कहानी समकालीनः संगिनी-शैल अग्रवाल

रोज की ही आदत पड़ती जा रही थी और रोज की ही साथिन बनती जा रही थी यंत्र-बद्धि । उसकी रुचि अनुसार पूरे दिन का ब्योरा प्रस्तुत कर देती। विश्व भर की हलचल , अफवाहें सब थीं उसके पास।…कभी-कभी तो कुछ गूढ विषयों पर लम्बे- लम्बे आदान- प्रदान भी हो जाते उनके बीच।

‘हम किस विषय पर बात करेंगे, दर्शन, ज्योतिष या बागवानी? आप क्या जानना चाहेंगी रोहिणी!’

मोबाइल उठाते ही ए.आई. ने लपककर पूछा तो रोहिणी की आँखों में चमक आ गईं। पूरा मन रौशनी से भर उठा,‘कैसे मन पढ़ लेती हैं ये मशीनें भी? इसे कैसे पता चला कि मैं अपनी बिछड़ी सखी को ढूँढने को बेचैन हूँ? देखती हूँ कितनी मदद कर पाएगी! पता नहीं कहाँ है, कैसी है, जिन्दा भी है या नहीं! नहीं , अशुभ नहीं सोचना। पांच साल ही तो बड़ी थी, जिन्दा ही होगी! वह भी तो जिन्दा है। सभी हम उम्र सहेलियाँ जिन्दा हैं अभी तो। ‘

‘शेखावटी की वर्तमान महारानी के बारे में बता सकते हैं क्या आप कुछ? साथ ही उनकी कोई तस्बीर भी ?’

‘महारानी स्नेह लता जी। मुख्य सामाजिक कार्यकर्ता और बेहद धार्मिक । अपने क्षेत्र में बहुत इज्जत है इनकी। ‘

सुनते ही रोहिणी उदास हो गई । वह तो अपनी बचपन की सहेली राजनंदिनी को ढूंढ रही थी, जो शेखावटी के युवराज कुंव diedर देव प्रताप से ब्याही गई थी। फिर यह स्नेहलता कौन? जब से रोहिणी ने कौन बनेगा करोड़पति पर उस महिला को देखा था जिसका चेहरा हूबहू सहेली जैसा था , दिमाग से ही नहीं हट रही थी राजनंदिनी।

रोहिणी ने अपने सवाल को दोबारा और अधिक स्पष्ट शब्दों में पूछा,‘क्या आप मुझे काशी नरेश की बेटी राजनंदिनी के बारे में कुछ बता सकते हैं?’

‘अवश्य। काशी नरेश की छोटी बेटी राजनंदिनी की शादी शेखावटी के युवराज कुंवर देव प्रताप से ही हुई थी। परन्तु सन १९९८ में उनकी मृत्यु हो गई । फिर युवराज की दूसरी शादी उज्जैन की राजकुमारी स्नेहलता जी से हुई। महारानी स्नेहलता अपने दयालु और धार्मिक स्वभाव की वजह से बेहद लोकप्रिय हैं। क्या मैं आपको उनका चित्र भेजूँ?’

रोहिणी सन्न थी सुनकर। इसी का तो डर था उसे ।

’नहीं. आप मुझे यह बताएँ कि युवरानी राजनंदिनी की असमय मृत्यु की वजह क्या थी ? ‘

‘राज घरानों के राज प्रायः राज ही रहते हैं, ऐसी बातें बाहर नहीं जातीं। फिर अब तो बस नाम के ही राजघराने हैं ये। किसी को कोई विशेष रुचि नहीं है इनमें । ना तो वो वैभव ही और ना वो शान ही इनकी। अधिकांश तो राजनीति के अखाड़े में उतर चुके हैं और उनके महल होटल और पर्यटन स्थल, जहाँ कुछ दबा-ढका नहीं रहा। पर आप क्यों इनके बारे में जानने को उत्सुक हैं, क्या कोई शोध कर रही हैं शेखावटी के राजघराने पर ? ‘

