बाल कोनाः साझा यह संसार हमारा-शैल अग्रवाल

वह जामुन का पेड़ पुश्तैनी था। सभी पेड़ कट चुके थे , बगीचा मैदान बन चुका था पर वह अभी भी वहीं और ज्यों का त्यों ही खड़ा था, वजह-उस पर मीठे-मीठे जामुन आते थे। बस एक ही समस्या थी, घर के मालिक या उसके बच्चों को एक खाने को न मिलते, पकने के पहले ही सारी जामुन बंदर खा जाते। जो खा न पाते उन्हें भी तोड़-तोड़ कर जमीन पर बिखेर देते। चिढ़ जाते थे मालिक बंदरों को देखते ही और बंदर उन्हें देखकर। एक दिन तो हद ही हो गई, जब वह डंडा लेकर उन्हें भगाने जा रहे थे तो बंदर उनके मुँह से उनका चश्मा ही छीन ले गया। फिर तो लाख कोशिशों और केले के लालच के बाद भी कई टुकड़ों में कांच टूटा चश्मा ही वापस मिल पाया।
बहुत दुखी थे सभी क्या किया जाए और कैसे छुटकारा पाया जाए इन बन्दरों से?

झर्रे वाली बन्दूक तक से नहीं डरते थे बंदर। एक-आध को तो थोड़ी बहुत चोट भी लगी, फिर भी वही रोज-रोज का उपद्रव जारी रहा। हारकर पेड़ कटवाने का फैसला कर लिया मालिक ने। पर यह सुनकर तो चुनमुन का तो रोना ही नहीं रुक रहा था। असल बात यह थी कि उसे जामुन से भी ज्यादा बंदर अच्छे लगते थे। अब वह कैसे समझाए अपने पापा को कि बन्दरों को भी तो भूख लगती है- फिर इनके पास डबलरोटी भी तो नहीं जिसे सुबह सुबह खा लें ये? और इन्हें टाइनिंग ट्बल पर बैठकर खाना भी तो नहीं सिखाया किसी ने। यह सब तो छोड़ो इनके पास तो कोई घर तक नहीं। चिड़िया तक घोसला बनाकर रहती हैं पर ये तो वह भी नहीं करते? अब जो मिलेगा और जैसे आता है, वही तो और वैसे ही तो जिएँगे और खाए-पियेंगे बेचारे!

चुनमुन ने एक निश्चय किया कि मम्मी का झूठा बचा-कुचा खाना, जो मम्मी कूड़े में फेंक देती थीं, बन्दरों के लिए जामुन के पेड़ के नीचे एक कोने में रख दिया करेगी।

धीरे-धीरे बंदर उसे भी उतने ही प्यार से खाने लगे, वह भी बिना फैलाए । और पेड़ पर भी कई जामुन बचने और पकने लगीं, जो चुनमुन और उसके पापा बड़ा स्वाद ले-लेकर खा रहे थे।

हाँ, एक जादू और हुआ अब बंदर उन्हें देखकर गुर्राते नहीं, टुकुर-टुकुर राह देखते हैं चुनमुन की और उसके पापा की। इंतजार करते हैं उनका, जैसे कि एक दोस्त दूसरे की करता है।….

साझा यह संसार हमारा
धरती यह पूरी आसमान हमारा
नदिया, झरने, पंछी और पौधे
कितना सारा बिखरा खजाना हमारा
तरह तरह के लोग यहाँ पर
तरह तरह के जीव
रहेंगे सब मिल-जुलकर
तभी निभेगी प्रीत, जीने की रीत
सब अच्छे हैं बुरा कोई नहीं
शर्त यही बस अपना-सा जानो
उनका भी सुख-दुख पहचानो

शैल अग्रवाल
shailagrawal@hotmail.com
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