा करते. मेरे यहाँ आने के बाद ही ये कार्यवाही शुरू हुई है रघु तक तो कागज़ अभी पहुँचे तक नहीं हैं. दी, शाम को मिलती हूँ.” कह कर उसने फ़ोन रख दिया.
मुझे संजय पर बहुत गुस्सा आया. माना, अपनी ऑफ़िशियल और बिजनेस की बातों को वो अपने तक ही सीमित रखते थे पर पाखी तो मेरी सहेली थी,कम से कम यह तो मुझे बताना चाहिए था उसके तलाक का केस उनके ही पास आया है और वह भी उनके दोस्त यानि राम के द्वारा. खैर आज तो वो अपने बिजनेस टूर पर हैं लौटेंगे तो जरूर पूछूँगी. सोच कर जल्दी-जल्दी मैं अपने ऑफिस के लिए तैयार होने लगी.
शाम को लौटते ही खाने की तैयारी में जुट गयी अकेली होती तो कुछ भी न बनाती पर पाखी के लिए तो कुछ बनाना ही था. उसे चायनीज़ खाना बहुत पसंद था सो जल्दी-जल्दी कुछ डिशेस बना कर ओवन के डोंगों में दाल कर रसोई साफ़ कर दी मैने, तभी टन्न से घंटी बजी,दरवाजा खोला तो वही चिर-परिचित मुस्कान लिए पाखी खड़ी थी पर आज उस मुस्कान में कुछ मायूसी भी छिपी थी. मैने उसे अपने गले लगा लिया. दो बूँद आँसुओं की गर्माहट मैने अपने कन्धों पर महसूस की. “चल पगली ऐसे आँसू टपकाते हैं क्या?” अपने आँचल से आँसुओं को पोंछते हुए उसे सीधे अपने बेडरूम में ले आयी.पलंग पर बिठा कर साइड-टेबल पर रखे जग में से गिलास में पानी उंढेला और उसे दिया.
पानी पी कर शायद उसका जी कुछ शांत हुआ. “कैसी हो, दी?”
“मेरी क्या पूछती हो अपनी बताओ. मैं तो तुम्हारी तलाक की फाइल देखने के बाद से ही सब कुछ जानने को बेताब हूँ, आखिर यह फैसला हुआ क्यों और देखो तो सही संजय ने भी मुझे इस बारे में कुछ नहीं बताया वो तो आज स्टडी रूम की सफाई करते समय तुम्हारी फाइल मैने देख ली तो मुझे पता चला.नहीं तो तुम्हारा तलाक भी हो जाता और मुझे पता भी नहीं चलता.तुम तो बताती ही नहीं.”
“कैसे बताती? कितनी खुश थीं आप मेरे इस रिश्ते से और मेरे हनीमून की बातें सुन कर अपने ही एक और हनीमून की तैयारी कर बैठीं थीं आप तो.”
“‘हाँ, लेकिन संजय को दूसरे हनीमून मनाने की फ़ुर्सत ही नहीं मिली अब तक, पहला ही जल्दी-जल्दी मना कर वापस आ गए थे काम का बोझ जो ले कर गए थे सिर पर. ”
“चलो पहले कुछ खा लो, फिर बैठ कर बातें करेंगे,आज चायनीज़ खाना बनाया है तुम्हारे लिए तुम्हें बहुत पसंद है न…”
“ओह! दी, सच में कौन सी डिश बनाई है? मैं तो दुबई में रह कर भी अपनी पसंद-नापसंद सब कुछ भूल ही गयी थी. अब सब कुछ याद आ रहा है.”
“चलो खुद ही सर्व कर लो किचन में आ कर, फिर यहाँ बैठ कर पुराने दिन याद करेंगे.”
फिर तो बहुत सी बातें हुईं हम दोनों की.पाखी की माँ को फ़ोन करके पाखी को रात में अपने ही यहाँ रोक लिया मैने. दूसरे दिन छुट्टी भी थी सो देर रात तक हम लोग आपस में बातें ही करते रहे फिर न जाने कब नींद ने अपनी बाँहों में दबोच लिया हम दोनों को.
सुबह बड़ी देर में हम लोगों की आँख खुली.पाखी झट-पट चाय बना लाई. चाय पीते समय मैने उन सब बातों पर सोच-विचार करके पाखी को समझाया और पूछा, “क्या तलाक ही आख़िरी उपाय है तुम्हारी समस्याओं का?”
“दी, आप ही बताइए मुझे क्या करना चाहिए क्या आप ऐसे आदमी के साथ पूरी ज़िंदगी बिता सकती हैं जो आठ-आठ दिन तक आपसे बात ही न करे और ना ही इसकी कोई वज़ह बताये. ऊपर से इतने मूड-स्विंग्स…मैं तो चिरौरी करते मनाते-मनाते ही थक गयी. उन पर कोई असर नहीं होता मेरी बातों का.ऊपर से रात को अपना कमरा अन्दर से बंद करके सो जायें जैसे मेरी कोई जरूरत ही नहीं है उनको.”
“तो क्या कोई और आ गई है रघु की ज़िंदगी में?”
