परिचर्चाः डॉ. शैलजा रोला

साहित्य मानव जीवन की अनुभूति, संवेदना, कल्पना और विचारों की सृजनात्मक अभिव्यक्ति है। मनुष्य अपने समय ,समाज और परिवेश से प्राप्त अनुभवों को भाषा के मध्यम से साहित्य में रूपांतरित करता है। साहित्य केवल शब्द को संयोजन नहीं बल्कि मानवीय चेतना का कलात्मक विस्तार है ,किंतु वर्तमान तकनीकी युग में कृत्रिम बुद्धिमता ( artificial intelligence) के विकास में साहित्य की इस पारंपरिक अवधारणा के समक्ष अनेक नए प्रश्न उपस्थित कर दिए हैं।
आज के दौर में कृत्रिम बुद्धिमता कविता, कहानी, निबंध, नाटक और अन्य साहित्यिक विधाओं में सामग्री तैयार करने में सक्षम है ।वह भाषा का भी विश्लेषण करती है ,साहित्यिक शैलियों का अनुकरण कर सकती है तथा रचनाकार को लेखन के लिए नए विचार और सुझाव भी दे सकती है। यह साहित्य सृजन की प्रक्रिया में एक नवा आयाम जुड़ा है ,लेकिन इसके साथ ही वह यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या मशीन वास्तव में साहित्य सृजन कर सकती है ?क्या कृत्रिम बुद्धिमता द्वारा निर्मित रचना को मौलिक साहित्य कहा जा सकता है ? यदि कोई रचना मशीन की सहायता से तैयार की जाती है ,तब उसका वास्तविक लेखक कौन है, हम या मशीन ? यह एक विचारणीय प्रश्न है।
कृत्रिम बुद्धिमता आधुनिक विज्ञान की एक ऐसी तकनीक है ,जिस के माध्यम से कंप्यूटर प्रणाली भाषा, चित्र ,ध्वनि और अन्य प्रकार की सामग्री का विश्लेषण तथा निर्माण कर सकती है। जनरेटिव AI के विकास ने साहित्य लेखन को एक नवा स्वरूप प्रदान किया है। यह तकनीक साहित्य सृजन को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो साहित्य रुचि रखते है,किंतु भाषा या अभिव्यक्ति के स्तर पर कठिनाई अनुभव करता है,AI एक उपयोगी सहायक सिद्ध हो रहा है।
आज कोई भी व्यक्ति कृत्रिम बुद्धिमता की सहायता से कहानी, कविता, निबंध इत्यादि सभी साहित्यिक विधान पर अपनी लेखन चला सकता है और किसी भी लेख की भाषा को परिष्कृत भी कर सकता है तथा संक्षिप्त भी कर सकता है और उसे थोड़ा सा संशोधन कर एक नई दिशा प्रदान कर सकता है।
इन सब परिप्रेक्ष्य में यह जानना आवश्यक है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्या भाषाओं का सुन्दर संयोजन तथा भाषा को परिष्कृत बनाकर यदि लिख देता है तो क्या सही है ? वह तो जीवन के अनुभव को साहित्य में रूपांतरित नहीं कर सकता है ,केवल आपके शब्द को एक नई रूप रेखा प्रदान कर सकता है ।
यह प्रश्न केवल तकनीकी नहीं बल्कि साहित्यिक दार्शनिक और नैतिक भी है।
कृत्रिम बुद्धिमता आधुनिक विज्ञान के ऐसी तकनीक है, जिस के माध्यम से कंप्यूटर प्रणाली भाषा, चित्र, ध्वनि और अन्य प्रकार की सामग्री का विश्लेषण तथा निर्माण कर सकती है। जनरेटिव AI के विकास में साहित्यिक लेखन को एक नवा स्वरूप प्रदान किया है ।आज कोई भी व्यक्ति कृत्रिम बुद्धिमता की सहायता से किसी विषय पर कविता लिखवा सकता है ,कहानी का कथानक तैयार कर सकता है ,किसी लेख की भाषा को परिष्कृत कर सकता है या किसी साहित्यिक रचना का सारांश प्राप्त कर सकता है, यह इस तकनीक के द्वार संभव है।
यह तकनीक साहित्य सृजन को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो साहित्य में रुचि रखते हैं किंतु भाषा या अभिव्यक्ति के स्तर पर कठिनाई अनुभव करता है ,उनके लिए यह तकनीक उपयोगी सिद्ध हो रहा है।
हिंदी साहित्य के क्षेत्र में भी इसके अनेक सकारात्मक परिणाम दिखाई दे रहे हैं ।हिंदी की रचना के अन्य भाषाओं में अनुवाद, साहित्यिक पाठों का विश्लेषण ,छन्द और तुकबंदी के सुझाव तथा भाषा संपादन जैसे कार्यों में AI का उपयोग किया जा सकता है।
