मंथनः हमारे ये मूक सहवासी-शैल अग्रवाल

प्रकृति में कितने रंग हैं कितने जीव हैं हम इनसानों के अलावा भी, कभी-कभी तो बहुत आश्चर्य होता है कि कितनी विविध क्षमताओं से भरपूर भी हैं सभी! कोई बहुत दूर तक देख सकता है तो कोई बहुत तेज दौड़ सकता है। तो किसी की उड़ान बहुत ऊँची है तो कोई समुद्र की अतल गहराइयों में गोता मार सकता है।
बचपन से ही आकर्षित किया है प्रकृति की तरह ही इन नन्हे सहवासियों ने भी। बचपन में भी पर सर्कस में इन्हें देखना अच्छा नहीं लगता था। ना ही मदारियों के साथ। हाँ चिड़िया घर में जाकर जरूर देख आती थी। एक साथ और एक जगह पर कई देखने को जो मिल पाते थे। परन्तु इस अवधारणा ने भी मन कचोटा है कि जब सभी तरह के जीव जन्तु प्रदर्शन पर हैं यहाँ तो आदमी भी तो होना चाहिए , वह भी तो मात्र एक जैविक प्रकार ही है इन्ही की तरह? पर ऐसा कैसे संभव…प्रभु के बाद उसी की बनाई तो है यह दुनिया सारी , हमारा रहन-सहन, तौर-तरीके और जीवन!
भारत की बात करें या यहाँ ब्रिटेन की सबसे पहले तो वही ध्यान में आते हैं, जिन्हें हमने पालतू बना लिया । अपने संग घरों में रखा। यहाँ बगीचे में भांति-भांति की चिड़िया आती हैं। कुत्ते और बिल्लियों का तो बेहद प्रेमी देश है यह। हमारी पड़ोसन ने पन्द्रह बीस बिल्लियाँ पाल रखी हैं और भी जाने किस-किसकी बिल्लियाँ बेधड़क घूमती रहती हैं आगे-पीछे। आश्चर्य चकित थी जब क्लेयर ने बताया कि उसने अपनी फैट कैट को पन्द्रह हजार पौंड में खरीदा है। कुत्ते-बिल्लियों के लिए मोटी-मोटी रकम देना और उन्हें राजा महाराजा की तरह सारी शुख-सुविधाओं में रखना आम बात है यहाँ ब्रिटेन में। रखने वाले तो भारत में भी मिल जाएंगे ऐसे ही. अपनी सहेली अमिता याद आ रही है जो बच्चों की डॉक्टर थी और अपनी पालतू कुतिया सिल्की को खाना खिलाए बगैर , सारे विटामिन दिए बगैर खुद खाना नहीं खाती थी और जबतक घर में रहती थी गोदी से नहीं उतारती थी। देवीराजा थी जिसके पास एक दो नहीं पच्चीस कुत्ते थे और चार नौकरानियाँ पूरे वक्त उनकी सेवा सुश्रुसा में रहती थीं। …
चूंकि पास में ही सुरक्षित वन जैसा विस्तृत पार्क है यहाँ ब्रिटेन में घर के पड़ोस में ही, तो कभी-कभी हिरन भी आया। लोमड़ी तो अक्सर ही दिखती है। पीछे दूर बगीचे के एक कोने में इसने बच्चे भी दिए थे और एकबार तो भूखी बच्चे को मुंह में दबाए शीशे की बड़ी खिड़की से भी आ टकराई थी खाली स्थान समझकर। पार्क में तरह तरह के बतख और हंस हैं। गाय व गधे हैं। दूसरे अन्य अनगिनत पक्षियों के साथ। कभी-कभी अपने बगीचे में फव्वारे से पानी पीते फ्लैमिंगो और स्टार्क भी दिखे। जी हाँ वही स्टार्क जिनकी चोंच में नवचात बच्चे के साथ उसकी तस्बीर आप सभी ने देखी होगी। नीलकंठ और कठफोड़ा भी पहली बार यहीं पर देखा। कबूतर और गिलहरियों ने तो खेल का मैदान ही बना रखा है। उनके साथ-साथ स्टार्लिंग( सफेद काले कौए) कौवे और उल्लू व चमदागड़ भी दिख जाते हैं कभी-कभी। हैजहौग और केंचुए भी घूमते देखे और तालाब में तैरते मेंढक भी यह तो यहाँ ब्रिटेन में अपने घर में रह रहे सहजीवियों की बात कर रही हूँ, जिन्हें देखा अदृश्य और भी जाने कितने , जिनमें से कुछका आना तो बेहद नागवार गुजरता है। जैसे कि यहाँ के पैने दांतों वाले और गोलगोल आँखों वाले मोटे-मोटे चूहे जिन्होंने एकबार डेरा डाला था तो सालभर की कड़ी लड़ाई के बाद बड़ी मुश्किल से उन्हें घर के बाहर निकाल पाई थी। उसमें पड़ोसियों की बिल्ली भी कोई विशेष मदद नहीं कर पाई थीं मेरी इन्हें पकड़ने या मारने में। दूसरी तरफ के पड़ोसी का शिकारी बिलौटा एरिक चिड़ियों को तो मार-मारकर आधा-पूरा खाकर इधर-उधर पटक जाता पर उस चूहों के अतिक्रमण के समय एक भी चूहे को नहीं मार पाया। बगीचे में घूमती तितलियाँ बहुत अच्छी लगती थीं पर अब जाने क्यों उनकी संख्या कम होती जा रही है। उनकी जगह ले ली है लैवेंडर की लहलहाती झाड़ों पर मंडराती मधुमक्खियों ने। जिन्होंने अभी तक तो कभी नहीं काटा पर जिनका गुंजन सुनते ही मेहमान डर जाते हैं और सतर्क होकर घर के अंदर ही बैठना चाहते हैं।
