माह के कविः नरेन्द्र व्यास


|| जब मुझे बह जाना चाहिए था.. ||

मैं वहीं था-
जहाँ सब कुछ बह रहा था,
पर मैं नहीं।

नीचे-
गर्जन करती धारा,
तोड़ती किनारे,
ढोती हर वो चीज
जो कमज़ोर थी।

और मैं?
मैं चट्टान था,
— नहीं, बना नहीं था–
बना दिया गया था
हर उस पल में
जब मुझे बह जाना चाहिए था,
पर मैं ठहरा रहा।

कभी-कभी
स्थिर रहना भी
विद्रोह होता है।

|| कठोर गुठलियों की तरह ||

एक वक़्त था
जब वो आँगन ही मर्तबान था-
उसमें धूप भी मिलती थी,
छाँव भी,
और हँसी के साथ
थोड़ी-थोड़ी चुटकियाँ नमक की।

हम सब थे—
उसके एक-एक चटखारे मे
मेथी की तरह ठहरे,
सौंफ जैसे महकते,
कलौंजी की तरह थोड़े तीखे
पर ज़रूरी।

तब अचार बनता नहीं था-
सिंझता था,
हर रिश्ते के तेल में
धीरे-धीरे,
जैसे सब्र पकता है।

अब वो साझा मर्तबान नहीं है-
न वह आँगन,
न वह धूप
जिसमें सबका स्वाद बराबर था।

अब मेथी किसी के हिस्से,
सौंफ किसी के,
और दीवारें-
कठोर गुठलियों की तरह
अपने-अपने हिस्से के मसाले
अलग-अलग डिब्बों में ढूँढ़ती हैं।

कोई कहता है-
“मेरे बिना अचार नहीं बनता था”,
कोई कहता-
“मैंने सबसे ज़्यादा तेल डाला था।”
तो कोई-
हींग का अधिकार जताता।

पर सच तो ये है-
मर्तबान चटक चुका है।
और उस दरार से-
रिस गया है
हमारा साझा स्वाद।

अब जब-
कभी कोई अचार चखता हूँ,
तो उसमे स्वाद नही ढूंढता,
बस ये सोचता हूँ-
“क्या उसमें मेरे घर का
एक दाना भी बचा है?”

|| दरारें सिर्फ़ टूटन नहीं होतीं ||

वह दीवार गिरी नहीं थी,
न ही पत्थर पिघले थे-
बस कहीं,
एक छोटी सी दरार आई थी।

और ठीक वहीं,
उग आया था
एक नन्हा पीपल,
धरती की त्वचा से
फुट पड़ा था
भूली हुई प्रार्थना सा।

ना मौसम उसका था,
न आमंत्रण मिट्टी का।

फिर भी
वह उग आया,
जैसे-
पीड़ा में जन्म लेता शौर्य,
मौन के भीतर गूँजती वाणी।

उसने
दीवार को तोड़ा नहीं-
पर उसकी कठोरता को
बस थोड़ा-सा पसीना दिया।

कोई बड़ी क्रांति नहीं-
वह था
बस एक जीवन का
छोटा, सच्चा प्रमाण।

दरारें,
सिर्फ़ टूटन नहीं होतीं-
कभी-कभी वे
रखती हैं
कविता के बीज भी।

|| मटर के दाने ||

(डिब्बे में बंद कुछ हरे सुख)
????
रसोई के कोने में
एक टीन का डिब्बा रखा था-
जिसमें कुछ सूखे मटर के दाने थे।

न वे खाए गए,
न उगाए गए-
बस संभाल कर रखे गए थे
मानो माँ के आँचल की बँधी गाँठ में
कोई भूला हुआ आशीर्वाद।

हर दाना-
एक शाम था
जो बिना नमक की सब्ज़ी में
माँ के झुँझलाने से मीठा हो जाता था।

एक दाना ऐसा भी था-
जिसे मैंने दीवार पर फेंका था
गुस्से में,
जब माँ ने कहा था-
“अभी खेलने नहीं जाना..!”
वह अब भी चुपचाप पड़ा था,
उस चोट में थोड़ा मेरा बचपन था।