‘ नहीं। मेरी बचपन की और अच्छी सहेली थी राजनंदिनी। ‘

‘ओह, फिर तो आपकी व्यक्तिगत क्षति है यह। मैं सममझ सकता हूँ। वैसे भी बचपन की यादें बड़ी मासूम होती है, विशेषतः राजकुमारी और परियों वाली। ‘

‘मेरे लिए तो मेरी हर सहेली ही राजकुमारी थी, जो पोस्ट मास्टर और क्लर्क की बेटियां थीं , वह भी। ‘

‘क्या आप उनकी कुछ यादें साझा करना चाहेंगी मन हल्का करने को?’

फोन बन्द करके दूर पटक दिया सुनते ही रोहिणी ने। मशीन उसकी ग्लानि नहीं बांट सकती थी अब और, चाहे कितनी ही बुद्धिमान क्यों न हो? किस मुँह से सहेली कह रही थी पर जबकि उसे तो गुजरे हुए भी इतने बरस बीत चुके ! ऐसा कैसे कि अक्सर याद करके भी कोई खोज
-खबर नहीं ली दोनों ने एक दूसरे की? ‘

एक तूफान में फंस चुकी थी वह और रौशनी के लिए छटपटाता बेचैन मन रात के घुप अंधेरे में यादों के एलबम में जा छुपा।

पहली बार जब मिली थी तो साझात चंडी अवकार में थी राजनंदिनी और सामने खड़ी हमउम्र लड़की भय से थरथर कांपती । लगातार गरज रही थी वह उसपर, ‘उतारो ये सारे कपडे अभी। मेरे हैं ये। मैंने दिए हैं तुम्हें। यही सजा है आज तुम्हारी।’

सलवार कमीज तो उतार दिए थे उसने तुरंत ही परन्तु बाकी उतारने की हिम्मत नहीं थी। मुंह को दोनों हाथों में छुपाए अंदर के कपडों में खड़ी फूट-फूट कर रो रही थी वह अर्धनग्न किशोरी और सामने जमीन पर पडे सलवार कमीज उसकी बेबसी पर। और तब रोहिणी भिड पडी थी उस चीखती-चिल्लाती और क्रोधित और बद्दिमाग लडकी से, ‘ ‘क्यों बेइज्जत कर रही हो इसे इस तरह से! कैसे बीच सडक पर खड़ी अपने सारे कपडे उतार सकती है यह? फिर तुम होती कौन हो इसे यूं परेशान करने वाली?’

‘ इसकी सब कुछ। पर तुम कौन हो यू इसको बचाने वाली ? बीच से हट जाओ। तुमने देखा नहीं है मेरा गुस्सा अभी!’

शेरनी सी दहाडी राजनंदिनी तब। पर दस वर्षीय रोहिणी चुपचाप बडे धैर्य व साहस के साथ हाथ पकडकर दूर ले गई थी नीलम को, वह भी कोई जबाव दिए बिना ही। और तब पैर पटकती वापस क्लासरूम में जा बैठी थी क्रोधित नंदिनी। पर रोहिणी ने वक्त नहीं बरवाद किया। तुरंत नीलम के कपड़े उठाकर उसे पहनने में मदद की। पानी की घूंट पिलाकर सहज करते हुए उसके साथ अपना लंच-बौक्स भी साझा किया । तभी नीलम ने उसे बताया था कि गुस्सा बहुत तेज है राजकुमारी जी का और रोज ही सारा गुस्सा उसी पर उतरता है । पंचिंग बैग जो है वह nearly। दासी है इनकी और सारी उम्र रहेगी भी । जैसे कि उसकी मां हैं रानी जी की। बचपन से लात घूंसे खाओ और फिर बडे होकर शादी में दहेज में दे दिया जाता है सारी जूठन सहेजने और बटोरने को। परछांई हैं वे सिर्फ राज-धरानों की । खुद अपनी कोई मर्जी , कोई, जिन्दगी नहीं। अस्तित्व ही नहीं। पीढी-दर-पीढी के गुलाम हैं बस।

