
कोड़ी की कीमत
फोन की घंटी घनघना उठी। स्क्रीन पर किसी उर्वशी का नाम था। सोचा–‘कौन होगी?’ कुछ देर असमंजस में रहा, फिर फोन रिसीव कर कहा–‘हेलो !’
“पवित्र बोल रहे हो?” आवाज आई।
“हाँ, तुम कौन?”
“भूल गए?”
“कुछ याद नहीं पड़ रहा… तुम्हीं बतला दो !”
“तुम्हारे कॉलेज के समय की हीरोइन, जिसे तुम बहुत चाहते थे–‘उर्वशी’…याद आया?”
“ओह ! उर्वशी तुम….इतने सालों बाद आज अचानक? मेरा नम्बर कहाँ से मिला तुम्हें?”
“कॉलेज में हमारे साथ थी न….उमा त्यागी, आज-कल पहुँची हुई कवियत्री है। एक गोष्ठी में उनसे मुलाकात हो गई। तुम्हारी बातें चली तो नंबर मिल गया। आज सुकून से बात करने बैठी हूँ। तुम्हारे पास समय का अभाव तो नहीं है ना?”
“नहीं-नहीं, मुझे तो खुशी हो रही है कि तुमसे बात कर रहा हूँ।”
“हाँ, प्यार तो परवान चढ़ न सका, अब बातों से ही दिल बहला लें !…कुछ और जरिया तो है नहीं।”
“तुम छोड़कर गई तो दिल में मलाल था। लम्बे अर्से तक दिल की गहराई में तुम्हें बैठे हुए महसूस करता रहा। तुम शाहिद के साथ निकाह कर चली गई थी। लेकिन तुमने ऐसा किया क्यों? मुझे बीच मझधार में छोड़कर यूँ चले जाना मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा था?”
“वह मेरी भूल थी। मैंने तुम्हारे समर्पण और प्रीत को समझा ही नहीं था। उसके झाँसे में ऐसी आई कि पूरी कायनात में वही एक दिखता था।”
“अब कहो, वही प्रीत अब भी बची है या नहीं?”
“किससे….तुमसे या शाहिद से?”
“शाहिद से, मुझसे तो तुमने प्रीत की ही कब थी जो बची रहती?”
“कहा ना–मेरी भूल थी वह। सब्जबाग ऐसे दिखाए कि कुछ समझ ही नहीं सकी।” और वह बिसुरने लगी।
“क्या हुआ….लगा कि तुम रो रही हो ! कानो ने बिसुरने की आवाज सुनी है।”
“तुम्हारे कानों ने सही सुना है।”
“क्यों….जिसके लिए छोड़कर गई थी, उसने तुम्हारे प्यार को बिसरा दिया क्या?”
एक टीस और सिसकन बह चली थी। काँपती-सी आवाज में उसने कहा–‘धोखेबाज था वह….मुझसे निकाह करना साजिश थी, एक जिहाद था।…. आँखें जब खुली तब तक वह तलाक दे चुका था।”
“तलाक…!”
“हाँ तलाक….और फिर नदीम ने, उसी के नक्शे कदम पर चलते हुए फिर से मुझे फुसला लिया। मेरा घर-बार, नाते-रिश्ते, धर्म-संस्कृति सब तो छूट ही गए थे। उसी का फायदा उठाकर वे मुझे इस्तेमाल करते रहे। फिर ‘बोली’ लगने का सिलसिला शुरू हुआ।”
“मतलब…?”
“तुम्हें मेरी देह चाहिए तो बोली लगानी पड़ेगी और कोड़ियों के भाव मुझे खरीदा जा सकता है। मेरी कीमत ज्यादा नहीं है।”