कुछ दाने काले पड़ चुके थे,
जैसे कोई बात जो
कभी कहनी थी, पर रह गई।
और कुछ-
आज भी हरे थे,
जैसे वह हँसी
जो किसी पुराने चुटकुले पर
अब भी फूट सकती है।

माँ ने कभी उन्हें उबालने की नहीं सोची-
शायद वो जानती थी,
वे पकने के लिए नहीं,
संजोने के लिए थे।

कभी-कभी
मैं उन्हें हथेली पर रख लेता हूँ-
वो खड़कते हैं
जैसे- घर के बर्तन,
जिनमें बचपन की दोपहरें पकती थीं।

एक दिन
एक दाना बोला-
“क्या अब भी मुझमे बचा है,
कोई स्वाद?”
या बस स्मृति?”

मैं मुस्कराया-
“तू वो है
जो भूख मिटाता नहीं,
पर जगा देता है।”

अब मटर के दाने
मेरे शब्दों में उगते हैं-
कविता की क्यारी में
हरे, कोमल, थोड़े मीठे
थोड़े कड़े,
पर हर बार-
ताज़े और सच्चे।

|| जल की देह पर सवार ||

यह नदी नहीं है-
यह एक दीर्घ श्वास है धरती की,
शांत, निःशब्द,
जैसे स्मृति के भीतर-
कोई बिम्ब तैरता हो धीरे-धीरे।

पानी की पारदर्शिता में
मैंने समय को देखा-
खुरदरे पत्थरों की त्वचा पर
उँगलियों-सा फिसलता हुआ।
यह क्या है?
एक स्तब्ध पुकार,
या केवल एक क्षण
जो ठहर गया है देखने के लिए।

कंकड़ों के बीच बहता प्रकाश-
न सूर्य है,
न कोई दिशा-
सिर्फ़ गति का रहस्य।

जैसे मैं वहाँ नहीं हूँ,
पर मेरी दृष्टि, मेरा अवचेतन
वहाँ जल की देह पर सवार है।

नदी के किनारे उगी घास
क्या किसी कविता का प्रारंभ है?
या अंत?
या केवल
वह स्पर्श जो किसी शब्द को
उच्चरित होने से पहले ही
मौन कर देता है।

मैं लौटता नहीं,
मैं ठहरता नहीं-
मैं केवल देखता हूँ
जैसे देखना ही
एकमात्र नैतिक क्रिया हो
इस पारदर्शी संसार में।

– नरेन्द्र व्यास
जन्म – ४ अक्टूबर
जन्म स्थान- जयपुर (राजस्थान )
कर्मभूमि – बीकानेर (राजस्थान)
शिक्षा- एम. ए. (हिन्दी साहित्य), डिप्लोमा इन कम्प्यूटर साइंस
साहित्यिक यात्रा- विगत लगभग 25 वर्षों से निरंतर साहित्य-साधना में संलग्न। हिंदी एवं राजस्थानी भाषाओं में समान रूप से लेखन। कविता, कहानी, निबंध, संस्मरण, आलोचना, व्यंग्य और साहित्यिक विमर्श—विविध विधाओं में रचनात्मक सक्रियता, आकाशवाणी मे समय-समय पर कविता पाठ।

हिंदी और राजस्थानी भाषा की विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन। वेब पत्रिका आखर कलश का संपादन।
प्रकाशित कृति- राजस्थानी भाषा में एक समवेत कविता संग्रह।
सम्प्रति- राज. अभियांत्रिकी महाविद्यालय, बीकानेर।

स्थाई पता-
नरेन्द्र व्यास
C/o. बी.डी. व्यास ‘पटवारी’
कीकाणी व्यासों का चौक, बीकानेर (राजस्थान)
पिन- 334001
मोबाइल न. 8769148138
ईमेल- vyasnarenk@gmail.com

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