सुनकर ही रोहिणी का मन भर आया था- पर आज के जमाने में ऐसा कैसे हो सकता है? सोचने लगी थी वह जो दादी कहा करती थीं! राजा के अगाडी और पिछाडी दोनों की ही किस्मत खराब।

उसके बाद से वह नीलम और राजनंदिनी दोनों से ही दूर रहने लगी थी। जाने क्यों मन ही नहीं लगता था उसका उनके साथ। एक भय सा घेरे रहता। भय जो उस दिन भी लगा था जब बहुत मान मनौवल करके नंदिनी अपने महल ले गई थी उसे। जब भव्य बैठकी में १०१ मृत शेरों को आसपास खडे देखकर उसकी आंखें स्वतः ही बन्द होगई थीं। जब एकसाथ बीस-बीस पूडल को नंदिनी पर उछलते देखकर वह वापस अपनी कार में दौडकर भयभीत जा बैठी थी। कुत्त्ते उसे भी पसॅद थे और दो थे भी उसके पास, पर अक साथ इतने सारे संभालना, उनक् साथ खेसना वहीं आता था उसे। स्कूल में भले ही एक हो, कितनी अलग थी उनकी दुनिया । उसकी महक प्यार और अहसासों से भरी हुई और नंदिनी की ठंडी औपचारिक और डर की हद तक विशाल जिसमें खोने से डर चुकी थी रोहिणी। तब एकदिन राजनंदिनी ने ही फिरसे पहल की थी और आ घेरा था उसे, ‘सुनो रोहिणी मुझे यह पाठ समझ में नहीं आ रहा। क्या समझा दोगी ?’ और सहज ही समझा भी दिया था रोहिणी ने।

फिर तो रोज की ही बात हो गई थी और खुद-ब-खुद नंदिनी करीब होती चली गई थी उसके। हवा पानी और इच्छाएं बहना चाहें तो रास्ता ढूंढ ही लेती हैं अपना , नंदिनी ने भी ढूंढ लिया था । हद तो उस दिन हुई जब सुबह-सुबह इतवार के दिन घर आ पहुंची। बडी शेवरलेट जब पूरे लाव-लश्कर के साथ आकर रुकी तो घर ही नहीं, पूरे मोहल्ले में तहलका मच गया। पर रोहिणी वैसे ही अविचलित थी । हाथ पकडकर अंदर ले गई। फिर तो नंदिनी राजकुमारी नहीं, एक साधारण सहेली थी। बाद में शिमला से भेजी चिट्ठी में भी लिखा था उसने कि वह दिन उसकी जिन्दगी का सबसे यादगार दिन था। इतना स्नेह और संतोष कभी नहीं मिला था उसे।

दो घंटे ही तो रुकी थी वह और वहीं चौके में पीढे पर ही बैठी रही थीं दोनों सहेलियां । पता नहीं चूल्हे की आंच की गर्मी थी या मां की स्नेही मुस्कान जिसने इतना यादगार बना दिया उस एक साधारण और आम दिन को। वहीं बैठे-बैठे मां का स्नेह और भोजन कब उदरस्थ हो गया, पता ही नहीं चला था दोनों को। फिर थोडी देर अपने कमरे और बगीचे में भी ले गई थी रोहिणी , जहां अपनी गुडिया , किताबों और फल-फूल और पेड पौधे सभी से मिलवाया था रोहिणी ने नंदिनी को। शाम को दो चार और सहेलियां आने वाली थीं और सबका नौका-विहार का भी कार्यक्रम भी था। पर इतनी इजाजत नहीं थी उसे।

उसके बाद तो अगले महीने ही शहर से दूर मंहगे अंग्रेजी बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया गया था उसे। शुरु शुरु में एकाध पत्र आए थे नंदिनी के रोहिणी के पास। पर वह जबाव में कुछ भी तो नहीं लिख पाई थी। फिर वह सिलसिला भी बन्द हो गया था।