यहाँ पौंड में तैरती मछलियों को पड़ोसी की बिल्ली खा जाती थी पर कोई विशेष असर नहीं होता था परन्तु याद आता है जब बचपन में भारत में बाबूजी ने पचास रंगबिरंगी खूबसूरत मछलियों से भरा फिशटैंक लाकर दिया था और दूसरे दिन ही जाने कैसे एक टाइगर मझली मर गई थी तो कितना रोई थी मैं फिर दूसरे दिन एक और वही उदासी व रोने धोने का क्रम जारी रहा। हारकर तीसरे दिन ही बाबूजी ने वह टैंक जाने किसे दे दिया। पूचने पर बोले कि तुझे खुश देखने के लिए लाया था, रुलाने को नहीं।…यह तो हुई पिछले पांच-छह दशक से रह रहे अपने घर ब्रिटेन और भारत में बिताए बचपन की एक याद। जहाँ जीवन के बुनियादी दो दशक बिताए वहाँ की और भी कई अनमोल यादें हैं। उस भारत की बात करूँ तो जीवन बिल्कुल भिन्न था। हाथी, उँट और घोड़ों की सवारी वहीं पर की। गधों की नहीं, जैसे यहाँ बीच पर बच्चों को घुमाया जाता है। भारत में तो गधे पर घूमना बेइज्जती समझी जाती है। एक बार जब दो साल की भारत गई मेरी बेटी को डन्की राइड की याद आई तो उसकी हर फरमाइश पूरी करने वाले मामा ने साफ मना कर दिया यह कहकर कि यह काम तो यहाँ नहीं हो सकता क्यों मेरी नाक कटाने पर तुली हो सपना । उसके बाद घोड़े पर घुमाकर लाए तो उसे घोड़े का शौक चढ़ गया। और अपने पोनी साइज के मेटल के यंत्रचलित घोड़े को वह सुबह शाम घास खिलाए बगैर ना वह सोती थी और ना ही स्कूल ही जाती थी। भारत में घर में गाय-भैंस थीं क्योंकि सबको शुद्ध ताजा दूध चाहिए था, एक दो नहीं १० १५ और साथ में अलशेशियन नर मादा कुत्तों का जोड़ा भी। बचपन में कछुआ , खरगोश, और छोटा खिलौने जैसा पामेरियन कुत्ता, रंग-बिरंगी मछलियाँ सब पाली थीं। बारह आने में तब एक से एक बढ़कर सभी खूबसूरत चिड़िया-बुलबुल, तोता और मैना मिल जाते थे , जिन्हें हम लाते , खिलाते-पिलाते और फिर उड़ा भी देते। पिंजरे में नहीं रखा। एकबार एक मिठ्ठू को रखा कि इसे अपनी तरह बोलना सिखाएँगे पर वह जब पिंजडे से सिर मारने लगा, चोंच से शलाख काटना शुरु कर दिया तो बगीचे में ले जाकर पिंजरा खोल दिया था और ताई जी से खूब डांट भी खाई थी तब क्योंकि हफ्ते भर के अंदर ही वह उनकी नकल में मिठ्ठू रामराम – कहने लगा था। बन्दर और बिल्लियों को कम ही पालते थे तब, फिरभी वह खुला अधिकार समझते थे पूरे घर, बगीचे अन्दर बाहर सभी जगह पर। पर एक आश्चर्य की बात अवश्य हुई किसी भी जानवर ने ना कभी काटा और ना ही डराया बचपन से ही। याद है एकबार शहतूत की डाल से बन्दर कूदा था और छह साल की मैं अपने तीन चार साल के भाई को जो डरकर रोने लगा था , बचाने के लिए उसके ऊपर उसे पूरा ढककर लेट गई थी फिर भी उसने मुझे नहीं भाई के दिखते जरा से पैर को ही काटा। फिर सात आठ साल की उम्र में दूसरा सामना हुआ जब स्कूल की ऊपरी मंजिल पर एक बंदर ने घेर लिया । सारे शिक्षक व सहपाठी दूर से देख रहे थे और सोच रहे थे क्या करें और तब मैंने चुपचाप अपना लंचबौक्स उसकी तरफ बढ़ा दिया था और वह चुपचाप एक शरीफ जानवर की तरह उसे लेकर चला गया था। वह दिन भी याद है जब बगीचे