किसका घर
“सुनों प्रतिभा, कुंभ स्नान के लिए चलते हैं। कुछ दिन घर से बाहर रहेंगे तो सुकून मिलेगा। बेटे और बहुओं में आये दिन की कलह से बचे भी रहेंगे।” देवेश ने पत्नी से कहा।
पत्नी ने पति को लाचार निगाहों से देखा। कुछ क्षण मौन रही। फिर कहने लगी–“आत्मिक शान्ति के लिए आध्यात्म ने प्रयास तो बहुत किए लेकिन सफलता नहीं मिली। चार दिन बाद वापस यहीं लौटकर आना पड़ेगा। चार दिन की खुशियों से बाकी बचा जीवन तो कटने वाला नहीं?”
“आस्था के मार्ग से भटक जाना ही दोष है। पता क्या, इस मार्ग से हम भी भटक रहे हों? और वहाँ सुकून के अच्छे दिनों में क्या मालूम, हम भगवान को प्यारे हो जावें। पहले चल तो पड़ें। वहाँ तय कर लेगें कि कहाँ समय बिताना है। और कैसे बचे दिनों को जीना है?”
“नहीं। जिस औलाद को जन्म दिया। समझा कि बुढ़ापे में ये हमारा ख्याल रखेंगे। वही बेकद्री करने लगें, तो बात समझ से परे हो जाती है।… उस दिन, तीनों लड़कों के बीच नौंक-झौंक के बाद जो झगड़ा हुआ, उसे बर्दाश्त करने की हिम्मत ना तुम्हारी रही, ना मेरी?”
“अभी तक तो इनके खर्चे हम ही कर रहे हैं। इतने पर भी ये हालत?.. खर्च करना बंद कर देगें, तब देखना–ये ना तुम्हारे रहेंगे, ना मेरे?”
“बात तो ठीक है।… अब मोह, प्रीत और ममता मिटती जा रही है। यहाँ भी रहने को मन नहीं है। सोचा नहीं था, ऐसे भी दिन देखने पड़ जाएँगे।… जैसा आपको अच्छा लगे, वही ठीक। आगे नसीब में जो होगा, देखा जाएगा?”
अगली सुबह। कंधों पर बैग लादे दोनों पति-पत्नी घर से बाहर निकल लिए। बेटे और बहुएँ तो नींद से जागे भी नहीं थे। वे सोकर ही देर से उठते हैं। उन्हें तो मालूम भी नहीं कि माँ-बाप कहीं बाहर जाने की तैयारी में हैं। घर से निकले और दस-पन्द्रह कदम ही चले थे कि पत्नी पीछे मुड़कर घर की तरफ अजीब-सी नजरों से देखने लगी।
देवेश ने पूछा–“पीछे मुड़कर क्या देख रही हो प्रतिभा?”
“देख रही हूँ, इस बसेरे को बनाने में, पूरा एक जन्म बीत गया। कितना परिश्रम किया और पसीना बहाया। तिनका-तिनका जोड़ कर इसे पूरा किया। सुख के दिन और रातें बीत गई। हमारा मोह था, इसे बनाने और सँवारने में। यह कभी हमारे सपनों का महल था। आज सोचती हूँ–“नहीं जानते थे कि यह घर कभी हमारा नहीं रहेगा?”

सुख
“हाँ बोलो, क्यों तुमने मुझे यहाँ बुलाया?” नाराजगी प्रकट करते हुए श्रद्धा ने परेश से पूछा।
“मिलने को जी चाहता था, इसलिए।” परेश बोला।
“अपने जी को काबू में रखो। अब हमारे बीच कुछ रह नहीं गया है। तुम्हें बताया तो था कि मैं अब किसी और की होने जा रही हूँ। तुम आगे से मुझे फोन भी नहीं करना।” तीखेपन से श्रद्धा ने कहा।
“देखो यहाँ सड़क पर खड़े रहकर कोई बात नहीं हो सकती। अंदर कैफे में कुछ देर बैठते हैं। या फिर सामने पार्क के एकांत में। एक लंबे अरसे तक हमने एक-दूजे को चाहा है। आज एकदम से इतनी लम्बी दूरी बना लेना ठीक नहीं। हमने प्यार किया था, फिर अचानक तुम्हारा यह फैसला?” परेश की आँखों में पानी छलक आया था।
“लेकिन मेरे पिता ने अब मेरा रिश्ता तय कर दिया है। अगले दस दिन में, फेरों में बंधकर मैं पोलैंड चली जाऊँगी। दिलों की वह चाहत अब खत्म हुई। भूल जाओ कि कभी हमने एक-दूसरे को चाहा था। वह हमारी भूल थी या जवानी का जोश था। लेकिन घर बसाने के लिए तो सीरियस होना पड़ता है। अब मैं कोई भी रिस्क लेना नहीं चाहती। अच्छा होगा कि तुम भी मुझे भूलकर किसी के साथ बंधन में बंध जाओ?” माथे पर लकीरें खिंच गई थीं।
परेश का मन दूखा। पूछा उसने–“और वह, जो तुम्हारे पेट में पल रहा है, मेरा अंश… उसका क्या?”
“अभी तो दो ही महीने हुए हैं। पोलैंड में कोई भी बहाना कर मैं उसे गिरा दूँगी।… और वो मेरी प्रोब्लम है।”
“तुमने तो मेरे साथ पूरा जीवन बिताने की कसमें खाई थी।” परेश की अधीरता बढ़ने लगी।
“खाई थी, लेकिन फिर विचार हुआ कि तुम मुझे वह ऐशो आराम, वह साधन नहीं दे सकते, जो पोलैंड में बसा मेरा मंगेतर मुझे देगा। उसके पास धन-दौलत है। अच्छी तनख्वाह वह पाता है। तुम कभी इतना नहीं कर पाओगे। मुझे अपना सुख तो देखना ही है।” श्रद्धा बोली।
“अच्छा रुको।… थोड़ी देर शान्ति से बैठकर विचार कर लेते हैं। सामने के पार्क की बेंच पर बैठ जाते हैं।” परेश उसे समझाने लगा।
“मुझे समझाने की जरूरत नहीं। ना मैं सहज तुम्हारी बातों में आने वाली। मैंने जो कहा, उसे समझने की कोशिश करो। अब मैं किसी और की हो चुकी हूँ। मुझे कोई बदनामी नहीं चाहिए और ना ही तुम्हारा कोई मशविरा।”
“मानता हूँ। मैं तुम्हें वह ऐशो आराम नहीं दे सकता, जो वह अमीर आदमी दे सकता है। लेकिन हम दोनों के बीच प्रीत का दरिया जो बहा, उसका क्या?”
क्रोध उमड़ा और बोली वह–“तुम्हें उस दरिया में डूबे रहना है तो डूबो, डूबकर चाहे मरो भी ! मुझे तो सुविधा से जीवन जीना है। अपना सुख देखना है। बगैर धन वह सुख तुम मुझे कभी नहीं दे सकते।… इसलिए अच्छा होगा कि तुम अपने रास्ते चलते बनो और मैं अपने रास्ते।” और क्रोध भरी आँखों से उसे घूरते हुये वह वहाँ से चली गई।