“अब आने की ज़रुरत ही क्या है पहले से ही है.”
“क्या….?”
“और तुम्हें पता है कौन है वो?”
“वही तो हुआ, हमारे वहाँ पहुँचने से पहले ही वहाँ मौजूद थी अनीता, घर की चाबी भी उसी के पास थी, लगता था घर की मालकिन वही थी.”
“शादी-शुदा है क्या?”
“नहीं शादी-वादी में वो विश्वास नहीं करती, लिव-इन-रिलेशनशिप में ज्यादा भरोसा है उसे.”
“तो क्या वो भी तुम्हारे साथ ही रहती है?”
” नहीं, उसका घर है, अपनी बहन के साथ रहती है,एयर होस्टेस हैं दोनों.?”
“ओह”
“तो क्या रघु के साथ सम्बन्ध हैं उसके?”
“मानते तो नहीं, कहते हैं खाली दोस्ती है दोनों की.पर मुझे पूरा विश्वास है शादी से पहले रघु उसके साथ ही रहते थे.”
“कोई सबूत है इस बात का? अगर ऐसा ही था तो शादी क्यों की तुमसे?”
“घरवालों के दवाब में आ कर. पर अब कहते हैं कि मैं उनकी बेस्ट पार्टनर नहीं बन सकती. हर बात में मेरी तुलना अनीता से करतें हैं. अब बताइए हर लड़की की अलग- अलग विशेषताएं होती हैं. अगर वो किन्हीं बातों में मुझसे बेहतर है तो मैं भी तो उससे किसी बात में बेहतर हो सकती हूँ यह वो रियलाइज़ करने की कोशिश ही नहीं करते. मैं तो अनीता को उनकी दोस्त समझ कर चुप ही रहती हूँ पर कम से कम मुझे तो पत्नी का दर्ज़ा दें.ऊपर से उनके व्यवहार के पल-पल बदलते रूप, कहाँ तक बर्दाश्त करती, इससे तो मैं शादी से पहले ही अच्छी थी.अब तो हँसना-बोलना ही खत्म हो गया.एंजाॅयमेंट नाम की चीज़ तो दूर-दूर तक नज़र नहीं आती उस घर में.”
“तो क्या रघु अपनी ज़िंदगी एन्जॉय करतें हैं?”
“घर में तो नहीं करते हाँ बाहर करते हों तो पता नहीं मुझे अपने साथ कहीं लेकर भी तो नहीं जाते.बस घर में पड़ी-पड़ी बोर होती रहती थी.”
“यह तो वाकई में बड़ी समस्या है.तुमने कभी जानने की कोशिश नहीं की?”
“कुछ पूछती हूँ तो कहते है, “मैं बस ऐसा ही हूँ’ और जब मैं पूछती हूँ कि दूसरे लोगों के सामने तो आप बहुत बदले-बदले से होते हैं हँसते-बोलते हैं, तो कहते हैं “उन्हें दिखावा करता हूँ’,यह भी भला कोई बात हुई, इन सब बातों का मेरे दिल पर क्या असर पड़ता है, इस बात से उन्हें कोई लेना देना नहीं.”
“ये सब कब से शुरू हुआ, यहाँ से तो ठीक-ठाक ही गए थे तुम दोनों.”
“उन्हीं यादों पर तो जिंदा हूँ अब तक, बहुत प्यार दिया था रघु ने कश्मीर की उन वादियों में, मैं तो फूली न समाई थी अपनी किस्मत पर, सोचती अगर ये लव- मेरिज होती तो सारा प्यार शादी से पहले ही खत्म हो जाता, अरैन्जेड मेरिज में प्यार शादी के बाद ही होता है जो शायद कभी खत्म नहीं होता, पर यह तो एक महीने में ही न जाने कहाँ चला गया था .”
“तो क्या वहाँ जाते ही…”
“हाँ और क्या,और फिर अनीता भी तो वापस मिल गयी थी उन्हें.”
“वापस आने के बाद अपनी ससुराल गयीं तुम?”
“पापा और भैया ने जाने ही नहीं दिया.”
“क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारी ससुराल में कोई इस समस्या को सुलझाने में मदद कर सकता है?”
मम्मी और भाभी के तो लाड़ले हैं वो, बहनें भी भइया-भइया कह कर जान छिड़कतीं हैं उन पर,वहाँ मेरी कौन सुनेगा ?हाँ बड़े भाईसाहब हैं, शायद कुछ समझा सकें उन्हें.”
“ठीक है तो हम भाईसाहब से ही बात करेंगे.”
“पापा और भैया नाराज़ हुए तो?”
“उन्हें पता ही नहीं चलेगा.”
“दी, मुझे डर लग रहा है.”
‘इसमें डरने की क्या बात है? यह तो तुम्हारी ज़िंदगी का सवाल है.अच्छा यह बताओ कि तुम क्या चाहती हो,अपनी शादी बचाना चाहती हो या तोड़ना?
“दी, रघु का पहले वाला प्यार मिलता रहे तो मैं क्यों इस शादी को तोड़ना चाहूँगी? समस्या तो यही हैं न कि अब वो मुझे प्यार नहीं करते.”