में बनाई अपनी स्टडी ( एक छोटी-सी कोठरी के दरवाजे पर एक लंगूर बैठा कटहली चम्पा की कलियाँ खा रहा था और मैं चुपचाप सांस खींचकर अपना काम करती रही थी और वह थोड़ी देर बाद खा-पीकर चुपचाप चला गया था। ऐसा ही कुछ उस दिन भी हुआ था जब स्कूल की पिकनिक पर रिहैन्ड बांध गए ते हम। बरसाती दिन थे पानी अच्छा-खासा था चारोतरफ और एक शिला से झरने जैसा पानी गिरता देखकर उसके नीचे जाकर बैठने का लोभ संवरण नहीं कर पाई थी। आँखें बन्दकर आनंद लेती रही कुछ देर फिर जब आंख खुली तो सामने दो हरे सांप का जोड़ा था मुश्किल से दो हाथ की दूरी पर। सांस तो अटकी पर मन ने कहा डरो मत, भागो मत , अगर आक्रमाक नहीं होओगी इनके प्रति, गलत नहीं सोचोगी तो चले जाएंगे ये। और यही हुआ भी । उनके जाते ही मैं भागकर वापस सहेली और शिक्षकों के पास थी। किसी को बताने तक की हिम्मत नहीं पड़ी, क्योंकि गलती तो मेरी ही थी। जाना ही नहीं चाहिए था मुझे यूँ अकेले। इस सबके उल्लेख का तात्पर्य बस यही है कि भले ही इन जानवर और जीव-जन्तुओं के पास भाषा न हो पर महसूस करने की , भावों को समझने की इन्द्रियाँ होती है। छोटे-से छोटे जीव के पास भी। यदि आप इनके प्रति सहज हैं, प्रकृति और अपने आसपास, इनके बीच रहकर इनके सह अस्तित्व को स्वीकारते हैं तो ये आपको नुकसान नहीं पहुँचाएंगे।
ऐसा ही तब भी हुआ था जब कानपुर में मैस्टन रोड वाली भाभी के यहाँ मैंने २०-२५ रोटियाँ बनाई थीं और चौके में बन्दर घुस आया था। तब भी चुपचाप वह रोटी का डिब्बा उसे पकड़ा दिया था बिना किसी विरोध के और वह चुपचाप चला गया था लेकर। बाद में भाभी ने हंसकर बताया था कि डंडा रखा है यहाँ दरवाजे के पीछे उससे डरातीं तो तुरंत भाग जाता। यूँ अपनी मेहनत बरबाद नहीं करते। पर मुझे तो वही सूझा था उस वक्त। शायद लड़ने का ख्याल ही नहीं आया भय में। शांति से समझौता ही बेहतर लगा।
बनारस में तो घर में ही नहीं सड़कों पर भी गाय और सांड घूमती थीं, हैं। सत्तर के दशक में जब तीन साल की बेटी को भारत लेकर गई तो उसने लौटकर अपनी शिक्षक को बताया कि ‘इन्डिया इज फनी कन्ट्री। काओज , डौग्स एन्ड पीपल औल कैन वाक टुगैदर औन द रोड। अर्थात बहुत फर्क देश लगा भारत उसे । वहाँ आदमियों के साथ-साथ गाय और कुत्ते भी सड़क पर चल सकते हैं।
तो ऐसा ही है हमारा सबको साथ लेकर जीने वाला, सह अस्तित्व वाला, वसुझैव कुटुम्बकम वाला भारत । फिर कुत्ते और घोड़ों की वफादारी के तो हजारों किस्से हम सभी ने सुन रखे होंगे। हमारे घर के बगल में ही एक तांगेवाला रहता था जिसकी मौत के बाद घोड़े ने किसी के हाथ से कुछ नहीं खाया, बीमार पड़ गया उसकी याद में और अंततः बूढ़ा घोड़ा- घोड़ी थी शायद मर भी गई। मेरे पास खुद अपने कुत्तों की वफादारी की बेमिसाल कहानियाँ हैं जिन्हें याद करके आज भी मन भर आता है। इन्ही मूक और बेबस नन्हे साथियों की स्मृति को सहेजकर समर्पित किया है मैंने आपके लिए इस आलेख कहूँ या संस्मरण में ताकि आप भी पढ़ें और आनंद लें और आँखें सजल कर लें उनकी याद में। यह नेह के रिश्ते होते ही ऐसे हैं। कबूतर और मुर्गियों को पालते उन्हें लड़वाते और फिर उन्हें कुछ हो जाए तो उनकी याद में बीमार पड़ते कईयों को देखा था बचपन में । आज फिर एक बार फिर उसी लगन उसी शिद्दत से इनकी देखभाल की जरूरत है ताकि ये सभी हमारी साथ रहें, इतिहास न बन जाएँ ये भी कहीं।…

सर्वाधिकार सुरक्षित @ www.lekhni.net
Copyrights @www.lekhni.net

सर्वाधिकार सुरक्षित @ www.lekhni.net
Copyrights@www.lekhni.

error: Content is protected !!