
शांत दिखते नीलकंठ तक बेचैन आकाश में उड़ रहे थे, जैसे चील गोल-गोल चक्कर लगाती हैं और राजहंस भी जल में तैर नहीं, अपितु व्यग्र खड़े थे। कैलाश पर शांति नहीं एक अज्ञात बेचैनी थी और दिन एक आम दिन नहीं, जाने क्यों लाख कोशिशों के बावजूद परबतिया भूल नहीं पा रही थी इन संकेतों को। फिर उस खुले आकाश के नीचे मानसरोवर का जल भी तो स्थिर नहीं था आज …चांदी के तारों सा झिलमिल करता कांपे ही जा रहा था बारबार सूरज की उन सुनहरी किरणों के नीचे बेचैन।
और कोई दिन होता तो गहरी सांस लेकर परवतियाय कहती कि फालतू का वहम नहीं करते , सब कुछ कितना अलौकिक है यहाँ पर, बिल्कुल स्वर्ग-सा ही तो। पर आज तो वह भी बेचैन ही थी और जाने किस भय में बेवजह ही दिल धकधक करे जा रहा था उसका भी सुबह से ही। वैसे ईमानदारी से देखा जाए तो ऐसी कोई बात नहीं थी जिससे डरा जाए, रोज-सा ही आम दिन था वह। बालों को लपेटकर जूड़े में बांध लिया तब परबतिया ने और तेज कदमों से वापस मुड़ ली।
सुबह के दस बज चुके थे और अभी तक एक भी यात्री शिवधाम तक नहीं पहुंचा था। परवतिया शायद इसीलिए बेचैन थी अब उन बादल, सूरज और लहरों की तरह। जानती जो थी परवतिया कि यह चिंता की बात तो थी पर इतनी भी नहीं कि उन्मन हुआ जाए! पल्लू कमर में घोंस वापस साफ-सफाई में जुट गईं बहनें। ऐसा भी होता है कि कोई नहीं पहुँचता कई-कई दिन। आसान भी तो नहीं यह दुर्गम चढ़ाई!
पर अगर बात रोटी-रोजी से जुड़ जाए तो इंतजार तो रहेगा ही और उसे भी था एक व्यग्र इंतजार… बर्फ से ठंडे जल में दोनों बहनें सुबह चार बजे ही डुबकी लगाकर तैयार हो जातीं और हर घंटे-आध घंटे पर मोड़ पर खड़ी होकर नीचे झांक भी आतीं…. मेहमान और साधु का तो वैसे ही कोई वक्त नहीं होता आने-जाने का।
बापू ने तो मना कर रखा था अकेले तलाब तक जाने को और अंधेरे में तो हरगिज ही नहीं। भेडिए आ जाएँ तो किसी को जीने लायक नहीं छोडते। मानसरोवर पर तो रात के अंधेरे में जाने कितनों की चीरभाड़ कर चुके हैं ये। जाने कितने किस्से हैं इनके वहशीपन के, आधी खाई-चबाई लाशों के … कहते-कहते बापू चुप हो जाते और दोनों बेटियों को गोदी में लेकर उनका सिर सहलाने लगते, मानो उनकी सुरक्षा के लिए प्रार्थना कर रहे हों मन-ही-मन।…
पर बेटियों को डर नहीं लगता था इन बातों से। परिचित जो हो चुकी थीं दोनों कैलाश से, मानसरोवर से । और डर तो बस अनजान का ही रहता है ना! फिर आदमी से बढकर और कौन-सा जानवर अधिक खूंखार होगा? जब इनसे निपट लेती हैं वह, तो इस भेड़िए से भी निपट ही लेंगी अगर सामने आ ही गया तो?