कहर
“तनिक देर आँखें बंद कर बैठ जा बिटिया। कई घंटों से रोती ही तो रही है। आँखें सूजकर लाल हो गई हैं। हृदय छीजने लगा है। बेचैनी बहुत है। आ मेरे पास… यहाँ बैठ। साँसों की धौंकनी को ठहर जाने दे ! रोने को पूरा जीवन पड़ा है, अब तो तनिक ठहर जा?” पहलगाँव से पति के शव के साथ लौटी बेटी से उसके पिता ने कहा।
“इन आँखों ने जिस मंजर को देखा है, ईश्वर किसी को भी ऐसा मंजर न दिखाए। मैंने कहा था विनय से, नहीं जाते कश्मीर… घर में जो सुकून है, बाहर कहीं नहीं… लेकिन वे नहीं माने।” और वह फिर से बिलख पड़ी। अंतस् की चीत्कार बाहर आती गई और वह तड़पती रही।
“तुम्हें जरा भी संदेह नहीं हुआ कि मिल्ट्री की ड्रेस में खुंखार आतंकवादी हैं, जानवर हैं?” पिता पूछने लगे।
“जब तक सोच पाते, गोलियाँ बरसने लगीं। विनय के साथ और भी बहुतों को गोलियों से छलनी कर दिया गया। उन्हें मारकर वे आगे बढ़े तो चीखकर मैंने कहा–‘कायरो जाते कहाँ हो, मुझे भी गोली मारो न?’ गन पर झपटी भी लेकिन छीन न सकी। गन अगर छीन लेती तो उन्हें जिंदा नहीं जाने देती।”
पापा का हृदय विदीर्ण हुआ और आँखों से तीव्र-वेग आँसू बहते चले गए। दुखी पिता बिलखती बेटी को गोद में समेटे दिलासा ही देते रहे।
बेटी पुनः चींखी–“कायरों ने कहा, अपने चौकीदार को बताना यह मंजर, तुझे इसके लिए ही जिंदा छोड़ रहे हैं।… और हैवानों ने दाँत निपोर दिए पापा। विनय तड़पते रहे और वे कहकहे लगाते वहाँ से चले गए। कोई मदद को नहीं आया। हरसूँ चींख लेने के बाद भी किसी ने हमारी आवाज तक नहीं सुनी।” दरिया बह चला और पापा ने बेटी के मुख को हथेलियों में सहेज लिया।

खेल पसारें
“अरे भाई, ये कैसा खेल पसार रहे हो? नफरत, नफरत क्यूँ खेल रहे हो? मत खेलो यह खेल।”
“हम क्यों नहीं खेलें यह खेल?”
“इस खेल से तुम्हें हासिल क्या हो रहा है?”
“बहुत कुछ…।”
“क्या बहुत कुछ?”
“इसी से तो हमारी रोजी-रोटी चलती है।”

डॉ. सुरेश वशिष्ठ, गुरुग्राम
मो. 9654404416