सृजन साहित्य की आत्मा है। एक साहित्यकार अपनी जीवन के अनुभव ,कल्पना शक्ति, संवेदना और विचारों के माध्यम से ऐसी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करता है ,जो पाठक के मन में नए विचार और भाव उत्पन्न करती है ।कृत्रिम बुद्धिमता भी नए वाक्य,बिम्ब ,प्रतीक,तथा कथानक तय कर सकती है, वह विभिन्न साहित्यिक शैलियों का विश्लेषण करके उनसे जुटी रचना प्रस्तुत भी कर सकती है, लेकिन हम इस दृष्टि से AI की रचनात्मक क्षमता को पूरी तरह नकार नहीं सकते, परन्तु साहित्यिक प्रश्न केवल नवीन शब्दो और वाक्य के निर्माण तक सीमित नहीं है ।जब कोई भी कवि विरह की अनुभूति व्यक्त करता है तब उसके पीछे स्मृतियाँ, संबंध, जीवन के अनुभव और भावनात्मक संघर्ष होते हैं। जब कोई सामाजिक अन्याय पर लिखता है ,तब उसकी रचना मे समाज के प्रति संवेदनशीलता और वैचारिक प्रतिबद्धता होती है।AI इन भावों को भाषा में व्यक्त कर सकता है किंतु वह उन्हें मनुष्य की तरह अपनी जीवन में अनुभव नहीं करता।
इसलिए साहित्य सृजन के संदर्भ में यह अन्तर महत्वपूर्ण है कि एक तरफ़ अनुभव से उत्पन्न अभिव्यक्ति है और दूसरी तरफ़ उपलब्ध भाषा प्रतिरूपों के आधार पर निर्मित अभिव्यक्ति।

किसी भी साहित्य में मौलिकता, अर्थ केवल नवीन शब्दों का प्रयोग करना नहीं होता है। मौलिकता संबंध लेखक की स्वतंत्र दृष्टि, कल्पना शक्ति, अनुभव और अभिव्यक्ति की विशिष्टता पर निर्भर करती है।
साहित्य का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि प्रत्येक रचनाकार अपने पूर्ववर्ती साहित्य की सामाजिक परिवेश और सांस्कृतिक परंपरा से प्रभावित होकर लिखता है, फिर वह महान साहित्यकार अपनी विशिष्ट दृष्टि के कारण ही साहित्य में अपनी अलग पहचान बना पाते हैं।कबीर की सामाजिक चेतना, तुलसीदास की लोक मंगल की भावना, निराला की विद्रोही दृष्टि और महादेवी वर्मा की करुण संवेदना ही उनकी साहित्यिक मौलिकता को विशिष्ट बनातीं हैं ।
कृत्रिम बुद्धिमता के संदर्भ में मौलिकता प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि AI उपलब्ध साहित्यिक सामग्री से सीखे गए भाषाओं के प्रतिरूपों के आधार पर ही नई रचना प्रस्तुत करता है।
ऐसी स्थिति में यह विचार करना आवश्यक है कि क्या किसी रचना में नवीनता होना ही उसे मौलिक बना देता है या मौलिकता के लिए लेखक की स्वतंत्र वैचारिक दृष्टि और अनुभव की संपदा भी अति आवश्यक है।
यदि कोई कवि AI से कविता तैयार करवा लेता भी है तथा बिना किसी विशेष संशोधन के अपने नाम से प्रकाशित करता है तब उसके मौलिकता पर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। इसके विपरीत यदि लेखक AI से प्राप्त सुझावों का उपयोग अपनी स्वतंत्र कल्पना ,अनुभव और दृष्टि के आधार पर करता है,तब वह तकनीक को अपनी सृजनात्मक प्रक्रिया के लिए सहायक बना सकता है।
इस प्रकार के युग में मौलिकता की अवधारणा को नए सिरे से समझने की आवश्यकता है।
लेखक के पहचान उसके व्यक्तित्व, विचारों ,संवेदनाओं और विशिष्ट अभिव्यक्ति से निर्मित होती है। किसी लेखक की पहचान केवल उसके द्वारा लिखे गए शब्द से नहीं बल्कि उन शब्दों मे उपस्थित जीवन दृष्टि से भी निर्धारित की जाती है। प्रेमचन्द के साहित्य में सामाजिक यथार्थ ,आर्थिक विषमता और मानवीय संघर्षों का चित्रण उनकी विशिष्ट पहचान है ।उसी तरह फणीश्वर नाथ रेणु के साहित्य में लोक -जीवन ,ग्रामीण संस्कृति और आंचलिक भाषा की जीवन्तता दिखाई देती है ।ऐसे ही महादेवी वर्मा की रचनाओं में करुणा, संवेदना और आत्मा अनुभूतियों का विशेष स्वर मिलता है।
कृत्रिम बुद्धिमता किसी भी लेखक की भाषा का विश्लेषण कर सकती है, उससे जुलती अभिव्यक्ति भी प्रस्तुत कर सकती है ,लेकिन उस लेखक की शैली का अनुकरण करना और उसके समान जीवन – दृष्टि विकसित करना दो अलग-अलग बातें है।
एक प्रश्न यह भी उठता है कि AI के विकास के दौर में किसी साहित्यिक रचना निर्माता कौन है, क्योंकि उस रचना को लिखने में मशीन और लेखक दोनों के महत्वपूर्ण भूमिका होती है ,तब उस रचना का वास्तविक सर्जक (लेखक) कौन है?