“ठीक है आज संजय दोपहर तक आ जायेंगे हुम उनसे बात करेंगे.तब तक तुम नहा धो कर फ्रेश हो जाओ.” मैने अपनी अलमारी से एक नयी साड़ी निकाली जो संजय कलकत्ता से लाये थे रेडीमेड ब्लाऊज़ के साथ, सही नाप न जानने के कारण ब्लाउज़ कुछ छोटा ही ले आये थे.
“देखो तो सही यह ब्लाऊज़ तुम्हें फिट आ जायेगा. नहा कर यह साड़ी पहन लो यह रंग तुम पर बहुत अच्छा लगेगा.”
कह कर में खाने और नाश्ते का इंतजाम करने रसोई में चली गयी.तभी दरवाज़े पर घंटी बजी. नंदी काकी आयी थीं काम करने. रविवार को खाना और नाश्ता भी वही बनातीं थी.बस मुझे भी फ़ुर्सत मिल गयी.रसोई में उन्हें सब कुछ बता कर वापस आयी तो पाखी नहा-धो कर साड़ी पहनने की कोशिश कर रही थी मैंने उसकी मदद की और बंगाली स्टाइल में साड़ी पहना कर माथे पर सिन्दूर से बड़ी सी गोल बिंदिया लगा कर माँग भी भर दी. हाँ, बंगाली परिवार ही तो था उसका, ससुराल भी कलकत्ता का. शीशे में अपना संवरा रूप देख कर वह स्वयं ही शर्मा गयी.तभी ड्राॅर में रखे शंख की चूड़ी और कंगन भी उसे पहना दिए,लोहे की चूड़ी तो वह पहनी ही हुई थी.
“देखो तो सही बिलकुल बंगाली-वधू लग रही हो.” कह कर मैं भी फ्रेश होने बाथरूम में चली गयी.
दोपहर खाने के समय तक संजय भी टूर से वापस लौट आये थे. पाखी को सजे संवरे रूप में देख कर एक पल तो वह ठिठक से गए फिर सहज हो कर हाल-चाल पूछने लगे.
इससे पहले कि पाखी कुछ बोल पाती मैंने ही उनसे गुज़ारिश की कि वो उसके और रघु के तलाक की कार्यवाही कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दें.
“ऐसा क्यों?”
“पाखी अपनी शादी को बनाये रखने के लिए एक मौका चाहती है.”
“पर उसके घरवाले तो नहीं चाहते.”
“उन्होंने उसकी राय जानी ही कब? यह तो उनकी जबरदस्ती है.”
“अगर तुम कहती हो तो मैं कुछ दिन रुक सकता हूँ पर अगर राम ने जोर डाला तो भला कितने दिन रुक पाउँगा.”
“हमें एक कोशिश का मौका तो दीजिये.”
“ठीक है, देख लो कोशिश करके.”
हमने रघु के घर फ़ोन लगाया. पता लगा उसके भाईसाहब किसी काम से हमारे ही शहर में होटल ओबराय में ठहरे हुए हैं.बस हमें तो मन-माँगी मुराद मिल गयी.खाना खा कर हम सीधे होटल ओबराय पहुँचे.
रिसेप्शन से ही उनके कमरे का नंबर लगाया.उन्होंने लॉबी में इंतज़ार करने के लिए कहा.करीब दस मिनट में कलफ़दार कुरता-पायजामा पहने वे लॉबी में आ गये. पाखी को बंगाली दुल्हन के रूप में देख कर उनकी आँखों में उसके लिए स्नेह उमड़ आया और सर पर हाथ रख कर उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया और पूछा,”तुम कब आयीं दुबई से? खबर ही नहीं दी रघु ने.”
अब चौंकने की मेरी बारी थी.”ऐसा कैसे हो सकता है? कम से कम बताना तो चाहिए था रघु को.”
“बिलकुल नासमझी है उसकी,अरे दुल्हन पहली बार माँ के घर आये तो यहाँ ससुराल वालों के भी तो फ़र्ज़ होते हैं और अकेली ही आयी हो या कोई लेने गया था वहाँ.”
“जी नहीं कोई नहीं गया था मैं खुद ही आ गयी.”
“और उस बुद्धू मियाँ ने तुम्हें अकेले ही भेज दिया,अरे हम में से कोई चला जाता अगर मायके भेजना ही था तो,कम से कम हमें खबर तो करता.”
“जी पाखी खुद ही वहाँ वापस न जाने के लिए लौट आयी है.” मैने अपनी बात पर ज़ोर देते हुए कहा.
“क्या!!!” उनका मुँह खुला का खुला ही रह गया.
“जी, पाखी के घरवालों ने इन दिनों के तलाक के पेपर्स भी तैयार कर लिए हैं. “मैने कहा तो वे सकते में आ गए.बोले, “इतनी बड़ी बातें छुपाईं रघु ने हमसे,ठहरो मैं अभी बात करता हूँ उससे फ़ोन पर.चलो कमरे में चलते हैं.”