उससे अगली वह मुलाकात करीब-करीब दस साल बाद ही हुई थी।

अचानक और अप्रत्याशित ही मिल गई थी नंदिनी वैसे नदी सागर से जा मिलती है। दोनों पूडल को गोदी में लिए बैठी थी कार की पैसेंजर सीट पर और पिछली सीट पर दोनों गोल- मटोल सुंदर बच्चों को आया संभाले हुए थी। विश्वनाथ गली के बाहर बगल-बगल में ही तो खडी थीं दोनों की कार ज्ञानवापी के उस मुहाने पर। इतनी भीड नहीं होती थी तब ना ही ट्रैफिक पुलिस इतनी सख्त ही। बडी और दूर से ही पहचान में आने वाली गाडियों के लिए तो कतई और कभी नहीं। उलटे सलाम ही ठोकती थीं। फिर छोटी या बडी इतनी कारें थीं भी तो नही थीं तब। फिर इस मुलाकात को भी तो चालीस से अधिक वर्ष बीत चुके अब।

देखते ही लपककर बाहर आई थी नंदिनी और भींचकर गले लगाया था उसे।

खुशी उसके पोर-पोर से झलक रही थी। चहककर बोली थी, ‘शादी के बाद कितनी बदल गई है तू!’ रोहिणी ने टोका भी था तब सहेली को नख-शिख तक पूरा निहारकर-‘पर तू नहीं बदलेगी कभी। आज भी बस वैसे ही बस अपने कुत्तों के साथ, नितांत अकेली।’ तो हॅसकर बोली थी- ‘आदतें कब बदलती हैं ?’ पर उसकी आवाज का वह गीलापन अंदर तक छू गया था रोहिणी को। आंखें तक पनीली थीं अब तो दोनों की। नंदिनी की आंखों में वह बवंडर और आग नहीं थी, जिसे बचपन से देखने की आदी हो चुकी थी रोहिणी और यह अभाव चुभ रहा था उसे।

आग और पानी का कैसा मेल- जानती थी रोहिणीी। पर यह भी तो होता ही रहता है और कभी-कभी तो तबाही भी पूरी ही लाता है अनियंत्रित कामनाओं से, उनकी मनमानी से। वैसे भी तूफानों में कौन टिक पाया है! गुजर गए तो ठीक और तोड दिया तो पंझी तक जुट जाते हैं फिर से तिनका-तिनका घोंसला बनाने में। यही तो हैं दिन्दगी की चुनौतियों, ललकारती और दुलारती । निरंतर की हवा चाहिए इस आग और पानी को। और वही नहीं मिलती अक्सर। सामने खडी अजनबी युवरानी को तो शायद पूरा ही बदल दिया था जीवन के थपेडों ने। सजी-संवरी दिख तो रही थी पर अंदर से बेहद टूटी-बिखरी और अकेली ही लगी ।

नीलम के बारे में पूछा तो बोली उड गई पिंजरा तोडकर अपने यार के साथ…. कोई खबर नहीं, कहां है कैसी है? हमने ली भी नहीं। जरूरत ही नहीं थी! फिर कितना भी वक्त बदल चुका हो, हमारे पिंजरे भी तो इतने कमजोर नहीं हैं सखी!…

यादें गूंजतीं रहीं कानों में।

बाथरूम में जाकर दोबारा, तिबारा भरपूर पानी के छींटे मुँह पर मारे।

जगना ही होगा उसे।

यादों की लड़ी अंतहीन हो चली थी और हर बात बांटी नहीं जा सकती, यंत्र-बुद्धि से भी नही, जानती थी वह। फिर क्या बताती और क्यों बांटती धीर-गंभीर रोहिणी एक जड़ भावना रहित मशीन को, वह भी अपना मन हलका करने को? एक कंधा चाहिए सहारे को, एक स्पर्श चाहिए था उसे नेह भरा। दीन दुनिया की खबर तो थी नहीं यह जो सुनते ही छू मंतर भी हो जाती उसके दिमाग से।…

शैल अग्रवालं
संपर्क सूत्रः shailagrawal@hotmail.com
shailagrawal@gmail.com

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