भोले बाबा की शरण में आकर निडर हो गई थीं बहनें- बड़ी खास करके। कहती परवतिया अठ्ठारह साल की हो चुकी हूँ सब जानती-समझती हूँ और तब चौदह की छोटी इन्दरानी टुकुर-टुकुर उसे देखती ही रह जाती । इस भेड़िए के डर से अपने नित्य कर्म कैसे बदल देतीं ? रोज गीता पढ़ती है परवतिया नहा-धोकर। कर्मयोगी कृष्ण निडर होकर कर्तव्य पथ पर चलने का, कर्म करते जाने का संदेश देते हैं रोज उसे।
एक वही तो वक्त होता था, जब खुली हवा में सांस ले सकती थीं बहनें, वरना तो बस काम-ही काम अगर एक भी मेहमान आ जाए! आसान थोड़े ही होता है शिवधाम चलाना, खास करके जितने पैसे पर वह चलाती हैं। पर उगता सूरज पल में ही अपनी उष्मित किरणों के स्नेहिल स्पर्ष से सारी थकान मिटा देता और अरग देते वक्त आकाश में बिखरे सारे रंग उनके सपनों में भर जाता- क्या पता इन यात्रियों में ही एकदिन उनका सपनों का राजकुमार मिल जाए! कितने चिंतित रहते थे बापू भी तो उनकी शादी को लेकर। कहते-कैसा अभागा हूँ। मेरी फूलों-सी राजकुमारी क्या यूँ ही उम्र निकालेंगी, साफ-सफाई करते, शिवधाम की उसकी देख-रेख करते-करते, प्रभु?
तब परबतिया मुस्कराकर गरम-गरम कहवा पकड़ा देती बापू को। सरक गया मफलर फिरसे गले में लपेट देती-रात भर खांसते हो, अपना ध्यान रखा करो, बजाय फालतू की चिंता करने के। यह रैन-बसेरा नहीं, भोले बाबा का आशीर्वाद है हमपर। है कोई इससा पूरी पहाणी पर?
बात तो सही ही थी । यूँ तो नीचे सरकारी आवास भी थे पर शिवधाम की प्राकृतिक छटा निराली थी, पूरी कुदरती और उनकी देखभाल व सुख-सुविधा भी ममत्व से भरपूर। तभी तो नीचे तराई का गांव छोड़ , खेती छोड़, यहाँ आ बसे थे तीनों प्राणी। पर जबसे माई गई और कोई था भी तो नहीं उनके लिए वहाँ गांव में, जिसका मोह बांधे रखता!
देखते ही रीझ गई थी परवतिया जब हवा के संग कैसी-कैसी पंछियों की गुटरगूँ ने स्वागत किया था उनका। फिर तो बड़ी सूझ-बूझ से की थी सारी साज-सज्जा तीनों ने मिलकर उस उजाड़ और वीरान गुफा की। अंदर वाली खोह में चार बिस्तर डाल दिए । जहाँ चार आराम से ठहर जाते हैं और बगल में ही परदे के पीछे एक बालटी गरम पानी हमेशा तैयार रहता। गरम खाना सुबह शाम और चाय और बिस्कुट जब चाहें तब। बस इतना ही इन्तजाम था वहाँ उनके पास। पर यह भी बहुत था घर से निकले और देवलोक में बैठे थके यात्रियों के लिए और वह भी इतने कम पैसों में। फिर सुविधाओं में भी तो कभी कोई कोताही नहीं होती थी शिवधाम में, बरफ के तूफानों में भी नहीं, आधी-पानी में भी नहीं और बाहर आते ही मानसरोवर और कैलाश दोनों के ही दर्शन हो जाते थे यात्रियों को। भला ऐसा मनभावन सौभाग्य और कहाँ मिल पाएगा उन्हें?