कमरे तक पहुँचते-पहुँचते रंजन भाईसाहब काफी उत्तेजित हो चुके थे. हमने उन्हें शांत करवाते हुए पहले पूरी बात सुन लेने की गुज़ारिश की तो वे थोड़ा शांत हुए. पाखी की हर बात को उन्होंने बड़े ध्यान से सुना और फिर हमारे सामने ही रघु को फ़ोन लगाया. अपने बड़े भाई को फ़ोन पर पाखी के पक्ष में बोलना रघु को ज़रा भी अच्छा नहीं लगा.उसने टका सा जवाब दिया,”पाखी अपनी मर्ज़ी से यहाँ से गयी है, यह उसका घर है जब चाहे वापस लौट सकती है पर अगर आप मुझसे उम्मीद करते हैं कि मैं उसे वहाँ लेने आऊँ तो मेरे लिए संभव नहीं होगा.” कह कर उसने फ़ोन रख दिया.
“पाखी, तुम अपने पिता से अनुमति ले कर मेरे साथ कलकत्ता चलो, मैं देखता हूँ रघु को, नहीं तो मैं ही लेकर जाऊँगा तुम्हें उसके पास.”
“बात पाखी के वहाँ वापस जाने की ही नहीं है,समस्या रघु के बर्ताव की है, जिससे पाखी को वहाँ उसके साथ रहने में मुश्किल हो रही है.घर में पत्नी के साथ कैसे पेश आना है वही नहीं समझ रहे हैं रघु जी.”
“मैं समझाऊंगा न उसे, आखिर बड़ा भाई हूँ उसका,पिताजी के न रहने पर पाल पोस कर बड़ा मैने ही किया है उसे,कैसे नहीं मानेगा मेरी बात? तुम दोनों चिंता न करो, पर व्यवहार में क्या प्रॉब्लम है?यहाँ तो वो ठीक- ठाक ही था.वहाँ जा कर क्या हो गया?मियां-बीबी में तो खटर-पटर होती ही रहती है,आखिर ऐसा क्या हुआ जो तलाक की नौबत आ गयी.”
जो भी कुछ पाखी ने मुझे बताया था वही सब मैने उन्हें हुबहू बता दिया.सब कुछ जानने के बाद उन्होंने प्रश्नसूचक नज़रों से पाखी की ओर देखा. पाखी ने ‘हाँ’ कहते हुए नज़रें झुका लीं.
उन्होंने बहुत इसरार किया कि पाखी उनके साथ कलकत्ता चले पर उसका जाना तब तक संभव नहीं था जब तक वे स्वयं जा कर पाखी के पिता से न मिलते इसलिए हम सब ही पाखी के घर के लिए रवाना हो गए.
पाखी के पिता हम सबको एक साथ देख कर भौंचक्के से रह गए. फिर भी उन्होंने शिष्टाचार का पालन करते हुए हम सब को बैठक में बिठाया. बात रंजन भाईसाहब ने ही शुरू की. “मैं पाखी को अपने साथ ले जाने आया हूँ.”
“क्या? ऐसा कैसे हो सकता है. पाखी अब यहीं रहेगी. क्या आप नहीं जानते कि दुबई में रघु ने उसके साथ कैसा व्यवहार किया है?”
“जानता तो नहीं था पर अब जान गया हूँ.”
“और उस पर भी आप उसे यहाँ लेने आये हैं?”
“मैं आपकी तकलीफ़ समझ सकता हूँ, आप हमें एक मौका तो दीजिये.”
“और कल को पाखी को या रघु को कुछ हो गया तो?”
“ऐसा क्या हो सकता है जो आप इतना घबरा रहे हैं?”
“क्या आप नहीं जानते कि रघु ने आत्महत्या की धमकी दी है, अगर पाखी को वहाँ भेजा तो.”
हम सब जैसे आसमान से नीचे गिरे, यह तो हमें पता ही न था, मैने पाखी को प्रश्नसूचक नज़रों से देखा.उसने न में अपना सिर हिलाया.
तभी उसके पिता बोल पड़े.”तलाक के कागज़ तैयार करने से पहले मैने रघु को फोन किया था सच्चाई जानने के लिए पर उसने मुझे यही जवाब दिया.”
“यह तो गंभीर मामला है.अच्छा मैं चलता हूँ.फिर मिलूँगा, पर मेरी गुज़ारिश है कि आप अभी तलाक तक मत जाइये मुझे मामले की जड़ तक जाने दीजिये.”
“कब तक इंतज़ार करें हम?”
“कृपया मुझे थोड़ा वक़्त दीजिये.” कहते हुए रंजन भाईसाहब उठ कर चले गए.
करीब एक हफ्ते बाद पाखी का फ़ोन आया कि रंजन भाईसाहब रघु को दुबई से वापस ले आये हैं, रघु ने दुबई की नौकरी छोड़ दी है और काफी बीमार है.रंजन भाईसाहब चाहते हैं कि अब मैं वापस कलकत्ता आ कर रहूँ अगर कोई मुश्किल होगी तो वही उसका हल भी निकालेंगे.