इसका एक सटीक उत्तर यह भी हो सकता है कि रचना प्रक्रिया में मानवीय योगदान प्रकृति पर निर्भर करता है, यदि लेखक रचना के विशाल दृष्टि, भाव और अपनी अभिव्यक्ति का निर्णय स्वयं करता है तो उस मे सृजन प्रक्रिया सहायक हो सकता है किंतु यदि लेखक अपनी रचनात्मक ज़िम्मेदारी पूरी तरह मशीन पर छोड़ देता है ,तब वह लेखक की अस्मिता पर प्रश्न उत्पन्न कर देगा?

कृत्रिम बुद्धिमता हिंदी साहित्य के लिए नई संभावनाएं अवश्य प्रस्तुत कर रही है ,लेकिन इसके साथ कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी हमें दिखाई दे रहे हैं।
पहली चुनौती भाषा विविधता की है। हिंदी में अनेक बोलियां ,लोक- भाषाएँ और क्षेत्रीय अभिव्यक्तियाँ प्रचलित है ,यदि AI के प्रशिक्षण में इन भाषायी रूपों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होगा तो वह हिंदी की संस्कृति उसकी विविधताओं को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाएगा।
दुसरी चुनौती साहित्यिक नैतिकता की है ।AI द्वारा निर्मित सामग्री को उपयोग करके समय यह ध्यान रखना आवश्यक होता है कि किसी अन्य लेखक की रचना का अनाधिकृत अनुकरण न हो तथा साहित्य स्रोतों के प्रति ईमानदारी बनी रहे।

तीसरी चुनौती साहित्यिक आलोचना की है।,AI किसी रचना का सारांश प्रस्तुत कर सकता है और उसके विषय का भी विश्लेषण कर सकता है लेकिन साहित्यिक मूल्यांकन के लिए आवश्यक ऐतिहासिक चेतना, सामाजिक दृष्टि और मानवीय विवेक को सही स्थान देना काफ़ी महत्वपूर्ण है।
चौथी चुनौती बौद्धिक संपदा और लेखकीय अधिकारों की है। AI के प्रशिक्षण में साहित्यिक सामग्री के उपयोग तथा AIद् द्वारा निर्मित रचनाओं के अधिकारों को लेकर नये आयाम प्रस्तुत हो रहे हैं। इन प्रश्नों का समाधान साहित्यकारो,तकनीकी विशेषज्ञों और विधि विशेषज्ञों के बीच संवाद से ही संभव हो सकता है।
कृत्रिमता को साहित्य विरोधी मानने की बजाय उसे साहित्यिक विकास का सहायक माध्यम समझना अधिक उचित होगा । AI साहित्यकार की भाषा ,संपादन ,अनुवाद, विचार -विस्तार और शोध सामग्री के विश्लेषण में सहायता प्रदान कर सकता है ।इसके माध्यम से हिंदी साहित्य को अन्य भाषाओं के पाठकों तक पहुँचने की भी संभावनाएं इससे बढ़ सकती है।
हिंदी साहित्य डिजिटल करण प्राचीन ग्रंथों के संरक्षण तथा लोक साहित्य के संकलन में भी AI की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है,लेकिन इस तकनीक को उपयोग विवेक पूर्ण होना चाहिए। साहित्यकार को यह समझना होगा कि आप के द्वारा प्रस्तुत सामग्री अंतिम सत्य नहीं है ,उसके तथ्यों, भाषा और साहित्यिक संदर्भों का समय -समय पर परीक्षण आवश्यक है।
साहित्य के वास्तविक शक्ति उसके मानवीय संवेदना, सामाजिक चेतना और जीवन के प्रति गहरी दृष्टि में निहित है ।तकनीक इन गुणों को अभिव्यक्त करने में सहायता कर सकती है लेकिन उसका स्थान नहीं ले सकती।