परबतिया खुश थी अपनी जिन्दगी से, अपने शिवधाम से। बूढा बाप कुछ खास तो नहीं कर पाता था, पर गिद्ध सा बैठा निगरानी पूरी कर लेता था, मजाल है कि एक चम्मच तक खो जाए या एक पैसे की भी हिसाब में भूल-चूक हो जाए।
यह बात दूसरी थी कि बैठे-बैठे ही हुकुम चलाता था और जरा-सी भी देर होने पर चीखने-चिल्लाने लग जाता। पर बेटियाँ सहनशील थीं, खास करके परवतिया। नाम माँ ने तो पार्वती ही रखा था उसका। परवतिया कैसे हो गया अब तो उसे खुद भी याद नहीं। वैसे ही शायद जैसे ये पहाणी पत्थर मौसम की मार से रंगरूप बदल लेते हैं। फिर जरूरत और मजबूरी दोनों ही तो थी उनकी कि शान्त रहें दोनों बहनें। वरना कौन रह पाता उस कलह के ज्वालामुखी के अंदर।
भूले-भटके ही सही, यात्री रहें, यही जरूरी था अक्सर ही आधे पेट खाकर सो जाने वाले उनके परिवार के लिए। परवतिया जानती थी कि सेवा से ही मेवा मिलती है और वह दिनरात सेवा कर रही थी , अपनों की ही नहीं, परायों की भी।
सारा काम नीचे-ऊपर का सब, खरीददारी और साफ-सफाई दोनों बहनें ही करती थीं, वह भी अंधेरा ढलने से पहले ही निपटा देतीं। और मौसम साफ हो तभी बाहर जातीं। बरफ पानी से इतना नहीं डरती थीं जितना कि पहाणी पर खड़े उस भेड़िए से। सुना है झुंड में ही चलते हैं हमेशा और जबतक आदमी संभले, शिकार को बोटी-बोटी नोच डालते हैं। रोज ही सुनती थीं बहनें बापू से यह भी! और कई बार देखा भी है उन्होंने इसे पहाण की चोटी पर छुपे खडे हुए। जाने सच में था भी वहाँ या फिर वहम भी तो हो सकता है उसका बर्फ पर पड़ती बादलों की परछांइयों की वजह से!बापू तो यही कहते हैं दूर से ही देखते रहते हैं भेड़िए, पास नहीं आते । सही वक्त का इंतजार करते हैं। पर यदि एकबार दिख ैसी भी जाएँ तो मुड़कर दोबारा मत देखना इनकी तरफ। देखोगी तो हमला कर देंगे। सो मुडकर नहीं देखतीं बेटियाँ इनकी तरफ । बस हनुमान चालीसा पढती भय का एक बोझ-सा कंधे पर लादे तेज कदमों से वापस लौट आतीं। हाँ, उस वक्त मीलों लम्बा अवश्य लगता वह छोटा-सा महकता-गमकता रास्ता उन्हें और बुरांस के फूलों से लदी फंदी पहाणी और नैसर्गिक सुंदरता से भी विमुख हो जाती भयभीत चेतना । सच असली भेडिया बाहर नहीं , अंदर का भय ही है, परबतिया का तो कम-से-कम यही मानना था। ऐसी सुन्दर और रम्य जगह…शिव का घाम है यह…सांप-बिच्छू शेर-चूहे-मोर सभी का… किसी को किसी से भय नहीं , वैर नहीं यहां!
मानसरोवर से इतनी नजदीकि की वजह से ही तो बहुत भाता है यात्रियों को उनका यह शिवघाम। विदेशियों को तो खास करके। सरोवर से दस कदम पर ही तो है छोटी सी गुफा, जिसे वह अब शिवधाम के नाम से पुकारती है और है भी शिवधाम ही- दरवाजे पर सिंह की छाल का बिछावन और दीवार पर बारहसिंघा का भव्य चमचमाता सिर… एक अलौकिक और रहस्यमय साज-सज्जा है शिवधाम की, बिल्कुल शिव के अनुरूप ही उनके लिए, जो शिव और मोक्ष को जानते और समझते हैं।
अहम का सिर काटकर पैरों के नीचे बिछाकर ही तो मिल पाते हैं शिव। फिर यहाँ तो हर यात्री आता ही शिव को पाने के लिए है।
माना कुछ-कुछ असहज करती है यह सज्जा कुछ यात्रियों को पर इससे ज्यादा साज-सजावट के लिए उनके पास और कुछ है भी तो नहीं। यह भी माना दोनों चीजें अब बहुत पुरानी हो चुकी हैं और तब की हैं जब बापू की बाजुओं में ताकत थी और वह शिकार पर जाया करते थे। पर चादर अनुसार ही तो पैर फैला पाएगा इनसान?