मैने पाखी से पूछा क्या उसके पिता और राम भैया तैयार हैं उसे कलकत्ता भेजने के लिए? उसका जवाब न में सुन कर मैं चिंता में पड़ गयी और दूसरे दिन ऑफिस से सीधी पाखी के घर चली गयी.वहाँ उसके पिता से बात करने पर वह एक शर्त पर उसे वहाँ भेजने को राज़ी हुए कि वह केवल बीमार रघु को देखने वहाँ जायेगी वह भी अकेली नहीं, अगर मैं उसके साथ जाऊँ तो.
उन्होंने कलकता का एक होटल में हमारे रहने की बुकिंग की और हम एक हफ्ते के लिए कलकत्ता चले गए.रंजन भाईसाहब होटल में हमसे मिले और उनके साथ हम सीधे उस नर्सिंग होम पहुँचे जहाँ रघु भर्ती थे. डॉक्टर की राय थी कि पाखी पहले उन डाक्टरों से मुलाकात करे जो रघु कि मानसिक समस्याओं के लिए इलाज कर रहे थे.मेरे लिए यह कोई नयी या चौंकाने वाली बात नहीं थी क्योंकि आजकल की अफरा-तफरी की भाग-दौड़ की ज़िंदगी में हर व्यक्ति किसी न किसी मानसिक दबाव में रहता ही है पर पाखी थोड़ी परेशान जरूर हो गयी. सायकायट्रिस्ट का अपॉइंटमेंट दूसरे दिन का मिला.
रंजन भाईसाहब ने चाहा कि हम उनके घर चलें पर हमने कहा कि इस समय वे हमें होटल छोड़ दें घर हम किसी और दिन चलेंगे.होटल पहुँच कर जाने से पहले रंजन भाईसाहब ने बताया कि पाखी से मिलने के बाद दूसरे दिन ही वो बिन रघु को कोई सूचना दिए दुबई पहुँच गए थे.वहाँ का नज़ारा देख कर उनके होश फ़ाकता हो गए.घर अन्दर से बंद था और कॉल बेल बजने पर भी कोई उत्तर नहीं आ रहा था.तो उन्होंने खिड़की से झाँक कर देखा, सोफ़े पर रघु सो रहा था.यहाँ तक कि मोबाइल की भी घंटी नहीं सुन रहा था संयोग से खिड़की की जाली एक तरफ से निकली हुई थी. वे जाली फाड़ कर अन्दर पहुँचे तो रघु को बेहोशी की हालत में पाया.पास में ही एक डॉक्टर की पर्ची और कुछ दवाइयाँ पड़ी थीं.परदेस का मामला था.कोई बखेड़ा नहीं खड़ा हो इसलिए सबसे पहले उन्होंने पर्ची पर लिखे डॉक्टर के नंबर पर फ़ोन लगाया.डॉक्टर प्रवीण रघु का ही दोस्त निकला और वो समाचार सुन कर फ़ौरन वहाँ पहुँच गया. उसने बताया कि दो दिन पहले रघु अपनी नींद की समस्या लेकर उसके पास आया था कि रात को तीन-चार घंटे सोने के बाद ही उसकी नींद उड़ जाती है और फिर सारी रात करवटें बदलते ही गुज़रती है.इसलिए उसने चार गोलियाँ दीं थी एक ही गोली रोज़ रात को खाने के लिए पर चारों गोलियाँ पत्ते में नहीं थी इसका मतलब रघु ने चारों गोलियाँ एक साथ खा लीं थीं और अब नीमबेहोशी की हालत में था. उसी पर्ची के पीछे रघु ने लिखा था, ‘मैं जीना नहीं चाहता’, इसका मतलब रघु ने खुदकुशी करने की कोशिश की थी.डॉक्टर प्रवीण ने अपने क्लिनिक से एम्बुलेंस बुलवा ली थी और उसी समय वहाँ ले जा कर उपचार किया.जैसे ही रघु थोड़ा ठीक हुआ उसने बताया कि उसने अपनी कंपनी में इस्तीफ़ा दे दिया है और वो वापस अपने घर जाना चाहता है इसलिए अब वो उसे कलकत्ता ले आये और डॉक्टर प्रवीण के कहने पर ही उसे यहाँ इलाज के लिए भर्ती किया गया है,डॉक्टर ये जानना चाहते है कि वो क्यों जीना नहीं चाहता इसके लिए घरवालों और विशेष रूप से पाखी का सायकाईट्रिस्ट डॉ मोदी से मिलना जरूरी है.