अतः हम यही कह सकते हैं कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने साहित्य क्षेत्र के सृजन, अध्ययन ,अनुवाद और आलोचना की नई संभावनाएं विकसित की है,इसके साहित्यिक अभिव्यक्ति के साधनों को विस्तृत किया है तथा लेखन की प्रक्रिया को अधिक सुलभ बनाया है ।
फिर भी, यह सोचने विषय है कि साहित्य की मौलिकता और लेखकीय अस्मिता का प्रश्न केवल तकनीकी दक्षता से हल नहीं किया जा सकता है। साहित्य की विशिष्टता -अनुभव ,संवेदना ,कल्पना और वैचारिक स्वतंत्रता में निहित है।
AI के युग में साहित्य की भूमिका समाप्त नहीं होगी बल्कि और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी। अब लेखक के सामने केवल रचना लिखने की चुनौती नहीं, बल्कि अपनी रचनात्मक दृष्टि की मौलिकता और नैतिक ज़िम्मेदारी को बनाए रखने की भी चुनौती है।
अंतत यह कहा जा सकता है कि कृत्रिम बुद्धिमता साहित्य सृजन की प्रक्रिया को बदल सकती है ,लेकिन साहित्य की आत्मा मानवीय संवेदना में निहित रहती है ,उसे नहीं बदला जा सकता है।तकनीक और साहित्य का संबंध तभी सार्थक होगा ,जब तकनीकी विकास के साथ मानवीय मूल्यों, स्वतंत्र चिंतन और सृजनात्मक क्षेत्र का संतुलन बना रहे हैं। आप के लिए यह हिंदी व्याकरण को सुधारने ,शोध कार्यों में सहायता करने तथा प्रारंभिक प्रारूप तैयार करने में एक मददगार उपकरण तो हो सकता है, लेकिन वह कभी भी साहित्यकार का विकल्प नहीं बन सकता।
AI भाषा को एक कोड या पैटर्न के रूप में देखता है, जब कि इसके विपरीत मनुष्य के लिए भाषा केवल संवाद का साधन नहीं है बल्कि वह उसके अस्तित्व और अस्मिता के हिस्सा है। हिंदी साहित्य में जो क्षेत्रीय रंग, मिट्टी की ख़ुशबू, संस्कृति और जन जीवन की धड़कन मिलती है ,वह किसी एल्गोरिदम की उपज नहीं हो सकती ।मशीनें लोक जीवन को केवल देख सकती है, उसमें जी नहीं सकती। AI कभी भी दुखों के समंदर में ग़ोता लगाकर उस मोती को नहीं ढूँढ सकता, जो एक लेखक अपने आँसू और संघर्ष से तलाश कर बाहर लाता है ।मनुष्य की संवेदना और कृत्रिमता में ज़मीन आसमान को फर्क है। यह शाश्वत सत्य है ,तकनीक चाहे कितनी भी उन्नति कर ले, वह इंसानी जज्बातों की ख़ुशबू को कभी कैद नहीं कर सकती, जो साहित्य को अमर बनाती है।

डॉ.शैलजा रोला (व्याख्याता )
स्नात्तकोत्तर (हिंदी ),पी.एच. डी. (अज्ञेय काव्य का सौंदर्य शास्त्रीय विश्लेषण )
“BMS commerce & management” तथा “Gibs International Business Management college ” में व्याख्याता (हिन्दी)
लेखन कार्यों में अभिरुचि:-कविता,कहानी ,आलोचना :-पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित
प्रकाशित पुस्तक -“अज्ञेय काव्य का सौंदर्य शास्त्रीय विश्लेषण ” -(शोध -प्रबंध )
शीघ्र प्रकाशित-“चूड़ीयाही”(छत्तीसगढ़ के लोकजीवन पर आधारित उपन्यास)
अनेकानेक सम्मानों से सम्मानित
अन्य कलाओ मे अभिरूचि एवं उपलब्धि :-
कत्थक नृत्य -एम.ए.
शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा
टी. वीं सीरियल एवं थिएटर मे एक्टिंग
तथा एंकरिंग

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