परवतिया ने देखा है कि कैसे भेडिए सी ही चमकती हैं कभी-कभी मरदों की आंखें रात के अंघेरे सी सियाह अंधेरी खोह में पर सिर पर एक छत तो है उसके और जीने का सहारा भी बन चुकी है अब तो। सोचते-सोचते ही मुस्कराकर इन्दरानी को और कसके चिपटा लेती परवतिया सीने से। बड़ी बहन जो थी। कम्बल सिर से पैर तक लपेटकर रात भर को छुप जातीं दोनों बहनें फिर तो, हिलती तक नहीं जबतक कि भास्कर देव रौशनी का अंजुरी दान न कर दें गुफा में।
आराम से कट रही थी तीनों की जिन्दगी… नियम और क्रम में पूरी तरह से सुव्यवस्थित।
पर उस दिन चार की जगह तीन बजे ही आँख खुल गई परबतिया की। सोई पड़ी बहनिया को हिलाया तो उठ भी बैठी।
फिर तो बिना आवाज किए इशारे ही इशारे में बाहर आ गईं दोनों।
‘आज जल्दी ही सही’, बस इतना ही कहा था परवतिया ने फुसफुसाकर और सुबह के नित्यकर्म के लिए चल पड़ी थी दोनों। भरपूर अमावस की रात थी वह। एक-दूसरे को भी नहीं देख पा रही थीं दोनों। अन्दाज से ही छाया-सी आगे को सरकती रहीं। एक तारा तक नहीं था आकाश में रोशनी के लिए और पत्थरों के टीले इतने ऊबड़-खाबड़ कि टकरा जाओ तो सीधे नीचे जाकर ही दम ले पाओ।
‘संभल-संभल कर ‘दोनों एक दूसरे से कहतीं और आगे बढ़ती चली गईं।
अगली पगड़ंडी पर मुड़ी ही थीं कि जोरदार घड़घड़ की आवाज सुनाई दी उन्हें। मानो भेड़ियों का झुंड-का-झुंड पीछे दौड़ा चला आ रहा था। पर मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं थी। जानती जो थीं कि भेड़िए के अलावा और कौन हो सकता है यहाँ पर, वह भी रात के इस अँधेरे में! कुछ पल तो भय से जमी-थमी हतप्रद खड़ी रहीं, पर जब खुदकी ही तेज चलती सांसों का शोर डराने लगा तो उलटे पैर भागीं दोनों अपने शिवधाम की ओर।
पर तबतक तो बहुत देर हो चुकी थी। लुढ़कती-पुड़कती और आधी जमी चट्टानें अब तक तेज और मोटी धार का रूप ले चुकी थीं। चारोतरफ के पेड़, पहाड़ी पत्थर सब बहे चले आ रहे थे उनकी तरफ मानो चारो तरफ से कई-कई सफेद , भूरे भेड़िए निकल आए हों और उनकी तरफ दौड़े चले आ रहे हों।
‘भाग इन्दु भाग। ‘ बस इतना ही कहा था तब भयभीत परबतिया ने।
इसके पहले कि भेड़िया उन तक पहुँचे भागना ही था अब तो उन्हें।
भयभीत आँखें बन्द करके भाग रही थीं परवतिया और इन्दरानी।
अचानक बरफ की सिल्ली-सा ठंडा और भारी कुछ टकराया इन्दरानी से और सुन्न कर गया उसे।
चीख तक फटी आँखों में ही जमी रह गई परबतिया की। कुछ समझ में आए उसके इसके पहले ही अपने साथ बहा ले चली थी तेज धार उसकी छोटी बहन, उसकी जिन्दगी, उसकी दाहिनी बाजू , उसकी इन्दरानी को।
इतनी जल्दी हुआ सब कि परवतिया सहायता मांगता इन्दरानी का हाथ तक नहीं पकड़ पाई। मिनटों में इन्दरानी पहाणी से लुढ़कती-पुड़कती पानी के बहाव संग नीचे जा पहुँची और पल में ही आंखों से ओझल भी हो गई। पत्थर सी वहीं जमी-थमी सारा अनर्थ देखती परवतिया खुद भी तो बही जा रही थी अब चट्टानों से टकराती, टूटे पेड़ों संग कूड़े-सी बहती, उखड़ी शाखों के सहारे पानी की तेज लहरों और उठती-गिरती भंवरों से बाहर निकलने की कोशिस करती और अपनी बहन को आंसू भरी आंखों से अभी भी ढूंढती।,,,
बर्फीली वह नदी पूरा चण्डी का रूप ले चुकी थी अब तक और बहती जाती परवतिया सोच रही थी, क्या इसी को प्रलय कहते हैं, या मोझ का मार्ग है यह? शिवधाम का, असली कैलाशपुरी का? बन्द होती परवतिया की आँखों में अब आँसुओं के संग कई-कई अनुत्तरित सवाल थे। और थी आखिरी सांस तक एक चिंता शिवधाम की, बूढ़े बाप की, अपनी आधी-अधूरी पीछे छूटी जिम्मेदारियों की- ‘कैसे अकेले-अकेले जीवन कटेगा बापू का दोनों बेटियों के बिना ? और कहीं यह पानी वहाँ उनकी गुफा में भी तो नहीं जा पहुँचा!