डॉ मोदी से अपॉइंटमेंट और काउंसिलिंग के लिए मैं पाखी के साथ ही गयी, भाईसाहब भी साथ ही थे.जब डॉ से मिल कर पाखी वेटिंग रूम में आयी तो उन्होंने भाईसाहब को अन्दर बुला लिया. मैने पाखी की ओर प्रश्नसूचक नज़रों से देखा. वो थोड़ी घबराई हुई सी थी. मैने थर्मस से थोड़ी कॉफ़ी निकाल कर उसे पिलाई, थोड़ी एनर्जी आने पर उसने बताया कि डॉ. ने कई व्यक्तिगत सवाल पूछे थे पाखी से, दोनों पति -पत्नी के आपस के संबंधों के बारे में , रघु की आदतों और व्यवहार के बारे में ,जितना कुछ वो उसे समझ पाई थी उसने बता दिया. अब डॉ चाहते हैं कि सब परिवार वाले जान जायें कि रघु किस समस्या से हो कर गुज़र रहे थे और मेडिकल ट्रीटमेंट के साथ और क्या क्या सावधानियाँ बरतनी होंगी जिससे इलाज में सहायता मिले, जिसके लिए पाखी का रघु के साथ रहना जरूरी है. हाँ, अगर वो उसे उसके हाल पर छोड़ कर तलाक लेना चाहती है तो उस पर कोई दबाब नहीं है वो चाहे तो अपनी मर्जी से निर्णय ले सकती है . जब तक पाखी थोड़ी सहज हुई डॉ मोदी और भाई साहब भी वहाँ आ गए, दोनों बातें करते हुए वहीं सोफे पर बैठ गए. डॉ ने हमें बताया कि रघु के व्यवहार में जो बातें दिखाई देती हैं वो उसके बस में नहीं है वो शायद काफी समय से बाईपोलर डिसऑर्डर से ग्रस्त है और शायद स्वयं भी नहीं जानता कि उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है .इस समय उसे इलाज और देखभाल की सख्त आवश्यकता है .
डॉ. की बात सुन कर मैं और पाखी तो सन्न से रह गए पर भाईसाहब को शायद डॉ. की केबिन में ही इस बात का अहसास हो गया था ,इसलिए उनके चेहरे पर आश्चर्य के भाव नहीं थे .
डॉ मोदी ने हमें कुछ पेपर्स दिए जिसमें बाईपोलर डिसऑर्डर के बारे में जानकारी तथा मरीज़ की देखभाल के बारे में निर्देश लिखे थे और एक हफ़्ते बाद मिलने को कहा तब तक वे रघु को अस्पताल में ही रखना चाहते थे .
अब हमारे पास एक हफ़्ता था सोचने के लिए की आगे क्या करना है, होटल वापस पहुँच कर पाखी गुमसुम और उदास थी. मैं चाह कर भी उसके चेहरे को पढ़ नहीं पा रही थी कि उसके मन में क्या चल रहा था .हम दोनों ने मिल कर डॉ की सारी हिदायतों को पढ़ा और बाईपोलर डिसऑर्डर के मरीज़ और इस बीमारी को समझने की कोशिश की .ये बीमारी ठीक होगी या नहीं इसका कोई निश्चित हल नहीं था, रघु के जीवन में, व्यवहार में उतार-चड़ाव आते ही जायेंगे और घरवालों को उसकी मानसिक स्थिति को समझते हुए अपने आपको एडजस्ट करना होगा और ध्यान देना होगा कि वो बराबर समय से दवाइयाँ लेता रहे तो लक्षणों को कंट्रोल में रखा जा सकता है .
रात के खाने के समय भी पाखी अनमनी सी रही. मैने जानबूझ कर उसके मन को नहीं छेड़ा. यह उसकी ज़िन्दगी का अहम् मसला था और उसे सोच-विचार कर ही निर्णय लेना था .रघु से वो बहुत प्यार करती थी ,उसे ऐसी हालत में कैसे अकेला छोड़ दे? शायद इसी दुविधा में वो सोच में पड़ी थी .
अगले दिन सुबह होते ही पाखी ने डॉ मोदी को फ़ोन किया और रघु से मिलने की अपनी इच्छा प्रकट की. डॉ. मोदी ने हिदायत दी कि दस बजे वो राउन्ड्स पर जायेंगे तब ही वो अस्पताल आये जिससे अगर रघु उसे देख कर उत्तेजित हो तो वो उसे संभाल सकें, आख़िर दुबई से वापस लौटने के बाद वो पहली बार रघु से मिल रही थी .
जल्दी जल्दी नाश्ता निबटा कर हम लोग अस्पताल पहुँचे. भाईसाहब वहाँ पहले से ही मौजूद थे. ठीक दस बजे डॉ ने पाखी को अपनी केबिन में बुलाया कुछ निर्देश दिए और अपने साथ ही रघु के कमरे में ले गए . मैं विज़िटिंग रूम में बैठी रही .पर वहाँ की खिड़की से रघु का कमरा साफ़ दिखाई दे रहा था . जैसे ही पाखी और डॉ मोदी कमरे में पहुँचे, रघु ने बिस्तर से उठने की कोशिश की. नर्स ने पीछे से सहारा दे कर उसे अधलेटा सा बिठा दिया. डॉ. ने नर्स से रघु की हालत के बारे में जानकारी ली, जैसे ही रघु ने डॉ. के पीछे खड़ी पाखी को देखा उसने अपनी नज़रें झुका लीं. कुछ अनजानी सी बीमारी का भय, कुछ चिंता और कुछ रघु के पूर्व व्यवहार से आतंकित पाखी भी उससे नज़रें न मिला पाई .पर आगे बढ़ कर फूलों का गुलदस्ता और ‘गेट वेल सून’ का कार्ड उसने रघु के सिरहाने रखी मेज़ पर सजा दिया .कार्ड में उसने पहले ही एक प्रेम भरा सन्देश अपने हाथों से लिख दिया था .