कोई उम्मीद नहीं थी फिर भी बूड़ने से पहले वह ढूंढ लेना चाहती थी अपनी उस बहन को भी जो उसके बिना एक निवाला तक मुँह में नहीं डालती थी पर आज इस दौड़ में उसे पछाड़ती उससे आगे निकल गई थी।
बेचैन आँखें इधर-उधर ढूंढती रहीं और धीरे-धीरे परवतिया की आधी चेतना भी लुप्त होती चली गई। सोचने-समझने की शक्ति, दर्द सहने ही नहीं महसूस करने तक की भी। फिर भी वह जगे रहना चाहती थी, बहन के मिल जाने की आस टूटी नहीं थी अभी भी। पर बहन कैसे मिलती, ऊँचे पर्वत पर खड़े भेड़िए ने दोनों बहनों को अपनी गिरफ्त में जो ले लिया था, वह भी दो झुंडों में बांटकर।…
बेहोश होती परवतिया को एक बात और समझ में आई उस वक्त कि पहाण की चोटी पर गश्त लगाता भेड़िया कोई और नहीं, खुद भोले बाबा ही तो थे, जो अब अपनी बाहें फैलाए उसके सामने खडे थे । खुद आए थे उसे संग ले जाने को।
फिर तो मिनटों में ही उँची-नीचे भंवरों संग जा समाई उनमें ही परवतिया।
…
अपनी तीसरी आँख खोल चुके थे अब कैलाशपति। प्रलयंकारी उनका डमरू बहते पानी की कलकल के साथ पूरे निनाद पर था उस वक्त और साफ सुनाई दे रहा था सभी को। पूरा कैलाश ही मानो पिघल-पिघलकर बह रहा था अब। अगल-बगल से बहती लाशों के सिर और बदन के ऊपर से तेजी से गुजर जाता कभी तो कभी उन्हें अनगिनत थपेड़े देता। कभी फुंकारती उंची-ऊँची लहरें बनकर ताण्डव करने लगता, तो कभी गोल भंवरों में निगल लेता सब कुछ। हाथ जोड़कर प्रणाम कर दिया था सभी ने शिव के इस रौद्र रूप को । पर डबडबाई और अंदर-बाहर पूरी जल में डूबी, कीच सनी परबतिया की हारी चेतना इतना अवश्य पूछना चाहती थीं अपने इष्ट से कि उन्हें ही इतना डराने की, इतना तोड़फोड़ करने की क्या जरूरत आन पडी थी ? भक्तों के साथ ही ऐसा रौद्र रूप क्यों? वे तो उनकी शरण में ही जी रहे थे!
त्रिशूली, गण्डक, कोसी, गंगा जाने क्या-क्या नाम गूंज रहे थे कानों में और एक नदी पूरे प्रवाह में बह रही थी भीतर-बाहर सभी के । भेड़ियों ने बेरहमी से दबोच रखा था शिकार को और जाने किस निराश शून्य की तरफ घसीटे ले जा रहा था वह उन्हें, गुडुप, गुडुप की कई आवाजें सुनी सभी ने और फिर सब शांस भी हो गया, कीचड़ के उस ऊँचे पहाण पर और कीच दसदस के उस अन्तहीन तालाब में भी। अब कोई नहीं था वहां पर सिवाय उस भेडियों के । उसके वापस लौटने के भय के जो हड्डी चीरती हवा में बर्फ सा ही जमा खड़ा था अभी भी वहीं पर, कैलाश के नीचे, चोटियो और झाडियों के पीछे, मानसरोवर के अगल-बगल की ऊँची-नीची सर्पीली राहों पर…सच कहें तो दुनिया भर के पिघलते पहाणों की चोटियों पर।…

शैल अग्रवाल
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