जब पाखी रघु के कमरे से बाहर आई तो मैने पूछ ही लिया ,”कैसा है रघु ?”
पाखी किसी और संसार में खोयी हुई थी,उसकी पलकों पर आँसुओं का इन्द्रधनुष छाया हुआ था जो उसके गालों पर टपका ही चाहता था .मैने अपने आँचल से उसकी पलकों को धीमे से छुआ और वो सतरंगे आँसू मेरे आँचल में सिमट गए .पाखी मेरे गले लग कर फूट-फूट कर रो पड़ी .मैने उसे धीरज बँधाया और हम लोग वापस अपने होटल आ गए .अभी कमरे में पहुँचे ही थे कि बैरे ने एक कार्ड देते हुए कहा कि अस्पताल से कोई दे गया है . अरे ,ये तो वही कार्ड था जो पाखी रघु को आज दे कर आयी थी .तो क्या रघु ने वो कार्ड वापस भिजवा दिया? इस आशंका से जब हम दोनों ने उसे खोला तो पाखी की आँखों में खुशी का ज्वार उमड़ आया . रुंधे हुए गले से उसने रघु का सन्देश पड़ा -‘पाखी आज तुम मुझसे मिलने आयी तो मुझे अच्छा लगा ,कल भी आओगी न ?’
मुझे उन दोनों के रिश्तों को संवरने की आहट साफ़ सुनायी देने लगी .मैने प्रश्नसूचक नज़रों से पाखी को देखा . उसने हाँ में सिर हिलाते हुए मेरे हाथों को ज़ोर से पकड़ लिया .उसकी आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह रही थी .शायद पति के सारे जुल्म भरे अहसास को उसमें बह जाने दिया उसने उस धारा में और नए सिरे से उसके प्रति अपने मन में संजोने के लिए नए स्वप्न सजाने लगी अपनी पलकों पर .अब वो गुमसुम नहीं थी आशा की एक किरण चमक रही थी उसकी आँखों में .
इधर मेरी छुट्टी भी समाप्त होने को आ रही थी पर पाखी को मंझधार मैं छोड़ कर मैं वापस नहीं जा सकती थी और अकेली वापस लौट कर उसके घरवालों को क्या जवाब देती ? इसलिए मैने अपनी छुट्टी एक हफ़्ता और लेने की अर्ज़ी अपने ऑफिस भेज दी और अपने पति को भी सूचना दे दी.आम पतियों की तरह पहले तो वे झल्लाए पर फ़िर स्थिति की गंभीरता को समझते हुए मेरे निर्णय को सही ठहराया उन्होंने .पर पाखी के घरवालों को क्या सूचित करूँ? इसी उहापोह में पड़ी थी मैं .
अब डॉ. मोदी ने पाखी को रोज़ रघु से मिलने की इजाज़त दे दी थी .भाईसाहब ने कई बार हम दोनों को अपने घर बुलाया पर अभी पाखी के घावों पर मरहम लगाना बाकी था. सो हमने पहले उन दोनों पति-पत्नी के आपस के रिश्ते को सँवारने में ही भलाई समझी .जब तक पाखी रघु के पास होती मैं और भाईसाहब वेटिंग रूम में बैठ कर उसका इंतज़ार करते .
भाईसाहब ने मुझे उन सब बातों की जानकारी दी जिन पर उनका ध्यान तब गया जब डॉ मोदी ने उनसे रघु के बचपन और कॉलेज के दिनों के बारे में तरह- तरह के सवाल पूछे .उसकी इस बीमारी के लक्षण कॉलेज के दिनों से ही प्रकट होने लगे थे शायद घर में किसी का ध्यान नहीं गया और उन लक्षणों को उसका नोर्मल व्यवहार ही समझा सबने, शायद वो ऐसे ही नेचर का है .जैसे कॉलेज के दिनों में ६ -६ महीने कई तरह के कोर्स उसने बदले ,कभी बड़े ही उत्साह से एक लाइन पकड़ता , बहुत अच्छे अंक भी पा जाता पर दूसरे ही क्षण उसे वो कोर्स उबाऊ लगता और फ़िर वह एकदम डल हो जाता कई -कई दिनों तक अपने कमरे में अकेला ही पड़ा रहता किसी से बात तक न करता और किसी काम में उसका मन नहीं लगता .पर कुछ समय के बाद अपना मन बदल कर बड़े उत्साह के साथ फ़िर कोई नया कोर्स ज्वाइन कर लेता .इस तरह तीन साल बर्बाद किये उसने .बड़ी मुश्किल से एक कोर्स बहुत ही अच्छे अंको से पूरा किया था जिससे उसे दुबई में नौकरी मिली थी .इसलिए उन लोगों ने उसकी शादी भी कर दी थी . शादी के समय वह बड़ा उत्साहित था और खुशी -खुशी पाखी को अपने साथ दुबई भी ले कर गया.उन लोगों ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था वहाँ जा का सब कुछ यूँ पलट जायेगा और आज यह दिन देखना पड़ेगा .
अब रघु की बीमारी मेरे लिए एक पहेली बन गयी थी जिसमें शायद पाखी भी उलझ कर रह जायेगी, ऐसा सोच कर मैने इंटरनेट पर जानकारी हासिल करने की सोची .बहुत कुछ पढ़ा मैने इंटरनेट पर फ़िर तो इस उलझन की सारी परतें मानो उघड़ती चलीं गयीं . रात को मैने और पाखी दोनों ने मिल कर इस बीमारी के बारे में रिसर्च की, बाईपोलर डिसऑर्डर ग्रस्त लोगों के अनुभव पढ़े और जाना कि अगर पाखी अपने तलाक का निर्णय टाल देती है तो उसे आगे जीवन में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा और कैसे रघु को इस बीमारी के गूढ़तम कष्टों से उबारना होगा. इसके लिए सबसे पहले पाखी को रघु का विश्वास जीतना होगा कि वही उसकी जीवन- संगिनी है और उसके जीवन का केवल एक ही उद्देश्य है और वह है कि रघु को इस बीमारी से लड़ने में सहयोग देना .
काफ़ी सोच-विचार के बाद पाखी ने अपना जीवन रघु की इस हालत और बीमारी को समर्पित करने का निर्णय ले लिया, विवाह के बाद एक महीने तक रघु ने उसे जो प्यार दिया था उसके बदले वह अपना सम्पूर्ण जीवन उस पर लुटाने को तैयार थी, फ़िर चाहे उसे अपने जीवन में कितनी भी चुनौतियों को स्वीकार करना पड़े . मैं जानती थी पाखी कर्मठ जी वाली लड़की थी जो मन में ठान लेती थी उसे पूरा करके ही छोड़ती थी इसलिए मैने भी उसका साथ दिया.

डॉ. मोदी से मिल कर उसने अपना तलाक न लेने का निर्णय सुनाया तो डॉ. ने रघु और पाखी दोनों को साथ बिठा कर काउन्सिलिंग की. दोनों को इस बीमारी के बारे में पूरी जानकारी दी और आगे की ज़िंदगी कैसे जीनी है यह भी हिदायतें दीं.जिसमें विशेष बात यह थी कि उन्हें इलाज जारी रखने के लिए बीच-बीच में डॉ. मोदी से मिलते रहना होगा और कभी भी चाहे ऐसा लगे कि रघु ठीक हो रहा है तो भी दवाई अपने आप से बंद नहीं करनी होगी, हो सकता है कभी लक्षणों के बदलने पर दवा भी बदलनी पड़े .कभी ऐसा भी हो सकता है कि रघु खुद ही दवा न लेना चाहे क्योंकि इस बीमारी में जब मरीज़ ‘हाइप’ पर होता है तो वो जो व्यवहार उस समय कर रहा होता है वो उसी में जीना चाहता है, उसमें उसे बहुत आनंद आता है जैसे बहुत अधिक खरीदारी करना,किसी किसी काम में बहुत अधिक रूचि लेना जो पति-पत्नी के शारीरिक संबंधों से भी जुड़ी हो सकती है, या फिर अधिक बोलना आदि, और दवा न ले कर उन लक्षणों को बने रहने देना चाहता है. इसलिए दवा बंद कर देता है पर उससे इस बीमारी के रिलेप्स होने का डर रहता है , मरीज़ फिर से गहन अवसाद कि स्थिति में जा सकता है,जिससे ये एपिसोड और भी तीव्र अवस्था में उभर कर अपना असर दिखाता है, जिसे वह उस समय नहीं समझ पाता और फिर दोबारा से इस एपिसोड का इलाज करने में ज्यादा मुश्किल होती है और ज्यादा परेशानियों का सामना करना पड़ता है.
भाईसाहब को यह जान कर खुशी हुई कि पाखी ने रघु से तलाक लेने का निर्णय बदल दिया है उन्होंने हमें अपने घर चलने का आग्रह किया पर पाखी ने यह कह कर टाल दिया कि वह रघु के साथ ही अपनी ससुराल जाना चाहती है जब उसे अस्पताल से छुट्टी मिलेगी .
भाईसाहब ने इस बात की सूचना पाखी के पिता को दे दी . पहले तो वो बहुत भड़के पर पाखी के निर्णय के आगे उन्हें झुकना ही पड़ा.
अस्पताल से डिस्चार्ज हो कर रघु और पाखी एक साथ अपने घर पहुँचे. मैंने पाखी को उसी लाल साड़ी में सजा दिया था जिसमें वो बंगाली दुल्हन लग रही थी .
लौटते समय मेरी आँखों में आँसू थे, न जाने वो पाखी से बिछुड़ने के ग़म के थे या उसका घर एक बार फिर बस जाने की खुशी के, यह मैं आज तक न समझ पाई .


शील निगम
मुंबई

error: Content is protected !!